राज्यों की पुलिस और देश की सेना से इतर सीआरपीएफ भारत का एक प्रमुख केन्द्रीय पुलिस बल है, जिसे आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने का काम देश ने सौंपा है। इसकी स्थापना 27 जुलाई 1939 को ब्रिटिश शासन के दौरान क्राउन रिप्रेजेंटेटिव्स पुलिस के रूप में हुई थी।
स्वतंत्रता के बाद 28 दिसंबर 1949 को संसद ने CRPF अधिनियम के तहत इसका नाम बदलकर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल कर दिया। यह केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। जानकारी के मुताबिक, अब तक सीआरपीएफ के 2255 बहादुर जवानों ने देश की सेवा में अपने प्राणों की आहूति दी।
क्यों हुई थी सीआरपीएफ की स्थापना
ब्रिटिश सरकार ने तत्कालीन रियासतों में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस बल का गठन किया था। आजादी के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसकी भूमिका का विस्तार करते हुए इसे देश की आंतरिक सुरक्षा की सबसे महत्वपूर्ण केंद्रीय पुलिस बल के रूप में विकसित किया।
28 दिसंबर 1949 में संसद में अधिनियम के जरिए इसका नाम बदलकर केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ किया गया था। इसके बाद इसकी भूमिका भी बदल गई। इसे केन्द्र के अधीन एक सशस्त्र यूनिट बनाई गई। सरदार पटेल ने इसे भारत की जरूरतों के मुताबिक ढाला था।
देशी रियासतों के एकीकरण और देश के विभाजन के दौरान हुए दंगों के निपटने में सीआरपीएफ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे पहले आजादी से पहले 1959 में हुए हॉट स्प्रिंग्स और आजादी के बाद 1965 में हुए सरदार पोस्ट की जंग में इसकी बहादुरी की गाथा आज भी गाई जाती है।
CRPF की भूमिका और जिम्मेदारियाँ
सीआरपीएफ राज्यों की कानून व्यवस्था को बनाए रखने में मदद करता है। देश में आतंकवादियों और उग्रवाद विरोधी अभियानों में सबसे आगे रहता है। नक्सल विरोधी अभियानों में सीआरपीएफ की अहम भूमिका रही, जिसके दम पर देश नक्सल मुक्त हो पाया यानी देश की आंतरिक सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने में इसकी भूमिका अहम है।
इसके अंतर्गत 246 बटालियन शामिल हैं। सीआरपीएफ का नेतृत्व महानिदेशक करता है और इसे चार हिस्सों में विभाजित किया गया है। जम्मू , कोलकाता, हैदराबाद और गुवाहाटी यानी उत्तर-दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों क्षेत्र के लिए अलग- अलग महानिदेशक हैं जो इस अर्धसैनिक बलों को कंट्रोल करते हैं।
कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी- देश के किसी भी क्षेत्र में हो रही सभाओं, विरोध प्रदर्शनों और दूसरे तरह की जमावड़े के दौरान भीड़ को नियंत्रित करना सीआरपीएफ की जिम्मेदारी है और इसके लिए इनके जवानों को तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
आतंकवादियों से निपटने के लिए हर खतरे वाली जगहों पर इसकी तैनाती होती है, जहाँ ये आधुनिक शस्त्रों से लैस होते हैं और इसके लिए इन्हें खास तौर पर प्रशिक्षित किया जाता है।
नक्सल मुक्त भारत बनाने में सीआरपीएफ का अहम रोल
सीआरपीएफ की यूनिट को खास तौर पर नक्सली क्षेत्रों में लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया गया है, इसलिए राज्य पुलिस के साथ मिलकर ये नक्सल प्रभावित राज्यों में अभियान चलाती रही हैं। स्थानीय लोगों के साथ मिलकर उनमें विश्वास पैदा करना और विकास परियोजनाओं को सुरक्षा देना भी इसका काम है।
कोबरा कमांडो बटालियन- नक्सलियों के गुरिल्ला युद्ध और जंगलों में अभियान को अंजाम देने के लिए सीआरपीएफ के कोबरा कमांडो बटालियन को बनाया गया है। ये बटालियन अपने काम को बखूबी अंजाम देता रहा है। देश को नक्सल मुक्त करने में इसकी अहम भूमिका रही है।
माओवादी नक्सलियों से जंगल में उनकी शैली में ही लड़ना कोई आसान काम नहीं है। ‘जंगल योद्धा’ के रूप में कोबरा कमांडो ने सही रणनीति अपना कर इसे निभाया। इसके लिए इन जवानों को खास प्रशिक्षण दिया गया है। 2008 से 2011 के बीच कोबरा की 10 इकाइयाँ बनाई गई। इन्हें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा, झारखंड आंध्रप्रदेश समेत दूसरे वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों में तैनात किया गया। इस बटालियन को जंगलों में अभियान चलाने में महारत हासिल है।
इतना ही नहीं सीआरपीएफ को वीआईपी सुरक्षा में भी लगाया जाता है। करीब 5.68 फीसदी सीआरपीएफ अभी भी वीआईपी सुरक्षा में लगे हुए हैं। देश के प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्रियों, लोकसभा के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति-उपसभापति समेत दूसरे गणमान्य लोगों की सुरक्षा में तैनात हैं।
इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम जैसे राज्यों के राज्यपाल, मुख्यमंत्री समेत तमाम मंत्रियों, सांसद-विधायक आदि की सुरक्षा के लिए इन्हें तैनात किया जाता है।
वीआईपी सुरक्षा विंग- सीआरपीएफ की वीआईपी सुरक्षा विंग को वीआईपी सुरक्षा में विशेषज्ञता हासिल है। जिन्हें ये सुरक्षा प्रदान करती हैं, उनमें केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राजनेता, सरकारी अधिकारी, आध्यात्मिक नेता, व्यवसायी और दूसरी प्रमुख हस्तियाँ शामिल हैं। यह खास इकाई वीआईपी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी सावधानी और पेशेवर अंदाज में काम करती है।
संसद भवन की सुरक्षा का जिम्मा भी पहले सीआरपीएफ निभाती थी। इसलिए जब 2001 में संसद पर हमला हुआ था तो सीआरपीएफ के जवान भी बलिदान हुए, लेकिन अपने अदम्य साहस से आतंकियों के मंसूबों को नाकाम किया था।
सीआरपीएफ का करीब 8.5 फीसदी हिस्सा देश के अहम प्रतिष्ठानों, हैरिटेज और आवास की सुरक्षा में लगे हुए हैं। उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में खास तौर पर इन्हें लगाया गया है। यहाँ सरकारी सचिवालय, दूरदर्शन केन्द्र, बैंक, टेलीफोन एक्सचेंज, विकास परियोजनाएँ और जेलों की सुरक्षा ये करते हैं।
लोकतंत्र के लिए सबसे अहम संसदीय चुनाव के दौरान इनकी भूमिका अहम होती है। चाहे लोकसभा चुनाव हो या किसी राज्य में विधानसभा चुनाव। सीआरपीएफ हर पोलिंग बूथ से लेकर ईवीएम को सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाता है। वोट देने आने वाले हर व्यक्ति पर उसकी नजर होती है।
यह गृह मंत्रालय, चुनाव आयोग और राज्य पुलिस के साथ समन्वय कर काम करता है। निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को सुनिश्चित करने में सीआरपीएफ का अहम रोल है। इसके लिए इन्हें खास ट्रेनिंग दी जाती है।
पर्यावरण, आपदा और यूएन मिशन में योगदान
सीआरपीएफ की यूनिट को जू, वन्यजीव अभ्यारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों की रक्षा के लिए भी तैनात किया जाता है। अवैध कटाई रोकने के अभियान में भी इन्हें लगाया जाता है। देश के किसी क्षेत्र में बाढ़- बारिश आए या भूकंप और सुनामी- चक्रवात जैसे प्राकृतिक आपदा, हर समय सीआरपीएफ मुस्तैद रहता है।
राहत और बचाव कार्यों में इसकी अहम भूमिका होती है। इसके लिए भी इन्हें खास ट्रेनिंग दी जाती है ताकि मानवीय सहायता करने में कोई दिक्कत पेश न आए।
सीआरपीएफ अंतर्राष्ट्रीय मिशन में भी जाता है। यूएन के अंतरराष्ट्रीय शांतिरक्षा के प्रयास में इसका योगदान रहा है। दुनियाभर में भीड़ नियंत्रण, आतंकवाद विरोधी अभियान और कानून व्यवस्था बनाए रखने में इसकी विशेषज्ञता का उपयोग किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय शांति मिशन पर सीआरपीएफ के पुरुष और महिला दोनों जाते हैं। इन्हें इसके लिए ट्रेनिंग दी जाती है।
दंगा नियंत्रण और वीआईपी सुरक्षा से लेकर उग्रवाद से निपटने में इसकी भूमिका अहम है यानी सीआरपीएफ का काम बहुमुखी है।
रैपिड एक्शन फोर्स – सीआरपीएफ की यूनिट रैपिड एक्शन फोर्स एक खास यूनिट है जिसे अक्टूबर 1992 में दंगों और हिंसा से निपटने के लिए बनाया गया था। यह संकट के वक्त तुरंत तैनात किया जाता है और शांति बहाल करना इसकी जिम्मेदारी होती है। आरपीएफ का अपना ध्वज भी है,जो शांति का प्रतीक है। इसे 7 अक्टूबर 2003 में तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने इसे ध्वज प्रदान किया था।
महिला बटालियन: सीआरपीएफ भारत का एकमात्र अर्धसैनिक बल है जिसमें 6 महिला बटालियन हैं। इसकी पहली महिला बटालियन का गठन 1986 में हुआ था। इसका नाम 88(एम) बटालियन है, जिसका मुख्यालय दिल्ली में है।
ये बटालियन खास तौर पर ऐसे आंदोलन या सभा जिसमें महिलाएँ ज्यादा होती हैं, वहाँ तैनात की जाती है, ताकि शांति व्यवस्था बनाने में दिक्कत न हो। इन जगहों पर पुरुष जवानों को तैनात करने में काफी दिक्कत हो सकती है, क्योंकि मामूली सी लापरवाही भी कानून-व्यवस्था की गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। महिला बटालियन यह सुनिश्चित करती हैं कि ऐसी स्थितियों को संवेदनशीलता और कुशलता से संभाला जाए।
सीआरपीएफ की राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता का इतिहास रहा है। इन उपलब्धियों में सीमा पर देश की सुरक्षा करने से लेकर आंतरिक खतरों से निपटने में इसका योगदान अहम है। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान जनता को राहत पहुँचाने और जानमाल की रक्षा में ये लगा रहता है। द
संसद की सुरक्षा से लेकर अयोध्या में हुए हमलों को नाकाम किया
संसद की सुरक्षा में तैनात सीआरपीएफ के जवानों ने 2001 में संसद में आतंकियों के हमले से रक्षा की। यही नहीं जब 2005 में अयोध्या में हमला हुआ तो उसे भी नाकाम किया। 80 के दशक में पंजाब का उग्रवाद हो या पूर्वोत्तर का संघर्ष हर जगह सीआरपीएफ ने स्थिति को नियंत्रित करने में भूमिका निभाई। यही वजह है कि इसे 2001 में प्राथमिक आंतरिक सुरक्षा बल का नाम दिया गया।
देश के अंदर उग्रवादियों से निपटने में सीआरपीएफ हमेशा आगे रहा है। यही वजह है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनात जवानों में एक तिहाई सीआरपीएफ के हैं। पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक और बिहार से लेकर आंध्र प्रदेश तक नक्सलवाद के उन्मूलन में इसका अहम रोल रहा।
ओडिशा, बंगाल और दक्षिण-पश्चिम राज्यों में चक्रवात आए हों या सुनामी, हर जगह सीआरपीएफ मदद के लिए सबसे आगे रहा है। 2001 का गुजरात में आए भयानक भूकंप, 2005 में आए जम्मू कश्मीर भूकंप में इसने राहत कार्यों की सबने सराहना की। हर साल बाढ़ देश के कई राज्यों को डुबोता है। ऐसे में कई गाँव और इलाके मुख्य मार्ग से कट जाते हैं। ऐसे जगहों तक राहत सामग्री बाँटने से लेकर लोगों को निकालने का काम भी सीआरपीएफ करती है।
संयुक्त राष्ट्र शांतिरक्षा अभियानों में सीआरपीएफ की अहम भूमिका रही है। श्रीलंका, हैती, कोसोवो और लाइबेरिया में सीआरपीएफ का काम काफी सराहनीय रहा।


