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रतन लाल की हत्या से पहले इस्लामी भीड़ ने 2 और पुलिसकर्मियों को बनाया था बंधक: दिल्ली दंगों की चार्जशीट

रतन लाल को कट्टरपंथी इस्लामिक भीड़ द्वारा उस समय बेरहमी से मारा गया था, जब वह चांद बाग के वजीराबाद रोड पर ड्यूटी कर रहे थे। चार्जशीट के अनुसार भीड़ पहले से दंगे को अंजाम देने के लिए तैयार थी।

दिल्ली में 24 से 26 फरवरी के बीच बड़े पैमाने पर हुए दंगों के दौरान इस्लामिक कट्टरपंथियों ने निर्दोष लोगों की निर्मम हत्या कर दी थी। हिंदुओ में सबसे पहले कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या हुई थी। उन्हें इस्लामी भीड़ ने निर्दयता से मार डाला था। दिल्ली पुलिस के विशेष जाँच दल द्वारा दायर चार्जशीट में रतन लाल की हत्या और आईपीएस अमित शर्मा और आईपीएस अनुज कुमार पर दंगाइयों द्वारा किए गए जानलेवा हमलों में कम से कम 17 आरोपियों का उल्लेख किया गया है।

दिल्ली में हुए दंगों के लगभग 4 से 5 प्रमुख साजिशकर्ता हैं, जिनमें सलीम खान, सलीम मुन्ना और शादाब शामिल हैं। पुलिस ने कहा कि देश की छवि को खराब करने के लिए दिल्ली में हुए दंगों की साजिश रची गई थी। इसमें गौर करने वाली बात यह है कि जिस डीएस बिंद्रा को सीएए विरोधी प्रदर्शकारियों को खाना परोसने के लिए मीडिया ने मसीहा का दर्जा दे दिया था, उसका भी नाम रतन लाल की हत्या में शामिल दंगों के आरोपितों के साथ है।

रतनलाल को कट्टरपंथी इस्लामिक भीड़ द्वारा उस समय बेरहमी से मारा गया था, जब वह चांद बाग के वजीराबाद रोड पर अपनी ड्यूटी कर रहे थे। चार्जशीट के अनुसार भीड़ पहले से दंगे को अंजाम देने के लिए तैयार थी।

जैसा कि पहले चार्जशीट में यह उल्लेख किया गया है कि एजेंसियों ने घटनास्थल से बिना इस्तेमाल किए गए कारतूसों को बरामद किया था। इसके साथ उन्होंने इस्तेमाल किए गए कारतूसों को पेट्रोल बम के साथ और मोलोटोव कॉकटेल की बोतलों को आसपास के रिक्शा की दुकानों की छत से बरामद किया था। जाँच के लिए दंगों में इस्तेमाल किए गए ईंट और पत्थरों को भी इकट्ठा किया गया था।

दिल्ली दंगों के समय निर्दयतापूर्वक किए गए रतन लाल की हत्या का एक वीडियो भी सामने आया था, जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। उस समय यह बात सामने आई थी कि पुलिस ने भीड़ के पास जाकर उनसे बात की थी। पुलिस ने उनसे शांत रहने और उनके द्वारा जारी अवैध मार्च को बंद करने के लिए कहा था। इसके बाद भीड़ भड़क गई और पुलिसवालों पर हमला कर दिया।

रतन लाल की हत्या में दायर चार्जशीट में एक चौकाने वाला तथ्य सामने आया है। चार्जशीट को पढ़ने के बाद ऑपइंडिया ने पाया कि जाँच के दौरान कई गवाहों ने इस बात की पुष्टि की थी कि इस्लामी भीड़ ने रतन लाल की हत्या से पहले, अन्य पुलिस अधिकारी को भी बंधक बनाया था।

बता दें उस क्षेत्र में दो बीट पुलिस इंस्पेक्टर भी मौजूद थे। इन पर क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी थी। भीड़ ने सीएए के विरोध में एक अवैध मार्च निकालने का फैसला किया था। उन्होंने भी इन तथ्यों का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था।

चार्जशीट के अंश

चार्जशीट में में यह बताया गया कि मुख्य आरोपितों में से एक सलीम मुन्ना दंगों से पहले मुस्लिमों को इलाके में जाकर उन्हें “अपनी ताकत दिखाने” के लिए कह रहा था। इसके साथ ही रतन लाल की हत्या से पहले दो पुलिस अधिकारियों ने यह बयान दिया था कि भीड़ पहले से ही लाठी और डंडों से लैस थी। उन्होंने आगे बताया कि वे इस मामले में सलीम मुन्ना से बात करने के लिए विरोध स्थल के तंबू में गए, ताकि भीड़ को इकट्ठा होने से रोका जा सके। अधिकारी प्रदर्शनकारियों से मिलने और उनसे बात करने के लिए कहने गए थे।

हालाँकि उस दौरान दोनों अधिकारियों को भीड़ ने बंदी बना लिया था। बड़ी मुश्किल से वे वहाँ से भागने में सफल हुए। इस बात की गवाही एक मुस्लिम पीड़ित ने भी दी थी, जिसका बयान चार्जशीट में लगाया गया है।

चश्मदीद का बयान

दिसंबर 2019, में कट्टरपंथी इस्लामवादियों की भीड़ ने देश के अलग अलग हिस्सों में दंगों को भड़काया था। तब भी इसी तरह की एक घटना हुई थी।।

उस समय मेरठ पुलिस को एक सूचना मिली थी कि शुक्रवार को विरोध-प्रदर्शन के दौरान चीजें बहुत भयावह हो सकती हैं। शुक्रवार की नमाज के तुरंत बाद, नागरिकता संशोधन विधेयक को लागू करने के विरोध में दोपहर करीब 2 बजे जामा मस्जिद में काली पट्टी बाँधकर लोगों की भारी भीड़ इकट्ठा हुए थी। जब पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने पुलिस के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया। इसके बाद 15-20 बदमाश लिसाड़ी गेट चौराहे पर पहुँचे और वहाँ हंगामा करना शुरू कर दिया। जैसे ही वहाँ भीड़ बढ़ती गई, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बलों पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया।

प्रदर्शन के दौरान दोने तरफ से गोलियाँ भी चली। मौके पर डीएम और एसएसपी को पहुँचना पड़ा। प्रदर्शनकारी इसके बाद हापुड़ रोड पर पहुँच गए। वहाँ लगभग 25-30 आरएएफ पुलिस ट्रेनी को तैनात किया गया था। प्रदर्शनकारी वहाँ पहुँचकर गाड़ियों को तोड़ने फोड़ने लग गए। साथ ही जवानों पर पत्थरबाजी भी की।

पथराव से खुद को बचाने के लिए ट्रेनी पुलिसकर्मी पास के एक दुकान के अंदर घुस गए। लेकिन प्रदर्शनकारी वहाँ भी पहुँच गए। हिंसक प्रदर्शनकारियों ने दुकान का शटर बंद कर उन्हें बंधक बना लिया गया। भीड़ ने दुकान में आग लगाने की भी कोशिश की थी।

दुकान में फँसे हुए पुलिसकर्मियों ने अपने वरिष्ठ पुलिसकर्मियों को इसकी जानकारी दी। इसके बाद नौचंदी पुलिस स्टेशन से एक पुलिस बल उनकी सुरक्षा के लिए रवाना हुई। लेकिन उनके वाहनों को भी रोक दिया गया और प्रदर्शनकारियों द्वारा उन पर पथराव किया गया। हिंसक प्रदर्शनकारियों को काबू करने के लिए पुलिस ने भीड़ पर गोलियाँ चलाईं और किसी तरह फँसे हुए आरएएफ सैनिकों को बचाया। साथ ही स्थिति को भी नियंत्रण में लाया गया।

इस घटनाओं को देखते हुए यह स्पष्ट है, कि रतन लाल की हत्या के ठीक पहले टेंट में फँसे कॉन्स्टेबल बेहद खतरे की स्थिति में थे। तुरंत बाद उसी भीड़ ने कॉन्स्टेबल रतन लाल की निर्दयता से हत्या कर दी और कई अन्य लोगों को घायल कर दिया था।

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