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12 वर्ष पहले गोरखनाथ पीठ के पीठाधीश्वर, फिर देश के सबसे बड़े सूबे के CM: जनता तक पहुँच और समस्याओं पर तत्काल प्रतिक्रिया – UP में विकास और धार्मिक विरासत साथ-साथ बढ़ा रहे योगी आदित्यनाथ

मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली को समझने के लिए गोरखपुर के अनुभव को देखना जरूरी है। एक धार्मिक संस्था चलाना और सरकार चलाना एक जैसा काम नहीं है लेकिन दोनों जगह एक चीज समान है, वह है लोगों की समस्याओं से सीधा सामना।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी आदित्यनाथ की कहानी सिर्फ एक मुख्यमंत्री के सत्ता में आने की कहानी नहीं है। यह कहानी एक ऐसी धार्मिक-सामाजिक परंपरा से निकलकर शासन के सबसे बड़े मंच तक पहुँचने की है, जिसने पूर्वी उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और सामाजिक गतिविधियों के जरिए अपनी मौजूदगी बनाई।

एक तरफ गोरखनाथ मठ की परंपरा थी, दूसरी तरफ राजनीति। एक तरफ भगवा वस्त्र में पीठाधीश्वर की जिम्मेदारी थी, दूसरी तरफ करोड़ों लोगों वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी। ऐसे में योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक जीवन को समझने के लिए सिर्फ 19 मार्च 2017 (जिस दिन उन्होंने पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली) से शुरुआत करना पर्याप्त नहीं है।

गोरखपुर में स्थित गोरखनाथ मंदिर

राजनीतिक जीवन में आने पहले भी उनकी प्रशासनिक शैली और राजनीतिक सोच की कई जड़ें गोरखनाथ पीठ में दिखाई देती हैं। वहाँ जनता से सीधा संपर्क, संस्थाओं को चलाना, शिक्षा और स्वास्थ्य के जरिए समाज तक पहुँचना और समस्याओं पर तत्काल प्रतिक्रिया देना उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन चुका था।

फिर यही अनुभव लखनऊ पहुँचा। फर्क सिर्फ इतना था कि गोरखनाथ में जिम्मेदारी कुछ संस्थाओं और एक बड़े सामाजिक क्षेत्र की थी, जबकि मुख्यमंत्री बनने के बाद पूरा उत्तर प्रदेश ही उनका कार्यक्षेत्र बन गया।

युवावस्था में ही गोरखनाथ पीठ से जुड़े

5 जून 1972 को उत्तराखंड में जन्मे अजय सिंह बिष्ट बाद दीक्षा लेने के बाद योगी आदित्यनाथ के नाम से पहचाने गए। विज्ञान से स्नातक करने वाले अजय सिंह बिष्ट युवावस्था में ही गोरखनाथ पीठ से जुड़े और महंत अवैद्यनाथ के शिष्य बने। 15 फरवरी 1994 को महज 22 वर्ष की उम्र में उन्हें गोरक्षपीठ का उत्तराधिकारी घोषित किया गया।

यह कोई सामान्य धार्मिक पद नहीं था। गोरखनाथ पीठ पूर्वी उत्तर प्रदेश में केवल पूजा-पाठ का केंद्र नहीं रही। समय के साथ यहाँ शिक्षा, चिकित्सा, सामाजिक सेवा और धार्मिक गतिविधियों से जुड़े संस्थान विकसित हुए। महंत दिग्विजयनाथ और बाद में महंत अवैद्यनाथ ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

योगी आदित्यनाथ इसी परंपरा के उत्तराधिकारी बने। इसके बाद उनके सामने दो जिम्मेदारियाँ थीं। पहली, अपने गुरु और पीठ की विरासत को आगे बढ़ाना। दूसरी, उस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना। उन्होंने इसके लिए सिर्फ धार्मिक आयोजनों का रास्ता नहीं चुना। शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा और संगठनात्मक गतिविधियों का विस्तार भी उनकी सार्वजनिक भूमिका का हिस्सा बना।

सितंबर 2014 में महंत अवैद्यनाथ के ब्रह्मलीन होने के बाद योगी आदित्यनाथ औपचारिक रूप से 12 सितंबर 2014 को गोरक्षपीठाधीश्वर बने। यानी मुख्यमंत्री बनने से लगभग तीन साल पहले ही वह एक बड़े संस्थान के प्रमुख और हजारों लोगों के रोजमर्रा के संपर्क में रहने वाले सार्वजनिक व्यक्तित्व को निभाते आए थे।

पीठ में गुरु गोरक्षनाथ की पूजा अर्चना करते CM योगी

विरासत संभालने का मतलब सिर्फ गद्दी संभालना नहीं था

गोरखनाथ पीठ की विरासत को समझने का एक महत्वपूर्ण पहलू उसका संस्थागत ढाँचा है। गोरखनाथ मंदिर से जुड़े शिक्षा और चिकित्सा संस्थान लंबे समय से संचालित होते रहे हैं। पीठ की गतिविधियों में अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और सामाजिक सेवा संस्थाएँ शामिल रही हैं।

योगी आदित्यनाथ के सामने चुनौती यह थी कि इस विरासत को केवल पुरानी परम्पराओं तक सीमित न रखा जाए। उन्होंने संगठनात्मक विस्तार और बड़े सार्वजनिक आयोजनों के माध्यम से इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाहर भी व्यापक पहचान दिलाई। इसी दौर में योगी की पहचान एक ऐसे नेता के तौर पर बनी, जो अपने धार्मिक-सांस्कृतिक विचारों को सार्वजनिक जीवन में खुलकर रखते थे।

1998 में वह पहली बार गोरखपुर से लोकसभा सांसद चुने गए। उस समय उनकी उम्र महज 26 वर्ष थी। इसके बाद 1999, 2004, 2009 और 2014 में भी उन्होंने गोरखपुर से लोकसभा चुनाव जीता।

लगातार पाँच बार सांसद रहना केवल चुनाव जीतने का रिकॉर्ड नहीं था बल्कि ऐतिहासिक उपलब्धि थी। इस दौरान उनका गोरखपुर से राजनीतिक और सामाजिक संपर्क लगातार मजबूत होता गया और देश-प्रदेश के स्तर पर भी उनकी राजनीति ऊपर उठती गई। यही वह दौर था, जिसमें एक पीठाधीश्वर धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति के खिलाड़ी के रूप में स्थापित हुआ।

गोरक्षनाथ पीठ में आरती करते पीठाधीश्वर CM योगी आदित्यनाथ

गोरखपुर ने योगी को क्या सिखाया?

मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली को समझने के लिए गोरखपुर के अनुभव को देखना जरूरी है। एक धार्मिक संस्था चलाना और सरकार चलाना एक जैसा काम नहीं है लेकिन दोनों जगह एक चीज समान है, वह है लोगों की समस्याओं से सीधा सामना।

गोरखनाथ पीठ के अस्पताल में आने वाला मरीज, स्कूल में पढ़ने वाला छात्र, रोजगार या आर्थिक मदद की उम्मीद लेकर आने वाला व्यक्ति और धार्मिक आयोजन में पहुँचने वाला श्रद्धालु, सभी अलग-अलग तरह की अपेक्षाएँ लेकर आते हैं।

यही प्रत्यक्ष जनसंपर्क योगी के सार्वजनिक जीवन की शैली का हिस्सा बना। एक इंटरव्यू में योगी आदित्यनाथ ने खुद बताया कि मठ का काम सार्वजनिक सेवा से जुड़ा रहा है और वहाँ से उन्हें प्रशासन की सीख मिली।

गोरखपुर में उन्होंने जिन संस्थाओं और परियोजनाओं को आगे बढ़ाया, उनका असर भी धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। AIIMS, खाद कारखाना, सड़कें, रामगढ़ ताल का विकास, चिड़ियाघर, मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और शहर की कनेक्टिविटी जैसी परियोजनाओं ने गोरखपुर की पुरानी पहचान को बदलना शुरू किया।

2017: जब गोरखपुर का सांसद बना उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री

19 मार्च 2017 उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए ऐतिहासिक दिनों में गिना जाएगा। इसी दिन योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह अपने आप में असाधारण राजनीतिक घटना थी।

एक ऐसा व्यक्ति, जो राजनीति का पर्याय बन चुके सफेद कपड़ों की जगह भगवा पहनता था, वह देश के सबसे बड़े राज्य की सरकार का मुखिया बन गया। लेकिन योगी के पास एक चीज थी, जो अक्सर राजनीतिक जीवन में वर्षों बाद आती है, वह थी जमीनी संगठन और प्रत्यक्ष जनसंपर्क का लंबा अनुभव।

उनके सामने उत्तर प्रदेश की समस्याओं की लंबी सूची थी। कानून-व्यवस्था की चुनौती, खराब सड़कें, बिजली, किसानों की समस्या, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा की गुणवत्ता, निवेश की कमी और क्षेत्रीय असमानता। सरकार ने शुरुआत में ही कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता दी।

योगी सरकार की प्रशासनिक शैली का एक प्रमुख शब्द बना, ‘जीरो टॉलरेंस’। समर्थकों के लिए यह अपराधियों के खिलाफ कड़ा प्रशासन था जबकि आलोचकों ने कई बार सरकार की पुलिस और कानून-व्यवस्था संबंधी नीतियों पर सवाल भी उठाए। लेकिन सरकार ने कानून-व्यवस्था को राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में रखा।

‘बीमारू’ की छवि से बाहर निकलने की कोशिश

उत्तर प्रदेश लंबे समय तक देश की आर्थिक क्षमता और वास्तविक विकास के बीच के अंतर का उदाहरण माना जाता रहा। योगी सरकार ने इस तस्वीर को बदलने के लिए सबसे पहले कनेक्टिविटी पर जोर दिया। एक्सप्रेसवे इसका सबसे बड़ा उदाहरण बने।

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे ने लखनऊ को पूर्वी उत्तर प्रदेश से जोड़ने का काम किया। बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे ने अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्र को बेहतर कनेक्टिविटी दी। गंगा एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वी हिस्से तक एक लंबा आर्थिक कॉरिडोर बनाने की संभावना पैदा की।

यह सिर्फ सड़क बनाने की कहानी नहीं है। एक अच्छी सड़क के साथ ट्रांसपोर्ट आता है और ट्रांसपोर्ट के साथ बाजार जुड़ते हैं। बाजार जुड़ने पर उद्योगों के लिए जगह बनती है। उद्योग आने पर रोजगार पैदा होता है। यही वजह है कि योगी सरकार एक्सप्रेसवे को केवल यात्रा आसान करने वाली सड़क के तौर पर नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास के कॉरिडोर के रूप में प्रस्तुत करती रही है।

एयरपोर्ट के मामले में बदली तस्वीर

2017 के समय उत्तर प्रदेश में सीमित संख्या में ही एयरपोर्ट नियमित हवाई सेवाओं से जुड़े थे। इसके बाद प्रयागराज, कानपुर, बरेली, कुशीनगर, अयोध्या, अलीगढ़, आजमगढ़, श्रावस्ती, चित्रकूट और मुरादाबाद जैसे शहरों तक हवाई कनेक्टिविटी बढ़ी

आज उत्तर प्रदेश का एयर कनेक्टिविटी नेटवर्क पहले की तुलना में काफी बड़ा है। अयोध्या में अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट और जेवर में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसी परियोजनाएँ इस बदलाव की बड़ी मिसाल हैं।

जेवर सिर्फ एक एयरपोर्ट नहीं है। इसके आसपास बनने वाले औद्योगिक, लॉजिस्टिक और शहरी ढाँचे को मिलाकर देखा जाए तो यह पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आर्थिक तस्वीर बदलने की क्षमता रखने वाली परियोजना है। यानी सरकार का मॉडल केवल ‘एयरपोर्ट बनाओ’ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एयरपोर्ट के आसपास आर्थिक गतिविधियों का इकोसिस्टम तैयार करने पर भी जोर रहा।

शहरों में मेट्रो, गाँवों में सड़क और बिजली

योगी सरकार की विकास कहानी का एक बड़ा हिस्सा बड़े शहरों से जुड़ा है लेकिन इसका दूसरा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई देता है। सड़क निर्माण, बिजली कनेक्शन, आवास, शौचालय, नल से जल और ग्रामीण कनेक्टिविटी जैसी योजनाओं ने गाँवों में बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाया।

यहाँ केंद्र और राज्य सरकार की योजनाएँ साथ-साथ काम करती हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना, सौभाग्य, जल जीवन मिशन और उज्ज्वला जैसी केंद्रीय योजनाओं का क्रियान्वयन राज्य मशीनरी के जरिए हुआ।

स्वास्थ्य में सबसे बड़ा बदलाव कहाँ दिखाई देता है?

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था को बदलना सबसे कठिन कामों में से एक है। योगी सरकार ने मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने, नए संस्थान बनाने और पुराने अस्पतालों के विस्तार पर जोर दिया। गोरखपुर का AIIMS इसका प्रतीक बन गया।

जिस शहर की पहचान कभी जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी बीमारी के संकट से होती थी, उसी शहर में आधुनिक चिकित्सा संस्थान का विकसित होना राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बदलाव था। पूर्वांचल के दूसरे हिस्सों में भी मेडिकल कॉलेजों का विस्तार हुआ। सरकारी आँकड़ों के अनुसार राज्य में मेडिकल कॉलेजों का नेटवर्क पिछले वर्षों में काफी बढ़ा है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सिर्फ बड़े अस्पताल बनाना नहीं है। मेडिकल शिक्षा के विस्तार का अर्थ डॉक्टरों और विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाना भी है। यही कारण है कि मेडिकल कॉलेजों के विस्तार को लंबे समय में उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

शिक्षा में ‘इमारत’ से आगे की चुनौती

शिक्षा के क्षेत्र में योगी सरकार के सामने दोहरी चुनौती थी। एक तरफ सरकारी स्कूलों का इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारना, दूसरी तरफ शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना। ऑपरेशन कायाकल्प जैसे कार्यक्रमों के जरिए सरकारी स्कूलों में भवन, शौचालय, फर्नीचर, बिजली, पेयजल और अन्य सुविधाओं पर काम हुआ।

मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना जैसी पहल के जरिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को मुफ्त कोचिंग उपलब्ध कराने की कोशिश की गई। यहाँ सरकार की सोच यह रही कि प्रतिभा केवल बड़े शहरों के महँगे कोचिंग संस्थानों तक सीमित न रहे।

अभी भी शिक्षा की गुणवत्ता, सरकारी स्कूलों में शिक्षक उपलब्धता और उच्च शिक्षा तक पहुँच जैसी चुनौतियाँ पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं लेकिन स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर और संस्थागत विस्तार में बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

निवेश के लिए बदला माहौल

किसी भी राज्य में उद्योग तभी आता है, जब कारोबारी को तीन चीजों पर भरोसा हो। सड़क, बिजली की उपलब्धता, कानून-व्यवस्था ठीक रहेगी या नहीं। योगी सरकार ने इन तीनों को निवेश नीति से जोड़ने की कोशिश की।

इन्वेस्टर्स समिट, नई औद्योगिक नीतियाँ, डिफेंस कॉरिडोर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, फिल्म सिटी और एक्सप्रेसवे आधारित औद्योगिक कॉरिडोर इसी रणनीति का हिस्सा हैं। इससे बड़े पैमाने पर निवेश प्रस्ताव जमीन पर उतरे हैं और हजारों उद्योग स्थापित हुए हैं।

2026 में मुख्यमंत्री ने भी कहा कि राज्य में लगभग ₹15 लाख करोड़ के प्रोजेक्ट ग्राउंडेड हो चुके हैं और करीब ₹6 लाख करोड़ की परियोजनाएँ चल रही हैं। इन आँकड़ों से एक बात जरूर स्पष्ट होती है कि उत्तर प्रदेश ने निवेश आकर्षित करने को अपनी प्रशासनिक प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान दिया है।

कानून-व्यवस्था और प्रशासन: योगी मॉडल की सबसे चर्चित पहचान

योगी सरकार की सबसे ज्यादा चर्चा शायद सड़क या एयरपोर्ट की वजह से नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था की वजह से हुई। सरकार ने अपराधियों और माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई को अपनी पहचान बनाया।

अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई, गैंगस्टर एक्ट का इस्तेमाल और पुलिस को खुली कार्रवाई का संदेश, ये सब योगी सरकार के प्रशासनिक मॉडल का हिस्सा रहे। इस मॉडल पर राजनीतिक विवाद भी हुए। विपक्ष ने कई बार ऐसी कार्रवाइयों को लेकर सवाल उठाए और पुलिस एनकाउंटर तथा प्रशासनिक कार्रवाई की आलोचना की। विपक्ष द्व्रारा यह लेकिन किया गया सिर्फ राजनीति के लिए और सरकार ने समय-समय पर इनको अपनी नीति बता कर स्पष्ट भी किया।

सरकार का तर्क रहा कि अपराध के खिलाफ सख्त रुख ने व्यापारियों, महिलाओं और आम नागरिकों में सुरक्षा की भावना बढ़ाई है। इसका सीधा असर निवेश के माहौल पर पड़ने का दावा भी सरकार करती रही है।

धार्मिक विरासत से शासन तक एक समान सूत्र

अब सवाल आता है कि गोरखनाथ पीठ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन के बीच आखिर संबंध क्या है? जवाब है, ‘संस्था के जरिए सेवा’। गोरखनाथ पीठ में मंदिर के साथ अस्पताल और शिक्षण संस्थान हैं। मुख्यमंत्री के रूप में योगी के सामने पूरा राज्य है, जहाँ सरकार स्कूल, अस्पताल, सड़क, पुलिस, बिजली और पानी के जरिए जनता तक पहुँचती है।

गोरखपुर में एक संस्था के स्तर पर जो मॉडल था, लखनऊ में वही सोच बहुत बड़े पैमाने पर दिखाई देती है। फर्क सिर्फ स्केल का है। मठ में हजारों लोग आते थे, मुख्यमंत्री के तौर पर करोड़ों लोगों की जिम्मेदारी सामने है।

मठ में अस्पताल चलाना एक जिम्मेदारी थी तो मुख्यमंत्री के तौर पर पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारना चुनौती है। वहीं, मठ में शिक्षा संस्थानों का संचालन था तो सरकार में लाखों बच्चों की शिक्षा व्यवस्था है। इसीलिए योगी की यात्रा को केवल ‘संत से मुख्यमंत्री’ की यात्रा कहना अधूरा है। यह ‘एक संस्था के प्रशासक से पूरे राज्य के प्रशासक’ बनने की यात्रा भी है।

विरासत का विस्तार धार्मिक सीमाओं से बाहर

योगी आदित्यनाथ की पहचान निश्चित रूप से हिंदुत्व और गोरखनाथ पीठ से जुड़ी रही है। अयोध्या, काशी, मथुरा, धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक स्थलों के विकास पर उनकी सरकार ने विशेष जोर दिया। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद वहाँ तेजी से विकसित हुआ इंफ्रास्ट्रक्चर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

लेकिन योगी सरकार की प्रशासनिक कहानी सिर्फ धार्मिक परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। उसी समय बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे बन रहा है, पूर्वांचल में मेडिकल कॉलेज खुल रहे हैं। जेवर में एयरपोर्ट तैयार हो रहा है तो वहीं नोएडा और लखनऊ में औद्योगिक और शहरी परियोजनाएँ आगे बढ़ रही हैं। यानी उनकी राजनीति का सांस्कृतिक पक्ष जितना स्पष्ट है, प्रशासन का विकास पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।

2017 से 2026: सबसे बड़ा बदलाव क्या है?

अगर पूरे बदलाव को एक लाइन में समझना हो तो कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश की विकास नीति में ‘घोषणा’ से ‘कनेक्टेड सिस्टम’ की ओर बढ़ने की कोशिश हुई है। एक्सप्रेसवे को उद्योग से जोड़ा गया। एयरपोर्ट को लॉजिस्टिक्स से जोड़ा गया।

शहरों को मेट्रो से जोड़ा गया और मेडिकल कॉलेजों को मेडिकल एजुकेशन से। कानून-व्यवस्था को निवेश से जोड़ा गया तो धार्मिक पर्यटन को इंफ्रास्ट्रक्चर से। यही वह बदलाव है, जो योगी सरकार को केवल सड़क और भवन बनाने वाली सरकार से अलग प्रशासनिक मॉडल के रूप में पेश करता है।

गोरखनाथ से लखनऊ तक की कहानी

इस पूरी यात्रा में एक चीज लगातार दिखाई देती है, वह है संस्थागत कामकाज पर जोर। गोरखनाथ पीठ की विरासत को उन्होंने केवल धार्मिक पहचान के रूप में नहीं संभाला, बल्कि उससे जुड़ी संस्थाओं और सामाजिक पहुँच को विस्तार दिया।

मुख्यमंत्री बनने के बाद उसी अनुभव को बड़े पैमाने पर लागू करने की कोशिश की। यही कारण है कि योगी आदित्यनाथ की कहानी को सिर्फ भगवा वस्त्र से सत्ता तक पहुँचने की कहानी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।

यह एक ऐसे व्यक्ति की यात्रा है, जिसने पहले एक पीठ की जिम्मेदारी संभाली, फिर संसद में राजनीतिक पहचान बनाई और अंततः देश के सबसे बड़े राज्य की प्रशासनिक मशीनरी को संभाला। गोरखनाथ में जिम्मेदारी एक संस्था की थी। वहीं लखनऊ में जिम्मेदारी 24 करोड़ से अधिक लोगों की है।

शायद यही योगी आदित्यनाथ की पूरी राजनीतिक यात्रा को समझने की सबसे सरल कुंजी है। पीठाधीश्वर के रूप में उन्होंने एक विरासत को संभाला और बढ़ाया; मुख्यमंत्री के रूप में उसी अनुभव को पूरे उत्तर प्रदेश के पैमाने पर लागू करने की कोशिश की।

इस यात्रा का मूल्यांकन इतिहास अंततः विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम आदमी के जीवन में आए वास्तविक बदलाव से करेगा। हालाँकि इतना जरूर कहा जा सकता है कि 1994 में गोरखनाथ पीठ से शुरू हुई वह यात्रा, आज उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन की सबसे प्रभावशाली कहानियों में शामिल हो चुकी है।

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