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अल्पसंख्यकों की बस्तियों के विकास पर ₹398 करोड़ खर्च करेगी कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार, नेटिजन्स ने ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ पर कॉन्ग्रेस को घेरा

कर्नाटक में सिद्धारमैया के नेतृत्व में चल रही कॉन्ग्रेस सरकार ने अल्पसंख्यकों की बस्तियों के कथित विकास पर ₹398 करोड़ खर्च करने का फैसला लिया है। नेटिजन्स ने इसे राज्य सरकार की’मुस्लिम तुष्टिकरण’ नीति का हिस्सा बताया है। पूछा है कि इसी तरह हिंदुओं की बस्तियों के विकास के लिए बजट क्यों नहीं आवंटित किया जाता है।

सिद्धारमैया सरकार ने शहरी इलाकों में बेहद पिछड़ी अल्पसंख्यक बस्तियों के विकास के लिए 398 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। खासतौर पर राज्य के उन 22 विधानसभा क्षेत्रों में जो मुस्लिम बाहुल्य इलाके हैं। इन क्षेत्रों में पिछड़ी और मुस्लिम कॉलोनियों को मॉडल कॉलोनियों के रूप में विकसित करने के लिए यह धनराशि जारी की गई है।

साथ ही, पानी और झीलों के विकास पर भी बड़ा खर्च किया गया है। शिगगाँव की नगनूर झील के लिए 105.19 करोड़, बांकापुर की तेवरमल्लीहल्ली झील के लिए 92.84 करोड़ और सावनूर के मोती तालाब के लिए 153.20 करोड़ मंजूर किए गए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके अलावा उत्तर कन्नड़ के येल्लापुर में गंगावली नदी पर एक नया पुल बनाया जाएगा, जिस पर 35 करोड़ खर्च रुपए खर्च होगा। वहीं बीजापुर एयरपोर्ट के लिए 618.75 करोड़ की मंजूरी पर विचार हो रहा है और मुख्य सचिव से रिपोर्ट माँगी गई है।

बागलकोट जिले के लोकापुर में कॉन्ग्रेस भवन बनाने के लिए सरकार ने 400.63 वर्ग मीटर जमीन 30 साल के लीज पर देने का फैसला किया है। मंड्या जिले के मलवली और मड्डूर तालुका में नहरों के विकास पर 293.47 करोड़, बेलगावी जिले के खानापुर तालुक में मल्लप्रभा नदी पर बैराज के लिए 50 करोड़ और मंसी तालुक में तुंगभद्रा नदी से सिंचाई परियोजना के लिए 109 करोड़ मंजूर किए गए हैं।

इसके अलावा सरकार की ओर से 35 मोबाइल हेल्थ यूनिट्स को अपग्रेड करने के लिए 12.25 करोड़ और बेंगलुरु के विक्टोरिया अस्पताल में 1,000-बेड वार्ड्स के फर्नीचर के लिए 20.05 करोड़ मंजूर हुए हैं।

कर्नाटक सरकार के इस फैसले पर लोगों का कहना है कि मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए कॉन्ग्रेस सरकार धार्मिक आधार पर पक्षपात कर रही है, क्योंकि कॉन्ग्रेस सरकार को हिंदू बस्तियों के विकास के लिए पहले कभी इतने पैसे खर्च कर योजनाओं पे चर्चा करते नहीं देखा गया है।

नेटिजन्स ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए सीधे कहा कि हिंदू करदाताओं के टैक्स की रकम का इस्तेमाल उन्हीं पर पत्थर मारने वालों के मकान बनाने पर किया जा रहा है।

थाना घेरा, अल्लाहु अकबर के नारे, देवी-देवताओं पर गंदी बातें… शाहजहाँपुर में पैगंबर मुहम्मद-कुरान पर आपत्तिजनक टिप्पणी का आरोप लगा मुस्लिम भीड़ का हंगामा

उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में शुक्रवार (12 सितंबर 2025) की शाम कथित तौर पर एक विवादित सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भारी हंगामा खड़ा हो गया। जानकारी के अनुसार, एक व्यक्ति ने पैगंबर मुहम्मद और कुरान पर कुछ अभद्र टिप्पणी की थी, जिसके बाद इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने थाने को घेर लिया। भीड़ थाने के बाहर ‘आरोपित सौंप दो’ और अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगाने लगी, जिससे माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया।

हालाँकि, पुलिस ने तत्परता से कार्रवाई करते हुए आरोपित को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन इसके बावजूद हंगामा तीन घंटे तक चलता रहा। कुछ असामाजिक तत्वों ने भीड़ का फायदा उठाकर माहौल को और भी बिगाड़ने की कोशिश की। जब समझाने की कोशिशें नाकाम हो गईं और भीड़ ने अपना उपद्रव जारी रखा, तो पुलिस को मजबूरन लाठीचार्ज करना पड़ा।

बवाल का कारण

शुक्रवार (12 सितंबर 2025) शाम करीब साढ़े छह बजे केके दीक्षित नाम के एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर पैगंबर मुहम्मद और कुरान के खिलाफ अभद्र टिप्पणी कर दी। यह टिप्पणी एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए दी गई थी, जिसमें आरोपित ने गालियाँ दी थीं। इस पोस्ट के बाद मुस्लिम समाज का गुस्सा फूटा और बदला लेने के लिए कुछ मुस्लिम युवकों ने भी देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी।

इस पर स्थानीय ईदगाह कमेटी के सदस्य कासिम रजा ने मामले की सूचना पुलिस को दी। घटना के बाद लोगों में गुस्सा था और स्थिति ज्यादा बिगड़ी, जब कुछ असमाजिक तत्व भीड़ में घुसकर माहौल को और खराब करने लगे। थाने के बाहर ‘आरोपित को सौंप दो-सौंप दो’ के नारे लगने लगे। इतने में भीड़ और उग्र हो गई और आरोपित को पकड़ने के लिए थाने के अंदर घुसने लगी।

पुलिस की कार्रवाई

पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपित के खिलाफ FIR दर्ज की और उसे गिरफ्तार कर लिया। बावजूद इसके, स्थिति शांत नहीं हुई और भीड़ ने थाना घेर लिया। पुलिस ने स्थिति को काबू करने के लिए पहले समझाने की कोशिश की और मुस्लिम समाज के मौलानाओं को बुलाकर माहौल नियंत्रण करने को कहा, लेकिन लोग नहीं माने। इसके बाद पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। पुलिस की इस कार्रवाई के बाद भगदड़ मच गई और लोग इधर-उधर भागने लगे। तीन घंटे के बाद स्थिति शांत हुई।

घटना के बाद जिला प्रशासन ने शांति बनाए रखने की अपील की है। डीएम धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि प्रशासन ने इस मुद्दे को सख्ती से लिया है और आरोपित के खिलाफ कार्रवाई की है। उन्होंने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की है और कहा कि माहौल बिगाड़ने का प्रयास करने वाले कुछ असमाजिक तत्वों को कानून के दायरे में लाया जाएगा।

वहीं, एसपी राजेश द्विवेदी ने भी कहा कि पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की और स्थिति को काबू में किया है। साथ ही, उन्होंने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है।

फ्लैग मार्च और स्थिति नियंत्रण

स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए 7 थानों की पुलिस बल और क्यूआरटी के साथ डीएम-एसपी ने फ्लैग मार्च किया। इसके बाद पुलिस ने रोड पर बैठे कुछ लोगों को समझाने की कोशिश की। डीएम ने यह भी साफ किया कि पत्थरबाजी की कोई सूचना नहीं मिली है और पुलिस पूरी तरह से स्थिति पर नजर बनाए हुए है।

यह घटना शाहजहाँपुर में तनाव का कारण बनी, लेकिन प्रशासन और पुलिस की तत्परता से स्थिति को काबू में किया गया। प्रशासन ने शांति बनाए रखने की अपील की है और लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने की गुजारिश की है।

नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री बनीं सुशीला कार्की, राष्ट्रपति के सामने ली पद की शपथ: संसद भंग करने की रखी थी शर्त, जानें-पूर्व चीफ जस्टिस के बारे में सब कुछ

नेपाल में राजनीतिक उथल-पुथल के बीच बड़ी खबर आ गई है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की ने शुक्रवार (12 सितंबर 2024) की रात करीब 9.30 बजे शीतल निवास में शपथ ग्रहण कर ली है और वे अंतरिम प्रधानमंत्री बन गई हैं। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने संसद भंग करने का फैसला लिया और कार्की को अंतरिम सरकार का नेतृत्व सौंप दिया। संविधान की धारा 61 के तहत यह नियुक्ति की गई है, जो राष्ट्रपति के अधिकारों से जुड़ी है।

राष्ट्रपति पौडेल ने सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल के साथ कई दौर की बैठकों के बाद यह फैसला लिया। पौडेल निवास पर हुई आखिरी मीटिंग में कार्की को बुलाया गया और उन्होंने जिम्मेदारी स्वीकार कर ली। जेन-जेड कोर कमेटी ने कहा कि वे कैबिनेट में जगह नहीं लेंगे, बल्कि सरकार की निगरानी करेंगे।

शपथग्रहण समारोह में उपराष्ट्रपति रामसहाय यादव, प्रधान न्यायाधीश प्रकाश सिंह रावत मौजूद रहे। वहाँ पर पूर्व प्रधानमंत्री डॉ बाबूराम भट्टराई, प्रधान सेनापति जनरल अशोक राज सिग्देल, मुख्य सचिव एकनारायण अर्याल भी मौजूद रहे। इसके अलावा काठमांडू के मेयर बालेन शाह भी शपथग्रहण समारोह में उपस्थित रहे।

सुशीला कार्की नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकी हैं। 2016 में उन्होंने यह पद संभाला था और अपने छोटे से कार्यकाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था। वे ईमानदार और निष्पक्ष न्याय के लिए जानी जाती हैं। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से राजनीति शास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट करने वाली कार्की को सभी प्रमुख राजनीतिक दलों और जेन-जेड समूहों की सहमति से चुना गया।

जानिए- PM मोदी से प्रभावित सुशीला कार्की को, जिसे GenZ ने बनाया नेपाल का प्रधानमंत्री

नई अंतरिम सरकार से भारत-नेपाल रिश्ते मजबूत होने की उम्मीद है। रात 12 बजे से इमरजेंसी लगाने की घोषणा हो सकती है। जेन-जेड ने 6 महीने में चुनाव कराने की माँग की है, जिसे स्वीकार किया गया। नेपाल में स्थिरता लौटने की उम्मीद है, लेकिन हिंसा और विदेशी साजिशों की आशंका बनी हुई है।

गौरतलब है कि जेन-जेड युवा प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार, सोशल मीडिया बैन और बेरोजगारी के खिलाफ 8-9 सितंबर को हिंसक विरोध प्रदर्शन किए थे। इन प्रदर्शनों में संसद भवन, राष्ट्रपति भवन और पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली के आवास पर आग लगा दी गई थी। अब तक 51 लोगों की मौत हो चुकी है और 1000 से ज्यादा लोग घायल हैं। जेल ब्रेक में 15,000 कैदी फरार हो गए हैं, जिससे काठमांडू में कर्फ्यू लगा हुआ है।

इस बीच, पूर्व पीएम ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ने संसद भंग का विरोध किया है। पार्टी महासचिव शंकर पोखरेल ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया और समर्थकों से सड़कों पर उतरने की अपील की।

किराएदार इमरान-नदीम ने हिंदू मकान मालिक की दुकानों पर किया कब्जा, विरोध करने पर बोल दिया हमला: बुर्काधारी बीवी-बेटियों ने भी पीटा, मुंबई के मीरा रोड का मामला

मुंबई के मीरा रोड पुलिस स्टेशन में मंगलवर (9 सितंबर 2025) को दर्ज शिकायत में आरोप है कि हिंदू मकान मालिक की दुकानों पर मुस्लिम किराएदारों ने कब्जा कर लिया। विरोध करने पर मालिक को गालियाँ-धमकियाँ दीं और अपनी बीवी-बेटियों से भी पिटवाया।

शिकायतकर्ता तृप्ति अभिषेक तिवारी ने आरोप लगाया है कि इस्माइल इमरान, नदीम व उनके परिजन (पत्नी, बेटियाँ और अन्य) ने मेटर रूम की दीवार तोड़कर रास्ता बनाया, खुले इलाके में जिम और शौचालय बनवाये, दुकान के बीचों-बीच कंक्रीट का छोटा ऑफिस खड़ा कर दिया और छत पर शेड लगा लिया। जिसके परिणामस्वरूप उनके व्यवसाय और परिवार को लगातार खतरा और परेशानियाँ झेलनी पड़ रही हैं।

मामला उस समय हिंसक रूप ले लेता है जब 9 सितंबर को अभिषेक अपनी दुकानों का जायजा लेने गए। शिकायत के मुताबिक इमरान के परिवार के सदस्यों ने अभिषेक पर लोहे की C-शेप रॉड, प्लास्टिक पाइप और लकड़ी जैसी चीजों से हमला किया, इमरान के भाई नदीम और अन्य ने भी मिलकर फलाँ-फरमान से पीटा। तृप्ति ने बताया कि उनके फोन से घटना का वीडियो जब्त कर रिकॉर्डिंग मिटा दी गई और उन्हें तथा उनके कर्मचारियों को भी पीटा गया।

आरोप है कि आरोपितों ने जान से मारने की धमकी दी और एक अवैध समूह बनाकर उत्पीड़न किया। शिकायत में यह भी उल्लेख है कि इलाके का नया नगर मुस्लिम-बहुल है और वहाँ हिंदुओं के खिलाफ प्रतिकूल परिस्थितियों का अनुभव होने लगा है।  

शिकायतकर्ता का कहना है कि बेटियों पर हमले और लगातार धमकियाँ इस समुदाय के जीवन को मुश्किल बना रही हैं।  इसी घटनाक्रम पर मीरारोड थाने में केस दर्ज कराया गया है, मामला भारतीय न्याय संहिता BNS की धाराओं के तहत पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और मामले की जाँच कर रही है।

छत्तीसगढ़ में लाल आतंक पर बड़ी चोट, सुरक्षा बलों ने ₹1 करोड़ के ईनामी माओवादी कमांडर बालकृष्ण को किया ढेर: 9 अन्य भी मारे गए

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए माओवादी संगठन को करारा झटका दिया है। गुरुवार (11 सितंबर 2025) को हुए एक एनकाउंटर में 10 नक्सली मारे गए, जिनमें सबसे बड़ा नाम मॉडेम बालकृष्ण उर्फ बालन्ना का है।

बालकृष्ण पर 1 करोड़ रुपए का ईनाम था और वह माओवादी संगठन की केंद्रीय कमेटी का सदस्य था। इसके साथ ही वह ओडिशा स्टेट कमेटी का प्रमुख भी था। पुलिस की मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में उसका नाम शीर्ष पर था।

बालकृष्ण 1983 से नक्सली गतिविधियों में सक्रिय था और पिछले 35 सालों में उसने कई बड़े हमलों की साजिश रची। छत्तीसगढ़ और ओडिशा में उसने नक्सलियों का मजबूत नेटवर्क खड़ा किया था।

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, साल 2008 में ओडिशा के नयागढ़ में हुए हमले में 13 पुलिसकर्मियों समेत 14 लोग मारे गए थे। उसी साल मलकानगिरी के बालिमेला जलाशय पर हुए हमले में 37 कमांडो बलिदान हुए थे। 2009 में कोरापुट के नाल्को प्लांट पर हमले में 11 सीआईएसएफ जवान बलिदान हुए थे। ये सभी हमले बालकृष्ण की साजिश का हिस्सा थे।

तेलंगाना के वारंगल का रहने वाला बालकृष्ण पढ़ाई में इंटरमीडिएट तक पहुँचा था। वह कई बार पुलिस की गिरफ्त में आया, लेकिन हर बार बच निकला। 1990 में टीडीपी विधायक वेंकटेश्वर राव के अपहरण के बाद उनकी रिहाई के बदले सरकार को बालकृष्ण को जेल से छोड़ना पड़ा।

हाल के सालों में वह बीमार था, लेकिन नक्सली संगठन की रणनीति बनाना जारी रखा। तीन महीने पहले जब एक अन्य बड़ा नक्सली बसवराजू मारा गया, तब बालकृष्ण ने संगठन की कमान संभाली थी।

बालकृष्ण लंबे समय से बीमार बताया जा रहा था, लेकिन वह लगातार संगठन की रणनीति बना रहा था। तीन महीने पहले जब बसवराजू नाम का बड़ा नक्सली मारा गया, तब बालकृष्ण ने मुख्य जिम्मेदारी संभाल ली थी।

सुरक्षा एजेंसियों को खबर मिली थी कि बालकृष्ण गरियाबंद रूट के जरिए ओडिशा में नक्सली सप्लाई लाइन को मजबूत करने की कोशिश कर रहा था। गुरुवार को सुरक्षा बलों ने सटीक जानकारी के आधार पर ऑपरेशन चलाया और बालकृष्ण समेत 10 नक्सलियों को मार गिराया। यह मुठभेड़ नक्सलियों के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि बालकृष्ण उनके संगठन की रीढ़ था।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस कार्रवाई की सराहना की और कहा कि सरकार की मजबूत नीति और लगातार अभियानों से मार्च 2026 तक भारत को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा। इस एनकाउंटर ने सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ाया है और नक्सलियों के खिलाफ जंग में एक नया अध्याय जोड़ा है।

अयोध्या को ‘सोलर सिटी’ बनाएगी योगी सरकार, सौर ऊर्जा से रोशन होगी सूर्यवंशी प्रभु श्रीराम की नगरी: सरयू नदी पर बनेगा 40 मेगावाट की क्षमता का पार्क

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार अयोध्या को एक आधुनिक ‘सोलर सिटी’ बनाने जा रही है। भगवान राम के सूर्यवंश की राजधानी रही अयोध्या अब सौर ऊर्जा के जरिए अपने गौरवशाली इतिहास को भविष्य से जोड़ेगी। सूर्यवंश का सूर्य देव से गहरा नाता रहा है और इसी प्रेरणा से योगी सरकार इस पवित्र नगरी को स्वच्छ ऊर्जा का मॉडल बनाना चाहती है। यह प्रोजेक्ट देश के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।

क्या है सोलर सिटी प्रोजेक्ट?

उत्तर प्रदेश नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा विभाग (UPNEDA) इस प्रोजेक्ट को लीड कर रहा है। अयोध्या को सोलर सिटी बनाने का मतलब है कि यहाँ बिजली का बड़ा हिस्सा सौर ऊर्जा से आएगा। इस मॉडल को बाद में प्रदेश के 16 अन्य नगर निगमों और नोएडा में लागू किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत अयोध्या में सौर ऊर्जा से चलने वाली कई सुविधाएँ शुरू की जाएँगी।

अयोध्या सोलर सिटी प्रोजेक्ट की खास बातें

सौर पैनल की स्थापना: अयोध्या के 117 सरकारी इमारतों की छतों पर 2.5 मेगावाट के सौर पैनल लगाए जाएँगे। इसमें राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय में 250 किलोवाट, कृषि विश्वविद्यालय में 155 किलोवाट, जिला कोर्ट में 100 किलोवाट, राम कथा संग्रहालय में 58 किलोवाट और कई सरकारी स्कूलों में 50 किलोवाट के सौर पैनल शामिल हैं।

सौर पार्क: सरयू नदी के किनारे 40 मेगावाट का सोलर पार्क बनाया जाएगा, जो अयोध्या की 40% बिजली जरूरतों को पूरा करेगा। यह पार्क रामपुर हलवारा, मांझा क्षेत्र में बन रहा है।

सौर उर्जा से जुड़ी बुनियादी सुविधाएँ: शहर में सौर ऊर्जा से चलने वाली स्ट्रीट लाइट्स, सोलर चार्जिंग पॉइंट, पेयजल कियोस्क और सोलर ट्री लगाए जाएँगे। साथ ही, सरयू नदी में सौर ऊर्जा से चलने वाली नावें भी शुरू होंगी।

इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा: सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित कर रही है। लोगों को अपनी छतों पर सौर पैनल लगाने के लिए सब्सिडी भी दी जाएगी।

कब तक पूरा होगा प्रोजेक्ट?

यह पाँच साल का प्रोजेक्ट है, जो 2023 में शुरू हुआ और 2028 तक पूरा होगा। यह उत्तर प्रदेश की सौर ऊर्जा नीति 2022 का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य 2026-27 तक 22,000 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन करना है। इसमें 14,000 मेगावाट सौर पार्कों से और 8,000 मेगावाट छतों पर सौर पैनलों से आएँगे।

अयोध्या का यह प्रोजेक्ट न सिर्फ पर्यावरण को बचाएगा, बल्कि शहर को एक आधुनिक और स्वच्छ ऊर्जा का केंद्र भी बनाएगा। यह भगवान राम की नगरी को नई पहचान देगा और देश में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश को अग्रणी बनाएगा।

‘नेपो किड्स’ के ऐशो-आराम VS गरीब आम जनता: समझें नेपाल में क्यों ओली सरकार से नहीं मैच हुई GenZ की वाइब, कैसे सोशल मीडिया छोड़ सड़कों पर किया प्रदर्शन

नेपाल में लगातार कई दिनों से भड़की हिंसक झड़पों के बाद हालात काबू से बाहर हो गए हैं। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि गुरुवार (11 सितम्बर 2025) को पूरे देश में कर्फ्यू और कड़ी पाबंदियाँ लगा दी गईं। छोटे से हिमालयी देश को हिलाकर रख देने वाले इन प्रदर्शनों का नेतृत्व मुख्यतः Gen-Z (नई पीढ़ी) कर रही है।

इन प्रदर्शनों में अब तक 31 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 600 से अधिक लोग घायल हुए हैं। राजधानी काठमांडू में सेना ने नागरिकों से घरों के भीतर रहने की अपील की है। बुधवार (11 सितम्बर 2025) की देर रात बड़ी संख्या में सैनिकों को सड़कों पर उतारकर हालात पर काबू पाने की कोशिश की गई।

हफ्ते की शुरुआत में ही प्रदर्शनकारियों ने सरकारी दफ्तरों और इमारतों को आग के हवाले कर दिया था। इसके बाद राजनीतिक संकट इतना गहराया कि सरकार ही धराशायी हो गई। इस अफरातफरी में देशभर की 77 जिलों की जेलों से करीब 13,000 कैदियों के फरार होने की भी पुष्टि हुई है।

बुधवार (10 सितम्बर 2025) को प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों ने काठमांडू स्थित सेना मुख्यालय में जाकर सैन्य अधिकारियों से बातचीत की। चर्चा का विषय यह था कि अंतरिम सरकार का नेतृत्व किसके हाथ में होना चाहिए।

इस दौरान आंदोलन के भीतर से कुछ आवाजें नेपाल की पूर्व मुख्य जज सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाए जाने के पक्ष में उठीं। उधर, काठमांडू के युवा मेयर बालेन शाह, जो सिर्फ 35 साल के हैं और इंजीनियर व राजनेता बनने से पहले एक रैपर भी रह चुके हैं, उन्होंने आंदोलनकारियों से शांति बनाए रखने और अंतरिम प्रशासन की घोषणा तक संयम बरतने की अपील की है।

सोशल मीडिया पर प्रतिबंध से लेकर सड़क पर विरोध प्रदर्शन तक

नेपाल में सोमवार (8 सितम्बर 2025) को सोशल मीडिया पर अचानक लगाए गए बैन के बाद ही हालात बेकाबू होने शुरू हो गए। सरकार के इस फैसले से नाराज युवाओं ने सड़कों पर उतरकर जोरदार प्रदर्शन किया। पुलिस ने भीड़ पर गोलियाँ चलाईं, जिससे गुस्सा और भड़क उठा।

जिसके बाद मंगलवार (9 सितम्बर 2025) तक आंदोलन ने बड़ा रूप ले लिया। हजारों युवाओं ने सरकारी दफ्तरों पर हमला कर दिया और कई इमारतों में आग लगा दी। दरअसल, सरकार ने यह कदम उस विवादित कानून के तहत उठाया, जिसमें तय समय-सीमा तक फेसबुक, यूट्यूब और ‘X’ समेत 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के रजिस्ट्रेशन न होने पर कार्रवाई का प्रावधान किया गया था।

सरकार का कहना है कि सोशल मीडिया पर फर्जी आईडी बनाकर नफरत फैलाने, अफवाहें गढ़ने, धोखाधड़ी करने और साइबर अपराधों को अंजाम देने वालों पर लगाम कसने के लिए यह आदेश दिया गया।

नेपाल दूरसंचार प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि जो प्लेटफॉर्म्स रजिस्टर नहीं हुए हैं, उन्हें बंद कर दिया जाए। हालाँकि, नोटिस में यह साफ नहीं किया गया कि किन प्लेटफॉर्म्स पर कार्रवाई की जाएगी।

सरकार ने इतना जरूर कहा कि आदेश मानने के बाद सेवाएँ बहाल कर दी जाएँगी। अधिकारियों का दावा है कि यह कदम केवल साइबर अपराध रोकने के लिए उठाया गया है। लेकिन युवाओं के लिए यह सीधे उनकी आवाज पर हमला साबित हुआ। यही वजह है कि आंदोलन धीरे-धीरे भड़क कर पूरे देश में आग की तरह फैल गया।

#NepoKids का बढ़ता चलन

हालाँकि नेपाल में भड़के इस आंदोलन की जड़ें सिर्फ सोशल मीडिया बैन तक सीमित नहीं हैं। इसकी शुरुआत तो हफ़्तों पहले ऑनलाइन ही हो चुकी थी। पिछले कुछ दिनों से इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर लगातार वीडियो और पोस्ट वायरल हो रहे थे, जिन पर हैशटैग ‘#NepoKids’ ट्रेंड कर रहा था।

इन वीडियो में नेपाल के सीनियर नेताओं के बेटे-बेटियाँ अपने महँगे Gucci हैंडबैग, प्राइवेट जेट और विदेशी विश्वविद्यालयों की डिग्रियाँ दिखाते नजर आए। यह चमक-धमक उस नेपाल से बिलकुल अलग तस्वीर पेश कर रही थी, जहाँ आम गरीब परिवार रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।

एक पोस्ट में तो साफ लिखा था – “नेपो-बच्चे आलीशान जिंदगी जीते हैं, वो भी उस पैसे पर जो उनके भ्रष्ट माता-पिता जनता से लूटते हैं, वही पैसा जो प्रवासी मजदूरों की पसीने से भीगी मेहनत से कमाकर नेपाल भेजा जाता है।”

कई युवाओं के लिए यह ट्रेंड महज मजाक नहीं था, बल्कि एक आईना था जिसने नेपाल की राजनीतिक जमात के बच्चों की अय्याशी को उजागर कर दिया। जहाँ सत्ता परिवारों के वारिस आराम से विदेशों में पढ़ाई और ऐशो-आराम में डूबे हैं, वहीं आम नेपाली युवा बेरोजगारी और अनिश्चित भविष्य से जूझ रहे हैं।

सोशल मीडिया पर भड़का यह गुस्सा धीरे-धीरे सड़कों पर फूट पड़ा और देखते ही देखते यह आंदोलन नेपाल के इतिहास के सबसे बड़े जन-आंदोलनों में बदल गया।

दो दुनिया, एक देश

एक तरफ नेपाल के असरदार नेताओं के बच्चे विदेशों में बसे हैं, बिजनेस क्लास में उड़ान भरते हैं, ऊँची-ऊँची इमारतों में रहते हैं और ऐसी जिंदगी जी रहे हैं जिसका खर्च असल में नेपाल की जनता की गाढ़ी कमाई से उठाया जा रहा है।

दूसरी तरफ करोड़ों नेपाली नागरिक बुनियादी जरूरतों के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं, सस्ती शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ और सुरक्षित रोज़गार तक उनके लिए सपना बन गया है। हालात इतने खराब हैं कि युवा अपने घर-परिवार का पेट पालने के लिए विदेशों में मज़दूरी करने को मजबूर हैं।

इंस्टाग्राम पोस्ट का स्क्रीनशॉट

सोशल मीडिया पर लगातार ऐसे वीडियो वायरल हुए जिन पर हैशटैग #NepoKid, #NepoBabies, #PoliticiansNepoBabyNepal चलने लगे। इनमें सीधा सवाल उठाया गया, क्या नेताओं के बच्चों की सफलता उनकी मेहनत का नतीजा है या फिर परिवार की मलाई खाने का? कई जगहों से तो सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन की अपीलें भी सामने आईं।

अब यह खाई इतनी चौड़ी हो चुकी है कि उसे नजरअंदाज करना नामुमकिन हो गया है। युवाओं के लिए यह ईर्ष्या का नहीं, बल्कि न्याय और अस्तित्व का सवाल बन गया है। उनका सीधा सवाल है, आख़िर कब तक वे नेताओं के बच्चों को ऐशो-आराम की जिंदगी जीते देखते रहेंगे जबकि खुद न्यूनतम जरूरतों के लिए संघर्ष करते रहेंगे?

एक पीढ़ी जो चुप रहने से इनकार करती है

यह गुस्सा अचानक नहीं फूटा। नेपाल का युवा सालों से उपेक्षा झेल रहा है। चाहे पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली की सरकार रही हो या उसके पहले की, किसी ने भी जनता से संवाद बनाने या अपने वादे पूरे करने की जहमत नहीं उठाई। जनता की चिंताओं को बार-बार दरकिनार किया गया और सुधारों के नाम पर किए गए वादे कभी जमीनी हकीकत नहीं बने।

लेकिन इस बार सरकार ने जब सोशल मीडिया पर बैन लगाकर आवाज दबाने की कोशिश की तो दाँव उल्टा पड़ गया। पहले से ही भ्रष्टाचार और परिवारवाद से नाराज Gen-Z ने साफ कर दिया, अब बहुत हो चुका।

युवाओं ने सिर्फ बैन का विरोध नहीं किया, बल्कि इसे अपने आंदोलन का झंडा बना दिया, एक ऐसा आंदोलन जो भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और सत्ता के रसूख़दार वर्ग की अय्याशियों को जड़ से खत्म करने की माँग कर रहा है।

एक विरोध प्रदर्शन जिसने रातों रात नेपाल को बदल दिया

हैशटैग #NepoKids अब नेपाल के इस जनविद्रोह का चेहरा बन चुका है। जो बहस ऑनलाइन शुरू हुई थी, वही आज राजनीतिक भूकंप में बदल गई है। प्रदर्शन इतने प्रचंड हुए कि प्रधानमंत्री समेत कई मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा। यह साफ बताता है कि जनता का गुस्सा किस कदर फूट पड़ा है।

मौतों का आँकड़ा लगातार बढ़ रहा है और हजारों लोग घायल हो चुके हैं। राजधानी काठमांडू में सेना की मौजूदगी यह साबित करती है कि हालात कितने गंभीर हैं। लेकिन एक सच यह भी है कि इस आंदोलन ने नेपाल की राजनीति की तस्वीर हमेशा के लिए बदल दी है।

डिजिटल युग में यह साबित हो गया कि एक हैशटैग सरकार गिरा सकता है और जिस पीढ़ी को कभी ‘बहुत छोटी’ कहकर नजरअंदाज़ किया जाता था, वही आज एक न्यायपूर्ण देश की लड़ाई की अगुवाई कर रही है।

अगर इन प्रदर्शनों की गहराई में जाएँ तो एक साफ सच्चाई सामने आती है, नेपाल के युवा केवल सोशल मीडिया बैन का जवाब नहीं दे रहे थे। वे उन दशकों की नाराज़गी का हिसाब माँग रहे थे, जिसमें भ्रष्टाचार थमा नहीं, नेता जनता के पैसों को अपनी जागीर समझकर लूटते रहे और सियासी घरानों के बच्चे विदेशों में ऐशो-आराम की जिंदगी दिखाते रहे, जबकि आम नेपाली अपने ही देश में बुनियादी जरूरतों के लिए तरसते रहे।

आख़िरकार, यह गहरी खाई गुस्से के विस्फोट में बदल गई। अनसुने रहने से तंग आकर GenZ सड़कों पर उतर आया, सिर्फ बैन के खिलाफ नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, परिवारवाद और सत्ता के रसूख़दारों की अय्याशी को खत्म करने की माँग के लिए।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रीति सागर ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

2024 चुनावों में ‘वोट चोरी’ के नहीं कोई सबूत: राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के प्रोपेगेंडा को मद्रास HC से झटका, याचिका खारिज कर ठोंका ₹1 लाख का जुर्माना

मद्रास हाई कोर्ट ने कॉन्ग्रेस के उस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनावों में बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट में हेरफेर का आरोप लगाया था। इस मामले में दायर जनहित याचिका (PIL) को कोर्ट ने न सिर्फ खारिज किया, बल्कि याचिकाकर्ता पर 1 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला कॉन्ग्रेस के ‘वोट चोरी’ के झूठे प्रचार को बेनकाब करता है और भारत के चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे को मजबूत करता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला वकील वी. वेंकटा सिवकुमार ने दायर किया था, जिसमें माँग की गई थी कि चुनाव आयोग को राहुल गाँधी की ओर से 7 अगस्त 2025 को पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन में उठाए गए आरोपों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने का आदेश दिया जाए।

राहुल गाँधी ने इस प्रेजेंटेशन में दावा किया था कि 2024 के लोकसभा चुनावों में वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ हुई और इस बात को केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी 13 अगस्त 2025 की प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोहराया था। याचिका में माँग की गई थी कि चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट का डेटा सार्वजनिक करना चाहिए और इस मामले की जाँच की स्थिति बतानी चाहिए।

लेकिन मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस मनिंद्रा मोहन श्रीवास्तव और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की बेंच ने इस याचिका को पूरी तरह से गलत और बेबुनियाद करार दिया। कोर्ट ने कहा कि यह याचिका पूरी तरह से भ्रामक है और इसमें कोई ठोस सबूत या स्वतंत्र जाँच का आधार नहीं है। कोर्ट ने साफ कहा कि याचिका में सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप की बातें हैं, जो कुछ प्लेटफॉर्म्स पर कही गईं, लेकिन इनके पीछे कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं।

मद्रास हाई कोर्ट का सख्त रुख

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस याचिका में कोई ठोस सामग्री या विस्तृत जानकारी नहीं है। यह एक अस्पष्ट और सामान्य शिकायत है, जिसमें कोर्ट से गहन जाँच की माँग की गई, जो उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना कि चुनाव आयोग को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का कोई आदेश नहीं दिया जा सकता, क्योंकि यह उसकी जिम्मेदारी है कि वह अपनी जाँच और फैसले खुद करे।

इसके बाद कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाया जो तमिलनाडु स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को एक महीने के अंदर जमा करना होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले में मेरिट पर कोई राय नहीं दी गई है और चुनाव आयोग को अपने फैसले लेने की आजादी बरकरार रहेगी।

कॉन्ग्रेस का वोट चोरी प्रोपेगेंडा बेनकाब

यह फैसला कॉन्ग्रेस के ‘वोट चोरी’ के दावे पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है। बीजेपी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट करके इस फैसले को कॉन्ग्रेस के झूठे प्रचार का पर्दाफाश बताया। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी का पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन विदेश में तैयार किया गया था, जिससे इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।
अमित मालवीय ने कहा कि कोर्ट ने याचिका को भ्रामक, अस्पष्ट और सबूतों से खाली करार दिया है। साथ ही 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाकर कोर्ट ने यह संदेश दिया कि राजनीतिक हितों के लिए चुनाव प्रक्रिया को बदनाम करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

अमित मालवीय ने आगे कहा कि यह फैसला 2024 के लोकसभा चुनावों की निष्पक्षता और बीजेपी की ऐतिहासिक जीत की वैधता को मजबूत करता है। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि पार्टी बेकार की कानूनी लड़ाइयों और प्रचार में समय बर्बाद कर रही है, जबकि बीजेपी शासन, स्थिरता और विकास पर ध्यान दे रही है।

मद्रास हाई कोर्ट के फैसले से कॉन्ग्रेस बेनकाब

मद्रास हाई कोर्ट के इस फैसले से कॉन्ग्रेस की किरकिरी हुई है। राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी ने जो प्रोपेगेंडा चलाया था, वह कोर्ट में टिक नहीं सका। हालाँकि राहुल गाँधी को चुनाव आयोग ने 7 दिनों का समय दिया था, लेकिन राहुल गाँधी की तरफ से आधिकारिक तौर पर कोई जानकारी नहीं दी गई और न ही हलफनामा दाखिल किया।

मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला कॉन्ग्रेस के ‘वोट चोरी’ के दावों पर करारा प्रहार है। 1 लाख रुपए का जुर्माना और याचिका को खारिज करना साफ संकेत है कि बिना सबूत के राजनीतिक साजिशें नहीं चलेगी। यह फैसला न सिर्फ कॉन्ग्रेस के प्रचार को नेस्तनाबूद करता है, बल्कि भारत के लोकतंत्र की मजबूती को भी दिखाता है। अब सवाल यह है कि क्या कॉन्ग्रेस अपने झूठे अभियान को बंद करेगी, या फिर और बेबुनियाद दावों के साथ जनता को भ्रमित करने की कोशिश करेगी? समय ही इसका जवाब देगा।

बुर्का-मांस-नमाज और तबलीगी जमात में जाने का दबाव, आजम ने शीला को साईबा बनाकर किया निकाह: हरियाणा के नूहं में धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत पहली गिरफ्तारी

हरियाणा के नूहं जिले में एक हिंदू महिला का धोखे से धर्म परिवर्तन करवाने और उसका शारीरिक व मानसिक शोषण करने का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मामले में आजम नाम के मुस्लिम व्यक्ति को गिरफ्तार किया है।

यह गिरफ्तारी हरियाणा के नए कानून ‘गैरकानूनी धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम 2022’ के तहत की गई है। नूहं जिले में इस कानून के तहत यह पहली कार्रवाई है।

क्या है मामला?

पीड़िता का नाम शीला उर्फ कंचन है। वह उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के धनपुरा गाँव की रहने वाली है और पिछले कई सालों से अपने दो बच्चों के साथ हरियाणा के नूहं में रह रही थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2008 में शीला की शादी छुट्टन नाम के व्यक्ति से हुई थी, लेकिन छुट्टन की नशे की लत और आपराधिक गतिविधियों के चलते उसका शादीशुदा जीवन खराब हो गया।

छुट्टन एक हत्या के केस में जेल चला गया और शीला को बच्चों समेत अकेला छोड़ दिया। इसके बाद शीला मजदूरी कर अपने बच्चों का पालन-पोषण करती रही। 2020 में शीला की मुलाकात नूहं में रहने वाले मुस्लिम व्यक्ति आजम से हुई। आजम ने मदद और बच्चों की देखभाल का भरोसा दिया।

आजम ने अपने प्रेमजाल में फँसाकर शीला का भरोसा जीता। फिर वह शीला और बच्चों को नोएडा, पानीपत और भिवाड़ी लेकर गया और किराए पर रखा। शीला ने आरोप लगाया कि आजम ने 2020 में मौलाना से जबरन धर्मांतरण कराया।

मौलाना ने उसे कलमा पढ़वाया और शीला नाम बदलकर ‘साईबा’ रख दिया। इसके बाद आजम ने जबरन निकाह भी किया। निकाह के बाद आजम हर रोज प्रताड़ित करता था। घर में रखी हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ी और मारपीट भी की।

आजम ने बुर्का पहनने, नमाज पढ़ने और तबलीगी जमात में जाने का भी दबाव बनाया और जबरन मांस खिलाया। शीला को बाद में पता चला कि आजम पहले से शादीशुदा है और उसके बच्चे भी है।

जब शीला ने आजम के गाँव मालब जाकर उसके परिवार से बात करनी चाही तो वहाँ हमला कर दिया। किसी तरह से जान बचाकर शीला नूहं वापस आई, लेकिन आजम भी वहाँ आ गया और फिर उसके साथ रहने लगा।

पुलिस की कार्रवाई

शीला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पीड़ित महिला का कहना है कि आजम उसकी मजदूरी की कमाई छीन लेता था और लगातार शारीरिक व मानसिक शोषण करता था। उसने बताया कि आजम के साले कल्लू और हक्कू उसे फोन पर अश्लील बातें करते और निकाह का दबाव डालते थे।

शिकायत के बाद नूहं के DSP और एसपी के निर्देश पर आजम को गिरफ्तार कर लिया गया है। SP राजेश कुमार ने बताया कि यह नूहं में धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत पहली गिरफ्तारी है और मामले की जाँच की जा रही है।

बेटे की मौत का फायदा उठा घर में घुसे मिशनरी, बोले-भगवान ने की नाइंसाफी, येशू मदद करेंगे: MP में 10 साल में 200 परिवारों का धर्मांतरण, 5 गिरफ्तार

मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले के नवानगर इलाके में पिछले 10 साल से धर्म परिवर्तन का नेटवर्क चल रहा था। मंगलवार (9 सितंबर 2025) की रात पुलिस ने छापा मारा और मौके से आपत्तिजनक ईसाई धर्म संबंधी और किताबें बरामद की। मामले में पुलिस ने नाथन नायक, मीणा नायक, अर्पित नायक, पिंकी सोनवानी और नंदन शाह को गिरफ्तार किया है। सभी को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया है।

यह पूरा मामला नवानगर की बसौर बस्ती से जुड़ा है, जहाँ नाथन नायक और उसका परिवार रह रहा था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ये लोग आसपास के गरीब, दुखी और जरूरतमंद लोगों को पढ़ाई, पैसे और इलाज जैसी चीजों का लालच देकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर करते थे।

बस्ती वालों के अनुसार, हर रविवार, बुधवार और शुक्रवार को बड़ी संख्या में लोग वहाँ जमा होते थे। जैसे ही सब अंदर जाते, गेट बंद कर दिया जाता और अंदर क्या होता, किसी को पता नहीं चलता।

स्थानीय महिला रेणु देवी ने बताया कि उनके बेटे की मौत के बाद परिवार परेशान था, तभी ये लोग उनके पास आने लगे, हाल-चाल पूछने लगे और फिर यीशू की प्रार्थना में बुलाने लगे। उन्होंने साफ मना कर दिया, लेकिन कई दूसरे लोग लालच में आ गए और धर्म परिवर्तन कर लिया।

रेणु देवी ने कहा, “ये लोग मेरे ऊपर निगाह रख रहे थे। आते-जाते मुझसे हाल पूछते। कुछ दिन बाद मेरे पास बैठकर मन बहलाने की कोशिश करने लगे। हफ्ता भर ही हुआ होगा कि धर्म-कर्म की बातें करते। वो कहते- भगवान ने बहुत बड़ी नाइंसाफी कर दी। येशू मेरी मदद करेंगे। वे बहुत दयालु हैं। मुझसे इन लोगों ने प्रार्थना में आने के लिए कहा। बोलते थे कि हम पैसा-धेला सब से मदद करेंगे।”

नाथन पहले से ही ईसाई बन चुका था और सिंगरौली में आकर सिलाई की दुकान खोली थी। फिर धीरे-धीरे उसने ढाई हजार वर्ग फीट जमीन पर कब्जा कर चर्चनुमा बिल्डिंग बना ली। वहीं पर बैठकर वो और उसका परिवार धर्म परिवर्तन का काम करते थे। उसकी पत्नी मीणा महिलाओं को और बेटा अर्पित युवाओं को टारगेट करता था।

बस्ती के लोगों का कहना है कि करीब 200 से ज्यादा लोग ईसाई बन चुके हैं। यहाँ तक कि कोयला खदान में काम करने वाले कुछ अधिकारी और कर्मचारी भी प्रार्थना सभा में शामिल होते थे।

पुलिस अब यह भी जाँच कर रही है कि क्या कॉलेजों में भी युवाओं को टारगेट किया गया और धर्म परिवर्तन के लिए पैसों का इस्तेमाल हुआ। इसलिए उनके बैंक अकाउंट्स की भी जाँच की जा रही है। फिलहाल घर और दुकान सील कर दी गई है और मामले की गहराई से जाँच चल रही है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, नवानगर थाना प्रभारी कपूर त्रिपाठी ने कहा,” सूचना मिली थी कि एक बस्ती में कुछ लोग स्थानीय लोगों को बरगलाकर अवैध रूप से उनका धर्मांतरण करा रहे हैं। इस सूचना पर तुरंत एक्शन लिया गया। मौके पर जाकर देखा तो करीब 100 लोग वहां इकट्ठा थे। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 5 लोगों को हिरासत में लिया। इन आरोपितों से पूछताछ जारी है।”