दक्षिण एशिया के नक्शे पर एक अजीब विरोधाभास उभर रहा है। जहाँ भारत, बांग्लादेश और नेपाल जैसे देश गरीबी के दलदल से बाहर निकलने के लिए लंबी छलाँग लगा रहे हैं, वहीं पाकिस्तान उसी दलदल में और गहरा धँसता जा रहा है। सरकारी आँकड़ों और रिपोर्ट्स ने पाकिस्तान की कंगाली की जो तस्वीर पेश की है, वह न केवल डरावनी है बल्कि एक राष्ट्र के तौर पर उसकी विफलताओं का कच्चा चिट्ठा भी है। जहाँ दुनिया चाँद पर पहुँचने और डिजिटल इकोनॉमी की बात कर रही है, वहाँ पाकिस्तान की 28.8% आबादी इस बात के लिए संघर्ष कर रही है कि रात को चूल्हा जलेगा या नहीं।
आँकड़ों की गवाही: छह साल में कैसे डूबा पाकिस्तान?
पाकिस्तान में गरीबी का ग्राफ अब केवल एक आर्थिक आँकड़ा नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी बन चुका है। साल 2018-19 में यहाँ गरीबी की दर 21.9% थी, जो 2024-25 के सर्वे में बढ़कर 28.8% पर पहुँच गई है।
महज छह सालों के भीतर गरीबी में 6.9% की यह उछाल बताती है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था वेंटिलेटर पर है। फेडरल प्लानिंग मिनिस्टर अहसान इकबाल जल्द ही इन आधिकारिक आँकड़ों को जारी करने वाले हैं, लेकिन सूत्रों ने पहले ही पुष्टि कर दी है कि स्थिति काबू से बाहर है।
यह गिरावट इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि 2005-06 में पाकिस्तान की आधी आबादी गरीब थी, जिसे बड़ी मुश्किल से 2018-19 तक घटाकर 21.9% पर लाया गया था। लेकिन पिछले छह सालों की गलत नीतियों ने उस एक दशक की मेहनत पर पानी फेर दिया।
आज पाकिस्तान में गरीबी का पैमाना यह है कि अगर किसी घर की मासिक खपत प्रति व्यक्ति 3,758 पाकिस्तानी रुपए से कम है, तो उसे गरीब माना जाता है। सोचिए, इस महँगाई के दौर में इतनी कम रकम में एक इंसान कैसे जिंदा रह सकता है?
पड़ोसियों ने मारी बाजी: भारत की उड़ान और पाकिस्तान का पतन
दक्षिण एशिया के बाकी देशों के मुकाबले पाकिस्तान की नाकामी बिल्कुल साफ दिखती है। इसमें सबसे ऊपर भारत का नाम आता है, जिसने गरीबी मिटाने के मामले में पूरी दुनिया के सामने एक अद्भुत मिसाल पेश की है। विश्व बैंक के आँकड़ों के अनुसार, भारत ने पिछले 10 सालों में (मोदी सरकार के कार्यकाल में) करीब 17 करोड़ से ज्यादा लोगों को गरीबी के दलदल से बाहर निकालकर एक चमत्कार कर दिखाया है। भारत की शानदार आर्थिक नीतियों का ही नतीजा है कि जहाँ पहले 16 प्रतिशत से ज्यादा लोग बेहद गरीबी में थे, अब वह आँकड़ा घटकर महज 2.3 प्रतिशत रह गया है, जो भारत की एक बहुत बड़ी जीत है।
वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान के ही पूर्व हिस्से बांग्लादेश ने अपने कपड़ा उद्योग के जरिए सुधार की कोशिश की है, लेकिन पाकिस्तान खुद हर मोर्चे पर पिछड़ गया है। यहाँ तक कि नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों ने भी भारी संकट और चुनौतियों के बावजूद खुद को संभाला है और अपनी अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने में जुटे हैं। इन सभी पड़ोसियों के मुकाबले पाकिस्तान की स्थिति सबसे ज्यादा डराने वाली है, क्योंकि जहाँ बाकी देश तरक्की कर रहे हैं, वहीं पाकिस्तान इकलौता ऐसा मुल्क है जहाँ गरीबी घटने के बजाय और भी तेजी से बढ़ती जा रही है।
कंगाली के विलेन: आखिर क्यों नहीं सुधरे हालात?
पाकिस्तान की इस कंगाली के पीछे उसकी खुद की गलत प्राथमिकताएँ और नाकामियाँ जिम्मेदार हैं। पाकिस्तान ने कभी भी अपनी जनता की भलाई या देश के विकास के लिए नीतियाँ नहीं बनाईं, बल्कि उसका पूरा ध्यान हमेशा ‘भारत से डर’ और जंग की तैयारी पर रहा। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक तरफ पाकिस्तान पाई-पाई के लिए कर्ज माँग रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह अपने देश के विकास पर पैसा खर्च करने के बजाय आतंकियों को पालने और उन्हें फंडिंग करने में लगा रहता है।
इसी का नतीजा है कि आज वहाँ की आम जनता दाने-दाने को तरस रही है और देश कंगाली के उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नजर नहीं आता। इसके अलावा, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कर्ज के जाल में फँस चुकी है। पिछले कुछ सालों में उसने बार-बार IMF से भारी लोन लिया, जिसकी कड़ी शर्तों की वजह से वहाँ टैक्स का बोझ बढ़ गया और गरीबों को मिलने वाली सब्सिडी खत्म हो गई।
रही-सही कसर वहाँ फैली भयंकर महँगाई, भ्रष्टाचार और विनाशकारी बाढ़ ने पूरी कर दी। हालात इतने खराब हैं कि वहाँ GDP ग्रोथ सुस्त है और गेहूँ जैसी बुनियादी चीजों के दाम भी आसमान छू रहे हैं। अपनी जनता को रोटी देने के बजाय आतंकियों को पनाह देने और सेना पर बेहिसाब पैसा बहाने की वजह से ही आज पाकिस्तान पूरी दुनिया में हाथ में कटोरा लेकर घूमने को मजबूर है।
प्रांतों का हाल: पंजाब और सिंध में हाहाकार
पाकिस्तान की कंगाली अब उसके उन इलाकों तक भी पहुँच गई है जिन्हें कभी सबसे खुशहाल और अमीर माना जाता था। रिपोर्ट बताती है कि पंजाब और सिंध, जो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाते थे, वहाँ अब गरीबी सबसे तेजी से पैर पसार रही है। वहीं, खैबर पख्तूनख्वा के हालात भी लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। बलूचिस्तान की बात करें तो वहाँ पहले से ही इतनी ज्यादा गरीबी थी कि अब नई बढ़ोतरी के बाद स्थिति और भी ज्यादा भयानक हो गई है।
यह पूरी स्थिति साफ इशारा करती है कि पाकिस्तान का आर्थिक ढाँचा अंदर से पूरी तरह खोखला और बर्बाद हो चुका है। अब यह संकट केवल पिछड़े इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि कंगाली का यह जहर बड़े शहरों से लेकर दूर-दराज के गाँवों तक फैल गया है। देश की गलत नीतियों और भ्रष्टाचार की वजह से आज पाकिस्तान का वह मध्यम वर्ग भी गरीबी की रेखा के नीचे गिर रहा है, जो कभी देश को चलाने की ताकत रखता था।
‘परमाणु बम’ है पर ‘आटे का ड्रम’ नहीं
पाकिस्तान की त्रासदी यह नहीं है कि वह गरीब है, त्रासदी यह है कि वह गरीब बने रहने का चुनाव खुद करता है। जिस देश की प्राथमिकता अपने पड़ोसी से होड़ करना और छद्म युद्ध (Proxy War) लड़ना हो, वहाँ की जनता का हाल ऐसा ही होता है। आज दुनिया के सामने पाकिस्तान की छवि एक ऐसे मुल्क की है जो एक हाथ में परमाणु बम और दूसरे हाथ में भीख का कटोरा लेकर खड़ा है। 1970 के दशक में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो का वो वाला बयान भी सच होता दिख रहा है, “हम घास या पत्ते खाएँगे, भूखे भी रहेंगे लेकिन हम अपना खुद का बम बनाएँगे।” आज वहीं भूखे रहने की स्थिति साफतौर पर पूरी दुनिया को दिख रही है।
भारत डिजिटल क्रांति और 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी की ओर बढ़ रहा है और पाकिस्तान अभी भी इसी उलझन में है कि उसे IMF से अगली किस्त कब मिलेगी। जब तक पाकिस्तान अपनी ‘भारत केंद्रित’ विदेश नीति और सेना के प्रभुत्व वाली आर्थिक नीतियों को नहीं बदलता, तब तक गरीबी की यह दर 28% से 40% तक पहुँचने में देर नहीं लगेगी। पाकिस्तान के लिए अब भी वक्त है कि वह अपने ‘जंग के जुनून’ को छोड़कर ‘तरक्की के जुनून’ को अपनाए, वरना इतिहास उसे एक ‘विफल राष्ट्र’ (Failed State) के उदाहरण के रूप में याद रखेगा।


