एक चौंकाने वाली घटना में, झारखंड के आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मंगरू पाहन (30 वर्ष) की 21 जून की रात चाकू घोंपकर हत्या कर दी गई। हत्या तो अमूमन हर दिन होती है लेकिन यह घटना चौंकाने वाली इसलिए है क्योंकि जिस कारण से हत्या की गई, वह अमूमन नहीं होती। हत्या की वजह थी – अपने घर के सामने गांजा पीने से मना करना। यह मनाही गांजा पी रहे तीन लोगों को इतनी नागवार गुजरी कि उन्होंने घर के मालिक की हत्या कर दी।
दैनिक भास्कर की ख़बर के अनुसार, मोहम्मद साज़िद उर्फ़ छोटू, आज़म अंसारी उर्फ़ बाबू और रमज़ान अंसारी उर्फ़ चुटरी को इस हत्या के आरोपित के तौर पर गिरफ़्तार किया गया है। इस मामले में पुलिस ने कथित तौर पर इस्तेमाल किया गया चाकू भी बरामद किया है।
आरोपितों ने पुलिस के सामने यह स्वीकार भी कर लिया कि बहस के दौरान उसने मंगरू पाहन के पेट में छुरा घोंपा था।
मंगरू पाहन, जो अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ जीवयापन कर रहा था। वो कडरू इलाक़े में सरना टोली का निवासी था। पाहन, एक मजदूर के रूप में अपनी ज़िंदगी जी रहे थे, परिवार पाल रहे थे। घटना वाली रात लगभग 9 बजे के आसपास तीनों आरोपित अपने दोस्तों के साथ कडरू के सरना टोली में मंगरू के घर के बाहर गांजा पी रहे थे। मंगरू ने विनम्रतापूर्वक उन तीनों से उसके घर के बाहर गांजा न पीने का अनुरोध किया। लेकिन, उन तीनों में से एक को मंगरू की बात इतनी नागवार गुज़री कि उसने ग़ुस्से में मंगरू के पेट में छुरा घोंप दिया और वहाँ से भाग गया।
“वे (मंगरू) घर से बाहर आए (जहाँ एक पेड़ है) वहाँ तीनों आरोपित गांजा पी रहे थे। इस पर मंगरू ने आपत्ति जताई। उनसे कहा कि आप रेलवे स्टेशन जा सकते हैं, जहाँ लोग नहीं हैं। लेकिन, उन्होंने (आरोपितों) बहस की और फिर उनमें से एक ने उन्हें (मंगरू) चाकू मार दिया।”
मंगरू के रिश्तेदारों ने पुष्टि की, “हम उन्हें रिम्स (राजेंद्र इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) ले गए, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।”
गांजा पीने पर आपत्ति को लेकर पिछले साल भी ऐसी ही घटना में वसीम ने संतोष को मार दिया था (सौजन्य:द हिन्दू)
पिछले साल, इसी तरह की एक घटना में, संतोष नाम के एक व्यक्ति को वसीम द्वारा मार दिया गया था क्योंकि उसने गांजा पीने पर आपत्ति जताई थी। संतोष भाजपा के सदस्य थे और वसीम कथित तौर पर कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता का बेटा था। हमले के गवाह रहे 27 वर्षीय अशोक ने पुलिस को दिए अपने बयान में कहा था कि संतोष ने मुख्य आरोपित वसीम के गांजा पीने पर आपत्ति जताई थी।
तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने अपने उत्तराधिकारी को लेकर एक बार फिर से बयान दिया है। इस बयान में उन्होंने कहा कि उनकी उत्तराधिकारी कोई खूबसूरत महिला भी हो सकती है। दरअसल, दलाई लामा ने हाल ही में बीबीसी की पत्रकार रजनी वैद्यनाथन को एक इंटरव्यू दिया। इस दौरान उन्होंने कहा कि उनकी उत्तराधिकारी कोई महिला भी हो सकती है, लेकिन वह आकर्षक होनी चाहिए। उन्होंने ये बात 2015 में भी कही थी, और अभी भी वो अपनी इस बात पर अडिग हैं। उन्होंने इंटरव्यू में कहा कि जितना महत्त्व दिमाग का है, उतना ही खूबसूरती का भी है। साथ ही उन्होंने कहा, “अगर महिला दलाई लामा बनती हैं तो उसे कहीं ज्यादा आकर्षक होना चाहिए।”
This was perhaps the most surprising moment in the interview. I asked the Dalai Lama if he stood by his earlier comment that if his successor was female, she should be attractive.
जब रजनी ने उनसे ऐसा बोलने के पीछे की वजह पूछी तो दलाई लामा ने कहा कि उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि अगर कोई महिला लामा आती हैं और वो खुश दिखती हैं तो लोग भी उन्हें देखकर खुश होंगे और अगर कोई महिला लामा दुखी दिखती हैं तो लोग उन्हें देखना पसंद नहीं करेंगे। साथ ही दलाई लामा ने कहा, “असली खूबसूरती मन की खूबसूरती है, ये सच है, लेकिन मैं समझता हूँ कि आकर्षक दिखना भी ज़रूरी है।”
दलाई लामा ने यूरोप में अप्रवासियों पर भी अपनी राय रखी और कहा कि केवल सीमित संख्या में शरणार्थियों को रहने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि यूरोप, यूरोपियों के लिए है और अगर अप्रवासी अपने देशों में वापस नहीं भेजे जाते हैं, तो पूरा यूरोप मुस्लिम देश या फिर अफ्रीकी देश बन सकता है। इसके साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि जो शरणार्थी यूरोप आ गए हैं, उन शरणार्थियों को अपने यहाँ शरण देकर उन्हें शिक्षा एवं प्रशिक्षण देना चाहिए। इनका कौशल विकास कर फिर उन्हें उनके देश में भेजने का लक्ष्य होना चाहिए।
इसके साथ ही दलाई लामा ने कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप में नैतिक सिद्धांत की कमी है। उन्होंने कहा कि एक दिन ट्रंप कुछ कहते हैं, तो अगले दिन वो (ट्रंप) कुछ और कहते हैं। उन्होंने ट्रंप के अमेरिका फर्स्ट नीति की आलोचना की और कहा कि अमेरिका को वैश्विक जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
कोलकाता में अंतरराष्ट्रीय महिला मुक्केबाज सुमन कुमारी के साथ दुर्व्यवहार और मारपीट की घटना सामने आई है। पुलिस के अनुसार, महिला मुक्केबाज सुमन कुमारी पर हमला उस वक़्त किया गया जब वो अपने दोपहिया वाहन से कार्यालय जा रही थीं।
सुमन ने अपने फेसबुक अकाउंट पर पूरे मामले की जानकारी देते हुए लिखा:
“मैं शुक्रवार को 11 बजे स्कूटी से दफ़्तर जा रही थी। उसी समय 25 साल का एक लड़का मेरे सामने आया और बिना वजह मुझे गालियाँ देने लगा। इतना ही नहीं जब मैंने इसका विरोध किया तो उसने मेरे साथ मारपीट भी की। इसके बाद मैंने वहाँ खड़े पुलिस वालों से मदद की गुहार लगाई, लेकिन उन्होंने मुझे पास के थाने में जाने की की सालह दी और इस मामले से पल्ला झाड़ लिया। लेकिन मैं जल्दी में थी इसलिए मैं पुलिस स्टेशन नहीं जा पाई और अपने ऑफ़िस पहुँच गई।” इसके आगे उन्होंने लिखा, “फिर भी मुझे कोलकाता पुलिस पर पूरा भरोसा है। मैं केपी (कोलकाता पुलिस) से अनुरोध करती हूँ कि वह इस मामले को देखें और क़ानून व्यवस्था को यथासंभव बहाल करें। केवल तभी मेरा प्रिय शहर महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षित होगा।”
सुमन कुमारी ने इस पोस्ट में कोलकाता पुलिस को भी टैग किया है। ख़बर है कि इस मामले में तीन लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है।
West Bengal: Three men arrested by Kolkata Police for allegedly assaulting National level boxer Suman Kumari in Mominpur. Case registered pic.twitter.com/sDLcCjy4OM
शहर की पुलिस ने अपने फेसबुक पेज में उल्लेख किया कि इस मामले को दर्ज कर लिया गया है और इलाक़े की सीसीटीवी फुटेज को देखने के बाद तीन लोगों- राहुल शर्मा, शेख़ फ़िरोज़ और वसीम ख़ान को गिरफ़्तार कर लिया गया है।
पुलिस ने मुक्केबाज सुमन कुमारी के फेसबुक पेज पर इस बात की जानकारी दी, “हमने एक घंटे के भीतर अपराधियों की पहचान कर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। और सुनिश्चित करेंगे कि उन्हें सज़ा दी जाए।”
इससे पहले, पूर्व मिस इंडिया यूनिवर्स जोशी सेनगुप्ता को कुछ बदमाशों द्वारा परेशान करने का मामला सामने आया था। इस घटना को अभी दो हफ़्ते भी नहीं बीते थे कि मुक्केबाज सुमन कुमारी के साथ मारपीट की ख़बर सामने आ गई।
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें एक मुस्लिम व्यक्ति को कान पकड़कर उठक-बैठक करते हुए जय श्री रीम बोलने के लिए मजबूर करते देखा गया। वीडियो वायरल होने के बाद पत्रकारिता के समुदाय विशेष और लिबरल गैंग ने इसे हेट क्राइम के तौर पर खूब भुनाया। लेकिन हकीकत सबसे सामने है। दरअसल जाँच के बाद पुलिस ने इस मामले में एक मुस्लिम शख्स को गिरफ्तार किया है। खबर के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के कूच बिहार जिले में आप्सी मियाँ नाम के शख्स को असगर अली को जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।
Muslim man Apsi Mia arrested after a video showing him forcing another Muslim youth Asgar Ali to chant “Jai Shri Ram” while making him to do sit-ups – went viral.. pic.twitter.com/iY0I1m05WK
जबरन ‘जय श्रीराम’ बोलने की यह घटना लोकसभा चुनाव के बाद ही हुई थी, लेकिन हाल ही में वीडियो वायरल होने के बाद राज्य प्रशासन ने इस पर संज्ञान लिया। इस वीडियो में उठक-बैठक करते हुए जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर करने के साथ ही असगर को ये भी धमकी दी जा रही है कि वो न तो कभी ममता बनर्जी का नाम लेगा और न ही वो कभी टीएमसी के लोगों के साथ दिखना चाहिए। मुंबई मिरर के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद, आप्सी मियाँ ने असगर अली और उत्पल दास के साथ मार-पीट की थी, उसे प्रताड़ित किया था। हालाँकि, उस समय कोई गिरफ्तारी नहीं हुई थी।
Muzlim Apsi Miyan made Asgar Ali do sit-ups and chant ‘Jai Shri Ram’ at Coock Behar in Bengal. The video went viral. ‘Hindu terrorists’ were blamed by liberals. After police arrest, identity of the accused came out. Liberals are silent and busy with Team India’s saffron jersey.
अब वीडियो वायरल होने के बाद, आप्सी मियाँ को गिरफ्तार कर लिया गया। आप्सी को शुक्रवार (जून 28, 2019) को कूच बिहार के तूफानगंज अदालत में पेश किया गया और फिर उसे पुलिस हिरासत में भेज दिया गया। मुंबई मिरर ने बताया कि भाजपा ने आप्सी मियाँ के साथ किसी भी तरह के संबंध से इनकार किया है।
इन दिनों कई ऐसी घटनाएँ हुई हैं, जहाँ आरोप लगाया गया है कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को जय श्री राम का नारा लगाने के लिए मजबूर किया गया है और जय श्री राम न बोलने पर उनके साथ मारपीट की जाती है। हालाँकि,जब पुलिस द्वारा इसकी जाँच की जाती है, तो इनमें से अधिकतर मामले फर्जी ही निकलते हैं।
हाल ही में, मदरसा के एक शिक्षक ने आरोप लगाया था कि उन्हें जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर किया गया था। लेकिन जब पुलिस ने जाँच शुरू की और प्रत्यक्षदर्शियों से बात की तो मदरसा के शिक्षक मोहम्मद मोमिन का दावा बिल्कुल झूठा निकला। वहीं, गुरुग्राम में भी एक ऐसी ही घटना में बरकत आलम नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति ने आरोप लगाया था कि हिंदुओं के एक समूह ने उसे जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर किया और जब उसने ऐसा करने से मना किया तो उसके साथ मारपीट की गई, उसके सिर से टोपी फेंक दिया गया। हालाँकि, जब पुलिस ने मामले की तहकीकात की और घटनास्थल पर लगे सीसीटीवी फुटेज को खंगाला तो बरकत का आरोप भी बिल्कुल निराधार निकला।
तकरीबन 2 साल पहले राजस्थान के अलवर में कथित मॉब लिंचिंग के जिस मामले ने पूरे देश को हिला दिया था, उस पहलू खान के खिलाफ राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने चार्जशीट दाखिल की है। ताजा चार्जशीट में खान पर गो-तस्करी का आरोप लगाया गया है। डेरी चलाने वाले पहलू खान को 1 अप्रैल 2017 को बहरोड़ के पास कथित गो-रक्षकों की एक भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था। नई फाइल की गई चार्जशीट में उस पिक-अप ट्रक के मालिक का नाम भी दर्ज है, जिसे पशुओं को ले जाने के लिए इस्तेमाल किया गया था।
#ExpressFrontPage | The chargesheet also names the owner of the pick-up truck that was used for transporting the cattle on April 1, 2017, when the lynching took place near Behror.https://t.co/DG4WpCabfH
राज्य में कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने के कुछ दिन बाद ही, पिछले साल 30 दिसंबर को यह चार्जशीट तैयार की गई थी। 29 मई 2019 को बहरोड़ के एडिशनल चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में यह चार्जशीट पेश की गई। इस चार्जशीट में पहलू खान और उनके बेटों पर राजस्थान गोवंशीय पशु (वध और अस्थायी प्रवासन या निर्यात पर प्रतिबंध) अधिनियम, 1995 की धारा 5, 8 और 9 लगाई गई है।
खान के सबसे बड़े बेटे इरशाद (25 साल) का नाम भी चार्जशीट में है। इरशाद ने द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, “हमने गो-रक्षकों के हमले में अपने पिता को खो दिया और अब हमें गो-तस्कर बताया गया है। हमें उम्मीद थी कि राजस्थान की नई कॉन्ग्रेस सरकार हमारे खिलाफ दर्ज मुकदमे की समीक्षा कर उसे वापस ले लेगी, मगर अब हमारे खिलाफ चार्जशीट फाइल कर दी गई है। हमने सरकार बदलने के बाद न्याय की उम्मीद लगाई थी पर ऐसा हुआ नहीं।”
इरशाद के छोटे भाई आरिफ को भी चार्जशीट में आरोपी बताया गया है। पिछले साल, राज्य की तत्कालीन भाजपा सरकार ने भी ऐसी ही चार्जशीट खान के सहयोगियों अज़मत और रफीक़ के खिलाफ दाखिल की थी। लेकिन तब विपक्ष में बैठे कॉन्ग्रेसी नेताओं ने इस मसले पर खूब राजनीति की थी और पुलिस की कार्रवाई को ‘भगवा रंग’ देने का प्रयास किया गया था।
अब अलवर के बहरौर पुलिस स्टेशन में दर्ज चार्जशीट में कहा गया है कि मामले की पूरी जाँच करने के बाद आरोपित इरशाद, आरिफ और पहलू खान के खिलाफ आरबीए अधिनियम की धारा 5, 8, 9 के तहत अपराध साबित हुआ है, जबकि आरोपित खान मोहम्मद के खिलाफ आरबीए अधिनियम के धारा 6 के तहत अपराध साबित हुआ है। चूँकि, दो अलग-अलग पिक अप वैन पर हमला हुआ था, इसलिए पुलिस ने आरबीए अधिनियम के तहत दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की। पहला पिक अप वैन जगदीश का था, जिसे अर्जुन ड्राइव कर रहा था, जबकि दूसरे पिक अप वैन में पहलू खान और उसके बेटे सवार थे, जो कि मोहम्मद का था।
जानकारी के मुताबिक, राजस्थान की CID- क्राइम ब्रांच ने पहलू खान की हत्या के आरोपित सभी 6 लोगों को क्लीन चिट दे दी। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि हमले में इन 6 लोगों के मौजूद होने का कोई सबूत नहीं है। राजनीतिक रूप से गौर करने वाली बात यह है कि जब भाजपा सरकार ने पहलू खान और उनके बेटों पर गो-तस्करी का आरोप लगाया था और जब कथित भीड़ द्वारा पहलू खान पर हमला किया गया था तो कॉन्ग्रेस ने बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) पर प्रतिबंध लगाने की माँग की थी और आरोप लगाया था कि राज्य में गो-रक्षा के नाम पर सांप्रदायिक तनाव को भड़काने की कोशिश की जा रही है। और अब सत्ता में आते ही राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने पहलू खान को गो-तस्करी के मामले में अपराधी बताया है।
अभिनेता आयुष्मान खुराना अभिनीत फिल्म Article-15 शुक्रवार (जून 28, 2019) को रिलीज हो गई है। उत्तर प्रदेश के कानपुर में इस फिल्म को लेकर बवाल भी शुरू हो चुका है। इस फिल्म के विरोध में अखिल भरतीय सर्व ब्राम्हण महासभा के सैकड़ों कार्यकर्ता सड़क पर उतर आए। इस दौरान उन्होंने कमिश्नर और डीएम को एक ज्ञापन देते हुए इस फिल्म के रिलीज होने पर रोक लगाए जाने की माँग की है। ऐसा नहीं होने पर वो लोग टॉकीजों के अंदर घुसकर जबरन फिल्म को नहीं चलने देने का ऐलान किया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कानपुर में ब्राह्मण समाज के सैकड़ों लोगों ने इस फिल्म का जबरदस्त विरोध किया। इस दौरान लोगों ने फिल्म और आयुष्मान के खिलाफ नारेबाजी करते हुए सिनेमाघरों में लगे पोस्टरों को फाड़ दिया। इस बीच कानपुर शहर स्थित जेड स्क्वायर मॉल में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जमकर झड़प भी हुई। बवाल बढ़ता देख कई थानों की फोर्स को बुलाकर हालात काबू में किया गया। फिलहाल हंगामे को देखते हुए जिला प्रशासन ने Article-15 फिल्म के सभी शो अस्थाई तौर पर बंद करा दिए हैं।
दरअसल, इस फिल्म दिखाया गया है कि उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले में दो चचेरी बहनों के साथ गैंग रेप के बाद उनके शव पेंड़ से लटके हुए हैं। आरोप है कि फिल्म में लड़कियों और उनके परिवार पर जुल्म करने वालों को महंत के बेटों के रूप में दिखाया गया है, जबकि वहीं पीड़ितों को दलित दिखाया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इस फिल्म के माध्यम से उनकी छवि को धूमिल किया जा रहा है और समाज को बाँटने का भी काम हो रहा है। इस दौरान राष्ट्रीय ब्राह्मण महासंघ के कार्यकर्ताओं ने फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने की माँग करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम डीएम को एक ज्ञापन दिया।
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के एक गाँव में हिंसक इस्लामी भीड़ द्वारा बृहस्पतिवार (जून 27, 2019) देर रात मंदिर में घुसकर एक दलित युवक के साथ मारपीट करने की घटना सामने आई है। समुदाय विशेष के युवक दलित व्यक्ति से इसलिए नाराज थे क्योंकि वो मंदिर में लाउडस्पीकर पर भजन चला रहा था। इसके बाद गाँव में दोनों समुदायों के बीच हिंसक झड़प शुरू हो गई जिसमें दोनों पक्षों के बीच लाठी-डंडे चलने लगे और पथराव भी हुआ।
सूचना मिलने पर पुलिस गाँव में पहुँची और उत्पात मचाने वाले समुदाय विशेष के करीब आधा दर्जन आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद गाँव के हालात को काबू में किया गया। अब गाँव में तनाव को देखते हुए पीएसी की तैनाती की गई है।
मंदिर में भजन चला रहे थे दलित युवक
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना मेरठ के कंकरखेड़ा थाना क्षेत्र के घंसौली गाँव में हुई। यहाँ अनुसूचित जाति के कुछ युवक मंदिर में लाउडस्पीकर पर भजन चला रहे थे। यह भजन सुनना दूसरे मजहब के कुछ लोगों को पसंद नहीं आया और उन्होंने इसका विरोध किया। इसके बाद उन्होंने दलित युवकों को पीटना शुरू कर दिया।
आरोप है कि समुदाय विशेष के लोगों ने दलित युवकों पर लाठी डंडो से हमला कर दिया। घटना के दौरान रात में तीन-चार लोग घायल हो गए। इसी बीच किसी ने पुलिस को सूचना दी। इसके बाद जैसे ही अधिकारी कई थानों की फोर्स लेकर मौके पर पहुँचे तो हमलावर भाग निकले।
पुलिस ने इस मामले में दलित युवकों से मारपीट करने के आरोप में 6 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने गाँव वालों से शांति बनाए रखने की अपील की। गाँव में हालात को काबू कर लिया गया है। अब गाँव में तनाव को देखते हुए पीएसी की तैनाती की गई है।
सोशल मीडिया पर आए दिन फर्जी खबरों के चक्रव्यूह में इस बार फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन भी फँस गए। वो भी तब, जब कि मुंबई में खतरनाक बारिश जारी है। दरअसल, अमिताभ बच्चन सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो के झाँसे में आ गए। इस वीडियो में दावा किया जा रहा है कि NASA ने बारिश वाले बादल बनाने की मशीन विकसित की है जिसकी मदद से बारिश करवाई जा सकती है।
ट्विटर पर @JayasreeVijayan नाम के एक यूजर ने भारी-भरकम मशीन से निकलते धुएँ का एक वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा, “NASA ने बारिश वाले बादल बनाने वाला इंजन विकसित कर लिया है। देखिए, दुनिया कहाँ जा रही है। अद्भुत!” इस ट्वीट में कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर को भी टैग किया गया है। यही ट्वीट बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता अमिताभ बच्चन की नजरों में आया और उन्होंने इसे रीट्वीट करते हुए इच्छा जताई कि हमें भी ऐसी ही एक बादल बनाने वाली मशीन की जरूरत है।
… can we get one in India .. I mean right now .. RIGHT NOW .. PLEASE !!?????? https://t.co/pTRI8r4VsK
अमिताभ बच्चन से एक कदम आगे जाते हुए कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें ऐसी तकनीक भारत में तो चाहिए ही, साथ ही उन्हें इसरो से भी शिकायत है कि आखिर वो कब ऐसे बारिश करने वाले यंत्रों का आविष्कार करेंगे?
अमेरिका के नैशनल ऐरोनॉटिक्स ऐंड स्पेस ऐडमिनिस्ट्रेशन (NASA) ने ऐसी कोई मशीन नहीं बनाई जिससे बारिश करने वाले बादल बन सके। यह दावा पूरी तरह से फर्जी है और इस बात का स्पष्टीकरण फ़ोर्ब्स भी दे चुकी है। लेकिन फिर भी यह वीडियो बड़ी मात्रा में भ्रामक तथ्य के साथ बड़ी मात्रा में शेयर किया जा रहा है।
यह आर्टिकल फ़ोर्ब्स पर अप्रैल, 2018 में प्रकाशित किया गया था और इसे मार्शल शेफर्ड ने लिखा था, जो कि NASA में 12 साल तक रिसर्च मौसम विज्ञानी रह चुके हैं। इस आर्टिकल में शेफर्ड ने बताया है कि कैसे रॉकेट की टेस्टिंग से जलवाष्प पैदा होता है – “RS-25 (रॉकेट) से मुख्य रूप से जल वाष्प निकलता है क्योंकि इंजन लिक्विड हाइड्रोजन और लिक्विड ऑक्सिजन को जलाता है। ओह….सोचिए जब ये दोनों मिलते हैं तो क्या होता है: आपको H2O मिलेगा (जिसे पानी भी कहा जाता है)। इसलिए तस्वीरों और वीडियो में जो आप बादल देख रहे हैं वह एक सरल वैज्ञानिक प्रक्रिया का हिस्सा है।”
RS-25 इंजन लिक्विड-फ्यूल क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन है। नासा ने इसका इस्तेमाल स्पेस शटल में किया था। अब इसका इस्तेमाल नासा के अगले बड़े रॉकेट द स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS) में किया जाएगा।
वायरल हो रहा यह वीडियो 2 अलग-अलग रॉकेट इंजन के परीक्षण के वीडियो को जोड़कर तैयार किया गया है। वीडियो के शुरुआती कुछ सेकंड में RS-25 इंजन के परीक्षण की क्लिप है, जबकि बाकी का वीडियो बीबीसी की टीवी सीरीज “स्पीड” का है। 2001 में प्रसारित हुए इस शो को इंग्लिश ब्रॉडकास्टर जेरेमी क्लार्कसन ने होस्ट किया था। फुटेज में RS-68 इंजन का परीक्षण देखा जा सकता है।
इस प्रकार अमिताभ बच्चन और अन्य लोगों द्वारा शेयर किया जा रहा यह वीडियो फर्जी है और नासा ने ऐसी कोई मशीन तैयार नहीं की है, वायरल वीडियो रॉकेट इंजन के परीक्षण का है।
हालाँकि, क्लाउड-सीडिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसकी मदद से सीमित इलाके में कृत्रिम बारिश करवाई जा सकती है। इसके तहत ड्राई आइस जैसे केमिकल्स का छिड़काव पानी वाले बादलों पर किया जाता है, जिससे बारिश होती है। इस प्रक्रिया ने काफी हद तक सफलता प्राप्त की है, लेकिन बारिश करवाने का यह तरीका काफी महँगा है।
इससे पहले कि आगे की बात की जाए, राजनीति और समाज की परतें उधेड़ी जाए, चंद सवाल आप से- क्या आपको भी डर लग रहा है देश में? क्या आपको लग रहा है कि सत्ता आपके रोजगार छीन रही है? क्या आपको लग रहा है कि उद्योगपतियों को ज़्यादा तरजीह दी जा रही है और आम जनमानस की लगातार उपेक्षा हो रही है? क्या ऐसा लग रहा है कि देश तेजी से ‘हिन्दू राष्ट्र’ की तरफ बढ़ रहा है? क्या आपको भी लग रहा है कि देश में ‘अल्पसंख्यक’ खतरे में हैं? क्या आप भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं कि देश में दंगे, आतंकवाद और मॉब लिंचिंग बढ़ी है? क्या आपको लगता है कि देश में अचानक से अपराध के ग्राफ में उछाल आया है?
ऐसे और भी कई प्रश्न किए जा सकते हैं और इनके वास्तविक परिदृश्य को गायब कर मीडिया गिरोह आपको इनका मनगढंत और प्रोपगैंडा आधारित जवाब भी देती रही है। वैसे, ऐसे और भी कई सवालों की बाढ़ अचानक से मीडिया के विशेष गिरोह के द्वारा ‘कठिन सवाल’ के नाम पर पिछले पाँच साल से उठाए और उछाले जा रहे हैं और उनकी यह यात्रा फिलहाल अगले पाँच साल के लिए तो तय हो ही चुकी है। इसके बाद कितनी लम्बी चलेगी इस पर अभी से कुछ कहना कल्पना में लम्बा गोता लगाना होगा, जिससे बचते हुए जो चल रहा है उसी पर फोकस रहते हुए बात आगे बढ़ाता हूँ।
सबसे बड़ी बात इस पूरे वामपंथी और प्रोपेगैंडा प्रधान मीडिया गिरोह को जवाब से तब तक कोई राब्ता नहीं है, जब तक वह उसके अजेंडा को आगे बढ़ाने वाला न हो। सही जवाब, सही तथ्य या देश की सही तस्वीर से इस गिरोह को बदहज़मी है। इसका मुख्य काम, या कहें कि हुक्का-पानी का जुगाड़ फर्ज़ी नैरेटिव बिल्डिंग, काल्पनिक डर, झूठे आँकड़े, और देश में लगातार ‘नफ़रत का माहौल’ बनाने का पूरा सामान मुहैया कराकर ही चल रहा है।
फर्जी ‘नफरत का माहौल’ तैयार करने के लिए ये किसी भी हद तक जा सकते हैं। यहाँ तक कि ये बहुत होशियारी से इतिहास से उन घटनाओं को गोल कर सकते हैं, जो इनके बर्दास्त करने लायक नहीं है या इनके अजेंडा को पलीता लगा सकता है और उन घटनाओं को चस्पा कर सकते हैं जिससे इनका मतलब सधता हो। इसके लिए अगर ‘कुछ भी’ करना पड़ेगा तो यह वामपंथी बुद्धिजीवी और पक्षकार ‘निष्पक्ष’ मीडिया गिरोह पीछे नहीं हटने वाले, फिलहाल, ऊपर के सभी सवालों में फिर से आग लगाने की कोशिश जारी है।
मुद्दे तलाश लिए गए हैं। गिरोह के सदस्य ‘कच्चा माल’ इकठ्ठा करने के लिए स्टूडियों के साथ ही, सड़कों पर भी निकल चुके हैं और इस बार इन्हे ऑक्सीजन मिला है दो मुद्दों से एक झारखण्ड में एक चोर तबरेज़ को भीड़ द्वारा पीटकर मार देने से और दूसरा, हाल ही में ‘तीन तलाक़‘ पर बहस को अपने अंजाम तक पहुँचाने की कवायद को नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा आगे बढ़ाने से।
आप आँकड़ों में जाकर देखेंगे तो पता चलता है कि ये समस्याएँ नई नहीं हैं, लेकिन समाधान की तरफ बढ़ने वाला नेतृत्व ज़रूर इस बार दृढ़ है और यही वजह कि ये आज तक इसे ‘हिंदुत्ववादी सरकार’ कहकर गाली देते आए हैं। अब डर इस बात का है कि कहीं उन्हें उन पीड़ित महिलाओं का भी समर्थन न मिल जाए, जिससे इनका पूरा प्रोपेगैंडा मशीनरी और नैरेटिव की जड़ों में मट्ठा पड़ सकता है, इसलिए इनका बिलबिलाना एक बार फिर से चालू हो गया है।
हाल ही में जिस ‘डरा हुआ शांतिप्रिय’ के नैरेटिव को हवा दी जा रही थी, जब उसी समुदाय के पिछड़ेपन पर पीएम नरेंद्र मोदी ने चर्चा करते हुए कॉन्ग्रेस काल के एक मंत्री के स्टेटमेंट को कोट करते हुए कहा कि ‘कैसे कॉन्ग्रेस चाहती थी कि मुस्लिम गटर में रहें’ इस पर कॉन्ग्रेस से सवाल करने बजाए इसे इस तरह प्रोजेक्ट किया जा रहा कि पूर्ण बहुमत की बीजेपी सरकार अल्पसंख्यकों को ख़त्म कर देना चाहती है, उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बना देना चाहती है, आदि-इत्यादि…..
इसकी पहली कड़ी में बात करें तो प्रोपेगेंडा वेबसाइट “The Wire” की, जिसका मक़सद ही अब सिर्फ पत्रकारिता के नाम पर नफ़रत और सत्ता विरोधी लहर पैदा करना रह गया है, ने देश में अल्पसंख्यकों अर्थात मुस्लिमों, नहीं! नहीं! बल्कि ‘डरा हुआ शांतिप्रिय’ पर वैचारिक समर्थन के लिए पूर्व राजनीतिज्ञ और अब खुद को ‘कुरान का तालिब’ अर्थात विद्यार्थी बताने वाले आरिफ मुहम्मद खान से इंटरव्यू करते हुए उनसे अपने अजेंडे के अनुरूप जवाब पाने की कोशिश में प्रोपेगेंडा मास्टर ‘द वायर’ की पत्रकार आरफा खानम शेरवानी को बहुत ज़लील होना पड़ा।
जल्दी में, आरिफ़ मुहम्मद खान के परिचय में इतना बता दूँ कि आरिफ साहब ने शाहबानों तीन तलाक़ मामले में राजीव गाँधी द्वारा सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट देने के कारण, उनकी मुख़ालफ़त करते हुए राजीव गाँधी मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया था। उनसे जब पत्रकार आरफा ने अपने अजेंडे को आगे बढ़ाते हुए सवाल किया कि क्या नरेंद्र मोदी सरकार में देश का समुदाय विशेष ‘बेहद डरा हुआ’ है? तो समझने में देर नहीं लगी कि इस पूरे इंटरव्यू का उद्देश्य क्या है। चलिए तेजी से कुछ सवालों और उनके बेहद सुलझे, दृढ़ और तार्किक जवाबों को आपके सामने रखता हूँ फिर आपसे पूछूँगा कि क्या है वाकई देश, हिंदुत्व और देश के वर्त्तमान नेतृत्व की वास्तविक तस्वीर….
आरफ़ा खानम (AK): अपने पहले ही स्पीच में प्रधानमंत्री मोदी ने क्यों कहा कि ‘देश का मुस्लिम गटर में है।’ क्यों एक विशाल जीत हासिल करने के बाद 33 साल के बाद यह कहा गया? जबकि मोदी को बहुत कम या न के बराबर मुस्लिमों का सपोर्ट हासिल है, यहाँ तक कि उनके 303 सांसदों में कोई भी समुदाय विशेष नहीं है तो क्यों वह लगातार मुस्लिमों और कॉन्ग्रेस पर बात कर रहे हैं?
आरिफ़ मोहम्मद खान (AMK): आप दोनों चीज़ों को गलत तरीके से मिला रही हैं, कॉन्ग्रेस या मोदी की विजय दोनों दो चीजें हैं। थम्पिंग मेजोरिटी (बड़ी जीत) इसलिए मिली है कि देश के लोगों ने उन्हें पसंद किया। कॉन्ग्रेस विपक्ष में है इसलिए उस पर बात होगी। सत्ता पक्ष विपक्ष और विपक्ष सत्ता पक्ष को निशाने पर लेगा, यह तो प्रक्रिया का हिस्सा है और यह लगातार चलता रहता है और यह लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है।
AK: उन्हें क्यों इसे बार-बार उठाना पड़ रहा है?
AMK: यह नया नहीं है। यह बेहद सामान्य है लोकतंत्र में यह कभी नहीं रुकना चाहिए। प्रधानमंत्री इस मुद्दे को (तीन तलाक़) खुद लेकर नहीं आए। वह एक पुराने इंटरव्यू के बारे में बात कर रहे हैं जहाँ एक कॉन्ग्रेस के मंत्री (आरिफ़ मुहम्मद खान) ने शाहबानो मामले में अपनी ही सरकार के खिलाफ स्टैंड लिया था। और यहाँ याद दिलाना ज़रूरी है कि कैसे कॉन्ग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण के चक्कर में तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिए कानून ले आई। उसे सामान्य मुस्लिमों की चिंता नहीं थी बल्कि उच्च वर्गीय मुस्लिमों को लाभ पहुँचाना था।
AK: शाहबानों पर फैसले को 1986 में उलट दिया गया था और अब मोदी सरकार तीन तलाक़ पर पहला बिल लाने जा रही है। आप अभी भी 1986 में अटके हैं?
AMK: क्या 1986 में जो समस्या थी, सुलझ गई है?
AK: लेकिन परिस्थितियाँ बदल गई हैं।
AMK: आप खुद को ही कंट्राडिक्ट कर रही हैं। आप कह रही हैं कि पहला बिल पेश हो रहा है उस समस्या पर जो शाहबानों मुद्दे को लाइमलाइट में लेकर आया था। शाहबानों को तीन तलाक़ दिया गया था या अयोध्या का मुद्दा ही ले लें, क्या ये मुद्दे सुलझ गए हैं?
AK: मोदी सरकार चाहती है कि हम इन्हीं मुद्दों में उलझे रहें।
AMK: वापस उसी मुद्दे पर आइए, क्या जो समस्या 1986 में उठी थी वह सुलझ गई है। 1986 में जो हुआ वह देश को पुनः 1947 में लेकर चला गया। जो नफ़रत 1947 में बोई गई थी वही, क्या आपको पता है कि 50 के दशक में कितने लोगों की लिंचिंग की गई थी। लाखों लोग मारे गए थे। तारीख भुलाकर आप खुद को धोखा दे रही हैं।
AK: 1947 की राजनीति अलग थी और 2019 की अलग है फिर आप अभी भी कह रहे हैं कि मुस्लिमों को हिंदुत्व की राजनीति से डरना नहीं चाहिए।
AMK: पहले आप मेरे सवाल का जवाब दीजिए। यदि 1986 में पैदा हुई समस्या अभी भी बनी हुई है, जो समस्या पर्सनल लॉ बोर्ड ने देश में पैदा की थी, वह आज भी प्रासंगिक है। 6 फरवरी को राजीव गाँधी ने मुझसे कहा था कि अयोध्या में ताला खुलने का कोई भी मुस्लिम नेता विरोध नहीं करेगा। मैंने पूछा कैसे तो उन्होंने कहा कि मैंने सभी को ताला खोलने की सूचना दे दी है। (यहाँ आरिफ मोहम्मद में समस्या की जड़ एक गैर अनुभवी प्रधानमंत्री का होना बताया)
AK: 1986 का मुद्दा अब क्यों?
AMK: क्योंकि अभी तक सुलझा नहीं है, UPA 10 साल बीच में भी सत्ता में रही तब भी उसने इस समस्या को क्यों सॉल्व नहीं किया?
AK: क्योंकि कुछ दूसरे मुद्दे थे, कुछ समिति बनाई गई थी। (यहाँ निष्पक्ष पत्रकार खुलकर पक्षकारिता पर उतर गई हैं)
AMK: तो क्या हुआ?
AK: मुद्दों की पहचान की गई। (जैसे कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता हों)
AMK: मुद्दे बहुत पहले पहचान लिए गए थे, कृपया लोगों को गुमराह मत कीजिए।
AK: क्या अभी की मोदी सरकार और कॉन्ग्रेस के बीच कोई अंतर नहीं है?
AMK: शाह बानो के बाद, शहाबुद्दीन ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था, जिसके बाद ‘सैटेनिक वर्सेस’ को बैन कर दिया गया। मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि बैन लगाने का क्या उद्देश्य था? बैन लगाया गया लेकिन कोई भी किताब जब्त नहीं की गई बल्कि बैन के बाद 10000 किताबें खान मार्किट में बेची गई। इस किताब को बैन करने के पीछे की मंशा क्या थी? आप क्या इस डुअलिटी से सहमत हैं? पिछले पाँच साल में कोई भी दंगा देश में नहीं हुआ।
AK:जो छोटे-मोटे हुए उनका क्या?
AMK: मैंने कहा कि ये सब नया नहीं है।
AK: लेकिन किसी भी चुनाव से पहले दंगे होते हैं। आपको याद होगा ‘2013 का मुजफ्फरनगर दंगा’ जबकि दूसरी पार्टी (कॉन्ग्रेस) सत्ता में थी। उस समय के ऐसे बहुत से प्रमाण हैं कि बीजेपी के पदाधिकारी और सांसद उसमें शामिल थे, जिन्हें अब प्रमोट कर मंत्री बना दिया गया है।
AMK: किसकी ज़िम्मेदारी थी कि उत्तर प्रदेश में उन दंगों को रोके?
AK: लेकिन,यदि जमीनी स्तर पर देखा जाए तो….
AMK: अमेजिंग, भीड़ में आखिर ये नफ़रत पैदा ही क्यों हुई?
AK: तो आपके कहने का मतलब है कि साम्प्रदायिकता यूँ खुलेआम बढ़नी चाहिए?
AMK: ऐसा आप कह रही हैं?
AMK: 6 महीने पहले ही गुलाम नबी आज़ाद अलीगढ़ के मीटिंग में कह रहे थे कि देश में साम्प्रदायिकता इतनी बढ़ गई है कि जो कैंडिडेट जहाँ 80% तक मुझे बुलाया करते थे उन्होंने अब मुझे बुलाना बंद कर दिया है। क्या वे सभी बीजेपी के कैंडिडेट थे जो उन्हें बुलाते थे? कौन सी पार्टी सांप्रदायिक हो चुकी है?
AK: तो क्या आप इस बात से सहमत हैं कि देश में साम्प्रदायिकता बढ़ रही है?
AMK: हमारा देश सांप्रदायिक नहीं हो रहा है। जो लोग सिर्फ एक ही समुदाय की बात करते रहें और इतने अदूरदर्शी थे कि उन्हें यह भी नहीं पता कि देश इस पर प्रतिक्रिया देगा। जो नारे लग रहे हैं, किसने उन नारों को ईजाद किया?
AK: क्या बहुसंख्यकों की साम्प्रदायिकता अल्पसंख्यकों की साम्प्रदायिकता के प्रति प्रतिक्रिया है?
AMK: अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग मत करिए, मैंने इस शब्द का प्रयोग नहीं किया है और न करूँगा।
AK: मोदी का दूसरा कार्यकाल चल रहा है, इसमें भारत में मुस्लिमों का भविष्य क्या है?
AMK: प्रश्न कि मुस्लिमों का भारत में भविष्य क्या है? जो भविष्य भारत का है वही वहाँ के लोगों का है, जिसमें मुस्लिम भी शामिल हैं।
AK: क्या उनकी पहचान का कोई महत्त्व नहीं है?
AMK: कौन सी पहचान?
AK: यह मुद्दे, उनकी पहचान से जुड़ी है?
AMK: क्या मेरी पहचान यह होनी चाहिए कि मैं अपनी पत्नी को तीन तलाक़ देकर घर से बाहर कर दूँ? क्या यह होनी चाहिए कि क्षमता एक भी पत्नी को संभालने की न हो और आगे बढ़कर तीन और रखनी चाहिए की वकालत करूँ?
AK: लोग अपनी चिंता ज़ाहिर कर रहे हैं कि भारत ‘सेक्युलर राष्ट्र’ से ‘हिन्दू राष्ट्र’ में तब्दील होता जा रहा है। क्या आप सहमत हैं?
AMK: क्या आपने कभी उन देशों का विरोध किया जो इस्लामिक हैं?
AK: भारत के सन्दर्भ में बात कीजिए?
AMK: जब विश्व एक ग्लोबल विलेज है और आप ‘हिन्दू राष्ट्र’ से क्या समझ रही हैं?
AK: जहाँ अल्पसंख्यक, मुस्लिम या ईसाई दूसरे दर्जे के नागरिक हों।
AMK: यह विचार केवल दूसरे धर्मों में है। खासतौर से मुस्लिमों में जहाँ अहमदिया, बरेलवी, देवबंदी, शिया, सुन्नी सब एक दूसरे को दोयम दर्जे का मानते हैं या ख़ारिज करते हैं। हिंदुत्व में दूसरे दर्जे के नागरिक का कोई विचार नहीं है। यहाँ कोई भी ‘धिम्मी’ नहीं होता और किसी को भी ‘जजिया’ के लिए नहीं कहा जाता।
AK: आप ‘हिन्दू सुप्रीमेसी’ से इनकार कर रहे हैं?
AMK: इस देश का सबसे छोटा अल्पसंख्यक पारसी, उनका भी संसद में कोई प्रतिनिधि नहीं है। वह प्रतिनिधित्व के लिए नहीं रो रहे? कितने ईसाई हैं इस देश में?
AK: लेकिन, अब आप इतिहास भूल रहे हैं, कैसे बहुत सारे गरीब लोग मुस्लिम ही हैं……
AMK: कैसे वे लोग इतने गरीब हुए? सर सैयद ने कहा था कि हमें कोई भी गरीब नहीं बना सकता। जब अंग्रेजों ने यहाँ इंग्लिश मीडियम स्कूलों की शुरुआत की तो उसके कुछ साल बाद ही 8000 मौलवी इकट्ठे होकर विरोध को निकल पड़े कि इंग्लिश स्कूल इस्लाम के खिलाफ हैं। तो कौन है आज मुस्लिमों के गरीब होने का ज़िम्मेदार?
AK: लेकिन यह तो 1947 से भी पहले की बात है?
AMK: यह दृष्टिकोण अभी भी जीवित है। मैं देवबंद के बहसों को दिखा सकता हूँ कि किस तरह आज भी वे आधुनिक शिक्षा को हतोत्साहित करते हैं।
AK: आज जिस साम्प्रदायिकता, संकीर्णता की बात कर रहे हैं मैं उससे असहमत नहीं हूँ, यह दोनों समुदायों में है। अंतर इस बात का है कि जो ‘हिंदुत्व की राजनीति’ में विश्वास करते हैं वह सत्ता में हैं।
AMK: आपकी समस्या यह है कि एक पत्रकार होने के नाते आप बार-बार मेरे मुँह में शब्द ठूँसने की कोशिश कर रही हैं।
AK: एक और सवाल, सबसे बड़ी समस्या क्या है देवबंद या नागपुर?
AMK: मेरी लड़ाई खुद के खुदगर्जी से है न कि दूसरों के विरुद्ध, समझने की कोशिश करिए यदि आप समझ सकती हों। आपको याद होगा कि आपने ट्विटर पर लिखा था, “मैं होली खेलूँगी बिस्मिल्लाह करके” याद करिए फिर क्या हुआ था? मैंने सारे कमेंट पढ़े थे। यह इनटॉलेरेंस कहाँ से आ रही है?
AK: मैं सहमत हूँ कि दोनों तरफ संकीर्णता है।
AMK: लेकिन हमेशा हमला दूसरी तरफ ही करुँगी। लेकिन, खुद के अंदर, अपनी कमियों की तरफ नहीं झाँकना है। क्योंकि दूसरों पर उँगली उठाना आसान है।
AK: मैं देख रही हूँ आप लगातार दूसरे तरफ की संकीर्णता और फ़ण्डामेंन्टलिज़्म को इग्नोर कर रहे हैं जिसे सरकार का संरक्षण प्राप्त है।
AMK: आप लड़िए, मैं तो कहूँगा कि यह वह देश हैं जहाँ साईं बाबा के मंदिर पूरे देश में हैं। साईं बाबा का हर भक्त जानता है उनके माता-पिता मुस्लिम थे। लेकिन लोगों की उनमें आस्था को देखते हुए उन्हें ‘अवतार’ घोषित किया गया, उनकी पूजा होती है। यदि आप इस देश के लिए लाभकारी हैं तो आपको यहाँ एक पायदान ऊपर रखा जाएगा, भगवान की तरह।
इस तरह से अंततः, ‘वायर’ का सारा अजेंडा धरा का धरा रह गया। ‘डरा हुआ शांतिप्रिय और ‘दोयम दर्जे की नागरिकता’ की थ्योरी को इंटरव्यू से मान्यता नहीं मिली। साथ ही प्रोपेगेंडा पत्रकार को खुद यह स्वीकार करना पड़ा कि वो आपके बहुत से विचारों से असहमत है, फिर भी उनके मुँह में लगातार शब्द ठूँसकर सहमति ढूँढने की कोशिश हुई। (क्योंकि उनका जवाब तो गिरोह के अजेंडा को शूट ही नहीं कर रहा था।)
आरिफ मुहम्मद के तेवर और तार्किक जवाबों ने ‘The Wire’ के प्रोपेगेंडा आधारित सवालों को एक साइड कर वह सब उजागर कर दिया जो सत्य है और कहना ज़रूरी भी। क्योंकि इस बार सामने कोई ‘मुस्लिम नेता’ नहीं बल्कि इस देश को प्यार करने वाला, ‘डरा हुआ शांतिप्रिय’ नहीं बल्कि वह था जिसे इस देश की मिट्टी ने, देश की ज्वलंत समस्याओं ने, तत्कालीन अनुभवहीन सत्ता के खिलाफ मुखालफत की ताकत दी।
वह शक्ति और ईमानदारी आज भी कायम है, जिसकी बदौलत डंके की चोट पर वह यह कह सके कि ‘अगर आपको यहाँ डर लग रहा है तो क्या आप पाकिस्तान में रहना चाहेंगी, जहाँ आए-दिन मस्जिद में बम फेंके जा रहे हैं। क्या यमन या सीरिया में….या किसी भी इस्लामिक देश में’…. वायर की पत्रकार को जवाब नहीं सूझा।
कहने का तात्पर्य यह है कि इस देश से ज़्यादा सहिष्णु देश दुनियाँ के मानचित्र में ढूँढना मुश्किल है। इस देश ने कभी भी किसी और का हक़ नहीं छिना। इस देश ने अपने लोगों को बम बाँधकर जेहाद के नाम पर मानवता की हत्या करना नहीं सिखाया। इस देश ने सम्पूर्ण विश्व को न सिर्फ वसुधैव कुटुंबकम का पाठ पढ़ाया बल्कि प्राचीन काल से यही इस देश के निरंतर फलने-फूलने का मन्त्र भी रहा। आज जिसे ‘हिंदुत्व’ या ‘हिन्दू राष्ट्र’ कहकर बदनाम करने की कोशिश की जा रही है उस हिंदुत्व ने, उस सनातन परम्परा के वाहकों ने कभी अपनी संतानों को ‘दोयम दर्जे’ का नहीं समझा।
माननीय गिरोहों, बंद करिए ना, ये नफ़रत का कारोबार, बंद करिए आपराधिक घटनाओं में भी मुस्लिम एंगल ढूँढ़कर साम्प्रदायिकता का रंग देना। लाल चश्मे को साइड रखकर देखिए यह देश हर रंग से सराबोर था, है और रहेगा। निरंतर विकसित होने का जेनिटिकल कोड इस धरा में इस तरह गुम्फित है कि वह चंद लोगों द्वारा फैलाए गए प्रोपेगेंडा से नष्ट नहीं होने वाला।
आज सोशल मीडिया के दौर में जागरूकता बढ़ी है, लोगों की समझ में भी इजाफा हुआ है। वायर और अन्य प्रोपेगेंडा मशीनरी को यह समझना होगा कि और कितना ज़लील होना चाहते हैं। क्योंकि, यह पहली बार नहीं है जब ऐसी जलालत से सामना हुआ हो। अब भी समय है, यह नफरत और ‘व्यक्ति विशेष’ (मोदी) से घृणा की पत्रकारिता बंद कर, देश के उत्थान के लिए कुछ ज़रूरी मुद्दे उठाइए, जिसमें दम हो, जो जायज हो, सरकार को कंस्ट्रक्टिव सपोर्ट भी दीजिए। बाकि, जनता रेत में सिर गाड़े नहीं खड़ी है। देश के लोगों की सब-पर नज़र है जो उसकी उम्मीदों पर खरा उतरेगा वह राज करेगा नहीं तो…. आप खुद ही जानती हैं कि इस तरह की पत्रकारिता आपको कहाँ ले जाने वाली है।
हाँ, ऊपर के जो कुछ सवाल रह गए वह आप पर छोड़ता हूँ। अपने आस-पास नज़र रखिए, सरकार के कार्यों पर नज़र रखिए जवाब मिल जाएगा। जवाब तो आपके पास पहले से भी है, बस खुद को टटोलिए, इन वायर, स्क्रॉल, प्रिंट, NDTV आदि-इत्यादि जैसे प्रोपेगेंडा चैनलों और पोर्टलों को नहीं क्योंकि ये पत्रकारिता के नाम पर ख़बर नहीं डर, साम्प्रदायिकता, नफ़रत, घृणा, संकीर्णता… और न जाने क्या-क्या, का ज़हर बेच रहे हैं। निष्पक्ष ‘पक्षकार’ ‘महर्षि’ रवीश कुमार ने शायद इन्हीं के लिए कहा था कि इन्हें देखना-पढ़ना-सुनना बंद कर दीजिए, वह कर चुके हैं और अब कहा जा रहा है कि वह धीरे-धीरे ठीक हो रहे हैं तो अब बारी आपकी है….. चुन लीजिए बीमारी या स्वास्थ्य, नफ़रत या प्रेम, पतन या उन्नति…. चाभी आपके हाथों में है।
गुरुवार को, वेदांता के वरिष्ठ वकील, सी आर्यमा सुंदरम, ने मद्रास उच्च न्यायालय को बताया कि चीनी कंपनियों ने स्टरलाइट के विरोध प्रदर्शन को फंड दिया था जिसके परिणामस्वरूप थिपुकुडी में SIPCOT में अपनी तांबा गलाने की इकाई को बंद कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि ये चीनी कंपनियाँ भारतीय तांबा बाजार (कॉपर मार्केट) पर कब्ज़ा करने में रुचि रखती थीं।
सुंदरम ने तमिलनाडु सरकार द्वारा तूतीकोरिन में अपनी तांबा गलाने की इकाई को बंद करने के आदेश को चुनौती देते हुए ये आरोप लगाए। उन्होंने डिवीज़न बेंच को बताया, “इन कंपनियों ने स्टरलाइट के ख़िलाफ़ आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन को बढ़ावा दिया और फंड भी दिया। तांबे के लिए भारत का आयात बिल $ 2 बिलियन है, यह माँग स्टरलाइट द्वारा पहले से की जा रही थी।”
उन्होंने कहा कि स्टरलाइट भारत के तांबे की माँग का लगभग 38% आपूर्ति कर रहा था। संयंत्र को बंद करने के दबाव में, यह माँग विदेशी कंपनियों द्वारा पूरी की गई।
बाद में सुंदरम ने बताया कि SIPCOT औद्योगिक परिसर में 63 कंपनियाँ थीं। इसमें 10 लाल श्रेणी की कंपनियाँ शामिल थीं जो ख़तरनाक सामग्री को संभालने का काम करती थीं।
इसके अलावा सुंदरम ने इस बात पर भी संदेह व्यक्त किया कि स्टरलाइट विरोधी- प्रदर्शनकारियों ने 20,000 लोगों को इकट्ठा करने का प्रबंधन कैसे किया। सुंदरम ने कहा कि 13 लोगों की मौत के बाद प्लांट को सरकार ने बंद कर दिया था। फिर भी, अदालत में अपनी दलीलों में, सरकार ने इसका कारण पर्यावरण प्रदूषण बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि सीबीआई, जो अब तक फायरिंग की जाँच कर रही थी, अब तक कंपनी को जाँच के लिए नहीं बुलाया गया। इसके बावजूद, दंड स्वरूप कंपनी को बंद करने का आदेश दे दिया गया।
कल (27 जून), वेदांता ने मद्रास उच्च न्यायालय को बताया था कि निहित स्वार्थ वाले एनजीओ और कार्यकर्ताओं ने स्टरलाइट विरोधी-प्रदर्शनों का आयोजन किया था। स्टरलाइट विरोधी प्रदर्शन के कारण पुलिस ने फायरिंग की जिसमें 13 प्रदर्शनकारी मारे गए। इसके चलते मई 2018 में प्लांट बंद हो गया था।
एनजीटी ने साबित किया था कि कंपनी सभी पर्यावरण मानदंडों का पालन कर रही थी और सरकार को इसे फिर से खोलने का निर्देश दिया। हालाँकि, मद्रास उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया और संयंत्र को फिर से खोलने के आदेश को वापस ले लिया।