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नक्सलवाद के खात्मे की HM अमित शाह की डेडलाइन नजदीक, छत्तीसगढ़-ओडिशा में हजारों सरेंडर: जानें- किन योजनाओं से बदल रही तस्वीर

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद के खात्मे का जो संकल्प लिया गया था, वह अब केवल एक राजनीतिक बयान नहीं रह गया है, बल्कि जमीनी हकीकत में बदलता हुआ दिखाई दे रहा है।

दशकों तक जिन इलाकों को लाल आतंक का गढ़ माना जाता था, जहाँ हिंसा, डर और अस्थिरता आम जनजीवन का हिस्सा बन चुके थे, वहाँ अब धीरे-धीरे शांति, विकास और भरोसे की वापसी हो रही है। जैसे-जैसे तय की गई डेडलाइन करीब आ रही है, वैसे-वैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीर भी बदलती दिख रही है।

नक्सलवाद जिन इलाकों में पैर जमाए बैठा था, वहाँ विकास रुक गया था, प्रशासन कमजोर पड़ गया था और आम लोग डर के साए में जीवन जीने को मजबूर थे। लेकिन हाल के वर्षों में खासतौर से 2025 और 2026 की शुरुआत में हुई निर्णायक कार्रवाइयों ने यह संकेत दे दिया है कि लाल आतंक अब अपने अंतिम दौर में पहुँच चुका है।

नक्सल मुक्त छत्तीसगढ़ के आँकड़े  

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान अब निर्णायक चरण में पहुँच चुका है और नवंबर 2025 से अक्टूबर 2025 के बीच राज्य के कई नक्सल प्रभावित जिलों में बड़ी सफलताएँ दर्ज की गई हैं, जिससे बस्तर अंचल में माओवादी नेटवर्क की पकड़ तेजी से कमजोर हुई है।

नारायणपुर जिले में 25 नवंबर 2025 को 28 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें 19 महिलाएँ शामिल थीं और 22 नक्सलियों पर कुल 89 लाख रुपए का इनाम घोषित था, ये सभी दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी से जुड़े थे और पूर्वी बस्तर डिवीजन की मिलिट्री कंपनी नंबर 6 के सक्रिय कैडर रहे, जिनमें पंडी ध्रुव उर्फ दिनेश, दुले मंडावी उर्फ मुन्नी, छत्तीस पोयम और पदनी ओयम जैसे हार्डकोर सदस्य भी शामिल थे, जिन्होंने SLR, INSAS और .303 राइफलें पुलिस को सौंपीं।

नारायणपुर नक्सली सरेंडर (फोटो साभार: ETV Bharat)

नारायणपुर जिले में ही 2025 के दौरान कुल 287 नक्सली मुख्यधारा में लौट चुके हैं, जो इस बात का संकेत है कि यह इलाका अब तेजी से नक्सल प्रभाव से बाहर आ रहा है। इसी तरह कांकेर जिले में नॉर्थ सब-जोनल ब्यूरो से जुड़े 21 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें 4 DVCM, 9 ACM और 8 पार्टी सदस्य शामिल थे।

ये सभी केशकाल डिवीजन के कुएमारी और किसकोडो एरिया कमेटी से जुड़े थे और उन्होंने 3 AK-47, 4 SLR, 2 INSAS, 6 .303 और 1 BGL लॉन्चर सहित कुल 18 हथियार जमा किए, जबकि कांकेर के कामतेड़ स्थित BSF कैंप में करीब 50 नक्सलियों ने भी सरेंडर किया, जिनमें बटालियन कमांडर स्तर के कैडर भी शामिल थे।

24 जुलाई 2025 को छत्तीसगढ़ के बीजापुर में 25, दंतेवाड़ा 15, नारायणपुर 8, सुकमा 5 और कांकेर 13 में एक ही दिन में कुल 66 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिन पर ₹1.3 करोड़ से अधिक का इनाम घोषित था, जिससे यह साफ हुआ कि बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा और कांकेर जैसे परंपरागत नक्सल प्रभावित जिले अब धीरे-धीरे उग्रवाद से बाहर निकल रहे हैं।

(फोटो साभार : X_@ITBP_official)

इसके अलावा 15 और 16 अक्टूबर 2025 को छत्तीसगढ़ में दो दिनों के भीतर 197 नक्सलियों ने हथियार डाले, जिसमें 16 अक्टूबर को 170 और 15 अक्टूबर को 27 नक्सली शामिल थे, जो हाल के वर्षों में राज्य का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण अभियान माना जा रहा है।

2025 में अब तक छत्तीसगढ़ में 1000 से अधिक नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं, जबकि 2024–25 के दौरान 500 से अधिक नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए, जिससे बस्तर, नॉर्थ बस्तर, अबूझमाड़, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर, सुकमा और दंतेवाड़ा जैसे इलाकों में नक्सल संगठन की कमर टूट चुकी है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार, जनवरी 2024 में बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद से अब तक छत्तीसगढ़ में 2100 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, 1785 गिरफ्तार हुए और 477 मुठभेड़ों में ढेर किए गए, जबकि अबूझमाड़ और नॉर्थ बस्तर को आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित किया जा चुका है।

छत्तीसगढ़ और ओडिशा : नक्सल मुक्त होते इलाके

ओडिशा के मलकानगिरी जिले में गुरुवार (05 फरवरी 2026) नक्सल विरोधी अभियान को बड़ी सफलता मिली है। यहाँ एक टॉप माओवादी कमांडर सुखराम मरकाम ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया। उस पर 21 लाख रुपए का इनाम घोषित था और वह लंबे समय से फायरिंग, IED ब्लास्ट, अपहरण और आम नागरिकों की हत्या जैसी गंभीर घटनाओं में शामिल रहा है।

मलकानगिरी के SP विनोद पाटिल ने इसे बड़ी कामयाबी बताते हुए कहा कि नक्सलियों के लिए हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का यही सही समय है। उन्होंने बाकी नक्सली कैडरों से भी सरेंडर करने की अपील की। सरेंडर के दौरान आरोपित ने SLR राइफल, कारतूस और दो शक्तिशाली IED भी पुलिस को सौंपे, जिससे इलाके की सुरक्षा और मजबूत हुई है।

(फोटो साभार: दैनिक जागरण)

पुलिस के अनुसार, इस सरेंडर के बाद मलकानगिरी जिला अब प्रभावी रूप से नक्सल मुक्त हो गया है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि लगातार चलाए गए सुरक्षा अभियानों, मजबूत खुफिया तंत्र और प्रशासन की सतर्कता का नतीजा है।

इसी तरह छत्तीसगढ़ के एक बड़े नक्सल प्रभावित इलाके को भी नवंबर 2025 में आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित किया गया था। यह इलाका कभी नक्सली हिंसा और डर का केंद्र हुआ करता था, लेकिन अब वहाँ शांति लौट रही है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और स्थानीय प्रशासन की सक्रियता से नक्सलियों की पकड़ कमजोर पड़ गई।

मलकानगिरी के कुछ हिस्सों को भी हाल ही में नक्सल मुक्त घोषित किया गया है। पहले जहाँ पुलिस का पहुँचना भी खतरे से खाली नहीं था, अब वहाँ चौकियाँ मजबूत हो रही हैं, सड़कें बन रही हैं, संचार सुविधाएँ बेहतर हो रही हैं और सरकारी योजनाएँ आम लोगों तक पहुँच रही हैं।

ये घटनाएँ इस बात का साफ संकेत हैं कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब निर्णायक दौर में पहुँच चुकी है। पुलिस और प्रशासन की मेहनत से प्रभावित इलाकों में धीरे-धीरे सामान्य जीवन लौट रहा है, लोग बिना डर के रह पा रहे हैं और विकास का रास्ता खुल रहा है।

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के गोगुंडा इलाके में सुरक्षाबलों ने माओवादी आतंक के प्रतीक बने कुख्यात नेता रमन्ना के 20 फीट ऊँचे स्मारक को ध्वस्त कर दिया है। CRPF की 74वीं बटालियन ने एंटी-नक्सल ऑपरेशन के तहत इस ढाँचे को विस्फोट के जरिए जमींदोज किया।

फोटो साभार – ईटीवी भारत

यह स्मारक माओवादी संगठन के लिए डर और वैचारिक प्रचार का माध्यम था, जिसे खत्म कर सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर बड़ा प्रहार किया है। यह कार्रवाई बस्तर और सुकमा क्षेत्र को नक्सलमुक्त बनाने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार का वर्ष रहा 2025

साल 2025 को नक्सलवाद के खिलाफ एक निर्णायक और ऐतिहासिक वर्ष माना जा रहा है, क्योंकि इस दौरान सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के खात्मे के लिए बड़े और प्रभावी ऑपरेशन किए।

जंगलों में फैले नक्सली नेटवर्क को खत्म किया गया, कई बड़े नक्सली कमांडरों को मार गिराया गया या गिरफ्तार किया गया और उनके फंडिंग व हथियार सप्लाई के रास्तों पर सख्त कार्रवाई करते हुए रोक लगाई गई।

इस साल सैकड़ों नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए या पकड़े गए, कई बड़े संगठन कमजोर हो गए और बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस के संयुक्त अभियानों से नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या भी घट गई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, नक्सली हिंसा की घटनाओं में पिछले वर्षों की तुलना में बड़ी गिरावट आई है, जिससे साफ है कि सरकार की नीति अब सिर्फ बचाव तक सीमित नहीं रही, बल्कि आक्रामक, मजबूत और निर्णायक हो चुकी है।

पहले कैसे थे हालात? जब डर ही कानून था

नक्सल प्रभावित इलाकों के पुराने हालात पर नजर डालें, तो साफ समझ आता है कि इन क्षेत्रों में सामान्य जीवन इनके लिए कितना मुश्किल था। कई गाँवों में स्कूल सालों तक बंद रहे, क्योंकि शिक्षक और अभिभावक दोनों ही नक्सली हिंसा से डरते थे। स्वास्थ्य सेवाएँ लगभग न के बराबर थीं, डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ का वहाँ पहुँचना मुश्किल माना जाता था।

सड़कें अधूरी थीं, मोबाइल नेटवर्क कमजोर या बिल्कुल नहीं था और बैंकिंग सुविधाएँ लोगों की पहुँच से बाहर थीं। ग्रामीणों से जबरन वसूली आम बात थी और नक्सली फरमान ही कई जगहों पर स्थानीय कानून का रूप ले चुके थे। शाम ढलते ही लोग अपने घरों में कैद हो जाते थे और बच्चों का भविष्य अंधकार में डूबता जा रहा था।

नक्सली केवल हथियारों के बल पर नहीं, बल्कि डर, प्रतीकों और मानसिक दबाव के जरिए लोगों पर काबू पते थे। उनके झंडे, पोस्टर और उनके ‘स्मारक’ आम लोगों के भीतर डर का काम करती थी।

बदलती जमीनी हकीकत: विकास, शिक्षा और भरोसे की वापसी

अब वही इलाके धीरे-धीरे एक नई पहचान की ओर बढ़ रहे हैं। जिन क्षेत्रों में पहले सरकारी गाड़ियाँ भी मुश्किल से पहुँच पाती थीं, वहाँ अब नई सड़कें बन रही हैं, पुल तैयार हो रहे हैं और मोबाइल व इंटरनेट नेटवर्क मजबूत किया जा रहा है। बैंकिंग सेवाएँ, डाक सुविधाएँ और राशन वितरण प्रणाली पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी हो गई हैं।

स्कूल दोबारा खुल रहे हैं, बच्चों की नियमित उपस्थिति बढ़ रही है और युवाओं में शिक्षा व रोजगार को लेकर नई जागरूकता दिखाई दे रही है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सक्रिय हो रहे हैं, एम्बुलेंस सेवाएँ पहुँच रही हैं और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ ग्रामीणों तक पहुँचने लगा है।

छत्तीसगढ़ का सुकमा अब बदलते दौर की नई कहानी लिख रहा है। घने जंगल, मुश्किल भौगोलिक हालात और सीमित सरकारी पहुँच के चलते यहाँ लंबे समय तक ‘लाल आतंक’ पनपता रहा लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं।

केंद्र और राज्य सरकार की पहल पर शुरू हुई ‘आम बगीचा योजना’ ने इलाके की नक्सली पहचान को पलट देना शुरू कर दिया है। छोटे-छोटे बागानों ने ग्रामीणों की आमदनी बढ़ाई है, महिलाओं ने व्यवसाय में कदम रखा है और कुछ तो ‘लखपति दीदी’ बनने की ओर अग्रसर हैं।

यह सिर्फ आर्थिक बदलाव नहीं है बल्कि सुरक्षा, आत्मविश्वास और सामाजिक सोच में भी स्पष्ट सुधार दिख रहा है। जब विकास यहाँ तक पहुँचता है, तो असर केवल पैसों तक सीमित नहीं रहता, यह लोगों की उम्मीदें, हौसला और भविष्य की चुनौतियों से निपटने की शक्ति भी बढ़ाता है।

‘आम बगीचा परियोजना’ का मुख्य उद्देश्य यह है कि ग्रामीण लोग खेती के अलावा स्थायी और टिकाऊ तरीकों से आय हासिल कर सकें। अस्थिरता के बीच छोटे-मोटे खेत और बारहमासी फसलें जोखिम भरी होती हैं। फलों के पेड़, खासकर संकर किस्में, कुछ सालों के भीतर नियमित फल देने लगती हैं और कई वर्षों के लिए आय का स्रोत बन जाता हैं।

मर्काम धूला ने कहा की “प्रशासन की मदद से हमने आम, नींबू और नारियल लगाए, अब कमाई होने वाली है।”

प्रशासन ने देखा कि सुकमा की मिट्टी और जलवायु फलों के लिए अनुकूल है, इसलिए यहाँ बागवानी को बढ़ावा देना मतलब लोगों को लंबे समय के लिए आर्थिक सुरक्षा देना है। साथ ही महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ जैसी योजनाओं से जोड़कर उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ाने की भी कोशिश की जा रही है।

जहाँ पहले डर का माहौल था, वहाँ अब सामान्य जीवन की वापसी हो रही है। लोग खुले तौर पर अपने व्यवसाय शुरू कर रहे हैं, कृषि और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है और विकास की नई उम्मीदें जन्म ले रही हैं।

क्या कहते है आँकड़े

सरकारी और गृह मंत्रालय के ताज़ा आँकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुकी है। संसद में साझा किए गए नवीनतम डेटा के अनुसार, भारत में नक्सली हिंसा अपने चरम वर्ष 2010 की तुलना में करीब 89% तक घट चुकी है।

जहाँ 2010 में 1,936 हिंसक घटनाएँ दर्ज हुई थीं, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर लगभग 218 रह गई है। इसी तरह, नक्सल हिंसा से होने वाली मौतों में भी 91% तक की गिरावट आई है।

2010 में जहाँ 1005 मौतें दर्ज हुई थीं, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर लगभग 93 से 150 के बीच सिमट कर रह गया है। नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 126 से घटकर 2025 में केवल 11 रह गई है, जबकि सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या 36 से घटकर सिर्फ 3 (बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर छत्तीसगढ़) तक सिमट गई है, जो रेड कॉरिडोर के लगभग पतन का संकेत है।

2025 में ही सुरक्षा बलों ने 317–364 नक्सलियों को मार गिराया, जिनमें 12 से अधिक शीर्ष कमांडर शामिल थे, साथ ही 942-1022 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और लगभग 2000-2337 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जो संगठन के आंतरिक मनोबल के टूटने और सरकार की पुनर्वास नीति की सफलता को दर्शाता है।

बीते एक दशक में 8000 से अधिक नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौट चुके हैं और सरकार की सरेंडर कम रिहैबिलिटेशन नीति, आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण, मासिक वजीफा और रोजगार योजनाओं ने इस बदलाव को गति दी है।

जैसे-जैसे 31 मार्च 2026 की तारीख नजदीक आ रही है, नक्सली संगठनों के भीतर बेचैनी और भ्रम की स्थिति बढ़ती जा रही है। निचले स्तर के कैडर हथियार छोड़ रहे हैं, नेतृत्व संकट गहरा रहा है और संगठन के भीतर अविश्वास की भावना पैदा हो रही है।

फंडिंग नेटवर्क कमजोर पड़ रहे हैं, सप्लाई चैनल टूट रहे हैं और कई नक्सली समूह अपने अस्तित्व को लेकर असमंजस में हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि हाल के समय में बड़ी संख्या में नक्सली स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर चुके हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि लाल आतंक अब अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है।

लाल आतंक से आजाद होती जमीन: बदलती पहचान और नई उम्मीदें

जहाँ पहले बारूद की गंध और हिंसा का साया था, वहाँ अब विकास, शिक्षा और अवसरों की चर्चा हो रही है। नई पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर अधिक आशावान दिखाई दे रही है। छोटे व्यापार, कृषि आधारित उद्यम, पर्यटन और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है।

नक्सल प्रभावित रहे इलाके अब हिंसा की पहचान से बाहर निकलकर विकास और संभावनाओं की पहचान गढ़ने लगे हैं। लोग अपने क्षेत्र को डर से नहीं, बल्कि उम्मीद और अवसर से जोड़कर देखने लगे हैं।

क्रिकेट पर नासिर हुसैन की भारत से नफरत आई सामने, पाकिस्तान-बांग्लादेश के समर्थन में कर रही बैटिंग: जानें किस तरह ‘उम्माह’ के लिए BCCI-ICC को कोस रहा पूर्व ‘ब्रिटिश’ कैप्टन

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन का बयान क्रिकेट को जोड़ने के बजाय उसे और बाँटता हुआ दिख रहा है। ICC और BCCI पर सवाल उठाना एक बात है, लेकिन बहिष्कार और अव्यवस्था को पसंद करना क्रिकेट की भावना के खिलाफ है। नासिर हुसैन ने पाकिस्तान के 15 फरवरी को भारत के खिलाफ T20 वर्ल्ड कप मैच का बॉयकॉट करने के फैसले को सही कहा है, उसे वर्ल्ड क्रिकेट में ‘फेयरनेस’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।

स्काई स्पोर्ट्स पॉडकास्ट के दौरान हुसैन ने सवाल किया कि अगर भारत ने सरकारी पाबंदियों या सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर कहीं खेलने से मना कर दिया होता, तो क्या ICC इतना ही सख्त रवैया अपनाता। उन्होंने टॉप बॉडी पर असरदार बोर्ड के आगे झुकने का आरोप लगाया, साथ ही बांग्लादेश और पाकिस्तान की ‘अपनी बात पर अड़े रहने’ की तारीफ की।

यह सब बयान बीसीसीआई और भारत को कटघड़े में खड़े करने के लिए थे, जबकि विवाद की जड़ में बांग्लादेश और पाकिस्तान का फैसला था।

हुसैन ने बांग्लादेश की भारत में नहीं खेलने के फैसले की तुलना चैंपियंस ट्रॉफी के दौरान भारत के पाकिस्तान जाने से मना करने से कर दी। इससे भी उनकी मंशा समझ में आती है।

सबसे पहले, बात करते हैं बहस की अहम वजह बांग्लादेश की। बांग्लादेश को BCCI की मर्जी से T20 वर्ल्ड कप से बाहर नहीं किया गया था। ICC ने अपने सदस्यों की मीटिंग बुलाई थी। चौदह बोर्ड ने बांग्लादेश को शामिल करने के खिलाफ वोट किया। सिर्फ बांग्लादेश और पाकिस्तान की क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने इसका समर्थन किया।

यह भारत का दबाव नहीं था, बल्कि यह दुनिया के ज़्यादातर क्रिकेट खेलने वाले देशों का बांग्लादेश को यह बताना था कि आप किसी ग्लोबल टूर्नामेंट से एक महीने पहले शेड्यूल और कॉन्ट्रैक्ट इस तरह नहीं तोड़ सकते। यह उम्मीद नहीं कर सकते कि बाकी सब इस गड़बड़ी को झेल लेंगे।

बांग्लादेश को अचानक भारत दौरे के दौरान सुरक्षा सताने लगी

जब KKR ने आम लोगों के विरोध को देखते हुए बांग्लादेशी बॉलर मुस्तफिजुर रहमान को अपनी टीम से बाहर निकाल दिया और उसका IPL कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया गया। इसके बाद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड को अचानक भारत दौरे को लेकर ‘सिक्योरिटी की चिंता’ होने लगी। पहले ऐसा कोई डर नहीं था। टीम पहले भी भारत दौरे पर आ चुकी थी। कैलेंडर काफी पहले से पता था। घबराहट तभी सामने आई जब एक फ्रेंचाइजी का फैसला उन्हें पसंद नहीं आया।

नासिर हुसैन ने केकेआर के फैसले को बीसीसीआई का फैसला मान लिया। BCCI आईपीएल की KKR जैसी फ्रेंचाइजी नहीं चलाता। लीग ऑर्गनाइजर प्राइवेट मालिकों को खास खिलाड़ियों को साइन करने या बनाए रखने के लिए मजबूर नहीं करते हैं, और न ही कर सकते हैं। फ्रेंचाइजी क्रिकेट का पूरा कमर्शियल लॉजिक यही है। अगर इन्वेस्टर्स को बताया जाए कि उन्हें किसे खरीदना है, तो मॉडल खत्म हो जाएगा। कोई भी सीरियस भारतीय बोली लगाने वाला ऐसी लीग में पैसा नहीं लगाएगा जहाँ खिलाड़ियों की पसंद नेशनैलिटी कोटा या पॉलिटिकल प्रेशर से तय होती हो। इसकी जानकारी तो नासिर हुसैन को होगी ही।

अगर बांग्लादेश को लगता कि उसके साथ गलत बर्ताव हो रहा है, तो उसके पास कई ऑप्शन थे, IPL से बात करना, अपने खिलाड़ियों को हिस्सा लेने से रोकना, या बोर्ड के जरिए बातचीत करना। इसके बजाय उसने टूर्नामेंट से कुछ हफ़्ते पहले ही ‘सिक्योरिटी की चिंताएँ’ खड़ी कर दीं, जिससे बहुत ज़्यादा दिक्कतें पैदा हो गईं।

ICC ने उसी तरह जवाब दिया जैसा कोई भी रेगुलेटर देता, उन नियमों और टाइमलाइन को लागू करके जिन पर सब पहले ही राज़ी हो चुके थे और स्कॉर्टलैंड को बांग्लादेश की जगह मौका देकर ये बता दिया कि सबकुछ ठीक है।

हुसैन ने सबसे बड़ी गलती बांग्लादेश के आखिरी मिनट में हटने की तुलना भारत के 2025 चैंपियंस ट्रॉफी के लिए पाकिस्तान जाने से मना करने से करके की हैं। वह लोगों को यह नहीं बताते हैं कि भारत ने ICC और PCB दोनों को महीनों पहले ही बता दी थी। वह अपने पॉडकास्ट के दौरान ये नहीं कहते कि भारत में आतंकवाद फैलाने के पीछे पाकिस्तान का हाथ रहा है। भारत ने इसलिए पाकिस्तान में जाने से इनकार किया था।

अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुआ आतंकी हमला इसका जीता जागता सबूत है। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने भारतीय टूरिस्ट को गैर-मुस्लिम बताकर उन पर गोलियाँ चलाईं। ये घटना चैंपियंस ट्रॉफी खत्म होने के कुछ हफ़्ते बाद हुआ था। यह कोई पुराना इतिहास या एब्स्ट्रैक्ट जियोपॉलिटिक्स नहीं है।

इसके बावजूद, भारत ने एशिया कप में पाकिस्तान के खिलाफ अपने मैच खेले। BCCI आसानी से टूर्नामेंट से हट सकता था, लेकिन उसने पूरी तरह से एसोसिएट देशों के कमर्शियल फायदे के लिए खेला। बदले में उसे क्या मिला? पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का एक सिरफिरा चीफ, जो ट्रॉफी लेकर भाग गया। भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ नहीं मिलाया था और टीम ने पाकिस्तान के किसी सियासी व्यक्ति से ट्रॉफी लेने से मना कर दिया। भारतीय खिलाड़ी चाहते थे कि उन्हें कोई दूसरा व्यक्ति ट्रॉफी दे, लेकिन पीसीबी चीफ अड़े रहे। नतीजा महीनों तक ट्रॉफी पाकिस्तान में पड़ा रहा।

बांग्लादेश को भारत से बॉर्डर पार से आतंक का सामना नहीं करना पड़ता। पाकिस्तान भारत में आतंकियों को भेजता है, हथियार भेजता है और अब नशे का अवैध कारोबार भी करता है। ऐसे में यह दिखाना कि ये एक जैसे हालात हैं, बेईमानी है।

क्या नासिर हुसैन को कई महीनों पहले सुरक्षा कारणों से भारत द्वारा पाकिस्तान में नहीं खेलने और आखिरी मिनट में पॉलिटिकल गुस्से की वजह से बांग्लादेश का टी20 से बाहर जाने के बीच का फर्क नहीं पता।

फिर भावनाओं और भावुकता के क्षण आते हैं। वे कहते हैं, “किसी समय, किसी को कहना चाहिए, बहुत हो गई यह पॉलिटिक्स, क्या हम वापस क्रिकेट खेलना शुरू कर सकते हैं?”

यह PCB नहीं था, जिसने सबके सामने ऐलान किया था कि पाकिस्तान 15 फरवरी को भारत के साथ नहीं खेलेगा। यह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ थे, जिन्होंने भारत के साथ मैच नहीं खेलने की बात कही। जब कोई सरकार का मुखिया खेल का बॉयकॉट करने का ऐलान करता है, तो राजनीति उन्हें नहीं दिखाई देती है।

बल्कि BCCI को ही खेल का राजनीतिकरण करने का आरोप लगा रहे नासिर हुसैन की सोच एकतरफा नजर आती है।

नासिर हुसैन ने खुलकर कहा, ‘मुझे अच्छा लगता है कि बांग्लादेश अपने खिलाड़ियों के लिए डटा रहा। मुझे यह भी पसंद है कि पाकिस्तान ने बांग्लादेश का समर्थन किया।’ यह सोच क्रिकेट भावना के विरुद्ध है। कोई क्रिकेटर वैश्विक आयोजन के बहिष्कार की तारीफ कैसे कर सकता है?

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन ने कहा, ‘सबको बस एक ही चीज चाहिए, निरंतरता। बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत के साथ एक जैसा व्यवहार होना चाहिए।’ उन्होंने यह भी जोड़ा, ‘पावर के साथ जिम्मेदारी आती है।’ लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि अनुबंध तोड़ना, मैच न खेलना और अंतिम समय पर टूर्नामेंट में अमूक मैच नहीं खेलने का ऐलान करना किस तरह जिम्मेदारी है?

ICC पर यह आरोप लगाना कि यह BCCI का ही एक एक्सटेंशन है, पूरी सच्चाई से नजर फेरना है। फाइनेंशियल सच्चाई को नजरअंदाज करना है। दरअसल ICC के सबसे बड़े रेवेन्यू ड्राइवर इंडिया-सेंट्रिक ब्रॉडकास्ट डील हैं, खासकर इंडिया-पाकिस्तान मैच। उस पैसे का एक बड़ा हिस्सा एसोसिएट और छोटे बोर्ड को रीडिस्ट्रिब्यूट किया जाता है।

जब पाकिस्तान मैचों का बॉयकॉट करता है या बांग्लादेश शेड्यूल बिगाड़ देता है, तो यह ‘इंडिया को नुकसान’ नहीं पहुँचा रहा है, यह उसी पूल को छोटा कर रहा है जो ग्लोबल क्रिकेट के कमज़ोर सदस्यों को सपोर्ट करता है। ठीक इसीलिए यह आइडिया कि ICC को लगातार कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने में शामिल होना चाहिए, बेतुका है। नियम किसी वजह से होते हैं। अगर आप हारते हैं, तो आपको पैसे देने पड़ते हैं। अगर आप एग्रीमेंट तोड़ते हैं, तो आपको नतीजे भुगतने पड़ते हैं। यह ‘BCCI कंट्रोल’ नहीं है, यह बेसिक गवर्नेंस है।

अगर पाकिस्तान को लगता है कि उसके पास इस सिस्टम के बाहर जिंदा रहने के लिए आर्थिक ताकत है, तो वह कोशिश करने के लिए आज़ाद है। वह एक पैरेलल बॉडी बना सकता है और दूसरों को भी इसमें शामिल होने के लिए मना सकता है। इसे मौजूदा स्ट्रक्चर को नुकसान पहुँचाने और खुद को पीड़ित दिखाने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।

वर्ल्ड कप 2023, जब हुसैन की इंग्लिश टीम ने नहीं खेला था मैच

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन यह भी भूल गए कि उनके नेतृत्व में इंग्लैंड टीम ने राजनीतिक वजहों से जिम्बाब्वे में खेलने से मना कर दिया था। हालाँकि इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात हुसैन का अपना इतिहास है। 2003 के वर्ल्ड कप में, हुसैन की लीडरशिप वाली इंग्लैंड टीम ने जिम्बाब्वे के साथ खेलने से मना कर दिया था, क्योंकि वहाँ रॉबर्ट मुगाबे के शासन का विरोध हो रहा था। वहाँ इंग्लैंड की टीम को कोई सुरक्षा खतरा नहीं था। हुसैन ने उस फैसले का सपोर्ट किया।

उन्होंने ECB पर एक छोटे बोर्ड को धमकाने का आरोप नहीं लगाया। उन्होंने ICC की निरंतरता पर कुछ नहीं कहा। उन्होंने यह शिकायत नहीं की कि क्रिकेट का राजनीतिकरण किया जा रहा है। इसके विपरीत उन्होंने बाद में कहा कि उन्हें अपने इस रवैये पर ‘गर्व’ है।

2009: हुसैन तब कहाँ थे, जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे को वीजा देने से मना कर दिया

साल 2009 में जिम्बाब्वे को T20 वर्ल्ड कप से आसानी से बाहर कर दिया गया और उसकी जगह स्कॉटलैंड को शामिल कर लिया गया, जिसे ICC ने “विन-विन” सॉल्यूशन कहा। इंग्लैंड ने जिम्बाब्वे के खिलाड़ियों को वीजा देने से मना कर दिया। फिर से, हुसैन ने ताकतवर बोर्ड्स के छोटी टीमों को कुचलने के बारे में कोई बात नहीं कही। ज़िम्मेदारी के बारे में कोई लेक्चर नहीं दिया। जिम्बाब्वे क्रिकेट को ‘कमजोर’ करने पर कोई आँसू नहीं बहाए। साफ़ है, खेल में पॉलिटिक्स तब ठीक है जब इंग्लैंड ऐसा करता है, लेकिन जब भारत नियमों का पालन करने पर जोर देता है, तो यह बहुत बुरा लगता है।

दरअसल हुसैन ने जो बातें कही वह ‘निरंतरता’ के बारे में नहीं है। यह पावर में बदलाव के बारे में है। वर्ल्ड क्रिकेट में सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी अब लॉर्ड्स या ECB नहीं है। यह BCCI है। यह सच्चाई एंग्लो कमेंट्री के एक खास हिस्से को परेशान करती है, जो तब पूरी तरह से सहज था जब ‘सिद्धांत’ इंग्लिश हितों के साथ जुड़े होते थे और जब वे नहीं होते थे तो काफ़ी लचीला था।

क्रिकेट कभी भी पॉलिटिकल वैक्यूम में नहीं रहा। 2003 में भी नहीं था। 2009 में भी नहीं था। आज भी नहीं है। फ़र्क यह है कि अब, भारत से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह दूसरे बोर्ड के पॉलिटिकल नाटकों का खर्च चुपचाप उठाए। ICC को अपने कॉन्ट्रैक्ट लागू करने चाहिए। BCCI को अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए। और पाकिस्तान और बांग्लादेश को यह तय करना चाहिए कि वे नियमों पर आधारित सिस्टम का हिस्सा बनना चाहते हैं या नहीं।

जहाँ तक ​​नासिर हुसैन की बात है, तो ‘कंसिस्टेंसी’ के लिए उनका अचानक आया जुनून ज़्यादा असरदार होगा अगर वे इसे अपने रिकॉर्ड पर लागू करें। जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे का बॉयकॉट किया, तो पॉलिटिक्स और खेल टकराए थे। जब पाकिस्तान अपनी सरकार के कहने पर भारत के साथ खेलने का बॉयकॉट करता है, तो अचानक उनकी भाषा बदल जाती है और सारा दोष BCCI पर डालते हैं कि है इसने क्रिकेट को खराब कर दिया है। यह सिद्धांत नहीं है, यह क्रिकेट पर कंट्रोल खोने का गुस्सा है।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे मूल रूप में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

घूसखोर पंडत… एक टाइटल नहीं, प्रयोग है हिंदुओं की सहनशीलता परखने का: समझिए पूरे बवाल को, दोबारा न शुरू हो जाए ‘ढोंगी बाबा-लालची ब्राह्मण’ वाला पुराना प्रोपगेंडा

नेटफ्लिक्स पर ‘घूसखोर पंडत’ नाम की फिल्म का टीजर सामने आया। उसी पल साफ हो गया कि असल में कुछ बदला नहीं है। बल्कि ये ओटीटी प्लैटफॉर्म और बॉलीवुड इंडस्ट्री का वही पुराना खेल है। फिल्म की रिलीज डेट तय नहीं हुई है, लेकिन नाम तय कर चुका है कि निशाना कौन होगा। ‘घूसखोर’ और ‘पंडत’ को एक साथ जोड़ देना कोई मासूम क्रिएटिविटी नहीं है, यह वही प्रोपेगेंडा है जो बॉलीवुड और नेटफ्लिक्स सालों से इस्तेमाल करते आए हैं, जहाँ पंडित और ब्राह्मण पहचान ‘सेफ टारगेट’ समझी जाती है।

इससे पहले ‘धुरंधर’ आई, ‘द कश्मीर फाइल्स’ आई और जब लोगों को लगने लगा कि अब शायद असली मुद्दों पर फिल्मे बनने लगी हैं, पूरा माहौल दक्षिणपंथी हो गया, तभी ‘घूसखोर पंडत’ नाम से फिल्म आ टपकती है। एक ओर जब देशभर में UGC के नए नियमों को लेकर ब्राह्मणों के खिलाफ नफरत खुलेआम फैलाई जा रही है, उसी बीच में इस नाम का आना किसी भी तरह से संयोग नहीं कहा जा सकता है।

बल्कि फिल्म का ऐसा नाम एक प्रयोग जरूर कहा जा सकता है, जिससे हिंदुओं की सहनशीलता को परखा जा सके। प्रयोग उन ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द बंगाल फाइल्स’ और ‘धुरंधर’ के आलोचकों के लिए भी है, जिससे ‘घूसखोर पंडत’ नाम देकर बॉलीवुड की छवि को बैलेंस किया जा सके। लेकिन यह नया नहीं है, ये बॉलीवुड में सालों से होता आया है, जहाँ पंडित और बाबा की छवि को बदनाम कर, उन्हें घूस, लालच और पाखंड से जोड़कर बेहिचक पेश किया जाता है। क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री को पता है कि यही ‘सेफ टारगेट’ है।

घूसखोर पंडत कोई मासूम टाइटल भी नहीं है और न ही इसे किसी एक कहानी की आजादी कहकर टाला जा सकता है। बॉलीवुड और अब नेटफ्लिक्स बरसों से पंडित और ब्राह्मण पहचान को एक खास फ्रेम में फिट करता आया है, जहाँ नाम के साथ ही चरित्र का फैसला सुना दिया जाता है।

‘दुश्मन’ में गोकुल पंडित को बलात्कारी और सीरियल किलर बनाया गया, ‘मातृभूमि’ में पंडित जगन्नाथ सामाजिक हिंसा और क्रूरता का चेहरा बना, ‘पीके’ और ‘OMG’ जैसी फिल्मों में पंडित और साधुओं को ढोंगी और ठग के रूप में पेश किया गया। बार-बार यही मैसेज दिया गया कि पंडित और बाबा का मतलब लालच, पाखंड और झूठ-फरेब।

यही सोच ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर और ज्यादा बेखौफ होकर सामने आई, खासकर नेटफ्लिक्स पर। जहाँ ‘अन्नपूर्णा‘ में ब्राह्मण लड़की को मांस पकाते और खाते दिखाया गया, भगवान राम को लेकर संवाद डाले गए और विरोध के बाद FIR हुई तो फिल्म हटा ली गई। ऐसे ही ‘लीला’ में एक काल्पनिक हिंदू राष्ट्र को कट्टर, जातिवादी और हिंसक बताकर पूरे हिंदू समाज को ही नकारात्मक रंग में रंग दिया गया।

इतना ही नहीं ‘ए सूटेबल बॉय’ में मंदिर को महज एक सेट बनाकर हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़के का किसिंग सीन दिखाया गया और फिर प्रगतिशील का नाम दिया गया। इसी बैकग्राउंड में जब नेटफ्लिक्स ‘घूसखोर पंडत’ जैसा नाम सामने लाता है, तो यह किसी एक फिल्म का मामला नहीं रह जाता। यह उसी सिलसिले की अगली कड़ी बन जाता है, जहाँ हिंदू और पंडित पहचान को बार-बार व्यंग्य और अच्छे सिनेमा की आड़ में अपमानित किया जाता है, और इसे सबसे सुरक्षित रणनीति मानी जाती है।

वैसे ‘घूसखोर पंडत’ के नाम ने एक बात तो साफ कर दी है कि अब दर्शक अंधे नहीं है। फिल्म का टीजर आते ही जिस तरह सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूटा, ‘शेमऑननेटफ्लिक्स’ नाम से हैशटैग ट्रेंड हुए और सीधा नेटफ्लिक्स के मेकर्स पर कानूनी कार्रवाई हुई, उसने बॉलीवुड के पुराने नैरेटिव से रची गई दोहरी साजिश को धराशायी कर दिया।

जबकि पहले हुआ करता था कि कोई फिल्म आती थी, पंडित और बाबा की छवि को बदनाम कर पतली गली से निकल जाती थी। और कुछ चुनिंदा लोग विरोध करते रह जाते थे और वो भी बोलते-बोलते थककर शांत हो जाते थे। अब ऐसा नहीं है। घूसखोर पंडत नाम पर विवाद मामले में विरोध फिल्म की रिलीज से पहले ही शुरू हो गया, क्योंकि लोग पैटर्न पहचान चुके हैं।

यही वजह है कि लोग सवाल उठा रहे है कि हर बार ‘सेफ टारगेट’ पंडितों को क्यों समझा जाता है? सबसे बड़ा सवाल लोग पूछ रहे हैं कि अगर यही टाइटल किसी और पहचान के साथ होता, अगर फिल्म का नाम घूसखोर ‘मौलवी’ या ‘घूसखोर मौलाना’ रखा गया होता, तो क्या नेटफ्लिक्स और बॉलीवुड इतने निश्चिंत होकर टीजर लॉन्च कर पाते। क्या तब इसे क्रिएटिव फ्रीडम कहा जाता?

यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा संकेत है। बॉलीवुड और नेटफ्लिक्स अब वही पुराना नैरेटिव आसानी से आगे नहीं बढ़ा सकते। जिस समाज को उन्होंने सालों तक ‘सेफ टारगेट’ समझा, वह अब जवाब दे रहा है, नाम पर सवाल उठा रहा है और नैरेटिव को धो रहा है। ‘घूसखोर पंडत’ एक फिल्म से ज्यादा एक चेतावनी बन चुका है, उस इंडस्ट्री के लिए जो अब तक यह मानकर चल रही थी कि वह कुछ भी परोस देंगे और कोई पूछने वाला नहीं होगा। अब पूछने वाले भी हैं और यही बात उन्हें सबसे ज्यादा चुभ रही है।

असम में ‘मियाँ’ के बचाव में उतरा पूरा इकोसिस्टम, ‘भाई जान’ के दिल में गोली जैसी लगी CM हिमंता की बोली: जानें- दर्द से कराह क्यों रहे घुसपैठियों के हमदर्द

असम में ‘मियाँ’ शब्द को लेकर जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। इस शब्द की गूँज कोर्ट में भी सुनाई दी। विपक्ष इसको लेकर बीजेपी पर मुस्लिमों के खिलाफ अभियान चलाने का आरोप लगा रही है। सीएम हिमंता बिस्वा सरमा को कोर्ट में घसीटा गया है। दिल्ली से लेकर असम तक एफआईआर दर्ज करवाई गई है।

ओवैसी ने ‘मियाँ’ पर पूछे सीएम से सवाल

एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि क्या कोई नेता ऐसा कह सकता है कि ऑटो रिक्शा में कोई मियाँ ड्राइवर है तो उसे किराया पाँच रुपए की जगह चार रुपए दो। उनका कहना है कि असम में मियाँ बंगाली मुस्लिम को कहते हैं, जो 150-200 साल पहले अंग्रेजों द्वारा लाकर यहाँ बसाए गए। ये भारत के नागरिक हैं और इन्हें ऑटो के लिए 1 रुपए कम देने की बात खुद मुख्यमंत्री कह रहे हैं। उन्होंने कहा, “असम के मुख्यमंत्री, आप कितने छोटे हैं?”

मियाँ शब्द पर विपक्ष बीजेपी को घेरने में लगी हुई है। राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक में कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने ये बयान समुदाय विशेष यानी मुस्लिमों को ध्यान में रख कर दिया है। कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने मियाँ शब्द को मुख्यमंत्री पर झूठ बोलने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने न तो ऐसे शब्द लिखे हैं और न ही इसे माना है।

‘मियाँ’ शब्द अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए हो रहा इस्तेमाल

दरअसल सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही असम में प्रवासियों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई थी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि उनकी आलोचना करने वालों को असम में गैर-कानूनी माइग्रेशन पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बारे में सोचना चाहिए। उन्होंने साफ किया कि इस शब्द का इस्तेमाल लोकल लेवल पर बिना डॉक्यूमेंट वाले बांग्लादेशी मुस्लिम माइग्रेशन को लेकर किया गया था।

सीएम सरमा शुरुआत से ही ‘मियाँ’ शब्द को परिभाषित करते आ रहे हैं। हर बार सार्वजनिक मंच से उन्होंने कहा कि ‘मियाँ’ शब्द बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो असम में तेजी से फैल रहे हैं। असमिया संस्कृति और राज्य के साथ-साथ ये घुसपैठिए देश के लिए बड़ा खतरा हैं। इसलिए इनलोगों को असम से बाहर निकाल कर ही वे दम लेंगे।

मुख्यमंत्री ने इसे असम के अस्तित्व की लड़ाई बताते हुए विपक्ष को ललकारा है। उन्होंने राहुल गाँधी पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि चाहे एक नहीं, बल्कि 1000 राहुल गाँधी भी चिल्लाएँ तो भी वे अपने इस अभियान से पीछे हटने वाले नहीं हैं।

‘मियाँ’ लोगों को तकलीफ देना मेरा काम- हिमंता

मुख्यमंत्री ने विपक्ष और कॉन्ग्रेस के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा, “कॉन्ग्रेस मुझे भले गाली दे, लेकिन मेरा काम मियाँ लोगों को तकलीफ देना है।” सीएम सरमा ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अगर मियाँ लोग परेशान नहीं होंगे, तो वे दुलियाजान और तिनसुकिया जैसे इलाकों में घुस आएँगे। सीएम हिमंता ने तिनसुकिया में जमीन के लेन-देन की एक लिस्ट का हवाला देते हुए चिंता जताई कि हिंदू अपनी जमीनें बेच रहे हैं और मियाँ मुसलमान उन्हें खरीद रहे हैं। सीएम ने सवाल उठाया, “अगर हम अभी सावधान नहीं हुए, तो कब होंगे?”

सीएम ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट में जो सुधार चल रहा है, उसका मकसद यही है कि मियाँ लोग वोट न दे सकें। सीएम हिमंता ने कहा, “यह तो अभी शुरुआत है। जब राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) लागू होगा, तब 4 से 5 लाख मियाँ वोटों को चुन-चुनकर लिस्ट से बाहर किया जाएगा।” उनके मुताबिक, यह ध्रुवीकरण हिंदू-मुस्लिम के बीच नहीं, बल्कि ‘असमिया बनाम बांग्लादेशी’ के बीच है, जिसमें असमिया मुसलमान उनके दुश्मन नहीं हैं।

‘आत्मसमर्पण नहीं, आखिरी दम तक लड़ेंगे’

मुख्यमंत्री ने कहा कि वह एक असमिया होने के नाते कभी घुटने नहीं टेकेंगे। उन्होंने कहा कि जो लोग जनसांख्यिकीय बदलाव के आगे हार मान चुके हैं, वे आत्मसमर्पण कर दें, लेकिन वह लड़ेंगे और ध्रुवीकरण करेंगे। हिमंता बिस्वा सरमा ने साफ कर दिया कि घुसपैठियों के कारण राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान खतरे में है और इसे बचाने के लिए कड़े कदम उठाना अब वक्त की जरूरत है।

विपक्ष की आलोचनाओं के बीच हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि उन्होंने बांग्लादेशियों को मियाँ नाम नहीं दिया है, बल्कि वे खुद को मियाँ कहते हैं। उन्होंने मियाँ कविता लिखी। उन्होंने कहा कि अगर बांग्लादेशी घुसपैठियों को वे मियाँ कहते हैं तो वे लोग असम के लोगों को असमिया कह सकते हैं। इसमें दिक्कत क्या है।

असम में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। असमिया अस्मिता की रक्षा और बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा अहम है, क्योंकि राज्य में घुसपैठ की समस्या से जनता त्रस्त है। मियाँ वाले नैरेटिव का काट कॉन्ग्रेस को नहीं मिल रहा है। बस वह विरोध ही जता पा रही है। वह खुल कर मुस्लिमों का समर्थन भी नहीं कर पा रही है।

असम में घुसपैठ बड़ी समस्या

असम विधानसभा में सरकार ने साल 2025 में घुसपैठियों पर पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि राज्य में 1971 से लेकर 2014 के बीच 47,928 घुसपैठियों की पहचान की गई है। इन लोगों को राज्य के फॉरेन ट्रिब्यूनल ने विदेशी घोषित किया है। असम विधानसभा में मुख्यमंत्री और गृहमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बताया कि इन 47,928 विदेशी लोगों में से 27,309 मुस्लिम हैं जबकि 20613 हिन्दू हैं। यानी कुल घुसपैठियों में 56% मुस्लिम हैं।

राज्य विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, 27,309 मुस्लिम घुसपैठियों में से सबसे अधिक 4182 जोरहाट जिले में जबकि 3897 मुस्लिम गुवाहाटी शहर में पहचाने गए हैं। डिब्रूगढ़ में 2782 लोगों को मुस्लिम घुसपैठिया बताया गया है। इसके अलावा होजाई, सिवासनगर, नगांव और कछार में भी 2000 से अधिक मुस्लिम घुसपैठियों की पहचान हुई है। इसके अलावा भी असम के कई जिलों में मुस्लिम घुसपैठियों को पहचाना गया है। वहीं बाहर से आने वाले सबसे अधिक हिन्दुओं की सँख्या कछार, गुवाहाटी और लखीमपुर जैसे जिलों में हैं।

घुसपैठ से त्रस्त असम में अगर असमिया संस्कृति और परंपरा की रक्षा करनी है, तो घुसपैठियों को बाहर निकालना बेहद जरूरी है। यही वजह है कि सीएम हिमंता इस मुद्दे पर आक्रामक हैं और राज्य से लगातार घुसपैठियों को खदेड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने साफ कहा है कि असमिया पहचान बचाने के लिए अगले 30 साल तक ‘ध्रुवीकरण की राजनीति’ जारी रहेगी।

जनता दरबार में ही निलंबन, ‘नो वर्क नो पे’ और जाँच की धमकी से काम पर लौटते CO: बिहार में जमीन विवादों की जड़ों पर प्रहार करते विजय सिन्हा, भ्रष्टाचार पर लग रही लगाम

बिहार के उप-मुख्यमंत्री और राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा के नेतृत्व में विभाग में हो रहे सुधारों की एक नई सुबह की शुरुआत हुई है। लंबे समय से बिहार की जनता जमीन से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार, देरी और रिश्वतखोरी की शिकार रही है। अंचलाधिकारी (CO) स्तर पर 90% से अधिक भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी थीं, जहाँ दाखिल-खारिज, म्यूटेशन, नाम सुधार जैसे बुनियादी काम बिना घूस के नहीं होते थे।

दलालों का एक पूरा नेटवर्क खड़ा हो गया था, जो अंचल और थाना मिलकर जनता की जमीन लूटने का रैकेट चला रहे थे। इसी कारण बिहार में जमीन विवादों से जुड़ी मारपीट, हत्याएँ और अपराध बढ़ते जा रहे थे। लेकिन विजय कुमार सिन्हा के सख्त रुख और ईमानदारी से भरे संकल्प ने इन भ्रष्ट तत्वों में खौफ पैदा कर दिया है।

सिन्हा ने विभाग में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि राजस्व विभाग जनता की सेवा के लिए है, परेशान करने के लिए नहीं। जनता दरबार और भूमि सुधार जनकल्याण संवाद कार्यक्रमों में वे खुद बैठकर शिकायतें सुनते हैं और दोषी अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई करते हैं।

गया के बोधगया में आयोजित एक ऐसे ही कार्यक्रम में आमस अंचल के CO अरशद मदनी पर रिश्वत लेने के आरोप लगे। एक आवेदक ने बताया कि 25000 रुपए की रिश्वत सरकारी बॉडीगार्ड के माध्यम से ली गई। सिन्हा ने मंच से ही CO को हटाने, जाँच कराने और यदि दोष सिद्ध हुआ तो निलंबन व FIR दर्ज करने का आदेश दिया।

इसी तरह अन्य शिकायतों पर उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी दी कि फाइलें लटकाने या जनता को भटकाने वाले अब नहीं बचेंगे। उनका व्यंग्यपूर्ण बयान- ‘नाम सुधारने के लिए अंचल में कौन-कौन से देवता खुश किए जाते हैं, मुझे सब मालूम है’- भ्रष्टाचार और बिचौलियों पर सीधा प्रहार था।

अधिकारियों में यह खौफ साफ दिख रहा है। जब सरकार ने भ्रष्टाचार पर लगाम कसनी शुरू की, तो अंचलाधिकारियों ने हड़ताल (सामूहिक अवकाश) की धमकी दी और 2 फरवरी 2026 से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए। उनका मुख्य मुद्दा अनुमंडल राजस्व पदाधिकारी जैसे नए पदों के सृजन से संवर्गीय आशंका था।

जनहित में अंचल कार्यालय बंद नहीं रह सकते थे, खासकर बजट सत्र के दौरान। सिन्हा ने सख्ती दिखाई-नो वर्क, नो पे लागू किया, सरकारी गाड़ी और कार्यालय की चाबी वापस लेने का आदेश दिया और वरीय कर्मचारियों, BDO, DSLR आदि को अंचल का प्रभार सौंपने का विकल्प दिया। प्रधान सचिव सीके अनिल ने मंत्री के सामने ही चेतावनी दी कि हड़ताल वापस न ली तो डिसमिस कर दिया जाएगा।

परिणामस्वरूप, हड़ताल पहले दिन ही टूट गई। शाम को सिन्हा से मुलाकात के बाद बिहार राजस्व सेवा संघ ने हड़ताल वापस ले ली। उन्होंने तीन सदस्यीय समिति गठित की, जिसमें प्रधान सचिव सीके अनिल अध्यक्ष हैं। समिति माँगों, प्रमोशन, न्यायालयीय आदेशों और संवर्गीय संतुलन पर विचार करेगी। सिन्हा ने आश्वासन दिया कि जायज माँगें पूरी होंगी, सेवा नियमावली का सम्मान होगा और किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। उनका बयान- “ठीक है, दवा हो रहा है, असर भी दिख रहा है, घबराइए नहीं, सब कुछ समाधान होगा”- सुधार की प्रक्रिया को दवा की तरह प्रभावी बताता है।

यह पहली बार है जब सरकार ने इतनी सख्ती से भ्रष्ट अंचलाधिकारियों पर नकेल कसी है। पहले दलालों के माध्यम से रिश्वत ऊपरी कमाई होती थी, जो CO के खाते में नहीं आती थी। कई अधिकारियों के खर्च उनकी सैलरी से कहीं अधिक थे-बच्चों की फीस अकेले वेतन के बराबर। लेकिन अब जाँच का डर है। सिन्हा के आने से ईमानदारी को प्रोत्साहन मिला है। जनता में खुशी की लहर है। लोग कह रहे हैं कि CO अब पैसा वसूली के लिए दलाल नहीं रख पाएँगे और काम बिना रिश्वत के होगा।

सिन्हा का यह प्रयास ऐतिहासिक है। वे न केवल भूमाफियाओं को ‘सिर पर कफन बाँधकर’ चुनौती दे रहे हैं बल्कि विभाग को पारदर्शी और जन-केंद्रित बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) हर अंचल में खोलने, शनिवार को grievance redressal, ऑनलाइन सेवाओं को मजबूत करने जैसे कदम आम आदमी की मदद करेंगे। ईमानदार अधिकारी अब सम्मानित होंगे जबकि भ्रष्टों पर कार्रवाई तय है।

आने वाला समय बताएगा कि बिहार में जमीन विवाद कम होंगे, अपराध की जड़ें सूखेंगी। जनता सिन्हा के साथ है। बिहार की जनता अब उम्मीद की किरण देख रही है-भ्रष्टाचार मुक्त राजस्व व्यवस्था की। विजय कुमार सिन्हा का यह संघर्ष बिहार के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय बनेगा।

जिस ‘चिकन नेक’ को काटना चाहता था शरजील इमाम, वहाँ जमीन के भीतर से गुजरेगी ट्रेन: 40 km अंडरग्राउंड रेल टनल में दफन होंगी इस्लामी साजिशें

सिलीगुड़ी के पास ‘चिकन नेक’ भारत का वह संकरा क्षेत्र है, जो पूर्वोत्तर से पूरे देश को जोड़ता है। इसकी चौड़ाई मात्र 20 किलोमीटर और लंबाई करीब 60 किलोमीटर है। जेल में बंद शरजील इमाम जैसे देशद्रोही हों या बांग्लादेश-चीन जैसे पड़ोसी देश, सबने भारत को नुकसान पहुँचाने के लिए सामरिक दृष्टि से अहम इस ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ को काटने की बात कही थी। इसको देखते हुए अब भारत चिकन नेक को अभेद्य किला में परिवर्तित करने जा रहा है, जिससे दुश्मनों के मंसूबे धरे के धरे रह जाएँगे।

भारत की चिकन नेक को लेकर योजना

केंद्र सरकार चिकन नेक की सुरक्षा को लेकर लेकर काफी गंभीर है। इसके लिए ना केवल आसमान और धरती पर पैनी नजर रखी जा रही है, बल्कि अब धरती के अंदर भी इसकी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की तैयारी चल रही है। अब चिकन नेक से होते हुए 40 किलोमीटर लंबे रेलवे टनल बनाने की तैयारी चल रही है।

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मंगलवार (3 फरवरी 2026) को कहा, “नॉर्थ-ईस्ट को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले स्ट्रेटेजिक कॉरिडोर के लिए खास प्लानिंग हो रही है। अंडरग्राउंड रेलवे ट्रैक बिछाने और मौजूदा ट्रैक को चार लाइन बनाने का काम चल रहा है।” बंगाल में टिन माइल हाट से रंगापानी तक जाने वाली अंडरग्राउंड रेल लाइनें 20-24 मीटर की गहराई पर बिछाई जाएँगी।

भारतीय रेलवे ने पश्चिम बंगाल के टिन माइल हाट और रंगापानी स्टेशनों के बीच अंडरग्राउंड रेल लाइन बिछाना तय किया है। यह भौगोलिक दृष्टि से काफी अहम है। टिन माइल हाट बंगाल के दार्जिलिंग जिले में है, जो सिलीगुड़ी से करीब 10 km दूर है। यह बांग्लादेश बॉर्डर के पास है। यहाँ से बांग्लादेश का पंचगढ़ जिला सिर्फ 68 किलोमीटर दूर है।

‘चिकन नेक’ भारत के लिए क्यों है अहम

चिकन नेक 22 किमी चौड़ी जमीन की पतली सी पट्टी है, ये पूरे भारत को पूर्वोत्तर के 8 राज्यों से जोड़ती है। असल में, यह नॉर्थ-ईस्ट का एकमात्र पुल है, जिससे होकर हाईवे, रेल लिंक, फ्यूल लाइन गुजरती है और यह सैनिक साजोसामान के पूर्वोत्तर तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता भी है।

दरअसल चिकन नेक कॉरिडोर सामरिक दृष्टि से ऐसा चौराहा है, जहाँ से दक्षिण में बांग्लादेश, पश्चिम में नेपाल और उत्तर में चीन की चुम्बी वैली जाने का द्वार खुलता है। खास बात यह है कि चुम्बी वैली में, चीनी सेना का अच्छा खासा जमावड़ा है। इसलिए हर दिशा पर भारत को नजर रखने के लिए चिकन नेक की जरूरत है।

चिकन नेक पर कमजोर होते ही भारत का पूर्वोत्तर तक पहुँच खत्म हो जाएगा साथ ही सिक्किम और अरुणाचल जैसे राज्य की सीमा तक पहुँचना भी मुश्किल हो जाएगा। इन राज्यों के बड़े क्षेत्र पर चीन अपना दावा करता रहा है।

अंडरग्राउंड रेल से भारत को जबरदस्त फायदा होगा

रेलवे माल ढोने का सबसे आसान तरीका माना जाता है। एक मालगाड़ी एक बार में करीब 300 ट्रकों के बराबर माल ढो सकती है। चिकन नेक कॉरिडोर में अभी तक निर्माण कार्य जमीन पर होते रहे हैं। इन्हें पड़ोसी देश निशाना बना सकते हैं। प्राकृतिक आपदा से भी इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुँच सकता है। अंडर ग्राउंड टनेल हर आपदा में सुरक्षित रहेगा। न तो इसे दुश्मन देश हवाई हमला कर सकते हैं और न ही ड्रोन, आर्टिलरी से इसे निशाना बनाया जा सकता है। यानी युद्ध के वक्त ये कॉरिडोर जवानों और सामानों की आवाजाही के लिए संजीवनी साबित होगा।

डिफेंस एक्सपर्ट संजीव उन्नीथन के मुताबिक, अंडरग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर का पता लगाना मुश्किल होता है और यह सुरक्षित होता है। युद्ध में आपकी स्थिति मजबूत हो जाती है।”

उन्नीकृष्ण के मुताबिक, केन्द्र का यह कदम सामरिक दृष्टि से सबसे तेज इंफ्रास्ट्रक्चर विकास का उदाहरण है। यह भारत की टनलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर क्षमताओं के परिपक्व होने और कम समय में बड़े प्रोजेक्ट्स शुरू करने की क्षमता को दर्शाता है।

केंद्र सरकार की तारीफ करते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि यह ‘लंबे समय से चली आ रही स्ट्रेटेजिक कमज़ोरी’ को दूर करने वाला कदम है, जिसे 1971 के युद्ध के बाद ही कर लिया जाना चाहिए था। सरमा ने ट्वीट किया, “प्रस्तावित अंडरग्राउंड रेल लिंक एक बड़ी स्ट्रेटेजिक सफलता है, जो नॉर्थ ईस्ट और देश के बाकी हिस्सों के बीच एक सुरक्षित और फुलप्रूफ ट्रांसपोर्टेशन कॉरिडोर बनाता है।”

चीन का बड़ा सैनिक नेटवर्क पास में है मौजूद

चीन डोकलाम और अरुणाचल प्रदेश के पास इंफ्रास्ट्रक्चर का एक बड़ा नेटवर्क तैयार कर चुका है। सैटेलाइट से तस्वीरों के द्वारा भी इसकी पुष्टि हुई है। दूसरी तरह बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्तों में खटास आए हैं। कई कट्टरपंथी बांग्लादेशी नेताओं ने भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर कब्जा करने और नॉर्थ ईस्ट को अलग करने की धमकी दे चुके हैं।

इसके अलावा, सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास रंगपुर में लालमोनिरहाट एयरबेस को बांग्लादेश फिर से विकसित कर रहा है। ऐसे में पड़ोसी देशों से भारत की एकता को अक्षुण्ण रखने का एकमात्र उपाय है कि हम अपने क्षेत्रों को अभेद्य बना लें।

भारत क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए बंगाल, असम और त्रिपुरा के एयरस्ट्रिप के नेटवर्क को मजबूत करने में जुट गया है। ये एयरस्ट्रिप द्वितीय विश्वयुद्ध के वक्त एक्टिव थे। भारत इन क्षेत्रों में अपनी सुरक्षा मजबूत करने में लगा हुआ है। इसको लेकर बंगाल में चोपड़ा, बिहार में किशनगंज और असम में लचित बोरफुकन में नए आर्मी बेस बनाए हैं। चीन की बढ़ती नेवल मौजूदगी और बांग्लादेश के साथ उसके गहरे डिफेंस जुड़ाव के बीच बंगाल के हल्दिया में एक नया नेवी बेस भी बनने वाला है।

रेलवे के कदम से देश की जीवन रेखा मानी जाने वाली इस नेटवर्क में कहीं से भी मिसाइलों को ट्रांसपोर्ट करना, छिपाना और लॉन्च करना आसान हो जाएगा। देश की सुरक्षा के लिए ये कदम मील का पत्थर साबित होगा।

शरजील इमाम ने चिकन नेक काटने की धमकी दी थी

2020 में दिल्ली दंगों की साजिश रचने वाला और भारत के खिलाफ जहर उगलने वाला शरजील इमाम ने सिलिगुडी कॉरिडोर को लेकर कहा था, “अगर 5 लाख लोग हमारे पास संगठित हों, तो हम हिंदुस्तान और नॉर्थ-ईस्ट को स्थाई तौर पर कट कर सकते हैं। स्थाई नहीं तो कम से कम एक-आध महीने के लिए तो कट कर ही सकते हैं। मतलब, इतना मवाद डालो पटरियों पर, रोड पर कि उन्हें हटाने में एक महीना लगे। जाएँ एयर फोर्स से। असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है।”

अमित शाह ने दिया जवाब

शरजील इमाम ने चिकन नेक को अलग करने की बात कही थी, इस पर हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह ने सिलिगुड़ी में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि सिलीगुड़ी गलियारा भारत का था, है और रहेगा। इसपर धमकी देने या छेड़छाड़ करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा, “दिल्ली में कुछ लोगों ने नारे लगाए कि वे चिकन नेक को काट डालेंगे। अरे इसे कैसे काटोगे क्या तुम्हारे बाप की जमीन है यह भारत की जमीन है इस पर कोई हाथ नहीं लगा सकता”

उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस ने ऐसे लोगों को जेल में डाल दिया है और विपक्ष ऐसे लोगों की पैरवी कर रहा है। लेकिन देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों को सुप्रीम कोर्ट ने करारा जवाब दिया और बेल अर्जी भी खारिज कर दी।

AI वीडियो-अप्रकाशित किताब के प्रोपेगेंडा को निशिकांत दुबे ने किताबों के सत्य से धोया, नेहरू-इंदिरा-सोनिया सबकी एक साथ पोल खुलने से बौखलाई कॉन्ग्रेस

पिछले तीन दिनों से संसद में राहुल गाँधी और उनके कॉन्ग्रेसी नेता बवाल मचाए हुए हैं। मुद्दा है चीन का। राहुल गाँधी संसद के भीतर एक ऐसी किताब के अंशों का हवाला दे रहे हैं, जो अभी तक छपी ही नहीं है। उसी किताब के आधार पर सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि चीन के मुद्दे पर सच्चाई छुपाई जा रही है।

लेकिन बुधवार (04 फरवरी 2027) को तस्वीर अचानक बदल गई। बीजेपी नेता निशिकांत दुबे ने राहुल गाँधी की पूरी हवाबाजी महज एक मिनट में धराशायी कर दी। उन्होंने सदन में एक पहले से छपी हुई किताब के कुछ अंश पढ़कर सुनाए। इसके बाद न सिर्फ राहुल गाँधी, बल्कि कॉन्ग्रेस के बाकी नेता भी सन्न रह गए।

बिना छपी किताब और AI वीडियो के सहारे सरकार को बदनाम करने की कोशिश

मामले की शुरुआत 02 फरवरी 2026 को हुई, जब राहुल गाँधी अचानक संसद में कुछ पन्ने निकालकर पढ़ने लगे। उन्होंने इसे सीधे तौर पर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से जुड़ा मुद्दा बताया। राहुल गाँधी ने दावा किया कि ये अंश पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की किताब से हैं। राहुल गाँधी ने कहा कि इस किताब में लिखा है कि चीन के साथ युद्ध जैसे हालात में सरकार ने कोई आदेश नहीं दिया। राहुल गाँधी का दावा है कि नरवणे उस वक्त अकेले पड़ गए थे और सरकार ने जानबूझकर पीछे हटने का फैसला लिया।

राहुल गाँधी के इस दावे पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तुरंत सवाल उठाए। उन्होंने साफ पूछा कि ये कहानी आखिर आ कहाँ से रही है? राजनाथ सिंह ने कहा कि जिस किताब के अंश संसद में पढ़े जा रहे हैं, वह किताब अब तक छपी ही नहीं है। जब किताब छपी ही नहीं, तो उसके अंशों के आधार पर सरकार पर सवाल कैसे खड़े किए जा सकते हैं।

इसके बाद संसद में जोरदार हंगामा शुरू हो गया, जो अगले दिन के सत्र तक चलता रहा। विपक्ष के नेता टेबल पर चढ़े, स्पीकर की ओर कागज उछाले गए और नारेबाजी से सदन का कामकाज ठप हो गया।

लेकिन सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश संसद तक ही सीमित नहीं रही। कॉन्ग्रेस ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ हैंडल से एक AI वीडियो जारी किया, जिसमें उसी बिना छपी किताब की कहानी को विजुअल के रूप में दिखाया गया। इस वीडियो के सहारे से सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की कोशिश की गई।

कॉन्ग्रेस की साजिश, निशिकांत दुबे ने की धराशायी

कॉन्ग्रेस की सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की साजिश का जवाब देने संसद में बीजेपी नेता निशिकांत दुबे मैदान में उतरे। 04 फरवरी 2027 को उन्होंने राहुल गाँधी को सीधे-सीधे जवाब देते हुए जवाहर लाल नेहरू, सोनिया गँधी और इंदिरा गाँधी समेत गाँधी परिवार के अतीत को सदन के सामने खोलकर रख दिया, वह भी सारी छपी हुई किताबों से।

निशिकांत दुबे हाथ में छपी हुई किताबें लेकर आए और कहा कि अगर बिना छपी किताब के पन्ने लहराकर तीन दिन तक संसद ठप की जा सकती है, तो फिर उन किताबों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो छप चुकी है और जिनमें कॉन्ग्रेस और नेहरू के कारनामें दर्ज हैं। उन्होंने ‘नेहरू: ए बायोग्राफी’, ‘एडविना एंड नेहरू’ और दूसरी पुस्तकों के अंश पढ़ते हुए नेहरू पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और निजी जीवन की अय्याशियों की पोल खोली।

निशिकांत दुबे ने कहा कि देश को गुमराह करने की कॉन्ग्रेस की आदत पुरानी है और आज वही पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी झूठे नैरेटिव के सहारे प्रधानमंत्री और सरकार को बदनाम करने में लगी है। निशिकांत दुबे का हमाल यही नहीं रुका। उन्होंने राहुल गाँधी से सीधा सवाल किया क्या कॉन्ग्रेस इन किताबों को भी फर्जी बताएगी या फिर सच सामने आने पर चुप्पी साध लेगी।

इस पर कॉन्ग्रेस बौखला गई। प्रियंका गाँधी ने दुबे के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि संसद में इस तरह कि किताबें पढ़ना नियमों के खिलाफ है और बीजेपी जानबूझकर नेहरू का नाम उछालकर ध्यान भटकाना चाहती है। कॉन्ग्रेस नेताओं ने इसे निजी हमला बताया और हंगामा शुरू कर दिया।

निष्कर्ष: कॉन्ग्रेस का असली चेहरा

इससे पता चलता है कि कॉन्ग्रेस अब हर उस हद तक जाने को तैयार दिख रही है, जहाँ से सरकार और प्रधानमंत्री को नीचा दिखाया जा सके। पहले संसद में बिना छपी किताब के पन्ने लहराए गए, फिर उसी झूठी कहानी को सच साबित करने के लिए कॉन्ग्रेस ने AI वीडिया बनाकर चलाया। सवाल साफ है, जिस किताब का अस्तित्व ही सार्वजनिक तौर पर नहीं है, उसके सहारे कॉन्ग्रेस ने सरकार और प्रधानमंत्री की छवि खराब करने की पूरी कोशिश की। यह सोची-समझी साजिश नजर आती है।

लेकिन जैसे ही बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने संसद में छपी हुई किताबों का जिक्र कर दिया, कॉन्ग्रेस घबरा गई। जिन किताबों को कोई नकार नहीं सकता, जिनका रिकॉर्ड मौजूद है, जिनके लेखक और पन्ने सबके सामने हैं। उन्हीं से कॉन्ग्रेस को सबसे ज्यादा डर लगने लगा। साफ है, जो पार्टी अप्रकाशित किताब और AI वीडियो के सहारे झूठ गढ़ सकती है, वही पार्टी सच सामने आते ही बौखला जाती है। यही कॉन्ग्रेस का असली चेहरा है।

उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म, USMEA का हुआ गठन: जानें- पाठ्यक्रम से मान्यता के तरीकों तक, अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए क्या-क्या बदलेगा

उत्तराखंड की धामी सरकार ने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को समाप्त कर दिया है। अब इसकी जगह सरकार ने उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (Uttarakhand State Minority Education Authority – USMEA) का गठन किया है।

अब यह नया शिक्षा प्राधिकरण ही राज्य में चलने वाले सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए सिलेबस तय करेगा, मान्यता देगा और शिक्षा की दिशा निर्धारित करेगा। यह नई व्यवस्था जुलाई 2026 से पूरी तरह लागू हो जाएगी जिसके बाद मदरसा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

सरकार का कहना है कि यह कदम शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, पारदर्शिता बढ़ाने और सभी अल्पसंख्यक समुदायों को समान अवसर देने के लिए उठाया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अल्पसंख्यक मंत्रालय के विशेष सचिव डॉ पराग मधुकर धकाते ने इस फैसले को शिक्षा सुधार की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है।

मदरसा बोर्ड को खत्म करने की जरूरत क्यों पड़ी?

अब तक उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा की व्यवस्था मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के मदरसों तक सीमित थी। सरकार का कहना है कि इससे अन्य अल्पसंख्यक समुदायों जैसे सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी को समान शैक्षणिक दर्जा और अवसर नहीं मिल पा रहे थे। इसके अलावा कई मदरसों पर अवैध संचालन, मानकों के उल्लंघन और शैक्षणिक गुणवत्ता की कमी के आरोप भी लगे थे।

राज्य में हाल के वर्षों में सैकड़ों अवैध मदरसों पर कार्रवाई के बाद सरकार इस निर्णय पर पहुँची कि अब एक नई, आधुनिक, समावेशी और जवाबदेह शिक्षा प्रणाली लागू करने की जरूरत है, जिसमें सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए एक समान नियम और ढाँचा हो।

अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025: नई शिक्षा नीति की नींव

मदरसा बोर्ड को समाप्त करने और नई व्यवस्था लागू करने के लिए सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025 लागू किया है। इस कानून के तहत अब राज्य के सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान एक ही प्राधिकरण के अधीन होंगे।

इस अधिनियम के अनुसार, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों द्वारा चलाए जाने वाले संस्थानों को एक समान प्रक्रिया के तहत मान्यता दी जाएगी। सरकार ने यह निर्णय इसलिए लिया ताकि इससे शिक्षा प्रणाली अधिक पारदर्शी, न्यायपूर्ण और आधुनिक बने।

क्या है उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (USMEA)?

नए गठित उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यक छात्रों के लिए बेहतर, आधुनिक और रोजगारोन्मुख शिक्षा सुनिश्चित करना है। यह प्राधिकरण अब यह तय करेगा कि अल्पसंख्यक संस्थानों में कौन-सा पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा, शिक्षा का स्तर क्या होगा और संस्थानों को किस शर्त पर मान्यता मिलेगी।

सरकार का कहना है कि यह प्राधिकरण संस्थानों के मजहबी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन यह सुनिश्चित करेगा कि शिक्षा राज्य शिक्षा बोर्ड के मानकों के अनुरूप हो और छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जा सके।

अब सभी संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी और एक समान शैक्षणिक प्रणाली का पालन करना होगा। सरकार का दावा है कि इससे शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव खत्म होगा और सभी समुदायों को समान अवसर मिलेंगे।

पाठ्यक्रम में क्या बदलाव होगा?

नई प्रणाली के तहत अब अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के तय मानकों के अनुसार पढ़ाई करानी होगी। विज्ञान, गणित, भाषा, सामाजिक विज्ञान और आधुनिक विषयों पर अधिक जोर दिया जाएगा ताकि छात्र उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सकें।

मजहबी विषय पढ़ाने की अनुमति रहेगी, लेकिन वे शैक्षणिक गुणवत्ता और तय मानकों के अनुरूप होने चाहिए। सरकार का उद्देश्य है कि छात्रों को मजहबी शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक और व्यावहारिक ज्ञान भी मिले।

कौन हैं नए प्राधिकरण के प्रमुख सदस्य?

सरकार ने इस प्राधिकरण में अनुभवी शिक्षाविदों, प्रोफेसरों, समाजसेवियों और प्रशासनिक अधिकारियों को शामिल किया है, ताकि शिक्षा से जुड़े फैसले अकादमिक और बौद्धिक आधार पर लिए जा सकें।

डॉ सुरजीत सिंह गाँधी को इस प्राधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जो BSM पीजी कॉलेज रुड़की में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं। अन्य सदस्यों में प्रो राकेश जैन, डॉ सैयद अली हमीद, प्रो गुरमीत सिंह, प्रो पेमा तेनजिन, डॉ एल्बा मन्ड्रेले, प्रो रोबिना अमन, समाजसेवी राजेंद्र सिंह बिष्ट और सेवानिवृत्त अधिकारी चंद्रशेखर भट्ट शामिल हैं। इसके अलावा निदेशक कॉलेज शिक्षा, निदेशक SCERT और निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण भी पदेन सदस्य होंगे।

मान्यता के लिए सख्त नियम लागू

नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान को मान्यता पाने के लिए कड़े नियमों का पालन करना होगा। संस्थानों को सोसाइटी, ट्रस्ट या कंपनी एक्ट के तहत पंजीकरण, संस्था के नाम पर भूमि और संपत्ति का रिकॉर्ड, बैंक खाता और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी।

यदि किसी संस्था पर वित्तीय गड़बड़ी, शैक्षणिक मानकों के उल्लंघन या मजहबी और सामाजिक सद्भाव के खिलाफ गतिविधियों का आरोप पाया गया, तो उसकी मान्यता रद्द भी की जा सकती है। सरकार का कहना है कि इससे फर्जी संस्थानों और अवैध संचालन पर लगाम लगेगी।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि अब यह नया प्राधिकरण तय करेगा कि अल्पसंख्यक बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाएगी और यह सुनिश्चित करेगा कि सभी संस्थान उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के मानकों का पालन करें। सरकार का दावा है कि यह कदम अल्पसंख्यक छात्रों को मुख्यधारा से जोड़ने, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, और उन्हें बेहतर भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में उठाया गया है।

क्या होता है लैमिनेटेड बैट, क्यों क्रिकेट में इसके इस्तेमाल की मिली अनुमति: MCC ने एकसाथ बदले 73 नियम

अब क्रिकेट पहले जैसा नहीं रहेगा। मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब (MCC) ने क्रिकेट को आधुनिक समय के हिसाब से ढालने के लिहाज से क्रिकेट के नियमों में 73 बदलावों की घोषणा की है। MCC ने ‘लॉज ऑफ क्रिकेट’ का नया संस्करण तैयार किया गया है जो 2022 के बाद पहला संशोधित संस्करण है। क्लब का कहना है कि इन बदलावों का मकसद क्रिकेट के नियमों को खेल की मौजूदा जरूरतों के हिसाब से अपडेट करना है ताकि वे वर्तमान समय के साथ तालमेल बैठा सकें। ये नए नियम अक्टूबर से प्रभावी होंगे।

क्रिकेट के नियमों में किए गए बदलावों को लेकर काफी चर्चा हो रही है। इनमें सबसे अहम बदलाव बहु-दिवसीय मैचों यानी टेस्ट क्रिकेट जैसे मुकाबलों से जुड़ा है। पहले ऐसा होता था कि अगर दिन के आखिरी ओवर में विकेट गिर जाए तो ओवर वहीं खत्म हो जाता था। लेकिन नए नियम के अनुसार अब ऐसा नहीं होगा। अब दिन का आखिरी ओवर पूरा कराया जाएगा और नया बल्लेबाज मैदान पर आकर बाकी गेंदें खेलेगा।

इसके अलावा क्रिकेट में बल्लों को लेकर भी नियम बदले गए हैं। अब लैमिनेटेड बल्लों (यानी कई परतों से बने बल्लों) के इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई है। ‘हिट विकेट’ नियम को भी पहले से ज्यादा साफ और आसान तरीके से समझाया गया है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किन परिस्थितियों में बल्लेबाज को हिट विकेट आउट माना जाएगा। वहीं, ‘ओवरथ्रो’ यानी फील्डिंग के दौरान अतिरिक्त रन मिलने से जुड़े नियम की परिभाषा को भी सरल बना दिया गया है। इनमें सबसे अधिक चर्चा लैमिनेटेड बल्लों को लेकर हो रही है।

पहले लैमिनेटेड बल्ले से खेलना था अवैध

MCC ने ‘लॉज ऑफ क्रिकेट’ के नियम 5.8 के तहत ‘बल्लों की श्रेणियाँ’ (categories of bat) से जुड़े नियम में संशोधन की घोषणा की है। इसके तहत लैमिनेटेड बैट यानी ‘टाइप D’ के बल्लों की सभी तरह के क्रिकेट में अनुमित दी जा रही है। पहले इन बल्लों से ओपन एज क्रिकेट (यानी वयस्क खिलाड़ियों के क्रिकेट) खेलना अवैध माना जाता था। हालाँकि, जूनियर क्रिकेट तक इन बल्लों से खेलने की इजाजत थी।

क्या होते हैं लैमिनेटेड बल्ले?

लैमिनेटेड बल्ला अलग-अलग प्रकार की लकड़ी के टुकड़ों को जोड़कर बनाया जाता है, जिससे विलो लकड़ी से बने बल्लों की तुलना में इसकी लागत काफी कम हो जाती है। इसमें दो या तीन टुकड़ों को आपस में जोड़कर तैयार किया जाता है। आमतौर पर एक इंग्लिश विलो पेड़ को पूरी तरह तैयार होने में 15 साल या उससे अधिक समय लगता है। वहीं, क्रिकेट बल्लों की माँग तेजी से बढ़ रही है। इसी वजह से MCC लंबे समय से लैमिनेटेड बल्लों पर रिसर्च कर रहा था।

साल 2017 में MCC ने पहली बार जूनियर क्रिकेट में लैमिनेटेड बल्लों के इस्तेमाल की अनुमति दी थी। इसके बाद MCC ने दुनियाभर के बैट निर्माताओं के साथ मिलकर इस विषय पर काम किया। पिछले साल अक्टूबर में लॉर्ड्स में एक सम्मेलन भी आयोजित किया गया था। इन सभी प्रक्रियाओं के बाद MCC ने यह फैसला लिया कि लैमिनेटेड बल्लों का इस्तेमाल वयस्कों की क्लब क्रिकेट में भी किया जा सकता है।

और किन प्रमुख नियमों में हुआ बदलाव?

क्रिकेट के नियमों में कई अहम बदलाव किए गए हैं, जो खासतौर पर टेस्ट और मल्टी-डे क्रिकेट पर असर डालेंगे।

दिन के आखिरी ओवर में विकेट पर नया नियम

अब अगर दिन के आखिरी ओवर में विकेट गिरता है, तो ओवर वहीं खत्म नहीं होगा। पहले नया बल्लेबाज अगले दिन आता था, जिससे गेंदबाजों को नुकसान होता था। नए नियम के तहत पूरा ओवर उसी दिन खेला जाएगा, अगर परिस्थितियाँ अनुकूल हों। इससे खेल में रोमांच बढ़ेगा और गेंदबाजों को बेहतर मौका मिलेगा।

शॉर्ट रन पर नियम स्पष्ट

अब बल्लेबाज रन लेने के बाद वापस लौट सकते हैं, अगर धोखा देने की मंशा नहीं है तो कोई सजा नहीं होगी। लेकिन अगर जानबूझकर शॉर्ट रन किया गया, तो फील्डिंग टीम तय करेगी कि अगली गेंद पर कौन बल्लेबाज स्ट्राइक करेगा। इससे नियमों का गलत इस्तेमाल रोकने में मदद मिलेगी।

बाउंड्री कैच पर सख्ती

अब बाउंड्री लाइन के बाहर से बार-बार उछलकर कैच पकड़ना मान्य नहीं होगा। फील्डर बाहर से सिर्फ एक बार गेंद को छू सकता है, इसके बाद उसे पूरी तरह मैदान के अंदर रहना होगा। अगर वह बाहर गिरा या कदम रखा, तो गेंद बाउंड्री मानी जाएगी। इससे विवादास्पद कैच पर रोक लगेगी।

ओवरथ्रो की नई परिभाषा

अब ओवरथ्रो और मिसफील्ड के बीच साफ अंतर किया गया है। अगर फील्डर स्टंप्स पर थ्रो करता है, तो उसे ओवरथ्रो माना जाएगा। लेकिन गेंद रोकने में गलती को ओवरथ्रो नहीं माना जाएगा। इससे रन गिनने को लेकर होने वाला भ्रम कम होगा।

विकेटकीपर के नियम में बदलाव

अब गेंद रिलीज होने से पहले विकेटकीपर के स्टंप्स के सामने आने पर नो-बॉल नहीं होगा। नए नियम के अनुसार गेंद छोड़ने के बाद विकेटकीपर को स्टंप्स के पीछे रहना जरूरी होगा।

हिट विकेट नियम में बदलाव

अगर बल्लेबाज़ शॉट खेलने के बाद संतुलन खोकर स्टंप्स गिरा देता है, तो वह हिट विकेट आउट होगा। अगर फील्डर की टक्कर से वह स्टंप्स पर गिरता है, तो आउट नहीं होगा। साथ ही, बल्लेबाज के हाथ से बल्ला छूटकर स्टंप्स पर लग जाता है, तो वह आउट माना जाएगा। अगर बल्ला किसी खिलाड़ी से टकराकर स्टंप्स गिराए तो बल्लेबाज को आउट नहीं माना जाएगा।

MCC: वो क्लब जो बनाता है क्रिकेट के नियम

क्रिकेट के नियम आज जिस संस्था द्वारा तय किए जाते हैं, वह है MCC यानी मेरिलिबोन क्रिकेट क्लब (Marylebone Cricket Club)। दिलचस्प बात यह है कि MCC कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन नहीं बल्कि एक निजी क्रिकेट क्लब है, जिसकी स्थापना 1787 में लंदन में हुई थी। इसके बावजूद MCC को क्रिकेट की दुनिया में नियम निर्धारक संस्था के रूप में मान्यता प्राप्त है।

MCC ने 1788 में क्रिकेट के पहले लिखित और आधिकारिक नियम तैयार किए थे जिन्हें बाद में ‘Laws of Cricket’ के नाम से जाना गया। समय के साथ क्रिकेट का विस्तार दुनिया भर में हुआ लेकिन नियमों को तय करने की जिम्मेदारी MCC के पास ही रही। यही वजह है कि आज भी क्रिकेट के मूल नियम MCC द्वारा बनाए और संशोधित किए जाते हैं।

1909 में जब इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) की स्थापना हुई, तो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के संचालन और टूर्नामेंटों की जिम्मेदारी ICC को मिली। हालाँकि, क्रिकेट के नियमों का अधिकार MCC के पास ही रहा। ICC अपने अंतरराष्ट्रीय मैचों में MCC द्वारा बनाए गए नियमों को लागू करता है और जरूरत पड़ने पर MCC के साथ मिलकर उनमें बदलाव करता है।

आज भी जब क्रिकेट में कोई बड़ा बदलाव किया जाता है तो उसका आधार MCC द्वारा तैयार किए गए ‘Laws of Cricket’ होते हैं। MCC समय-समय पर खेल की बदलती परिस्थितियों, तकनीक और आधुनिक क्रिकेट की जरूरतों को देखते हुए नियमों में संशोधन करता है।

ऑनलाइन गेमिंग चैलेंज के लिए 24 घंटे में 4 बच्चों ने की आत्महत्या, किसी ने लगाई फाँसी तो किसी ने बालकनी से कूदकर दी जान: समझें- कितना खतरनाक है यह ट्रेंड और बच्चों को इससे कैसे बचाएँ

गाजियाबाद में 12 साल की पाखी, 14 साल की प्राची और 16 साल की निशिका ने 9वीं मंजिल से कूदकर एक साथ जान दे दी। ये तीनों बहनें थीं। शुरुआती जाँच में ये सामने आया है कि तीनों ‘कोरियन लवर’ ऑनलाइन गेम खेलती थीं।

बताया जा रहा है कि मंगलवार (3 जनवरी 2026) को उन तीनों बहनों के ऑनलाइन गेम का आखिरी टास्क था। तीनों ने टास्क के तहत 9वीं मंजिल से कूद कर जान दे दी। हालाँकि इसकी पुष्टि अभी नहीं हो पाई है, क्योंकि तीनों के फोन की जाँच के बाद ही इसका खुलासा हो पाएगा।

तीनों बहनें पिछले 2 साल से स्कूल नहीं जा रही थीं। इनका पढ़ने में मन नहीं लगता था। पिता ने इसकी वजह से इन्हें डाँटा भी था। तीनों कोरियन कल्चर से काफी प्रभावित थीं। माता-पिता के विरोध के बावजूद ये तीनों मोबाइल पर लगी रहती थीं।

पिता चेतन कुमार के मुताबिक बच्चियाँ काफी वक्त से ये गेम खेल रही थीं और 3 जनवरी को इनका 50वाँ यानी आखिरी टास्क था। इस टास्क को पूरा करने के बाद इनलोगों ने मौत को गले लगा लिया। अब आखिरी टास्क के मुताबिक इन्हें 9वीं मंजिल से कूदना था या टास्क पूरा करने के बाद इनलोगों ने अपने पिता के गेम खेलने से रोकने की वजह से जान दी, ये जाँच का विषय है

बालकनी से कूद गई बच्चियाँ

अभी तक जो बात सामने आई है, इसके मुताबिक बच्चियों ने दो स्टेप वाली सीढ़ी का सहारा लिया और फिर ऊपर चढ़ कर रेलिंग के ऊपर से कूद गई। इस दौरान एक बहन ने दूसरी बहन का हाथ पकड़ा और एक को पीठ पर बैठाया और कूद गई। इन बहनों में 14 साल की प्राची इस गेम की लीडर थी। उसके निर्देश के मुताबिक बाकी दोनों बहनें काम करती थी। हमेशा तीनों साथ रहती थीं। सुसाइड से पहले इनके कमरे में फर्श पर बिखरे हुए फोटो मिले हैं।

इनलोगों ने एक पन्ने का सुसाइड नोट भी लिखा है जिसके अंत में ‘मम्मी पापा सॉरी’ लिखा है। सुसाइड नोट में कहा है कि मुझे माफ कर दो पापा, सॉरी पापा। हार्ट ब्रेक की इमेज बनाई गई है, फिर लिखा है कि ‘इस डायरी में जो कुछ लिखा है, वह सब सच है’ अभी पढ़िए। आई ए रियली सॉरी, सॉरी पापा। दिवारों पर लिखा था, ‘आई एम वेरी वेरी अलोन, मेक मी ए हार्ट ऑफ ब्रोकन।’

पुलिस गेम के कंट्रोलर यानी उस लिंक की तलाश कर रही है, जिसके सहारे इन बच्चियों को निर्देश मिल रहे थे कि कौन-सा टास्क करना है। आखिर फोन में ही वह सारे टास्क होंगे जिसका पालन इन लोगों ने किया है।

भोपाल में भी बच्चे ने दी जान

भोपाल में मोबाइल गेमिंग की लत के चलते एक 14 साल के बच्चे अंश साहू ने फाँसी लगाकर अपनी जान दे दी। परिजनों को शक है कि उसने ऑनलाइन टास्क पूरी करने के लिए फाँसी लगाई। अंश 8वीं क्लास का छात्र था और परिवार का इकलौता बेटा था। उसके माता-पिता प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते हैं।

पुलिस के मुताबिक, कुछ दिनों से वह ऑनलाइन गेम खेलने लगा था। माता-पिता ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह मान नहीं रहा था। वह काफी शांत बच्चा था और इनदिनों अकेले रहना पसंद करता था। 3 जनवरी 2026 को दोपहर में माता-पिता घर पर नहीं थे। उस वक्त उसने फाँसी लगा ली। वह कौन सा गेम खेल रहा था और उसकी मौत से इसका क्या संबंध है, इसकी जाँच के लिए फोरेंसिक टीम मोबाइल ले गई है।

ऑनलाइन गेमिंग का बच्चों पर असर

ऑनलाइन गेम्स जैसे पबजी, फ्री फायर और दूसरे गेम्स में बच्चों को टास्क दिया जाता है। एक के बाद एक मिल रहे टास्क को पूरा करने पर बच्चों में जोश आ जाता है। इस दौरान गेम की ऐसी लत लग जाती है कि बच्चा उन्हें पूरा करने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहता है। एक तरह के वह मानसिक तौर पर गेम की गिरफ्त में आ जाता है। इसे ‘गेमिंग डिसऑर्डर’ भी कहा जाता है।

इस दौरान बच्चा अपनी दिनचर्या भी भूल जाता है। पढ़ना-लिखना, खेलना-कूदना, स्कूल जाना सब कुछ वह भूल जाता है। बच्चा अकेला रहना पसंद करता है। परिजनों और दोस्तों से वह दूरी बनाने लगता है। आउटडोर गेम खेलना नहीं चाहता। परिजनों के टोकोटाकी से वह गुस्सा जाता है और उसके स्वभाव में चिढ़चिढ़ापन आ जाता है। कई बार बच्चा हिंसक भी हो जाता है।

ऑनलाइन गेमिंग के दौरान बच्चों को पता नहीं होता कि वह किसके साथ गेम खेल रहा है। ऐसे में साथ खेल रहा खिलाड़ी उसे साइबर बुलिंग का शिकार बना सकता है। कई बार दोस्ती करने की कोशिश करते हैं और विश्वास जीत कर निजी जानकारियाँ हासिल करते हैं।

इसी तरह का मामला एक्टर अक्षय कुमार ने सार्वजनिक मंच पर शेयर किया था। उनका कहना था कि उनकी बेटी को ऑनलाइन गेमिंग के दौरान न्यूड होकर फोटो खिंचने की माँग की गई थी। उन्होंने बेटी को समझाया और ऑनलाइन गेमिंग से दूर करने के लिए डॉक्टर से सलाह ली।

ऑनलाइन गेमिंग को छोड़ना इतना आसान नहीं होता, इसलिए जो इसे खेलते हैं, वे खेले बगैर नहीं रह पाते। फाइटिंग और शूटिंग वाले गेम से बच्चों में हिंसक प्रवृति बढ़ती है और इसका उनके दिमाग पर काफी बुरा असर पड़ता है। बच्चों की भाषा असभ्य भी हो जाती है। कई बार बच्चों को डराया धमकाया जाता है।

बच्चों के ‘मन की बात’ को समझना जरूरी

ऑनलाइन गेम कई तरह के होते हैं। कई गेम में दो व्यक्ति खेल रहे होते हैं तो कई गेमों में कई लोग एक साथ खेलते हैं। ऐसे गेम का इस्तेमाल बच्चों के ब्रेनवॉश करने में होता है। उन्हें पेरेंट्स से दूर करने, असामाजिक कार्यों की ओर प्रोत्साहित करने के लिए भी हो सकता है।

एक्सपर्ट के मुताबिक, बच्चों को भावनात्मक तौर पर सहारे की जरूरत होती है। पेरेंट्स से खुल कर बात नहीं कह पाना, जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम और ऑनलाइन रहना, बच्चों को गलत आदतों का शिकार बना सकता है। इसलिए बच्चों से बातचीत करने, उसे भरोसे में लेने और ऐसा माहौल बनाने की जरूरत है, जिससे बच्चा खुद ब खुद अपनी बातें शेयर करे और उसे पेरेंट्स समझा पाएँ।

बच्चों को अगर गेम की लत से दूर रखना या उबारना चाहते हैं तो उसके साथ वक्त बिताएँ। उसे अकेला न छोड़े। परिवार में अनुशासन लाएँ। परिवार कम से कम एक बार एक साथ बैठकर खाना खाय, ये तय करें। बच्चे को प्रोत्साहित करें और उसके साथ बातें करें। बच्चे को अपनी बात कहने देने का पूरा मौका दें। डाँटने-डपटने की जगह उससे दोस्ताना व्यवहार करें और उसके मन की बात को समझने की कोशिश करें। पुरानी पसंदीदा चीजों से उसे जोड़ने की कोशिश करें। मोबाइल और इंटरनेट को सीमित करें। उसके साथ माता-पिता या बहन-भाई, जिससे बच्चा ज्यादा घुल मिल जाता है, वे उसके साथ खेलें। उसे दूसरी चीजों की ओर प्रोत्साहित करे।

बच्चों को मोबाइल देकर न छोड़ें, बल्कि उसकी एक्टिविटी पर नजर रखें। ऑनलाइन गेम खेलने वाले बच्चों पर तो खास तौर पर नजर रखनी चाहिए, ताकि उसके गेम का पता पैरेंट्स को हो। पैरेंट्स अपने बैंक अकाउट की जानकारी बच्चों से शेयर न करें। बच्चों को अगर पैसे देते हैं, तो ये ध्यान दें कि कहीं वह उन पैसों को गेमिंग में तो खर्च नहीं कर रहा।

कई बार बच्चे ऑनलाइन चीजों को सही मान लेते हैं। चाहे गेम में टास्क मिला हो या चैलेंज। उन्हें वह सब सही लगता है और वे उसके परिणाम को समझ नहीं पाते। भोपाल का अंश और गाजियाबाद की तीनों बहनें ऐसे ही टास्क का शिकार थे और उसके लिए उन्होंने खुदकुशी कर ली।

भारत समेत कई देशों ने ऑनलाइन गेम रोका

भारत में ‘प्रमोशन एंड रेगुलेशन ऑफ ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025’के तहत ऑमलाइन गेमिंग पर रोक लगाई गई थी। इसके तहत सरकार ने पैसे लगाने वाले और जुए जैसे गेम, सट्टेबाजी और बेटिंग वाले गेम पर पाबंदी लगा दी। भारत के अलावा चीन में 18 साल से नीचे के बच्चों को एक दिन में सिर्फ 3 घंटे गेम खेलने की इजाजत होती है।

इसमें भी विदेशी गेम्स पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। वेनेजुएला, कंबोडिया, तुर्की, सऊदी अरब, अफगानिस्तान, मलेशिया, सिंगापुर जैसे कई देश हैं, जहाँ ऑनलाइन गेम्स खेलने को लेकर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं।

भारत में सभी ऑनलाइन गेम्स पर प्रतिबंध नहीं लगाए गए हैं। केवल पैसे वाले गेम्स पर रोक लगी है। वक्त आ गया है जब ऐसे गेम्स पर भी रोक लगे। बच्चों को गेमिंग और एडल्ट कंटेंट से दूर रखने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है। केन्द्र सरकार ने ऑनलाइन गेम्स को लेकर हेल्पलाइन नंबर 155260 जारी किया है। किसी भी तरह के साइबर धोखाधड़ी की स्थिति में संपर्क करें।