Homeदेश-समाजलाला जगत नारायण से लेकर ML मनचंदा तक: खाालिस्तानी आतंकवादियों का निशाना बने पत्रकारों...

लाला जगत नारायण से लेकर ML मनचंदा तक: खाालिस्तानी आतंकवादियों का निशाना बने पत्रकारों की कहानी

हथियार न उठाने वाले इन पत्रकारों और मीडियाकर्मियों का एकमात्र अपराध खालिस्तानी आतंकियों की सत्ता स्वीकार किए बिना सच को छापना और प्रसारित करना था।

यह 9 सितंबर 1981 की शाम थी। ‘हिंद समाचार’ समाचार पत्र समूह के 83 वर्षीय संस्थापक और मुख्य संपादक लाला जगत नारायण पटियाला से जालंधर की ओर अपनी कार से जा रहे थे। कार उनके ड्राइवर सोमनाथ चला रहे थे। एक रॉयल एनफील्ड बुलेट बाइक उनका पीछा कर रही थी, लेकिन शुरुआत में दोनों में से किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

जब वे लुधियाना से लगभग चार किलोमीटर दूर थे, तब मोटरसाइकिल ने रफ्तार बढ़ाई और कार के बगल में आ गई। चलती कार पर गोलियाँ चलाई गईं, लेकिन हमलावरों का निशाना चूक गया। सोमनाथ ने गाड़ी मोड़ने की कोशिश की, लेकिन सामने से आ रही एक बस ने रास्ता रोक दिया।

मोटरसाइकिल रुक गई। दो सशस्त्र व्यक्ति नीचे उतरे और फंसी हुई कार की ओर बढ़े। उन्होंने बिल्कुल करीब से गोलियाँ चलाईं। जगत नारायण को तीन गोलियाँ लगीं और कार के अंदर ही उनकी मौत हो गई। ड्राइवर सोमनाथ भी इस गोलीबारी में घायल हो गए।

लाला जगत नारायण की हत्या पंजाब में उग्रवाद के दौर में कोई अकारण किया गया हमला नहीं था। हमलावरों ने एक विशिष्ट व्यक्ति का पीछा किया था, उसका भागने का रास्ता बंद किया और तब तक गोलियाँ चलाईं जब तक कि वे आश्वस्त नहीं हो गए कि खाालिस्तानी आतंकवादियों के खिलाफ बार-बार लिखने वाला यह संपादक अब दोबारा कभी नहीं लिख पाएगा।

यह हमला पंजाब में उग्रवाद के दौरान प्रेस पर हुए सबसे शुरुआती और सबसे गंभीर हमलों में से एक बन गया। अगले दशक में खाालिस्तानी आतंकवादियों ने संपादकों, संवाददाताओं, रेडियो अधिकारियों और समाचार पत्र के कर्मचारियों की हत्याएँ कीं। उन्होंने डिलीवरी वाहनों पर हमले किए, अखबार बेचने वाले हॉकरों को गोलियाँ मारीं, संवाददाताओं को धमकियाँ दीं और यह तय करने वाले फरमान जारी किए कि कौन से शब्द छापे या बोले जा सकते हैं।

मीडिया अब केवल उग्रवाद को कवर नहीं कर रहा था, बल्कि वह खुद इस लड़ाई का एक मुख्य मैदान बन चुका था।

लाला जगत नारायण क्यों बने खालिस्तानी आतंकियों का निशाना?

लाला जगत नारायण ऐसे संपादक नहीं थे जिनका प्रभाव केवल एक छोटे से न्यूज़रूम तक सीमित हो। उनका हिंद समाचार समूह उर्दू भाषा में ‘हिंद समाचार’, हिंदी भाषा में ‘पंजाब केसरी’ और पंजाबी भाषा में ‘जग बाणी’ का प्रकाशन करता था। 1981 तक इन प्रकाशनों ने पंजाब और पड़ोसी राज्यों में एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार कर लिया था।

वह पंजाब के पूर्व मंत्री, सांसद और एक प्रमुख सार्वजनिक आवाज भी थे। उनके संपादकीय लेखों ने सांप्रदायिक अलगाव का विरोध किया, जरनैल सिंह भिंडरावाले की आलोचना की और सिख राजनीति में हिंसा के बढ़ते इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी।

इस तरह के हमलों के मुख्य कारणों में से एक 1978 में अमृतसर में भिंडरावाले के समर्थकों और संत निरंकारी मिशन के बीच हुई हिंसक झड़प थी। जगत नारायण ने इस घटना से जुड़ी कार्यवाहियों के दौरान निरंकारियों का समर्थन किया था और निरंकारी अनुयायियों की हत्या की कड़ी आलोचना की थी। उनके समाचार पत्र भिंडरावाले और हिंसा को सही ठहराने के लिए धार्मिक लामबंदी का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ संपादकीय छापते रहे।

जगत नारायण के विरोध को सिखों के प्रति दुश्मनी के रूप में पेश नहीं किया गया था। उन्होंने लगातार यह तर्क दिया कि राजनीतिक या धार्मिक मतभेदों को हिंदू-सिख संघर्ष में नहीं बदला जाना चाहिए। हालाँकि उनकी व्यापक पहुँच ने उन्हें उन लोगों के लिए विशेष रूप से खतरनाक बना दिया जो खाालिस्तानी अलगाववाद को पंजाब की सिख आबादी की एकमात्र सर्वमान्य आवाज के रूप में चित्रित करना चाहते थे।

उनके संपादकीय हिंदी, पंजाबी और उर्दू के पाठकों तक पहुँचते थे। इसलिए उनकी हत्या से केवल बदला लेने से कहीं अधिक हासिल किया जा सकता था। यह पंजाब के हर संपादक को यह चेतावनी दे सकता था कि उग्रवादियों का विरोध करने के परिणाम क्या हो सकते हैं।

हत्या की साजिश के सिलसिले में 19 सितंबर 1981 को भिंडरावाले को गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी से हिंसा और राजनीतिक लामबंदी शुरू हो गई, लेकिन इसके तुरंत बाद उसे रिहा कर दिया गया। घटनास्थल से गिरफ्तार किए गए नछत्तर सिंह को बाद में जगत नारायण की हत्या का दोषी ठहराया गया। अदालत के रिकॉर्ड से पता चलता है कि एक अन्य आरोपित स्वर्ण सिंह को बरी कर दिया गया था, जबकि तीसरा आरोपित मुकदमे से पहले ही फरार हो गया था। हालाँकि संस्थापक की हत्या भी उनके समाचार पत्रों को खामोश नहीं कर सकी।

रमेश चंद्र ने जारी रखा अपने पिता का अभियान

लाला जगत नारायण की हत्या के बाद उनके सबसे बड़े बेटे रमेश चंद्र ने हिंद समाचार समूह का कार्यभार संभाला। उन्होंने देखा था कि आतंकवाद के खिलाफ लिखने की क्या कीमत उनके पिता को चुकानी पड़ी थी। वह यह भी जानते थे कि उसी संपादकीय नीति को जारी रखने से वह और उनका संगठन लगातार खतरे में रहेंगे। इसके बावजूद समूह ने खाालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा की जाने वाली हिंसा के खिलाफ अपने रुख में कोई बदलाव नहीं किया।

रमेश चंद्र ने आतंकियों के खिलाफ लिखना जारी रखा और हिंदू-सिख एकता को बढ़ावा दिया। वह ‘बलिदानी परिवार फंड’ की स्थापना से भी जुड़े थे, जो आतंकवाद से प्रभावित परिवारों के लिए धन एकत्र करता था, जिसमें हिंदू और सिख दोनों पीड़ित शामिल थे।

अपने पिता की हत्या के तीन साल से भी कम समय बाद 12 मई 1984 को जालंधर में रमेश चंद्र की गोली मारकर हत्या कर दी गई। मीडिया रिपोर्टों में इस हत्या को खालिस्तानी आतंकियों द्वारा किया गया एक और बड़ा हमला बताया गया, ऐसे समय में जब पंजाब में हिंसा बहुत तेजी से बढ़ रही थी। वह एक कार्यक्रम से लौट रहे थे जब उन्हें गोलियों से भून दिया गया।

रमेश की हत्या के जरिए खाालिस्तानी आतंकवादी जो संदेश देना चाहते थे, वह साफ था। जब एक संपादक को मारने से समाचार पत्र समूह का रुख नहीं बदला, तो आतंकवादी उनकी जगह लेने वाले हर व्यक्ति के पीछे पड़ जाएँगे। लेकिन हिंद समाचार समूह का प्रकाशन जारी रहा।

इसके तीनों समाचार पत्रों की कुल साप्ताहिक प्रसार संख्या 1989 तक लगभग सात लाख प्रतियों तक पहुँच गई थी। यह संगठन उत्तरी भारत के सबसे बड़े समाचार पत्र समूहों में से एक बन गया था, लेकिन इसके कार्यालय तेजी से एक किलेबंद परिसर में बदलते जा रहे थे। इसके परिसरों के आसपास रेत के बंकर, सशस्त्र गार्ड और विशेष बैरियर लगाए गए थे। संपादक अपने साथ हथियार रखते थे। कर्मचारी अजनबियों को यह बताने से बचते थे कि वे कहाँ काम करते हैं। खतरा अब केवल मालिकों तक सीमित नहीं था।

सांप्रदायिक विभाजन के खिलाफ बोलने पर सुमीत सिंह की हत्या

खाालिस्तानी आतंकवादियों ने अपने निशानों को धर्म के आधार पर नहीं बाँटा। अलगाववादी विचारों को चुनौती देने वाले सिख पत्रकार भी उनके निशाने पर थे। सुमीत सिंह 30 वर्षीय पत्रकार थे और अपने परिवार द्वारा स्थापित एक प्रगतिशील पंजाबी साहित्यिक पत्रिका ‘प्रीत लड़ी’ के संपादक थे। वे धर्मनिरपेक्ष राजनीति, सांप्रदायिक सद्भाव और हिंदुओं तथा सिखों के बीच सहयोग का समर्थन करते थे।

22 फरवरी 1984 को खाालिस्तानी आतंकवादियों ने अमृतसर से लगभग 25 किलोमीटर दूर लोपोके गाँव में उन पर हमला किया। सुमीत सिंह के भाई द्वारा हमलावरों से हाथ जोड़कर यह कहने और यह बताने के बावजूद कि सुमीत सिंह खुद एक सिख हैं, उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।

मीडिया रिपोर्टों में उन्हें हिंदू-सिख एकता के समर्थक के रूप में बताया गया। लेकिन खालिस्तानी आतंकियों ने उन्हें गद्दार करार दिया क्योंकि उन्होंने इस विचार को खारिज कर दिया था कि सिखों और हिंदुओं को विरोधी राजनीतिक गुटों में विभाजित होना चाहिए।

उनकी हत्या ने खालिस्तानी आतंकियों के इस अभियान के असली चेहरे को उजागर कर दिया। एक सिख पहचान उस पत्रकार की रक्षा नहीं कर सकी जिसने खाालिस्तान को खारिज कर दिया था। निर्णायक कारक पीड़ित का धर्म नहीं था, बल्कि यह था कि उसके शब्द उग्रवादी मकसद में मदद कर रहे थे या बाधा डाल रहे थे।

बलदेव सिंह मान और सिख वामपंथ का खाालिस्तान विरोध

बलदेव सिंह मान एक और सिख लेखक थे जिनकी राजनीति ने उन्हें सीधे अलगाववादियों के सामने खड़ा कर दिया था। मान एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता और पंजाबी प्रकाशन ‘हीरावल दस्ता’ से जुड़े संपादक थे। उन्होंने खाालिस्तानी हिंसा की निंदा करते हुए और एक धर्मतांत्रिक अलगाववादी राज्य की माँग को खारिज करते हुए लेख लिखे और सार्वजनिक सभाओं को संबोधित किया।

26 सितंबर 1986 की आधी रात से ठीक पहले अमृतसर जिले के हर्षा छीना के पास दो बंदूकधारियों ने मान पर उस समय गोलियाँ चला दीं जब वे एक रिक्शा में यात्रा कर रहे थे। वे अपनी नवजात बेटी को देखने जा रहे थे। मौके पर ही उनकी मौत हो गई। मान की हत्या कम्युनिस्ट नेता दर्शन सिंह कैनेडियन की हत्या के ठीक एक दिन बाद हुई थी। दोनों व्यक्ति सिख थे। दोनों ने खाालिस्तानी उग्रवाद के खिलाफ सार्वजनिक रूप से अभियान चलाया था।

उनकी मौतों ने यह दिखाया कि उग्रवादी सिख कम्युनिस्टों, धर्मनिरपेक्षतावादियों और वर्ग राजनीति के समर्थकों को भी क्यों खत्म करना चाहते थे। ये आवाजें इस दावे का खंडन करती थीं कि यह संघर्ष भारतीय राज्य या हिंदू समुदाय के खिलाफ सिखों द्वारा सामूहिक रूप से लड़ी जा रही लड़ाई का प्रतिनिधित्व करता है। एक सिख का सार्वजनिक रूप से खाालिस्तान का विरोध करना उस आख्यान के लिए विशेष रूप से नुकसानदेह था।

पंजाब के जिलों में रिपोर्टर बने आसान शिकार

लाला जगत नारायण, रमेश चंद्र, सुमीत सिंह और बलदेव सिंह मान की हत्याओं ने अपनी सार्वजनिक पहचान के कारण ध्यान आकर्षित किया। जिला संवाददाताओं के पास वैसी मशहूरियत, संस्थागत सुरक्षा या राजनीतिक पहुँच नहीं थी। उन्हें पहचानना भी आसान था।

एक स्थानीय संवाददाता उन्हीं लोगों के बीच रहता था जिनकी खबरें वह कवर करता था। आतंकवादी उसके घर, कार्यस्थल, परिवार और दैनिक रास्ते को जानते थे। उसे सुबह एक धमकी भरा पत्र मिल सकता था और शाम तक उसका सामना उन लोगों से हो सकता था जिन्होंने वह पत्र भेजा था।

मई 1988 तक ‘इंडिया टुडे’ ने रिपोर्ट दी कि आतंकवादियों ने पिछले सात वर्षों के दौरान पंजाब में कम से कम छह पत्रकारों की हत्या कर दी थी और लगभग एक दर्जन अन्य पर हमला किया था। मृतकों में ज्ञानी जगजीत सिंह, नरेंद्र पाल सिंह और राज्य के सबसे अधिक हिंसा प्रभावित जिलों में काम करने वाले अन्य पत्रकार शामिल थे।

ज्ञानी जगजीत सिंह गुरदासपुर के एक पत्रकार थे, जिनकी एक सशस्त्र हमले में घायल होने के बाद दिसंबर 1986 में अमृतसर के एक अस्पताल में मौत हो गई थी। वे ‘अकाली पत्रिका’ से जुड़े थे।

खाालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा मारे गए हिंद समाचार समूह के कर्मचारियों की एक सूची में जगजीत सिंह नाम के व्यक्ति का भी नाम था। हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि वे अलग-अलग प्रकाशनों में योगदान देने वाले एक ही व्यक्ति थे या दो अलग-अलग व्यक्ति थे।

नरेंद्र पाल सिंह जिन्हें मीडिया में नरिंदर पाल सिंह पाल भी कहा जाता था, तरनतारन से ‘पंजाब केसरी’ और ‘जग बाणी’ के लिए काम करते थे। वे 1987 में मारे गए थे, जब तरनतारन और सीमावर्ती जिले कड़े पहरे वाले समाचार पत्र कार्यालयों से बाहर काम करने वाले रिपोर्टरों के लिए सबसे खतरनाक स्थानों में से एक बन गए थे।

खतरा सिर्फ रिपोर्टिंग के स्तर तक सीमित नहीं था। खबरों के चयन, संपादन और प्रस्तुति के लिए जिम्मेदार डेस्क पत्रकारों को भी निशाना बनाया गया। ‘जग बाणी’ के मुख्य उप-संपादक बंत सिंह की मई 1988 में हत्या कर दी गई थी। एक डेस्क संपादक के रूप में, उन्हें उग्रवादियों की तलाश में गाँवों में जाने की आवश्यकता नहीं थी। उनका कथित अपराध समाचार पत्र में छपने वाली सामग्री से जुड़ा था।

एक महीने बाद 4 जून 1988 को स्कूटर पर आए आतंकवादियों ने होशियारपुर में एक छोटे से स्कूल के बाहर परदुमन सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी, जिसे वे चलाते थे। वे ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ (पीटीआई) और ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के लिए जिले को कवर करते थे और पंजाब आधारित प्रकाशनों में भी योगदान देते थे।

पुलिस ने तुरंत कोई कारण नहीं बताया। हालाँकि मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि खाालिस्तान के खिलाफ लिखने के कारण अन्य पत्रकारों की भी हत्या की गई थी। उस समय परदुमन सिंह को उग्रवाद के दौरान आतंकवादियों द्वारा मारा गया आठवाँ पत्रकार बताया गया था।

अगले ही महीने हिंद समाचार समूह ने अपने समाचार संपादक इंद्रजीत सूद को खो दिया। सूद ने संगठन के भीतर वर्षों बिताए थे और जगत नारायण हत्या मामले की जाँच से जुड़ी मुकदमेबाजी में बचाव पक्ष के गवाह के रूप में भी पेश हुए थे। जुलाई 1988 तक उनके पास एक ऐसी भूमिका थी जो सीधे तौर पर इस बात को प्रभावित करती थी कि समाचार पत्रों में उग्रवादियों की मौतों और आतंकवादी हमलों को कैसे प्रस्तुत किया जाता है।

खाालिस्तान कमांडो फोर्स के चीफ लाभ सिंह की हत्या के बाद जालंधर में समूह के कड़े पहरे वाले कार्यालय के पास उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

उग्रवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले मीडिया घरानों ने खुद दावा किया कि लाभ सिंह की मौत की रिपोर्टिंग के दौरान ‘जग बाणी’ में इस्तेमाल की गई भाषा के बदले में सूद की हत्या की गई थी। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, उनकी हत्या इसलिए की गई क्योंकि समाचार पत्र ने एक मरे हुए आतंकवादी का वर्णन उस सम्मान के बिना किया था जिसकी माँग उसके चाहने वाले करते थे।

बिना सुरक्षा के काम करने वाले संवाददाताओं तक फैले हमले

पत्रकारों पर ये हमले 1990 तक उन कस्बों तक फैल गए जहाँ जिला संवाददाता वरिष्ठ संपादकों को उपलब्ध किलेबंद कार्यालयों और व्यापक सुरक्षा के बिना काम करते थे।

नानक चंद नागपाल सुनाम के एक अनुभवी प्रेस रिपोर्टर थे। 1987 के पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के एक फैसले में उनकी पहचान उर्दू दैनिक ‘प्रताप’ के संवाददाता के तौर पर की गई थी और कस्बे से स्थानीय न्यायिक और राजनीतिक घटनाओं की रिपोर्टिंग में उनकी भूमिका दर्ज की गई थी। 1990 में संगरूर जिले में उनके घर के पास उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

जालंधर समाचार पत्र समूह के जगराँव बेस्ड पत्रकार भाग सिंह खेला की सितंबर 1990 में शेरपुर कलाँ गाँव में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस समय की मीडिया रिपोर्टों में उल्लेख किया गया था कि वे एक कार्यरत पत्रकार थे जिनकी पंजाब में एक खास हिंसा वाले सप्ताह में हत्या कर दी गई थी।

वामपंथी समाचार पत्र ‘नवाँ ज़माना’ से जुड़े रिपोर्टर और फोटोग्राफर बलबीर सिंह सग्गू को आतंकवादियों और पुलिस दोनों के दबाव का सामना करना पड़ा था। 1988 की इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि आतंकवादियों ने उन्हें कई साल पहले स्वर्ण मंदिर के पास अपना फोटोग्राफी स्टूडियो बंद करने के लिए मजबूर किया था। एक असाइनमेंट को कवर करने के दौरान पुलिस ने भी उनके साथ बदसलूकी की थी।

12 नवंबर 1990 को अमृतसर में गुरु नानक देव विश्वविद्यालय परिसर में सशस्त्र खाालिस्तानी आतंकवादियों ने सग्गू की गोली मारकर हत्या कर दी। उसी हमले में ‘पंजाब केसरी’ से जुड़े पत्रकार नरेंद्र शर्मा घायल हो गए थे।

अमर नाथ वर्मा की हत्या 8 फरवरी 1991 को कर दी गई थी। संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश विभाग के उस वर्ष के मानवाधिकार मूल्यांकन में उनकी पहचान एक पत्रकार और साप्ताहिक ‘कौमी बुलहारा’ के संपादक के रूप में की गई थी और कहा गया था कि आतंकवादियों ने उनकी हत्या कर दी थी।

ये हत्याएँ सजा की एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा थीं जिसमें पत्रकारों को खाालिस्तान की आलोचना करने, उनके बयानों को छापने से इनकार करने, किसी आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करने या बहिष्कार के तहत रखे गए प्रकाशन के लिए काम करने के कारण मारा जा सकता था।

हिंद समाचार के हॉकर और एजेंट भी निशाने पर थे

हिंद समाचार समूह ने सबसे लंबे समय तक चले इस अभियान का सामना किया। 1989 तक समूह ने अपने संस्थापक, उनके बेटे और सात संपादकीय कर्मचारियों को खो दिया था। इसके बाद आतंकवादियों ने अपनी रणनीति बदल दी। केवल संपादकों और रिपोर्टरों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, उन्होंने उस व्यवस्था पर हमला करना शुरू कर दिया जो समाचार पत्रों को प्रिंटिंग प्रेस से पाठक तक ले जाती थी।

जून 1989 में खाालिस्तान कमांडो फोर्स के आतंकवादियों ने अपने तीनों समाचार पत्रों का प्रकाशन बंद करने के आदेश को मानने से इनकार करने के बाद हिंद समाचार के कर्मचारियों और समाचार पत्र विक्रेताओं पर हमला किया। चंडीगढ़ के पास दो हमलों में चार कर्मचारी मारे गए।

अगले कुछ हफ्तों में हुए हमलों की सीरीज के दौरान अखबार बाँटने वाले सात कर्मचारियों की मौत हो गई, जिनमें किशोर छात्र भी शामिल थे। लुधियाना में जब हॉकर अखबारों के बंडल खोल रहे थे, तब एक बम विस्फोट हुआ जिसमें लगभग एक दर्जन लोग घायल हो गए।

पुलिसकर्मियों ने साइकिलों पर अखबार विक्रेताओं के साथ जाना शुरू कर दिया। अखबार डिस्ट्रीब्यूशन वाले रूट की सुरक्षा के लिए हर सुबह सैकड़ों पुलिसकर्मियों को तैनात किया जाता था। लगभग 30 हॉकरों ने काम करना बंद कर दिया, जबकि प्रसार संख्या में कथित तौर पर लगभग 60,000 प्रतियों की गिरावट आई।

पीड़ित केवल पत्रकार नहीं थे। हिंद समाचार समूह के नुकसान में शामिल लोगों में संपादक, रिपोर्टर, हॉकर, एजेंट, ड्राइवर, वितरक और सुरक्षाकर्मी शामिल थे। उनके काम अलग-अलग थे, लेकिन उन्हें निशाना बनाए जाने का कारण एक ही था। प्रत्येक ने आतंकवादियों के आदेश के बावजूद समाचार पत्रों को जनता तक पहुँचाने में मदद की कि उन्हें बंद कर दिया जाए।

18 जुलाई 1990 को गरांव के पास फिरोजपुर की ओर जा रही हिंद समाचार के समाचार पत्र वितरण वाहन पर बंदूकधारियों ने हमला कर दिया। तीन पुलिस गार्डों सहित अंदर सवार सभी पाँचों लोग मारे गए। हिंद समाचार समूह से जुड़े लगभग 40 विक्रेता, एजेंट और हॉकर मारे गए। इसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत कर्मचारियों को मारना नहीं था। इसका उद्देश्य प्रकाशन को आर्थिक और भौतिक रूप से असंभव बनाना था।

आतंकवादियों ने यह तय करने की कोशिश की कि किन शब्दों का इस्तेमाल करें पत्रकार

पत्रकारों पर हमलों के साथ-साथ लिखित आदेश, टेलीफोन पर धमकियाँ और कथित आचार संहिता भी जारी की गई। आतंकवादियों के बयानों में अक्सर यह चेतावनी होती थी कि समाचार पत्रों को उनके बयानों को पूरा छापना होगा। संपादन करने, छोटा करने या दावों पर सवाल उठाने पर सजा मिल सकती थी। पत्रकारों को अधिकारियों के दबाव का भी सामना करना पड़ा, जिन्होंने पुलिस के दुर्व्यवहार या उग्रवाद विरोधी अभियान में विफलताओं के बारे में रिपोर्टों पर आपत्ति जताई।

रिपोर्टर एक तरफ उस प्रशासन के बीच फंसे थे जो अनुकूल कवरेज चाहता था और दूसरी तरफ आतंकवादियों के बीच जो मानते थे कि उनके पास संपादकों को मौत की सजा देने का अधिकार है।

नवंबर 1990 में सोहन सिंह के नेतृत्व वाली पंथिक कमेटी ने पत्रकारों, संपादकों और स्तंभकारों के लिए एक कोड जारी किया। खाालिस्तान के लिए अभियान चलाने वालों को ‘उग्रवादी’ या ‘स्वतंत्रता सेनानी’ कहा जाना था, न कि आतंकवादी। सरकारी जनसंपर्क अधिकारियों को हिंदी या अंग्रेजी में सामग्री जारी न करने का आदेश दिया गया।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इस फरमान में घोषणा की गई कि आपस में जुड़े 5 आतंकवादी संगठनों के नेता किसी पत्रकार या संपादक को मौत की सजा सुना सकते हैं। पंथिक कमेटी यह तय करेगी कि सजा पर अमल किया जाए या नहीं और वह किसी भी अपील पर सुनवाई भी करेगी।

उग्रवादियों ने आरोप लगाने, सजा सुनाने और उस पर अमल करने की अपनी व्यवस्था बना ली थी। एक पत्रकार को उसी संगठन द्वारा दोषी ठहराया जा सकता था जिसकी वह रिपोर्टिंग कर रहा था, जिसमें धमकी और गोली के बीच कोई कानून, सबूत या स्वतंत्र प्राधिकरण खड़ा नहीं था।

प्रसारण शब्दावली को लेकर राजेंद्र कुमार तालिब की हत्या

पत्रकारों को निशाना बनाने का खालिस्तानी आतंकियों का यह अभियान जल्द ही निजी स्वामित्व वाले समाचार पत्रों से ऑल इंडिया रेडियो तक फैल गया। चंडीगढ़ में ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन निदेशक राजेंद्र कुमार तालिब एक सम्मानित उर्दू कवि भी थे। 6 दिसंबर 1990 को दो आतंकवादी उनके घर में घुसे और उनकी गोली मारकर हत्या कर दी।

सोहन सिंह के नेतृत्व वाली पंथिक कमेटी का समर्थन करने वाले पाँच संगठनों ने कुछ ही दिनों में जिम्मेदारी ली। समूहों ने कहा कि उनकी तालिब से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी और उन्होंने उनकी हत्या को ‘ऑपरेशन मातृभाषा’ का पहला चरण बताया।

उनकी शिकायत यह थी कि ऑल इंडिया रेडियो ने उनके द्वारा थोपे गए भाषा कोड का पालन नहीं किया था। ‘इंडेक्स ऑन सेंसरशिप’ के एक अध्ययन में यह भी दर्ज किया गया कि तालिब के हत्यारों ने अपने सशस्त्र अभियान को संदर्भित करते हुए ‘आतंकवादी’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई थी। उनकी हत्या का उद्देश्य यह प्रदर्शित करना था कि खाालिस्तानी संगठन एक सार्वजनिक प्रसारक द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा तय कर सकते हैं।

आतंकवादी कोड लागू करने के लिए ML मनचंदा का अपहरण

प्रसारण पर नियंत्रण हासिल करने का सबसे बर्बर प्रयास मई 1992 में हुआ। एमएल मनचंदा पटियाला में ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन निदेशक थे। 18 मई 1992 को बब्बर खालसा के आतंकियों ने उनका अपहरण कर लिया और सरकार के सामने माँगें रखीं।

संगठन चाहता था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उनकी आचार संहिता को लागू करे। माँगों में हिंदी और अन्य गैर-पंजाबी कार्यक्रमों को बंद करना शामिल था। उग्रवादियों ने आतंकवादी हमलों को अंजाम देने वालों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली शब्दावली पर भी आपत्ति जताई और टेलीविजन प्रसारकों के पहनावे और प्रस्तुति पर नियम थोपने की कोशिश की।

वार्ता जारी रहने के दौरान मनचंदा को बंधक बनाकर रखा गया। सरकार द्वारा माँगों को स्वीकार किए बिना समय सीमा समाप्त हो गई। 27 मई को बब्बर खालसा के आतंकवादियों ने उनकी हत्या कर दी और उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। उनका धड़ पंजाब में मिला, जबकि उनका कटा हुआ सिर हरियाणा के अंबाला में मिला।

सरकार द्वारा संगठन की समय सीमा का पालन करने में विफल रहने के बाद मनचंदा की हत्या कर दी गई थी। बब्बर खालसा ने इस हत्या का दावा किया और इसे मीडिया कोड लागू करने के अपने प्रयास से खुले तौर पर जोड़ा। कई अन्य मामलों के विपरीत, जहाँ जिम्मेदारी विवादित रही या बंदूकधारी बिना पहचान के भाग निकले, मनचंदा की हत्या के पीछे का उद्देश्य सार्वजनिक रूप से घोषित किया गया था।

आतंकवादियों ने एक सरकारी रेडियो स्टेशन के निदेशक का अपहरण कर लिया था, संपादकीय और भाषाई नीति पर बातचीत की थी और राज्य द्वारा आत्मसमर्पण न करने पर उनकी हत्या कर दी थी।

इस हत्या के विरोध में ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन के कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया। फिर भी इस खौफ का असर दिखाई दिया। प्रसारण प्रथाएँ बदल गईं, हिंदी कार्यक्रमों को हटा दिया गया और अधिकारी आतंकवादी फरमानों का उल्लंघन करने के बारे में तेजी से सावधान हो गए।

दुश्मन बनने के लिए किसी पत्रकार को हथियार उठाने की जरूरत नहीं थी

लाला जगत नारायण की 1981 में हत्या और 1992 में एमएल मनचंदा का सिर कलम किए जाने के बीच सूचना का निर्माण और वितरण करने वाले लोगों के खिलाफ एक निरंतर अभियान चला।

निशाने के अनुसार तरीके बदलते गए। संपादकों की हत्या की गई। जिला रिपोर्टरों पर उनके घरों के पास हमले किए गए। रेडियो अधिकारियों को गोली मार दी गई या उनका अपहरण कर लिया गया। अखबार के बंडल इकट्ठा करते समय हॉकरों को मार दिया गया। डिलीवरी वाहनों पर घात लगाकर हमला किया गया। न्यूज़रूम को निर्देश और मौत की धमकियाँ देने वाले पत्र मिले।

मूल माँग एक ही रही: आत्मसमर्पण करो। किसी भी प्रकाशन से खाालिस्तानी संगठनों द्वारा चुनी गई शब्दावली का उपयोग करने की उम्मीद की जाती थी। उग्रवादी बयानों को बिना किसी बदलाव के छापना पड़ता था। अलगाववाद की आलोचना को विश्वासघात माना जा सकता था। आतंकवादी अत्याचारों की कवरेज से बहिष्कार या हत्या हो सकती थी। यहाँ तक कि किसी नापसंदगी वाले अखबार का डिस्ट्रीब्यूशन भी दंडनीय बन गया।

इसका प्रभाव उन व्यक्तिगत प्रकाशनों से परे गया जिनके कर्मचारियों की हत्या की गई थी। धमकियों ने स्व-सेंसरशिप को बढ़ावा दिया, प्रभावित जिलों से रिपोर्टिंग को कमजोर किया और उग्रवादी दावों को कम जांच के साथ प्रसारित होने दिया।

फिर भी समाचार पत्र छपते रहे। हॉकर सशस्त्र सुरक्षा के बीच अपने रास्तों पर लौटे। संपादक किलेबंद दीवारों के पीछे से काम करते रहे। रिपोर्टर उन कस्बों से अपनी रिपोर्ट भेजते रहे जहाँ हर कोई उनका नाम और पता जानता था।

जगत नारायण की हत्या इसलिए की गई क्योंकि उनके छपे हुए शब्दों ने आतंकवादी अलगाववाद के उभार को चुनौती दी थी। रमेश चंद्र की हत्या इसलिए की गई क्योंकि उनके पिता की मौत अखबार को खामोश करने में विफल रही थी। सुमीत सिंह और बलदेव सिंह मान की सिख होने के बावजूद हत्या कर दी गई क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिक विभाजन और खाालिस्तान को खारिज कर दिया था। राजेंद्र कुमार तालिब को इसलिए गोली मारी गई क्योंकि एक प्रसारक ने उस शब्दावली का इस्तेमाल किया जिसका उग्रवादियों ने विरोध किया था। एमएल मनचंदा का सिर इसलिए कलम कर दिया गया क्योंकि ऑल इंडिया रेडियो अपनी भाषा और संपादकीय नीति बब्बर खालसा के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेगा।

वे राइफल लेकर नहीं चलते थे और न ही सुरक्षा बलों की कमान संभालते थे। उनका अपराध हथियारों वाले आतंकियों की सत्ता को स्वीकार किए बिना संपादन, रिपोर्टिंग, प्रकाशन या प्रसारण करना था।

पंजाब उग्रवाद का कोई भी इतिहास उन पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को शामिल किए बिना पूरा नहीं हो सकता, जिन्होंने खाालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा यह घोषणा किए जाने के बाद भी प्रकाशन जारी रखा कि एक कॉलम, शीर्षक, प्रसारण या समाचार पत्र का बंडल मौत की सजा दे सकता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Anurag
Anurag
Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over 22 years of professional experience, including more than six years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

किसी का फोकस ‘अंबेडकरवाद’ पर, किसी का ‘फ्री फिलिस्तीन’ पर: CJP प्रदर्शन से पनपे ‘इंफ्लुएंसर्स’ का अपना-अपना एजेंडा, जानिए कंटेंट की माइनिंग कर कैसे...

CJP प्रदर्शन से चमके मोहम्मद जुनैद, हर्षित, उज्जवल, रिया अहिर और नीशू जैसे तथाकथित इंफ्लुएंसर्स का अपना-अपना एजेंडा है।

Pink Saheli Smart Card: 1 अगस्त से दिल्ली की महिलाओं के लिए बदल जाएगा मुफ्त बस यात्रा का नियम, जानिए कैसे बनेगा कार्ड और...

1 अगस्त 2026 से दिल्ली में महिलाओं की मुफ्त बस यात्रा केवल पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड से होगी और डिजिटल टिकटिंग व्यवस्था लागू होगी।
- विज्ञापन -