लोकसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने उन्हें प्रधानमंत्री आवास के पास प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने के बाद दिल्ली पुलिस के जवानों को लेकर विवादित बयान दिया है। राहुल गाँधी ने कहा कि मंगलवार (21 जुलाई 2026) को जब उन्हें 7 लोक कल्याण मार्ग से हटाया जा रहा था तब सुरक्षा कर्मियों ने निजी तौर पर उनसे मौजूदा सरकार को हटाने की बात कही। राहुल गाँधी के मुताबिक, पुलिसकर्मियों ने उनके कान में कहा, “इनको हटाइए।”
राहुल गाँधी ने दावा किया कि इस दौरान उनकी पुलिसकर्मियों से अलग-अलग बातचीत हुई। उन्होंने कहा, “एक पुलिसकर्मी ने कहा कि मैं राजस्थान से हूँ, हम तो सिर्फ वर्दी पहने हुए हैं। दूसरे ने कहा कि मैं हरियाणा से हूँ, इन्हें हटाइए। यानी ऐसी भावना मौजूद है और सब सच्चाई जानते हैं।”
उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मी अपने आदेश का पालन करने के लिए मजबूर हैं लेकिन उनमें से कई मौजूदा स्थिति से खुश नहीं हैं। राहुल गाँधी ने दावा किया, “उन्हें आदेश मानना पड़ता है, इसलिए वे अपना काम कर रहे हैं। लेकिन पुलिस भी जो हुआ है उससे खुश नहीं है। संवेदनशील पुलिसकर्मी मानते हैं कि यह देश के भविष्य के साथ अपराध है। वे इसमें अपने बच्चों का भविष्य भी देखते हैं।”
प्रदर्शन में अपनी मौजूदगी पर राहुल गाँधी ने कहा कि वह छात्रों के आंदोलन के साथ मजबूती से खड़े हैं। उन्होंने पुलिस के साथ हुई धक्का-मुक्की को मामूली बताते हुए कहा कि छात्रों के लिए खड़े होने की कीमत अगर ‘एक-दो मुक्के’ भी हैं तो यह बड़ी बात नहीं है।
आज हर छात्र कह रहा है, पुलिसवाले कह रहे हैं, पूरा देश कह रहा है – मोदी सरकार को जाना पड़ेगा।
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) July 22, 2026
विपक्ष के नेता के रूप में मेरी ज़िम्मेदारी हर भारतीय की आवाज़ बनना है – और उसके लिए हर कीमत छोटी है। pic.twitter.com/uSLu9Py3F5
यह घटना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर प्रदर्शन के दौरान हुई। राहुल गाँधी के साथ प्रियंका गाँधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खरगे, केसी वेणुगोपाल और पवन खेड़ा समेत कई कॉन्ग्रेस नेता मौजूद थे। इस धरने की जानकारी अंतिम समय तक कॉन्ग्रेस के कई सांसदों को भी नहीं थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियों और एसपीजी को भनक न लगे इसलिए यह योजना राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी वाड्रा और केसी वेणुगोपाल ने बनाई थी।
संस्थानों में अविश्वास पैदा करने की कोशिश
राहुल गाँधी का पुलिस की कथित नाराजगी पर जोर देना देश के संस्थानों के भीतर विभाजन पैदा करने की कोशिश है। पुलिसकर्मियों के निजी तौर पर सरकार के खिलाफ होने का दावा करके उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि सुरक्षा बल और पुलिस मौजूदा सरकार से असंतुष्ट हैं।
राज्य संस्थानों के भीतर मतभेद पैदा करना व्यापक राजनीतिक रणनीति का एक तरीका माना जाता है। सुरक्षा बलों की निष्ठा पर सवाल खड़े करने से सरकारी व्यवस्था को कमजोर करने और बड़े स्तर पर अस्थिरता का माहौल बनाने की कोशिश की जाती है। इतिहास में भी सुरक्षा बलों का मनोबल गिराने या उन्हें मौजूदा सरकार के खिलाफ करने की कोशिश को शासन परिवर्तन की रणनीतियों का हिस्सा माना गया है। जब राज्य संस्थानों की एकजुटता कमजोर पड़ती है तो किसी देश की राजनीतिक व्यवस्था भी अस्थिर हो सकती है।
सैन्य तख्तापलट (Military coup) वह स्थिति होती है जब किसी देश की सेना अचानक और गैरकानूनी तरीके से सत्ता पर कब्जा कर नागरिक सरकार को हटा देती है। इसमें लोकतांत्रिक चुनाव या संवैधानिक प्रक्रिया के बजाय बल या बल की धमकी के जरिए शासन अपने हाथ में लिया जाता है। दक्षिण एशिया के कई देशों में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं।
बांग्लादेश का मामला: अंदरूनी विश्वासघात की एक मिसाल
पड़ोसी देशों की हालिया राजनीतिक घटनाएँ दिखाती हैं कि राजनीतिक अस्थिरता और सरकारी संस्थानों के भीतर अविश्वास किस तरह सत्ता परिवर्तन का कारण बन सकता है। बांग्लादेश इसका एक बड़ा उदाहरण है जहाँ सेना के भीतर की परिस्थितियों ने सरकार गिरने में अहम भूमिका निभाई।
बांग्लादेश के राजनीतिक घटनाक्रम पर 15 नवंबर 2025 को प्रकाशित किताब ‘Inshallah Bangladesh: The Story of an Unfinished Revolution’ के बाद चर्चा तेज हुई। दीप हलदर, जयदीप मजूमदार और शहीदुल हसन खोखोन द्वारा लिखी गई इस किताब में बताया गया है कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को कैसे सत्ता से हटाया गया। किताब में हसीना सरकार के पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल ने सरकार गिरने को लेकर कई दावे किए हैं।
दिल्ली में लेखकों से बातचीत के दौरान खान कमाल ने सत्ता परिवर्तन को ‘CIA की पूरी तरह से रची गई साजिश’ बताया, जिसे लंबे समय तक तैयार किया गया। उन्होंने दावा किया कि बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान ने इसमें अहम भूमिका निभाई। कमाल ने कहा, “हमें नहीं पता था कि सीआईए ने वाकर को अपने प्रभाव में ले लिया था।” उन्होंने यह भी कहा कि डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस (DGFI) और नेशनल सिक्योरिटी इंटेलिजेंस (NSI) जैसी एजेंसियाँ प्रधानमंत्री को पहले से आगाह नहीं कर सकीं।

खान कमाल ने बांग्लादेश में विदेशी दिलचस्पी के दो प्रमुख कारण बताए। पहला, उनका दावा था कि वॉशिंगटन दक्षिण एशिया में एक साथ कई मजबूत नेताओं को सत्ता में देखना नहीं चाहता था। उन्होंने इसके उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और शेख हसीना का नाम लिया। दूसरा कारण उन्होंने बंगाल की खाड़ी में म्यांमार के तट के पास स्थित सेंट मार्टिन द्वीप का रणनीतिक महत्व बताया। पद छोड़ने से पहले शेख हसीना ने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि उन पर राजनीतिक समर्थन के बदले सेंट मार्टिन द्वीप तक पहुँच देने का दबाव बनाया गया था, जिसे उन्होंने देश की संप्रभुता के खिलाफ बताते हुए ठुकरा दिया।
लेखकों ने यह भी लिखा कि देश के भीतर सक्रिय कट्टरपंथी समूहों ने बाहरी खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर काम किया। खान कमाल के मुताबिक, पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) ने जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश के साथ मिलकर जन आंदोलन को भड़काया। उन्होंने कहा कि विदेशी प्रशिक्षण प्राप्त लोगों द्वारा पुलिस को निशाना बनाए जाने की चेतावनी मिलने के बावजूद जनरल वाकर ने शेख हसीना को भरोसा दिलाया कि सेना बिना पुलिस की मदद के हालात संभाल लेगी।
4 अगस्त 2024 की शाम गोनोभबन में हुई उच्चस्तरीय सुरक्षा बैठक में खान कमाल ने सुझाव दिया कि पुलिस ढाका में प्रवेश के सभी रास्तों को अपने नियंत्रण में ले। लेकिन जनरल वाकर ने यह प्रस्ताव खारिज कर दिया। उनका कहना था कि जनता को पुलिस पर भरोसा नहीं है और सेना ही स्थिति संभालेगी। कमाल ने कहा, “उस शाम उन्होंने उन पर भरोसा किया।” लेकिन 5 अगस्त 2024 की सुबह तक सेना के सीधे दबाव में शेख हसीना को इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा।
म्यांमार संकट: संवैधानिक तख्तापलट और सैन्य शासन
म्यांमार दक्षिण एशिया का एक और उदाहरण है, जहाँ सेना ने सीधे हस्तक्षेप कर चुनी हुई नागरिक सरकार को सत्ता से हटा दिया। 1 फरवरी 2021 को म्यांमार की सेना (तातमदाव) ने सत्ता पर कब्जा कर लिया, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को हटा दिया और उसके प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया।
1948 में स्वतंत्रता मिलने के बाद से म्यांमार की राजनीति पर सेना का गहरा प्रभाव रहा है। 1962 में पहला सैन्य तख्तापलट हुआ। हालाँकि, 2008 में नागरिक शासन की ओर बढ़ने के लिए नया संविधान लागू किया गया लेकिन उसमें सेना को व्यापक अधिकार दिए गए। संसद की 25 प्रतिशत सीटें सेना के लिए आरक्षित रखी गईं, 3 प्रमुख सुरक्षा मंत्रालयों का नियंत्रण सेना के पास रहा और आपातकाल की ऐसी व्यवस्था बनाई गई जिसे कई विश्लेषक पहले से मौजूद तख्तापलट की व्यवस्था मानते हैं। इसके तहत राष्ट्रीय संकट की स्थिति में सत्ता सेना को सौंपी जा सकती थी।
नवंबर 2020 के संसदीय चुनाव के बाद नागरिक सरकार और सेना के बीच तनाव बढ़ गया। आंग सान सू की की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) को स्पष्ट बहुमत मिला जबकि सेना समर्थित यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद वरिष्ठ जनरल मिन आंग ह्लाइंग के संसदीय प्रक्रिया से राष्ट्रपति बनने की संभावना खत्म हो गई। सेना ने बड़े पैमाने पर चुनावी गड़बड़ी का आरोप लगाया। हालाँकि, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय चुनाव पर्यवेक्षकों ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। इसके बावजूद सेना ने दोबारा चुनाव कराने और संसद की पहली बैठक टालने की माँग की।
जब सरकार ने 1 फरवरी 2021 को संसद की बैठक बुलाने का फैसला बरकरार रखा, तो सेना ने तुरंत तख्तापलट कर दिया। राष्ट्रपति विन म्यिंत, स्टेट काउंसलर आंग सान सू की और कई सांसदों को हिरासत में ले लिया गया। पूर्व सैन्य अधिकारी और उपराष्ट्रपति म्यिंत स्वे कार्यवाहक राष्ट्रपति बने और संविधान के अनुच्छेद 417 और 418 का इस्तेमाल करते हुए आपातकाल घोषित कर दिया। इसके साथ ही कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की सभी शक्तियाँ वरिष्ठ जनरल मिन आंग ह्लाइंग को सौंप दी गईं।
इस सत्ता परिवर्तन के बाद पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन, अशांति और हड़तालें शुरू हो गईं। इसके जवाब में नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट नाम की एक समानांतर सरकार बनाई गई और कई सशस्त्र प्रतिरोध समूह भी सामने आए। सत्ता बनाए रखने के लिए सेना की कार्रवाई ने म्यांमार को लंबे गृह संघर्ष में धकेल दिया, जिससे अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल गई।
ऐतिहासिक उदाहरण: भारत में आपातकाल से पहले का दौर
भारत के राजनीतिक इतिहास में पुलिस और सशस्त्र बलों की निष्ठा को प्रभावित करने की कोशिशों जैसी बातें पूरी तरह नई नहीं हैं। 1975 में आपातकाल लागू होने से पहले भी इसी तरह की बातें सामने आई थीं।
25 जून 1975 को विपक्ष के नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक सभा को संबोधित किया। अपने करीब 80 मिनट के भाषण में जेपी ने पुलिस, सशस्त्र बलों और सरकारी अधिकारियों से कहा कि वे सरकार के उन आदेशों का पालन न करें जिन्हें वे ‘गैरकानूनी और अनैतिक’ मानते हैं। जेपी ने इसे अहिंसक सविनय अवज्ञा का हिस्सा बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की तानाशाही प्रवृत्तियों के खिलाफ लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना है।
सभा में जेपी ने तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश एएन रे से भी अपील की कि वे इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ इंदिरा गाँधी की अपील की सुनवाई न करें, जिसमें उनके चुनाव को अमान्य ठहराया गया था। हालाँकि, उन्होंने कहा कि वह मुख्य न्यायाधीश की ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा रहे हैं लेकिन उनका तर्क था कि क्योंकि एएन रे की नियुक्ति तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को नजरअंदाज कर की गई थी, इसलिए जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है। लोकतंत्र पर खतरे की बात करते हुए जेपी ने कहा कि भारत न तो बांग्लादेश है और न ही पाकिस्तान, जहाँ मनमानी शासन को बिना विरोध स्वीकार कर लिया जाएगा।
इस रैली के बाद विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे की माँग को लेकर एक सप्ताह का सत्याग्रह शुरू किया और देशभर में आंदोलन चलाने के लिए लोक संघर्ष समिति (LSS) का गठन किया। बढ़ते राजनीतिक दबाव और सरकारी तंत्र से की जा रही अपीलों के बीच इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने 25 जून 1975 की रात देशभर में आपातकाल लागू कर दिया। इसके बाद मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए और कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले लिया गया।
मीडिया और ‘तख्तापलट’ की कहानी
मीडिया और राजनीतिक वर्ग द्वारा सेना की बगावत या तख्तापलट जैसी आशंकाओं को लेकर कहानी गढ़ने की प्रवृत्ति नई नहीं है। कॉन्ग्रेस के शासनकाल में भी सामान्य संस्थागत गतिविधियों को तख्तापलट की कोशिश बताने वाली खबरों का राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर कड़ा विरोध हुआ था।
इसका एक प्रमुख उदाहरण पत्रकार शेखर गुप्ता का 2012 में द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख था, जिसका शीर्षक था, ‘The January night Raisina Hill was spooked: Two key army units move towards Delhi without notifying govt’। इस रिपोर्ट में बिना सरकार को सूचना दिए सेना की दो प्रमुख टुकड़ियों के दिल्ली की ओर बढ़ने को संभावित तख्तापलट जैसी स्थिति के संकेत के रूप में पेश किया गया था।

इस रिपोर्ट की उस समय खूब आलोचना हुई थी। सिर्फ तत्कालीन सरकार ने ही नहीं बल्कि कॉन्ग्रेस के कई आलोचकों ने भी इस कथित साजिश की कहानी को सनसनी फैलाने वाला बताया। उनका कहना था कि यह पाठकों का ध्यान खींचने के लिए गढ़ी गई कहानी थी। इसी वजह से कुछ लोगों ने मजाक में शेखर गुप्ता को ‘कूप्टा’ (Coupta) भी कहना शुरू कर दिया।
ऐसे गैर-जिम्मेदाराना ‘तख्तापलट’ वाले दावे सशस्त्र बलों की छवि को तो नुकसान पहुँचाते ही हैं साथ ही साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे को कमजोर करते हैं। यह ऐतिहासिक उदाहरण दिखाता है कि सेना या पुलिस की कथित नाराजगी के आधार पर सत्ता परिवर्तन की कहानी गढ़ना लंबे समय से जिम्मेदार राजनीति या पत्रकारिता नहीं बल्कि सनसनी फैलाने का तरीका माना जाता रहा है।
इसी तरह, राहुल गाँधी का हालिया दावा कि पुलिसकर्मियों ने उनसे सरकार हटाने की बात कही वो भी इसी तरह की रणनीति का हिस्सा लगता है जिसमें सरकारी संस्थानों के भीतर असंतोष का संकेत देकर अस्थिरता की कहानी खड़ी करने की कोशिश हो रही है।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)


