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सम्राट अशोक के 2300 साल पुराने शिलालेख को बना दिया मजार, अवैध निर्माण कर सालाना उर्स का भी आयोजन: बिहार के सासाराम में ‘लैंड जिहाद’

यह शिलालेख ईसा पूर्व 256 ईस्वी में देश भर में आठ स्थानों पर सम्राट अशोक ने लघु शिलालेख लगवाए थे। इनमें से एक सासाराम की चंदन पहाड़ी पर है। कलिंग युद्ध में हुए रक्तपात से विचलित होकर सम्राट अशोक भगवान गौतम बुद्ध की शरण में आ गए थे और बौद्ध धर्म के संदेशों के प्रसार के लिए जगह-जगह शिलालेख खुदवाए थे।

देश में ‘लव जिहाद’ (Love Jihad) के बाद जिहाद के कई तरीकों के बारे में खबरें आती रहती हैं। इनमें से एक लैंड जिहाद (Land Jihad) भी है। लैंड जिहाद में अवैध ढाँचों के जरिए सरकारी अथवा निजी जगहों पर अतिक्रमण कर उसे इस्लामी संपत्ति के रूप में परिवर्तित करने की कोशिश की जाती है।

लैंड जिहाद का एक ऐसा ही मामला बिहार के सासाराम से सामने आया है, जहाँ कट्टरपंथियों ने मौर्य वंश के सम्राट अशोक के लगभग 2300 साल पुराने शिलालेख पर ही कब्जा कर वहाँ मजार बना दिया है। वहीं, सरकार की लापरवाही भी साफ दिख रही है कि हजारों साल पुराने ब्राह्मी लिपि में लिखे गए इन शिलालेखों को सहेजने में लापरवाही दिखाई।

बिहार के रोहतास जिला के मुख्‍यालय सासाराम में कैमूर पहाड़ी श्रृंखला की चंदन पहाड़ी की प्राकृतिक कंदरा में अशोक महान द्वारा 2300 साल पहले लघु शिलालेख उत्कीर्ण कराए गए थे। यह शिलालेख ब्राह्मी लिपि में है, जो देश में भर में मात्र ऐसे 8 शिलालेख हैं। इनमें यह शिलालेख भी शामिल है और यह बिहार का अकेला शिलालेख है।

इस शिलालेख के चारों तरफ अवैध निर्माण करने के बाद इसकी घेराबंदी कर दी गई है। वहीं, शिलालेख को सफेद चूने से पुतवा कर उस पत्थर पर हरे रंग का चादर ओढ़ाकर मजार घोषित कर दिया गया है। इसे सूफी संत की मजार घोषित कर सालाना उर्स का भी आयोजन हो रहा है। शिलालेख का घेराबंदी करने के बाद उसके गेट में ताला लगाकर रखा जा रहा है।

स्वतंत्रता के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस शिलालेख को वर्ष 2008 में संरक्षित स्मारक घोषित किया था। सासाराम शहर की पुरानी ग्रैंड ट्रंक रोड (GT Road) और नए बाइपास के बीच कैमूर पहाड़ी श्रृंखला में आशिकपुर पहाड़ी की चोटी से लगभग 20 फीट नीचे स्थित कंदरा में स्थापित शिलालेख के पास ASI ने संरक्षण संबंधी बोर्ड भी लगाया था, लेकिन अतिक्रमणकारियों ने इसे साल 2010 में उखाड़कर फेंक दिया।

साल 2008, 2012 और 2018 में ASI ने अशोक शिलालेख के पास अतिक्रमण हटाने के लिए तत्कालीन जिलाधिकारी (DM) से कहा था। इसके बाद जिलाधिकारी ने सासाराम के एसडीएम को कार्रवाई का आदेश दिया था। एसडीएम ने शिलालेख पर अवैध कब्जा करने वाले मरकजी मोहर्रम कमेटी से मजार की चाबी तत्काल प्रशासन को सौंपने के कहा था, लेकिन कमिटी ने आदेश को अनसुना कर दिया। धीरे-धीरे यहाँ एक बड़ी इमारत अवैध रूप से बना दी गई। 

इस शिलालेख को ब्रिटिश राज में खोजा गया था और साल 1917 में इसे संरक्षित किया था। हालाँकि, इस संरक्षित स्थल की 2300 साल पुरानी पहचान को मात्र 23 साल में मिटा दिया गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने जिला प्रशासन को लगभग 20 पत्र लिखकर इस पहाड़ी पर यथास्थिति बनाए रखने के लिए कहा, लेकिन गैर-कानूनी निर्माण के जरिए इस धरोहर का निशान मिटाने की कोशिश की जा रही है।

यह शिलालेख ईसा पूर्व 256 ईस्वी में देश भर में आठ स्थानों पर सम्राट अशोक ने लघु शिलालेख लगवाए थे। इनमें से एक सासाराम की चंदन पहाड़ी पर है। कलिंग युद्ध में हुए रक्तपात से विचलित होकर सम्राट अशोक भगवान गौतम बुद्ध की शरण में आ गए थे और बौद्ध धर्म के संदेशों के प्रसार के लिए जगह-जगह शिलालेख खुदवाए थे। उस समय लोगों की भाषा ब्राह्मी थी। इसलिए ये संदेश उसी भाषा में खुदवाए गए थे।

ऐसी ही एक घटना महाराष्ट्र में भी सामने आई थी, जहाँ शिवाजी महाराज के ‘लोहागढ़’ किले में अवैध मजार बनाकर इसे एक कथित सूफी संत ‘उमर शहावली बाबा’ का मजार घोषित कर दिया गया। इसके बाद वहाँ सालाना उर्स (मेला) का भी आयोजन किया जाने लगा। इतिहासकारों ने बताया कि छत्रपति साहूजी महाराज के शासनकाल में भी वहाँ किसी तरह का मजार या मस्जिद नहीं थी। ये बाद में अवैध कब्जा कर बनाया गया है।

हालाँकि, ये सासाराम और लोहागढ़ किले तक ही बात सीमित नहीं है। अजमेर किले से लेकर देश के तमाम किलों और पुराने हिंदू विरासतों पर ऐसे मजार देखने को मिलने लगे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बाद में अवैध कब्जा कर ऐसे ढाँचे को खड़ा कर कब्जा करने की कोशिश की जा रही है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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