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गोवा के हर उम्मीदवार को ₹90 लाख देने का अरविंद केजरीवाल ने किया था वादा, AAP ने ली थी ₹45 करोड़ की रिश्वत: दिल्ली शराब घोटाले में CBI का खुलासा

केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने दिल्ली शराब घोटाला में कोर्ट को बताया है कि आम आदमी पार्टी (AAP) को शराब घोटाले में ₹45 करोड़ की रिश्वत ली थी। CBI ने यह भी बताया है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने गोवा विधानसभा चुनाव में हर उम्मीदवार को ₹90 लाख देने का वादा किया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार (27 अगस्त, 2024) को कोर्ट यह सभी जानकारी दी है। CBI इस मामले में अब चौथी सप्लीमेंट्री चार्जशीट लगाने जा रही है। कोर्ट में इस चार्जशीट लगाने को लेकर ही बहस चल रही थी। इस सप्लीमेंट्री चार्जशीट में CM केजरीवाल, AAP विधायक दुर्गेश पाठक और ऑरबिन्दो फार्मा के डायरेक्टर पी सारथ रेड्डी, कारोबारी अमित अरोड़ा समेत पाँच लोगों को आरोपित बनाया गया है। इसकी सुनवाई के दौरान CBI ने कोर्ट के सामने कई जानकारियाँ रखी हैं।

CBI ने कोर्ट को बताया कि AAP को ₹45 करोड़ की रिश्वत शराब घोटाला मामले में प्राप्त हुई थी। यह रिश्वत साउथ ग्रुप से मिली थी, जिसे शराब घोटाला मामले में फायदा पहुँचाया गया था। CBI ने यह बताया कि साउथ ग्रुप ने यह पैसा गोवा चुनाव के लिए दिया था। CM केजरीवाल ने इस दौरान गोवा चुनावों में AAP उम्मीदवारों को फंड की कमी ना होने देने की बात कही थी।

CBI ने खुलासा किया है कि CM केजरीवाल गोवा विधानसभा चुनाव के सभी 40 उम्मीदवारों को ₹90-₹90 लाख देने की बात कही थी ताकि वह आराम से चुनाव लड़ सकें। केजरीवाल ने AAP गोवा को इस बात का भरोसा दिया था कि उन्हें पैसे की कमी नहीं होने दी जाएगी।

CBI ने बताया है कि ऑरबिंदों फार्मा के पी सारथ रेड्डी ने ₹14 करोड़ की रिश्वत BRS नेता के कविता को दी थी। यह रिश्वत आगे के कविता के माध्यम से AAP तक पहुँच गई। पी सारथ रेड्डी इस मामले में सरकारी गवाह है। CBI ने पहले बताया है कि रिश्वत का यह पूरा पैसा साउथ ग्रुप से आया था।

मामले की सुनवाई दौरान CBI ने यह भी खुलासा किया कि गोवा चुनाव के दौरान MLA दुर्गेश पाठक यहाँ के इंचार्ज थे और पैसे का सारा लेनदेन उन्हीं के माध्यम से हुआ। कोर्ट ने इस मामले में अब अगली सुनवाई 3 सितम्बर को करने को कहा है।

गौरलतब है कि CM केजरीवाल समेत AAP के कई नेताओं पर आरोप है कि दिल्ली में शराब नीति बदल कर उन्होंने कुछ कारोबारियों को फायदा पहुँचाया। उन पर आरोप है कि इस फायदा पहुँचाने के बदले में उन्होंने बड़ी रिश्वत ली, इसे गोवा चुनाव में खर्च किया गया। इस मामले में दिल्ली CM अरविन्द केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत कई नेता आरोपित हैं।

जन्माष्टमी की छुट्टी में सरकारी स्कूल में घुसे हाशिम-कासिम, भीतर बना डाली ‘बहन की कब्र’ : कौशांबी में UP पुलिस ने दबोचा

उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जिले में एक सरकारी स्कूल के अंदर कब्र बनाने का मामला सामने आया है। यह कब्र जन्माष्टमी की छुट्टी पर चुपके से बनाई गई थी। प्रिंसिपल की शिकायत पर पुलिस ने FIR दर्ज करके जाँच शुरू कर दी है। आरोपितों के नाम कासिम और हाशिम हैं। मंगलवार (27 अगस्त 2024) को पुलिस ने दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। प्रशासन ने करवाए गए अवैध निर्माण को ढहा दिया है।

यह मामला कौशाम्बी जिले के थानाक्षेत्र पश्चिम शरीरा का है। यहाँ आषाढ़ा उच्च माध्यमिक विद्यालय है जिसमें सभी समुदाय के बच्चे एक साथ पढ़ाई करते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सोमवार को जन्माष्टमी की छुट्टी थी। मंगलवार को जब स्कूल खुला तो अंदर एक कब्र बन चुकी थी। अध्यापकों को याद आया कि एक व्यक्ति काफी पहले से अपनी बहन की कब्र स्कूल के अंदर होने का दावा करता आ रहा था। हालाँकि वो अपने दावे के समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं कर पाया।

आखिरकार स्कूल के प्रिंसिपल ने अपने उच्चाधिकारियों को पूरे मामले से अवगत करवाया। आनन-फानन में प्रशासनिक अमला स्कूल पहुँचा। यहाँ उन्होंने देखा कि अंदर न सिर्फ पक्की कब्र बना दी गई थी बल्कि उसके एक तरफ शिलापट भी जोड़ दिया गया था। प्रशासन ने फ़ौरन ही किए गए नवनिर्माण को ध्वस्त किया। प्रिंसिपल से तहरीर ली गई। इस तहरीर में मवाना गाँव के 40 साल के कासिम और 48 वर्षीय हाशिम को नामजद किया गया। इसी तहरीर पर दोनों आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 170, 126 व 135 के तहत केस दर्ज कर लिया गया।

केस दर्ज करके पुलिस ने आरोपितों की तलाश शुरू कर दी। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में यह माना है कि कासिम और हाशिम की करतूत से भीड़ जमा हो गई थी और शांति भंग होने का खतरा भी पैदा हो गया था। मंगलवार (27 अक्टूबर 2024) को पुलिस ने हाशिम और कासिम को गिरफ्तार कर लिया। इन दोनों को कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए अदालत में पेश किया गया है। फिलहाल मामले की जाँच व अन्य वैधानिक कार्रवाई की जा रही है। स्कूल में बच्चों की पढ़ाई फिर से सामान्य रूप से चल रही है।

हिंदू घृणा में सनी सुनीता विश्वनाथ ने जन्माष्टमी को बनाया आतंकवाद की ढाल, हमास पर महाभारत-गीता से डाला पर्दा: हमारे देवताओं से दूर रहो ‘द वायर’

प्रोपेगेंडा पोर्टल द वायर ने 26 अगस्त 2024 को हिंदू विरोधी और भारत विरोधी अमेरिकी संगठन हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स की कार्यकारी निदेशक सुनीता विश्वनाथ का एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख में सुनीता ने गाजा में फिलिस्तीनियों की पीड़ा और महाभारत में भगवान कृष्ण और पांडवों द्वारा झेली गई यातनाओं के बीच तुलना करने का प्रयास किया। उन्होंने हिंदुओं से कृष्ण जन्माष्टमी पर हमास आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति रखने को कहा।

द वायर के माध्यम से सुनीता विश्वनाथ द्वारा पेश की गई उपमा न केवल बहुत ही गलत है, बल्कि भ्रामक भी है। महाभारत में पांडवों के बारे में बताया गया है, जो धर्म के अवतार थे और उन्होंने अधर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले कौरवों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। महाभारत के महान युद्ध का मार्गदर्शन भगवान कृष्ण ने न्याय और सत्य को लाने के लिए किया था।

द वायर के लेख का स्क्रीनशॉट

दूसरी ओर फिलिस्तीनी आतंकवादी संगठन हमास महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों सहित नागरिकों को बिना किसी गलती के निशाना बना रहा है, साथ ही यहूदियों के नरसंहार और इजरायल राज्य के विनाश की बात कर रहा है। यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि अधिकांश फिलिस्तीनी हमास का समर्थन करते हैं और दुनिया के नक्शे से इजरायल को मिटा देना चाहते हैं।

सुनीता ने फिलिस्तीनियों की इजरायल से दुश्मनी की तुलना पांडवों के धर्मयुद्ध से करते महाभारत के सार को विकृत कर दिया है। उन्होंने उस हमास के लिए सहानुभूति बटोरने की कोशिश की है, जो अच्छाई से कोसों दूर है।

अगर हम समानताएँ देखना चाहें तो हमास की हरकतें कौरवों से ज़्यादा मिलती-जुलती हैं क्योंकि जिस तरह कौरव छल और विश्वासघात के ज़रिए पांडवों का सफाया करना चाहते थे, उसी तरह हमास, उसके समर्थक और उससे जुड़े आतंकी संगठन इजरायल का सफाया करना चाहते हैं। इसके अलावा, यह पहचानना ज़रूरी है कि महाभारत उत्पीड़न बनाम प्रतिरोध की कहानी नहीं है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की जीत, अत्याचार पर न्याय की जीत की कहानी है। उस संदर्भ में, हमास की तुलना कभी भी पांडवों या कृष्ण से नहीं की जा सकती। हमास की असली तुलना कौरवों और बुरी ताकतों से ही हो सकती है।

इजरायल कंस नहीं है: दोनों की तुलना गलत

सुनीता ने अपने लेख में इजरायल को कंस के रूप में चित्रित किया है, जो भगवान कृष्ण का दुष्ट मामा है। ऐसी तुलना पूरी तरह से भ्रामक और गलत है। कंस एक क्रूर शासक था, जो कृष्ण को मरवाना चाहता था क्योंकि भविष्यवाणी के अनुसार, कृष्ण ही उसके पतन का कारण बनने वाले थे। कंस ने कृष्ण को तब मारने की कोशिश की थी, जब वह एक शिशु थे और तब तक अपने प्रयास जारी रखे जब तक कि कृष्ण ने अंततः कंस को मार नहीं दिया।

7 अक्टूबर को जो हुआ, उस पर वापस लौटते हुए, आतंकवादी हमले में मासूम बच्चों को किसने मारा? यह हमास था। अगर हमास ने मासूम बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को बिना सोचे-समझे मार डाला, तो हमास और उसके समर्थकों को जो प्रतिशोध झेलना पड़ा, उसकी तुलना भगवान कृष्ण ने बचपन में अपने पूरे जीवन में जो झेला, उससे कैसे की जा सकती है?

कंस का शासन क्रूरता, भय और अन्याय से भरा था। दूसरी ओर, इजरायल एक संप्रभु लोकतांत्रिक राज्य है, जहाँ अन्य धर्मों के लोग भी स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं। उसे हमास के आतंकवादी हमलों से खुद का बचाव करने का पूरा अधिकार है। ये तो हमास और उससे जुड़े आतंकवादी संगठन हैं, जो इजरायल को नक्शे से मिटा देना चाहते हैं। इजरायल ने जो किया वह एक बदला था और गाजा में जो हुआ वह 7 अक्टूबर को फिलिस्तीनी आतंकवादी संगठन हमास द्वारा किए गए आतंकवादी हमले का कोलेटरल डैमेज था।

इस प्रकार, इजरायल को कंस के बराबर मानना ​​गुमराह करने वाला और गलत तरीके से पेश करना है, ताकि इजरायल-हमास संघर्ष की एक अलग कहानी बनाई जा सके। कंस एक अत्याचारी था। उसने अपनी शक्ति के डर से लोगों को कैद किया और मार डाला। यह हमास से बहुत मिलता-जुलता है जिसने 7 अक्टूबर को निर्दोष इजरायलियों और विदेशी नागरिकों की हत्या की और इजरायल के बदले के डर से 250 से अधिक लोगों को बंधक बना लिया।

दूसरी ओर, इजरायल दमन करने के लिए प्रेरित नहीं है। यहूदी देश और उसके लोग अपनी भूमि पर शांतिपूर्वक रहना चाहते हैं और उन्होंने सालों से गाजा में दो-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर बुनियादी ढाँचे के निर्माण में मदद की है। हमास ने क्या किया? उसने इजरायल पर हमलों के लिए गाजा में इजरायल द्वारा विकसित बुनियादी ढाँचे का इस्तेमाल किया। यहाँ तक ​​कि गाजा में लगाए गए पाइपों का इस्तेमाल इजरायल पर हमला करने के लिए रॉकेट बनाने के लिए किया गया।

हमास पर इजरायल का बदला लोगों पर अत्याचार करने की इच्छा से प्रेरित नहीं है। वास्तव में इजरायल ने फिलिस्तीन के लोगों को सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए कई चेतावनियाँ भेजीं क्योंकि वे हमास के प्रतिष्ठानों पर हमला करने जा रहे थे। हालाँकि अपनी बदमाशी की वजह से हमास ने फिलिस्तीन के लोगों को गाजा छोड़ने की अनुमति नहीं दी। सुनीता यहाँ बेवजह हिंदुओं के देवताओं को घसीट रही हैं, ताकि कहानी को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा सके और हमास के पापों को किसी तरह के धार्मिक संघर्ष के रूप में पेश किया जा सके।

भगवद्गीता की शिक्षाओं की गलत व्याख्या कर रही सुनीता

सुनीता ने अपने लेख में अपनी कहानी को सही ठहराने के लिए भगवद गीता का हवाला देने का प्रयास किया। सुनिया ने दावा किया कि हिंदुओं को फिलिस्तीनियों के लिए खड़ा होना चाहिए क्योंकि भगवान कृष्ण हमें सभी की भलाई के लिए प्रयास करना और दूसरों के सुख-दुख को अपना मानना ​​सिखाते हैं। हालाँकि वह शिक्षाओं के बारे में सही हैं, लेकिन उस संदर्भ का गलत इस्तेमाल किया है।

द वायर के लेख का स्क्रीनशॉट

भगवद गीता एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक है। यह धर्म के महत्व और न्याय को लक्ष्य मानकर सही काम करने की आवश्यकता को सिखाती है। कृष्ण ने अर्जुन को धर्म के अनुसार काम करना सिखाया, भले ही यह कठिन लगे। यहूदियों के प्रति हिंसा और घृणा फैलाने वाले हमास जैसे आतंकवादी संगठन का समर्थन करना भगवद गीता के माध्यम से भगवान कृष्ण की शिक्षाओं के अनुरूप नहीं है। भगवान कृष्ण धर्म का पालन करने वालों की सुरक्षा की वकालत करते हैं, न कि ऐसे कार्यों का समर्थन करते हैं, जिनमें निर्दोष लोगों को नुकसान पहुँचाया गया हो या उनकी हत्या की गई हो, जबकि हमास ने वही किया है।

हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स: छद्म हिंदू विरोधी लकड़बग्घे

सुनीता हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) की कार्यकारी निदेशक हैं, जो अमेरिका में स्थित एक हिंदू विरोधी और भारत विरोधी संगठन है। यह संगठन खुद को मानवाधिकारों के रक्षक के रूप में पेश करता है। हालाँकि, इसके हिंदू विरोधी चरित्र का कई बार पर्दाफाश हो चुका है। HfHR अक्सर अपने कथानक को आगे बढ़ाने के लिए हिंदू प्रतीकों और शिक्षाओं का इस्तेमाल करता है। इस लेख में भी सुनीता ने महाभारत और भगवान कृष्ण की शिक्षाओं का इस्तेमाल करके एक आतंकवादी संगठन और उसके समर्थकों के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की। ऐसा करके HfHR ने एक बार फिर अपने असली रंग और विचारधारा को उजागर किया है।

एचएफएचआर और सुनीता जैसे व्यक्ति हिंदू प्रथाओं और मान्यताओं की आलोचना करने से पहले सांस नहीं लेते। हिंदू ग्रंथों की उनकी चुनिंदा नाराजगी और उनकी व्याख्याओं को तोड़-मरोड़ कर पेश करना, जैसा कि उन्होंने यहाँ किया, यह दर्शाता है कि उनका प्राथमिक लक्ष्य मानवाधिकारों की रक्षा करना नहीं है, बल्कि झूठे आख्यानों के साथ हिंदू पहचान को धरती से मिटाना है। सुनीता ने हमास के साथ गठबंधन किया और इजरायल-हमास संघर्ष को इस तरह से पेश किया कि इजरायल को गलत तरीके से बदनाम किया जा सके। इस प्रकार, एचएफएचआर की कार्यकारी निदेशक ने मानवाधिकार संगठन के रूप में अपना हिंदू विरोधी रूप दिखाया।

हिंदू देवताओं को राजनीतिक तुलना से रखें बाहर

इजरायल-हमास संघर्ष में गलत तुलना करने के लिए सनातन धर्म की शिक्षाओं का दुरुपयोग न केवल बौद्धिक रूप से बेईमानी है, बल्कि दुनिया भर के हर समझदार हिंदू के लिए अपमानजनक है जो इन पवित्र कथाओं का सम्मान करते हैं। महाभारत सिर्फ़ एक और कहानी नहीं है। यह सनातन धर्म का इतिहास है, बुराई पर धार्मिकता की जीत की कहानी। इसलिए इसे राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने के लिए तोड़-मरोड़कर या गलत तरीके से पेश नहीं किया जाना चाहिए। खासकर जो इसकी शिक्षाओं के बिल्कुल विपरीत हैं।

सुनीता, HfHR जैसे संगठनों और द वायर जैसे मीडिया घरानों को हिंदू देवताओं को अपने घटिया प्रोपेगेंडा से बाहर रखना चाहिए क्योंकि यह स्पष्ट है कि वे हिंदू धर्म के सच्चे सार का सम्मान नहीं कर सकते। हमास और पांडवों के बीच तुलना न केवल गलत है बल्कि ऐसा सोचना भी बेहद घटिया है। यह धार्मिक धार्मिकता की आड़ में हिंसा और आतंकवाद को वैध बनाने का प्रयास है। अब समय आ गया है कि इन झूठी कहानियों को सामने लाया जाए और उन्हें हाथ से निकलने से पहले ही रोक दिया जाए।

यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

बांग्लादेश में झील में तैरती मिली महिला पत्रकार की लाश, जिस चैनल में काम करती थी उसके मालिक को भी जेल: अराजकता थामने में विफल अंतरिम सरकार

बांग्लादेश में लगातार विरोध प्रदर्शन और उपद्रव के बाद सत्ता-परिवर्तन हो गया, इसके बावजूद वहाँ हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। हिन्दुओं और शेख हसीन की पार्टी ‘आवामी लीग’ के नेताओं को खासकर के निशाना बनाया जा रहा है। अब बांग्लादेश की राजधानी ढाका स्थित हातिर झील से एक महिला पत्रकार की लाश मिली है। सारा रहनुमा नामक उक्त महिला पत्रकार ‘गाजी टीवी’ नामक न्यूज़ चैनल में कार्यरत थीं। इससे पता चलता है कि बांग्लादेश में महिलाएँ अराजक तत्वों से सुरक्षित नहीं हैं।

सारा रहनुमा ‘गाजी टीवी’ में बतौर न्यूज़रूम एडिटर कार्यरत थीं। उनकी हत्या को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि पत्रकार भी बांग्लादेश में डरे हुए महसूस कर रहे हैं। इस चैनल को गोलम दस्तगीर गाजी द्वारा चलाया जाता है, जो उद्योगपति होने के साथ-साथ बांग्लादेश के टेक्सटाइल एन्ड जूट मंत्री भी रहे हैं। वो ‘आवामी लीग’ से जुड़े हुए थे। 2024 में वो नारायणगंज क्षेत्र से लगातार चौथी बार सांसद बने थे। अब उन्हें भी सत्ता-परिवर्तन के बाद गिरफ्तार कर लिया गया है।

मृतका सारा रहमुमा की उम्र 32 वर्ष थी।ढाका मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल (DMCH) आउटपोस्ट के इंस्पेक्टर बच्चू मियाँ ने भी सारा रहनुमा की मौत की पुष्टि की है। सागर नामक शख्स उन्हें अस्पताल लेकर आया था। उसने पानी के ऊपर झील में उन्हें देखा, जिसके बाद उन्हें अस्पताल लेकर आया। यहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। सारा ने मौत से पहले फहीम फैसल को टैग करते हुए फेसबुक पर उनकी दोस्ती के लिए धन्यवाद दिया था और लिखा था कि आपके सारे सपने पूरे हों।

सारा रहनुमा ने इस फेसबुक पोस्ट में ये भी लिखा था कि साथ में हमारी बहुत सारी योजनाएँ थीं, लेकिन मैं माफ़ी चाहती हूँ कि हम उन योजनाओं को पूरा नहीं कर पाए। एक अन्य फेसबुक पोस्ट में उन्होंने लिखा था कि मौत की तरह जीवन जीने से बेहतर है कि व्यक्ति मर ही जाए। पुलिस मौत के कारण की जाँच करेगी। बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस को मुख्य सलाहकार नियुक्त कर उनके नेतृत्व में अंतरिम सरकार चलाई जा रही है। यही सरकार चुनाव भी कराएगी, जिसके बाद पूर्ण सरकार का गठन होगा।

बांग्लादेश के पत्रकार ने अब ‘सुकन्या देवी रेप’ केस पर राहुल गाँधी को घेरा: जानिए क्या है वह मामला जिसमें कॉन्ग्रेस नेता थे आरोपित, सुप्रीम कोर्ट ने कर दिया था खारिज

बांग्लादेश के वरिष्ठ पत्रकार और बांग्लादेशी अखबार Blitz के संपादक सलाउद्दीन शोएब चौधरी ने अपने एक्स अकॉउंट से ‘सुकन्या देवी’ मामले में ट्वीट करके एक बार फिर राहुल गाँधी को सवालों में घेरा है। अपने ट्वीट में उन्होंने कहा है कि वो इस केस में जाँच शुरू कर चुके हैं और उन्हें इस क्रम में कई सौ सोशल मीडिया पोस्ट मिले हैं जो बताते हैं कि सुकन्या देवी के साथ जो रेप हुआ था उस मामले में कैसे राहुल गाँधी की संलिप्ता थी।

उन्होंने अपने लंबे पोस्ट में उन्होंने सुकन्या देवी से जुड़े कई बातों का जिक्र किया है। इससे पहले वो राहुल गाँधी से जुड़े कई दावों को अपने एक्स पर साझा कर चुके हैं। फिर चाहे वो राहुल गाँधी की किसी कैरिबियन महिला से हुई शादी पर किया गया किसी यूट्यूबर का दावा हो, या उनके दो बच्चे होने की बात।

उन्होंने कुछ तस्वीरें भी अपने अकॉउंट पर लगातार साझा की हुईं हैं और उनका कहना है कि वो राहुल विंसी उर्फ राहुल गाँधी के बारे में बहुत सी चौंकाने वाली सच्चाई खोजने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने बीते दिनों राहुल गाँधी पर एक रिपोर्ट भी पेश की थी जिसका शीर्षक उन्होंने- “राहुल विंसी एक्सपोज्ड -द अटोल्ड स्टोरी ऑफ पॉवर, सीक्रेट्स एंड कॉन्ट्रोवर्सी था।” इसके बाद उनका दावा है कि उन्हें मारने की धमकियाँ दी गईं। उन्होंने पोस्ट में राहुल गाँधी की कैंब्रिज की डिग्री पर भी प्रश्न खड़े किए और सबसे ताजा ट्वीट में उन्होंने सुकन्या देवी केस उठाया।

ये सुकन्या देवी केस क्या है और कैसे इसके तार राहुल गाँधी से जुड़े हैं आइए बताएँ…

सुकन्या देवी मामला उस आरोप से संबंधित है, जिसमें राहुल गाँधी और उनके दोस्तों पर यूपी के एक स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता की बेटी सुकन्या देवी के साथ 2006 में अमेठी में बलात्कार करने का आरोप लगाया लगाया गया था। शुरू में इस आरोप को कई ब्लॉगर्स द्वारा उठाया गया था। उसमें कहा गया था कि कथित घटना को लेकर शिकायत करने के लिए सोनिया गाँधी से मिलने के बाद लड़की और उसके माता-पिता गायब हो गए थे।

आरोपों में कहा गया कि सुकन्या, बलराम सिंह नामक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता की बेटी थी, और वह आरोपित राहुल गाँधी की बहुत बड़ी प्रशंसक थी। आरोप लगाया गया कि जब राहुल गाँधी अमेठी गेस्ट हाउस में अपने दोस्तों के साथ पार्टी कर रहे थे, तो वह उनसे मिलने के लिए वहाँ गई थीं, जहाँ आरोपित राहुल गाँधी और उनके 7 दोस्तों ने उनका कथित तौर पर बलात्कार किया था, जिनमें से 2 ब्रिटेन के थे और 2 अन्य इटली के थे।

जाहिर है कि वह किसी तरह इस घटना के बाद भाग निकली और कई लोगों से संपर्क किया लेकिन कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आया। आरोपों में यह भी कहा गया कि सुकन्या देवी अपने पिता बलराम सिंह और माँ सुमित्रा देवी के साथ सोनिया गाँधी और मानवाधिकार आयोग से मिलीं, मगर उसके बाद उसका पूरा परिवार लापता हो गया। आरोप यह भी था कि ध्रुपद नाम का वीडियोग्राफर और एक न्यूज चैनल का एक कैमरामैन, जिन्होंने सुकन्या का बयान रिकॉर्ड किया था, उसके बाद वो भी लापता हो गए।

हालाँकि, उस समय इन आरोपों को मेन स्ट्रीम मीडिया ने पूरी तरह से नजरअंदाज किया और केवल कुछ सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा इसे उठाया गया, लेकिन जब 2011 में सपा विधायक किशोर समरते ने इसे उठाया तो मीडिया को इसकी रिपोर्ट करने के लिए मजबूर होना पड़ा। समरीते ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक मामला भी दायर किया था, जिसमें कथित बलात्कार और सुकन्या के माता-पिता के गायब होने को लेकर जाँच की माँग की गई थी।

विधायक ने कहा था कि जब वह गाँव गए थे, तो उन्होंने पाया था कि उसके परिवार ने घर को छोड़ दिया था और पड़ोसी उस परिवार के दिल्ली जाने के बाद रहस्यमय तरीके से गायब होने की बात से अनजान थे।

लेकिन अदालत के आदेश पर पुलिस द्वारा की गई जाँच में आरोपों में कोई सच्चाई नहीं पाई गई। जाँच में पाया गया कि किशोर समरिते द्वारा बताया गया परिवार का पता मौजूद नहीं है। इसके अलावा, गजेंद्र पाल नाम के एक अन्य व्यक्ति ने बलराम और सुकन्या के दोस्त के रूप में अदालत में एक और याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि समरिते ने एक झूठी याचिका दायर की थी जो राजनीति से प्रेरित थी।

जाँच में यह भी पाया गया कि बलराम सिंह ने अपना घर बेच दिया था और दूसरी जगह चले गए थे, और उनकी पत्नी और बेटी के नामों का ब्लॉगों में गलत उल्लेख किया गया था। उनकी पत्नी सुशीला देवी थीं और उनकी सबसे बड़ी बेटी कीर्ति सिंह थीं। उन्होंने जानकारी दी थी कि मीडिया में दावा करने वाले कुछ लोग उनके घर आए थे और उन्हें सुकन्या देवी की तस्वीर दिखाते हुए पूछा कि क्या वह उनकी बेटी है। उन्होंने उन्हें बताया था कि यह एक अलग महिला थी न कि उनकी बेटी।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि कीर्ति देवी एक अलग महिला थी, और उसे इस केस को कमजोर करने के लिए इसमें शामिल किया गया था। मगर हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाकर्ताओं, किशोर सम्राट और गजेंद्र पाल को जुर्माना भरने के लिए कहा था। किशोर पर ‘झूठ’के आधार पर एक याचिका दायर करने के लिए 50 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया था, जिसमें से 25 लाख कीर्ति सिंह को, 20 लाख राहुल गाँधी को और 5 लाख यूपी के डीजीपी को इनाम के रूप में दिए जाने थे।

दूसरी ओर, गजेंद्र पर 5 लाख का जुर्माना लगाया गया था, क्योंकि उनके पास मामले में उनका उस परिवार से कोई संबंध नहीं था। इस तथ्य के बावजूद कि परिवार ने कोई शिकायत दर्ज नहीं की थी, अदालत ने गजेन्द्र पाल को उस परिवार को अदालत में घसीटने के लिए भी फटकारा।

इसके बाद किशोर समरीते ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने भी 2012 में आरोपों को खारिज कर दिया था, और समरिते पर 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था, जबकि उच्च न्यायालय के जुर्माने को 50 लाख रुपए से घटाकर 10 लाख रुपए कर दिया था।

अदालत ने उल्लेख किया था कि “कोई भी साक्ष्य नहीं है” यह दिखाने के लिए कि कथित घटना 2006 में हुई थी। इसके अलावा, समरिते ने सुनवाई के दौरान यू-टर्न लेते हुए कहा था कि उन्हें इस मामले की कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं है और उन्होंने सपा नेतृत्व के निर्देश पर यह याचिका दायर की थी।

लक्षद्वीप में PM मोदी के पड़े चरण, मालदीव में हाफ हो गए भारतीय पर्यटक: देसी द्वीप जाने वाले टूरिस्ट हुए डबल, फ्लाइट 88% बढ़े

मालदीव के भारत विरोधी रवैये का नुकसान उसकी टूरिज्म इंडस्ट्री को उठाना पड़ा है। भारत विरोधी स्टैंड लेने के कारण मालदीव जाने वाले भारतीय टूरिस्टों की संख्या में 41% तक की कमी दर्ज की गई है। वहीं लक्षद्वीप में जाने वाले भारतीयों की संख्या इस बीच दोगुनी हो गई है। पीएम मोदी का लक्षद्वीप के प्रचार करने का असर भी पड़ा है।

मालदीव के पर्यटन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में अप्रैल से जुलाई के बीच मालदीव जाने वाले भारतीयों की संख्या बीते वर्ष के इसी समय के मुकाबले लगभग आधी हो गई है। मालदीव के पर्यटन मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, 2023 में जनवरी से जुलाई के बीच में भारत से 1.22 लाख पर्यटक मालदीव पहुँचे थे।

वर्ष 2024 के जनवरी से जुलाई के बीच यह संख्या घट कर 71,600 पर आ गई है। पर्यटकों की संख्या में यह 41.6% की कमी है। भारत 2023 में जनवरी-जुलाई के बीच मालदीव में पर्यटकों का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत था। वर्तमान में भारत इसमें छठे स्थान पर पहुँच गया है।

मालदीव भारत

मालदीव भारतीय पर्यटकों की घटती संख्या से होने वाले नुकसान को चीन के जरिए पूरा करने की कोशिश कर रहा है। चीन से मालदीव पहुँचने वाले पर्यटकों की संख्या में 2024 में 59% की बढ़ोतरी हुई है। चीन से 2023 (जनवरी-जुलाई) में लगभग 92,391 पर्यटक पहुँचे थे। यह संख्या 2024 (जनवरी-जुलाई) के बीच बढ़ कर 1.59 लाख हो चुकी है।

रूस को पछाड़ कर मालदीव में पर्यटकों का सबसे बड़ा स्रोत अब चीन बन गया है। चीन के बाद अब रूस इस मामले में दूसरे स्थान पर पहुँच गया है। भारत अब शीर्ष 5 में भी नहीं है। यह भारतीयों के मालदीव के बहिष्कार करने का असर है। इस कारण मालदीव की टूरिज्म इंडस्ट्री को बड़ा नुकसान होने की संभावना है।

जहाँ मालदीव को भारतीय पर्यटक अब त्याग रहे हैं वहीं भारत के अपने नैसर्गिक स्थान लक्षद्वीप में पर्यटकों की आमद में बढ़ोतरी हो रही है। आँकड़ों के अनुसार, लक्षद्वीप के अगात्ती एयरपोर्ट पर जाने वाली फ्लाइट्स की संख्या बीते वर्ष के मुकाबले लगभग दोगुनी हो गई है।

अगात्ती एयरपोर्ट पर बीते वर्ष अप्रैल से जून के बीच 418 फ्लाइट्स पहुँची थी। यह संख्या 2024 के अप्रैल से जून के बीच बढ़ कर 786 हो गई। अप्रैल और जून के बीच लक्षद्वीप पहुँचने वाले पर्यटकों की संख्या 22,890 रही है। यह संख्या बीते वर्ष की इसी अवधि के दौरान 11,074 थी। यानी इसमें दोगुना उछाल देखा गया है।

मालदीव से भारतीय पर्यटकों के मोहभंग के पीछे सबसे बड़ा कारण वहाँ के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू का भारत विरोधी रवैया है। मोहम्मद मुइज्जू 2023 में देश के राष्ट्रपति चुने गए थे। उन्होंने लगातार भारत विरोधी अभियान चुनाव में चलाए थे। जीतने के बाद भी उन्होंने राहत बचाव में लगे भारतीय सैनिकों को मालदीव से बाहर जाने को कहा था।

इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी के लक्षद्वीप का प्रचार करने के बाद मालदीव के मंत्रियों द्वारा की गई गाली गलौच का भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। मालदीव के मंत्रियों के अभद्र बयानों के कारण भारत में बायकाट अभियान चलाया गया था। इसका सीधा असर अब दिख रहा है।

यूट्यूबर्स को ₹5-8 लाख, X यूजर्स को ₹2-4 लाख हर महीने: सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स को ‘रोजगार’ देगी UP सरकार, जान लीजिए शर्तें

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने ऐलान किया है कि वो सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसरों को माला-माल कर देगी। 8 लाख रुपए महीने तक सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर्स कमा सकेंगे। कमाई की मिनिमम लिमिट भी 2 लाख रुपए रखी गई है। खास बात ये है कि इस सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसरों को सरकार का गुणगान करना होगा। सरकारी योजनाओं की जानकारी देनी होगी। वैसे, योगी सरकार ने प्रस्ताव में ये बात भी रखी है कि अगर किसी ने राष्ट्र विरोधी बातों का प्रसार किया, तो पैसे छोड़िए, जेल भी जाना पड़ सकता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूपी कैबिनेट ने सोशल मीडिया पॉलिसी पास कर दी है। अब एक्स, यूट्यूब, फेसबुक और इंस्टाग्राम के इंफ्लूएंसर को फॉलोअर्स की संख्या के हिसाब से हर महीने पैसे मिला करेंगे। इसके बदले में उन्हें यूपी सरकार का प्रचार प्रसार करना पड़ेगा। इसके लिए बाकायदा रजिस्ट्रेशन भी किया जाएगा। हालाँकि यूपी सरकार को अगर कंटेंट गलत लगा, अभद्र लगा, राष्ट्रविरोधी लगा, तो फिर कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है। यूपी से पहले राजस्थान में भी इस तरह की पॉलिसी आई थी। तब अशोक गहलोत वहाँ के मुख्यमंत्री थे।

इस पॉलिसी के तहत विज्ञापन का लाभ लेने के लिए कॉन्टेंट प्रोवाइडर को चार श्रेणियों बाँटा गया है। इसमें एजेंसी या फर्म को अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर सब्सक्राइबर और फॉलोअर्स के आधार पर बाँटा गया है- 5 लाख, 4 लाख, 3 लाख और 30 हजार रुपए प्रति माह, जबकि यूट्यूब वीडियो शॉट और पॉडकास्ट भुगतान के लिए 8 लाख रुपए, 7 लाख रुपए, 6 लाख रुपए और 4 लाख रुपए रखा गया है।

यूपी सरकार द्वारा जारी प्रेस नोट

यूपी सरकार नई सोशल मीडिया पॉलिसी में राष्ट्र विरोधी कॉन्टेंट डालने पर तीन साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। हालाँकि यूपी सरकार का प्रस्ताव कैबिनेट में पास जरूर हुआ है, लेकिन विस्तार से इसकी पूरी जानकारी सामने नहीं आ पाई है। वैसे, अभी तक आईटी एक्ट की धारा 66E, और 66F के तहत कार्रवाई की जाती थी। इसके अलावा अभद्र एवं अश्लील सामग्री पोस्ट करने पर आपराधिक मानहानि के मुकदमे का भी सामना करना पड़ सकता है।

एक्सपोज होंगे दोहरे कैरेक्टर वाले सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर?

अगर आप सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हैं, तो ये बात आपको भली भाँति पता होगी कि सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर्स की कोई राजनीतिक लाइन नहीं होती। जो लोग एंटरटेनमेंट के लिए कंटेंट बनाते हैं, उन्हें तो इस योजना का जमकर फायदा मिलेगा, लेकिन जो लोग राजनीतिक, सामाजिक कंटेंट के नाम पर पार्टी विशेष, व्यक्ति विशेष के लिए काम करते हैं, और मौका पाते ही दूसरी तरफ पलट जाते हैं, वो इस योजना से जरूर एक्सपोज हो जाएँगे।

यही नहीं, अब वो बैलेंस के नाम पर दोनों तरफ बैटिंग भी नहीं कर पाएँगे, क्योंकि इस गाइडलाइन का सीधा सा मतलब है कि आप इस तरफ हैं या उस तरफ। उस तरफ में समाज को तोड़ने वाली बातें, राजनीतिक दुराग्रह और कदाचार हमेशा दिखता रहा है। ऐसे लोग आम तौर पर ‘वरिष्ठ’ पत्रकार के तौर पर खुद की पहचान रखते हैं, लेकिन खुलेतौर पर वो समाज को तोड़ने वाली बातें फैलाते हैं। इस मामले में इन लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। वैसे, हम इस कदम को इस नजरिए भी देख सकते हैं कि सोशल मीडिया पर यूपी को लेकर क्या कुछ कहा जा रहा है, उन सब पर तो नजर रहेगी ही, साथ ही राष्ट्र विरोधी तत्वों की पहचान में भी इस कदम से मदद मिल सकती है।

ममता बनर्जी के राज में ‘अभया’ के लिए न्याय माँगना भी गुनाह, BJP नेता के कार को घेर कर गोलीबारी; घटनास्थल से बम भी मिला: डरा रहे हैं बंगाल बंद के वीडियोज

पश्चिम बंगाल में भाजपा नेता प्रियांगु पांडेय पर हमला किया गया है। आरोप है कि उन पर 6-7 गोलियाँ चलाई गईं। पुलिस ने घटनास्थल पर बम के गोले भी बरामद किए हैं। बम से भी हमला किया गया था। उनकी कार का शीशा क्षतिग्रस्त हो गया है। साथ ही ड्राइवर को गोली लगी है। घटना नॉर्थ 24 परगना जिले की है। भाजपा ने राज्य में बंद का आह्वान किया है। 1 दिन पहले छात्रों ने ‘नबन्ना अभियान’ चलाया, जिसके तहत राज्य भर में विरोध प्रदर्शन हुए। RG Kar मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में महिला डॉक्टर के बलात्कार एवं हत्या के खिलाफ ये विरोध प्रदर्शन हो रहा है।

नॉर्थ 24 परगना के भाटपारा में 2 भाजपा कार्यकर्ताओं को गोली मारे जाने की भी खबर है। हालाँकि, पुलिस का कहना है कि ‘एंग्लो-इंडिया जूट मिल’ के बाहर कुछ लोगों ने 2 व्यक्तियों की पिटाई की है और घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने फायरिंग का वीडियो डाला है। पूर्व सांसद अर्जुन सिंह ने भी कहा कि गोलीबारी की घटना हुई है। वीडियो में देखा जा सकता है कि एक व्यक्ति कार पर फायरिंग कर रहा है, अंदर से चीख की आवाजें आती हैं और लोग झुक जाते हैं।

सौमिक भट्टाचार्य, राहुल सिन्हा और लॉकेट चटर्जी – इन 3 प्रमुख भाजपा नेताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। 12 घंटे का ये बंद बुलाया गया है। वहीं प्रियांगु पांडेय ने बताया कि वो अर्जुन सिंह के आवास पर जा रहे थे, जेटिंग मशीन का इस्तेमाल कर रास्ता ब्लॉक कर दिया गया था। उन्होंने बताया कि लगभग 50 लोगों ने उनकी गाड़ी को घेरा, 7-8 बम फेंके गए और 6-7 राउंड गोलीबारी हुई। उन्होंने बताया कि TMC और पश्चिम बंगाल पुलिस ने मिल कर उनकी हत्या की साजिश रची थी, उनकी सुरक्षा हटा लिए जाने के बाद ये घटना हुई है।

अर्जुन सिंह ने कहा कि ACP की मौजूदगी में ये घटना हुई है। कोलकाता में भी बंद के कारण सड़कों पर कम गाड़ियाँ दिखीं। नदिया और मुंशीबाजार में टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले की खबर है। सियालदह रेलवे स्टेशन से ट्रेनों का परिचालन ठप्प रहा, ईस्टर्न रेलवे में 49 जगह प्रदर्शनकारी डटे रहे। नबन्ना अभियान में शामिल प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई के कारण भाजपा ने ये बंद बुलाया है। कई छात्रों और युवाओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।

53 करोड़ बैंक अकाउंट, ₹2 लाख करोड़ डिपॉजिट… 10 साल की हुई PMJDY, नरेंद्र मोदी ने PM बनते ही डाली वित्तीय क्रांति की नींव: जनधन के बारे में जानिए सब कुछ

प्रधानमंत्री जनधन योजना (PMJDY) के 10 साल बुधवार (28 अगस्त, 2024) पूरे हो गए हैं। देश के हर परिवार में एक बैंक खाता खोलने के उद्देश्य से चालू की गई यह योजना अपने लक्ष्य से भी आगे निकल चुकी है। आम नागरिकों तक वित्तीय सेवाएँ पहुँचाने के साथ ही बैंकों की सेहत सुधारने में भी इस योजना का बड़ा फायदा हुआ है। इस योजना के कारण कई स्तर पर होने वाला भ्रष्टाचार भी कम करने में मदद मिली है और सरकार सीधे जनता तक पहुँची है। पीएम मोदी ने इस योजना के 10 वर्ष पूरे होने पर इसके लाभार्थियों को बधाई दी है।

पीएम मोदी ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “आज देश के लिए एक ऐतिहासिक दिन है। इस अवसर पर मैं सभी लाभार्थियों को शुभकामनाएँ देता हूँ। इस योजना को सफल बनाने के लिए दिन-रात एक करने वाले सभी लोगों को भी बहुत-बहुत बधाई। जन धन योजना करोड़ों देशवासियों, विशेषकर हमारे गरीब भाई-बहनों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और उन्हें सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर देने में सफल रही है।”

PMJDY ने 10 वर्ष में कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं। चाहे देश की लगभग 50 करोड़ आबादी को बैंक खाते उपलब्ध करवाना हो या फिर लगभग 36 करोड़ लोगों को ATM कार्ड उपलब्ध करवाना हो, इस योजना के कारण देश में वित्तीय क्रान्ति आई है। PMJDY के शुरू होने से पहले देश की लगभग 60%-70% आबादी के पास बैंकिंग सुविधा नहीं थी। इस योजना के कारण उस तक आर्थिक आजादी पहुँच पाई है।

क्यों लाई गई PMJDY?

दरअसल, पीएम मोदी को पता था कि जब तक सरकारी सहायता लोगों तक सीधे नहीं पहुँचेगी तब तक भ्रष्टाचार कम नहीं होगा और मदद सीधे पहुँचे, इसके लिए लोगों के पास बैंक खाते होने जरूरी थे। देश की आजादी के लगभग 7 दशक पूरे होने और बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद भी एक बड़ी आबादी के पास बैंक सुविधाओं का एक्सेस नहीं था। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2011 तक भारत की लगभग 70% आबादी बैंक खाते की सुविधा से महरूम थी।

देश की आबादी का बड़ा हिस्सा सिर्फ इसलिए खाता नहीं खुलवा सकता था, क्योंकि उसके पास उसमें जमा करने के लिए न्यूनतम राशि भी नहीं थी। यह इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा था। जब देश में लोगों के पास खाते नहीं थे तो ATM जैसी सुविधाओं की बात ही छोड़ दी जाए। इसमें भी हमारा देश दुनिया के बाक़ी विकासशील देशों से कहीं पीछे थे।

साल दर साल बदली तस्वीर

पीएम मोदी की सरकार ने यह सभी समस्याएँ इसी एक योजना के जरिए सुलझाने की सोची और 28 अगस्त, 2014 को PMJDY शुरू हो गई। यह भी अनोखी बात थी कि कोई योजना ऐलान के मात्र दो सप्ताह के भीतर जमीन पर उतर आई हो। इसके लिए सरकारी बैंकों ने गाँवों में अपने कैम्प लगाए। बैंक मित्र नियुक्त किए गए, जो कि गरीब एवं वंचित तबके के लोगों को इसके बारे में जागरूक कर उनके खाते खुलवाते।

योजना के अंतर्गत सरकार ने खाता खोलने के लिए कोई न्यूनतम राशि रखने की शर्त हटा दी। सिर्फ आधार एवं अन्य पहचान पत्र पर बैंकों ने खाते खोले। PMJDY के शुरू ही हिट हो गई। गाँव-गाँव में लगे कैम्प असर दिखाने लगे। PMJDY की रिपोर्ट बताती है कि योजना चालू होने के एक महीने के भीतर ही 3.3 करोड़ से अधिक खाते खुले। इनमें से 1.8 करोड़ से अधिक खाते ग्रामीण इलाकों में खोले गए थे।

मात्र एक वर्ष में PMJDY के अंतर्गत 17.9 करोड़ खाते खोले गए। उससे भी बड़ी सफलता यह रही कि इनमें से 60% खाते ग्रामीण इलाकों में खोले गए थे। एक माह के भीतर ही देश के 1 करोड़ लोगों को रुपे ATM कार्ड भी दे दिए गए। एक साला पूरा होते-होते देश में इस योजना के अंतर्गत खोले जाने वाले खातों की संख्या लगभग 18 करोड़ पहुँच गई। इसमें से लगभग 11 करोड़ खाते ग्रामीण क्षेत्रों में खोले गए थे।

PMJDY की उपलब्धियाँ

वर्तमान स्थिति के अनुसार, PMJDY के अंतर्गत 53.13 करोड़ से अधिक खाते देश भर में खोले जा चुके हैं। इस योजना के तहत देश में 36 करोड़ से अधिक रुपे एटीएम जारी किए जा चुके हैं। इन कार्ड की खासियत यह है कि इन पर आमजनों को कोई चार्ज नहीं देना पड़ता, जबकि पहले विदेशी कम्पनियों के कार्ड पर सालाना फीस देनी पड़ती थी।

PMJDY पीएम मोदी

PMJDY खातों में औसतन ₹4000 से अधिक खाताधारक रख रहे हैं। यह दिखाता है कि देश में छोटी बचतें भी बढ़ रही हैं। अगस्त 2015 में इन खातों में औसतन ₹1015 ही जमा थे। इस हिसाब देखा जाए तो पिछले लगभग 10 वर्षों में छोटे बचतें 4 गुनी हो चुकी हैं। PMJDY का सीधा संबंध देश की डिजिटल भुगतान क्रान्ति UPI से भी है। PMJDY के तहत खोले गए खातों के कारण UPI लेनदेन में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है और यह गाँवों तक पहुँच सका है।

खाते खुले तो पहुँची सीधी मदद

PMJDY खातों का सबसे बड़ा लाभ देश की आम जनता को सरकारी लाभ लेने में रहा है। सरकार द्वारा लोगों के खाते में सीधे लाभ भेजने में बीते 10 वर्षों में खासी तेजी आई है। रिपोर्ट बताती है कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के तहत जहाँ 2013-14 में मात्र 10.8 करोड़ लोगों को सीधे सहायता राशि भेजी जा रही थी। वहीं, कोरोनाकाल के दौरान यह संख्या 98 करोड़ पहुँच गई। 98 करोड़ लाभार्थियों को अलग-अलग योजनाओं के तहत सहायता राशि उपलब्ध करवाई गई। यह इसीलिए संभव हो पाया, क्योंकि अब इन सबके पास बैंक खाता है।

PMJDY से बैंकों की भी सुधरी हालत

PMJDY से सिर्फ लोगों को ही नहीं, बल्कि बैंकों को भी फायदा हुआ है। लोगों द्वारा छोटी-छोटी बचत को बैंक में जमा करने के कारण अब बैंकों के पास अधिक पूँजी आ रही है। रिपोर्ट बताती है कि PMJDY के अंतर्गत खोले गए खातों में देश के लोगों ने ₹2 लाख करोड़ से अधिक की धनराशि जमा कर रखी है। इस धनराशि के आने से बैंकों को अपना संचालन करने में आसानी हुई है। 2014 से पहले बैकों की सेहत ख़ास अच्छी नहीं थी। खाताधारकों की संख्या बढ़ने और उनके लेनदेन के कारण इन बैंकों का लेनदेन भी बढ़ा है।

हर गिरफ्तारी के बाद रोकी ट्रायल, नई चार्जशीट के बाद नए सिरे से सुनवाई-गवाही: राजस्थान पुलिस की एक ‘भूल’, अजमेर सेक्स स्कैंडल में सजा सुनाने में लगे 32 साल

32 साल पहले हुए ‘अजमेर सेक्स कांड’ (Ajmer sex scandal) मामले में अभी कुछ दिन पहले फैसला आया तो इस केस की भयावहता पर दोबारा चर्चा होने लगी। लोग हैरान थे ये जानकर कि आखिर इतने बड़े मामले मे अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हो पाई थी? और क्यों 100 से ज्यादा लड़कियों को इंसाफ मिलने में इतना समय लगा? गड़बड़ी कहाँ हुई, ढिलाई कहाँ बरती गई? चलिए आज पूरे केस में क्या-क्या कार्रवाई कब-कब हुई इसे समझते हैं, लेकिन पहले जान लेते हैं कि आखिर इस पूरे कांड की शुरुआत हुई कैसे।

अजमेर सेक्स कांड कैसे खुला

साल 1992 में अजमेर का यह मामला सुर्खियों में आया था जब शहर में अचानक लड़कियों की न्यूड तस्वीरें वायरल होना शुरू हुई थी। लड़कियाँ सुसाइड करने लगी थीं और पूरा शहर इन तस्वीरों को देख शर्मसार हो रहा था। केस में रसूखदारों के नाम आने लगे थे। पुलिस केस दबाने में जुटी थी। मगर, तब एक न्यूजपेपर में इस घटना को लेकर एक खबर छपी और हड़कंप मच गया। बात बिगड़ती देख राजस्थान की तत्कालीन सरकार भैरोसिंह शेखावत ने जाँच को सीआईडी-सीबी को सौंपा।

कैसे हुई थी अजमेर सेक्स कांड की शुरुआत

पड़ताल हुई तो हर पहलु चौंकाने वाला था। सेक्स कांड के आरोपितों के तार दरगाह के खादिमों से जुड़ते मिले। पूरी साजिश रचने वालों ने सबसे पहले एक बिजनेसमैन के बेटे को निशाना बनाया था। उन्होंने उस लड़के से दोस्ती करके उसकी तस्वीरें उतारी थी और बाद में अपनी गर्लफ्रेंड को पोल्ट्री फार्म पर लाने को कहा था। लड़का जब पोल्ट्री फार्म पर गर्लफ्रेंड लाया तो वहाँ उसका भी रेप हुआ और न्यूड तस्वीरें निकाली गईं। इसके बाद लड़की से कहा गया कि वो अपनी सहेलियों को वहाँ लाए वरना उसकी फोटो हर जगह होगी।

लड़की भी डरकर उनकी बात मान बैठी। इसके बाद फार्म पर आने वाली हर लड़की के साथ रेप हुआ, दूसरों से रेप करवाया गया, उनके न्यूड फोटोशूट हुए और फिर उन्हें उसी के सआधार पर ब्लैकमेल करके अलग-अलग जगह बुलाया जाने लगा। मामले में बड़ा मोड़ तब आया जब आरोपितों ने फोटो को डेवलप कराने के लिए उन्हें लैब भेजा और लैब कर्मचारियों ने उन्हें बेचना शुरू कर दिया। लड़कियों को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। हर जगह सर्कुलेट करना शुरू कर दिया।

कौन-कौन था शामिल?

मामले में 18 आरोपितों का नाम उजागर हुआ जिसमें तत्कालीन यूथ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष फारूख चिश्ती, उपाध्यक्ष नफीस चिश्ती, ज्वाइंट सेक्रेट्री अनवर चिश्ती का नाम शामिल था। इनके नाम इस प्रकार हैं- हरीश तोलानी (कलर लैब मैनेजर), फारुख चिश्ती, नफीस चिश्ती (उपाध्यक्ष), अनवर चिश्ती (ज्वाइंट सेक्रेट्री), पुरुषोत्तम, इकबाल भाटी, कैलाश सोनी, सलीम चिश्ती, सोहैल गनी, जमीन हुसैन, अल्मास महाराज, इशरत अली, मोइजुल्लाह उर्फ पूतन इलाहाबादी, परवेज अंसारी, नसीम उर्फ टारजन, महेश लुधानी, शम्सू उर्फ माराडोना, जहूर चिश्ती, का नाम सामने आया।

चार्जशीट दायर करते समय हुई गलती

अखबार में खबर छपने के बाद जब जाँच एजेंसियों ने इसमें पड़ताल शुरू की तो 12 नाम मुख्य रूप से सामने आए। उसके बाद 30 नवंबर 1992 में इस मामले में जाकर पहली 8 लोगों के खिलाफ चार्जशीट 173 सीआरपीसी के तहत दायर हुई। हीं बाकी चार आरोपितों के खिलाफ मामले में चार अलग-अलग चार्जशीट दायर हुए।

केस में देरी का कारण

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में विशेषज्ञों से की गई बात से पता चलता है कि ये मामला 32 साल तक इसलिए खिंचा क्योंकि जब नई चार्जशीट दायर होती थी तो पहले से चले ट्रायल को रोककर फिर से ट्रायल शुरू करना पड़ता था। अगर 173 सीआरपीसी की जगह 299 सीआरपीसी में चार्जशीट दायर होती तो ऐसा नहीं होता।

इस केस में जितनी देरी हो रही थी आरोपित उतने बेखौफ थे। उन्हें पता था कि हर बार नई चार्जशीट दायर होनी है और हर बार केस नए सिरे से देखा जाएगा। पुलिस की भूल थी या कुछ और लेकिन साल 2003 तक इस केस के 7 आरोपित नफीस चिश्ती , इकबाल भाटी, सलीम चिश्ती, सोहैल गनी, जमीर हुसैन, अल्मास महाराज और नसीम उर्फ टारजन फरार रहे। बाद में जाकर ये पुलिस के हत्थे चढ़े।

साल 2003 में नफीस चिश्ती और नसीम टार्जन के पकड़े जाने के बाद इनके खिलाफ 2004 में चार्जशीट दाखिल हुई। 2005 तक 52 गवाहों के बयान दर्ज कराए गए, लेकिन उसके बाद केस के एक और आरोपित इकबाल भाटी मुबंई से गिरफ्तार हो गया। अब जिस समय 52 गवाह के बयान दर्ज हो चुके थे उसके बाद भी पुलिस को नई चार्जशीट दाखिल करनी पड़ी। दोबारा से गवाहों को कोर्ट में बुलाया गया और बयान दर्ज हुए।

20 गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद साल 2012 में सलीम चिश्ती को पुलिस ने पकड़ा और जाकर गिरफ्तारी हुई। वहीं जमीन हुसैन भी अग्रिम जमानत लेकर अमेरिका से भारत लौटा। इस तरह एक बार फिर ट्रायल रुका और नफीस चिश्ती, नसीम, इकबाल भाटी, सलीम चिश्ती और जमीर हुसैन के खिलाफ पुलिस ने फिर बयान दर्ज करने शुरू किए। 69 गवाहों की बयान दर्ज होने के बाद 2018 में फिर सोहैल गनी को पुलिस ने इस मामले में गिरफ्तार किया और इस तरह एक और बार पीछे की गई सारी मेहनत पर पानी फिर गया।

नई चार्जशीट दायर हुई नया ट्रायल हुआ। फिर 104 गवाहों ने कोर्ट में अपना बयान दर्ज कराया और इस तरह पूरा मामला 2024 तक खिंचता ही गया। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञों ने जो इस केस के लंबे खिंचने के बारे में बताया वो यही था कि आरोपितों को भगौड़ा मानते हुए 173 सीआरपीसी की बजाय 299 के तहत पेश करती तो शायद केस इतना लंबा न खिंचता। 173 सीआरपीसी में केस दर्ज होने के कारण बार-बार गवाही लेनी पड़ी। अगर केस 299 के तहत दर्ज होता तो ट्रायल भी जल्दी पूरा होता और फैसला भी आ जाता। 299 crpc का अर्थ यही होता है कि मामले में साफ किया जाए कि आरोपित फरार हैं और उन्हें तत्काल गिरफ्तार करने की संभावना नहीं है। ऐसे में उनकी अनुपस्थिति में गवाहों के बयान दर्ज हों।

32 साल में आए उतार-चढ़ाव

बता दें कि इस केस में इन 32 सालों में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले। कहने को पहली बार सजा 8 आरोपितों को 1998 में मिल गई थी। 18 मई 1998 को जिला जज ने कैलाश सोनी, हरीश तोलानी, इशरत अली, मोइजुल्लाह उर्फ पूतन इलाहाबादी, परवेज अंसारी, महेश लुधानी, अनवर चिश्ती और शम्सू उर्फ माराडोना को उम्रकैद की सजा दी थी लेकिन इन आरोपितों ने हाईकोर्ट में अपील की और 2001 में 4 आरोपितों महेश लुधानी, कैलाश सोनी, हरीश तोलानी और परवेज अंसारी को बरी कर दिया गया और इशरत अली, मोइजुल्लाह उर्फ पूतन इलाहाबादी, अनवर चिश्ती और शम्सू उर्फ माराडोना की सजा बरकरार रखी।

जिनकी सजा बरकरार रही उन्होंने 2003 में सुप्रीम कोर्ट में अपील की जहाँ उनकी सजा 10 साल कम कर दी गई और इस तरह 10 साल की सजा काटने के बाद वो सब रिहा हो गए। केस का मुख्य आरोपित फारूख चिश्ती पहले ही मानसिक बीमारी का हवाला देकर बचा हुआ था, लेकिन 2007 में उसे उम्रकैद की सजा हो गई। फिर फारूख चिश्ती भी हाईकोर्ट गया और कोर्ट ने इस बात पर गौर करते हुए कि उसे उसे सजा काटते हुए 11 साल हो गए थे इसलिए उसे भी छोड़ दिया गया। अब 20 अगस्त को इस मामले में नफीस चिश्ती, नसीम उर्फ़ टार्जन, सलीम चिश्ती, इकबाल भाटी, सोहेल गनी और सैयद जमीर हुसैन को दोषी ठहराया गया है और इन्हें सजा हुई।

ऐसा नहीं है कि अब इस मामले में हर आरोपित को सजा मिल गई हो। केस का एक आरोपित अल्मास महाराज आज भी फरार है। कहा जाता है कि वो अमेरिका में रहता है। उसके खिलाफ इंटरपोल ने रेड कॉर्नर नोटिस इश्यू कर रखा है। भविष्य जब कभी वो गिरफ्तार होगा तो फिर से वही समस्या देखने को मिलेगी जो इतने समय तक थी। यानी दोबारा नई चार्जशीट और नया ट्रायल। इस केस को इतना समय बीत गया है कि पीड़िताएँ थक चुकी हैं।