Homeफ़ैक्ट चेकफैक्ट चेक: राष्ट्रीय सुरक्षा पर NDA सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड के बारे में आपटार्डों...

फैक्ट चेक: राष्ट्रीय सुरक्षा पर NDA सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड के बारे में आपटार्डों के पेज का फर्ज़ीवाड़ा

निष्कर्ष बिल्कुल स्पष्ट है, जब आतंकवादियों को ख़त्म करने की बात आती है तो एनडीए का रिकॉर्ड यूपीए के दूसरे कार्यकाल से बेहतर रहा है। संसद में स्पष्ट बहुमत वाली सरकार के कार्यकाल के दौरान भारत को अस्थिर करने की पाकिस्तान की इच्छा भी इतनी ज़्यादा संघर्ष विराम उल्लंघन की वजह है।

पुलवामा आतंकी हमले के बाद एक तरफ़ जहाँ पूरा राष्ट्र भारतीय सुरक्षा बलों और शहीद हुए लोगों के परिवार के समर्थन में एक साथ आगे आया, वहीं भारतीय राजनीति और तथाकथित उदारवादी वर्ग के कुछ वर्गों द्वारा पूरे मामले का राजनीतिकरण करने का हर संभव प्रयास किया गया।

उस पर भी विडम्बना ये कि कुछ यह भी आरोप लगाने से नहीं चूके कि भारत सरकार ने राजनीतिक लाभ पाने के लिए हमारे ही सैनिकों की हत्या की साजिश रची, दूसरों ने कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का भी आह्वान कर डाला।

अब, सोशल मीडिया पर एक आम आदमी समर्थक पेज द्वारा एक तस्वीर सर्कुलेट की जा रही है। उसमें जानबूझकर फर्ज़ी आंकड़ों से एनडीए सरकार के दौरान नेशनल सिक्योरिटी पर झूठे दावे किये जा रहे हैं।

तस्वीर में दावा किया गया है कि यूपीए के दूसरे कार्यकाल के दौरान 109 आतंकवादी हमले हुए, जिसमें 139 जवान बलिदान हुए, 12 नागरिक मारे गए और 563 संघर्ष विराम उल्लंघन हुए, जबकि एनडीए सरकार के लिए समान संख्या 626, 483, 210 और 5596 हैं। तस्वीर में आम आदमी समर्थक पेज़ का दावा है कि यह डेटा दक्षिण एशिया आतंकवाद पोर्टल (SATP) से लिया गया है।

हालाँकि, अगर हम जम्मू और कश्मीर में SATP वेबसाइट के आँकड़ों को देखें तो UPA के दूसरे कार्यकाल में 146 नागरिक हताहत हुए थे। एनडीए के तहत, अब तक 205 नागरिक हताहत हुए हैं। UPA-II के दौरान सुरक्षा बलों में हताहतों की संख्या 242 थी जबकि NDA सरकार के दौरान 346 थी। यह सच है कि पिछली सरकार की तुलना में एनडीए शासन के दौरान अधिक जवान बलिदान हुए हैं। लेकिन पूरा सच ये भी है कि इस दौरान अधिक आतंकवादियों को भी समाप्त कर दिया गया है। UPA-II के दौरान यह आँकड़ा जहाँ 752 थी वहीं NDA शासन के दौरान यह 859 थी। यह डेटा 3 फरवरी, 2019 तक का है, इसलिए इसमें पुलवामा टेरर अटैक के हताहतों और आतंकवाद विरोधी हमलों में शामिल बलिदानियों को शामिल नहीं किया गया है।

संघर्ष विराम उल्लंघन के रूप में, LOC पर 2009-2014 के बीच 335 उल्लंघन हुए। और 2015-2018 के बीच 576। दिए गए आँकड़ों से, यह स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान अधिक संघर्ष विराम उल्लंघन हुए हैं।  फिर भी यह संख्या तस्वीर में उल्लिखित सँख्या के आस-पास भी नहीं हैं।

यह स्पष्ट नहीं है कि आतंकी हमलों की संख्या कहाँ से प्राप्त हुई क्योंकि हमें SATP वेबसाइट पर ऐसा कोई आँकड़ा नहीं मिला। स्पष्ट है कि केवल झूठ फ़ैलाने के लिए ऐसे ही एक बड़ी संख्या चुनी गई ताकि सुरक्षा के मामले में NDA को कमज़ोर साबित किया जा सके।

निष्कर्ष बिल्कुल स्पष्ट है, जब आतंकवादियों को ख़त्म करने की बात आती है तो एनडीए का रिकॉर्ड यूपीए के दूसरे कार्यकाल से बेहतर रहा है। हालाँकि, अधिक सुरक्षाकर्मी बलिदान हुए हैं, लेकिन इसका कारण भारतीय सेना द्वारा किए गए आतंकवाद विरोधी अभियानों की अधिक संख्या भी हो सकता है। संसद में स्पष्ट बहुमत वाली सरकार के कार्यकाल के दौरान भारत को अस्थिर करने की पाकिस्तान की इच्छा भी इतनी ज़्यादा संघर्ष विराम उल्लंघन की वजह है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तस्वीर में सर्कुलेट किए जा रहे आँकड़ों में केंद्र सरकार द्वारा वामपंथी उग्रवाद को समाप्त करने के लिए उठाए गए कदमों को शामिल नहीं किया गया है। जबकि तथ्य ये है कि नरेंद्र मोदी सरकार की नक्सल आतंकवादियों पर कठोर कार्रवाई के कारण, निकट भविष्य में देश में माओवादी हिंसा के अंत की कल्पना करना बहुत आसान हो गया है।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

ऑपइंडिया स्टाफ़
ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

क्या भारत की राजनीति पहली बार पूरी तरह ‘हिन्दू-केंद्रित’ हो गई है?

क्या भारत की राजनीति का सबसे बड़ा बदलाव चुनावी नतीजों में नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस के केंद्र में हुआ है? PM मोदी मजबूत हों या कमजोर, सत्ता में BJP रहे या विपक्ष आए, क्या हिन्दू पहचान और हिन्दू समाज से जुड़े सवाल अब भारतीय राजनीति के केंद्रीय विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं?

कुएँ में कूदने की जगह नहीं बची तो रोने लगीं हिंदू महिलाएँ: जानिए- 1947 में रावलपिंडी के तोहा खालसा में 90 हिंदू-सिख महिलाओं ने...

जानिए 1947 के रावलपिंडी दंगों में तोहा खालसा की 93 हिंदू महिलाओं के कुएँ में एक साथ कूदकर जान देने की दर्दनाक कहानी।
- विज्ञापन -