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शैक्षणिक परिसर को ‘सामाजिक न्याय उद्योग’ का अखाड़ा न बनाएँ- UGC नियमावली पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के संदेश

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के ‘इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026’ पर सुप्रीम कोर्ट की रोक किसी तकनीकी खामी पर लगाया गया विराम नहीं है, बल्कि एक खतरनाक वैचारिक ढाँचे पर खींची गई आपात रेखा है। यह सरकार और यूजीसी- दोनों के लिए अंतिम चेतावनी सरीखी है कि सामाजिक न्याय का अर्थ ऐसा तंत्र खड़ा कर देना नहीं होता, जिसमें एक वर्ग को जन्म से पीड़ित और दूसरे को जन्म से अभियुक्त मान लिया जाए। न्याय का यह मॉडल सुधार नहीं करता, वह पहले ही दिन कैंपस को संदेह और भय में बाँट देता है।

शिक्षा के परिसर सर्वसमावेशी हों, उन्मुक्त हों, भेदभाव से मुक्त हों- यह आकांक्षा सर्वमान्य है। शायद यूजीसी की भी। लेकिन 2012 के पुराने फ्रेमवर्क को हटाकर जो नए रेगुलेशंस लाए गए, उनमें सामान्य जाति के अस्तित्व को ही लगभग नकार दिया गया। जैसे यह पहले से तय कर लिया गया हो कि वे भेदभाव के शिकार हो ही नहीं सकते, और उनके विरुद्ध झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतें हो ही नहीं सकतीं।

यह सुधार नहीं है। वैचारिक दमन है।

इसीलिए इसका मुखर विरोध हुआ और सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। शीर्ष अदालत ने वस्तुतः यह संदेश दिया है कि अस्पष्ट परिभाषाओं, एकतरफा समितियों और बिना जवाबदेही वाले अधिकारों के सहारे चलने वाला ‘न्याय’ शिक्षा को बचा नहीं सकता। वह केवल समाज में नई दरारें पैदा करेगा।

अब सवाल केवल नियमों का भी नहीं रह गया है। सवाल उस राजनीतिक और बौद्धिक अहंकार का है, जो यह मान बैठा था कि कैंपस को भय के सहारे नियंत्रित किया जा सकता है। संभवतः वे यह भूल गए कि ‘सामाजिक न्याय उद्योग’ जब शैक्षणिक परिसर में उतरता है, तो न्याय नहीं, भय सबसे पहले संगठित होता है। शिक्षा का स्पेस संवाद से खिसककर संदेह में बदल जाता है।

सुप्रीम कोर्ट का संकेत साफ है- सामाजिक न्याय भावना से नहीं, संतुलित प्रक्रिया से चलता है। जो ढाँचा भरोसा तोड़े, वह सुधार नहीं, विभाजन पैदा करता है। यूजीसी के रेगुलेशंस से यह आशंका भी गहराई कि ये नियम अकादमिक सुधार से अधिक राजनीतिक संतुलन साधने का उपकरण बन सकते हैं। कैंपस को संवाद का क्षेत्र बनाने के बजाय शिकायत आधारित संघर्ष का मैदान बना सकते हैं।

भारतीय कैंपस के अतीत को मोटे तौर पर तीन चरणों में देखा जा सकता है;

  • 1970–80 के दशक के छात्र आंदोलन
  • मंडल काल के कैंपस तनाव
  • हालिया वर्षों का वैचारिक ध्रुवीकरण

हर चरण ने एक ही बात साबित की है- कैंपस में शांति, भय और निगरानी से नहीं आती। शांति आती है निष्पक्ष संवाद, पारदर्शी प्रक्रिया और भरोसे से। यूजीसी के नए नियम इस संतुलन को तोड़ते दिख रहे थे।

यह पूरा विवाद सत्तारूढ़ राजनीति के लिए भी कसौटी है। सामाजिक न्याय का प्रश्न यदि इस रूप में उभरे कि एक वर्ग स्वयं को स्थायी आरोपित और दूसरा स्वयं को स्थायी पीड़ित मानने लगे, तो परिणाम न्याय नहीं, स्थायी सामाजिक तनाव होता है।

कुछ इसे भाजपा की कथित कास्ट बैलेंसिंग राजनीति की परीक्षा मानते हैं, तो कुछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुतले जलाने और उग्र नारों में राजनीतिक अवसर खोज रहे हैं। पर सच यह है कि यह परीक्षा केवल भाजपा की नहीं, पूरे नीति निर्माण तंत्र की है।

आदर्श शैक्षणिक कैंपस की कसौटी बिल्कुल स्पष्ट है- वह संवाद प्रधान हो। शिकायत से पहले संवाद हो। मेडिएशन सेल हों, जो प्रशासनिक विस्तार नहीं, बल्कि विश्वसनीय शिक्षकों और छात्रों पर आधारित हों। जहाँ शिकायतकर्ता और आरोपित- दोनों की गरिमा सुरक्षित रहे, जाँच समयबद्ध हो और झूठे आरोपों पर स्पष्ट दंड का प्रावधान हो, क्योंकि न्याय का अर्थ केवल संरक्षण नहीं, निष्पक्षता भी है।

कैंपस में असहमति को अपराध न बनाया जाए। छात्रों को सिखाया जाए कि विचारों का संघर्ष लोकतंत्र की ताकत है, उसकी कमजोरी नहीं। भावनात्मक उन्माद के बजाय तथ्यात्मक जाँच पर आधारित व्यवस्था ही स्वस्थ शिक्षा की शर्त है।

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि कैंपस वैचारिक प्रयोगशाला नहीं हैं। वे राष्ट्र की बौद्धिक नर्सरी हैं। शिक्षक और छात्र भय में जीते हुए न पढ़ सकते हैं, न पढ़ा सकते हैं। शिक्षा स्वतंत्रता में ही फलती है।

इसीलिए सुप्रीम कोर्ट की रोक को टकराव नहीं, संशोधन का अवसर समझा जाना चाहिए। UGC के लिए भी और उनके लिए भी, जो अदालत के निर्देश के बाद सड़कों पर उतर आए हैं। यूजीसी को चाहिए कि वह नियमों को स्पष्ट करे, परिभाषाओं को सर्वसमावेशी बनाए और प्रक्रिया को दोतरफा न्याय पर आधारित करे।

कैंपस का उद्देश्य किसी वर्ग को स्थायी विजेता या स्थायी पीड़ित बनाना नहीं है। कैंपस का उद्देश्य सोचने वाला नागरिक गढ़ना है। सुप्रीम कोर्ट की रोक यही याद दिलाती है कि शैक्षणिक परिसर न वैचारिक प्रयोगशाला हैं, न राजनीतिक अखाड़े। वह सोचने वाला नागरिक गढ़ने की जगह है।

स्मरण रहे जो नीति विवेक नहीं, डर बोती है, वह शिक्षा नहीं रचती; वह समाज में वही दरार और गहरी करती है, जिसके नाम पर उसे बेचा जाता है।

50+ देश, 800+ कलाकार, 1200+ स्टॉल: 39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला की हुई शूरूआत, लोकल से ग्लोबल होने पर रहेगा जोर

हरियाणा के फरीदाबाद में शनिवार (31 जनवरी 2026) से विश्व प्रसिद्ध 39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेले की शानदार शुरुआत हो गई है। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने इस भव्य महोत्सव का उद्घाटन किया, जिसमें हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भी शरीक हुए।

15 फरवरी 2026 तक चलने वाले इस मेले की इस बार की थीम ‘Local to Global’ रखी गई है, जिसका उद्देश्य हमारे स्थानीय कारीगरों की कला को पूरी दुनिया के सामने पेश करना है। उत्तर प्रदेश और मेघालय इस साल के ‘थीम स्टेट’ हैं, जबकि मिस्र ‘पार्टनर नेशन’ के तौर पर अपनी प्राचीन संस्कृति का जादू बिखेरेगा।

लोकल से ग्लोबल की ओर बढ़ते कदम और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी

इस बार सूरजकुंड मेला अपने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ने के लिए तैयार है। पिछले सालों के मुकाबले इस बार 50 से अधिक देशों के करीब 800 कलाकार और शिल्पकार हिस्सा ले रहे हैं। उत्तर प्रदेश और मेघालय के स्टॉल्स पर आपको वहाँ की पारंपरिक लोक कला और हथकरघा का बेहतरीन काम देखने को मिलेगा।

वहीं, मिस्र अपनी वास्तुकला और प्राचीन कलाकृतियों से पर्यटकों का मन मोहेगा। यह आयोजन न केवल मनोरंजन का केंद्र है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर मजबूती से खड़ा करने का एक बड़ा जरिया भी बन गया है।

हस्तशिल्प, लजीज व्यंजन और ‘मेला साथी’ ऐप की सुविधा

मेला परिसर में 1200 से अधिक स्टॉल लगाए गए हैं, जहाँ लकड़ी, मिट्टी, धातु और पत्थर से बनी खूबसूरत कलाकृतियाँ बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। स्वाद के शौकीनों के लिए इस बार यूनिसेफ (UNICEF) की मदद से उत्तर प्रदेश के खास लजीज व्यंजनों के स्टॉल लगाए गए हैं।

पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए ‘मेला साथी’ (Mela Sathi) नाम का एक मोबाइल ऐप भी लॉन्च किया गया है, जिसकी मदद से आप किसी भी स्टॉल की लोकेशन आसानी से खोज सकते हैं और मेले का पूरा आनंद उठा सकते हैं।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम और सितारों से सजी सांस्कृतिक शामें

मनोरंजन के लिए इस बार कैलाश खेर, गुरदास मान और सलमान अली जैसे दिग्गज कलाकार अपनी सुरीली आवाज से समाँ बांधेंगे। हरियाणा की मिट्टी से जुड़े पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूँज भी हर शाम सुनाई देगी।

मेले के लिए करीब 7 करोड़ रुपए की लागत से बुनियादी ढाँचे को और मजबूत किया गया है, जिसमें नए हाट और मनोरंजन क्षेत्र शामिल हैं। सुरक्षा के लिहाज से पूरे परिसर में चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और ट्रैफिक को सुचारू रखने के लिए खास पार्किंग व्यवस्था व रूट डायवर्जन भी किया गया है।

सुरक्षा और ट्रैफिक के पुख्ता इंतजाम

मेले के सफल आयोजन के लिए बुनियादी ढाँचे पर करीब 7 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं, जिसमें 127 नए हाट और मनोरंजन क्षेत्र का निर्माण शामिल है। सुरक्षा के लिए पूरे परिसर में भारी संख्या में CCTV कैमरे लगाए गए हैं। ट्रैफिक को सुचारू रखने के लिए फरीदाबाद में 31 जनवरी से 15 फरवरी तक भारी वाहनों की ‘नो-एंट्री’ रहेगी। पर्यटकों के लिए ईरोज सिटी, हेलीपैड और लेकवुड सिटी में पार्किंग की विशेष व्यवस्था की गई है।

सुनेत्रा पवार बनीं महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी CM, अजित पवार की विरासत बढ़ाएँगी आगे: क्या शरद पवार ग्रुप करने वाला था NCP पर कब्जा?

महाराष्ट्र की राजनीति में शनिवार (31 जनवरी 2026) को एक ऐतिहासिक पल आया, जब राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। वह महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी सीएम बन गई हैं। शपथ ग्रहण के दौरान समर्थकों ने ‘अजित दादा अमर रहे’ के नारे भी लगाए।

यह शपथ ग्रहण समारोह मुंबई में हुआ, जिसमें मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उप मुख्यमंत्री एकनाश शिंदे और महायुति के अन्य नेता मौजूद रहे। दिवंगत अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार ने शाम 5.05 बजे इस पद पर अपने पति की जगह ली, जिनकी 28 जनवरी 2026 को बारामती में प्लेन क्रैश में दुखद मौत हो गई थी।

सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम बनाने के इस फैसले ने एनसीपी (अजित गुट) को मजबूती दी, लेकिन शरद पवार गुट में हैरानी और नाराजगी पैदा की। सूत्रों के मुताबिक, यह कदम सिर्फ पद भरने का नहीं, बल्कि पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है।

शपथ से पहले विधायक दल की बैठक में बनी सर्वसम्मति

मुंबई में शनिवार (31 जनवरी 2026) को दोपहर 2 बजे एनसीपी (अजित गुट) के विधायकों की बैठक विधान भवन में हुई। इसमें सुनेत्रा पवार को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुना गया। पार्टी नेता दिलीप वलसे पाटिल ने उनका नाम प्रस्तावित किया, जिसे सभी ने समर्थन दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर सुनेत्रा को डिप्टी सीएम बनाने की सिफारिश की गई।

प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे और छगन भुजबल जैसे वरिष्ठ नेताओं ने यह प्रक्रिया तेजी से पूरी की। विधायक सना मलिक ने कहा, “पिछले दो दिनों से कार्यकर्ता और नेता यही माँग कर रहे थे कि सुनेत्रा को दादा (अजित पवार) की जगह लाया जाए।”

बहरहाल, सुनेत्रा पवार ने अब डिप्टी सीएम पद की शपथ ले ली है। उन्होंने शपथ ग्रहण से पहले राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। हालाँकि सुनेत्रा अभी विधानसभा या विधान परिषद की सदस्य नहीं हैं, इसलिए उन्हें 6 महीने में चुनाव लड़ना होगा।

NCP को शरद पवार गुट के कब्जे से बचाना मुख्य वजह

सूत्र बताते हैं कि सुनेत्रा को इतनी जल्दी सत्ता के केंद्र में लाने का बड़ा कारण एनसीपी (अजित गुट) को बचाना है। अजित पवार के निधन से पहले दोनों गुटों के विलय की बातें जोरों पर थीं। शरद पवार गुट के नेता जयंत पाटिल, एकनाथ खड़से और अनिल देशमुख ने दावा किया कि विलय लगभग तय था। अजित पवार खुद 12 फरवरी को घोषणा करने वाले थे।

अजित पवार के विमान हादसे में निधन के बाद महाराष्ट्र की राजनीति शोक में थी, लेकिन सियासी गलियारों में एक और चर्चा तेज हो चुकी थी। एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की। एनसीपी (शरद पवार) गुट के वरिष्ठ नेताओं ने दावा किया कि यह सिर्फ चर्चा नहीं थी, बल्कि तीन-चार महीनों से बातचीत चल रही थी। यहाँ तक कहा गया कि अजित पवार की आखिरी इच्छा भी यही थी कि पार्टी एक हो और शरद पवार के जन्मदिन तक यह ‘तोहफा’ दिया जाए। सवाल ये है कि अजित पवार की मौत के तुरंत बाद उनकी आखिरी इच्छा को क्यों सामने रखा गया?

ऐसे में अजित गुट को डर था कि विलय हुआ तो पार्टी पर शरद पवार की पकड़ मजबूत हो जाएगी और उनका गुट हाशिए पर चला जाएगा। प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसे नेता नहीं चाहते थे कि पार्टी फिर शरद पवार के हाथ में जाए। इसलिए सुनेत्रा को डिप्टी सीएम बनाकर गुट को मजबूत केंद्र दिया गया। यह महायुति की सोची-समझी रणनीति है, ताकि एनसीपी पर संतुलन बना रहे।

शरद पवार का हैरानी भरा बयान- मुझे कोई जानकारी नहीं

शरद पवार ने शपथ ग्रहण पर हैरानी जताई। उन्होंने कहा, “मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। यह उनकी पार्टी का आंतरिक फैसला होगा। प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे ने शायद तय किया हो।” उन्होंने विलय पर कहा, “पिछले चार महीने से बात चल रही थी। अजित और जयंत पाटिल नेतृत्व कर रहे थे। अजित की इच्छा थी कि दोनों दल साथ आएँ, लेकिन अब कुछ कहा नहीं जा सकता।”

शरद पवार ने इशारा किया कि जल्दबाजी हुई है। उन्होंने कहा, “अजित के प्लेन क्रैश ने विलय की बात रोक दी।” शरद पवार और सुप्रिया सुले शपथ समारोह में नहीं गए। इससे परिवार में नाराजगी साफ दिखी। शरद पवार ने यह भी कहा कि परिवार की नई पीढ़ी विरासत आगे बढ़ाएगी, लेकिन सत्ता की मौजूदा संरचना में वे खुद हाशिए पर महसूस कर रहे हैं।

सिर्फ विलय रोकना ही नहीं, कई अन्य कारण भी हैं। सुनेत्रा पवार के डिप्टी सीएम बनने से 4 अहम संदेश NCP समर्थकों में गया है-

अजित पवार की राजनीतिक विरासत को परिवार में रखना। सुनेत्रा बारामती से जुड़ी हैं और 2024 लोकसभा चुनाव लड़ चुकी हैं। कार्यकर्ता उन्हें ‘वहिनी’ कहते हैं और उनकी माँग थी कि विरासत जारी रहे।

महायुति गठबंधन में स्थिरता। अजित के निधन से एनसीपी कमजोर हो सकती थी, जिसका फायदा विपक्ष को मिलता। सुनेत्रा को लाकर गठबंधन मजबूत हुआ।

महिला नेतृत्व को बढ़ावा। महाराष्ट्र में पहली महिला डिप्टी सीएम बनना बड़ा संदेश है।

  1. कार्यकर्ताओं का मनोबल मजबूत हुआ। शोक में डूबे कार्यकर्ताओं को नया चेहरा मिला।

सुनेत्रा पवार के बारे में 10 अहम बातें

  1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि: सुनेत्रा पवार का जन्म 18 अक्टूबर 1963 को महाराष्ट्र के धाराशिव (पूर्व ओसमानाबाद) में एक राजनीतिक परिवार में हुआ था। उनके पिता और भाई पद्मसिंह पाटिल भी सक्रिय राजनेता रहे, जिससे बचपन से ही सार्वजनिक जीवन का माहौल मिला।

शिक्षा और शुरुआती जीवन: सुनेत्रा ने औरंगाबाद से कॉमर्स में स्नातक की डिग्री हासिल की। 1985 में अजित पवार से शादी के बाद वे बारामती में बस गईं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हुईं।

स्वच्छता और ग्रामीण विकास की शुरुआत: उन्होंने पवार परिवार के पैतृक गाँव काठेवाडी में स्वच्छता अभियान चलाया, जहाँ खुले में शौच की समस्या दूर की। बाद में निर्मल ग्राम अभियान के तहत 86 गांवों में सेल्फ हेल्प ग्रुप्स के जरिए स्वच्छता को बढ़ावा दिया।

पर्यावरण संरक्षण में योगदान: 2010 में एनवायरमेंटल फोरम ऑफ इंडिया एनजीओ की स्थापना की और इको-विलेज कॉन्सेप्ट को भारत में लोकप्रिय बनाया। पर्यावरण जागरूकता और सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर उनका फोकस ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ा बदलाव लाया।

टेक्सटाइल उद्योग में नेतृत्व: सुनेत्रा पवार बारामती हाई टेक टेक्सटाइल पार्क (2008) की चेयरपर्सन हैं, जहाँ 15,000 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला, ज्यादातर महिलाओं को। यह प्रोजेक्ट केंद्र सरकार की स्कीम से जुड़ा और महिलाओं के सशक्तिकरण का बड़ा उदाहरण बना।

शिक्षा क्षेत्र में भूमिका: सुनेत्रा पवार विद्या प्रतिष्ठान की ट्रस्टी हैं, जो शरद पवार द्वारा स्थापित संस्था है और हजारों छात्रों को शिक्षा देती है। साल 2017 से सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी की सीनेट मेंबर के रूप में शिक्षा सुधारों में योगदान दे रही हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रियता: सुनेत्रा पवार साल 2011 से फ्रांस के वर्ल्ड एंटरप्रेन्योरशिप फोरम की थिंक टैंक मेंबर हैं। वो सस्टेनेबल डेवलपमेंट और उद्यमिता पर वैश्विक चर्चाओं में भारत का प्रतिनिधित्व करती रही हैं।

राजनीति में प्रवेश: लंबे समय तक बैकग्राउंड में रहने के बाद 2024 में सक्रिय राजनीति में आईं। बारामती से लोकसभा चुनाव लड़ा, हालाँकि हार गईं, लेकिन पवार परिवार की विरासत को आगे बढ़ाया।

राज्यसभा सांसद के रूप में भूमिका: एनसीपी से राज्यसभा सांसद चुनी गईं और संसद में महाराष्ट्र के मुद्दों पर आवाज उठाती हैं। सामाजिक और पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर उनकी सक्रियता संसदीय चर्चाओं में दिखती है।

वर्तमान में डिप्टी सीएम की जिम्मेदारी: अजित पवार के निधन के बाद महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनीं। पार्टी और परिवार की विरासत को संभालते हुए ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण पर फोकस जारी रख रही हैं।

विलय की बात अब ठंडे बस्ते में, अब आगे क्या?

शपथ के बाद विलय की अटकलें थम गई हैं। अजित गुट चुप है, जबकि शरद गुट कह रहा है कि बात रुक गई। यह घटना महाराष्ट्र की राजनीति में नया मोड़ है। एक तरफ परिवार की विरासत सुनेत्रा पवार ने बचा ली है, तो दूसरी तरफ NCP के दोनों गुटों की दूरी और बढ़ गई है। वहीं, माना जा रहा है कि शरद पवार अब अपनी रणनीति के अगले पड़ाव को लेकर विचार कर रहे हैं।

मद्रास HC ने DMK सरकार के आदेश को किया रद्द, ऐतिहासिक कल्लाझागर मंदिर फंड के कॉमर्शियल इस्तेमाल की दी थी अनुमति: पढ़ें कोर्ट ने क्या कहा

मद्रास हाई कोर्ट (मदुरै बेंच) ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें मदुरै जिले के ऐतिहासिक कल्लाझागर मंदिर के अतिरिक्त (सरप्लस) धन का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए करने की अनुमति दी गई थी।

कोर्ट ने 23 जनवरी 2026 को स्पष्ट कहा कि मंदिरों को विकास परियोजनाओं की तरह नहीं देखा जा सकता और ‘विकास’ के नाम पर होने वाली कोई भी गतिविधि मंदिर की धार्मिक भावना और मंदिर प्रशासन से जुड़े कानून के अनुरूप ही होनी चाहिए।

जस्टिस अनीता सुमंत और जस्टिस सी कुमारप्पन की डिवीजन बेंच ने 8 मार्च 2024 को जारी उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मंदिर के धन से रेस्टोरेंट, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, कॉटेज और अन्य व्यावसायिक सुविधाओं के निर्माण की अनुमति दी गई थी।

बेंच ने कहा कि यह आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है और तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) अधिनियम के कई प्रावधानों का उल्लंघन करता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति है, जहाँ राज्य मंदिर संसाधनों को अपना समझकर वैधानिक प्रक्रिया अपनाए बिना उपयोग करना चाहता है।

कोर्ट ने कहा- मंदिर का विकास उसकी धार्मिक भावना के अनुरूप होना चाहिए

फैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट ने साफ किया कि मंदिर व्यावसायिक स्थान नहीं हैं और इन्हें इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की तरह नहीं बदला जा सकता। जजों ने HR&CE विभाग के रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि विभाग का मुख्य काम मंदिरों की रक्षा और संरक्षण करना है, न कि उन्हें कमाई का साधन बनाना।

कोर्ट ने कहा कि HR&CE अधिनियम की धाराएँ 35, 36, 66, 67 और 86 तथा ‘सरप्लस फंड उपयोग नियम’ यह स्पष्ट करते हैं कि मंदिर के रखरखाव का खर्च केवल वर्तमान आय से होना चाहिए, न कि वर्षों से जमा अतिरिक्त धन से। कोर्ट ने कहा कि राज्य ने मंदिर के रिजर्व फंड को गैर-जिम्मेदाराना और अवैध तरीके से खर्च किया है, जो कानून का उल्लंघन है।

बेंच ने यह भी कहा कि विभाग ने कल्लाझागर मंदिर को एक प्रोजेक्ट की तरह देखा, जिसे आधुनिक विकास और अपग्रेडेशन की जरूरत है, जबकि ऐसे विचार मंदिर की प्रकृति से ही अलग हैं। कोर्ट ने माना कि भक्तों के लिए बुनियादी सुविधाएँ जरूरी हैं, लेकिन ऐसा करते समय मंदिर की आध्यात्मिक पहचान से समझौता नहीं होना चाहिए और न ही कानूनी सुरक्षा को दरकिनार किया जा सकता।

बजट मंजूरी के बिना मंदिर धन का अवैध उपयोग

सरकारी आदेश रद्द करने का एक बड़ा कारण यह था कि HR&CE अधिनियम के तहत अनिवार्य बजट और मंजूरी की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि करोड़ों रुपए का खर्च मंदिर के ट्रस्टी बोर्ड की अनुमति और उचित बजट बनाए बिना तय कर लिया गया।

बेंच ने बताया कि धारा 86 के तहत बजट प्रक्रिया में HR&CE आयुक्त की जाँच, विचार-विमर्श, स्पष्टीकरण और अवैध खर्च को हटाने की व्यवस्था है, लेकिन यहाँ इनमें से कुछ भी नहीं किया गया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि ट्रस्टियों ने खर्च की आवश्यकता या वैधता पर गंभीरता से विचार किया हो।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक संस्थाओं के धन को व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए बिना उचित मंजूरी और निगरानी के मोड़ा नहीं जा सकता, खासकर जब इसमें करोड़ों रुपये शामिल हों।

मंदिर के अतिरिक्त धन में तेज गिरावट ने बढ़ाई चिंता

कोर्ट ने मंदिर के जमा अतिरिक्त धन में तेजी से आई कमी पर गंभीर चिंता जताई। ऑडिट खातों के अनुसार, मंदिर का सरप्लस मार्च 2021 में 96.6 करोड़ था, जो मार्च 2023 तक बढ़कर 107.60 करोड़ हो गया, लेकिन मार्च 2024 में यह तेजी से घटकर 62.37 करोड़ रह गया।

कोर्ट ने कहा कि यह गिरावट बिना बजट और बिना कानूनी मंजूरी के खर्च का नतीजा है। बेंच ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह देवता के खिलाफ अपराध है और यह स्थिति ‘खेत की रखवाली करने वाला ही फसल खाने’ जैसी है। कोर्ट के अनुसार, यह सिर्फ अवैध नहीं बल्कि मंदिर प्रबंधन में विश्वासघात भी है।

ट्रस्टी बोर्ड की अनुपस्थिति से आदेश की वैधता कमजोर

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मंदिर के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और कानून के अनुसार नया बोर्ड गठित नहीं किया गया। HR&CE अधिनियम की धारा 46 के तहत नया बोर्ड बनाना जरूरी है, लेकिन ऐसा करने के कोई प्रमाण नहीं मिले। कोर्ट ने कहा कि ‘फिट पर्सन’ या कार्यकारी अधिकारी स्थायी रूप से ट्रस्टियों की जगह नहीं ले सकते।

बेंच ने साफ कहा कि ऐसे मंदिरों का संचालन अधिकारियों द्वारा नहीं, बल्कि ट्रस्टी बोर्ड द्वारा होना चाहिए। ट्रस्टी बोर्ड के बिना मंदिर वित्त से जुड़े फैसले और भी ज्यादा अवैध और कमजोर हो जाते हैं।

मंदिर सरकारी संपत्ति नहीं है, कोर्ट ने राज्य को दिलाया याद

हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि मंदिर राज्य का हिस्सा या सरकारी विभाग नहीं हैं। बेंच ने स्पष्ट किया कि राज्य मंदिर की संपत्ति को अपना नहीं समझ सकता और न ही मंदिर के धन का उपयोग सरकार द्वारा सोची गई परियोजनाओं में कर सकता है।

कोर्ट ने राज्य की ‘आइकोनिक टेंपल डेवलपमेंट स्कीम’ की आलोचना करते हुए कहा कि विकास मंदिर और भक्तों की जरूरतों से निकलना चाहिए, न कि राजनीतिक घोषणाओं या एक जैसे मॉडल से। कोर्ट ने कहा कि मंदिर आस्था के स्थान हैं, प्रशासनिक प्रयोग के विकास प्रोजेक्ट नहीं।

कैसे हुई विवाद की शुरुआत?

यह विवाद 8 मार्च 2024 को जारी सरकारी आदेश और 11 अक्टूबर 2024 के कार्य आदेश से शुरू हुआ। इन आदेशों के तहत लगभग 40 करोड़ के सिविल कार्यों को मंजूरी दी गई थी। इस परियोजना में मंदिर परिसर में गेस्ट हाउस, डॉर्मिटरी, दुकानें, भोजनालय, पार्किंग सुविधा, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, पुजारियों के क्वार्टर और मंदिर संरचनाओं के नवीनीकरण जैसे कार्य शामिल थे।

इसके खिलाफ कई याचिकाएँ दायर की गईं, जिनमें कहा गया कि मंदिर धन का गलत उपयोग हो रहा है, ट्रस्टी बोर्ड की मंजूरी नहीं ली गई और HR&CE अधिनियम का उल्लंघन हुआ। सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने सरकारी आदेश और कार्य आदेश दोनों को रद्द कर दिया। साथ ही मंदिर के रख-रखाव और वसंत मंडपम की प्रसिद्ध भित्ति चित्रों के संरक्षण के निर्देश भी दिए।

अरुलमिघु नंदीश्वरर शिवन मंदिर: पहले भी आया था ऐसा ही मामला

यह पहली बार नहीं है जब मद्रास हाई कोर्ट ने मंदिर धन के व्यावसायिक उपयोग को रोका है। जनवरी 2025 में कोर्ट ने अरुलमिघु नंदीश्वरर शिवन मंदिर में शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाने की योजना भी रद्द कर दी थी। मुख्य जज केआर श्रीराम और जस्टिस सेंथिलकुमार राममूर्ति की बेंच ने कहा था कि संपन्न मंदिरों के अतिरिक्त धन का उपयोग शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाने में नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा था कि ऐसा निर्माण मंदिर की धार्मिक शिक्षाओं का प्रचार नहीं करता, जैसा कि HR&CE अधिनियम की धारा 66 में जरूरी है। बेंच ने चेतावनी दी थी कि व्यावसायिक निर्माण से मुकदमे, किराएदार विवाद और अतिक्रमण जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं, जबकि धन को सुरक्षित निवेश में रखा जाए तो निश्चित लाभ मिल सकता है।

उस मामले में भी कोर्ट ने सरकार की योजना रद्द करते हुए सुझाव दिया था कि धन का उपयोग गरीब हिंदुओं के विवाह, जरूरतमंदों को भोजन कराने और देशी पेड़ लगाने जैसे धार्मिक उद्देश्यों में किया जाए।

मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रृति सागर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

शरजील इमाम के लिए दिल्ली प्रेस क्लब में फिर से वही रटा-रटाया रोना, फैलाया एकतरफ फर्जी नरेटिव: जानें- ‘सेक्युलर-लिबरल’ गैंग के दावों की हकीकत

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में गुरुवार (29 जनवरी 2026) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई, जो UAPA के तहत गिरफ्तार शरजील इमाम की गिरफ्तारी के छह साल पूरे होने के अवसर पर थी। इस मौके पर कई वक्ताओं ने उसके मामले को न्यायिक दुरुपयोग और असहमति को दबाने के लिए राज्य दमन का स्पष्ट उदाहरण बताया।

कार्यक्रम की शुरुआत सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने की, जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के पतन की आलोचना की और इमाम की लंबी जेल यात्रा को नागरिकता संशोधन कानून जैसे कानूनों के विरोध करने वालों को चुप कराने की रणनीति बताया।

इसके बाद द वायर से जुड़ी वकील रश्मि सिंह ने अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि इमाम के भाषणों को गलत तरीके से देशद्रोही बताकर पेश किया गया, जबकि वे केवल शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का समर्थन करते थे। उन्होंने लंबित मामलों के बीच जमानत को एक मौलिक अधिकार के रूप में भी पेश किया।

शरजील इमाम के भाई मुजम्मिल इमाम ने अपने अनुभव साझा किए और कथित पुलिस क्रूरता की घटनाओं का जिक्र किया, जो उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय के खिलाफ लक्षित उत्पीड़न का प्रतिनिधित्व करती हैं।

राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने राजनीतिक दृष्टिकोण से टिप्पणी की और UAPA जैसे कानूनों के संसदीय दुरुपयोग की आलोचना करते हुए नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा के लिए बदलाव की आवश्यकता बताई।

पत्रकार सबा नकवी ने बताया कि किस तरह आतंकवाद विरोधी कानूनों का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के खिलाफ हथियार के रूप में किया जा रहा है। पत्रकार आदित्य मेनन ने इमाम की शैक्षणिक पृष्ठभूमि पर जोर दिया और कहा कि उनकी जेल यात्रा से होने वाला बौद्धिक नुकसान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरनाक मिसाल पेश करता है। सेवानिवृत्त दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिता नारायण ने भी भाषण दिया, जिसमें न्यायिक प्रणाली में कथित अन्याय पर ध्यान केंद्रित किया गया।

कोर्ट के निर्णयों और पृष्ठभूमि की समीक्षा से यह संकेत मिलता है कि मामला पूरी तरह अन्याय का नहीं, बल्कि कानूनी जवाबदेही से जुड़ा है, हालाँकि उनके साझा किए गए कथन में इमाम को बदले की भावना वाले सिस्टम का पीड़ित दर्शाया गया है।

शरजील इमाम पर होने वाले कथित कार्यक्रम की जाँच

अपने उद्घाटन भाषण में, जो मानवाधिकारों की चिंता से प्रेरित था, हर्ष मंदर ने दिल्ली पुलिस पर 2020 की दंगों को आरोपित की साजिश के रूप में पेश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अगर पुलिस जल्दी कार्रवाई करती तो हिंसा आसानी से रोकी जा सकती थी।

मंदर ने स्वीकार किया कि उन्होंने दिसंबर 2019 में जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के कथित रूप से पुस्तकालय में पीटने के अगले दिन भी इसी तरह का भाषण दिया था, लेकिन उन्होंने बताया कि उमर खालिद ने समान विचारों को अधिक कुशलता से दिखाया और वह अभी भी स्वतंत्र हैं, जबकि खालिद जेल में हैं।

मंदर ने खालिद की सराहना की कि उन्होंने गाँधीवादी अहिंसा पर जोर दिया और सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने ‘आतंक’ और ‘सांप्रदायिक हिंसा’ के बीच अस्पष्ट अंतर किया।

उन्होंने कहा कि अगर किसी मुस्लिम समूह ने हमला किया तो इसे आतंकवादी हमला कहा जा सकता है, जबकि हिंदू समूह को गौ रक्षक, रामभक्त या स्वयंसेवक कहकर नजरअंदाज किया जा सकता है।

मंदर ने खालिद के साथ उनकी अंतरिम जमानत के दौरान हुई हाल की फोन बातचीत का भी जिक्र किया, जिसमें खालिद ने देश की खराब स्थिति पर ईमानदार चर्चा करने की इच्छा व्यक्त की।

अंत में मंदर ने भारत के कुछ सबसे होशियार दिमागों और संवेदनशील लोगों की जेल यात्रा की आलोचना की और शरजील इमाम व खालिद को युवा पीढ़ी के लिए ‘रोल मॉडल’ बताया।

हालाँकि, यह विवरण गहन जाँच की माँग करता है। दिल्ली हाई कोर्ट के 2022 के दस्तावेजों से पता चलता है कि खालिद के भाषण, अहिंसा के दावे के बावजूद, तनाव बढ़ने पर सार्वजनिक अशांति पैदा करने की प्रवृत्ति रखते थे।

प्रारंभिक सबूत उनके अन्य साथियों के मामले में साजिश में उनकी भूमिका में अंतर को सामने लाते हैं, जिन्हें राहत मिली थी। न्यायपालिका द्वारा खालिद की जमानत लगातार अस्वीकृत करने से भाषण की सामग्री और संदर्भ में महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट होते हैं, जैसे कॉल लॉग जैसी फोरेंसिक कनेक्शन जो उनके उत्तेजक भाषण को 53 मौतों वाले दंगों से जोड़ती हैं।

पुलिस की प्रतिक्रिया के संदर्भ में, आधिकारिक दस्तावेज दावा करते हैं कि यह हिंसा एक संगठित ‘रेजिम चेंज ऑपरेशन’ थी, जो एंटी-CAA विरोध के दौरान की गई थी और इसे साधारण दमन के रूप में नहीं देखा जा सकता। खालिद की व्यक्तिगत चर्चा की आशाएँ सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनवरी 2026 में उसकी जमानत खारिज करने के फैसले में स्थापित सबूतों को प्रभावित नहीं करतीं।

रश्मि सिंह का विश्लेषण, जिसमें उन्होंने बताया कि इमाम का ‘चक्का जाम’ का आह्वान किसी हिंसक उद्देश्य पर आधारित नहीं था और इसलिए इसे देशद्रोह नहीं माना जाना चाहिए, उनके द वायर में प्रकाशित लेखों पर आधारित है, जिसमें उन्होंने कहा कि इमाम गलत समझे जाने की कीमत चुका रहे हैं।

हालाँकि, यह दृष्टिकोण उनके बयानों के पूरे संदर्भ को नजरअंदाज करता है, जो साधारण विरोध प्रदर्शन से लेकर क्षेत्रों के रणनीतिक अलगाव (चिकन नेक) तक के सुझावों तक फैले थे और इसके जरिए अलगाववादी खतरे का भी संकेत दिया।

आरोपों की रूप रेखा

आरोपों की रूपरेखा बढ़ते तनाव की समयरेखा को सामने लाती है, जिसने फरवरी 2020 के हिन्दू विरोधी दिल्ली दंगों को जन्म दिया, जिसमें सांप्रदायिक झड़पों में 53 लोग मारे गए। अभियोजक कॉल रिकॉर्ड और चैट जैसी सबूतों का उपयोग करके इमाम को कथित साजिश से जोड़ते हैं, लेकिन रश्मि सिंह और अन्य इसे झूठा बताते हैं।

विडंबना यह है कि इस तरह की रक्षा में जमानत पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया जाता है, लेकिन उसी कोर्ट के मूल्यांकन को खारिज कर दिया जाता है कि इमाम और उनके सह-आरोपित उमर खालिद ‘मौजूदा सबूतों के आधार पर गुणात्मक रूप से अलग स्थिति’ में हैं। इससे साफ होता है कि चयनात्मक गुस्सा दिखाई देता है और अशांत समय में भाषणों के संभावित प्रभाव को नज़रअंदाज करना कानूनी वास्तविकता को सरल बना सकता है।

मुजम्मिल इमाम का 2020 के अपने पूछताछ का नाटकीय विवरण, जिसमें पुलिस ने कथित रूप से उन्हें निर्वस्त्र किया, पीटा, पिस्टल मुँह में ठूँस दी और अपमानजनक रिकॉर्डिंग की, परिवार की कठिनाइयों को व्यक्तिगत रूप देने और कथित मुसलमान विरोधी पक्षपात को उजागर करने के लिए था। हालाँकि, इन दावों की आधिकारिक रिकॉर्ड में पुष्टि नहीं हुई है।

मुजम्मिल की संक्षिप्त हिरासत दंगों के वित्तपोषण और समन्वय की जाँच के दौरान हुई, जिसमें इमाम पर डिजिटल सबूतों के आधार पर आरोप है। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत खारिज करते समय प्रतिशोध पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि प्रारंभिक सबूतों पर ध्यान केंद्रित किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि शुद्ध पीड़ित होने की कहानी प्रेस कॉन्फ्रेंस में अधिक आकर्षक हो सकती है।

लेकिन न्यायालय में उतनी प्रासंगिक नहीं है। यह एक पैटर्न को दर्शाता है जिसमें परिवार की गवाही नाटकीयता बढ़ाती है, लेकिन चल रही जाँच के दौरान निर्दोष साबित करने में कोई योगदान नहीं देती।

मनोज कुमार झा का हस्तक्षेप विधायी दृष्टिकोण वाला था। उन्होंने इमाम और खालिद को जमानत न देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर सवाल उठाया और पाँच साल से अधिक समय तक हिरासत में रहने के बावजूद मामले में कोई महत्वपूर्ण न्यायिक प्रगति न होने को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए चिंता का विषय बताया, जिसे उन्होंने आपराधिक न्याय प्रणाली पर चोट के रूप में वर्णित किया। उन्होंने उदाहरण के तौर पर ‘चक्का जाम’ का जिक्र किया, जो गर्ल्स हॉस्टल की टूट चुकी दीवार को बदलने के काम में रोड़ा बन गया और इसे इमाम के मामले में सड़क अवरोध जैसी स्थिति के समान बताया।

हालाँकि, इस आपत्ति को न्यायिक तर्क के साथ संतुलित करना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में स्पष्ट कहा कि इमाम और खालिद ‘गुणात्मक रूप से अलग स्थिति’ में हैं, क्योंकि प्रारंभिक सबूत (prima facie evidence) मौजूद हैं और यही कारण है कि जमानत खारिज की गई, भले ही हिरासत का समय लंबा हो चुका हो।

कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, इमाम ने चिकन नेक मार्ग को ब्लॉक करने और असम एवं पूर्वोत्तर को अलग करने के संदर्भ में टिप्पणियाँ की थीं, जिसे कोर्ट ने संप्रभुता को खतरे में डालने वाला माना, न कि साधारण चक्का जाम, जिससे संवेदनशील भू-राजनीतिक स्थिति में सक्रियता की सीमाओं पर सवाल उठते हैं।

झा के शब्द इमाम के मामले में कुछ विशेष दावों, जैसे कि फोरेंसिक सबूतों से जुड़े दंगे की साजिश को कम महत्व देते हैं, जिसे कोर्ट ने पारंपरिक जमानत मिसालों को पलटने के लिए पर्याप्त माना।

सबा नकवी का भाषण मुख्य रूप से मुस्लिम असहमति पर आतंकवाद विरोधी कानूनों के प्रणालीगत हथियार के रूप में इस्तेमाल पर केंद्रित था। उन्होंने खालिद जैसे मामलों का हवाला देते हुए बताया कि अल्पसंख्यक ऐसी नीतियों (जैसे CAA) का विरोध करते समय असमान जाँच और कठोर दंड झेलते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे कानून वैध विरोध प्रदर्शनों को दंडित करते हैं, जिससे सामाजिक अलगाव और लोकतांत्रिक स्थानों की हानि होती है। नकवी ने यह भी स्वीकार किया कि भेदभाव 2014 के बाद शुरू नहीं हुआ, बल्कि उससे पहले भी मौजूद था।

उनके द्वारा अलगाव पर जोर, सामाजिक-राजनीतिक बहस में सही है, जटिल साजिश मामलों में जमानत निर्णयों को प्रभावित करने वाले साक्ष्य मानकों की भूमिका को नजरअंदाज कर सकता है।

आदित्य मेनन ने इमाम की विद्वत्ता और अकादमिक योग्यता की सराहना की और उनकी जेल यात्रा को विद्वान चर्चा के लिए भयावह नुकसान और युवा मनों में स्वतंत्र अभिव्यक्ति को दबाने वाली मिसाल बताया, खासकर उन लोगों में जो इस्लामोफोबिया पर सवाल उठाते हैं।

उन्होंने इमाम के बयानों की तुलना 2008 के अमरनाथ विरोध प्रदर्शन जैसी अहिंसक आंदोलनों से की, यह कहते हुए कि ये बयानों रणनीतिक ब्लॉकेड के रूपक थे, न कि देशद्रोह और इमाम को मुस्लिम राजनीतिक सक्रियता का प्रतीक बताया, जबकि लोकतांत्रिक स्थान सिकुड़ रहे हैं। मेनन ने बताया कि ऐसे हालात अल्पसंख्यकों की राजनीतिक प्रभावशीलता को सीमित करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने जमानत की खारिज

हालाँकि, इस प्रशंसात्मक दृष्टिकोण की न्यायिक व्याख्या के साथ तुलना आवश्यक है। 2022 में दिल्ली की कोर्ट ने देशद्रोह के आरोप तय किए, जिसमें ‘चिकन नेक’ का उदाहरण ऐसे बयानों के रूप में देखा गया जो देश की एकता के लिए हानिकारक थे, जबकि अमरनाथ का संदर्भ इसी प्रकार के भौगोलिक प्रभाव नहीं रखता।

अभियोजकों के सबूत, जैसे दंगों के समन्वय से जुड़े लिंक, प्रारंभिक सबूत के रूप में पर्याप्त माने गए, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने जमानत अस्वीकार करते हुए पुष्ट किया और गुणात्मक अंतर को को दिखाया। शरजील इमाम की अकादमिक योग्यता उन्हें ऐसे भाषणों के लिए न्यायिक जाँच से बचाती नहीं है, जिन्हें कोर्ट ने अशांति के समय में द्वेष पैदा करने वाला माना, खासकर जिन परिस्थितियों में मौतें हुईं।

नंदिता नारायण ने भारतीय सरकार की न्याय प्रणाली में कथित दोहरे मानकों का दावा किया, यह कहते हुए कि UAPA जैसे कानून मुस्लिम सक्रियकों और इमाम जैसे विद्वानों के खिलाफ ‘चयनात्मक रूप से लागू’ किए जाते हैं, जबकि बाकी कार्यों के लिए अन्य लोगों पर कार्रवाई नहीं होती।

उन्होंने इमाम की गिरफ्तारी को अल्पसंख्यकों की अकादमिक स्वतंत्रता और असहमति दबाने के पैटर्न का हिस्सा बताया। नारायण ने गाजा में इजराइल के कार्यों की तुलना भारत के अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार से की और हिटलर द्वारा शत्रुता की भावना का राजनीतिक लाभ उठाने के उदाहरण का हवाला दिया, वर्तमान प्रशासन की रणनीतियों की तुलना ऐसे विभाजनकारी प्रयासों से की। नारायण ने अन्याय का मुकाबला करने के लिए एकजुटता की अपील और इमाम को नैतिक विरोध का उदाहरण बताया।

इस आलोचना के लिए सावधानी जरूरी है, क्योंकि UAPA का उपयोग अल्पसंख्यकों के अलावा अन्य मामलों में भी किया गया है, जैसे एल्गर परिषद जाँच में गैर-मुस्लिम आरोपित। इमाम के क्षेत्रीय अवरोध पर किए गए विशेष बयानों को कोर्ट के दस्तावेजों, जैसे 2022 के दिल्ली कोर्ट के फैसले में, केवल अकादमिक अभिव्यक्ति नहीं बल्कि आरोप का आधार माना गया।

साजिश के आरोपों का समर्थन संपर्क ट्रेल जैसे सबूतों से होता है। जबकि अकादमिक स्वतंत्रता की चिंताएँ वैध हैं, भारत की बहुदलीय लोकतंत्र, जहाँ चुनाव, स्वतंत्र प्रेस और न्यायिक निगरानी जारी है, उसकी तुलना नाजी जर्मनी के तानाशाही या इजराइल की गाजा नीति जैसी भू-राजनीतिक स्थिति से करना आसान होगा।

निष्कर्ष

हर्ष मंदर की मानवाधिकार चिंताओं से लेकर नंदिता नारायण द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक तुलना तक, प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी गई भावुक अपीलें अक्सर इमाम के मामले में कोर्ट के निर्णयों और सबूतों के महत्व को कम करके दिखाती हैं। वास्तविक सच्चाई चाहे 2020 के दंगों से जुड़े फोरेंसिक सबूत हों या प्रारंभिक सबूत (prima facie) के लिए बार-बार न्यायिक पुष्टि संकेत देते हैं कि इस मामले में दुश्मनी नहीं, बल्कि जवाबदेही काम कर रही है।

भारत जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रति दृढ़ है, मजबूत संस्थानों, नियमित चुनावों और सतर्क न्यायपालिका के माध्यम से किसी भी दुरुपयोग की रोकथाम करता है। भारत की न्यायिक प्रणाली की स्थायी मजबूती ट्रायल्स के दौरान स्पष्ट होती है, जब सबूतों की गंभीरता से जाँच की जाती है।

यह विभाजन का उपकरण नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय एकता का रक्षक है। यह याद दिलाता है कि सच्चा न्याय संतुलित जाँच पर फलता-फूलता है, न कि अतिशयोक्तिपूर्ण भय की गूंज पर, जो अनजाने में उन्हीं स्वतंत्रताओं को कमजोर कर सकती है जिन्हें यह संरक्षित करने का दावा करता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

हनुमान चालीसा पाठ पर भड़के SC दबंग, प्रजापति माँ-बेटे को जूतों की माला पहनाकर निकाला जुलूस-अंबेडकर प्रतिमा के सामने रगड़वाई नाक: हापुड़ में 4 गिरफ्तार, पढ़ें FIR की अहम बातें

उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले से सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ने वाली एक रूह कंपा देने वाली वारदात सामने आई है। यहाँ शाहपुर चौधरी गाँव में एक माँ और उसके बेटे को जूतों की माला पहनाकर पूरे गाँव में घुमाया गया और उन्हें अमानवीय तरीके से अपमानित किया गया। इस पूरी घटना से जुड़ी FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल कार्रवाई की है और अब तक चार आरोपितों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया है, जबकि अन्य की तलाश जारी है।

मंदिर में विवाद और जूतों की माला का ‘फरमान’

जानकारी के अनुसार, घटना की जड़ें अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय से जुड़ी हैं। पीड़ित युवक दीपक चौधरी (प्रजापति समुदाय) के अनुसार, उस दौरान गाँव के मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ हो रहा था, तभी दलित समुदाय के एक युवक ने हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिसका दीपक ने विरोध किया था।

आरोप है कि इसी रंजिश के चलते 26 जनवरी 2026 को कुछ दलित युवकों ने दीपक को रास्ते में रोक लिया और गाली-गलौज की। इसके बाद उसकी माँ को भी मौके पर बुला लिया गया। गाँव की पंचायत ने कथित तौर पर एक ‘तालिबानी’ फरमान सुनाया कि दोनों को जूतों की माला पहनाकर घुमाया जाए ताकि धर्म पर टिप्पणी का बदला लिया जा सके।

प्रतिमा के सामने नाक रगड़वाई और निकाला जुलूस

पीड़ित ने FIR में आरोप लगाया कि उसे और माँ को जबरन बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के सामने ले जाया गया और वहाँ उनकी नाक रगड़वाई गई। इसके बाद भीड़ ने दोनों के गले में जूतों और चप्पलों की माला डाल दी और पूरे गाँव में उनका जुलूस निकाला।

इस दौरान माँ-बेटे के साथ मारपीट भी की गई और उन्हें हाथ जोड़कर माफी माँगने पर मजबूर किया गया। यह पूरी शर्मनाक घटना गाँव में लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गई, जिसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

पुलिस की कार्रवाई और गाँव में तनाव

वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। गढ़ कोतवाली पुलिस ने पीड़ित की तहरीर पर तत्काल 10 नामजद युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए चार आरोपितों (अनिल, अमित, सागर और विनीत) को गिरफ्तार कर लिया है।

गढ़ कोतवाली प्रभारी इंस्पेक्टर देवेंद्र विष्ट ने बताया कि आरोपितों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जा रही है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि एक आरोपित पुलिस विभाग से जुड़ा है, जिसकी जाँच की जा रही है। फिलहाल गाँव में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है और एहतियातन पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

‘जानवरों की तरह नोंचा, मुँह में कपड़ा ठूँसा’: दिल्ली के भजनपुरा में 6 साल की मासूम से 3 मुस्लिम नाबालिगों ने किया गैंगरेप, पीड़ित परिवार की आपबीती का Video

देश की राजधानी दिल्ली में शाम ढलते ही मानवता को शर्मसार करने वाली एक रूह कंपा देने वाली वारदात सामने आई है। यहाँ के भजनपुरा थाना क्षेत्र में महज 6 साल की मासूम बच्ची के साथ पड़ोस में रहने वाले तीन नाबालिग मुस्लिम लड़कों ने सामूहिक दुष्कर्म (गैंगरेप) की घटना को अंजाम दिया। दरिंदगी इस कदर बर्बर थी कि जब बच्ची खून से लथपथ हो गई, तो उसे घर के दरवाजे पर एक आरोपित यह झूठ बोलकर छोड़ गया कि वह ‘ई-रिक्शा से टकराकर गिर गई’ है। दर्द से कराह रही वह नन्हीं जान जैसे ही कमरे के अंदर दाखिल हुई, अपनी माँ की आँखों के सामने ही बेहोश होकर गिर पड़ी। अपनी लाड़ली की यह हालत देख माँ के पैरों तले जमीन खिसक गई।

बेटी के कपड़ों को खून से सना देख माँ ममता के मारे उसे अस्पताल की ओर लेकर भागी, लेकिन रास्ते में ही उसने विचार बदला और वह बच्ची को लेकर सीधे जाफराबाद पुलिस थाने पहुँच गई। वहाँ उसने पुलिस को पूरी कहानी सुनाई। हैरानी की बात यह रही कि जिन आरोपितों को पकड़ने के लिए पुलिस को महज 10 मिनट का रास्ता तय करना था, वहाँ पहुँचने में पुलिस को 10 घंटे लग गए। इस देरी का नतीजा यह हुआ कि पुलिस केवल दो आरोपितों को ही हिरासत में ले सकी, जबकि गैंगरेप का मुख्य आरोपित घटना के 10 दिन बीत जाने के बाद भी दिल्ली पुलिस की गिरफ्त से मीलों दूर है।

ग्राउंड रिपोर्ट: बदबूदार गली के उस कमरे की कहानी जहाँ सिसक रही है मासूमियत

इस भयावह घटना की हकीकत जानने के लिए ऑपइंडिया की टीम बीते बुधवार (28 जनवरी, 2026) को पीड़ित परिवार के घर पहुँची। भजनपुरा इलाके की एक छोटी सी और बदबूदार गली के आखिरी छोर पर यह परिवार एक बड़े से कमरे में रहने को मजबूर है। यह गली आगे से बंद है, जो इलाके के घुटन भरे माहौल को दर्शाती है। कमरे के अंदर का दृश्य हृदयविदारक था। पीड़ित बच्ची कंबल ओढ़े बेड पर सुध-बुध खोकर लेटी थी, जबकि गहरी चिंता और बेबसी में डूबे माता-पिता बेड के अलग-अलग कोनों पर बैठे अपनी किस्मत और कानून व्यवस्था को कोस रहे थे।

पीड़िता के पिता ने बताया कि 18 जनवरी 2026 की शाम करीब 7 बजे जब वह बाजार सब्जी लेने जा रहे थे, तब उनकी बिटिया ने साथ चलने की जिद की। पिता ने उसे घर के बाहर एक दुकान से कुछ सामान दिलाया और बाजार चले गए। जब वह लौट रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक आरोपित और उसका परिवार उनके सामने से ही भाग रहा था, लेकिन तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि वह भागने वाला शख्स उनके परिवार की खुशियाँ लूट चुका है। घर पहुँचने पर उन्हें पता चला कि उसी लड़के और उसके दो साथियों ने मासूम बेटी के साथ घिनौनी हरकत की है। पिता का कहना है कि मुख्य आरोपित वर्तमान में बिहार के दरभंगा में खुलेआम घूम रहा है, लेकिन पुलिस उसे पकड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। इस सदमे के कारण न तो पिता रिक्शा चलाने जा पा रहे हैं और न ही माँ काम पर जा रही है। दोनों बारी-बारी से बस अपनी बेटी के घावों को सहला रहे हैं।

दरिंदों ने बच्ची को जानवरों की तरह नोंचा- माँ

पीड़ित माँ ने उस शाम का मंजर याद करते हुए बताया कि वह घर पर ही थीं तभी एक आरोपित लड़का उनकी बेटी को गोद में उठाकर लाया और एक्सीडेंट की झूठी कहानी गढ़ी। माँ ने जब देखा कि बच्ची के प्राइवेट पार्ट से खून बह रहा है तो उनका माथा ठनका। उन्होंने आरोपित से सवाल किया कि अगर टक्कर लगी तो चेहरे या सिर पर चोट क्यों नहीं है? इसके बाद वह आरोपित बच्ची को वहीं छोड़कर भाग निकला। माँ ने बताया कि दरिंदों ने बच्ची को जानवरों की तरह नोंचा था। उसके शरीर पर दांतों के निशान थे, कपड़े फटे हुए थे और कान पर गंभीर सूजन थी।

जब पुलिस को लेकर माँ घटनास्थल पर पहुँची तो वहाँ का नजारा देख रूह काँप गई। एक चूड़ी की फैक्ट्री की छत और दीवारों पर खून के धब्बे बिखरे हुए थे, जो चीख-चीख कर उस शाम की बर्बरता गवाही दे रहे थे। पुलिस ने मौके का वीडियो तो बनाया लेकिन दबिश देने में इतनी देरी की कि मुख्य आरोपित को फरार होने का पूरा मौका मिल गया। हद तो तब हो गई जब घटना के अगले दिन एक आरोपित की माँ ने पीड़ित परिवार के घर आकर सहानुभूति दिखाने के बजाय उन्हें धमकाया और कहा कि ‘तेरी बेटी के साथ जो हुआ वह ठीक ही हुआ, ऐसे ही होना चाहिए।’

तीन दरिंदों ने मुँह में कपड़ा ठूँस कर लूटी मासूमियत

बिस्तर पर लेटी उस 6 साल की बच्ची ने जब अपनी टूटी-फूटी जुबान से दर्द बयाँ किया, तो वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखें नम हो गईं। बच्ची ने बताया कि वे तीन लड़के थे जिन्होंने उसके साथ गंदा काम किया। उसे डराया-धमकाया गया और उसकी चीखें दबाने के लिए उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया गया था। आरोपितों ने न केवल कानून का उल्लंघन किया, बल्कि मानवता के हर उस मापदंड को तोड़ दिया जो समाज को सुरक्षित बनाता है।

यह पीड़ित परिवार मूल रूप से उत्तराखंड के रुद्रपुर जिले का रहने वाला है और पिछले 15 सालों से दिल्ली में आजीविका की तलाश में संघर्ष कर रहा है। पिता पैडल वाला रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पालते हैं, जबकि माँ एक कागज बनाने वाली फैक्ट्री में मजदूरी करती है। यह परिवार पिछले तीन सालों से भजनपुरा के इस किराए के कमरे में रह रहा है। पिता बताते हैं कि उनके पाँच बच्चे थे (3 लड़की, 2 लड़का) लेकिन आठ महीने पहले 14 साल के सबसे बड़े बेटे की बीमारी के कारण मौत हो गई। गरीबी के चलते वह अपने बच्चों तक का इलाज नहीं करा सके। अब इस दरिंदगी ने उनकी बची-खुची हिम्मत भी तोड़ दी है।

पिता बताते हैं कि जिस गली में यह वारदात हुई, वहाँ उनका अकेला हिंदू परिवार रहता है, जबकि बाकी सभी पड़ोसी मुस्लिम समुदाय से हैं। हालाँकि, यह पूरा इलाका हिंदू बाहुल्य है, लेकिन उस विशेष गली में वे सामाजिक और सुरक्षा के लिहाज से खुद को बेहद कमजोर महसूस कर रहे हैं। 12 वर्ष की उनकी बड़ी बेटी अब घर पर रहकर छोटे भाई-बहनों की देखभाल करती है, क्योंकि माता-पिता इस सदमे से उबर नहीं पा रहे हैं।

पड़ोसी बोले- आरोपितों को हो फाँसी की सजा

इलाके के लोगों में भी इस घटना को लेकर भारी रोष व्याप्त है। गली में रहने वाली एक हिंदू महिला ने गुस्से में कहा कि आरोपितों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि किसी की रूह काँप जाए। उन्हें तड़पा-तड़पा कर चौराहे पर मारना चाहिए।

वहीं, बाजार में चाय बेचने वाली एक मुस्लिम महिला ने भी आरोपितों के लिए फाँसी की माँग की। उन्होंने कहा कि ‘आज उस बच्ची के साथ हुआ है, कल हमारी बेटियों के साथ भी हो सकता है।’

सबसे तेज अर्थव्यवस्था, मजबूत निर्यात, बढ़ता सर्विस सेक्टर… वैश्विक चुनौतियों और US टैरिफ के बीच भारत की शानदार तरक्की: पढ़ें- इकोनॉमिक सर्वे की अहम बातें

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार (29 जनवरी 2026) को संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 पेश किया। लगातार चौथे साल यह रिपोर्ट बताती है कि भारत सबसे तेज बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की अर्थव्यवस्था 6.8% से 7.2% के बीच बढ़ेगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मुख्य निष्कर्षों पर प्रतिक्रिया दी और कहा, “आज पेश किया गया आर्थिक सर्वेक्षण भारत के रिफॉर्म एक्सप्रेस की पूरी तस्वीर दिखाता है, जो मुश्किल वैश्विक माहौल में भी लगातार आगे बढ़ रहा है। इसमें मजबूत मैक्रोइकॉनॉमिक आधार, निरंतर विकास गति और राष्ट्र-निर्माण में नवाचार, उद्यमिता और इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती भूमिका को उजागर किया गया है।”

पीएम मोदी ने कहा कि आर्थिक सर्वेक्षण समावेशी विकास के महत्व पर ज़ोर देता है और इसमें एमएसएमई, किसानों, युवा रोज़गार और सामाजिक कल्याण को विशेष ध्यान दिया गया है। उन्होंने कहा, “यह विनिर्माण को मज़बूत करने, उत्पादकता बढ़ाने और विकसित भारत बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने का रोडमैप भी बताता है। इससे मिलने वाले विचार नीति-निर्माण में मदद करेंगे और भारत के आर्थिक भविष्य में विश्वास को और मजबूत करेंगे।”

यह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुमान से भी मेल खाता है, जिसने 2025-26 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान 7.3% कर दिया, जो अक्टूबर के 6.2% से 0.7 प्रतिशत अंक ज़्यादा है। साथ ही आईएमएफ ने 2026-2027 का अनुमान भी 6.2% से बढ़ाकर 6.4% कर दिया।

सर्वेक्षण में कहा गया कि वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर रही है। इसमें बताया गया कि व्यापार में रुकावटें, खासकर टैरिफ और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में धीमी वृद्धि, निर्यात और निवेशक विश्वास पर असर डाल सकती हैं। लेकिन भारत ने लगातार अनुमान से बेहतर जीडीपी आँकड़े दर्ज किए हैं।

अमेरिकी टैरिफ के बावजूद भारत का लगातार विकास

भारत का कुल निर्यात (माल और सेवाएँ) वित्त वर्ष 25 में रिकॉर्ड 825.3 अरब डॉलर तक पहुँचा और वित्त वर्ष 26 में भी वैश्विक व्यापार की अनिश्चितता के बीच बढ़ता रहा। सर्वेक्षण के अनुसार, अप्रैल-दिसंबर 2025 में माल निर्यात 2.4% बढ़ा जबकि सेवा निर्यात 6.5% बढ़ा, भले ही टैरिफ बढ़ाए गए थे।

सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए विकास दर 7.4% रखी है, जो पिछले साल के 6.3-6.8% के अनुमान से ज़्यादा है। सर्वेक्षण में बताया गया कि बड़े टैरिफ बढ़ोतरी के बावजूद विकास तेज़ हुआ। इसमें लिखा है, “हालाँकि 2025 में अमेरिका द्वारा कई भारतीय निर्यातों पर कुल 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने के बाद विकास अनुमान कम किए गए थे, लेकिन वास्तविक प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा।”

ट्रंप का मोदी सरकार को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन न करने और नई दिल्ली-इस्लामाबाद के बीच मध्यस्थता के उनके दावों का विरोध करने पर दंड देने का फैसला भारत की विकास गति को रोकने में नाकाम रहा लगता है।

अस्थाई आँकड़ों से पता चला कि भारत का बजट घाटा वित्त वर्ष 21 में जीडीपी के 9.2% से घटकर वित्त वर्ष 25 में 4.8% हो गया और वित्त वर्ष 26 में संभवतः 4.4% तक पहुँचेगा। राजस्व घाटा जीडीपी के हिस्से के रूप में लगातार कम हुआ और वित्त वर्ष 09 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया। पूँजीगत व्यय के लिए ज्यादा धन उपलब्ध होने से सरकारी खर्च की गुणवत्ता सुधरी है।

पहले अग्रिम अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 26 में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.4% रहने का अनुमान है, जो देश के लगातार मजबूत विकास को दिखाता है। सर्वेक्षण में कहा गया, “निजी खपत और पूँजी निर्माण विकास को सहारा दे रहे हैं, जबकि आपूर्ति पक्ष पर सेवाएँ मुख्य योगदानकर्ता बनी हुई हैं। विनिर्माण गतिविधि मज़बूत हुई है और कृषि ने संरचनात्मक बाधाओं के बावजूद स्थिरता दी है।”

वित्तीय संकेतक भी सुधरे हैं, केंद्र की आय प्राप्तियाँ वित्त वर्ष 25 में जीडीपी के 9.2% तक पहुँचीं। सावधानीपूर्ण वित्तीय प्रबंधन की वजह से 2025 में तीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग बढ़ाई। सितंबर 2025 में सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (जीएनपीए) कई दशकों के निचले स्तर 2.2% पर आ गईं, जो बैंकिंग क्षेत्र में परिसंपत्ति गुणवत्ता में शानदार सुधार दिखाता है। दिसंबर 2025 तक ऋण वृद्धि 14.5% थी, जो उधार गतिविधि में मजबूत गति दर्शाती है।

इस बीच, भारत का बाहरी कर्ज़ मार्च 2025 के अंत में 736.3 अरब डॉलर से बढ़कर सितंबर 2025 के अंत में 746 अरब डॉलर हो गया। बाहरी कर्ज़ का जीडीपी अनुपात 19.2% था। इसके अलावा, कुल कर्ज़ का पाँच प्रतिशत से भी कम बाहरी है, जिससे बाहरी क्षेत्र से जुड़े जोखिम कम होते हैं। दिसंबर 2024 तक भारत का वैश्विक बाहरी कर्ज़ में हिस्सा सिर्फ 0.69 प्रतिशत है, जो वैश्विक कर्ज़ में उसकी तुलनात्मक रूप से छोटी भूमिका दिखाता है।

मजबूत निर्यात आँकड़े, विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी, नियंत्रित महँगाई और अन्य फैक्टर

अमेरिकी टैरिफ बढ़ने के बावजूद अप्रैल-दिसंबर 2025 में भारत का माल निर्यात 2.4 प्रतिशत बढ़ा, जबकि सेवा निर्यात 6.5 प्रतिशत बढ़ा। माल और सेवाएँ मिलाकर कुल निर्यात वित्त वर्ष 25 में रिकॉर्ड 825.3 अरब डॉलर तक पहुँचा और वित्त वर्ष 26 में भी सुधार जारी है।

इसी अवधि में माल आयात 5.9% बढ़ा, लेकिन इसे सेवा व्यापार अधिशेष और मजबूत प्रेषणों (Remittances) ने संतुलित किया। नतीजतन, वित्त वर्ष 26 की पहली छमाही में चालू खाता घाटा जीडीपी के सिर्फ 0.8% पर कम रहा।

ग्राफ साभार: PIB

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मार्च 2025 के अंत में 668 अरब डॉलर से बढ़कर 16 जनवरी तक 701.4 अरब डॉलर हो गया। यह भंडार सितंबर 2025 के अंत में बकाया बाहरी कर्ज़ का लगभग 94% और माल आयात के लगभग 11 महीनों का कवर देता है, जो आरामदायक तरलता बफर प्रदान करता है।

विदेशी मुद्रा भंडार उच्च स्तर पर (फोटो साभार: PIB)

केंद्रीय सरकार ने अस्थिर वैश्विक बाज़ारों और अभूतपूर्व बदलावों को देश के उपभोक्ताओं की जेब पर नकारात्मक असर नहीं पड़ने दिया, जो इस उपलब्धि को और बढ़ाता है। सर्वेक्षण के अनुसार, अप्रैल से दिसंबर 2025 तक भारत की औसत हेडलाइन महँगाई दर 1.7% रही, जो सीपीआई श्रृंखला शुरू होने के बाद सबसे कम है।

साल 2025 में प्रमुख उभरती बाज़ार और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (ईएमडीई) में भारत में हेडलाइन महँगाई में सबसे बड़ी गिरावट आई, लगभग 1.8 प्रतिशत अंक। खास बात यह है कि यह महँगाई कम होना वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में 8% की मजबूत जीडीपी वृद्धि के साथ हुआ, जो भारत के ठोस मैक्रोइकॉनॉमिक आधार और बिना अर्थव्यवस्था के गर्म होने के कीमतों को कुशलता से नियंत्रित करते हुए विकास बनाए रखने की क्षमता को दिखाता है।

महँगाई पर नियंत्रण

सर्वेक्षण में यह भी बताया गया कि भारत का सेवा क्षेत्र स्थिरता का कारक बन गया है, जो देश के कुल मूल्य वर्धित (जीवीए) का आधे से ज्यादा देता है और रोजगार व निर्यात का प्रमुख चालक है। वित्त वर्ष 26 के पहले अग्रिम अनुमानों के अनुसार, पहली छमाही में इसका जीडीपी हिस्सा 53.6% हो गया और जीवीए हिस्सा अब तक के सबसे ऊँचे स्तर 56.4% पर पहुँचा। इससे आधुनिक, व्यापार योग्य और डिजिटल रूप से दी जाने वाली सेवाओं की बढ़ती अहमियत पता चलती है।

वैश्विक सेवा व्यापार में भारत का हिस्सा 2005 में 2% से दोगुना होकर 2024 में 4.3% हो गया, जिससे वह दुनिया का सातवाँ सबसे बड़ा सेवा निर्यातक बन गया। यह देश का मुख्य विकास इंजन है और जीडीपी का आधे से ज़्यादा हिस्सा देता है। क्षेत्र ने वित्त वर्ष 2025-2026 में 9.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, जो कुल विकास को आगे बढ़ा रही है जबकि महामारी से पहले सेवा निर्यात वृद्धि 7-8 प्रतिशत थी जो हाल के वर्षों में लगभग 14 प्रतिशत हो गई।

वित्त वर्ष 23-25 में औसतन सभी एफडीआई का 80.2% हिस्सा (महामारी से पहले वित्त वर्ष 16-20 के 77.7% से ज़्यादा) सेवा क्षेत्र को मिला, जो इसे एफडीआई का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता बनाता है। खास बात यह है कि यह क्षेत्र सालाना औसतन 7-8% की दर से बढ़ा है।

भारत ने ग्रीनफील्ड डिजिटल निवेश में वैश्विक नेता की अपनी भूमिका भी मज़बूत की और 2024 में 1,000 से ज़्यादा परियोजनाओं के साथ ग्रीनफील्ड निवेश घोषणाओं में दुनिया में चौथा स्थान पाया। 2020 से 2024 तक यह ग्रीनफील्ड डिजिटल निवेश के लिए दुनिया का सबसे लोकप्रिय स्थान बना, जिसने 114 अरब डॉलर आकर्षित किए।

सर्वेक्षण के अनुसार, घरेलू अर्थव्यवस्था “वैश्विक अनिश्चितता के बीच स्थिर विकास वाली है, जिसमें सावधानी की ज़रूरत है लेकिन निराशावाद की नहीं।” इसमें यह भी कहा गया कि भारत के अगले दस साल के आर्थिक लक्ष्यों के लिए बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश की ज़रूरत है। भारत को अपने भविष्य के सपनों को पूरा करने के लिए कई चुनौतियाँ पार करनी हैं, लेकिन यह दिखाता है कि देश सही रास्ते पर है।

कई कैबिनेट मंत्रियों ने सर्वेक्षण की सराहना की, जिनमें गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हैं। उन्होंने कहा, “यह पीएम मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था की उस ताकत की गवाही देता है जो चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए ज़ोरदार आगे बढ़ रही है।”

गृहमंत्री ने कहा कि जब दुनिया महामारी से आर्थिक अस्थिरता में डूब गई थी, तब हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत नेतृत्व के चलते सभी को साथ लेकर इन दोनों बाधाओं को पार करते हुए सहज रूप से आगे बढ़ती रही।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। अंग्रेजी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

दशकों पहले तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी हुई थीं करोड़ों की 3 मूर्तियाँ, अब अमेरिका इज्जत से लौटाएगा: जानिए 12 साल में मोदी सरकार के नेतृत्व में कितनी धरोहरें भारत को मिलीं वापस

सांस्कृतिक विरासत केवल कला या संग्रहालय की वस्तुएँ नहीं होती, बल्कि किसी देश की इतिहास, धर्म और पहचान का प्रतीक होती हैं। दशकों से तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी हुई पवित्र कांस्य मूर्तियों की कहानी इस बात की याद दिलाती है कि कला और धर्म के प्रतीकों की अवैध तस्करी कितनी गंभीर समस्या है। इसी संदर्भ में अमेरिका के वाशिंगटन स्थित स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय लिया है।

उसने भारत सरकार को तीन दक्षिण भारतीय कांस्य मूर्तियों, शिव नटराज, सोमस्कंद और संत सुंदरार विद परवई को लौटाने की घोषणा की। ये मूर्तियाँ तमिलनाडु के मंदिरों से दशकों पहले अवैध तरीके से हटाई गई थीं और बाद में अंतरराष्ट्रीय कला बाजार के जरिए अमेरिका तक पहुँचीं।

यह कदम न केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर की वापसी की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि दुनिया भर में लूटी गई विरासत को उनके मूल देशों तक लौटाने की वैश्विक मुहिम को भी मजबूती देता है।

कौन-कौन सी मूर्तियाँ भारत लौटाई जा रही हैं?

स्मिथसोनियन द्वारा जिन तीन मूर्तियों की पहचान की गई है, वे दक्षिण भारतीय कांस्य कला की उत्कृष्ट मिसाल हैं। इनमें चोल काल की प्रसिद्ध ‘शिव नटराज’ प्रतिमा शामिल है, जो लगभग 990 ईस्वी की मानी जाती है।

दसवीं शताब्दी की नटराज की कांस्य प्रतिमा (फोटो साभार: Special Arrangement)

संग्रहालय के निदेशक चेस एफ रॉबिन्सन ने कहा, “शिव नटराज की यह प्रतिमा तंजावुर जिले के श्री भाव औषधेश्वर मंदिर से संबंधित थी, जहाँ 1957 में इसकी तस्वीर ली गई थी। बाद में 2002 में न्यूयॉर्क स्थित डोरिस वीनर गैलरी से इस कांस्य प्रतिमा को राष्ट्रीय एशियाई कला संग्रहालय ने अधिग्रहित कर लिया।”

12वीं शताब्दी की सोमस्कंद प्रतिमा (फोटो साभार: Special Arrangement)

दूसरी मूर्ति ‘सोमस्कंद’ है, जो 12वीं शताब्दी की चोलकालीन कृति है और इसमें शिव को पार्वती के साथ दर्शाया गया है। शोध में पुष्टि हुई है कि ‘सोमस्कंद’ की तस्वीर 1959 में अलत्तूर गाँव के विश्वनाथ मंदिर में ली गई थी।

विजयनगर काल (16वीं शताब्दी) के संत सुंदरार अपने परवई के साथ (फोटो साभार: Special Arrangement)

तीसरी प्रतिमा ‘संत सुंदरार विद परवई’ है, जो विजयनगर काल की 16वीं शताब्दी की मूर्ति है। संत सुंदरर विद परावई की तस्वीर 1956 में वीरसोलापुरम गाँव के एक शिव मंदिर में ली गई थी।

ये तीनों मूर्तियाँ केवल कलात्मक वस्तुएँ नहीं थीं, बल्कि तमिलनाडु के मंदिरों में पूजनीय और पवित्र प्रतिमाएँ थीं। इन्हें धार्मिक उत्सवों के दौरान बाहर निकाला जाता था। इसलिए इनका मंदिरों से चोरी होना धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से गंभीर अपराध माना जाता है।

मंदिरों से चोरी और अवैध तस्करी का मामला

संग्रहालय अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इन प्रतिमाओं को जिस समय हटाया गया, उस दौरान भी भारत में पुरावशेष संरक्षण कानून लागू थे। इसका मतलब यह है कि इनका निर्यात या बिक्री पहले से ही कानूनन प्रतिबंधित थी।

जाँच में सामने आया कि इन मूर्तियों को मंदिरों से हटाकर चोरी-छिपे अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुँचाया गया और फिर इन्हें निजी कलेक्शन व संग्रहालयों में शामिल कर लिया गया। शिव नटराज प्रतिमा को 2002 में न्यूयॉर्क की डोरिस वीनर गैलरी के जरिए खरीदा गया था।

जाँच में यह भी संकेत मिले कि इस बिक्री के लिए फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया गया। वहीं सोमस्कंद और संत सुंदरार विद परवई की प्रतिमाएँ 1987 में आर्थर एम सैकलर द्वारा दान की गई लगभग 1,000 वस्तुओं के संग्रह के साथ संग्रहालय में आई थीं।

प्रोवेनेंस रिसर्च से हुआ बड़ा खुलासा

इन मूर्तियों की वापसी का फैसला विस्तृत प्रोवेनेंस जाँच के बाद हुआ। प्रोवेनेंस रिसर्च का अर्थ है किसी कलाकृति के स्वामित्व और इतिहास की पूरी कड़ी को खंगालना। स्मिथसोनियन की टीम ने अधिग्रहण रिकॉर्ड, लेन-देन का इतिहास, डीलर दस्तावेज, शिपिंग व कस्टम पेपर्स, पुरानी तस्वीरें, पत्राचार और संग्रहालय के आर्काइव की गहन समीक्षा की।

इस प्रक्रिया में कई गंभीर ‘रेड फ्लैग’ सामने आए, जैसे 1973 से पहले मूर्तियों का कोई स्पष्ट इतिहास नहीं होना, अधिग्रहण को पीछे की तारीख में दिखाने की कोशिश और कुछ कस्टम दस्तावेजों में मूर्ति का स्रोत ‘थाईलैंड’ तक लिखा जाना।

फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी की तस्वीरों ने निभाई निर्णायक भूमिका

साल 2023 में स्मिथसोनियन ने पांडिचेरी स्थित फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी के फोटो आर्काइव्स के साथ मिलकर काम किया। इन अभिलेखों में दक्षिण भारतीय मंदिरों की दुर्लभ तस्वीरें मौजूद हैं। जाँच में पुष्टि हुई कि ये तीनों कांस्य मूर्तियाँ 1956 से 1959 के बीच तमिलनाडु के सक्रिय मंदिरों में मौजूद थीं और उनकी तस्वीरें उसी दौरान ली गई थीं।

इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इन निष्कर्षों की समीक्षा की और आधिकारिक रूप से माना कि मूर्तियों को भारतीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए हटाया गया था। इसी आधार पर स्मिथसोनियन ने इन्हें लौटाने का निर्णय लिया।

शिव नटराज की ‘लॉन्ग-टर्म लोन’ व्यवस्था पर विवाद

तीनों मूर्तियाँ भारत लौटाई जाएँगी, लेकिन इनमें से एक ‘शिव नटराज’ को भारत सरकार ने एक विशेष समझौते के तहत दीर्घकालिक ऋण (Long-term loan) पर संग्रहालय में प्रदर्शित रहने की अनुमति दी है। संग्रहालय का कहना है कि इससे वह मूर्ति का पूरा सच दुनिया के सामने रख सकेगा, जिसमें इसका मंदिर से संबंध, अवैध तस्करी, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिक्री और अंततः भारत वापसी की कहानी शामिल होगी।

यह मूर्ति संग्रहालय की प्रदर्शनी ‘The Art of Knowing in South Asia, Southeast Asia, and the Himalayas’ में प्रदर्शित रहेगी। हालाँकि, कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि मंदिर की मूर्तियाँ पवित्र और अविभाज्य संपत्ति होती हैं, इसलिए उन्हें लोन पर रखना कानूनी और नैतिक रूप से विवादित है।

ऑपरेशन ‘Hidden Idol’ और अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई

इस घोषणा के साथ ही अमेरिका में सांस्कृतिक तस्करी के खिलाफ कार्रवाई भी तेज हुई है। उसी दिन ‘अमेरिकी आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन’ (ICE) ने ‘ऑपरेशन हिडन आइडल’ के तहत कई भारतीय कांस्य मूर्तियाँ जब्त कीं।

इनमें 14वीं शताब्दी की पार्वती प्रतिमा और तमिलनाडु की चार अन्य मूर्तियाँ शामिल थीं, जिनकी कुल अनुमानित कीमत 5 मिलियन डॉलर से अधिक बताई गई। यह प्रतिमा न्यू जर्सी के Port of Newark पर पकड़ी गई थी। जाँच में पता चला कि इसे कम से कम छह डीलरों के जरिए फर्जी प्रोवेनेंस के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में घुमाया गया था।

अमेरिकी एजेंसियों ने कई मामलों को कथित तस्कर सुभाष कपूर के नेटवर्क से जोड़ा है, जिस पर 100 मिलियन डॉलर से अधिक की सांस्कृतिक संपत्ति की तस्करी का आरोप है। कपूर 2011 में जर्मनी में गिरफ्तार हुआ था और 2012 में भारत प्रत्यर्पित किया गया।

अमेरिका ने 2007 से अब तक 24 देशों को 6600 से अधिक कलाकृतियाँ लौटाने में मदद की है, जो वैश्विक सहयोग के बढ़ते स्तर को दर्शाता है।

तमिलनाडु आइडल विंग और भारत की रिकवरी रणनीति

तमिलनाडु पुलिस की आइडल विंग-CID ने भी इस वापसी को बड़ी उपलब्धि बताया है। पूर्व डीजीपी के जयनथ मुरली ने कहा कि यह मामला भारत की MLAT (आपसी कानूनी सहायता संधि) आधारित रणनीति की सफलता है।

उन्होंने बताया कि सोमस्कंद मूर्ति थिरुवारूर जिले के अलत्तूर गाँव के विश्वनाथ मंदिर से चोरी हुई थी और इसके दस्तावेज भारत ने पहले ही 2022 में प्रस्तुत कर दिए थे।

2014 से अब तक 640+ धरोहर वापस आए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत लंबे समय से मंदिरों और पुरातात्विक स्थलों से चोरी हुई मूर्तियों की वापसी के लिए कदम उठाता रहा है। औपनिवेशिक काल और बाद के वर्षों में कमजोर सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय नीलामी बाजार ने तस्करी को बढ़ावा दिया। कई बार सही दस्तावेज और फोटोग्राफ रिकॉर्ड न होने के कारण मूर्तियों की पहचान और वापसी कठिन हो जाती है। फिर भी भारत सरकार लगातार प्रयास कर रही है और 2014 के बाद से अब तक 640 से अधिक चोरी की गई धरोहरें वापस लाई जा चुकी हैं।

स्मिथसोनियन का यह फैसला इसी श्रृंखला की एक बड़ी कड़ी है। यह केवल मूर्तियों की वापसी नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि अब संग्रहालयों को अपने संग्रह की पारदर्शिता और नैतिक जिम्मेदारी निभानी होगी। स्मिथसोनियन द्वारा तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी हुई तीन पवित्र कांस्य मूर्तियों की वापसी भारत के लिए सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जीत है।

ईजी मनी के नाम पर करता था साइबर फ्रॉड, Wingo ऐप पर मोदी सरकार का एक्शन: सर्वर समेत सबकुछ ब्लॉक, समझिए- कैसे आम लोगों से कराता था अपराध

भारत में साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं, इसे देखते हुए अब सरकार ने Android यूजर्स को निशाना बनाने वाले एक बड़े फ्रॉड नेटवर्क पर कड़ा शिकंजा कसा है। गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) ने ‘Wingo’ नाम की संदिग्ध Android ऐप के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है।

यह ऐप लोगों को जल्दी पैसा कमाने का लालच देकर फँसाता था और फिर उनके मोबाइल फोन का गलत इस्तेमाल करते हुए उनकी जानकारी के बिना फर्जी SMS भेजने जैसी गतिविधियों में शामिल था। सरकार ने इसके सर्वर, टेलीग्राम चैनलों और यूट्यूब प्रचार को ब्लॉक कर इस पूरे नेटवर्क पर बड़ा प्रहार किया है।

Wingo ऐप पर सरकार की डिजिटल स्ट्राइक और बड़ा बैन

Wingo ऐप के खिलाफ लगातार शिकायतें मिलने के बाद गृह मंत्रालय के साइबर विंग ने जाँच शुरू की। जाँच में यह सामने आया कि यह ऐप एक संगठित साइबर फ्रॉड नेटवर्क का हिस्सा है। इसके बाद सरकार ने इसके कमांड एंड कंट्रोल सर्वर को पूरी तरह जियो-ब्लॉक कर दिया, जिससे इसका संचालन बंद हो सके।

साथ ही Wingo से जुड़े चार बड़े टेलीग्राम चैनलों को भी ब्लॉक कर दिया गया, जिनसे करीब 1.53 लाख यूजर्स जुड़े हुए थे। इसके अलावा, यूट्यूब पर मौजूद 53 से ज्यादा वीडियो भी हटाए गए जो इस ऐप का प्रचार कर रहे थे या इसे डाउनलोड करने का तरीका बता रहे थे।

सरकार ने Android यूजर्स के लिए अलर्ट जारी करते हुए कहा है कि वे अनजान और गैर-आधिकारिक ऐप्स से सतर्क रहें।

क्या था Wingo ऐप और कैसे फैलाया जा रहा था ‘क्विक मनी’ का जाल?

जाँच में सामने आया कि Wingo ऐप लोगों को आसान कमाई और जल्दी रिटर्न का झाँसा देकर फँसाता था। यूजर्स को कहा जाता था कि वे छोटे-छोटे टास्क पूरे करें या निवेश करें और बदले में मोटा मुनाफा कमाएँ। शुरुआत में मामूली पैसे देकर भरोसा बनाया जाता था ताकि लोग इसे असली कमाई का जरिया समझ लें।

इसके बाद यूजर्स से पैसे जमा करवाए जाते थे और फिर अचानक ऐप बंद हो जाता था या यूजर अकाउंट ब्लॉक कर दिया जाता था। यह स्कीम रेफरल बेस्ड पोंजी मॉडल की तरह काम कर रही थी, जिसमें लोगों को दूसरों को जोड़ने के लिए भी प्रेरित किया जाता था।

यूजर्स के फोन से चोरी-छिपे भेजे जा रहे थे फर्जी SMS और डेटा चोरी का खतरा

सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि Wingo ऐप यूजर की जानकारी के बिना उसके मोबाइल नंबर से रोजाना 80 से 100 संदिग्ध SMS भेज रहा था। इन संदेशों का इस्तेमाल स्कैम मैसेज, फिशिंग लिंक और अन्य साइबर धोखाधड़ी के लिए किया जा रहा था।

पुलिस के अनुसार, यह ऐप ‘Telecom Mule as a Service’ प्लेटफॉर्म की तरह काम कर रहा था, जिसमें आम नागरिकों के मोबाइल नंबर और डिजिटल पहचान का गलत इस्तेमाल करके असली अपराधी कानून की पकड़ से बच रहे थे। इसके लिए ऐप कॉन्टैक्ट्स, गैलरी, लोकेशन और SMS जैसी संवेदनशील परमिशन माँगता था, जिससे निजी डेटा चोरी होने का खतरा बढ़ गया था।

Telegram-YouTube के जरिए स्कैम का प्रचार और 1.53 लाख यूजर्स का नेटवर्क

सरकारी एजेंसियों ने पाया कि यह फ्रॉड नेटवर्क सोशल मीडिया के जरिए बड़े स्तर पर फैलाया जा रहा था। टेलीग्राम पर बने चार बड़े चैनलों के माध्यम से इस ऐप को प्रमोट किया जा रहा था और दावा किया जा रहा था कि इससे जुड़े यूजर्स की संख्या एक लाख से ज्यादा है।

इन चैनलों के जरिए लोगों को ऐप डाउनलोड करने के निर्देश दिए जाते थे, जल्दी कमाई के दावे किए जाते थे और रेफरल के जरिए दूसरों को जोड़ने का लालच दिया जाता था। इसके अलावा यूट्यूब पर 53 से ज्यादा वीडियो मौजूद थे जो इस ऐप का प्रचार कर रहे थे। सरकार ने इन सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर कार्रवाई करते हुए चैनल ब्लॉक और वीडियो हटाने के निर्देश दिए।

Android स्कैम क्या है और पहले भी क्यों लग चुके हैं ऐसे ऐप्स पर बैन?

Android स्कैम दरअसल वह धोखाधड़ी है जिसमें अपराधी यूजर्स को नकली ऐप डाउनलोड करवाकर उनके फोन का कंट्रोल हासिल कर लेते हैं। ये ऐप्स अक्सर गारंटीड मुनाफा, डेली प्रॉफिट या जल्दी पैसा कमाने का दावा करते हैं।

एक बार इंस्टॉल होने के बाद ये ऐप्स फोन की परमिशन लेकर डेटा चोरी, फर्जी ट्रांजैक्शन और साइबर अपराधों को अंजाम देते हैं। भारत में इससे पहले भी कई फर्जी लोन ऐप्स, निवेश स्कीम ऐप्स और रेफरल बेस्ड फ्रॉड प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई हो चुकी है। Wingo ऐप भी उसी तरह का एक नया और बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है।

यूजर्स को सरकार की सख्त सलाह

सरकार ने साफ कहा है कि यूजर्स केवल आधिकारिक ऐप स्टोर से ही एप्लिकेशन डाउनलोड करें और अनावश्यक परमिशन देने से बचें। ऐसी ऐप्स से दूर रहें जो गारंटीड या डेली प्रॉफिट का दावा करती हैं। किसी भी अनजान UPI ID या QR कोड पर पैसे भेजने से बचें और कभी भी OTP या बैंक डिटेल्स शेयर न करें।

अगर किसी को शक हो कि वह ठगी का शिकार हुआ है तो तुरंत संदिग्ध ऐप को अनइंस्टॉल करें, साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें और cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें। सरकार की इस कार्रवाई से यह साफ हो गया है कि साइबर अपराधियों के खिलाफ डिजिटल स्तर पर सख्ती लगातार जारी रहेगी।