चीन की राजनीति और सेना के भीतर एक बार फिर बड़ा भूचाल आया है। इस बार वजह हैं पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के शीर्ष जनरल और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बेहद करीबी माने जाने वाले झांग यूश्या। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बेहद करीबी माने जाने वाले और चीनी सेना के शीर्ष नेतृत्व में शामिल जनरल झांग यूश्या के खिलाफ जाँच शुरू होने से सत्ता के गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
चीन के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि झांग यूश्या पर ‘अनुशासन और कानून के गंभीर उल्लंघन’ के आरोपों में जाँच चल रही है। इसी के साथ एक और वरिष्ठ अधिकारी जनरल लियू झेनली भी जाँच के दायरे में हैं। इस कदम को कई दशकों में चीनी सेना के भीतर सबसे बड़ी कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है।
China's top general, President Xi Jinping's second-in-command, is under investigation, marking the highest-profile purge of senior military leadership amid Beijing's military modernization https://t.co/ZXoQc5XUNtpic.twitter.com/mJRRqWAzxg
रक्षा मंत्रालय ने आरोपों का खुलासा भले नहीं किया है, लेकिन चीन में ‘अनुशासन और कानून के उल्लंघन’ जैसे शब्द आमतौर पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग या पार्टी लाइन से भटकने की ओर इशारा करते हैं। ऐसे मामलों में अक्सर पद से हटाना और कड़ी सजा देखने को मिलती है।
यह कार्रवाई ऐसे समय पर हुई है जब बीते वर्ष अक्टूबर में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी पहले ही 9 शीर्ष जनरलों को निलंबित कर चुकी है। जानकारों का मानना है कि यह केवल भ्रष्टाचार विरोधी अभियान नहीं, बल्कि सेना पर केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ मजबूत करने का प्रयास भी है।
कौन हैं झांग यूश्या और क्यों माने जाते थे बेहद ताकतवर?
75 वर्षीय झांग यूश्या चीन की सबसे शक्तिशाली सैन्य संस्था सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) के उपाध्यक्ष थे। यह वही संस्था है, जिसके अध्यक्ष खुद राष्ट्रपति शी जिनपिंग हैं। झांग न सिर्फ CMC के शीर्ष अधिकारी थे, बल्कि कम्युनिस्ट पार्टी के पोलितब्यूरो के सदस्य भी रहे हैं, जहाँ देश के सबसे अहम फैसले लिए जाते हैं।
उन्होंने 1968 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी जॉइन की थी और वे उन गिने-चुने वरिष्ठ अधिकारियों में थे जिनके पास वास्तविक युद्ध का अनुभव था। वह उन कुछ सैन्य अधिकारियों में शामिल थे जो सीधे शी जिनपिंग के साथ मिलकर सेना की कमान सँभालते थे।
उम्र सीमा पार करने के बावजूद उन्हें पद पर बनाए रखा गया, जिसे लंबे समय तक शी जिनपिंग के भरोसे का संकेत माना जाता रहा। उन्हें लंबे समय तक चीनी सेना का अनुभवी और प्रभावशाली चेहरा माना गया। लेकिन अब वही जनरल सत्ता की जाँच एजेंसियों के निशाने पर हैं।
क्या शी जिनपिंग को हटाने की हो रही थी कोशिश?
झांग यूश्या और सैन्य रणनीति प्रमुख ल्यू झेनली के खिलाफ अचानक शुरू हुई जाँच ने कई अटकलों को जन्म दे दिया है। चीन मामलों की विशेषज्ञ और मानवाधिकार कार्यकर्ता जेनिफर जेंग का दावा है कि यह सिर्फ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि सत्ता संघर्ष का हिस्सा है।
उनके अनुसार, पार्टी के भीतर एक गुट शी जिनपिंग की ताकत कम करना चाहता था। इस गुट में पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ, पूर्व प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ और झांग यूश्या जैसे दिग्गज शामिल बताए जा रहे हैं। इन नेताओं का मकसद कम्युनिस्ट पार्टी को बनाए रखते हुए चीन को देंग शियाओपिंग के दौर जैसी सामूहिक नेतृत्व व्यवस्था में लौटाना था।
जेंग का यह भी कहना है कि हाल ही में शी जिनपिंग की बीमारी और अस्पताल में भर्ती होने की खबरें दरअसल एक रणनीतिक चाल थीं, जिससे विरोधियों को भ्रम में रखा जा सके।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक अहम बैठक के दौरान झांग यूश्या अपेक्षाकृत कम सुरक्षा के साथ पहुँचे थे। वहीं पहले से मौजूद बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें घेर लिया और हिरासत में ले लिया गया। कुछ दावों में कहा जा रहा है कि झांग वास्तव में शी जिनपिंग को हटाने की योजना बना रहे थे, लेकिन इसकी जानकारी पहले ही लीक हो गई।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद शी जिनपिंग ने तेजी से कार्रवाई कर यह संकेत दे दिया कि सत्ता पर उनकी पकड़ अब भी मजबूत है। इससे पहले एक अन्य वाइस चेयरमैन हे वेइडोंग को हटाने की जानकारी महीनों बाद सामने आई थी, लेकिन झांग यूश्या के मामले में घोषणा तुरंत की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर यह भ्रम भी टूट रहा है कि सिर्फ चेहरों के बदलने से व्यवस्था बदल सकती है। या तो पूरा सिस्टम बदलेगा, या फिर चीन में डर और सख्ती का यही दौर आगे भी चलता रहेगा।
क्या रहा पहले चुनौती देने वालों का हश्र?
शी जिनपिंग के सत्ता में आने के बाद से चीन में व्यापक सफाई अभियान चल रहा है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक 2012 से अब तक करीब 2 लाख अधिकारियों पर कार्रवाई हो चुकी है। सेना में इससे पहले भी कई प्रभावशाली जनरलों को पद से हटाया गया है।
पूर्व CMC उपाध्यक्ष गुओ बॉक्सियोंग और शू काईहौ जैसे नाम इसके उदाहरण हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि झांग यूश्या के खिलाफ कार्रवाई भी इसी संदेश का हिस्सा है कि सेना में वफादारी सिर्फ शीर्ष नेतृत्व के प्रति ही चलेगी।
झांग यूश्या पर जाँच ने यह साफ कर दिया है कि चीन में सत्ता के केंद्र में किसी भी तरह की असहमति के लिए अब बहुत कम जगह बची है। यह कार्रवाई भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम है या फिर सत्ता को चुनौती देने वालों के खिलाफ सख्त संदेश इसका पूरा जवाब आने वाले समय में मिलेगा। लेकिन इतना तय है कि चीनी सेना और राजनीति में यह घटना एक टर्निंग पॉइंट बन चुकी है।
दुनिया की राजनीति और पैसे के मामले में 26 और 27 जनवरी 2026 की तारीखें बहुत बड़ी होने वाली हैं। भारत और यूरोप के देशों के बीच एक बहुत बड़ा समझौता होने जा रहा है, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ (यानी सभी समझौतों की जननी) कहा जा रहा है। इसका इंतजार पिछले 20 सालों से था। इस खास डील को पूरा करने के लिए यूरोप के सबसे बड़े नेता उर्सुला वॉन डेर लेयेन और एंटोनियो कोस्टा दिल्ली पहुँच चुके हैं, जहाँ भारत सरकार ने उनका शानदार स्वागत किया है।
यह मौका इसलिए भी खास है क्योंकि भारत के इतिहास में पहली बार यूरोप के नेता हमारे गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर मुख्य मेहमान होंगे और यूरोप की सेना की एक टुकड़ी दिल्ली के कर्तव्य पथ पर परेड भी करेगी। इस पूरे समझौते का मुख्य मकसद ‘फ्री ट्रेड‘ यानी व्यापार को आसान बनाना है।
इससे 2 अरब लोगों के लिए एक बहुत बड़ा बाज़ार खुल जाएगा। साथ ही, यह भारत और यूरोप दोनों को व्यापार के लिए चीन और अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय एक-दूसरे का मजबूत साथी बनाएगा।
‘मदर ऑफ ऑल डील्स’: 2 अरब लोगों का बाजार और 25% वैश्विक GDP
यूरोप की बड़ी नेता उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इस समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है, जिसका मतलब है कि यह अब तक का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण व्यापारिक समझौता है। इसके पीछे की बड़ी वजह यह है कि जब भारत और यूरोप के 27 देश एक साथ आएँगे, तो यह पूरी दुनिया का सबसे बड़ा और ताकतवर व्यापारिक बाजार बन जाएगा। यह बाजार इतना विशाल होगा कि पूरी दुनिया में होने वाली कुल कमाई का लगभग चौथा हिस्सा अकेले इसी डील से जुड़ा होगा।
इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा भारत के छोटे और बड़े व्यापारियों को होगा। अभी जब भारत से कपड़े, जूते, गहने या आईटी (IT) सर्विस यूरोप भेजी जाती है, तो वहाँ उन पर भारी टैक्स लगता है। लेकिन इस डील के बाद हमारे सामान बिना किसी अतिरिक्त टैक्स के यूरोप के बाजारों में बिक सकेंगे, जिससे भारतीय कंपनियों को काफी मुनाफा होगा।
वहीं दूसरी ओर, यूरोप की शानदार कारें (जैसे मर्सिडीज और फॉक्सवैगन) और वहाँ की खास वाइन पर जो भारी टैक्स भारत में लगता है, वह कम हो जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में भारतीयों के लिए ये विदेशी ब्रांड्स पहले के मुकाबले काफी सस्ते हो सकते हैं।
रक्षा और तकनीक: ‘SAFE’ कार्यक्रम में भारत की एंट्री
यह समझौता सिर्फ सामान के लेनदेन तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत और यूरोप अब दोस्ती का एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं जिसे ‘सुरक्षा और रक्षा साझेदारी’ कहा जा रहा है। यह कदम भारत को अपनी सेना और हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में बहुत मदद करेगा। इस समझौते के बाद, भारत की डिफेंस कंपनियाँ पहली बार यूरोप के उस खास खजाने (SAFE प्रोग्राम) का हिस्सा बन पाएँगी, जिसमें करीब 150 अरब यूरो रखे गए हैं।
आज तक किसी भी गैर-यूरोपीय देश को इतने बड़े फंड का फायदा उठाने का मौका नहीं मिला है, जो भारत के लिए गर्व की बात है। इसके साथ ही, भारत और यूरोप अब आपस में खुफिया जानकारियाँ भी साझा करेंगे। चाहे समुद्र की सुरक्षा हो, इंटरनेट पर होने वाले साइबर हमले हों या फिर आतंकवाद से लड़ना- दोनों पक्ष मिलकर काम करेंगे।
यूरोप ने हाल ही में हुए आतंकी हमलों के बाद खुलकर भारत का साथ दिया है और कहा है कि भारत को अपनी रक्षा के लिए मुँहतोड़ जवाब देने का पूरा हक है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत है। एक और अहम बात यह है कि अब यूरोप की बड़ी कंपनियाँ चीन को छोड़कर भारत को अपना नया ठिकाना बनाना चाहती हैं।
वे अपनी फैक्ट्रियाँ भारत में लगाना चाहती हैं, जिससे न केवल हमारे यहाँ चिप (सेमीकंडक्टर) और क्लीन एनर्जी जैसे आधुनिक क्षेत्रों में काम बढ़ेगा, बल्कि भारत पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग सेंटर बनकर उभरेगा।
नौकरियों की बारिश: युवाओं और स्किल्ड प्रोफेशनल के लिए सुनहरा मौका
इस बड़े समझौते का सबसे शानदार असर हमारे देश में नौकरियों पर पड़ने वाला है। जानकारों का कहना है कि इसके आने से लाखों लोगों को काम मिलेगा। सबसे अच्छी बात यह है कि भारतीय इंजीनियरों, डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के लिए अब यूरोप जाकर काम करना बहुत आसान हो जाएगा। इसके लिए दोनों पक्ष एक खास नियम (मोबिलिटी फ्रेमवर्क) बना रहे हैं, जिससे वीजा मिलने में आने वाली दिक्कतें दूर होंगी और हमारे टैलेंट को विदेश में बेहतर मौके मिलेंगे।
साथ ही, यूरोप की बड़ी कार कंपनियाँ अब अपनी फैक्ट्रियाँ और पार्ट्स बनाने वाली यूनिट्स भारत में ही लगाएँगी। इससे हजारों इंजीनियरों और टेक्नीशियन्स के लिए भर्ती के द्वार खुलेंगे। इसके अलावा, यूरोप अब अपनी दवाओं की सप्लाई के लिए भारत पर भरोसा कर रहा है। इससे हमारे देश की दवा कंपनियों (फार्मा सेक्टर) में रिसर्च और दवा बनाने के काम में भारी बढ़ोतरी होगी और हज़ारों नई नौकरियाँ आएँगी।
यही नहीं, भविष्य की ऊर्जा यानी सोलर, हवा और हाइड्रोजन से बिजली बनाने के क्षेत्र में भी भारत और यूरोप मिलकर काम करेंगे। इस वजह से क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों के लिए भारत में ही नौकरियों की भरमार हो जाएगी। कुल मिलाकर, यह डील भारतीय युवाओं के करियर को एक नई ऊँचाई पर ले जाने वाली साबित होगी।
नया वर्ल्ड ऑर्डर और भारत का दबदबा
यह ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ सिर्फ कागज का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह बदलती हुई दुनिया का एक बड़ा इशारा है। आज जब अमेरिका अपनी व्यापारिक नीतियों में कड़े बदलाव कर रहा है और चीन पर भरोसा कम हो रहा है, तब यूरोप ने भारत को अपना सबसे भरोसेमंद और लोकतांत्रिक साथी चुना है। यह समझौता भारत को दुनिया की एक ऐसी आर्थिक शक्ति बना देगा, जो अमेरिका और चीन के दबाव से अलग अपनी एक नई पहचान रखेगी।
बड़े जानकारों का कहना है कि आज यूरोप की आबादी बूढ़ी हो रही है, इसलिए उन्हें काम करने के लिए भारत के युवाओं और यहाँ के बड़े बाजार की सख्त जरूरत है। दूसरी तरफ, भारत को आगे बढ़ने के लिए यूरोप की आधुनिक टेक्नोलॉजी और वहाँ से आने वाले बड़े निवेश (पैसे) की जरूरत है। यानी इस दोस्ती में दोनों का ही बड़ा फायदा है। हालाँकि, भारत को एक बात का ध्यान रखना होगा कि इस समझौते का फायदा उठाकर चीन जैसा कोई तीसरा देश अपना सस्ता माल हमारे बाजार में न खपा दे। 27 जनवरी को जब इस पर पक्की मुहर लग जाएगी, तो यह आज के भारत की अब तक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक जीत कहलाएगी।
बांग्लादेश में संघीय चुनावों से पहले यह खुलासा हुआ है कि अमेरिकी राजनयिक कट्टर इस्लामी राजनीतिक पार्टी बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी से सक्रिय रूप से संपर्क कर रहे हैं।
यह खुलासा वाशिंगटन पोस्ट ने गुरुवार (22 जनवरी 2026) को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट (आर्काइव) में किया। अमेरिकी अखबार ने एक लीक ऑडियो क्लिप भी साझा की जिसमें पिछले साल 1 दिसंबर को ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास में एक अमेरिकी राजनयिक और कुछ बांग्लादेशी महिला पत्रकारों के बीच बंद कमरे की मीडिया बातचीत सुनी जा सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका जमात-ए-इस्लामी से इसलिए नजदीकियाँ बढ़ा रहा है क्योंकि उसे उम्मीद है कि आने वाले बांग्लादेशी संघीय चुनाव में यह पार्टी जीतेगी। ऑडियो रिकॉर्डिंग में अज्ञात अमेरिकी राजनयिक यह मानते सुनाई दे रहे हैं कि बांग्लादेश ‘इस्लामी दिशा में बदल गया है’ और अमेरिका के हित में है कि वह इस कट्टर इस्लामी पार्टी से दोस्ती करे।
लीक ऑडियो क्लिप में अमेरिकी राजयनिक ने कहा, “हम चाहते हैं कि वे हमारे दोस्त बनें”। ये क्लिप अब सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। राजनयिक ने जमात-ए-इस्लामी के बांग्लादेशी समाज के लिए खतरे को भी कम करके आँका। उसने कहा, “मुझे बस यह विश्वास नहीं है कि जमात शरिया लागू कर सकती है।”
ऑडियो रिकॉर्डिंग में अज्ञात अमेरिकी राजनयिक यह भी मानते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ मुकदमा निष्पक्ष और स्वतंत्र नहीं था। फिर भी उन्होंने बांग्लादेश की कंगारू अदालत से उनकी सजा की तारीफ की और इसे ‘राजनीतिक प्रतिभा’ और ‘प्रभावशाली’ बताया।
The Washington Post has leaked a private conversation between US diplomats and Jamaat-leaning journalists.
The United States does not consider Sheikh Hasina’s trial to be correct or acceptable. Yet, despite this, the US is pleased with the verdict delivered by Yunus. The US is… pic.twitter.com/xVownNvWhj
अमेरिकी अंदाज में कहें तो अंतरराष्ट्रीय मामलों के जज, जूरी और जल्लाद बनकर अमेरिकी राजनयिक ने बंद कमरे की बैठक में हसीना को ‘दोषी’ घोषित कर दिया।
जब वाशिंगटन पोस्ट ने ढाका में अमेरिकी दूतावास की प्रवक्ता मोनिका शी से जवाब माँगा तो उन्होंने कहा, “संयुक्त राज्य अमेरिका किसी एक राजनीतिक पार्टी का पक्ष नहीं लेता और बांग्लादेशी लोगों द्वारा चुनी गई किसी भी सरकार के साथ काम करने की योजना बनाता है।”
लेकिन यह सच नहीं है। नवंबर 2023 में ऑपइंडिया ने रिपोर्ट की थी कि कैसे अमेरिकी सरकार, उसकी एजेंसियाँ और उसमें घुसी मीडिया बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाने के लिए ‘रिजीम चेंज ऑपरेशन’ चला रही थीं।
आवामी लीग नेता की छवि को तोड़-मरोड़कर उन्हें ‘तानाशाह नेता’ दिखाने की कोशिश की गई। अमेरिकी सरकार ने ‘लोकतंत्र बचाने’ और ‘स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव’ कराने के बहाने 2024 के बांग्लादेश चुनाव प्रक्रिया में दखल दिया।
सारे प्रयासों के बावजूद शेख हसीना मजबूत जनादेश के साथ सत्ता में लौटीं। लेकिन अमेरिकी डीप स्टेट ने जल्द ही अपना गंदा एजेंडा शुरू कर दिया।
6 महीने बाद हसीना को सत्ता से हटा दिया गया, एक सोची-समझी रिजीम चेंज ऑपरेशन में। इस्लामी ताकतों को शांत करने और अमेरिका के लिए एसेट बनकर काम करने का काम किसी और को नहीं, बल्कि मुहम्मद यूनुस को सौंपा गया।
ऑपरेशन सर्चलाइट, 1971 बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और जमात-ए-इस्लामी की भूमिका
दिसंबर 1970 में हुए आम चुनावों में पूर्वी पाकिस्तान की प्रांतीय विधानसभा में शेख मुजीबुर रहमान की आवामी लीग को भारी बहुमत (167 सीटें) मिला था।
पश्चिमी पाकिस्तान की लगातार दखलंदाजी से रहमान ने ज्यादा क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग शुरू कर दी थी।
यह भारत विभाजन के सिर्फ 13 साल बाद की बात थी, जब मुसलमानों ने अपना अलग देश माँगा था।
मजहब के नाम पर एक होने के बावजूद पश्चिम और पूर्वी पाकिस्तान के बीच नाराजगी बढ़ती जा रही थी।
1970 चुनावों में पश्चिम पाकिस्तान में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाले पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के जुल्फिकार अली भुट्टो रहमान की माँगों के खिलाफ थे। उन्होंने धमकी दी थी कि अगर पीपीपी को सरकार में शामिल नहीं किया गया तो वे पूर्वी पाकिस्तान की प्रांतीय विधानसभा का बहिष्कार करेंगे और उसे भंग करने की माँग करेंगे।
पूर्वी पाकिस्तान को सत्ता और स्वायत्तता न मिलने से नाराज शेख मुजीबुर रहमान ने 7 मार्च 1971 को सविनय अवज्ञा आंदोलन की घोषणा कर दी। भुट्टो को गृहयुद्ध का डर लगा और राष्ट्रपति याह्या खान ने मार्शल लॉ लगा दिया तथा रहमान और अन्य नेताओं को गिरफ्तार करने का आदेश दिया।
राजनीतिक और नागरिक अशांति को काबू करने के लिए पाकिस्तानी फौज ने 26 मार्च 1971 को ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया। रहमान पहले से ही पश्चिम पाकिस्तान की दादागिरी से निराश होकर स्वतंत्रता की माँग कर चुके थे।
पाकिस्तानी सैनिकों ने राजारबाग और पीलखाना इलाके में बंगाली आबादी पर हमला किया। उन्होंने मुजीबुर रहमान को जेल में डाल दिया और इकबाल हॉल में विश्वविद्यालय पर धावा बोला, जिसमें 9 शिक्षक और 200 छात्र मारे गए।
इसी तरह पुराने ढाका, तेजगाँव, इंदिरा रोड, मीरपुर, कालाबागान और अन्य जगहों पर नागरिकों पर बर्बर हमले जारी रहे।
उसी रात चटगाँव में भी कई लोग सेना की गोलियों से मारे गए। दैनिक इत्तेफाक, दैनिक संगबाद जैसे राष्ट्रीय अखबार बंद कर दिए गए, उनके दफ्तर जला दिए गए और कई पत्रकार मारे गए। सामूहिक कब्रें खोदी गईं और जल्दी-जल्दी बुलडोजर से ढक दी गईं।
ढाका में करीब 700 लोग जिंदा जला दिए गए। झुग्गी-झोपड़ी वालों के घरों में आग लगाई गई, भागते लोगों पर गोलियाँ चलाई गईं, एक काली मंदिर को तोड़ दिया गया और केंद्रीय शहीद मीनार को भी नष्ट कर दिया गया।
मान्यता है कि ऑपरेशन सर्चलाइट में पाकिस्तानी सेना ने 10,000 से 35,000 बंगालियों को मारा, जबकि आने वाले महीनों में मौतों की संख्या 3 लाख से ऊपर पहुँच गई।
भुट्टो ने मशहूर रूप से कहा था, “शुक्र है कि पाकिस्तान बच गया।”
बंगाली आबादी के खिलाफ नरसंहार और तेज हो गया। आने वाले महीनों में करीब 4 लाख बंगाली महिलाओं का बलात्कार किया गया, जिनमें ज्यादातर हिंदू थीं।
पाकिस्तानी सेना के ये सारे अत्याचार और मानवता के खिलाफ अपराध जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों की मदद से संभव हुए, जिसने ‘अल बद्र’, ‘अल शम्स’ और ‘रजाकार’ नाम के तीन सशस्त्र दस्ते चलाए थे।
स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पड़ोसी भारत को आगे आना पड़ा ताकि नरसंहार रुक सके। 14 दिनों में पाकिस्तानी फौजों के कमांडर ए के नियाजी ने आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर दस्तखत किए और इस तरह 16 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश नाम का नया देश बना।
साल 2010 में गठित अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (बांग्लादेश) ने जमात-ए-इस्लामी से जुड़े 10 चरमपंथियों को 1971 के नरसंहार में ‘सहयोगी‘ पाया।
इनमें शामिल थे-
अब्दुल कादर मुल्लाह (दिसंबर 2013 में फांसी) गुलाम आजम मुहम्मद कमरुज्जमान (अप्रैल 2015 में फांसी) देलवार होसैन सईदी अली अहसान मोहम्मद मुजाहिद (नवंबर 2015 में फांसी) अबुल कलाम आजाद मोतिउर रहमान निजामी (मई 2016 में फांसी) मीर कासिम अली (सितंबर 2016 में फांसी) अबुल कलाम मुहम्मद यूसुफ चौधरी मुईन-उद्दीन
गुलाम आजम और अबुल कलाम मुहम्मद यूसुफ 2014 में मर गए, जबकि देलवार होसैन सईदी 2023 में प्राकृतिक कारणों से मरे। अबुल कलाम आजाद अब तक फरार हैं। चौधरी मुईन-उद्दीन अब ब्रिटिश नागरिक है और गिरफ्तार नहीं हुआ।
जमात-ए-इस्लामी से जुड़े 5 चरमपंथियों को दिसंबर 2013 से सितंबर 2016 के बीच फांसी दी गई।
1971 नरसंहार के बाद जमात-ए-इस्लामी द्वारा हिंदुओं पर टारगेटेड हिंसा
6 दिसंबर 1992 को 5000 मुस्लिम पुरुषों की भीड़, बाँस और लोहे की छड़ें लेकर ढाका नेशनल स्टेडियम में भारत-बांग्लादेश क्रिकेट मैच में घुसने की कोशिश की।
United Press International की 1992 की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
पुलिस ने आँसू गैस और रबर बुलेट चलाकर उन्हें रोका। यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, 1000 मुस्लिमों की भीड़ ढाका के थाटारी बाजार इलाके के हिंदू शिव मंदिर में घुसी और उसे जमीन से मिटा दिया।
इस्लामी कट्टरपंथियों ने नारिंदा इलाके के एक हिंदू मंदिर पर भी हमला किया और एक 88 साल के हिंदू पुजारी पर बम से गंभीर हमला किया। मुस्लिम भीड़ ने ढाकेश्वरी मंदिर में घुसने की भी कोशिश की।
उन्होंने हिंदुओं की दुकानों को लूटा और अल्पसंख्यक समुदाय की गाड़ियों को डंडों और लोहे की छड़ों से तोड़ दिया।
ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज (HRCBM) के अनुसार, यह दंगा कट्टर इस्लामी संगठन जमात-ए-इस्लामी ने कराया था, जो उस समय सत्ता में रही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की गठबंधन सहयोगी थी।
यह दंगे अपने आप नहीं हुए, बल्कि अच्छी तरह प्लान किए गए थे। करीब 2400 हिंदू महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुए, 3500 मंदिर और धार्मिक स्थल नष्ट कर दिए गए।
हिंदू समुदाय के 28000 घर और 2500 व्यावसायिक इमारतें जला दी गईं। इस हिंसा में करीब 700 हिंदू मारे गए। ये आँकड़े कम थे, जैसा कि उस समय कई बड़े नेताओं ने माना था।
बीबीसी की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
साल 2001 में जमात-ए-इस्लामी ने BNP के साथ मिलकर चुनाव जीता तो हिंदू समुदाय पर अकल्पनीय अत्याचार हुए। कई बांग्लादेशी हिंदुओं को सोची-समझी हिंसा के बाद देश छोड़ना पड़ा।
बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया, “हिंदू नेताओं ने कहा कि चुनाव नतीजे आने के साथ ही उन पर हमले शुरू हो गए थे-हत्या, लूट और बलात्कार। उनका कहना था कि इस्लामी पार्टियाँ और BNP ने उन्हें निशाना बनाया क्योंकि उन्होंने उन चुनावों में विरोधी आवामी लीग का समर्थन किया था।”
2013 की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
फरवरी 2013 में जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठन ‘इस्लामी छात्र शिबिर’ ने 50 से ज्यादा हिंदू मंदिरों पर हमला किया और अल्पसंख्यक समुदाय के 1500 से ज्यादा घरों-दुकानों को निशाना बनाया। गाइबांधा, चटगांव, रंगपुर, सिलहट, बोगरा आदि जिलों में आगजनी की।
एक साल बाद फरवरी 2014 में BNP सदस्यों और जमात-ए-इस्लामी के चरमपंथियों ने हिंदू समुदाय पर 160 हमले किए।
OHCHR की रिपोर्ट
इस साल 12 फरवरी को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने 104 पेज की रिपोर्ट जारी की जिसमें बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों का ब्योरा था।
रिपोर्ट का नाम है- ‘Human Rights Violations and Abuses related to the Protests of July and August 2024 in Bangladesh.’
इसमें पाया गया कि हिंदू समुदाय पर ज्यादातर हमले पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने का जश्न मनाने वाली ‘विजय जुलूसों’ के दौरान हुए।
OHCHR ने नोट किया कि हमलावर BNP और जमात-ए-इस्लामी के स्थानीय समर्थक थे। रिपोर्ट के पेज 62 पर लिखा है- “BNP और जमात-ए-इस्लामी विरोधी दलों के कुछ स्थानीय सदस्य और समर्थक बदले की कार्रवाइयों में मानवाधिकार उल्लंघन के लिए जिम्मेदार हैं, जिनमें हिंदू समुदाय के सदस्यों के खिलाफ भी शामिल हैं।”
सितंबर 2024 में मानवाधिकार कार्यकर्ता और निर्वासित बांग्लादेशी ब्लॉगर असद नूर ने खुलासा किया कि हिंदुओं को जबरन ‘जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश’ में शामिल कराया जा रहा है।
नूर ने बताया कि लालमोनिरहाट सदर उपजिला के खुनियागाछ यूनियन के कलमती वार्ड नंबर 2 में जमात-ए-इस्लामी के सदस्य गए। उन्होंने 27 गरीब हिंदुओं को निशाना बनाया और उन्हें पार्टी में शामिल होने पर मजबूर किया।
असद नूर के अनुसार, कट्टरपंथियों ने उन्हें मारने और देश से निकालने की धमकी दी। मजबूरी में गरीब हिंदुओं को उनकी बात माननी पड़ी। जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों ने उन्हें कुछ फॉर्म पर दस्तखत कराए और इस्लामी किताबें दीं ताकि उनका ब्रेनवॉश करके हिंदू धर्म छुड़वाया जाए।
हाफिज मोहम्मद शाह आलम, जमात-ए-इस्लामी (लालमोनिरहाट शाखा) के सहायक सचिव, हिंदुओं को जबरन शामिल करने के दौरान मौजूद थे।
सिर्फ अपना भला देखता है अमेरिका
दुनिया की सबसे पुरानी लोकतंत्र होने के नाते अमेरिका दूसरे देशों के सुचारु कामकाज में गहरी दिलचस्पी लेता है लेकिन अक्सर लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को गिराकर अपने हितैषी रिजीम सत्ता में लाता है।
अगस्त 2024 में बांग्लादेश में रिजीम चेंज ऑपरेशन और उसके बाद कट्टर इस्लामियों को सत्ता देना ऐसे ही सत्ता दुरुपयोग का एक उदाहरण है।
अमेरिका खुद को ‘Land of Liberty’ कहता है, लेकिन वह खुशी-खुशी उन रिजीम और समूहों को सत्ता दे देता है जो महिलाओं, धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों की आजादी छीनते हैं, बशर्ते उसका गंदा मकसद पूरा हो जाए।
अमेरिका बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी से क्यों नजदीकियाँ बढ़ा रहा है, जिसका महिलाओं पर अत्याचार, नरसंहार और हिंदुओं व अन्य अल्पसंख्यकों पर जुल्म करने का साबित हुआ रिकॉर्ड है।
इस कट्टर इस्लामी संगठन का बांग्लादेश की सत्ता तक पहुँचना देश की सद्भाव और सामाजिक ताने-बाने के लिए झटका है। इसके अलावा क्षेत्रीय अस्थिरता, आतंकवाद और अनगिनत सुरक्षा चुनौतियों का खतरा भी है।
मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) शासित पश्चिम बंगाल में वार्षिक हिंदू पर्व सरस्वती पूजा में कई जगहों पर बाधा डाली गई। शुक्रवार (23 जनवरी 2026) को सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के भीतर गुटबाजी के चलते उत्तर 24 परगना जिले के कमरहाटी शहर में सरस्वती पूजा बाधित हो गई।
डीडी न्यूज बांग्ला की एक रिपोर्ट के अनुसार, बेलघड़िया सर्वजनिन श्री श्री दुर्गा चौक सोसाइटी मंदिर को TMC के एक गुट ने ताला लगा दिया। इस वजह से स्थानीय हिंदू महिलाएँ देवी सरस्वती की पूजा नहीं कर पा रही हैं। अब तक TMC पार्षद इस विवाद का कोई समाधान नहीं निकाल सके हैं।
वहीं स्थानीय पुलिस ने यह कहते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया कि जब तक TMC के दोनों गुट किसी साझा सहमति पर नहीं पहुँचते, तब तक ताला नहीं हटाया जाएगा। एक महिला ने कहा, “हम चाहते हैं कि यह मंदिर सभी के लिए एक साझा पूजा स्थल बना रहे। यहाँ सिर्फ एक ताला होना चाहिए, लेकिन उसकी दो चाबियाँ हों, एक उनके पास और एक हमारे पास।” एक अन्य महिला ने कहा, “यह किसी एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं है। यह मंदिर सबका है।”
ममता बनर्जी के अल्मा मेटर में सरस्वती पूजा आयोजित करने पर TMC नेता ने छात्राओं को दी धमकी
दक्षिण कोलकाता स्थित सरकारी सहायता प्राप्त जोगेश चंद्र चौधरी कॉलेज की एक छात्रा ने आरोप लगाया है कि एक TMC नेता ने सरस्वती पूजा आयोजित करने को लेकर छात्राओं को धमकी दी। पीड़िता के अनुसार, उक्त TMC नेता की पहचान दाऊद आलम मोल्ला के रूप में हुई है।
सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में छात्रा कहती है, “दाऊद आलम मोल्ला बाहर खड़ा है। उसने मुझे धमकी दी है कि वह मेरी LLM को f*** कर देगा।” संयोग से जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी का अल्मा मेटर है।
TMC leader Daud Alam Molla threatened students of Jogesh Chandra Chowdhury Law college from performing Saraswati Puja. Else he will ensure their LLM is jeopardised. Last year Trinamool leader Sabbir Ali threatened on similar lines and he has been duly rewarded by his Party. He… pic.twitter.com/zRotdmNCAI
इससे पहले, जनवरी 2025 में ऑपइंडिया ने रिपोर्ट की थी कि पश्चिम बंगाल राज्य तृणमूल छात्र परिषद के तत्कालीन महासचिव मोहम्मद शब्बीर अली ने सरस्वती पूजा करने पर छात्राओं को बलात्कार और हत्या की धमकी दी थी।
TMC गुटों की आपसी लड़ाई से रुका सरस्वती पूजा समारोह
शुक्रवार (23 जनवरी 2026) को कूचबिहार जिले के दिनहाटा कॉलेज में सरस्वती पूजा मंडप को छोड़ दिया गया, जब सत्तारूढ़ TMC के दो गुटों के बीच झड़प हो गई। ABP आनंदा की रिपोर्ट के अनुसार, बाद में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को बुलाया गया। मामले की जानकारी मिलते ही दिनहाटा थाना प्रभारी और SDPO कॉलेज परिसर पहुँचे।
पूजा में शामिल होने आए हिंदू श्रद्धालुओं को अपनी जान-माल की सुरक्षा के लिए वहाँ से भागना पड़ा। घटनास्थल से सामने आए दृश्य बताते हैं कि कॉलेज परिसर को TMC के गुंडों ने रणक्षेत्र में बदल दिया।
50% से अधिक छात्र मुस्लिम होने के कारण स्कूल परिसर में हिंदू छात्रों को सरस्वती पूजा की अनुमति नहीं
उत्तर 24 परगना जिले के बारासात शहर से सामने आए एक अन्य मामले में हिंदू छात्रों को स्कूल परिसर के भीतर सरस्वती पूजा आयोजित करने की अनुमति नहीं दी गई। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह अनुमति इसलिए नहीं दी गई क्योंकि स्कूल में 50% से अधिक छात्र मुस्लिम थे।
सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में पुलिसकर्मी छात्रों को देवी सरस्वती की पूजा करने से रोकते नजर आए। बाद में हिंदू छात्रों को मजबूरन स्कूल परिसर के बाहर, फुटपाथ पर पूजा आयोजित करनी पड़ी।
प्रदीप चटर्जी नामक एक व्यक्ति को यह कहते सुना गया, “उन्होंने कहा कि यहाँ पूजा नहीं हो सकती क्योंकि इस स्कूल में हिंदू अल्पसंख्यक हैं… पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं की हालत में कोई फर्क नहीं है।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने देवी सरस्वती को ‘दरवाजे से बाहर’ कर दिया, जिससे छात्रों को सड़क किनारे देवी को पुष्प अर्पित करने पड़े।
इस घटना की बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने कड़ी निंदा की। उन्होंने ट्वीट कर पूछा, “क्या पश्चिम बंगाल अब बांग्लादेश बन गया है?” उन्होंने आगे कहा, “यह घटना हमें एक बात सिखाती है, अगर हिंदू अल्पसंख्यक बन गए, तो उनके साथ कैसा व्यवहार होगा?”
পশ্চিমবঙ্গ এখন কি বাংলাদেশে পরিণত হয়ে গেছে? প্রশ্ন টা উঠেই যায় যখন স্কুলের বাচ্চা বাচ্চা ছাত্রছাত্রীরা সরস্বতী পুজো করতে চাইলে স্কুল কর্তৃপক্ষ আর মমতা পুলিশের যৌথ উদ্যোগে সেই পুজো বন্ধ করে দেওয়া হয়। কারণ দেখানো হয় স্কুলে হিন্দু বাচ্চারা সংখ্যালঘু, ৫০% শতাংশের উপর মুসলিম… pic.twitter.com/Sm5QBscydu
उपरोक्त चारों घटनाएँ स्थानीय बंगाली मीडिया में रिपोर्ट की गई हैं। पश्चिम बंगाल में अक्सर ऐसा देखा गया है कि हिंदू अधिकारों से जुड़ी खबरों को मुख्यधारा का मीडिया नजरअंदाज कर देता है। ऐसे में यह आश्चर्यजनक नहीं होगा अगर सरस्वती पूजा में बाधा के मामलों की संख्या दर्जनों तक पहुँच जाए।
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में सामने आया ‘जिम जिहाद’ का मामला किसी एक जिम या एक आरोपित तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक ऐसा संगठित नेटवर्क है, जो वर्षों से फिटनेस और जिम की आड़ में चुपचाप काम कर रहा था। 2 हिंदू युवतियों की शिकायत ने जिस जिम जिहाद की परतें खोल दी हैं, उसने यह साफ कर दिया कि जिम जैसी सामान्य जगहों को भी इस्लामी कट्टरपंथियों ने योजनाबद्ध तरीके से धर्मांतरण, ब्लैकमेलिंग और यौन शोषण के अड्डों में बदल दिया है।
कैसे खुला जिम जिहाद का नेटवर्क?
इस मामले का खुलासा मंगलवार (20 जनवरी 2026) को हुआ जब मिर्जापुर देहात कोतवाली में 2 युवतियों की अलग-अलग तहरीरें दर्ज हुईं। शुरुआत में मामला आम शोषण जैसा दिखा लेकिन जैसे ही पुलिस ने आरोपितों के मोबाइल फोन खँगाले, पूरी तस्वीर सामने आ गई। जाँच में 50 से अधिक लड़कियों के अश्लील वीडियो और चैट मिले। इसके बाद 25 से 30 महिलाओं ने बिना अपनी पहचान उजागर किए पुलिस से संपर्क किया और धर्मांतरण तथा ब्लैकमेलिंग से जुड़ी जानकारी दी।
हिंदू लड़कियों ने पुलिस को बताया कि नारघाट महुवरिया इलाके में संचालित कम से कम 5 जिमों में मालिक और ट्रेनर वर्कआउट के बहाने पहले उनसे दोस्ती करते थे और फिर उन्हें धीरे-धीरे अपने जाल में फँसाया जाता था।
पीड़िताओं के अनुसार, ट्रेनर पहले भरोसा जीतते, नजदीकियाँ बढ़ाते और फिर AI का इस्तेमाल कर अश्लील फोटो और वीडियो तैयार करते थे। इन्हीं, फोटो-वीडियो के जरिए लड़कियों को ब्लैकमेल किया जाता था, उनसे पैसे वसूले जाते थे और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जाता था। विरोध करने पर वीडियो वायरल करने और जान से मारने की धमकी दी जाती थी।
बी-फिट जिम जाने वाली एक पीड़िता ने तहरीर में बताया कि वहाँ उसकी मुलाकात शेख अली नाम के ट्रेनर से हुई। ट्रेनिंग के दौरान उसने पहले दोस्ती बढ़ाई और फिर प्यार का नाटक कर भरोसा जीता। इसके बाद उसके साथ अश्लील हरकतें की गईं और आपत्तिजनक फोटो-वीडियो बना लिए गए जिनके जरिए लगातार ब्लैकमेल किया गया और पैसों की माँग की जाती रही।
पीड़िता ने यह भी बताया कि आरोपी ने उसके नाम पर लोन भी कराया। आर्थिक शोषण के साथ-साथ उसका धर्मांतरण भी कराया गया। उससे बुर्के में फोटो खिंचवाई गईं, घर पर पाँचों वक्त नमाज पढ़ने को कहा गया और दरगाह ले जाकर कलमा पढ़वाकर धर्मांतरण कराया गया। जब उसने इसका विरोध किया तो आरोपी गाली-गलौज पर उतर आया और जान से मारने के साथ-साथ वीडियो वायरल करने की धमकी देने लगा
शिकायत के बाद पुलिस ने जाँच के लिए 4 टीमों का गठन कर दिया। जाँच के बाद 21 जनवरी को पुलिस ने बी-फिट जिम के ट्रेनर मोहम्मद शेख अली और फैजल खान को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार आरोपितों के मोबाइल की जाँच में बड़े खुलासे हुए। इसमें KGN-1 जिम के मालिक जहीर और KGN-3 जिम के मालिक शादाब का नाम सामने आया, जिन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। जाँच में यह भी पता चला कि KGN-2 और आयरन फायर जिम के तार भी इसी मामले से जुड़े हुए हैं।
एक परिवार, पाँच जिम और पूरा जिहादी नेटवर्क
जाँच में यह तथ्य सामने आया कि 5 में से 4 जिम एक ही परिवार के लोग चला रहे थे। KGN-1 जहीर के पास था, KGN-2.0 उसका भाई अशफाक उर्फ लकी खान चलाता था। आयरन फायर जिम फरीद अहमद के नाम पर था जबकि KGN-3.0 उसका जीजा शादाब संचालित करता था। जहीर का बड़ा भाई इमरान पहले जिम संचालन में शामिल रहा है और उसके पुराने मामलों की हिस्ट्रीशीट भी खंगाली जा रही है।
ड्यूटी के बाद जिहाद करता था कॉन्स्टेबल इरशाद
इस मामले में और भी गंभीर मोड़ तब आया जब भदोही जीआरपी में तैनात हेड कॉन्स्टेबल इरशाद खाँ की भूमिका भी इस जिहादी नेटवर्क में सामने आई। पुलिस के अनुसार, आयरन फायर जिम का वास्तविक संचालन उसकी निगरानी में होता था। कागजों पर मालिक फरीद अहमद था लेकिन इरशाद वर्षों से इस नेटवर्क से जुड़ा हुआ था। वह ड्यूटी खत्म करने के बाद जिम पहुंचता था और पूरे जिहाद के इस नेटवर्क पर नजर रखता था।
अमीर घरों की महिलाओं को बनाते थे निशाना, 6 गिरफ्तार
इस मामले में अब तक मोहम्मद शेख अली, फैजल खान, जहीर, शादाब, फरीद अहमद और जीआरपी हेड कॉन्स्टेबल इरशाद खाँ को गिरफ्तार किया जा चुका है। वहीं, इमरान और अशफाक उर्फ लकी फरार हैं। दोनों के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर 25-25 हजार रुपए का इनाम घोषित किया गया है।
थाना को0देहात पर पंजीकृत 02 अलग-अलग धर्मांतरण से सम्बन्धित अभियोगों में गठित 04 पुलिस टीमों द्वारा अबतक कुल 06 अभियुक्तों की गिरफ्तारी की गयी है । जिसके सम्बन्ध में #सोमेन_बर्मा#DIG/SSP Mirzapur की बाइट-#UPPolice#Mirzapurpic.twitter.com/8R7l0yqd0k
पुलिस के मुताबिक, यह गैंग बेहद सुनियोजित तरीके से काम करता था। इनके निशाने पर खास तौर पर अमीर और प्रभावशाली परिवारों की महिलाएँ होती थीं। गैंग का एक सदस्य पहले महिला से नजदीकियाँ बढ़ाने और उसे अपने जाल में फँसाने की कोशिश करता था। अगर वह इसमें कामयाब नहीं होता, तो गैंग का दूसरा सदस्य आगे आता था और अलग तरीके से संपर्क साधता था।
पुलिस जाँच में यह भी सामने आया है कि जिन महिलाओं पर उन्हें शक होता था या जिन्हें आसानी से फँसाया जा सकता था तो उन्हें बहाने से दूसरे जिम में भेज दिया जाता था ताकि वहाँ गैंग के बाकी सदस्य उन्हें फँसा सकें। इस तरह गैंग अलग-अलग लोगों और स्थानों का इस्तेमाल कर महिलाओं को निशाना बनाता था। पुलिस ने बताया है कि आरोपित कई महिलाओं को फ्री जिम ट्रेनिंग का भी लालच देते थे। ट्रेनिंग के दौरान तस्वीरें ले ली जातीं और नंबर एक्सचेंज के बहाने ट्रेनिंग टिप्स और फिर निजी बातचीत शुरू की जाती। इन महिलाओं को बुर्का पहनाकर घुमाया जाता और इस्लाम अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।
जिम की फंडिंग की भी हो रही जाँच
ASP सिटी नितेश सिंह ने बताया है कि जिम की फंडिंग की भी जाँच चल रही है। पुलिस के मुताबिक, जिमों के सेटअप में लाखों रुपये लगाए गए थे। साथ ही, वहाँ काम करने वाले ट्रेनरों को केवल 10 से 15 हजार रुपए महीने का वेतन मिलता था, इसके बाद भी ट्रेनर रईसी में रहते है। महँगे मोबाइल फोन, ब्रांडेड कपड़े और जूते इस बात की ओर इशारा करते हैं कि जिमों की फंडिंग किसी बड़े नेटवर्क से जुड़ी हो सकती है।
पुलिस के मुताबिक, अब तक जाँच में 50 से अधिक लड़कियों के साथ ब्लैकमेलिंग के सबूत मिले हैं। बताया जा रहा है कि इस जिम की फंडिंग करने वालों में कई प्रतिष्ठित व्यवसायी और जनप्रतिनिधियों के नाम सामने आ रहे हैं।
जिम सील, जाँच जारी
मामले की गंभीरता को देखते हुए DM पवन कुमार गंगवार ने धारा 163 के तहत आदेश जारी कर पाँचों जिमों के संचालन पर 27 फरवरी 2026 तक पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। सभी जिम पूरी तरह सील कर दिए गए हैं ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे और किसी भी तरह की अवैध गतिविधि दोबारा न हो सके। पुलिस कॉल डिटेल रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा और संपर्कों की जाँच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि यह नेटवर्क और किन इलाकों तक फैला हुआ है।
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद स्थित बिलारी से एक चौंकाने वाली खबर आई है, जहाँ 12वीं में पढ़ने वाली एक हिंदू छात्रा को उसकी ही 5 मुस्लिम सहेलियों ने बीच सड़क पर घेरकर जबरन बुर्का पहना दिया। घटना 20 दिसंबर की है, जिसका CCTV फुटेज अब वायरल हो रहा है।
पीड़ित छात्रा के भाई देव चौधरी की शिकायत पर पुलिस ने 22 जनवरी 2026 को FIR दर्ज कर ली है। FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। आरोप है कि ये मुस्लिम लड़कियाँ छात्रा पर इस्लाम कबूल करने का दबाव बना रही थीं और उसे लालच दिया कि बुर्का पहनने से उसकी ‘किस्मत बदल जाएगी‘।
बीच सड़क पर बुर्का और ‘खूबसूरती’ का झाँसा
बिलारी के शाहकुंज कॉलोनी में रहने वाली छात्रा जब ट्यूशन पढ़कर लौट रही थी, तभी उसकी सहेलियों ने उसे गली में रोक लिया। CCTV में साफ दिख रहा है कि मुस्लिम लड़कियाँ पहले उससे बातें करती हैं, फिर अचानक एक सहेली अपने बैग से बुर्का निकालती है। छात्रा मना करती रही, लेकिन लड़कियों ने उसे यह कहकर बुर्का पहना दिया कि ‘इसमें तुम बहुत खूबसूरत लगोगी।’ इस दौरान लड़कियाँ इधर-उधर ताकती रहीं कि कोई उन्हें देख न ले।
‘खाने में कुछ मिलाया और हिंदू धर्म से नफरत भरी’
पीड़ित के भाई का आरोप है कि उसकी बहन का लंबे समय से ब्रेनवॉश किया जा रहा था। भाई ने तहरीर में बताया कि एक बार ये लड़कियाँ उसकी बहन को रेस्टोरेंट ले गईं और खाने में कुछ नशीला पदार्थ मिला दिया।
इसके बाद से छात्रा का सिर भारी रहने लगा और उसने घर वालों की बात मानना बंद कर दिया। आरोप है कि ये पाँचों मुस्लिम लड़कियाँ छात्रा को बार-बार इस्लाम कबूल करने के लिए उकसाती थीं और उसके मन में हिंदू धर्म के प्रति नफरत पैदा करने की कोशिश कर रही थीं।
हिंदू छात्रा के भाई ने आशंका जताई है कि इस पूरी घटना के पीछे कोई गहरा खेल है। उसने पुलिस को बताया कि कोई इस्लामिक संगठन इन मुस्लिम छात्राओं को मोहरा बनाकर हिंदू लड़कियों के धर्मांतरण की मुहिम चला रहा है।
पीड़िता के भाई का कहना है कि जब उसे शक हुआ तो उसने एक साधु को भी दिखाया, जिसने बताया कि लड़की पर ‘कुछ करा’ दिया गया है। फिलहाल पुलिस थावला गाँव और आसपास की रहने वाली इन 5 आरोपित छात्राओं से पूछताछ की तैयारी कर रही है।
FIR की कॉपी में क्या है?
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, बिलारी थाने में दर्ज शिकायत में 5 मुस्लिम लड़कियों को नामजद किया गया है। FIR में लिखा है कि मुस्लिम लड़कियों ने छात्रा को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया और इस पूरे मामले में एक राजनीतिक या सोची-समझी साजिश की बू आ रही है।
FIR की कॉपी में पीड़िता के भाई की शिकायत
हिंदू संगठनों में उबाल, पुलिस बोली- जाँच जारी है
इस घटना के बाद इलाके के हिंदू संगठनों में भारी गुस्सा है और उन्होंने आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है। एसपी ग्रामीण कुंवर आकाश ने बताया कि भाई की तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। CCTV और अन्य सबूतों को जुटाया जा रहा है, जो भी तथ्य सामने आएँगे उसके आधार पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
भारतीय अंतरिक्ष अन्वेषण का इतिहास हमेशा से गुजरात से जुड़ा रहा है। अहमदाबाद की धरती से डॉ विक्रम साराभाई का जो सपना था, वह आज साणंद की खोराज में साकार हो रहा है। अब तक उपग्रह निर्माण का कार्य पूरी तरह से सरकारी संगठन इसरो की जिम्मेदारी थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियानों के तहत अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोल दिया गया है।
इस क्रांति का केंद्र वर्तमान में गुजरात का साणंद है। साणंद में देश के पहले एकीकृत निजी उपग्रह निर्माण संयंत्र की आधारशिला रखी गई है। अजीस्ता स्पेस ने भारत की महत्वाकांक्षी ‘इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल पेलोड फैक्ट्री’ की आधारशिला रखी है।
यह अत्याधुनिक कारखाना साणंद के खोराज औद्योगिक क्षेत्र में बनाया जाएगा। इस कारखाने की आधारशिला रखकर इसका उद्घाटन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने किया। इस संयंत्र से कई चीजें जुड़ी हैं, जैसे केंद्र सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘मेक इन इंडिया’ और गुजरात सरकार का 2047 तक विकसित गुजरात का लक्ष्य। आज हम इस पूरे संयंत्र और इससे गुजरात और भारत को भविष्य में मिलने वाले लाभों के बारे में चर्चा करेंगे।
भूमि पूजन की तस्वीरें (फोटो साभार: गुजराती जागरण)
यह परियोजना क्या है?
इस परियोजना का मुख्य नाम इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल पेलोड फैक्ट्री है, जिसे कंपनी के आंतरिक संदर्भ में ‘पामनारो’ संयंत्र के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत में निजी क्षेत्र की पहली एकीकृत उपग्रह निर्माण इकाई है, जहाँ उपग्रह का संपूर्ण उत्पादन यानी डिजाइन, इंजीनियरिंग, घटक निर्माण, संयोजन, एकीकरण, परीक्षण और प्रमाणीकरण सभी कार्य एक ही स्थान पर किए जाएंगे।
यह संयंत्र उच्च-रिजॉल्यूशन इमेजिंग, रिमोट सेंसिंग और मल्टीस्पेक्ट्रल कैमरों जैसे उन्नत ऑप्टिकल पेलोड पर ध्यान केंद्रित करेगा, जो कृषि, पर्यावरण, आपदा प्रबंधन और रक्षा जैसे नागरिक क्षेत्रों के लिए उपयोगी हैं। यह संयंत्र अहमदाबाद के साणंद स्थित खोराज औद्योगिक एस्टेट में स्थापित किया जाएगा, जहाँ प्लॉट संख्या K-19 से K-24/1 तक के क्षेत्र में कारखाने का निर्माण किया जाएगा।
From research to end-to-end satellite manufacturing, Gujarat is stepping into a new era of high-tech innovation. This landmark facility reflects our commitment to Make in India, build future-ready capabilities, and empower India’s private space ecosystem.#SpaceTechnology… https://t.co/iesCaleakR
इस संयंत्र की आधारशिला गुजरात के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने 22 जनवरी 2026 को रखी थी। इस अवसर पर संयंत्र के विकास, अवसंरचना और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए गुजरात सरकार के साथ 500 करोड़ रुपए से अधिक के समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए। इन समझौता ज्ञापनों के तहत, भारत के निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए गुजरात सरकार द्वारा भूमि, प्रोत्साहन और सहायता प्रदान की जाएगी।
अजीस्ता विवरण
अजीस्ता स्पेस एक भारत-जर्मन संयुक्त उद्यम है, जिसमें अजीस्ता इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड (भारत, हैदराबाद स्थित) और बर्लिन स्पेस टेक्नोलॉजीज जीएमबीएच (जर्मनी) शामिल हैं। कंपनी के पास पहले से ही अहमदाबाद के साणंद जीआईडीसी, सरखेज-साणंद रोड स्थित प्लॉट नंबर 16 पर एशिया का पहला निजी उपग्रह कारखाना है, जो 30,000 वर्ग फुट के क्लीन रूम, एआईटी (असेंबली, इंटीग्रेशन और टेस्टिंग) लैब और परीक्षण सुविधाओं से सुसज्जित है।
मौजूदा कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 50 उपग्रहों की है, जिसे बढ़ाकर 250 तक किया जा सकता है। पावर सिस्टम, संचार और नियंत्रण इकाइयों जैसे 80% से अधिक उप-प्रणालियों का निर्माण कारखाने के भीतर ही किया जाता है। इससे निर्माण समय में 250 गुना की कमी आती है और लागत में 40 गुना की बचत होती है।
अजीस्ता की फैक्ट्री साणंद में स्थित है। (फोटो साभार: अजीस्ता वेबसाइट)
इस नए संयंत्र का उद्देश्य
यह नया संयंत्र केवल पुर्जों या पेलोड के निर्माण के लिए ही नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर उत्पादन की तैयारी के लिए बनाया गया है। इससे मेगा-कॉन्स्टेलेशन (हजारों उपग्रहों के नेटवर्क, जैसे स्टारलिंक) के लिए त्वरित और सस्ती आपूर्ति संभव हो सकेगी। इस संयंत्र का मुख्य उद्देश्य निजी क्षेत्र द्वारा भारत में पूरी तरह से स्वदेशी उपग्रहों और उन्नत ऑप्टिकल पेलोड का उत्पादन करना है।
यह एक संपूर्ण एकीकृत सुविधा होगी, जहाँ डिजाइन से लेकर अंतिम उत्पादन, परीक्षण और प्रमाणीकरण तक सब कुछ एक ही छत के नीचे किया जाएगा। इस संयंत्र में अत्याधुनिक सुविधाएं होंगी, जैसे उन्नत क्लीन रूम, अंशांकन प्रयोगशालाएं और अनुसंधान एवं विकास केंद्र, जिससे विदेशी आयात पर निर्भरता कम होगी और भारतीय उपग्रह वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे।
अजीस्ता की मुख्य उपलब्धि
कंपनी की सबसे बड़ी उपलब्धि एबीए फर्स्ट रनर (एएफआर) उपग्रह है। यह उपग्रह अजीस्ता बीएसटी एयरोस्पेस का पहला उपग्रह है। यह भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र द्वारा निर्मित पहला उच्च-प्रदर्शन वाला रिमोट सेंसिंग उपग्रह है, जिसका वजन 80 किलोग्राम है और इसे विस्तृत क्षेत्र में मध्यम-रिजॉल्यूशन वाली ऑप्टिकल इमेजिंग के लिए डिजाइन किया गया है।
यह उल्लेखनीय है कि उपग्रह का वजन केवल 80 किलोग्राम है, यानी यह एक बड़े सूटकेस जितना हल्का है। इसका आकार लगभग 60 सेमी x 60 सेमी x 40 सेमी है। इसमें एक विशेष कैमरा लगा है, जो पृथ्वी की तस्वीरें लेता है। यह कैमरा लगभग 550 किलोमीटर ऊपर से तस्वीरें लेता है, जिनमें कार जैसी वस्तुएँ भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। इसे ‘4.6 मीटर रिजॉल्यूशन’ कहा जाता है यानी 4.6 मीटर से छोटी वस्तुएँ भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
एबीए फर्स्ट रनर (एएफआर) उपग्रह (फोटो साभार: अजीस्टा वेबसाइट)
यह कैमरा एक बार में 60 किलोमीटर चौड़ाई तक के भूभाग की तस्वीरें ले सकता है, जिसे ‘वाइड-स्वैथ’ कहा जाता है । यह रंगीन तस्वीरें (लाल, हरे और नीले रंग में) और विशेष प्रकार की तस्वीरें भी ले सकता है, जैसे कि पौधों के स्वास्थ्य का पता लगाने के लिए इन्फ्रारेड तस्वीरें। यह उपग्रह सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा में पृथ्वी की परिक्रमा करता है यानी, यह हर दिन एक ही समय पर एक ही स्थान के ऊपर से गुजरता है, इसलिए तस्वीरें हमेशा एक ही प्रकार के प्रकाश में ली जाती हैं।
इस उपग्रह का उपयोग कृषि में फसलों की स्थिति की निगरानी करने, पानी की आवश्यकता है या नहीं, जंगलों, नदियों, पर्यावरण प्रदूषण, नए निर्माण, सड़कों, बाढ़ की निगरानी करने, भूकंप के समय सहायता की आवश्यकता वाले स्थानों का पता लगाने आदि जैसे कार्यों के लिए किया जा सकता है ।
इस उपग्रह को 13 जून 2023 को अमेरिका से स्पेसएक्स के फाल्कन-9 रॉकेट द्वारा लॉन्च किया गया था। यह एक साझा मिशन था, जिसका अर्थ है कि कई छोटे उपग्रह एक साथ भेजे गए थे। यह अब दो साल से अधिक समय से अंतरिक्ष में कार्यरत है।
इसने हजारों तस्वीरें ली हैं, बड़ी मात्रा में डेटा भेजा है और पृथ्वी के 10% से अधिक हिस्से की तस्वीरें खींची हैं। यह अभी भी अच्छी तरह से काम कर रहा है और अगले तीन वर्षों तक कार्य करने की योजना है।
‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को गति प्रदान करना
गुजरात के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने इस संयंत्र की आधारशिला रखते हुए कहा , “अज़ीस्ता स्पेस की यह सुविधा आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, क्योंकि उपग्रह का संपूर्ण डिज़ाइन, विकास और परीक्षण स्वदेशी तकनीक का उपयोग करते हुए एक ही मंच के अंतर्गत किया जाएगा।”
उन्होंने आगे कहा, “यह परियोजना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक तैयारियों को मजबूत करेगी।” इसका अर्थ यह है कि इस संयंत्र द्वारा निर्मित उपग्रह रक्षा, कृषि, आपदा प्रबंधन और अन्य क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता का निर्माण करेंगे।
साणंद में अजीस्ता बीएसटी द्वारा स्थापित उपग्रह निर्माण इकाई केवल ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियानों के लिए एक परियोजना नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव है। अब तक, भारत सुरक्षा और सीमा निगरानी के लिए अपने अत्याधुनिक उपग्रहों के लिए अक्सर विदेशी प्रौद्योगिकी या घटकों पर निर्भर रहता था।
लेकिन अब स्थिति बदलेगी। इसके अलावा, जब कोई उपग्रह भारत में बनता है, तो उसका डिजाइन और उसके द्वारा भेजा गया डेटा पूरी तरह से भारतीय नियंत्रण में रहता है। सुरक्षा की दृष्टि से यह ‘आत्मनिर्भरता’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, भारत अपनी आवश्यकता के अनुसार तेजी से छोटे उपग्रहों का निर्माण और प्रक्षेपण कर सकेगा, जो पहले संभव नहीं था।
वैश्विक विनिर्माण केंद्र: दुनिया भर की कई कंपनियाँ अब चीन के विकल्प तलाश रही हैं। साणंद स्थित यह संयंत्र अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत को चीन के एक मजबूत विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है। अजीस्ता का संयंत्र प्रति वर्ष 36 उपग्रहों का निर्माण कर सकता है।
इसका अर्थ है कि भारत अब अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का ‘खुदरा विक्रेता’ से ‘थोक विक्रेता’ बन रहा है। ऐसे सफल निजी उद्यमों को देखते हुए, अन्य विदेशी एयरोस्पेस कंपनियां भी भारत में निवेश करने और यहाँ कारखाने स्थापित करने के लिए प्रेरित होंगी।
लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र का विकास: उपग्रह बनाना किसी एक कंपनी का काम नहीं है, इसके लिए हजारों छोटे-छोटे पुर्जों की आवश्यकता होती है। साणंद में संयंत्र की स्थापना से आसपास के सैकड़ों लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को सेंसर, बोल्ट, पैनल और वायरिंग हार्नेस बनाने के ऑर्डर मिलेंगे। गुजरात पहले से ही इंजीनियरिंग और विनिर्माण के क्षेत्र में अग्रणी है। अब यहाँ के उद्योगों को अंतरिक्ष-स्तरीय पुर्जे बनाने का कौशल प्राप्त होगा, जो ‘मेक इन इंडिया’ की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी: एक रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी फिलहाल केवल 2% या 8.4 अरब डॉलर है। भारत सरकार 2033 तक इस हिस्सेदारी को बढ़ाकर 8% से अधिक या 44 अरब डॉलर करना चाहती है । यह संयंत्र इसमें महत्वपूर्ण योगदान देगा। इसके अलावा, इसरो अब गगनयान और आदित्य एल1 जैसे बड़े मिशनों पर ध्यान केंद्रित कर सकेगा, जबकि साणंद जैसी निजी इकाइयाँ वाणिज्यिक उपग्रहों के निर्माण का काम संभालेंगी। यह विभाजन ‘आत्मनिर्भर भारत’ को और बढ़ावा देगा।
प्रतिभा पलायन रोकना: ‘आत्मनिर्भर भारत’ का अर्थ ‘आत्मनिर्भर युवा’ भी है। अब तक भारत के सर्वश्रेष्ठ एयरोस्पेस इंजीनियर अवसरों की तलाश में नासा या स्पेसएक्स जैसी कंपनियों के लिए अमेरिका जाते थे। अब जब भारत की धरती पर, और वह भी गुजरात जैसे राज्य में, विश्व स्तरीय कारखाने मौजूद हैं, तो प्रतिभाशाली युवा भारत में ही रहेंगे और देश के लिए प्रौद्योगिकी का विकास करेंगे।
आयात घटेगा और रोजगार बढ़ेगा: इस संयंत्र में विद्युत प्रणाली, संचार और नियंत्रण इकाइयों जैसे 80% से अधिक उप-प्रणालियाँ भारत में निर्मित होंगी। इससे आयात घटेगा, लागत कम होगी और निर्माण प्रक्रिया तेज होगी। संयंत्र बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार है, जिससे भारत हजारों उपग्रहों के विशाल समूह जैसी परियोजनाओं में अग्रणी भूमिका निभा सकेगा।
यह परियोजना गुजरात को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और उच्च-तकनीकी विनिर्माण में राष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी बनाएगी और इलेक्ट्रॉनिक्स, मैकेनिकल इंजीनियरिंग और रिमोट सेंसिंग जैसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करेगी।
गुजरात: अनुसंधान से लेकर अंतरिक्ष विनिर्माण के वैश्विक केंद्र तक
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गुजरात का अंतरिक्ष से संबंध भारत की स्वतंत्रता के साथ ही शुरू हुआ। 1947 में, डॉ विक्रम साराभाई ने अहमदाबाद में पीआरएल की स्थापना की। इसे ‘भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान का उद्गम स्थल’ कहा जाता है। यहीं से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की प्रारंभिक वैज्ञानिक नींव रखी गई थी। फिर भारतीय वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों के फलस्वरूप, 1969 में इसरो की स्थापना हुई, जिसमें डॉ साराभाई का योगदान प्रमुख था।
इसके अलावा, अहमदाबाद में स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (एसएसी) को इसरो का हृदय माना जाता है। एसएसी रिमोट सेंसिंग, संचार और नेविगेशन पेलोड (उपग्रहों के मुख्य उपकरण) बनाने में विशेषज्ञता रखता है। चंद्रयान-3 मिशन में उपयोग किए गए 11 महत्वपूर्ण उपकरण, जैसे लैंडर कैमरा, अल्टीमीटर और रडार आदि, अहमदाबाद स्थित एसएसी केंद्र में ही तैयार किए गए थे । लैंडिंग साइट के चयन की 80% प्रक्रिया भी यहीं पूरी हुई थी।
अनुसंधान से आगे बढ़ते हुए, गुजरात अब ‘उपग्रह निर्माण’ के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है। अजीस्ता बीटीएस एयरोस्पेस एशिया का पहला निजी कारखाना है जो ‘उपग्रहों का बड़े पैमाने पर उत्पादन’ करने में सक्षम है। इस संयंत्र की क्षमता प्रति सप्ताह 2 उपग्रह या प्रति वर्ष लगभग 100 सूक्ष्म उपग्रहों के निर्माण की है।
सरकार की योजना साणंद को सिर्फ एक कारखाने तक सीमित रखने की नहीं है, बल्कि इसे एक ऐसा केंद्र बनाने की है जहाँ उपग्रह डिजाइन से लेकर परीक्षण तक सब कुछ एक ही स्थान पर किया जा सके। अज़ीस्ता के अलावा, साणंद में अन्य सहायक उद्योगों की स्थापना की प्रक्रिया भी चल रही है।
साणंद का यह क्षेत्र न केवल गुजरात बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए ‘उपग्रह निर्माण की राजधानी’ बनने जा रहा है। सरकार की नीतियों और निजी क्षेत्र के उत्साह को देखते हुए ऐसा लगता है कि अगला दशक ‘गुजरात में निर्मित’ उपग्रहों का दशक होगा।
यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में प्रार्थना आमीन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के तराना कस्बे में सांप्रदायिक तनाव ने हिंसक रूप ले लिया है। गुरुवार (22 जनवरी 2026) शाम को विश्व हिंदू परिषद (VHP) के स्थानीय नेता सोहिल ठाकुर बुंदेला पर जानलेवा हमला हुआ, जिसके बाद शुक्रवार (23 जनवरी 2026) को जुमे की नमाज के बाद उपद्रवियों की भीड़ ने हिंदू बहुल मोहल्लों में घुसकर जमकर उत्पात मचाया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पत्थरबाजी, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाओं में कम से कम 13 बसें, 10 कारें, कई मोटरसाइकिलें क्षतिग्रस्त हुईं, जबकि कई घरों और दुकानों को निशाना बनाया गया। पुलिस ने अब तक 15 से 20 लोगों को गिरफ्तार किया है और स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है, लेकिन इलाके में तनाव बना हुआ है।
VHP नेता पर मुस्लिमों के हमले से मामले की शुरुआत
यह पूरा विवाद गुरुवार (22 जनवरी 2026) की शाम करीब 7:00-7:30 बजे शुरू हुआ। तराना के शुक्ला मोहल्ला में VHP की गौ सेवा प्रकोष्ठ के प्रमुख सोहिल ठाकुर बुंदेला अपने घर के बाहर मंदिर के पास खड़े थे। इसी दौरान मुस्लिम युवतों उन्हें टोका और फिर पीछे से लाठी-डंडों से हमला कर दिया। सोहिल के सिर में गंभीर चोट आई और उन्हें पहले स्थानीय अस्पताल और फिर उज्जैन रेफर किया गया। हमले में करीब छह लोग घायल हुए।
हमले की खबर फैलते ही दोनों पक्षों के लोग सड़कों पर उतर आए। पत्थरबाजी और तोड़फोड़ शुरू हो गई, लेकिन पुलिस ने देर रात तक स्थिति संभाल ली। इस मामले में पुलिस ने FIR दर्ज की और हमले के पाँच नामजद आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। एक मुख्य आरोपित अभी फरार है। उज्जैन एसपी प्रदीप शर्मा ने खुद मोर्चा संभाला और धारा 163 BNSS के तहत निषेधाज्ञा लगा दी गई।
जुमे की नमाज के बाद मुस्लिमों ने सड़कों पर उतर कर की हिंसा
शुक्रवार (23 जनवरी 2026) को खेड़ी मोहल्ला तकिया मस्जिद में जुमे की नमाज के बाद तनाव फिर भड़क उठा। नमाज खत्म होते ही बड़ी संख्या में मुँह पर कपड़ा बाँधे उपद्रवी सड़कों पर उतर आए। मुस्लिमों की भीड़ ने गलियों में पथराव करते हुए गाड़ियों में तोड़फोड़ की वहीं दूसरी ओर बस स्टैंड के पास खड़ी एक बस में आग लगा दी।
इसके बाद भीड़ ने सड़कें जाम कर दीं और हिंदू बहुल इलाकों की ओर बढ़ गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, तलवार, लाठी-डंडे और रॉड से लैस लोग हिंदू मोहल्लों में घुसे। महिलाओं ने आरोप लगाया कि उपद्रवी घरों में घुसने की कोशिश कर रहे थे, पूजा स्थल को निशाना बनाने की धमकी दे रहे थे और गाली-गलौच कर रहे थे।
हिंदू मोहल्लों में जमकर पत्थरबाजी हुई। घरों के शीशे टूट गए, दरवाजे तोड़े गए। बस स्टैंड के पास खड़ी बसों को आग के हवाले कर दिया गया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि पुलिस की मौजूदगी में ही उपद्रवी घरों में तोड़फोड़ कर रहे थे और एक बस को जलाते हुए नजर आ रहे थे। स्थानीय महिलाओं ने बताया कि उपद्रवी मोहल्ले को घेरकर चिल्ला रहे थे और पुलिस पर भी दबाव बना रहे थे।
हिंसा में भारी संपत्ति का नुकसान
कम से कम 13 बसें क्षतिग्रस्त, जिनमें से एक-दो को पूरी तरह आग लगा दी गई।
10 कारें और कई मोटरसाइकिलें तोड़ी-जलाई गईं।
4-6 घरों में तोड़फोड़, शीशे टूटे।
कई दुकानों को निशाना बनाया गया।
एक मंदिर के बाहर पत्थरबाजी की गई, हालाँकि पूजा स्थल को बड़ा नुकसान नहीं हुआ।
पुलिस और प्रशासन की तरफ से कार्रवाई जारी
पुलिस ने तुरंत अतिरिक्त बल तैनात किया। जिले के 5-10 थानों से फोर्स बुलाई गई। ड्रोन से निगरानी की जा रही है और फ्लैग मार्च निकाला गया। CCTV फुटेज और सोशल मीडिया वीडियो की जाँच कर अन्य उपद्रवियों की पहचान की जा रही है।
नामजद दंगाइयों से इतर पुलिस ने सप्पन मिर्जा, ईशान मिर्जा, शादाब उर्फ इडली, सलमान मिर्जा, रिजवान मिर्जा और नावेद के खिलाफ जानलेवा हमले का केस दर्ज किया। इनमें से पाँच को गिरफ्तार कर लिया गया है, एक की तलाश जारी है।
उज्जैन एसपी प्रदीप शर्मा ने कहा, “हमने 15 से 20 लोगों को हिरासत में लिया है। CCTV और वीडियो देखकर अन्य आरोपितों की पहचान हो रही है। सख्त कार्रवाई होगी।” उन्होंने लोगों से अफवाहें न फैलाने और शांति बनाए रखने की अपील की।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दावोस से लौटते ही सख्त निर्देश दिए। उन्होंने कहा, “हिंसा करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। सभी दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।”
VHP और हिंदू संगठनों ने हमले के मुख्य आरोपित की तुरंत गिरफ्तारी और उसके घर पर बुलडोजर एक्शन की माँग की। तराना थाने के बाहर प्रदर्शन भी हुआ।
अभी शनिवार (24 जनवरी 2026) की सुबह तक स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन तनाव बना हुआ है। निषेधाज्ञा लागू है और संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात है। प्रशासन का दावा है कि अफवाहें फैलाने वालों पर भी कार्रवाई होगी। जाँच जारी है और आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं।
उत्तर प्रदेश पुलिस ने शुक्रवार (23 जनवरी 2026) को कोडीन युक्त कफ सिरप तस्करी मामले के मुख्य आरोपित भोला प्रसाद जायसवाल की लगभग 28 करोड़ की संपत्तियों को कुर्क करने की प्रक्रिया शुरू की। यह कार्रवाई कोर्ट के आदेश के बाद की गई।
संपत्ति कुर्क करने की यह कार्रवाई वाराणसी के तीन अलग-अलग स्थानों पर की गई। फिलहाल भोला प्रसाद सोनभद्र जिला जेल में बंद है। संपत्ति कुर्की की कार्रवाई की जानकारी देते हुए सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक (SP) अभिषेक वर्मा ने बताया कि विशेष जाँच टीम (SIT) की जाँच में सामने आया कि भोला प्रसाद एक संगठित आपराधिक गिरोह चला रहा था।
सोनभद्र –
कोडीन कफ सिरप का मामला –
सोनभद्र पुलिस आरोपियों द्वारा अवैध रूप से अर्जित 28 करोड़ पचास लाख की संपत्ति कुर्क कर रही है,कार्रवाई जारी !! pic.twitter.com/dVE8tjH3UF
अवैध कारोबार के जरिए उसने लगभग 28.50 करोड़ की संपत्ति अर्जित की थी। इसके बाद पुलिस ने इन संपत्तियों की पहचान कर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 107 (अपराध से अर्जित संपत्ति की कुर्की, जब्ती या बहाली) के तहत कोर्ट में रिपोर्ट पेश की।
साक्ष्यों पर विचार करते हुए कोर्ट ने गुरुवार (22 जनवरी 2026) को कुर्की का आदेश जारी किया। इसके बाद पुलिस टीम को वाराणसी भेजा गया और संपत्तियों को कुर्क करने की प्रक्रिया शुरू की गई। कुर्क की गई संपत्तियों में वाराणसी स्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय शाखा, इंडियन बैंक में 1,13,93,276 रुपए की दो फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) शामिल हैं।
इसके अलावा 6,89,607 रुपए की राशि वाले दो बैंक खातों को डेबिट फ्रीज किया गया है। इसके साथ ही लगभग 1.22 करोड़ की एक मर्सिडीज-बेंज कार को भी कुर्क किया गया है। फरवरी 2023 में भोला प्रसाद की पत्नी शारदा जायसवाल के नाम से खरीदे गए वाराणसी के दो आवासीय मकान, जिनकी कीमत 3.03 करोड़ है, उन्हें भी जब्त किया गया।
इसके अलावा भेलूपुर इलाके में स्थित लगभग 23 करोड़ की एक इमारत, जिसे भोला प्रसाद ने अपनी पत्नी के नाम पर खरीदा था, उसे भी कुर्क कर लिया गया है।
उत्तर प्रदेश कोडीन कफ सिरप मामला
यह मामला एक संगठित आपराधिक नेटवर्क से जुड़ा है, जो कोडीन युक्त डॉक्टर की पर्ची पर मिलने वाले कफ सिरप का अवैध भंडारण, बिक्री और तस्करी कर रहा था। कोडीन अफीम से बनने वाला एक नशीला पदार्थ है, जिसका उपयोग आमतौर पर कफ सिरप में किया जाता है। अधिक मात्रा में सेवन करने पर इसका दिमाग पर नशे जैसा असर होता है।
लंबे समय तक उपयोग से इसकी लत लग सकती है, जो हेरोइन या अफीम जैसी खतरनाक लत में बदल सकती है। हाल के वर्षों में इसका इस्तेमाल ‘सॉफ्ट ड्रग’ के रूप में बढ़ा है। इन दवाओं को बिना डॉक्टर की पर्ची के बेचना गैरकानूनी है, लेकिन गिरोह फर्जी दस्तावेज और जाली रिकॉर्ड के जरिए भारी मात्रा में स्टॉक दिखाकर इन्हें अवैध रूप से बेच रहा था।
बाद में इन सिरप को शेल कंपनियों के जरिए अलग-अलग राज्यों में और सीमा पार तस्करी की जाती थी। जाँच में यह भी सामने आया कि यह नेटवर्क उत्तर प्रदेश से बाहर कश्मीर, पश्चिम बंगाल और यहाँ तक कि बांग्लादेश तक फैला हुआ था। खुफिया जानकारी के आधार पर यूपी STF ने लखनऊ में छापा मारा, जिससे पूरे रैकेट का खुलासा हुआ।
हालाँकि कोडीन की बिक्री पूरी तरह अवैध नहीं है, लेकिन इसे केवल निर्धारित मात्रा में और लाइसेंस प्राप्त विक्रेताओं द्वारा ही बेचा जा सकता है। यूपी पुलिस के अनुसार, यह गिरोह कोडीन को अवैध रूप से जमा कर नशे के लिए इस्तेमाल होने वाले पदार्थ के रूप में तस्करी कर रहा था।
इस नेटवर्क की जाँच 2024 में शुरू हुई थी। 2025 तक 128 से अधिक FIR दर्ज की गईं, 280 ड्रग लाइसेंस रद्द किए गए, 3.5 लाख से ज्यादा कफ सिरप की शीशियाँ जब्त की गईं और 32 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। यह अवैध कोडीन तस्करी गिरोह लगभग 428 करोड़ का बताया जा रहा है, जो उत्तर प्रदेश के 28 जिलों से लेकर नेपाल, बांग्लादेश, दुबई और पाकिस्तान तक फैला हुआ है।
अक्टूबर 2025 में जाँच और तेज हुई, जब सोनभद्र जिले में एक ट्रक पकड़ा गया। ट्रक में चिप्स के कार्टन लदे हुए थे, लेकिन जाँच करने पर उनमें कोडीन युक्त कफ सिरप की बड़ी खेप निकली। जब्त दवाओं की कीमत लगभग 3 करोड़ आँकी गई। इस मामले में मध्य प्रदेश के तीन तस्करों, हेमंत पाल, बृजमोहन शिवहरे और रामगोपाल धाकड़ को गिरफ्तार किया गया।
जाँच के दौरान शुभम जायसवाल का भी नाम सामने आया, जो मूल रूप से वाराणसी का रहने वाला है और वर्तमान में दुबई में रहता है। नवंबर 2025 में यूपी STF ने लखनऊ के गोमती नगर स्थित विभूति खंड से अमित कुमार सिंह को गिरफ्तार किया। पूछताछ में सिंह ने खुलासा किया कि वह शुभम जायसवाल के इशारे पर इस कोडीन तस्करी नेटवर्क को चला रहा था।
आगे की जाँच में सामने आया कि शुभम जायसवाल, भोला प्रसाद जायसवाल का बेटा है, जिसकी 28 करोड़ की संपत्ति अब कुर्क की जा चुकी है। भोला प्रसाद को कोलकाता एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया था, जब वह यूपी STF की कार्रवाई से बचने के लिए थाईलैंड भागने की कोशिश कर रहा था।
शराब हराम, कोडीन नहीं: वैकल्पिक नशे के रूप में अधिक दाम में भी खरीद रहे मुस्लिम
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला सवाल यह था कि 120 में मिलने वाला कफ सिरप 1500 में क्यों बिक रहा था। इस सवाल का जवाब ‘हलाल’ से जुड़ा बताया जा रहा है।
बांग्लादेश जैसे मुस्लिम बहुल देशों और भारत के उन क्षेत्रों में जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक है, जैसे उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और सिक्किम के कुछ हिस्से, वहाँ इस कफ सिरप का इस्तेमाल वैकल्पिक नशे के रूप में किया जा रहा था।
इस्लाम में शराब को हराम माना जाता है, इसलिए कोडीन युक्त कफ सिरप को कथित तौर पर ‘हलाल’ नशे के विकल्प के रूप में देखा जाने लगा। इसी वजह से जो बोतल कानूनी बाजार में 120 से 160 रुपए में मिलती है, वही अवैध रूप से 1200 से 1500 रुपए में बेची जा रही थी।
यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
उत्तर प्रदेश लंबे समय तक गरीबी और बेरोजगारी की चुनौतियों से जूझता रहा है। 2017 से पहले राज्य की लगभग आधी आबादी बहुआयामी गरीबी से प्रभावित थी। लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार के 8 वर्षों के प्रयासों ने एक ऐतिहासिक बदलाव दर्ज किया है।
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से 2025 के बीच 6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आए हैं। यह उपलब्धि केवल आँकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि योजनाओं, कौशल विकास, लघु उद्यमों और स्टार्टअप्स के संगठित प्रयासों का परिणाम है।
उत्तर प्रदेश दिवस 2026 के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनता के लिए ‘पाती’ लिखी। इसमें राज्य की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश अब भारत के विकास इंजन के रूप में उभर चुका है।
उन्होंने जनता से ‘विकसित उत्तर प्रदेश’ के संकल्प को दोहराने की अपील की। इसी अवसर पर अपनी पाती में सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में उन्होंने बताया कि 2017 से 2025 के बीच 6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आए हैं।
2017 से पहले की स्थिति
2015-16 में उत्तर प्रदेश में बहुआयामी गरीबी दर 37.68 प्रतिशत थी, जो राज्य की लगभग आधी आबादी को प्रभावित करती थी। 1947 से 2017 तक गरीबी उन्मूलन योजनाओं का प्रभाव सीमित रहा, लाभ जरूरतमंदों तक कम पहुँचा।
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 2019-21 तक यह दर घटकर 22.93-22.95% रह गई। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि योजनाओं का असर दिखना शुरू हो गया था।योगी सरकार ने गरीबी उन्मूलन को प्राथमिकता दी। 2017 से 2025 के बीच 5.94 करोड़ लोग पिछले पाँच वर्षों में गरीबी रेखा से ऊपर उठे। अब राज्य ‘जीरो पॉवर्टी’ अभियान चला रहा है, जिसका लक्ष्य शेष गरीबों को भी मुख्यधारा में लाना है।
सुधार वाले प्रमुख जिले
महराजगंज जिले में 29.64 प्रतिशत की सबसे बड़ी कमी दर्ज की गई। गोंडा में 29.55 प्रतिशत, बलरामपुर में 27.90 प्रतिशत कमी आई। कौशाम्बी और खीरी में क्रमशः 25.75 प्रतिशत और 25.23 प्रतिशत सुधार हुआ। SC/ST/OBC समुदायों और ग्रामीण क्षेत्रों में यह बदलाव सबसे स्पष्ट दिखा।
योगी सरकार में गरीबी कम होने के पीछे कई कारण रहे। सबसे पहले लघु उद्यमों का विकास हुआ। छोटे उद्योगों और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा दिया गया। एक जिला एक उत्पाद (ODOP) जैसी योजनाओं ने जिला-स्तरीय क्लस्टर्स बनाए, जिससे रोजगार और निर्यात दोनों में वृद्धि हुई।
दूसरा बड़ा कारण कौशल विकास योजनाएँ रहीं। UPSDM और कौशल सतरंग जैसी योजनाओं ने लाखों युवाओं को रोजगारोन्मुखी कौशल दिए। विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना ने पारंपरिक कारीगरों को प्रशिक्षण और औजारों की सहायता दी।
तीसरा कारण स्टार्टअप्स और उद्यमिता का बढ़ावा रहा। UP स्टार्टअप पॉलिसी 2020 के तहत हजारों स्टार्टअप्स को फंडिंग मिली। स्टार्टअप सीड फंड स्कीम ने नए विचारों को प्रोटोटाइप और इंक्यूबेशन तक पहुँचाया। कौशल विकास मिशन ने बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार योग्य बनाया।
कई प्रमुख योजनाएँ
वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) योजना 2018 में शुरू हुई। प्रत्येक जिले के लिए एक प्रमुख उत्पाद चुना जाता है। क्लस्टर विकास, ब्रांडिंग और मार्केट लिंकेज पर जोर दिया जाता है। इससे 5 लाख नौकरियां सृजित हुईं। 916 उद्यमियों को सहायता मिली, जिससे 10,733 रोजगार बने। महराजगंज जैसे जिलों में 25-30 प्रतिशत MPI कमी इसी से जुड़ी।
प्रत्येक जिले के लिए एक प्रमुख उत्पाद चुनकर क्लस्टर विकसित करती है, जिसमें गुणवत्ता, स्केलेबिलिटी और ब्रांडिंग पर फोकस है। मार्केट लिंकेज प्रदान कर लघु उद्यमियों को बढ़ावा, SC/ST/OBC के लिए टूलकिट और ट्रेनिंग की उपलब्धता मिली। इससे निर्यात और स्थानीय रोजगार बढ़ा।
उत्तर प्रदेश स्किल डेवलपमेंट मिशन (UPSDM) मिशन 2013 से सक्रिय है। 34 सेक्टर्स में 283 कोर्सेज पर मुफ्त प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। इसमें अंग्रेज़ी और कंप्यूटर स्किल्स भी शामिल हैं। इससे लाखों युवा प्रशिक्षित हुए। जीरो पॉवर्टी अभियान में ग्रामीण क्षेत्रों को लाभ मिला। गेनफुल एम्प्लॉयमेंट का लक्ष्य हासिल हुआ।
कौशल सतरंग योजना बेरोजगार युवाओं के लिए है। इस योजना ने युवाओं को स्वरोजगार और नौकरी के अवसर दिए। युवाओं को 7 उप-योजनाओं के माध्यम से ट्रेनिंग दी जाती है। 2.37 लाख युवाओं को लक्ष्य बनाया गया। 30,000 स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन मिला। अप्रेंटिसशिप में ₹2500 स्टाइपेंड उपलब्ध कराया गया। इस योजना के जरिए ट्रेनिंग पार्टनर्स को प्रति प्रशिक्षु ₹20,000 तक भुगतान किया गया।
विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना ने पारंपरिक कारीगरों को मुफ्त प्रशिक्षण और औजारों के लिए ₹10,000 से ₹10 लाख तक सहायता दी। इस योजना में कारीगरों को 10-दिवसीय ट्रेनिंग दी जाती है। टूलकिट के लिए ₹10,000 से ₹10 लाख तक सहायता मिलती है। 1.43 लाख कारीगर लाभान्वित हुए। 66,300 को ₹372 करोड़ लोन वितरित किया गया।इस योजना के जरिए स्वरोजगार से गरीबी कम हुई।
मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान (MYUVA) 2024 में लॉन्च हुई। इसके तहत शिक्षित युवाओं को ₹5 लाख तक ब्याज मुक्त ऋण मिलता है। 1 लाख उद्यमियों का वार्षिक लक्ष्य है। इस योजना में ₹1000 करोड़ का बजट आवंटित किया गया। इसके जरिए MSME को बढ़ावा मिला। इस योजना में शिक्षित युवाओं को ब्याज मुक्त ऋण और माइक्रो एंटरप्राइजेज पर ₹5 लाख तक ग्रांट दी जाती है।
स्टार्टअप सीड फंड स्कीम ने स्टार्टअप्स को ₹5 करोड़ तक फंडिंग, प्रोटोटाइप ग्रांट और पेटेंट सब्सिडी प्रदान की। ये असल में UP स्टार्टअप पॉलिसी 2020 का हिस्सा है। इससे हजारों स्टार्टअप्स लाभान्वित हुए हैं। 16,500 से अधिक डायरेक्ट जॉब्स बने। इनोवेशन से आर्थिक उत्थान हुआ।
उपलब्धि का प्रभाव
ये योजनाएं सामाजिक सुरक्षा के ढाँचे को मजबूत कर रही हैं। गरीबी उन्मूलन केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहा है। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने भी बड़ा योगदान दिया। 1.06 करोड़ परिवारों को ₹12,000 वार्षिक पेंशन मिली। 15 करोड़ लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध कराया गया।
इसके अलावा 1.86 करोड़ परिवारों को उज्ज्वला गैस योजना का लाभ मिला। 4.77 लाख बेटियों की शादियों में सहायता दी गई। लघु उद्यम और स्टार्टअप्स से आर्थिक स्वावलंबन बढ़ा है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश गरीबी उन्मूलन में देश का अग्रणी राज्य बन गया है।
चुनौतियों के साथ क्या है भविष्य की दिशा
हालाँकि योगी सरकार के प्रयासों में मिली उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं, लेकिन साथ ही चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में असमानता अभी भी है। स्वरोजगार को स्थायी बनाने के लिए बाज़ार की कमी है। इसके साथ ही तकनीकी सहयोग की आवश्यकता है।
अपने प्रयासों में सरकार को भविष्य के लिए डिजिटल स्किल्स और नई तकनीकों पर ध्यान देना होगा। इसके अलावा बिहार चुनावों से सीख लेते हुए महिलाओं की भागीदारी हर क्षेत्र में और बढ़ानी होगी।
उत्तर प्रदेश दिवस पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पत्र जनता को प्रेरित करने वाला था। इसमें उन्होंने राज्य की उपलब्धियों का उल्लेख किया और भविष्य के संकल्प को दोहराया। 6 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालना वाकई एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
उत्तर प्रदेश अब गरीबी उन्मूलन में देश का अग्रणी राज्य है और यह उपलब्धि करोड़ों परिवारों के जीवन स्तर में वास्तविक सुधार का प्रतीक है। इसे बनाए रखना अब योगी सरकार के लिए दूर की कौड़ी नहीं होगी।