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‘प्रदर्शन के नाम पर शहर को बंधक नहीं बना सकते, जंतर-मंतर बंद करने पर विचार करो’: दिल्ली HC की सख्त टिप्पणी, जानें- क्यों सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक माना जा रहा यह धरना स्थल

दिल्ली हाई कोर्ट ने जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों से आम लोगों को होने वाली परेशानियों पर चिंता जताते हुए सरकार से इसे बंद करने पर विचार करने को कहा है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में भी वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल की माँग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई जारी है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शनों के स्थल के रूप में जारी रखने पर गंभीर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से पूछा कि आखिर इस स्थान को बंद करने पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी विरोध-प्रदर्शन के कारण पूरे शहर को अनावश्यक रूप से बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए।

यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी ने जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देने के लिए दिल्ली पुलिस को निर्देश देने की माँग की थी। इसी मुद्दे से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट भी सुनवाई कर रहा है, जिसमें जंतर-मंतर के बजाय विरोध-प्रदर्शनों के लिए वैकल्पिक स्थल तय करने की माँग की गई है।

जंतर-मंतर बंद क्यों नहीं कर देते?: हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा सवाल

मामले की सुनवाई जस्टिस अमित महाजन की एकल पीठ ने की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के कारण शहर के आम लोगों को परेशानी उठानी पड़ती है और सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। जस्टिस महाजन ने कहा कि इस तरह के प्रदर्शन शहर के बीचों-बीच नहीं होने चाहिए, हालाँकि अंतिम फैसला सरकार का है।

उन्होंने सवाल किया कि आखिर पूरे शहर को अनावश्यक रूप से बंधक क्यों बनाया जाए और सरकार जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में बंद क्यों नहीं कर देती। यह मामला ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी की ओर से दायर याचिका से जुड़ा था।

समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय घोष ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने जुलाई में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति के लिए आवेदन दिया था, लेकिन दिल्ली पुलिस ने अब तक न तो उसे मंजूर किया है और न ही खारिज किया है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन में अधिकतम 75 लोगों के शामिल होने की बात आवेदन में स्पष्ट रूप से कही गई थी।

इसके बावजूद पुलिस आवेदन पर निर्णय नहीं ले रही है। इस पर कोर्ट ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा से पूछा कि सरकार इस स्थल को बंद करने पर विचार क्यों नहीं करती। जस्टिस महाजन ने दोहराया कि उनकी व्यक्तिगत राय में इस तरह के प्रदर्शन दिल्ली शहर के भीतर नहीं होने चाहिए।

पुलिस, केंद्र और याचिकाकर्ता के तर्क: कोर्ट ने कहा- शहर को बंधक नहीं बनाया जा सकता

ASG चेतन शर्मा ने कोर्ट को बताया कि यही मुद्दा पहले से सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है, जहाँ यह तय होना है कि क्या जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए नामित स्थल बने रहना चाहिए। इस पर जस्टिस महाजन ने कहा कि उनकी राय में ऐसा नहीं होना चाहिए।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता संजय घोष ने सवाल उठाया कि क्या केंद्र सरकार का यह रुख है कि दिल्ली में कहीं भी विरोध-प्रदर्शन नहीं हो सकते। इस पर जस्टिस महाजन ने कहा कि यह निर्णय पुलिस को लेना है कि वह शहर के भीतर प्रदर्शन की अनुमति दे सकती है या नहीं।

जवाब में घोष ने कहा कि यदि सरकार यह स्पष्ट कह दे कि दिल्ली में लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण प्रदर्शन नहीं होंगे तो वे उसे स्वीकार कर लेंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह यह नहीं कह रही कि प्रदर्शन लोकतांत्रिक हैं या अलोकतांत्रिक, बल्कि उसका सवाल केवल इतना है कि ऐसे आयोजनों से पूरे शहर को परेशानी क्यों झेलनी पड़े।

इस पर संजय घोष ने सुप्रीम कोर्ट के शाहीन बाग फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। जस्टिस महाजन ने इसका जवाब देते हुए कहा कि अधिकार अपनी जगह हैं, लेकिन शहर को बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता।

सुनवाई के दौरान ASG चेतन शर्मा ने यह भी बताया कि जंतर-मंतर क्षेत्र में फिलहाल दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC) की धारा 144 लागू है और 15 अगस्त नजदीक होने के कारण सुरक्षा व्यवस्था और अधिक कड़ी कर दी गई है।

उन्होंने कहा कि कई बार 75 लोगों का प्रदर्शन देखते-देखते 75 हजार लोगों की भीड़ में बदल जाता है और ऐसी स्थिति में सुरक्षा एजेंसियों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो जाती है। इस पर जस्टिस महाजन ने फिर कहा कि उनकी व्यक्तिगत राय में शहर के भीतर ऐसे प्रदर्शन नहीं होने चाहिए क्योंकि इससे एंबुलेंस सहित आम लोगों की आवाजाही प्रभावित होती है।

इसके बाद ASG शर्मा ने कहा कि कई बार प्रदर्शनकारियों के अनुच्छेद 19(1)(a) के अधिकारों को अन्य नागरिकों के अधिकारों से ऊपर मान लिया जाता है, जिससे आम जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

अंत में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वह ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी के आवेदन पर 8 अगस्त तक निर्णय ले और इसी निर्देश के साथ याचिका का निस्तारण कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट में भी जंतर-मंतर के खिलाफ याचिका, वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल की माँग

जंतर-मंतर को लेकर विवाद केवल दिल्ली हाई कोर्ट तक सीमित नहीं है। इससे पहले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया था।

यह याचिका सतीश चंद कौशिक ने दायर की है, जिसमें कहा गया है कि जंतर-मंतर अब विरोध-प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं रह गया है और इसके स्थान पर कोई वैकल्पिक स्थल तय किया जाना चाहिए। याचिका में तर्क दिया गया है कि जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों से स्थानीय निवासियों को लगातार असुविधा होती है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि क्षेत्र में आने-जाने के रास्ते बाधित हो जाते हैं, आवश्यक वस्तुओं और दवाइयों की आपूर्ति प्रभावित होती है तथा मेडिकल सेवाओं और एंबुलेंस की आवाजाही में भी रुकावट आती है। इसलिए विरोध-प्रदर्शनों के लिए किसी ऐसे स्थान की व्यवस्था की जानी चाहिए जहाँ नागरिकों को कम से कम असुविधा हो।

सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य जज की अध्यक्षता वाली पीठ ने भी माना कि याचिका में उठाए गए मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिका में यह बताया गया है कि जंतर-मंतर अब प्रदर्शन के लिए उपयुक्त स्थल नहीं रह गया है क्योंकि वहाँ आने-जाने में गंभीर दिक्कतें होती हैं और चिकित्सा संबंधी आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति भी प्रभावित होती है।

मुख्य जज ने इसे महत्वपूर्ण चिंता का विषय बताया। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री आवास तक प्रस्तावित एक राजनीतिक मार्च के मद्देनजर पहले जैसी अप्रिय घटनाओं से बचना जरूरी है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावित कार्यक्रम पर कोई टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों से निपटना संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों का दायित्व है। इसके बाद कोर्ट ने मामले को अलग से सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

कॉकरोचों ने की संसद में घुसने की कोशिश

गौरतलब है कि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान संसद में घुसने की भी कोशिश हुई थी, जो कि जंतर-मंतर से करीब 3 से 4 किलोमीटर की दूरी पर है। दिल्ली पुलिस ने अपने बयान में कहा था कि प्रदर्शन के लिए केवल जंतर-मंतर पर धरना देने की अनुमति दी गई थी। संसद की ओर मार्च निकालने या तय प्रदर्शन स्थल से आगे बढ़ने की इजाजत नहीं थी।

दिल्ली पुलिस के मुताबिक, कई हफ्तों तक प्रदर्शन शांतिपूर्वक चलता रहा और इस दौरान प्रदर्शन स्थल को जबरन खाली नहीं कराया गया। हालात तब बिगड़े, जब प्रदर्शनकारियों का एक समूह संसद का सत्र चलने के दौरान संसद की ओर बढ़ने लगा और रास्ते में लगाए गए सुरक्षा बैरिकेड्स को पार करने की कोशिश की।

पुलिस ने कहा कि प्रदर्शनकारियों से कई बार घोषणा करके तय जगह पर ही रहने की अपील की गई। इसके बावजूद कुछ लोग आगे बढ़ते रहे। इस दौरान बैरिकेड्स को नुकसान पहुँचाया गया, पुलिस को निशाना बनाया गया और कई पुलिसकर्मियों, जिनमें वरिष्ठ और बुजुर्ग अधिकारी भी शामिल थे, को घरेकर धक्का-मुक्की और बदसलूकी की गई।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
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