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‘ईसाई बन जाओ, जिंदगी सुधर जाएगी’: दलितों को झाँसा देकर धर्मांतरण कराने की कोशिश का आरोप, पढ़ें FIR की कॉपी की अहम बातें, देवभूमि के खटीमा का मामला

उत्तराखंड के खटीमा में सिदारी प्रसाद दलित समुदाय के लोगों को ईसाई धर्मांतरण के लिए ब्रेनवॉश कर रहा है। सिदारी दलित लोगों को इलाज और पैसों का लालच देकर ईसाई बनाने का काम कर रहा है। हिंदू संगठन ने आरोपित के खिलाफ शिकायत की है। पुलिस ने भी आरोपित के खिलाफ संबंधित धाराओं में FIR दर्ज कर ली है।

मामला उधम सिंह नगर जिले के खटीमा के झनकिया थाना क्षेत्र का है। यहाँ सिदारी प्रसाद प्रार्थना सभा आयोजित कर दलित लोगों को ईसाई बनने के लिए ब्रेनवॉश करता है। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के प्रखंड संयोजक जितेंद्र विश्वकर्मा ने आरोपित के खिलाफ शिकायत की, जिसके बाद पुलिस ने एक्शन लेते हुए FIR दर्ज की। ऑपइंडिया के पास FIR की कॉपी मौजूद है।

अंधविश्वास और लालच के सहारे दलितों का ब्रेनवॉश

धर्मांतरण के पीछे मिशनरियों का हाथ है और सिदारी प्रसाद भी इनसे जुड़ा हुआ है। आरोपित सिदारी प्रसाद अंधविश्वास और सामाजिक भेदभाव का लाभ उठाकर दलित लोगों को ईसाई बन सब कुछ ठीक होने का भरोसा दिलाता है। वह कहता है कि ईसाई बनोगे तो बीमारियाँ ठीक हो जाएँगी, परिवार में समस्याएँ दूर होंगी और शराब की आदत भी छूट जाएगी।

इन लोगों को प्रार्थना सभा में इकट्ठा किया जाता है, जहाँ लोगों को धर्मांतरण के लिए बेनवॉश किया जाता। ये सभाएँ हर रविवार को आयोजित की जाती हैं, जिनमें पुरानी रीति-रिवाजों का त्याग करने और हिंदू धर्म छोड़ने के बारे में उकसाया जाता है। इसके साथ ही सभा में भूत-प्रेथ जैसी भ्रमित कहानियाँ सुनाई जाती। इन लोगों को पैसों का लालच भी दिया जाता है।

खटीमा के अलावा मेलाघाट, सिसैया, बरी अंजनिया, नौसर और दियाँ जैसे इलाकों में भी मिशनरियाँ सक्रिय हैं। जो कमजोर वर्ग के लोगों को निशाना बनाती हैं और लालच देकर धर्मांतरण करने के लिए ब्रेनवॉश करती हैं।

इन प्रार्थना सभाओं के नाम पर धर्मांतरण किए जाने की सूचना हिंदू संगठन को लगी। संगठन ने मौके पर पहुँचकर आरोपित सिदारी का पर्दाफाश किया। उसके पास से ईसाई से जुड़ी पुस्तकें और प्रार्थना की सामग्री बरामद हुई। इन सबूतों के आधार पर हिंदू संगठन ने पुलिस से शिकायत की।

पुलिस ने दर्ज की FIR

हिंदू संगठन की शिकायत पर पुलिस ने आरोपित सिदारी प्रसाद के खिलाफ उत्तराखंड धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2018 की धारा 3 और 5, भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 351(3) और धारा 352 के तहत FIR दर्ज की है।

हिंदू संगठन के खटीमा प्रखंड संयोजक जितेंद्र विश्वकर्मा ने अपनी शिकायत में बताया कि 24 अक्टूबर 2025 की सुबह 10 बजे उन्हें जानकारी मिली कि सिदारी प्रसाद अपने साथियों संग मिलकर अपने घर में बनी अवैध चर्च में दलित हिंदुओं का धर्मांतरण कर ईसाई बनाने का प्रयास कर रहा है।

सिदारी ने बताया कि ये सभी लोग उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से आए थे। इन्हें ईसाई रीति-रिवाज के बारे में बताया जा रहा था, जिसे वे ‘सर्वोत्तम धर्म’ बता रहे थे और धर्मांतरण कराने के लिए तरह-तरह के लालच दिए जा रहे थे। यहाँ तक कि सिदारी ने शिकायतकर्ता जितेंद्र को भी धर्मांतरण के लिए दबाव डाला।

FIR का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: Uttarakhand police)

जितेंद्र अपने साथी विशाल सिंह, आकाश राठौर और प्रदीप सिंह के साथ मिलकर सिदारी के घर पहुँचे थे। यहाँ सिदारी ने उन्हें भी परिवार सुखी होने का लालच देकर धर्मांतरण का दबाव बनाया। इसके साथ ही सिदारी ने एक ईसाई पुस्तक भी दिखाई और कहा कि इसमें ईसाई से जुड़ी अच्छी-अच्छी बातें लिखी हुई हैं, जिसे पढ़कर जीवन बेहतर हो जाएगा।

इतना ही नहीं जब जितेंद्र ने धर्मांतरण का विरोध किया तो सिदारी ने गाली-गलौज की और जान से मारने की भी कोशिश की। जितेंद्र ने कहा, सिदारी ने हिंदू अनुसूचित जाति के व्यक्तियों को इस तरह बहला-फुसलाया है कि उन्हें ईसाई बनने में कोई कठिनाई महसूस नहीं हो रही है। जितेंद्र ने पुलिस से अनुरोध किया है कि सिदारी जैसे देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति एवं उसके साथियों के विरुद्ध दण्डात्मक कार्यवाही करने की कार्रवाई की जाए।

मामले में थाना प्रभारी निरीक्षक देवेंद्र गौरव ने मीडिया को दिए बयान में कहा कि फिलहाल धर्मांतरण घटना को लेकर जाँच जारी है। गौरतलब है कि सिदारी फरार है और पुलिस उसकी गिरफ्तारी के प्रयास कर रही है।

(मूलरूप से यह खबर अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

‘अरुणाचल प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून जल्द हो लागू’: नॉर्थ-ईस्ट की जनजातियों की रैली से भड़के ईसाई, क्यों अपने ही घर में अल्पसंख्यक हो रहे ‘डोनी पोलो’ को पूजने वाले

अरुणाचल प्रदेश के 27 जिलों, 26 प्रमुख जनजातियों और 100 उप-जनजातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले हजारों मूल निवासियों ने धर्मांतरण विरोधी अधिनियम (APFRA 1978) को लागू करने की माँग को लेकर रैली निकाली। शनिवार (20 अक्टूबर 2025) को पारंपरिक कपड़ों में इन लोगों ने ईटानगर तक मार्च किया। राज्य के ईसाई इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं।

धर्मांतरण को रोकने के लिए 48 साल पहले अरुणाचल प्रदेश फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट 1978 लागू हुआ था।

ईसाइयत के प्रचार- प्रसार की वजह से अरुणाचल के मूल निवासी यहाँ अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। ये लोग डोनी पोलो की पूजा करते हैं, जहाँ ‘डोनी’ का अर्थ है ‘सूर्य’ और ‘पोलो’ का अर्थ है ‘चंद्रमा’। ये वे सिंबल हैं, जिस पर अरुणाचल प्रदेश के लोगों की आस्था है।

फोटो साभार- TOI

डोनी पोलो, ईसाई धर्म और हिंदू धर्म के अलावा, अरुणाचल प्रदेश में महायान और थेरवाद बौद्ध धर्म के अनुयायियों की भी अच्छी खासी तादाद है।

इंडिजिनस फेथ एंड कल्चरल सोसाइटी ऑफ अरुणाचल प्रदेश (IFCSAP) के अध्यक्ष एमी रूमी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि स्वदेशी आस्था को मानने वालों ने राज्य के स्वदेशी विश्वास और परंपरा को बचाने के लिए अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम (एपीएफआरए) को पूरी तरह लागू करने की माँग को लेकर रैली निकाली। उन्होंने कहा कि इस कानून को 1978 में तत्कालीन राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई थी, लेकिन अभी तक इसे लागू नहीं किया गया है।

रूमी ने कहा, “अगर यह कानून लागू होता है, तो हमारी संस्कृति, परंपरा और धार्मिक पहचान की रक्षा हो पाती।”

फोटो साभार- इंडिया टुडे

प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए वकील आर.एस. लोडा ने कहा, “हम नहीं चाहते कि अरुणाचल प्रदेश मिजोरम या नागालैंड की तरह अपनी मूल पहचान खो दे, जहाँ विदेशी धर्म के प्रचार- प्रसार के कारण स्थानीय मान्यताएँ नष्ट हो गई हैं।”

अरुणाचल प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू करने की माँग करने वालों का कहना है कि यह कानून किसी भी धर्म या संप्रदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह केवल ‘जनजातीय समुदाय को प्रलोभन या लालच देकर हो रहे धर्मांतरण से बचाता है’।

अरुणाचल प्रदेश के स्वदेशी आस्था और सांस्कृतिक समाज (IFCSAP) के एक प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्री मामा नटुंग से मुलाकात की और अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 1978 (APFRA) को तत्काल लागू करने का आग्रह किया। उन्होंने राज्य की स्वदेशी आस्था, संस्कृति और आदिवासी पहचान की रक्षा के लिए इस अधिनियम को लागू करने पर जोर देते हुए एक ज्ञापन सौंपा।

इनका कहना है कि बाहरी प्रभावों से अरुणाचल की संस्कृति पर संकट मंडरा रहा है। इसे संरक्षित करने और जनजातीय विरासत को बचाने के लिए कानून का लागू करना जरूरी होता जा रहा है। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य में ईसाई आबादी और धर्मांतरण गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

1971 की जनगणना के मुताबिक, अरुणाचल प्रदेश में ईसाई आबादी 0.79% थी, जो 2011 की जनगणना में 30.26% हो गई। 1971 में अन्य धर्मों और मतों (ORP) का हिस्सा 63.46% था, जबकि 2011 की जनगणना में यह 26.20% रह गया।

1971 में हिंदुओं की आबादी 22% थी और 2011 में यह 29.04% हो गई। 1971 की जनगणना में बौद्धों की आबादी लगभग 13% थी, लेकिन 2011 में यह घटकर 11.77% रह गई। वहीं, मुसलमानों की आबादी 1971 में 0.18% थी, जो बढ़कर 2011 की जनगणना में 1.95% हो गई।

ईसाई APFRA का कर रहे विरोध

अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (ACF) APFRA कानून का विरोध कर रहा है। फोरम के अध्यक्ष तारह ​​मिरी का तर्क है कि ‘धर्मांतरण विरोधी कानून धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है और ईसाइयों को निशाना बनाता है।” फरवरी 2025 में ACF ने धर्मांतरण विरोधी कानून के विरोध में 8 घंटे की भूख हड़ताल किया था।

नागा बैपटिस्ट चर्च काउंसिल के महासचिव रेव जेलहोउ कीहो ने जनवरी 2025 में मुख्यमंत्री पेमा खांडू को एक पत्र लिखा था और दावा किया था कि APFRA का उद्देश्य पारंपरिक धर्म का संरक्षण करना नहीं, बल्कि ईसाइयों का दमन करना है।

पत्र में कीहो ने लिखा, “APFRA का असली उद्देश्य पारंपरिक धर्म का संरक्षण करना नहीं, बल्कि उस समय के एक खास धार्मिक समूह का दमन करना था… इस आधार पर यह अधिनियम असंवैधानिक है। उस वक्त आपके लोग और क्षेत्र इस विधेयक का विरोध कर रहे थे, लेकिन देश के हालात बहुत बदल गए हैं। अब आपके लोगों, खासकर आपके राज्य के ईसाईयों का क्या होगा।”

पत्र में आगे कहा गया है, “हमें यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि देश के अन्य हिस्सों में ईसाइयों को बेवजह सताने के लिए इस कानून (धर्मांतरण विरोधी कानून) का कैसे दुरुपयोग किया जाता है। हमारी व्यावहारिक समझ हमें बताती है कि आपके शांतिप्रिय लोगों के साथ भी यही होगा, और यह पूरे क्षेत्र में फैल जाएगा।”

मुख्यमंत्री खांडू ने परंपराओं के संरक्षण की बात कही

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने राज्य की स्वदेशी आस्थाओं को बढ़ावा देने और परंपराओं को संरक्षित करने की भाजपा सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने इन्हें जनजातीय समुदायों की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आत्मा बताया।

मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा किया। इसमें उन्होंने विस्तार से बताया कि स्वदेशी आस्थाओं को संरक्षित करना क्यों आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रमुख धर्मों के विपरीत, स्वदेशी आस्थाएँ “किताबों से नहीं, बल्कि ज़मीन, स्मृति और जीवित परंपराओं से आती हैं। ये बाहर से थोपी नहीं जाती, बल्कि इसकी जड़ें हजारों सालों से जमी हुई हैं। ये हमारे लोगों, हमारे जंगलों, पहाड़ों, नदियों और पूर्वजों की आत्मा को संजोए हुए हैं।”

स्वदेशी आस्थाओं को बढ़ावा देने और संरक्षित करने के लिए, मुख्यमंत्री खांडू ने आदि, गालो, न्यीशी और तांगसा जनजातियों के लिए 6 स्वदेशी गुरुकुल, 3,000 से अधिक पंजीकृत पुजारियों के वेतन, सभी जिलों में जनजातीय सांस्कृतिक केंद्र और राज्य भर में 50 स्वदेशी केंद्रों की स्थापना की घोषणा की।

दिसंबर 2024 में मुख्यमंत्री खांड स्वदेशी मामलों के विभाग का नाम बदलकर स्वदेशी आस्था और संस्कृति कर दिया। उन्होंने इसे ‘स्वदेशी परंपराओं की समृद्ध विरासत के संरक्षण, संवर्धन और सुरक्षा की प्रतिबद्धता की दिशा में एक कदम’ बताया।

अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम क्या है?

अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम अक्टूबर 1978 में अस्तित्व में आया था। इसका उद्देश्य ‘ताकत, लालच या धोखा देकर होने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना’ था। भारत के राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी दे दी थी।

राज्य में कई ‘स्वदेशी आस्थाओं’ की पहचान की गई। इनमें बौद्ध धर्म (मोनपा, मेम्बा, शेरदुकपेन, खम्बा, खम्पती और सिंगफो द्वारा प्रचलित), वैष्णव धर्म (नोक्टेस द्वारा प्रचलित), आका और प्रकृति पूजक (दुन्यी-पोलो के उपासकों सहित) शामिल हैं।

अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 3 में स्पष्ट रूप से कहा गया है – “कोई भी व्यक्ति किसी व्यक्ति को बल प्रयोग, प्रलोभन या किसी कपटपूर्ण तरीके से, प्रत्यक्ष रूप से या अन्यथा, एक धार्मिक आस्था से दूसरी धार्मिक आस्था में परिवर्तित नहीं करेगा या परिवर्तित करने का प्रयास नहीं करेगा और न ही कोई व्यक्ति ऐसे किसी धर्मांतरण के लिए उकसाएगा।”

कानून में आगे कहा गया है कि धारा 3 का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति पर ₹10,000 तक का जुर्माना और अधिकतम 2 वर्ष तक की कैद की सजा हो सकती है।

यह अधिनियम किसी व्यक्ति के धर्मांतरण के बारे में संबंधित जिले (अरुणाचल प्रदेश में) के जिलाधिकारी को सूचित करने का भी आदेश देता है। ऐसा न करने पर 1 वर्ष तक की कैद और ₹1000 तक के जुर्माने का प्रावधान है।

कानून की धारा 6 में कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत अपराध को संज्ञान में लिया जाएगा और पुलिस निरीक्षक से नीचे के अधिकारी इसकी जाँच नहीं करेंगे। अधिनियम के तहत अभियोजन के लिए पुलिस उपायुक्त की पूर्व अनुमति या अतिरिक्त सहायक आयुक्त से नीचे के पद के अधिकारी से सत्यापित कराने की आवश्यकता होती है।

धर्मांतरण विरोधी कानून के कार्यान्वयन के लिए अरुणाचल प्रदेश सरकार द्वारा नियम बनाने की माँग करते हुए गुवाहाटी हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई थी। इस मामले में बड़ी सफलता सितंबर 2024 में मिली।

न्यायमूर्ति कर्दक एटे और न्यायमूर्ति बुदी हाबुंग की खंडपीठ ने महाधिवक्ता आई. चौधरी के जवाब की जाँच के बाद जनहित याचिका को बंद कर दिया। सरकार ने कोर्ट को बताया है कि इसके नियमों को सूचीबद्ध करने के लिए 6 महीने का वक्त चाहिए।

गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर 2024 को अपने आदेश में कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि संबंधित अधिकारी अपने दायित्वों के प्रति सचेत रहेंगे और मसौदा नियमों को आज से 6 (छह) महीने की अवधि के भीतर अंतिम रूप दे दिया जाएगा।”

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री खांडू पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि गुवाहाटी उच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार, सरकार को छह महीने के भीतर मसौदा नियम तैयार करना है। यह समय सीमा अक्टूबर 2025 में समाप्त हो रही है।

यह अत्यंत आवश्यक है कि राज्य सरकार धार्मिक जनसांख्यिकी की रक्षा और स्वदेशी आस्थाओं एवं परंपराओं के संरक्षण के लिए एपीएफआरए या धर्मांतरण-विरोधी कानून लागू करे। हालाँकि ईसाई समूह इस कानून को अपनी धार्मिक पहचान पर हमले के रूप में देख रहे हैं। उन्हें ये समझने की जरूरत है कि एपीएफआरए अगर लागू होता है, तो यह ताकत से, प्रलोभन से या किसी झाँसे में आकर किए जा रहे धर्मांतरण के खिलाफ होगा।

गाजा युद्ध के दौरान इजरायल को हथियार से लेकर फाइटर जेट तक की मदद दे रहा था तुर्की, फोड़ रहा था TATA कंपनी पर ठीकरा: UN की रिपोर्ट ने खोल दी पोल

तुर्की इन दिनों भारत की मशहूर कंपनी टाटा ग्रुप पर गुस्सा निकाल रहा है। उसका ब्रॉडकास्टर टीआरटी कह रहा है कि टाटा ने इजरायल को गाजा युद्ध के लिए हथियारों के पार्ट्स दिए। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने तुर्की की पोल खोल दी। रिपोर्ट में साफ लिखा है कि तुर्की खुद इजरायल की मदद कर रहा था।

पत्रकार सिद्धांत सिब्बल ने यूएन की रिपोर्ट की कॉपी शेयर की है। सिद्धांत ने लिखा, “जिन बंदरगाहों ने एफ-35 के पुर्जों, हथियारों, जेट ईंधन, तेल और अन्य सामग्रियों को इजरायल तक पहुँचाने में मदद की है, उनमें तुर्की भी शामिल है।”

यूएन रिपोर्ट में तुर्की का आया नाम

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगस्त 2025 में जब गाजा पर इजरायल का कब्जा कर लिया, उस वक्त भी मिस्र ने इजरायल के साथ 35 बिलियन यूएस डॉलर के गैस डील की। ये इजरायल के इतिहास में सबसे बड़ी गैस डील थी। यूरोपीय यूनियन और मिस्र लगातार गाजा से नजदीक से अवैध तरीके से होकर जाने वाले गैस पाइप लाइन से गैस मँगाते रहे हैं। ये तभी भी था जब फिलिस्तीन पर इजरायल ने ताबड़तोड़ हमला किया और अभी भी है, जब गाजा पर इजरायल का कब्जा हो चुका है।

इजरायल का व्यापार और सामानों की आवाजाही दूसरे देशों के परिवहन तंत्र पर ही निर्भर रही है। अमेरिका के अलावा तुर्की, फ्रांस, इटली, बेलजियम, नीदरलैंड,ग्रीस, मोरक्को आदि देशों के बंदरगाहों से एफ-35 के पुर्जों, हथियारों, जेट ईंधन, गैस और ऑयल समेत दूसरी सामग्रियों को इजरायल तक पहुँचाए गए।

टाटा समूह पर तुर्की के आरोप

तुर्की गाजा के विनाश के लिए भारतीय कंपनी ‘टाटा समूह’ पर आरोप लगा रहा है। टीआरटी का कहना है कि इजरायल को हार्ड वेयर और दूसरे साजो सामान टाटा ने उपलब्ध कराए। टाटा समूह की कंपनी टाटा मोटर्स की सहायक कंपनी जगुआर लैंड रोवर पर एमडीटी डेविड हल्के वाहनों के चेसिस की आपूर्ति करने का आरोप लगाया।

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) पर इजरायल की वित्तीय और सरकारी प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा प्रदान करने और प्रोजेक्ट निम्बस में भागीदारी करने का आरोप लगाया है। टीआरटी का कहना है कि इसका इस्तेमाल इजरायल ने गाजा की निगरानी में किया।

टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) पर आरोप लगाया गया कि सभी नए F-16 लड़ाकू विमानों के लिए विंग और सभी AH-64 अपाचे हमलावर हेलीकॉप्टरों के लिए फ्यूज़लेज उपलब्ध कराया। जबकि इन विमानों के फ्यूल की व्यवस्था तुर्की के बंदरगाहों ने किया। इन बंदरगाहों से विमानों के कलपुर्जें और दूसरे सामान मँगाए गए। इनका इस्तेमाल गाजा युद्ध में इजरायल ने किया। तुर्की पहले अपने गिरेबान में झाँक ले। इजरायल को मदद करने के सबूत संयुक्त राष्ट्र के पास हैं।

इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध और गाजा में बमबारी के दौरान इजरायल द्वारा इस्तेमाल विस्फोटकों को पहुँचाने में तुर्की का हाथ रहा। जबकि भारत ने इस युद्ध से दूरी बनाई और मानवीय आधार पर इजरायल के साथ-साथ गाजा में रहने वाले लोगों की मदद की। तुर्की के दोगले रवैये का ये एक उदाहरण है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान का दिया था साथ

दरअसल ये वही तुर्की है, जिसने गाजा युद्ध के दौरान अपनी हवाई अड्डों को इजरायल के लिए बंद करने का ऐलान किया था। यहाँ तक कि अपने बंदरगाहों पर इजरायली जहाजों के आने पर पाबंदी लगा दी थी, लेकिन अब उसकी असलियत सामने आ गई है।

तुर्की उन चंद देशों में शामिल है, जिसकी नीति ‘भारत विरोध’ की रही है। तुर्की पर जब प्राकृतिक आपदा आई, तो उसकी मदद के लिए सबसे पहला हाथ भारत ने उठाया। लेकिन जब भारत पर पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकियों ने पर्यटकों पर हमला किया और भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकियों के ठिकानों को निशाना बनाया, तो तुर्की को ‘सार्वभौमिकता’ याद आ गई।

उसने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के वक्त भारत के खिलाफ और पाकिस्तान के समर्थन में बयान दिए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्लामाबाद के पक्ष में खड़े दिखाई दिया था। अब साजिश के तहत भारतीय कंपनियों को टारगेट किया जा रहा है। दरअसल ये सभी सामने आया था कि तुर्की में भारतीय पर्यटकों की संख्या काफी कम हो गई है।

पहले भारतीयों की पसंदीदा जगहों में इस्तांबुल हुआ करता था। हिन्दी फिल्मों की शूटिंग भी काफी यहाँ होती थी, लेकिन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान तुर्की के स्टेंड की वजह से भारत में नाराजगी दिखाई दी। सोशल मीडिया पर #BoycottTurkey हैशटैग ट्रेंड करने लगा। तुर्की की यात्रा रद्द करने की अपील की जाने लगी और पर्यटन एजेंसियों ने अपनी सेवाएँ रोक दी।

तुर्की के पर्यटन उद्योग पर काफी असर पड़ा। अनुमान के मुताबिक ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद 33.3% भारतीय पर्यटकों की संख्या यहाँ कम हो गई। इसकी खीझ निकालने के लिए अब तुर्की भारतीय कंपनियों को टारगेट कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जिन देशों ने इजरायल को जरूरी सामानों यहाँ तक कि ऑयल और गैस के आवाजाही के लिए अपनी बंदरगाह का इस्तेमाल करने दिया, उनमें तुर्की, फ्रांस, इटली,मोरक्को भी शामिल हैं। अब तुर्की से पूछा जाना चाहिए कि उसने किस आधार पर टाटा समूह पर उँगली उठाई। इजरायल के साजो सामान के लिए अपने बंदरगाह के इस्तेमाल करने की इजाजत दी। न सिर्फ तुर्की बल्कि यूरोपियन देशों और मिस्र ने गैस डील की। ये गाजा पर आक्रमण करने से अब तक जारी है।

‘अपर कास्ट’ ने नहीं की ग्रेटर नोएडा में दलित लड़के की हत्या, कॉन्ग्रेस की महिला प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने झूठ फैलाया: जानिए क्या है मामले का पूरा सच, पढ़ें FIR में और क्या

ग्रेटर नोएडा में 17 साल के दलित लड़के के साथ बेरहमी से की गई मारपीट मामले में सोशल मीडिया पर कुछ लोग अलग खेल को खेल रहे हैं। बताया जा रहा है कि अनिकेत जाटव को मारने वाले ऊँची जाति के लोग थे इसलिए उत्तरप्रदेश सरकार उसे नहीं दिलाएगी।
 
देख सकते हैं कि सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने अपने ट्वीट में लिखा है- “एक 17 के दलित लड़के की उसके जन्मदिन पर ऊँची जाति वालों ने ग्रेटर नोएडा में बुरी तरह पिटाई की। उसे मारते हुए कहा गया- तेरी औकात क्या है?”
 
शमा लिखती हैं, “हर हफ्ते- दो हफ्ते में हम ऐसी खबरें देखते हैं जहाँ भाजपा राज में दलितों को मारा जा रहा है। नरेंद्र मोदी और उनकी डबल इंजल की सरकार पूरी तरह से दलितों को बचाने में विफल हो चुकी है।”

शमा के इस ट्वीट को पढ़कर शायद किसी को भी अपर कास्ट लोगों से घृणा हो जाए कि जातिवाद के कारण एक दलित को मारा गया और आपके मन में सवर्णों के लिए यही घृणा डालना शमा मोहम्मद का मकसद है।

इस केस में हकीकत यह है कि आरोपित अनुसूचित जनजाति से आने वाले लड़के थे। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में यह बात साफ लिखी गई है कि अनिकेत के साथ जो दुर्व्यवहार और मारपीट की घटना हुई वो मीणा समुदाय से आने वाले लड़कों ने की। उन्होंने ही अनिकेत और उनके चाचा सुमित कुमार को डंडे और रॉड से पीटा था।

बाद में पुलिस ने इस केस में युवराज मीणा और जीतू मीणा को गिरफ्तार भी किया है। मगर शमा मोहम्मद जैसे लोग एक दलित लड़के की हत्या पर भी अपनी राजनीति करने में लगे हैं। उन्हें ये जानकारी भी नहीं है कि जिस समय वह ट्वीट कर रहीं थीं, उस वक्त अनिकेत की हालत क्या थी।

बता दें कि सिर्फ शमा मोहम्मद ही नहीं, समाजवादी पार्टी और भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद तक ने भी इस मामले में बिन सच्चाई को जानें सवाल उठाए। नीचे स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं कि कैसे पूरे मामले को दलित बनाम अपर कास्ट बनाने का प्रयास हुआ है।

अनिकेत ने अस्पताल में तोड़ा दम

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, घटना 15 अक्टूबर की है। अंबेडकर नगर के रबूपुरा इलाके में हुई मारपीट के बाद अनिकेत गंभीर स्थिति में अस्पताल में भर्ती में था। एक हफ्ते तक उसने यहाँ जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ी और फिर उसने दम तोड़ दिया।
 
खबर आने के बाद भाजपा विधायक धीरेंद्र सिंह भी परिवार को सांत्वना देने पहुँचे। उनकी सीएम योगी से बात कराने की भी जानकारी सामने आई है। मुख्यमंत्री ने खुद कार्रवाई का आश्वासान दिया है।

फिर भी कॉन्ग्रेस नेत्री, भीम आर्मी के नेता समेत उन जैसे लोग इस पूरे मामले में परिवार के साथ खड़े होने की जगह अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं। कभी आरोपितों को ‘अपर कास्ट’ का कहकर केस को उछाला जा रहा है तो कभी इसे ‘योगी सरकार की नाकामयाबी’ बताकर पेश किया जा रहा है।

FIR में क्या है?

इस पूरे मामले में हुई एफआईआर की कॉपी ऑपइंडिया के पास है। एफआईआर पढ़कर पता चलता है कि 15 अक्टूबर को जब सुमित और अनिकेत उसके जन्मदिन पर घूमने के लिए सयद पोखर गए थे तभी वहाँ आसिफ नाम का लड़का आया और उन्हें देखकर गया। इसके बाद ही युवराज, जीतू, रचीत, सुनील समेत कई लड़के आए और लाठी डंडे से दोनों को मारा गया। इस दौरान उनके साथ गाली-गलौच भी हुई। उन्हें जातिसूचक शब्द भी कहे गए। एफआईआर में युवराज, जीतू, रचीत, भरत, अंकित, पवन, सुनील को नामजद किया गया है। इनके अलावा 10-12 लोग अज्ञात पर केस दर्ज हुआ है।

ईटानगर में अवैध मस्जिदों के खिलाफ सड़कों पर उतरे युवा: APIYO अध्यक्ष ऑपइंडिया से बोले- ‘हर दिन 2000 तक मुस्लिम घुसपैठिए अरुणाचल में कर रहे प्रवेश’

अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में शुक्रवार (24 अक्टूबर 2025) को अरुणाचल प्रदेश इंडिजिनस यूथ ऑर्गेनाइजेशन (APIYO) के नेतृत्व में सैकड़ों की संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए। इनके हाथों में ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस जाओ’ और ‘अरुणाचल प्रदेश को बचाओ’ जैसे नारे लिखे पोस्टर थे।

दरअसल, म्यांमार से सटा अरुणाचल प्रदेश, ईसाई धर्मांतरण और इस्लामी कट्टरपंथियों की घुसपैठ की दोहरी मार झेल रहा है। सड़कों पर उतरे ये युवा भी इन्हीं इस्लामी कट्टरपंथियों की घुसपैठ से परेशान हैं। इन युवाओं की माँग है कि राजधानी ईटानगर और नाहरलागुन (जिन्हें अरुणाचल प्रदेश की जुड़वाँ राजधानियाँ कहा जाता है) में मुस्लिमों ने जमीन पर कब्जा कर 15-20 मस्जिद व अन्य इस्लामी धार्मिक स्थल बना लिए हैं जिन्हें हटा दिया जाना चाहिए।

युवाओं का यह विरोध प्रदर्शन आकाशदीप से शुरू होकर आईजी पार्क के पास टेनिस कोर्ट तक पहुँचा जहाँ सैकड़ों युवाओं ने धरना दिया। इस प्रदर्शन में APIYO के साथ ऑल कैपिटल कॉम्प्लेक्स यूथ वेलफेयर एसोसिएशन और ऑल नाहरलागुन यूथ वेलफेयर एसोसिएशन भी शामिल थे।

हर दिन 1-2 हजार मुस्लिम राज्य में कर रहे प्रवेश: APIYO अध्यक्ष लियाक

इस प्रदर्शन को लेकर ऑपइंडिया ने APIYO के अध्यक्ष तारो सोनम लियाक से बातचीत की है। लियाक ने इस बातचीत में कई हैरान करने वाले दावे किए हैं। उन्होंने बताया है कि अरुणाचल प्रदेश में हर दिन अन्य राज्यों या देशों से एक हजार से दो हजार मुस्लिम व्यक्ति इनर लाइन परमिट (ILP) दिखाकर प्रवेश कर रहे हैं।

हालाँकि, उन्होंने इसके बाद जो बताया वो भी खतरनाक है। लियाक के मुताबिक, ये लोग ILP दिखाकर घुस जाते हैं लेकिन फिर भीड़ में गायब हो जाते हैं और वापस अपने मूल स्थान पर नहीं लौटते हैं।

लियाक का कहना है कि मुस्लिमों की बढ़ती जनसंख्या डेमोग्राफी में बदलाव का मामला तो है ही। इसके अलावा राज्य की सांस्कृतिक और सामाजिक सुरक्षा पर भी इससे गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

लियाक ने आरोप लगाया कि बाहरी लोगों के बढ़ते ठिकानों के कारण ड्रग्स और नशे की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है, जिससे स्थानीय युवाओं पर गहरा असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा, “अगर सरकार ने समय रहते कदम नहीं उठाए, तो अरुणाचल की सांस्कृतिक पहचान खतरे में पड़ जाएगी।”

APIYO ने राज्य के मुख्य सचिव को लिखा पत्र

APIYO ने इन घटनाओं को लेकर अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव को भी पत्र लिखा है। ऑपइंडिया के पास मौजूद दो पन्नों के इस पत्र में माँग की गई है कि जुड़वाँ राजधानी परिसर के भीतर जामा मस्जिद/मदरसा के अवैध निर्माण को तत्काल रद्द किया जाए और जुड़वाँ राजधानी शहर ईटानगर और नाहरलागुन में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को तत्काल हटाया जाए।

APIYO ने पत्र में लिखा है, “जुड़वाँ राजधानी शहर 13730 से अधिक मुस्लिम आबादी रह रही है लेकिन इसमें से 20% मुस्लिम आबादी बांग्लादेशी है, जो राज्य के हमारे मूल निवासियों के लिए एक बड़ा खतरा है।”

APIYO ने लिखा, “राज्य सरकार की जानकारी के बिना जुड़वाँ राजधानी परिसर के भीतर 10 से अधिक अवैध जामा मस्जिदें चल रही हैं, जो मूल निवासियों के लिए बहुत असुरक्षित है। इसलिए, जुड़वाँ राजधानी शहर के भीतर केवल 2 जामा मस्जिदों की अनुमति देना आवश्यक है और राज्य के मूल निवासियों के हित में अन्य को तुरंत हटा दिया जाना चाहिए।”

इसके अलावा संगठन ने राजधानी परिसर और उसके नजदीक दोईमुख, होलोंगी आदि जगहों पर साप्ताहिक बाजार पर प्रतिबंध लगाए जाने की माँग की है। पत्र में लिखा गया है, “राजधानी परिसर और उसके पड़ोसी क्षेत्रों जैसे दोईमुख और होलोंगी आदि में हर दिन साप्ताहिक बाजार लगता है, जहाँ बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी व्यापारिक उद्देश्य से बाहर से हमारे राज्य में आते हैं और राजधानी परिसर में किराए के कमरों में रहते हैं, जो हमारे स्थानीय स्वदेशी व्यापारिक समुदाय के लिए एक खतरा है।”

साथ ही, संगठन की चिंता है कि राज्य में बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी प्रवेश कर रहे हैं और अगर इसे समय रहते नहीं रोका गया तो अपराध दर बढ़ने की बहुत संभावना है।

मुख्य सचिव को APIYO का पत्र (फोटो साभार: तारो सोनम लियाक)

प्रशासन ने शुक्रवार को प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए और पूरा विरोध शांतिपूर्वक संपन्न हुआ। हालाँकि, संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने उनकी माँगों पर जल्द कार्रवाई नहीं की, तो आंदोलन को राज्यव्यापी स्तर पर तेज किया जाएगा।

हालाँकि, प्रशासन ने कार्रवाई का भरोसा दिया है और मस्जिदों की जाँच की है लेकिन संगठन के लोग इस जाँच से संतुष्ट नहीं हैं। लियाक का कहना है कि वह चाहते हैं कि सरकार 15 दिनों के भीतर-भीतर इस पर सही तरीके से कार्रवाई करे वरना वह इस विरोध को राज्य स्तर तक लेकर जाएँगे।

गौरतलब है कि सीमावर्ती राज्य होने के कारण अरुणाचल प्रदेश में बाहरी राज्यों के लोगों को प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट (ILP) लेना अनिवार्य है। APIYO जैसे स्थानीय संगठनों का आरोप है कि इस व्यवस्था का दुरुपयोग कर बड़े पैमाने पर अवैध बसावट की जा रही है।

हिंडनबर्ग की तर्ज पर वॉशिंगटन पोस्ट का प्रोपेगेंडा, LIC-अडानी के निवेश को लेकर फैलाया झूठ: कथित ‘पत्रकारों’, ‘विशेषज्ञों’ और गैर-मौजूद ‘आंतरिक दस्तावेजों’ का लिया सहारा

अमेरिकी अखबार द वाशिंगटन पोस्ट ने शुक्रवार (24 अक्टूबर 2025) को अडानी समूह और मोदी सरकार की छवि को खराब करने की कोशिश की। अखबार ने बिना सबूत दिए ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ (सरकार-उद्योगपतियों के बीच साठगांठ) या ‘भ्रष्ट पूँजीवाद’ के आरोप लगाते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की।

यह रिपोर्ट ‘India’s $3.9 billion plan to help Modi’s mogul ally after U.S. charges’ शीर्षक से प्रकाशित की गई है। इसमें दावा किया गया कि मोदी सरकार ने भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) पर दबाव डालकर अडानी समूह में निवेश कराने की योजना बनाई थी।

‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने कहा कि उसने आंतरिक दस्तावेज हासिल किए हैं, जिनसे यह पता चलता है कि सरकारी अधिकारियों ने मई महीने में एक प्रस्ताव तैयार कर उसे आगे बढ़ाया, जिसके तहत लगभग $3.9 बिलियन (करीब 32,000 करोड़ रुपए) का निवेश LIC के जरिए अडानी समूह की कंपनियों में कराने की बात थी। अखबार का आरोप है कि यह कदम मोदी सरकार के प्रभाव में लिया गया ताकि अडानी समूह को मदद मिल सके।

वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित प्रचार लेख का स्क्रीनशॉट

जहाँ ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने इसे किसी ‘एक्सक्लूसिव जानकारी’ के रूप में पेश करने की कोशिश की, वहीं वास्तव में यह निवेश अडानी समूह ने खुद मई महीने में एक प्रेस रिलीज में घोषित किया था।

अडानी समूह ने कहा था, “देश की सबसे बड़ी ट्रांसपोर्ट कंपनी अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड (APSEZ) ने 15 साल की अवधि के लिए 5,000 करोड़ रुपए जुटाए हैं। यह रकम कंपनी ने नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) जारी करके जुटाई है। कंपनी की मजबूत आर्थिक स्थिति और ‘AAA/Stable’ क्रेडिट रेटिंग के चलते इस पर 7.75% सालाना ब्याज दर तय की गई है। इस पूरे इश्यू को भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने खरीदा है। ये डिबेंचर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर सूचीबद्ध किए जाएँगे।।”

साधारण शब्दों में, NCD एक फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रूमेंट है, जिसमें निवेशक को ब्याज मिलता है लेकिन इसे कंपनी के शेयर में बदलने का विकल्प नहीं होता। इस LIC-अडानी डील में, LIC को 7.75% वार्षिक ब्याज मिलेगा और 5000 करोड़ रुपए की मूल राशि परिपक्वता यानी 2040 में वापस मिल जाएगी।

LIC जैसी संस्था के लिए, अडानी पोर्ट्स में यह निवेश एक सुरक्षित और पूर्वानुमानित आय का स्रोत होगा, क्योंकि इसमें जोखिम कम है और क्रेडिट रेटिंग AAA/Stable है।

साथ ही यह बताना भी जरूरी है कि भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की जीवन बीमा कंपनी LIC ने कई निजी कंपनियों में भारी निवेश किया है।

उदाहरण के लिए, LIC के प्रमुख निवेशों में रिलायंस इंडस्ट्रीज (1.38 लाख करोड़ रुपए), ITC Ltd (82,342 करोड़ रुपए), HDFC बैंक, TCS, IDBI बैंक, ICICI बैंक, भारती एयरटेल, SBI, L&T और इंफोसिस शामिल हैं।

इसलिए, यह असामान्य नहीं है कि LIC ने अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन लिमिटेड (APSEZ) में भी 5000 करोड़ रुपए का निवेश किया।

फिर भी ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने बिना ठोस सबूत के आरोप लगाया कि मोदी सरकार किसी तरह करदाता के पैसे का इस्तेमाल करके एक भारतीय समूह की मदद कर रही है, जो कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है।

‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने ‘आंतरिक दस्तावेज’ के हवाले से दावा किया कि भारत के वित्तीय सेवा विभाग (DFS) ने LIC को अडानी ग्रुप में निवेश करने से सावधान किया था। हालाँकि, ऐसे किसी ‘आंतरिक दस्तावेज’ के होने की पुष्टि नहीं हुई है।

अखबार ने एक दस्तावेज के हवाले से दावा किया, “DFS के दस्तावेजों में यह स्वीकार किया गया कि प्रस्तावित निवेश योजना में जोखिम हैं। अडानी की सिक्योरिटीज विवादों के प्रति संवेदनशील हैं… जिससे अल्पकालिक कीमत में उतार-चढ़ाव हो सकता है।”

रिपोर्ट में अखबार ने एक तथाकथित ‘स्वतंत्र विशेषज्ञ’ हेमिंद्रा हजारी का हवाला देते हुए भारतीय सरकार, LIC और अडानी ग्रुप की ईमानदारी पर सवाल उठाने की कोशिश की।

इसके बावजूद, ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ को यह मानना पड़ा कि LIC द्वारा किया गया निवेश पूरी तरह पारदर्शी प्रक्रिया के तहत हुआ था यानी सभी नियामक नियमों का पालन करते हुए, पूरी जाँच-पड़ताल (due diligence) के साथ और आर्थिक लाभ को ध्यान में रखकर निवेश किया गया था।

अखबार ने Hindenburg रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसे अब खारिज कर दिया गया है, ताकि अडानी समूह के खिलाफ बिना सबूत भ्रष्ट पूँजीवाद के आरोप फैलाए जा सकें।

एलआईसी ने वाशिंगटन पोस्ट के दावों को खारिज किया

भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने शनिवार (25 अक्टूबर 2025) को जारी बयान में कहा, “द वाशिंगटन पोस्ट द्वारा लगाए गए यह आरोप कि LIC के निवेश निर्णय बाहरी दबावों से प्रभावित होते हैं, पूरी तरह झूठे, बेबुनियाद और वास्तविकता से दूर हैं।”

सार्वजनिक क्षेत्र की इस बीमा कंपनी ने किसी भी आंतरिक दस्तावेज के अस्तित्व के दावे को भी खारिज किया, जो अखबार की रिपोर्ट की एकमात्र आधारशिला थी।

LIC ने स्पष्ट किया, “इस तरह का कोई दस्तावेज या योजना कभी तैयार नहीं की गई है, जो LIC के द्वारा अडानी समूह में निवेश के लिए रोडमैप बनाए। निवेश निर्णय LIC अपने बोर्ड-स्वीकृत नीतियों के अनुसार स्वतंत्र रूप से, विस्तृत परिश्रम (due diligence) करने के बाद ही लेता है।”

अडानी ग्रुप ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि वित्तीय सेवा विभाग (DFS) या कोई अन्य सरकारी संस्था उसके निवेश निर्णयों में किसी भी तरह की भूमिका नहीं निभाती है।

कंपनी ने कहा, “LIC ने हमेशा उच्चतम स्तर की जाँच-पड़ताल (due diligence) सुनिश्चित की है। उसके सभी निवेश निर्णय मौजूदा नीतियों, कानूनी प्रावधानों और नियामक दिशानिर्देशों के पूरी तरह पालन के साथ, अपने सभी निवेशकों और हितधारकों के सर्वोत्तम हित में लिए गए हैं।”

अडानी समूह ने क्रोनी कैपिटलिज्म के आरोपों से इनकार किया

अडानी समूह ने भी द वाशिंगटन पोस्ट द्वारा लगाए गए भ्रष्ट पूँजीवाद के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

समूह ने कहा, “हम यह साफ तौर पर कहते हैं कि हमारा किसी भी कथित सरकारी योजना से कोई संबंध नहीं है, जिसके तहत LIC के फंड्स को निर्देशित किया गया हो। LIC कई कॉरपोरेट समूहों में निवेश करती है, इसलिए यह कहना कि अडानी ग्रुप को कोई विशेष तरजीह दी गई, भ्रामक है।”

LIC ने आगे कहा, “इसके अलावा, LIC को हमारे पोर्टफोलियो में किए गए निवेश से अच्छा रिटर्न मिला है। राजनीतिक पक्षपात या किसी विशेष सरकारी समर्थन के दावे पूरी तरह निराधार हैं। हमारा विकास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय नेतृत्व से पहले ही शुरू हो चुका था।”

अडानी और मोदी सरकार पर निशाना साधने वाली संदिग्ध रिपोर्ट के पीछे ‘पत्रकार’

इस तथाकथित ‘हिट-पीस’ रिपोर्ट के पीछे जिन कथित पत्रकारों का नाम सामने आया है, उनमें से एक प्रांशु वर्मा हैं।

ऑपइंडिया ने दिसंबर 2023 में रिपोर्ट किया था कि वह अमेरिकी राजनीतिक टिप्पणीकार जैक पोसोबिक से भारतीय OSINT (ओपन सोर्स इंटेलिजेंस) हैंडल ‘Disinfo Lab’ के बारे में जानकारी माँग रहे थे।

प्रंशु वर्मा, जो फरवरी 2022 से The Washington Post में काम कर रहे हैं, कथित तौर पर जैक पोसोबिक को ‘Disinfo Lab’ से जुड़ी जानकारियाँ साझा करने से रोकना करना चाहते थे।

उन्होंने जनवरी 2023 में एक लेख ‘Tracking rising religious hatred in India, from half a world away’ में इस्लामवादी रकीब हामिद नाइक की सकारात्मक झलक पेश की। रकीब हामिद नाइक एक कुख्यात फर्जी समाचार फैलाने वाला है और ‘Hindutva Watch’ नाम के एक एंटी-हिंदू प्रोपेगेंडा प्लेटफॉर्म का संस्थापक भी है।

प्रांशु वर्मा के लेख का स्क्रीन शॉर्ट

वह (रकीब हामिद नाइक) कश्मीर घाटी में 1990 के दशक की शुरुआत में कट्टर इस्लामवादियों द्वारा किए गए हिंदू जनसंहार को नकारने के लिए भी कुख्यात है। नाइक ने काशी में ज्ञानवापी मस्जिद के भीतर पाए गए हिंदू शिवलिंग का भी मजाक उड़ाया था।

प्रांशु वर्मा ने जनवरी 2023 में अपने लेख में DOTO द्वारा उपलब्ध कराए गए डेटाबेस का हवाला देकर भारत में धार्मिक घृणा बढ़ने का दावा किया। ‘Disinfo Lab’ ने पहले DOTO की फर्जी रिपोर्टों को उजागर किया था, जिसके बाद DOTO ने डेटाबेस को पहले संशोधित किया और फिर हटा दिया।

लेख के सह-लेखक एक अन्य ‘पत्रकार’ रवि नायर हैं, जो वामपंथी प्रचार पोर्टल ‘द वायर’ के कॉलमिस्ट हैं।

इस साल सितंबर में, दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें ऐसा कथित defamatory content हटाने का आदेश दिया, जो उन्होंने हिंडनबर्ग रिसर्च के झूठ पर आधारित प्रकाशित किया था ताकि व्यवसायी गौतम अडानी की छवि खराब की जा सके।

रवि नायर ने फरवरी 2025 में ब्रिटिश अखबार द गार्जियन में अडानी समूह के बारे में झूठ फैलाए। मोदी सरकार पर निशाना साधने की हताशा में, इस ‘पत्रकार’ ने खुद को बेवकूफ बनाते हुए भारतीय रुपए की तुलना अफगानिस्तान की मुद्रा से कर दी।

ऑपइंडिया ने पहले यह भी बताया था कि ऑस्ट्रेलिया की NGO समर्थित पोर्टल ‘Adani Watch’ लगभग सभी भ्रामक लेखों को रीट्वीट करता है, जो रवि नायर द्वारा प्रकाशित किए जाते हैं। यह पत्रकार हिंदू भावनाओं का मजाक उड़ाने और नियमित रूप से हिंदू विरोधी (Hinduphobic) सामग्री फैलाने के लिए जाना जाता है।

उन्होंने पहले स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के बारे में झूठ फैलाए और उसके ध्वस्त करने की भी माँग की। रवि नायर राफेल डील के बारे में भी झूठ फैलाने और भारत की रक्षा खरीद को रोकने में आगे रहे, हालाँकि इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में दिबाकर दत्ता ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

‘कट्टा-दुनाली’ से लेकर ‘यादव रंगदार बनेंगे’ तक: बिहार चुनाव से जुड़े RJD समर्थकों के गानों में दिख रही जंगलराज की झलक, चुनावी मंचों पर भी परोसी जा रही अश्लीलता

बिहार विधानसभा चुनाव का माहौल पूरी तरह गर्म हो चुका है। जहाँ एक ओर NDA सुशासन, विकास और बिहार के गौरव को मुद्दा बना रहा है, वहीं दूसरी ओर आरजेडी और उसके समर्थक अपने चुनावी प्रचार में हिंसा, बंदूक और अश्लीलता का सहारा लेकर राजनीतिक स्तर को गिरा रहे हैं। गीतों के माध्यम से होने वाला यह ध्रुवीकरण दिखा रहा है कि आरजेडी सत्ता में वापसी के लिए किस हद तक जा सकती है।

मनोज तिवारी का ‘हाँ, हम बिहारी हैं जी’: बिहार की पहचान का गीत

बीजेपी नेता और लोकप्रिय भोजपुरी गायक मनोज तिवारी ने बिहार के सम्मान में गाना ‘हाँ, हम बिहारी हैं जी’ रिलीज किया है, जिसे जनता खूब पसंद कर रही है। यह गीत सकारात्मकता और संस्कृति पर आधारित है। गाने की शुरुआत ‘हाँ, हम बिहारी हैं जी… माटी को सोना कर दें, वाली कलाकारी है जी…’ से होती है।

यह गीत बिहार की मेहनतकश जनता, कला, इतिहास और मिट्टी की खुशबू को सलाम करता है। इसमें बिहार के सबसे बड़े पर्व छठ पूजा का भी सुंदर जिक्र है। यह गाना NDA के उस संदेश को मजबूती देता है, जिसमें बिहार की पहचान को गरीबी या गुंडागर्दी से नहीं, बल्कि मेहनत और संस्कृति से जोड़ा जाता है।

RJD समर्थकों के गानों में हिंसा और गोली-बारूद का प्रचार

मनोज तिवारी के सकारात्मक प्रचार के ठीक उलट, RJD के समर्थक और उनसे जुड़े यूट्यूब गायक हिंसा और गुंडागर्दी को बढ़ावा दे रहे हैं। ये गाने सीधे तौर पर मतदाताओं को धमका रहे हैं और पुराने ‘जंगलराज’ की वापसी का संकेत दे रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी चुनावी रैली में इन गानों पर तीखा हमला बोला है और इन्हें ‘कट्टा-दुनाली’ का प्रचार बताया है। BJP ने अपने X हैंडल पर RJD की मानसिकता और हिंसा वाले गानों का एक लूप पोस्ट किया है। पहले गाने के बोल हैं- ‘लेके दुनाली दिवाली हम मनाइबो गोली के छल्ला से रे… भैया के आवे दे सता ता कट्टा सता के उठा लेबो घारा से रे…’ यह गाना कहता है कि दोनाली बंदूक से दिवाली मनाई जाएगी और RJD के सत्ता में आने पर बंदूक की नोक पर लोगों को उनके घर से उठा लिया जाएगा।

मोदी ने इसे ‘जंगलराज की वापसी की धमकी’ बताया और कहा कि RJD समर्थक बिहार को फिर उसी हिंसक दौर में धकेलना चाहते हैं, जिससे NDA सरकार ने राज्य को बाहर निकाला था।

हिंसक गानों की लंबी फेहरिस्त

यह कोई एक गाना नहीं है। RJD समर्थकों की ओर से ऐसे कई गाने सोशल मीडिया पर चल रहे हैं। पहला गाना- ‘भैया के आवे दे सत्ता में, उठा लेब सटा के कट्टा घरा से रे’। इसमें वोट न देने वालों को बंदूक से उठाने की बात है। दूसरा गाना- ‘RJD सरकार बनेगी तो यादव रंगदार बनेंगे, घर-घर हथियार रखे जाएँगे’। यह गाना साफ तौर पर जातीय और हिंसक संदेश दे रहा है।

इसके अलावा, ‘कट्टा-दुनाली’ और ‘गोली के छल्ला’ जैसे शब्द बार-बार इन गानों में दोहराए गए हैं। कुछ गानों में विरोधियों को जलाने तक की धमकियाँ दी गई हैं। एक गाने में RJD समर्थित यूट्यूबर गुंडे आरजेडी को हराने वालों को जलाने की धमकी दे रहे हैं। मतलब जनता या तो RJD की गुंडागर्दी झेलकर भी वोट दे या जला दी जाए।

ये गाने सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि बिहार के वोटरों को डराने और हिंसा का माहौल बनाने की कोशिश हैं।

RJD समर्थकों के गानों में जातिवाद और अश्लीलता का जहर

RJD समर्थकों और उससे जुड़े यूट्यूब चैनलों पर अब गानों में सिर्फ बंदूक नहीं, बल्कि अश्लीलता भी खुलकर परोसी जा रही है। भोजपुरी संगीत, जो कभी भिखारी ठाकुर और सारधा सिन्हा जैसे कलाकारों की वजह से संस्कृति का आईना था, अब फूहड़ता और महिला विरोधी बोलों का मंच बन चुका है। ‘बैगन लेल’, ‘चदरा में अदरा’ और ‘लॉलीपॉप लागेलू’ जैसे गीतों में महिलाओं को वस्तु की तरह दिखाया गया। यही गायक अब राजनीति में उतरकर समाज सुधार की बात कर रहे हैं।

RJD ने इस बार खेसारी लाल यादव को टिकट दिया है, जबकि जनसुराज पार्टी ने रितेश पांडेय को मैदान में उतारा है। इन दोनों पर अश्लील गाने गाने के आरोप हैं। खेसारी लाल के कई वायरल गीतों में महिलाओं के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल हुआ है, जबकि रितेश पांडेय के ‘बैगन लेल’ जैसे गाने खुलेआम फूहड़ता को बढ़ावा देते हैं। अब यही कलाकार जनता के वोट माँग रहे हैं। सवाल यह है कि जो गानों में महिला का मजाक उड़ाते हैं, क्या वे विधानसभा में महिला सशक्तिकरण की बात करेंगे?

बिहार की जनता को सोचने की जरूरत

आज बिहार की जनता के सामने दो तस्वीरें हैं। एक तरफ मनोज तिवारी का ‘हाँ, हम बिहारी हैं जी’, जो बिहार की मिट्टी, मेहनत और संस्कृति का गीत है। दूसरी तरफ RJD समर्थकों के हिंसक और अश्लील गाने, जो जंगलराज की याद दिलाते हैं। वोटरों को तय करना है कि वे विकास और शांति की राह चुनेंगे या गोलियों और गुंडागर्दी की। बिहार अब पुराना जंगलराज नहीं चाहता- वह वही बिहार बनना चाहता है, जो मेहनत, सम्मान और सुशासन पर गर्व करे।

मामला लव जिहाद का, मीडिया खेल रहा अदालत की टिप्पणी पर: जानिए कैसे अफाक अहमद के केस को दिया गया एंगल, छिपाई गई आरिफ-सादिक की करतूत

हाल में इलाहाबाद कोर्ट की एक टिप्पणी पर मीडिया में जमकर खबरें चल रही हैं। हेडलाइन दी जा रही है कि कोर्ट ने कहा है कि वॉट्सऐप पर भेजे गए ‘अनकहे शब्द’ भी नफरत फैला सकते हैं। कई जगह इस हेडलाइन को ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे अदालत किसी के चुप रहने को भी दोषी बता रहा है, जबकि हकीकत यह है कि यह पूरा मामला लव जिहाद से जुड़ा है।

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी बिजनौर से जुड़े एक केस में की है जहाँ एक मुस्लिम युवक अफाक अहमद ने अपने खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की याचिका दाखिल की थी। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए ये जरूर कहा है,

“वॉट्सऐप पर भेजा गया कोई संदेश भले ही सीधे तौर पर धर्म का जिक्र न करे, लेकिन अगर उसमें अनकहे शब्दों और संकेतों के जरिए किसी समुदाय के खिलाफ नफरत, वैमनस्य या दुर्भावना फैलाने का भाव है, तो वह भी अपराध की श्रेणी में आएगा।”

लेकिन कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा? इसे जानिए।

पूरा मामला दरअसल लव जिहाद और जबरन धर्म परिवर्तन से जुड़ा है। अफाक अहमद का भाई आरिफ अहमद फिलहाल जेल में है। उस पर आरोप है कि उसने एक हिंदू युवती से संबंध बनाकर उसे धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने की कोशिश की और उसे दुबई ले जाने की योजना थी।

यह शिकायत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कार्यकर्ता संदीप कौशिक ने दर्ज कराई थी। शुरुआती तौर पर मामूली धाराओं में दर्ज FIR बाद में गंभीर धाराओं में तब्दील कर दी गई, जिसमें बलात्कार, धोखाधड़ी, जहर देना, फर्जीवाड़ा, और धर्म परिवर्तन अधिनियम, 2021 के तहत अपराध शामिल हैं।

इसी गिरफ्तारी के बाद अफाक अहमद ने अपने परिचितों को एक वॉट्सऐप मैसेज भेजा। उसने लिखा कि उसके भाई को राजनीतिक दबाव में झूठे मामले में फँसाया गया है और उसके परिवार के बहिष्कार की बाट कही जा रही है। उसने यह भी लिखा कि “उसे डर है कि कहीं भीड़ उसे मार न दे” लेकिन साथ ही उसने अदालत और न्याय व्यवस्था पर भरोसा जताया।

यह संदेश देखने में साधारण लगा पर अदालत ने इसे बहुत गंभीरता से लिया। जस्टिस जे जे मुनिर और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने कहा कि “संदेश के शब्द सीधे तौर पर धर्म का उल्लेख नहीं करते, लेकिन उसमें जो अनकहा संदेश है, वह साफ तौर पर यह धारणा देता है कि आरोपित का भाई मुसलमान होने की वजह से निशाना बनाया गया है।” अदालत ने कहा “यह वही ‘unsaid words’ हैं जो किसी खास समुदाय की धार्मिक भावनाएँ भड़का सकते हैं और दो समुदायों के बीच दुश्मनी, घृणा और अविश्वास का माहौल पैदा कर सकते हैं।”

कोर्ट ने साफ कहा कि भले ही यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353(3) (धार्मिक स्थल पर अपराध) के अंतर्गत न आता हो, लेकिन धारा 353(2) के तहत यह अपराध बनता है क्योंकि यह संदेश नफरत फैलाने की क्षमता रखता है। अदालत ने कहा कि “यह मामला केवल एक व्यक्ति की निजी पीड़ा का नहीं है, बल्कि यह समाज के साम्प्रदायिक ताने-बाने को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।”

इसलिए कोर्ट ने अफाक अहमद की याचिका को खारिज करते हुए कहा, “मामला जाँच के योग्य है और इसे शुरुआती चरण में रोका नहीं जा सकता।”

यह पहला मौका नहीं है जब किसी मुस्लिम परिवार पर  लव जिहाद  के आरोपों के बाद ऐसे विवाद खड़े हुए हों। अदालत ने इस बार यह स्पष्ट किया कि धार्मिक पहचान के नाम पर खुद को पीड़ित बताने वाले बयान भी अप्रत्यक्ष रूप से नफरत फैलाने का जरिया बन सकते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि अफाक के परिवार पर एक नहीं बल्कि तीन-तीन FIR दर्ज हो चुकी हैं, एक उसके भाई आरिफ पर, दूसरी खुद अफाक पर और तीसरी उनके चाचा सादिक पर, जिन्होंने स्थानीय चैनल पर बयान दिया था कि “उसके भतीजे को फँसाया गया है।”

RSS कार्यकर्ता संदीप कौशिक, जिन्होंने सबसे पहले शिकायत दर्ज कराई थी, उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस से कहा की “लड़की का परिवार डर के साये में था। मैंने एक जिम्मेदार नागरिक की तरह पुलिस में रिपोर्ट की। यह समाज की सुरक्षा का मामला था।”

तेजस्वी यादव: महागठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा या लालू परिवार की पुरानी छाया, क्या बिहार को बदल पाएँगे या सिर्फ वादों में रह जाएँगे?

बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव को महागठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा (CM Face) घोषित किया जाना केवल एक चुनावी घोषणा भर नहीं है, यह बिहार की सत्ता की पुरानी कहानियों को फिर से जिंदा करने जैसा है। सवाल यह है कि क्या तेजस्वी वाकई नए बिहार की तस्वीर हैं या फिर अपने पिता लालू प्रसाद यादव के दौर की जंगल राज’ वाली छवि के वारिस बनकर ही रहेंगे?

लालू की विरासत और परिवारवाद का बोझ

तेजस्वी यादव ऐसे परिवार से आते हैं जिसने बिहार की राजनीति को दशकों तक अपने कब्जे में रखा। लालू प्रसाद यादव, जिनका नाम कभी ‘गरीबों का मसीहा’ तो कभी ‘घोटालों का बादशाह’ कहा गया, वही तेजस्वी के पिता हैं। लालू के राज में बिहार ने जैसा विकास देखा, उसकी गवाही आज भी टूटी सड़कें और बेरोजगारी देती हैं।

अब तेजस्वी उसी विरासत के साथ मैदान में हैं। पर सवाल यह है, क्या वे उस छवि को मिटाकर अपनी पहचान बना पाएँगे? या फिर वही परिवारवाद की राजनीति जारी रखेंगे, जहाँ कुर्सी का रास्ता सिर्फ खानदान से होकर जाता है?

लोग आज भी याद करते हैं कि लालू के दौर में भ्रष्टाचार, जातिवाद और गुंडागर्दी किस हद तक बढ़ी थी। ऐसे में तेजस्वी जब कहते हैं कि वे नया बिहार लाएँगे, तो जनता पूछती है, “भैया, पहले पुराना तो साफ कर लो।”

वादे बड़े- बड़े  पर जमीन खाली

तेजस्वी यादव हर चुनाव में 10 लाख सरकारी नौकरियों का वादा करते हैं। पर जब उनसे पूछा जाता है कि ये नौकरियाँ कहाँ से आएँगी, तो जवाब मिलता है, हम दिखाएँगे।

दरअसल, बिहार के मतदाता अब भाषणों से ज्यादा हिसाब चाहते हैं। तेजस्वी ने जब उपमुख्यमंत्री रहते हुए कोई बड़ी नीति लागू नहीं की, तो लोग सोचने लगे कि अगर आधी कुर्सी पर ये हाल है, तो पूरी कुर्सी पर क्या होगा?

फिर भी, तेजस्वी खुद की तुलना स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग से कर डालते हैं, वो भी तब जब उन्होंने खुद 9वीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है! सोशल मीडिया पर लोग बोले- “जॉब्स ने आईफोन बनाया, आपने क्या बनाया – बस भाषण?” ऐसे इनोवेटिव दावों से बिहार में तो हंसी का माहौल बन गया, लेकिन राजनीति में यह ओवरकॉन्फिडेंस अक्सर नुकसानदायक साबित होता है।

महागठबंधन का फेस पर भरोसे की कमी

महागठबंधन ने तेजस्वी को CM उम्मीदवार बनाकर साफ कर दिया है कि अब यह चुनाव ‘लालू परिवार बनाम बाकी सब’ होने वाला है। पर अंदरखाने में सब ठीक नहीं है, कॉन्ग्रेस नाराज है, पप्पू यादव खुलेआम कह रहे हैं कि वोट तो राहुल गाँधी के चेहरे पर पड़ेगा, तेजस्वी पर नहीं।

जब गठबंधन के साथी ही भरोसा न करें, तो जनता क्या करेगी?

उधर, बीजेपी और एनडीए तेजस्वी को भ्रष्टाचार का चेहरा बताकर घेर रही है। चारा घोटाला, भूमि के बदले नौकरी घोटाला और अब ‘माई-बहन योजना’ में धोखाधड़ी, ये सारे पुराने आरोप फिर से गूँज रहे हैं। यानी तेजस्वी का नया बिहार वाला दावा, पुराने आरोपों के कीचड़ में बार-बार फँस जाता है।

तेजस्वी यादव अब महागठबंधन का चेहरा हैं और बिहार की जनता उन्हें गंभीरता से देख रही है। पर समस्या यह है कि तेजस्वी की राजनीति वादों और ट्वीट्स तक सीमित लगती है। जमीनी स्तर पर कोई बड़ा परिवर्तन नहीं दिखता।

अगर तेजस्वी को वाकई बिहार बदलना है, तो उन्हें यह साबित करना होगा कि वे केवल लालू के बेटे नहीं एक सक्षम प्रशासक हैं। फिर चाहे वह नौकरी देने का वादा हो, निवेश लाने का या अपराध पर नियंत्रण का। अब जनता को आंकड़े चाहिए भावनाएँ नहीं।

चेहरा नया, तरीका पुराना

तेजस्वी यादव का मुख्यमंत्री चेहरा बनना महागठबंधन के लिए एक राजनीतिक जुआ है।
अगर उन्होंने वाकई अपने पिता की ‘जंगल राज’ वाली छवि को पीछे छोड़ दिया और सुशासन की नई परिभाषा दी, तो वे बिहार के इतिहास में अलग जगह बना सकते हैं।

पर अगर वही पुराने आरोप, वही परिवारवाद और वही वादों की राजनीति जारी रही तो जनता कहेगी, “नाम बदल गया, पर नजरिया वही रहा, लालू 2.0 बस नए पैकिंग में।”

अंत में मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा कि बिहार की जनता अब परिपक्व है। उसे ‘परिवार का चेहरा’ नहीं, ‘काम का चेहरा’ चाहिए। तेजस्वी यादव चाहे कितने भी पोस्टर लगवा लें, पर अगर नतीजे वही पुराने रहे, तो महागठबंधन का CM फेस चुनाव के बाद सिर्फ सेल्फी फेस बनकर रह जाएगा।

दिल्ली की प्रदूषित हवा पर बरसेगी राहत की बारिश, IIT कानपुर के सहयोग से पहले आर्टिफिशियल रेन की तैयारी पूरी: जानें कैसे सूखे और ठंड में बरसेंगे बदरा

दिल्ली की प्रदूषित हवा से राहत दिलाने के लिए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। उनकी पहल पर राजधानी में पहली बार आर्टिफिशियल बारिश (Artificial Rain) कराने की तैयारी पूरी हो चुकी है। मौसम विभाग के मुताबिक, 28 से 30 अक्टूबर के बीच दिल्ली-एनसीआर में पर्याप्त बादल छाने की संभावना है और 29 अक्तूबर 2025 को दिल्ली वासी पहली आर्टिफिशियल बारिश का अनुभव करेंगे।

दिलचस्प बात यह है कि ऐसा प्रयास पहले आम आदमी पार्टी सरकार ने भी करने की घोषणा की थी, लेकिन तकनीकी और मंजूरी के कारण वह इसे पूरा नहीं कर सकी थी। अब रेखा गुप्ता सरकार ने उस अधूरे वादे को साकार करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इस प्रोजेक्ट की कुल लागत ₹3.21 करोड़ है, जिसे IIT कानपुर, आईएमडी (भारतीय मौसम विभाग) और दिल्ली सरकार मिलकर चला रहे हैं।

क्यों जरूरत पड़ी कृत्रिम बारिश की?

दिल्ली में हवा की गुणवत्ता हर साल गंभीर रूप से गिरती है और राजधानी में प्रदूषण बढ़ जाता है। इस बार भी सड़कों पर चल रही गाड़ियों के धुआँ, औद्योगिक फैक्ट्रियों और निर्माण कार्यों के कारण हालत और खराब हो गई है। इस वजह से साँस लेना मुश्किल हो गया है, खासकर बुजुर्गों, बच्चों और साँस से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए।

बारिश चाहे प्राकृतिक हो या आर्टिफिशियल, हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 जैसे प्रदूषक कणों को नीचे गिरा देती है। यही वजह है कि दिल्ली सरकार ने क्लाउड सीडिंग तकनीक से बारिश कराने का फैसला किया है ताकि लोगों को कुछ दिनों के लिए राहत मिल सके।

वैज्ञानिकों का कहना है कि आर्टिफिशियल बारिश के बाद प्रदूषण का स्तर लगभग 7 से 10 दिनों तक काफी हद तक कम हो जाता है। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा, “यह सिर्फ एक प्रयोग नहीं, बल्कि दिल्ली की साँसों को राहत देने का मिशन है।”

कैसे होती है कृत्रिम बारिश (क्लाउड सीडिंग प्रक्रिया)?

क्लाउड सीडिंग एक ऐसी वैज्ञानिक तकनीक है जिसमें बादलों के अंदर कुछ विशेष रासायनिक कण छोड़े जाते हैं ताकि उनमें मौजूद नमी एक-दूसरे से जुड़कर पानी की बूँदों में बदल जाए और बारिश हो सके। यह प्रक्रिया प्राकृतिक बारिश की तरह ही होती है, फर्क बस इतना है कि इसे तकनीकी रूप से तेज किया जाता है।

इसमें इस्तेमाल होने वाले मुख्य रसायन हैं-

  • सिल्वर आयोडाइड (AgI)
  • ड्राई आइस (ठोस कार्बन डाइऑक्साइड)
  • सोडियम क्लोराइड (नमक)
  • कैल्शियम क्लोराइड और मैग्नीशियम

इन रसायनों को हवाई जहाज, ड्रोन या रॉकेट की मदद से बादलों में छोड़ा जाता है। दिल्ली के इस प्रोजेक्ट में सेसना विमान का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो मेरठ, खेकड़ा, बुराड़ी, सादकपुर, भोजपुर और अलीगढ़ के ऊपर से उड़ान भरेगा।

प्रत्येक विमान में 8 से 10 केमिकल पैकेट होंगे जिन्हें बटन दबाकर छोड़ा जाएगा। एक उड़ान लगभग 90 मिनट की होगी। हालांकि यह तभी संभव है जब आसमान में पर्याप्त बादल मौजूद हों। बिना नमी के बारिश कराना संभव नहीं होता।

दुनिया में पहली बार कब और कहाँ हुई थी आर्टिफिशियल बारिश?

आर्टिफिशियल बारिश का इतिहास करीब 80 साल पुराना है। सबसे पहले 13 नवंबर 1946 को अमेरिका में वैज्ञानिक डॉ विंसेंट शेफर्ड ने यह कारनामा किया था। उन्होंने एक प्लेन से ड्राई आइस बादलों पर फेंकी, जिससे भारी बर्फबारी और बारिश शुरू हो गई। इसके बाद डॉ बेरहार्ड फॉनगुड ने सिल्वर आयोडाइड का उपयोग करके क्लाउड सीडिंग को और विकसित किया।

आज के समय में यह तकनीक कई देशों में सफलतापूर्वक अपनाई जा चुकी है। जहाँ चीन ने 2008 के बीजिंग ओलंपिक के दौरान मौसम को नियंत्रित करने के लिए क्लाउड सीडिंग तकनीक का इस्तेमाल किया था, ताकि खेलों के दौरान बारिश न हो और आयोजन सुचारू रूप से संपन्न हो सके।

वहीं, दुबई में हर साल गर्मी के मौसम में आर्टिफिशियल बारिश कराई जाती है, ताकि तापमान में कमी लाई जा सके और सूखे की स्थिति से राहत मिले। फ्रांस में भी इस तकनीक का उपयोग निजी स्तर पर किया जाता है।

वहाँ कई कंपनियाँ शादियों या बड़े आयोजनों के दौरान बारिश रोकने के लिए क्लाउड सीडिंग करवाती हैं। इसकी लागत करीब 1 करोड़ रुपए तक होती है, जो इस सेवा की बढ़ती लोकप्रियता और उपयोगिता को दर्शाता है।

भारत में कब और कहाँ हुई थी पहली कृत्रिम बारिश?

भारत में पहली बार क्लाउड सीडिंग का प्रयोग 1983 और 1987 में किया गया था। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने 1993–94 में सूखे से राहत पाने के लिए इसका इस्तेमाल किया। कर्नाटक सरकार ने 2003 में और महाराष्ट्र सरकार ने 2009 और 2015 में यह प्रयोग किया।

भारत में इस तकनीक पर सबसे ज्यादा शोध IIT कानपुर और CAIPEEX (Cloud Aerosol Interaction and Precipitation Enhancement Experiment) प्रोजेक्ट के तहत हुआ है। यही संस्थान अब दिल्ली की आर्टिफिशियल बारिश के प्रोजेक्ट में भी सहयोग कर रहा है।

कितना खर्च आता है आर्टिफिशियल बारिश पर?

क्लाउड सीडिंग कोई सस्ता प्रोजेक्ट नहीं है। एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बारिश कराने का औसत खर्च करीब 1 लाख रुपए होता है। अगर पूरी दिल्ली में बारिश कराई जाए तो खर्च 15 करोड़ रुपए से अधिक हो सकता है।

वर्तमान में दिल्ली सरकार के इस प्रोजेक्ट पर 3.21 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसमें 5 ट्रायल्स किए जाएँगे, हर ट्रायल की लागत 55 लाख रुपए से 1.5 करोड़ रुपए के बीच होगी। इसके अलावा 66 लाख रुपए शुरुआती सेटअप पर खर्च हुए हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि कृत्रिम बारिश के बाद हवा में मौजूद धूल, धुआँ और प्रदूषक नीचे बैठ जाते हैं। इससे PM2.5 और PM10 जैसे खतरनाक कणों की मात्रा घट जाती है। हवा साफ हो जाती है और साँस लेने में राहत मिलती है।

हालाँकि यह राहत अस्थाई होती है, क्योंकि प्रदूषण के स्रोत जैसे गाड़ियाँ, फैक्ट्रियाँ और निर्माण कार्य फिर से हवा को दूषित करने लगते हैं। फिर भी यह एक वैज्ञानिक और त्वरित समाधान है जो लोगों को कुछ समय के लिए राहत दे सकता है।