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सांसद नुसरत जहाँ के सिंदूर, मेंहदी, वंदे मातरम पर इस्लामिक चिरकुट नाराज, दी गंदी गालियाँ

इस बार के लोकसभा चुनाव में तमाम चर्चा के बीच एक सांसद भी चर्चा का विषय बनी रहीं। कारण चाहे राजनीति में ग्लैमर कहिए या फिर पार्टी, लेकिन अभिनेत्री से सांसद बनीं TMC की सांसद नुसरत जहाँ लगातार मीडिया में बनी हुई हैं। नुसरत ने बंगाल की बशीरहाट लोकसभा सीट से जीत हासिल की।

TMC की 2 सांसद, नुसरत जहाँ और मिमी चक्रबर्ती, ने मंगलवार (जून 25, 2019) को लोकसभा सदस्य के रूप में शपथ ग्रहण की। इस दौरान उन्होंने जय हिंद-वंदे मातरम-जय बांग्ला के नारे भी लगाए। साथ ही, लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिड़ला के पैर भी छुए। अपनी शादी के चलते नुसरत जहाँ 17 और 18 जून को सदन में मौजूद नहीं थीं। ऐसे में उन्होंने मंगलवार (जून 25, 2019) को शपथ ग्रहण की।

सिन्दूर-शपथ-वन्दे मातरम: इन 3 वजहों से कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं नुसरत

शपथ लेने के लिए लोकसभा पहुँचीं नुसरत ने गुलाबी और सफेद रंग की खूबसूरत साड़ी पहन रखी थी। वहीं, उनके दोनों कलाइयाँ चूड़ियों से भरी हुई थीं। माँग में सिंदूर और हाथों में मेहंदी सजी हुई थी। उन्होंने अपने शपथ भाषण की शुरुआत ‘अस-सलाम वालेकुम, नमस्कार’ से की। इसके बाद उन्होंने पूरा भाषण बांग्ला में दिया।

उसके बाद नुसरत अचानक से कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गई हैं। कारण है उनका एक जैन व्यक्ति से शादी कर लेना और उसके बाद संसद में वन्देमातरम के साथ शपथ लेना। अक्सर देखा गया है कि इस्लामिक कट्टरपंथियों की ओर से वन्दे मातरम कहने के प्रति विरोध का स्वर रहा है। इसका सबसे ताजा उदाहरण भी इसी बार, इसी संसद में देखने को मिला जब लोकसभा में सांसद पद की शपथ लेते वक्त समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान ने ‘वन्दे मातरम’ कहने से इनकार कर दिया।

उन्होंने वन्दे मातरम को ‘इस्लाम के खिलाफ’ करार दिया है। लेकिन वन्दे मातरम को इस्लाम के खिलाफ करार देने वाले वो अकेले व्यक्ति नहीं हैं। नुसरत जैन के खिलाफ सोशल मीडिया पर लगातार आपत्तिजनक व्यंग्य और टिप्पणियाँ की जा रही हैं। उन्हें हिन्दू से शादी करने के लिए भद्दी गालियों के साथ ही जन्नत में जगह ना मिलने तक की दुआएँ की जा रही हैं।

19 जून को नुसरत जहां रूही जैन कोलकाता के बिजनेसमैन निखिल जैन से शादी के बंधन में बंध गईं। उन्होंने तुर्की में शादी की। इस वजह से नुसरत कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं।

दलित को पीड़ित दिखाना हो तब वह ‘दलित’ है और अपराधी दिखाना हो ‘हिन्दू’ बताया जाएगा

आजकल एक नया ट्रेंड सा चल पड़ा है। कुछ नेताओं ने अंग्रेजों के ‘फूट डालो-राज करो’ की तर्ज पर हिन्दुओं को आपस में ही बाँटने की कोशिशें शुरू कर दी है। बाँटने और राज करने की राजनीति के सिरमौर बन चुके नेताओं ने मुस्लिमों और दलितों को एक साथ रख कर हिन्दुओं को उनसे अलग रखना शुरू कर दिया है। यह ऐसा ही है जैसे हाथी की सूँड़ में अगर चोट लगती है तो कहा जाए कि ये चोट हाथी को थोड़े लगी है, उसकी सूँड़ को लगी है। ये प्रयास इसीलिए किए जा रहे हैं ताकि दलित ख़ुद को हिन्दुओं से अलग देखने लगें, जो कि असंभव है। यह ऐसा ही है, जैसे क़ुरैशियों को कहना कि तुम मुस्लिम नहीं हो। यह ऐसा ही है, जैसे पठानों और मुस्लिमों को अलग कर के देखना।

यह सब चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है। इसे समझने के लिए कुछ दिन पीछे कर्नाटक चुनाव से पहले वाले समय को देखने चलते हैं। उस दौरान राज्य के मुख्यमंत्री रहे सिद्धारमैया ने लिंगायत और वीरशैव समुदाय को अलग रिलिजन के रूप में का मान्यता देने की योजना बनाई। इसका सीधा अलक्ष्य था- लिंगायतों को यह एहसास दिलाना कि वे अलग रिलिजन से सम्बन्ध रखते हैं और वे हिन्दू धर्म के अंतर्गत नहीं आते। ‘अलग पहचान’ की इस राजनीति को केंद्र सरकार ने रिजेक्ट कर दिया। मामला हाईकोर्ट में गया और वहाँ मोदी सरकार ने साफ़-साफ़ कहा कि बसवन्ना के अनुयायी अलग धर्म में नहीं आते।

कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के भीतर आने वाले अधिकतर लोग अनुसूचित जाति के अंतर्गत आते हैं और अगर उन्हें हिन्दू धर्म से अलग दर्जा दे दिया जाता तो वे अनुसूचित जाति का दर्जा भी खो देते। लिंगायत समुदाय के गुरु माने जाने वाले बसावा या बसवन्ना 12वीं सदी के भक्ति काल के एक लोकप्रिय कन्नड़ कवि थे। लिंगायत समुदाय का संस्थापक उन्हें ही माना जाता रहा है। बसवन्ना भगवान शिव के परम भक्त थे। अब आप सोचिए, शिवभक्तों को हिन्दुओं से अलग दर्जा देने की कोशिश करने वाले ये नेता दलितों को अलग साबित करने के लिए क्या नहीं करेंगे? एपीजे अब्दुल कलाम ने 2003 में वाजपेयी काल के दौरान संसद में बसावा की प्रतिमा का अनावरण किया था, प्रधानमंत्री मोदी ने 2015 लंदन में टेम्स नदी के किनारे उनकी प्रतिमा का अनावरण किया।

लेकिन, भाजपा के कार्यकाल में लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने की कोशिश नहीं की गई। ठीक ऐसे ही, आज मंगलवार (जून 25, 2019) को राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आज़ाद ने हिन्दुओं व दलितों को अलग-अलग रखते हुए उन्हें ऐसे साबित करने की कोशिश की, जैसे हिन्दू और मुस्लिम अलग धर्म और मज़हब हैं। उन्होंने उस कथित पुराने भारत की बात की, जहाँ ‘दलितों और हिन्दुओं’ को एक-दूसरे की फ़िक्र थी। अब ‘दलितों और मुस्लिमों’ पर कथित अत्याचार की बात करते हुए ‘डर का माहौल’ पैदा करने की कोशिश चल रही है ताकि ऐसा प्रतीत हो कि अत्याचार करने वाले हिन्दू हैं और पीड़ित मुस्लिम और दलित। जबकि असल में, अगर अत्याचारी हिन्दू है तो दलित भी उसके अंदर आ गया।

बात-बार पर संविधान की बात करने वाले ऐसे नेताओं व पत्रकारों की जमात को सबसे पहले संविधान की याद दिलानी ही ज़रूरी है। भारत में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों को दलित कहा जाता है। अगर ये नेता मानते हैं कि दलित और हिन्दू अलग-अलग हैं तो फिर मुस्लिमों में किसी जाति को एससी-एसटी का दर्जा क्यों नहीं प्राप्त है? The Constitution (SC) Order, 1950 के मुताबिक़, हिन्दू, जैन और बौद्ध- इन तीन धर्मों के लोगों को छोड़ कर किसी अन्य धर्म से सम्बन्ध रखने वाले किसी भी व्यक्ति को एससी केटेगरी के अंदर नहीं रखा जा सकता। कहने को तो अगर अर्थ लगाया जाए तो हर धर्म के दबे-कुचले लोगों को दलित कहा जा सकता है क्योंकि दलित शब्द का संविधान में कहीं वर्णन नहीं है।

अगस्त 7, 2018 को भारतीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक आदेश जारी कर मीडिया को ‘दलित’ शब्द के बदले ‘अनुसूचित जाति’ का प्रयोग करने कहा था। यहाँ बात यह है कि आख़िर हिन्दुओं में फूट डालकर अगर वोट मिल भी जाते हैं तो क्या इससे देश और समाज नहीं बँट जाएगा? जो नेता इस तरह के कार्य करते हैं, उन्हें अंग्रेजों से अलग कैसे माना जाए? उदाहरण देखिए। कई मीडिया संस्थानों ने सर्वे के आधार पर यह बताया कि कैसे भारत में मुस्लिमों व दलितों पर अत्याचार हो रहा है, उनसे भेदभाव किया जा रहा है। इसी तरह बीबीसी अपने लेख में कहता है कि नरेंद्र मोदी के भारत में मुस्लिम और दलित अपनी जान के लिए चिंतित हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्था ह्यूमन राइट्स वाच ने लिखा कि हिन्दू लोग मुस्लिमों व दलितों पर अत्याचार करते हैं।

यह सब किसलिए? जो दलित हिन्दू समाज का ही अंग है, उस अनुसूचित जाति को उसके ही धर्म से अलग पहचान बनाने की कोशिश कर पूरे हिन्दू समुदाय को अलग-थलग करने की कोशिश चल रही है, जिसमें ईसाई मिशनरी, लोभी नेता और हिंदुत्व-विरोधी ताक़तों के साथ-साथ भारत विरोधी ताक़तें भी शामिल हैं। इन्हें आइना दिखाने के लिए दो ऐसी घटनाओं का ज़िक्र करना ज़रूरी है, जहाँ इनके मुँह बंद हो जाते हैं। मई 2018 में तमिलनाडु के थेनी जिले में एक दलित बस्ती में किसी वृद्ध दलित महिला की मौत हो गई। जब वे उस महिला का अंतिम क्रिया कर्म करने के लिए जा रहे थे, तभी मुस्लिमों से उनकी झड़प हुई।

दरअसल, मृत दलित महिला की शवयात्रा मुस्लिम बस्ती से गुज़र रही थी, जिसपर मुस्लिमों ने आपत्ति जताई। बाद में दोनों के बीच लाठी-डंडे से लड़ाई हुई और 30 से अधिक लोग घायल हो गए। इसे क्या कहा जाएगा? इसे हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच लड़ाई कहा जाएगा या फिर दलितों और समुदाय विशेष के बीच, ऐसा हिन्दुओं और दलितों को अलग-अलग देखने वाले विद्वानों को जवाब देना चाहिए? यह निर्भर करता है। अगर दलितों ने नुक़सान पहुँचाया तो इसे हिन्दुओं द्वारा मुस्लिमों पर अत्याचार बना कर पेश किया जा सकता है। अर्थात यह, कि यही दलित तब तो हिन्दू हो जाते हैं (जो कि सही है) जब पीड़ित कोई मुस्लिम हो और यही दलित हिन्दू तब नहीं होते जब मुस्लिमों के साथ उन्हें एक कर के बात की जाती है।

अब दूसरी घटना पर आते हैं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को 1981 में ‘अल्पसंख्यक संस्थान’ का दर्जा दिया गया, जिसे 2005 मे इलाहबाद हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। यूपीए सरकार इस निर्णय के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गई लेकिन राजग सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस अपील को वापस ले लिया। अभी हाल ही में ख़बर आई कि एससी-एसटी कमीशन ने एएमयू से पूछा है कि संस्थान अनुसूचित जाति एवं जनजाति को एडमिशन के दौरान नियमानुसार आरक्षण क्यों नहीं दिया जाता? इस विवाद पर मुस्लिमों व दलितों पर कथित अत्याचार की बात करने वाले किसका पक्ष लेंगे? एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा जब भंग कर दिया गया है तो फिर वहाँ एससी-एसटी को आरक्षण क्यों नहीं दिया जा रहा?

यकीन मानिए, अगर किसी अन्य विश्वविद्यालय में ऐसा होता तो इसे मोदी सरकार द्वारा दलितों पर अत्याचार के रूप में पेश किया जाता। यूनिवर्सिटी के कुलपति की जाति देखी जाती कि कहीं वह कथित उच्च जाति का तो नहीं है। इसीलिए, यह निर्भर करता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि पीड़ित कौन है और अपराधी किसे दिखाना है? अक्सर ख़बरों में अगर दलित परिवारों में लड़ाई हुई हो फिर भी इसे दलितों पर अत्याचार के रूप में ही पेश किया जाता है। दलित को जब पीड़ित दिखाना हो तब उसे दलित कहा जाएगा और जब उसे अपराधी दिखाना हो तो उसे हिन्दू बताया जाएगा। ध्यान दीजिए, आज ये दलितों को हिन्दू धर्म से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं, कल इनकी ज़हर बुझी तलवार ओबीसी जातियों तक पहुँचेगी और ‘मुस्लिमों और ओबीसी’ पर अत्याचार का रोना रोया जाएगा।

नक्सलियों ने जवानों को मारने का बनाया था प्लान, ‘आसमानी बिजली’ ने किया फेल

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर से बम ब्लास्ट की ख़बर सामने आई है। दरअसल, सामरी क्षेत्र के माओवादी प्रभावित क्षेत्र पुंदाग में माओवादियों द्वारा चुनाव के दौरान जवानों को निशाना बनाते हुए IED की सीरीज़ बिछाई गई थी। घटना की जानकारी मिलते ही सामरी थाना क्षेत्र से SI विनोद पासवान अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुँचने के लिए रवाना हुए, लेकिन बारिश के चलते वहाँ नहीं पहुुँच सके, लेकिन CRPF जवानों की टीम बाइक से वहाँ पहुँचने में क़ामयाब रही। इस ब्लास्ट से क्षेत्र तो ज़रूर दहल गया, लेकिन माओवादियों की मंशा पर पानी भी फिर गया।

ख़बर के अनुसार, शुक्रवार (21 जून) की शाम को बारिश के साथ आकाशीय बिजली के सम्पर्क में आने से सड़क पर बिछाए गए सभी 56 IED बम ब्लास्ट हो गए। इतनी भारी मात्रा में IED बिछाने का मक़सद किसी बड़ी घटना को अंजाम देना था। इस घटना के बाद सामरी पुलिस के साथ सामरी, सबाग व बंदुरचुआ में तैनात CRPF के जवान एलर्ट हो गए हैं। फ़िलहाल सुरक्षा की दृष्टि से एक एन्टी लैंड माइंस वाहन भी ज़िले से भेजा गया है।

हालाँकि, इस बम ब्लास्ट में किसी के हताहत होने की कोई ख़बर नहीं है। जानकारी के अनुसार, बलरामपुर-रामानुजगंज ज़िले के चुनचुना-पुंदाग क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए शासन-प्रशासन द्वारा कई काम कराए जा रहे हैं। इनमें से एक सबाग से पुंदाग तक सड़क निर्माण कार्य भी है और इस कार्य में माओवादी बाधा बन रहे हैं। उन्होंने इस सड़क निर्माण कार्य में लगी मशीनों और वाहनों को आग लगा दी थी। इतना ही नहीं माओवादियों ने निर्माण कार्य में लगे इंजीनियर और मुंशी का अपहरण तक कर लिया था। 

माओवादियों ने जवानों की जान से मारने के मक़सद से कई बार उन जगहों पर IED बिछाई जहाँ से वो गुजरते हैं। कई बार इन बमों का शिकार स्थानीय चरवाहे और उनके मवेशी हो जाते हैं। ऐसी हरक़तों से माओवादियों ने सड़क निर्माण कार्य में बाधाएँ उत्पन्न की।

बिहार: बच्चों के परिजनों पर प्रशासन ने दर्ज की FIR, डर के मारे पुरुषों ने छोड़ा गाँव

एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) के कारण बिहार में बच्चों की मौत का सिलसिला जारी है। अस्पतालों में सुविधाओं की कमी है और राज्य सरकार के स्तर पर फिलहाल जो प्रयास हुए भी हैं, वे नाकाफी हैं। इन सबके बीच नेताओं के बयानों ने भी पीड़ितों का दर्द और बढ़ाया है और अब जिला प्रशासन ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिस पर चौतरफा सवाल उठ रहे हैं। जिला प्रशासन ने बच्चों की मौत और जल आपूर्ति को लेकर प्रदर्शन कर रहे 39 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

दरअसल, एईएस के कारण बच्चों की मौत और जल आपूर्ति में कमी को लेकर वैशाली जिले के हरिवंशपुर में लोग सड़क पर उतर आए थे। लोगों ने इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और जल आपूर्ति बेहतर करने और बीमारी के खिलाफ जल्द ठोस कदम उठाने की माँग की। जिला प्रशासन ने इनकी माँगें तो नहीं मानीं, मगर प्रदर्शन कर रहे 39 लोगों के खिलाफ एफआईआर जरूर दर्ज करा दी।

जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, उनके रिश्तेदारों ने कहा कि जब उनके बच्चे मर रहे हैं और उनके पास पीने तक के लिए पानी नहीं है तो हम विरोध क्यों ना करें? उन्होंने कहा, “हमारे बच्चे मर रहे हैं। पानी नहीं है। हमने इसके खिलाफ रोड घेराव किया तो प्रशासन ने हम पर केस दर्ज कर दिया। केस दर्ज होने के बाद हमारे परिवारों के पुरुष गाँव छोड़कर भाग गए हैं। घर में कमाने वाले वही थे और अब उनके न होने से हमें और दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।”

गौरतलब है कि, रविवार (जून 23, 2019) को हरिवंशपुर पहुँचे हाजीपुर के सांसद पशुपति कुमार पारस और लालगंज के लोजपा विधायक राजकुमार साह को ग्रामीणों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। बच्चों की मौत से लोग इतने गुस्से में थे कि कोई सांसद को दरवाजे पर कुर्सी तक देने को तैयार नहीं था। उग्र ग्रामीणों ने तो विधायक को बंधक भी बना लिया था। फिर बाद में जब शाह ने पीड़ित परिवारों को ₹5,000 की आर्थिक सहायता दी और साथ ही जरूरी दवाओं का वितरण किया, तब जाकर लोगों ने विधायक को जाने दिया।

प्रतापगढ़ मर्डर: हाथ-पाँव काटकर खाट से बाँधा और झोपड़ी सहित फूँक दिया गया दलित

कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के रामपुर बेला गाँव में 35 वर्षीय विनय नामक दलित व्यक्ति को देर रात उसके ही खेत में बनी झोपड़ी में जलाकर मार दिया गया था। इस घटना का पता उस समय चला था जब 17 जून की सुबह विनय की झोपड़ी से धुआँ उठता दिखाई दिया। गाँव के लोगों ने जाकर देखा तो विनय की झोपड़ी और झोपड़ी के अंदर विनय का शव बुरी तरह जल चुका था। खबरों के मुताबिक पता चता चला था कि विनय को उसकी खाट से बाँधकर जलाया गया है। साथ ही उसकी मोटरसाइकल भी उसी आग में जला दी गई।

इस घटना में पहले ग्रामीणों को लग रहा था कि ‘विशेष समुदाय’ के लोगों द्वारा इस घटना को अंजाम दिया गया है, क्योंकि एक दिन पहले ही भारत-पाक की जीत पर विनय की उनसे झड़प हुई थी, जबकि विनय के परिवार ने बताया कि विनय अपने परिवार के साथ मैच देख रहा था लेकिन उसने ऐसे किसी झगड़े के बारे में नहीं बताया।

इस मामले पर स्वराज मैगजीन की पत्रकार स्वाति गोयल ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट की, ताकि मामले के अनसुलझे सिरों पर प्रकाश डाला जा सके। स्वाति की रिपोर्ट के अनुसार विनय की इतनी बेरहमी और क्रूरता से हत्या की गई कि न केवल ग्रामीण बल्कि मेडिकल प्रोफेशनल्स भी उसे देखकर हैरान रह गए।

रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीणों ने बताया कि विनय का शव विखंडित हो रखा था, उसके हाथ-पाँव काट दिए गए थे और उसका शव लोहे की तार से खाट में बंधा हुआ था। विनय के भाई का कहना है कि उसे यह भी संदेह है कि विनय का गला तक काट दिया गया था। साथ ही, उसके पेट की जगह उन्हें सिर्फ़ राख़ दिखाई दे रही थी।

स्वाति के मुताबिक पट्टी पुलिस थाने के एसएचओ अखिलेश प्रताप सिंह ने बताया कि ‘अनजान’ व्यक्ति के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया गया। जाँच जारी है और पुलिस ने पूछताछ के लिए 2 लोगों को हिरासत में लिया है। इन 2 लोगों में विनय का एक साथी प्रेम सरोज भी शामिल किया है जो सूअर चराने के काम में विनय के साथ काम करता था। हालाँकि विनय के परिवार ने इस हत्या में प्रेम के नाम होने की संभावना को मना किया है क्योंकि उनके लिए वह एक परिवार जैसा है।

विनय के परिवार वालों का शक इस हत्या में उन लोगों पर जा रहा है जो उस रात 100 मीटर दूरी पर निर्माणाधीन फार्म हाउस में मांस और शराब के साथ पार्टी कर रहे थे। परिवार के शक के पीछे बहुत से कारण हैं, जिनसे गाँव वाले भी सहमति जता रहे हैं।

परिवार के शक का कारण:

  • जिस तार से विनय को बाँधा गया, बिलकुल वैसी ही तार का प्रयोग निर्माण स्थल पर किया जा रहा था।
  • ऐसा मुमकिन ही नहीं कि विनय पर इतनी क्रूरता से हमला किया गया और पार्टी कर रहे उन लोगों को सुनाई ही नहीं दिया हो।
  • फार्महाउस की तरफ़ खून के निशान मिले हैं।
  • दो लोग जो कि फार्महाउस के पार्टनर्स से संबंधित है, वो आपराधिक प्रवृति के हैं।

हालाँकि विनय के परिवार के पास फार्महाउस में पार्टी कर रहे लोगों पर इल्जाम लगाने का कोई मकसद नहीं है, उनका कहना यह भी है कि विनय की किसी के साथ कोई दुश्मनी नहीं थी, वह लोग इस बात को भी नहीं समझ पा रहे हैं कि कोई विनय की हत्या क्यों करेगा।

परिवार के शक के बारे में पुलिस का कहना है कि अभी तक उनके पास इस तरह की कोई शिकायत दर्ज नही हुई है। और ग्रामीणों का इस घटना को लेकर कहना है कि उन्होंने इस तरह का भयंकर अपराध 1998-99 के बाद देखा जब एक 5 लोगों के परिवार की अज्ञात हत्यारों द्वारा हत्या कर दी गई थी।

गौरतलब है इस गाँव की आधे से ज्यादा आबादी दलितों की है जिन्होंने जाति और सांप्रदायिक संघर्ष कभी नहीं देखे। इस घटना के बाद कई स्थानीय राजनेताओं ने परिवार से मिलकर उन्हें मदद की पेशकश की। जानकारी के अनुसार इस मामले में पुलिस के पास अब तक हत्यारों को लेकर कोई सुराग नहीं हैं और विनय के परिवार वालों के पास भी इन सवालों का कोई जवाब नहीं है कि हत्यारे कौन हो सकते हैं और विनय को मारने के क्या कारण हो सकते हैं?

स्पीकर ही नहीं हम तमिलनाडु की सरकार को भी हटाना चाहते हैं: स्टालिन

द्रमुक अध्यक्ष एमके स्टालिन ने सोमवार को धमकी दी कि पलानिस्वामी की अन्नाद्रमुक सरकार को तमिलनाडु की सत्ता से जल्दी-से-जल्दी हटाने के लिए उनकी पार्टी प्रयासरत है। हालाँकि वह राज्य की विधानसभा में स्पीकर के खिलाफ महज अविश्वास प्रस्ताव की बात कर रहे थे जिस पर 1 जुलाई को बहस होनी है, लेकिन उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि स्पीकर ही नहीं, द्रमुक पूरी सरकार को ही हटा देना चाहता है। “निर्वाचन के बिना भी सत्ता-परिवर्तन सम्भव है और द्रमुक जल्दी ही सत्ता की बागडोर छीन लेगा। स्पीकर से ज्यादा मुख्यमंत्री को हटाना जरूरी है।” स्टालिन तमिलनाडु में पानी के अभूतपूर्व संकट से निपटने में राज्य सरकार की नाकामी के खिलाफ हो रहे भारी विरोध प्रदर्शन को सम्बोधित कर रहे थे।

‘लोकतान्त्रिक नैतिकता’ से यू-टर्न 

स्टालिन का यह नया रुख द्रमुक की पहले की स्थिति के ठीक उलट है। पहले द्रमुक की नीति थी कि वह सरकार गिराने के लिए निर्वाचन के अलावा कोई रास्ता नहीं अख्तियार करेगा। यहाँ तक कि लोक सभा निर्वाचन के साथ हुए विधानसभा की सीटों के उप-निर्वाचन में भी स्टालिन ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि द्रमुक सत्ता-परिवर्तन के लिए अनैतिक तरीके नहीं अपनाएगा। लोकसभा में भी तमिलनाडु की 38 सीटों में से 37 पर अपने प्रत्याशियों को जिताने में सफल रहा था।

ऐसे में यह माना जा रहा है द्रमुक के विधानसभा निर्वाचन में जाने से कतराने का कारण विधानसभा उप-निर्वाचन हैं। लोक सभा के लिए उसी जनता द्वारा बुरी तरह नकारे जाने के बाद भी अन्नाद्रमुक 22 में से 9 सीटों पर अपने प्रत्याशियों को जिताने में कामयाब रहा था। स्टालिन शायद इसे इस रूप में देख रहे हैं कि भले ही तमिल जनता उन्हें राष्ट्रीय फलक पर राज्य के प्रतिनिधित्व के लिए बेहतर माने, लेकिन राज्य पर शासन के लिए अभी वह निर्णायक रूप से अन्नाद्रमुक सरकार से विमुख नहीं हुई है।

‘अविश्वास प्रस्ताव से घबरा गई है सरकार’  

स्टालिन का कहना है कि सरकार अविश्वास प्रस्ताव से घबरा रही है। ऐसे में 28 जून (शुक्रवार) को शुरू हो रहे विधानसभा सत्र पर निगाहें टिक गईं हैं। द्रमुक ने यह अविश्वास प्रस्ताव लोक सभा निर्वाचन के पहले पेश किया था, जब स्पीकर पी धनपाल ने अन्नाद्रमुक के बागी विधायकों की सदस्यता रद्द करने की कार्रवाई शुरू कर दी थी। स्टालिन ने मंत्रियों और अन्नाद्रमुक के पदाधिकारियों द्वारा वर्षा के लिए पूजा-पाठ कराए जाने पर भी तंज कसते हुए कहा कि यह बारिश कराने के लिए नहीं बल्कि सत्ता बचाने के लिए हो रहा है।

स्टालिन ने यह भी कहा कि उन्होंने जब इस आसन्न जल-संकट की चेतावनी एक साल पहले दी थी तो अन्नाद्रमुक सरकार ने उनकी बात अनसुनी कर दी थी। “अन्नाद्रमुक के पिछले आठ साल के शासनकाल में एक भी बड़ी पेयजल योजना पूरी नहीं हो पाई है।” 234 सदस्यों की विधानसभा में अन्नाद्रमुक के पास 119 विधायकों का साधारण बहुमत है। इसके अलावा उसके तीन विधायक बागी हैं, और तीन अन्य की निष्ठा संदिग्ध है। वहीं द्रमुक के पास 100 और उसकी गठबंधन की साथी कॉन्ग्रेस और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के पास 7 सीटें हैं। अन्नाद्रमुक ने स्टालिन के दावे को ‘दिन के ख्वाब’ कह कर खारिज कर दिया है। 

रेप, हत्या का दोषी ‘MSG’ पैरोल पर करना चाहता है ‘खेती’, जेलर और सरकार हैं इम्प्रेस्ड

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख बलात्कारी, हत्यारा गुरमीत राम रहीम एक बार फिर चर्चा में हैं। शिष्याओं के साथ दुष्कर्म के मामले में 20 साल की सजा भुगत रहे राम रहीम ने पैरोल माँगी है। राम रहीम के पैरोल मामले पर सियासी सरगर्मी भी बढ़ गई है। जेल में निरूद्ध राम रहीम द्वारा सिरसा जिले में अपनी जमीन पर खेती करने लिए पैरोल के आवेदन को जेल प्रशासन ने स्वीकार भी कर लिया है। राम रहीम की रिहाई के लिए हरियाणा सरकार ने उसके ‘अच्छे आचरण‘ का हवाला दिया है। हालाँकि, राम रहीम की रिहाई पर अंतिम फैसला कमिश्नर कोर्ट करेगा।

जेल मंत्री कृष्ण पवार ने राम रहीम को पैरोल देने की पैरवी भी कर दी है। गृह विभाग ने सिरसा और रोहतक जिला प्रशासन से इस पर रिपोर्ट माँगी है। हालाँकि, राम रहीम को पैरोल अभी मिली नहीं, लेकिन आने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए इसके सियासी संदेश जरूर तलाशे जाने लगे हैं।

इस सारे प्रकरण में सबसे हैरान कर देने वाली बात तो यह है हरियाणा की रोहतक जेल में सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख को लेकर जेल अधीक्षक ने कहा कि राम रहीम कोई हार्डकोर क्रिमिनल नहीं है और जेल के अन्दर उसका आचरण अच्छा रहा है। सिरसा जिला प्रशासन ने पैरोल देने या नहीं देने के लिए जेल अधीक्षक से राय माँगी है।

खेती करने के लिए चाहिए पैरोल

अधिकारियों ने बताया कि राम रहीम को लेकर सभी बातों का ध्यान रखकर ही उनके पैरोल की याचिका पर रिपोर्ट तैयार की जा रही है। गौरतलब है कि राम रहीम खेती करने के लिए पैरोल माँग रहा है। यह भी जाँच की जा रही है कि राम रहीम के पास कितनी जमीन है।

सेलिब्रिटी अपराधियों’ की ढाल बनती जा रही है पैरोल

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम साध्वी यौन शोषण और पत्रकार हत्याकांड मामले में रोहतक की सुनारिया जेल में सजा काट रहा है। राम रहीम को जब सजा दी जा रही थी तो हरियाणा व पंजाब में जमकर हिंसा हुई थी, कई लोगों की जाने गई थी।

शासन और प्रशासन का ‘नामी अपराधियों’ के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर एक आम बात होती जा रही है। ऐसे अपराधियों को पैरोल देने का उद्देश्य चाहे कुछ भी हो, लेकिन यह तो तय है कि कोई आदमी जब भी किसी अपराध में जेल जाता है तो उसके जेल पहुँचने से पहले उसकी पैरोल वहाँ पहुँच जाती है।

किस्सा चाहे गुरमीत राम रहीम का हो या फिर संजय दत्त जैसे लोगों का, यह पैरोल ताकतवरों का आसान हथियार साबित होती जा रही है, जिससे उन नामी अपराधियों के अपने हितों के साथ उनके ‘अच्छे आचरण’ का हवाला देने वालों के हित भी सलामत रहें।

बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त भी दिसंबर 2014 को अपनी पत्नी मान्यता की खराब तबियत का हवाला देकर बाहर आए और फिर उनकी यह पैरोल तीन बार बढ़ाई गई। इसे लेकर मीडिया में काफी सवाल भी उठे थे और यह विवाद इतना बढ़ा कि महाराष्ट्र सरकार ने पैरोल के नियम सुधारने के लिए प्रस्ताव भी सदन में रखा था।

सवाल यह है कि अपराधियों के ऐसे व्यक्तिगत कितने ही कारण हो सकते हैं जिनकी वजह से वह पैरोल लेकर खुला घूम सकता है। फिर चाहे किसी को अपने घर पर पानी की समस्या के लिए पैरोल चाहिए हो या फिर अपने बच्चे के साथ बैडमिंटन और चेस खेलने के लिए साथी की जरूरत हो और उसके पिता के अलावा उसका साथ देने वाला कोई न हो।

खैर, गुरमीत राम रहीम की पैरल ने सियासत से लेकर मीडिया में नई बहस तो छेड़ ही दी है। देखना यह बाकी है कि जिस खेती का गुरमीत राम रहीम हवाला दे रहे हैं वो कितने फल देती है।

आफताब और चाँद के बेटों ने मंदिर के पास की गोलीबारी, भजन करती महिलाओं में फैलाई दहशत

उत्तर प्रदेश के मेरठ में दिनदहाड़े गोलियाँ चलाई गईं। यह घटना मेरठ के प्रह्लादनगर थाने के पास की ही है। स्कूटी सवार 2 युवाकों ने फायरिंग की और उसके बाद भाग निकले। दरअसल, पास में ही कुटी के नजदीक एक प्राचीन मंदिर है, जहाँ महिलाएँ भजन-कीर्तन कर रही थी। इन युवाकों का इरादा उन्हें डराने-धमकाने का था। दोनों ही युवकों ने उस मंदिर के पास आकर फायरिंग की, जिससे भजन कर रही महिलाएँ दहशत में आ गईं। आरोपित का स्कूटी नंबर सीसीटीवी फुटेज में दर्ज हो गया, जिस आधार पर पुलिस ने ईदगाह चौक स्थित आशिक अली होटल के मालिक चाँद के बेटे को हिरासत में ले लिया।

आरोपितों की उम्र 18 वर्ष से कम है। एक के पिता का नाम चाँद है तो दूसरे के पिता का नाम आफताब है। आरोपितों ने न सिर्फ़ फायरिंग की बल्कि गाली-गलौज भी की। वहाँ उपस्थित लोगों के साथ गली-गलौज करते हुए ये भाग निकले। इलाक़े में तनाव फैलने से बचाने के लिए स्थानीय व्यापारियों व भाजपा नेताओं ने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई की। प्रह्लादनगर कॉलोनी के लोगों का कहना है कि क्षेत्र में छेड़छाड़ की घटनाएँ काफी बढ़ गई है। कॉलोनी में गेट लगाने की माँग के साथ लोगों ने थाना के बाहर प्रदर्शन भी किया।

आरोपितों ने पिस्टल लहराते हुए दो से तीन राउंड गोलीबारी की। दोपहर में हुई इस वारदात के बाद कुछ लोगों ने आरोपितों का पीछे भी किया लेकिन तब वे हाथ नहीं आए। इंस्पेक्टर नज़ीर अली ख़ान ने बताया कि आरोपितों द्वारा इस्तेमाल की गई बन्दूक नकली है और उसे मेले से ख़रीदा गया है। लेकिन, लोगों का कहना है कि उन पिस्टलों से असली बन्दूक की तरह धुआँ निकलता दिख रहा था। हिंदुस्तान में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस के दावों में झूठ ज्यादा दिखाई दे रहा है। पुलिस ने दोनों किशोरों के पिता को थाने बुलाया।

प्रह्लादनगर में हाल ही में कुछ दिनों पहले समुदाय विशेष के लोगों द्वारा भाजपा नेता पर फायरिंग की गई थी, जिसके बाद इलाक़े के हिन्दू संगठनों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया था। कॉलोनी में गेट लगाने की माँग की गई थी। स्थानीय अख़बारों के मुताबिक़, इलाक़े में हुई ताज़ा घटनाओं को देख कर लगता है कि यहाँ सांप्रदायिक तनाव कभी भी भड़क सकता है। भाजपा नेता पर गोलीबारी के बाद क्षेत्र में अफवाहों का बाज़ार गर्म हो गया था। भाजपा नेता व स्थानीय पार्षद ने ताज़ा गोलीबारी की घटना को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है।

स्थानीय पार्षद ने कहा कि सम्प्रदाय विशेष के लोग यहाँ अक्सर छेड़छाड़, लूटपाट, मारपीट और स्टंटबाज़ी की घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं। अगर कोई सज्जन विरोध करता है तो ये मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। पार्षद ने आगे कहा कि समुदाय विशेष के लड़के गलियों में गुटबंदी करते हैं और फिर सीटी बजाते हुए इधर-उधर मँडराते रहते हैं। ये लोग शोरशराबा भी करते हैं। अधिकारियों पर बार-बार शिकायत किए जाने के बावजूद मामले का संज्ञान नहीं लेने का आरोप लगाया गया है। पुलिस ने ताज़ा मामले में प्रयोग किए गए स्कूटर को भी ज़ब्त कर लिया है।

AAP विधायक मनोज कुमार को 3 महीने की जेल, ₹10 हजार का जुर्माना

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने मंगलवार (जून 25, 2019) को कोंडली से आप विधायक मनोज कुमार को चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने के मामले में 3 महीने की सजा और ₹10 हजार जुर्माने की सजा सुनाई है। हालाँकि, आदेश को चुनौती देने के लिए विधायक मनोज कुमार को जमानत दे दी गई है। 

आप सांसद को कोर्ट ने 2013 विधानसभा चुनाव में पूर्वी दिल्ली के कल्याण पुरी इलाके में बने एक मतदान केंद्र पर चुनावी प्रक्रिया को बाधित करने का दोषी पाया। एडिशनल चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट समर विशाल ने 11 जून को मनोज कुमार को आईपीसी की धारा 186 और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 131 के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने पुलिसवालों की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए ये फैसला सुनाया था और बहस के लिए 25 जून की तारीख तय की गई थी।

गौरतलब है कि, ये मामला मनोज और उनके 50 समर्थकों द्वारा एमसीडी स्कूल के मेन गेट के बाहर हंगामा करने से संबंधित है। इन लोगों ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान ही स्कूल का मेन गेट बंद कर दिया था। 4 दिसंबर 2013 को कल्याणपुरी थाने में दर्ज केस के मुताबिक, आप विधायक ने अपने समर्थकों के साथ मिलकर कल्याण पुरी स्थित एमसीडी प्राइमरी स्कूल पर बने पोलिंग स्टेशन पर उत्पात किया जहाँ दिल्ली विधानसभा के लिए मतदान हो रहा था। आप विधायक ने वहाँ चुनाव कराने में लगे पुलिस वालों के काम में रुकावट डाली, पुलिस कॉन्स्टेबल को धमकाया और पुलिवालों समेत चुनाव अधिकारियों को पोलिंग बूथ के अंदर बंद कर दिया। इतना ही नहीं, मनोज कुमार और उनके समर्थकों ने मतदान समाप्त होने के बाद भी अपना आंदोलन जारी रखा और बूथ के बाहर मतपेटियों को बाहर नहीं ले जाने दिया जिसके बाद मतपेटियों को दूसरे रास्ते से बाहर निकाला गया था।

Spice-2000 ‘अचूक’ बमों का इस्तेमाल, और 90 सेकंड में सब तबाह: ऐसे हुई थी बालाकोट पर एयर स्ट्राइक

एनडीटीवी से बात करते हुए बालाकोट पर हमला करने वाले भारतीय वायुसेना के पायलटों ने सीधे शब्दों में कहा कि उनका निशाना नहीं चूका था। पाकिस्तान अपने यहाँ हुए नुकसान को कमतर कर के दिखाने की कोशिश कर रहा है। नाम गुप्त रखने की शर्त पर हुए इस इंटरव्यू में जिन दो मिराज 2000 पायलटों ने अपनी बात रखी, उनमें से एक स्क्वाड्रन लीडर हैं। बालाकोट एयर स्ट्राइक 1971 की जंग के बाद पाकिस्तान पर भारत का पहला हवाई हमला था।

वीडियो फीड वाले बमों का इस्तेमाल होना था

पुलवामा हमले के जवाब में जैश-ए-मोहम्मद के बालाकोट स्थित ट्रेनिंग सेंटर पर कार्रवाई के तहत हुई एयर स्ट्राइक बारे में पायलटों ने बताया कि पूरा ऑपरेशन 2-2.5 घंटों में खत्म हो गया। बम गिरने के बाद जिहादी कैंप मात्र 90 सेकंड में पूरी तरह तबाह हो गए थे। दोनों पायलटों ने मिराज से 5 इज़राइली स्पाइस-2000 बमों से जिहादी प्रशिक्षण केंद्रों पर हमला किया था। 26 फरवरी को भारतीय वायु सेना ने कुल 12 मिराज-2000 जेटों को इन जिहादी कैम्पों को तबाह करने के लिए हमले का आदेश दिया था।

हमले में हालाँकि स्पाइस के अलावा क्रिस्टल मेज़ (Crystal Maze) नामक एक दूसरे तरह की हवा-से-सतह पर हमला करने वाली मिसाइल की 6 यूनिट का भी इस्तेमाल होना था लेकिन मौसमी परिस्थितियों की गड़बड़ी के चलते यह संभव नहीं हो पाया। क्रिस्टल मेज़ मिसाइल की खासियत यह है कि यह हमला करने के साथ-साथ वीडियो फीड भी भेजती है, अतः अगर इसका इस्तेमाल हो सकता तो वायु सेना के पास मिशन की सफलता का सबूत भी होता। 

‘इमारतों की सैटेलाइट तस्वीरें साफ़ नहीं हैं’

क्रिस्टल मेज़ बमों का इस्तेमाल न हो पाने और हमले की सफलता का कोई वीडियो सबूत न होने के बावजूद वायु सेना पायलटों के मन में मिशन की सफलता को लेकर कोई संदेह नहीं है। “मुझे स्पाइस बमों के निशाने पर गिरने में कोई संदेह नहीं है।” सैटेलाइट इमेजिंग कंपनी ‘डिजिटल ग्लोब’ ने तस्वीरें जारी की थीं जिनमें एयर स्ट्राइक का दावा जिस स्थान पर किया गया था, वहाँ पर इमारतें खड़ीं थीं। इस बात पर पायलटों ने बताया कि स्पाइस बमों की डिज़ाइन ऐसी है कि वह किसी ढाँचे (जैसे इमारत) से टकराने पर तुरंत धमाका नहीं करते।

उनकी विस्फ़ोटक सामग्री का धमाका ढाँचे को भेद कर मानव निशाने के निकटतम पहुँच कर होता है, ताकि दुश्मन के ज़िंदा बचने की संभावना न्यूनतम हो जाए। अतः अमूमन इस बम के इस्तेमाल पर निशाने के बाहरी ढाँचे की तबाही नहीं होती, लेकिन अंदर के मानव-लक्ष्य मारे जाते हैं। “सैटेलाइट से जारी तस्वीरें इतनी साफ़ नहीं हैं कि वह बमों के ढाँचे के अंदर घुसने से बने छेदों को दिखाएँ।”

पायलट आगे जोड़ते हैं, “स्पाइस 2000 चूकने वाला हथियार नहीं है। संभव है कि इमारतों की छतों पर जो नुकसान हुआ है, उसे छिपाने का प्रयास हो रहा हो।” NDTV का दावा है कि उसे निशाने पर रहीं इमारतों में से एक की अल्ट्रा-हाई रेज़ोल्यूशन की तस्वीर दिखाई गई है, जिसमें इमारत की छत पर तीन छेद साफ़ देखे जा सकते हैं। जिहादी रंगरूटों का हॉस्टल मानी जा रही यह इमारत पाकिस्तानी अधिकारियों ने उन विदेशी पत्रकारों और कूटनीतिज्ञों को नहीं दिखाई थी, जिन्हें वह बालाकोट स्ट्राइक के 43 दिन बाद ‘दौरे’ पर ले गए थे। 

मिशन जानने के बाद सिगरेट और चहलकदमी

भारतीय युद्धक विमान लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल को पार कर 8 किलोमीटर अंदर गए थे उन बमों को दागने की पोज़ीशन पर आने के लिए। पायलटों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव भी एनडीटीवी को बताए। स्क्वाड्रन लीडर के मुताबिक स्ट्राइक के पहले (तनाव कम करने के लिए) उन्होंने बहुत सारी सिगरेट पी थी, और मिशन से लौटकर भी उन्होंने कुछ और सिगरेट पी। “मिशन क्या है, यह ब्रीफिंग दिए जाने के बाद हम लगातार चहलकदमी कर रहे थे।” पायलटों ने बताया कि मिशन के दौरान इतना कुछ होता है करने के लिए कि दो घंटे कितनी तेज़ी से बीत गए, यह पता भी नहीं चला।

उन्होंने यह भी बताया कि मिशन के दौरान एक पाकिस्तानी जेट को भारतीय जेटों के हवाई व्यूह (फॉर्मेशन) की तरफ़ उड़ते हुए भी मिशन के बाकी जेटों का समन्वय और ऐसी ही परिस्थिति की चौकसी कर रहे जेट ने पकड़ा। अच्छी बात यह थी कि तब तक बम दागकर भारतीय योद्धा नुक्सान की सीमा के बाहर चुके थे। “स्पाइस 2000 को दागने के बाद उसके लास्की की तरफ बढ़ने के दौरान उस क्षेत्र में रुककर नहीं देखना पड़ता। यह दागिए-और-भूल-जाइए किस्म का है।”