दिल्ली के लाल किले के पास 10 नवंबर 2025 को हुए कार धमाके के कुछ ही घंटों बाद इस्लामाबाद के कोर्ट परिसर में 11 नवंबर को आत्मघाती विस्फोट हो गया। इन दोनों धमाकों ने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव को और गहरा कर दिया है।
दिल्ली हमले में दर्जनभर से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि इस्लामाबाद धमाके में भी लगभग उतने ही लोग मारे गए और कई घायल हुए। इन घटनाओं ने पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है।
दोनों हमलों में सुसाइड बॉम्बर शामिल थे और ANFO आधारित विस्फोटक का इस्तेमाल हुआ। इस्लामाबाद धमाके की जिम्मेदारी पाकिस्तानी तालिबान के गुट जमात-उल-अहरार ने ली है।
इसके बावजूद पाकिस्तानी फौज और सरकार ने आरोप लगाया कि हमले में भारत का हाथ है। भारत ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया और कहा कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक अस्थिरता और सत्ता संघर्ष से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे बयान दे रहा है।
सोशल मीडिया और विश्लेषकों का एक वर्ग इस्लामाबाद धमाके को ‘फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन’ कह रहा है। इसका मतलब है कि पाकिस्तान ने खुद हमला करवाकर दोष भारत पर डालने की कोशिश की, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को पीड़ित दिखा सके।
इस नैरेटिव के पीछे यह आशंका भी जताई जा रही है कि दिल्ली में हुए धमाके के बाद पाकिस्तान भारत की संभावित जवाबी कार्रवाई, जिसे ‘ऑपरेशन सिंदूर 2.0′ कहा जा रहा है, को टालने के लिए भी इस तरह का दांव चल रहा है।
दिल्ली-इस्लामाबाद के धमाके- संयोग या स्क्रिप्ट?
यह संयोग नहीं हो सकता बल्कि समयबद्ध पटकथा है। भारत और पाकिस्तान के घटनाओं की टाइमलाइन खुद एक स्क्रिप्ट जैसी लगती है। लाल किले का धमाका सोमवार (10 नवंबर 2025) शाम 6:45 बजे हुआ। महज 18 घंटे बाद, मंगलवार (11 नवंबर 2025) की दोपहर 12:39 बजे इस्लामाबाद कोर्ट कॉम्प्लेक्स आत्मघाती विस्फोट से हिल गया।
दोनों हमलों में आत्मघाती हमलावर शामिल थे, दोनों में ANFO आधारित विस्फोटक इस्तेमाल हुए और दोनों ठीक उसी समय हुए जब भारत फरीदाबाद, कश्मीर और उत्तर प्रदेश तक फैले जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के ‘डॉक्टर मॉड्यूल’ को ध्वस्त कर रहा था।
पाकिस्तानी फौज के फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने इस्लामाबाद में धमाकों के जरिए पाकिस्तान को पीड़ित दिखलाने की कोशिश की है। मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर की दहल अब भी पाकिस्तानी फौज के जहन में बैठा है।
साथ ही दिल्ली धमाके के बाद हर खुफिया इंटरसेप्ट, हर जब्त किया गया उपकरण, जाँच का सुराग और विस्फोटक पाकिस्तान-समर्थित जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की ओर इशारा करता है।ये वही आतंकी संगठन है जिसे मुनीर ने वर्षों तक अपनी निजी प्रॉक्सी की तरह पाला-पोसा।
इतना ही नहीं, ऑपरेशन सिंदूर में मारे गए JeM आतंकियों को पाकिस्तान में राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार दिया गया, जिसमें सेना के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। ऐसे में मुनीर की घबराहट लाजिमी है।
डॉक्टरों से बम बनाने वालों तक- फरीदाबाद मॉड्यूल और दिल्ली धमाका
दिल्ली का हमला अचानक नहीं बल्कि JeM-सम्बंधित मॉड्यूल के नेटवर्क का हिस्सा था। इस नेटवर्क में डॉक्टर, शिक्षाविद और मेडिकल प्रोफेशनल्स शामिल थे, जिन्हें आतंकवादी लॉजिस्टिक्स चेन चलाने के लिए कट्टरपंथी बनाया गया था।
इस नेटवर्क के केंद्र में था जमात-उल-मोमिनात, JeM का नया महिला विंग, जिसका नेतृत्व मसूद अजहर की बहन सादिया अजहर बहावलपुर से कर रही थी। उनकी भारत में प्रमुख ऑपरेटिव हैंडलर डॉ. शाहेना शाहिद को हथियार और अमोनियम नाइट्रेट के साथ लखनऊ से पकड़ा गया।
उनका हैंडलर पुलवामा निवासी और फरीदाबाद के अल-फलाह यूनिवर्सिटी में लेक्चरर डॉ. मुझम्मिल शकील को 2,900 किलो विस्फोटक सामग्री के साथ गिरफ्तार किया गया।
जब उन दोनों के सरगना ऑपरेटिव उमर मोहम्मद को लगा कि नेटवर्क उजागर हो चुका है तो उसने दिल्ली के लाल किले के पास कार बम विस्फोट कर दिया, जिसमें 10 लोग मारे गए। इस आत्मघाती हमले ने इस बात पर ध्यान दिलाया किया कि पाकिस्तान का नेटवर्क भारत के शहरी इलाकों में भी कितनी गहराई तक फैला हुआ है।
ऑपरेशन सिंदूर से डरा है पड़ोसी मुल्क
जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद जवाबी कार्रवाई के तहत मई 2025 में भारत के ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान के आतंकी ढाँचे को तहस-नहस कर दिया था। पाकिस्तान में पल रहे 9 आतंकी कैंप, 10 सैन्य ठिकाने और कई रडार स्टेशन इस कार्रवाई में नष्ट हो गए।
इस कार्रवाई में भारत ने ब्रह्मोस-A क्रूज़ मिसाइल से नूर खान एयरबेस को भी निशाना बनाया था, जो पाकिस्तान के परमाणु कमांड के बेहद नजदीक है। पाकिस्तान को खास तौर पर इस ऑपरेशन में अपनी वायुसेना के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपमानित होना पड़ा था।
अब दिल्ली धमाकों के बाद ‘ऑपरेशन सिंदूर 2.0’ की चर्चा है, जिसे लेकर पाकिस्तान में भय और असुरक्षा साफ तौर पर देखी जा सकती है। इसीलिए पाकिस्तान ने ‘फाल्स फ्लैग’ का हथकंडा अपना कर भारत की संभावित जवाबी कार्रवाई ऑपरेशन सिंदूर 2.0 को टालने के लिए यह ‘पीड़ित दिखने’ की रणनीति अपनाई।
दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास 10 नवंबर 2025 की शाम हुआ विस्फोट केवल एक साधारण शरद संध्या को नहीं बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा की प्रकृति को भी झकझोर गया। जाँच एजेंसियों का कहना है कि यह कोई अकेला, अशिक्षित आतंकी द्वारा किया गया हमला नहीं था बल्कि एक व्यापक, गुप्त लॉजिस्टिक्स और तकनीकी मॉड्यूल का हिस्सा था, जिसमें उच्च शिक्षित, पेशेवर रूप से प्रशिक्षित लोग जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर और विश्वविद्यालय-शिक्षित ऑपरेटिव शामिल थे।
इन लोगों ने विस्फोटक सामग्री की खरीद, छिपाने और तकनीकी सहायता जैसे कार्यों को अंजाम दिया। सुरक्षा विश्लेषक अब इस प्रवृत्ति को ‘व्हाइट कॉलर जिहाद’ कह रहे हैं, अर्थात शिक्षा और पेशेवर विश्वास का दुरुपयोग कर देश के भीतर ऐसी हिंसा को अंजाम देना, जिसे नकारा जा सके और जिसका प्रभाव घातक हो।
प्रारंभिक जाँच और फोरेंसिक निष्कर्ष
विस्फोट के कुछ ही दिनों बाद बहु-एजेंसी छापों और जाँचों का दायरा दिल्ली से बाहर तक फैल गया। अधिकारियों ने ऐसे नमूने बरामद किए, जिनमें प्रयुक्त विस्फोटक सामान्य अमोनियम नाइट्रेट से कहीं अधिक शक्तिशाली थे। प्रेस ब्रीफिंग्स और मीडिया रिपोर्टों में विभिन्न राज्यों से बड़ी मात्रा में बम बनाने की सामग्री और रसायनिक घटकों की बरामदगी का विवरण आया।
समेकित रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली-NCR, श्रीनगर, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में हुए इन ऑपरेशनों से सैकड़ों किलो विस्फोटक जब्त किए गए। कुछ रिपोर्ट्स ने इस पूरी मात्रा को टन स्तर तक बताया। गिरफ्तार लोगों में कुछ डॉक्टर और शिक्षण संस्थानों से जुड़े व्यक्ति भी शामिल थे।
रणनीतिक संदर्भ: ऑपरेशन सिंदूर और प्रॉक्सी वॉर की दिशा
सुरक्षा विश्लेषक इस मॉड्यूल को सीधे तौर पर साल 2025 के मध्य में भारत की सीमा-पार की कार्रवाई, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से जोड़कर देखते हैं। इस अभियान के तहत कई आतंकी ढाँचों को तबाह किया गया था। उसके बाद यह साफ दिखा कि प्रतिपक्ष ने अपनी रणनीति बदल ली है।
जब भारत की सीधी सैन्य कार्रवाइयाँ उसके लिए महँगी और कठिन साबित हुईं, तब उसने ‘डिनाएबल’ यानी नकारे जा सकने वाले स्थानीय प्रॉक्सी नेटवर्क सक्रिय कर दिए। दूसरे शब्दों में कहें तो जब बाहरी विकल्प सीमित हो जाते हैं, तो बाहरी सरगनाओं के लिए यह आसान हो जाता है कि वे भीतर के कम-संदिग्ध चेहरों को सक्रिय करें और हिंसा को अंदर से अंजाम दें।
शिक्षित पेशेवरों को क्यों बनाया जाता है हथियार?
लक्षित समूह के रूप में शिक्षित लोगों को चुनने के पीछे कठोर तर्क है। डॉक्टर, इंजीनियर और विश्वविद्यालय-प्रशिक्षित व्यक्ति समाज में भरोसेमंद माने जाते हैं। उनके पास तकनीकी दक्षता, गतिशीलता, सप्लाई-चेन तक पहुँच और सामाजिक विश्वसनीयता होती है। ये सभी गुण उन्हें कम संदिग्ध बनाते हैं जबकि आतंकी नेटवर्क के लिए उन्हें अधिक उपयोगी बना देते हैं।
इनकी पेशेवर पहचान उन्हें औद्योगिक रसायनों की वैध खरीद, परिवहन, भंडारण और विस्फोटक प्रणालियों की संरचना में सहायता देती है। कई मामलों में यह भी पाया गया है कि जो तथाकथित ‘प्रेरक’ या कट्टर मौलवी स्वयं तकनीकी रूप से अनपढ़ हैं, वे शिक्षित युवाओं को प्रभावित करने में सफल हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, शिक्षा और कट्टरता का यह संयोजन अत्यंत घातक रूप ले लेता है।
घरेलू चुनौती: वैध अवसरों का दुरुपयोग
भारत सरकार की छात्रवृत्तियाँ, लैपटॉप वितरण, उच्च शिक्षा का विस्तार और कौशल विकास योजनाएँ देश की ताकत हैं। लेकिन इन्हीं अवसरों का दुरुपयोग भी कट्टर तत्व अपने प्रचार और हिंसा के औजारों में बदल रहे हैं।
जाँच में सामने आया है कि कुछ मामलों में सरकारी योजनाओं से मिले संसाधनों जैसे उपकरण, डिजिटल एक्सेस या यात्रा की सुविधा को आतंकी कार्यों के लिए प्रयोग किया गया। नीति निर्धारकों के सामने यह दोहरी चुनौती है। एक ओर अवसरों को जारी रखना और दूसरी ओर संस्थागत सुरक्षा के ऐसे उपाय सुनिश्चित करना जो इन अवसरों के दुरुपयोग को रोक सकें।
देश कितनी बड़ी त्रासदी से बचा?
अधिकारियों की ब्रीफिंग और मीडिया रिपोर्टे्स इस बात पर जोर देती हैं कि इस मामले में रोकथाम और तबाही के बीच की दूरी बेहद कम थी। जम्मू-कश्मीर, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पकड़े गए विस्फोटक पदार्थों का नेटवर्क यदि सफलतापूर्वक सक्रिय होता तो यह देश के धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों पर व्यापक हमलों की क्षमता रखता था।
जाँच में संकेत मिले हैं कि नियोजित लक्ष्य उच्च जनसंख्या घनत्व वाले और प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण स्थल थे। यदि खुफिया एजेंसियों ने समय रहते कार्रवाई न की होती तो परिणाम भयानक हो सकते थे। यह सफलता संयोग नहीं थी। यह लंबे समय तक की गई मानवीय खुफिया निगरानी, कई एजेंसियों के समन्वय और फोरेंसिक विश्लेषण का परिणाम थी।
मौन प्रहरी: इंटेलिजेंस ब्यूरो की निर्णायक भूमिका
इन घटनाओं के पीछे जो सबसे निर्णायक और अदृश्य शक्ति रही, वह भारत की इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) है। जो देश की सबसे पुरानी और गुप्त सुरक्षा एजेंसी है। इस पूरे अभियान में IB की मानव स्रोतों से मिली जानकारी, राज्यों के बीच समन्वय और विश्लेषणात्मक कड़ियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
IB के अधिकारी बिना किसी प्रशंसा या पुरस्कार की अपेक्षा के दिन-रात काम करते हैं। वे महीनों तक सूचनाओं को जोड़ते हैं, संपर्कों को विकसित करते हैं और गुप्त निगरानी से जमीनी हकीकत तक पहुँचते हैं। इन्हीं मौन रक्षकों के कारण कई बड़े हमले समय रहते विफल कर दिए जाते हैं। उनकी पेशेवर निष्ठा और मौन सेवा ही देश की वास्तविक ढाल है। यह ‘शांत सुरक्षा’ भारत की रक्षा का सबसे सशक्त स्तंभ है।
सामुदायिक जिम्मेदारी और शिक्षित वर्ग की भूमिका
यह प्रवृत्ति केवल सुरक्षा नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक चुनौती भी है। भारत के मुस्लिम इस राष्ट्र की आत्मा, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। उनमें से विशाल बहुमत हिंसा को अस्वीकार करता है और देश की प्रगति में भागीदार बनना चाहता है। लेकिन जब कट्टर तत्व शिक्षित युवाओं को लक्ष्य बनाते हैं तो समाज और परिवारों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
विश्वविद्यालयों, मेडिकल कॉलेजों, प्रोफेशनल संस्थाओं और धार्मिक संगठनों को सतर्क निगरानी तंत्र और परामर्श प्रणाली विकसित करनी चाहिए। स्कॉलरशिप या डिजिटल कार्यक्रमों में नागरिक नैतिकता और डिजिटल सुरक्षा के तत्वों को शामिल करना आवश्यक है ताकि युवाओं को ब्रेनवॉश होने से बचाया जा सके। शिक्षित वर्ग को न केवल स्वयं सचेत रहना चाहिए बल्कि अपने ज्ञान और विवेक से दूसरों को भी जागरूक करना चाहिए।
नीति-स्तर पर दोहरी रणनीति
इस चुनौती से निपटने के लिए जवाब भी दो स्तरों पर होना चाहिए:
खुफिया नेटवर्क को और गहराई देना ताकि लॉजिस्टिक चैन जल्दी पकड़ी जा सके।
शैक्षणिक और कल्याणकारी योजनाओं में डिजिटल सुरक्षा और पारदर्शिता के नए मानक बनाना।
सामुदायिक स्तर पर ऐसे प्रयासों को बढ़ावा देना जो असहिष्णुता के बजाए संवाद और सहयोग को प्रोत्साहित करें।
और राष्ट्रीय विमर्श को इस दिशा में ले जाना कि अहिंसा, नागरिक उत्तरदायित्व और साझा समृद्धि ही असली राष्ट्र-धर्म हैं।
निष्कर्ष
लालकिला क्षेत्र में हुआ विस्फोट और उससे जुड़े मॉड्यूल ने यह दिखा दिया है कि आधुनिक आतंकवाद अब शिक्षा, तकनीकी दक्षता और सामाजिक विश्वास का भी हथियार बना रहा है। इसका उत्तर भय या बहिष्कार नहीं है बल्कि दोहरी क्षमता में है। एक ओर मौन, पेशेवर खुफिया काम जो खतरे को जड़ से रोक सके और दूसरी ओर समाज की वह सजीव चेतना जो कट्टरता को अस्वीकार करे।
यदि हमारे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षित नागरिक राष्ट्रनिर्माण की दिशा में अपनी भूमिका निभाएँ और इंटेलिजेंस ब्यूरो जैसी संस्थाएँ उसी निष्ठा से अपने कार्य करती रहें, तो ‘व्हाइट कॉलर जिहाद’ जैसी विकृत प्रवृत्तियों को समाप्त किया जा सकता है। शांत खुफिया कौशल और जागरूक नागरिकता- यही भारत की सबसे मजबूत सुरक्षा की ढाल है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन की राजकीय यात्रा पर भूटान पहुँचे हुए हैं। इस ऐतिहासिक दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने भारत और भूटान की सरकार द्वारा मिलकर बनाए गए पुनात्सांगछू-II जलविद्युत (हाइड्रो इलेक्ट्रिक) परियोजना का उद्घाटन किया।
प्रधानमंत्री मोदी ने X पर उद्घाटन समारोह की कुछ तस्वीरें साझा करते हुए लिखा, “विकास को गति देना, दोस्ती को गहराई देना और टिकाऊ भविष्य की दिशा में आगे बढ़ना! ऊर्जा सहयोग भारत और भूटान की साझेदारी का एक मजबूत स्तंभ है। आज हमने पुनात्सांगछू-II हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया। यह हमारे दोनों देशों की दोस्ती का एक स्थायी प्रतीक है।”
Fuelling development, deepening friendship and driving sustainability!
Energy cooperation remains a key pillar of the India-Bhutan partnership. Today, we inaugurated the Punatsangchhu-II Hydropower Project. This is an enduring symbol of friendship between our countries. pic.twitter.com/amYDqzxD1Q
1,020 मेगावॉट की इस जलविद्युत परियोजना का उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी ने भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक के साथ किया। यह भारत और भूटान के संबंधों में एक अहम पड़ाव माना जा रहा है। पुनात्सांगछू-II जलविद्युत परियोजना का काम इस साल अगस्त में पूरी तरह पूरा हो गया था। इसकी आखिरी यूनिट को 27 अगस्त 2025 को भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे और भूटान में भारत के राजदूत सुधाकर दलेला की मौजूदगी में जोड़ा गया था।
#WATCH | Bhutan | Prime Minister Narendra Modi and His Majesty the King of Bhutan Druk Gyalpo inaugurate the Punatsangchhu-II Hydroelectric Project, in the presence of the Sacred Buddha Relics
भारत-भूटान ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग से मजबूत कर रहे हैं रिश्ते: जानिए कैसे भारत ने बनाई और फंड की पुनात्सांगछू-II जलविद्युत परियोजना
पश्चिमी भूटान में पुनात्सांगछू नदी पर बनी पुनात्सांगछू-II जलविद्युत परियोजना एक ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ यानी नदी के प्राकृतिक प्रवाह से चलने वाली परियोजना है। इसका मतलब है कि इसमें बड़े बाँध या विशाल जलाशय नहीं बनाए जाएँगे बल्कि यह नदी के बहाव से ही स्वच्छ और टिकाऊ बिजली पैदा करती है। इस परियोजना की शुरुआत दिसंबर 2010 में भारत सरकार और भूटान सरकार ने मिलकर की थी। 1960 के दशक से ही यह परियोजना भारत-भूटान के गहरे रिश्तों का प्रतीक मानी जाती है।
इस पूरी परियोजना के लिए भारत ने लगभग 7,500 करोड़ रुपए का वित्तीय सहयोग दिया है। इसमें 30 प्रतिशत हिस्सा अनुदान (यानी लौटाने की जरूरत नहीं) के रूप में और 70 प्रतिशत हिस्सा रियायती दर पर ऋण के रूप में दिया गया। इस व्यवस्था का मकसद था कि भूटान जैसे मित्र देश को आसान भुगतान शर्तों के साथ मदद मिले। इस परियोजना से भूटान की बिजली उत्पादन क्षमता में करीब 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी और क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी।
यह परियोजना टर्नकी जॉइंट वेंचर के रूप में पूरी की गई जिसमें भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) मुख्य भारतीय डेवलपर थी। इस परियोजना में भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों और इंजीनियरों ने भूटान की द्रुक ग्रीन पावर कॉरपोरेशन (DGPC) के साथ मिलकर डिजाइन, निर्माण और संचालन का काम संभाला। भारतीय टीम ने भूटान के इंजीनियरों को भौगोलिक सर्वे, बांध निर्माण और टरबाइन स्थापना में तकनीकी सहायता दी ताकि हिमालयी इलाकों में आने वाली चुनौतियों जैसे भूकंपीय गतिविधियाँ और भूस्खलन से निपटा जा सके।
इस परियोजना को भारत की इंजीनियरिंग परामर्श कंपनियों का पूरा सहयोग मिला। इसमें वॉटर एंड पावर कंसल्टेंसी सर्विसेज (WAPCOS) ने इंजीनियरिंग और डिजाइन का काम संभाला जबकि नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ रॉक मैकेनिक्स (NIRM) ने मॉडलिंग और भू-तकनीकी सेवाएँ दीं।
निर्माण कार्य 2011 में शुरू हुआ था लेकिन बीच में परियोजना को कई भौगोलिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा इसमें जमीन धंसने (sinkholes) और नींव की अस्थिरता जैसी समस्याएँ प्रमुख थीं। इन कठिनाइयों के बावजूद भारत और भूटान की टीमों ने मिलकर उन्नत इंजीनियरिंग तकनीकों के जरिए इन रुकावटों को दूर किया और परियोजना को आगे बढ़ाया। भारत ने इस परियोजना के दौरान पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने पर भी विशेष ध्यान दिया ताकि पुनाखा-वांगड्यू घाटी जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पारिस्थितिक प्रभाव को न्यूनतम रखा जा सके।
भूटान के एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जो इस साल सितंबर में प्रकाशित हुई इस परियोजना ने अब तक लगभग 2,160 मिलियन यूनिट स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन किया है, जिससे करीब 6 अरब भूटानी मुद्रा (1 भूटानी मुद्रा =1 भारतीय रुपया) की घरेलू आय हुई है।
पुनात्सांगछू-II परियोजना भूटान में भारत की मदद से बनी एकमात्र जलविद्युत परियोजना नहीं है। भारत ने भूटान में अब तक छह बड़ी संयुक्त जलविद्युत परियोजनाओं को वित्तीय सहायता और तकनीकी सहयोग के साथ पूरा किया है, जिनसे भूटान की कुल स्थापित बिजली क्षमता में 3,400 मेगावॉट से अधिक का योगदान हुआ है। भारत, भूटान की बिजली का सबसे बड़ा खरीदार भी है। पिछले कई वर्षों में भारत ने भूटान के साथ छुखा, कुरिचू, ताला, मंगदेछू, पुनात्सांगछू और प्रस्तावित खोलोंगछू जलविद्युत परियोजनाओं में साझेदारी की है। वर्ष 2021 में मंगदेछू जलविद्युत परियोजना (Mangdechhu HEP) को सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय बाँध का पुरस्कार मिला था, जो भारत-भूटान के ऊर्जा सहयोग की बड़ी सफलता मानी जाती है।
भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (पड़ोसी पहले) नीति से बदल रहा है भूटान
ऐतिहासिक रूप से भारत ने भूटान के विकास में अहम भूमिका निभाई है और वह हमेशा इसकी प्रगति की कहानी का एक अभिन्न हिस्सा रहा है। भूटान की 13वीं पंचवर्षीय योजना (2024 से 2029) के लिए भारत सरकार ने 10,000 करोड़ रुपए की सहायता देने का वादा किया है। इसमें परियोजनाओं के लिए मदद, सामुदायिक विकास योजनाएँ, आर्थिक प्रोत्साहन कार्यक्रम और अनुदान शामिल हैं। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह राशि पिछली 12वीं पंचवर्षीय योजना की तुलना में 100 प्रतिशत अधिक है।
भारत और भूटान के बीच व्यापारिक संबंध भी काफी मजबूत हैं। वर्ष 2024-25 में भारत ने भूटान को 1.3 अरब डॉलर का निर्यात किया। इनमें पेट्रोलियम उत्पाद, लोहा-इस्पात, अनाज और स्मार्टफोन शामिल थे। वहीं, भूटान ने भारत को कुल 513 मिलियन डॉलर के उत्पादों का निर्यात किया जिनमें बिजली और निर्माण सामग्री प्रमुख थीं।
India is Bhutan's largest trade and development partner. The trade volume has tripled since 2014 to over $1.7 billion. Hydropower is a cornerstone of this partnership, with India funding and constructing mega hydropower projects in Bhutan, while Bhutan exports the electricity… pic.twitter.com/6q87B69aMO
जलविद्युत परियोजनाओं के अलावा भारत ने भूटान को रेलवे ढाँचे को मजबूत करने में भी मदद दी है। 11 नवंबर को थिम्फू में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि इस वर्ष सितंबर में भारत सरकार ने भूटान के गेलेफू और समत्से शहरों को असम के कोकराझार और पश्चिम बंगाल के बनरहाट से जोड़ने का फैसला किया है। यह परियोजना तीन साल में पूरी होने की उम्मीद है।
करीब 4,033 करोड़ रुपए की इस रेलवे परियोजना के तहत 89 किलोमीटर लंबी दो रेल लाइनों का निर्माण किया जाएगा। इससे यात्रा का समय काफी घट जाएगा और भूटान में भारत की मदद से विकसित की जा रही ‘गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी’ को भी बड़ी बढ़त मिलेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “इस परियोजना के पूरा होने से यहाँ के उद्योगों और भूटानी किसानों को भारत के विशाल बाजार तक आसानी से पहुँच मिल सकेगी।”
भारत थिम्फू-फुएंतशोलिंग हाईवे और बॉर्डर की सड़कों बढ़ाने में भी योगदान दे रहा है। इसके अलावा नई दिल्ली, थिम्फू और पारो में स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में भी मदद कर रही है। भारत ने इन कार्यों और स्वास्थ्य व शहरी ढांचे से जुड़ी अन्य योजनाओं के लिए कुल 1,113 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं।
इसके साथ ही भारत, भूटानी छात्रों को भी उच्च शिक्षा के अवसर प्रदान कर रहा है। नेहरू-वांगचुक छात्रवृत्ति और राजदूत छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं के माध्यम से हर साल 1000 से अधिक भूटानी विद्यार्थियों को भारत में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति दी जाती है। भूटान के लोगों के जीवन को और सुविधाजनक बनाने के लिए भारत अपने UPI सिस्टम को भी वहाँ विस्तार दे रहा है, जिससे डिजिटल भुगतान आसान और तेज हो सके।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भूटान की राजधानी थिंफू के लिए मंगलवार (11 नवंबर 2025) को दो दिवसीय यात्रा के लिए निकल गए हैं। इस यात्रा के जरिए दोनों देशों के बीच दोस्ती गहरी करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने दिल्ली में लालकिले के पास हुए ब्लास्ट के दोषियों के लिए कड़ा संदेश दिया।
पीएम मोदी ने कहा कि वे भारी मन से भूटान आए हैं। उन्होंने ब्लास्ट में मरने वाले 10 लोगों के लिए शांति प्रार्थना की बात कही। साथ ही ये भी संदेश दिया कि दोषियों को किसी भी हाल में छोड़ा नहीं जाएगा।
दिल्ली में ब्लास्ट जैसे राष्ट्रीय संकट के समय देश के नेताओं के यात्रा समेत हर गतिविधि पर दुनिया की नजर रहती है। असल में ध्यान से देखा जाए तो यह यात्रा एक सोच-समझकर बनाई गई रणनीति जैसी दिखती है, जिसके तहत संकट से निपटने और भारत की विदेश नीति और लंबे समय की सुरक्षा जरूरतों के बीच संतुलन बनाया गया। हालाँकि कुछ लोगों ने इतनी जल्दी विदेश यात्रा पर जाने के फैसले पर सवाल भी उठाए।
? As PM @narendramodi is enroute to Thimphu, Bhutan, let us watch highlights of the expansive and multisectoral deep rooted ??-?? partnership. pic.twitter.com/AHU4FxzO9R
दिल्ली धमाके के तुरंत बाद यात्रा के पीछे की स्थिति
10 नवम्बर, 2025 की शाम दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास काफी भीड़भाड़ वाले चौराहे पर कार में भीषण विस्फोट हुआ। विस्फोट में 10 लोगों की जान जाने के साथ, लोगों में दहशत और सतर्कता का माहौल पैदा हो दिया। इस हादसे में कई लोग अब भी घायल हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए देशवासियों को जाँच का आश्वसन दिया है। उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह और अन्य अधिकारियों के साथ स्थिति की तुरंत समीक्षा की ताकि राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) जैसी सुरक्षा और फॉरेंसिक एजेंसियों को तैनात किया जा सके, जिससे जाँच और सुरक्षा दोनों सुनिश्चित हों।
इतिहास बताता है कि अचानक संकट के समय राज्यनीति में किए गए बदलाव कभी-कभी दुश्मनों को देश की क्षमता परखने का साहस दे सकते हैं। मोदी ने यह दिखाया कि किसी हमले का सदमा या अव्यवस्था भारत की प्राथमिक विदेश नीति हितों से ऊपर नहीं होगी। उन्होंने भूटान यात्रा जारी रखकर यह संदेश दिया।
पड़ोस में, जहाँ चीन और पाकिस्तान भारत की दबाव झेलने की क्षमता पर नजर रखते हैं, वहाँ पर यह यात्रा बेहद अहम है। घबराहट दिखाने के बजाय स्थिरता दिखाना एक छोटा लेकिन प्रभावी कदम है।
थॉमस मेसजारोस और लॉरेंट डाने के अनुसार, जब किसी फैसले लेने वाली टीम को अचानक कोई अप्रत्याशित या मुश्किल स्थिति का सामना करना पड़ता है तो ‘असाधारण समस्याओं से सामना होने की स्थिति’ के चलते उलझन पैदा हो जाती है। यह उलझन सोचने और सही कदम उठाने की प्रक्रिया को बिगाड़ देती है।
यह स्थिति कभी उलझे हुए संदेशों, कभी अधिक प्रतिक्रिया या देरी के रूप में सामने आती है और ये सब मिलकर टीम की कमजोरी का संकेत देते हैं जिससे विरोधी ताकतें फायदा उठा सकती हैं।
मेजारोस-डैनेट ढाँचे के अनुसार, सदमा एक अचानक और गहरा झटका होता है जो सामान्य सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित करता है। इसके उलट, संकट एक ऐसी प्रक्रिया है जो पूरे सिस्टम को बदल सकती है।
ऐसा ट्रॉमा दिमाग को तार्किक प्रक्रिया को छोड़कर उस स्थिति में ले जाता है जिसे लेखक ‘मानसिक जड़ता’ (psychic sideration) कहते हैं। यानी विचार और व्यवहार का पक्षाघात। इसका परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर नीति पक्षाघात होता है, जब राजनीतिक संस्थाएँ हिचकिचाहट में फँस जाती हैं और बदलाव की बजाय ठहरने का शिकार हो जाती हैं।
इतिहास के उदाहरण बताते हैं कि यह मनोवैज्ञानिक बोझ समाज को कमजोर कर देता है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने 11 सितम्बर के हमलों के बाद पहले ‘रणनीतिक और सामरिक शून्य’ का सामना किया, फिर धीरे-धीरे एक संगठित प्रतिक्रिया तैयार की। बाद में इराक में संस्थागत पक्षाघात और फैसला लेने की क्षमता के अस्त-व्यस्त होने से नीति का अधिक विस्तार हुआ जिससे हालात और बिगड़े।
इसी तरह, भारत 1962 के चीन-भारत युद्ध के दौरान आत्ममंथन और सतर्कता में उलझ गया और वर्षों तक अपनी सीमाओं से बाहर शक्ति प्रदर्शित करने में हिचकिचाता रहा। इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि जब भावनात्मक भ्रम राज्यनीति पर हावी हो जाता है, तो उसके परिणाम गंभीर होते हैं। समाज कमजोर पड़ता है, संस्थाएँ ठहर जाती हैं और दुश्मन इसका फायदा उठाते हैं।
पीएम मोदी के लिए यह दिखाना बेहद जरूरी था कि सदमे और संकट के बीच भी शासन की प्रक्रिया जारी रह सकती है। उनकी भूटान यात्रा एक प्रतीकात्मक संदेश थी कि आंतरिक अशांति के बावजूद भारत अपने कूटनीतिक और क्षेत्रीय दायित्वों को पूरा करता रहेगा।
क्राइसिस थ्योरी में इसे ‘संकट में प्रवेश का प्रबंधन’ कहा जाता है। इसका उद्देश्य होता है कि घबराहट फैलने से पहले पूरे सिस्टम को स्थिर किया जाए। जो नेता इस शुरुआती दौर में निर्णायक कदम उठाते हैं वे बाजारों, नौकरशाही और लोगों के बीच अनिश्चितता को फैलने से रोकते हैं।
सदमे के जवाब में रणनीतिक निरंतरता
मेजारोस और डैनेट के अनुसार, एक सकारात्मक सदमा असल में संकट को नियंत्रण करने की क्षमता रखता है। इसे वे ‘मानसिक सूजन-रोधी’ (psychic anti-inflammatory) कहते हैं, जो स्थिति को बिगड़ने से रोकता है।
राजनीति में इसका अर्थ है कि नेता निर्णायक और स्थिरता लाने वाले कदम उठाकर राष्ट्रीय माहौल को पहले जैसा कर सकता है। प्रधानमंत्री मोदी की भूटान यात्रा ठीक उसी तरह का काउंटर-शॉक थी। इसने उस डर और अटकलों के चक्र को तोड़ दिया जिसे हमले ने पैदा करने की कोशिश की थी और उसकी जगह व्यवस्था और सामान्यता की तस्वीर पेश की।
इतिहास में भी इससे जुड़े कई उदाहरण मौजूद हैं
1940 में लंदन ब्लिट्ज के दौरान विंस्टन चर्चिल ने अपने सार्वजनिक कार्यक्रम जारी रखे और क्षतिग्रस्त इलाकों में घूमे, ताकि जनता को दिखा सकें कि सरकार अब भी मौजूद और सक्रिय है।
2011 में अरब स्प्रिंग के जवाब में मोरक्को के राजा मोहम्मद VI ने सबको चौंकाते हुए अपनी व्यक्तिगत शक्तियाँ कम कर दीं और संवैधानिक बदलावों की घोषणा की। इस कदम ने ‘सामाजिक-राजनीतिक संकट को कम किया’ और अशांति को समाप्त कर दिया।
क्या होता अगर पीएम मोदी रुक जाते
अगर प्रधानमंत्री मोदी अपनी यात्रा को स्थगित कर देते तो उसका प्रतीकात्मक असर तुरंत और नकारात्मक होता। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे भारत के रक्षात्मक आत्ममंथन के रूप में देखा जा सकता था जबकि घरेलू स्तर पर यह चिंता और असुरक्षा का संकेत देता। ऐसे संकेत इतिहास में कई बार भारी रणनीतिक नुकसान का कारण बने हैं।
1986 की चेर्नोबिल त्रासदी में सोवियत नेतृत्व की हिचकिचाहट और चुप्पी ने उनकी प्रतिष्ठा को देश और विदेश दोनों में नुकसान पहुँचाया। इसी तरह, 1993 के मुंबई सिलसिलेवार धमाकों में भारत की देर से आई राष्ट्रीय प्रतिक्रिया ने असुरक्षा का भाव पैदा किया जिससे वर्षों तक सीमा-पार नेटवर्कों को प्रोत्साहन मिला।
1979 के ईरान बंधक संकट में अमेरिका की शुरुआती अनिश्चितता ने तेहरान को आत्मविश्वास दिया और खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी रोकथाम की क्षमता को कमजोर किया।
इसके विपरीत वे देश जो संकट के समय आगे बढ़ते हैं, अक्सर अधिक मजबूत होकर निकलते हैं। उदाहरण के लिए 1973 के योम किप्पुर युद्ध में इजराइल का नेतृत्व पहले तो झटके में आया, लेकिन तुरंत सदमे से निकलकर जवाबी कार्रवाई में जुट गया और रणनीतिक पहल बनाए रखी। यही सिद्धांत कूटनीति में भी लागू होता है। दबाव के बीच कई कार्य करने की क्षमता संस्थागत परिपक्वता और मानसिक तैयारी का संकेत देती है।
नेतृत्व की छवि और निदान को लेकर तर्क
विदेश नीति में विश्वसनीयता केवल भाषणों पर नहीं बल्कि दबाव की स्थिति में दिखाए गए व्यवहार पर आधारित होती है। भारत की ‘पड़ोस पहले’ और ‘हिमालय सुरक्षा’ नीतियों का अहम हिस्सा रहे भूटान की यात्रा को जारी रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने यह दिखाया कि अंतरराष्ट्रीय संपर्क और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन एक-दूसरे के पूरक हैं न कि विरोधी।
भूटान डोकलाम और अन्य क्षेत्रों में चीनी दबाव के खिलाफ एक महत्वपूर्ण बफर राज्य है। पीएम मोदी के इस निर्णय से भूटान आश्वस्त हुआ कि भारत के वादे आंतरिक उथल-पुथल के बावजूद अटल हैं।
निवारण सिद्धांत (Deterrence Theory) के अनुसार, ऐसे कदम किसी राज्य के दृढ़ संकल्प संकेत को मजबूत करते हैं यानी यह विश्वास कि छोटे पैमाने के उकसावे उसके निर्णय-निर्माण को प्रभावित नहीं कर सकते।
इसके उलट, अगर यात्रा रद्द कर दी जाती और यह दिखाया जाता कि छोटे आतंकी हमले भारत की रणनीतिक योजनाओं को बदल सकते हैं तो इससे वही नेटवर्क प्रेरित होते जिन्होंने विस्फोट की साजिश रची थी। इसलिए, पीएम मोदी की स्थिरता ने एक संभावित कमजोरी को दृढ़ता की घोषणा में बदल दिया।
लीडरशिप में संकट आने पर सामने आता है मोदी सिद्धांत
क्राइसिस मैनेजमेंट के पाठ में ‘सदमे के लिए मानसिक तैयारी’ के महत्व पर जोर दिया गया है। इसका अर्थ है कि नेताओं को दिनचर्या में आने वाली रुकावट के लिए तैयार रहना चाहिए और सिस्टम को इस तरह सक्षम बनाना चाहिए कि वे संकट के बावजूद काम करता रहे।
पिछले 10 वर्षों में भारत की शासन संस्कृति ने इस सोच को धीरे-धीरे आत्मसात किया है। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर 2020 के गलवान संघर्ष तक, ध्यान हमेशा इस बात पर रहा है कि बल प्रयोग से पहले शांतिपूर्ण और संयमित प्रतिक्रिया दी जाए। यही पैटर्न भूटान यात्रा में भी दिखा, जिसने यह साबित किया कि तनाव की स्थिति में भारत की स्वाभाविक प्रतिक्रिया घबराहट नहीं बल्कि शांति है।
दिल्ली धमाके का उद्देश्य अनिश्चितता पैदा करना था। एक रणनीतिक नकारात्मक सदमा जो नीति में चिंता, विचलन और हिचकिचाहट ला सके। लेकिन इस नकारात्मक सदमे को प्रधानमंत्री मोदी के यात्रा जारी रखने के फैसले ने एक सकारात्मक सदमे से निष्क्रिय कर दिया। जैसा कि मेजारोस और डैनेट ने कहा है, “सदमे के दो असर हो सकते हैं- या तो यह सोचने और कार्य करने की क्षमता खत्म हो जाए और या फिर यह प्रतिक्रिया देने की क्षमता को बढ़ा देता है।” मोदी की प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से दूसरे असर के अनुरूप थी।
कूटनीतिक निरंतरता बनाए रखते हुए उन्होंने असुरक्षा की तस्वीर को किनारे कर दिया, भारत की अंतरराष्ट्रीय गति को बनाए रखा और यह दोहराया कि शासन आतंक के बीच भी चलता रहना चाहिए। ऐसी स्थिरता इतिहास से भी समर्थित है। चर्चिल के उदाहरण से लेकर मोरक्को के सुधारों तक और आधुनिक निवारण सिद्धांत तक, सबक यही है, “जो राज्य सदमे पर नियंत्रण पा लेते हैं, वे अपनी नियति खुद तय करते हैं।”
भारत-भूटान के संबंध: परंपरा और रणनीतिक साझेदारी
भारत और भूटान के लंबे समय से चले आ रहे विशेष संबंधों की नींव असल में गहराई से अपनाया गया आपसी विश्वास, साझा आध्यात्मिक परंपरा और भौगोलिक निकटता हैं। हाइड्रोपॉवर, व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और रक्षा सहयोग इस साझेदारी की प्रमुख विशेषताएँ हैं।
हिमालयी क्षेत्र में स्थित भू-आवेष्ठित (landlocked) राष्ट्र भूटान, चीन और भारत के बीच एक महत्वपूर्ण बफर राज्य की भूमिका निभाता है। अपनी रणनीतिक स्थिति को देखते हुए, भारत भूटान का सबसे विश्वसनीय साझेदार बना हुआ है और सुरक्षा सहयोग तथा विकास पहलों में लगातार समर्थन देता है।
PM @narendramodi arrived at Paro, Bhutan on a State Visit, where he was received by the PM @tsheringtobgay of Bhutan and accorded a warm welcome. He will join the people of Bhutan in marking the 70th birth anniversary of His Majesty the Fourth King.
हालाँकि आधिकारिक बयान दोस्ती, विकास और सांस्कृतिक उत्सव पर केंद्रित था, लेकिन इस यात्रा के पीछे कई कम स्पष्ट लेकिन महत्वपूर्ण लक्ष्य भी थे।
चीनी प्रभाव का मुकाबला: अधूरे सीमा विवादों के बीच चीन भूटान में लगातार कूटनीतिक और बुनियादी ढाँचे से जुड़ी पहल कर रहा है। मोदी की यात्रा ने पूर्वी हिमालय में चीन के बढ़ते प्रभाव को चुनौती दी और भूटान के प्रति भारत की सुरक्षा प्रतिबद्धता को दोहराया।
सीमा सुरक्षा और बुनियादी ढाँचा: संवेदनशील क्षेत्रों के पास सड़क और निगरानी सुधारों के माध्यम से सीमा नियंत्रण को मजबूत करने पर गोपनीय चर्चाएँ इस यात्रा का हिस्सा हैं।
आर्थिक परस्पर निर्भरता: भारत के निवेश का उद्देश्य भूटान की जलविद्युत परियोजनाओं और नई सीमा-पार रेल कनेक्शनों के जरिए आर्थिक निर्भरता बढ़ाना है, ताकि वैकल्पिक व्यापार मार्गों से चीन के प्रभाव के प्रति भूटान की संवेदनशीलता कम हो।
सॉफ्ट पावर का प्रदर्शन: मोदी की प्रार्थनाएँ और राजा का जन्मदिन जैसे भूटान के उत्सवों में भागीदारी भारत के सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करती है और सॉफ्ट पावर के जरिए भूटान की जनता और अभिजात वर्ग की राय भारत के पक्ष में प्रभावित करती है।
खुफिया और संकट तैयारी: संभावित सीमा या आंतरिक सुरक्षा खतरों के खिलाफ बंद दरवाजों के पीछे खुफिया जानकारी साझा करना और समन्वय जारी है। ऐसी यात्राएँ अपडेट और संयुक्त योजना बनाने में मदद करती हैं।
जल और जलवायु सहयोग: जलवायु लचीलापन और साझा जल संसाधन प्रबंधन पर चर्चाएँ खासकर पर्यावरण से जुड़े अहम क्षेत्रों में भारत को भूटान का पसंदीदा साझेदार बनाती हैं।
भू-राजनीतिक प्रभाव
इस अहम समय पर भारत-भूटान के कूटनीतिक संबंधों को दक्षिण एशिया और हिमालयी क्षेत्र की बड़ी रणनीतिक तस्वीर में देखना जरूरी है। भूटान भारत की उस रणनीति का अहम हिस्सा है, जिसका उद्देश्य उत्तर-पूर्वी सीमा की रक्षा करना और चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को रोकना है।
बड़े पैमाने पर बुनियादी ढाँचे की परियोजनाओं का उद्घाटन और सांस्कृतिक कूटनीति सोची-समझी कार्रवाइयाँ थीं, जिन्होंने भूटान की राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता के लिए भारत पर निर्भरता को और मजबूत किया। इस यात्रा ने यह संदेश भी दिया कि आतंकवादी हमलों के बावजूद भारत के रणनीतिक हित और विदेशी प्रतिबद्धताएँ प्रभावित नहीं होंगी।
दिल्ली धमाके के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूटान यात्रा का विचारपूर्ण निर्णय लिया, जो कठिन सुरक्षा परिस्थिति में उनके राजनेता-सुलभ नेतृत्व को दर्शाता है। इस यात्रा ने न केवल महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाया, बल्कि भारत-भूटान की अटूट दोस्ती को भी मजबूत किया और भारत की दृढ़ता को प्रदर्शित किया।
पीएम मोदी ने यह दिखाया कि संकट के समय भी भारत की स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियाँ मजबूत स्तंभ बनी रहती हैं क्योंकि उन्होंने तात्कालिक संकट प्रतिक्रिया और दीर्घकालिक कूटनीतिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाया है।
इस यात्रा ने भारत-भूटान संबंधों को मजबूत करने के साथ-साथ भारत के बड़े क्षेत्रीय लक्ष्य को भी सामने रखा। अडिग सहयोग और रणनीतिक दृष्टि के साथ स्थिरता को बढ़ावा देना और बाहरी दबावों का सामना करना।
इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी का नेतृत्व रणनीतिक दृष्टि और सहानुभूति का मिश्रण था। उन्होंने विस्फोट में मारे गए परिवारों के प्रति सार्वजनिक रूप से संवेदना व्यक्त की और साथ ही एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक यात्रा को आगे बढ़ाया। यह भारत के संस्थानों पर विश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा व विदेश नीति के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक था।
ये लेख मूल रूप से दिव्यांश तिवारी ने लिखा है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ।
दिल्ली लालकिले में हुए धमाके के बाद से फरीदाबाद का अल फलाह यूनिवर्सिटी चर्चा में है। यूनिवर्सिटी को जाँच के घेरे में रखा गया है। मंगलवार (11 नवंबर 2025) को यहाँ सर्च ऑपरेशन चलाया गया और 7 लोगों को हिरासत में लिया गया। इसके लिए सुबह से ही करीब 800 पुलिसकर्मी तैनात थे। बताया जा रहा है कि यूनिवर्सिटी के करीब 60 लोगों से पूछताछ की गई है।
आसपास के सभी मस्जिदों को भी जाँच के घेरे में लिया गया। आस-पास के गाँव के मौलानाओं, मौलवियों से पूछताछ की गई है। अब तक 4 इमामों से भी पूछताछ की गई।
यूनिवर्सिटी से जुड़े जिहादी डॉक्टर गिरफ्तार
दरअसल इस अल फलाह यूनिवर्सिटी के तीन डॉक्टरों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें फरीदाबाद से गिरफ्तार डॉक्टर मुजम्मिल और उसकी गर्लफेंड डॉक्टर शाहीन शामिल है।
माना जा रहा है कि यूनिवर्सिटी में सफेदपोश आतंकियों को पनाह दिया गया। यानी जिन लोगों पर शक नहीं किया जा सके, उन्हें हथियार बनाया गया।
फिलहाल एजेंसियों की हर गतिविधियों पर नजर है। जिन 4 इमामों को गिरफ्तार किया गया है, उनकी व्हाट्सएप डिलीट पाई गई हैं। यानी कहीं न कहीं इन डॉक्टरों के संबंध उन इमामों से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए मैसेज को डिलीज किया गया है।
अल फलाह यूनिवर्सिटी के कई चेहरे
ऑपइंडिया की टीम जब अल फलाह यूनिवर्सिटी पहुँची, तो उन्हें गेट पर ही रोक दिया गया। लेकिन पहचान छुपा कर जैसे तैसे गेट के अंदर टीम पहुँची, तो देखा कि कैंपस इतना बड़ा था कि दिल्ली एनसीआर में शायद इतना बड़ा कैंपस किसी दूसरी प्राइवेट यूनिवर्सिटी की नहीं होगी। कैंपस में काफी चहल पहल थी। छात्रों का हुजूम था और शिक्षक भी इधर-उधर जाते दिख रहे थे।
दूर से देखने पर ऐसा लग रहा था कि डॉक्टर मुजम्मिल की घटना से ये लोग अंजान हैं। डॉक्टर मुजम्मिल इस कैंपस में ही आता-जाता था। यहाँ वह छात्रों को पढ़ाता था।
कैंपस के अंदर खुले जगह पर कुछ लोग नमाज पढ़ रहे थे। सुरक्षा गार्ड ने साफ कहा कि वह किसी मुजम्मिल को नहीं जानते हैं। उसने कहा, “सुबह से लोग चर्चा कर रहे हैं लेकिन हमें नहीं पता।”
ऑपइंडिया की टीम जब आगे बढ़ी तो उसे बड़ा-सा अस्पताल दिखाई दिया। यहाँ मरीजों के रिश्तेदारों और दूसरे लोगों का आना जाना लगा हुआ था। बडी संख्या में मेडिकल कॉलेज की लड़कियाँ बुर्के में आ-जा रही थीं। सभी की दबी जुबान पर डॉक्टर मुजम्मिल और डॉक्टर शाहीन का नाम था।
टीम ने उनमें से कुछ लोगों से बात करने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने डॉक्टर मुजम्मिल और डॉक्टर शाहीन के बारे में बात करने से इनकार कर दिया। कुछ लोगों ने सिर्फ ये बताया कि वो हैरान हैं न्यूज देखकर क्योंकि डॉक्टर मुजम्मिल को उन्होंने एक डॉक्टर और प्रोफेसर के तौर पर देखा है।
एक मेडिकल के छात्र ने बताया, “हमारे लिए बहुत आश्चर्य की बात है, क्योंकि डॉक्टर मुजम्मिल हमें पढ़ाते थे।”
ऑपइंडिया से एक असिस्टेंट हिन्दू प्रोफेसर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, यहाँ ज्यादातर स्टूडेंट्स जम्मू कश्मीर और पश्चिम उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। मुस्लिम ज्यादा हैं। अन्य धर्मों के बच्चे भी हैं। शुरुआत में जब यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू किया, तो उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता थी और थोड़ा अजीब माहौल लगा था। यहाँ उन्होंने देखा था कि कई प्रोफेसर लंबी दाढ़ी और मुस्लिम गेटअप में कैंपस में आते थे। डॉक्टर मुजम्मिल उनमें से एक था, जो पीले रंग की बाइक पर अक्सर कैंपस आता था। डॉक्टर मुजम्मिल कई वर्षों से वहाँ पढ़ा रहा था।
घटना के बाद डॉक्टर शाहीन की चर्चा भी आपस में खूब हो रही है। महिला प्रोफेसर ने बताया कि डॉक्टर शाहीन की गिरफ्तारी से हर कोई हैरान है। क्योंकि वह सबसे अधिक समय हमारे बीच बिताती थी। छात्र- प्रोफेसर अलग अलग अपने ग्रुप के साथ बात कर रहे हैं। लेकिन अनजान लोगों से इस मुद्दे पर बात नहीं कर रहे।
डॉक्टर शाहीन वह महिला है, जिसकी कार से अवैध हथियार बरामद हुआ। वह इस यूनिवर्सिटी में पढ़ा रही थी। महिला प्रोफेसर के मुताबिक, डॉक्टर शाहीन पहले स्विफ्ट कार से आती थी, लेकिन कुछ दिनों पहले उन्होंने नई ब्रीजा खरीदी थी।
अल फलाह यूनिवर्सिटी में घूमने के बाद ऑपइंडिया की टीम को दो अहम बातें महसूस की। पहला यहाँ अवैध गतिविधियाँ चलती हैं। दूसरी बात यह है कि यूनिवर्सिटी ऐसा केन्द्र है, जहाँ बाहरी लोगों का आना जाना लगा रहता है।
यूनिवर्सिटी के बायीं तरफ थोड़ी दूर पर मुजम्मिल का वह ठिकाना है, जहाँ से 360 किलो ग्राम अमोनियम नाइट्रेट बरामद किए गए थे। यूनिवर्सिटी के दायीं तरफ करीब 2 किलोमीटर जाने पर गाँव मिलता है फतेहपुर तगा। जहाँ पर वह जगह आती है जहाँ छोटा सा मकान है। इस मकान में डॉक्टर मुजम्मिल रहता तो नहीं था लेकिन भाड़े पर लिया हुआ था। यहाँ उसने तकरीबन 2500 किलो अमोनियम नाइट्रेट जमा कर रखा था।
यूनिवर्सिटी के दोनों तरफ जिहादी प्रोफेसर डॉक्टर मुजम्मिल के दो ठिकाने थे। वहाँ भी ऑपइंडिया की टीम पहुँची और जगह का मुआयना किया।
दिल्ली से सटा फरीदाबाद का ये यूनिवर्सिटी हर तरह से आतंकियों का अच्छा पनाहगार बन गया था। सुरक्षित होने के साथ-साथ शिक्षक कार्य से जुड़े होने पर आतंकियों पर नजर भी नहीं जा पा रही थी।
इसकी स्थापना 2014 में अल-फ़लाह चैरिटेबल ट्रस्ट ने की थी। हरियाणा निजी विश्वविद्यालय (संशोधन) अधिनियम, 2014 के माध्यम से इसे मान्यता दी गई। 2015 में यूजीसी ने इसे मान्यता दी। ये यूनिवर्सिटी करीब 70 एकड़ में फैला हुआ है। यूनिवर्सिटी के अंदर ही अल फलाह अस्पताल भी है, जहाँ लोगों का फ्री में इलाज किया जाता है। इसमें 650 बेड लगे हुए हैं। यूनिवर्सिटी के अंदर हॉस्टल, स्टाफ और डॉक्टरों के क्वाटर्स, लाइब्रेरी, लैब आदि हैं।
यूनिवर्सिटी को अल फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट चलाता है। इसके अध्यक्ष जवाद अहमद सिद्दीकी हैं। फिलहाल यहाँ के रजिस्ट्रार प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद परवेज हैं। अब सवाल उठता है कि यूनिवर्सिटी प्रबंध को अपने प्रोफेसरों के करतूत की जानकारी थी या नहीं।
यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने जानबूझकर यहाँ इन डॉक्टरों को रखा था ताकि इन पर किसी की नजर ना पड़े या इन डॉक्टरों ने यूनिवर्सिटी को पनाहगार के रूप में इस्तेमाल किया।
गुजरात के गिर सोमनाथ में स्थित प्रभास पाटण में प्रशासन द्वारा चलाई जा रही मेगा डिमोलिशन ड्राइव के दौरान तनावपूर्ण स्थिति बन गई। सरकारी जमीन पर बने निर्माणों को हटाने का काम चल रहा था। इसी दौरान एक दरगाह को हटाने को लेकर मुस्लिम टोला इकट्ठा हो गया, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएँ और बच्चे थे। इस टोले ने पुलिस पर पथराव किया, जिससे दो पुलिसकर्मी घायल हो गए। अब इस घटना के मामले में 100 के टोले खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।
जानकारी के मुताबिक, सोमनाथ में काफी समय से प्रशासन द्वारा गैरकानूनी निर्माणों के खिलाफ मेगा डिमोलिशन ड्राइव चलाई जा रही है। इस ड्राइव में कई रिहायशी और कमर्शियल गैरकानूनी निर्माण ध्वस्त किए जा रहे हैं। इसी कड़ी के तहत 10 नवंबर को प्रभास पाटण पुलिस स्टेशन इलाके के शंख सर्कल के पास सोमनाथ मंदिर के नजदीक दुकानें, मकान और मजहबी स्थल वाली 11 संपत्तियों को हटाने की तैयारी की गई थी।
ज्यादातर कब्जे हटाने के बाद पुलिस सहित टीम शाम के समय गैरकानूनी हजरत रंगीलाशाह दरगाह हटाने पहुँची तो बुर्काधारी महिलाओं और बच्चों के साथ एक ग्रुप वहाँ घुस आया और पुलिस से विवाद शुरू कर दिया। पुलिस ने इस भीड़ को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन भीड़ में मौजूद लोगों ने चिल्लाकर पुलिस पर सीधा हमला कर दिया और पत्थर बरसाने शुरू कर दिए।
दरगाह (फोटो: भास्कर)
इस दौरान पुलिस ने हल्का लाठीचार्ज किया और तीन टीयरगैस के गोले छोड़े। इसके बाद टोला तितर-बितर हो गया और स्थिति काबू में आ गई। इस पथराव की घटना में प्रभास पाटण के पीआई एमवी पटेल तथा सर्विलांस स्क्वॉड के हेड कांस्टेबल कुलदीपसिंह परमार घायल हो गए। पुलिस के मुताबिक, 80 से 100 लोगों के टोले ने पुलिस पर पथराव किया था।
स्थिति काबू में आने के बाद पुलिस ने आरोपियों को पकड़ने के लिए ऑपरेशन शुरू किया। पुलिस के मुताबिक अभी स्थिति पूरी तरह काबू में है और हमलावरों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया गया है। टोले में मौजूद महिलाओं के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया है।
17 नामजद और 100 की भीड़ के खिलाफ मुकदमा
पथराव की इस घटना को लेकर पुलिस ने सख्त कार्रवाई की है। इस मामले में 17 नामजद लोगों सहित 100 के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। हमले की घटना के बाद पुलिस ने वीडियो फुटेज के आधार पर कार्रवाई की।
डिप्टी मामलतदार रणजीतसिंह खेर की शिकायत के आधार पर पुलिस ने 17 नामजद लोगों सहित करीब 100 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। ऑपइंडिया के पास FIR की कॉपी उपलब्ध है।
प्रभास पाटण पुलिस स्टेशन में BNS की धारा 189(2), 189(3), 189(5), 190, 191(2), 195(1), 125, 121(1) और गुजरात पुलिस एक्ट की धारा 135 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। मुकदमा दर्ज मुख्य आरोपितों में रफीक गढ़िया, शबाना हारुन मोठिया, रजिया हुसैन कालवात, साकील उर्फ भूरो, गुलाम साबिर डॉक्टर, राजुशा हिनफशा बानवा, शकील उर्फ गली कालवात, ओबामा, नदीम कालवाणिया, अयूब बदाम, रफीक उर्फ बोदु, सब्बीर मौलाना, सुफियान कालवाणिया, मयुद्दीन हनीफ आमद महमद महिडा, सब्बीर इकबाल और सब्बीर हारुन शामिल हैं।
ऑपइंडिया से बात करते हुए शिकायतकर्ता डिप्टी मामलतदार (सर्कल ऑफिसर) रणजीतसिंह खेर ने बताया कि सरकारी काम के तहत उनकी टीम पुलिस सुरक्षा के साथ हजरत रंगीला दरगाह ध्वस्त करने पहुँची थी। यह दरगाह सरकारी जमीन पर बनी है। जैसे ही टीम वहाँ पहुँची कि स्थानीय महिलाएँ, बच्चे और पुरुषों का ग्रुप चिल्लाने लगा और पुलिस के समझाने के बावजूद सरकारी काम में दखल देने लगा। पुलिस ने और समझाने की कोशिश की तो महिलाओं समेत पूरे ग्रुप ने पथराव शुरू कर दिया।
खेर ने आगे बताया कि पथराव तेज होने के बाद पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू किया और टीयर गैस के गोले छोड़कर स्थिति काबू में ली। उन्होंने यह भी कहा है कि स्थिति काबू में लेने के बाद उनकी टीम ने पुलिस के साथ मिलकर गैरकानूनी दरगाह ध्वस्त कर दी। उन्होंने बताया है कि पुलिस इस मामले में कार्रवाई कर रही है, लेकिन डिमोलिशन ड्राइव अभी भी जारी रहेगी।
बुलडोजर कार्रवाई (फोटो: भास्कर)
हमले के बाद आरोपियों को पकड़ने के लिए पुलिस ने तुरंत कॉम्बिंग ऑपरेशन शुरू किया है। हालाँकि ज्यादातर आरोपित घटना के बाद फरार हो चुके हैं, जिनकी तलाश पुलिस कर रही है। प्रशासन ने साफ कहा है कि सरकारी जमीन से गैरकानूनी कब्जे हटाने का काम जारी रहेगा और कानून हाथ में लेने वाले तथा सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने वाले तत्वों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएँगे।
और जानकारी के लिए प्रभासपाटण पुलिस से भी संपर्क किया गया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका। जवाब मिलने की स्थिति में रिपोर्ट अपडेट की जाएगी।
(मूल रूप से ये खबर गुजराती में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दो चरणों का मतदान पूरा हो चुका है और अब जनता के रुझान एग्जिट पोल के रूप में सामने आने लगे हैं। देशभर की प्रमुख सर्वे एजेंसियों ने अपने-अपने एग्जिट पोल के सर्वे जारी कर दी हैं, जिनमें इस बार बिहार में NDA की सरकार बनती दिखाई दे रही है।
हर एजेंसी के आँकड़े थोड़े-बहुत अलग हैं लेकिन सभी सर्वे में एक समान संकेत है कि बिहार की जनता ने एक बार फिर NDA पर भरोसा जताया है। वहीं तेजस्वी यादव और राहुल गाँधी के नेतृत्व वाला महागठबंधन पिछड़ता नजर आ रहा है, जो एग्जिट पोल के मुताबिक 70-90 सीटों पर ही सिमट सकता है।
इस बीच पहली बार बिहार की राजनीति में कदम रखने वाली प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी को लेकर एग्जिट पोल्स में निराशाजनक संकेत मिले हैं। लगभग सभी प्रमुख सर्वे के मुताबिक जनसुराज पार्टी का खाता खुलना भी मुश्किल लग रहा है। हालाँकि, कुछ इलाकों में पार्टी को सीमित समर्थन जरूर मिला लेकिन यह राज्यव्यापी असर बनाने में नाकाम रही।
कुल मिलाकर एग्जिट पोल्स यह दिखा रहे हैं कि बिहार की सियासत में इस बार फिर NDA की मजबूत वापसी होती दिख रही है जबकि विपक्ष को जनता के रुझान में उम्मीद से कम समर्थन मिला है।
MATRIZE एग्जिट पोल
MATRIZE ने एग्जिट पोल के अनुसार, बिहार चुनाव 2025 में NDA जीत हासिल करेगी। चुनाव में NDA को 147-167 सीटें मिलने वाली हैं। वहीं महागठबंधन को 70-90 सीटों पर सिमटकर रह जाएगा। उधर अन्य पार्टियों को 3-6 सीटें मिलने की संभावना है।
People’s Insight के एग्जिट पोल के हिसाब से बिहार चुनाव में NDA 133-148 सीटें हासिल करेगी। वही महागठबंधन को 87-102 सीटें मिलने का अनुमान है जबकि जनसुराज पार्टी केवल 0-2 सीटों पर सिमटकर रह जाएगी। उधर अन्य पार्टियों की झोली में 3-6 सीटें जाने की संभावना है।
दैनिक भास्कर के एग्जिट पोल में भी NDA को बढ़त मिल रही है। सर्वे के अनुसार, NDA 145-160 सीटों पर जीत सकती है। महागठबंधन को 73-91 सीटें मिलने का अनुमान है। जनसुराज का खाता भी खुल सकता है, पार्टी को 0-3 सीटें मिल सकती हैं। वहीं अन्य दल 5-10 सीटों पर जीत हासिल कर सकते हैं।
रिपब्लिक टीवी के P-Marq के एग्जिट पोल के अनुसार, NDA 142-162 सीटों के साथ बिहार चुनाव में बाजी मारेगी। सर्वे में महागठबंधन को 80-98 सीटें मिलने का अनुमान है। जन सुराज के खाते में 01-04 सीटे आ सकती हैं। वही अन्य दलों को 00-03 सीटे मिल सकती हैं।
Chanakya Strategies के एग्जिट पोल में NDA को 130-138 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है जबकि महागठबंधन को 100 से 108 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। एग्जिट पोल में जनसुराज तो शून्य सीटों के साथ खाता ही नहीं खोल सकी। वहीं अन्य दलों को 3 से 5 सीटें मिलने की उम्मीद है।
न्यूज 24 के एग्जिट पोल में NDA को 152 सीटों से बहुमत मिल सकती है। महागठबंधन की केवल 84 सीटों पर जीतने की संभावना है। वहीं अन्य दल 7 सीट पर बाजी मार सकते हैं।
न्यूज 18 के एग्जिट पोल
न्यूज 18 के एग्जिट पोल में NDA को भारी बहुमत हासिल हो रही है। एग्जिट पोल में NDA को 140 से 150 सीटें मिल सकती हैं। उधर महागठबंधन को 85 से 95 सीटें मिलने की संभावना है। वहीं अन्य दलों को 7 सीटें मिल सकती हैं।
टाइम्स नाउ के एग्जिट पोल
टाइम्स नाउ के एग्जिट पोल में NDA को 143 सीटें के साथ बढ़त मिलती दिख रही है। महागठबंधन को भी 95 सीटें मिलने की संभावना हैं। वहीं अन्य दल 5 सीटें जीत सकते हैं।
क्या है एग्जिट पोल?
एग्जिट पोल (Exit Poll) वह सर्वेक्षण होता है, जो किसी चुनाव में मतदान खत्म होने के तुरंत बाद किया जाता है। जब लोग अपने-अपने मतदान केंद्रों से वोट डालकर बाहर निकलते हैं तो सर्वे एजेंसियों के प्रतिनिधि उनसे पूछते हैं कि उन्होंने किस पार्टी या उम्मीदवार को वोट दिया।
इन जवाबों के आधार पर एजेंसियाँ एक अनुमान तैयार करती हैं कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिल सकती हैं और कौन-सी पार्टी सरकार बना सकती है। यही अनुमान एग्जिट पोल कहलाता है। इसे आम तौर पर मतदान समाप्त होने के बाद लेकिन वोटों की गिनती से पहले, टीवी चैनलों और अखबारों में प्रकाशित किया जाता है।
एग्जिट पोल के मायने?
एग्जिट पोल का असली मतलब होता है जनता के रुझान का अंदाजा लगाना। यह चुनाव के नतीजों की आधिकारिक घोषणा नहीं होती बल्कि केवल ‘संभावित जनमत का आकलन‘ होता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि किन मुद्दों पर मतदाताओं ने वोट दिया, किन क्षेत्रों में किस पार्टी को बढ़त मिली और आम जनता का झुकाव किस ओर रहा।
हालाँकि, एग्जिट पोल हमेशा सटीक नहीं होते है क्योंकि यह सीमित सैंपल पर आधारित होते हैं और हर मतदाता का वोट गुप्त होता है। फिर भी यह चुनावी माहौल का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है, जो मतदान के बाद जनता की सोच और रुझान को समझने में मदद करता है।
मतदान में चुनाव आयोग की 17 नई पहल का प्रभाव
इस बार बिहार में मतदान में सारे रिकॉर्ड टूट गए। पहले चरण में 64.66 प्रतिशत मतदान हुआ जबकि दूसरे चरण में भी रिकॉर्ड तोड़ 68.55 फीसदी मतदान दर्ज किया गया। इसके पीछे चुनाव आयोग की नई तकनीकी और प्रबंधन संबंधी 17 पहलों की बड़ी भूमिका रही। आयोग ने पहली बार राज्य के सभी मतदान केंद्रों पर 100 प्रतिशत लाइव वेबकास्टिंग की व्यवस्था की, जिससे मतदान प्रक्रिया की रीयल-टाइम निगरानी संभव हुई और लोगों में भरोसा बढ़ा।
इसके अलावा हर मतदान केंद्र पर मतदाताओं की अधिकतम संख्या घटाकर 1200 कर दी गई ताकि भीड़ और अव्यवस्था से बचा जा सके। उम्मीदवारों के रंगीन फोटो वाले EVM बैलेट, मोबाइल जमा केंद्र, विकलांग मतदाताओं के लिए व्हीलचेयर और ई-रिक्शा जैसी सुविधाएँ भी इस बार जोड़ी गईं।
इन पहलों का सीधा असर मतदान प्रतिशत पर पड़ा। अधिक पारदर्शिता और सुविधा के कारण मतदाताओं में उत्साह बढ़ा और ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक लंबी कतारें नजर आईं। ECINet नाम की डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए मतदान की रीयल-टाइम जानकारी ने भी प्रशासनिक निगरानी को आसान बनाया। साथ ही मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) अभियान के कारण बड़ी संख्या में नए मतदाता जुड़ सके, जिससे मतदान का दायरा और बढ़ गया।
नतीजा यह रहा कि बिहार ने इस बार पिछले सभी चुनावों का रिकॉर्ड तोड़ते हुए सबसे अधिक मतदान दर्ज किया, जो यह दर्शाता है कि जब चुनाव प्रक्रिया भरोसेमंद और सुविधाजनक बनती है तो लोकतंत्र में लोगों की भागीदारी अपने आप बढ़ जाती है।
9 नवंबर 2025 को गुजरात एंटी-टेररिस्ट स्क्वॉड (ATS) ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया। इनमें तेलंगाना के डॉ. अहमद मोहियुद्दीन सैयद का नाम भी शामिल था। वह राइसिन नाम के जहर को बनाने पर काम कर रहा था।
असल में राइसिन इतना ज्यादा खतरनाक है कि उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित किया गया है। ये लोग ISIS से जुड़े संगठन ‘इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP)’ से संपर्क में थे।
ATS के अनुसार, 35 वर्षीय डॉ. सैयद ने चीन से मेडिकल की पढ़ाई की है। वह अफगानिस्तान निवासी अबू खदीजा के कहने पर काम कर रहा था। खदीजा ISKP से जुड़ा हुआ है। वह पाकिस्तान के कई लोगों से भी संपर्क में था।
पूछताछ के दौरान, डॉ. सैयद ने कबूल किया कि वह राइसिन (जिसे ‘रायजिन’ (Ryzin) भी कहा जाता है) नाम के अत्यधिक जहरीला पदार्थ बनाने की तैयारी कर रहा था। इसे अरंडी के बीजों से तैयार किया जाता है। इसके लिए उसने शोध से जुड़े सामान, केमिकल और जरूरी कच्चा माल भी जुटा लिया था।
एसपी के सिद्धार्थ के नेतृत्व वाली ATS टीम को खुफिया जानकारी मिलने के बाद अहमदाबाद-महेसाना रोड पर अदलाज टोल प्लाजा के पास छापेमारी में सैयद को गिरफ्तार किया। वह सिल्वर रंग की फोर्ड फिगो कार चला रहा था।
कार में अधिकारियों को दो ग्लॉक पिस्टल, एक बेरेटा पिस्टल, 30 जिंदा कारतूस और लगभग 4 लीटर अरंडी का तेल प्लास्टिक के कंटेनर में बरामद हुआ। अरंडी का तेल राइसिन नामक ज़हर बनाने के लिए मुख्य सामग्री होता है।
सैयद के पास से मिले डिवाइसेज की फॉरेंसिक जाँच के बाद पुलिस को दो और लोगों तक पहुँची। इनमें से एक उत्तर प्रदेश के शामली में दर्जी आजाद सुलेमान शेख है और दूसरा उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी का छात्र मोहम्मद सुहैल मोहम्मद सलीम खान था। इन लोगों ने सैयद को हथियार दिलाने में मदद की थी और गुजरात के बनासकांठा से उसके साथ काम कर रहे थे।
ATS के अनुसार, ये दोनों इस्लामिक कट्टरपंथी विचारधारा के हैं। ये लोग लखनऊ, दिल्ली और अहमदाबाद जैसी जगहों पर हमले करने के लिए रेकी कर चुके थे।
इस पूरे मामले में पाकिस्तान का कनेक्शन भी सामने आया है। अधिकारियों ने बताया कि आरोपितों से बरामद किए हथियार राजस्थान के हनुमानगढ़ से मिले थे। इन हथियारों को उनका हैंडलर पाकिस्तान सीमा के पार ड्रोन से भेजता था। ATS ने इस ऑपरेशन में तीन पिस्टल, 30 जिंदा कारतूस और राइसिन से जुड़ी सामान भी जब्त किए।
राइसिन, बायोटेरर और जिहादी संगठन का काफिरों को जहर से मारने का जुनून
राइसिन एक बहुत जहरीला प्रोटीन है जो अरंडी के पौधे या रिसिनस कम्यूनिस से मिलता है। राइसिन न तो वायरस है और न ही बैक्टीरिया बल्कि यह एक लेक्टिन टॉक्सिन है। ये शरीर की कोशिकाओं में प्रोटीन बनने की प्रक्रिया को रोक देता है। इसे खाने, सांस के जरिए या इंजेक्शन से लेने पर इंसान के अंग जल्दी फेल होने लग जाते हैं और मौत हो सकती है।
राइसिन निकालने के लिए सबसे पहले अरंडी के बीजों को अच्छे से पीसकर उनका पेस्ट बनाया जाता है। फिर उससे तेल निकाल दिया जाता है। इसके बाद जो बचा हुआ गूदा होता है उसे केमिकल से प्रोसेस किया जाता है और राइसिन वाला हिस्सा अलग किया जाता है।
हालाँकि यह एक तकनीकी काम है फिर भी इसके लिए सिर्फ सामान्य लैब उपकरण, दस्ताने और एसीटोन से ही ये काम किया जा सकता है।
राइसिन के खतरे को महज इस बात से समझा जा सकता है कि सिर्फ नमक के एक दाने से भी कम 500 माइक्रोग्राम भर खा लेने या हवा के जरिए सांस में ले लेने या इंजेक्शन के जरिए शरीर में पहुँचाने पर यह किसी भी हट्टे-कट्टे इंसान को मार सकता है। सबसे बुरी बात यह है कि इसका कोई इलाज या एंटीडोट भी अब तक नहीं है।
राइसिनजिस तरीके से शरीर के संपर्क में आता है, उसी के हिसाब से ही उसके लक्षण भी बदलते हैं। अगर राइसिन को निगल लिया जाए तो उल्टी, दस्त, पेट में खून निकलना और शॉक हो सकता है।
राइसिन को इंजेक्शन से लेने पर शरीर के अंदरूनी हिस्सों में खून निकलना, टिश्यू का मरना और अंगों का काम बंद हो जाना होता है। साँस से रिजिन के अंदर जाने पर फेफड़ों में जलन, कमजोरी, बुखार, फेफड़ों में घाव, सूजन और अधिक नुकसान होता है।
किसी भी तरीके से राइसिन के शरीर में अंदर जाने पर हर हालत में बेहद दर्दनाक तरीके से 5-6 दिनों के अंदर मौत होना लगभग तय है।
अमेरिका के CDC (सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन) ने राइसिन को ‘कैटेगरी B बायोटेररिज्म एजेंट’ की सूची में रखा है। यह केमिकल वेपन्स कन्वेंशन (CWC) में ‘शेड्यूल-1’ टॉक्सिक केमिकल के तौर पर दर्ज है।
CDC के अनुसार राइसिन एक ‘प्राकृतिक जहर है जो कई तरीकों से शरीर को नुकसान पहुँचा सकता है।’ अगर इसे धुँए, पाउडर या खाने-पीने की चीजों में मिला दिया जाए तो बहुत बड़े पैमाने पर लोगों को नुकसान पहुँचाया जा सकता है।
राइसिन का इस्तेमाल 1970 के दशक से हत्या और आतंकवादी साजिशों के लिए किया जा रहा है। पहली बार 1978 में राइसिन का उपयोग एक बुल्गारियाई पत्रकार जॉर्जी मार्कोव की हत्या में किया गया था।
बुल्गारियाई खुफिया एजेंसी के एक एजेंट ने लंदन के वाटरलू ब्रिज पर एक छतरी से राइसिन की गोली मार्कोव की टांग में मार दी थी। इसके बाद वह कुछ ही दिनों में मर गए।
इस्लामिक आतंकवादी संगठनों ने राइसिन को खास तौर पर अपना लक्ष्य बनाया है, क्योंकि यह ‘गरीब आदमी का परमाणु बम’ माना जाता है। यह सस्ता है लेकिन बहुत खतरनाक है और इसका इस्तेमाल कई तरीकों से जिहाद के लिए किया जा सकता है।
राइसिन को बनाने के लिए सन् 2000 में तैयार की थी प्रयोगशाला
सन् 2000 के शुरूआती वर्षों में अल-कायदा ने राइसिन को अपने जिहादी मकसद पूरे करने के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया। 2003 में अल-कायदा के एक गिरोह ने ब्रिटेन (UK) की सड़कों पर राइसिन और अन्य जहरों से हमले करने के लिए एक लैब बनाई की थी।
ब्रिटिश सुरक्षा एजेंसियों ने ऑपरेशन के जरिए लंदन में एक पते से 22 अरंडी के बीज, लैब उपकरण और राइसिन बनाने की जानकारी बरामद की। इस मामले में छह अल्जीरियाई लोगों को गिरफ्तार किया गया।
बाद में एक अल्जीरियाई नागरिक कैमल बोरगास को ‘जहर या विस्फोटकों के जरिए डर, दहशत या नुकसान पहुँचाने की साजिश’ के आरोप में 17 साल जेल की सजा सुनाई गई।
5 फरवरी, 2003 को संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण में अमेरिका के तत्कालीन विदेश मंत्री कॉलिन पॉवेल ने इस घटना को आतंकवादी अबू मुसाब अल-जरकावी के नेटवर्क से जोड़ा था।
2004 तक जरकावी के ‘अल-कायदा इन इराक (AQI)’ ने फालुजाह की लैब में राइसिन पर प्रयोग करना शुरू किया। इनमें सायनाइड जैसे दूसरे जहर का भी परीक्षण शामिल था।
2003 में ऐसा दो बार हुआ जब अक्टूबर और नवंबर के बीच राइसिन लगे हुए दो पत्र मिले। इनमें से एक पत्र व्हाइट हाउस को भेजा गया था, लेकिन उसे समय रहते प्रोसेसिंग फैसिलिटी पर ही पकड़ लिया गया।
उसी साल उत्तरपूर्वी इराक के खुर्मुल में अमेरिकी सेना (US coalition forces) ने एक रासायनिक हथियार फैक्ट्री पर कब्जा किया। उन्हें वहाँ राइसिन और अन्य जहर के निशान मिले।
सन् 2000 के शुरुआती वर्षों में अमेरिकी गठबंधन सेना ने इराक और सीरिया में ISIS और अन्य आतंकी कट्टरपंथियों की ओर से चलाए जा रहे कई केमिकल लैब को पकड़ा।
माना जाता है कि ISIS ने सद्दाम की सत्ता में जहरीले केमिकल का जखीरा जब्त किया और कैदियों पर राइसिन समेत तरह-तरह के जहर का परीक्षण किया। इनका प्रयोग आतंकी हमलों और सजा-ए-मौत में किया जाता था।
ISIS की सत्ता में हुए राइसिन समेत कई खतरनाक केमिकल के हुए टेस्ट
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, ISIL/ISIS ने 8 अलग-अलग केमिकल एजेंट बनाए। इन केमिकल्स को इंसानों और जानवरों पर आजमाया और अपने 4 साल के शासनकाल में कम से कम 13 हमले किए।
इन एजेंट्स में एल्युमिनियम फॉस्फाइड, बोटुलिनम टॉक्सिन, क्लोरीन, सायनाइड आयन, निकोटिन, राइसिन, थैलियम सल्फेट और सल्फर मस्टर्ड (मस्टर्ड गैस) शामिल थीं।
ISIS ने इन खतरनाक कैमिकल्स इस्तेमाल मोर्टार, रॉकेट और आईईडी में किया। हालाँकि इन केमिकल्स को केमिकल वेपन्स कन्वेंशन (CWC) ने बैन कर रखा है। उस समय खुद ISIS प्रमुख अबू बकर अल-बगदादी ने इन केमिकल हथियारों के प्रयोग की मंजूरी दी थी।
ISIS के रासायनिक हथियारों के प्रयोग को तीन चरणों में समझा जा सकता है। पहले चरण में, जून 2014 से जून 2015 के बीच जिहादियों ने पुराने तरीके और आसानी से मिलने वाले इंडस्ट्रियल कैमिकल्स जैसे क्लोरीन और फॉस्फीन का इस्तेमाल किया। उनका मकसद कच्चे आईईडी को तैयार करना था।
ISIS की प्रोपेगेंडा मैगजीन ‘दाबिक’ और ‘रुमियाह’ में लगातार ‘जहर जिहाद’ का प्रचार किया जाता था और अकेले जिहादियों को आसानी से मिलने वाली चीजों से लोगों को मारने के लिए उकसाया जाता था। ISIS ने पारंपरिक तरीके छोड़कर कैमिकल, बायोलॉजिकल, रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर (CBRN) वाले सामानों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना शुरू किया।
दूसरे चरण में जून 2015 से जनवरी 2017 के बीच ISIS जिहादियों ने सल्फर मस्टर्ड एजेंट बनाने और उसे मोर्टार बम तथा रॉकेटों के जरिए गिराने की क्षमता की तकनीक तैयार की।
इस चरण में कैमिकल हमले सीरिया के अलेप्पो प्रांत से लेकर इराक के किर्कुक तक पूरे ‘खलीफाई इलाकों’ में किए गए। अप्रैल 2016 में ऐसे 8 हमले दर्ज हुए। कुल मिलाकर ISIS ने सीरिया और इराक में 37 से ज्यादा कैमिकल हमले किए, जिनमें से कम-से-कम 20 बार क्लोरीन का इस्तेमाल किया गया था।
तीसरे चरण में, आखिरी रिकॉर्डेड कैमिकल हमला 8 जनवरी 2017 को सीरिया में हुआ। मोसुल के जुलाई 2017 में ISIS के हाथ से जाने के बाद उनका कैमिकल हथियार बनाना लगभग बंद हो गया और कैमिकल हमलों का सिलसिला भी थम गया।
फरवरी 2015 में, ब्रिटेन के लिवरपूल से 31 वर्षीय सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर मोहम्मद अली डार्कनेट से राइसिन खरीदने की कोशिश कर रहा था। ऐसा करते हुए पकड़े जाने पर उसे 8 साल की जेल की सजा सुनाई गई।
अली ने ऑनलाइन अपना नाम ‘Weirdos 0000’ रखा था। डार्कनेट पर ‘साइकोकेम’ (Psychochem) नाम के सप्लायर से उसने 500 मिलीग्राम राइसिन के लिए कीमत पर बातचीत की। यह मात्रा 700 से 1400 लोगों को मारने के लिए काफी थी। लेकिन असल में यह सप्लायर FBI एजेंट था जिसने ब्रिटिश पुलिस को सूचना दी।
अली ने दावा किया कि वह सिर्फ कौतूहल के तहत डार्कनेट की सीमाएँ जानना चाहता था। मामला आतंकवादी हमला योजना का साबित नहीं हो सका, लेकिन जहरीले पदार्थ के खरीद के मामले में उसे सजा दी गई थी। अली ने कहा कि उसने टीवी शो ‘Breaking Bad’ देखने के बाद राइसिन के बारे में जाना था और इसे जानवरों पर टेस्ट करना चाहता था।
इसके अलावा ISIS ने जिहादियों को ट्रक या अन्य वाहनों का इस्तेमाल करके घातक हमले किए। 2016 में फ्रांस में हुआ नाइस हमला, जिसमें 86 से अधिक लोग मरे। 2016 में ही बर्लिन में ट्यूनीशियाई नागरिक अनिस अमरी ने हमला किया, जिसमें 12 लोग हताहत हुए।
2017 में लंदन ब्रिज पर एक इस्लामिक आतंकवादी हमला हुआ, जिसमें पाकिस्तानी-ब्रिटिश नागरिक खुर्रम बट, मोरक्को के राशिद रेदौआने और इटली के यूसुफ जघबा ने 8 लोगों की जान ले ली। 2017 में न्यूयॉर्क में उजबेकिस्तान के सयफुल्लो सैपोव ने हमला किया जिसमें 8 लोगों की मौत हुई।
इसी तरह के हमले कर जिहादियों ने बॉयो और टॉक्सिक हथियारों से हमलों को बढ़ावा दिया।
2018 के कोलोन प्लॉट में, एक ट्यूनीशियाई जिहादी सईफ अल्लाह एच ने जर्मनी के कोलोन में अपार्टमेंट में 84 मिलीग्राम राइसिन बनाया था। वह इसे डोर हैंडल पर फैलाने या सिरिंज के जरिए इंजेक्शन लगाने की योजना बना रहा था। वह 2017 में सीरिया जाने की कोशिश कर चुका था लेकिन तुर्की में रोक दिया गया।
वह जर्मन काउंटरटेरेरिज्म एजेंसियों की नजर में तब आया जब सईफ का ट्यूनीशियाई पासपोर्ट गायब हो गया। 2018 में ब्रिटिश खुफिया एजेंसी ने जर्मनी को एक ट्यूनीशियाई निवासी के संदिग्ध ऑनलाइन शॉपिंग के बारे में सूचित किया। सईफ की पत्नी यास्मीन को भी उसके जिहादी रुझानों का पता था।
जून 2018 में सईफ अल्लाह एच को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन तब तक उसने अपने अपार्टमेंट में 84.03 मिलीग्राम राइसिन बना लिया था और 3,150 अरंडी के बीज जमा कर लिए थे।
अक्टूबर 2024 में, 18 वर्षीय आरोपित एक्सेल रुदाकुबाना पर इंग्लैंड के साउथपोर्ट में टेलर स्विफ्ट-थीम वाली डांस क्लास में चाकू से हमले के बाद 3 हत्याओं और 10 हत्या के प्रयास के आरोप लगाए गए।
यूके पुलिस ने रुदाकुबाना के घर की तलाशी ली और वहाँ एक PDF फाइल बरामद की। इसका शीर्षक था ‘Military Studies in the Jihad Against the Tyrants: The Al-Qaeda Training Manual’. इस दस्तावेज़ के मिलने के बाद उस पर आतंकवाद का आरोप भी लगाया गया।
अधिकारी यह भी दावा करते हैं कि रुदाकुबाना ने घातक टॉक्सिन वाला राइसिन जहर बनाया, जिसके कारण उस पर बॉयोवेपन बनाने का आरोप भी लगा है। ISIS पर भारत की कार्रवाई 2014 से जारी: पारंपरिक हथियार और जिहादी पुराने हैं, राइसिन जैव-आतंकी साजिश ने लाई नई परत
2016 में केरल मॉड्यूल का भंडाफोड़ से लेकर 2019 के श्रीलंका ईस्टर बम धमाकों में भारत के लिंक की जाँच, 2022 बिहार टेरर मॉड्यूल, 2023 पुणे आईएसआईएस टेरर मॉड्यूल, 2025 में पुणे, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली में आतंकी हमलों की साजिश रचने वाले जिहादियों को पकड़ने के लिए बहु-राज्य अभियानों से लेकर, 2024 में बेंगलुरु में लश्कर-ए-तैयबा टेरर मॉड्यूल तथा 2025 में दिल्ली में आईएसआईएस से जुड़े टेरर मॉड्यूल तक राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) और प्रत्येक राज्य की एंटी-टेररिज्म स्क्वाड (ATS) आईएसआईएस और अन्य इस्लामी आतंकी संगठनों से जुड़े जिहादियों को गिरफ्तार कर इन मॉड्यूल्स का पर्दाफाश करती आ रही हैं। भारतीय एजेंसियाँ देश में अपनी जड़ें गहरी करने की कोशिश कर रहे विभिन्न इस्लामी आतंकी संगठनों के भर्ती और फाइनेंशियल नेटवर्क को तोड़ रही हैं।
हालाँकि गुजरात एटीएस की ओर से बताए गए जैविक युद्ध (बायो वार) या जैव-आतंकवाद (बायोटेररिज्म) का यह षड्यंत्र काफी चिंताजनक है। आईईडी, गोलीबारी, बम धमाके और इस्लामी कट्टरपंथ के बाद अब भारत को ‘विषैले खतरे’ का सामना करना पड़ रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, गिरफ्तार किए गए आईएसआईएस से जुड़े जिहादियों ने राइसिन (Ricin) का उपयोग करके लोगों को मारने की साजिश रची थी। इसके लिए आतंकवादी गुजरात और अन्य राज्यों में भीड़भाड़ वाले फूड मार्केट और सप्लाई चेन को अपने लक्ष्य के तौर पर देख रहे थे। जिहादियों का मकसद था कि लोगों की खाद्य आपूर्ति में जहर मिलाकर बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या करने की योजना बनाई थी।
हालाँकि सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं और राइसिन जैव-आतंकी साजिश की जाँच जारी है, लेकिन ऐसे मामलों को ‘भटके हुए नौजवानों’ की मूर्खता या शरारत कहकर अनदेखा नहीं किया जा सकता। बल्कि, इस बायोटेररिज्म साजिश का खुलासा देश के लिए आँखें खोलने वाला है ताकि वह समझ सके कि इस्लामी आतंकवादियों से उसे कितने अलग और घातक खतरे मिल रहे हैं।
ये जिहादी कट्टरपंथी, ‘हूर’ पाने की चाह रखने वाले आतंकवादी हैं, जो एन्क्रिप्टेड नेटवर्क के माध्यम से प्रशिक्षित हैं, विज्ञान और तकनीक का उपयोग निर्दोषों की हत्या के लिए हथियार बनाने में कर रहे हैं और सुनियोजित जिहादी इकोसिस्टम इनकी रीढ़ बने हुए हैं।
हालाँकि पारंपरिक विस्फोटक या हथियार जिहादियों के लिए पुरानी रणनीति बने रहेंगे, लेकिन अलग-अलग युद्धों के इस युग में कैमिकल हथियार आसानी से घातक आतंक फैलाने की क्षमता रखते हैं।
राइसिन या सारिन जैसे रासायनिक पदार्थ सामान्य औद्योगिक रसायनों या अरंडी के बीजों से साधारण प्रयोगशालाओं में तैयार किए जा सकते हैं, जिससे यह अकेले या छोटे आतंकी समूहों के लिए सुविधाजनक विकल्प बन जाता है।
कम लागत, बड़े ढाँचे की कम जरूरत और पकड़े जाने की कम संभावना के कारण ये आतंकवादियों की पहली पसंद बनते हैं। इस तरह के हथियार बॉयोवॉर की आशंका बढ़ा देता है। इससे राइसिन जैसे अन्य जैविक हथियार आधारित साजिशें न केवल शांत बल्कि बड़े स्तर पर लोगों को मारने के लिए अनुकूल बन जाते हैं।
ये खबर मूल रूप से श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ।
बिहार विधानसभा चुनाव में मतदान शांतिपूर्ण रहा है। राज्य में कई ऐसे गाँव और कस्बे हैं जहाँ पहली बार वोटिंग हुई। नक्सलप्रभावित इन क्षेत्रों में पहले कोई पोलिंग बूथ नहीं बनाया जाता था। गाँव के लोग नक्सलियों से डर कर वोट डालने दूसरी जगह जाते भी नहीं थे, लेकिन इस बार नजारा बदला दिखा। इन क्षेत्रों में जमकर वोट पड़े और लोगों की लंबी कतारें सुबह से ही देखी गई।
बिहार चुनाव के पहले चरण में मुँगेर का भीमबाँध, तारापुर, लखीसराय का सूर्यगढ़ा, कछुआ, बाँसकुंड जैसे इलाकों में कई ऐसे बूथ रहे, जो कभी नक्सल प्रभावित हुआ करते थे, वहाँ दशकों बाद मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग किया।
दूसरे चरण में जमुई के चोरमारा, गया के पिछुलिया और रोहतास के रेहल गाँव ऐसे ही क्षेत्र थे, जहाँ पहली बार लोगों ने अपने गाँव में ही वोट डाला। जाहिर है लोगों में उत्साह भी गजब का था। इन क्षेत्रों में पहली बार पोलिंग बूथ बनाया गया। गाँव में पार्टियों के समर्थक भी दिखे, जो पहले नक्सली बायकॉट की वजह से गायब रहते थे।
जमुई, गया के कई गाँव में बने पहली बार पोलिंग बूथ
जमुई के बरहट क्षेत्र के चोरमारा गाँव में 1011 एससी-एसटी मतदाता हैं। इनमें 523 महिला और 488 पुरुष वोटर हैं। इनलोगों ने इस बार वोट डाला।
गयाजी के इमामगंज विधानसभा क्षेत्र का पिछुलिया और तारचुआ गाँव भी नक्सलियों का केन्द्र रहा है। तारचुआ गाँव में तो 2024 लोकसभा चुनाव के वक्त पोलिंग बूथ बनाए गए और वोटिंग प्रक्रिया अपनाई गई, लेकिन पिछुलिया गाँव के लोगों ने पहली बार अपने गाँव में वोट डाला।
औरंगाबाद जिले के मदनपुर का बादाम क्षेत्र भी नक्सल प्रभावित रहा है। यहाँ पहली बार बूथ बनाया गया। यहाँ 894 मतदाता हैं। वोट डालने के लिए इनकी लंबी लाइनें सुबह से ही देखी गई। बुजुर्ग से लेकर पहली बार वोट डालने वाले युवा भी काफी उत्साहित थे। गाँव में सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए गए थे।
चुनाव के दौरान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में वोटिंग का टाइम बदला गया। दूसरे चरण में ऐसे 402 मतदान केन्द्र थे। यहाँ सुबह 7 बजे से शाम 4 बजे तक वोट पड़े। जबकि दूसरे क्षेत्रों में शाम 6 बजे तक वोट डाले गए।
रोहतास जिले के रेहल गाँव में 20 साल बाद 11 नवंबर 2025 को वोटिंग हुई। यहां वोटिंग के दौरान की कई तस्वीरें भी सामने आई। सुरक्षा के कड़े इंतजाम के बीच शांतिपूर्ण माहौल में यहाँ वोटिंग हुई ।
मुँगेर से लखीसराय तक कई गाँव में सालों बाद वोट पड़े
पहले चरण में नक्सल प्रभावित मुँगेर के भीमबाँध समेत 7 मतदान केन्द्रों पर 20 साल बाद वोट डाला गया। इन जगहों पर 5 जनवरी 2005 को नक्सली हमले हुए थे। भीमबांध इलाके के पास बारूदी सुरंग विस्फोट कर मुंगेर के SP समेत 7 पुलिसकर्मियों को मार दिया गया था। इसके बाद उन इलाकों से मतदान केंद्रों को हटा दिया गया था।
भीमबाँध तारापुर विधानसभा के तहत आता है। इसके बूथ संख्या 310 पर 170 महिलाएँ और 204 पुरुषों समेत 374 मतदाता हैं। पहले इस क्षेत्र में पोलिंग बूथ नहीं बनाई जाती थी। लोगों को 20 किलोमीटर दूर जाकर वोट डालना पड़ता था। जाहिर है नक्सलियों का डर और दूरी की वजह से लोग वोट डालने नहीं जा पाते थे, लेकिन इस बार लोगों ने मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
इसी तरह बिहार के कछुआ और बासकुंड गाँव के लोगों ने 16 साल बाद मतदान किया। नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण पहले मतदान करना लोगों के लिए संभव नहीं हो पाता था।
लखीसराय जिले के 56 मतदान केंद्र नक्सल प्रभावित हैं। चानन प्रखंड के दो मतदान केंद्र संख्या 407 सामुदायिक भवन कछुआ में 363 मतदाता है। मतदान केंद्र संख्या 417 बासकुंड-कछुआ में 495 मतदाता हैं। नक्सल प्रभावित इन दोनों इलाकों में पहली बार EVM के जरिए मतदान हुए।
इन दोनों मतदान केंद्रों में वोट डालने के लिए मतदाताओं को पहले 6 से 10 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। साथ ही इसके लिए लोगों को जंगल और पहाड़ पार कर पैदल चलना पड़ता था। जाहिर है नक्सलियों के चुनाव बहिष्कार के बीच इनके लिए वोट डालना लगभग असंभव-सा था।
लोकसभा चुनाव 2024 में 5 माओवाद से प्रभावित मतदान केंद्र को बदलकर मैदानी भाग में लाया गया था। लेकिन एक साल के अंदर इसे नक्सल से मुक्त कर दिया गया। चुनाव आयोग ने उन 5 मतदान केंद्रों को उनके मूल स्थान पर स्थापित कर वोट कराया।
इसी तरह लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र के चार गाँवों में भी इस बार पोलिंग बूथ बनाए गए।
8 जिलों में नक्सलवाद का असर
झारखंड से सटे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों जैसे- गया ,अलवर और रोहतास में बॉर्डर पर खास निगरानी की गई, ताकि वोटिंग प्रक्रिया में किसी तरह की दिक्कत न हो।
राज्य के 8 जिले ऐसे हैं, जो नक्सल प्रभावित माने जाते हैं। इनमें गया, औरंगाबाद, मुँगेर, जमुई, कैमूर, लखीसराय, नवादा और रोहतास शामिल है। नक्सल प्रभावित बांका और पश्चिम चंपारण के बगहा को अब नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया है।
बिहार में इस बार दो चरणों में हुए मतदान
बिहार विधानसभा चुनाव इस बार दो चरणों में संपन्न हुए। पहले चरण में 6 नवंबर को 121 सीटों पर मतदान हुआ जबकि 11 नवंबर को 122 सीटों पर मतदान हुआ।
बिहार में पहले 5 से 7 चरणों में भी मतदान होता था। इसकी वजह थी चुनावी हिंसा। लूटपाट, बूथ कैप्चरिंग और बैलेट बॉक्स का ‘जिन्न’। लेकिन पिछले कुछ सालों से यहाँ चुनाव आयोग शांतिपूर्ण मतदान कराने में सफल रहा है। इस बार तो दो चरणों में चुनाव भी कराए गए।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 और भी खास था, क्योंकि 22 साल बाद हुए एसआईआर के माध्यम से यहाँ वोटर लिस्ट अपडेट किया गया।
देश में पहली बार बूथ कैप्चरिंग बिहार में हुआ
देश में पहली बार बूथ कैप्चरिंग की खास घटना 1957 में बिहार के बेगूसराय के रचियाही में हुई थी। घटना की जानकारी दूसरे दिन लोगों को अखबार से लगी। 1957 की इस घटना ने बिहार में राजनीति की दिशा ही बदल दी। राज्य के चुनाव पर माफिया हावी होने लगे। राजनीतिज्ञों और माफियाओं के साँठगाँठ की शुरुआत भी हो गई।
1980 तक आते-आते चुनाव में बाहुबलियों का बोलबाला देखा जाने लगा। हालाँकि देश में चुनाव सुधारों की चर्चा भी होने लगी। 1957 की घटना के बाद चुनाव आयोग ने सुरक्षाबलों की तैनाती पर जोर देना शुरू किया। धीरे-धीरे केंद्रीय बलों की मौजूदगी जरूरी हो गई।
लालू राज में निकलते थे बैलेट बॉक्स से ‘जिन्न’
लालू राज में चुनाव के दौरान बैलेट बॉक्स खुलते ही जिन्न निकलता था। यानी वोट से पहले के माहौल कुछ और बयां करते थे और जीत का सेहरा किसी और के सिर सजता था। बूथ लूट तो आम बात थी।
हत्या, अपहरण की खबरों से पेपर पटे रहते थे। ये वह दौर था, जब चुनाव लोकतंत्र का उत्सव नहीं बल्कि डर और दहशत बन चुका था।। खुलेआम वोटरों को डराया धमकाया जाता था। मतदाताओं के वोट पहले ही पड़ चुके होते थे, उन्हें वापस भेज दिया जाता था।
बिहार चुनाव 2025 इस मामले में खास है कि यहाँ नक्सल प्रभावित जिलों में भी मतदान केन्द्र की व्यवस्था गाँव-गाँव की गई। इस लिहाज से ये चुनाव ऐतिहासिक रहा। डर से परे लोगों ने अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल किया। दशकों बाद अपने गाँव के बूथ पर वोट डालने की खुशी साफ दिखाई दी। जाहिर है उत्साह भी था। इसका भी असर रहा कि वोटिंग प्रतिशत ने पुराने आँकड़े पार कर दिए।
बिहार में ऐतिहासिक चुनाव का श्रेय मोदी सरकार की नक्सल विरोधी अभियानों और कोशिशों को जाता है, जिसकी वजह से नक्सलवाद अब कुछ जिलों में सिमट कर रह गई है। बड़े बड़े ईनामी नक्सली हथियार डाल रहे हैं। मुख्य धारा में शामिल हो रहे हैं। बिहार में वोटिंग की ‘गूँज’ नक्सली दहशत खत्म होने का सबसे बड़ा सबूत है।
दिल्ली के लाल किले के पास सुनहरी मस्जिद के करीब सोमवार (10 नवंबर 2025) शाम जबरदस्त धमाका हुआ। एक सफेद i-20 कार में हुआ यह विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि 8 लोगों की मौत हो गई और 20 से अधिक घायल हुए। यह धमाका इतना जोरदार था कि आसपास खड़ी कई गाड़ियाँ जलकर खाक हो गईं। पुलिस को घटनास्थल से एक हाथ बरामद हुआ, जिसके DNA की जाँच से हमलावर की पहचान की जा रही है।
शुरुआती जाँच में सामने आया कि कार को डॉ मोहम्मद उमर नाम का संदिग्ध चला रहा था, जो फरीदाबाद के आतंकी मॉड्यूल से जुड़ा था। इस धमाके के बाद सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हो गई हैं और लाल किला 3 दिनों के लिए बंद कर दिया गया है। लाल किला ब्लास्ट की जाँच गृह मंत्रालय ने NIA को सौंप दी है। अभी तक इस मामले की जाँच दिल्ली पुलिस कर रही थी।
कश्मीर में लगे कुछ पोस्टर बने आतंक की जाँच की शुरुआत
यह पूरी कहानी एक छोटी-सी लगने वाली लेकिन बेहद अहम घटना से शुरू हुई। श्रीनगर के नौगाम इलाके में दीवारों पर लगे धमकी भरे पोस्टरों से। अक्टूबर 2019 के बाद पहली बार अक्टूबर 2025 में ऐसे पोस्टर दिखे, जिनमें जैश-ए-मोहम्मद के नाम से सुरक्षा बलों को खुली धमकियाँ दी गई थीं। उस समय इलाके में सामान्य शांति थी, इसलिए अचानक ऐसे पोस्टरों का सामने आना पुलिस के लिए असामान्य संकेत था।
श्रीनगर के SSP जी वी सुनीप चक्रवर्ती ने तुरंत जाँच के आदेश दिए, जिन्होंने इससे पहले कई बड़ी आतंकी कार्रवाइयों को विफल किया था। पुलिस टीमों ने इलाके की CCTV फुटेज खंगालनी शुरू की और कुछ ही दिनों में तीन ऐसे चेहरों की पहचान हुई जो पहले पत्थरबाजी और भड़काऊ गतिविधियों में शामिल रह चुके थे। इन्हीं तीन ओवरग्राउंड वर्करों (OGWs) की गिरफ्तारी ने एक ऐसी कड़ी को खोला, जिसने धीरे-धीरे एक गहरे आतंकी नेटवर्क की परतें उजागर कर दीं।
जो शुरुआत में सिर्फ कुछ पोस्टर लगने की मामूली घटना लग रही थी, वही अब देश के भीतर फैले एक मल्टी-स्टेट आतंकी मॉड्यूल का शुरुआती सुराग बन चुकी थी। ऐसा नेटवर्क, जो कश्मीर से हरियाणा और दिल्ली तक अपनी जड़ें फैला चुका था।
मौलवी इरफान से खुला आतंकी साजिश का जाल
ओवरग्राउंड वर्करों (OGWs) की गिरफ्तारी के बाद जब पुलिस ने पूछताछ शुरू की, तो जाँच की दिशा शोपियाँ के मौलवी इरफान अहमद तक जा पहुँची। यही वह कड़ी थी, जिसने पूरे आतंक नेटवर्क का दरवाजा खोल दिया। इरफान कोई आम व्यक्ति नहीं था, वह स्थानीय मस्जिद में मौलवी था और मजहब के नाम पर युवाओं को कट्टरपंथ की राह पर मोड़ने का काम करता था।
तीन हफ्तों तक चली गहन पूछताछ में यह सामने आया कि इरफान का सीधा संबंध जैश-ए-मोहम्मद (JeM) और अंसार गजवत-उल-हिंद (AGH) जैसे पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों से था। इरफान के मोबाइल फोन से पुलिस को कई चौंकाने वाले सबूत मिले, जिनमें पाकिस्तान में बैठे जैश के आतंकी उमर बिन खत्ताब के टेलीग्राम चैनल से सीधा संपर्क शामिल था।
यही डिजिटल सबूत वह धागा साबित हुआ, जिसने जाँच एजेंसियों को एक ऐसे ‘व्हाइट कॉलर टेरर नेटवर्क‘ तक पहुँचा दिया, जो बाहर से शिक्षित और सभ्य दिखने वाले डॉक्टरों, मौलवियों और प्रोफेशनल्स की आड़ में देश के भीतर गहरी साजिश रच रहा था। इस खुलासे ने सुरक्षा एजेंसियों को झकझोर दिया, क्योंकि अब तक आतंक की परिभाषा बंदूकों और जंगलों तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन यहाँ आतंक ‘डॉक्टरों के लैब कोट’ और ‘मौलवियों के उपदेश’ की ओट में पल रहा था।
डॉक्टरों की दुनिया में छिपा आतंक
मौलवी इरफान अहमद से मिली जानकारी ने पुलिस को एक चौकाने वाली दिशा दी। 3 पढ़े-लिखे डॉक्टरों तक पहुँचाया, जो अपने पेशे का पर्दा डालकर आतंक के असली मंसूबों में लिप्त थे। ये डॉ मुजम्मिल शकील (पुलवामा), डॉ आदिल अहमद राठर (कुलगाम) और डॉ शाहीना शाहिद (लखनऊ) थे।
पूछताछ में सामने आया कि ये डॉक्टर सिर्फ मरीजों का इलाज नहीं कर रहे थे, बल्कि उन्होंने आतंकियों के लिए हथियार और बम बनाने की सामग्री जुटाने में सक्रिय मदद की थी। खुद को मेडिकल प्रोफेशनल दिखाकर उन्होंने लोगों का विश्वास हासिल किया और किसी को शक होने से बचाया।
इन सभी का तार हरियाणा के फरीदाबाद में स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़ा था। यही वह जगह थी, जहाँ से पुलिस ने अब तक के सबसे बड़े विस्फोटक जखीरे में से एक बरामद किया। लगभग 2,900 किलो अमोनियम नाइट्रेट, हथियार और बम बनाने की सामग्री, जो दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में बड़े हमलों की योजना का हिस्सा हो सकती थी। यह खुलासा साफ कर देता है कि कैसे आतंक अब सिर्फ संघर्ष क्षेत्रों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा और पेशेवर संस्थानों के भीतर भी छिपकर काम कर रहा है।
यूनिवर्सिटी से आतंक की लैब तक: शिक्षा का काला इस्तेमाल
जाँच में सामने आया कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी में कार्यरत डॉ मुजम्मिल शकील ने अपने पेशेवर माहौल का दुरुपयोग किया। उसने यूनिवर्सिटी की लैब उपकरणों और रिसर्च सामग्री का इस्तेमाल विस्फोटक तैयार करने के लिए किया। दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट में कहा गया कि यूनिवर्सिटी में छिपाए गए RDX के सैंपल्स प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किए गए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह तैयारी सिर्फ थिएरेटिकल नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप से भी चल रही थी।
साथ ही, पहले अनंतनाग मेडिकल कॉलेज में कार्यरत डॉ आदिल अहमद राठर को सहारनपुर से गिरफ्तार किया गया। उसके कॉलेज लॉकर की तलाशी में AK-47 राइफल और कारतूस बरामद हुए। यह दर्शाता है कि इन डॉक्टरों ने स्वयं को मेडिकल प्रोफेशनल के रूप में छुपाकर, आतंक के लिए उपकरण और हथियार इकट्ठा किए, जिससे यह नेटवर्क पूरी तरह से शहरी और पेशेवर ढाँचे में घुसपैठ कर चुका था।
फरीदाबाद में बरामद 2,900 किलो विस्फोटक
जब पुलिस की टीम फरीदाबाद के धौज और फतेहपुर टगा गाँव में छापेमारी के लिए पहुँची, तो उन्हें वहाँ एक ऐसा खौफनाक जखीरा मिला कि सभी दंग रह गए। इन दो घरों से कुल 2,900 किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट बरामद हुआ, जो बड़े पैमाने पर विस्फोटक बनाने के लिए इस्तेमाल होता है।
सिर्फ इतना ही नहीं, पुलिस ने 20 टाइमर, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट, तार, रिमोट कंट्रोल, बैटरियाँ और धातु की चादरें भी जब्त कीं। ये सभी सामान IED तैयार करने में काम आते हैं, यानी किसी भी बड़े हमले की योजना के लिए पूरी तरह से तैयार सामग्री थी।
इसके अलावा, एक घर से AK-56 राइफल, क्रिंकोव राइफल, चीनी पिस्तौल और बरेटा गन जैसे भारी हथियार भी मिले। जाँच में पता चला कि यह पूरा मॉड्यूल पाकिस्तान स्थित आतंकियों के निर्देशों पर काम कर रहा था और इसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी। इस खुलासे ने साफ कर दिया कि आतंक अब सिर्फ जंगली इलाकों या संघर्ष क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी और शिक्षित माहौल में भी चुपचाप जाल बुन रहा है।
जाँच के बाद गिरफ्तारी का सिलसिला
मौलवी इरफान अहमद और तीन डॉक्टरों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की कार्रवाई और व्यापक हुई। जम्मू-कश्मीर और हरियाणा के अलग-अलग स्थानों से 8 और लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें आरिफ निसार, यासिर-उल-अशरफ, मकसूद अहमद, और जमीर अहमद आहंगर उर्फ मुतलशा शामिल थे।
जाँच में यह भी सामने आया कि मुतलशा एक पैन-इंडिया चैट ग्रुप ‘फर्जंदान-ए-दारुल उलूम देवबंद’ का सक्रिय सदस्य था। यह ग्रुप ऑनलाइन युवाओं को जिहाद के लिए मानसिक रूप से प्रेरित और कट्टरपंथ की ओर मोड़ने का काम करता था। सभी गिरफ्तार आरोपितों को UAPA की धारा 16 और 18 के तहत न्यायिक हिरासत में भेजा गया, जिससे यह नेटवर्क पूरी तरह से न्यायिक नियंत्रण में आ गया।
दिल्ली तक कैसे पहुँची साजिश
जाँच में सामने आया कि फरीदाबाद से सटे इलाकों में विस्फोटक तैयार किए जा रहे थे और इन्हें दिल्ली में लाने की तैयारी थी। पुलिस को शक है कि इस नेटवर्क का मकसद दिल्ली या एनसीआर में बड़ा ब्लास्ट कराना था, ताकि सांप्रदायिक तनाव फैल सके। धौज में बरामद सामग्री से अनुमान है कि विस्फोटक पिछले दो वर्षों में धीरे-धीरे जुटाए गए थे।
फॉरेंसिक टीम ने मौके से मिले अवशेषों में अमोनियम नाइट्रेट फ्यूल ऑयल की मौजूदगी की पुष्टि की। यह वही केमिकल है जो फरीदाबाद में जब्त किए गए विस्फोटकों में भी पाया गया था। NIA और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल अब यह जाँच कर रही है कि क्या यह आत्मघाती हमला (फिदायीन ऑपरेशन) था।
क्या था मकसद और आगे का खतरा
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि डॉ उमर ने यह विस्फोट ‘घबराहट में किया गया हमला’ था। शक है कि फरीदाबाद में छापेमारी और डॉ मुजम्मिल की गिरफ्तारी के बाद उसने जल्दबाज़ी में धमाका कर दिया, ताकि साजिश उजागर होने से पहले कोई ‘प्रभावी वार’ किया जा सके। हालाँकि एजेंसियाँ यह भी जाँच कर रही हैं कि क्या दिल्ली मूल लक्ष्य थी, या यह धमाका किसी और बड़ी योजना का हिस्सा था।
ISIS-India की खौफनाक साजिश: खाना-पानी में जहर घोलने का प्लान
इसके अलावा, गुजरात ATS ने एक खौफनाक साजिश का पर्दाफाश करते हुए तीन आरोपितों ‘कैराना के आजाद सुलेमान शेख (20), लखीमपुर के मोहम्मद सुहैल (23) और एक डॉक्टर को गिरफ्तार किया था, जिन पर खाने-पीने की वस्तुओं में घातक जहर (रिसिन) मिलाकर बड़े पैमाने पर लोगों को मारने और दहशत फैलाने का आरोप है।
उनके निशाने में एक RSS कार्यालय, दिल्ली का आजाद मार्केट और अहमदाबाद का फल बाजार थे और छापे में तीन पिस्तौल, 30 कारतूस और ज़हर बनाने में काम आने वाला अरंडी का तेल बरामद हुआ है। जाँच में यह नाता भी मिला है कि गिरोह ISIS-KP से जुड़ा था और उसे पाकिस्तानी हैंडलर ‘अब्दुल खदीजा’ से टेलीग्राम के जरिए निर्देश मिलते थे, इस समूह का नेटवर्क यूपी, राजस्थान, गुजरात और आंध्र प्रदेश तक फैला पाया गया है और अब ATS साइबर फोरेंसिक से मोबाइल-लैपटॉप की पड़ताल कर संदेश-लेनदेन और धन के स्रोत का पता लगा रही है क्योंकि खाने-पीने में जहर मिलाना छिपकर व्यापक नुकसान और सार्वजनिक भय पैदा करने की नीति है।
यह पूरी कहानी बताती है कि कैसे एक छोटा-सा सुराग, कुछ दीवारों पर चिपके पोस्टर, देश की सुरक्षा एजेंसियों को एक ऐसे आतंकी नेटवर्क तक ले गया जो डॉक्टरों, मौलवियों और पढ़े-लिखे पेशेवरों के रूप में काम कर रहा था। इन लोगों ने ‘ज्ञान’ और ‘सेवा’ के नाम पर आतंक फैलाने की योजना बनाई थी।
अगर फरीदाबाद और कश्मीर में समय रहते छापेमारी न होती, तो दिल्ली एक बहुत बड़े हमले का शिकार हो सकती थी। फिलहाल, जाँच जारी है और देश की सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हैं, ताकि कोई और ‘व्हाइट कॉलर आतंकी’ समाज के भीतर से फिर न उभरे।