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30 दिन में खुफिया एजेंसियों ने आतंक के 8 बड़े मंसूबों पर पानी फेरा, देश भर से पकड़े गए आतंकी: 3000+ किलो बारूद-RDX-IED जब्त, बड़ी तबाही की थी तैयारी

भारतीय खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे देश में 8 बड़े आतंकी साजिशों को बीते 30 दिनों में नाकाम किया है। इसके बावजूद दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास हुए धमाके ने यह सबक दिया कि एक छोटी सी चूक भी आतंकियों के लिए विनाश लाने का मौका साबित हो सकती है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो बीते एक महीने में लगभग 3000 किलो से अधिक मात्रा के विस्फोटक, 20 लाख रुपए आईईडी बनाए जाने वाले सामान, बंदूकें, पिस्तौल, कारतूस, कई लीटर अरंडी का तेल- जिससे राइसिन जहर बनाया जाता है और आतंकियों के काम आने वाली कई अन्य चीजें जब्त की हैं।

खुफिया एजेंसियों के लगातार धर पकड़ के चलते ऐसा अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोफ्त में आकर आतंकियों ने लाल किला धमाका अंजाम दिया। आईए जानते हैं देश के किन हिस्सों से सुरक्षा एजेंसियों ने आतंकियों को पड़कर देश को सुरक्षित करने में अपनी भूमिका निभाई।

दिल्ली NCR से मिला 2,900 किलो विस्फोटक

10 नवंबर को दिल्ली-एनसीआर, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा पुलिस ने फरीदाबाद से 2,900 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद की। इसमें अमोनियम नाइट्रेट, पोटैशियम नाइट्रेट और सल्फर (गंधक) शामिल थे।

इस मामले में डॉ. मुज़म्मिल गनई और डॉ. आदिल को गिरफ्तार किया गया। बरामद सामग्री से सैकड़ों IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) बनाए जा सकते थे। इनसे कई जगहों पर बड़े पैमाने पर धमाके किए जा सकते थे। यह बरामदगी सीधे तौर पर दिल्ली के लाल किला धमाके से जुड़ी बताई जा रही है।

गांधीनगर में ISIS मॉड्यूल का भंडाफोड़

ब्लास्ट से ठीक दो दिन पहले, 8 नवंबर 2025 को गुजरात एटीएस ने गांधीनगर में एक बड़े ISIS मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया था। इसमें तीन आतंकियों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें एक एमबीबीएस डॉक्टर अहमद मोहियुद्दीन सैयद भी शामिल है।

इन लोगों के पास से सुरक्षा एजेंसियों को 2 Glock पिस्तौल, 1 Beretta पिस्तौल, 30 कारतूस और 4 लीटर कैस्टर ऑयल (अरंडी का तेल) मिला। अरंडी के तेल से ISIS समेत दुनिया भर के कई आतंकी संगठन घातक राइसिन जहर बनाने पर प्रयोग कर रहे हैं।

राइसिन जहर सायनाइड से भी ज्यादा खतरनाक है। इसे खाने और इंजेक्शन के साथ साथ हवा के जरिए भी फैलाया जा सकता है। राइसिन की बेहद छोटी सी मात्रा बड़े पैमाने पर लोगों को मारकर तबाही मचा सकती है।

यह मॉड्यूल ISI के समर्थन से काम कर रहा था और और ISIS-खुरासान प्रांत (ISKP) से इसे अलग-अलग निर्देश मिल रहे थे। हथियारों की सप्लाई ड्रोन के जरिए सीमा पार से की जा रही थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन आतंकियों ने दिल्ली व अहमदाबाद सहित कई शहरों में हमलों की योजना बनाई थी। इसके लिए उन्होंने दिल्ली, लखनऊ और अहमदाबाद में RSS कार्यालय और भीड़भाड़ वाले बाजारों की रेकी तक की थी।

राजस्थान ATS ने पकड़ा TTP का आतंकी

7 नवंबर 2025 को राजस्थान एटीएस ने सांचोर, जालौर से मौलवी ओसामा उमर को गिरफ्तार किया। वह पिछले 4 वर्षों से अफगानिस्तान से जुड़े आतंकी संगठन तेहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के शीर्ष कमांडरों से संपर्क में था।

ओसामा युवाओं को कट्टरपंथी बना रहा था और दुबई के रास्ते अफगानिस्तान भागने की फिराक में था। इसी दौरान खुफिया एजेंसियों ने जालौर, बाड़मेर, जोधपुर और करौली में छापेमारी कर चार अन्य लोगों को भी हिरासत में लिया गया है।

स्पेशल सेल ने किया ISIS- आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश

24 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने एक ISIS-प्रेरित आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश किया। इसमें दिल्ली और भोपाल के रहने वाले अदनाना नाम के दो आतंकियों को गिरफ्तार किया गया।

वे IED धमाका और फिदायीन (आत्मघाती) हमला करने की तैयारी में थे और राजधानी के भीड़भाड़ वाले इलाकों को निशाना बना रहे थे। जाँच के दौरान हथियार और गोला-बारूद भी बरामद किए गए। अदनान खान चार्टर्ड अकाउंटेंसी ( CA) की पढ़ाई कर रहा था।

साथ ही वह गुपचुप तरीके से ऑनलाइन आतंकी गतिविधियों में शामिल था। रिपोर्ट्स में खुलासा हुआ कि वह ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ नामक एक व्हाट्सएप ग्रुप चलाता था।जाँच में पता चला कि वे सीरिया-आधारित ISIS हैंडलर अबू इब्राहिम अल-कुरैशी से सोशल मीडिया (Instagram) के जरिए जुड़े हुए थे।

आंध्र प्रदेश पुलिस ने किया स्लीपर सेल्स नेटवर्क को ध्वस्त

17 अक्टूबर 2025 को आंध्र प्रदेश पुलिस ने उत्तर प्रदेश के अमरोहा से सज्जाद हुसैन और महाराष्ट्र के मालेगाँव से तौफीक आलम शेख को आतंकवादी नेटवर्क से जुड़े होने के आरोप में गिरफ्तार किया।

पुलिस की ये कार्रवाई एक व्यापक अभियान का हिस्सा थी, जिसका उद्देश्य ISIS-प्रेरित नेटवर्क और पैन-इंडिया स्लीपर सेल्स को ध्वस्त करना था। जाँच में सामने आया कि दोनों आरोपित पाकिस्तान-आधारित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) से जुड़े व्हाट्सऐप ग्रुप्स और चैनलों के सक्रिय सदस्य थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, ये दोनों आतंकी युवाओं को कट्टरपंथी बनाने की कोशिश कर रहे थे। दोनों पाकिस्तान जाकर सैन्य प्रशिक्षण लेने और भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने की योजना बना रहे थे। इससे पहले पुलिस ने धर्मवरम से JeM नेटवर्क से जुड़े कोटवाल नूर मोहम्मद को भी गिरफ्तार किया था।

पंजाब से हथियारों के साथ धरे गए अपराधी

15 अक्टूबर को पंजाब पुलिस ने एक क्रॉस-बॉर्डर हथियार और नशा तस्करी नेटवर्क का पर्दाफाश किया। इस दौरान अमृतसर से 28 साल के रजन उर्फ सागर, फाजिल्का से 24 साल के सुरिंदर सिंह उर्फ पाली और तरन तारन जिले से 25 साल के जगजीत सिंह को गिरफ्तार किया गया।

पुलिस को बरामदगी में 10 आधुनिक पिस्तौलें मिलीं। इनमें 4 ग्लॉक 9mm और 6 .30 बोर पिस्तौल के साथ 500 ग्राम अफीम शामिल थी। यह गिरोह पाकिस्तान-आधारित हैंडलरों से जुड़ा था और पंजाब में अपराधियों व गैंगस्टरों को हथियार सप्लाई कर रहा था।

महाराष्ट्र ATS ने युवाओं को कट्टरपंथी बना रहा आतंकी गिरफ्तार

28 अक्टूबर को महाराष्ट्र एटीएस ने पुणे के कोंढवा क्षेत्र से 33 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर जुबेर हांगरगेकर को गिरफ्तार किया। वह अल-कायदा से जुड़ा प्रचार साहित्य रखता था और युवाओं को कट्टरपंथी बना रहा था।

उसके लैपटॉप से अल-कायदा से जुड़े प्रचार के सामान और फॉरेंसिक जाँच में कई कट्टरपंथी सामग्री मिली। जुबेर का संबंध उन आरोपितों से भी था जिन्हें 2023 में मुंबई, पुणे और गुजरात में बम धमाकों की साजिश के आरोप में पकड़ा गया था। उसे UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत बुक किया गया।

2.5 किलो RDX के साथ पंजाब पुलिस ने पकड़े 2 आतंकी

9 अक्टूबर 2025 को पंजाब पुलिस की काउंटर इंटेलिजेंस यूनिट ने जालंधर से दो आतंकियों गुरजिंदर सिंह और दीवान सिंह को गिरफ्तार कर 2.5 किलो RDX से लैस IED और रिमोट कंट्रोल बरामद किया।

यह मॉड्यूल यूके-आधारित हैंडलर निशान जौरियन और अदेश जमराई संचालित कर रहे थे। इसके बारे में हर जानकारी BKI मास्टरमाइंड हरविंदर सिंह रिंदा दे रहा था। बरामद IED का इस्तेमाल बड़े आतंकी हमले के लिए किया जाना था।

सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता ने बचाई लाखों जिंदगियाँ

कुल मिलाकर कहा जा सकता है की सुरक्षा एजेंसियों की सफल कोशिशों ने आतंकियों के दिलों दिमाग पर इस कदर हमला किया है कि उनके हर मंसूबे लगभग पस्त हो रहे हैं। इसके चलते उनके बौखलाहट दिल्ली धमाकों की तरह बाहर आई है।

आतंकवादियों का उद्देश्य होता है- विनाश। इसके लिए वे कभी किसी माल को निशाना बनाते हैं तो कभी किसी बाजार वाली जगह पर, या फिर किसी सार्वजनिक जगह पर जहाँ परिवार एक साथ खुशियाँ मानने और यादें संजोने आते हैं।

यह सुरक्षा एजेंसियों की ही सतर्कता और तेजी थी जिसके चलते देश भर के अलग-अलग हिस्सों में छुपकर बैठे आतंकियों और स्लीपर सेल्स को न केवल पकड़ा जा सका पर साथ ही विनाशकारी धमाके करने वाले सामग्रियों को भी जब्त किया गया।

आतंकियों का सिर्फ एक ही मकसद है- किसी भी हाल में देश के लोगों को आहत करना और इसके लिए उन भीड़भाड़ वाले इलाकों में वे नाम, जाति, धर्म या रंग को नहीं देखते, बस अपने मकसद को जहन में रखते हैं।

अगर यह सुरक्षा एजेंसियां समय पर अपना काम नहीं कर रही होतीं तो दिल्ली धमाके से भी बहुत बड़ा कुछ हो चुका होता और हम उसे पर आंसू बहा रहे होते।

डॉक्टर अहमद मोहिउद्दीन निकला रिसिन जहर का मास्टरमाइंड, गुजरात ATS ने हैदराबाद से पकड़ा: केमिकल के साथ ISKP हैंडलर गिरफ्तार

गुजरात एटीएस (Anti-Terrorist Squad) ने 11 और 12 नवंबर को हैदराबाद के डॉक्टर अहमद मोहिउद्दीन सैयद के घर पर छापा मारा। यह कार्रवाई ‘रिसिन टेरर साजिश’ की जाँच के तहत की गई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एटीएस टीम ने डॉक्टर के राजेंद्रनगर स्थित फ्लैट से कुछ अज्ञात केमिकल और कच्चा माल बॉक्सों में भरकर जब्त किया। इस दौरान साइबराबाद पुलिस दूर से नजर रखे हुए थी।

डॉक्टर अहमद मोहिउद्दीन सैयद इस जैविक (बायो) टेरर साजिश का मुख्य आरोपित है। जाँच में सामने आया है कि उसका घर एक तरह का वर्कशॉप बन चुका था, जहाँ वह रिसिन नामक घातक केमिकल पर काम कर रहा था। जब्त की गई सामग्री को अब फॉरेंसिक साइंस लैब में जाँच के लिए भेजा गया है।

पूछताछ में आरोपित ने बताया कि वह अभी तक अरंडी के बीजों (Castor beans) से रिसिन टॉक्सिन को पूरी तरह निकाल नहीं पाया था और न ही उसने हमले का तरीका तय किया था।

जाँच एजेंसियाँ अब 2018 में जर्मनी के कोलोन शहर में हुई रिसिन बम साजिश का भी अध्ययन कर रही हैं, जिसमें एक कट्टरपंथी दंपती ने रिसिन तैयार किया था, लेकिन हमले से पहले ही पकड़े गए थे। वहीं, राजेंद्रनगर पुलिस का कहना है कि उन्हें इस गिरफ्तारी की जानकारी तभी मिली जब गुजरात पुलिस ने आधिकारिक रूप से इसकी घोषणा की।

कौन हैं डॉ अहमद मोहिउद्दीन सैयद?

जानकारी के मुताबिक, डॉक्टर अहमद मोहिउद्दीन सैयद एक जनरल फिजिशियन हैं। इसका निकाह नहीं हुआ हैं और हैदराबाद के राजेंद्रनगर स्थित फोर्ट व्यू कॉलोनी में असद मंजिल अपार्टमेंट की एक फ्लैट में अकेले रहता था। सैयद ने अपनी MBBS की पढ़ाई चीन से की थी और मरीजों को इंटरनेट पर मुफ्त परामर्श देता था। वह किसी अस्पताल या क्लिनिक से जुड़ा नहीं था। इसके अलावा, वह एक ऑनलाइन फूड बिजनेस का पार्टनर भी था।

सैयद छह भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं। उसका परिवार तेलंगाना के खम्मम का रहने वाला है। उसे अपनी इंटरमीडिएट (कक्षा 11-12) की पढ़ाई हनमकोंडा में पूरी की जो वारंगल के पास है।

वह 2007 में चीन MBBS की डिग्री लेने गया था और 2012–13 में भारत लौटने के बाद कुछ समय खम्मम में रहा। इसके बाद वो राजेंद्रनगर के फ्लैट में रहने लगे। बताया जाता है कि वहाँ उसकी एक होटल मालिक से दोस्ती हुई और दोनों ने मिलकर एक ऑनलाइन फूड जॉइंट शुरू किया, जो ऐप्स के जरिए सैंडविच और शावरमा बेचता था।

हालाँकि, जब स्थानीय पुलिस ने उसके पार्टनर से पूछताछ की, तो उसने सैयद की हिस्सेदारी के बारे में कोई जानकारी नहीं दी। गुजरात ATS के अनुसार, जब सैयद के भाई उमर फारूकी से संपर्क किया गया, तो उसने बताया कि सैयद एक बिजनेस डील फाइनल करने के लिए गुजरात गया था।

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, परिवार ने सैयद से उन पार्सलों के बारे में सवाल भी किए थे जो अक्सर उसके पास आते थे और जिनमें जहरीले पदार्थ होते थे। इस पर सैयद ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि वह एक ऐसी दवा बना रहा हैं जिससे परिवार अमीर हो जाएगा।

राजेंद्रनगर पुलिस अधिकारी ने बताया कि फारूकी के अनुसार, यह परिवार लगभग 20 साल पहले हैदराबाद आया था। पहले वे मेहदीपट्टनम में रहे, फिर टोलिचौकी चले गए। करीब चार साल पहले परिवार ने अपरपल्ली इलाके में भाइयों और अन्य सदस्यों के लिए अलग-अलग फ्लैट खरीदे।

आतंकी साजिश की जड़ तक पहुँच रही गुजरात ATS

गुजरात ATS की जाँच में पता चला है कि डॉक्टर अहमद मोहिउद्दीन सैयद के पास से कैस्टर ऑयल (अरंडी का तेल) बरामद हुआ है। इसके अलावा उसने जो सामग्री खरीदी थी, उनके स्रोत और उनके ChatGPT व सर्च इंजन पर की गई खोजों के सबूत भी ATS को मिले हैं। यही दो प्रमुख कारण हैं, जिनसे अधिकारियों को यह शक हुआ कि सैयद किसी बायोटेरर (जैविक आतंकी) साजिश में शामिल था।

रविवार (9 नवंबर 2025) को गुजरात ATS ने बताया कि सैयद एक संदिग्ध आतंकी गिरोह का हिस्सा था और रिसिन नामक घातक रासायनिक पदार्थ का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर हमला करने की योजना बना रहा था। ATS के अनुसार, उसका हैंडलर अबू खालिदा, जो अफगानिस्तान में स्थित इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP) से जुड़ा है, उसे निर्देश दे रहा था।

ATS ने इस मामले में दो और युवकों को गिरफ्तार किया है, शामली के 20 साल का दर्जी आजाद सुलेमान शेख और लखीमपुर खीरी का 23 साल का छात्र मोहम्मद सुहैल मोहम्मद सलीम खान को बनासकांठा से हिरासत में लिया गया। इन तीनों पर आर्म्स एक्ट, भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita) और UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत केस दर्ज किया गया है।

जानकारी के मुताबिक, ATS की टीमें अब आरोपितों के घरों और उन सभी स्थानों पर जाएँगी जहाँ उन्होंने हमले की साजिश के दौरान आना-जाना किया था। इसके लिए अधिकारी लखीमपुर खीरी और शामली भी जाएँगे।

एक अधिकारी के अनुसार, पूछताछ में आरोपितों ने बताया कि वे अभी तक रिसिन को पूरी तरह अलग  नहीं कर पाए थे और हमले का तरीका तय नहीं किया था। उनका कहना था कि जब रिसिन तैयार हो जाता, तब ही हमले की विधि तय की जाती। गुजरात ATS अब इस गिरोह के अन्य संभावित सदस्यों की तलाश में जुटी है।

रिसिन के जरिए हिंदुओं को निशाना बनाने की आतंकी साजिश

गुजरात ATS ने अहमदाबाद–मेहसाणा रोड पर स्थित अडालज टोल प्लाजा के पास एक सिल्वर फोर्ड फिगो कार को रोककर डॉक्टर अहमद मोहिउद्दीन सैयद को गिरफ्तार किया, जिससे रिसिन टेरर साजिश का भंडाफोड़ हुआ। SP के सिद्धार्थ की ATS टीम ने कार से दो ग्लॉक पिस्तौल, एक बेरेटा हैंडगन, 30 जिंदा कारतूस और 10 लीटर के कंटेनर में रखे लगभग 4 लीटर कैस्टर ऑयल बरामद किया।

सैयद से मिले डिजिटल उपकरणों की फॉरेंसिक जाँच के आधार पर ATS ने दो और आरोपितों को गिरफ्तार किया। जाँच में सामने आया कि ये दोनों युवक राजस्थान में भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास एक डेड ड्रॉप स्थान से हथियार और कारतूस उठाकर सैयद तक पहुँचाते थे।

ATS को यह भी पता चला है कि आरोपित पाकिस्तान के कई लोगों से संपर्क में था और उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दफ्तरों समेत कई धार्मिक और संगठनात्मक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ के पैटर्न का निरीक्षण किया था। पिछले छह महीनों में उसने अहमदाबाद के नारोदा फल मंडी और दिल्ली के आज़ादपुर कृषि उपज मंडी (APMC) जैसे भीड़भाड़ वाले इलाकों की भी रेकी की थी।

पाँच वक्त का नमाजी था आतंकी मुजम्मिल, अल-फलाह यूनिवर्सिटी की मस्जिद जाता था: इमाम इश्तियाक ने अपने घर में दी थी पनाह

दिल्ली लाल किले के सामने 10 अक्टूबर 2025 की शाम को हुए i-20 कार धमाके की घटना को केन्द्र सरकार ने आतंकी साजिश माना है। घटना के बाद से ही फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी जाँच के घेरे में है, क्योंकि इसी यूनिवर्सिटी से तीन आतंकी डॉक्टरों को गिरफ्तार किया गया है। इतना ही नहीं बीते दिन 800 पुलिस कर्मियों ने यूनिवर्सिटी और इसके आस-पास के इलाकों में सर्च ऑपरेशन चलाकर करीब 12 लोगों को हिरासत में लिया है।

लाल किले के सामने हुए कार धमाके के बाद ऑपइंडिया की टीम फरीदाबाद के उस धौज गाँव पहुँची, जहाँ अल-फलाह यूनिवर्सिटी मौजूद है। शाम का समय था हम धौज गाँव की सबसे बड़ी मस्जिद के बाहर खड़े थे। इस दौरान हमने आतंकी डॉक्टर मुजम्मिल और अल-फलाह यूनिवर्सिटी को लेकर गाँव के लोगों से बात की तो अधिकाँश लोगों ने हमारे कैमरे के सामने बोलने से बचने या फिर घटना के संबंध में कोई जानकारी नहीं कहकर दूरी बना ली।

कुछ लोगों ने हमसे बात की। इनमें मस्जिद के सामने अल्लाह की माला जपते हुए हाजी कासिम ने कहा, “मुझे घटना के बारे में कोई जानकारी नहीं है, मैं मस्जिद में रहता हूँ। हमें नहीं पता कहाँ कितने लोग मारे गए। हम सिर्फ मस्जिद में अल्लाह-अल्लाह करते हैं।”

आमीन ने कहा, “ये बहुत ही गलत हुआ है जिसने भी किया है उसे सजा मिलनी चाहिए।” आगे मस्जिद से नमाज पढ़कर निकले मोहम्मद इकबाल ने कहा, “मुझे घटना के संबंध में कोई जानकारी नहीं है। मैं तो पासपोर्ट का वेरिफिकेशन कराने के लिए आया हूँ। पुलिस ने सही काम किया है। कानून अपना काम करे।”

इरफान ने कहा, “ये मामला बाहर का है हमारे यहाँ तो वह (आतंकी) डॉक्टर की नौकरी करते थे अल-फलाह यूनिवर्सिटी में। यूनिवर्सिटी ने डॉक्टर को नौकर डिग्री देखकर दी थी न कि आतंकी देखकर। इस घटना से हमारा गाँव बदनाम हुआ, हम इसके लिए शर्मिंदा हैं।”

आतंकी के नमाज पढ़ने के सवाल पर बीच में टोकते हुए एक अन्य युवक ने कहा, “धर्म अलग चीज है और आतंकवाद एक अलग चीज है। नमाज का और आतंकवाद का कोई संबंध नहीं है। इस अल-फलाह यूनिवर्सिटी से लाखों बच्चे पढ़कर निकले हैं, कभी किसी ने कोई गंदा काम नहीं किया। ये पहली घटना हुई है। इमाम साहब का कोई संबंध नहीं है वह सिर्फ मस्जिद में लोगों को नमाज पढ़ाते थे।”

पास में ही खड़े एक अन्य व्यक्ति ने कहा, “डॉक्टर साहब काम तो अच्छा करते थे मरीजों को देखने का और नमाज पढ़ने का, लेकिन ये जो हादसा हुआ है इसका हमें कुछ नहीं पता।”

अगर पढ़ाई करके ही बम फोड़ना है तो पढ़ाई क्यों करना? इस सवाल पर इरफान ने कहा ,”कोई माँ-बाप आतंकी बनाने के लिए अपने बच्चों को नहीं पढ़ाता, लेकिन अब हम आगे से जम्मू-कश्मीर के लोगों पर भरोसा नहीं कर पाएँगे।”

एक अन्य व्यक्ति ने कहा, “डॉक्टर (आतंकी) को पूरा इलाका जानता था। वह बढ़िया से हमारा इलाज करते थे। हमने आज तक उसके बारे में कोई बात नहीं सुनी।”

मस्जिद के सामने खडे एक अन्य व्यक्ति ने कहा, “हम डॉक्टर साहब से दवा लेने के लिए जाते थे। बहुत बार मिले हैं, वो अच्छे इंसान थे। पाँच वक्त के नमाजी थे।” आपको बता दें कि धौज की इस बड़ी मस्जिद में हर रोज एक हजार से 1500 लोग नमाज के लिए आते हैं।

जिस मस्जिद में आतंकी पढ़ता था नमाज वहाँ पहुँची ऑपइंडिया की टीम

अल-फलाह यूनिवर्सिटी की मस्जिद में ही आतंकी मुजम्मिल पाँच वक्त की नमाज अदा करता था। कैंपस के पिछले हिस्से में मौजूद मस्जिद पर हम पहुँचे, तो मस्जिद के पास वाले मकान मालिक रहीमुद्दीन ने कहा, “वो (आतंकी मुजम्मिल) इमरजेंसी में डॉक्टर थे। यहीं नमाज पढ़ते आते थे। हम भी यहीं पढ़ते हैं। कभी ऐसा शक नहीं हुआ। हमारी सिर्फ दुआ सलाम होती थी। हमें सिर्फ इतना पता था कि वह कश्मीर के हैं।”

रहीमुद्दीन ने आगे कहा, “हम यहाँ 4 साल से रहते हैं और मस्जिद के इमाम मो. इश्तियाज यहाँ करीब 20 साल से इमाम है। ये बहुत गलत हुआ है। हमारा गाँव डॉक्टर के कारण बदनाम हो गया है। अब हम कश्मीर के किसी व्यक्ति पर भरोसा नहीं कर पाएँगे।” रहीमुद्दीन ने कहा कि इस तरह के लोगों को यूनिवर्सिटी को पनाह नहीं देनी चाहिए।

इसके बाद हमने इमाम के घर और मस्जिद को भी देखा। जानकारी मिली कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी द्वारा ही यूनिवर्सिटी स्थापना के समय ही एक एकड़ जमीन में करोड़ों की लागत से मस्जिद का निर्माण कराया गया था।

मस्जिद में इमाम मो. इश्तियाज आतंकी डॉक्टर मुजम्मिल के साथ लोगों को पाँच वक्त की नमाज अदा कराता था। इस इमाम को अल-फलाह यूनिवर्सिटी द्वारा ही सैलरी दी जाती थी। इस मस्जिद में रहने वाले इमाम मो. इश्तियाज ने ही आतंकी मुजम्मिल को गाँव फतेहपुर तगा में किराए पर घर दिया था, जहाँ से पुलिस को 2563 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई थी।

1942 में गुजरात के जिन ‘महाराज’ ने बचाई थी यहूदी-पोलिश बच्चों की जान, 83 साल बाद उन्हें इजरायल ने दिया सम्मान: अपने शहर में मूर्ति लगाई; जानिए कौन थे जाम साहब दिग्विजय सिंह जडेजा

दक्षिणी इजरायल के नेवातिम में हाल ही में नवानगर (अब जामनगर) के पूर्व महाराजा जामसाहेब दिग्विजय सिंह जडेजा की प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह प्रतिमा उस करुणा और मानवता की याद में बनाई गई है, जब जामसाहेब ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड के सैकड़ों बच्चों, जिनमें कई यहूदी बच्चे भी शामिल थे, उनको भारत में शरण और सुरक्षा दी थी।

जाम साहब की प्रतिमा नीचे लिखा गया है:

‘होलोकॉस्ट के दौरान, उन्होंने अपने खर्च पर कई यहूदी बच्चों को बचाया और उन्हें

अपने घर में आश्रय दिया तथा उन्हें देखभाल और प्यार प्रदान किया।’

कार्यक्रम में यहूदी धर्मग्रंथ से एक वाक्य भी लिया गया- ‘जो एक जीवन बचाता है, वह पूरी दुनिया को बचाता है।’

यह कार्यक्रम भारतीय यहूदी विरासत केंद्र (IJHC) और कोच्चि यहूदी विरासत केंद्र (CJHC) ने महाराजा जामसाहेब की याद में और उनकी प्रतिमा के अनावरण के लिए आयोजित किया था। यह प्रतिमा सितंबर 2024 में तैयार हो गई थी, लेकिन हमास के साथ जारी युद्ध के कारण इसके अनावरण में कई बार देरी हुई।

जाम दिग्विजय सिंह कौन थे?

महाराजा दिग्विजय सिंह रणजीत सिंह नवानगर के अंतिम शासक थे। उन्हें और उस समय के कई राजाओं को लोग स्नेह से बापूसाहेब कहते थे। यह उपाधि किसी पद या सम्मान के रूप में नहीं दी जाती थी, बल्कि जनता के प्यार और विश्वास का प्रतीक थी। ऐसे राजाओं का मंत्र था, “मेरी प्रजा का कल्याण मेरे साथ हो।”

भावनगर के नरेश कृष्णकुमार सिंह जी और जामसाहेब दिग्विजयसिंह जडेजा जैसे राजा सचमुच बापूसाहेब कहलाने योग्य थे, जिन्होंने अपनी प्रजा की देखभाल पिता की तरह की। दिग्विजयसिंहजी ने सिर्फ अपने राज्य के लोगों की ही नहीं, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर पोलैंड के नागरिकों की भी मदद की।

द्वितीय विश्व युद्ध के समय उन्होंने वहाँ के बच्चों को भारत में शरण दी, बिना किसी स्वार्थ के मानवता का उदाहरण पेश किया। आज भी पोलैंड और इजरायल जैसे देश उन्हें सम्मान और कृतज्ञता के साथ याद करते हैं।

जामसाहेब दिग्विजयसिंह जडेजा

जाम साहब दिग्विजय सिंह जडेजा का जन्म 1895 में हुआ था। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई राजकुमार कॉलेज में की और आगे की शिक्षा यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन से प्राप्त की। 1919 में वे ब्रिटिश सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट बने और करीब बीस साल की सेवा के बाद 1931 में सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद भी वे 1947 तक भारतीय सेना में मानद पद पर जुड़े रहे।

1933 में अपने चाचा रणजीत सिंह जडेजा के निधन के बाद वे नवानगर के महाराजा बने। वे 1966 में अपनी मृत्यु तक नवानगर (अब जामनगर) के शासक रहे। 1947 में भारत की आजादी के बाद उन्होंने अन्य राजाओं के साथ अपने राज्य का भारत में विलय कर दिया। इस तरह वे जामनगर के अंतिम महाराजा माने जाते हैं।

उनके पुत्र शत्रुशल्य सिंह जडेजा वर्तमान में जामनगर के राजा हैं। भले ही अब राज्याभिषेक जैसी परंपराओं का राजनैतिक महत्व खत्म हो गया है, लेकिन जामनगर की जनता आज भी अपने राजपरिवार को वही आदर और सम्मान देती है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलिश बच्चों को आश्रय दिया गया था, जिनमें से कई यहूदी थे

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1939 में सोवियत संघ और जर्मनी ने मिलकर पोलैंड पर हमला किया। इसके बाद पोलैंड की सरकार गिर गई और उसके शासक लंदन भाग गए। हजारों पोलिश नागरिकों, जिनमें महिलाएँ, बच्चे, विकलांग और अनाथ शामिल थे, उनको सोवियत संघ भेज दिया गया। उन्हें शरणार्थी शिविरों और अनाथालयों में रखा गया, जहाँ वे भूख और बीमारियों से जूझते रहे।

लगभग दो साल तक यह स्थिति बनी रही। 1941 में सोवियत सरकार ने इन लोगों को रिहा कर दिया और देश छोड़ने की अनुमति दी। तब हजारों पोलिश नागरिकों ने दूसरे देशों में शरण ली कुछ मेक्सिको गए, कुछ न्यूजीलैंड और अन्य देशों में बस गए।

उसी समय महाराजा दिग्विजय सिंह जडेजा ब्रिटिश युद्ध मंत्रिमंडल में हिंदू प्रतिनिधि के रूप में जुड़े हुए थे। उन्हें जब इन पोलिश बच्चों की दुर्दशा का पता चला, तो उन्होंने तुरंत उनकी मदद का निर्णय लिया। बातचीत के बाद यह तय हुआ कि इन बच्चों को भारत लाया जाएगा और उन्हें सुरक्षित आश्रय दिया जाएगा।

भले ही तुमने अपने माता-पिता को खो दिया है , लेकिन आज से मैं तुम्हारा पिता हूँ 

पोलैंड के बच्चों का पहला समूह 1942 में नवानगर पहुँचा। महाराजा दिग्विजय सिंह जडेजा स्वयं उनका स्वागत करने पहुँचे और बच्चों से कहा, “अब तुम अनाथ नहीं हो। मैं तुम्हारा पिता हूँ और नवानगर अब तुम्हारा घर है।”

महाराजा ने बच्चों के रहने, खाने और पढ़ाई की पूरी व्यवस्था की। बालाचडी के पास उनके लिए एक शिविर बनाया गया, जहाँ उन्हें सुरक्षित माहौल, चिकित्सा सुविधा और शिक्षा मिली। बच्चों के लिए पोलिश भाषा की किताबों वाला एक पुस्तकालय भी बनाया गया ताकि वे अपनी मातृभाषा से जुड़े रहें।

जाम साहब हर व्यवस्था का खुद ध्यान रखते थे और नियमित रूप से शिविर का दौरा करते थे। जब बच्चों ने भारतीय भोजन को बहुत मसालेदार बताया, तो उन्होंने उनके लिए सात पोलिश रसोइए रखे और पढ़ाई के लिए पोलिश शिक्षक भी नियुक्त किए।

बाद में एक और कैंप खोला गया, जहाँ और बच्चे लाए गए। इस कार्य में पटियाला और बड़ौदा के राजाओं ने आर्थिक मदद दी, जबकि टाटा समूह ने भी धनराशि दी। इन बच्चों की देखभाल के लिए लाखों रुपए  जुटाए गए।

पोलिश बच्चे द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति तक नवानगर में रहे। युद्ध खत्म होने के बाद जब ब्रिटेन ने पोलिश सरकार को मान्यता दी, तो कई बच्चे अपने देश लौट गए, जबकि कुछ ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में बस गए। जाम साहब स्वयं उन्हें विदा करने पहुँचे, वह क्षण बच्चों और उनके बापूसाहेब दोनों के लिए बेहद भावुक था।

जाम साहब को पोलैंड में ‘अच्छे महाराजा’ के नाम से जाना जाता है

जाम साहब ने अपने धर्म और मानवता के पालन में बिना किसी स्वार्थ के काम किया। उन्होंने कठिन समय में हजारों पोलिश बच्चों को आश्रय दिया और उनके लिए पिता समान बने रहे। पोलैंड आज भी इस भारतीय महाराजा को कृतज्ञता और सम्मान के साथ याद करता है। वहाँ उन्हें ‘अच्छे महाराजा’ के नाम से जाना जाता है।

पोलैंड की राजधानी वारसॉ में उनके सम्मान में ‘नवानगर के जाम साहब स्मारक’ बनाया गया है। इस स्मारक पर लिखा है, ‘दयालु महाराजा को श्रद्धांजलि, पोलैंड के कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से।’

इसके अलावा, वारसॉ में जाम साहब के नाम पर एक स्कूल है जो भारतीय शैली में बना है और एक ‘महाराजा स्क्वायर’ नाम का चौक भी है। इसी स्थान पर स्मारक स्थित है। साल 2022 में पोलैंड में जाम साहब के नाम पर एक ट्रेन भी शुरू की गई। अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पोलैंड यात्रा के दौरान इस स्मारक पर जाकर श्रद्धांजलि दी थी।

इजरायल ने यहूदी बच्चों को बचाने के लिए उन्हें सम्मानित किया

पोलैंड ही नहीं, इजरायल भी महाराजा दिग्विजय सिंह जडेजा को नहीं भूला है। नवानगर में जिन पोलिश बच्चों को शरण दी गई थी, उनमें कई यहूदी बच्चे भी शामिल थे। यहूदी समुदाय आज भी मानता है कि उस हिंदू राजा ने जब मदद की तो उन्होंने धर्म या जाति नहीं देखी सब बच्चों को समान रूप से अपनाया।

यहूदी-अमेरिकी ऐतिहासिक संरक्षण सोसायटी के अध्यक्ष जेरी क्लिंगर ने अपने एक लेख में लिखा कि जब वे एक अन्य परियोजना पर काम कर रहे थे, तो उनके एक सहकर्मी ने उन्हें जाम साहब की इस मानवता की कहानी बताई। वह सहकर्मी उन लोगों में से कुछ को जानता था, जिन्हें बचपन में जाम साहब ने शरण दी थी।

क्लिंगर ने कहा, “ऐसे बहुत से लोग होंगे जिनकी जिंदगी जाम साहब ने बदली, भले ही कुछ अब जीवित न हों। लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि उन्होंने यहूदी बच्चों को भी शरण दी थी। पोलैंड ने तो उनका सम्मान किया है, अब इजरायल में भी उन्हें उचित सम्मान मिलना चाहिए।” इसी सोच से नेवातिम में उनकी प्रतिमा लगाने की पहल शुरू हुई।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती टीम के मेघल सिंह परमार ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

दिल्ली ब्लास्ट से जाँच के घेरे में फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी, जानिए कौन है इसका चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी

दिल्ली में लाल किले के सामने मंगलवार (10 नवंबर 2025) को बड़ा धमाका हुआ, जिससे पूरा देश दहल गया। मिनटों में जाँच एजेंसियाँ मौके पर पहुँचीं और उस ब्लास्ट की जाँच शुरू की जिसमें कम से कम 13 लोगों की जान गई।

जल्दी ही दिल्ली लाल किला ब्लास्ट और अल-फलाह यूनिवर्सिटी का लिंक सामने आया, क्योंकि धमाका करने वाला आतंकवादी उन तीन मेडिकल डॉक्टर्स का साथी था जो यूनिवर्सिटी से जुड़े थे और हरियाणा पुलिस व जम्मू-कश्मीर पुलिस के जॉइंट ऑपरेशन में गिरफ्तार हुए थे। पुलिस ने दिल्ली ब्लास्ट से कुछ घंटे पहले गिरफ्तार डॉक्टर्स से जुड़े ठिकानों से 2,900 किलो से ज्यादा विस्फोटक बरामद किए थे।

यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर प्रो (डॉ) भूपिंदर कौर ने आखिरकार बयान दिया कि यूनिवर्सिटी का पकड़े गए टेरर मॉड्यूल से कोई लिंक नहीं है, लेकिन यूनिवर्सिटी के चांसलर और फाउंडर जवाद अहमद सिद्दीकी चुप रहे। हैरानी की बात है कि सिद्दीकी का डिजिटल फुटप्रिंट लगभग नहीं है।

ऑपइंडिया ने चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी पर उपलब्ध जानकारी खँगाली और कुछ परेशान करने वाला इतिहास मिला। उनकी लिंक्डइन प्रोफाइल पर ज्यादा जानकारी नहीं है। ‘अबाउट’ सेक्शन में लिखा है, ‘मैनेजिंग ट्रस्टी: अल-फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट 1995 से अब तक, चांसलर: अल-फलाह यूनिवर्सिटी, फरीदाबाद 2014 से अब तक, मैनेजिंग डायरेक्टर: अल-फलाह इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड 1996 से अब तक।’

सोर्स: लिंक्डइन

ऑपइंडिया को मिल्ली गजट की जुलाई 2000 की रिपोर्ट में लिखा मिला कि जवाद अहमद सिद्दीकी नाम का शख्स अपने दो भाइयों के साथ तिहाड़ जेल में था क्योंकि अल-फलाह इन्वेस्टमेंट लिमिटेड में निवेशकों को ठगा था। कंपनी की जानकारी देखी तो पता चला कि वो 1992 में रजिस्टर्ड हुई और स्टेटस ‘स्ट्राइक ऑफ’ है, यानी कंपनी बंद हो चुकी है।

सोर्स: जौबाकॉर्प

जौबाकॉर्प पर उपलब्ध जानकारी से पता चला कि कंपनी का सिर्फ एक डायरेक्टर था, जवाद अहमद सिद्दीकी।

सोर्स: जौबाकॉर्प

सिद्दीकी के पुराने डायरेक्टोरियल एसोसिएशन से अल-फलाह एजुकेशन सर्विस प्राइवेट लिमिटेड का लिंक मिला। सिद्दीकी मार्च 2019 तक इस कंपनी के डायरेक्टर थे।

सोर्स: जौबाकॉर्प

अल-फलाह एजुकेशन सर्विस प्राइवेट लिमिटेड की और जानकारी देखी तो दो पुराने डायरेक्टर मिले, जवाद अहमद सिद्दीकी और सऊद अहमद सिद्दीकी।

सोर्स: जौबाकॉर्प

ये जानकारी जरूरी थी क्योंकि जब ऑपइंडिया ने मिली गजट में बताए केस को देखा, तो दो नाम थे- जवाद और सऊद। इस केस पर बाद में आएँगे।

अल-फलाह एजुकेशन सर्विस प्राइवेट लिमिटेड और अल-फलाह यूनिवर्सिटी का कनेक्शन जोड़ने के लिए कंपनी का पता चेक किया। वो था ‘अल-फलाह हाउस, 274-ए, जामिया नगर, ओखला, नई दिल्ली।’

सोर्स: जौबाकॉर्प

ये वही पता है जो अल-फलाह यूनिवर्सिटी की ऑफिशियल वेबसाइट पर है।

सोर्स: अल फलाह यूनिवर्सिटी

हमने ‘[email protected]’ ईमेल से भी कनेक्शन जोड़ा, जो यूनिवर्सिटी प्रोफाइल वाली कई वेबसाइट्स पर ऑफिशियल ईमेल के तौर पर लिस्टेड है।

सोर्स: गूगल सर्च

यूनिवर्सिटी के भारत एजुकेशन पेज पर सिद्दीकी और फरदीन दोनों के ईमेल हैं।

सोर्स: भारत एजुकेशन

ये ईमेल आईडी अल-फलाह इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के जौबाकॉर्प पेज पर भी है, वही कंपनी जो फ्रॉड में शामिल थी।

सोर्स: जौबाकॉर्प

साफ है कि जो शख्स गिरफ्तार हुआ और लंबे समय तिहाड़ जेल में रहा, वही जवाद अहमद सिद्दीकी है जो अल-फलाह यूनिवर्सिटी चला रहा है।

कंपनी के मौजूदा डायरेक्टर हैं सुफयान अहमद सिद्दीकी और फरदीन बेग। सुफयान अहमद सिद्दीकी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, फरदीन बेग अल-फलाह यूनिवर्सिटी में टीचर हैं और एंटी-रैगिंग कमिटी के मेंबर भी।

सोर्स: लिंक्डइन

हमारी रिसर्च में पता चला कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी 2 मई 2014 को हरियाणा प्राइवेट यूनिवर्सिटी (अमेंडमेंट) एक्ट, 2014 से स्थापित की गई, जो हरियाणा विधानसभा ने पास किया। यूजीसी से 5 जनवरी 2015 को सेक्शन 2(एफ) और 12(बी) के तहत मान्यता मिली। एक्सपर्ट कमिटी बनी और इंस्पेक्शन विजिट 29-30 मई 2015 को हुई। बाद में कमियों को पूरा करने पर यूजीसी ने मान लिया।

जवाद अहमद सिद्दीकी 2 साल से ज्यादा जेल में रहा

अब उस केस पर आते हैं, जिसके लिए उसे तिहाड़ भेजा गया था। ऑपइंडिया को दिल्ली हाई कोर्ट का 27 मार्च 2003 का जजमेंट मिला, जो जस्टिस आरसी चोपड़ा ने सुनाया था। कोर्ट डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, 2000 में न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, नई दिल्ली में एफआईआर दर्ज हुई थी आईपीसी की धारा 420, 409, 406, 468, 471 और 120(बी) के तहत। केस इकोनॉमिक ऑफेंस विंग, क्राइम ब्रांच, नई दिल्ली को भेजा गया।

केस डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, जवाद सिद्दीकी अल-फलाह ग्रुप ऑफ कंपनीज के चेयरमैन-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर थे, और सऊद सिद्दीकी (अल-फलाह एजुकेशन सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के पूर्व डायरेक्टर में से एक) उसका डायरेक्टर था। पिटिशनर्स और उनके साथी आरोपियों ने ढेर सारे निवेशकों को अपनी कंपनीज में डिपॉजिट करवाया। कोर्ट ने नोट किया कि उन्होंने 7.5 करोड़ रुपये की रकम गबन की। शिकायत केआर सिंह ने की थी, जिन्हें 95 लाख रुपए का चूना लगाया गया था।

जजमेंट में लिखा था, “आरोप है कि पिटिशनर्स ने ढेर सारे लोगों को अपनी ग्रुप कंपनीज में डिपॉजिट करवाया लेकिन बाद में उनके सिग्नेचर फर्जी करके और डॉक्यूमेंट्स बनाकर उन डिपॉजिट्स को अपनी कंपनीज के शेयर्स में बदल दिया।”

जाँच और एफएसएल रिपोर्ट्स ने कन्फर्म किया कि निवेशकों के सिग्नेचर फर्जी थे। डिपॉजिट कुछ ऐसी कंपनीज के नाम पर लिए गए जो कभी थीं ही नहीं। फिर पैसा आरोपितों के पर्सनल अकाउंट्स में ट्रांसफर हो गया। जब कोर्ट ने ये जजमेंट पास किया, तब तक जवाद 37 महीने और सऊद 38 महीने जेल में थे।

ट्रिब्यून की जून 2004 की रिपोर्ट के मुताबिक, 1995 में अल-फलाह ग्रुप ऑफ कंपनीज ने अल-फलाह सहकारी आवास समिति बनाई। ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी ने 1996 में समिति को 10,000 स्क्वायर मीटर अलॉट किए, जहाँ मेंबर्स और शेयरहोल्डर्स के लिए 100 फ्लैट्स बनाने थे। लेकिन कुछ फाइनेंशियल दिक्कतों की वजह से कंस्ट्रक्शन नहीं हुआ और जवाद वगैरह गिरफ्तार हो गए।

जवाद जेल में थे, तब उनके कुछ साथियों ने उन्हें ठगा और उनके सिग्नेचर फर्जी करके 13 करोड़ में कुछ फ्लैट्स बेच दिए। ट्रिब्यून रिपोर्ट में उनकी गिरफ्तारी की खबर छपी थी, जिसमें आरोपित थे एसपी यादव, मंजूर हसन जैदी और संजीव श्रीवास्तव।

जवाद अहमद सिद्दीकी को लेकर ये खुलासे अल-फलाह यूनिवर्सिटी चलाने वालों की विश्वसनीयता और बैकग्राउंड पर गंभीर सवाल उठाते हैं। फ्रॉड और फॉर्जरी के पुराने आरोपों से लेकर टेरर मॉड्यूल से जुड़ा विवाद तक, पैटर्न ऐसा है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यूनिवर्सिटी प्रशासन ने खुद को चल रही जाँच से अलग कर लिया है, लेकिन अल-फलाह की लीडरशिप को संदिग्ध फाइनेंशियल और क्रिमिनल गतिविधियों से जोड़ने वाले सबूत बताते हैं कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी और उसके मैनेजमेंट की तेजी से गहरी जाँच जरूरी है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित की गई है। मूल कॉपी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

लद्दाख में बना दुनिया का सबसे ऊँचा न्योमा एयरबेस, चीन के लिए साबित होगा सबसे बड़ा सिरदर्द: जानें भारत को LAC पर कैसे मिलेगी रणनीतिक बढ़त

पूर्वी लद्दाख की ऊँचाइयों पर भारतीय वायुसेना का नया न्योमा एयरबेस अब पूरी तरह ऑपरेशनल हो चुका है। समुद्र तल से करीब 13,700 फीट की ऊँचाई पर बना यह एयरबेस न सिर्फ भारत का बल्कि दुनिया के सबसे ऊँचे लड़ाकू विमान को तैनात करने वाले एयरबेस में से एक है। यह लद्दाख के नायमो-मुढ़ क्षेत्र में स्थित है, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर है।

LAC से महज कुछ किलोमीटर की दूरी होने के चलते एयरबेस की रणनीतिक अहमियत बेहद बढ़ जाती है। भारत-चीन के बीच पिछले कुछ सालों से लद्दाख सेक्टर में जारी तनातनी और चीन की लगातार बढ़ती सैन्य मौजूदगी के बीच यह एयरबेस भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक कदम साबित हो रहा है।

न्योमा एयरबेस की खासियत?

न्योमा एयरबेस लद्दाख में भारतीय वायुसेना का चौधा सक्रिय एयरबेस बना गया है। यह एयरबेस पहले एक एडवांस लैंडिंग ग्राउंड (ALG) के रूप में इस्तेमाल किया जाता था लेकिन अब इसे एक पूर्ण सैन्य एयरबेस के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहाँ मिग-29 और सुखोई-30 जैसे लड़ाकू विमान भी तैनात किए जा सकेंगे। इससे भारत की रणनीतिक ताकत में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी और सीमाई इलाकों में निगरानी और प्रतिक्रिया क्षमता में सुधार आएगा।

न्योमा एयरबेस में अब अत्याधुनिक रनवे और एयर ट्रैफिक कंट्रोल सुविधाएँ बनाई जा रही हैं, जिससे किसी भी मौसम या परिस्थिति में विमानों का संचालन संभव हो सकेगा। इस एयरबेस का निर्माण बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (BRO) द्वारा किया जा रहा है, जो कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी काम करने के लिए जाना जाता है।

यह एयरबेस लद्दाख के दुर्गम इलाके में स्थित है, जहाँ तापमान कई बार माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है और ऑक्सीजन का स्तर भी काफी कम होता है। इसके बावजूद न्योमा एयरबेस भारत के लिए एक रणनीतिक गेमचेंजर साबित हो सकता है। यह एयरबेस न केवल सीमा की सुरक्षा को मजबूत करेगा बल्कि आपात स्थितियों, आपदा राहत अभियानों और सैनिकों की लॉजिस्टिक्स आपूर्ति में भी अहम भूमिका निभाएगा।

न्योमा एयरबेस भारतीय वायुसेना के लिए बड़ी उपलब्धि

न्योमा एयरबेस के चालू होने से भारतीय वायुसेना की रणनीतिक क्षमता में भारी इजाफा हुआ है, क्योंकि यह सीमा से बेहद नजदीक है और किसी भी संभावित आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई के लिए निर्णायक भूमिका निभा सकेगा। पहले लद्दाख तक पहुँचने में विमानों और सैनिकों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी लेकिन अब न्योमा एयरबेस की वजह से यह दूरी और समय दोनों घट गए हैं।

यह एयरबेस से भारतीय वायुसेना किसी भी गतिविधि का जवाब मिनटों में दे सकेगी। लद्दाख की गलवान घाटी और पैंगोंग त्सो झील जैसे संवेदनशील इलाकों के ऊपर से हवाई निगरानी और गश्त और भी आसान हो जाएगी। भारत के फाइटर जेट्स अब सीमा से केवल कुछ मिनटों की दूरी पर तैनात रह सकेंगे, जिससे किसी भी अप्रत्याशित स्थिति का जवाब तुरंत दिया जा सकेगा।

न्योमा एयरबेस से भारत की चीन पर बढ़त

न्योमा एयरबेस से भारत को चीन पर कई स्तरों पर बढ़त मिलेगी। चीन पिछले कुछ सालों से LAC के पार तिब्बत क्षेत्र में अपनी हवाई संरचना को तेजी से विकसित कर रहा है। उसने वहाँ कई नए रनवे, हेलीपोर्ट्स और सैन्य भंडारण सुविधाएँ तैयार की हैं। न्योमा एयरबेस भारत की उसी चुनौती का जवाब है।

अब भारत भी समान ऊँचाई और कठिन इलाकों में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है, जिससे दोनों के बीच रणनीतिक संतुलन कायम हो सके। चीन के लिए यह संकेत है कि भारत अब केवल रक्षात्मक मुद्रा में नहीं बल्कि सक्रिय रणनीतिक तैयारी के साथ आगे बढ़ रहा है।

भारत की सैन्य क्षमता का उदाहरण है न्योमा एयरबेस

न्योमा एयरबेस के चालू हो जाने से लद्दाख और कारगिल क्षेत्र में सेना के अभियानों को बेहतर सपोर्ट मिलेगा। जरूरत पड़ने पर यह एयरबेस सियाचिन जैसे इलाकों के लिए भी लॉजिस्टिक्स हब बन सकता है। भविष्य में यहाँ ड्रोन और निगरानी विमानों की तैनाती भी बढ़ाई जा सकती है, जिससे सीमा पर हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी जा सके।

दरअसल, यह एयरबेस सिर्फ एक हवाई अड्डा नहीं बल्कि एक रणनीतिक संदेश है कि भारत अब सीमाओं की सुरक्षा के मामले में किसी भी ढिलाई के मूड में नहीं है। जब चीन तिब्बत में अपनी एयर स्ट्रिप्स और बेस का नेटवर्क बढ़ा रहा है तब भारत ने भी अपनी तैयारी दिखा दी है। न्योमा एयरबेस चीन पर दबाव बढ़ाता है कि भारत सीमा पर कोई भी अचानक कदम उठाने से पहले कई बार सोचे।

कॉन्ग्रेस-AIMIM में सीक्रेट अलायंस, सीमांचल में RJD की बर्बादी के पीछे ग्रैंड ओल्ड पार्टी: वक्फ के बहाने ‘हाथ’ में दिखी ‘पतंग’ की डोर

तेलंगाना के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर वक्फ (संशोधन) एक्ट 2025 के तहत UMEED पोर्टल पर संपत्तियों के रजिस्ट्रेशन की डेडलाइन एक साल बढ़ाने की माँग की है। पत्र में तकनीकी मुश्किलें, पुराने रिकॉर्ड्स की उपलब्धता और पोर्टल की खामियों का जिक्र है।

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक्स पर पोस्ट कर रेड्डी के कदम की सराहना की। उन्होंने लिखा, “जैसी उम्मीद थी, वक्फ संशोधन एक्ट के तहत पोर्टल पर अनिवार्य रजिस्ट्रेशन में बड़ी मुश्किलें आ रही हैं। सीएम रेवंत रेड्डी साहब को धन्यवाद, जिन्होंने नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर वक्फों को दस्तावेज जमा करने के लिए एक्सटेंशन माँगा। मैंने भी एडवोकेट निजाम पाशा के जरिए सुप्रीम कोर्ट में समय बढ़ाने के लिए केस फाइल किया है।”

ओवैसी का यह पोस्ट दिखाता है कि वे इस मुद्दे पर सक्रिय हैं। AIMIM मुख्य रूप से मुस्लिम हितों की राजनीति करती है और वक्फ एक्ट उनके लिए बड़ा मुद्दा है। वे दावा करते हैं कि यह एक्ट मुस्लिम संपत्तियों को कमजोर कर सकता है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ओवैसी ने रेड्डी का खुला समर्थन किया, जो कॉन्ग्रेस के नेता हैं। यह उस बड़े राजनीतिक गठजोड़ की ओर इशारा करता है, जिसके बारे में हम आगे बात करेंगे।

भारत की राजनीति को अगर कोई व्यक्ति सालों से देखता आया है, तो वो जानता है कि यहाँ की हर घटना के पीछे कई परतें होती हैं। कभी ये परतें साफ-साफ दिखती हैं, तो कभी इतनी गहरी होती हैं कि आम आदमी की नजर से ओझल रह जाती हैं। आज हम इसी कड़ी में बात कर रहे हैं वक्फ संपत्तियों के उस बड़े मुद्दे की, जो इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है।

केंद्र सरकार ने वक्फ (संशोधन) एक्ट, 2025 के तहत वक्फ संपत्तियों को केंद्रीय पोर्टल-यूएमईईडी (UMEED) पर रजिस्टर कराना जरूरी कर दिया है। इस मुद्दे पर तेलंगाना के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने PM मोदी से हस्तक्षेप की माँग करते हुए डेडलाइन को एक साल तक आगे बढ़ाने की माँग की है। रेवंत के पत्र पर AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तुरंत समर्थन जताया और खुद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने की बात कही।

दरअसल, पत्र में रेड्डी ने लिखा कि सज्जादा नशीन और मुतवल्लियों ने खुद अतिरिक्त समय माँगा। ये पत्र सिर्फ कागजी नहीं है, बल्कि कॉन्ग्रेस की मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति का अहम पहलू है। दरअसल, तेलंगाना में मुस्लिम आबादी 12% के करीब है, जो हैदराबाद में काफी ज्यादा है। रेड्डी कॉन्ग्रेस के नेता हैं, सरकार उनकी… ऐसे में मुस्लिम वोटर्स को खुश रखना उनकी राजनीति का हिस्सा है। लेकिन यहाँ सवाल उठता है- क्या ये सिर्फ मुस्लिम समुदाय की मदद है या इसके पीछे बड़ा खेल है? क्योंकि ओवैसी ने तुरंत समर्थन किया।

कॉन्ग्रेस-AIMIM का छिपा गठजोड़, वोट कटवा की पुरानी रणनीति

ये सब सुनने में तो प्रशासनिक मामला लगता है, जिसमें पुराने रिकॉर्ड्स जुटाना, तकनीकी दिक्कतें सुलझाना, मुतवल्लियों को ट्रेनिंग देना जैसे मुद्दे हैं। लेकिन अगर गहराई से देखें, तो ये राजनीति की उस पुरानी किताब का एक नया अध्याय है, जहाँ कॉन्ग्रेस और AIMIM का छिपा गठजोड़ सालों से चलता आ रहा है। बाहर से कॉन्ग्रेस ओवैसी को बीजेपी की ‘बी-टीम’ बताती रहती है, लेकिन अंदरखाने AIMIM कई राज्यों में कॉन्ग्रेस के सहयोगियों का वोट काटकर उसे सौदेबाजी की ताकत देती है।

विश्लेषण करेंगे तो पाएँगे कि ओवैसी देश के हर एक उस राज्य में चुनाव लड़ते हैं, जहाँ कॉन्ग्रेस के सहयोगी राज्य स्तरीय दल मजबूर स्तर पर होते हैं। ओवैसी उन्हीं का वोट काटते हैं, ताकि कॉन्ग्रेस के पास सौदेबाजी की ताकत रहे।

सबसे पहले बिहार की बात करें तो पिछले विधानसभा चुनाव में AIMIM ने सीमांचल इलाके में 6 सीटें जीतीं। ये सीटें मुख्य रूप से मुस्लिम बहुल थीं, जहाँ राष्ट्रीय जनता दल (RJD) मजबूत था। अगर AIMIM नहीं लड़ती, तो ये वोट RJD को जाते और RJD की सीटें बढ़तीं।

नतीजा? कॉन्ग्रेस जो RJD की सहयोगी है वो सौदेबाजी में मजबूत रहती। क्योंकि अगर RJD ज्यादा मजबूत हो जाती, तो कॉन्ग्रेस को गठबंधन में कम हिस्सा मिलता। इसी तरह इस बार भी बिहार में AIMIM पूरी ताकत से लड़ रही है, जहाँ कॉन्ग्रेस कमजोर है लेकिन RJD को कमजोर रखना चाहती है। इस बार 6 सीटों का बदला 36 पर लेने की तैयारी है। यही वजह है कि ओवैसी ने बिहार में तेजस्वी यादव को सीधा निशाना बनाया, जबकि राहुल या कॉन्ग्रेस पर बहुत हल्का हाथ रखते रहे।

ऐसा ही हाल महाराष्ट्र में है। एनसीपी को नुकसान पहुँचता है। सीट भले ही किसी विपक्षी बीजेपी-शिवसेना को मिलती हो, लेकिन सहयोगियों की संख्या कम होने से कॉन्ग्रेस अपनी प्रासंगिकता बरकरार रख पाती है और बाकी जगहों पर अच्छा प्रदर्शन करके सहयोगियों को दाबे रखती है।

उत्तर प्रदेश में भी AIMIM ने जो नुकसान किया, वो कॉन्ग्रेस या बीजेपी का नहीं, सपा का हुआ। इसी तरह से राजस्थान, एमपी जैसे राज्यों में है। जिन राज्यों में कॉन्ग्रेस है ही नहीं, वहाँ AIMIM नहीं है, जैसे बंगाल में। या जहाँ कॉन्ग्रेस मजबूत है, वहाँ AIMIM नहीं है, जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, ओडिशा… इसी बात से समझ सकते हैं कि कॉन्ग्रेस और AIMIM का गठजोड़ कितना भीतर तक है।

कॉन्ग्रेस-AIMIM का गठजोड़ जटिल है। बाकी काम आम जनता को मूर्ख बनाने वाला कॉन्ग्रेस इको-सिस्टम और उनका भोंपू-तंत्र कर ही देता है। ऐसे में लोग कॉन्ग्रेस के हल्ले को सही मान लेते हैं कि ओवैसी और उनकी पार्टी बीजेपी को फायदा पहुँचाती है, जबकि अंदरखाने वो सिर्फ कॉन्ग्रेस को समर्थन देती है।

ओवैसी सदन में वो मुद्दे उठाती है, जो कॉन्ग्रेस किसी मजबूरी के चलते उठा नहीं पाती और वोटिंग के समय अक्सर ओवैसी कॉन्ग्रेसी ग्रुप में खड़े दिखते हैं। हालाँकि दिखाने के लिए वो कभी कभी राहुल को निशाने पर भी लेते हैं, लेकिन उनके निशाने पर बीजेपी-हिंदुत्ववादी राजनीति और कॉन्ग्रेस के सहयोगी ही रहते हैं।

इस मुद्दे पर मैंने कई एक्सपर्ट्स से बात की। एक पॉलिटिकल एनालिस्ट ने कहा, “AIMIM कॉन्ग्रेस के लिए सेफ्टी वॉल्व है। वे मुस्लिम गुस्से को हैंडल करते हैं, ताकि कॉन्ग्रेस सेक्युलर बनी रहे।”

इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि तेलंगाना जो ओवैसी का गृह प्रदेश है, वहाँ पार्टी सिर्फ हैदराबाद में लड़ती है, लेकिन जुबली हिल्स जैसी प्रीमियम सीट वो कॉन्ग्रेस के लिए छोड़ती है और उसका खुलेआम समर्थन करती है।

कुछ दिन पहले तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने ‘‘मुस्लिम मतलब कॉन्ग्रेस, कॉन्ग्रेस मतलब मुस्लिम’ वाला बयान दिया था। अब ओवैसी ने रेवंत रेड्डी का खुला समर्थन किया है। वक्फ को लेकर रेड्डी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। एक तरफ बिहार में रेड्डी सीधे तेजस्वी को चुनौती दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस को हैदराबाद में समर्थन कर रहे हैं। ये छिपा पॉलिटिकल मोटिव नहीं तो और क्या है, जो धीरे-धीरे इस गठजोड़ को सामने ला रहा है।

दिल्ली ब्लास्ट पर जश्न मनाने वाले आतंक के समर्थकों पर कार्रवाई जरूरी, असम की हिमंता सरकार ने कायम की मिसाल

दिल्ली में लाल किला के पास हुए कार ब्लास्ट में 12 लोगों की मौत हो गई। इस ब्लास्ट का कनेक्शन पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जम्मू-कश्मीर के कई प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े हैं। इस ब्लास्ट ने जहाँ पूरे देश को झकझोर दिया। वहीं सोशल मीडिया पर इस घटना का जश्न मनाने वाले कुछ लोग हमें यह याद दिला गए कि आतंकवाद सिर्फ बम-गोला नहीं बल्कि विचारधारा से भी पनपता है।

राजधानी में हुई इतने बड़े धमाके के बाद जब पूरा देश शोक में था तब कुछ इस्लामी कट्टरपंथी खुशियों में व्यस्त थे। ऐसे लोगों की पहचान कर असम की बीजेपी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया है। राज्य के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी ऐसे लोगों को साफ संदेश दिया है।

असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा का बयान

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था, “दिल्ली बम विस्फोट की घटना निंदनीय है। वहीं कुछ लोगों ने फेसबुक पर इस तरह की घटना पर बधाई दी या खुशी वाले इमोजी पोस्ट किए। इस तरह की प्रतिक्रिया से पता चलता है कि वे लोग वास्तव में आतंकवाद का समर्थन करते हैं। हम कल (10 नवंबर 2025) रात से इन लोगों की पृष्ठभूमि की जाँच कर रहे हैं। जरूरत पड़ने पर हम इनमें से कुछ लोगों को गिरफ्तार भी करेंगे।”

सीएम ने आगे कहा, “असम में हम आतंकवाद को बढ़ावा देने और किसी भी तरह का समर्थन करने की अनुमति नहीं देंगे। हम इसके लिए बहुत सख्त हैं। कल से हमने देखा है कि घटना की खबर मिलने के बाद कुछ लोग बहुत खुश हैं। कोई इस खबर से खुश है, तो कोई किसी की मौत से खुश। मुझे लगता है कि वे लोग भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवाद का समर्थन कर रहे हैं। मैंने DGP से उन लोगों की पृष्ठभूमि की जाँच करने को कहा है, अगर वे असम के नागरिक हैं तो हमें उन्हें गिरफ्तार करेंगे।”

दिल्ली ब्लास्ट पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वालों की गिरफ्तारी

असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने जो कहा वो किया। सोशल मीडिया पर दिल्ली में हुए ब्लास्ट के खिलाफ आपत्तिजनक और भड़काऊ पोस्ट करने वाले 5 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। सीएम हिमंता ने एक्स पर पोस्ट कर यह जानकारी दी। उन्होंने यह भी लिखा कि असम पुलिस की यह कार्रवाई जारी रहेगी।

सीएम हिमंता ने बताया कि सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले राज्यभर से 5 लोगों में दारांग के मत्तीउर रहमान, गोलपाड़ा के हसन अली मंडल, चिरांग के अब्दुल लतीफ, कामरूप के वजहुल कमाल और बोंगाईगांव के नूर अमीन अहमद को गिरफ्तार किया गया है। सीएम हिमंता ने चेतावनी भी देते हुए कहा, “असम पुलिस नफरत फैलाने या आतंक का महिमामंडन करने के लिए सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ तेजी से और दृढ़ता से कार्रवाई करना जारी रखेगी।”

दिल्ली ब्लास्ट और फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल

फिर बात करें दिल्ली ब्लास्ट के तारों की और फरीदाबाद में सामने आए आतंकी मॉड्यूल की तो इस ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई कार, विस्फोट और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी जाँच में यह साफ हुआ है कि यह एक बड़ा नेटवर्क था। जाँच एजेंसियों को फरीदाबाद, सहारनपुर, लखनऊ समेत कुछ जिलों से 2900 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, जो सीधे दिल्ली ब्लास्ट से जुड़ रही है।

इसके अलावा जिस i20 कार से ब्लास्ट हुआ, उसमें बैठा डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी के तार भी आतंकी मॉड्यूल से जुड़े। उसके दोस्त सज्जाद अहमद और परिवार वालों से पूछताछ की गई तो सामने आया कि वह संदिग्ध आतंकी गतिविधियों में शामिल था। जाँच एजेंसियों को यह भी शक है कि फरीदाबाद से गिरफ्तार आतंकी मुजम्मिल की गर्लफ्रेंड डॉ. शाहीना का भी दिल्ली ब्लास्ट में बड़ा रोल हो सकता है। डॉ. शाहीना पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की महिला ट्रेनर थी, उसके पास से एके-47 और हथियार बरामद हुए।

ये सारी जानकारी इस बात का सबूत है कि दिल्ली ब्लास्ट कोई आम नहीं बल्कि सोची-समझी साजिश हो सकती है, जो एक बड़े आतंकी नेटवर्क ने अंजाम दी है। जाँच एजेंसियाँ इस आतंकी नेटवर्क का भंडाफोड़ कर चुकी हैं, उनकी कार्रवाई आगे भी जारी है।

असम में गिरफ्तारी आतंकी विचारधारा पर लगाम

ऐसे में असम सरकार की कार्रवाई का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि आतंक केवल उतना नहीं है जब बम धमाके होते हैं। आतंकवाद की विचारधारा को सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर डाली गई गलीज टिप्पणियों, इमोजी में खुशी मनाने, पोस्टों में देश में हुए निंदनीय ब्लास्ट पर समर्थन दिए जाने से ही पनपने का मौका मिलता है।

जब सरकार उन तक पहुँचती है और ऐसे लोगों को कानून के दायरे में लाती है तो यह एक स्पष्ट संदेश देती हैं कि आतंक का समर्थन करना अपराध है, सिर्फ आतंक करना नहीं बल्कि उसे बढ़ावा देना, महिमामंडन करना, चुप्पी सहना भी वैध नहीं है। यह एक तरह से उदाहरण सेट करता है कि आतंक की विचारधारा रखने वालों पर भी कार्रवाई होगी।

ऐसे मामलों में तुरंत और निष्पक्ष कार्रवाई से यह भी साबित होता है कि कानून सिर्फ बड़े हमलावरों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए भी है जो इन धमाकों की खुशी मनाकर ‘दूसरी पंक्ति’ बनते हैं।

हिमंता बिस्वा सरमा का ब्लास्ट पर खुशी मनाने वालों को कड़ा संदेश

और आखिर में हिमंता बिस्वा सरमा के बयान पर लौटते हैं। उन्होंने घोषणा की कि असम पुलिस इन सोशल मीडिया पोस्ट करने वालों की पृष्ठभूमि की जाँच कर रही है और जरूरत पड़े तो गिरफ्तार करेगी। यह बयान सिर्फ कड़ी भाषा नहीं, कार्रवाई होने तक का ‘डर’ है। जब एक प्रदेश का मुख्यमंत्री इस तरह स्पष्ट शब्दों में कहता है, “अगर ये लोग असम के नागरिक हैं तो उन्हें नहीं बख्शा जाएगा।” तो यह एक तरह से सरकार की नीति को दर्शाता है कि कैसे आतंक की विचारधारा को पनपने से पहले दबा दिया जाना चाहिए।

सोशल मीडिया पर खुशियाँ मनाने वाले इस्लामी कट्टरपंथियों जैसे लोगों को डर होना चाहिए कि उनकी हर ऑनलाइन पर नजर रखी जा रही है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी है लेकिन जब वो आजादी आतंकी विचारधारा में बदल जाए तो कार्रवाई जरूरी हो जाती है। हिमंता बिस्वा सरमा का यह रवैया न सिर्फ गंभीर है बल्कि समय की माँग भी है।

बिहार विधानसभा चुनाव से फिर हुआ साबित, राहुल गाँधी ही BJP के ‘स्टार’ प्रचारक

बिहार चुनाव के लिए मतदान खत्म हो गया है और दो दिन बाद यानी 14 नवंबर 2025 को नतीजे भी आ जाएँगे। नतीजे से पहले मंगलवार (11 नवंबर 2025) को आए एग्जिट पोल और जमीनी स्थिति को देखकर यही लग रहा है कि एक बार फिर NDA बिहार में सरकार बनाने जा रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर NDA के दलों के तमाम बड़े नेताओं के धुँधार प्रचार और महिलाओं से लेकर अलग-अलग वर्गों के लिए दी गई योजनाओं के कॉकटेल ने NDA के लिए जमीन तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके अलावा एक और फैक्टर जिसके इस चुनाव में बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाने में मदद की वो हैं कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी, सुनने में बेशक यह अटपटा लगे लेकिन हकीकत यही दिख रही है।

इस चुनाव में बीजेपी के लिए एक ‘स्टार प्रचारक’ राहुल गाँधी भी साबित हुए हैं। इसके पीछे कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं वो सारे तथ्य हैं जिन्हें कोई भी विश्लेषक झुठला नहीं सकता है। इसके साथ ही, दबे स्वर में और पर्दे के पीछे ही सही लेकिन उनके सहयोगी दल भी इन बातों को मान रहे हैं।

राहुल गाँधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ ने बिगाड़ा महागठबंधन का मोमेंटम

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले EC ने मतदाता सूची सही करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान चलाया। इसमें कई लाख ऐसे वोट काटे गए जो मृत, डबल या कहीं और जा चुके थे। पहले से ही देश भर में कथित ‘वोट चोरी’ का डंका पीट रहे राहुल गाँधी को यह बात अपने पक्ष की लगी और उन्होंने बीते 17 अगस्त से ‘वोटर अधिकार यात्रा’ की शुरुआत कर दी।

इस यात्रा में उनका मानना था कि आम लोग सड़कों पर उतर आएँगे और नीतीश कुमार के खिलाफ माहौल बनाने में मदद मिलेगी लेकिन वैसा हुआ नहीं। वो लगातार मंचों से लोगों में आक्रोश होने का दावा करते रहे लेकिन वो आक्रोश कहीं नजर नहीं आया। उल्टा जिन असल मुद्दों को लेकर वो राज्य की सरकार को घेर सकते थे, वो इस यात्रा के चलते पीछे छूट गए।

इस यात्रा में एक मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को माँ की गाली दी गई, जिससे माहौल और महागठबंधन के खिलाफ हो गया। यह यात्रा खत्म होते-होते RJD-कॉन्ग्रेस में दरार साफ दिखने लगी। दावा किया जाने लगा कि RJD नेता तेजस्वी यादव इस यात्रा से खुश नहीं है और उनका व उनके दल का मानना था कि इस यात्रा का जमीन पर कोई फायदा नहीं दिख रहा है।

पटना में इस यात्रा के समापन के दौरान पहले एक बड़ी रैली की जानी थी लेकिन माना गया कि लालू यादव समझ गए थे कि दरअसल इस यात्रा से सिर्फ राहुल गाँधी अपने लिए फेम जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, बिहार चुनाव में इसका कोई असर पड़ने वाला है। इसके कारण वो रैली भी रद्द कर दी गई और पदयात्रा के साथ ही यह यात्रा समाप्त हो गई जिसका जमीन पर असर नहीं दिखाई पड़ा।

यात्रा खत्म होते तक RJD-कॉन्ग्रेस के बीच मतभेद की खबरें खूब सामने आईं। तेजस्वी यादव ने अपनी अलग यात्रा निकाली जिसके केंद्र में वोट चोरी का मुद्दा नहीं था। उन्होंने कोशिश की कि नीतीश कुमार की सरकार को बिहार से जुड़े मुद्दों पर घेरा जाए जो राहुल गाँधी का यात्रा से गायब थे।

यात्रा के तुरंत बाद मलेशिया घूमने पहुँचे राहुल गाँधी

जब राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा खत्म हुई तो वो छुट्टियाँ मनाने मलेशिया निकल गए। इससे राहुल गाँधी पर जो ‘पार्ट टाइम राजनेता’ होने के आरोप लगते रहे थे वो फिर एक बार सामने आए। बीजेपी ने हाथों-हाथ इसे लपका और राहुल गाँधी पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। बीजेपी और उसके समर्थकों ने यह साबित करने की कोशिश की कि दरअसल, राहुल गाँधी बिहार के चुनाव और इस मुद्दे को लेकर गंभीर नहीं है।

यह छवि जनता के बीच पहुँचनी शुरू हुई और जो मुद्दा राहुल गाँधी ने उठाया था वो कहीं पीछे छूट गया। लोगों के बीच यह बात पहुँची कि बिहार का यह यात्रा राहुल गाँधी के लिए बस एक ‘असाइनमेंट’ की तरह ही थी। यह पहली बार नहीं था, जब राहुल गाँधी की यात्रा पर सवाल उठे हों अमेरिका, इटली और बैंकॉक जैसी यात्राओं के दौरान भी राहुल गाँधी पर सवाल उठ चुके हैं। इस यात्रा के बाद बीजेपी को यह साबित करने में मदद मिली की उनकी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ असल में एक खानापूर्ति भर थी।

बिहार से 2 महीने के लिए गायब हो गए राहुल गाँधी

पटना में अपनी पद यात्रा के बाद राहुल गाँधी बिहार से छूमंतर हो गए। 1 सितंबर को पटना में वोटर अधिकार यात्रा के बाद वो करीब 58 दिनों तक बिहार से गायब रहे और अक्टूबर के बिल्कुल आखिर में मुजफ्फरपुर और दरभंगा में चुनावी रैलियों में शामिल हुए। इस बीच बीजेपी और NDA के बड़े नेता यहाँ तक कि खुद प्रधानमंत्री मोदी भी लगातार बिहार से जुड़े हुए थे।

खुद कॉन्ग्रेस के नेता भी राहुल गाँधी की अनुपस्थिति से हैरान थे। बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने ‘डेक्कन हेराल्ड’ से कहा, “बिहार के चुनावी मैदान से राहुल गांधी की लंबी अनुपस्थिति से हम भी हैरान हैं। राहुल की इतने लंबे समय तक अनुपस्थिति पार्टी को भारी पड़ सकती है।” राहुल गाँधी की अनुपस्थिति में BJP और अन्य दलों के नेताओं ने चुनावी माहौल को अपने पक्ष में करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राहुल की अनुपस्थिति बीजेपी के लिए बिहार में फायदे का सौदा ही साबित हुई।

राहुल गाँधी ने छठ का किया अपमान, PM मोदी को लेकर बोले ‘अपशब्द’

एक कहावत है कि ‘देर आए, दुरुस्त आए’, कॉन्ग्रेस को भी राहुल गाँधी के बिहार चुनाव प्रचार में लौटने से यही उम्मीदें थीं। लेकिन यहाँ भी दाँव उल्टा ही पड़ गया। छठ के दौरान ही राहुल गाँधी पर छठ पूजा के अपमान का आरोप लगा। इसके अलावा उन्होंने मंच से प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपशब्दों को भी प्रयोग किया।

बिहार के मुजफ्फरपुर में गुरुवार (29 अक्टूबर 2025) को जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी ने कहा था, “छठ पूजा वोट हासिल करने के लिए किया गया नाटक है और मोदी वोट के लिए मंच पर नाच भी सकते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी को छठ पूजा या बिहार की परंपरा से कोई लेना-देना नहीं है। उनका मकसद केवल वोट लेना है।”

इसे बीजेपी ने छठ पूजा और पीएम मोदी का अपमान बताते हुए राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पर खूब हमला बोला। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सभा में कहा कि कॉन्ग्रेस और RJD के लोग छठी मैया का अपमान कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “आप बताएँ क्या कोई वोट पाने के लिए छठ मैया का अपमान करेगा, क्या माताएँ निर्जला उपवास करती हैं, क्या वो सहन करेंगी क्या?”

फेल हुआ राहुल गाँधी का H- बम

बिहार में वोटिंग से ठीक पहले भी राहुल गाँधी ने कथित वोट चोरी का हवाला देते हुए ‘H-फाइल्स’ जारी कीं, इसमें दावा किया गया कि हरियाणा चुनाव में BJP ने वोट चोरी की है। बिहार चुनाव से पहले हरियाणा में वोट चोरी का दावा कहीं से भी लोगों को तार्किक नहीं लगा। हालाँकि, कुछ लोगों को लगा कि शायद वोट चोरी की बात इससे लोगों के मन में बैठ जाए लेकिन वो भी धरा रह गया जब उनके दावों की पोल खुलनी शुरू हो गई।

राहुल गाँधी ने जो दावे अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में किए उनमें कोई दम नहीं निकला और ऐसे में बीजेपी को फिर एक बार राहुल गाँधी पर हमले का मौका मिल गया। बीजेपी ने कहना शुरू कर दिया कि राहुल गाँधी असल में अपनी हार छिपाने के लिए बहाने ढूँढ रहे हैं। चुनाव से ठीक पहले भी वो बिहार चुनाव के लिए बिना कोई ठोस प्लान के नजर आए।

बीजेपी के नेता और उसके समर्थक अक्सर सोशल मीडिया पर कहते हैं कि राहुल गाँधी दरअसल बीजेपी के सबसे बड़े स्टार प्रचारक हैं। इसे लेकर जोक्स और मीम्स बनाए जाते हैं। अब, राहुल गाँधी जिस तरह बिहार चुनाव में महागठबंधन को मजबूत करने के बजाय NDA को ताकत देते हुए दिखाई दिए हैं, उससे शायद यह बात साबित भी होती है।

सबरीमाला मंदिर ‘सोना चोरी’ केस में पूर्व TDB अध्यक्ष गिरफ्तार, नए अध्यक्ष की नियुक्ति के बीच SIT ने केरल HC को सौंपे सबूत: जानें वामपंथी सरकार कैसे नियुक्त करती है मंदिर बोर्ड का चीफ

केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर से ‘सोना चोरी’ मामले ने एक नया मोड़ आया है। एसआईटी ने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) के पूर्व अध्यक्ष और आयुक्त एन. वासु को 11 नवंबर 2025 को गिरफ्तार कर लिया।

वासु का सीपीएम से पुराना रिश्ता रहा है। वह कोल्लम पंचायत अध्यक्ष और पूर्व मंत्री पीके गुरुदासन के निजी सचिव और वकील हैं। केरल के विपक्षी कॉन्ग्रेस नेता वीडी सतीशन ने कहा कि वासु की गिरफ्तारी से वरिष्ठ माकपा नेताओं की संलिप्तता उजागर होगी। एसआईटी सीपीएम नेता और पूर्व टीडीबी अध्यक्ष पद्मकुमार से भी पूछताछ कर सकती है।

केरल हाईकोर्ट ने भी सख्त टिप्पणी करते हुए मंदिर प्रबंधन के सोना चोरी में ‘मिलीभगत’ की बात कही है। वहीं केरल की वामपंथी सरकार ने टीडीबी के नए अध्यक्ष के तौर पर पूर्व आईएएस अधिकारी जयकुमार को नियुक्त किया है।

टीडीबी के नए अध्यक्ष बने जयकुमार

केरल सरकार ने रिटायर आईएएस अधिकारी के जयकुमार को टीडीबी यानी त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड का अध्यक्ष बनाया है। पूर्व मंत्री और विधायक के राजू को बोर्ड का सदस्य बनाया गया है। टीडीबी सबरीमाला के भगवान अयप्पा मंदिर सहित प्रमुख मंदिरों का प्रबंधन करता है।

10 नवंबर 2025 को जारी अधिसूचना के मुताबिक वर्तमान त्रावणकोर देवस्वओम बोर्ड के अध्यक्ष पी एस प्रशांत का कार्यकाल 13 नवंबर को खत्म हो रहा है। इसलिए 14 नवंबर से इनका कार्यकाल शुरू होगा, जो 2 साल तक चलेगा।

नई नियुक्ति ऐसे समय हो रही है, जब सबरीमाला मंदिर में सोना चोरी का मामला गरमाया हुआ है। केरल सरकार की इस मुद्दे पर काफी फजीहत हो चुकी है। विपक्ष ने टीडीबी के खिलाफ एक्शन की माँग करते हुए विधानसभा की कार्यवाही का बहिष्कार किया। इस मामले में सीपीएम के कई नेताओं के नाम आ रहे हैं।

कैसे होती है टीडीबी सदस्यों की नियुक्ति

केरल सरकार टीडीबी सदस्यों की नियुक्ति करती है। इसमें एक अध्यक्ष और दो सदस्य होते हैं। इस नियुक्ति के मानदंड को सार्वजनिक नहीं किया जाता है, हालाँकि कहा जाता है कि इसमें एक प्रक्रिया अपनाई जाती है। ये बोर्ड सरकार के प्रति जवाबदेह होता है और मंदिर प्रशासन का काम संभालता है।

बोर्ड भारत सरकार के अधीन एक स्वायत्त संस्था के रूप में काम करता है। इसे त्रावणकोर कोचीन हिंदू धार्मिक संस्थान अधिनियम 1950 के तहत बनाया गया है।

सीपीएम नेता पद्मकुमार से पूछताछ संभव

इस मामले में अब तक 5 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें मुख्य आरोपी उन्नीकृष्णन पोट्टी, सबरीमाला के पूर्व प्रशासनिक अधिकारी मुरारी बाबू, पूर्व कार्यकारी अधिकारी डी सुदेश कुमार और तिरुवभरणम के पूर्व आयुक्त केएस बैजू और पूर्व टीडीबी अध्यक्ष वासु शामिल हैं।

एसआईटी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेता और पूर्व टीडीबी अध्यक्ष के. पद्मकुमार से पूछताछ करने की कोशिश में है। जब एन. वासु देवासम बोर्ड में आयुक्त थे, तब पद्मकुमार टीडीबी के अध्यक्ष थे। फिलहाल वासु न्यायिक हिरासत में हैं, जिनसे एसआईटी पूछताछ कर रही है।

एसआईटी का मानना है कि मंदिर की मूर्तियों और आवरणों पर सोने के बजाय तांबे में बदलने की पूरी प्रक्रिया बहुत बड़े घोटाले को दर्शाता है और इस पूरे मामले में कई हाई प्रोफाइल नाम जाँच के दायरे में आ रहे हैं।

पूर्व टीडीबी अध्यक्ष और वामपंथी वासु की हुई गिरफ्तारी

ताजा मामले में एसआईटी ने टीडीबी के पूर्व अध्यक्ष और कमिश्नर एन वासु को गिरफ्तार किया है। वासु को पहले भी गिरफ्तार किया गया था और पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया था। वासु का सीपीएम से पुराना नाता रहा है। वह दो बार टीडीबी के आयुक्त रह चुके हैं। फिलहाल तिरुवनंतपुरम में वकालत करते हैं।

सोना चोरी के मामले में क्राइम ब्रांच ने पता लगाया है कि मार्च 2019 में सन्निधानम द्वार पैनल से सोना पिघलाने के पूरे काम की जानकारी वासु को थी और उनकी सहमति के बाद ही ये काम किया गया। इस दौरान वासु टीडीबी के अध्यक्ष थे। इससे पहले टीडीबी से 2 बार आयुक्त के तौर पर जुड़े रहे।

विपक्ष शुरू से कहता रहा है कि सबरीमाला मामले में सत्तारूढ़ सीपीएम के नेताओं की संलिप्तता रही है। माना जा रहा है कि मुख्य आरोपी उन्नीकृष्णन पोट्टी ने हिरासत में पूछताछ के दौरान वासु की भूमिका के बारे में बताया।

उन्नीकृष्णन पोट्टी के पुराने ईमेल को जाँच रिपोर्ट में शामिल किया गया है। इसमें पोट्टी ने कथित तौर पर वासु को बताया था कि मंदिर के देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की मरम्मती के बाद सोना बच गया है। पोट्टी ने कथित तौर पर उस बचे हुए सोना का इस्तेमाल एक जरूरतमंद लड़की की शादी में लगा दिया। इससे संबंधित ईमेल 9 दिसंबर 2019 को भेजा गया था।

वासु ने ईमेल फॉरवर्ड तो कर दिया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की, जिसके कारण सोना गायब पाया गया। जाँच में पता चला कि वासु को इन सभी मामलों की पूरी जानकारी थी, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।

हालाँकि वासु ने जाँच दल को ऐसे किसी घोटाले में अपनी भूमिका से साफ इनकार किया। उसने कहा कि उसके कार्यकाल के दौरान देवी-देवताओं के मरम्मत का काम नहीं हुआ और वह उन्नीकृष्णन पोट्टी को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता है। उसे केवल ‘स्पांसर’ के तौर पर जानता है। वासु के मुताबिक, उस वक्त कई स्पांसर थे और उन सबकी जाँच करना अव्यावहारिक है।

इस मामले में मुख्य आरोपी उन्नीकृष्णन पोट्टी, मुरारी बाबू और पूर्व आयुक्त केएस बैजू को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। एसआईटी को अब जल्द ही केरल हाईकोर्ट में अंतिम रिपोर्ट सौंपनी है।

केरल हाईकोर्ट ने माना बोर्ड की ‘संदिग्ध’ भूमिका

केरल हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान माना है कि बोर्ड के सदस्यों का सबरीमाला अयप्पा मंदिर के सोना चोरी में भूमिका है। एसआईटी इस बात पर भी विचार कर रहा है कि टीडीबी के रिटायर और सेवा करने वाले अधिकारियों और हाई प्रोफाइल राजनीतिक नियुक्तियों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के दायरे में लाया जाए या नही

एसआईटी ने सौंपे कई दस्तावेज

ये मामला राजनीतिक और कानूनी तौर पर काफी अहम है, क्योंकि इस मामले की जाँच की आँच उच्च अधिकारियों तक पहुँच रही है। एसआईटी अधिकारियों का कहना है कि यदि ऐसा है, तो एसआईटी संभवतः कोल्लम स्थित जाँच आयुक्त और विशेष न्यायाधीश (सतर्कता) के समक्ष एक रिपोर्ट दाखिल करेगी, जिसका अधिकार क्षेत्र पथानामथिट्टा जिला भी है।

अधिकारियों का कहना है कि एसआईटी टीडीबी अधिकारियों पर ‘गबन करने के इरादे’ का आरोप लगाकर मुकदमा चलाने की कोशिश कर सकती है, क्योंकि उन्होंने मंदिर की नक्काशी और मूर्तियों पर चढ़े सोने के पैनल को ‘जानबूझकर गलत तरीके से श्रेणियों में बाँटा’। इसके बाद मरम्मती के नाम पर मुख्य आरोपी उन्नीकृष्णन पोट्टी को सौंपा।

एसआईटी ने कोर्ट को दस्तावेज सौंपते हुए दावा किया है कि सोने की परत चढ़े पैनलों में सोने की जगह तांबे का इस्तेमाल करने को ‘आधिकारिक छूट देना’, ये दर्शाता है कि पोट्टी को फायदा पहुँचाने की कोशिश की गई। ऐसा जानबूझकर किया गया, ताकि चोरी का मामला सामने आने पर ‘आधिकारिक पेपर’ दिखाकर कानूनी रूप से पोट्टी और अन्य अधिकारियों को बचाया जा सके।

प्रतिमाओं पर सोने की परत चढ़ाने में अनियमितता का मामला

सबरीमाला के गर्भगृह में द्वारपालकों की सोने की परत वाली मूर्तियों को मरम्मत के लिए चेन्नई की एक निजी आभूषण फर्म को भेजा गया था। इस पर उठे विवाद के बाद हाईकोर्ट ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान लिया था।

दरअसल कोर्ट ने स्पष्ट रूप से आदेश दिया था कि सबरीमाला के आभूषणों की कोई भी मरम्मत या रखरखाव विशेष आयुक्त को पूर्व सूचना देने के बाद ही किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं किया गया था।

टीडीबी ने 2019 में 40 साल की वारंटी के साथ मूर्तियों पर स्वर्ण परत चढ़ाने की जिम्मेदारी चेन्नई की फर्म स्मार्ट क्रिएशन्स को दिया था।

साल 2025 की शुरुआत में जब मूर्तियों को मरम्मत करने की जरूरत पड़ी, तो टीडीबी ने फिर से मूर्तियों को उसी फर्म को भेज दिया। लेकिन इस बार जरूरी अनुमति नहीं लिए गए।

अदालत ने मरम्मत कार्य चेन्नई को आउटसोर्स करने के टीडीबी के फैसले पर सवाल उठाते हुए मरम्मती कार्य को तत्काल प्रभाव से रोकने का आदेश दिया। साथ ही मंदिर की कीमती वस्तुओं और प्रतिमाओं को केरल वापस भेजने का निर्देश दिया।

4.5 किलोग्राम सोना ‘गायब’ मिला था

साल 2019 में सबरीमाला मंदिर के गर्भगृह (सन्निधानम) के द्वारपालकों की प्रतिमाओं पर सोने की परत चढ़ाने का काम शुरू हुआ। इसके लिए लगभग 42 किलो सोना मंदिर से लिया गया था। योजना के मुताबिक इन सोने की प्लेटों पर विशेष प्रक्रिया से गोल्ड प्लेटिंग कर उसे दोबारा गर्भगृह में लगाया जाना था।

जब ये प्लेटें वापस आईं और मंदिर में स्थापित की गईं, तब चौंकाने वाला सच सामने आया। 42.8 किलोग्राम सोने की जगह मात्र 38 किलोग्राम सोने का ही रिकॉर्ड फर्म के पास था। बाकि 4.5 किलोग्राम सोना गायब हो गया।

इसके बावजूद, टीडीबी ने 2025 में मूर्तियों की मरम्मती का काम उसी फर्म स्मार्ट क्रिएशन्स को दिया। इसके बाद विवाद बढ़ गया और कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा।