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हिन्दुओं-सनातन को गाली देने वाले वजाहत खान को सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ा, कहा- बोलने की आजादी दूसरे के अपमान के लिए नहीं: सारी FIR एक साथ करने से भी किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दुओं को गाली देने वाले वजाहत खान को जमकर फटकारा है। कोर्ट ने कहा है कि आजादी का दुरुपयोग नहीं करें। कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पर हो रहे अभिव्यक्ति की आजादी के गलत इस्तेमाल से मुकदमेबाजी बढ़ रही है। इससे न्यायिक सिस्टम धीमा पड़ जाता है और कई तरह की अड़चनें पैदा होती है।

वजाहत की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने लगायी फटकार

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ वजाहत खान की अर्जी पर सुनवाई कर रही थी जिसमें भड़काऊ सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर चार राज्यों में दायर आपराधिक मामलों को एक साथ जोड़ने का आग्रह किया गया था। लेकिन कोर्ट ने इस पर कोई फैसला नहीं किया है।

अभिव्यक्ति की आजादी के साथ कर्तव्यों का करें पालन

कोर्ट ने वजाहत खान की सोशल मीडिया पर किए गये टिप्पणियों की आलोचना की और कहा कि सभी नागरिकों के लिए जरूरी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते समय संयम बरतें।
लोग अपने अधिकारों का इस्तेमाल तो कर रहे हैं लेकिन भाईचारा और सम्मान सुनिश्चत करने के लिए अपने कर्तव्यों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा, “अभिव्यक्ति की आजादी एक बहुत ही अहम मौलिक अधिकार है। लेकिन अगर इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग होता है, तो इससे मुकदमेबाजी होती है और अदालतें जाम हो जाती हैं।”

कोर्ट में वजाहत खान के वकील ने खान के माफी माँग लेने की बात कही। उन्होंने कहा, “मेरे आचरण के लिए कोई बहाना नहीं है। मुझे वही गलती दोहराने का कोई अधिकार नहीं है जिसका आरोप मैंने दूसरों पर लगाया था। ये ट्वीट पुराने थे और कुछ बातों की प्रतिक्रिया में थे। मैंने पहले ही माफ़ी मांग ली है।”

वजाहत की शिकायत पर पनौली हुई थी गिरफ्तार

वजाहत खान की शिकायत पर ही ऑपरेशन सिंदूर को लेकर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भड़काऊ पोस्ट करने पर सोशल मीडिया इफ्लुएंसर शर्मिष्ठा पनोली को पश्चिम बंगाल पुलिस ने गिरफ्तार किया था। शर्मिष्ठा की गिरफ्तारी के बाद बंगाल पुलिस ने वजाहत के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया था।

जहाँ एक ओर शर्मिष्ठा को दो हफ्ते तक जेल में रखने के बाद भी उसकी बेल को नामंजूर कर दिया गया था। वहीं वजाहत ने उसकी गिरफ्तारी का जश्न मुस्लिम समुदाय के साथ मनाया था।

वजाहत के सोशल मीडिया पर हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक पोस्ट दिखा थे। इसके बाद लोगों ने उसकी गिरफ्तारी की माँग की थी। अपने सोशल मीडिया पोस्ट में वजाहत ने लिखा था “कामाख्या देवी मंदिर में ब्राह्मण को अन्य हिंदुओं से कटी हुई योनि की पूजा करवानी पड़ती है। इसमें अंतर करना बहुत मुश्किल है कि यह अंधभक्ति है या कोई मानसिक बीमारी।”

हिन्दुओं को दी थी वजाहत ने गाली

हिंदूओं को गाली देते हुए वजाहत ने एक पोस्ट में लिखा था “तुझ जैसी रं* पेट की औलाद रसूल के बारे में मेरी बात करे ये जेब नहीं देता…तू इसकी बात कर, तेरा कृष्णा कैसा रंगीला था देख…सच्चाई देख वहम में मत जी…झं$% सा&% तूने जो भी कहा वो सब तो झूठ और बहुत है लेकिन ये तेरे ही किताब का है सच पढ़, सु& के पि%$”

इंस्टाग्राम पर एक आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए उसने लिखा “अबे भो, ब… अपनी बहन से जाकर सीख तेरा धर्म ला, तेरा धर्म जो तेरी बहन कोठे में बैठ कर सिखाती है… या फिर वही धर्म तेरे घर पे आकर सिखाती है, चु कर ब*… अपनी बीवी को तुझ जैसा संघी काम चो है दूसरे के लिए चो* देता है और अपनी बहन चो* है… ब… सुन रं पेट का जाना… मेरे अबाओ अजदाद कन्वर्ट हुए भी ते ना तो हमें उनपर फक्र है…के गंदा धर्म शैतानों का पूजा करने वाला, लिंग का पूजा करने वाला धर्म चो* कर… पाक साफ धर्म अपना और हक धर्म अपना…फखर है उनपे…जा तू लिंगम पूजा कर…लौ*

उसने ट्वीट किया था “एक हिंदू अपनी साली को अंग-अंग पर रंग लगाते हुए और अपने दोस्तों को भी उसके साथ ऐसा करने का निमंत्रण देते हुए…हिंदू.. यहीं है इनकी असलियत… बलात्कारी संस्कृति।”

एक अन्य पोस्ट में उसने लिखा था, “नहीं वो उसकी बात कर रहा है जिसकी 16108  रखैलों के साथ रंग रसिया मनाता था…या चुपके-चुपके लड़कियों को नहाते हुए देखता था..”

ऐसे ही उसने एक पोस्ट में लिखा था, “मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ है… पहले अपने धर्म के बारे में पढ़ो। मूत्र पीने वाले बदमाश”

वेश्याओं के धर्मांतरण के लिए छांगुर पीर ने बना रखा था अलग गैंग, गरीब-SC हिन्दू भी निशाने पर: दुबई से बुलाता था ‘ट्रेनर’ मौलाना, लड़कियाँ फँसाने की होती थी ट्रेनिंग

जमालुद्दीन उर्फ छांगुर पीर ने धर्म परिवर्तन कराने के लिए तीन श्रेणियाँ बनाई थीं। इनमें अलग-अलग वर्ग की महिलाएँ और युवतियाँ शामिल की गईं। वहीं, मुस्लिम युवकों को भी नाम बदलकर हिंदू युवतियों को प्रेमजाल में फँसाकर धर्मांतरण कराने का काम सौंपा गया।

पहली श्रेणी में मुस्लिम महिलाएँ गरीब और अनुसूचित जाति की महिलाओं का ब्रेनवॉश कर धर्म परिवर्तन कराती थीं। दूसरी श्रेणी में मुस्लिम युवतियों को रखा गया, वेश्या महिलाओं को फँसाकर इस्लाम कबूल करवातीं। आखिरी श्रेणी में मुस्लिम युवक नाम बदलकर हिंदू युवतियों के पीछे लगाया गया।

दुबई से कट्टर मौलाना बुलाकर देता प्रशिक्षण

छांगुर पीर अपने गुर्गों को प्रशिक्षण देने के लिए दुबई से कट्टर मौलाना बुलाता था। उनके साथ नेपाल में सक्रिय दावत-ए-इस्लामी की टीम भी होती थी। ये मौलाना मुस्लिम युवकों को हिंदू युवती को फँसाने के तरीके बताते थे। साथ ही हिंदू धर्म के विरुद्ध ब्रेनवॉश करते थे। इस प्रशिक्षण के काम के लिए ही छांगुर पीर ने आलीशान कोठी बनवाई थी।

बलरामपुर की कोठी में बनाए तहखाने

छांगुर के धर्मांतरण के नेटवर्क में 579 जिलों में 3000 गुर्गे काम कर रहे थे। इस नेटवर्क को बढ़ाने के लिए छांगुर पूरी मेहनत से लगा हुआ था। उसने गुर्गों को प्रशिक्षण देने के लिए दो आलीशान कोठी भी बनवाई। इनमें पहले फ्लोर पर तहखाने बनाए गए, जिनमें रोजाना तकरीर कराने की तैयारी थी।

बलरामपुर के मधुपुर गाँव स्थित छांगुर की कोठी की निर्माण कराने वाली वसीउद्दीन ने बताया कि साल 2022 में कोठी बननी शुरू हुई थी। हालाँकि, अब तक पूरी तरीके से बनकर तैयार नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि कोठी को पिलर पर खड़ा किया गया, जिससे छांगुर अपने हिसाब से कमरों को बाँट सके।

वसीउद्दीन ने कहा कि शुरुआत में ही लगा था कि किसी अवैध कार्य के लिए कोठी का निर्माण हो रहा है, लेकिन छांगुर ने बताया था कि वह विद्यालय खोलना चाहता था। बाद में उसने अस्पताल खोलने की बात कही। इसी तरह बार-बार झूठ बोलता रहा।

बता दें कि बलरामपुर स्थित कोठी को प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया है। अब कोठी का मलबा पढ़ा दिखाई देता है। इसी कोठी में छांगुर अपने परिवार समेत नीतू और नवीन रोहरा के साथ रहता था।

गोंडा में भी छांगुर के अड्डे की तलाश

छांगुर पीर के धर्मांतरण नेटवर्क की जड़ें उत्तर प्रदेश के गोंडा में भी होने की आशंका है। यहाँ धानेपुर क्षेत्र के रेतवागाड़ा में छांगुर पीर के अड्डे की तलाश की जा रही है। ATS रमजान को ढूँढ रही है, जिससे छांगुर के बाकी सहयोगियों का पता निकलेगा।

मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया कि अयोध्या के करीब होने के चलते छांगुर गोंडा में भी अपनी जड़े मजबूत कर रहा था। यह काम रमजान को सौंपा गया था, वही वजीरगंज और नवाबगंज तक अपने डेरा जमा रहा था। पूरी जानकारी कि लिए ATS के अधिकारी जाँच में जुटे हैं।

राहुल गाँधी का ऑर्डर पाते ही कर्नाटक में ‘रोहित वेमुला एक्ट’ थोपने की तैयारी, जानिए क्यों इसके प्रावधानों को बताया जा रहा ‘संस्थागत उत्पीड़न’: क्या अहिन्दा तुष्टिकरण के लिए हिन्दुओं को बाँटने की हो रही साजिश

कर्नाटक में सिद्दारमैया सरकार आगामी मानसून सत्र में ‘रोहित वेमुला विधेयक 2025’ को पेश करने की पूरी तैयारी कर चुकी है। राहुल गाँधी के ‘हुक्म’ के बाद कर्नाटक सरकार ने छात्रों के बीच SC,ST,OBC और अल्पसंख्यक समुदाय को ‘अन्याय से बचाने’ का बीड़ा उठाया है।

रोहित वेमुला विधेयक का उद्देश्य कथित तौर पर उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न को रोकना है।

इस विधेयक का नाम हैदराबाद विश्वविद्यालय के पीएचडी छात्र रोहित वेमुला के नाम पर रखा गया है। 17 जनवरी 2016 को रोहित ने आत्महत्या कर ली थी। उसकी आत्महत्या के बाद पूरे देश में जातिगत भेदभाव को लेकर काफी आक्रोश सामने देखने को मिला था। हालाँकि बाद में यह बात जरूर साफ हुई कि रोहित वेमुला असल में दलित समुदाय से था ही नहीं।

बिल में क्या हैं प्रावधान

कर्नाटक सरकार ने इस विधेयक को राज्य के सभी सरकारी, निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में लागू करने की बात कही है। इसके तहत सामान्य कैटेगरी के छात्रों को छोड़कर बाकी सभी के लिए, यानी SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदाय को अन्याय से बचाने की बात कह कानून बनाए गए हैं।

बिल में किसी भी तरह के भेदभाव को गैर-जमानती और संगीन अपराध माना गया है। इसमें पहली बार दोषी पाए जाने पर 1 साल की जेल और ₹10,000 जुर्माना और दोबारा अपराध पर 3 साल की जेल और ₹1 लाख जुर्माना का प्रावधान है। साथ ही, दोषी संस्थानों को राज्य सरकार से वित्तीय सहायता नहीं मिलेगी और पीड़ित को सीधे मुआवजा देने की व्यवस्था भी की गई है।

बिल के तहत कोई भी पीड़ित या फिर उसके परिवार का व्यक्ति सीधे पुलिस में शिकायत दर्ज कर सकता है और बिना किसी सबूत के आरोप लगाया जा सकता है। दोषी पाए जाने पर आरोपित को 1 लाख रुपए तक का मुआवजा देना पड़ेगा।

एक तरह से सामान्य श्रेणी के छात्रों को रंजिश में SC/ST/OBC या अल्पसंख्यक समुदाय का कोई भी व्यक्ति बड़े आराम से जेल भिजवा सकता है। जब तक व्यक्ति निर्दोष साबित नहीं हो जाता तब तक वो दोषी ही माना जाएगा।

इससे भी बड़ी विडंबना ये है कि आरोपित के साथ-साथ उस व्यक्ति को भी इस एक्ट के तहत जेल हो सकती है जिसने आरोपित की मदद की हो, उकसाया हो या फिर वो भी जिसने रोकने की कोशिश नहीं की।

सोशल मीडिया पर जानकार इसे एक संस्थागत उत्पीड़न है। उनका कहना है कि इसे ‘सामाजिक न्याय’ की चाशनी में लपेटकर परोसा जा रहा है। कई विश्लेषक ये भी कह रहे हैं कि जब इसी तरह का SC-ST एक्ट इस वर्ग को संरक्षण देने के लिए पहले से ही मौजूद है तो फिर इस तरह का एक्ट थोप कर संस्थानों के माहौल में द्वेष भरने की क्या आवश्यकता है?

जो दलित नहीं, उसके नाम पर बिल

कर्नाटक सरकार ने रोहित वेमुला के नाम पर दलित विधेयक बना दिया गया जबकि रोहित असल में दलित था ही नहीं। अब इस पर लोग सवाल भी उठा रहे हैं। 2017 में आंध्र प्रदेश सरकार ने रोहित का अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र रद्द कर दिया था और कहा था कि वह ओबीसी वर्ग से हैं ऐसे में शेड्यूल कास्ट का प्रमाण पत्र धोखाधड़ी से बनवाया गया।

इसके लिए तेलंगाना पुलिस ने भी 3 मई 2024 को हाई कोर्ट में एक क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी। इसमें बताया गया था कि रोहित वेमुला SC श्रेणी से नहीं था और उसने आत्महत्या इसलिए की क्योंकि उसे अपनी जाति की सच्चाई के उजागर होने का डर था। क्लोजर रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई थी कि उनकी मृत्यु के लिए कोई भी व्यक्ति या संस्थान जिम्मेदार नहीं था।

रोहित वेमुला के माता-पिता ने भी इस बात को स्पष्ट किया है कि वह SC-ST समुदाय से नहीं बल्कि वेद्देरा जाति से आते हैं। रोहित के पिता ने यह तक भी कहा था कि उनके बेटे की हत्या हुई थी और वामपंथी समूह ने रोहित की मौत का इस्तेमाल मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए किया।

राहुल ने लिखी पाती और बन गया विधेयक

रोहित की मौत के बाद शुरुआत में उसे दलित बताया गया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने वामपंथी मीडिया और प्रोपेगेंडा पोर्टल्स के साथ मिलकर जातिगत भेदभाव का मुद्दा उठाया और मोदी सरकार पर निचली जातियों को दबाने का आरोप लगाया।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने 16 अप्रैल 2025 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिखा और कहा कि कॉलेज और विश्वविद्यालयों में ‘रोहित वेमुला अधिनियम’ लेकर आया जाए ताकि जातिगत भेदभाव समाप्त हो सके।

यह माँग तब आई जब उन्होंने संसद में दलित, आदिवासी और OBC समुदाय के छात्रों और शिक्षकों से मुलाकात की और कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव होता है। इसके बाद सरकार कर्नाटक सरकार ने मानसून सत्र में रोहित वेमुला एक्ट को पेश करने की घोषणा भी की कर दी।

बता दें रोहित के सुसाइड नोट में उन्होंने स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) से नाराज़गी जताई थी। इसके बावजूद वामपंथी समूह आज भी रोहित की याद में कार्यक्रम करते हैं और इसके जरिए गैर-दलित हिंदुओं को निशाना बनाया जाता है।

न्याय की आड़ में कॉन्ग्रेस की अहिन्दा वोटबैंक की रणनीति

सामाीजिक न्याय की आड़ लेकर इस बिल में जिन-जिन वर्गों को शामिल किया गया है वो असल में कॉन्ग्रेस की अहिन्दा वोट बैंक की राजनीति का एक हिस्सा है। कॉन्ग्रेस की रणनीति कर्नाटक में हमेशा से ‘अहिन्दा’ यानी अल्पसंख्यक, OBC और दलित वोटबैंक को मजबूत करने को लेकर सामने दिखी है।

‘अहिन्दा’ शब्द सबसे पहले कॉन्ग्रेस के नेता देवराज उर्स ने दिया था। बाद में सिद्धारमैया ने इससे अपनी सियासी पहचान स्थापित कर ली। इसी रणनीति के तहत 2015 की जनगणना में OBC और मुस्लिम आरक्षण बढ़ाने की सिफारिश की गई थी।

कर्नाटक में मुस्लिम आबादी 18.08% है और वो OBC में सबसे बड़ा समूह है। कॉन्ग्रेस का मानना है कि जितना वह मुस्लिमों और OBC को आरक्षण देगी, उतना ही पार्टी का वोटबैंक मजबूत होता जाएगा।

जातिगत जनगणना ‘सामाजिक न्याय’ या दो-धारी तलवार

कर्नाटक में जातिगत जनगणना का मुद्दा कॉन्ग्रेस के लिए दो-धारी तलवार बन गया है। एक तरफ पार्टी अपने ‘सामाजिक न्याय’ के नैरेटिव को बनाए रखना चाहती है, जिसके तहत वो OBC, मुस्लिम और दलित वोटबैंक को साधने की कोशिश कर रही है।

दूसरी तरफ लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों का विरोध उसे बैकफुट पर ले आया है। डीके शिवकुमार का बयान कि “हम हर समुदाय को साथ लेकर चलेंगे” साफ तौर पर कॉन्ग्रेस की मजबूरी को दिखाता है।

राहुल गाँधी जातिगत जनगणना को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सियासी पहचान का हिस्सा बनाना चाहते थे, लेकिन अब खुद इस जंजाल में फँसते जा रहे हैं। उनकी पार्टी अब तक न तो 2015 की रिपोर्ट को लागू कर पाई, न ही इसे पूरी तरह खारिज कर पा रही है।

एक ओर बीजेपी इसे कॉन्ग्रेस की नाकामी और सियासी ड्रामेबाजी बता रही है तो दूसरी ओर कर्नाटक की जनता के बीच ये सवाल उठ रहा है कि क्या कॉन्ग्रेस सच में सामाजिक न्याय की बात करती है, या ये सिर्फ वोटबैंक की राजनीति है?

दलित न होते हुए भी रोहित वेमुला के नाम पर विधेयक लाकर कॉन्ग्रेस को भले ही कुछ राजनीतिक लाभ मिल जाए, लेकिन इसके कारण समाजिक न्याय से ज्यादा लोगों के बीच ऊँच-नीच या विभाजन होगा और उन छात्रों के लिए भी परेशानी खड़ी होगी जिन्हें इस एक्ट में किसी भी तरह का संरक्षण नहीं मिला है

इसके साथ ही ये बात भी गौर करने वाली है कि कॉन्ग्रेस का लाया ये एक्ट सिर्फ कर्नाटक के साथ साथ हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना जैसे कॉन्ग्रेस शासित राज्यों तक भी पहुँच सकता है।

‘मंदिर की जमीन पर बनी है मस्जिद’: हिन्दू संगठन MP के जबलपुर में कर रहे विरोध, बताया- वक्फ बोर्ड ने 3 गुना जमीन ली, CM मोहन यादव ने SDM हटाया

मध्य प्रदेश के जबलपुर में हिन्दू संगठनों ने कहा है कि एक मंदिर की जमीन पर मस्जिद बनाई गई। इसको लेकर जबलपुर के राँझी में सोमवार (14 जुलाई 2025) को जमकर हंगामा हुआ। यह विवाद तब और बढ़ गया जब जबलपुर के कलेक्टर ने एक विवादित पोस्ट कर दी।

अब रांझी स्थित मढ़ई में गायत्री मंदिर की जमीन पर मस्जिद होने के विवाद ने एक बड़े प्रदर्शन का रुप ले लिया है। जानकारी के अनुसार, जबलपुर के रघुवीर सिंह मरावी ने 12 जुलाई को एक पोस्ट की थी, जिसमें मस्जिद निर्माण से जुड़ी जानकारी साझा की गई थी। इसके बाद हिन्दू इस मामले में कार्रवाई की माँग करने लगे।

इसके बाद जबलपुर कलेक्टर के ऑफिशियल अकाउंट से शेयर की गई पोस्ट में लिखा गया कि मौके पर कभी मंदिर निर्मित होने या मंदिर की भूमि पर मस्जिद निर्मित होने जैसा कोई प्रमाण नहीं पाया गया है। कलेक्टर की पोस्ट में दावा था कि मस्जिद का निर्माण बंदोबस्त के पूर्व उनके कब्जे और मालिकाना हक की जमीन पर ही हुआ है।

इसके कुछ ही घंटे बाद इस पोस्ट को डिलीट भी कर दिया गया था। लेकिन उससे पहले हिंदूवादी संगठन के कार्यकर्ताओं ने पोस्ट देख ली थी। इस मामले में हिंदू संगठन प्रमाण के साथ ये बता रहे हैं कि मस्जिद का निर्माण मंदिर वाली जगह पर किया गया है। उन्होंने कलेक्टर के दावों को गलत बताया और विरोध की बात कही।

वह कलेक्टर की पोस्ट के बाद और गुस्साए गए। आक्रोशित हिंदुओं ने SDM रघुवीर सिंह का अर्थी जुलूस भी निकाला। यह मामला मध्य प्रदेश के CM मोहन यादव तक भी पहुँच गया। उन्होंने इस मामले में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने जाँच कमेटी गठित करने का आश्वासन दिया है।

SDM को भी हटा दिया गया है। हिंदुओं ने मंगलवार (15 जुलाई 2025) को भी प्रदर्शन करने के लिए कहा था। लेकिन बाद में विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने कहा कि मुख्यमंत्री के जाँच के आदेश के बाद उन्होंने अपने कार्यक्रम को स्थगित कर दिया गया है।

नए SDM ऋषभ जैन का कहना है कि यह पोस्ट SDM की जानकारी के बिना शेयर की गई थी। हिंदू संगठनों ने आरोप लगाया है कि खसरा नंबर 169 की जमीन पर मस्जिद निर्माण किया गया है। संगठन का कहना है कि वक्फ बोर्ड के नाम पर केवल 1000 वर्गफीट भूमि का आवंटन है और मस्जिद का निर्माण लगभग 3000 वर्गफीट में किया गया है।

हिंदू संगठनों का आरोप है कि मस्जिद की आड़ में अवैध रूप से मदरसा भी संचालित किया जा रहा है। इससे पहले मस्जिद कमेटी ने यह मामला हाईकोर्ट में भी दायर किया था, हालाँकि सबूत के तौर पर कागजों की कमी के चलते केस वापस लेना पड़ा था।

26/11 जैसे हुई थी पहलगाम हमले की साजिश, ‘लोकल’ लोगों को शामिल ना करने का ISI ने दिया था ऑर्डर: रिपोर्ट में बताया- सरगना सुलेमान 7 दिन पहले ही आ गया था कश्मीर

पहलगाम आतंकी हमले में शामिल तीनों आतंकी पाकिस्तानी थे। सुरक्षा एजेंसियों ने इसका खुलासा किया है। एजेंसी का कहना है कि हमले की योजना पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने मिलकर बनाई थी। इसे अमलीजामा पहनाने के लिए पाकिस्तानी आतंकियों को शामिल किया गया ताकि किसी को शक न हो।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक सुरक्षा एजेंसियों ने कहा है कि ISI ने लश्कर कमांडर साजिद जट्ट को निर्देश दिया था कि वह जम्मू-कश्मीर में केवल पाकिस्तानी आतंकियों का ही इस्तेमाल करे, ताकि उसकी पहचान छिपी रहे। यही वजह है कि किसी भी कश्मीरी आतंकी को इस हमले में शामिल नहीं किया गया।

रिपोर्ट्स की माने तो सुरक्षा सूत्रों का कहना है कि यह हमला 26/11 मुंबई हमले की तरह ही लश्कर-ISI की एक मिली-जुली योजना थी। हमले के लिए स्थानीय लोगों को जरुरत के हिसाब से शामिल करने का निर्देश दिया गया था।

जानकारी के अनुसार पहलगाम हमले का लीडर आतंकी सुलेमान था। सुरक्षा एजेंसियों ने शंका जताई है कि सुलेमान पाकिस्तान की स्पेशल फोर्सेज का पूर्व कमांडो था और 2022 में उसने पाकिस्तान के पंजाब में लश्कर-ए-तैयबा के मुरीदके सेंटर में ट्रेनिंग ली थी।

खूफिया एजेंसियों को सैटेलाइट फोन के विश्लेषण से पता चला है कि 15 अप्रैल 2025 को सुलेमान त्राल के जंगल में छिपा हुआ था। यानी वह घटना के पहले से ही बैसरन में हमले की जगह पहुँच चुका था। एक और खुलासे के तहत पता चला कि सुलेमान अप्रैल 2023 में पुंछ में सेना के ट्रक पर हुए हमले में भी शामिल था। इस हमले में पाँच सैनिक मारे गए थे।

इससे पहले फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा करते हुए कहा था कि पहलगाम जैसा हमला बिना किसी फंडिंग के नहीं हो सकता। FATF ने इस संबंध में एक बयान भी जारी किया था।

FATF ने कहा था “आतंकवादी हमले दुनिया भर में लोगों की जान लेते हैं, उन्हें अपंग बनाते हैं और भय पैदा करते हैं। FATF ने कहा था  “यह और हाल ही में हुए अन्य हमले, बिना पैसे और आतंकवादी समर्थकों के बीच पैसे के लेन-देन के साधनों के बिना नहीं हो सकते थे”। अपने आधिकारिक बयान में FATF ने कहा था कि वह मामले में एक्शन लेते हुए आतंकी फंडिंग पर एक विश्लेषण भी जारी करेगा।

बता दें कि 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में आतंकियों ने निर्दोष हिंदुओं को निशाना बनाया था। इस आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए थे। इसके बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर चलाया था। जिसके तहत भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कई आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया था।

‘अहमदाबाद-मुंबई के बीच नहीं चलेगी बुलेट ट्रेन’: मीडिया रिपोर्ट्स को मोदी सरकार ने बताया झूठ, PIB ने कहा-रेल मंत्रालय ने नहीं लिया ये फैसला, E10 शिंकानसेन से प्रोजेक्ट की होगी शुरुआत

अहमदाबाद और मुंबई के बीच जापानी बुलेट ट्रेन नहीं चलने का दावा ‘फर्जी’ निकला है। कुछ मीडिया संस्थानों ने इस खबर को धड़ल्ले से चलाया था। इसमें दावा किया गया था कि जापानी बुलेट ट्रेन के बजाय वंदे भारत ट्रेन को चलाया जाएगा। लेकिन PIB ने इस दावे को ‘भ्रामक’ बताया है।

PIB ने खबर का फैक्ट-चेक करते हुए बताया कि रेल मंत्रालय ने इस तरह का कोई निर्णय नहीं लिया है। बल्कि मुंबई और अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन चलाने के कार्य प्रगति पर है। साथ ही भारत और जापान के बीच हुई रणनीतिक साझेदारी की भी जानकारी दी।

क्या था मीडिया का दावा

हिन्दुस्तान समाचार की एक रिपोर्ट में जापानी ट्रेन न चलने की वजह कीमत बताई गई। दावा किया गया कि जापान ने तय कीमत 3 गुना अधिक बढ़ा दी, जिसके चलते भारत सरकार ने बुलेट ट्रेन न चलाने का फैसला लिया। दावा किया गया सप्लाई करने से पहले ₹16 करोड़ कीमत बताई गई। जबकि सप्लाई करते वक्त इसकी कीमत बढ़ाकर ₹50 लाख कर दी गई।

जबकि हाल ही कि PIB की प्रेस-रिलीज में अहमदाबाद-मुंबई हाईस्पीड कॉरिडोर को लेकर पूरी जानकारी दी गई। इसमें कार्य की गति पर भी जानकारी साझा की गई है। साथ ही जापान सरकार द्वारा बुलेट ट्रेन देने की भी सूचना दी गई है।

क्या है अहमदाबाद-मुंबई कॉरिडोर

अहमदाबाद और मुंबई के बीच हाई स्पीड कॉरिडोर का निर्माण कराया जा रहा है। यह हाई स्पीड कॉरिडोर 508 किलोमीटर लंबा है। जो कि जापान की शिंकानसेन टेक्नोलॉजी से बनाया जा रहा है। इसके लिए भारत-जापान के बीच साझेदारी की गई है। इसके तहत जापान सरकार भारत में इस कॉरिडोर के लिए अगली पीढ़ी की E10 शिंकानसेन ट्रेनों की शुरुआत करने का निर्णय लिया है।

310 किलोमीटर का निर्माण हुआ पूरा

अहमदाबाद और मुंबई के बीच चलने जा रही हाई स्पीड कॉरिडोर की जापानी बुलेट ट्रेन का 310 किलोमीटर का निर्माण पूरा हो गया है। जबकि महाराष्ट्र में BKC से थाणे के बीच पहले चरण की 21 किलोमीटर टनल को खोला जा चुका है।

BBC की गाजा पर डॉक्यूमेंट्री थी प्रोपेगेंडा, हमास आतंकी के लड़के को बनाया हीरो: अब खुद मानी अपनी गलती, कहा- प्रोडक्शन कंपनी ने बोला था झूठ

BBC की गाजा पर बनाई हुई डॉक्यूमेंट्री ‘गाजा हाउ टू सर्वाइव अ वारजोन’ पूरी तरह से प्रोपेगेंडा थी। यह बात BBC ने खुद मान ली है। BBC ने बताया है कि उसने इस डॉक्यूमेंट्री में हमास आतंकी के बेटे को इसमें दिखाया था। इसे BBC ने पीड़ित दिखाने का प्रयास किया था। यह डॉक्यूमेंट्री फरवरी, 2025 में प्रसारित हुई थी।

BBC ने सोमवार (14 जुलाई 2025) को अपनी गलती स्वीकार की है। BBC ने कहा है कि उसने डॉक्यूमेंट्री में संपादकीय नियमों का उल्लंघन किया है। BBC ने बताया है कि बाद में पता चला है कि डॉक्यूमेंट्री में जिस बच्चे ने नैरेशन किया है, वह हमास से जुड़े एक सीनियर आतंकी का बेटा है। यह जानकारी पहले दर्शकों से छुपाई गई।

यह डॉक्यूमेंट्री ‘होयो फिल्म्स’ नाम की एक कंपनी ने बनाई थी। फरवरी 2025 में डॉक्यूमेंट्री प्रसारित होने के बाद बच्चे को लेकर प्रश्न उठे थे। बच्चे को लेकर उठे सवालों के बाद इसे BBC के iPlayer से हटा लिया गया था। अब यह भी सामने आया है कि डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले 3 लोग हमास वाली बात जानते थे।

दावा है कि उन लोगों ने BBC से यह बात छुपाई कि जिस लड़के को वह पीड़ित दिखा रहे हैं वह असल में हमास आतंकी का बेटा है। BBC ने बताया है कि डायरेक्टर जनरल टिम डेवी द्वारा कराई गई समीक्षा में BBC की भारी लापरवाही की बात सामने आई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि डॉक्यूमेंट्री के निर्माण और मंजूरी के समय सही जाँच नहीं की गई।

BBC न्यूज की CEO डेबोरा टर्नेस ने कहा है कि बीबीसी अपनी गलती को स्वीकार करता है और अब इसे सुधारने का प्रयास करेगा। यहूदियों के खिलाफ घृणा से लड़ने वाले एक संगठन ने इस डॉक्यूमेंट्री को जनता के पैसों का दुरुपयोग कहा है और BBC पर सच छुपाने का आरोप लगाया है। अब इस मामले में मीडिया रेगुलेटर ऑफकॉम ने भी जाँच शुरू कर दी है।

HOYO फिल्मस पर उठे सवाल

BBC ने माना है कि डॉक्यूमेंट्री रिलीज करने से पहले तथ्यों की ठीक से जाँच नहीं की गई। वहीं पूर्व ITN CEO और ऑफकॉम के पूर्व कंटेंट रेगुलेटर स्टीवर्ट पर्बिस ने इस मामले में प्रोडक्शन कंपनी होयो फिल्म्स की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।

BBC Radio 4 के कार्यक्रम ‘वर्ल्ड ऐट वन’  में बात करते हुए पर्बिस ने बताया कि BBC ने कम से कम दो बार इस मामले में सीधे होयो फिल्म्स से सवाल किए थे। जिनके फिर भी होयो फिल्म्स ने बच्चे के पिता को लेकर कोई जानकारी नहीं दी।

पर्बिस ने यह भी कहा कि जब BBC ने पूछा कि क्या किसी तरह का कोई दस्तावेज है जो हमास से संबंध दिखाता हो, तो होयो फिल्म्स ने भरोसा दिलाया कि सोशल मीडिया चेक में कुछ नहीं मिला। जवाब के अधूरे और अस्पष्ट होने के बावजूद BBC ने आगे जाँच नहीं की।

BBC की यही गलती आगे चलकर एक बड़ी संपादकीय चूक साबित हुई। पर्बिस ने साफ कहा है कि यह मामला सिर्फ BBC की गलती नहीं है, बल्कि प्रोडक्शन कंपनी की तरफ से जरूरी जानकारी छिपाने का गंभीर मामला है।

डॉक्यूमेंट्री में क्या दिखाया और क्या छिपाया

‘गाजा हाउ टू सर्वाइव अ वारजोन’ नाम की इस डॉक्यूमेंट्री का निर्देशन जैमी रॉबर्ट्स और यूसुफ हम्माश ने किया था। यह फिल्म चार लड़कों की कहानी दिखाती है, जो इजरायल और हमास के बीच चल रहे युद्ध के बीच गाजा में रह रहे हैं। फिल्म को होयो फिल्म्स ने बनाया था।

इस डॉक्यूमेंट्री की शूटिंग गाजा में अंतरराष्ट्रीय मीडिया के प्रवेश पर लगे प्रतिबंधों के कारण लंदन से दूर बैठकर निर्देशित की गई। डॉक्यूमेंट्री की खास बात यह थी कि इसे एक 13 साल के बच्चे की आवाज में सुनाया गया था ताकि

लेकिन बाद में पता चला कि यह बच्चा एक हमास नेता का बेटा है। यह जानकारी डॉक्यूमेंट्री में नहीं बताई गई थी, जो BBC के संपादकीय नियमों का उल्लंघन है। इस खुलासे के बाद फिल्म की साख पर सवाल उठने लगे और BBC ने इसे फरवरी 2025 में हटा दिया था।

गाजा पर दूसरी डॉक्यूमेंट्री भी हटाई

BBC की CEO डेबोरा टर्नेस ने भी इस डॉक्यूमेंट्री को लेकर बात की। उन्होंने इस दौरान दूसरी डॉक्यूमेंट्री ‘गाजा: डॉक्टर्स अंडर अटैक’ लेकर उठे विवाद पर बात की। उन्होंने बताया कि इस डॉक्यूमेंट्री पर भी प्रश्न उठे थे। इस लिए इसे प्रसारित करने से रोक दिया गया था।

उन्होंने बताया कि BBC के अंदर ही कुछ लोगों ने इस पर सवाल उठाए थे, क्योंकि इस डॉक्युमेंट्री से जुड़ी एक पत्रकार ने सोशल मीडिया पर कुछ आपत्तिजनक बातें कही थीं। बाद में यह फिल्म Channel 4 ने प्रसारित की।

डेबोरा टर्नेस ने कहा कि इस डॉक्युमेंट्री की मुख्य पत्रकार रमिता नवई ने BBC Radio 4 के ‘Today’ कार्यक्रम में जो भाषा इस्तेमाल की, वह BBC की निष्पक्षता के मानकों के खिलाफ थी। उन्होंने कहा, “इसकी वजह से हमारे लिए इस प्रोजेक्ट को जारी रखना नामुमकिन हो गया।” उन्होंने यह भी जोड़ा “BBC का कोई भी पत्रकार ऐसा बयान ऑन एयर नहीं दे सकता।”

गौरतलब है कि 4 जुलाई को रमिता नवई ने BBC रेडियो पर दावा किया था, “इजरायल एक ‘रफ स्टेट’ है, जो वार क्राइम्स, एथनिक क्लिंजिंग और मास मर्डर (फिलिस्तीनियों की सामूहिक हत्या) कर रहा है।”

टर्नेस ने माना- BBC हुआ फेल

BBC की CEO डेबोरा टर्नेस ने BBC Radio 4 से बातचीत में जवाबदेही पर जोर दिया। उन्होंने माना कि BBC कुछ जरूरी सवालों की सही तरह से जाँच नहीं कर पाया। उन्होंने कहा कि BBC ने मामले को गंभीरता से लिया और पूरी जाँच की।

उन्होंने दावा किया कि BBC में किसी को भी नरेटर के हमास से जुड़े उसके पिता के बारे में पता नहीं था। टर्नेस ने स्वीकार किया कि BBC को पता होना चाहिए था।

होयो फिल्म्स ने माँगी माफ़ी

डॉक्यूमेंट्री बनाने वाली कंपनी होयो फिल्म्स ने अब एक बयान जारी कर माफ़ी माँगी है और BBC की बातों को सही माना है। उसने कहा है कि वह BBC की रिपोर्ट को गंभीरता से लेती है। हालाँकि, कंपनी ने BBC को गुमराह करने के किसी भी इरादे से इनकार किया है और कहा है कि वह सुधार करेगी। कंपनी ने आगे कहा कि वह iplayer के लिए डॉक्यूमेंट्री का एक संशोधित संस्करण जारी करने के लिए BBC के साथ काम कर रही है।

BBC महानिदेशक कार्रवाई का किया वादा

BBC के महानिदेशक ने इस गलती को स्वीकार करते हुए इसे एक बड़ी चूक बताया है। उन्होंने इस लापरवाही के लिए माफी माँगी है और कहा है कि BBC इस मामले में दो स्तरों पर कार्रवाई करेगा। उन्होंने कहा कि इसके तहत जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाएगा और ऐसी गलती दोबारा न हो इसके लिए भी जरूरी कदम उठाए जाएँगे। BBC बोर्ड ने भी एक बयान में कहा,”हमारी पत्रकारिता में भरोसा और पारदर्शिता से अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं है।”

इस साल मार्च में BBC के डायरेक्टर जनरल टिम डेवी ने ‘कल्चर, मीडिया एंड स्पोर्ट सेलेक्ट कमेटी’ को बताया था कि उन्होंने डॉक्युमेंट्री को iPlayer से हटाने जैसा कठिन फैसला लिया था। डेवी ने बताया कि डॉक्युमेंट्री में नरेशन करने वाले लड़के के परिवार को लेकर बार-बार प्रोडक्शन कंपनी से सवाल पूछे गए लेकिन उनका कोई जवाब नहीं मिला।

उन्होंने बताया था कि इस डॉक्युमेंट्री को लेकर BBC को दो तरफ़ से शिकायतें मिलीं। इसमें इजरायल विरोधी लगभग 500 शिकायतें और इसे हटाने को लेकर 1,800 शिकायतें आईं थी।

विदेशी-घुसपैठिए ही नहीं, बिहार में 12.5 लाख ऐसे भी वोटर जो अब नहीं हैं जिंदा: 35.5 लाख लोगों को लिस्ट से बाहर करेगा चुनाव आयोग, अब तक 6.60 करोड़ ने जमा किए फॉर्म

बिहार में वोटर वेरिफिकेशन का काम जोर शोर से चल रहा है। अब तक करीब 7.90 करोड़ लोगों में से 6.60 करोड़ मतदाताओं का गणना फॉर्म जमा कराया जा चुका है यानी करीब 88 फीसदी मतदाताओं का वेरिफिकेशन हो चुका है। अब तक 5.74 करोड़ फॉर्म चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपलोड किया जा चुका है। बीएलओ अभी भी घर-घर जाकर फॉर्म जमा कर रहे हैं और 963 एईआरओ लगातार इस पूरी प्रक्रिया पर नजर बनाए हुए हैं।

चुनाव आयोग ने कहा, “करीब 1 लाख बीएलओ जल्द ही घर-घर जाकर तीसरे राउंड का दौरा शुरू करेंगे। सभी राजनीतिक दलों के 1.5 लाख बूथ-स्तर के एजेंट हर दिन 50 मतदाता पहचान पत्र सत्यापित और जमा कर सकते हैं। बिहार के 261 शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के सभी 5,683 वार्डों में विशेष शिविर भी लगाए जा रहे हैं ताकि कोई भी मतदाता वोटर लिस्ट में शामिल होने से वंचित न रह जाए”

(ग्राफिक्स साभार- न्यूज 18)

किसके नाम कटे हैं?

अब तक की कवायद में ही करीब 35.50 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं जिनमें मृतकों के नाम, डुप्लिकेट मतदाता या प्रवासियों के नाम शामिल हैं। इसमें लगभग 12.55 लाख (1.59%) पंजीकृत मतदाता शामिल हैं, जिनकी मृत्यु हो चुकी है। करीब 17.37 लाख मतदाता (2.2%) स्थायी रूप से राज्य से बाहर चले गए हैं। 5.76 लाख (0.73 फीसदी) ऐसे मतदाता हैं जिन्होंने एक से अधिक जगहों पर अपना नाम वोटर लिस्ट में रखा हुआ है।

चुनाव आयोग को नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों के कुछ विदेशी नागरिक भी मिले, जो मतदाता के रूप में पंजीकृत थे। जाँच के बाद उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाएँगे।

राज्य से बाहर रहने वाले मतदाता ऐसे भरें फॉर्म

जो मतदाता अस्थायी रूप से राज्य से बाहर हैं, उनसे या तो सीधे संपर्क किया जा रहा है या उन्हें अखबारों में विज्ञापन देकर जानकारी दी है ताकि वे अपने गणना फॉर्म भर सकें।

चुनाव आयोग ने कहा, “अस्थायी रूप से राज्य से बाहर रहने वाले मतदाता अपने मोबाइल फोन का उपयोग करके ECINet ऐप या https://voters.eci.gov.in पर ऑनलाइन गणना फॉर्म भर सकते हैं। अगर उनके परिवार का कोई सदस्य राज्य में मौजूद है तो व्हाट्सएप या किसी अन्य माध्यम से एप्लिकेशन फॉर्म लेकर ऑनलाइन BLO को भेज सकते हैं।”

चुनाव आयोग ने कहा है कि अगर कोई गलती सुधारना चाहता है या कोई अपडेट करना चाहता है तो ऑनलाइन कर सकता है।

विपक्ष पहुँचा सुप्रीम कोर्ट

बिहार में मतदाता सूची संशोधन का विपक्ष लगातार विरोध कर रहा है। इसको लेकर चुनाव आयोग भी विपक्ष के निशाने पर है। महुआ मोइत्रा, योगेंद्र यादव, मनोज झा और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) सहित कई विपक्षी नेताओं और संगठनों ने इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चुनाव आयोग ने नागरिकों पर ही पहचान साबित करने का भार डाल दिया है। राज्य में प्रवासियों की संख्या और गरीबी को देखते हुए ये गलत है। चुनाव आयोग ने जिन दस्तावेजों की माँग की है इससे लाखों मतदाता वोटिंग प्रक्रिया से वंचित रह जाएँगे। उन्होंने मतदाता प्रमाण पत्र के रूप में आधार कार्ड को शामिल नहीं करने पर भी सवाल उठाए।

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (10 जुलाई 2025) को एसआईआर पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने हालाँकि सुझाव दिया कि चुनाव आयोग आधार कार्ड, ईपीआईसी कार्ड और राशन कार्ड को भी पहचान पत्र के लिए शामिल करे। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी।

सीमांचल राज्यों में मिले थे जनसंख्या से ज्यादा आधार कार्ड

बिहार के सीमांचल 4 जिलों कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज और अररिया में आधार कार्ड की संख्या आबादी से अधिक मिली है। इन सीमांचल इलाकों में 100 लोगों पर 120-126 आधार कार्ड मिले हैं। इससे आधार कार्ड की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठ गए हैं। ऐसे में आधार कार्ड को पहचान पत्र में शामिल नहीं करने के फैसले पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए।

बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बताया है कि 2025 में जनवरी से मई तक हर महीने औसतन 26 हजार से लेकर 28 हजार आवेदन निवास प्रमाण पत्र के लिए किशनगंज में आ रहे थे। उन्होंने बताया कि जैसे ही चुनाव आयोग की यह प्रक्रिया चालू हुई यह संख्या तेजी से बढ़ गई।

उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बताया कि जुलाई के 6 दिनों में ही निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए 1.28 लाख से अधिक आवेदन किशनगंज में आ गए। उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि किशनगंज में घुसपैठिए बड़ी संख्या में मौजूद हैं।

विदेश मंत्री जयशंकर ने की चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग से मुलाकात, PM मोदी-राष्ट्रपति मुर्मू का सन्देश भी पहुँचाया: कहा- व्यापार में ना डालो अड़ंगा, 6 साल बाद हुआ है दौरा

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार (15 जुलाई 2025) को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। 2020 की गलवान घाटी के संघर्ष के बाद पहली बार दोनों देशों के नेताओं ने मुलाकात की। विदेश मंत्री एस. जयशंकर वर्तमान में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए बीजिंग में पहुँचे हैं।

चीनी राष्ट्रपति से मुलाकात की जानकारी विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दी। उन्होंने लिखा, “बीजिंग में राष्ट्रपति शी चिनफिंग से बातचीत की। उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुभकामनाएँ दीं। हमारे द्विपक्षीय रिश्तों की प्रगति के बारे में भी चर्चा हुई। इस दिशा में हमारे नेताओं के मार्गदर्शन का अहम योगदान रहा।”

अपनी मुलाकात में दोनों नेताओं ने सीमा विवाद, व्यापारिक सहयोग, और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे कई मुद्दों पर चर्चा की। यह मुलाकात दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने और संवाद को आगे बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।

इस मुलाकात में भारत और चीन के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा के शुरू पर भी खुशी जताई। राष्ट्रपति से मिलने से पहले विदेश मंत्री जयशंकर ने चीनी उपराष्ट्रपति हान झेंग और विदेश मंत्री वांग यी से भी मुलाकात की थी।

जयशंकर की चीनी राष्ट्रपति के साथ ये पहली मुलाकात है। शी जिनपिंग विदेश मंत्रियों से अक्सर मुलाकात में दिलचस्पी नहीं दिखाते। अब इस मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच चल रहे तल्ख रिश्तों में नर्मी आने का अंदेशा जताया जा रहा है।

विदेश मंत्री ने चीन के साथ बातचीत में व्यापारिक प्रतिबंधों पर बात की। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन भारत के मैनिफैक्चरिंग सेक्टर में नुकसान पहुँचाने वाले कदमें से परहेज करे। इसी के साथ पर्यटन को मजबूत करने के लिए सीधी उड़ान के साथ यात्रा की प्रक्रिया को सरल बनाने की बात भी कही है।

SCO में भारत का रुख स्पष्ट

SCO की बैठक में जयशंकर ने भारत के आतंकवाद के कड़े रुख पर अपनी सीधी बात रखी। उन्होंने कहा कि जब SCO का मूल उद्देश्य ही आतंकवाद से लड़ना है, तो उसके संयुक्त बयान में आतंकवाद का उल्लेख न होना भारत को स्वीकार नहीं है। जयशंकर ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के उस फैसले को भी दोहराया जिसमें उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले का ज़िक्र न होने के कारण दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था।

जयशंकर ने यह भी कहा कि भारत आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाता है और ऐसे देशों की आलोचना करने से नहीं हिचकिचाना चाहिए जो आतंकवाद को नीति के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

बता दें कि SCO देशों में भारत, चीन के साथ पाकिस्तान भी शामिल है। SCO देशों में चीन, बारत, रूस, पाकिस्तान, ईरान, बेलारूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान देश शामिल हैं। 2001 में इसकी स्थापना की गई थी। इसका मुख्यालय चीन के बीजिंग में है। ये संगठन यूरेशिया क्षेत्र में राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है।

‘मंदिर-देवताओं के हितों की रक्षा करने को न्यायालय बाध्य’: मद्रास HC ने खारिज की फातिमा की याचिका, शौहर इकबाल की मौत के बाद लेना चाहती थी तमिलनाडु के मंदिर की प्रॉपर्टी

मद्रास हाईको्र्ट ने कहा है कि भगवान में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति मंदिर की संपत्तियों की सुरक्षा के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। हाईकोर्ट ने ये भी कहा है कि न्यायालय मंदिर और देवता के हितों की रक्षा करने के लिए बाध्य है।

ये टिप्पणी करते हुए याचिकाकर्ता एए फातिमा नाचिया की दायर अर्जी खारिज कर दी। फातिमा नाचिया चेन्नई के चन्नमल्लेश्वर और चन्न केशवरपेरुमल देवस्थानम की संपत्तियों पर कब्जा चाहती थी।

कोर्ट ने क्या कहा?

मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस एडी जगदीश चंदिरा ने अपने आदेश में कहा, ” मंदिर में रुचि रखने वाला कोई भी व्यक्ति कानून की शरण में आ सकता है और कोर्ट खुद भी मंदिर या देवताओं के हितों की रक्षा करने के लिए बाध्य है।”

क्या था मामला?

दरअसल मंदिर की संपत्ति याचिकाकर्ता फातिमा के शौहर मोहम्मद इकबाल को पट्टे पर दी गई थी। मंदिर प्रबंध कमेटी ने 1994 में उनके खिलाफ दीवानी अदालत में एक याचिका दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए 2000 में कोर्ट ने इकबाल से पट्टे की जमीन वापस लेने का आदेश पारित किया। इसके बाद इकबाल ने कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील दायर की। इकबाल की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी फातिमा ने मुकदमा जारी रखा।

इस पर अब मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला दिया है। कोर्ट ने ये भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता विवाद को अनसुलझा रखने के लिए एक के बाद एक कई आवेदन दायर करके केवल कुछ तकनीकी पहलुओं पर मुकदमे को लंबा खींच रहा है।

ऐतिहासिक मंदिर है पेरुमल देवस्थानम

चन्ना मल्लेश्वरम और चन्ना केशव मंदिर को पेरुमल देवस्थानम कहा जाता है। चेन्नई के इन दोनों मंदिर को जुड़वां मंदिर कहा जाता है। ये मंदिर भगवान विष्णु (चेन्ना केशव) और भगवान शिव (चेन्ना मल्लेश्वर) को समर्पित हैं, साथ ही ये चेन्नई के इतिहास से जुड़े हुए हैं। चेन्ना शब्द से चेन्नई शब्द की उत्पत्ति हुई है। इसलिए हिन्दुओं के लिए ये प्राचीन मंदिर काफी अहम है।