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बजट 2026-27 में IT और AI की ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए खास व्यवस्था, डेटा सेंटर के लिए 2047 तक टैक्स हॉलिडे का ऐलान: जानिए भारत के लिए क्यों है जरूरी

दुनियाभर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई टेक्नोलॉजी के बढ़ते इस्तेमाल और इसकी वजह से डेटा सेंटर में आई तेजी का फायदा उठाने के लिए भारत सरकार ने बजट 2026 में डेटा सेंटर्स और क्लाउड सर्विसेस को लेकर बड़ा ऐलान किया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश में ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने वाली विदेशी कंपनियों को 2047 तक टैक्स में छूट देने का प्रस्ताव रखा। ये कदम देश में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

इस पॉलिसी का मकसद डेटा लोकलाइजेशन को बढ़ावा देना और क्लाउड प्रोवाइडर्स को घरेलू इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना है।

डेटा सेंटर्स और क्लाउड सर्विसेज को बढ़ावा

वित्त मंत्री ने रविवार (1 फरवरी 2026) को अपने 2026-27 के बजट भाषण के दौरान कहा, “जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में तेजी लाने और डेटा सेंटर्स में निवेश बढ़ाने की जरूरत को समझते हुए, मैं 2047 तक किसी भी विदेशी कंपनी को टैक्स में छूट देने का प्रस्ताव रखती हूँ, जो भारत से डेटा सेंटर सर्विस का इस्तेमाल करके दुनिया भर के ग्राहकों को क्लाउड सर्विस देती है। हालाँकि उसे भारतीय ग्राहकों को एक भारतीय रीसेलर एंटिटी के जरिए सर्विस देनी होगी।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं यह भी प्रस्ताव रखती हूँ कि अगर भारत से डेटा सेंटर सर्विस देने वाली कंपनी एक रिलेटेड एंटिटी है, तो लागत पर 15% का सेफ़ हार्बर दिया जाए।”

एनारॉक की रिपोर्ट के अनुसार, अनुमान है कि भारत का डेटा सेंटर बाजार अभी $10 बिलियन यानी करीब 91547.6 करोड़ रुपए का है, जिससे FY24 में लगभग $1.2 बिलियन यानी 10.8 करोड़ रुपए का रेवेन्यू जेनरेट हुआ। रियल एस्टेट फर्म JLL के अनुसार, भारत में 2027 तक 795 MW की नई कैपेसिटी जुड़ने की उम्मीद है, जिससे कुल क्षमता 1.8 GW हो जाएगी।

इससे पहले केंद्रीय IT मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि भारत के AI इंफ्रास्ट्रक्चर में प्राइवेट इन्वेस्टमेंट पिछले साल के $70 बिलियन यानी करीब 7 हजार करोड़ रुपए से बढ़कर इस फाइनेंशियल ईयर (FY26) के आखिर तक दोगुना हो सकता है।

2025 में कई कंपनियाँ निवेश के लिए आगे आई

अक्टू बर 2025 में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ ने घोषणा की थी कि वह AI-रेडी डेटा सेंटर में 1 गीगावाट (GW) बनाने के लिए 5 सालों में $6.5 बिलियन यानी ₹54,000 करोड़ से अधिक का निवेश करेगी। अक्टूबर 2025 में ही गूगल ने अडानी ग्रुप के साथ पार्टनरशिप में 1GW डेटा सेंटर बनाने के लिए $15 बिलियन यानी 1.22 लाख करोड़ रुपए के निवेश की घोषणा की।

माइक्रोसॉफ्ट ने भी दिसंबर 2025 में घोषणा की कि वह भारत में $17.5 बिलियन यानी 1.45 लाख करोड़ रुपए निवेश करेगा, जिसका मेन फोकस AI डेटा सेंटर ही होगा। अमेजन ने भी अगले 5 सालों में भारत में $35 बिलियन यानी 2.92 लाख करोड़ रुपए निवेश करेगा। हालाँकि उसने ये साफ नहीं किया है कि डेटा सेंटर में कितना निवेश होगा।

जानकारी के मुताबिक, भारत में अभी 1-3 GW की लीज़्ड डेटा सेंटर कैपेसिटी है, जो इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, थाईलैंड और वियतनाम जैसे दूसरे उभरते बाजारों की तुलना में सबसे ज्यादा है।

डेटा सेंटर AI की माँग को पूरा करने के लिए जरूरी है कंप्यूटिंग पावर का होना। इस क्षेत्र में विकास के लिए रेयर अर्थ मेटल्स की भी काफी माँग है। इसके लिए भी बजट में प्रावधान किया गया है।

बजट में वित्त मंत्री ने कहा, “रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट की स्कीम नवंबर 2025 में शुरू की गई थी। अब ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे मिनरल से भरपूर राज्यों को माइनिंग, प्रोसेसिंग, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाने का प्रस्ताव है।”

स्मार्टफोन जैसे कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर इलेक्ट्रिक गाड़ियों और यहाँ तक ​​कि फाइटर जेट तक में रेयर अर्थ मेटल्स की जरूरत है। इस घोषणा से भारत की रेयर अर्थ मेटल्स को लेकर चीन पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।

भारत की रणनीतिक जरूरत को पूरी करने के लिए डेटा सेंटर्स की जरूरत है क्योंकि भारत दुनिया का 20 फीसदी डेटा पैदा करता है, लेकिन उसके पास दुनिया का केवल 3फीसदी डेटा सेंटर है। इसको देखते हुए बजट 2026 में सरकार ने विदेशी कंपनियों के लिए 2027 तक टैक्स होलीडे का ऐलान किया है। दरअसल अब भारत सरकार हर तरह का डेटा जैसे स्वास्थ्य, वित्तीय और व्यक्तिगत डेटा देश में ही स्टोर करने पर जोर देती है।

भारत में ई कॉमर्स, ऑनलाइन पेमेंट और ओटीटी मीडिया के साथ साथ गेमिंग का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। इनके लिए हाई स्पीड डेटा स्टोरेज की जरूरत है। भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मामले में एक वैश्विक लीडर बनने की ओर है। ऐसे में क्लाउड सर्विस के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना देश की तरक्की और सुरक्षा के लिए अहम है।

कर्नाटक का हेट स्पीच बिल पहुँचा राष्ट्रपति के पास, उनकी मुहर से होगा फैसला: जानिए क्या है ‘Hate Speech Bill’ के प्रावधान और क्यों है आपत्ति

कर्नाटक सरकार की ओर से पारित ‘हेट स्पीच और हेट क्राइम (रोकथाम) विधेयक, 2025’ अब राष्ट्रपति के पास भेजा गया है। राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने इस बिल पर हस्ताक्षर करने के बजाय इसे राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखा है। उनका कहना है कि बिल के कई प्रावधान अस्पष्ट हैं और यह नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर डाल सकते हैं।

बिल में क्या है?

कर्नाटक सरकार ने हेट स्पीच और हेट क्राइम को रोकने के लिए यह नया कानून प्रस्तावित किया है। इसका उद्देश्य समाज में नफरत फैलाने वाले भाषणों और भड़काऊ गतिविधियों पर रोक लगाना है।

बिल में हेट स्पीच को इस तरह परिभाषित किया गया है कि कोई भी बयान, लेखन, चित्र या अभिव्यक्ति जो किसी व्यक्ति या समूह के धर्म, जाति, लिंग, यौन अभिविन्यास, जन्मस्थान या विकलांगता के आधार पर उन्हें चोट पहुँचाए या समाज में असामंजस्य पैदा करे, उसे अपराध माना जाएगा।

इस बिल के तहत दोषी पाए जाने पर जुर्माना और जेल की सजा दोनों का प्रावधान है। यदि किसी व्यक्ति या समूह पर हमला उनकी पहचान (धर्म, जाति आदि) के आधार पर किया जाता है, तो उसे हेट क्राइम माना जाएगा। पुलिस को अधिकार दिया गया है कि वे ऐसे मामलों में तुरंत कार्रवाई करें और नोटिस जारी करें।

कैसे हिंदू बने निशाना?

इस बिल को लेकर सबसे बड़ा विवाद यह है कि कई हिंदू संगठनों और नेताओं का कहना है कि बिल का इस्तेमाल खास तौर पर हिंदू धार्मिक गतिविधियों और बयानों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।

हिंदू संगठनों का कहना है कि इस बिल का असर धार्मिक भाषण पर हो सकता है। प्रवचन, मंदिरों में दिए जाने वाले उपदेश या सामाजिक मुद्दों पर की गई आलोचना को भी ‘हेट स्पीच’ मानकर कार्रवाई की जा सकती है।

कुछ हिंदूवादी नेताओं का आरोप है कि इसके तहत त्योहारों और जुलूसों पर भी खतरा मंडरा हा है। हिंदू त्योहारों के दौरान निकाले जाने वाले जुलूसों या नारों को भी इस कानून के तहत आपत्तिजनक माना जा सकता है।

भाजपा और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार इस कानून का इस्तेमाल हिंदू संगठनों और कार्यकर्ताओं को दबाने के लिए कर सकती है। आलोचकों का मानना है कि बिल का दायरा इतना व्यापक है कि यह खास तौर पर हिंदू समुदाय की धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।

राज्यपाल ने किस बात पर जताई आपत्ति

राज्यपाल ने बिल को राष्ट्रपति के पास भेजकर तीन मुख्य आपत्तियाँ दर्ज की हैं। उन्होंने कहा है कि बिल की परिभाषाएँ बहुत व्यापक हैं और यह तय करना मुश्किल है कि कौन-सा बयान हेट स्पीच है और कौन-सा नहीं।

इसके अलावा अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत नागरिकों को बोलने और लिखने की स्वतंत्रता है। यह बिल उस स्वतंत्रता पर ‘चिलिंग इफेक्ट’ डाल सकता है। राज्यपाल की तीसरी आपत्ति संवैधानिक वैधता को लेकर है। उनका कहना है कि बिल के कुछ प्रावधान केंद्र के कानूनों से टकराते हैं, इसलिए इसे राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी है।

राज्यपाल ने इस बिल को राष्ट्रपति के पास भेजकर साफ कर दिया है कि इस बिल पर अंतिम फैसला अब केंद्र के हाथ में है। अगर राष्ट्रपति इसे मंजूरी देती हैं तो यह देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सामंजस्य के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। लेकिन अगर मंजूरी नहीं मिलती, तो सरकार को इसे दोबारा संशोधित करना पड़ेगा।

बंगाल में 700 साल बाद ‘बोंगो त्रिवेणी कुंभ’ का आयोजन, इस्लामी आक्रमणों से बंद था महोत्सव: जानें- कैसे फीनिक्स की तरह जगी सनातनी परंपरा, PM मोदी ने की तारीफ

पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में 700 साल बाद फिर से हिंदुओं का पवित्र ‘बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव’ फिर से आकार ले रहा है। यह महोत्सव हुगली के बांसबेड़िया क्षेत्र में स्थित ‘त्रिवेणी’ में आयोजित होगा। इसे प्रयागराज का दक्षिणी रूप कहा जाता है। मान्यता है कि यहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का संगम होता है। इसी जगह पर 11 से 14 फरवरी 2026 के बीच ‘बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव’ फिर से हो रहा है।

हुगली का यह ‘दक्षिण प्रयाग’ प्राचीन काल से कुंभ स्नान और मेले का केंद्र रहा, लेकिन 1292 ईस्वी में जफर खान गाजी के आक्रमण और मंदिर तोड़ने के बाद करीब 700 साल तक यह परंपरा बंद हो गई थी। हालाँकि साल 2022 में इतिहासकार कंचन बनर्जी, प्रबीर भट्टाचार्य और त्रिवेणी कुंभ मेला समिति के प्रयासों से इसे फिर जीवित किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में और पत्र के जरिए इसकी सराहना की है। पीएम मोदी ने कहा कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत को बचाने का सराहनीय कदम है। दरअसल, ये बात सभी जानते हैं कि बंगाल को ऐतिहासिक रूप से हिंदू विचार, दर्शन और आध्यात्मिक परंपराओं की एक महत्वपूर्ण भूमि माना जाता है। गंगा–ब्रह्मपुत्र डेल्टा क्षेत्र में प्राचीन वैदिक परंपराएँ और स्थानीय लोक आस्थाएँ मिलकर हिंदू धर्म का एक अलग और खास रूप बनाती हैं।

‘दक्षिण प्रयाग’ कहे जाने के कारण त्रिवेणी में होने वाले धार्मिक स्नान और मेले बहुत पवित्र माने जाते हैं, खासकर कुंभ संक्रांति जैसे शुभ मौकों पर। इस स्थान का संबंध पास के ऐतिहासिक क्षेत्र सप्तग्राम से भी जुड़ा हुआ है, जो पहले एक बड़ा धार्मिक और व्यापारिक केंद्र था।

वैष्णव विद्वान वृंदावन दास के अनुसार, सप्तग्राम–त्रिवेणी घाट वह पवित्र स्थान है जहाँ सप्तऋषियों ने तपस्या की थी। मान्यता है कि यहाँ स्नान करने से इंसान के पाप धुल जाते हैं। प्रयागराज और पश्चिम बंगाल की त्रिवेणी जैसे पवित्र संगम स्थलों पर सामूहिक स्नान की परंपरा कई सदियों से चली आ रही है।

मान्यता है कि त्रिवेणी में स्नान करने से इंसान की सोई हुई आध्यात्मिक शक्ति जाग जाती है, ज्ञान की राह खुलती है और मन को शांति व संतुलन मिलता है। यहाँ हर 4 साल में एक बार कुंभ मेला आयोजित किया जाता है।

अर्ध कुंभ हर 6 साल में हरिद्वार और प्रयागराज में होता है, जबकि पूर्ण कुंभ हर 12 साल में आयोजित किया जाता है। पूर्ण कुंभ का समय गुरु (बृहस्पति), सूर्य और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर तय होता है और यह चार पवित्र स्थानों- प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में से किसी एक जगह पर होता है।

महाकुंभ मेला हर 144 साल में एक बार आयोजित होता है। हाल ही में इसका आयोजन 2024 में प्रयागराज में हुआ था, जिसे बहुत ऐतिहासिक और खास माना गया।

एक समय बंगाल की पवित्र धरती पर भी कुंभ मेला लगता था, लेकिन बार-बार हुए इस्लामी आक्रमणों के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो गई और लोगों की यादों से भी मिटती चली गई।

2025 बोंगो त्रिबेनी कुंभो महोत्सव

स्थानीय इतिहासकार अशोक गांगुली के अनुसार, त्रिवेणी कुंभ मेला और गंगासागर मेले के बीच पुराना ऐतिहासिक संबंध था। पहले के समय में साधु-संत गंगासागर मेला खत्म होने के बाद पैदल चलकर त्रिवेणी आते थे और माघ संक्रांति के दिन स्नान करते थे। त्रिवेणी में इस दिन को ‘अनुकुंभ’ के रूप में मनाया जाता था। उस दौर में सप्तग्राम और त्रिवेणी शिक्षा, संस्कृति और तीर्थ यात्रा के बड़े केंद्र हुआ करते थे।

लेकिन 1292 ईस्वी में इस्लामी शासक जफर खान गाजी ने त्रिवेणी पर हमला किया और इलाके को घेर लिया। इस दौरान कई हिंदुओं की हत्या की गई और पाल वंश काल का एक प्राचीन विष्णु मंदिर तोड़ दिया गया। इसके बाद हिंदुओं की धार्मिक सभाओं और जुलूसों पर रोक लगा दी गई, जिससे त्रिवेणी कुंभ मेले की परंपरा पूरी तरह खत्म हो गई।

1288 से 1313 ईस्वी के बीच, सप्तग्राम और त्रिवेणी पूरी तरह इस्लामी आक्रमणकारियों के नियंत्रण में आ गए। कई इतिहासकारों का मानना है कि इस समय हिंदू और बौद्ध मंदिरों व मठों को जानबूझकर तोड़ा गया और उनकी जगह मस्जिदें और दरगाहें बनाई गईं।

2025 बोंगो त्रिबेनी कुंभो महोत्सव

भारतीय पुरातत्वविद राखालदास बनर्जी और प्रणब रॉय के शोध से पता चला है कि जफर खान गाजी की दरगाह के खंभों और निर्माण में टूटे हुए हिंदू, जैन और बौद्ध मंदिरों की मूर्तियाँ और कलाकृतियों के निशान मौजूद हैं। माना जाता है कि इस क्षेत्र में आखिरी बार कुंभ मेला 1319 ईस्वी में आयोजित हुआ था।

इसके बाद लगभग 703 वर्षों तक कुंभ मेला बंद रहा, लेकिन 2022 में इस ऐतिहासिक परंपरा को फिर से जीवित किया गया। अमेरिका में रहने वाले इतिहासकार कंचन बनर्जी, कोलकाता के प्रबीर भट्टाचार्य और त्रिवेणी कुंभ मेला समिति के प्रयासों से इस परंपरा को दोबारा शुरू किया गया।

संतों के मार्गदर्शन और स्थानीय लोगों के सहयोग से, माघ संक्रांति और भैमी एकादशी के पावन अवसर पर कुंभ मेला और कुंभ स्नान का आयोजन किया गया। इस दौरान त्रिवेणी के साधु-संत सप्तऋषि घाट पर एकत्र हुए, जिसे वह स्थान माना जाता है जहाँ सप्तऋषि मैत्रेय, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, व्यास, वशिष्ठ और विश्वामित्र ने तपस्या की थी।

2025 बोंगो त्रिबेनी कुंभो महोत्सव

इस आयोजन को ‘बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव’ नाम दिया गया। 2022 से अब तक यह त्रिवेणी में तीन बार आयोजित हो चुका है। इस मेले के सफल आयोजन में दान देने वालों का सहयोग, आयोजकों की मेहनत और स्थानीय लोगों का उत्साहपूर्ण समर्थन बहुत जरूरी रहा है।

बंगाल में कुंभ मेले पर पीएम मोदी का संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 फरवरी 2023 को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 98वें एपिसोड में ‘बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव’ का खास जिक्र किया था।

उन्होंने बताया था कि अमेरिका में रहने वाले कंचन बनर्जी ने उन्हें भारत की सांस्कृतिक विरासत को बचाने से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहल के बारे में जानकारी दी थी। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के बांसबेड़िया शहर में त्रिवेणी कुंभ महोत्सव आयोजित किया गया, जिसमें 8 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि त्रिवेणी कुंभ महोत्सव इसलिए खास है क्योंकि इसे करीब 700 साल बाद दोबारा शुरू किया गया है। उन्होंने बताया कि यह परंपरा हजारों साल पुरानी है, लेकिन करीब 700 साल पहले यह बंद हो गई थी।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि आजादी के बाद भी इसे दोबारा शुरू नहीं किया जा सका, लेकिन दो साल पहले स्थानीय लोगों और त्रिवेणी कुंभो परिचालना समिति की कोशिशों से इस महोत्सव को फिर से जीवित किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि त्रिवेणी कुंभ महोत्सव से जुड़े सभी लोगों को बधाई दी जानी चाहिए, क्योंकि वे सिर्फ एक पुरानी परंपरा को ही नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को भी बचा रहे हैं। उन्होंने बताया कि त्रिवेणी सदियों से पश्चिम बंगाल का एक पवित्र तीर्थ स्थल रही है, जिसका उल्लेख मंगल काव्य, वैष्णव साहित्य, शाक्त साहित्य और अन्य बंगाली ग्रंथों में मिलता है। ऐतिहासिक दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि यह क्षेत्र कभी संस्कृत शिक्षा और भारतीय संस्कृति का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था।

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि त्रिवेणी की विरासत को फिर से जीवित करने और कुंभ परंपरा को लौटाने के लिए पिछले साल यहाँ कुंभ मेला आयोजित किया गया। सात सौ साल बाद आयोजित यह तीन दिवसीय कुंभ महास्नान और मेला इस क्षेत्र में नई ऊर्जा और जागरूकता लेकर आया। इन तीन दिनों में गंगा आरती, रुद्राभिषेक, यज्ञ और अन्य धार्मिक अनुष्ठान हुए।

इसके साथ ही कीर्तन, बाउल, गौड़ीय नृत्य, श्री-खोल, पोतेर गान और चौ नृत्य जैसी बंगाली सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहीं। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह प्रयास देश के युवाओं को भारत के गौरवशाली अतीत से जोड़ने का एक सराहनीय कदम है।

इसके अलावा, फरवरी 2025 में होने वाले ‘बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव’ के तीसरे संस्करण से पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आयोजक संस्थाओं बोंगियो हिंदू धर्म प्रचार समिति (BHDPS) और त्रिवेणी कुंभो परिचालना समिति (TKPS)  को एक औपचारिक पत्र लिखकर शुभकामनाएँ और समर्थन दिया।

बोंगो त्रिबेनी कुंभो महोत्सव के आयोजकों को पीएम मोदी का संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पत्र में आयोजकों को शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि यह एक बहुत ही सराहनीय पहल है। उन्होंने बताया कि कई सदियों बाद 2023 में स्थानीय लोगों ने इस महोत्सव को फिर से शुरू किया, जिससे हमारी पुरानी और गौरवशाली परंपरा दोबारा जीवित हुई और नई पीढ़ी तक भी पहुँची।

प्रधानमंत्री ने कहा कि त्रिवेणी और प्रयागराज जैसे पवित्र शहरों को विशेष सम्मान मिलता है, क्योंकि ये आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने बताया कि गंगा किनारे स्थित त्रिवेणी में स्नान करना महाकुंभ की परंपरा का ही एक रूप माना जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि बांग्ला साहित्य में त्रिवेणी और आसपास के क्षेत्र के कई ऐतिहासिक उल्लेख मिलते हैं, जो बताते हैं कि यह इलाका कभी शिक्षा, कला, वास्तुकला, संस्कृति और संस्कृत भाषा का एक बड़ा केंद्र था। ऐसे धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन युवाओं को अपनी परंपराओं से जोड़ने का अच्छा अवसर देते हैं।

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि कुंभ महासंक्रांति, महात्रिवेणी संगम और संतों की शोभायात्रा के दौरान संतों और श्रद्धालुओं की मौजूदगी, हुगली और पूरे बंगाल के लोगों के लिए एक आध्यात्मिक और यादगार अनुभव होगी।

बोंगो त्रिबेनी कुंभो महोत्सव का लक्ष्य

मई 2023 में, 700 साल बाद फिर से शुरू हुए इस हिंदू पर्व को लेकर प्रचार मंच ‘आर्टिकल 14’ ने एक आलोचनात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की।

इससे जुड़े एक लेख को स्निग्धेंदु भट्टाचार्य नाम के लेखक ने लिखा था, जिसका शीर्षक था ‘हिंदुत्व, कथित रूप से बदला गया शोध पत्र और तृणमूल शासित पश्चिम बंगाल में कुंभ मेला ‘पुनर्जीवित’ करने के प्रयास को प्रधानमंत्री का समर्थन।’

इस लेख में त्रिवेणी कुंभ महोत्सव को दोबारा शुरू करने, इससे जुड़े संगठनों और प्रधानमंत्री के समर्थन को लेकर आलोचनात्मक और विवादास्पद दावे किए गए थे।

आर्टिकल 14 द्वारा पब्लिश किए गए दुर्भावनापूर्ण लेख का स्क्रीनशॉट

बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव पर 9 जून 2023 को द हिंदू अखबार में भी एक आलोचनात्मक लेख प्रकाशित हुआ। इस रिपोर्ट में कहा गया कि पश्चिम बंगाल में परंपराओं को कथित तौर पर बदल या गढ़ा जा रहा है और इसे एक राजनीतिक योजना के रूप में दिखाया गया। लेख में महोत्सव के ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पुनरुद्धार को लेकर संदेह और नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया।

द हिंदू द्वारा प्रकाशित हिटपीस का स्क्रीनशॉट

सत्य यह है कि ऐतिहासिक अभिलेखों में ‘कुंभ मेला’ शब्द थोड़े बाद में ही सामने आया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इस परंपरा और आस्था का अस्तित्व नहीं था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय इतिहास ने लंबे समय तक आक्रमणों और युद्धों का सामना किया, जिनके दौरान कई दस्तावेज और अभिलेख खो गए या बाधित हुए।

त्रिवेणी कुंभ मेला किसी आधुनिक आविष्कार या राजनीतिक परियोजना का हिस्सा नहीं है, जैसा कि कुछ प्रचार माध्यमों में दावा किया गया। यह एक पवित्र स्थल और भू-परिदृश्य है, जिसे भूगोल, शास्त्र, धार्मिक अभ्यास और सामूहिक स्मृति द्वारा संरक्षित रखा गया है। इसका संगम, स्नान और मेले सीधे तौर पर हिंदू सभ्यता और परंपरा की निरंतरता में स्थित हैं।

त्रिवेणी कुंभ के इतिहास को लेकर जो विवाद उठाए गए हैं, वे अक्सर हिंदुओं को उनकी छोटी परंपराओं से अलग करने की रणनीति का हिस्सा रहे हैं। देखा गया है कि हिंदू पुनरुद्धार को अक्सर केवल ‘उत्तर भारतीय घटना’ के रूप में पेश किया गया, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक और पौराणिक है। अब एक नई रणनीति यह अपनाई जा रही है कि पुराने सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के प्रमाणों की कमी को आधार बनाकर इस परंपरा को अस्वीकार किया जाए।

बंगाल कुंभ मेला का 2026 संस्करण

2026 का बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव 11 फरवरी से 14 फरवरी तक आयोजित किया जाएगा। यह तीन दिवसीय महापर्व लगभग 14 से 16 लाख श्रद्धालुओं को आकर्षित करने की उम्मीद है।

वे साधु और संत, जिन्होंने पहले गंगासागर मेले में हिस्सा लिया था, इस बार भी त्रिवेणी कुंभ मेले में उपस्थित रहेंगे। इतिहासकार कंचन बनर्जी के अनुसार, इस वर्ष का महोत्सव पिछले साल से भी भव्य और यादगार होने की संभावना है।

2026 बोंगो ट्रिबेनी कुंभो महोत्सव का पोस्टर

बोंगो ट्रिबेनी कुंभो मोहोत्सव का कार्यक्रम इस प्रकार है:

11 फरवरी 2026

  1. सूर्योदय, आदित्य हृदय मंत्र और शांति प्रवचन
  2. नगर संकीर्तन
  3. योग आसन (क्लब ग्राउंड)
  4. रुद्राभिषेक और रुद्र महा जोग्गो, शिव सहस्र नाम (क्लब ग्राउंड)
  5. बोस अंको: बच्चों का ड्राइंग कॉम्पिटिशन
  6. धर्म सभा
  7. गंगा आरती

12 फरवरी 2026

  1. शक्ति कुंभ जुलूस और फोटो प्रदर्शनी
  2. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल का भाषण
  3. गीता पाठ
  4. साधु भंडारा
  5. काली कीर्तन
  6. गोदियो नृत्तो
  7. गंगा आरती

13 फरवरी 2026

  1. अमृत स्नान यात्रा
  2. धर्म सभा
  3. साधु भोजन
  4. धोर्मियो ओनुस्थान / कीर्तन (क्लब ग्राउंड)
  5. गंगा आरती (सप्तर्षि घाट)
2026 बोंगो ट्रिबेनी कुंभो महोत्सव का पोस्टर

फंड इकट्ठा करना

ऑपइंडिया ने रिसर्चर और कॉलमिस्ट पल्लब मंडल से बात की, जो बोंगो ट्रिबेनी कुंभो मोहोत्सव के कोऑर्डिनेटर के तौर पर काम कर रहे हैं।

उन्होंने हमें इवेंट के ऑर्गनाइजेशन में आने वाली बजट की दिक्कतों और चुनौतियों के बारे में बताया, जिसमें लाखों भक्तों के आने का अनुमान है। मंडल ने आगे कहा कि इवेंट में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों के लिए भंडारा और प्रसादम उपलब्ध है। उन्होंने हिंदुओं से इस नेक काम में योगदान देने की अपील की।

बैंक अकाउंट की डिटेल्स ये हैं:

बंगीय सनातनी संस्कृति परिषद
केनरा बैंक, साल्ट लेक सिटी ब्राँच
अकाउंट नंबर 110199375104
IFSC: CNRB0002549

स्पॉन्सरशिप और कोलेबोरेशन के लिए, कंपनियाँ इवेंट कोऑर्डिनेटर पल्लब मंडल से +91 7001243943 पर संपर्क कर सकती हैं और ‘बोंगो ट्रिबेनी कुंभो मोहोत्सव’ के 2026 एडिशन को शानदार सफल बना सकती हैं।

(इस लेख के लिए मुख्य सामग्री स्वतंत्र शोधकर्ता और स्तंभकार पल्लब मंडल द्वारा प्रदान की गई है, जो वर्तमान में बोंगो त्रिवेणी कुंभ महोत्सव के कोऑर्डिनेटर के रूप में कार्यरत हैं।)

(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

भारतीय सांस्कृतिक विरासत की पहचान रहीं 9 बार वित्त मंत्री के तौर पर बजट के दिन पहनी गई निर्मला सीतारमण की साड़ियाँ: जानिए किस साल कहाँ की साड़ी पहनी और क्या थी उसकी खासियत

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 9वीं बार आम बजट पेश किया। पिछले 9 सालों में उन्होंने अलग-अलग राज्यों की संस्कृति को दर्शाती अलग-अलग खासियत वाली हैंडलूम की साड़ियों को पहन कर देश का बजट पेश किया है। उनकी साड़ियों के अलग अलग रंग के अलग-अलग मायने भी हैं। ये साड़ियाँ भारतीय कारीगरों और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान भी है।

इन साड़ियों के माध्यम से उन्होंने न केवल अपने प्रोफेशनल लुक को दर्शाया, बल्कि भारतीय शिल्प और स्थानीय कारीगरों की कला को भी सम्मानित करने का संदेश दिया।

वित्त मंत्री की साड़ियों पर चर्चा करने से पहले जानते हैं कि आखिर भारत की संस्कृति में साड़ी कितनी पुरानी है। साड़ी शब्द संस्कृत के ‘सट्टिका’ शब्द से बनी है। इसका मतलब होता है कपड़े की पट्टी। पहले पुरुष और महिलाएँ शरीर के निचले हिस्से में कपड़ा लपेटा करते थे, जिससे धोती पहनने के तरीके का विकास हुआ। महिलाओं ने थोड़ा लंबा कपड़ा लपेटना शुरू किया और इससे साड़ी की शुरुआत हुई।

ऋग्वेद में यज्ञ के वक्त पत्नी को साड़ी पहनकर साथ में बैठने का नियम था। माना जाता है कि यजुर्वेद में सबसे पहले साड़ी शब्द का उल्लेख हुआ। हड़प्पा संस्कृति में भी एक महिला की प्रतिमा मिली है, जो लंबे कपड़े को लपेट कर साड़ी की तरह पहनी हुई है यानी साड़ी पहनने की शुरुआत कब हुई, ये ठीक तरह से नहीं बताया जा सकता। इसकी चर्चा महाभारत काल में भी आती है, जब द्रौपदी के चीरहरण के वक्त भगवान श्रीकृष्ण ने उनके कपड़े की लंबाई बढ़ा कर उनकी मर्यादा की रक्षा की थी। इसे साड़ी ही कहा जाता है। ये तो हुई साड़ी की गौरवशाली इतिहास की बात, आज भी भारतीय परंपरा में महिलाओं के पोशाक के रूप में साड़ी सर्वमान्य और सर्वोपरि है।

2026 में वित्त मंत्री ने पहनी कट्टम कांजीवरम साड़ी

वित्त मंत्री सीतारमण जब 9वां बजट पेश करने लोकसभा में पहुँची तो खास कट्टम कांजीवरम साड़ी पहनी हुई थीं। मजेंटा रंग की साड़ी पर सुनहरे धागों से बेहतरीन स्क्वायर पैटर्न बना हुआ था। बॉर्डर को कॉफी ब्राउन शेड में रखते हुए सुनहरे जरी वर्क से हाइलाइट किया गया था। तमिलनाडु की इस साड़ी का इतिहास 400-500 साल पुराना है। इसे कांचीपुरम में बनाया जाता है।

2026 बजट के दिन वित्त मंत्री (साभार- @nsitharamanoffc)

2025 में मधुबनी पेंटिंग की साड़ी

2025 के बजट को पेश करने के लिए निर्मला सीतारमण बिहार की ऑफ-व्हाइट हैंडलूम सिल्क साड़ी सबसे ज्यादा चर्चा में रही थी। इस साड़ी पर मछली थीम वाली मधुबनी पेंटिंग थी, जिसे पद्मश्री सम्मानित दुलारी देवी ने तैयार किया था।

मधुबनी पेंटिंग की साड़ी (साभार- @nsitharamanoffc)

फरवरी 2024 में अंतरिम बजट पेश करते हुए पहनीं कांथा साड़ी

पश्चिम बंगाल की प्रसिद्ध ‘कांथा कढ़ाई’ वाली नीली तुसर सिल्क साड़ी में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2024 में चुनाव से पहले का अंतरिम बजट पेश किया। ये बंगाल के शिल्पकारों के कौशल को दर्शाता है। इन साड़ियों की छपाई काफी लोकप्रिय है।

जुलाई 2024 में अपना पूर्ण बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऑफ व्हाइट हथकरघा मंगलगिरी सिल्क साड़ी पहनी। आंध्र प्रदेश की ये साड़ी काफी सिंपल थी, जिसका बॉर्डर मजैंटा रंग का था।

पूर्ण बजट के दिन वित्त मंत्री का लुक (साभार- @nsitharamanoffc)

2023 में पहनी इल्कल साड़ी

वित्त मंत्री सीतारमण ने 2023 में कर्नाटक की इल्कल साड़ी पहन कर बजट पेश किया। लाल और काले रंग की टेम्पल बॉर्डर वाली साड़ी पर कसुती धागे का काम था। ये साड़ी भारतीय मंदिर वास्तुकला से प्रेरित मानी जाती है।

2023 वित्त मंत्री बजट लुक (साभार- @nsitharamanoffc)

2022 में पहनी बोंमकाई साड़ी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2022 में बजट पेश करते हुए ओडिशा की पारंपरिक बोंमकाई साड़ी पहनी थी। रस्ट ब्राउन कलर की साड़ी का बॉर्डर ऑफ व्हाइट था। ये ओडिशा की बुनाई कला को प्रदर्शित करता है।

2020 में वित्त मंत्री का बजट लुक (साभार- @nsitharamanoffc)

2021 में पहनी पोचमपल्ली साड़ी

तेलंगाना की पहचान पोचमपल्ली साड़ी पहनकर वित्त मंत्री ने 2021 का बजट पेश किया था। ऑफ व्हाइट और लाल रंग की इस सिल्क साड़ी के बॉर्डर पर हरे रंग का इकत डिजाइन किया गया था। पोचमपल्ली की महीन सिल्क बुनाई और पारंपरिक डिजाइन इसे भारतीय हथकरघा कला का उत्कृष्ट उदाहरण बनाती थी।

2021 में वित्त मंत्री का लुक (साभार- @nsitharamanoffc)

2020 में पहनी तमिलनाडु की साड़ी

2020 में वित्त मंत्री ने तमिलनाडु की पीले रंग की सिल्क साड़ी पहनी थी, जिसका बॉर्डर हरे रंग का था। साड़ी का हल्का पीला रंग उनके शांत और गंभीर व्यक्तित्व को दर्शा रहा था, जबकि हरे रंग का बॉर्डर इसे पारंपरिक और सुरुचिपूर्ण टच दे रहा था। ये ऊर्जा और खुशी का प्रतीक था।

2020 बजट के दिन का लुक (साभार- @nsitharamanoffc)

2019 में पहनी मंगलगिरी साड़ी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने पहले बजट 2019 को पेश करते वक्त आंध्रप्रदेश की मंगलगिरी साड़ी पहनी थी। गुलाबी रंग और सुनहरे बॉर्डर वाली यह साड़ी स्थिरता और गंभीरता का प्रतीक था।

2019 में बजट के दिन (साभार- @nsitharamanoffc)

वित्त मंत्री ने आज तक बजट पेश करते वक्त जितनी भी साड़ियाँ पहनी हैं, वे सभी हैंडलूम की खास राज्यों की संस्कृति को दर्शाती हुई थी। चाहे वह 2019 में आंध्रपर्देश की मंगलगिरी साड़ी हो या 2026 की तमिलनाडु की कट्टम कांजीवरम सिल्क साड़ी। उनका हर साल का साड़ियों का सलेक्शन उनके व्यक्तित्व को चार चाँद लगाने वाला रहा है।

हाई स्पीड रेल, टूरिज्म बूस्ट, टेक्सटाइल पार्क… लेकिन इनकम टैक्स में बदलाव नहीं: मोदी सरकार के बजट 2026 का पूरा विश्लेषण, जानें फायदे और नुकसान

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार (1 फरवरी 2026) को लोकसभा में वर्ष 2026-27 का केंद्रीय बजट पेश किया। यह बजट मोदी सरकार का पहला ऐसा बजट है जो ‘कर्तव्य भवन’ में तैयार हुआ और तीन मुख्य कर्तव्यों से प्रेरित है: आर्थिक विकास को तेज और स्थिर रखना, लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना तथा हर परिवार, समुदाय और क्षेत्र तक संसाधनों की पहुँच सुनिश्चित करना। बजट में कुल व्यय 53.5 लाख करोड़ रुपए और पूंजीगत व्यय 12.2 लाख करोड़ रुपए का रिकॉर्ड स्तर रखते हुए सरकार ने राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.3 प्रतिशत पर नियंत्रित रखने का संकल्प दिखाया है।

यह बजट स्पष्ट रूप से ‘विकसित भारत’ के विजन को आगे बढ़ाने वाला है। जहाँ एक तरफ इंफ्रास्ट्रक्चर, एमएसएमई, बायोफार्मा और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश की घोषणा हुई है, वहीं टूरिज्म, खेल और दुर्लभ खनिजों जैसे उभरते सेक्टरों को नई गति देने का प्रयास किया गया है। इनकम टैक्स स्लैब में कोई बदलाव न होने से निरंतरता बनी रहेगी, लेकिन एसटीटी में बढ़ोतरी और कुछ अन्य कर परिवर्तनों ने बाजार को थोड़ा झटका भी दिया।

इस लेख में हमने बजट 2026 का सटीक और निष्पक्ष विश्लेषण किया है। इसमें हम जानेंगे कि कैपेक्स में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी से इंफ्रास्ट्रक्चर को कितनी मजबूती मिलेगी, एमएसएमई और बायोफार्मा के लिए 10-10 हजार करोड़ के फंड का क्या असर होगा, सात हाई स्पीड रेल कॉरिडोर और टूरिज्म बूस्ट से रोजगार कैसे बढ़ेगा तथा मध्यम वर्ग, किसान और युवाओं को वास्तव में क्या मिला। साथ ही यह विश्लेषण आपको बताएगा कि यह बजट अर्थव्यवस्था को कितना आगे ले जाएगा और आम आदमी की जेब पर इसका कितना असर पड़ेगा।

1: टैक्स में बड़े बदलाव नहीं, मध्यम वर्ग को बड़ी राहत

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए 2026-27 के केंद्रीय बजट में सबसे ज्यादा चर्चा व्यक्तिगत आयकर यानी पर्सनल इनकम टैक्स में हुए बदलावों की हुई है। यह बदलाव मुख्य रूप से नई टैक्स व्यवस्था (न्यू रिजीम) को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए किए गए हैं। पुरानी व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन नई व्यवस्था को इतना सरल और फायदेमंद बनाया गया है कि ज्यादातर लोग अब इसी को चुनेंगे।

इसका उद्देश्य मध्यम वर्ग के लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा छोड़ना है, ताकि उनकी क्रय शक्ति बढ़े और अर्थव्यवस्था में खपत को बल मिले। यह बदलाव लाखों वेतनभोगी और मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है।

12 लाख तक की आय पर कोई टैक्स नहीं

बजट का सबसे बड़ा ऐलान यह है कि नई टैक्स व्यवस्था में अब 12 लाख रुपए तक की सामान्य आय (सैलरी, ब्याज आदि) पर कोई इनकम टैक्स नहीं देना पड़ेगा। यह छूट केवल सामान्य आय पर लागू है, कैपिटल गेन जैसी विशेष आय को छोड़कर। पहले यह सीमा 7 लाख रुपए थी, जिसे अब लगभग दोगुना कर दिया गया है।

इसका मतलब है कि अगर आपकी सालाना आय 12 लाख रुपए है, तो आपको एक भी रुपया टैक्स नहीं देना पड़ेगा। यह बदलाव उन लाखों लोगों के लिए खुशखबरी है जो मध्यम वर्ग में आते हैं और महँगाई के दौर में टैक्स का बोझ महसूस करते थे।

वेतनभोगियों के लिए अतिरिक्त लाभ, स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़ा

वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए एक और खास सुविधा दी गई है। स्टैंडर्ड डिडक्शन की राशि को 75,000 रुपए कर दिया गया है। पहले यह 50,000 रुपए थी। इस डिडक्शन के कारण प्रभावी टैक्स-फ्री आय की सीमा 12 लाख से बढ़कर 12.75 लाख रुपए हो जाती है। यानी अगर आप नौकरीपेशा हैं और आपकी सैलरी 12.75 लाख रुपए तक है, तो भी आपको कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। यह बदलाव विशेष रूप से उन लोगों के लिए फायदेमंद है जो सैलरी से आय कमाते हैं और पहले डिडक्शन का ज्यादा लाभ नहीं उठा पाते थे।

नए टैक्स स्लैब को बनाया गया सरल

नई टैक्स व्यवस्था में स्लैब को पूरी तरह से बदल दिया गया है, जिससे यह अधिक क्रमिक और न्यायपूर्ण हो गया है। नए स्लैब इस प्रकार हैं: 0 से 4 लाख रुपए तक शून्य प्रतिशत, 4 से 8 लाख तक 5 प्रतिशत, 8 से 12 लाख तक 10 प्रतिशत, 12 से 16 लाख तक 15 प्रतिशत, 16 से 20 लाख तक 20 प्रतिशत, 20 से 24 लाख तक 25 प्रतिशत और 24 लाख से ऊपर 30 प्रतिशत।

पहले स्लैब ज्यादा जटिल थे और ऊपरी आय वालों पर भी कम बोझ पड़ता था। अब यह संरचना इस तरह बनाई गई है कि जैसे-जैसे आय बढ़ती है, टैक्स का बोझ धीरे-धीरे बढ़ता है, जिससे मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा फायदा होता है।

रिबेट की व्यवस्था, यानी 12 लाख तक पूरी तरह टैक्स-फ्री

रिबेट की मौजूदा व्यवस्था को और मजबूत किया गया है। सेक्शन 87A के तहत रिबेट का लाभ अब इस तरह दिया गया है कि 12 लाख तक की आय पर कोई टैक्स नहीं बचेगा। पहले रिबेट केवल 7 लाख तक की आय पर पूरी छूट देता था।

अब स्लैब में कमी और रिबेट के संयोजन से 12 लाख तक की आय पूरी तरह टैक्स-फ्री हो गई है। यह व्यवस्था उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जिनकी आय इस सीमा के आसपास है और पहले उन्हें थोड़ा-बहुत टैक्स देना पड़ता था।

व्यावहारिक उदाहरण से समझें, कितनी बचत होगी?

बजट में कुछ उदाहरण दिए गए हैं जो बदलाव का असर स्पष्ट करते हैं। अगर किसी व्यक्ति की आय 12 लाख रुपए है, तो उसे पहले के मुकाबले 80,000 रुपए की बचत होगी, यानी पूरा टैक्स माफ। 18 लाख आय वाले को 70,000 रुपए और 25 लाख आय वाले को 1.1 लाख रुपए की राहत मिलेगी। ये आँकड़े दिखाते हैं कि मध्यम और ऊपरी मध्यम वर्ग दोनों को ही अच्छा खासा लाभ होगा। इन पैसों से लोग खर्च, बचत या निवेश कर सकेंगे, जिससे बाजार में माँग बढ़ेगी।

मध्यम वर्ग पर सकारात्मक प्रभाव, उनके हाथ में ज्यादा पैसा

ये सारे बदलाव मध्यम वर्ग के लिए सबसे बड़ी राहत हैं। मध्यम वर्ग भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य इंजन है। वे सबसे ज्यादा खर्च करते हैं, बचत करते हैं और निवेश करते हैं। अब उनके हाथ में ज्यादा पैसा आने से घरेलू खपत बढ़ेगी, जो अर्थव्यवस्था को गति देगी।

महँगाई और जीवन यापन की बढ़ती लागत के बीच यह राहत लोगों को आर्थिक सुरक्षा का एहसास कराएगी। सरकार ने इसे ‘ट्रस्ट बेस्ड’ टैक्स सिस्टम का हिस्सा बताया है, जहां ईमानदार करदाता को फायदा दिया जा रहा है।

सरकार को राजस्व का नुकसान, लेकिन लंबे फायदे

इन बदलावों से सरकार को प्रत्यक्ष करों में करीब 1 लाख करोड़ रुपए का राजस्व नुकसान होगा। अप्रत्यक्ष करों में भी कुछ छूट से 2,600 करोड़ का नुकसान अनुमानित है। लेकिन सरकार का मानना है कि इससे उपभोग बढ़ेगा, अर्थव्यवस्था तेज चलेगी और अंततः टैक्स बेस बढ़ेगा। यह एक तरह का ‘स्टिमुलस’ है जो बिना ज्यादा खर्च के अर्थव्यवस्था को बूस्ट देगा। लंबे समय में इससे निवेश और रोजगार भी बढ़ेंगे।

अन्य प्रत्यक्ष टैक्स बदलाव से सरलीकरण पर जोर

प्रत्यक्ष करों में कई अन्य सरलीकरण भी किए गए हैं। टीडीएस और टीसीएस की दरें कम की गई हैं और थ्रेशोल्ड बढ़ाए गए हैं, जैसे सीनियर सिटीजन के ब्याज पर टीडीएस की सीमा 50,000 से 1 लाख रुपए। अपडेटेड रिटर्न दाखिल करने की समयसीमा 2 साल से बढ़ाकर 4 साल की गई। छोटे चैरिटेबल ट्रस्टों की रजिस्ट्रेशन अवधि 5 से 10 साल की गई। सेल्फ-ऑक्यूपाइड प्रॉपर्टी पर दो घरों तक बिना शर्त के छूट।

सबसे महत्वपूर्ण नया इनकम टैक्स बिल अगले हफ्ते पेश होगा, जो मौजूदा कानून से आधा छोटा और सरल होगा। ये कदम टैक्स सिस्टम को और पारदर्शी व करदाता-अनुकूल बनाएँगे।

अप्रत्यक्ष करों में बदलाव से स्वास्थ्य और विनिर्माण को प्रोत्साहन

अप्रत्यक्ष करों यानी कस्टम्स ड्यूटी में भी बड़े बदलाव हैं। कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों की 36 दवाओं पर पूरी छूट और 6 दवाओं पर केवल 5 प्रतिशत ड्यूटी लगेगी। क्रिटिकल मिनरल्स, लिथियम-आयन बैटरी, टेक्सटाइल मशीनरी और अन्य इनपुट पर ड्यूटी कम की गई है।

इन छूटों का उद्देश्य एमएसएमई, निर्यात और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना है। कुल मिलाकर अप्रत्यक्ष करों में भी घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता दी गई है, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ को बल मिलेगा और आम लोगों को सस्ती दवाएँ व उत्पाद मिलेंगे।

2: विकास में खर्च- इंफ्रास्ट्रक्चर और पूँजीगत व्यय पर सरकार का जोर

केंद्रीय बजट 2026 में विकास को गति देने के लिए पूँजीगत व्यय यानी कैपिटल एक्सपेंडिचर पर विशेष जोर दिया गया है। सरकार का मानना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बनाता है। यह निवेश सड़क, रेल, बंदरगाह, ऊर्जा और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करता है, जिससे लंबे समय में रोजगार बढ़ता है, उत्पादकता बढ़ती है और अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ती है।

बजट में पूँजीगत व्यय को बढ़ाने का फोकस इसलिए है क्योंकि निजी निवेश अभी पूरी तरह रफ्तार नहीं पकड़ पाया है। सरकार खुद आगे बढ़कर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाएगी, जिससे निजी क्षेत्र को भी प्रोत्साहन मिलेगा। यह कदम ‘विकसित भारत’ के सपने को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

राज्यों को 1.5 लाख करोड़ रुपए का ब्याज-मुक्त लोन

बजट में राज्यों को इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए 1.5 लाख करोड़ रुपए का ब्याज-मुक्त लोन देने का प्रावधान किया गया है। यह लोन 50 साल की अवधि का है और राज्यों को अपनी पूंजीगत परियोजनाओं पर खर्च करने की छूट है। इसका उद्देश्य राज्यों को अपनी जरूरत के हिसाब से सड़क, स्कूल, अस्पताल या अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद करना है। साथ ही सुधार करने वाले राज्यों को अतिरिक्त प्रोत्साहन भी दिया जाएगा।

यह व्यवस्था केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग को मजबूत करती है और देश के हर क्षेत्र में समान विकास सुनिश्चित करती है। पिछली योजनाओं में यह राशि प्रभावी साबित हुई थी, इसलिए इसे जारी रखा गया है। इससे ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में भी विकास की गति बढ़ेगी।

जल जीवन मिशन को 2028 तक बढ़ाया गया

साल 2019 में शुरू हुआ जल जीवन मिशन अब 2028 तक बढ़ा दिया गया है। इस मिशन का लक्ष्य हर ग्रामीण घर में नल से साफ पानी पहुँचाना है। अब तक 15 करोड़ घरों यानी 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को पानी के कनेक्शन मिल चुके हैं। अब बाकी 20 प्रतिशत को कवर करने के लिए मिशन को तीन साल और बढ़ाया गया है।

बजट में इसकी कुल राशि बढ़ाई गई है और अब फोकस पानी की गुणवत्ता, रखरखाव और जन भागीदारी पर है। राज्यों के साथ अलग-अलग समझौते (MoU) किए जाएँगे ताकि पानी की सप्लाई स्थाई और नागरिक-केंद्रित हो। यह योजना न सिर्फ स्वास्थ्य सुधारती है बल्कि महिलाओं और बच्चों का समय बचाती है जो पहले पानी लाने में लगता था। यह ग्रामीण भारत की जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

शहरी सुधारों के लिए अर्बन चैलेंज फंड में ₹1 लाख करोड़

शहरों को विकास का केंद्र बनाने के लिए अर्बन चैलेंज फंड की घोषणा की गई है, जिसमें 1 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान है। यह फंड जुलाई 2024 के बजट में घोषित ‘सिटीज ऐज ग्रोथ हब्स’, ‘क्रिएटिव रीडेवलपमेंट ऑफ सिटीज’ और ‘वाटर एंड सैनिटेशन’ जैसी योजनाओं को लागू करने में मदद करेगा। फंड का 25 प्रतिशत तक केंद्र देगा, बाकी बैंक लोन, बॉन्ड या पीपीपी से आएगा।

साल 2026 में इसके लिए 10,000 करोड़ रुपए अलग रखे गए हैं। साथ ही शहरी सुधारों जैसे शहरी शासन, नगर सेवाएँ, भूमि उपयोग और प्लानिंग को प्रोत्साहित किया जाएगा। यह फंड शहरों को आर्थिक केंद्र बनाने में मदद करेगा, जहाँ रोजगार, उद्योग और सेवाएँ तेजी से बढ़ सकें। इससे शहरीकरण की समस्याओं का समाधान भी होगा।

परमाणु ऊर्जा मिशन में 2047 तक 100 GW बिजली का लक्ष्य, SMR के लिए 20,000 करोड़

ऊर्जा सुरक्षा और क्लाइमेट चेंज से निपटने के लिए न्यूक्लियर एनर्जी मिशन शुरू किया गया है। लक्ष्य है कि 2047 तक कम से कम 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन हो। इसके लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जाएगी और एटॉमिक एनर्जी एक्ट व सिविल लायबिलिटी एक्ट में संशोधन किए जाएँगे।

इसके साथ ही छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) के लिए अलग मिशन है, जिसमें 20,000 करोड़ रुपए का प्रावधान है। कम से कम 5 स्वदेशी SMR 2033 तक चालू होंगे। यह कदम ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण है क्योंकि परमाणु ऊर्जा साफ और स्थिर स्रोत है। इससे बिजली की बढ़ती माँग पूरी होगी और कार्बन उत्सर्जन कम होगा। यह भारत को ग्लोबल क्लीन एनर्जी लीडर बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड में ₹25000 करोड़

समुद्री क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड बनाया गया है, जिसमें 25,000 करोड़ रुपए का कोष होगा। सरकार इसमें 49 प्रतिशत तक योगदान देगी, बाकी बंदरगाह और निजी क्षेत्र से आएगा। फंड का उद्देश्य जहाज निर्माण, बंदरगाह और समुद्री उद्योग को लंबी अवधि का वित्त उपलब्ध कराना है।

इसके साथ ही जहाज निर्माण की वित्तीय सहायता नीति को रिवाइज किया जाएगा और बड़े जहाजों को इंफ्रास्ट्रक्चर लिस्ट में शामिल किया जाएगा। जहाज निर्माण क्लस्टर बनाए जाएँगे और स्किलिंग-टेक्नोलॉजी पर जोर होगा। यह कदम भारत को ग्लोबल शिपबिल्डिंग हब बनाने में मदद करेगा, निर्यात बढ़ाएगा और रोजगार सृजन करेगा। समुद्री व्यापार भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसलिए यह निवेश जरूरी था।

UDAN स्कीम को बढ़ाकर 120 नए डेस्टिनेशन

क्षेत्रीय हवाई संपर्क को मजबूत बनाने के लिए UDAN स्कीम को नया रूप दिया गया है। अब अगले 10 साल में 120 नए डेस्टिनेशन जोड़े जाएँगे और 4 करोड़ यात्रियों को लाभ होगा। स्कीम में हेलीपैड और छोटे एयरपोर्ट भी शामिल किए गए हैं, खासकर पहाड़ी, पिछड़े और पूर्वोत्तर इलाकों में। अब तक UDAN से 88 एयरपोर्ट जुड़े और 619 रूट चालू हुए, जिससे 1.5 करोड़ मध्यम वर्ग के लोगों को सस्ती हवाई यात्रा मिली।

यह नया संस्करण क्षेत्रीय असंतुलन दूर करेगा, पर्यटन बढ़ाएगा और दूरदराज के इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ेगा। इससे छोटे शहरों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

बिहार में ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट और कोसी कैनाल प्रोजेक्ट

बिहार के विकास पर विशेष ध्यान देते हुए बजट में कई घोषणाएँ की गई हैं। राज्य में नए ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट बनाए जाएँगे, जो पटना एयरपोर्ट की क्षमता बढ़ाने और बिहटा में ब्राउनफील्ड एयरपोर्ट के अलावा होंगे। इससे बिहार की हवाई कनेक्टिविटी बेहतर होगी और पर्यटन-व्यापार को बढ़ावा मिलेगा।

इसके साथ ही मिथिलांचल क्षेत्र में पश्चिमी कोसी नहर परियोजना के लिए वित्तीय सहायता दी जाएगी, जिससे 50,000 हेक्टेयर से ज्यादा भूमि की सिंचाई होगी और लाखों किसानों को फायदा होगा। ये दोनों प्रोजेक्ट बिहार को ‘पूर्वोदय’ की दिशा में आगे बढ़ाएँगे और क्षेत्रीय असंतुलन को कम करेंगे।

मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर से रोजगार और दीर्घकालिक विकास का लक्ष्य

ये सारे कदम मिलकर इंफ्रास्ट्रक्चर को अभूतपूर्व मजबूती देंगे। पानी, बिजली, सड़क, हवाई और समुद्री संपर्क बेहतर होगा। इससे लाखों रोजगार पैदा होंगे, खासकर ग्रामीण और छोटे शहरों में। लंबे समय में यह निवेश अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत करेगा, निजी निवेश को आकर्षित करेगा और भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में मदद करेगा। सरकार का यह दृष्टिकोण संतुलित है- जहाँ जरूरत है वहाँ केंद्र खुद निवेश कर रहा है और राज्यों-निजी क्षेत्र को साथ लेकर चल रहा है।

3: मोदी सरकार का विकास के चार इंजनों पर खास फोकस

केंद्रीय बजट 2026 में कई नई योजनाएँ और पहल शुरू की गई हैं, जो अर्थव्यवस्था के चार मुख्य इंजनों पर केंद्रित हैं। ये इंजन हैं- कृषि, एमएसएमई, निवेश और निर्यात। सरकार ने इनको इंजन इसलिए कहा है क्योंकि ये विकास की गति प्रदान करेंगे। इनके लिए ईंधन के रूप में सुधारों को रखा गया है।

बजट का उद्देश्य इन क्षेत्रों को मजबूत करके समावेशी विकास सुनिश्चित करना है। नई योजनाएँ उत्पादकता बढ़ाने, रोजगार सृजन करने और आत्मनिर्भरता की दिशा में हैं। ये पहल गरीब, युवा, किसान और महिलाओं पर विशेष फोकस रखती हैं। अब हम इन चार इंजनों और संबंधित योजनाओं को विस्तार से देखते हैं।

पहला इंजन: कृषि और उसकी नई योजनाएँ

बजट में कृषि को पहला इंजन बनाया गया है, क्योंकि यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और करोड़ों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है। सरकार का लक्ष्य कृषि को उत्पादक, विविधतापूर्ण और स्थाई बनाना है। इसके लिए कई नई योजनाएँ शुरू की गई हैं, जो कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों पर फोकस करती हैं।

  • प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना एक महत्वपूर्ण पहल है। यह एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट्स प्रोग्राम की सफलता से प्रेरित है। इसमें राज्यों के साथ साझेदारी में 100 कम उत्पादकता वाले जिलों को चुना गया है। योजना का लक्ष्य कृषि उत्पादकता बढ़ाना, फसल विविधीकरण अपनाना, पंचायत और ब्लॉक स्तर पर भंडारण सुविधा बनाना, सिंचाई बेहतर करना और क्रेडिट उपलब्धता सुनिश्चित करना है। इससे करीब 1.7 करोड़ किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। यह योजना मौजूदा स्कीमों के कन्वर्जेंस से चलेगी और विशेष उपाय भी शामिल होंगे।
  • ग्रामीण समृद्धि और लचीलापन कार्यक्रम भी नया है। यह बहु-क्षेत्रीय कार्यक्रम है, जो राज्यों के साथ मिलकर शुरू होगा। इसका फोकस कृषि में अंडर-एम्प्लॉयमेंट दूर करना है। स्किलिंग, निवेश, टेक्नोलॉजी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करके नए अवसर पैदा किए जाएंगे। ताकि ग्रामीण युवा और महिलाओं के लिए शहरों की ओर पलायन जरूरी न रहे। पहली फेज में 100 विकासशील कृषि जिलों को कवर किया जाएगा। इसमें ग्रामीण महिलाएँ, युवा किसान, छोटे किसान और भूमिहीन परिवार मुख्य लाभार्थी होंगे।
  • दालों में आत्मनिर्भरता मिशन 6 साल का है, जिसमें तुअर, उड़द और मसूर पर विशेष फोकस है। पहले दालों में आत्मनिर्भरता हासिल की गई थी, अब उपभोग बढ़ने से फिर जरूरत है। केंद्र एजेंसियां (NAFED और NCCF) रजिस्टर्ड किसानों से पूरी खरीद करेंगी। यह मिशन उत्पादकता, प्रोटीन कंटेंट और भंडारण पर जोर देगा।
  • सब्जियाँ और फल कार्यक्रम भी नया है। लोगों की पोषण जागरूकता बढ़ने से इनकी खपत बढ़ी है। राज्य सरकारों के साथ मिलकर उत्पादन, सप्लाई चेन, प्रोसेसिंग और किसानों को अच्छे दाम सुनिश्चित किए जाएँगे। इसमें एफपीओ और कोऑपरेटिव की भूमिका होगी।
  • बिहार में मखाना बोर्ड स्थापित किया जाएगा। मखाना बिहार की विशेष फसल है। बोर्ड उत्पादन, प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन और मार्केटिंग सुधारने में मदद करेगा। किसानों को एफपीओ में संगठित किया जाएगा और सरकारी स्कीमों का लाभ दिलाया जाएगा।
  • उच्च उपज बीज मिशन शुरू होगा, जिसमें रिसर्च मजबूत होगी और जलवायु प्रतिरोधी बीज विकसित किए जाएंगे। 100 से ज्यादा नई वैरायटी उपलब्ध कराई जाएँगी।
  • मत्स्य पालन के लिए नया फ्रेमवर्क आएगा, जो ईईजेड और हाई सीज से सस्टेनेबल फिशिंग पर फोकस करेगा। अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप पर विशेष ध्यान।
  • कपास उत्पादकता मिशन 5 साल का है, जो एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल कपास को बढ़ावा देगा। इससे किसानों की आय और टेक्सटाइल सेक्टर को कच्चा माल मिलेगा।
  • किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) की लोन लिमिट 3 लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपए की गई। इससे 7.7 करोड़ किसान, मछुआरे और डेयरी किसान लाभान्वित होंगे।
  • असम में नमरूप में 12.7 लाख टन क्षमता वाला यूरिया प्लांट बनेगा, जो आत्मनिर्भरता बढ़ाएगा।

ये सारी कृषि योजनाएँ मिलकर 1.7 करोड़ किसानों तक पहुँचेंगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगी।

दूसरा इंजन: MSME और उससे जुड़ी पहल

एमएसएमई को दूसरा इंजन कहा गया है, क्योंकि ये 5.7 करोड़ इकाइयाँ हैं जो रोजगार और निर्यात का बड़ा हिस्सा देती हैं। बजट में इनको स्केल देने पर जोर है।

  • एमएसएमई क्लासिफिकेशन की निवेश और टर्नओवर सीमा को क्रमशः 2.5 गुना और दोगुना किया गया। इससे छोटी इकाइयाँ बड़ी हो सकेंगी और रोजगार बढ़ेगा।
  • क्रेडिट गारंटी कवर माइक्रो-स्मॉल के लिए 5 से 10 करोड़ किया गया, जिससे 5 साल में 1.5 लाख करोड़ अतिरिक्त क्रेडिट मिलेगा। स्टार्टअप्स के लिए 20 करोड़ तक और एक्सपोर्टर एमएसएमई के लिए टर्म लोन पर गारंटी।
  • माइक्रो इंटरप्राइजेज के लिए उद्यम पोर्टल पर रजिस्टर्ड को 5 लाख लिमिट का क्रेडिट कार्ड मिलेगा। पहले साल 10 लाख कार्ड जारी होंगे।
  • स्टार्टअप्स के लिए नया फंड ऑफ फंड्स 10,000 करोड़ का बनेगा।
  • 5 लाख महिला, एससी-एसटी पहली बार उद्यमियों के लिए 2 करोड़ तक टर्म लोन स्कीम। स्टैंड-अप इंडिया से सीख लेकर।
  • फुटवियर-लेदर सेक्टर के लिए फोकस प्रोडक्ट स्कीम, जो 22 लाख रोजगार और बड़े निर्यात का लक्ष्य रखती है। टॉय सेक्टर को ग्लोबल हब बनाने की स्कीम।
  • बिहार में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फूड टेक्नोलॉजी बनेगा, जो पूर्वी क्षेत्र में फूड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देगा।
  • नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन सभी इंडस्ट्रीज के लिए पॉलिसी, रोडमैप और मॉनिटरिंग फ्रेमवर्क देगा। क्लीन टेक मैन्युफैक्चरिंग पर भी फोकस।

ये कदम एमएसएमई को चैंपियन बनाएँगे और लाखों रोजगार पैदा करेंगे।

तीसरा इंजन: निवेश

तीसरा इंजन निवेश है, जिसमें लोगों, अर्थव्यवस्था और इनोवेशन में निवेश शामिल है।

  • सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 में पोषण मानक बढ़ाए गए, जो 8 करोड़ बच्चों और महिलाओं को कवर करता है।
  • 50,000 अटल टिंकरिंग लैब स्कूलों में बनेंगी, जो बच्चों में इनोवेशन जगाएंगी।
  • सभी सरकारी सेकंडरी स्कूल और पीएचसी में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी।
  • भारतीय भाषा पुस्तक स्कीम से डिजिटल किताबें उपलब्ध होंगी।
  • स्किलिंग के 5 नेशनल सेंटर्स ग्लोबल पार्टनरशिप से बनेंगे।
  • आईआईटी में 6,500 अतिरिक्त सीटें और पटना आईआईटी में विस्तार।
  • एआई में एजुकेशन के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (500 करोड़)।
  • मेडिकल सीटें 5 साल में 75,000 बढ़ाने का लक्ष्य, अगले साल 10,000 सीटें।
  • सभी जिला अस्पतालों में 3 साल में डे-केयर कैंसर सेंटर।
  • पीएम स्वनिधि को रिवैंप करके स्ट्रीट वेंडर्स को ज्यादा लोन और क्रेडिट कार्ड।
  • गिग वर्कर्स (1 करोड़) को आईडी, हेल्थकेयर और ई-श्रम रजिस्ट्रेशन।

ये पहल युवाओं को स्किल्ड बनाएँगी और स्वास्थ्य-शिक्षा सुधारेंगी।

चौथा इंजन: निर्यात

निर्यात चौथा इंजन है। एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन शुरू होगा, जिसमें सेक्टोरल टारगेट होंगे। भारत ट्रेड नेट डिजिटल प्लेटफॉर्म ट्रेड डॉक्यूमेंटेशन और फाइनेंसिंग आसान करेगा। ग्लोबल सप्लाई चेन में एकीकरण के लिए सपोर्ट और इंडस्ट्री 4.0 पर फोकस। ये कदम निर्यात बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगे।

सुधारों को ईंधन कहा गया है। छह डोमेन में ट्रांसफॉर्मेटिव रिफॉर्म्स होंगे, जिसमें टैक्सेशन, पावर सेक्टर, अर्बन डेवलपमेंट, माइनिंग, फाइनेंशियल सेक्टर और रेगुलेटरी शामिल है। हाई लेवल कमिटी रेगुलेटरी रिफॉर्म्स की सिफारिश करेगी। स्टेट्स के लिए इनवेस्टमेंट फ्रेंडलीनेस इंडेक्स। ये सुधार अगले 5 साल में ग्रोथ पोटेंशियल बढ़ाएँगे।

विशेष फोकस एरिया: किसान, महिला, युवा और मध्यम वर्ग

केंद्रीय बजट 2026 में सरकार ने चार विशेष समूहों किसान (अन्नदाता), महिला (नारी), युवा और मध्यम वर्ग पर विशेष ध्यान दिया है। बजट की थीम ‘सबका विकास’ है और ये समूह विकसित भारत की नींव हैं। कृषि को पहला इंजन बनाकर किसानों को प्राथमिकता दी गई है।

महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने, युवाओं को स्किल और रोजगार देने तथा मध्यम वर्ग को टैक्स राहत देकर उनकी क्रय शक्ति मजबूत करने पर जोर है। ये फोकस क्षेत्र बजट को समावेशी बनाते हैं और हर वर्ग तक विकास पहुँचाने का प्रयास करते हैं। अब हम इनकी विस्तार से चर्चा करते हैं-

किसानों (अन्नदाता) के लिए कृषि को बनाया गया पहला इंजन

बजट में कृषि को अर्थव्यवस्था का पहला इंजन घोषित किया गया है, क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और करोड़ों परिवार इससे जुड़े हैं। सरकार का लक्ष्य शून्य गरीबी, खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय दोगुनी करना है। इसके लिए कई नई योजनाएँ शुरू की गई हैं, जो उत्पादकता, फसल विविधीकरण, भंडारण, सिंचाई और क्रेडिट पर फोकस करती हैं।

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना और ग्रामीण समृद्धि कार्यक्रम जैसे उपाय कम उत्पादक जिलों में बदलाव लाएँगे। दालों में आत्मनिर्भरता मिशन से तुअर, उड़द और मसूर की खेती बढ़ेगी। सब्जियाँ-फल कार्यक्रम पोषण और आय दोनों बढ़ाएगा। बिहार में मखाना बोर्ड और कपास मिशन क्षेत्रीय फसलों को मजबूत करेंगे। मत्स्य पालन का नया फ्रेमवर्क समुद्री संसाधनों का सस्टेनेबल उपयोग करेगा।

किसान क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाकर 5 लाख रुपए करने से छोटे किसानों को आसानी से लोन मिलेगा। यूरिया प्लांट और उच्च उपज बीज मिशन से इनपुट सस्ते और बेहतर होंगे। इन योजनाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा और पलायन कम होगा। कुल मिलाकर 1.7 करोड़ किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। यह फोकस किसानों को सशक्त बनाकर खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा।

महिलाओं (नारी) के लिए आर्थिक भागीदारी और सशक्तिकरण पर जोर

बजट में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने का लक्ष्य 70 प्रतिशत रखा गया है। महिलाएँ घर और समाज की रीढ़ हैं, इसलिए उनकी सशक्तिकरण पर कई योजनाएं केंद्रित हैं।

सबसे बड़ी पहल 5 लाख महिला और एससी-एसटी पहली बार उद्यमियों के लिए टर्म लोन स्कीम है। यह स्टैंड-अप इंडिया की सफलता पर आधारित है और 2 करोड़ तक लोन देगी। इससे महिलाएं अपना बिजनेस शुरू कर सकेंगी। ग्रामीण समृद्धि कार्यक्रम में ग्रामीण महिलाओं पर विशेष फोकस है, जहां स्किलिंग और उद्यमिता से उन्हें स्वावलंबी बनाया जाएगा।

ग्रामीण महिलाओं को एफपीओ और कोऑपरेटिव में संगठित किया जाएगा। शिक्षा में हर जिले में गर्ल्स हॉस्टल बनेंगे, जो लड़कियों की हायर एजुकेशन को आसान बनाएंगे। ये कदम महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करेंगे, घरेलू निर्णयों में उनकी भूमिका बढ़ाएंगे और लिंग समानता को बढ़ावा देंगे। सरकार का मानना है कि महिलाओं की भागीदारी से ही विकसित भारत संभव है।

युवाओं के लिए स्किलिंग, शिक्षा और रोजगार पर विशेष ध्यान

युवा भारत की सबसे बड़ी ताकत हैं और बजट में उन्हें भविष्य का निर्माणकर्ता माना गया है। युवाओं के लिए स्किलिंग, शिक्षा और रोजगार पर कई योजनाएं हैं, ताकि वे ‘मेक फॉर इंडिया, मेक फॉर द वर्ल्ड’ में योगदान दे सकें।

50,000 अटल टिंकरिंग लैब से स्कूलों में इनोवेशन और साइंटिफिक टेम्पर जगाया जाएगा। स्किलिंग के 5 नेशनल सेंटर्स ग्लोबल पार्टनरशिप से बनेंगे, जो इंडस्ट्री 4.0 के लिए तैयार करेंगे। आईआईटी में 6,500 अतिरिक्त सीटें और मेडिकल में 75,000 सीटें बढ़ाने का लक्ष्य युवाओं को हायर एजुकेशन देगा।

एमएसएमई और स्टार्टअप स्कीम से लाखों रोजगार पैदा होंगे। गिग वर्कर्स (लगभग 1 करोड़) को आईडी, हेल्थकेयर और ई-श्रम पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन मिलेगा। टूरिज्म में 50 टॉप डेस्टिनेशन डेवलपमेंट और हॉस्पिटैलिटी स्किलिंग से युवाओं को नए अवसर मिलेंगे। ये पहल युवाओं को स्किल्ड, रोजगारयुक्त और इनोवेटिव बनाएंगी, जिससे भारत ग्लोबल टैलेंट हब बनेगा।

मध्यम वर्ग के लिए टैक्स राहत और जीवन सुगमता

मध्यम वर्ग बजट का सबसे बड़ा लाभार्थी है, क्योंकि यह वर्ग उपभोग, बचत और निवेश का मुख्य आधार है। सबसे बड़ा तोहफा इनकम टैक्स में राहत है – 12 लाख तक आय टैक्स-फ्री, जिससे लाखों लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा आएगा।

कैंसर और गंभीर बीमारियों की दवाओं पर ड्यूटी छूट से इलाज सस्ता होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश से बेहतर सड़क, पानी, बिजली और हेल्थ सुविधाएँ मिलेंगी। उपभोग बढ़ाने की नीति से जीवन आसान होगा। ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी और डिजिटल शिक्षा से मध्यम वर्ग के बच्चे लाभान्वित होंगे। यह राहत मध्यम वर्ग को आर्थिक सुरक्षा देगी और उनकी क्रय शक्ति बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को बूस्ट देगी।

बजट 2026 में सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) पर बदलाव

केंद्रीय बजट 2026-27 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) में महत्वपूर्ण संशोधन प्रस्तावित किए, जो मुख्य रूप से फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट पर केंद्रित हैं। फ्यूचर्स पर STT दर को मौजूदा 0.02% से बढ़ाकर 0.05% कर दिया गया है, जबकि ऑप्शंस प्रीमियम और एक्सरसाइज दोनों पर इसे 0.15% किया गया है (पहले क्रमशः 0.1% और 0.125% के आसपास)।

हालाँकि आयकर विभाग ने स्पष्ट किया कि यह बढ़ोतरी केवल F&O पर लागू है, अन्य STT दरें अपरिवर्तित हैं। विभाग के अनुसार, ऑप्शंस और फ्यूचर्स का ट्रांजेक्शन वॉल्यूम भारतीय जीडीपी (लगभग 300 लाख करोड़ रुपए) का 500 गुना से अधिक (1.5 लाख लाख करोड़ रुपये) है। इस अत्यधिक सट्टेबाजी को नियंत्रित करने और सरकारी राजस्व बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया गया है।

इस घोषणा के बाद शेयर बाजार में भारी गिरावट देखी गई- सेंसेक्स 1500 अंक से अधिक टूटा। ट्रेडर्स और निवेशकों में निराशा है, क्योंकि F&O ट्रेडिंग महंगी हो जाएगी। सरकार का तर्क है कि यह छोटे निवेशकों को सट्टेबाजी से होने वाले नुकसान से बचाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बाजार की अस्थिरता कम कर सकता है, लेकिन अल्पकाल में लिक्विडिटी प्रभावित होगी। कुल मिलाकर, यह बदलाव पूँजी बाजार में संतुलन की दिशा में एक सुधारात्मक प्रयास है।

एक संतुलित और दूरदर्शी बजट

यह बजट विकास और समावेश का बेहतरीन संतुलन बनाता है। टैक्स राहत से मध्यम वर्ग खुश है, कृषि और एमएसएमई पर फोकस से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और सुधार लंबी अवधि का विकास सुनिश्चित करेंगे। महिलाओं और युवाओं की सशक्तिकरण योजनाएँ सामाजिक बदलाव लाएँगी। कुछ आलोचनाएँ भी हैं, जैसे पुरानी टैक्स व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं और कुछ क्षेत्रों में ज्यादा राशि की उम्मीद थी, लेकिन कुल मिलाकर यह बजट व्यावहारिक और दूरदर्शी है।

यह आत्मविश्वास जगाता है कि भारत तेजी से विकसित राष्ट्र बनेगा। किसान, महिला, युवा और मध्यम वर्ग सभी को शामिल करके यह ‘सबका विकास’ का सच्चा उदाहरण है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में यह बजट भारत को 21वीं सदी की महाशक्ति बनाने की दिशा में मजबूत कदम है।

3 दिन में 150000 नीचे आई चाँदी, बजट के दिन भी सोना गिरा: जानिए ऑल टाइम हाई के बाद क्यों जारी है ऐतिहासिक लुढ़कन?

सोने और चाँदी के ऑल टाइम हाई के बाद अचानक जोरदार गिरावट दर्ज की गई। जनवरी 2026 में लगभग 32 परसेंट की तेजी आई थी। पिछले तीन दिनों में सोने में भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जिसमें 24-कैरेट सोने की कीमतें 18,000 रुपये प्रति 10 ग्राम से ज्यादा गिर गईं, जबकि चाँदी 1.50 लाख रुपए से ज्यादा सस्ती हुई। पिछले 48 घंटों में जो हुआ वह कोई आम गिरावट नहीं है, बल्कि एक जबरदस्त बदलाव था, जिसने महीनों की सट्टेबाजी को खत्म कर दिया।

चाँदी ने बढ़ते हुए सोने को भी पीछे छोड़ दिया था। जब गिरी तो फिर सोने को पीछे छोड़ा। ऑल टाइम हाई से पिछले 3 दिन में 1.50 लाख रुपए से ज्यादा सस्ती हो गई। यहाँ तक कि रविवार को बजट वाले दिन भी 27000 रुपए की गिरावट चाँदी में देखी गई, जबकि गोल्ट रेट में 9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। जनवरी 2026 में लगभग 71 परसेंट की तेजी के बाद आई इस गिरावट की कई वजह है।

दुनिया भर में सोने और चाँदी में तेजी क्यों आई

आम तौर पर माना जाता है कि युद्ध और वैश्विक अशांति की वजह से सोना-चाँदी की माँग बढ़ती है और इसके विपरीत शांति होने पर इसके दाम कम होते हैं। लेकिन इस बार वैश्विक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। रूस- यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया में तनाव का माहौल बना हुआ है। अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध की स्थिति है यानी जियोपॉलिटिकल बैकग्राउंड वैसा ही है। जो बदला है, वह है मार्केट की पोजिशनिंग, निवेशकों का व्यवहार और जल्दी पैसे कमाने की उम्मीद। एक बार जब भारी बिकवाली शुरू हुई, तो गिरावट तो आनी ही थी।

ब्लूमबर्ग के डेटा से पता चलता है कि भारी बिकवाली से पहले अकेले जनवरी में सोने की कीमतें 17 परसेंट से ज़्यादा बढ़ गई थीं, जिससे ऐसा लगा कि ये साल सोना-चाँदी के अच्छे दिनों का है, लेकिन तेजी से स्थिति बदली है।

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, सोना-चाँदी में चार दशकों में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। दोनों मेटल पहले ऑल-टाइम हाई पर थे। इसके बाद सोने 12 परसेंट से ज्यादा गिरा और $5,000 प्रति औंस के निशान से नीचे चला गया। यह 1980 के दशक की शुरुआत के बाद की सबसे बड़ी गिरावट है।

डॉलर में आई मजबूती से फिसला सोना

इसकी अहम वजह डॉलर में आई वैश्विक मजबूती है। सोने-चाँदी की भारी बिकवाली का भी US डॉलर को फायदा मिला। इस बीच खबरें आई कि ट्रंप प्रशासन ने केविन वार्श को अगले फेडरल रिजर्व चेयरमैन के तौर पर नॉमिनेट करने की तैयारी कर रहा है। माना गया कि वॉर्श ज्‍यादा आक्रामक रुख अपना सकते हैं, जिससे अमेरिकी डॉलर मजबूत होगा और कीमती धातुओं पर दबाव पड़ेगा।

दरअसल निवेशक ये मान कर कीमती मेटल्स में पैसा लगा रहे थे कि अमेरिका डॉलर की गिर रही कीमतों को लेकर संजीदा नहीं है और उसे बर्दाश्त कर रहा है। लेकिन अमेरिका के मजबूत आर्थिक आँकड़ों ने इस पर पानी फेर दिया। सोने-चाँदी जैसे मेट्ल्स पर ऊँची व्याज दरें नेगेटिव असर डालती हैं। ऐसा माहौल बना कि कुछ निवेशक सोना-चाँदी से पैसा निकाल कर बांड और इक्विटी जैसे यील्ड वाले एसेट्स में पैसे लगाने लगे।

ब्लूमबर्ग रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी निवेशक काफी तेजी से कीमती मेटल खरीद रहे थे। इससे शंघाई फ्यूचर्स एक्सचेंज को सोने-चाँदी समेत कई धातुओं में आई बेतहाशा तेजी को कम करने के लिए जल्दबाजी में कदम उठाने पड़े। जैसे ही ग्लोबल कीमतें बदलीं, इसके शेयरों में गिरावट और तेज हो गई।

भारी बिकवाली का असर

कुछ दिनों में जबरदस्त उछाल को लेकर निवेशक मुनाफावसूली के लिए बेचना शुरू किया और जबरदस्त पैसा कमाया। घरेलू बाजारों में सोने और चाँदी के एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) में 20 फीसदी तक की गिरावट आई है। दिल्ली में सोना एक ही दिन में 14,000 रुपये प्रति 10 ग्राम गिर गया, जबकि 29 जनवरी 2026 को यह 1,83,000 रुपए के ऑल-टाइम हाई पर पहुँचा था। चाँदी भी इसके बाद 20,000 रुपये प्रति kg गिरी, जबकि यह भी 29 जनवरी 2026 को 4,04,500 रुपये के रिकॉर्ड पर पहुँच गई थी। लेकिन तीन दिनों में इसकी कीमत में जबरदस्त गिरावट दर्ज की गई। हालाँकि बजट के बाद 24 कैरेट सोना ₹1,62,240 प्रति 10 ग्राम हो गया और चाँदी 2.78 प्रति किलो पहुँच गया।

ये भी माना जा रहा है कि अचानक आई तेजी के बाद बाजार में करेक्शन का दौर शुरू हुआ। जानकार बताते हैं कि ऐसे करेक्शन लगभग तय थे। खास कर चाँदी में, जिसका बाजार अपेक्षाकृत छोटा और अस्थिर होता है। ऐसे में अगर तेजी ज्यादा आई है तो करेक्शन भी तेजी से ही होता है। यही वजह है कि चाँदी जबरदस्त तरीके से लुढ़का है।

तांबा भी ऑल टाइम हाई से औंधे मुँह गिरा

तांबा की कीमतों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। साल 2026 में तांबा निवेशकों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रहा था। 30 जनवरी को इसमें भारी गिरावट दर्ज की गई । तांबे की कीमत पहले ऑल टाइम हाई पर थी और 1411 प्रति किलो था, जो घट कर 1284 रुपए हो गया। यानी एक ही झटके में तांबे में 126.5 रुपए प्रति किलो सस्ता हो गया।

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी तांबे की कीमत $6.21 से गिरकर $5.96 प्रति औंस पर आ गया। इसकी वजह निवेशकों की भारी बिकवाली और सोने-चाँदी की कीमतों में आ रही गिरावट का दबाव माना जा रहा है। हालाँकि जानकार मानते हैं कि तांबे के उत्पादन में कमी और इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ रहे प्रोमोशन से तांबे का महत्व बना रहेगा इसलिए बाजार में इसकी कीमत अब नहीं घटेगी।

औद्योगिक माँग का कमजोर पड़ना

गिरावट की एक अहम वजह इंडस्ट्रियल मेटल्स की माँग का कमजोर पड़ना भी बताया जा रहा है। चाँदी का व्यापक इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल और मैन्युफैक्चरिंग जैसी इंडस्ट्री में होता है। ग्लोबल ग्रोथ की रफ्तार धीमी पड़ने की वजह चीन और यूरोप से इसकी माँग कम हो गई है। इसका दबाव पड़ा है और चाँदी की कीमतों पर इसका असर दिख रहा है।

यह अकेला ही उस रैली को अस्थिर करने के लिए काफी था जो लगभग पूरी तरह से डॉलर के कमजोर होने और गिरते रियल यील्ड पर बनी थी। एक मज़बूत डॉलर और बढ़ती बॉन्ड यील्ड सोने और चाँदी जैसे नॉन-यील्डिंग एसेट्स को मूल रूप से कम आकर्षक बनाती हैं और एक बार जब यह समीकरण फिर से बन गया, तो कीमतें डगमगाने लगीं।

रविदास जयंती पर पंजाब के डेरा सचखंड बल्लाँ जाएँगे PM मोदी: जानें- कौन हैं इससे जुड़े रविदासिया समुदाय के लोग जो खुद को मानते हैं सिख धर्म से अलग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार (1 फरवरी 2026) को पंजाब का दौरा करेंगे। यह दौरा 15वीं सदी के भक्ति संत गुरु रविदास की 649वीं जयंती के अवसर पर हो रहा है। गुरु रविदास के समानता और मानव गरिमा से जुड़े विचार आज भी पंजाब के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करते हैं।

PM मोदी जालंधर जिले में स्थित डेरा सचखंड बल्लाँ भी जाएँगे। यह स्थान रविदासिया समुदाय के लिए आस्था का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। इसके अलावा इस दौरे के दौरान कई महत्वपूर्ण इन्फ्रा परियोजनाओं से जुड़े ऐलान भी किए जाएँगे। इनमें आदमपुर एयरपोर्ट का नाम बदलकर श्री गुरु रविदास जी एयरपोर्ट रखने की घोषणा भी शामिल है।

प्रधानमंत्री मोदी का बल्लाँ दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब पंजाब में विधानसभा चुनावों में एक साल से भी कम समय बचा है। इस दौरे से रविदासिया समुदाय की उस पुरानी माँग पर भी फिर से ध्यान गया है, जिसमें वे सिख धर्म की मुख्यधारा से अलग अपनी धार्मिक पहचान को लेकर दावा करते रहे हैं।

PM का पंजाब दौरा और इन्फ्रा से जुड़ी घोषणाएँ

केंद्र सरकार की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, PM मोदी लगभग दोपहर 3:45 बजे आदमपुर एयरपोर्ट पहुँचेंगे। वहाँ वे एयरपोर्ट का नया नाम औपचारिक रूप से घोषित करेंगे, जिसे ‘श्री गुरु रविदास जी एयरपोर्ट, आदमपुर’ रखा जाएगा। यह नामकरण श्रद्धेय संत गुरु रविदास के सम्मान में किया जा रहा है। एयरपोर्ट का नाम बदलने की माँग समुदाय की ओर से लंबे समय से की जा रही थी।

क्या है डेरा सचखंड बल्लाँ का महत्व?

डेरा सचखंड बल्लाँ जालंधर के पास बल्लाँ गाँव में स्थित है। इसे दुनियाभर के रविदासिया समुदाय का सबसे प्रभावशाली धार्मिक केंद्र माना जाता है। इसकी स्थापना 20वीं सदी की शुरुआत में हुई थी और धीरे-धीरे यह दलित समाज के आत्मसम्मान और सामाजिक चेतना का प्रमुख केंद्र बन गया, खासकर चमार समुदाय के बीच, जो परंपरागत रूप से चमड़े के काम से जुड़ा रहा है और जिसे ऐतिहासिक रूप से अस्पृश्यता का सामना करना पड़ा।

पंजाब के दोआबा क्षेत्र में इस डेरा का प्रभाव सबसे अधिक देखा जाता है। इस क्षेत्र में दलित आबादी लगभग 45% है, जो राज्य के औसत 32% से काफी अधिक है। पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 23 सीटें दोआबा क्षेत्र में आती हैं। माना जाता है कि बल्लाँ डेरा कम से कम 19 विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं को प्रभावित करता है।

प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब कुछ दिन पहले ही डेरा के प्रमुख संत निरंजन दास को पद्म श्री सम्मान दिया गया है। इससे यह धारणा और मजबूत हुई है कि केंद्र सरकार की ओर से इस संस्था को उच्च स्तर पर मान्यता मिल रही है।

रविदासिया समुदाय कौन है?

रविदासिया समुदाय अपनी आध्यात्मिक परंपरा गुरु रविदास से जोड़ता है। गुरु रविदास भक्ति आंदोलन के संत थे, जिनका जन्म बनारस में हुआ था। उनकी रचनाओं ने जाति व्यवस्था को चुनौती दी और कर्मकांड की बजाय भक्ति और समानता पर जोर दिया। कई दशकों तक बड़ी संख्या में रविदासिया लोग खुद को सिख मानते रहे क्योंकि गुरु रविदास के भजन गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं और सिख गुरुद्वारों में पढ़े जाते हैं।

हालाँकि, समय के साथ सिख समाज के भीतर जातिगत भेदभाव को लेकर असंतोष बढ़ता गया। समुदाय का कहना है कि खास तौर पर प्रभावशाली जाट सिख समूहों की ओर से भेदभाव की प्रवृत्ति बनी रही। यह तनाव मई 2009 में उस समय चरम पर पहुँच गया जब ऑस्ट्रिया के विएना में डेरा बल्लाँ से जुड़े वरिष्ठ संत रमनंद की हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद पंजाब में हिंसक झड़पें हुईं और धार्मिक पहचान को लेकर तीखी बहस शुरू हो गई।

2010 में डेरा सचखंड बल्लाँ ने गुरु रविदास की जयंती के अवसर पर एक अलग धर्म ‘रविदासिया धर्म‘ की घोषणा की। डेरा ने अपना अलग पवित्र ग्रंथ ‘अमृत बाणी गुरु रविदास’ स्थापित किया और इसे कई रविदासिया धार्मिक स्थलों में गुरु ग्रंथ साहिब की जगह रखा गया। इससे सिख धर्म और हिंदू धर्म दोनों से औपचारिक रूप से अलग होने की प्रक्रिया सामने आई।

रविदासिया खुद को सिख धर्म से अलग क्यों मानते हैं?

रविदासिया समुदाय की अलग पहचान की माँग उनके जातिगत भेदभाव के अनुभवों से जुड़ी है। सिख धर्म समानता की शिक्षा देता है लेकिन समुदाय का कहना है कि सामाजिक व्यवहार अक्सर इन सिद्धांतों पर खरा नहीं उतरता। यह भावना विदेशों में बसे पंजाबी समुदायों में और मजबूत हुई जहाँ पंजाब की जातिगत विभाजन की प्रवृत्ति दिखती है।

अध्ययनों में बताया गया है कि ब्रिटेन, कनाडा, स्पेन और अन्य देशों में रविदासिया समुदाय ने मुख्यधारा के सिख गुरुद्वारों में भेदभाव का सामना करने के बाद अपने अलग पूजा स्थल स्थापित किए। ब्रिटेन में रविदासिया संगठनों ने अलग पहचान के लिए अभियान चलाया, जिसके बाद 2011 की जनगणना में ब्रिटेन के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने ‘रविदासिया’ को एक अलग धर्म के रूप में दर्ज किया। उस जनगणना में 11,000 से अधिक लोगों ने खुद को सिख या हिंदू से अलग रविदासिया बताया।

विदेशों में बसे रविदासिया समुदाय ने आर्थिक और संगठनात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने डेरा की संरचनाओं, विदेशों में मंदिरों, धर्मार्थ अस्पतालों और स्कूलों के निर्माण के साथ-साथ डेरा बल्लाँ से जुड़े अंतरराष्ट्रीय ट्रस्टों के लिए भी वित्तीय सहयोग किया है।

पंजाब में राजनीतिक असर

BJP के लिए PM मोदी का यह दौरा पंजाब में अपनी पकड़ मजबूत करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। 2020 में शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन टूटने के बाद BJP नए वोट का आधार बनाने की कोशिश कर रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर लगभग 6.6% था जो 2024 के लोकसभा चुनाव में बढ़कर 18.56% हो गया।

रविदासिया समुदाय से संपर्क बढ़ाकर भाजपा दलित समाज की आकांक्षाओं को साधना चाहती है और कॉन्ग्रेस व AAP के पारंपरिक समर्थन आधार में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। केंद्रीय मंत्रियों ने इस दौरे को गैर-राजनीतिक बताते हुए कहा है कि इसका उद्देश्य संत रविदास और उनके विचारों के प्रति सम्मान व्यक्त करना है।

विवादित पहचान को मान्यता

रविदासिया समुदाय के लिए PM मोदी का यह दौरा उनकी लंबे समय से चली आ रही पहचान और सम्मान की माँग को मान्यता मिलने के रूप में देखा जा रहा है। 2010 से यह समुदाय रविदासिया धर्म को अलग धर्म के रूप में आधिकारिक मान्यता देने की माँग कर रहा है, जिसमें जनगणना में अलग श्रेणी शामिल करने की माँग भी है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

1973 का ‘ब्लैक बजट’: जब इंदिरा गाँधी के काल में भुखमरी और आर्थिक संकट की कगार पर पहुँच गया था देश

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार (1 फरवरी) को जब अपना 9वाँ बजट पेश कर रही हैं, तो पूरा देश ‘विकसित भारत’ की चमक और 50 लाख नौकरियों के वादे के साथ भविष्य की ओर देख रहा है। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक दौर वह भी था जब साल 1973 में इंदिरा गाँधी के शासनकाल के दौरान ‘ब्लैक बजट’ पेश किया गया था। यह वह काला समय था जब सरकार की गलत आर्थिक नीतियों और अदूरदर्शिता ने देश को भुखमरी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था। आज के आत्मनिर्भर भारत और उस दौर की बेबसी के बीच जमीन-आसमान का फर्क है।

इंदिरा गाँधी का ‘ब्लैक बजट’: जब सरकारी तिजोरी में बचा था सिर्फ ‘अंधेरा’

साल 1973 का बजट भारतीय इतिहास में किसी डरावने सपने जैसा था। तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंतराव बी चव्हाण ने जब यह बजट पढ़ा, तो इसमें विकास की नहीं बल्कि बर्बादी की इबारत लिखी थी। उस समय सरकार को 550 करोड़ रुपए का भारी-भरकम घाटा हुआ था, जिसे आज हम राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) कहते हैं। उस दौर के हिसाब से यह आँकड़ा इतना बड़ा था कि इसने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी।

राजकोषीय घाटा दरअसल सरकार की नाकामी का रिपोर्ट कार्ड होता है, जो बताता है कि आपकी कमाई से कहीं ज्यादा आपके खर्चे हैं। इंदिरा गाँधी के दौर में यह घाटा इसलिए बढ़ा क्योंकि सरकार ने आर्थिक अनुशासन को ताक पर रख दिया था। आम बोलचाल में कहें तो यह ‘कमाई अठन्नी और खर्चा रुपैया’ वाला हाल था। खजाना खाली था, लेकिन सरकार के पास फिजूलखर्ची और संकट को संभालने की कोई ठोस योजना नहीं थी। इसी वित्तीय अंधकार की वजह से इसे ‘ब्लैक बजट’ कहा गया, जिसने आने वाले सालों के लिए महँगाई और कंगाली का रास्ता खोल दिया।

आसान शब्दों में उदाहरण के सहित समझाते हैं कि फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) या राजकोषीय घाटा क्या होता है। दरअसल, राजकोषीय घाटा सरकार की आर्थिक सेहत का रिपोर्ट कार्ड होता है। यह बताता है कि सरकार अपनी कुल कमाई (जैसे टैक्स और अन्य स्रोतों से होने वाली आय) के मुकाबले कितना ज्यादा खर्च कर रही है। मान लीजिए, सरकार की जेब में टैक्स और अन्य रास्तों से ₹100 आए, लेकिन उसने देश के विकास, सैलरी और पुरानी योजनाओं पर ₹120 खर्च कर दिए। अब यह जो ₹20 का अंतर है, वही ‘फिस्कल डेफिसिट’ कहलाता है। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को बाजार या अन्य संस्थाओं से कर्ज लेना पड़ता है।

अहंकार और गलत फैसलों की तिहरी मार: युद्ध, सूखा और सरकारी बेबसी

इंदिरा गाँधी की सरकार अपनी हर नाकामी का ठीकरा 1971 के युद्ध पर फोड़ती रही, लेकिन असल सच उनकी नीतियों की विफलता थी। युद्ध के बाद करीब 1 करोड़ शरणार्थियों का बोझ भारत पर पड़ा, लेकिन सरकार ने इसके लिए कोई इमरजेंसी फंड या आर्थिक बैकअप तैयार नहीं किया था। रक्षा बजट अचानक बढ़ाकर 1600 करोड़ रुपए कर दिया गया, जबकि आम जनता की थाली से रोटी गायब हो रही थी।

मुसीबत तब और बढ़ गई जब 1972-73 में भीषण सूखा पड़ा। इंदिरा गाँधी की सरकार के पास कृषि को लेकर कोई दूरदर्शी सोच नहीं थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गईं। गाँवों में लोग भूख से मरने लगे और भुखमरी का वो काल पैदा हुआ जिसने लाखों परिवारों को उजाड़ दिया। देश के पास अपना पेट भरने के लिए अनाज तक नहीं था। मजबूरन, भारत को विदेशों के सामने हाथ फैलाने पड़े और 20 लाख टन अनाज मँगाना पड़ा। इस आयात पर 160 करोड़ रुपए खर्च हुए, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी लगभग खत्म हो गया। यह एक ऐसे नेतृत्व की कहानी थी जिसने देश को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय दूसरों पर निर्भर बना दिया।

राष्ट्रीयकरण का ढोंग और बेपटरी होती अर्थव्यवस्था

अपनी विफलताओं को छिपाने और सत्ता पर पकड़ मजबूत करने के लिए इंदिरा गाँधी की सरकार ने ‘राष्ट्रीयकरण’ का सहारा लिया। कोयला खदानों, तांबा कंपनियों और बीमा कंपनियों को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। सरकार ने कोयला खदानों पर कब्जे के लिए 56 करोड़ रुपए फूँक दिए, लेकिन इसका लाभ जनता को मिलने के बजाय सरकारी तंत्र और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। बिजली संकट कम होने के बजाय और गहरा गया क्योंकि सरकारी नियंत्रण में आते ही इन उद्योगों में सुस्ती छा गई।

इसके अलावा, सरकार ने सूखा राहत के नाम पर 220 करोड़ रुपए बाँटने का दावा किया, लेकिन धरातल पर लोग दाने-दाने को तरसते रहे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ीं, तो सरकार ने हाथ खड़े कर दिए और महँगाई को बेलगाम होने दिया। 1973 का यह बजट दरअसल एक ऐसी सरकार की स्वीकारोक्ति थी जिसने आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह घुटने टेक दिए थे।

बेबसी के ‘ब्लैक बजट’ से आत्मनिर्भर भारत का उदय

आज जब हम निर्मला सीतारमण के बजट को देखते हैं, तो हमें स्पष्ट रूप से मोदी सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ की मजबूत नींव दिखाई देती है। 1973 का वह काला दौर और आज का स्वर्ण काल एक-दूसरे के विपरीत ध्रुव हैं। जहाँ इंदिरा गाँधी के समय भारत विदेशों से मिलने वाले अनाज और कर्ज पर निर्भर था और पलता था, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज भारत दुनिया को अनाज, तकनीक और वैक्सीन निर्यात कर रहा है।

मोदी सरकार के बजट ने यह साबित कर दिया है कि असली विकास वह है जहाँ देश अपनी क्षमताओं पर भरोसा करे। आज बजट का पैसा राजमार्गों, बंदरगाहों और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हो रहा है, न कि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। 1973 के ब्लैक बजट ने देश को भुखमरी की छवि दी थी, लेकिन आज का बजट मध्यम वर्ग को टैक्स में राहत देता है और छोटे व्यापारियों को पंख देता है। यह सफर बेबसी से ‘बॉस’ बनने का है। 1973 की उन डरावनी यादों से निकलकर आज भारत एक ऐसी आर्थिक महाशक्ति बन गया है, जो अब किसी के सामने झुकता नहीं, बल्कि दुनिया को रास्ता दिखाता है। इंदिरा गाँधी का वह दौर एक चेतावनी थी और मोदी का यह दौर एक नई आशा का सूर्योदय है।

ब्रिटिश काल से मोदी सरकार तक… रेल बजट की कहानी, जिसने भारत की वित्तीय व्यवस्था को करीब एक सदी तक अलग राह पर चलाया

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज (1 फरवरी 2026) को लगातार नौंवी बार बजट पेश करने जा रही हैं। आम बजट में देश की अर्थव्यवस्था, विकास योजनाओं और नीतियों की दिशा तय होगी, इस बजट में रेलवे को लेकर भी कई बड़े ऐलान किए जाने की संभावना है। हालाँकि, हमेशा ऐसा नहीं था और लंबे वक्त तक रेलवे का बजट आम बजट से अलग पेश किया जाता रहा था। यह परंपरा करीब नौ दशकों तक चली लेकिन 2017 में इसे समाप्त कर रेल बजट को आम बजट में शामिल कर दिया गया। इस फैसले के पीछे ऐतिहासिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण रहे।

रेल बजट की शुरुआत कैसे हुई

रेल बजट को अलग से पेश करने की परंपरा 1924 में ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुई थी। उस समय भारतीय रेलवे का आकार और महत्व इतना बड़ा था कि इसे आम बजट के तहत समायोजित करना कठिन माना गया। ईस्ट इंडिया रेलवे कमेटी के चेयरमैन सर विलियम एक्वर्थ ने रेलवे के प्रशासन और वित्तीय व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई सुधार सुझाए। उनकी सिफारिशों के आधार पर यह तय किया गया कि रेलवे का बजट आम बजट से अलग पेश किया जाएगा ताकि इसके खर्च, आय और योजनाओं पर विशेष ध्यान दिया जा सके।

स्वतंत्रता के बाद भी जारी रही परंपरा

1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद भी रेल बजट को अलग पेश करने की परंपरा जारी रखी गई। स्वतंत्र भारत का पहला रेल बजट देश के पहले रेल मंत्री जॉन मथाई ने प्रस्तुत किया था। उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में दो आम बजट भी पेश किए। उस समय रेलवे देश की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार था और इसकी आय का योगदान इतना बड़ा था कि इसे अलग बजट के रूप में बनाए रखना जरूरी समझा गया।

रेलवे की आय और अलग बजट का औचित्य

आजादी के समय रेलवे से होने वाली राजस्व प्राप्ति आम बजट की आय से लगभग 6% अधिक थी। इस वजह से सर गोपालस्वामी आयंगर समिति ने सिफारिश की थी कि रेलवे बजट को अलग ही पेश किया जाना चाहिए। 21 दिसंबर 1949 को संविधान सभा ने भी इस संबंध में एक प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। हालांकि यह व्यवस्था प्रारंभ में केवल पांच वर्षों के लिए तय की गई थी, लेकिन यह परंपरा लगातार आगे बढ़ती रही और 2016 तक कायम रही।

समय के साथ रेलवे के राजस्व में बदलाव

देश की अर्थव्यवस्था और परिवहन व्यवस्था में बदलाव के साथ रेलवे के राजस्व का अनुपात धीरे-धीरे कम होता गया। 1970 के दशक तक रेलवे का योगदान कुल राजस्व का लगभग 30% रह गया। 2015-16 तक यह घटकर करीब 11.5% तक पहुँच गया। इस गिरावट ने विशेषज्ञों को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या अलग रेल बजट की परंपरा अब भी जरूरी है।

रेल बजट के विलय की प्रक्रिया

नवंबर 2016 में रेल मंत्रालय ने घोषणा की कि रेल बजट को केंद्रीय बजट में शामिल किया जाएगा। यह फैसला नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों और बिबेक देबरॉय तथा किशोर देसाई द्वारा लिखे गए एक पेपर पर आधारित था। समिति का तर्क था कि आधुनिक सार्वजनिक वित्त प्रणाली में अलग रेल बजट का कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं रह गया है और भारत दुनिया का लगभग अकेला देश था, जहाँ यह परंपरा अभी भी जारी थी।

सरकार के भीतर इस प्रस्ताव पर व्यापक चर्चा हुई। तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने इसका समर्थन किया और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे संसद में प्रस्तुत किया। आखिरकार 2017-18 के बजट से पहली बार रेल बजट और आम बजट को एकीकृत कर दिया गया, जिससे दशकों पुरानी परंपरा खत्म हो गई।

वित्तीय व्यवस्था में हुए बदलाव

रेल बजट के आम बजट में विलय के साथ कई महत्वपूर्ण वित्तीय बदलाव भी किए गए। वित्त मंत्रालय ने रेलवे के अनुमानों के साथ एक विनियोग विधेयक तैयार करने और संसद में प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी संभाली। रेलवे को सरकार को लाभांश देने की बाध्यता से मुक्त कर दिया गया, जिससे उस पर वित्तीय दबाव कम हुआ। पहले रेलवे के लिए अलग पूंजी प्रवाह (कैपिटल फ्लो) की व्यवस्था थी, जिसे समाप्त कर दिया गया और इसके स्थान पर वित्त मंत्रालय से सकल बजटीय सहायता प्रदान करने की व्यवस्था की गई। इसके साथ ही रेलवे को बाजार से अतिरिक्त संसाधन जुटाने की स्वतंत्रता भी दी गई ताकि वह अपने पूंजीगत व्यय को पूरा कर सके।

रेल बजट के विलय के पीछे उद्देश्य

रेल बजट को आम बजट में शामिल करने का मकसद यह था कि सरकार देश की आमदनी और खर्च को एक साथ और साफ तरीके से देख सके। इससे रेलवे, सड़क और जलमार्ग जैसे परिवहन क्षेत्रों की योजनाओं को मिलाकर बेहतर तरीके से बनाया जा सका। इसके साथ ही वित्त मंत्रालय को पैसों के बंटवारे में ज्यादा सुविधा और लचीलापन मिला, ताकि जरूरत के अनुसार बीच साल में भी संसाधनों में बदलाव किया जा सके।

इस फैसले से कैसे आई पारदर्शिता

रेल बजट को आम बजट में मिलाने से बजट बनाने और पेश करने की प्रक्रिया आसान और साफ हो गई। पहले रेल बजट और आम बजट अलग-अलग होने के कारण संसद में तैयारी और चर्चा में ज्यादा समय लगता था लेकिन अब यह समय बचने लगा। अब सरकार की कमाई और खर्च एक ही दस्तावेज में दिखाए जाते हैं, जिससे संसद, निवेशकों और आम लोगों के लिए देश की आर्थिक स्थिति को समझना ज्यादा सरल हो गया।

रेल बजट को आम बजट में शामिल करना सिर्फ एक सरकारी फैसला नहीं था बल्कि बदलती अर्थव्यवस्था और नई वित्तीय सोच का नतीजा था। पहले रेलवे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता था लेकिन समय के साथ उसकी भूमिका बदलती गई। अलग रेल बजट की परंपरा लंबे समय तक भारतीय इतिहास का अहम हिस्सा रही लेकिन आधुनिक व्यवस्था में इसे खत्म कर एक ही बजट प्रणाली अपनाई गई। इस बदलाव से देश की वित्तीय व्यवस्था ज्यादा व्यावहारिक, साफ और बेहतर तालमेल वाली बन गई।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण लगातार नौंवी बार बजट पेश कर रचेंगी इतिहास: जानें- भारत के वित्तीय विवरण को बनाने की प्रक्रिया, क्या हैं मध्य वर्ग की उम्मीदें और चुनौतियाँ

भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार (1 फरवरी 2026) को संसद में संघीय बजट 2026-27 पेश करेंगी। यह उनका लगातार नौवाँ बजट होगा, जो एक रिकॉर्ड है। पहली बार बजट रविवार को पेश हो रहा है, जो ऐतिहासिक है।

इस बजट पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं, खासकर मध्य वर्ग की, जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। मध्य वर्ग महँगाई, टैक्स बोझ और जीवन यापन की बढ़ती लागत से जूझ रहा है। इस लेख में हम बजट बनाने की पूरी प्रक्रिया, मध्य वर्ग की प्रमुख चुनौतियों और इस बजट से उनकी उम्मीदों पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं।

बजट बनाने की प्रक्रिया को समझें

भारत में संघीय बजट बनाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 112 के तहत होती है। यह छह महीने पहले शुरू हो जाती है और अत्यंत गोपनीय रहती है, जिसके मुख्य चरण निम्नलिखित हैं-

बजट सर्कुलर जारी करना: वित्त मंत्रालय का आर्थिक मामलों का विभाग सितंबर-अक्टूबर में सभी मंत्रालयों और विभागों को बजट सर्कुलर जारी करता है। इसमें अगले वित्त वर्ष के लिए राजस्व और व्यय के अनुमान माँगे जाते हैं।

प्री-बजट मीटिंग्स: नवंबर-दिसंबर में वित्त मंत्री स्टेकहोल्डर्स जिसमें उद्योग जगत, किसान संगठन, अर्थशास्त्री, राज्य सरकारें आदि होने हैं, उनके साथ बैठके करते हैं। ये मीटिंग्स नीतिगत सुझाव देने में मदद करती हैं।

अनुमान तैयार करना: सभी मंत्रालय अपने व्यय और राजस्व के अनुमान भेजते हैं। वित्त मंत्रालय इनका मिलान करता है, घाटे का आकलन करता है और राजकोषीय नीति निर्धारित करता है।

हलवा सेरेमनी और लॉक-इन: बजट प्रिंटिंग की अंतिम कड़ी में पारंपरिक ‘हलवा सेरेमनी’ होती है। इस बार यह 27 जनवरी 2026 को हुई। इसमें वित्त मंत्री हलवा बनाती और बाँटती हैं, जो बजट टीम के लिए शुभ मानी जाती है।

इसके बाद बजट से जुड़े अधिकारी नॉर्थ ब्लॉक के बेसमेंट में ‘लॉक-इन’ हो जाते हैं। वो बाहरी दुनिया से संपर्क काटकर बजट दस्तावेज तैयार करते हैं। यह गोपनीयता सुनिश्चित करता है

अंतिम स्वीकृति और पेशकश: कैबिनेट की मंजूरी के बाद बजट लोकसभा में पेश होता है। इसके बाद चर्चा, मांगें अनुदान और वित्त विधेयक पारित होते हैं। यह प्रक्रिया न केवल आर्थिक योजना है, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं को दर्शाती है। 2026 बजट में ग्लोबल चुनौतियाँ जैसे अमेरिकी टैरिफ्स का भी असर दिख सकता है।

बजट 2026 से मध्य वर्ग की उम्मीदें

1 फरवरी को पेश होने वाले बजट से मध्य वर्ग को बड़ी राहत की उम्मीद है। प्रमुख अपेक्षाएँ:

हाउसिंग और शिक्षा-स्वास्थ्य: होम लोन ब्याज पर छूट बढ़ाना, मेडिकल खर्च पर डिडक्शन।

महंगाई नियंत्रण और रोजगार: GST में सुधार, आवश्यक वस्तुएँ सस्ती करना। स्किल डेवलपमेंट और जॉब क्रिएशन पर फोकस।

अन्य: कैपिटल गेंस टैक्स सरलीकरण, पेंशन और सेविंग स्कीम में राहत। विशेषज्ञ मानते हैं कि मध्य वर्ग को राहत से खपत बढ़ेगी, जो अर्थव्यवस्था को बूस्ट देगी।

उम्मीद और वास्तविकता का संतुलन

बजट 2026 विकसित भारत-2047 के सपने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। मध्य वर्ग की चुनौतियाँ गंभीर हैं, लेकिन अगर सरकार टैक्स राहत और खपत बढ़ाने पर फोकस करती है, तो यह वर्ग फिर मजबूत हो सकता है।

निर्मला सीतारमण का यह नौवाँ बजट न केवल आर्थिक दस्तावेज है, बल्कि करोड़ों मध्य वर्ग परिवारों की उम्मीदों का आईना भी। उम्मीद है कि यह बजट संतुलित और समावेशी होगा, जो सभी वर्गों की जरूरतों को ध्यान में रखेगा।