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9 बौद्ध भिक्षुओं को सेक्स जाल में फँसाया, घर में जमा कर रखे थे 80000 फोटो-वीडियो: ब्लैकमेल कर वसूले 100 करोड़, थाइलैंड पुलिस ने ‘मिस गोल्फ’ को पकड़ा

थाईलैंड पुलिस ने 15 जुलाई 2025 को एक महिला को गिरफ्तार किया है। महिला पर कई बौद्ध भिक्षुओं को यौन संबंध बनाने के लिए उकसाने और फिर उसे ब्लैकमेल करने का आरोप है। उसके पास से चोरी का सामान भी बरामद हुए है।

पुलिस ने महिला को ब्लैकमेलिंग, मनी लॉन्ड्रिंग और चोरी करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। पुलिस महिला को ‘मिस गोल्फ’ कह रही है।

पुलिस को मिले 80 हजार से ज्यादा वीडियो और तस्वीरें

पुलिस ने बताया कि उसके घर की तलाशी के दौरान भिक्षुओं को ब्लैकमेल करने के लिए इस्तेमाल की गई 80,000 से ज्यादा तस्वीरें और वीडियो मिले हैं। कई चैट लॉग मिले जिससे कई भिक्षुओं से उसके संबंधों का खुलासा हुआ है।

बौद्ध भिक्षुओं के ब्रह्मचर्य को पालन करने के नियम के उल्लंघन से बौद्ध संस्थानों में हलचल मच गई है। थाइलैंड में इस पर जबरदस्त बहस चल रही है। पिछले कुछ वर्षों में भिक्षुओं पर यौन अपराधों और मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल होने के कई आरोप भी लगे थे।

रॉयल थाई पुलिस सेंट्रल इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो ने बताया है कि इस मामले में करीब 9 बौद्ध भिक्षुओं को संलिप्त पाया गया है, जिन्हें मठ से निष्कासित कर दिया गया है।

महिला की ऐसे हुई गिरफ्तारी

बैंकॉक के उत्तर में नोंथबुरी प्रांत में रहने वाली 35 साल की विलावान एम्सावत को गिरफ्तार किया गया। चोरी के सामान भी उसके पास से मिले हैं। पुलिस को महिला विलावान के खाते से पता चला है कि थाईलैंड के एक बौद्ध मंदिर के बैंक खाते से एक वरिष्ठ भिक्षु ने उसे पैसे ट्रांसफर किए।

महिला ने ये स्वीकार किया बौद्ध भिक्षुओं से ऐंठे पैसे

थाई पुलिस ने बताया कि महिला विलावान को वरिष्ठ भिक्षुओं से पैसे मिले। पुलिस ने जाँच में पाया कि महिला ने बौद्ध भिक्षुओं को जब अपने प्रेम जाल में फँसाना शुरू किया तो पिछले 3 सालों में उसके खाते में 11.9 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 102.33 करोड़ रुपए आए। इनमें से ज्यादातर रकम बौद्ध भिक्षुओं ने ट्रांसफर किए हैं। जाँच में पता चला कि इनमें से अधिकांश पैसे ऑनलाइन खेली गई जुए वाली वेबसाइट पर खर्च कर दी गई।

मामले का ऐसे हुआ खुलासा

सेंट्रल इंवेस्टीगेशन ब्यूरो के उपायुक्त जारूनकियात पंकेव के मुताबिक जाँच पिछले महीने शुरू हुई और ये मामले तब सुर्खियों में आया जब बैंकॉक के एक प्रसिद्ध बौद्ध मंदिर के वरिष्ठ भिक्षु पर गाज गिरी। जाँच के दौरान पुलिस को पता चला कि महिला विलावन ने वरिष्ठ भिक्षु को अपने प्रेम जाल में फँसाया। उसने भिक्षु को बताया कि वह गर्भवती है और उसे 72 लाख थाई बाट की जरूरत है। ये रकम 222,000 अमेरिकी डॉलर या 1.85 करोड़ रुपए के बराबर है।

मामले के सामने आने के बाद थाइलैंड के मठ प्रशासन पर सवाल उठने लगे हैं। देशभर में थेरवाद संप्रदाय के बौद्ध भिक्षुओं की संख्या काफी है जिन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। महिलाओं को छूने मात्र से इनके ब्रह्मचर्य पर सवाल उठने लगते हैं।

देश की बड़ी जनसंख्या बौद्ध धर्म को मानने वाली है और बौद्ध मठों को काफी दान दिया जाता है। ये पैसा बौद्ध भिक्षुओं, मठ के वरिष्ठ भिक्षुओं और दूसरे मद में खर्च होता है।

सेंट्रल इंवेस्टीगेशन ब्यूरो ने एक फेसबुक पेज बनाया है, जहाँ लोग किसी भिक्षुक की शिकायत कर सकते हैं। थाईलैंड में बड़े पैमाने पर बौद्ध भिक्षुओं की जाँच की जाएगी। जाँच के बाद कई बदलाव किये जाएँगे ताकि बौद्ध धर्म में लोगों की आस्था बनी रहे। मंदिर की वित्तीय व्यवस्था से जुड़े कानून में भी संशोधन किया जा सकता है।

थाईलैंड के कार्यवाहक प्रधानमंत्री फुमथम वेचायाचाई ने अधिकारियों को आदेश दिये हैं कि जाँच में किसी तरह की कोताही नहीं बरती जाए और दोषी भिक्षुओं को हर हाल में सामने लाया जाए ताकि लोगों का विश्वास कायम रह सके।

अकबर ने 30000 काफिरों (हिन्दू) का नरसंहार करवाया, औरंगजेब ने तोड़े मंदिर: 8वीं के बच्चों को मुगलों का असली इतिहास पढ़ाएगा NCERT, इस्लामी सल्तनत में हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों का भी जिक्र

NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की नई किताब अब मुग़ल तथा इस्लामी आक्रान्ताओं की सच्चाई बताएगी। ‘समाज की खोज: भारत और उससे आगे भाग 1’ किताब में मुस्लिम आक्रांताओं की क्रूरता को भी बच्चों को पढ़ाया जाएगा। इस किताब में दिल्ली सल्तनत और मुगलों के शासनकाल को एक नए दृष्टिकोण से दिखाया गया है।

इस पुस्तक में बाबर को ‘क्रूर विजेता’, अकबर के शासन को ‘क्रूरता और सहिष्णुता का मिश्रण’ और औरंगजेब को ‘मंदिरों व गुरुद्वारों को नष्ट करने वाला’ बताया गया है। किताब में सल्तनत काल को लूट, विध्वंस और धार्मिक असहिष्णुता से भरा बताया गया है।

इंडियन एक्स्प्रेस के अनुसार, NCERT ने बताया है कि यह नई पुस्तक 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच के राजनीतिक घटनाक्रम, विद्रोहों और धार्मिक संघर्षों को केंद्र में रखती है, जिसे अब पहली बार कक्षा 8 में पढ़ाया जा रहा है। इससे पहले इसे 7वीं कक्षा में पढ़ाया जाता था।

सल्तनत काल और धार्मिक स्थलों पर हमले

नई पुस्तक में बताया गया है कि अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने श्रीरंगम, मदुरै, चिदंबरम और संभवतः रामेश्वरम जैसे प्रमुख हिंदू धार्मिक स्थलों पर आक्रमण किए। दिल्ली सल्तनत के दौरान बौद्ध, जैन और हिंदू मंदिरों पर कई बार हमले हुए। किताब के अनुसार, इन हमलों का उद्देश्य केवल लूट नहीं था, बल्कि मूर्तिभंजन यानी धार्मिक प्रतीकों का विनाश भी इसका मुख्य उद्देश्य था।

जजिया कर और गैर-मुस्लिम प्रजा

पुस्तक में ‘जजिया’ कर के बारे में भी बताया गया है। बताया गया है कि कुछ मुस्लिम शासकों द्वारा गैर-मुसलमानों (हिन्दुओं) पर लगाया गया था। किताब के अनुसार, यह कर उनके लिए सार्वजनिक अपमान का कारण भी बन गया। नई किताब के अनुसार, इस कर ने इस्लाम अपनाने के लिए एक प्रकार का वित्तीय और सामाजिक दबाव पैदा किया। कक्षा 7 की पुरानी किताब में जज़िया को भूमि कर के साथ वसूला गया कर बताया गया था, जबकि नई किताब इसे एक स्वतंत्र और अलग कर के रूप में पेश करती है।

बाबर – एक विजेता की दोहरी छवि

बाबर की आत्मकथा में उसे एक सुसंस्कृत और बौद्धिक रूप से जिज्ञासु व्यक्ति बताया गया है, लेकिन नई किताब में कहा गया है कि वह एक क्रूर विजेता था। किताब में बताया गया है कि उसने कई शहरों में नरसंहार किए, महिलाओं और बच्चों को गुलाम बनाया और लूटे गए शहरों के मारे गए लोगों की खोपड़ियों से मीनारें बनवाने पर गर्व महसूस किया। वहीं, पुरानी किताब में बाबर को केवल एक ऐसा शासक बताया गया था जिसे अपने सिंहासन से हटने के बाद काबुल और फिर दिल्ली और आगरा पर कब्ज़ा करने का अवसर मिला।

अकबर – सहिष्णुता और क्रूरता का मिश्रण

अकबर को नई किताब में एक ऐसा शासक बताया गया है जिसमें सहिष्णुता और क्रूरता दोनों के तत्व थे। नई किताब बताती है कि जब उसने चित्तौड़गढ़ के किले पर आक्रमण किया, तो लगभग 30,000 नागरिकों के नरसंहार का आदेश दिया।

किताब के अनुसार, अपनी जीत की घोषणा करते हुए उसने कहा कि उसने काफिरों के किलों और कस्बों पर कब्जा कर इस्लाम की स्थापना की और तलवार के बल पर मंदिरों को नष्ट कर काफिरों के प्रभाव को मिटा दिया। फिर अकबर ने बाद में विभिन्न धर्मों के प्रति सहिष्णुता दिखाई, फिर भी प्रशासन में गैर-मुसलमानों की संख्या अल्प ही रही।

औरंगजेब – धार्मिकता और राजनीति

नई किताब औरंगजेब के शासन को राजनीतिक और मजहबी दृष्टिकोणों से देखती है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उसके कई निर्णय राजनीतिक थे, उसके फरमान यह भी दिखाते हैं कि उसमें मजहबी कट्टरता भी थी।

उसने अपने राज्य के गवर्नरों को मंदिरों और धार्मिक शिक्षण संस्थानों को नष्ट करने के आदेश दिए। उसने काशी, मथुरा, सोमनाथ के मंदिरों, जैन धार्मिक स्थलों और सिख गुरुद्वारों को ध्वस्त करने का आदेश दिया।

आर्थिक और सामाजिक स्थिति

पुस्तक यह भी बताती है कि सल्तनत और मुगल शासन के अधीन एक मजबूत प्रशासनिक ढाँचा था और 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच आर्थिक गतिविधियाँ काफी जीवंत थीं। शहरों और बुनियादी ढाँचे में काफी प्रगति हुई, लेकिन 1600 के दशक के अंत में आर्थिक संकट और दबाव का दौर शुरू हुआ। इसके बावजूद, भारतीय समाज ने कस्बों, मंदिरों और अर्थव्यवस्था के अन्य पहलुओं के पुनर्निर्माण में लचीलापन और अनुकूलन क्षमता दिखाई।

मराठा और शिवाजी का योगदान

अध्याय के अंत में मराठों का वर्णन किया गया है, जिसमें शिवाजी को एक कुशल रणनीतिकार और दूरदर्शी नेता कहा गया है। उन्हें एक धार्मिक हिंदू बताया गया है जो अन्य धर्मों का सम्मान करते थे और अपवित्र हो चुके मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाते थे।

किताब के भीतर मराठों को भारत के सांस्कृतिक विकास में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता माना गया है। पुरानी किताब में शिवाजी को केवल एक कुशल प्रशासक और मराठा राज्य की नींव रखने वाला बताया गया था, लेकिन नई किताब में उनके धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण को भी महत्व दिया गया है।

नई किताब में दिल्ली सल्तनत के उत्थान-पतन, विजयनगर साम्राज्य, मुगलों का शासन, उनके खिलाफ हुए प्रतिरोध और सिखों के उदय को विस्तार से दर्शाया गया है। गौर करने वाली बात यह भी है कि पहले दिल्ली सल्तनत और मुगल इतिहास की पढ़ाई कक्षा 7वीं में होती थी।

लेकिन अब नए पाठ्यक्रम संरचना में बदलाव करते हुए, इसे 8वीं कक्षा में शामिल किया गया है। यह नई किताब पहले से कहीं ज्यादा आलोचनात्मक, विश्लेषणात्मक और तथ्यों पर आधारित है। इसमें शासकों की धार्मिक और सैन्य नीतियों का खुलकर अंदाजा लगाया गया है, जिसकी जानकारी पहले की किताबों में हल्की फुलकी ही दी गई थी।

सूर्य का आकार इतना बड़ा, फिर हनुमान जी ने कैसे निगला? – हिन्दू विरोधी पूछ रहे सवाल, जान लीजिए सनातन धर्म-दर्शन में छिपा जवाब

कुछ दिनों से सोशल मीडिया में सूर्य की तस्वीर वायरल की जा रही है और पूछा जा रहा है कि सूर्य का तो आकार फलाँ-फलाँ है तो हनुमान जी ने इसे कैसे निगल लिया? ऐसे प्रपंचियों को समझाना इस लेख का लक्ष्य नहीं, लेकिन कम से कम हिन्दुओं को तो चीजें पता होनी चाहिए। ख़ास बात ये है कि ये फ़ैलाने वाले कोई इस्लामी कट्टरपंथी नहीं हैं, बल्कि कई हिन्दू नाम वाले हैंडल भी हैं। इनका दलित हितों से कोई लेना-देना नहीं, लेकिन ये स्वयं को दलितों का ठेकेदार बताते हैं।

दिमागी स्तर मापने के जो भी मापदंड हों, इनका स्तर शून्य से भी नीचे जाता है। अब समय आ गया है जब हनुमान जी वाली कथा को क्रमवार देखें और समझें कि ऐसा क्या है जो सनातन धर्म पर हमला करने वालों को समझ नहीं आ रहा है। कथा संक्षेप में यूँ है कि हनुमान जी भूखे थे तो उन्होंने उगते हुए सूर्य को फल समझकर उसे निगल लिया। वो धरती से कूदकर सीधे सूर्य के पास गए। इससे दुनिया में अँधेरा हो गया और इंद्र ने उनपर वज्रप्रहार किया। बाद में वायुदेव के रुष्ट होने के बाद सब देवताओं ने उन्हें वरदान दिया।

हनुमान जी सूर्य को देखकर उसे निगलने के लिए उद्यत होते हैं

सनातन धर्म में सूर्य केवल ऊपर जो दिखता है वही सूर्य नहीं है। वेदों में सूर्य ब्रह्माण्ड का नेत्र है, जो ब्रह्म के चक्षु हैं उन्हें भी सूर्य ही कहा गया है। हनुमान जी उस समय बालक थे, लेकिन ज्ञानप्राप्ति को लेकर वो इतने व्यग्र थे कि एक ही झटके में सारा ज्ञान पा लेना चाहते थे। कथा कुछ यूँ है कि हनुमान जी ने उदित होते सूर्य को देखा और उसे निगलने के लिए उद्यत हो उठे। अर्थात, उन्हें आत्मज्योति की हल्की झलक दिखाई दी और वो तुरंत ही उसे पूरा पाने के लिए निकल पड़े।

वेदांत में ब्रह्म को ‘चक्षुः सूर्य इवोदितः’ कहकर संबोधित किया गया है, अर्थात वो ब्रह्म को ज्ञान का स्रोत बताकर कहा गया है कि वो कुछ उस तरह उदित होते हैं जैसे सूर्य। सूर्योदय का दृश्य काफ़ी सुंदर होता है, लेकिन उस सुंदरता और मद्धिम किरणों के पीछे सूर्य भयंकर ज्वाला का स्रोत है। ठीक वैसे ही, ज्ञान का प्रकाश बहुत अच्छा लगता है लेकिन उसे पाने निकलने पर पता चलता है कि ये अथाह है। कोई सीधे ब्रह्मज्ञानी नहीं बन सकता, उसके लिए प्रक्रिया से गुजरनी होती है।

वायु हनुमान जी की रक्षा करते हैं

वायु का तात्पर्य यहाँ अदृश्य जीवनरक्षक से है, जो ज्ञानप्राप्ति के लिए यात्रा करने वालों की सुरक्षा करता है। इसके पीछे ये सन्देश है कि अगर आप ज्ञानप्राप्ति के लिए बड़ी से बड़ी कूद भी लगाएँगे, तो इस ब्रह्माण्ड की प्राणवायु आपका साथ देगी। आपकी साँसें सार्थक लक्ष्य के लिए उपयोग में लाई जा रही हैं, इसीलिए वो आपका साथ नहीं छोड़ेंगी। योगी श्री M कहते हैं कि ये श्वास ही है जो आपकी आत्मा और आपके शरीर के बीच की सेतु है, अगर इसपर आपका नियंत्रण है तो आपके मस्तिष्क पर भी आपका नियंत्रण है।

अतः, हनुमान जहाँ भी जाते हैं वायुदेव उनका साथ देते हैं, उनकी रक्षा करते हैं। हनुमान वायुपुत्र भी हैं। यही कारण है कि वो लंका से उड़कर हिमालय पर पहुँच जाते हैं और वहाँ से पूरे पर्वत को उठाकर वापस लौटते हैं। लंका में आग लगाकर भी वो जलते नहीं, ‘मरुत उनचास’ पूरी लंका जला देते हैं लेकिन हनुमान जी नहीं जलते। ये वायु संपूर्ण ब्रह्माण्ड में है, पृथ्वी के वातावरण में ये हवा के रूप में है। हनुमान को पवन-पुत्र कहा गया है।

हनुमान सूर्य के प्रकाश से जलते नहीं

इसका अर्थ है कि सच्चा ज्ञान कभी भी आपको हानि नहीं पहुँचाता है, ये आपको शुद्ध करता है। हनुमान एक निर्दोष बालक हैं, भले ही वो ज्ञान रूपी प्रकाश के परम स्रोत के पास पहुँच जाते हैं लेकिन वो जलते नहीं। भगवद्गीता (4.38) में भी श्रीकृष्ण कहते हैं – ‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते‘, दूसरी कोई भी ऐसी चीज नहीं है जो ज्ञान की तरह आपको निर्मल कर सके। हनुमान जी द्वारा सूर्य के समीप जाकर भी न जलने के पीछे का अर्थ यही है कि आप तैयार नहीं हैं फिर भी सत्य या परमज्ञान आपको कोई नुक़सान नहीं पहुँचाएगा।

राहु सूर्य को निगलने के लिए लपकता है

कथा कुछ यूँ है कि उसी समय सूर्य को खाने के लिए राहु भी आया था, लेकिन हनुमान के भय से वो भाग जाता है। राहु, यानी – माया, शंका, भय। जब हनुमान यहाँ पवित्रता और साहस के प्रतीक हैं, तो राहु यहाँ माया है। माया से अध्यात्म के माध्यम से ही निपटा जा सकता है। माया को ‘महाठगिनी’ भी कहा गया है, जैसे-जैसे ज्ञान की प्राप्ति होती है वैसे-वैसे माया के बादल छँटते चले जाते हैं। हनुमान जी की तरह ही अपने डर का सामना कीजिए, मस्तिष्क में ‘सत्व’ होगा तब राहु नाम का तमस भागता फिरेगा।

योग वशिष्ठ में श्रीराम को उपदेश देते हुए वशिष्ठ मुनि समस्त संसार को माया बताते हुए कहते हैं कि इसमें जो कुछ भी है सब माया है। राहु उसी माया का प्रतीक है यहाँ। राहु ने ग्रहण लगा दिया, मतलब आपका चित्त आपके वश में नहीं है और ज्ञानप्राप्ति नहीं हो पाएगी। हनुमान जी इससे बच गए।

इंद्र द्वारा हनुमान को ख़तरा समझकर उनपर वज्र प्रहार करना

हनुमान जी को भूख लगी, उन्होंने उदित होते सूर्य का सुंदर रूप देखा, उसे निगलने के लिए उड़ लिए, पास पहुँचकर भी जले नहीं, राहु भाग निकला – अब कथा आगे बढ़ती है। इंद्र ने हनुमान जी को ख़तरा मानकर उनपर वज्र प्रहार किया। ज्ञानप्राप्ति के मार्ग में भी सज़ा? इंद्र यहाँ दैवीय कर्म, व्यवस्था और अनुशासन के प्रतीक हैं। ज्ञान तो आपको नहीं जलाएगा, लेकिन दैवीय शक्तियाँ आपकी परीक्षा अवश्य लेंगी। दुःख ज़रूर आएँगे, लेकिन अगर आप सही रास्ते पर हैं तो ये सज़ा नहीं बल्कि बदलाव की प्रक्रिया का माध्यम बनेंगे।

दुःख कभी-कभी सुधार के लिए ही आते हैं, ये दैवीय सज़ा ही नहीं होते। इसके बाद कथा है कि हनुमान जी को नुक़सान पहुँचता है तो वायुदेव पूरे ब्रह्माण्ड को तड़पता हुआ छोड़कर निकल लेते हैं। इस ब्रह्माण्ड में सबकुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है, भौतिकी के नियम भी यही कहते हैं। कई नियम हमें पता नहीं, लेकिन फिर भी वो अस्तित्व में हैं और अपना कार्य कर रहे हैं। न्यूटन से पहले भी गुरुत्वाकर्षण था। अंत में देवताओं को भी झुकना पड़ता है और हनुमान परमज्ञानी बनकर निकलते हैं।

इसके बाद जो रामायण में होता है, वो हम सबको पता है। मान लीजिए, हमें इतिहास की किसी घटना के बारे में जानना है। जो पुरातत्वविद होंगे, वो सीधे उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन करेंगे। जो इतिहासकार होंगे, वो समकालीन साहित्य देखेंगे। जो छात्र होंगे, वो उन इतिहासकारों को पढ़ेंगे। जो आम लोग होंगे, वो उस घटना पर आधारित उपन्यास पढ़ेंगे। जो बच्चे होंगे, उन्हें चित्रकथा के रूप में वो घटना पढ़ाई जाएगी। जिसका ज्ञान का जो स्तर, कंटेंट उसके लिए उसी रूप में दिमाइज किया जाता है। सनातन धर्म में भी ऐसा ही है।

जिन्हें शंका है, वो हनुमान जी पर लिखे गए इस लेख को पढ़ सकते हैं। श्रीराम ने हनुमान जी की बातों से ही अंदाज़ा लगा लिया कि वो तीनों प्रमुख वेदों के ज्ञाता हैं। जब पहली बार श्रीराम उनसे मिले, उस प्रसंग में हनुमान जी काफी देर तक बोलते हैं। श्रीराम ने पाया कि इसके बावजूद उनके मुँह से एक भी अशुद्धि नहीं निकली। हनुमान जी की भौहें, ललाट, मुख और नेत्र के अलावा सभी अंग उनकी बातों के हिसाब से उनका साथ देते थे। यानी, सभी अंगों में और उनकी बातों में तालमेल दिखता था।

टैगोर, मुजीबुर और अब सत्यजीत रे… इस्लामी कट्टरपंथियों ने मकान से निकाली दुश्मनी: अपनी ही सांस्कृतिक विरासत को बर्बाद करने में जुटी यूनुस सरकार

भारतीय फिल्ममेकर सत्यजीत रे का बांग्लादेश में स्थित घर गिरा दिया गया है। मैमनसिंह शहर में बने सत्यजीत रे के पैतृक घर को न गिराने की गुजारिश भारत सरकार की ओर से भी की गई थी। भारत की ओर से कहा गया था कि ये एक सांस्कृतिक धरोहर है। इसकी मरम्मत और संरक्षण का बीड़ा भी भारत सरकार ने उठाने की बात कही थी। इसके बावजूद बांग्लादेश की युनुस सरकार नहीं मानी और ऐतिहासिकता की परवाह किए बिना इसे जमींदोज कर दिया।

सत्यजीत का ये घर असल में उनकी तीन पीढ़ियों से जुड़ा हुआ था। इस घर को सत्यजीत रे के दादा और कवि सुकुमार रे के पिता प्रसिद्ध बाल साहित्यकार उपेंद्र किशोर रे का पैतृक घर है। जर्जर होने के 10 साल पहले तक इस घर को पहले मैमनसिंह शिशु अकादमी के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन बीते कुछ वर्षों से यह वीरान पड़ी थी। बांग्लादेशी अधिकारियों ने इमारत को जर्जर कहते हुए इसे नशेड़ियों का अ्डडा बताया था।

सिनेमा की रीढ़ रहे सत्यजीत

सत्यजीत रे विश्व सिनेमा के बड़े फिल्मकारों में से एक रहे हैं। उनकी फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाई। वह फिल्म डायरेक्टर होने के साथ-साथ लेखक, संगीतकार और चित्रकार भी थे। उनके दादा उपेंद्र किशोर रे ने लगभग 100 साल पहले ये घर बनवाया था। जो वर्तमान में एक ऐतिहासिक धरोहर था। 1947 में बँटवारे के दौरान यह संपत्ति वर्तमान बांग्लादेश (पहले पूर्वी पाकिस्तान) के अधिकार क्षेत्र में चली गई थी।

भारत सरकार ने इस इमारत को बचाने की पेशकश भी की थी, लेकिन बांग्लादेशी प्रशासन ने इसे नजरअंदाज कर दिया।

रबींद्रनाथ टैगोर के घर पर भी हुए हमले

संस्कृति के विनाश में महज सत्यजीत रे का ही घर नहीं तोड़ा गया बल्कि इस कड़ी में नोबेल पुरस्कार विजेता रबींद्रनाथ टैगोर का भी नाम शामिल है। 8 जून 2025 को रबींद्रनाथ टैगोर के पैतृक घर रबींद्र कचहरी बाड़ी में 50-60 लोगों की भीड़ ने घुसकर तोड़फोड़ की और संग्रहालय, सभागार और संरक्षक कार्यालय को भी नुकसान पहुँचाया था। घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश पैदा किया।

अपनी सफाई में क्या बोले यूनुस

सत्यजीत रे के घर को गिराए जाने के बाद भारत सरकार में इसे अत्यंत खेदजनक बताया और बांग्लादेश सरकार से पुनर्विचार की अपील भी की। इसके बाद मोहम्मद यूनुस सरकार का कहना है कि अब उस जगह पर नई इमारत बनाई जाएगी ताकि शिशु अकादमी की गतिविधियाँ दोबारा शुरू की जा सकें। पर असल में ये हरकत बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की असंवेदनशीलता और गैर-जिम्मेदाराना हरकत को दिखलाता है।

रबींद्रनाथ के घर पर तोड़फोड़ की घटना के बाद भी भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी और इसे “सांस्कृतिक स्मृति और सभ्यतागत निरंतरता पर सीधा हमला” बताया था। इसके बाद खुद की साख बचाने के दबाव में यूनुस सरकार ने जाँच और गिरफ्तारी की बात कही।

रवींद्रनाथ टैगोर और सत्यजीत रे दोनों ही बंगाली साहित्य, कला और विचारधारा को दुनिया के सामने लाने में और मजबूती से खड़ा करने में बेहद अहम भूमिका निभाई है। रबींद्रनाथ ने बांग्लादेश के साथ भारत का राष्ट्रगान भी लिखा। उनकी रचनाएँ बंगाली संस्कृति की आत्मा को साफतौर पर दिखलाती हैं।

इन दोनों के घरों के साथ हुई घटनाओं में एक समानता जरूर है और वह है- सरकार की निष्क्रियता और इस्लामीकरण करने वाले कट्टरपंथियों को बढ़ावा देने वाली चुप्पी। मोहम्मद यूनुस खुद नोबेल शांति पुरस्कार विजेता हैं। इसके बावजूद एक दूसरे नोबेल विजेता रबींद्रनाथ टैगोर की निशानी, उनके घर, जिससे न केवल भारत बल्कि बांग्लादेश के भी संस्कृति के बारे में दुनिया को पता चलता है, उसे बचाने में असफल रहे।

सत्यजीत रे के मामले में भी उनसे अपेक्षा थी कि वे सांस्कृतिक सहिष्णुता और विरासत संरक्षण को प्राथमिकता देंगे। लेकिन उनकी सरकार की नीतियाँ और प्रतिक्रियाएँ इस उम्मीद के विपरीत ही रही हैं। यह विडंबना ही है कि एक व्यक्ति, जिसने गरीबी हटाने और सामाजिक न्याय की बात की, उसकी सरकार सांस्कृतिक न्याय और ऐतिहासिक स्मृति की रक्षा में असफल रही।

अपने देश के संस्थापक के साथ भी किया अन्याय

ऐतिहासिकता को दरकिनार करने के साथ-साथ युनुस सरकार अपनी जड़ों को भी भुलाने के लिए हर विनाशकारी कदम उठाने को तैयार है। अंतरिम सरकार ने बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान को राष्ट्रपिता के दर्जे से भी वंचित कर दिया। साथ ही उनके स्वतंत्रता सेनानी की मान्यता को रद्द किया ।

मुजीबुर रहमान ने 1971 के मुक्ति संग्राम का नेतृत्व किया, लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बने और एक स्वतंत्र राष्ट्र की नींव रखी। देश को पाकिस्तान से आजादी दिलाने के उनके संघर्ष और बलिदान की अवहेलना करके असल में युनुस सरकार ने उनके अस्तित्व के साथ खिलवाड़ किया, उन्हें इतिहास से मिटाने की कोशिश की और उनके नाम को भी मुक्ति संग्राम की परिभाषा से हटा दिया।

नए अध्यादेशों के तहत उन्हें “मुक्ति संग्राम का सहयोगी” मात्र घोषित किया गया है, जिससे उनकी ऐतिहासिक भूमिका को गौण कर दिया गया है। इससे पहले यूनुस सरकार ने उनकी तस्वीर को करेंसी नोटों से हटाने और उनसे जुड़े राष्ट्रीय दिवसों को रद्द करने का भी निर्णय लिया था।

असल में युनुस का यह निर्णय शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को निशाना बनाने के लिए था। मुजीबुर रहमान की विरासत को मिटाने की कोशिशें बांग्लादेश को उसके इतिहास से काटने की साजिश जैसी लगती हैं, जो अंततः देश की पहचान और आत्मसम्मान को कमजोर करती हैं।

यह सब उस समय हो रहा है जब बांग्लादेश को एक स्थिर और समावेशी नेतृत्व की आवश्यकता है। यूनुस, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति और सामाजिक न्याय के प्रतीक माने जाते हैं, उनकी सरकार का यह रवैया सांस्कृतिक और ऐतिहासिक न्याय के खिलाफ है।

बांग्लादेश की जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह समझना होगा कि किसी भी शहर, राज्य या देश की सांस्कृतिक विरासत केवल ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं होतीं, बल्कि वे समाज की आत्मा होती हैं। सत्यजीत रे और रबींद्रनाथ टैगोर जैसे व्यक्तित्वों की स्मृति को मिटाना, दरअसल उस आत्मा को ही नष्ट करना है।

मोहम्मद यूनुस सरकार उन लोगों का जखीरा है जिन्हें संस्कृति, विरासत, ऐतिहासिकता जैसे किसी भी शब्द से कोई वास्ता ही नहीं है। यह वे का इस्लामिक कट्टरपंथी हैं जिन्हें बस हर तरह से विनाश करना ही आता है।

जिनके घर गिराए गए या तोड़े गए या जो सेनानी रहे उन्होंने तो समाज के भले के लिए और समाज को आगे बढ़ने का ही काम किया पर यूनुस की सरकार में शामिल इस्लामिक कट्टरपंथी सिर्फ देश में अस्थिरता, अशांति और तनाव बढ़ाने के लिए ही जाने जा रहे हैं। भविष्य में मोहम्मद यूनुस सरकार इतिहास में एक ऐसी सत्ता के रूप में दर्ज होगी जिसने अपनी ही सांस्कृतिक जड़ों को काटने का काम किया।

बिहार में बांग्लादेशी साज़िश, लीक हुई ‘टूलकिट’: ‘बैक साइड’ में चोटिल पप्पू यादव और रवीश कुमार ने किया चुनाव के बहिष्कार का ऐलान

पप्पू के आगे दो पप्पू, पप्पू के पीछे दो पप्पू। बोलो कितने पप्पू? पप्पू-पप्पू-पप्पू… जिधर देखो पप्पू की पप्पू। लखनऊ के कोर्ट में सरेंडर करता पप्पू। चुनाव आयोग को गाली देता पप्पू। पप्पू के मंच से भगाया जाता पप्पू। फिर भी बेटे का करियर बनाने के लिए पप्पू की तारीफ़ करता पप्पू।

पूर्णिया से निर्दलीय सांसद और कॉन्ग्रेस के नेता पप्पू यादव विपक्ष से कह रहे हैं कि वो बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव का बहिष्कार करे। पप्पू यादव का ख़ुद कॉन्ग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में बहिष्कार कर दिया था, जिस कारण उन्हें निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा था। अभी कुछ दिनों पहले हमें फिर से ये नज़ारा देखने को मिला जब बिहार में महागठबंधन के विरोध प्रदर्शन के दौरान कॉन्ग्रेस ने पप्पू यादव का बहिष्कार कर दिया। उन्हें मंच तक पर नहीं चढ़ने दिया गया, राहुल गाँधी के सुरक्षाकर्मियों ने धक्का देकर भगाया सो अलग।

पप्पू यादव से लेकर रवीश कुमार तक, चुनाव बहिष्कार वाला ‘टूलकिट’

लगता है पप्पू यादव की ‘बैक साइड’ में लगी चोट का कुछ असर उनके दिमाग पर भी हुआ है, इसीलिए उन्हें हर तरफ बहिष्कार-बहिष्कार ही दिखाई दे रहा है। बोल पप्पू यादव रहे हैं, लेकिन यह भाषा वही टूलकिट वाली है जो अराजकता को जन्म देती है। उस अराजकता से अराजक तत्व सत्ता हथियाने में कामयाब हो जाते हैं। जब लोकतान्त्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को चुनाव में हराने में ये कामयाब नहीं होते हैं, तब यही तरीका अपनाया जाता है।

रवीश कुमार का भी कहना है – “चुनाव क्यों करा रहे हैं, प्रिंट कमांड दीजिए और रिज़ल्ट छाप दीजिए।” नेताओं और उनका एजेंडा चलाने वाले युट्यूबरों की भाषा एक सी दिख रही है, ये मात्र संयोग नहीं हो सकता। अंदरखाने जो साज़िश चल रही है, ये उसको अमल में लाने के लिए लगाए गए प्यादे हैं।

मामला कुछ यूँ है कि बिहार में मतदाता सूची में सुधार का अभियान चल रहा है। ये काम भाजपा या जदयू नहीं, बल्कि चुनाव आयोग द्वारा किया जा रहा है। 1 लाख BLO घर-घर जाकर मतदाता सूची को अपडेट कर रहे हैं। ख़ास बात यह है कि राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त डेढ़ लाख BLA इस कार्य में उनकी सहायता कर रहे हैं। ज़ाहिर है, इनमें विपक्षी दलों के भी एजेंट्स हैं। क्या पप्पू यादव ये कहना चाह रहे हैं कि कॉन्ग्रेस द्वारा नियुक्त बूथ लेवल एजेंट्स ठीक से अपना कार्य नहीं कर रहे हैं? जब प्रक्रिया में ख़ुद कॉन्ग्रेस पार्टी शामिल है, फिर भी अगर उसे दोष दिख रहा है – तो उसका ठीकरा कॉन्ग्रेस पर भी फूटना चाहिए न?

भारत में लागू करना चाहते हैं बांग्लादेश वाला ‘अराजक’ मॉडल

चुनाव का बहिष्कार करने वाला टूलकिट इनका आजमाया हुआ है। पिछले वर्ष बांग्लादेश में खालिदा जिया की पार्टी BNP ने आम चुनाव का बहिष्कार किया। इस टूलकिट पर चलते हुए विदेशी ताक़तों की मदद से चुनाव विरोधी माहौल बनाया जाता है। जैसे, बांग्लादेश में यूरोपियन यूनियन के एम्बेस्डर चार्ल्स व्हाइटली ने एक पत्र लिखकर चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया। इसी तरह, जनवरी 2019 में लंदन में सैयद शुजा नामक शख्स ने कथित EVM हैकिंग का लाइव डेमो दिखाया। ये ऐसा डेमो था कि वामपंथी मीडिया पोर्टलों तक को कहना पड़ा – इतना ग़लत कैसे हो सकता है भाई?

पप्पू यादव भी इसी भाषा में बोल रहे हैं। वो कह रहे हैं कि दुनिया को पता तो चले कि भारत कितना लोकतान्त्रिक है। विडम्बना देखिए, एक ऐसा नेता ये सब कह रहा है जो ख़ुद 2 प्रतिशत से भी कम अंतर से जीतकर लोकसभा पहुँचा है। ये खेल अभी शुरू नहीं हुआ है। पिछले वर्ष जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में महायुति गठबंधन की जीत हुई, तब भी ऐसी साज़िश रची गई थी। इसी महाराष्ट्र में जब लोकसभा चुनाव में MVA की जीत हुई थी, तब EVM और चुनाव में छेड़छाड़ की चर्चाएँ थम गई थीं। एक निलंबित पुलिस अधिकारी के बयान के सहारे प्रपंच रचने का प्रयास किया गया। महाराष्ट्र चुनाव पर चर्चाओं को अबतक खींचा जा रहा है, पिछले ही महीने राहुल गाँधी ने दर्जनभर अख़बारों में लेख लिखकर महाराष्ट्र में कथित मैच फिक्सिंग का रोना रोया।

महाराष्ट्र में दाल नहीं गली, महाराष्ट्र चुनाव पर प्रपंच को नेशनल इशू बनाने की कोशिश भी नहीं चल पाई – तो अब बिहार के सहारे इस फैंटेसी को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि चुनाव आयोग को ये तय करने का अधिकार है कि जो भारत के नागरिक नहीं हैं वो मतदाता सूची में न रहें। बिहार म 2003 में भी SIR, यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन हुआ था। नब्बे के दशक में भी देश में तीन-तीन बार ये किया जा चुका है, फिर हंगामा सिर्फ़ अभी क्यों? 1957 और 1961 में जब SIR हुआ था, तब जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे। नेहरू के समय हुआ तो सही, मोदी के समय ग़लत कैसे?

अब तो पहले जैसी दिक्कत भी नहीं है। सबकुछ ऑनलाइन भी उपलब्ध है। voters.eci.gov.in पर जाकर फॉर्म भरकर कोई भी व्यक्ति गणना प्रपत्र भर सकता है। जो कामकाज या पढ़ाई के सिलसिले में बिहार से बाहर रह रहे हैं, उनके लिए भी ये विकल्प खुला है। मैंने भी ऐसे ही अपना नाम दर्ज कराया है।

असल में इनकी पूरी योजना वो करने की है, जो ये किसान आंदोलन के दौरान नहीं कर पाए, जो ये शाहीन बाग़ उपद्रव के दौरान नहीं कर पाए। किसान आंदोलन के दौरान भी इंटरनेशनल टूलकिट चला था, जिसमें गायिका रिहाना और पॉर्नस्टार मिया खलीफा तक के पोस्ट्स आए थे। अब पप्पू यादव ने शुरुआत की है, देखते हैं किन-किन के पोस्ट आते हैं। जबसे इन्होंने बांग्लादेश की चुनी हुई प्रधानमंत्री शेख हसीना को दूसरे देश में शरण लेते हुए देखा है, तबसे इनकी बाँछें खिली हुई हैं। जब अराजकता के कारण शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था, तब इन्होंने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश से बाहर शरण लेने को मजबूर करने के सपने देखे थे। तभी ये अराजकता को ‘युवा क्रांति’ बताकर उसका समर्थन कर रहे थे, हिन्दुओं के नरसंहार पर चुप थे।

बिहार में बुरी तरह विफल होगी ‘टूलकिट’ वाली साजिश

पप्पू यादव को सबसे पहले अपने पूर्णिया संसदीय क्षेत्र में जाना चाहिए, वहाँ के कॉन्ग्रेस के BLOs से पूछना चाहिए कि SIR कैसे होता है। वैसे पप्पू यादव के आसपास रहने वाले लोग बताते हैं कि जब तक वो दिन में एक इंटरव्यू नहीं देते हैं, तबतक उनके पेट में मरोड़ें उठती रहती हैं। जब वो लोगों के साथ होते हैं तब इतना बोलते हैं कि बाकियों को बोलने का मौक़ा भी नहीं मिलता।

इनके सामने समस्या ये आ रही है कि न बिहार में कॉन्ग्रेस का कोई अस्तित्व बचा है, न वहाँ भाजपा का मुख्यमंत्री हैं। सारी आलोचनाओं के बावजूद नीतीश कुमार का चेहरा क्लीन है, जिसके सामने चारा चोरी का ठप्पा वाला परिवार भी कहीं नहीं टिकता। जीतन राम माँझी और चिराग पासवान जैसे महादलित नेता NDA में हैं, इसीलिए यहाँ इनका जाति कार्ड भी नहीं चल पा रहा। अतः, जो साजिश महाराष्ट्र में विफल हुई उसका बिहार में भी फेल होना तय है। लेकिन हाँ, पप्पू यादव जैसे नेताओं के लगातार बोलते रहने से टूलकिट एक्सपोज होता रहेगा।

‘दादी जैसी नाक वाली’ प्रियंका गाँधी तक बन गई MP, पर बिहार की ‘कोयल’ रह गई बंजर: PM मोदी ने ₹1800 करोड़ से परियोजना को दी धार, 42000 हेक्टेयर जमीन की बुझेगी प्यास

1972 में अखंडित बिहार के सूखा प्रभावित इलाकों की सिंचाई के लिए राज्य सरकार ने एक परियोजना बनाई थी। नाम है- उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना (North Koel Reservoir Project)। 53 साल बाद अब इस परियोजना के पूरे होने की उम्मीद जगी है, क्योंकि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसमें दिलचस्पी ले रहे हैं।

जब इस परियोजना की नींव डली तब इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं। केंद्र से राज्य तक कॉन्ग्रेस का एकछत्र शासन था। बाद के सालों में इंदिरा के बेटे राजीव गाँधी भी प्रधानमंत्री बने। उनकी बहू सोनिया गाँधी लगातार 10 सालों तक पर्दे के पीछे से सरकार हाँकती रहीं। लेकिन इस परियोजना की किसी ने सुध नहीं ली।

आज इंदिरा के पोते राहुल गाँधी में ‘पीएम मटेरियल’ देखने वालों की कमी नहीं है। पोती प्रियंका गाँधी, जिनके समर्थकों का दावा है कि ‘उनकी नाक दादी (इंदिरा) जैसी है’, सांसद बन चुकी हैं। लेकिन कोयल परियोजना के भाग्य नहीं बदले।

5 दशक पहले शुरू हुई थी परियोजना के पूरा होने पर झारखंड और बिहार के चार सूखाग्रस्त जिलों में 42301 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई हो सकेगी। 1972 में शुरू की गई ये परियोजना राजनीति और लालफीताशाही का शिकार हो गई।

वर्षों से लटकी परियोजनाओं की पीएम मोदी ने ली सुध

पीएम मोदी ने इस परियोजना समेत ऐसे लटके हुए दूसरे कई परियोजनाओँ को लेकर समीक्षा बैठक की। पीएम ने कहा कि परियोजनाओं की देरी से दोहरा नुकसान होता है। एक तो लागत बढ़ जाती है, वहीं दूसरी ओर लोग इतने समय तक लाभ से वंचित रह जाते हैं। इसलिए केन्द्र और राज्य के अधिकारी दोनों को मिलकर ऐसी परियोजना को खत्म करने का प्रयास करना चाहिए और लोगों को फायदा पहुँचाने पर काम करना चाहिए।

क्या है उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना?

उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना एक अंतरराज्यीय सिंचाई परियोजना है जिससे बिहार और झारखंड जुड़े हुए हैं। इसमें झारखंड के लातेहार के कुटकू गाँव से होकर बहने वाली उत्तरी कोयल नदी पर एक बाँध बनाने की योजना है। बाँध से 92 किलोमीटर दूर झारखंड के पलामू जिले के मोहम्मदगंज में बैराज बनेगा और फिर बैराज से दो नहरें निकलेंगी। दाहिनी मुख्य नहर (आरएमसी) और बैराज से बाईं मुख्य नहर (एलएमसी)

इस परियोजना की शुरुआत 1972 में किया गया था। उस वक्त बिहार और झारखंड अलग नहीं हुए थे। परियोजना को 1993 में वन विभाग ने रोक लगा दी थी क्योंकि बाँध में पानी जमा होने पर झारखंड के बेतला नेशनल पार्क और पलामू टाइगर रिजर्व को खतरा हो सकता था। काम रुकने के बाद यह परियोजना 71,720 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई के लिए सालाना जल दे रही थी।

2000 में जब बिहार से झारखंड अलग हुआ तो परियोजना के दोनों बैराज और बाँध झारखंड में आ गए। दो नहरों में से एक नहर झारखंड में रह गया जबकि दूसरा नहर बिहार और झारखंड दोनों में चला गया। बिहार में ये 79.08 किलोमीटर तक फैला हुआ है।

2017 में मोदी सरकार ने की थी पहल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना के बाकी बचे कामों के लिए संशोधित 2,430.76 करोड़ रुपए की लागत से पूरा करने के लिए परियोजना को मंजूरी दी। इसमें केन्द्र का हिस्सा 1,836.41 करोड़ रुपए है।

अगस्त 2017 में बचे काम के लिए पहले 1,622.27 करोड़ रुपए को मंजूरी दी गई थी। इसमें केन्द्र का हिस्सा 1,378.60 करोड़ रुपये था। लेकिन अब इसे करीब 800 करोड़ रुपए बढ़ा दिया गया है।

हिन्दुओं को कलमा पढ़वा गोमांस खिलाता था छांगुर पीर, वीडियो भी बनाता था: रिपोर्ट, नेपाल बॉर्डर से सटे इलाकों की बदलना चाहता था डेमोग्राफी, इस्लामी धर्मांतरण गैंग के 5000+ शिकार

छांगुर पीर नेपाल से सटे जिलों में धर्मांतरण का अड्डा स्थापित करने में जुटा था। इसके लिए ₹10 करोड़ खर्च करने की तैयारी थी। 46 गाँवों के हिंदू युवाओं को टारगेट बनाने वाला था। छांगुर तकरीर के बहाने जलसों में पर्चे बाँटकर इन युवाओं की जिहाद के प्रति सोच जानने की कोशिश करता था। इन युवाओं को पैसों से मजबूत कर इस्लाम में परिवर्तन करने की साजिश रची थी।

खलिहान, तालाब और चारगाह की जमीन पर छांगुर का कब्जा

छांगुर की धर्मांतरण नेटवर्क को बढ़ाने के लिए सरकारी जमीनों पर कब्जा करने की प्लानिंग थी। साल 2022 से ही उसकी नजर विवादित और सरकारी जमीनों पर थी। इन जमीनों पर मजार और मदरसा खोलने की तैयारी थी। इसके लिए सरकारी प्रशासनिक अधिकारियों की मदद ले हा था।

ऐसे ही छांगुर ने बलरामपुर के उतरौला में दो जमीनों पर कब्जा किया। इनमें एक जमीन पर आलीशान कोठी बनाई, जिसे प्रशासन ने ध्वस्त करवा दिया है। वहीं दूसरी जमीन पर भी कोठी बनाई है, जिसकी तलाश अभी जारी है। इसके अलावा छांगुर की नजर लालगंज, रेहरामाफी, चपरहिया, बनघुसरा की सरकारी जमीनों पर थी।

उधर, उतरौला में छांगुर ने तहसील अधिकारियों की मिलीभगत से एक बड़े तालाब की जमीन को अपने नाम दर्ज करा लिया। इसी जमीन को 12 नवंबर 2023 को नीतू उर्फ नसरीन के नाम बेच भी दिया। जमीन की खरीद-फरोख्त में ₹1 करोड़ का भुगतान नसरीन से लिए जाने को भी बैनामें में दिखाया गया है।

सामने आईं और पीड़िताएँ

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, छांगुर पीर के धर्मांतरण नेटवर्क में 5000 से अधिक पीड़ित हैं। इनमें से एक लखनऊ की 31 साल की युवती हैं। युवती से 2015 में अमित नाम से अबू अंसारी ने उससे दोस्ती की। छांगुर ने साल 2020 में युवती का निकाह अबू अंसारी से कराकर धर्म परिवर्तन करवा दिया। इसके बाद से युवती के परिवार और दोस्तों ने उससे दूरी बना ली। युवती ने ही सबसे पहले छांगुर के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी।

बेंगलुरु की रहने वाली एक युवती ने बताया 2021 में राजू राठौर नाम के युवक से इंस्टाग्राम पर दोस्ती हुई। उसका असली नाम वसीम था। वसीम ने नौकरी का लालच दिया और कहा कि करोड़पति शेख से निकाह कराएगा। फिर फर्जी पासपोर्ट बनवाकर सऊदी अरब बुला लिया। यहाँ छांगुर पीर से वीडियो कॉल पर बात हुई, जिसने धर्म परिवर्तन के लिए ब्रेनवॉश किया। मना करने पर वसीम ने अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया। युवती ने 2023 में वापस आकर बेंगलुरु में वसीम के खिलाफ FIR दर्ज कराई।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, बलरामपुर जिले का चौधरीडीह गाँव का युवक भी छांगुर पीर के जाल में फँस गया। युवक ने बताया कि साल 2024 में छांगुर पीर ने धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया। विरोध किया तो गुर्गों से जान से मार देने की धमकी दी। इसके बाद से युवक और उसका परिवार छिपकर रह रहा है। युवक ने बताया कि छांगुर ने ₹15 से ₹16 लाख देने का लालच भी दिया। युवक ने आगे बताया कि छांगुर हिंदुओं से कलमा पढ़वाता था और गोमांस भी खिलाता था। इसका वीडियो भी बनाता था।

गल्फ के अल नाहदा और एमिरेट्स NBD बैंकों में छांगुर के खाते

छांगुर ने सऊदी अरब से भी बढ़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धर्मांतरण का नेटवर्क फैला रखा था। जाँच एजेंसियों को अंतरराष्ट्रीय कट्टरपंथी संगठनों से नेटवर्क जुड़े होने का शक है। छांगुर के करीबी नीतू उर्फ नसरीन और नवीन रोहरा के नाम पर विदेशों से फंडिंग की जाती थी। इससे जुड़े 8 विदेशी बैंकों में खाते मिले हैं।

ATS के अधिकारियों ने बताया कि अल नाहदा, एमिरेट्स NBD, मसरफ बैंक, अल अंसारी एक्सचेंज और वोस्ट्रो बैंक में भी छांगुर के सहयोगियों के खाते हैं। ATS अब पता लगाने में जुटी हैं कि इन खातों में कहाँ से पैसे भेजे जा रहे थे और इनका किस काम के लिए इस्तेमाल होना था।

अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होते ही ब्रिटेन ने चुपचाप 4000+ अफगानों को अपने यहाँ बसाया, खर्च किए ₹4600 करोड़: खबर दबाने को कोर्ट से ऑर्डर भी लिया

ब्रिटेन की सरकार चुपचाप 4500 अफगान अपने यहाँ लाकर बसा चुकी है। यह रीलोकेशन प्रक्रिया 2022 के बाद से लगातार चलती आ रही है। इस पर ब्रिटेन हजारों करोड़ रूपए खर्च कर चुका है। यह पूरा खुलासा अब ब्रिटेन के हाई कोर्ट के एक फैसले से हुआ है। अब तक मीडिया को भी इस मामले को रिपोर्ट करने से रोका गया था। ब्रिटेन सरकार को यह फैसला एक डाटा लीक के चलते लेना पड़ा है। अब ब्रिटेन की सरकार सवालों के घेरे में आ गई है।

क्या है मामला?

ब्रिटेन ने जिन लोगों को अफगानिस्तान से लाकर अपने यहाँ बसाया है, उनमें अफगान फ़ौज के पूर्व फौजी और उनके परिवार के साथ ही बाकी लोग शामिल हैं। अब तक यह मामला इसलिए नहीं मीडिया में आया था क्योंकि इस पर एक अदालत से रोक लगा दी गई थी। इस पर रिपोर्टिंग रोक दी गई थी।

जानकारी के अनुसार, फरवरी 2022 में यूके रक्षा मंत्रालय (MoD) के एक अधिकारी ने गलती से एक लिस्ट लीक कर दी थी, इसमें तालिबान के डर से यूके में शरण माँगने वाले करीब 19,000 अफ़गानों के नाम और व्यक्तिगत जानकारियाँ थीं।

यह लीक अगस्त 2023 में सामने आया था, जब यह जानकारियाँ फेसबुक पर वायरल हो गईं थी। इसके चलते हजारों अफगानों की जान सांसत में आ गई थी। इसके बाद, अप्रैल 2024 से ब्रिटेन सरकार ने चुपचाप अफगानों को ब्रिटेन लाना चालू कर दिया। इस प्रक्रिया पर अब तक 400 मिलियन पाउंड (₹46 अरब से अधिक) से खर्च हो चुका है।

यह भी आशंका जताई गई है कि इस पर ब्रिटिश नागरिकों के टैक्स का इतना ही पैसा अभी और खर्च होगा। सामने आया है कि अभी 600 पूर्व अफगान फौजी और उनके 1800 परिजन अफगानिस्तान में हैं और वापस निकाले जाने की राह देख रहे हैं।

इस मामले के खुलासे के बाद ब्रिटेन में पारदर्शिता और टैक्सपेयर के पैसे के उपयोग को लेकर प्रश्न उठे हैं। इस मामले की रिपोर्टिंग पर लगी रोक को हटाने के लिए हाल ही में इंडिपेंडेंट, द टाइम्स, टेलीग्राफ, फाइनेंशियल टाइम्स, प्रेस एसोसिएशन आदि ने कोर्ट में चुनौती दी थी।

डेटा लीक और अफगानों के गुप्त स्थानांतरण का खुलासा

करीब दो साल तक ब्रिटिश जनता को 2022 के डेटा लीक और उसके बाद हुए अफगानों के गुप्त स्थानांतरण के बारे में कुछ नहीं बताया गया, क्योंकि कंज़र्वेटिव सरकार ने 2023 में एक सुपर-इंजंक्शन (गोपनीयता बरतने वाला आदेश) कोर्ट से हासिल कर लिया था।

यह आदेश न केवल लीक की रिपोर्टिंग पर, बल्कि खुद आदेश के अस्तित्व की जानकारी पर भी रोक लगाता था। हाल ही में, जस्टिस चेम्बरलेन ने इस आदेश को हटा दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह की गोपनीयता ने ‘लोकतांत्रिक जवाबदेही को पूरी तरह से बंद कर दिया’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी पर गंभीर असर’ भी डाला।

यह इस मामले में चेम्बरलेन का यह चौथा फैसला था। इससे पहले 3 फैसले निजी रूप से दिए गए थे, जो अब प्रकाशित किए जा चुके हैं। अदालती दस्तावेजों से पता चला कि तत्कालीन रक्षा मंत्री बेन वालेस ने खुद इस गुप्त आदेश के लिए आवेदन किया था।

रक्षा मंत्रालय ने बाद में कहा कि तालिबान को शायद पहले से ही डेटा लीक की जानकारी थी, इसलिए रिपोर्टिंग से खतरा ज्यादा नहीं बढ़ता।

सरकार ने माफी माँगी, लेकिन रिलोकेशन पर चुप्पी साधी

ब्रिटिश संसद में रक्षा मंत्री जॉन हीली ने 2022 के अफगान डेटा लीक से प्रभावित लोगों से ‘माफी’ भी माँगी है। उन्होंने इसे एक ‘गंभीर विभागीय गलती’ बताया, जो एक स्प्रेडशीट को सरकारी सिस्टम के बाहर ईमेल करने से हुई थी।

मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने इस मामले में कोई आपराधिक जाँच नहीं की है। कंजर्वेटिव नेता केमी बेडेनोच ने भी इस मामले में माफी माँगी और कहा कि ‘किसी ने बहुत बड़ी गलती की है।’ हालाँकि, सरकार ने यह नहीं बताया कि यह लीक करने के जिम्मेदार अधिकारी पर कोई कार्रवाई हुई या नहीं।

इस लीक से प्रभावित अफगानों को सूचित किया गया है और उन्हें ऑनलाइन सतर्क रहने और अनजान संपर्कों से बचने की सलाह दी गई है। रक्षा मंत्रालय ने यह बताने से इनकार कर दिया कि इस लीक से किसी को सही में नुकसान हुआ है या नहीं।

अफगान डेटा लीक से ब्रिटेन पर उठ रहे सवाल

अफगानिस्तान में 20 साल की तैनाती के दौरान ब्रिटिश सेनाएँ अमेरिकी और नाटो सेनाओं के साथ मिलकर काम करती रहीं और उन्होंने स्थानीय अफगान सहयोगियों पर काफी भरोसा किया। 2022 का डेटा लीक न केवल इन सहयोगियों की जान को खतरे में डालता है, बल्कि इससे ब्रिटेन की अपने सहयोगियों की सुरक्षा और वादे निभाने की क्षमता पर भी गंभीर सवाल उठे हैं

रूस के साथ व्यापार किया तो लगेंगे कड़े प्रतिबंध: NATO का भारत-चीन-ब्राजील को अल्टीमेटम, यूक्रेन के साथ संघर्ष रोकने के लिए मॉस्को पर फूटा ट्रंप का ‘टैरिफ बम’

डोनाल्ड ट्रंप के रूस के साथ व्यापार करने पर रोक लगाने के बाद अब NATO ने भी दुनिया भर के देशों को रूस के साथ व्यापार करने पर अल्टीमेटम दिया है। इसमें उन्होंने साफ तौर पर भारत का नाम लिया है।

ट्रंप ने मंगलवार को रूस को चेतावनी दी थी कि यूक्रेन के साथ उसे 50 दिन के अंदर शांति समझौता करना पड़ेगा अन्यथा रूस पर 100% टैरिफ के साथ उसके साथ व्यापार करने वाले अन्य देशों पर भी सेकेंड्री टैरिफ लगाया जाएगा। इस कड़ी में ट्रंप ने NATO के सेक्रेटरी जनरल मार्क रूट से भी मुलाकात की थी।

अपनी मुलाकात में ट्रंप ने रूट से कहा था कि शांति समझौता न करने पर रूस के सामानों पर 100% तक टैरिफ लगेगा। साथ ही जो देश रूस के साथ व्यापार करत है, उश पर भी सेकेंड्री टैरिफ या सैंक्शन लगाए जाएँगे।

ट्रंप का कहना है कि अगर रूस ने युद्ध नहीं रोका तो उससे सामान खरीदने वाले देशों पर वो 100 प्रतिशत का टैरिफ लगा देंगे।

मार्क रूट में कहा है कि ब्राजील, चीन और भारत समेत कोई भी अन्य देश अगर रूस के साथ व्यापार जारी रखता है तो उन देशों पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाएँगे। असल में यह सभी प्रतिबंध रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष को रोकने के लिहाज से लगाए जाने की कयास लग रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप इस युद्ध को रोकने के लिए पहले भी कई प्रयास कर चुके हैं लेकिन अब तक वे रूस के सामने विफल रहे हैं। ऐसे में अब वह रूस पर अपना टैरिफ बम फोड़ रहे हैं।

मार्क रूट ने कहा कि अगर आप बीजिंग, दिल्ली या ब्राजील में रहते हैं या वहाँ से आते हैं तो सावधान हो जाइए। यह सेकेंडरी सैंक्शंस आपके लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। रूट में सभी देशों से अपील की है कि वह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फोन कर शांति वार्ता के लिए समझाएँ अन्यथा सेकेंडरी सैंक्शन से किसी भी देश को बचाया नहीं जा सकता।

रूस के साथ भारत पर भी दबाव

डोनाल्ड ट्रंप करने पर भारत पर पहले भी आपत्ति जाता चुके हैं। हालाँकि अमेरिका की आपत्ति को दरकिनार करते हुए भारत ने रूस के साथ निरंतर व्यापार चालू रखा है। अब रूस पर टैरिफ या अन्य देशों पर सेकेंडरी सैंक्शन लगाने वाले कदम से भारत को भी नुकसान पहुँच सकता है।

गौरतलब है कि अमेरिका ने यूरोपीय यूनियन समेत ब्राज़ील, म्यांमार, बांग्लादेश और कुछ अन्य देशों पर 20 से 50% तक का टैरिफ लगा दिया है। ये टैरिफ 1 अगस्त से लागू होगा। भारत अब तक इस सूची से बाहर है। इसके साथ ही अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील होने की भी संभावना प्रबल है। ऐसे में इस तरह के सैंक्शन या रूस के साथ व्यापार पर प्रतिबंध का भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना लाजमी है।

रूस पर नहीं कोई असर

हालाँकि रूस में अभी भी अमेरिका के इस धमकी को नजरअंदाज कर रहा है। शांघाई सहयोग संगठन (SCO) में मंगलवार 15 जुलाई 2025 को विदेश मंत्रियों की बैठक में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि अमेरिका के प्रतिबंधों का सामना करने के लिए मॉस्को पूरी तरह से तैयार है। लावरोव ने आगे कहा कि रूस पहले से ही प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में नए प्रतिबंध से निपटने की भी क्षमता रूस के पास मौजूद है।

‘तुम काँवड़ लेकर मत जाना’: बच्चों को भविष्य की सलाह नहीं, वामपंथी प्रोपेगेंडा है बरेली के टीचर की कविता, शिक्षा के बहाने हिन्दुओं की पौध को ही ‘ब्रेनवॉश’ करने का हो रहा प्रयास

उत्तर प्रदेश के बरेली में बच्चों को हिन्दू मान्यताओं के खिलाफ भड़काने वाले एक शिक्षक के ऊपर FIR दर्ज हुई है। इस शिक्षक का नाम रजनीश गंगवार है। उसकी एक वीडियो भी वायरल हो रही है। इसमें वह हाथ में माइक लिए हुए एक कविता सुनाता दिखता है। उसके सामने कई कतार में बच्चे खड़े हैं। वीडियो में रजनीश गंगवार काँवड़ के ऊपर एक कविता गा रहा है। वह कविता के सहारे बच्चों को सलाह देता है कि वह काँवड़ में शामिल ना हों, इसके लिए वह कई कुतर्क भी अपनी कविता में शामिल करता है।

रजनीश की वीडियो वायरल होने के बाद उसके खिलाफ FIR दर्ज हुई तो ट्विटर से लेकर फेसबुक तक लिबरल गैंग रोने लगा। बच्चों को भड़काने वाले इस शिक्षक को ‘तार्किक’ बता कर FIR की कार्रवाई की निंदा हो रही है। हालाँकि, यह कोई नहीं कहना चाह रहा कि शिक्षक रजनीश ने जो कविता बच्चों को सुनाई है, वह कोई तर्कशील बात नहीं बल्कि सीधे तौर पर उनको उनके धर्म से विमुख करने का प्रयास और काँवड़ जैसी पवित्र परम्परा के खिलाफ भड़काना है।

रजनीश अपनी कविता में कहता है-

काँवड़ लेने मत जाना, तुम ज्ञान का दीप जलाना

मानवता की सेवा करके, तुम सच्चे मानव बन जाना

अब अगर रजनीश की मानें तो जो काँवड़ लेने जाता है, वह ज्ञान का दीप नहीं जला सकता। रजनीश दावा करता है कि जो लोग काँवड़ लेकर जाते हैं वह ना ही ज्ञान अर्जित कर पाते हैं और ना ही मानवता की सेवा कर पाते हैं। अपनी कविता में तर्क की भ्रूणहत्या करने वाला रजनीश यह भूल जाता है कि इस देश में प्रत्येक वर्ष लाखों-करोड़ों की संख्या में हिन्दू काँवड़उठाते हैं और अपने आराध्य को अर्पित करते हैं। यह कोई पिकनिक नहीं बल्कि कठिन यात्रा होती है।

उसका यह दावा कि यह लोग पढ़े-लिखे नहीं होते या फिर मानवता की सेवा नहीं करते दरअसल एक वामपंथी प्रोपेगेंडा है जिसमे धर्म को हमेशा ही ऐसे नजरिए से देखा जाता है जैसे वह अज्ञानता का पोषक हो। जबकि सनातन में तो विद्या को ही सर्वोच्च माना गया है। छोटे बच्चों का दिमाग रजनीश का यह महीन प्रोपेगेंडा नहीं पकड़ पाता होगा, ऐसे में वह भले ही उससे प्रश्न ना करें, लेकिन उसकी बातें सीधे तौर पर काँवड़ के खिलाफ भड़काने वाली हैं।

इसी कविता की कुछ लाइनों में वह दावा करता है कि काँवड़ ढोकर कोई वकील, DM-SP नहीं बना है। रजनीश की यह बात बताती है कि उसके दिमाग में वामपंथी विचार इस कदर भरे हुए हैं कि वह बच्चों को करियर का फर्जी डर दिखाने से नहीं चूकता। जिन DM-SP का वह उदाहरण देता है, वह भी अपने धर्म के पालन में पीछे नहीं हटते। अगस्त, 2024 में हरिद्वार के DM-SP ने स्वयं काँवड़ उठाई थी और महादेव को जल अर्पित किया था।

रजनीश यह नहीं बताता कि एक वर्ष में कुछ दिन के लिए चलने वाली काँवड़ यात्रा किस तरह उनको DM-SP बनने से रोक लेगी। उसको यह समझाना चाहिए कि धर्म को अफीम बताने वाले कितने कम्युनिस्ट रोज वैज्ञानिक बन रहे हैं। उसको यह भी समझाना चाहिए कि कि तरह से किसी बच्चे का काँवड़ उठाना उसे उसकी पढ़ाई से विमुख कर देगा। क्या कोई बच्चा काँवड़ उठा लेगा तो उसके किताब छूने पर मनाही लग जाएगी?

यदि कोई व्यक्ति चाहेगा तो ईश्वर के प्रति अपनी आस्था से समझौता किए बिना ही सफलता पाएगा और वकील अथवा DM-SP क्या है, बड़े से बड़े पद को छू सकता है। काँवड़ और शिक्षा एक दूसरे के दुश्मन नहीं है। असल में तो काँवड़ व्यक्ति को सामूहिकता और लक्ष्य प्राप्त करने में जरूरी एकाग्रता ही सिखाती है। और काँवड़ उठाने वाले कहीं दूसरे ग्रह से नहीं आते, वह हमारे आस-पास के लोग हैं जो बाकी दिनों में वकील-डॉक्टर, पत्रकार, शिक्षक और अधिकारी हैं।

इसी कविता में रजनीश ने दावा किया कि काँवड़ से बुद्धि-विवेक का विकास नहीं होगा। उसकी विष्ठा की उल्टी यहीं नहीं रुकी बल्कि उसने काँवड़ यात्रा जैसे पवित्र आयोजन से भांग-धतूरा और गांजे को जोड़ दिया। हाँ! यह बात ठीक है कि काँवड़ यात्रा के दौरान कुछ ऐसे लोग होंगे जो भांग खाते होंगे, संभवतः एकाध गांजा भी पीते हों। लेकिन वामपंथी रजनीश को समझना चाहिए कि इससे कहीं अधिक संख्या उनकी है जो नंगे पैर चलते हैं, जिनके कंधे काँवड़ के बोझ से छिलते हैं और छाले तक हो जाते हैं।

रजनीश इन सभी को नशेडी बताना चाहता है और काँवड़ यात्रा का अपमान करना चाहता है। वह स्कूल के भीतर नई पौध में वह जहर बोना चाहता है जो आगे चल कर कन्हैया कुमार या योगेन्द्र यादव जैसे सनातन विरोधी में तब्दील होती है। कभी कथित मानवता, कभी शिक्षा तो कभी विज्ञान को मुखौटा बना कर सनातन का यह अपमान किया जाता है। रजनीश भी यही करने का प्रयास कर रहा था, लेकिन सफल नहीं हो सका।

इस जहर की खेती के लिए रजनीश को शह देने वालों की कोई कमी नहीं हैं। उसके खिलाफ जब न्यायसंगत कार्रवाई हुई तो यह गैंग उसे बचाने आ गया। साक्षी जोशी जैसे पत्रकार तुरंत उसे बचाने आ जाते हैं। और वह ये काम तब करते हैं जब रजनीश खुद कार्रवाई का नाम सुनते ही माफी मोड में आ जाता है। रजनीश ने भी अब दुनिया भर की बातें करके अपने कृत्य को सही ठहराने की कोशिश की है। यहाँ पर स्पष्ट है कि रजनीश अगर गलत नहीं होता तो वह माफी क्यों माँगता।

असल में यह सब कुछ और नहीं शिक्षा की चाशनी में डुबो कर दी जाने वाली हिन्दू घृणा की छोटी-छोटी डोज हैं। देश भर के कॉलेज-स्कूलों में ना जाने कितने ही रजनीश बैठे हुए हैं जो मौक़ा मिलते ही बच्चों को वामपंथ के जाल में लेना नहीं छोड़ते। अब अगर बरेली के रजनीश पर कोई कार्रवाई हो रही है तो वह ठीक है और यह एक मिसाल भी बनेगी।