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यूजीसी का ब्रांड ‘हिट’ है, जैसे गैस रिसने पर यूनियन कार्बाइड का ब्रांड ‘हिट’ था!

किसी भी कंपनी का ब्रांड अचानक हेडलाइंस में और जन-जन की जुबान पर आ जाए तो कंपनी के मार्केटिंग और ब्रांडिंग वालों की बल्ले-बल्ले हो जाती है। UGC का नाम इतने कम समय में इतनी बार पहले कब जपा गया था? बीते 10 दिनों में डिजिटल मीडिया पर UGC एक वायरल ब्रांड बन गया है। बाजार की भाषा में UGC का ब्रांड हिट है। कुछ इस तर्ज पर जैसे भोपाल में प्राणलेवा MIC गैस रिसने पर यूनियन कार्बाइड का ब्रांड हिट था।

UGC के पूर्व चेयरमैन एम जगदीश कुमार को भोपाल में अभी जिस दिन पद्मश्री का शुभ समाचार मिला तब UGC ही ट्रेंड कर रहा था। वे विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों के अधिकारियों से विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल 2025 पर ही संवाद करने आए थे।

यह भारत में उच्च शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक और प्रभावी सुधार की दिशा में बनाया गया एक शानदार प्लान है। इसमें UGC, AICTE और NCTE के स्थान पर तीन स्वतंत्र परिषदों के साथ एक ही आयोग के गठन की तैयारी है। इसे तैयार करने में निश्चित ही कई सालों का अभ्यास किया गया होगा और अब इस पर व्यापक संवाद हो रहा है। पूर्व चेयरमैन से UGC की ताजा कुख्याति से जुड़े प्रश्न भी आए, जिनके उत्तर नहीं ही मिलने थे। वे केवल इसी बिल पर सीमित रहे, जिसे संक्षिप्त में VBSA-2025 कहा गया है।

एक तरफ, यह विधेयक बहुत स्पष्ट संकेत करता हुआ दिखाई दिया कि सरकार भारत के उच्च शिक्षा जगत के पूरे डिजाइन को एक नए स्वरूप में ढालने के लिए अच्छी तैयारी से अग्रसर है। इसका नामकरण ही ‘विकसित भारत’ के नाम पर है। मतलब साफ है कि उच्च शिक्षा संस्थानों, उनकी संरचना और उनके प्रबंधन को एक बड़े लक्ष्य के लिए एक नए स्वरूप में सामने लाया जाए और वह लक्ष्य है- विकसित भारत। यह ऐसे प्रयास हैं, जो किसी भी दूरदृष्टिवान सरकार से अपेक्षित हैं। पूर्व चेयरमैन के नाते एम जगदीश कुमार इस महात्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए जुटे हैं। निश्चित ही एक बड़ी टीम यह काम कर रही होगी।

दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट में कुछ पुराने मामलों की फाइलें भी सरक रही हैं। यह विश्वविद्यालयों में घटे अप्रिय घटनाक्रमों की हैं, जो एक समय मीडिया में जातीय विवादों की सुर्खियाँ बने। विषय संवेदनशील है तो निश्चित ही सरकार का पक्ष रखने के लिए उच्च शिक्षा विभाग के ‘जिम्मेदार अधिकारियों’ को इसमें लगाया ही गया होगा।

सरकार के लिए असुविधाजनक स्थिति की आशंकाओं से जुड़े मामलों में कड़ी और बड़ी एहतियातें बरती ही जाती हैं। UGC के मनीषियों को जो ‘जातीय ज्ञान’ अचानक प्राप्त हुआ है, उसकी जड़ें ऐसे ही प्रकरणों की फाइलों में फैली हैं, जिसके बारे दिशा सूत्र सुप्रीम कोर्ट से मिले होंगे। तो जिम्मेदार अधिकारियों ने ‘अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए’ वह ऐतिहासिक रचना की, जिसने चाय की प्याली में तूफान नहीं ला दिया, पूरी गरम केतली ही अयोध्या से सोमनाथ तक उड़ेल दी। किए कराए पर पानी फिरना यही है।

अब कुछ प्रश्न हैं। अव्वल तो सिस्टम में कौन क्या देख रहा है? UGC में कौन क्या देख रहा है? सुप्रीम कोर्ट में कौन क्या देख रहा है? मंत्रालय में कौन क्या देख रहा है? मंत्रालय से UGC की ओर कौन क्या देख रहा है? UGC की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कौन क्या देख रहा है? जिसे जो भी दिखाई दे रहा है, वह अपने ऊपर किसे क्या दिखा रहा है?

प्रस्तुत प्रकरण में किसे क्या दिखाई दिया और उसने उसे क्या समझा, कागजों पर क्या लिखा और अंतिम रूप से जारी करने के पहले उसने किसको क्या दिखाया और समझाया? क्या किसी की बुद्धि में नहीं आया कि इसके क्या दुष्परिणाम अगले कुछ ही घंटों में सरकार के सारे अच्छे-किए कराए पर पानी फेरने वाले हैं? या UGC में सब यह मान रहे थे कि उनके सर्कुलरों को देखता ही कौन है। आए दिन कुछ न कुछ जारी करते हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में ज्यादातर फाइलों में समाते रहते हैं। साफ कहें तो डस्टबिन में। क्या UGC के बुद्धिमानों ने यह सोचा था कि यह भी ऐसा ही एक रद्दी का कागज होगा?

एक और महत्वपूर्ण बात है। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष है। देश भर में सामाजिक समरसता के सम्मेलन हो रहे हैं। ये आयोजन बड़े सामाजिक धरातल के हैं, जिनमें जातियों के छोटे और संकीर्ण दायरों से परे जाने की प्रेरणा है। संघ की समग्र शक्ति इसमें लगी हुई है और ये कोई हजारों की भीड़भाड़ वाले विशाल सम्मेलन नहीं हैं। सक्रिय रूप से सघन आयोजनों की इस श्रृंखला में संघ समाज के हर कोने का सीधा स्पर्श कर रहा है। इनकी चहल-पहल गाँव और कस्बों में हैं। बड़े शहरों के छोटे मोहल्लों के समूहों में है।

प्रधानमंत्री सोमनाथ को रेखांकित कर रहे हैं और अतीत से सबक लेने का संदेश दे रहे हैं। एक ऐसा अतीत जिसमें हमारे लिए हर तरह के भेदभाव से मुक्त एक संगठित समाज के रूप में सामने आने के संकेत हैं। न हम बटेंगे, न हम कटेंगे। हमारे बटने की बहुत बड़ी कीमतें देश ने चुकाई हैं और समाज को भी गहरे आघात झेलने पड़े हैं। इसलिए सब एक बड़े कोष्ठक में स्वयं को एक रखें, न कि छोटे और मध्यम कोष्ठकों में और उस बड़े कोष्ठक का नाम है कि हम सब हिंदू हैं। हमारी एक जाति है और एक ही धर्म है।

अब टाइमिंग महत्वपूर्ण है। ठीक ऐसे ही समय अचानक UGC की प्रयोगशाला में बैठे वैज्ञानिक एक नया रसायन लेकर आते हैं और वह सारे वातावरण को कसैले धुएँ से भर देता है। इस प्रभाव का रँग भी है, गँध भी है और स्वाद भी है। यह रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन नहीं है। सामाजिक समरसता के सम्मेलनों में हिस्सा ले रहे करोड़ों लोग एकदम से सन्नाटे में आ गए हैं। सोमनाथ से सबक ग्रहण करने की प्रक्रिया को अचानक ग्रहण लग गया है। कोई हिसाब नहीं लगा सकता कि इसमें किस-किसके हिस्से की कितनी हानि हो चुकी है और किनके चेहरे इस अचानक खुली लॉटरी से चमके हुए हैं? वे अवसरवादी जो चाहते ही हैं कि सरकार की ताकत खत्म हो और उनके अच्छे दिन लौटें। समाज बिखरे, टूटे, लड़े, भिड़े, मरे, कटे अपनी बला से।

क्या UGC में या मंत्रालय में ऐसे लोग आज भी जमा हैं, जो यह रेखांकित कर रहे हैं कि सरकार किसी की भी हो, सिस्टम में वे ही हैं और वे वह करके रहेंगे, जो वे करना चाहते हैं। अगर दुश्मनों की जमीन पर आतंकियों को निपटा रहे अज्ञात हमलावरों के पीछे कहीं भारत की प्रेरक शक्ति काम कर रही है तो अपने घर में अपने ही दीए के नीचे पसरे इस अंधेरे पर गौर करना जरूरी है। इस अंधेरे में कौन किस शक्ल में घात लगाकर बैठा है?

घात में वो जो भी है, उसने UGC के एक कागज को आगे सरकाकर वह सब कर दिया है, जो नहीं होना चाहिए था। ऐसे तत्व किसी भी पद पर हों, किसी भी विभाग में हों, संगठन में हों या सरकार में हों, इनके रहते किसी दुश्मन की जरूरत नहीं है। वे कुल्हाड़ी हाथ में लिए ही बैठे हैं। एक कुल्हाड़ी पूरी ताकत से पैरों पर मार ली गई है।

पता नहीं UGC मुख्यालय के मनीषियों में ठीक इसी समय क्या चल रहा होगा, जब चारों तरफ उनका ही नाम जप हो रहा है। उनके चियर लीडर्स किस मुद्रा में क्या भाव प्रकट रहे होंगे। UGC के महामतियों ने बैठे-ठाले किस-किस के हिस्से की कितनी हानि कर दी है, इसका हिसाब लगाना कठिन है।

UGC दिल्ली में है और दिल्ली की नाक के नीचे ऐसा कैसे हो सकता है?

एक समाजसेवी या टेक उद्यमी… जानें कौन हैं राहुल दीवान? जिनकी याचिका के कारण UGC के नए नियमों पर SC ने लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 जनवरी 2026) को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) विनियम, 2026 पर अस्थायी रोक लगा दी और इन नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका की तत्काल सुनवाई पर विचार करने पर सहमति जताई।

यह कदम नए UGC नियमों को लेकर बढ़ते विवाद के बीच उठाया गया है। आलोचकों का कहना है कि ये नियम भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव की एकतरफा और कठोर (ड्रैकोनियन) परिभाषा प्रस्तुत करते हैं, जो संतुलन और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है।

कोर्ट में यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता और उद्यमी राहुल दीवान की ओर से वकील पार्थ यादव ने CJI सूर्यकांत के सामने रखी। पार्थ यादव ने कोर्ट से अपील की कि इस मामले की जल्द से जल्द सुनवाई की जाए। उन्होंने तर्क दिया कि अगर ये UGC के नए नियम लागू रहे, तो वे भेदभाव रोकने के बजाए नया भेदभाव पैदा कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि यह मामला संविधान से जुड़े गंभीर सवाल उठाता है और इस पर तुरंत न्यायिक जाँच जरूरी है। इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की तत्काल सुनवाई पर विचार करने पर सहमति जताई, जिससे यह साफ संकेत मिला कि नए UGC नियमों को लेकर उठी चिंताओं की गहराई से जाँच होगी।

यह याचिका शुक्रवार (23 जनवरी 2026) को जारी किए गए UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) नियम, 2026 की कुछ खास धाराओं को चुनौती देती है। याचिका में कहा गया है कि नियम 3(1)(c), 8(b) और 8(c) भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करते हैं, जो कानून के सामने समानता, भेदभाव से सुरक्षा और गरिमा के साथ जीवन के अधिकार की गारंटी देते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका किसने फाइल की?

यह याचिका व्यवसायी और समाजसेवी राहुल दीवान ने सेवानिवृत्त IAS अधिकारी संजय दीक्षित, अनुभव पांडे और रूबल पडालिया के साथ मिलकर दायर की है। इन सभी में राहुल दीवान इस कानूनी चुनौती का सबसे मुखर चेहरा बनकर उभरे हैं। वे UGC के नए नियमों का खुलकर विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि नए नियम खतरनाक हैं और समाज में विभाजन पैदा कर सकते हैं।

याचिका दायर करने के तुरंत बाद राहुल दीवान ने ऑपइंडिया से बातचीत की और सुप्रीम कोर्ट जाने के पीछे की अपनी चिंताएँ और वजहें बताईं। उनका कहना है कि UGC के ये नए नियम असली भेदभाव को खत्म करने के लिए नहीं हैं, बल्कि एक खास वैचारिक सोच को संस्थागत रूप देने की कोशिश हैं।

राहुल दीवान ने UGC नियमों की आलोचना की

ऑपइंडिया से बात करते हुए राहुल दीवान ने कहा कि UGC के इन नियमों की मंशा काफी चिंताजनक लगती है। उनका कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य हिंदू समाज की अलग-अलग जातियों को ऊँची जातियों के खिलाफ खड़ा करना प्रतीत होता है और यह ढाँचा हिंदू समाज के भीतर टकराव और विभाजन बढ़ाने के लिए बनाया गया है।

राहुल दीवान ने UGC के नियमों पर सवाल उठाते हुए कहा कि इन नियमों में कुछ समुदायों को बिना ठोस सबूत के उत्पीड़क (शोषक) मान लिया गया है, जबकि यह साफ नहीं किया गया कि उत्पीड़क कौन है और इसका आधार क्या है। उन्होंने चेतावनी दी कि पीड़ितों को चुनिंदा तरीके से परिभाषित करने से इन नियमों का गलत इस्तेमाल बढ़ सकता है।

याचिका दायर करने के बाद LinkedIn पर अपनी राय साझा करते हुए, दीवान ने इन दिशानिर्देशों को विभाजनकारी बताया। उनका कहना है कि ये नियम इतिहास की कथित गलतियों के लिए पूरी-की-पूरी समुदायों को सजा देते हैं, जबकि व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय नहीं की जाती।

उन्होंने लिखा कि आज भारत में ब्राह्मण और सामान्य तौर पर ऊँची जातियों के लोग सबसे अधिक उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं और उन्हें हजार साल पहले उनकी जाति द्वारा किए गए माने जाने वाले कर्मों के लिए दंडित किया जा रहा है। उन्होंने इसे सामूहिक सजा करार दिया। राहुल दीवान का कहना है कि न्याय और समानता सुनिश्चित करने वाले कानून सभी के लिए बराबर होने चाहिए, न कि समाज के बड़े वर्गों को कानूनी सुरक्षा से बाहर करने वाले।

राहुल दीवान कौन है?

राहुल दीवान एक उद्यमी, सामाजिक कार्यकर्ता, ब्लॉगर, ओपन-सोर्स और एजाइल टेक्नोलॉजी के समर्थक, साथ ही शौकिया फोटोग्राफर हैं। वे योग और ध्यान को रोजाना की दिनचर्या की तरह अपनाते हैं। उन्होंने शुरुआत एक सॉफ्टवेयर सर्विस कंपनी खड़ी करके की, जिसे 20 सालों में लगभग 600 कर्मचारियों तक बढ़ाया और 2022 में उसे एक अमेरिकी कंपनी को बेच दिया।

अपनी कंपनी छोड़ने के बाद, वे एंजेल इन्वेस्टर बन गए और आयुर्वेद, सर्जिकल डिवाइस, सिंथेटिक बायोलॉजी, क्लीन टेक, फूड टेक और यहाँ तक कि फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट्स में भी निवेश कर रहे हैं।

साल 2006 में उन्होंने ‘सारयू फाउंडेशन’ नाम की एक गैर-लाभकारी संस्था शुरू की, जो कमजोर और वंचित पृष्ठभूमि के बच्चों के लिए गैर-औपचारिक शिक्षा पर काम करती है। इस संस्था ने अब तक दिल्ली और पूर्वी भारत के गाँवों में 1000 से अधिक बच्चों की मदद की है।

फाउंडेशन बच्चों को मैथ्स, म्यूजिक, इंग्लिश और योग की आफ्टर-स्कूल क्लासेस देता है, साथ ही सुरक्षित और सहयोगी माहौल बनाता है, ताकि बच्चे आत्मविश्वास के साथ सीख सकें और आगे बढ़ सकें।

2016 में राहुल दीवान ने संगम टॉक्स नाम से एक यूट्यूब चैनल शुरू किया, जो आज भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge Systems), इतिहास, विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, कला, संस्कृति, पर्यावरण और यात्रा जैसे विषयों का एक बड़ा मंच बन चुका है।

इस चैनल पर विद्वानों और शोधकर्ताओं के लगभग 1000 टॉक्स, 1600 से ज्यादा लंबे वीडियो और 6 भारतीय भाषाओं में कंटेंट उपलब्ध है, जिसमें हिंदी और अंग्रेजी सबसे प्रमुख हैं।राहुल दीवान इस पहल का अधिकांश खर्च खुद उठाते हैं और करीब 50 ऐसे लोगों या समूहों का समर्थन करते हैं, जो भारतीय सभ्यता के पुनर्निर्माण के लिए काम कर रहे हैं।

उन्होंने कंप्यूटर साइंस में B.Tech किया है, साथ ही पक्षी विज्ञान (ऑर्निथोलॉजी) और क्रिएटिव राइटिंग से जुड़े सर्टिफिकेट कोर्स भी किए हैं। राहुल दीवान खुद को इस सोच से प्रेरित बताते हैं “सही काम करो, तो सही चीजें अपने आप तुम्हारे साथ होंगी।” यह विचार उन्हें उनके आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु जग्गी वासुदेव से मिला है।

द हिंदू फंड और इसकी दूर-दृष्टि

राहुल दीवान का आने वाले 3–4 सालों का एक बड़ा लक्ष्य ‘1000 करोड़ हिंदू फंड’ बनाना है। यह पहल हिंदू नेटवर्क फाउंडेशन के तहत चलाई जा रही है, जिसे पहले सरयू फाउंडेशन के माध्यम से शुरू किया गया था।

इस फंड का उद्देश्य सनातन धर्म और भारतीय सभ्यता की रक्षा और प्रचार के लिए काम करने वाले व्यक्तियों और संगठनों को आर्थिक सहायता देना है। इसे सरल नाम हिंदू फंड दिया गया है और इसे कम नौकरशाही के साथ एक ग्रांट देने वाले मंच के रूप में तैयार किया गया है।

इस पहल की मूल सोच है, डिफ़ॉल्ट रूप से विश्वास (पहले भरोसा), यानी जो लोग धर्म और समाज के लिए काम कर रहे हैं, उन्हें अनावश्यक कागजी प्रक्रिया में उलझाने के बजाय सशक्त बनाया जाए।

यह फंड शिक्षा, संस्कृति, इतिहास, सभ्यतागत अध्ययन और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली पहलों को समर्थन देता है। राहुल दीवान का मानना है कि हिंदू समाज को अपना ऐतिहासिक आत्मविश्वास और सभ्यतागत पहचान फिर से मजबूत करनी चाहिए।

बैकग्राउंड: UGC नियमों की वजह से विरोध क्यों हुआ?

UGC 2026 के नियमों को लेकर विवाद इसलिए बढ़ा है क्योंकि इनमें जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा बहुत सीमित रखी गई है। इन नियमों में सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) को जाति-आधारित उत्पीड़न का शिकार मानने से बाहर कर दिया गया है और केवल SC, ST और OBC वर्गों को ही पीड़ित की श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब यह है कि अगर सामान्य वर्ग के किसी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता है, तो उसके लिए शिकायत दर्ज कराने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

आलोचकों का कहना है कि ये नियम यह मानकर चलते हैं कि जाति-आधारित भेदभाव केवल SC, ST और OBC के खिलाफ ही होता है और इस तरह सामान्य वर्ग को बाहर रखकर उल्टा भेदभाव (रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन) को बढ़ावा देते हैं। जबकि सामान्य वर्ग भी शैक्षणिक संस्थानों का एक बड़ा हिस्सा है।

नए नियमों को सामान्य छात्रों के खिलाफ पक्षपाती बताया जा रहा है, क्योंकि अगर इनका गलत इस्तेमाल हुआ, तो उनके पास किसी भी तरह की संस्थागत सुरक्षा या कानूनी रास्ता नहीं बचेगा। इसी वजह से 2026 के UGC नियमों को लेकर खासतौर पर छात्रों में भारी नाराजगी और विरोध देखने को मिल रहा है, क्योंकि इनका सीधा असर उनकी पढ़ाई, सुरक्षा और भविष्य पर पड़ सकता है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है,जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

भारत से बांग्लादेश तक सरस्वती पूजा के दौरान हिंसा: कहीं मूर्तियाँ तोड़ी गई तो कहीं पथराव-बमबाजी, पढ़ें- 24 घटनाएँ

2026 में हिंदू पर्व सरस्वती पूजा कई जगह विवाद, हिंसा और अवरोधों की चपेट में रहा। अलग-अलग राज्यों और इलाकों से आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरस्वती पूजा के आयोजनों पर कट्टरपंथियों द्वारा कई तरह के हमले और प्रतिबंध लगाए गए, जिससे श्रद्धालुओं को परेशानी झेलनी पड़ी।

कुछ स्थानों पर हिंदू बच्चों को पूजा में भाग लेने से रोका गया, तो कहीं देवी सरस्वती की मूर्तियों का अपमान किया गया। कई पंडालों में तोड़फोड़ की गई, सजावट को नुकसान पहुँचाया गया और आयोजकों को डराने की कोशिश की गई। कई जगहों पर पूजा में शामिल भक्तों पर धारदार हथियारों से हमले किए गए, जबकि कुछ जुलूसों पर पत्थरबाजी और बम फेंकने जैसी गंभीर घटनाएँ भी सामने आईं।

इन घटनाओं से यह सवाल उठता है कि क्या हिंदू त्योहारों को निशाना बनाकर व्यवस्थित तरीके से बाधित करने की कोशिश की जा रही है। लगातार हो रही ऐसी घटनाएँ धार्मिक स्वतंत्रता, कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द को लेकर गंभीर चिंता पैदा करती हैं। आगे इस तरह के 24 मामलों को सूचीबद्ध किया गया है।

1. बिहार के वैशाली में हिंदू श्रद्धालु को मुस्लिमों ने बेरहमी से पीटा

बिहार के वैशाली के नवागढ़ क्षेत्र में सरस्वती प्रतिमा विसर्जन के बाद लौट रहे हिंदू श्रद्धालुओं पर कथित रूप से एक मुस्लिम भीड़ द्वारा हमला किए जाने का मामला सामने आया। यहाँ सरस्वती पूजा के बाद श्रद्धालु प्रतिमा विसर्जन के लिए जुलूस निकाल रहे थे।

इस दौरान नवागढ़ बाजार क्षेत्र में मुस्लिमों ने जुलूस के मार्ग को बदलने का दबाव बनाया। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों में कहासुनी हुई और कुछ देर के लिए धक्का-मुक्की भी हुई। हालाँकि बाद में जुलूस आगे बढ़ गया। लेकिन विसर्जन के बाद जब श्रद्धालु वापस लौट रहे थे, तब मस्जिद के पास एक बार फिर विवाद भड़क गया।

आरोप है कि रितेश कुमार उर्फ रामचंद्र को रास्ते में रोककर कुछ लोगों ने बेरहमी से पीटा। जब अन्य श्रद्धालु उसे बचाने के लिए आगे आए तो कथित तौर पर लाठी-डंडों और तलवारों से लैस भीड़ ने उनका पीछा किया। वहीं आसपास की छतों से पत्थरबाजी किए जाने से इलाके में अफरा-तफरी मच गई और लोग जान बचाकर इधर-उधर भागने लगे।

2. झारखंड: लोहरदगा में सरस्वती पूजा जुलूस को लेकर मुस्लिमों ने हिंदुओं पर किया हमला

झारखंड के लोहरदगा जिले के कुडू थाना क्षेत्र अंतर्गत बारीडीह गाँव में 25 जनवरी 2026 को सरस्वती पूजा विसर्जन के दौरान तनावपूर्ण स्थिति बन गई। गाँव में माँ सरस्वती की झाँकी निकाली जा रही थी और विसर्जन समारोह के लिए श्रद्धालु मूर्ति लेकर गुजर रहे थे। इसी दौरान मूर्ति ले जा रहा वाहन एक मुस्लिम परिवार के घर की छत से हल्का सा टकरा गया।

इसके बाद संबंधित मुस्लिम परिवार और आसपास के कुछ लोग एकत्र हो गए और वाहन चालक के साथ मारपीट की। देर रात से शुरू हुआ विवाद सुबह तक बढ़ गया और देखते ही देखते स्थिति हिंसक हो गई। आरोप है कि इसके बाद एक भीड़ ने हिंदुओं पर हमला कर दिया। घटना में तीन लोग घायल हो गए।

3. ‘जय श्री राम’ भजन बजाने पर पथराव

बिहार के दरभंगा जिले के अलीनगर क्षेत्र में सरस्वती पूजा की प्रतिमा विसर्जन यात्रा के दौरान तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो गई, जब विसर्जन जुलूस पर कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों द्वारा पथराव किया गया। इस घटना में कई हिंदू श्रद्धालुओं को चोटें आईं और इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्थानीय हिंदू समुदाय का कहना है कि विवाद की शुरुआत रविवार (25 जनवरी 2026) को हुई थी, जब डीजे पर ‘जय श्री राम’ के भजन बजाए जा रहे थे। इसी बात को लेकर कहासुनी हुई, जो बाद में हिंसा में बदल गई।

4. त्रिपुरा: कैलाशहर में सरस्वती पूजा के दौरान मुस्लिमों ने फैलाई हिंसा

त्रिपुरा के उनाकोटी जिले के कैलाशहर में सरस्वती पूजा के दौरान कथित तौर पर तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो गई। आरोप है कि करीब 16 मुस्लिम युवकों ने हथियारों और लाठियों के साथ पूजा आयोजन में बाधा डालने की कोशिश की, जिसके बाद इलाके में झड़पें शुरू हो गईं।

बीजेपी मंडल अध्यक्ष प्रीतम घोष ने आरोप लगाया कि करीब 16 युवक माचेती और डंडों के साथ सरस्वती पूजा स्थल पर पहुँचे और हिंदुओं पर हमला करने लगे। उन्होंने कहा, “जैसे ही हमें सूचना मिली और हम मौके पर पहुँचे, हम पर अंधाधुंध हमला किया गया। इसके बाद स्थिति और हिंसक हो गई। ये असामाजिक तत्व बांग्लादेश जैसी खतरनाक स्थिति यहाँ पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। हमें एकजुट होकर ऐसी ताकतों के खिलाफ लड़ना होगा।”

5. बिहार के हाजीपुर में आरती के दौरान जबरन बंद कराया डीजे

बिहार के हाजीपुर के टेकनारी पंचायत के वार्ड नंबर 7 में सरस्वती पूजा के दौरान धार्मिक अनुष्ठान में उस समय बाधा उत्पन्न हो गई, जब स्थानीय थाना प्रभारी आरती के दौरान पंडाल में पहुँचे और डीजे बंद कराने का निर्देश दिया।

समिति सदस्यों और श्रद्धालुओं का कहना है कि उस समय कोई डीजे नहीं बज रहा था, फिर भी पुलिस कार्रवाई के कारण आरती रोकनी पड़ी, जिससे लोगों में नाराजगी फैल गई। घटना के बाद सैकड़ों ग्रामीण पंडाल में एकत्र हो गए और विरोध जताते हुए पुलिस कर्मियों को घेर लिया। ग्रामीणों ने थाना प्रभारी पर अनावश्यक हस्तक्षेप कर माहौल बिगाड़ने का आरोप लगाया।

6. बिहार के कटिहार में स्कूल ने सरस्वती पूजा पर लगाया प्रतिबंध

बिहार के कटिहार जिले के बिंदटोली गाँव स्थित उन्नत मध्य विद्यालय में सरस्वती पूजा के आयोजन पर रोक लगाए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया। वर्षों से स्कूल परिसर में सरस्वती पूजा का आयोजन नियमित रूप से होता आ रहा था, लेकिन वर्ष 2026 में स्कूल प्रशासन ने इसे प्रतिबंधित कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्ष 2025 में सरस्वती प्रतिमा विसर्जन के दौरान छात्रों द्वारा शिक्षक शाहिल कुमार को अबीर लगाए जाने पर उन्होंने आपत्ति जताई थी। इसके बाद उनकी माँग पर स्कूल के स्टाफ और प्रधानाचार्य लक्ष्मण मंडल ने विद्यालय में सरस्वती पूजा के आयोजन पर रोक लगाने का निर्णय ले लिया।

इस प्रतिबंध के चलते हिंदू श्रद्धालुओं को माँ सरस्वती की पूजा-अर्चना करने में कठिनाई हुई और कई लोगों को आसपास के अन्य स्थानों पर जाकर पूजा करनी पड़ी। मामला बढ़ने पर स्कूल परिसर के पास विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया।

बाद में प्रधानाचार्य लक्ष्मण मंडल ने पूरे मामले में हुई गलती को स्वीकार किया और आश्वासन दिया कि अगले वर्ष से विद्यालय में नियमित रूप से माँ सरस्वती की पूजा का आयोजन फिर से शुरू किया जाएगा। प्रधानाचार्य के आश्वासन के बाद स्थिति सामान्य हुई और तनाव समाप्त हो गया।

7. झारखंड के हजारीबाग में विसर्जन जुलूस पर कट्टरपंथियों ने फेंके पत्थर

झारखंड के हजारीबाग जिले में सरस्वती पूजा विसर्जन जुलूस के दौरान हिंसा की घटना सामने आई। 24 जनवरी 2026 को केरेडारी प्रखंड के बेल्टू गाँव में माँ सरस्वती की प्रतिमा विसर्जन के लिए निकाले गए जुलूस पर अचानक एक मुस्लिम भीड़ ने पत्थरबाजी शुरू कर दी। इस अप्रत्याशित हमले के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई और कई लोग घायल हो गए।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, विसर्जन जुलूस शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहा था, तभी अचानक कुछ लोगों ने जुलूस पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। इसके बाद जुलूस में शामिल कुछ लोगों ने भी जवाबी प्रतिक्रिया दी, जिससे दोनों पक्षों के बीच तनाव और बढ़ गया।

बताया जा रहा है कि विवाद की शुरुआत जुलूस के दौरान बजाए जा रहे गानों को लेकर हुई। मुस्लिम पक्ष ने कुछ गानों को ‘उकसाने वाला’ बताकर आपत्ति जताई और देखते ही देखते मामला हिंसा में बदल गया। पत्थरबाजी के कारण कई श्रद्धालु घायल हो गए और गाँव में तनावपूर्ण स्थिति बन गई।

8. झारखंड में विसर्जन जुलूस पर बमबाजी

झारखंड में सरस्वती पूजा के दौरान विसर्जन जुलूस में उस समय अफरा-तफरी मच गई जब असामाजिक तत्वों ने बमबाजी कर दी। यह घटना 24 जनवरी 2026 की देर रात लोधीपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत गोहरियों गाँव के वार्ड नंबर 14 में हुई।

सरस्वती प्रतिमा विसर्जन के दौरान डीजे पर संगीत बजाने को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद हुआ, जो देखते ही देखते हिंसक झड़प में बदल गया। इसी दौरान अचानक दो बम फेंके गए, जिससे मौके पर दहशत फैल गई और लोग इधर-उधर भागने लगे।

इस बमबाजी में नीरज कुमार, गौतम कुमार, मेघु मंडल और छोटू कुमार गंभीर रूप से घायल हो गए। प्राथमिक उपचार के बाद सभी घायलों को मायागंज अस्पताल में भर्ती कराया गया।

9. असम के डिब्रूगढ़ में तोड़ी माँ सरस्वती की प्रतिमा

असम के डिब्रूगढ़ में सरस्वती पूजा के अगले दिन देवी सरस्वती की प्रतिमा को कुछ अज्ञात असामाजिक तत्वों ने क्षतिग्रस्त कर अपमानित कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह घटना 24 जनवरी 2026 को डिब्रूगढ़ के डिब्रूजन जालान नगर लेबर लाइन इलाके में हुई।  

स्थानीय निवासियों ने कहा कि इलाके में पहले कभी ऐसी घटना नहीं हुई थी। लोगों ने प्रशासन से माँग की है कि दोषियों की पहचान कर उन्हें सख्त सजा दी जाए ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाएँ दोबारा न हों और धार्मिक सौहार्द बना रहे।

10. बंगाल में TMC नेता दाउद आलम मोल्ला पर छात्रों को पूजा से रोकने का आरोप

पश्चिम बंगाल के सरकारी प्रायोजित जोगेश चंद्र चौधुरी कॉलेज में सरस्वती पूजा के आयोजन को लेकर हिंदू छात्रों को कथित रूप से धमकाए जाने का मामला सामने आया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ऑल इंडिया तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के मुस्लिम नेता दाउद आलम मोल्ला पर छात्रों को पूजा आयोजित न करने की चेतावनी देने का आरोप है।

घटना उस समय चर्चा में आई जब कॉलेज की एक हिंदू छात्रा ने आरोप लगाया कि मोल्ला ने उन्हें डराया-धमकाया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में छात्रा ने कहा कि आरोपित नेता कॉलेज के बाहर खड़ा था और उसने अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए धमकी दी।

गौरतलब है कि यह कॉलेज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अल्मा मेटर भी है। इससे पहले जनवरी 2025 में भी एक छात्र संगठन नेता द्वारा सरस्वती पूजा करने पर धमकी देने का मामला रिपोर्ट हुआ था।

11. बांग्लादेश में कट्टरपंथियों ने तोड़ी मूर्ति

बांग्लादेश के गोपालगंज जिले के मुक्षुदपुर उपजिला के पश्चिम उजानी कंदनिपारा गाँव में एक सार्वजनिक पूजा मंडप में आयोजित सरस्वती पूजा के बाद मुस्लिम हमलावरों ने मूर्ति को तोड़फोड़ कर उसके गर्दन को मोड़ दिया और सिर लटकाकर जानबूझकर अपवित्र करने का कृत्य किया। मुक्षुदपुर थाने के अधिकारी अब्दुल्ला अल मामुन ने बताया कि पूजा संपन्न होने के बाद जब भक्त मंडप से लौट रहे थे, तभी यह हमला किया गया।

12. बिहार के छपरा में हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अभद्र टिप्पणी

बिहार के छपरा जिले के सोनपुर में सरस्वती पूजा समारोह के दौरान एक शर्मनाक घटना सामने आई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 23 जनवरी 2026 को बाबा हरिहरनाथ मंदिर के पास सरस्वती पूजा पंडाल के नजदीक देव नारायण पांडे नामक व्यक्ति ने देवी सरस्वती और अन्य हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया।

बताया गया कि आरोपित नशे की हालत में था और पूजा स्थल के पास धूम्रपान भी कर रहा था। घटना स्थानीय पुलिस स्टेशन से करीब पाँच सौ मीटर की दूरी पर हुई। वायरल वीडियो में आरोपित को लोगों से बहस करते और देवी-देवताओं के लिए अपमानजनक टिप्पणी करते देखा गया।

स्थानीय लोगों ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने आपत्तिजनक बयान जारी रखे। वीडियो वायरल होने के बाद अगले दिन आरोपी ने हाथ जोड़कर माफी माँगी।

13. गुजरात के सूरत में पूजा पंडाल में अश्लील गानों पर कराया डांस

गुजरात के सूरत में सरस्वती पूजा के दौरान एक विवादास्पद घटना सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 23 जनवरी 2026 को कटारगाम वड रोड स्थित आनंद पार्क सोसायटी में आयोजित पूजा पंडाल में महिलाओं से अश्लील भोजपुरी और हिंदी फिल्मी गानों पर नृत्य कराया गया।

इस दृश्य से कार्यक्रम में मौजूद हिंदू परिवार, बुजुर्ग और महिलाएँ असहज व शर्मिंदा महसूस करने लगे। खास तौर पर बड़ी संख्या में छोटे बच्चों की मौजूदगी को लेकर चिंता जताई गई।

स्थानीय लोगों ने कहा कि सरस्वती पूजा जैसे पवित्र अवसर पर इस तरह की अश्लीलता धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती है। कुछ हिंदू संगठनों ने आयोजकों पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाते हुए कड़ी कार्रवाई की माँग की।

14. बंगाल में TMC गुटों ने मंदिर पर लगाया ताला

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के कमरहाटी शहर में सरस्वती पूजा समारोह उस समय बाधित हो गया जब सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के अंदरूनी गुटीय संघर्ष ने धार्मिक आयोजन को प्रभावित कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना शुक्रवार, 23 जनवरी 2026 को हुई। बताया गया कि बेलघड़िया सरबजनिन श्री दुर्गा चौक सोसायटी मंदिर को TMC के एक गुट ने ताला लगाकर बंद कर दिया, जिससे स्थानीय हिंदू महिलाएँ माँ सरस्वती की पूजा नहीं कर सकीं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पार्षद इस विवाद का समाधान नहीं निकाल पाए हैं। वहीं पुलिस ने भी तब तक हस्तक्षेप से इनकार कर दिया जब तक दोनों गुट आपसी सहमति नहीं बनाते।

15. बंगाल के कूचबिहार में TMC गुटों ने बनाया हिंसक माहौल

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले के दिनहाटा कॉलेज में सरस्वती पूजा समारोह उस समय बाधित हो गया, जब सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के दो गुटों के बीच आपसी झड़प हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह घटना 23 जनवरी 2026 को हुई।

कॉलेज परिसर में स्थापित सरस्वती पूजा मंडप के पास अचानक राजनीतिक गुटबाजी हिंसक रूप ले गई, जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया। पूजा में शामिल होने आए हिंदू श्रद्धालुओं को अपनी सुरक्षा के लिए जान बचाकर भागना पड़ा और पूरा परिसर रणक्षेत्र में बदल गया।

मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि झगड़े के कारण पूजा की पवित्रता भी प्रभावित हुई। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस को बुलाया गया। दिनहाटा थाना प्रभारी और सब-डिविजनल पुलिस अधिकारी कॉलेज पहुँचे और स्थिति को नियंत्रित किया।

16. छत्तीसगढ़ में शराब के नशे में पूजा कार्यक्रम में पहुँचे शिक्षक

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में बसंत पंचमी के अवसर पर आयोजित सरस्वती पूजा के दौरान एक सरकारी शिक्षक के नशे में स्कूल पहुँचने का मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जुनापारा प्राथमिक शाला, गुमगरा में शिक्षक बुद्धेश्वर दास कथित रूप से शराब के नशे में पूजा कार्यक्रम में पहुँचे।

पूजा में मौजूद ग्रामीणों और अभिभावकों ने शिक्षक की हालत देखकर वीडियो रिकॉर्ड किया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि शिक्षक नियमित रूप से नशे की हालत में स्कूल आते थे। घटना के बाद ग्रामसभा में प्रस्ताव पारित कर शिक्षक को हटाने की माँग की गई। शिक्षा विभाग ने जाँच के बाद रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी को भेजते हुए निलंबन की सिफारिश की।

17. बंगाल के मुस्लिम बहुल स्कूल में हिंदू छात्रों को प्रवेश से रोका

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के मोयनागाड़ी फ्री प्राइमरी स्कूल में बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा को लेकर विवाद सामने आया। रिपोर्ट्स के अनुसार, मुस्लिम बहुल इस स्कूल में केवल हिंदू छात्रों को प्रवेश से रोक दिया गया और स्कूल के गेट बंद कर दिए गए।

बताया गया कि छात्रों ने पहले पूजा आयोजन की अनुमति ली थी, जिसे स्कूल प्रशासन ने मंजूरी भी दी थी। लेकिन अगले ही दिन यह अनुमति वापस ले ली गई। प्रशासन की ओर से तर्क दिया गया कि स्कूल में 50 प्रतिशत से अधिक छात्र मुस्लिम हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में पुलिस अधिकारियों को छात्रों को पूजा करने से रोकते हुए देखा गया। मजबूर होकर हिंदू छात्रों ने स्कूल के बाहर फुटपाथ पर पूजा का आयोजन किया।

18. त्रिपुरा में स्कूल प्रशासन ने सरस्वती पूजा करने से रोका

त्रिपुरा के धर्मनगर स्थित सखाईबाड़ी में होली क्रॉस कॉन्वेंट स्कूल द्वारा सरस्वती पूजा से जुड़े हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों की अनुमति न दिए जाने पर विवाद खड़ा हो गया। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने 16 जनवरी 2026 को स्कूल प्रबंधन से बसंत पंचमी के अवसर पर परिसर में पूजा आयोजन की अनुमति माँगी थी।

इसके बाद 22 जनवरी को भी परिषद ने दोबारा अनुरोध किया। बताया गया कि स्कूल में 70 प्रतिशत से अधिक छात्र हिंदू हैं और वे अपनी सांस्कृतिक परंपरा के अनुसार पूजा करना चाहते थे। हालाँकि स्कूल प्रशासन ने अनुमति देने से इनकार कर दिया।

इसके विरोध में वीएचपी ने स्कूल के बाहर प्रदर्शन किया, जिसमें कई अभिभावक भी शामिल हुए। प्रदर्शन के दौरान अभिभावकों ने प्राचार्य को घेरकर पूजा की अनुमति देने की माँग की। स्थिति तनावपूर्ण होने पर पुलिस बल तैनात किया गया।

19. MP के उज्जैन में 15 मुस्लिम युवकों ने किया जानलेवा हमला

मध्य प्रदेश के उज्जैन में 22 जनवरी 2026 को बजरंग दल सदस्य और विश्व हिंदू परिषद के पूर्णकालिक कार्यकर्ता सोहेल ठाकुर पर 10 से 15 मुस्लिम युवकों के समूह ने जानलेवा हमला कर दिया। यह घटना मालिपुरा क्षेत्र में संघ कार्यालय के पास एक होटल के बाहर हुई।

रिपोर्ट के अनुसार, मदरगढ़ और काजी मोहल्ला के युवकों ने ठाकुर को रोककर पहले बहस की और फिर अचानक लोहे की रॉड व अन्य हथियारों से हमला कर दिया। हमले में सोहेल ठाकुर के सिर पर गंभीर चोट आई और उन्हें नाजुक हालत में उज्जैन जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।

ठाकुर ने बताया कि वे पहले भी इलाके में कथित ‘लव जिहाद’ मामलों के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं, जिससे वे आरोपितों के निशाने पर थे। उन्होंने कहा कि एक दिन पहले हुए बसंत पंचमी सरस्वती पूजा कार्यक्रम में उनकी सक्रिय भागीदारी भी हमले का कारण बनी।

20. बांग्लादेश में आधी रात को पूजा मंडप में घुसकर तोड़ी प्रतिमा

बांग्लादेश के सतखीरा जिले में सरस्वती पूजा से एक दिन पहले देवी सरस्वती की प्रतिमा के साथ तोड़फोड़ की घटना सामने आई। यह घटना 22 जनवरी 2026 की रात टेटुलिया क्षेत्र में हुई, जहाँ अज्ञात शरारती तत्वों ने आधी रात को चुपके से पूजा मंडप में प्रवेश कर प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया।

हमलावरों ने देवी की मूर्ति को तोड़कर टुकड़ों में बिखेर दिया। अगली सुबह स्थानीय लोगों को घटना की जानकारी मिली, इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुँची और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन देते हुए जाँच शुरू कर दी।

21. ओडिशा में सरस्वती पूजा से कुछ दिन पहले तोड़फोड़ और मूर्तियों का अपमान

ओडिशा के रायगढ़ा जिले के अंबाडोला क्षेत्र में सरस्वती पूजा से कुछ दिन पहले एक शिक्षक पर हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों का अपमान और तोड़फोड़ करने का आरोप लगा। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जनजातीय क्षेत्र के एक स्कूल में गणेश और सरस्वती की मूर्तियाँ पूर्व छात्रों द्वारा 1999 और 1997 बैच की ओर से दान की गई थीं।

आरोप है कि शिक्षक एम कृष्णराजू अक्सर शराब के नशे में मूर्तियों का मजाक उड़ाता था और कहता था कि ये अंग्रेजी नहीं जानतीं तथा इनके पास कोई शैक्षणिक योग्यता नहीं है। घटना वाली रात भी वह नशे की हालत में स्कूल पहुँचा और मूर्तियों को अपमानजनक बातें कहकर तोड़ दिया।

अगली सुबह अन्य शिक्षकों ने मूर्तियों के टूटे हुए टुकड़े देखे और उन्हें ठीक करने का प्रयास किया। इस घटना से स्थानीय हिंदू समुदाय में आक्रोश फैल गया। हिंदू धर्मरक्षा समिति सहित कई संगठनों ने इसे धार्मिक भावनाओं पर हमला बताते हुए आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और कड़ी कार्रवाई की माँग की।

22. बंगाल में देवी सरस्वती और देवी काली की लगभग 70 से 80 मूर्तियाँ टूटी मिली

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के शांतिपुर में 7 जनवरी 2026 को मूर्ति तोड़फोड़ की एक गंभीर घटना सामने आई। लोकनाथ मंदिर के पास स्थित स्थानीय मूर्तिकार जयंत दास की कार्यशाला के बाहर देवी सरस्वती और देवी काली की लगभग 70 से 80 मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त अवस्था में पड़ी मिलीं।

ये मूर्तियाँ कई सप्ताह की मेहनत से तैयार की गई थीं, जिन्हें 23 जनवरी को सरस्वती पूजा और 21 जनवरी को काली पूजा के लिए बनाया जा रहा था। सुबह स्थानीय लोगों ने कार्यशाला के बाहर टूटी मूर्तियाँ देखीं। इस घटना से मूर्तिकारों की आजीविका पर भी गहरा असर पड़ा है, क्योंकि त्योहारों का मौसम उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण समय होता है।

23. बसंत पंचमी से पहले तोड़ी गईं हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ

पूर्वी मिदनापुर जिले के महिषादल क्षेत्र में 4 जनवरी 2026 की रात अज्ञात शरारती तत्वों द्वारा हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना सामने आई। यह घटना सरस्वती पूजा पर्व से कुछ ही सप्ताह पहले हुई, जिससे स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश और चिंता व्याप्त है।

रिपोर्ट के अनुसार, गारकमालपुर पंचायत के अंतर्गत कांथाल पोट्टी इलाके में निर्माणाधीन मां बसंती और देवी सरस्वती की कई मूर्तियों को तोड़ दिया गया। 5 जनवरी की सुबह ग्रामीणों ने देखा कि कुछ प्रतिमाएँ आंशिक रूप से और कुछ पूरी तरह टूटी हुई थीं।

मूर्तियों के कुछ विशेष हिस्सों को निशाना बनाया गया, जिससे यह घटना दुर्घटना नहीं बल्कि सुनियोजित तोड़फोड़ प्रतीत होती है। स्थानीय निवासियों ने इसे धार्मिक आस्था पर हमला बताते हुए कहा कि यह केवल मूर्तियों का नुकसान नहीं, बल्कि विश्वास और सांप्रदायिक सौहार्द पर सीधा प्रहार है।

24. त्रिपुरा: हर साल होती थी सरस्वती पूजा, इस बार घोषित कर दिया अवकाश

त्रिपुरा के उनाकोटी जिले के कुमारघाट उपमंडल अंतर्गत पेचारथल स्थित नलकाटा हाई स्कूल में इस वर्ष (2026) सरस्वती पूजा का आयोजन न होने से विवाद और तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। स्कूल में वर्षों से परंपरागत रूप से बसंत पंचमी के अवसर पर सरस्वती पूजा होती रही है, लेकिन 23 जनवरी 2026 को स्कूल प्रबंधन समिति ने अवकाश घोषित कर विद्यालय बंद रखा।

स्थानीय हिंदू छात्रों और अभिभावकों के अनुसार, कई विद्यार्थी सुबह स्कूल पहुँचे तो मेन गेट पर ताला लगा मिला। इससे छात्रों में निराशा और आक्रोश फैल गया। आरोप है कि स्कूल प्रबंधन समिति और शिक्षकों ने पूजा आयोजन के लिए कोई पहल नहीं की। हिंदू छात्रों का कहना है कि समिति में ईसाई, चकमा (बौद्ध) और मुस्लिम सदस्य बहुमत में हैं, जिसके कारण इस बार पूजा नहीं हो सकी।

SC ने UGC इक्विटी नियम 2026 पर लगाई रोक, भाषा अस्पष्ट और दुरुपयोग की आशंका जताई: लागू रहेंगे 2012 के पुराने नियम, जानें दोनों में 10 प्रमुख अंतर

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 जनवरी 2026) को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने’ नियम 2026 पर रोक लगा दी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमल्या बागची की बेंच ने कहा कि नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इनके दुरुपयोग की संभावना है। कोर्ट ने केंद्र और UGC को नोटिस जारी कर मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च तय की है। तब तक 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे।

कोर्ट ने चिंता जताई कि नियमों से समाज में विभाजन हो सकता है और भारत की एकता को शिक्षा संस्थानों में प्रतिबिंबित होना चाहिए। बेंच ने कहा, “हम ऐसी स्थिति में नहीं पहुँचना चाहते जहाँ अमेरिका जैसे अलग-अलग स्कूल हों।” कोर्ट ने नियमों की परिभाषाओं, खासकर जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को संवैधानिक और सामाजिक चिंताओं से जोड़ा और विशेषज्ञ समीक्षा की जरूरत बताई।

इस फैसले से फिलहाल सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में 2012 के UGC (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम लागू रहेंगे। ये नियम 14 मार्च 2012 को अधिसूचित किए गए थे और UGC एक्ट 1956 की धारा 26 के तहत बनाए गए थे। इनका मकसद जाति, धर्म, पंथ, भाषा, जातीयता, लिंग और विकलांगता के आधार पर भेदभाव रोकना था।

2012 नियमों में भेदभाव की परिभाषा व्यापक है। इसमें किसी छात्र या समूह को शिक्षा से वंचित करना, मानव गरिमा के खिलाफ शर्तें थोपना, अलग शैक्षणिक व्यवस्था बनाना या समान अवसरों को कमजोर करने वाला कोई भी अंतर, बहिष्कार या प्राथमिकता को भेदभाव माना गया है। नियम सभी छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करते हैं और उत्पीड़न को लगातार अपमानजनक आचरण बताया गया है।

ये नियम संस्थानों से कहते हैं कि सभी छात्रों के हितों की रक्षा करें, भेदभाव और उत्पीड़न पूरी तरह खत्म करें, दोषियों को सजा दें और समाज के सभी वर्गों में समानता बढ़ाएँ। खास तौर पर SC/ST छात्रों के लिए आरक्षण का पालन, एडमिशन में बाधा न डालना, डिग्री रोकना निषेध, फीस वसूली में भेदभाव न करना, मूल्यांकन में शोषण न करना, रिजल्ट में देरी न करना, हॉस्टल-प्लेग्राउंड में अलगाव न करना और टारगेटेड रैगिंग रोकना अनिवार्य है।

हर संस्थान में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेल और एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ऑफिसर नियुक्त करना जरूरी है। ऑफिसर प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर रैंक का होना चाहिए। शिकायत पर 60 दिनों में फैसला लेना और वेबसाइट पर सभी उपाय अपलोड करना अनिवार्य है।

2026 नियमों में बड़ा बदलाव था कि ये सिर्फ SC/ST तक सीमित नहीं थे, बल्कि OBC, EWS, दिव्यांग और महिलाओं को भी शामिल करते थे। इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर, इक्विटी कमेटी, इक्विटी स्क्वॉड और 24 घंटे हेल्पलाइन अनिवार्य थी। शिकायत निपटाने की सख्त समयसीमा (24 घंटे में बैठक, 15 दिन में रिपोर्ट) थी, लेकिन झूठी शिकायत पर कार्रवाई का प्रावधान नहीं था, जो 2012 में था।

2012 नियमों में भेदभाव की परिभाषा सभी छात्रों पर लागू थी और दंड प्रावधानों में सामान्य वर्ग भी शामिल हो सकता था, जबकि 2026 में SC/ST/OBC को स्पष्ट रूप से प्रोटेक्टेड बताया गया, जिससे सामान्य वर्ग को बाहर माना गया। यही विवाद की जड़ था।

2012 के नियम की कॉपी

दोनों कानूनों में 10 प्रमुख अंतर समझिए

  1. 2012 के नियमों में भेदभाव की परिभाषा को केवल चुनिंदा जाति समूहों तक सीमित नहीं किया गया था, जबकि 2026 दिशानिर्देशों में SC/ST/OBC का स्पष्ट उल्लेख था, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों को बाहर रखा गया।
  2. 2012 दिशानिर्देशों में OBC छात्रों का कोई उल्लेख नहीं था, तो 2026 के दिशानिर्देशों में OBC छात्रों को संरक्षित श्रेणी में शामिल किया गया।
  3. 2012 दिशानिर्देशों में SC/ST छात्रों के लिए प्रावधान थे, लेकिन जाति भेदभाव की बात करते समय ‘सभी छात्रों’ का विशेष उल्लेख था।
  4. ‘दंड अनुभाग’ में सभी छात्रों के खिलाफ भेदभाव का उल्लेख था – जिसमें सामान्य वर्ग के छात्र भी शामिल हो सकते थे। 2026 दिशानिर्देशों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं।
  5. 2012 के नियम सलाहकारी (एडवाइजरी) प्रकृति के थे, जबकि 2026 के नियम अनिवार्य हैं और गैर-अनुपालन पर कड़ी सजा (जैसे फंडिंग रोकना, डिग्री मान्यता छीनना) का प्रावधान है।
  6. 2026 में संरक्षण का दायरा बढ़ाकर फैकल्टी, नॉन-टीचिंग स्टाफ और जेंडर माइनॉरिटी तक किया गया, जबकि 2012 में मुख्य फोकस केवल छात्रों पर था।
  7. 2026 में ज्यादा संस्थागत तंत्र अनिवार्य हैं – जैसे इक्विटी कमेटी, इक्विटी स्क्वॉड, इक्विटी एम्बेसडर और 24×7 हेल्पलाइन। वहीं, 2012 में सिर्फ इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेल और एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ऑफिसर ही जरूरी थे।
  8. शिकायत निपटारे की समयसीमा 2012 में 60 दिन थी, जबकि 2026 में बहुत सख्त, जिसमें शिकायत के 24 घंटे में बैठक, 15 दिन में रिपोर्ट और 7 दिन में कार्रवाई।
  9. 2026 में भेदभाव की परिभाषा ज्यादा व्यापक है, जिसमें परोक्ष, अप्रत्यक्ष और संरचनात्मक भेदभाव भी शामिल हैं, जबकि 2012 में मुख्य रूप से प्रत्यक्ष भेदभाव पर फोकस था।
  10. 2026 में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के खिलाफ कोई स्पष्ट दंड या सुरक्षा प्रावधान नहीं है (ड्राफ्ट से हटाया गया), जबकि 2012 में कम से कम ऐसा कोई विवादास्पद मुद्दा नहीं था।

पढ़ें- 2012 के नियम

ये अंतर 2012 नियमों को सभी छात्रों के लिए ज्यादा समावेशी और कम सख्त बनाते हैं, जबकि 2026 नियम संरक्षित वर्गों पर ज्यादा फोकस करते हैं लेकिन दुरुपयोग की आशंका भी बढ़ाते हैं।

बता दें कि साल 2026 नियम के रोहित वेमुला (2016) और पायल तडवी (2019) की आत्महत्या के बाद बने। इन मामलों में जातिगत भेदभाव के आरोप लगे थे। 2019 में दाखिल PIL में 2012 नियमों के कमजोर कार्यान्वयन पर सवाल उठे। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने UGC को नए नियम जल्द अधिसूचित करने का निर्देश दिया था। 13 जनवरी 2026 को नियम नोटिफाई हुए।

नियमों के खिलाफ देशभर में विरोध हुआ। सामान्य वर्ग के लोग इसे सवर्णों के खिलाफ मान रहे थे। आरोप था कि अस्पष्ट परिभाषाएँ झूठी शिकायतों को बढ़ावा देंगी और अकादमिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी।

‘मियाँ’ का मतलब ‘अवैध बांग्लादेशी’… मुस्लिम विरोधी एजेंडा बताकर ‘द वायर’ का हिमंता के खिलाफ प्रोपेगेंडा, क्यों वामपंथियों की आँखों में खटकते हैं असम CM

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के हाल के बयानों को लेकर मुख्यधारा के वामपंथी मीडिया और ‘द वायर’ जैसे पोर्टल्स ने एक सुनियोजित अभियान छेड़ दिया है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण और ‘मियाँ’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर मुख्यमंत्री को ‘मुस्लिम विरोधी’ सिद्ध करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। हिमंता बिस्वा सरमा का संघर्ष किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उन ‘अवैध बांग्लादेशी’ के खिलाफ है जो असम की स्वदेशी संस्कृति, भूमि और लोकतांत्रिक अधिकारों को निगल रहे हैं।

द वायर का नैरेटिव: बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की साजिश

द वायर‘ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हिमंता बिस्वा सरमा जानबूझकर एक खास समुदाय (मियाँ) को डराने और उन्हें ‘परेशान’ करने की राजनीति कर रहे हैं। लेख में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री ने 4 से 5 लाख मियाँ मतदाताओं के नाम हटाने की बात कहकर लोकतंत्र का अपमान किया है। ‘द वायर’ ने मुख्यमंत्री के उस बयान को भी हाइलाइट किया जिसमें उन्होंने लोगों से मियाँ समुदाय के लिए ‘मुश्किलें’ पैदा करने को कहा, ताकि वे असम छोड़ दें।

वामपंथियों को हिमंता ने दिया जवाब

हिमंता बिस्वा सरमा ने वायर और उस जैसी वामपंथी खेमों के स्वघोषित मुस्लिम मसीहों को तीखा जवाब दिया है। उन्होंने X पर एक लंबे पोस्ट में लिखा, “जो लोग ‘मियाँ’ शब्द (यह असम में बांग्लादेशी मुस्लिमों की घुसपैठ के लिए इस्तेमाल होता है) पर मेरी टिप्पणी को लेकर मुझ पर हमला कर रहे हैं, उन्हें पहले यह पढ़ लेना चाहिए कि असम के बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने खुद क्या कहा है। यह मेरी भाषा नहीं है, न मेरी कल्पना, और न ही कोई राजनीतिक बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात है।”

उन्होंने आगे लिखा, “ये शब्द खुद अदालत के हैं, ‘असम में चुपचाप और खतरनाक तरीके से जनसंख्या में बदलाव हो रहा है, जिससे लोअर असम के रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण जिलों के हाथ से निकल जाने का खतरा पैदा हो सकता है। अवैध प्रवासियों की वजह से ये इलाके धीरे-धीरे मुस्लिम बहुल क्षेत्र बनते जा रहे हैं। इसके बाद यह केवल समय की बात होगी कि इन इलाकों को बांग्लादेश में मिलाने की माँग उठाई जाए। अगर लोअर असम हाथ से निकल गया, तो पूरा पूर्वोत्तर भारत देश के बाकी हिस्सों से कट जाएगा और उस क्षेत्र के समृद्ध प्राकृतिक संसाधन भी देश के हाथ से निकल सकते हैं’।”

हिमंता ने आगे लिखा, “जब देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत ‘जनसंख्या पर आक्रमण’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती है और देश की एकता और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चेतावनी देती है, तो उस सच्चाई को स्वीकार करना न तो नफरत है, न सांप्रदायिकता, और न ही किसी समुदाय पर हमला। यह एक गंभीर और पुरानी समस्या को समझना है, जिसे असम दशकों से झेल रहा है।

उन्होंने लिखा, “हमारा प्रयास किसी मजहब या किसी भारतीय नागरिक के खिलाफ नहीं है। हमारा प्रयास असम की पहचान, सुरक्षा और भविष्य की रक्षा करना है, ठीक वैसे ही जैसे सुप्रीम कोर्ट ने देश को चेतावनी दी थी। उस चेतावनी को नजरअंदाज करना ही असम और भारत के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा।”

वामपंथियों की आँखों में क्यो खटकते हैं हिमंता?

वामपंथी खेमे की राजनीति अक्सर इस सोच पर टिकी रही है कि धार्मिक पहचान को दबाकर रखा जाए और खास समुदायों को खुश करने की नीति अपनाई जाए। उन्हें ऐसे नेता पसंद आते हैं जो हर मुद्दे पर संतुलन के नाम पर चुप्पी साध लें या फिर वोट बैंक के दबाव में फैसले लें। जब कोई नेता खुलकर अपनी पहचान की बात करता है तुष्टीकरण की राजनीति को चुनौती देता है और स्पष्ट शब्दों में सच बोलता है, तो वही वामपंथियों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन जाता है।

हिमंता बिस्वा सरमा इसी वजह से वामपंथियों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं। वह बार-बार यह सवाल उठाते हैं कि आखिर हिंदू अपनी पहचान पर गर्व क्यों न करे। वामपंथी विचारधारा को यह बात स्वीकार नहीं होती क्योंकि उनकी राजनीति में हिंदू पहचान को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है। उन्हें लगता है कि अगर कोई नेता हिंदुत्व की बात करेगा, तो उनकी वैचारिक जमीन कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए वामपंथी गुट ऐसे नेताओं को कट्टर, विभाजनकारी या असहिष्णु साबित करने की कोशिश करते हैं।

वामपंथियों को यह भी खलता है कि हिमंता सरमा मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक की तरह देखने के बजाय उन्हें शिक्षा और विकास की मुख्यधारा में लाने की बात करते हैं। जब वह घुसपैठ या अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर सख्त रुख अपनाते हैं तो वामपंथी इसे मानवाधिकार या अल्पसंख्यक विरोध के रूप में पेश करने लगते हैं। असल में समस्या यह है कि वामपंथी हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखते हैं और कानून, सुरक्षा या सामाजिक संतुलन जैसी बातों को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते।

हिमंता सरमा का अपराध वामपंथियों की नजर में यही है कि वह डरकर नहीं बोलते। वह न तो किसी समुदाय के दबाव में आते हैं और न ही वैचारिक आलोचना से घबराते हैं। वह साफ कहते हैं कि देश और समाज का हित सबसे ऊपर है, चाहे इसके लिए कड़वी बात ही क्यों न कहनी पड़े। यही स्पष्टता वामपंथियों को असहज करती है।

कुल मिलाकर हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीति उस सोच से अलग है जिसमें नेताओं को हर मुद्दे पर संतुलित या अस्पष्ट भाषा में बोलते देखा जाता है। वह अपनी बात सीधे और स्पष्ट शब्दों में रखते हैं, चाहे वह उनकी पहचान का सवाल हो, विकास का मुद्दा हो या घुसपैठ और कानून-व्यवस्था का मामला। यही वजह है कि एक वर्ग उन्हें मजबूती और स्पष्टता का प्रतीक मानता है, जबकि वामपंथी उन्हें अपने लिए चुनौती और असहजता का कारण समझता है।

जिन UGC नियमों को SC ने रोका उनमें शामिल ‘वामपंथी’ इंदिरा जयसिंह की सिफारिशें, जनरल कैटेगरी के छात्रों को निशाने बनाने की संभावनाओं को किया गया नजरअंदाज

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियम UGC इक्विटी नियम 2026 पर स्टे लगा दिया है। हाल ही में उच्च शिक्षण संस्थानों को लेकर किए गए नोटिफिकेशन को लेकर बवाल मचा हुआ है। प्रमोशन ऑफ इक्विटी 2026 के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इस पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 27 जनवरी 2026 को छात्रों को भरोसा दिलाया कि इस नियम का गलत इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन छात्रों का डर खत्म नहीं हुआ और विरोध प्रदर्शन जारी रहा।

दरअसल ये तर्क दिया जा रहा है कि जनरल कटेगरी के लोग जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार नहीं हो सकते इसलिए उनकी शिकायत को सिस्टम से बाहर रखा जा रहा है। UGC इक्विटी नियम 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने के लिए एक ‘सुधार’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।

स्वराज्य के अनुसार, 2026 के नियमों के बजाए 2025 का नियम एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स में भेदभाव को दूर करने के लिए ज्यादा कारगर है। यह एक संतुलित नजरिया पेश करता है और ज्यादा व्यावहारिक है।

बराबरी पर UGC रेगुलेशन की शुरुआत

2019 में छात्र रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं ने दो पीआईएल दायर की थी, जिसके आधार पर 2025 के ड्राफ्ट तैयार किए गए थे। इन छात्रों में एक की मौत 2016 में और दूसरे की 2019 में हुई थी। उनके परिवारों ने आरोप लगाया था कि इनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव किया गया, जिसकी वजह से इनदोनों ने आत्महत्या कर ली थी।

दोनों याचिकाकर्ताओं की वकील सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह थी। उन्होंने एडवोकेट प्रसन्ना और दिशा वाडेकर के साथ मिलकर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में भेदभाव को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने की माँग की। सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया था कि शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए गाइडलाइंस तैयार की जाए, उसी के आधार पर यूजीसी के नए नियम बनाए गए।

कहा जाता है कि PIL में पूरी तरह से नए नियम की माँग नहीं की गई थी, बल्कि मौजूदा यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में बराबरी को बढ़ावा देना) रेगुलेशन, 2012 को सख्ती से लागू करने की माँग की गई थी। 2012 के नियमों के तहत यूनिवर्सिटी को भेदभाव, खासकर अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों को समानता दिलाने पर जोर दिया गया था।

PIL में याचिकाकर्ताओं ने एडमिशन, मूल्यांकन, हॉस्टल अलॉटमेंट और कैंपस लाइफ में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया था। उन्होंने संस्थानों पर 2012 के नियम को लागू करने में पूरी तरह विफल रहने का भी आरोप लगाया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि कोई मॉनिटरिंग नहीं की जाती थी। समान अवसर वाली जगह काफी कम थी। NAAC का कोई अता-पता नहीं था।
जनवरी 2025 में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुयान ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) को नियमों का पालन न करने के लिए फटकार लगाई। जजों ने UGC को सेल, शिकायतों और एक्शन पर डेटा पेश करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट UGC ने बताया कि वह रेगुलेशन के नियम का ड्राफ्ट बना रही है।

2025 के रेगुलेशन ने एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में जाति के आधार पर भेदभाव को दूर करने के लिए एक नियम बनाया।

UGC ने फरवरी 2025 में (हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन में प्रमोशन ऑफ इक्विटी) रेगुलेशन जारी किए थे। 2025 के ड्राफ्ट रेगुलेशन का उद्देश्य सुरक्षा, निष्पक्षता और स्वायत्तता के बीच एक संतुलित ढाँचा तैयार करना था। PIL की माँग के मुताबिक, ‘इक्विटी कमेटी’ और 24/7 हेल्पलाइन जैसे उपाय सुझाए गए, ताकि सभी शामिल पार्टियों (विशेषकर SC/ST छात्रों) के लिए सुरक्षा बढ़ाई जा सके।

इन नियमों में संस्थानों को अपनी स्थितियों के अनुसार, नियमों को लागू करने का अधिकार दिया गया। इक्विटी कमेटी का नेतृत्व संस्था के प्रमुख द्वारा किए जाने का प्रावधान है, ताकि संस्था की जवाबदेही को सुनिश्चित किया जा सके।

कमेटी में कम से कम एक सदस्य SC ​​या ST समुदाय से होना जरूरी था। ड्राफ्ट रेगुलेशन ने सामूहिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने के लिए फैकल्टी, छात्र-छात्राओं और संस्थान के प्रशासनिक स्टाफ की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया है।

2026 के रेगुलेशन में इंदिरा जयसिंह की सिफारिशों को शामिल किया गया

हालाँकि याचिकाकर्ता 2025 के ड्राफ्ट रेगुलेशन से खुश नहीं थे। सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने ड्राफ्ट में दस मुख्य बदलावों का प्रस्ताव दिया। सुप्रीम कोर्ट ने रेगुलेशन को फाइनल करने के लिए 8 हफ्ते की डेडलाइन तय की। इसको देखते हुए नए रेगुलेशन 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने के लिए 13 जनवरी 2026 को नोटिफाई किया गया।

इस रेगुलेशन में 2025 के रेगुलेशन में किए गए ‘संतुलन’ का अभाव था, और इसमें जयसिंह की कई सिफारिशें शामिल थीं।

2026 के रेगुलेशन ने पीड़ितों की कैटेगरी को SC, ST और OBC तक सीमित करके जनरल कटेगरी को जाति-आधारित हिंसा का शिकार मानने से मना कर दिया। जनरल कैटेगरी के छात्रों के लिए जाति-आधारित भेदभाव की शिकायत करने का कोई प्रावधान नहीं है। 2026 के रेगुलेशन न सिर्फ यह मानते हैं कि जाति के आधार पर भेदभाव सिर्फ SC, ST और OBC के लोगों के साथ होता है। इसमें जनरल कटेगरी के लोगों की सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है, क्योंकि नया नियम मानता है कि इनके साथ कोई भेदभाव नहीं होता।

नया फ्रेमवर्क जनरल कटेगरी के स्टूडेंट्स के खिलाफ है, जिनके पास नियमों का गलत इस्तेमाल होने पर संस्थान का सहारा नहीं होगा। यही वजह है कि 2026 के रेगुलेशन का जनरल कटेगरी के छात्र विरोध कर रहे हैं, जिन पर इसका सीधा असर पड़ेगा।

(इस लेख को अंग्रेजी में लिखा गया है। मूल रूप को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

आधुनिकता की चमक और संस्कृति की छाया: हम डिजिटल युग में भविष्य बना रहे हैं या खुद को खो रहे हैं?

भारत ने बीते वर्षों में डिजिटल इंडिया के माध्यम से अभूतपूर्व प्रगति की है। सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरण, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन और ई-गवर्नेस ने आम नागरिक के जीवन को आसान बनाया है। मोदी सरकार की मंशा रही है कि तकनीक के माध्यम से पारदर्शिता बढ़े, योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और युवा शक्ति नवाचार व शोध की ओर प्रेरित हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि डिजिटल क्रांति ने भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई है। भारतीय वैज्ञानिकों, तकनीकी संस्थानों और स्टार्टअप्स ने विश्व स्तर पर अपनी क्षमता सिद्ध की है। आज भारत डिजिटल भुगतान, स्टार्टअप इकोसिस्टम आईटी सेवाओं में अग्रणी देशों में गिना जाता है।

इसी प्रगति के बीच एक मौन, गहरी और गंभीर चिंता भी जन्म ले रही है: क्या हम तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, या धीरे-धीरे उसके मानसिक गुलाम बनते जा रहे हैं?

आज शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहाँ मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया की पहुँच न हो। सुबह आँख खुलते ही मोबाइल हाथ में आ जाता है और रात को सोने से पहले भी वही अंतिम साथी होता है। हम बिना सोचे-समझे घंटों स्क्रीन पर समय बिताते हैं। विभिन्न सर्वेक्षण बताते हैं कि भारत में लोग औसतन प्रतिदिन 6 से 7 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं। यह समय केवल काम या अध्ययन में नहीं जाता बल्कि अधिकतर सोशल मीडिया, रील्स, वीडियो और मनोरंजन में व्यतीत होता है। यह आँकड़ा केवल समय का नहीं, हमारी सोच, हमारी प्राथमिकताओं और हमारे जीवन के संतुलन का भी संकेत देता है।

पहले परिवारों में शाम को बैठकर बातचीत होती थी। चौपालों पर चर्चा होती थी। ट्रेन में लोग एक-दूसरे से बात करते थे। पार्कों में बुजुर्ग अनुभव साझा करते थे। आज हर व्यक्ति अपने-अपने मोबाइल में खोया हुआ है। पास बैठा व्यक्ति भी दूर लगता है।

भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताकत उसका संवाद थाः संवाद, सहकार और सौहार्द। आज वही संवाद धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। डिजिटल निर्भरता का सबसे बड़ा प्रभाव हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर दिखाई देता है। चिकित्सकों और शोधकर्ताओं के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम से अवसाद, चिंता, अनिद्रा और तनाव जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे संस्थानों के अध्ययन बताते हैं कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग किशोरों और युवाओं में मानसिक असंतुलन, आत्मविश्वास की कमी और सामाजिक अलगाव को जन्म देता है।

शारीरिक स्तर पर भी इसके दुष्परिणाम स्पष्ट हैं। कम चलना-फिरना, लंबे समय तक बैठना और देर रात तक स्क्रीन देखने से मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और रक्तचाप जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। जो रोग पहले वृद्धावस्था में होते थे, वे आज युवावस्था में ही दस्तक देने लगे हैं। यह केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, भविष्य की पीढ़ी की क्षमता का प्रश्न है। इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री भी एक गंभीर विषय है। हिंसा, अश्लीलता, अपसंस्कृति, गाली-गलौज और विकृत मानसिकता से भरी सामग्री आसानी से बच्चों और युवाओं तक पहुँच रही है।

इसका प्रभाव उनके मन, सोच और व्यवहार पर पड़ रहा है। रिश्तों के प्रति संवेदनशीलता कम हो रही है। धैर्य घट रहा है। सहनशीलता कमजोर हो रही है। कभी भारतीय परिवार को ‘प्रथम पाठशाला’ कहा जाता था। दादा-दादी बच्चों को कहानियाँ सुनाते थे, संस्कार देते थे, जीवन के मूल्य समझाते थे। माता-पिता बच्चों के साथ समय बिताते थे। आज वह भूमिका मोबाइल फोन निभा रहा है।

दो-तीन साल का बच्चा भी मोबाइल चलाना जानता है। माता-पिता व्यस्त हैं। बच्चे को मोबाइल पकड़ा दिया जाता है। यही उसकी दुनिया बन जाती है। संयुक्त परिवार की परंपरा, जो भारतीय समाज की रीढ़ थी, धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। बुजुर्गों का अनुभव, मार्गदर्शन और संस्कार नई पीढ़ी तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। हमारी संस्कृति संयम, संतुलन और त्याग पर आधारित रही है। सीमित आवश्यकताएँ, सरल जीवन और सामूहिकता हमारी पहचान थी।

आज हमारी आवश्यकताएँ असीमित हो गई हैं। उपभोग की संस्कृति बढ़ रही है। हम अधिक कमाने, अधिक खर्च करने और अधिक दिखाने की होड़ में फँसते जा रहे हैं। तकनीक ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। आज हर प्रश्न का उत्तर गूगल से लिया जाता है। हर निर्णय ऐप से होता है। हर दिशा GPS बताता है। हम धीरे-धीरे अपनी सोच, विवेक और निर्णय क्षमता तकनीक को सौंपते जा रहे हैं।

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि बु‌द्धि से ऊपर विवेक होता है। तकनीक बुद्धि का उत्पाद है लेकिन विवेक का विकल्प नहीं। जब विवेक कमजोर होता है, तब समाज दिशाहीन हो जाता है। इंटरनेट युग में अध्ययन, साहित्य, महापुरुषों के विचार और गहन चिंतन पीछे छूटते जा रहे हैं। कम लोग हैं जो तकनीक का उपयोग आत्मविकास के लिए करते हैं। अधिकतर लोग सतही मनोरंजन में उलझे रहते हैं।

शोध बताते हैं कि केवल एक सप्ताह का डिजिटल डिटॉक्स भी मानसिक संतुलन में सुधार ला सकता है। यह दर्शाता है कि हमारा मस्तिष्क लगातार डिजिटल उत्तेजना से थक चुका है। विश्व के कई देश इस खतरे को पहचान चुके हैं। फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य देशों में बच्चों के लिए सोशल मीडिया नियंत्रण, स्क्रीन लिमिट और पैरेंटल कंट्रोल पर गंभीर विचार हो रहा है।

भारत में भी इस दिशा में संतुलित नीति की आवश्यकता है- ऐसी नीति जो स्वतंत्रता और जिम्मेदारी दोनों को संतुलित करे। नीति से अधिक जरूरी सामाजिक जागरूकता है। माता-पिता को बच्चों के साथ समय बिताना होगा। शिक्षकों को केवल पाठ्यक्रम नहीं, जीवन मूल्य भी सिखाने होंगे। समाज को संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। डिजिटल इंडिया हमारी ताकत है। यह हमारी प्रगति का आधार है। लेकिन यदि हमने संतुलन नहीं बनाया, तो यही ताकत हमारी कमजोरी बन सकती है।

तकनीक साधन है, साध्य नहीं। हमें यह तय करना होगा कि हम तकनीक के मालिक रहेंगे या उसके दास बनेंगे। आज आवश्यकता है आत्ममंथन की। अपने जीवन की गति को थोड़ा धीमा करने की। अपने रिश्तों को फिर से समय देने की। अपने बच्चों को स्क्रीन से बाहर की दुनिया दिखाने की। डिजिटल युग में भी भारतीय मूल्य, संस्कृति और विवेक ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। यदि हम इन्हें बचा पाए, तो तकनीक हमारे लिए वरदान बनेगी। अन्यथा, हम सुविधाओं से भरे लेकिन संवेदनहीन समाज में बदलते चले जाएँगे। यह चुनाव आज हमारे हाथ में है।

क्या है आर्थिक सर्वेक्षण? जो आम जनता से लेकर उद्योगपतियों के खर्च का देता है पूरा ब्योरा: जानिए बजट से पहले क्यों इतना जरूरी?

बजट सत्र की शुरुआत के साथ ही संसद में गुरुवार (29 जनवरी 2026) को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सबसे पहले आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) 2025-26 पेश करेंगी। यह दस्तावेज देश की अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर सामने रखता है। वित्त मंत्री द्वारा यह रिपोर्ट बजट से ठीक एक दिन पहले संसद में रखी जाती है, ताकि बजट से पहले देश की आर्थिक स्थिति साफतौर पर समझी जा सके।

आर्थिक सर्वेक्षण की इस रिपोर्ट में आम लोगों की आमदनी, महँगाई का असर, रोजागर के हालात, खेती और उद्योग की स्थिति, सरकार के खर्च और नीतियों के नतीजे का आकलन होता है। सर्वेक्षण का मकसद सिर्फ आँकड़ें पेश करना नहीं होता, बल्कि यह समझना भी होता है कि देश की अर्थव्यवस्था किन चुनौतियों से जूझ रही है और आगे किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है।

इसी सर्वेक्षण के आधार पर यह तय होता है कि आने वाले बजट में किन सेक्टरों को प्राथमिकता दी जाएगी और किन नीतियों में बदलाव किया जा सकता है। अगर यह देश के लिए इतना जरूरी दस्तावेज है, तो इसके बारे में जानना भी उतना ही जरूरी है। आइए इसके बारे में हर डिटेल के साथ आगे बढ़ते हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण क्या होता है और इसे कौन तैयार करता है?

आर्थिक सर्वेक्षण सरकार की वह आधिकारिक रिपोर्ट होती है, जिसमें पूरे साल के दौरान देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति का विस्तार से विश्लेषण किया जाता है। इसमें यह बताया जाता है कि देश की आर्थिक रफ्तार कैसी रही, आमदनी और खर्च का संतुलन क्या रहा, महँगाई कितनी बढ़ी या घटी, रोजगार के अवसर कैसे रहे और खेती, उद्योग व सेवा क्षेत्र ने कैसा प्रदर्शन किया। आसान शब्दों में कहा जाए तो आर्थिक सर्वेक्षण यह समझाने की कोशिश करता है कि देश की अर्थव्यवस्था जमीन पर किस हालत में है, न सिर्फ कागजों में।

यह रिपोर्ट वित्त मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले आर्थिक कार्य विभाग द्वारा तैयार की जाती है। आर्थिक सर्वेक्षण को तैयार करने की जिम्मेदारी देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) और उनकी टीम की होती है। यह टीम पूरे साल जमा हुए सरकारी आँकड़ों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट्स और अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े डेटा का अध्ययन करती है। इसके बाद इन सभी जानकारियों को जोड़कर एक ऐसी रिपोर्ट बनाई जाती है, जो सरकार के आर्थिक फैसललों की दिशा और सोच को सामने रखती है।

आर्थिक सर्वेक्षण कोई राजनीतिक दस्तावेज नहीं होता, बल्कि इसे एक ‘विश्लेषणात्मक रिपोर्ट’ माना जाता है। इसमें सिर्फ उपलब्धियाँ ही नहीं गिनाई जातीं, बल्कि कमजोरियों, जोखिमों और आगे की चुनौतियों पर भी खुलकर बात की जाती है। यही वजह है कि इसे बजट से पहले पेश किया जाता है, ताकि नीति निर्धारण से पहले देश की आर्थिक सच्चाई को समझा जा सके। इसी सर्वे के आधार पर यह संकेत मिलता है कि सरकार आने वाले समय में अर्थव्यवस्था को किस दिशा में आगे बढ़ाना चाहती है।

आर्थिक सर्वेक्षण में किन-किन क्षेत्रों की समीक्षा होती है?

आर्थिक सर्वक्षण में देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े लगभग हर बड़े क्षेत्र की गहराई से समीक्षा की जाती है। सबसे पहले बात होती है आर्थिक विकास यानी GDP ग्रोथ की। इसमें यह बताया जाता है कि देश की अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ी, अलग-अलग सेक्टरों ने इसमें कितना योगदान दिया और यह विकास पिछले वर्षों के मुकाबले कैसा रहा। साथ ही आने वाले साल के लिए ग्रोथ का अनुमान भी पेश किया जाता है।

इसके बाद महँगाई की स्थिति का विश्लेषण किया जाता है। सर्वे यह बताता है कि रोजमर्रा की चीजों के दाम कैसे बदले, खाने-पीने की वस्तुओं, ईंधन और सेवाओं की कीमतों का आम लोगों पर क्या असर पड़ा। खुदरा महँगाई और थोक महँगाई दोनों पर अलग-अलग चर्चा होती है, ताकि साफ समझा जा सके कि दबाव कहाँ से आ रहा है।

रोजगार और श्रम बाजार भी आर्थिक सर्वे का अहम हिस्सा होता है। इसमें बताया जाता है कि नौकरियों की स्थिति कैसी रही, संगठित और अंसगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़े या घटे, महिला और युवाओं की भागीदारी कितनी रही। इसके जरिए यह समझने की कोशिश होती है कि आर्थिक विकास का फायदा लोगों तक पहुँच रहा है या नहीं।

सर्वे में कृषि क्षेत्र की अलग से समीक्षा की जाती है। इसमें फसलों का उत्पादन, मॉनसून का असर, किसानों की आय, न्यूनतम समर्थन मूल्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिति पर चर्चा होती है। खेती से जुड़े जोखिम और सुधार की जरूरत वाले पहलुओं को भी इसमें सामने रखा जाता है।

इसके अलावा उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की स्थिति बताई जाती है। इसमें फैक्ट्रियों का उत्पादन, निवेश का रुझान, MSME सेक्टर की हालत और बड़े उद्योगों के प्रदर्शन पर ध्यान दिया जाता है। साथ ही यह भी देखा जाता है कि उद्योगों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

सेवा क्षेत्र, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की बड़ी ताकत है। उस पर भी विस्तार से बात होती है। बैंकिंग, IT, पर्यटन, ट्रांसपोर्ट और अन्य सेवाओं की ग्रोथ, इनसे जुड़े रोजगार और निर्यात पर सर्वे में फोकस किया जाता है।

आर्थिक सर्वे में सरकारी वित्त की स्थिति भी शामिल होती है। इसमें सरकार की कमाई, खर्च, राजकोषीय घाटा, कर्ज की स्थिति और टैक्स संग्रह का पूरा हिसाब दिया जाता है। इससे यह साफ होता है कि सरकार की आर्थिक सेहत कैसी है।

अंत में सर्वे में वैश्विक आर्थिक हालत का असर भी समझाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार, युद्ध, तेल की कीमतें, ब्याज दरें और वैश्विक मंदी जैसे कारक भारतीय अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित कर रहे हैं, इस पर भी विस्तार से चर्चा होती है।

इस तरह आर्थिक सर्वेक्षण एक ही दस्तावेज में देश की पूरी आर्थिक तस्वीर पेश करता है, ताकि नीति निर्धारण के लिए ठोस आधार मिल सके।

बजट से पहले आर्थिक सर्वेक्षण क्यों जरूरी?

बजट देश के आने वाले साल की आर्थिक योजना होता है। ऐसे में बजट बनाने से पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि जमीन पर हालात क्या हैं। आर्थिक सर्वे इसी काम के लिए होता है। यह सरकार के यह समझने में मदद करता है कि किन जगहों पर हालात सुधरे हैं और किन क्षेत्रों में अब भी परेशानी बनी हुई है। बिना इस समझ के बजट सिर्फ अंदाजे पर आधारित रह जाएगा।

आर्थिक सर्वे यह साफ करता है कि सरकार के पिछले फैसलों का असर कैसा रहा। जिन योजनाओं से फायदा मिला, उन्हें आगे बढ़ाने का संकेत मिलता है। जिन नीतियों से उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं आए, उन पर दोबारा सोचने की जरूरत सामने आती है। इसी वजह से बजट से पहले सर्वे को एक तरह का मार्गदर्शन माना जाता है।

बजट में पैसा कहाँ खर्च किया जाए और किस क्षेत्र को ज्यादा सहारे की जरूरत है, इसका जवाब भी आर्थिक सर्वे से मिलता है। अगर किसी हिस्से में दबाव दिखता है, तो बजट में वहाँ राहत देने की कोशिश होती है। जहाँ संभावनाएँ दिखती हैं, वहाँ निवेश बढ़ाने की दिशा तय की जाती है। इससे बजट ज्यादा व्यावहारिक बनता है।

आर्थिक सर्वे आम लोगों और विशेषज्ञों दोनों के लिए भी अहम होता है। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार की सोच किस दिशा में जा रही है। बाजार, उद्योगों और आम नागरिक बजट से पहले ही समझने लगते हैं कि आगे किस तरह के फैसले हो सकते हैं। इसी वजह से आर्थिक सर्वे को बजट की नींव माना जाता है, जिस पर पूरे साल की आर्थिक योजना खड़ी होती है।

विश्वविद्यालयों में 118% बढ़ा जातिगत भेदभाव: जानें- UGC के आँकड़ों से कैसे खेल कर रहे वामपंथी

पिछले कुछ दिनों से ‘द वायर’ और उसके जैसे झुकाव वाले वामपंथी सोशल मीडिया अकाउंट्स यह दावा कर रहे हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118.4% की बढ़ोतरी हुई है। पहली नजर में यह आँकड़ा डराने वाला लगता है और यही इसका मकसद भी है। इतना बढ़ा हुआ प्रतिशत हमेशा चौंकाता है, खासकर तब जब असली संख्या और उसका संदर्भ छुपा दिया जाए।

असल डेटा क्या कहता है?

UGC के आँकड़ों के अनुसार, 2019-20 में 173 शिकायतें थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं। इसी को 118.4% की बढ़ोतरी बताया जा रहा है। हालाँकि, यह कभी नहीं बताया जाता कि ये शिकायतें 704 विश्वविद्यालयों और 1,553 कॉलेजों यानी 2,200 से ज्यादा उच्च शिक्षा संस्थानों से आई हैं। इस पैमाने पर देखें तो सबसे ज्यादा शिकायतों वाले साल में भी औसतन एक संस्थान में साल भर में एक से भी कम शिकायत आती है। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 90% से अधिक शिकायतें ‘निपटाई गई’ हैं। यानी व्यवस्था पूरी तरह ठप नहीं है जैसा कि एक संकट जैसी तस्वीर पेश की जा रही है।

साल-दर-साल आँकड़े भी किसी ‘अचानक विस्फोट’ की कहानी नहीं बताते। शिकायतें धीरे-धीरे बढ़ीं है 173 (2019–20), 182 (2020–21), 186 (2021–22), 241 (2022–23) और फिर 2023-24 में तेज उछाल आया। यह ज्यादा संभावना दिखाता है कि रिपोर्टिंग बढ़ी, न कि कैंपस नैतिकता अचानक गिर गई।

UGC अधिकारियों ने खुद माना है कि इसका बड़ा कारण छात्रों में SC/ST सेल्स की जानकारी बढ़ना है। यानी पहले जो मामले दबे रह जाते थे, अब वे सामने आ रहे हैं। यह सच है कि लंबित मामलों की संख्या18 से बढ़कर 108 हो गई है, जो सिस्टम पर दबाव की ओर इशारा करती है। लेकिन इसे पूरे उच्च शिक्षा तंत्र में ‘व्यापक भेदभाव का संकट’ बताना तथ्यात्मक रूप से भ्रामक है।

भारत का उच्च शिक्षा तंत्र (Higher Education System) करोड़ों छात्रों और लाखों शिक्षकों से जुड़ा है। ऐसे विशाल सिस्टम में केवल प्रतिशत उछाल दिखाकर तस्वीर पेश करना न तो संतुलित है, न ईमानदार। भेदभाव की शिकायतें गंभीर हैं और उनका समाधान जरूरी है। लेकिन संस्थाओं के आकार, प्रति-कैंपस औसत और नतीजों को छुपाकर आँकड़ों को केवल डर पैदा करने के लिए इस्तेमाल करना नीति-निर्माण नहीं बल्कि ‘नैरेटिव गढ़ना’ है।

आँकड़ों को कैसे हथियार बनाया जाता है?

इतने सारे तथ्यों के बावजूद सार्वजनिक बहस को सिर्फ एक आंकड़े तक सीमित कर दिया गया है- 118.4%। वामपंथी इकोसिस्टम इसी प्रतिशत को बार-बार उछालता है, लेकिन जानबूझकर यह नहीं बताता कि शिकायतें कितने संस्थानों, कितने छात्रों और प्रति कैंपस औसतन कितनी हैं। जब आधार संख्या छोटी होती है, तो थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी प्रतिशत में बहुत बड़ी दिखती है। संदर्भ और पैमाना हटते ही आँकड़े डर पैदा करने का औजार बन जाते हैं।

हमारा पक्ष: UGC 2026 का विरोध, न्याय का नहीं

UGC 2026 का विरोध करना भेदभाव से इनकार करना नहीं है। भेदभाव मौजूद है और उस पर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन नया ढाँचा जातिगत भेदभाव की परिभाषा को इस तरह बदलता है कि जनरल कैटेगरी को जानबूझकर बाहर कर देता है और साथ ही दुरुपयोग से बचाने वाली प्रक्रियात्मक सुरक्षा भी कमजोर करता है। इससे न्याय नहीं बल्कि संस्थानों में डर आधारित प्रशासन पैदा होने का खतरा है।

भारत को ऐसे भेदभाव-रोधी नियम चाहिए जो सख्त हों लेकिन संतुलित, सुरक्षात्मक हों लेकिन निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित हों, विचारधारा पर नहीं। बढ़ा-चढ़ाकर गढ़े गए नैरेटिव पर बनी नीतियाँ ऊपर से निर्णायक लग सकती हैं लेकिन अनुपात और प्रक्रिया के बिना वे उसी न्याय को कमजोर कर देती हैं, जिसे बचाने का दावा करती हैं।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

छँटनी के डर से जेफ बेजोस से नौकरी की भीख माँगता इंडिया ब्यूरो चीफ, जानें- कैसे वॉशिंगटन पोस्ट में नौकरी बचाने की शर्त बना ‘भारत विरोध’

वरिष्ठ पत्रकारों का अपने ही संस्थान के मालिक से सार्वजनिक मंच पर नौकरी बचाने की अपील करना मीडिया जगत में एक असामान्य और चौंकाने वाली स्थिति है। यह घटना न सिर्फ संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करती है बल्कि मीडिया संस्थानों पर मालिकाना प्रभाव की वास्तविकता को भी सामने लाती है। साथ ही, यह उस धारणा को भी चुनौती देती है कि मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र रूप से काम करता है।

‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ के नई दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा का ऐसा ही एक मामला सामने आया है। अखबार में बड़े पैमाने पर छँटनी की खबरें सामने आने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए सीधे अमेजन के संस्थापक और द वॉशिंगटन पोस्ट के मालिक जेफ बेजोस से हस्तक्षेप करने की अपील की है।

प्रांशु वर्मा का ट्वीट सिर्फ यह कहने तक सीमित नहीं था कि उन्हें नौकरी पर बने रहने दिया जाए। वह ट्वीट ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने सबके सामने अपना परिचय, अपने काम का ब्योरा और अखबार के प्रति अपनी निष्ठा एक साथ रख दी हो। जेफ बेजोस को टैग करते हुए वर्मा ने कहा कि ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ भारत के गिने-चुने मीडिया संस्थानों में से है, जो सरकार के दबाव या सेंसरशिप के डर के बिना रिपोर्टिंग करता है।

एक ही झटके में, उन्होंने खुद को कथित तौर पर तानाशाही मीडिया इकोसिस्टम में एक बहादुर विरोधी के तौर पर पेश कर दिया। साथ ही, अखबार को कथित तौर पर दबाने वाले भारतीय शासन व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने वाले एकमात्र ‘योद्धा’ के तौर पर पेश किया। दरअसल, लंबे वक्त से इस तरह की दुश्मनी विदेशी मीडिया निकालता रहा है। पश्चिमी संरक्षकों का समर्थन पाने के लिए इस तरह की मनगढ़ंत बातें कुछ मीडियाकर्मी लंबे वक्त से करते रहे हैं।

इसके बाद जो सामने आया, उसने लोगों को और हैरान कर दिया। प्रांशु वर्मा ने अपने ट्वीट में अपने ब्यूरो की उन खबरों की गिनती भी कर दी जिन्हें वह चर्चित मानते हैं। उन्होंने उदाहरण के तौर पर भारतीय अरबपतियों पर की गई वे रिपोर्टें गिनाईं, जिनमें दावा किया गया था कि उनके साथ दूसरों की तुलना में बेहतर व्यवहार किया जाता है। इसके अलावा मोदी सरकार के दौर में कथित भाई-भतीजावाद से जुड़ी खबरें, भारतीय कंपनियों पर रूस-यूक्रेन युद्ध को परोक्ष रूप से बढ़ावा देने के आरोपों वाले लेख और भारत की घुसपैठ रोकने की कोशिशों को ‘मुसलमानों को बांग्लादेश भेजने का अभियान’ बताने वाली रिपोर्टें भी शामिल थीं।

ब्यूरो चीफ द्वारा भेजे गए हर लेख का एक मकसद साफ था। ना केवल बेजोस के सामने अपनी काबिलियत साबित करना नहीं बल्कि उस ‘ग्लोबल नजरिए’ के साथ वैचारिक जुड़ाव का संकेत देना जिसने वाशिंगटन पोस्ट की विदेशी रिपोर्टिंग को परिभाषित किया है।

वर्मा ने यह साफ कर दिया कि ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ में काम करने और वहाँ टिके रहने का एक तय तरीका है। वहाँ भारत पर रिपोर्टिंग का मतलब सिर्फ घटनाएँ बताना नहीं है बल्कि भारत को कटघरे में खड़ा करना भी है। भारत को एक ऐसे संप्रभु लोकतांत्रिक देश के रूप में नहीं देखा जाता जो जटिल समस्याओं से जूझ रहा हो बल्कि उसे शक की नजर से देखा जाता है। उसकी नीतियों और फैसलों को अक्सर दमन, बहुसंख्यकवाद और नैतिक चूक के फ्रेम में रखकर पेश किया जाता है।

जाली दस्तावेजों, सीमा घुसपैठ और कई मामलों में आपराधिक आरोपों से जुड़े अवैध रोहिंग्याओं के जबरन देश में आने को राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं माना जाता बल्कि इसे सांप्रदायिक उत्पीड़न अभियान का नाम दिया जाता है। अरबपति उदारीकरण की ओर बढ़ रही अर्थव्यवस्था में कारोबारी नहीं हैं, बल्कि सत्ताधारी भ्रष्टाचार का पर्याय बन गए हैं। कूटनीतिक तनाव भू-राजनीति नहीं बल्कि भारत की कथित नैतिक विफलताओं के कारण उत्पन्न ‘विघटन’ है।

इसीलिए वर्मा की दलील पत्रकारिता के बचाव के लिए नहीं है बल्कि खुद को बनाए रखने की कोशिश है। इसमें साफ पता चलता है कि देखो हम कितना नुकसान करते हैं। देखो हम किस तरह की बातें फैलाते हैं। यकीनन इसे बचाना जरूरी है।

ताजा मामला ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ पर छाए संकट के बारे में बहुत कुछ बताता है। पोस्ट के पुराने मीडिया रिपोर्टर पॉल फारही की रिपोर्ट के मुताबिक, अखबार स्टाफ में भारी कटौती की तैयारी कर रहा है, जिससे 300 लोगों की नौकरियाँ खत्म हो सकती हैं। इसका सबसे ज्यादा असर विदेशी डेस्क और स्पोर्ट्स डेस्क पर पड़ेगा। एडिटर्स ने कथित तौर पर चेतावनी दी है कि न्यूजरूम के आधे से ज्यादा लोगों को छँटनी का सामना करना पड़ सकता है। इससे पहले 2023 में करीब 240 लोगों को नौकरी से हटाया गया था।

ये छँटनी की वजह साफ है। एडवरटाइजिंग रेवेन्यू गिर गया है, सब्सक्रिप्शन रुक गए हैं और ग्लोबल जर्नलिज्म के लिए जो नैतिक दिखावा कभी होता था, वह अब बिलों का भुगतान नहीं कर रहा है। पढ़ने वाले ध्यान नहीं दे रहे हैं, इसलिए नहीं कि जवाबदेह रिपोर्टिंग का स्वागत नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसलिए कि रिपोर्टिंग के रूप में लगातार ‘नैरेटिव एक्टिविज्म’ ने भरोसा खत्म कर दिया है।

वर्मा की बेजोस से सार्वजनिक अपील एक व्यापक और कुछ हद तक ‘बेशर्मी’ है। ब्यूरो चीफ और सीनियर एडिटर एक अरबपति मालिक से मेहरबानी की अपील करते हैं, साथ ही सत्ता से अपनी स्वतंत्रता का दावा करते हैं। यह एक ऐसी उलझन है जिसे #SaveThePost जैसे हैशटैग से दूर नहीं किया जा सकता।

अजीब बात है कि एक पत्रकार जो भारत सरकार पर प्रेस की आजादी को दबाने का आरोप लगाता है। उसका अपना पेशेवर भविष्य पूरी तरह से एक अमेरिकी उद्योगपति के विवेक पर निर्भर करता है। यह विडंबना ही है कि वर्मा अपने ब्यूरो की भारत के व्यापारिक समूहों पर पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग का बखान करते हुए एक अमेरिकी व्यवसायी से अपनी नौकरी बचाने की गुहार लगा रहे थे।

हालाँकि, प्रॉब्लम यह नहीं है कि बेजोस घाटे में चल रहे डेस्क को फंडिंग देने में हिचकिचा रहे हैं। प्रॉब्लम यह है कि द वॉशिंगटन पोस्ट जैसे आउटलेट्स इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं कि नफ़रत से भरी, सोच पर अड़ी रिपोर्टिंग अब एक टिकाऊ बिजनेस मॉडल नहीं है। इसी सोच की वजह से द वॉशिंगटन पोस्ट के लिए दुनिया भर में मुश्किलें बढ़ रही हैं। ये संस्थान ऐसी हालत में आ गया है कि अब उसे बने रहने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों को निकालने के बारे में सोचना पड़ रहा है।

वर्मा का ट्वीट उनकी नौकरी बचाने के लिए था। अनजाने में ही इसने उस मानसिकता को उजागर कर दिया जिसने अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में से एक को पतन के कगार पर पहुँचा दिया है। यही कारण है कि न्यूजलॉन्ड्री, द वायर आदि जैसे अधिकांश भारतीय मीडिया संस्थान जो द पोस्ट की विचारधारा का अनुकरण करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें भी इसी कारण से चंदा और सदस्यता के लिए लगातार अनुरोध करना पड़ता है।

चाहे वह कोई अमेरिकी प्रतिष्ठित समाचार पत्र हो या उसके भारतीय वैचारिक अनुकरणकर्ता, पाठकों ने उन मीडिया संगठनों से अपना समर्थन वापस लेना शुरू कर दिया है जो छद्म पत्रकारिता को ‘स्वतंत्र’ और ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता करते हैं।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे मूल रूप में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)