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मुस्लिम होंगे देश से बाहर, सिर्फ धर्म के आधार पर लागू होगा NRC? द वायर फैला रहा झूठ: Fact Check

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ पूरे देश में हिंसक प्रदर्शन हो रहा है। कल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, कर्नाटक के मंगलुरू, गुजरात के अहमदाबाद, मुंबई और राजधानी दिल्ली समेत देश के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए। मैंगलोर में स्कूल-कॉलेजो में छुट्टी घोषित कर दी गई है।

इस कथित विरोध प्रदर्शन के पीछे की मुख्य वजह ये है कि उन लोगों को नागरिकता संशोधन कानून के बारे में सही से पता नहीं है और इसके पीछे कुछ मीडिया संस्थानों का भी हाथ है, जो कि इनके बीच भ्रम की स्थिति पैदा करते हैं और झूठ फैलाते हैं। इसमें मीडिया संस्थान ‘द वायर’ भी शामिल है। ये लोग बस मुस्लिमों को भड़का रहे हैं और इनमें डर पैदा कर रहे हैं कि सभी मुस्लिमों को देश से बाहर कर दिया जाएगा।

The wire द्वारा पेश किया चार्ट

चार्ट में बताया गया है कि CAA लागू होने के बाद जब पूरे देश में NRC लागू होगा तो खुद को भारत का नागरिक साबित करने के लिए धर्म का प्रमाण पत्र दिखाना होगा। इसमें जो हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी पाए जाएँगे, उनके लिए देखा जाएगा कि वो किस देश से हैं? अगर वो पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश या फिर भारत से होंगे तो उन्हें वैध नागरिक माना जाएगा और नागरिकता दी जाएगी। वहीं इस चार्ट के अनुसार जो मुस्लिम होंगे, वो अवैध नागरिक होंगे। उन्हें वोट करने का अधिकार नहीं होगा, उन्हें डिटेंशन सेंटर भेज दिया जाएगा, उन्हें देश से निकाल दिया जाएगा। इसमें बताया गया है ये सारी योजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने बनाई है।

द वायर ने इसमें दिखाने की कोशिश की है कि किस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह CAA और NRC के जरिए मुस्लिमों को नागरिकता से वंचित करना चाहती है। हालाँकि उन्होंने यह नहीं बताया है कि ये चार्ट उन्होंने कहाँ से लिया है। उन्होंने जो चार्ट पेश किया है, वो किसी भी आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है, क्योंकि सरकार ने तो इस तरह का कोई चार्ट जारी नहीं किया है।

द वायर ने ये भी नहीं बताया कि उसने किस आधार पर यह तय किया कि पूरे देश में NRC लागू होने का यही तरीका होगा। क्या इसके लिए सिर्फ धर्म ही एकमात्र आधार होगा। क्या इसके लिए आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र वगैरह जैसे किसी अन्य दस्तावेज की आवश्यकता नहीं होगी? पूरे देश में NRC लागू होने का क्या प्रोसेस होगा, इसके बारे में फिलहाल कोई नहीं जानता। खुद सरकार ने ऐसा कोई आधिकारिक डॉक्यूमेंट भी नहीं जारी किया है। लेकिन द वायर के बकलोल पत्रकार AC कमरे में बैठकर मनगढ़ंत रिपोर्ट लिखकर देश में बवाल करवाने पर उतारू है। असम में भी जिस प्रोसेस से NRC लागू हुआ है, वो प्रोसेस भी सुप्रीम कोर्ट का था। सुप्रीम कोर्ट ने जैसा कहा, वैसा ही वहाँ किया गया। ये पीएम मोदी और अमित शाह का तरीका नहीं था और अमित शाह ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा भी है कि NRC लागू करने में धर्म का कोई आधार नहीं होगा। जो घुसपैठिए हैं, उन्हें देश से बाहर निकाला जाएगा। इसे आप यहाँ पर सुन सकते हैं।

नागरिकता कानून को NRC से जोड़कर देखने और फिर इसके नतीजे के बारे में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि NRC में धर्म के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं होगी और जो कोई भी एनआरसी के तहत इस देश का नागरिक नहीं पाया जाएगा, सबको निकालकर देश से बाहर किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सिर्फ मुस्लिमों के लिए NRC नहीं है। उन्होंने कहा कि इस कानून से देश के अल्पसंख्यकों को रत्ती भर भी नुकसान नहीं होने वाला है। उनकी सुविधा का खास ख्याल रखा जाएगा।

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नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ देश भर में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों में आतंकियों के स्लीपर मॉड्यूल सक्रिय हो चुके हैं। इनकी सक्रियता राजधानी दिल्ली में भी है। तोड़फोड़, आगजनी, पत्थरबाज़ी और दंगा भड़काने के मक़सद से इंडियन मुजाहिदीन और सिमी से जुड़े कट्टरपंथी आतंकी अपनी पूरी तैयारी के साथ नागरिकता क़ानून के खिलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों में शामिल हो चुके हैं। यह जानकारी ख़ुफ़िया एजेंसियों के माध्यम से मिली है, जिसकी पुष्टि दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने की है।

अधिकारी के अनुसार, गुरुवार (19 दिसंबर) को हुए विरोध-प्रदर्शन में बड़ी संख्या में मेवात, नूंह और उसके आसपास क्षेत्रों से क़रीब 25 हज़ार लोग गाड़ियों के ज़रिए दिल्ली में दाखिल होकर प्रदर्शन में शामिल हुए। इसी के मद्देनज़र दिल्ली पुलिस ने रात को ही गुड़गाँव बॉर्डर पर बैरिकेड्स लगाकर पुख़्ताा इंतज़ाम कर दिए थे। इसके अलावा, अतिरिक्त फ़ोर्स के साथ ही सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों को राउंड पर लगाया गया था। यही वजह थी कि गुरुवार को कड़ी निगरानी के बीच गाड़ियों की आवाजाही होने दी गई।

अधिकारी ने बताया कि क़रीब 60 व्हाट्सएप ग्रुप, ट्विटर, फ़ेसबुक अकाउंट को सस्पेंड करने के लिए स्पेशल सेल ने प्रोवाइडर कंपनियों को लेटर लिखा है। विरोध-प्रदर्शनों के मद्देनज़र गुरुवार को दिल्ली के कई इलाक़ों में इंटरनेट सेवा बंद कराई गई थी। इसके लिए स्पेशल सेल ने इंटरनेट और मोबाइल कंपनियों को एक दिन पहले ही सीक्रेट लेटर भेजा था, जिसका ख़ुलासा गुरुवार को हुआ।

ख़बर के अनुसार, सीक्रेट लेटर में चुछ चुनिंदा संवेदनशील इलाक़ों में इंटरनेट सेवाएँ बंद करने की बात कही गई थी। इस तरह का सीक्रेट लेटर, एयरटेल वोडाफोन, आइडिया, जियो, महानगर टेलिफोन निगम लिमिटेड, भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) को भेजा गया था। इसमें नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध-प्रदर्शनों से फैली अराजकता के मद्देनज़र क़ानून-व्यवस्था का हवाला दिया गया था।

एजेंसियों से कहा गया था कि 19 दिसंबर को सुबह 9 बजे से 1 बजे तक सभी सेवाएँ बंद रखी जाएँ। बंद की जाने वाली इन सेवाओं में कॉलिंग, SMS, वॉइस मैसेज और इंटरनेट सेवाएँ शामिल थीं। साथ ही उत्तर पूर्वी दिल्ली के जाफ़राबाद, सीलमपुर, मुस्तफ़ाबाद, साउथ ईस्ट दिल्ली के जामिया नगर, शाहीन बाग और हरियाणा की सीमा पर बवाना इलाक़े में भी संचार सेवाएँ बंद रखने को कहा गया था। पुलिस ने बताया कि यह क़दम ख़ुफ़िया जानकारी मिलने के बाद उठाया गया।

बता दें कि नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध में लगातार हो रहे हिंसक विरोध-प्रदर्शनों को कॉन्ग्रेस और कट्टरपंथी इस्लामिक समूहों द्वारा भड़काए जाने की बात भी सामने आई थी। इनमें कुछ व्हाट्सअप ग्रुप भी शामिल हैं, जो इन दंगों को हवा देने का काम कर रहे हैं।

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नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध प्रदर्शन में मंगलुरु और लखनऊ से प्रदर्शनकारियों के मरने की भी ख़बर आ रही है। जहाँ मंगलुरु में 2 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई, लखनऊ में एक प्रदर्शनकारी की मौत हुई। सूचना के अनुसार, लखनऊ ट्रामा सेंटर में 24 वर्षीय मोहम्मद वकील की चोट की वजह से मौत हो गई। सीएए के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध प्रदर्शन के हिंसक होने के कारण कई अन्य लोग भी घायल हुए हैं। यूपी डीजीपी ओपी सिंह ने कहा कि मोहम्मद वकील की मौत पुलिस फायरिंग से नहीं हुई है।

डीजीपी ने बताया कि अभी स्पष्ट नहीं है कि उक्त प्रदर्शनकारी की मौत विरोध प्रदर्शन में हिंसा लेने के कारण हुई या फिर किसी और वजह से। उधर गुरुवार (दिसंबर 19, 2019) की शाम मेंगलुरु हॉस्पिटल में भी दो लोगों के मरने की ख़बर आई है। ये दोनों मंगलुरु नार्थ पुलिस स्टेशन को आग के हवाले करने जा रहे थे। पुलिस ने प्रदर्शन को हिंसक होते देख गोली चलाई और ये दोनों ही मारे गए। शुक्रवार को भी मंगलुरु के सभी स्कूलों व कॉलेजों को बंद रखा गया है।

इधर नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में सीएए और एनआरसी को लेकर भड़काऊ पर्चे बाँट रहे दो लोगों को पुलिस ने गिरफ़्तार किया। मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में बॉलीवुड के कई लोग सड़कों पर उतरे। उनके साथ हज़ारों लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। ये वही मैदान है, जहाँ महात्मा गाँधी ने ‘अंग्रेजों, भारत छोड़ो’ का ऐलान किया था। फरहान अख़्तर ने भी उपद्रवियों के साथ विरोध प्रदर्शन किया। गुजरात में उपद्रवियों का नेतृत्व कर रहे निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवानी को पुलिस ने हिरासत में लिया।

अहमदाबाद में भी प्रदर्शन हिंसक हो उठा और दंगाइयों ने पुलिस पर पत्थर बरसाए। दो पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। एक पुलिसकर्मी को आईसीयू में भर्ती कराया गया है। दिल्ली में विमान बोस और सूर्यकांत मिश्रा जैसे वामपंथी नेताओं ने रामलीला मैदान में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया। बंगलुरु में कई सिटी बसों का रूट बदल दिया गया तो कई बसों ने अन्य दिनों के मुकाबले कम ही ट्रिप लगाई। कई जगह भारी ट्रैफिक जाम देखने को मिला।

मैं तनवीर अहमद, कर्नाटक पुलिस, भागो और छात्रों के भविष्य से मत खेलो: अधिकारी ने वामपंथी को खदेड़ा

“मेरा नाम तनवीर अहमद है। मैं कर्नाटक पुलिस का अधिकारी हूँ। आप अपने विरोध प्रदर्शन के लिए छात्रों का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। आपलोग यहाँ से जाओ। क़ानून का पालन करो। आप यहाँ लोगों को भड़का रहे हैं और उन छात्रों को बाद में इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। जाइए यहाँ से।”

ये शब्द हैं कर्नाटक पुलिस के इंस्पेक्टर तनवीर अहमद के, जिन्होंने मजहब के नाम पर नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर अपना उल्लू सीधा करने वाले वामपंथी नेताओं को आड़े हाथों लिया। दरअसल, कर्नाटक में एक महिला छात्रों को भड़का रही थीं, जिसपर अहमद ने उन्हें समझाया कि वो तो बच कर निकल जाएँगी, ये बेचारे छात्र बाद में फँस जाएँगे। अधिकारी ने अपना नाम इसीलिए बताया ताकि वहाँ उपद्रव की ताक में बैठे वामपंथियों को बता सकें कि मजहब के नाम पर लोगों को लड़ाना सही नहीं है।

पुलिस अधिकारी तनवीर अहमद ने उपद्रवियों के नेतृत्वकर्ता को सपाट शब्दों में कहा कि वो भड़का कर लोगों के भविष्य से न खेलें, ख़ासकर छात्रों के। पुलिस अधिकारी तनवीर ने उपद्रवी महिला वामपंथी को फटकारते हुए कहा- “छात्रों के करियर से मत खेलो। जाओ यहाँ से।” नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप उक्त पुलिस ऑफिसर को वामपंथियों को फटकारते हुए देख सकते हैं:

मंगलुरु में उपद्रवियों ने पुलिस पर पत्थरबाजी की, जिसके बाद पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। शहर में पहले ही 3 दिनों के लिए धारा-144 लागू कर दिया गया था। ये उपद्रवी सीएए को संविधान के विरुद्ध बता रहे थे। उपद्रवियों के बारे में ख़ास बात ये थी कि वो पहले से ही हेलमेट पहन कर पत्थरबाजी कर रहे थे, जिससे पता चल रहा था कि वो पूरी तैयारी के साथ आए हैं। आईआईएम के छात्रों ने भी विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था लेकिन धारा-144 लागू होने के कारण उन्होंने इसे टाल दिया। राज्य में कई संगठनों ने सीएए के विरोध में प्रदर्शन किया।

‘मुस्लिम टोपी’ पहन भाजपा कार्यकर्ता तोड़फोड़ कर समुदाय विशेष को बदनाम कर रहे: ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कॉन्ग्रेस की अध्यक्षा ममता बनर्जी ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी अपने कार्यकर्ताओं के लिए मुस्लिम टोपियाँ ख़रीद रही है और वह कार्यकर्ता तोड़फोड़ करके सार्वजनिक सम्पत्ति को नुक़सान पहुँचा रहे हैं, जिससे एक समुदाय विशेष को बदनाम किया जा सके। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल को कोलकाता में एक रैली के दौरान यह बयान दिया है। देशभर के कई शहरों में नागरिकता क़ानून को लेकर विरोध-प्रदर्शन हो रहा है और कई जगहों पर प्रदर्शन हिंसक हो रहे हैं।

इसके अलावा, ममता बनर्जी ने रैली में संबोधन के दौरान कहा कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद हमें नागरिकता साबित करने की क्या ज़रूरत है। उन्होंने माँग की कि नागरिकता क़ानून और NRC पर जनमत संग्रह कराया जाए और इसे संयुक्त राष्ट्र मॉनिटर करे। ममता का कहना है कि जनमत संग्रह के बाद यह पता चल जाएगा कि किसकी जीत होगी और किसकी हार। इसके आगे ममता ने कहा, “मैं तुमको चुनौती देती हूँ देश को फेसबुक और सांप्रदायिक दंगों का इस्तेमाल कर विभाजित करने की कोशिश मत करो।”

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि मोदी सरकार को अपने हर क़दम पर मिलने वाली कामयाबी ममता को एक आँख नहीं भाती। उन्होंने इतिहासकार रामचंद्र गुहा की गिरफ़्तारी पर भी केंद्र सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि यह सरकार छात्रों और एक इतिहासकार से डर गई है, इसलिए ऐसे दमनकारी क़दम उठा रही है।

हाल ही में ममता बनर्जी ने कहा था, “मैं पश्चिम बंगाल में संशोधित नागरिकता कानून और एनआरसी को कभी अनुमति नहीं दूँगी। यदि आप मेरी सरकार को बर्खास्त करना चाहते हैं, तो आप कर सकते हैं।” इस दौरान ममता बनर्जी ने सभी राज्यों के सीएम को एनआरसी और सीएए को लेकर संदेश दिया था। उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार के सबका साथ सबका विकास नारे पर निशाना साधते हुए कहा था, “केवल बीजेपी यहाँ बचे और बाकी सब चले जाएँ, यही बीजेपी की राजनीति है। यह कभी नहीं हो पाएगा। भारत सभी का है। अगर सबका साथ नहीं रहेगा तो सबका विकास कैसे होगा? नागरिकता क़ानून किसके लिए है?”

ग़ौरतलब है कि रविवार (15 दिसंबर) को बंगाल के मुर्शिदाबाद, बीरभूम और उत्तर 24 परगना में हिंसक प्रदर्शन हुए। इन विरोध-प्रदर्शनों के चलते यातायात प्रभावित रहा और लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। हावड़ा 24 परगना और मुर्शिदाबाद के विभिन्न स्टेशनों पर ट्रेनों को रोक दिया गया। इस बीच, मालदा और आसपास के ज़िलों में इंटरनेट सेवा बंद रही।

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दंगाइयों की संपत्ति बेच कर होगी नुकसान की भरपाई: उपद्रवियों पर सख्त हुए CM योगी

उत्तर प्रदेश में क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस सख्त हो उठी है। वहीं सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाने वालों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़ा सन्देश दिया है। नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ गुरुवार (दिसंबर 19, 2019) को विरोध प्रदर्शन करते हुए उपद्रवियों ने पुलिस के वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया, मीडियाकर्मियों के OB वैन को फूँक दिया और राज्य परिवहन की बसों को भी जला डाला। मुख्यमंत्री योगी ने कहा है कि सार्वजानिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाने वालों की संपत्ति बेच कर इसकी भरपाई की जाएगी। उपद्रवियों की संपत्ति को नीलाम करके जो पैसे आएँगे, उससे उनके द्वारा सार्वजनिक संपत्ति को पहुँचाई गई क्षति की भरपाई होगी।

सीएम योगी ने मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी से मुलाक़ात कर दंगाइयों से सख्ती से निपटने के आदेश दिए। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री ख़ुद स्थिति पर पैनी नज़र रख रहे हैं। उन्होंने पुलिस से कहा है कि उपद्रवियों को चिह्नित कर उनपर कड़ी कार्रवाई करें। सीएम योगी ने कहा कि उनकी सरकार उपद्रवियों की संपत्ति नीलाम कर वसूली करेगी। अफवाह फैलाने वालों पर भी निगरानी रखने के आदेश जारी किए गए हैं। सीएम योगी ने जनता को सन्देश जारी करते हुए कहा:

लखनऊ और संभल में बवाल किया गया। संभल में भी कई गाड़ियाँ जलाई गईं। नागरिकता कानून किसी के खिलाफ नहीं है। विपक्ष भ्रम के हालात पैदा कर रहा है। उपद्रवियों से सख्ती से निपटा जाए। प्रदर्शन के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लखनऊ में दर्जन भर वाहनों में आग लगाई गई। उपद्रवियों की संपत्ति कुर्क कर भरपाई की जाएगी। हिंसा में लिप्त लोगों की संपत्ति जब्त की जाएगी। लोकतंत्र में हिंसा के लिए जगह नहीं है।

लखनऊ प्रशासन ने कहा है कि अब स्थिति नियंत्रण में है। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर एक-एक उपद्रवी की पहचान की जा रही है। जो अब तक बच निकले हैं, ऐसे दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए पुलिस कमर कस रही है। लखनऊ के कमिश्नर ने बताया कि सिर्फ़ सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाने वालों की ही नहीं, बल्कि इसके लिए भड़काने वालों की भी संपत्ति नीलाम की जाएगी। जिन्होंने विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया और जिनके चलते सरकार को क्षति हुई, उनपर भी शिंकजा कसा जाएगा।

राजधानी लखनऊ में प्रदर्शनकारियों ने 20 मोटरसाइकिलों, 10 कारों, 3 बसों और मीडिया की 4 ओबी वैन को आग के हवाले कर दिया। कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोलों का प्रयोग करना पड़ा। यूपी पुलिस ने उपद्रवियों को खदेड़ने के लिए लाठीचार्ज भी किया। लखनऊ में शुक्रवार को होने वाली सभी परीक्षाओं को रद्द कर दिया गया है। वाराणसी में पहले ही स्कूलों व कॉलेजों को बंद करा लिया गया था।

क्या मुस्लिमों के ख़िलाफ़ है NRC? प्रपंचियों के फैलाए अफवाहों से बचने के लिए जानें सच्चाई

NRC को लेकर कई तरह के कनफ्यूजन हैं मसलन, क्या समुदाय विशेष के प्रति जानबूझकर यह षड्यंत्र रचा जा रहा है? क्या पहले NRC फिर CAB लाकर बीजेपी की सरकार भारत से कथित अल्पसंख्यकों को निकाल देना चाहती है? क्या यहाँ रह रहे सारे मुस्लिमों से उनकी नागरिकता का प्रमाण माँगा जायेगा? क्या पहली बार ऐसा हो रहा है? तो ये लेख NRC से जुड़े ऐसे ही सवालों के बारे में है।

NRC अर्थात National Register of Citizens जिसका हिंदी मतलब होता है- राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, ऐसा रजिस्टर जिसमें राष्ट्र के वैध नागरिकों का ब्यौरा दर्ज होता। अब प्रश्न ये है कि इसकी ज़रूरत क्यों है? आज के समय में विश्व के अधिकांश देश लोक कल्याणकारी देश हैं, जो अपने नागरिकों को कुछ मूलभूत सुविधाएँ देते हैं जिससे उनका जीवन स्तर को बेहतर होता है, उन्हें मानवोचित अधिकार मिलता है, संसाधनों का बँटवारा न्यायोचित ढंग से होता है। अत: एक राष्ट्र के पास उसके नागरिकों का ब्यौरा होना जरूरी है।

इसे यूँ समझिए कि आप एक पार्टी दे रहे हैं, जिसमें आपने 50 लोगों को न्योता दिया है लेकिन खाने के टाइम आस-पास के 50 लोग और आ जाएँ, जो बाखुशी अपने भोजन का इंतजाम कर सकते है तो आप क्या करेंगे? आप या तो अपने पास मौजूद 50 लोगों के राशन में से उन्हें खाना देंगे या आप अपनी लिस्ट से उपस्थित लोगों को मिलाएँगे और नाम मैच न करने पर उनलोगों को सादर विदा करेंगे। बस एक राष्ट्र की भी यही समस्या होती है और इसी समस्या के समाधान के लिए भारत में भी NRC तैयार हो रही है।

यह पहली बार नहीं है कि भारत के किसी राज्य में NRC तैयार हुआ है। दरअसल इससे पहले भी असम में 1951 में NRC तैयार किया जा चुका है जो स्वतंत्रता के बाद पहली बार जनगणना पर आधारित था। उसके बाद वर्ष 1971 में पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के बीच युद्ध होने के कारण हजारों की संख्या में शरणार्थी भारत आने लगे जिस कारण भारत को भी युद्ध में भाग लेना पड़ा और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। बांग्लादेश के स्वतंत्र होने के बाद कुछ शरणार्थी तो वापस गए लेकिन कुछ शरणार्थी यहीं रह गए और तब फिर से एक बार NRC को अपडेट करने की ज़रूरत महसूस हुई। लेकिन, ये काम सरकार को उसी वक्त करना चाहिए था जो तब की इंदिरा गाँधी और उनके बाद राजीव गाँधी की सरकार ने नहीं किया।

परेशानी तब और अधिक बढ़ने लगी जब नवनिर्मित बांग्लादेश से शरणार्थियों के रूप में अवैध प्रवासियों की संख्या में वृद्धि आने लगी जिसे लेकर ‘ऑल असम स्टूडेंट यूनियन’ और ‘ऑल असम गण संग्राम परिषद्’ के नेतृत्व में असमिया संस्कृति और पहचान की रक्षा के लिए जनांदोलन शुरू हुआ जिसे ‘असम आंदोलन’ के नाम से जाना गया। लगभग छह वर्ष तक चले इस आंदोलन की परिणिति ‘असम समझोते’ के रूप में सामने आया जो 15 अगस्त,1985 को राजीव गाँधी और असम के नेताओं के बीच हुआ।

इस समझौते में दो जो सबसे जरूरी बात थी, पहली कि 25 मार्च, 1971 को या इसके बाद असम में प्रवेश लेने वाले सभी विदेशियों की पहचान कर उन्हें देश से बहार किया जाएगा और दूसरी यह कि असम की संस्कृति और पहचान को बरकरार रखने के लिए सरकार द्वारा प्रयास किया जायेगा। और आज इस समझौते के 34 साल के बाद इसके प्रमुख शर्त को पूरा करने के लिए NRC को अपडेट किया गया है। अगर इस समझौते की शर्त उस वक़्त पूरी कर दी जाती तो न तो उसमे इतनी परेशानी आती न ही इतना कनफ्यूजन। इस चीज तब क्यों नहीं हो पाई इसका जवाब तब सत्ता में रही पार्टी ही दे सकती है कि वो कौन से कारण रहे जो काम उस वक़्त होना चाहिए था वो अब हो रहा है? आखिर कौन सा लालच था? क्या मंशा थी?

अब अगले सवाल पर आइए कि क्या किसी ख़ास समुदाय के खिलाफ यह षडयंत्र रचा जा रहा है? क्या पहले NRC बीजेपी की सरकार मजहब विशेष को निकाल देना चाहती है? क्या यहाँ रह रहे सारे मुस्लिमों से उनकी नागरिकता का प्रमाण माँगा जाएगा?

तो इसका जवाब है कि NRC का किसी भी जाति-धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है, ना ही इसका संबंध भारत के अन्य भागों में रह रहे मुस्लिमों से है। इनफेक्ट इसका संबंध असम के वैध नागरिक मुस्लिमों से भी नहीं है।

इसे तो 2014 में ‘असम सम्मलित महासंघ एवं अन्य बनाम भारत सरकार एवं अन्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय के बाद राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू हुई। पिछले साल जुलाई में NRC का अंतिम अपडेटेड ड्राफ्ट आया जिसमें 40 लाख लोगों के नाम नहीं पाए गए थे और उन्हें बाद में असम में उनका स्थायी निवास सिद्ध करने के लिए समय दिया गया। नागरिकता सिद्ध करने की प्रक्रिया में इस रजिस्टर में वे सभी लोग (या उनके वंशज) शामिल किये गये हैं जिनके नाम 1951 में जारी किये गए असम NRC या 24 मार्च, 1971 की मध्य रात्रि तक जारी किये गए किसी भी अन्य स्वीकार्य दस्तावेज में शामिल थे।

इन सारे नामों के आँकड़ों को ‘लिगेसी डाटा’ कहा जाता है। सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद 31, दिसम्बर 2019 को NRC की अंतिम सूची जारी की गई जिसमें सूची से बाहर रहे लोगों की संख्या 40 लाख से घटकर 19,06,657 हो गयी। अब चूँकि “नागरिकता“ संघ सूचि का विषय है इसलिए NRC के लिए फंडिंग और गाइडलाइंस केंद्र सरकार देती है लेकिन काम राज्य सरकार द्वारा किया जाता है और पूर्वोत्तर में इसे सबसे पहले लागू करने की एक सबसे बड़ी वजह ये है कि सबसे ज्यादा अवैध प्रवासी बांग्लादेश से पूर्वोत्तर के रास्ते ही भारत में घुसते हैं।

ध्यान देने वाली बात यह कि NRC का अपडेशन नागरिक अधिनियम,1995, 2003 और इसमें 2009, 2010 में हुए संशोधन के अनुसार पूरी तरह से कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए किया गया है। अब मुझे ये बताया जाए कि इसमें कहाँ मुस्लिमों के लिए दिक्कत आ रही है? कहाँ उन्हें टारगेट किया का रहा है? कहाँ उनके प्रति कोई दुर्भावना है? ये तो सिर्फ अवैध प्रवासियों को देश से बाहर करने कि प्रक्रिया है ताकि देश के वैध नागरिक को देश के संसाधन पर उचित अधिकार मिल सके।

अगले सवाल पर आते हैं कि NRC से बाहर हुए लोगों का क्या होगा? भारत का रिकॉर्ड आज तक बेहतरीन रहा है। ना तो भारत ने कभी किसी पर पहले हमला किया, ना ही भारत ने कभी अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न किया, जिससे यहाँ के अल्पसंख्यकों को किसी और देश में शरण लेने की जरूरत हो और आज भी भारत ऐसा कुछ नहीं करने जा रहा है। हालाँकि, ये 19 लाख लोग दिए गए समय में सबूत नहीं दे पाए कि वो असम के नागरिक हैं फिर भी उन्हें और समय दिया जा रहा है। उनके सामने और भी रास्ते खुले हुए हैं, जैसे- NRC से बाहर हुए लोग पहले विदेशी अधिकरण के सामने अपील करेंगे, बताते चले कि इसके लिए आलरेडी 300 अधिकरण काम कर रहे हैं और जरूरत के अनुसार लगभग 400 अधिकरण के गठन पर बात चल रही है।

वहाँ भी ये लोग अगर अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सके तो फिर इन लोगों के लिए पहले हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खुला हुआ है। जब सारी कानूनी प्रक्रिया से गुज़रने के बाद भी इन 19 लाख लोगों में से जो अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाएँगे, उन्हें भारत अपने यहां क्यों रखे? ये सबसे बड़ा सवाल है। क्यों भारत अपने नागरिकों का हक मारकर किसी और देश के नागरिकों को परोस दे? भारत ना तो इतना विकसित हुआ है कि इतने लोगों को बेवजह पालता रहे ना ही भारत नागरिकों का हक मारना उचित है।

ये बता दें कि 19,06,657 लोगों में लगभग 14 लाख लोग हिन्दू धर्म से हैं और करीब 5 लाख लोग मुस्लिम धर्म के, जो कि बांग्लादेश के बहुसंख्यकों का धर्म है। अब बताइए कि इसमें कहाँ क्या गलत हो गया भारत के मुस्लिमों के साथ? छद्म बुद्धिजीवी, धूर्त वामपंथी, कट्टरपंथी, और हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति से घर चलाने वाले लोगों ने ये चरस बोया कि “ओ जी ये तो मुस्लिम विरोधी है, संविधान की हत्या है, धार्मिक आधार पर पर है NRC के साथ CAB लाकर ये मुस्लिमों को निकाल देंगे देश से, बीजेपी तो हिन्दुओं कि पार्टी है, ये देश तोड़ रहे हैं ब्ला ब्ला ब्ला…”।

तो अब आते हैं CAB यानी नागरिकता संशोधन विधेयक पर। सबसे पहले NRC और CAB का आपस में कोई संबंध है ही नहीं। NRC पहले से चलता आ रहा है जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है और इसमें नागरिकता संशोधन विधेयक का जिक्र तक कहीं नहीं है।

मुझे वाकई नहीं समझ आ रहा कि NRC का विरोध क्यों किया का रहा है? मुझे ये दिख रहा है कि जिस काम को असम समझौते के तहत 1985 के बाद जितनी जल्दी संभव हो इतनी जल्दी होना चाहिए था उस काम को होने में 34 वर्ष लग गए। मुझे ये दिख रहा है कि त्रिपुरा में बांग्लादेशी घुसपैठिए इतनी संख्या में आए कि वहाँ के मूल आदिवासी वहाँ अल्पसंख्यक हो गए और बांग्लादेशी घुसपैठिए उनके हिस्से के संसाधन, उनके हिस्से की सरकार पर कुंडली मारे बैठे हैं।

ये दिख रहा है कि कुछ लोग कैसे अपनी राजनीति की रोटी सेंकने के लिए इस मुद्दे को जबरदस्ती हवा में उछाल रहे हैं और लोगों को भड़काने कि कोशिश में लगे हुए हैं। हर जगह हिंसा को उकसा रहे हैं और सक्रिय रूप से हिंसा में शामिल भी हो रहे हैं। क्या हिंसा का सहारा लेकर, तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करना संवैधानिक है? क्या संविधान और नियमों के अनुसार करीब चार दशक पुरानी समस्याओं को ठीक करना असंवैधानिक है? इसका फैसला इस लेख को पढ़ने वाले करें।

नोट- यह लेख नेहा चौधरी ने लिखा है।

जामिया हिंसा: दिल्ली हाईकोर्ट ने दंगाइयों को किसी भी तरह की अंतरिम राहत देने से किया इनकार

रविवार (15 दिसंबर) को जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंसा की जाँच के लिए एक न्यायिक आयोग के गठन का अनुरोध करने वाली याचिकाओं की सुनवाई करते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ ने मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति सी हरिशंकर की खंडपीठ ने आज छात्र दंगाइयों को किसी भी तरह से अंतरिम संरक्षण प्रदान करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने केंद्र, दिल्ली सरकार और पुलिस को एक नोटिस भी जारी किया, जिसमें जामिया मिलिया इस्लामिया की घटना पर जवाब दाखिल करने को कहा गया। अदालत इस मामले की सुनवाई आगामी 4 फरवरी को करेगी। इतनी लंबी तारीख़ मिलने पर याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से इसे और जल्दी देने की माँग की तो कोर्ट ने इससे इनकार कर दिया।

इससे पहले, दिल्ली हाईकोर्ट ने जामिया दंगाइयों को संरक्षण देने संबंधी याचिका ठुकरा दी थी। कोर्ट रूम में उस समय एक अजीब सा माहौल बन गया जब याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने जजों के समक्ष शेम-शेम के नारे लगाए।

इस बीच, दिल्ली हाईकोर्ट की सिंगल जज की बेंच ने जामिया छात्रों को हिरासत में लेने को चुनौती देने वाली याचिका को चीफ जस्टिस डीएन पटेल की बेंच में ट्रांसफर कर दिया है। ऐसे में इस याचिका पर भी अन्य पिटीशन के साथ डिवीजन बेंच में सुनवाई की जाएगी।

हाईकोर्ट के फ़ैसले से असंतुष्ट, वकीलों की लॉबी ने कथित तौर पर न्यायाधीशों पर ‘Shame on you’ के नारे लगाना शुरू कर दिया। 

पिछले कुछ दिनों से CAA के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन में घायल छात्रों के लिए चिकित्सा उपचार और मुआवज़े की माँग वाली छ: याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत का फ़ैसला आया है।

इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि इस मुद्दे पर सभी याचिकाएँ संबंधित उच्च न्यायालयों के पास ले जाई जाएँ। जहाँ इस बात पर ग़ौर किया जा सके कि क्या इस मुद्दे की जाँच के लिए एक स्वतंत्र जाँच समिति का गठन किया जा सकता है!

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में रविवार को दिल्ली के जामिया इलाके में जमकर हिंसा हुई। रविवार (दिसंबर 15, 2019) शाम प्रदर्शनकारियों ने कई बसें और बाइक फूँक दी। उपद्रवियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने अराजक तत्वों के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में घुसे होने के संदेह पर कैंपस से सभी छात्रों को बाहर निकाल दिया।

पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प में कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। प्रदर्शनकारियों ने बसों और वाहनों में आग लगा दी। जामिया में इस हिंसा के खिलाफ जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के अलावा जेएनयू और दूसरे संगठनों के लोगों ने भी पुलिस मुख्यालय पर देर रात प्रदर्शन किया। देर रात पुलिस द्वारा 50 छात्रों को रिहा करने के बाद सोमवार (दिसंबर 16, 2019) सुबह 4 बजे प्रदर्शन खत्म हुआ। जामिया कैंपस में 5 जनवरी तक छुट्टी घोषित कर दी गई है।

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‘अनपढ़ मोदी और टकले शाह, CAA वापस लो नहीं तो जिहाद के लिए तैयार रहो: मौलाना ने उगला ज़हर

एमके इस्लामिक चैनल नाम के एक इस्लामवादी यूट्यूब चैनल ने हाल ही में एक मौलाना जरजिस अंसारी हाफिजुल्लाह का एक भड़काऊ भाषण अपलोड किया है। इस भड़़काऊ भाषण में मौलाना को कई जगह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी करते और धमकी देते देखा और सुना जा सकता है। मौलाना ने नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) बिल को झूठा करार देते हुए इसे मुस्लिम-विरोधी ठहराया।

इस वीडियो को 18 दिसंबर 2019 को अपलोड किया गया था। इसे अब तक 4 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है। एमके इस्लामिक यूट्यूब चैनल से पता चलता है कि इसे इस साल अक्टूबर में बनाया गया। इस यूट्यूब चैनल पर इसी मौलाना द्वारा बनाए गए अब तक 13 वीडियो को शेयर किया जा चुका है जिसे 27 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है।

मौलाना अपने नफ़रत भरे भाषण में यह कहता है कि अगर मोदी या शाह उन्हें देश से बाहर फेंकने की कोशिश कर रहे हैं तो वह भारत के कोने-कोने में ‘जिहाद’ करेंगे। इस वीडियो में मौलाना को यह कहते हुए सुना जाता है कि “इनके बाप के बाप के बाप की भी ताक़त नहीं हैं कि हमें बाहर निकाल दें। हमें निकाल के तो दिखा मोदी, हम भी जिहाद करने से पीछे नहीं हटेंगे।”

हालाँकि, सरकार ने बार-बार स्पष्ट किया है कि CAA को लेकर भारतीय मुस्लिमों को बिल्कुल भी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन, मौलाना ने अपने श्रोताओं के बीच यह कहकर झूठ फैलाया कि सरकार देश से सभी अल्पसंख्यकों को बाहर निकालना चाहती है।

मौलाना ने पीएम मोदी को ‘अनपढ़’ और ‘नपुंसक’ कहा और गृह मंत्री को “मोटे” और “टकले” कहा। इसके अलावा, मौलाना ने गृह मंत्री को यह कहते हुए धमकी दी कि तुम आग से खेल रहे हो, तो हमें कमतर न आँके। इसके अलावा, दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की भी तारीफ़ करते हुए मौलाना ने कहा कि यह केजरीवाल ही थे जिन्होंने उन्हें पीएम मोदी की शैक्षणिक योग्यता दिखाई थी।

इसके अलावा, अपने नफ़रत भरे भाषण में लगभग 3 मिनट 30 सेकेंड पर, मौलाना ने सरकार को CAA और NRC को वापस लेने या जिहाद के लिए तैयार रहने की धमकी दी। मौलाना ने कहा कि अगर यह क़ानून पर तुम अटल रहे तो इतना याद रखना की मरने और मारने से कोई नहीं चूकेगा।

मोदी सरकार द्वारा नागरिकता अधिनियम लाए जाने के बाद से देशभर में इसके विरोध में हिंसक विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। जबकि देश भर में कई पाकिस्तानी हिन्दू प्रवासियों ने ऐतिहासिक नागरिकता संशोधन अधिनियम को पारित करने का जश्न मनाया और इसकी सराहना की है। इससे उनकी खोई हुई आशा वापस आ गई है, लेकिन दूसरी तरफ़ मुस्लिम भीड़ हिंसा पर उतारू है और सार्वजनिक सम्पत्ति को नष्ट करने के साथ-साथ देशभर में अराजकता फैलाने में जुटी हुई है।

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वीडियो: CAA विरोध के नाम पर उत्पात मचाने निकली थी दंगाई भीड़, यूपी पुलिस ने खदेड़-खदेड़ कर पीटा

उत्तर प्रदेश में सीएए के ख़िलाफ़ उपद्रव करने वालों पर पुलिस ने शिकंजा कसा है। वाराणसी और लखनऊ से लेकर आजमगढ़ तक, जहाँ भी दंगाइयों ने हिंसा का प्रयास किया, यूपी पुलिस ने उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर मारा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले ही सभी जिलों के प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिया था कि क़ानून का उल्लंघन करने वालों को बख्सा नहीं जाए। नीचे हम वाराणसी के बेनियाबाग का वीडियो संलग्न कर रहे हैं, जिसमें आप देख सकते हैं कि कैसे योगी की पुलिस ने दंगाइयों की बखिया उधेड़ दी।

वाराणसी के बेनियाबाग में उपद्रवियों को पुलिस ने खदेड़-खदेड़ के पीटा

यहाँ तक कि यूपी पुलिस 2-3 दिन पहले हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा के आरोपितों को भी ढूँढ-ढूँढ कर गिरफ़्तार कर रही है। मंगलवार (दिसंबर 17, 2019) को उपद्रव करने वाले 11 लोगों को चिह्नित कर गुरुवार को धर-दबोचा गया। जमीयत-उल-अशरफिया के छात्रों ने उपद्रव किया था, जिसके बाद पुलिस ने ये कार्रवाई की। आज़मगढ़ में पुलिस सोशल मीडिया पर भी पैनी नज़र रख रही है ताकि हिंसा फैलाने की साज़िशों को पहले ही नाकाम किया जा सके

दंगा भड़काने की कोशिश में मुस्लिम बहुल इलाके में वामपंथी

वाराणसी की बात करें तो समाजवादी पार्टी के नेताओं ने विरोध प्रदर्शन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। ‘प्रतिरोध सभा’ में भाग लेने जा रहे आम आदमी पार्टी के नेताओं को भी पुलिस ने हिरासत में लिया। और अपनी सख़्त निगरानी में विरोध के नाम पर दंगा भड़काने के उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया। प्रशासन ने पहले ही स्कूलों व कॉलेजों को बंद करवा दिया था, जिससे बच्चों अथवा छात्रों पर दंगाइयों के विरोध प्रदर्शन का कोई असर ना पड़े। बाजार भी अधिकतर बंद ही रहे।

राजधानी लखनऊ में भी उपद्रवियों ने आगजनी की, जिसके बाद पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया। उपद्रवियों ने पुलिस व मीडिया के वाहनों में तोड़फोड़ मचाई, जिसके बाद पुलिस ने उनकी जम कर पिटाई की। प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अजय लल्लू को भी पुलिस उठा कर ले गई। कई वामपंथी नेताओं की भी गिरफ़्तारी की गई। बलरामपुर में सपा के कई नेताओं को नज़रबंद कर लिया गया। शान्ति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई पूर्व विधायकों तक को पुलिस ने हिरासत में लिया। संभल में दंगाइयों ने राज्य परिवहन के एक बस में आग लगा दी। झाँसी में तो सपा सांसद चंद्रपाल सिंह को भी पुलिस उठा कर ले गई।