अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की है कि वाशिंगटन गल्फ रीजन से होकर जाने वाले समुद्री व्यापार के लिए राजनीतिक जोखिम बीमा और आर्थिक सुरक्षा गारंटी देंगे। ये घोषणा पश्चिम एशिया के हालात और ग्लोबल तेल सप्लाई पर हो रहे असर को देखते हुए किया गया है।
"Effective IMMEDIATELY, I have ordered the United States Development Finance Corporation (DFC) to provide, at a very reasonable price, political risk insurance and guarantees for the Financial Security of ALL Maritime Trade… If necessary, the United States Navy will begin… pic.twitter.com/pIJyFwL78j
राष्ट्रपति ट्रंप का यह ऐलान ईरान की उस धमकी के बाद आया है जिसमें उसने होर्मुज स्ट्रेट को पार करने की कोशिश करने वाले जहाजों पर हमला करने की बात कही थी। होर्मुज दुनिया के सबसे अहम चोकपॉइंट्स में से एक है।
इससे पहले इंश्योरेंस कंपनियों ने शिपिंग कंपनियों को नोटिस दिया था कि वे ईरान पर इजराइल-US हमलों को देखते हुए इंश्योरेंस रोक देंगी और प्रीमियम बढ़ा देंगी। नॉर्थस्टैंडर्ड, अमेरिकन क्लब, स्वीडिश क्लब, स्कल्ड, गार्ड और लंदन पी एंड आई क्लब सहित प्रमुख बीमा कंपनियों ने पोत सुरक्षा के बढ़ते खतरों का हवाला देते हुए युद्ध जोखिम बीमा वापस ले लिया था।
ये खतरा इजरायल और अमेरिका की ईरान पर किए गए हमले में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के मारे जाने के बाद बढ़ा। ईरान ने UAE,सऊदी अरब और दूसरे मिडिल ईस्ट के कई देशों पर हमले किए।
DFC समुद्री व्यापार का इंश्योरेंस करेगा
ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में ट्रंप ने कहा कि उन्होंने यूनाइटेड स्टेट्स डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (DFC) को खाड़ी में काम करने वाली शिपिंग लाइनों को तुरंत ‘बहुत सही कीमत’ पर पॉलिटिकल रिस्क इंश्योरेंस देने का निर्देश दिया है।
उन्होंने लिखा, “मैंने तुरंत प्रभाव से यूनाइटेड स्टेट्स डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन को सभी समुद्री व्यापार, खासकर खाड़ी से होकर जाने वाली एनर्जी की फाइनेंशियल सिक्योरिटी के लिए पॉलिटिकल रिस्क इंश्योरेंस और गारंटी देने का आदेश दिया है। यह सभी शिपिंग लाइनों के लिए उपलब्ध होगा।”
इसके अलावा, उन्होंने कहा कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो US नेवी टैंकरों को होर्मुज स्ट्रेट से एस्कॉर्ट करना शुरू कर सकती है। उन्होंने आगे कहा कि अगर जरूरी हुआ, तो यूनाइटेड स्टेट्स नेवी जल्द से जल्द होर्मुज स्ट्रेट से टैंकरों को एस्कॉर्ट करना शुरू कर देगी। चाहे कुछ भी हो, यूनाइटेड स्टेट्स दुनिया में एनर्जी का फ्री फ्लो पक्का करेगा।
होर्मुज स्ट्रेट तेल का अहम रास्ता बना हुआ है
होर्मुज स्ट्रेट, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है, दुनिया के तेल शिपमेंट का लगभग पाँचवाँ हिस्सा हैंडल करता है। ईरान की धमकियों और इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा खाड़ी क्षेत्र, खासकर होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले टैंकरों पर प्रीमियम चार्ज लगाने की वजह से यह समुद्री रास्ता चार दिनों से बंद है।
(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर हालात एक बार फिर बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। इजरायल और अमेरिका की हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने मध्य पूर्व को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। इसके बावजूद ईरान अपने परमाणु ढाँचे को फिर से खड़ा करने की पुकजोर कोशिश में है।
यूँ तो मिडिल ईस्ट में ईरान का परमाणु कार्यक्रम दशकों से तनाव का केंद्र रहा है पर अब ये अब खुलेआम युद्ध की शक्ल ले चुका है। इजरायल और अमेरिका की हालिया स्ट्राइक्स ने नतांज जैसी प्रमुख सुविधाओं को नुकसान पहुँचाया है, लेकिन ईरान का कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
ताजा हालात: न्यूक्लियर फैसिलिटी का क्या हुआ?
ईरान की प्रमुख न्यूक्लियर साइट नतांज पर हाल ही में भारी क्षति हुई है। 1 और 2 मार्च 2026 को लिए गए सैटेलाइट इमेजेस से पता चलता है कि कम्प्लेक्स के अंदर कम से कम दो छोटी बिल्डिंग्स को गंभीर नुकसान पहुँचा, जो एक दिन पहले बिल्कुल सुरक्षित दिख रही थीं।
ईरान के एटॉमिक एनर्जी चीफ मोहम्मद एस्लामी ने संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखकर अमेरिका और इजरायल पर दो हमलों का आरोप लगाया। यह नुकसान जून 2025 के युद्ध के बाद आया, जब इजरायल की ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ और अमेरिका की ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ ने नतांज, इस्फहान और फोर्डो जैसी साइट्स को निशाना बनाया था।
अमेरिका ने दावा किया कि कार्यक्रम ‘ऑब्लिटरेट’ यानी खत्म हो गया, लेकिन सैटेलाइट इमेजेस दिखाते हैं कि ईरान पुनर्निर्माण कर रहा है। फरवरी 2026 में अमेरिका की ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और इजरायल की ‘ऑपरेशन रोअरिंग लायन’ ने फिर से न्यूक्लियर और मिसाइल साइट्स को टारगेट किया।
ईरान में न्यूक्लियर फैसिलिटी में हो रहे काम की सैटेलाइट तस्वीर, साभार- The times of Israel
IAEA का अनुमान है कि ईरान के पास 440 किलो 60% यूटेनियम स्टॉक है, जो 10 बम बना सकता है, लेकिन इसकी लोकेशन अज्ञात है। नतांज ईरान का मुख्य संवर्धन केंद्र था, जहाँ हजारों सेंट्रीफ्यूज लगे थे, लेकिन हमलों के बावजूद IAEA को इंस्पेक्शन में बाधाएँ आ रही हैं। ईरान ने नए अंडरग्राउंड बंकर्स बना लिए हैं, जो हमलों से सुरक्षित हैं।
US-इजरायल की चिंताएँ और बयानबाजी
इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि अगर हमला न होता, तो ईरान का कार्यक्रम ‘महीनों में इम्यून’ हो जाता, क्योंकि वे अंडरग्राउंड बंकर्स बना रहे थे। उन्होंने फॉक्स न्यूज को बताया कि जून 2025 के हमलों के बाद ईरान ने नए साइट्स बनाए, जो मिसाइल और न्यूक्लियर प्रोग्राम को सुरक्षित कर देते। नेतन्याहू ने इसे ‘क्विक एंड डिसाइसिव’ बताया और कहा कि यह रीजिम चेंज यानी ईरान की सत्ता के पतन की स्थितियाँ पैदा करेगा।
अमेरिकी वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने कहा कि ट्रंप का लक्ष्य ईरान का ‘माइंडसेट’ बदलना है, ताकि वे कभी न्यूक्लियर वेपन न बनाएँ। उन्होंने जून 2025 के हमलों को सफल बताया, लेकिन कहा कि नेगोशिएशंस नाकाम रहीं क्योंकि ईरान नहीं माना।
यूएस स्पेशल एन्वॉय स्टीव विटकॉफ ने खुलासा किया कि ईरानी नेगोशिएटर्स ने दावा किया था कि उनके पास 460 किलो 60% एंरिच्ड यूटेनियम है, जो 11 बम बना सकता है। ट्रंप प्रशासन ने इसे रोकने के लिए स्ट्राइक्स किए।
CFR के अनुसार, इजरायल ईरान को एक्जिस्टेंशियल थ्रेट मानता है, क्योंकि न्यूक्लियर ईरान मिडिल ईस्ट को डेस्टेबलाइज करेगा। अमेरिका ने JCPOA से 2018 में बाहर निकलने के बाद सैंक्शंस लगाए, और अब 2026 में ओमान में बातचीत जारी है।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम: शुरुआत से आज तक
1950-1970: ईरान ने अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद से परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम शुरू किया। 1979: ईरानी क्रांति के बाद कार्यक्रम धीमा पड़ा। 2002: नतांज़ और अराक में गुप्त परमाणु स्थलों का खुलासा हुआ। 2015: JCPOA (ईरान परमाणु समझौता) हुआ, जिसमें ईरान ने यूरेनियम संवर्धन सीमित करने का वादा किया। 2018: अमेरिका ने समझौते से बाहर निकलकर कठोर प्रतिबंध लगाए। 2025: इजरायल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु स्थलों पर बमबारी की।
ईरान न्यूक्लियर हथियार क्यों चाहता है?
ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम 1950 के दशक में शाह के समय ‘एटम्स फॉर पीस’ के तहत अमेरिकी मदद से शुरू हुआ था। 1979 की इस्लामिक रेवोल्यूशन के बाद सस्पेंड हुआ, लेकिन 1980 के दशक में हुए ईरान-इराक वॉर में केमिकल अटैक्स के बाद रिवाइव हो गया। ईरान इसे ‘पीसफुल’ बताता है, लेकिन वेस्टर्न एनालिस्ट्स कहते हैं कि यह वेपन रिसर्च है।
इसके पीछे ईरान का मकसद इजरायल के न्यूक्लियर आर्सेनल और अमेरिकी थ्रेट्स के खिलाफ खुद को मजबूत करना है। ईरान के पास मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा बैलिस्टिक मिसाइल आर्सेनल है, जो 2000 किमी तक मार कर सकता है। न्यूक्लियर वेपन से वे रीजनल पावर बनेंगे, प्रॉक्सीज (हिजबुल्लाह, हूती) को स्ट्रॉन्ग करेंगे। IAEA रिपोर्ट्स कहती हैं कि ईरान ने 60% एंरिचमेंट बढ़ाया, जो वेपन्स-ग्रेड (90%) के करीब है।
ईरान के अधिकारी कहते हैं कि ‘कॉर्नर्ड कैट’ होने पर डॉक्ट्रिन चेंज कर सकते हैं। ‘कॉर्नर्ड कैट’ (घिरी हुए बिल्ली) का मतलब है कि जब कोई जीव खतरे में घिर जाता है, तो वह आक्रामक हो जाता है – यानी ईरान भी अस्तित्व पर संकट दिखने पर अपनी नीति बदल सकता है।
अप्रैल 2024 में IRGC के न्यूक्लियर सिक्योरिटी कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अहमद हग्तलाब ने कहा कि अगर इजरायल ईरान की न्यूक्लियर साइट्स पर हमला करता है या धमकी देता है तो ईरान अपना ‘न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन रिवाइज’ (परमाणु नीति संशोधित) कर सकता है।
अप्रैल 2024 के इजरायल पर ड्रोन-मिसाइल हमले के बाद उन्होंने धमकी देते हुए कहा था, “हमारे पास इजरायल की न्यूक्लियर साइट्स की जानकारी है, और जवाबी मिसाइल हमले तैयार हैं।”
इजरायल-अमेरिका क्यों रोकना चाहते हैं?
इजरायल के लिए ईरान एक्जिस्टेंशियल थ्रेट है। नेतन्याहू कहते हैं कि 95% मिडिल ईस्ट की परेशानियाँ ईरान से हैं। न्यूक्लियर ईरान सऊदी, UAE जैसे देशों को आर्म्स रेस में धकेलेगा। इजरायल ने पहले इराक (1981), सीरिया (2007) के रिएक्टर्स बम किए।
अमेरिका ईरान को US इंटरेस्ट्स के खिलाफ मानता है। ट्रंप ने 2018 में JCPOA छोड़ा क्योंकि यह अस्थायी था। 10-15 साल बाद खत्म हो जाता, एंरिचमेंट फिर शुरू हो जाता।
ट्रंप इसे कमजोर मानते थे, इसलिए अधिक से अधिक सैंक्शंस लगाए। उनका कहना था कि नई डील ‘इंडेफिनिट’ यानी हमेशा के लिए होनी चाहिए। उनका लक्ष्य ये है कि कोई न्यूक्लियर वेपन नहीं हो, मिसाइल प्रोग्राम खत्म किया जाए और प्रॉक्सी सपोर्ट मिलना बंद हो।
ट्रंप के स्पेशल एन्वॉय स्टीव विटकॉफ ने कहा कि ईरान ने ‘इनएलियनेबल राइट’ माँगी, लेकिन US ने कहा कि हम रोकेंगे। रीजिम चेंज यानी सत्ता में बदलाव से पीस डील्स होंगी। रीजिम चेंद को लेकर ईरान में लंबे समय से विरोध प्रदर्शन होते आए हैं। इस दौरान खामेनेई ने हजारों लोगों को मरवा दिया।
ट्रंप ने जनवरी 2026 में इसे लेकर खामेनेई को चेतावनी भी दी थी कि ईरान प्रोटेस्टर्स की हत्या बंद करे, वरना मिलिट्री एक्शन लिया जाएगा।
क्या है ईरान का न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन
ईरान का न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन सरल शब्दों में यही कहता है कि ईरान परमाणु बम या हथियार कभी नहीं बनाएगा। यह खामेनेई के फतवे पर टिका है, जो इस्लामिक नियमों से आता है। ईरान का दावा है कि उसका प्रोग्राम बिजली और मेडिकल के लिए है। NPT संधि में शामिल होने से उन्हें यूरेनियम संवर्धन (3-5%) का अधिकार है। लेकिन वे इसमें 60% तक पहुँच गए, जो बम के करीब (90%) है।
ईरान ने न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (NPT) पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन 2015 के JCPOA (संयुक्त व्यापक कार्य योजना) समझौते के बाद उसने कई उल्लंघन किए हैं। IAEA (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) का कहना है कि ईरान ने पर्छिन और लाविसान-शियन साइट्स जैसी जगहों पर गुप्त अनुसंधान किया है।
डॉक्ट्रिन के अनुसार ईरान का कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण ऊर्जा उत्पादन के लिए है, लेकिन 60% तक यूरेनियम संवर्धन (सिविल उपयोग के लिए सामान्यतः 3-5% पर्याप्त) ने संदेह पैदा कर दिया है।
हालिया बदलाव के संकेत मिले हैं, जहाँ ईरानी अधिकारी कहते हैं कि बाहरी खतरों की स्थिति में डॉक्ट्रिन में परिवर्तन संभव है। खामेनेई के सलाहकार कमल खर्राजी ने कहा है कि यदि ईरान के अस्तित्व पर खतरा आया तो सैन्य डॉक्ट्रिन बदल दी जाएगी। उन्होंने दावा किया कि अनुमति मिलने पर ईरान एक हफ्ते में ही परमाणु परीक्षण कर सकता है।
खामेनेई के ‘परमाणु फतवा’ की सच्चाई क्या है?
खामेनेई का फतवा ईरान द्वारा दुनिया को परमाणु हथियारों को ‘हराम’ यानी इस्लामिक नियमों में निषिद्ध के तौर पर बताकर दुनिया भर में प्रचारित किया गया, लेकिन असल में यह एक फर्जी नैरेटिव है।
अटलांटिक काउंसिल के विश्लेषण के अनुसार, 2004 में तत्कालीन न्यूक्लियर नेगोशिएटर हसन रूहानी ने यूरोपीय देशों को बताया कि खामेनेई ने फतवा जारी किया है, जो NPT से ज्यादा मजबूत है।
2003 में इराक इनवेजन के बाद खामेनेई ने कहा, ‘हम बॉम्ब नहीं चाहते।’ 2004 में रूहानी ने EU को बताया कि फतवा है। लेकिन खामेनेई ने कभी लिखित फतवा नहीं जारी किया।
उनके भाषणों में भी ‘उपयोग’ को हराम कहा गया, प्रोडक्शन या स्टोरेज पर कोई बात नहीं की गई।उनकी वेबसाइट पर 85 बयानों में सिर्फ उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
यह नैरेटिव 2003 इराक इनवेजन के बाद शुरू हुआ, जब ईरान ने अपना अस्तित्व बचाने के लिए इसे इस्तेमाल किया। अब अगर बात करें शिया लॉ की तो शिया कानून में फतवा स्थायी नहीं बल्कि रिवर्सिबल (बदलने योग्य) है, जैसे 1890s टोबैको फतवा। अधिकारी जैसे अली अली (2021) ने कहा: “कॉर्नर्ड कैट अलग व्यवहार करेगी।”
शिया लॉ में फतवा रिवर्सिबल है। अलवी ने कहा, ‘कॉर्नर्ड कैट अलग बिहेव करेगी।’ साइंटिस्ट्स कहते हैं कि खामेनेई कल स्टांस चेंज कर सकते हैं। यह पॉलिटिकल टूल है, जैसे 1890 के दशक में जारी हुआ तंबाकू फतवा।
तंबाकू फतवा की कहानी ऐसी है कि काजर सत्ता में नासिर अल-दीन शाह ने 1890 में ब्रिटेन को तंबाकू व्यापार का एकाधिकार दे दिया। इसके बाद धर्मगुरु मिर्जा हसन शिराजी ने दिसंबर 1891 में फतवा जारी किया, “तंबाकू का उपयोग इमाम महदी के खिलाफ युद्ध है।” इसके बाद लाखों ईरानियों ने तंबाकू पीना बंद कर दिया।
परिणाम में ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई और जनवरी 1892 में फतवा वापस ले लिया गया और फिर धूम्रपान वापस शुरू हो गया। खामेनेई के न्यूक्लियर फतवे को इसी तरह ‘रिवर्सिबल’ बताया जाता है।
ईरान न्यूक्लियर प्रोग्राम की पूरी कहानी
ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1957 में अमेरिका की मदद से शुरू हुआ था, जब शाह के समय ‘एटम्स फॉर पीस’ योजना के तहत सहयोग हुआ। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद यह कार्यक्रम निलंबित हो गया, लेकिन 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान इसे पुनर्जनन मिला। 2000 के दशक में नतांज और फोर्डो जैसी गुप्त साइटों का खुलासा होने पर IAEA ने सवाल उठाए।
2015 में JCPOA समझौते से यूरेनियम संवर्धन सीमित (3.67%) हुआ और IAEA निरीक्षण बढ़े। 2018 में ट्रंप ने इससे बाहर निकल गए और कड़े प्रतिबंध लगाए। इसके जवाब में ईरान ने ब्रेकआउट टाइम (बम बनाने की अवधि) कम कर दिया।
2024 में ईरान ने इजरायल पर सीधा हमला किया। जून 2025 में इजरायल-अमेरिका ने नतांज, इस्फहान पर स्ट्राइक्स किए, और IAEA ने नवंबर 2024 में 182 किलो 60% संवर्धित यूरेनियम का अनुमान लगाया। फरवरी 2026 में फिर हमले हुए।
इस कार्यक्रम ने मिडिल ईस्ट को युद्ध के कगार पर ला खड़ा कर दिया। इजरायल-ईरान के बीच टकराव अब बढ़ गया है और प्रॉक्सी वॉर तेज हुए हैं। सऊदी अरब ने कहा है कि ईरान को हथियार मिले तो हमें भी बनाने होंगे। सबसे चिंताजनक बात ये है कि IAEA को ईरान के स्टॉक की जगहों का पता नहीं है जो सबसे बड़ा खतरा है।
war on the rocks का फरवरी 2026 का एक लेख कहता है कि ईरान में सैन्य हमले न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर (सेंट्रीफ्यूज, प्लांट्स) को नष्ट कर सकते हैं, लेकिन कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकते। इसके कई कारण हैं।
ईरान के पास अब भी यूरेनियम का बड़ा स्टोरेज है, जिसे IAEA अब तक खत्म नहीं कर पाया है। ईरान ने नतांज के मलबे पर ही नए अंडरग्राउंड बंकर्स बनाए। ईरान के 1000+ न्यूक्लियर वैज्ञानिक कहीं भी नए प्लांट्स बना सकते हैं।
मिडिल ईस्ट का क्या है भविष्य: रीजिम चेंज या आर्म्स रेस?
ईरान के न्यूक्लियर संकट को लेकर भविष्य देखा जाए तो दो मुख्य रास्ते दिख रहे हैं। पहला, या तो रीजिम चेंज हो यानी ईरानी सरकार का पतन होगा और या फिर मिडिल ईस्ट में न्यूक्लियर आर्म्स रेस शुरू होगी। इसमें देशों के बीच हथियारों की होड़ लगेगी और स्थिति और बदतर होती चली जाएगी।
हालिया इजरायल-अमेरिकी स्ट्राइक्स ने ईरान के न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर को काफी नुकसान पहुँचाया है, लेकिन संवर्धित यूरेनियम का मटेरियल और न्यूक्लियर एक्सपर्ट्स अभी भी ईरान के पास बरकरार है।
इसके अलावा ओमान में चल रही डिप्लोमेटिक टॉक्स फेल हो चुकी हैं, जिससे अब पूरी तरह से क्षेत्रीय युद्ध की आशंका बढ़ गई है। ईरान IAEA निरीक्षण के बिना ही अपने कार्यक्रम का पुनर्निर्माण करेगा। इके कारण ये मिडिल ईस्ट में और अधिक असुरक्षा का मैहौल पैदा करेगा।
दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप का रीजिम चेंज का आह्वान इराक (2003) और लीबिया (2011) की तरह जोखिम भरा हो सकता है, जहाँ सरकार गिरने से अराजकता फैल गई। इससे मिडिल ईस्ट में न्यूक्लियर आर्म्स रेस का खतरा मंडरा रहा है, जहां सऊदी अरब जैसे देश भी हथियार बनाने पर उतर आएँगे।
बात 28 फरवरी 1757 की है। होली के त्यौहार में डूबे मथुरा-वृंदावन में हर तरह उल्लास का माहौल था। लोग खुशी में झूम रहे थे। लेकिन अफगान शासक अहमदशाह अब्दाली की नजर मथुरा-वृंदावन और आसपास के इलाके को लग गई थी। उसने अपनी सेना की एक टुकड़ी मथुरा-वृंदावन की तरफ भेजा। इसका नेतृत्व सरदार जहान खान कर रहा था।
इसकीौ जानकारी मिलते ही जाट राजकुमार जवाहर सिंह करीब 5000 योद्धाओं के साथ मथुरा की सीमा पर खड़े थे। मथुरा में आक्रांताओं को घुसने नहीं देने के लिए उन्होंने अहमद शाह अब्दाली की सेना के साथ 9 घंटे तक संघर्ष किया। इस दौरान उनके ज्यादातर सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इसके बाद मथुरा-वृंदावन में जमकर मारकाट मची। होली मनाने आए हजारों भक्तों को काट डाला गया। सड़कें खून से लाल हो गई।
Hindu Genocide of 1757 during Holi
28 Feb 1757. Jat prince Jawahar Singh with 5000 men offered resistance against Ahmad Shah Abdali's forces near Mathura fr 9 hrs, but in vain. What followed was genocide of 1000s of devotees who assembled in Mathura/Vrindavan 2 celebrate Holi 👇 pic.twitter.com/1i9pGZgV8o
सरदार खान ने आम लोगों और तीर्थयात्रियों की हत्या कर उसकी खोपड़ी इकट्ठा करने का आदेश अपने आदमियों को दिया था, क्योंकि अहमदशाह अब्दाली ने उसे हर सिर पर 5 रुपए ईनाम देने की बात कही थी। जाहिर है बड़े पैमाने पर लोगों का कत्लेआम कर खोपड़ी जमा किए जा रहे थे।
अब्दाली ने आदेश दिया था, “जाट की सीमाओं में जाओ और उसके कब्जे वाले हर शहर और जिले को लूटो और तबाह मचा दो। मथुरा-वृंदावन हिंदुओं की पवित्र जगह है। वहाँ इतना कत्लेआम मचाओ कि लोग हजारों सालों तक याद रखें। उस राज्य में कुछ भी मत छोड़ना। यहाँ से लेकर अकबराबाद (आगरा) तक कुछ भी बचना नहीं चाहिए।”
अहमदशाह अब्दाली ने ये भी कहा था कि वे जहाँ भी जाएँ, बारूद और तलवार साथ रखें। जो भी लूट का माल उन्हें मिले, वह ले लें। हर कोई जो काफिरों के सिर काटकर लाए, उसे सेनापति के तंबू के सामने फेंक दे। सबका हिसाब-किताब लगा कर सरकारी फंड से हर सिर के लिए पाँच रुपये दिए जाएँगे।
1 मार्च की सुबह-सुबह अफगान सेनापति सरदार जहान खान शहर में आया। उसने देखा कि शहर को बचाने के लिए न तो कहीं खाई खोदी गई थी और न ही मजबूत दीवार बनाई गई थी। मथुरा में बस भगवान कृष्ण के भक्त, उनकी पूजा में लीन पुजारी और तीर्थयात्री थे। होली के रंग में खून का रंग भी शामिल हो चुका था। सरदार जहान खान को अपने बादशाह अब्दाली को खुश करने का इससे अच्छा मौका नहीं मिल सकता था। उसने शहर में जो दिख रहा था, उसे मारना शुरू किया और लूटपाट करने लगा।
28 फरवरी को उसका जिस तरह बहादुरी से जाटों ने मुकाबला किया था, उसका गुस्सा भी था। इसलिए किसी पर भी रहम न करने का आदेश उसने अपनी सेना को दिया। हिंदुओं के खून से पूरा इलाका लहुलुहान हो गया। खून की नदियाँ सड़कों पर बह गई। शहर को लूटने और कत्लेआम से भी जब उसका मन नहीं भरा, तो उसने शहर में आग लगा दी। शहर में जहाँ भी भगवान की मूर्तियाँ दिखीं, उन्हें भारी हथियार जैसे- कुल्हाड़ी से मार-मार कर टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए।
बच्चों को मार कर उन्हें पोलो बॉल की तरह एक तरफ से दूसरी तरफ फेंका जा रहा था। महिलाओं को अपनी इज्जत बचाने के लिए जल समाधि लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। जो दिखी उनकी आबरू लूट ली गई और मार डाला। अमीर लोगों की संपत्ति लूटने के बाद खूबसूरत हिन्दू महिलाओं को बंधक बना कर अब्दाली का सेनापति साथ ले गया।
यमुना किनारे झोपड़ी में रहने वाले कृष्ण भक्तों को भी नहीं छोड़ा। बैरागी और संन्यासी साधुओं को उनकी झोपड़ियों में काट दिया गया। इस दौरान हर झोपड़ी में ‘एक कटा हुआ सिर रखा था जिसके मुँह पर मरी हुई गाय का सिर लगा था और उसके गले में रस्सी बंधी थी। मुस्लिम जौहरी के बयान के मुताबिक, मथुरा में इतनी तबाही हुई थी कि सात दिनों तक यमुना का पानी खून जैसा लाल बहता रहा और फिर पीला हो गया।
एक दिन तक जमकर उत्पात मचा कर सरदार जहान खान उसी रात मथुरा से चला गया। उसके कुछ सैनिक नजीब उद दौला के नेतृत्व में वहाँ तीन दिन तक रुका रहा। इस दौरान जो कुछ लोग बच गए थे, उन्हें मार डाला और घर से मंदिर तक हर जगह घुस कर हर कोने में बचे दौलत को लूट कर ले गया।
वृंदावन में नरसंहार
सरदार जहान खान मथुरा के बाद वृंदावन पहुँचा। मथुरा से सात मील उत्तर में वृंदावन को भी जमकर लूटा। लोगों का कत्लेआम किया और लोगों को लूटा। समीन के संस्मरणों के अनुसार, ‘जहाँ भी देखो, मारे गए लोगों के ढेर लगे हुए थे, बहुत सारी लाशें पड़ी थी। हर तरफ खून ही खून था।
रास्ते पर इतना खून था कि रास्ता पहचानना मुश्किल हो रहा था। एक जगह पर करीब 2 सौ मरे हुए बच्चों को ढेर कर दिया गया था। किसी भी लाश का सिर नहीं था, क्योंकि सिर तो अब्दाली की सेना अपने साथ ले गई थी। हर तरफ सिर्फ बदबू फैली हुई थी।
नागा साधुओं ने गोकुल में नहीं घुसने दिया
अब्दाली की सेना फिर गोकुल की ओर कूच की। अब्दाली ने शहर से छह मील दक्षिण-पूर्व में महाबन में डेरा डाला। यहाँ से उसने गोकुल को लूटने के लिए एक सेना भेजी, जो उनके कैंप से करीब दो मील दूर था। वहाँ नागा साधुओं ने मंदिर और आम लोगों की रक्षा की।
अब्दाली की सेना के खिलाफ भीषण युद्ध हुआ और नागा साधुओं ने वीरता से लड़ते हुए अब्दाली की फौज को परास्त किया। इस दौरान 2000 से ज्यादा नागा साधु वीरगति को प्राप्त हुए। बंगाल के वकील जुगल किशोर, जो उस समय शाह के कैंप में थे, ने उन्हें बताया कि गोकुल सिर्फ नंगे वैरागियों का आश्रम है और वहाँ ज्यादा पैसा नहीं है। इसलिए शाह ने अपनी टुकड़ी वापस बुला ली और गोकुल बच गया।
साधुओं और जाटों की वीरता इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। धर्म और मातृभूमि की रक्षा करते हुए हजारों वीरों ने होली के दिन अपनी जान देश को समर्पित किया।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने पक्षकारों के बीच आपसी समझौता होने के बाद हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में POCSO एक्ट 2012 के तहत दर्ज FIR को रद्द कर दिया है। इस फैसले के बाद न्याय, संवेदना और कानून की सख्ती को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इस मामले में मोहन मारुति जाधव पर उनकी नाबालिग भतीजी ने POCSO एक्ट की धारा 8 और 12 के तहत आरोप लगाए थे। साथ ही उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की कुछ धाराओं के तहत भी मामला दर्ज किया गया था।
बाद में पीड़िता ने अदालत में कहा कि अब उसे अपने चाचा से कोई शिकायत नहीं है। उसने यह भी बताया कि उसके चाचा उसे बेटी की तरह रखते हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि यह आरोप एक ‘गलतफहमी’ की वजह से लगाए गए थे। समझौते के तहत आरोपित को 1.5 लाख रुपए जमा करने का निर्देश दिया गया। यह राशि पीड़िता की पढ़ाई के लिए मैकबुक खरीदने के उद्देश्य से तय की गई है।
13 फरवरी 2026 को दिए गए इस फैसले को एक ऐसे बढ़ते रुझान के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें भारतीय अदालतें आपसी समझौते के आधार पर आपराधिक मामलों की कार्यवाही रोक देती हैं, भले ही वे मामले सामान्य तौर पर समझौते योग्य (compoundable) न हों। अब सवाल उठ रहा है कि ऐसे फैसले क्यों होते हैं और सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय इनकी वैधता के बारे में क्या कहते हैं?
कानूनी ढाँचा: CrPC की धारा 482 के तहत केस रद्द करने की शक्ति
ऐसे समझौतों की जड़ में हाई कोर्ट की एक खास कानूनी शक्ति होती है। यह शक्ति दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 482 में दी गई थी, जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 में शामिल किया गया है। इस प्रावधान के तहत हाई कोर्ट को यह अधिकार है कि वह न्याय के हित में या कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए किसी FIR या आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर सकता है।
आमतौर पर कुछ अपराध ऐसे होते हैं जिनमें दोनों पक्ष आपसी समझौता कर सकते हैं। इन्हें ‘समझौता योग्य’ (compoundable) अपराध कहा जाता है और इनका प्रावधान CrPC की धारा 320 में है। लेकिन POCSO या बलात्कार जैसे गंभीर अपराध ‘गैर-समझौता योग्य’ (non-compoundable) माने जाते हैं यानी इन्हें निजी तौर पर सुलझाया नहीं जा सकता। इसके बावजूद हाल के वर्षों में अदालतों ने धारा 482 का इस्तेमाल करते हुए कुछ मामलों में कार्यवाही रद्द की है, खासकर तब जब मामला निजी विवाद का हो और दोनों पक्षों में आपसी समझौता हो चुका हो।
हालाँकि, यह अधिकार असीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि FIR रद्द करना एक असाधारण कदम है और इसे बहुत सावधानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए। ऐसा तभी किया जाना चाहिए जब आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हों या मुकदमा जारी रखने से नुकसान ज्यादा और फायदा कम हो। POCSO जैसे मामलों में अदालतें खास तौर पर दो बातों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं एक तरफ समझौता और दूसरी तरफ बच्चों की सुरक्षा। कई मामलों में अगर पीड़िता बालिग हो चुकी हो और वह खुद समझौते के लिए तैयार हो या आरोपी से शादी कर चुकी हो तो अदालतें कार्यवाही रद्द करने की अनुमति दे देती हैं।
व्यवस्था पर दबाव और व्यावहारिक सोच
देश की अदालतों पर इस समय भारी बोझ है। साल 2026 की शुरुआत तक करीब 5.4 करोड़ मामले लंबित हैं जिनमें से लगभग 70% आपराधिक मामले हैं। दीवानी (सिविल) मामलों में फैसले आने में अक्सर दशकों लग जाते हैं। ऐसे में कई बार पक्षकार ज्यादा दबाव बनाने के लिए विवाद को आपराधिक रंग दे देते हैं। यानी जो मामला शुरू में पारिवारिक या कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा विवाद होता है, वह आगे चलकर ऐसी FIR में बदल जाता है, जिसमें यौन अपराध, मारपीट या धोखाधड़ी जैसे आरोप लगा दिए जाते हैं।
स्थिति और जटिल तब हो जाती है जब पुलिस जाँच में देरी होती है। जाँच लंबी खिंचती है, गवाह मुकर जाते हैं और समय बीतने के साथ सबूत कमजोर हो जाते हैं। ऐसे में दोष साबित करना मुश्किल हो जाता है। इन हालात में जब दोनों पक्ष आपसी समझौता कर लेते हैं तो अदालतें कई बार व्यावहारिक रुख अपनाती हैं। इससे एक तरफ लंबित मामलों का बोझ कम होता है तो दूसरी तरफ अगर पीड़िता आरोपित से शादी कर ले या अपने आरोप वापस ले ले तो सामाजिक शांति की कोशिश होती है।
केस रद्द करने के मार्गदर्शक सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई महत्वपूर्ण फैसलों के जरिए यह साफ किया है कि गैर-समझौता योग्य अपराधों में FIR रद्द करते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। भारत की दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत जो अपराध धारा 320 में शामिल नहीं हैं उन्हें गैर-समझौता योग्य माना जाता है। इन मामलों में राज्य खुद अभियोजन चलाता है क्योंकि इन्हें समाज के खिलाफ अपराध माना जाता है।
साल 1992 के चर्चित मामले ‘हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल’ में सुप्रीम कोर्ट ने FIR रद्द करने के 7 आधार बताए थे। इनमें यह भी शामिल था कि यदि आरोप पहली नजर में बेहद अविश्वसनीय हों या किसी अपराध का खुलासा ही न करते हों, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। इस फैसले ने बेकार और निरर्थक मुकदमों को रोकने के लिए अदालतों को एक आधार दिया।
इसके बाद 2012 के ऐतिहासिक मामले ‘ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य’ में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर समझौते से न्याय सुनिश्चित होता है, तो हाई कोर्ट को यह अधिकार है कि वह गंभीर अपराधों में भी कार्यवाही रद्द कर सकता है बशर्ते उनका स्वरूप मुख्य रूप से निजी या सिविल विवाद से जुड़ा हो। हालाँकि, अदालत ने साफ चेतावनी दी कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध या ऐसे अपराध जो समाज पर व्यापक असर डालते हैं उन्हें वैवाहिक या कारोबारी विवादों की तरह नहीं देखा जा सकता। ऐसे मामलों में FIR रद्द करना बेहद सावधानी और सीमित परिस्थितियों में ही संभव है।
इसके आगे बढ़ते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के मामले ‘नरेंद्र सिंह बनाम पंजाब राज्य’ में यह स्पष्ट किया कि हत्या के प्रयास जैसे गंभीर मामलों में भी किन परिस्थितियों में FIR रद्द की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि फैसला लेते समय 3 बातों पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए अपराध की गंभीरता, समझौते की सच्चाई (क्या वह दबाव में तो नहीं हुआ) और दोष सिद्ध होने की संभावना।
इसके बाद 2017 में ‘पर्बतभाई अहीर बनाम गुजरात राज्य’ में सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया कि समझौते के बावजूद आर्थिक अपराधों या ऐसे मामलों में FIR रद्द नहीं की जानी चाहिए जिनका समाज पर व्यापक असर पड़ता है।
खास तौर पर यौन अपराधों के मामलों में अदालतें बेहद सतर्क रहती हैं क्योंकि ऐसे अपराधों का असर सिर्फ पीड़ित पर ही नहीं, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। 2025 के मामले ‘मधुकर बनाम महाराष्ट्र राज्य’ में SC ने कहा कि बलात्कार से जुड़ी FIR को केवल ‘असाधारण परिस्थितियों’ में ही रद्द किया जा सकता है। यह तभी संभव है जब दोनों पक्षों के बीच स्वेच्छा से समझौता हुआ हो और अदालत को लगे कि मुकदमा जारी रखने में कोई जनहित नहीं है।
हालाँकि, 2024 के मामले ‘रामजी लाल बैरवा बनाम राजस्थान राज्य’ में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ समझौते के आधार पर POCSO की कार्यवाही रद्द करने से साफ इनकार कर दिया था। अदालत ने कहा कि POCSO कानून का मुख्य उद्देश्य बच्चों को शोषण से बचाना है इसलिए केवल आपसी समझौता इस तरह के गंभीर मामलों को खत्म करने का आधार नहीं बन सकता।
FIR रद्द करने और ना करने का पैटर्न
अलग-अलग मामलों में अदालतों का रुख इसी सिद्धांत पर आधारित दिखाई देता है। POCSO मामलों में कई बार FIR तब रद्द की जाती है जब पीड़िता आरोपित से शादी कर चुकी हो और दोनों पारिवारिक जीवन जी रहे हों।
2025 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में कार्यवाही इसलिए समाप्त कर दी गई क्योंकि एक शादीशुदा दंपती को लंबे मुकदमे से परेशान करना उचित नहीं माना गया। इसी तरह 2025 में केरल हाई कोर्ट ने दो POCSO मामलों को समझौते के बाद इसलिए रद्द कर दिया क्योंकि दोनों मामलों में शादी हो चुकी थी। 2023 में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी एक POCSO एफआईआर को खत्म कर दिया था, जहाँ दोनों पक्ष नाबालिग थे और आपसी समझौता हो चुका था।
हालाँकि, हर मामले में राहत नहीं मिलती। 2026 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने समझौते के बावजूद बलात्कार से जुड़े POCSO मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि पीड़िता का शरीर ‘उसका मंदिर’ है और ऐसा अपराध सामाजिक अपराध है।
इसी तरह 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एक शिक्षक के खिलाफ दर्ज POCSO एफआईआर को बहाल कर दिया। इससे पहले हाई कोर्ट ने पारिवारिक समझौते के आधार पर उसे रद्द कर दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए उस आदेश को पलट दिया।
निष्कर्ष: न्याय या समझौता?
ऐसे समझौते अदालतों पर बढ़ते बोझ, जजों की कमी और लंबी कानूनी प्रक्रिया के बीच एक व्यावहारिक रास्ता बनकर सामने आते हैं। हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि इससे गंभीर अपराधों के खिलाफ सख्त संदेश कमजोर हो सकता है, खासकर बच्चों से जुड़े मामलों में।
बॉम्बे हाई कोर्ट के मामले में शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता का आदेश पीड़ित-केंद्रित सोच दिखाता है, लेकिन यह सवाल भी उठाता है कि क्या पैसों से सम्मान और न्याय की भरपाई हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि समझौता सार्वजनिक हित से ऊपर नहीं हो सकता। अदालतों को हर मामले में तथ्यों को सावधानी से परखते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि FIR रद्द करना सुविधा नहीं बल्कि न्याय का माध्यम बने।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़े सकते हैं)
भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और गाँवों की रीढ़ हैं हमारी महिलाएँ। आज भी, जब देश तेजी से विकास के पथ पर अग्रसर है, ग्रामीण भारत की महिलाएँ आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्तिकरण की राह में अनेक चुनौतियों का सामना कर रही हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में ‘पहल’ संस्थान द्वारा शुरू की गई एक पहल न केवल इन महिलाओं के जीवन में बदलाव लाने वाली है बल्कि यह जनसेवा और राजनीति के आध्यात्मिकीकरण का एक सशक्त उदाहरण भी प्रस्तुत करती है।
जब 100 स्वयं सहायता समूहों की महिलाएँ ‘रामजी का सोहर’ गाते हुए ‘रामजी के पेड़े’ का निर्माण करेंगी, तो यह एक व्यवसाय होने के साथ-साथ आस्था, संस्कृति, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक एकता का एक अनूठा सम्मिश्रण भी होगा।
‘पहल’ संस्थान का यह प्रयास सचमुच एक सार्थक पहल है। बस्ती के 100 स्वयं सहायता समूहों को 1-1 लाख रुपए की आर्थिक सहायता (जो 25-25 हजार की चार किश्तों में दी जाएगी) प्रदान करना एक साहसिक और दूरदर्शितापूर्ण कदम है। यह राशि इन महिलाओं के हाथों में एक ऐसा उपकरण है, जिससे वे न केवल अपनी बल्कि अपने परिवार और समाज की तकदीर बदल सकती हैं। यह पूँजी उन्हें एक ऐसे उद्यम से जोड़ती है जिसकी जड़ें भारतीय संस्कृति और आस्था में गहराई तक धँसी हुई हैं।
‘रामजी के पेड़े’ का निर्माण इस परियोजना की आत्मा है। यह कोई साधारण मिठाई नहीं है। यह प्रसाद है, जो अयोध्या के भव्य राम मंदिर में विराजमान भगवान श्रीराम को चढ़ाया जाएगा। जब महिलाएँ इन पेड़ों को बनाएँगी तो उस प्रक्रिया में वो ‘रामजी का सोहर’ (लोकगीत) गाएँगी। ‘रामजी का सोहर’ गीत केवल एक लोकगीत नहीं है बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत दस्तावेज है।
जब ये महिलाएँ काम करते हुए इन गीतों को गाएँगी तो वे न केवल अपनी परंपराओं को संरक्षित करेंगी बल्कि उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का काम भी करेंगी। यह सांस्कृतिक पुनरुत्थान का एक सुंदर उदाहरण है, जहाँ लोक कला और आधुनिक उद्यम साथ-साथ चलते हैं। यह परिदृश्य हमें उस भारत की याद दिलाता है, जहाँ हर काम में ईश्वर का स्मरण होता था, हर उत्सव में सामूहिकता होती थी और हर उपज में आस्था का समावेश होता था।
देश-विदेश से राम भक्तों द्वारा इस प्रसाद के लिए आने वाले ऑर्डर इस बात के प्रमाण होंगे कि आस्था की कोई सीमा नहीं होती और न ही उसकी कोई कीमत होती है। यह माँग इन महिलाओं के उत्पाद को एक वैश्विक पहचान देगी और उन्हें आर्थिक रूप से इतना सशक्त बनाएगी कि वे आत्मनिर्भर भारत के सच्चे निर्माता साबित होंगी।
इस परियोजना के केंद्र में जनसेवा की भावना निहित है। यह कोई दान या हैंडआउट नहीं है बल्कि एक स्थायी आजीविका का माध्यम है। यह महिलाओं को उनके पैरों पर खड़ा होने का अवसर देता है। वे अब केवल परिवार की आर्थिक स्थिति में सहायक नहीं रहेंगी बल्कि वे स्वयं आय के मुख्य स्रोतों में से एक बन जाएँगी।इससे उनके परिवारों का जीवन स्तर तो ऊपर उठेगा ही, साथ ही समाज में उनकी स्थिति और सम्मान में भी अभूतपूर्व वृद्धि होगी।
एक आत्मनिर्भर महिला न केवल अपने बच्चों की शिक्षा का खर्च उठा सकती है बल्कि वह उनके स्वास्थ्य और पोषण पर भी ध्यान दे सकती है। इस तरह, यह एकल पहल सामाजिक विकास के कई आयामों को एक साथ छूती है।
इस पूरी अवधारणा में ‘राजनीति का आध्यात्मिकीकरण’ का गूढ़ दर्शन छिपा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राजनीति में नैतिकता और अध्यात्म के समावेश पर बल दिया है। आज के संदर्भ में, राजनीति का आध्यात्मिकीकरण का अर्थ है, विकास की राजनीति को आस्था, संस्कृति और सामुदायिक मूल्यों से जोड़ना। यह केवल वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर, जनता की भावनाओं और आस्था को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने का प्रयास है।
यहाँ ‘राम’ केवल एक देवता नहीं हैं बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं। उनसे जुड़कर यह आर्थिक गतिविधि एक पवित्र आयाम ग्रहण कर लेती है। जब राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक संगठन मिलकर ऐसी परियोजनाओं को बढ़ावा देते हैं, जिनका सीधा संबंध लोगों की आस्था से हो, तो वह जनसेवा महज एक सरकारी योजना न रहकर एक जनांदोलन का रूप ले लेती है।
यह परियोजना दर्शाती है कि कैसे एक धार्मिक स्थल (राम मंदिर) और धार्मिक आयोजन को आर्थिक गतिविधियों के केंद्र में रखा जा सकता है। इससे एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार होता है, जहाँ आस्था उत्पादन को बढ़ावा देती है, उत्पादन रोजगार पैदा करता है और रोजगार समृद्धि लाता है। यह राजनीति का वह रूप है जो विकास को धार्मिक आस्था से जोड़कर उसे अधिक समावेशी और प्रभावशाली बनाता है।
बस्ती की यह पहल केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, यह एक विचार है – एक ऐसा विचार जो पूरे देश में दोहराया जा सकता है। यह दर्शाता है कि कैसे आस्था, संस्कृति और आधुनिक अर्थशास्त्र का सम्मिलन समाज के सबसे कमजोर वर्गों को सशक्त बना सकता है।
‘रामजी के पेड़े’ का निर्माण केवल एक मिठाई बनाने की प्रक्रिया नहीं है, यह आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और आध्यात्मिकता का निर्माण है। जनसेवा का यह मॉडल, जो राजनीति के आध्यात्मिकीकरण की अवधारणा पर आधारित है, हमें सिखाता है कि सच्चा विकास वही है जो जनता की आस्था और आकांक्षाओं से जुड़ा हो।
होली नजदीक आने से ठीक पहले एक बार फिर हिंदुओं को बाँटने का खेल शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग खुद को अंबेडकरवादी बताकर खुलेआम कह रहे हैं कि होली उनका त्योहार नहीं है। वीडियो बनाकर समाज के अन्य लोगों से त्योहार से दूर रहने की अपील की जा रही है। माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि बहुजन समाज के लिए होली एक त्योहार नहीं, बल्कि शोक है।
सिर्फ इतना ही नहीं, होलिका दहन की कथा को भी तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की कहानी को अलग रंग देकर लोगों के मन में भ्रम फैलाने की कोशिश हो रही है। ‘होलिका के बलात्कार’ की भी कहानी सुनाई जा रही है। साफ दिख रहा है कि होली से पहले हिंदुओं को बाँटने की साजिश रची जा रही है।
‘मनुवादी विचारधारा वालों ने होलिका का किया बलात्कार’
ऐसे कई वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहे हैं। सबसे पहला वीडियो आँचल गौतम नाम की युवती का है, जो गाँव के लोगों को होलिका दहन के इतिहास के बारे में जानने के लिए कहती है। खुद को अंबेडकरवादी बताते हुए आँचल दावा करती है कि राजा हिरण्यकशिपु उनके समाज के थे और उनकी बहन होलिका के साथ ‘मनुवादी विचारधारा’ के लोगों ने बलात्कार किया था।
“मनुवादियों ने प्रह्लाद को शराबी बना दिया। अपनी शादी से एक दिन पहले, जब होलिका अपने भतीजे प्रह्लाद को भोजन परोसने गई, तो मनुवादियों ने होलिका के साथ बलात्कार किया और उसे जिंदा जला दिया। होली मत मनाओ।”
आँचल गाँव के लोगों को संबोधित करते हुए कहती हैं कि हम सभी लोगों को होली नहीं मनाना चाहिए। वे होलिका की मनगढ़ंत कथा सुनाते हुए कहती है, “एक राजा हिरण्यकशिपु थे हमारे समाज के। उनकी बहन थी होलिका। हेणाकश्यप के पुत्र थे प्रह्लाद। मनुवादी विचारधारा के लोग प्रह्लाद को दारू-शराब पिलाते थे। होलिका प्रह्लाद को बहुत ज्यादा मानती थी।”
वह आगे कहती है, “प्रह्लाद कहीं घूमने गया था, वहाँ उसको शराब पिला दी। उसके पीछे होलिका अपने भतीजे को खाना खिलाने अपने हाथों से गई। वो प्रह्लाद को ढूँढती है, वहाँ मनुवादी विचारधारा के लोग होलिका के साथ रातभर बलात्कार करते हैं। और होलिका को जला देते हैं। और सभी लोग क्या करते है हैप्पी होली।”
इतना ही नहीं वह अपनी कहानी आगे जारी रखते हुए कहती है, “वो सब लोग एक दूसरे को रंग लगाकर जश्न मनाते हैं कि उन्होंने होलिका को मार दिया। और कोई पाप न लगे इसीलिए होली मनाते हैं। तो सोचिए अगर हमारी बहन-बेटी के साथ बलात्कार हो जाएगा तो क्या हम होली मनाएँगे? इसीलिए हम लोगों को होली नहीं मनाना चाहिए।”
अंबेडकरवादियों का होली बॉयकॉट का अभियान
आँचल गौतम की इस वीडियो पर सोशल मीडिया पर मानो अभियान छिड़ गया। एक के बाद एक अंबेडकरवादियों की वीडियो सामने आईं, जिसमें होली न मनाने की अपील की गई। साथ ही होलिका को बहुजन समाज का बताकर उसके जलने का शोक मनाने को कहा गया।
नीचे वीडियो शालू गुप्ता नाम की अंबेडकरवादी कहती हैं, “होली हमारा त्योहार नहीं है। जिंदा स्त्री को जलाकर खुशी मनाने की चली आ रही परंपरा को आँख बंद करके स्वीकार नहीं करना है। क्षमा चाहती हूँ, न ही मैं होली की बधाई किसी को दूँगी और न ही लूँगी। जय भीम”
बिहार के एक युवक सुरेंद्र कुमार ने भी कहा, “होलिका बहुजन समाज के लिए काला दिन है। समाज के लोग इतिहास जानें।” वे कहते हैं कि हिंदू धर्म ने कभी बहुजन समाज की महिलाओं का सम्मान नहीं किया, यह सम्मान उन्हें बाबा भीमराव अंबेडकर से मिला है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर नाच-गाना करना है तो अपने महापुरुषों की जयंती पर करो।
तत्काल प्रभाव से संज्ञान लें
सुरेंद्र कुमार जोकि ( बक्सर बिहार ) का है ने फेसबुक पर होलिका माता के साथ बलात्कार का फर्जी वीडियो/दावा पोस्ट कर हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाई है।
होलिका दहन हिंदू संस्कृति का पवित्र पर्व है, प्रह्लाद की रक्षा का प्रतीक है इसमें बलात्कार जैसी… pic.twitter.com/LO2LKCqAVc
जैसा यहाँ खुद को अंबेडकरवादी बताने वाले लोग होलिका दहन के पीछे का इतिहास और मनगढ़ंत कहानी बनाकर पेश कर रहे हैं। असल में ऐसा कुछ है ही नहीं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, होली बुराई पर अच्छाई की जीत और भगवान की भक्ति की शक्ति के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है। कथा में बताया गया है कि असुर राजा हिरण्यकशिपु चाहता था कि सभी लोग उसी की पूजा करें, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था। इससे क्रोधित होकर उसने प्रह्लाद को मारने की कई कोशिशें कीं।
इसी क्रम में राजा की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। लेकि भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई। इसी घटना की याद में फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है और अगले दिन रंगों वाली होली खेली जाती है, जो प्रह्लाद की जान बचने की खुशी का प्रतीक है।
वहीं होलिका को बहुजन समाज बताने वाले लोग भी जान लें कि होलिका ब्राह्मण स्त्री थी, जिसके पिता महान ऋषि कश्यप थे। ऋषि कश्यप की तीन संतानें थीं- होलिका, हिरण्यकशिपु और हिण्याक्ष। हिंदू शास्त्रों के मुताबिक, तीनों का स्वभाव अत्याचारी और राक्षसी बताया गया है। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपुर का वध भगवान विष्णु ने वराह अवतार और नरसिंह अवतार में किया था। वहीं होलिका भक्त प्रह्लाद को मारने की कोशिश में खुद अग्नि में जलकर मर गई।
यहाँ अंबेडकरवादियों की मनगढ़ंत कहनी पर विराम लगता है। होलिका का न तो बलात्कार हुआ, और न ही किसी न उसे जबरदस्ती आग में जलाया। वही प्रह्लाद को मनुवादियों द्वारा शराबी और जुआरी भी नहीं बनाया गया। अंबेडकरवादियों की कहानी पूरी तरह से मनगढ़ंते है। होली हिंदुओं का त्योहार है और इसे हिंदू धर्म के हर व्यक्ति को खुशी से मनाना चाहिए, क्योंकि यह बुराई पर जीत का प्रतीक है।
अंबेडकरवादियों की मनगढ़ंत कहानी के मायने क्या हैं?
यह पहली बार नहीं है। हर साल होली से पहले कुछ कथित अंबेडकरवादी अपनी बनाई हुई कहानी लेकर सामने आ जाते हैं और कहते हैं कि होली उनका त्योहार नहीं है। वह इतिहास में दलित समाज पर हुए अत्याचार जैसी पुरानी बातें दोहराकर खुद को हिंदुओं से अलग बताने लगते हैं।
ये लोग खुलेआम हिंदू धर्म को बाँटने की साजिश रचते हैं। कम पढ़े-लिखे और भोले लोगों के बीच लंबी-लंबी बातें रखी जाती हैं। भाषणों, वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए उनके मन में भ्रम पैदा किया जाता है। धीरे-धीरे उनके दिमाग में शक और अलगाव का जहर भरा जाता है।
आखिर में नुकसान किसका होता है। उसी समाज का जिसे तोड़ने की कोशिश की जाती है। जहाँ आज देश को हिंदुओं की एकता की जरूरत है, वहाँ ऐसे कुछ लोग नफरत का जहर उगलते हैं और हिंदुओं को बाँटने में लग जाते हैं।
कॉन्ग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद सोनिया गाँधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत को लेकर भारत सरकार पर सवाल उठाते हुए ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में एक लंबा लेख लिखा है। सोनिया गाँधी इस बात से खफा हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुलकर क्यों ईरान के समर्थन में नहीं आ गए। अब इसके बदले में इजरायल-अमेरिका के समर्थन वाले खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों या हमारी विदेश नीति पर इसका क्या असर होगा इसकी सोनिया गाँधी को चिंता नहीं है। वो चाहती हैं कि PM मोदी खामेनेई की मौत की निंदा करें और ईरान के साथ खड़े हों।
"The killing of a sitting head of state in the midst of ongoing negotiations marks a grave rupture in contemporary international relations. Yet, beyond the shock of the event, what stands out equally starkly is New Delhi's silence."
क्या हत्या की निंदा का विदेश नीति पर असर होता है? 15 साल पीछे चलते हैं, 2011 में अरब दुनिया में शुरू हुई क्रांतियों की लहर लीबिया तक पहुँची और गद्दाफी की हिंसक तरीके से हत्या कर दी गई। उस समय कॉन्ग्रेस का शासन था और गद्दाफी से कॉन्ग्रेस की सरकार से दोस्ती थी, 2007 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पत्र भेजकर गद्दाफी को भारत आने का निमंत्रण दिया था। अब हिंसा और हत्या की खबर भारत तक पहुँची तो विदेश मंत्रालय ने इस पर जवाब माँगा गया। सरकार ने क्या गद्दाफी की हत्या पर भीड़ की निंदा की थी?
विदेश मंत्रालय ने कहा था, “कर्नल गद्दाफी की लीबिया के शहर सिरते में मौत हो गई है। लीबिया में चल रहे संघर्ष और वहाँ के लोगों की पीड़ा हमारे लिए चिंता का विषय रही है। हम आशा करते हैं कि लीबिया में जल्द ही शांति और स्थिरता लौटेगी। लीबिया की जनता के साथ भारत के संबंध गहरे और लंबे समय से चले आ रहे हैं। इस समय भारत एक बार फिर यह दोहराता है कि वह लीबिया के लोगों की राजनीतिक परिवर्तन प्रक्रिया और देश के पुनर्निर्माण में हर संभव मदद देने के लिए तैयार है।”
गद्दाफी की हत्या पर विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया
गद्दाफी की मौत के बाद भारत ने हत्या की निंदा करने का रास्ता नहीं चुना था, यह भारत की कमजोरी का रास्ता था या रणनीतिक चुप्पी? PM मोदी के दौर में विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत के हित सबसे ऊपर रखना है। हमने दुनिया के मसलों पर भारत के हितों को सबसे ऊपर रखा है।
भारत के हित सबसे ऊपर: विदेश नीति का भारतीय पक्ष
यह मान लेना सही नहीं है कि किसी घटना की सार्वजनिक निंदा करना ही एक सिद्धांतवादी विदेश नीति का एकमात्र पैमाना है। भारत ने हमेशा संतुलित और सोच-समझकर कूटनीति अपनाई है। रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब यह नहीं होता कि हर मुद्दे पर जोरदार बयान दिया जाए बल्कि इसका मतलब है कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखा जाए।
खासकर जब मामला अमेरिका और इजरायल जैसे देशों से जुड़ा हो और हालात बेहद संवेदनशील हों। भारत का पक्ष हमेशा शांति का पक्ष रहा है। इस युद्ध में भी शांति ने सभी पक्षों से शांति की ही अपील की है। रूस-यूक्रेन के युद्ध में भी भारत ने यही नीति अपनाई है। हम अपने हितों को सबसे ऊपर रखेंगे और वैश्विक शांति के लिए जो जरूरी हो वो कदम उठाने से भी परहेज नहीं करेंगे।
हमले के बाद ईरान ने कई खाड़ी देशों को निशाना बनाया है, होटलों से लेकर रिहायशी इलाकों तक पर हमले किए गए हैं। ऐसे में भारत बिना कुछ सोचे समझे ईरान की तरफ जाकर खड़ा हो जाए तो उस देशों में भारतीयों पर क्या असर होगा? क्या खाड़ी देश ईरान के साथ हैं? कूटनीति के फैसले अगर एक झटके में होने लगे तो देश के लिए समस्याएँ ही होंगी।
सोनिया का मकसद सिर्फ वोट बैंक साधना?
सोनिया गाँधी जैसे वरिष्ठ नेता जब सरकार से सवाल उठाते हैं, तो उसका एक राजनीतिक उद्देश्य भी होता है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर सरकार की भाषा जितनी संतुलित होती है, विपक्ष उतना ही उसे ‘चुप्पी’ या ‘झुकाव’ के रूप में दिखाता है। फिलिस्तीन के मुद्दे पर भी यही रणनीति अपनाई गई थी और अब ईरान के मामले में भी वही रुख दिखाई देता है।
भारत में गाँधी, पटेल या बोस के नाम वोट बैंक हो या ना हो लेकिन खामेनेई के नाम का तो है ही, सुप्रीम लीडर की मौत के भारत के अलग-अलग शहरों में दर्जनों जगहों पर हो रहे प्रदर्शन इस बात की गवाही हैं। बड़ी संख्या में भीड़ खामेनेई के लिए सड़कों पर आ रही है। कॉन्ग्रेस और सोनिया गाँधी इसी वोट बैंक को साधने की कोशिश में हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हर अंतरराष्ट्रीय घटना पर सरकार को सार्वजनिक रूप से कठोर बयान देना चाहिए? विदेश नीति भावनाओं से नहीं, हितों से संचालित होती है। पश्चिम एशिया जिसे हम अक्सर मिडिल ईस्ट भी कहते हैं, भारत के लिए केवल विचारधारा मुद्दा नहीं है, वहाँ करोड़ों भारतीय काम करते हैं, भारत की ऊर्जा सुरक्षा जुड़ी है, व्यापारिक और सामरिक हित जुड़े हैं। ऐसे में सरकार का पहला दायित्व बयानबाजी नहीं बल्कि संतुलन है।
विदेश नीति का मूल उद्देश्य राष्ट्रहित की रक्षा है, न कि कोई राजनीतिक लाभ। यदि सरकार किसी संवेदनशील स्थिति में खुली निंदा से बचती है, तो संभव है कि उसके पीछे सामरिक या कूटनीतिक कारण हों जो खुले तौर पर नहीं दिखाए जा सकते। विपक्ष का अधिकार है कि वह प्रश्न उठाए लेकिन हर संतुलित रुख को ‘कमजोरी’ बताना गंभीर विमर्श को नुकसान पहुँचाता है।
कॉन्ग्रेस की आलोचना केवल सिद्धांत की लड़ाई नहीं बल्कि राजनीतिक पोजिशनिंग है। वह खुद को नैतिक आवाज के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है और सरकार को बैकफुट पर लाना चाहती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंधों की हकीकत ब्लैक ऐंड व्हाइट नहीं होती। भारत जैसे उभरते देश को बयानबाजी से पहले संतुलन, लंबे वक्त के लिए सोच और रणनीतिक चतुराई की जरूरत है। राजनीति अपनी जगह है लेकिन राष्ट्रीय हित उससे ऊपर होना ही चाहिए।
होली का त्योहार खुशियों, रंगों और मेल-मिलाप का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इस बार माहौल सामान्य नहीं दिख रहा है। होली नजदीक आते ही कुछ जगहों पर अलग तरह की हलचल देखने को मिल रही है। कहीं ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई का रोना लेकर सड़कों पर उतरने की अपील की जा रही है, तो कहीं होली को लेकर भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही है। इसके मद्देनजर पुलिस प्रशासन भी सख्ती बरत रहा है।
यह पहली बार नहीं है जब किसी हिंदू त्योहार के आसपास तनाव खड़ा करने की कोशिश हुई हो। पिछले सालों में भी होली के समय हिंदुओं को निशाना बनाकर हिंसा फैलाई जाती रही है। कभी धमकियों से काम चलाया जाता है, तो कभी होली मना रहे हिंदुओं पर सीधा हमला किया जाता है। इसीलिए बीते कुछ सालों की घटनाओं को समझना जरूरी है, ताकि इसके पीछे कट्टरपंथियों का मकसद समझा जा सके।
दुनिया में जंग के बीच भारत में कट्टरपंथी बना रहे माहौल
जहाँ आज दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और अस्थिरता का माहौल है, वहीं भारत शांति और सौहार्द के साथ होली की तैयारी कर रहा है। यह अपने आप में किसी अच्छे दिन से कम नहीं है। लेकिन कुछ कट्टरपंथी और वामपंथी समूहों को शायद यही बात खटक रही है। उन्हें यह स्वीकार नहीं हो पा रहा कि भारत में त्योहार शांति से मनाए जा रहे हैं, इसलिए होली से ठीक पहले माहौल बिगाड़ने की कोशिशें तेज होती दिख रही हैं।
अमेरिका और इजरायल के हमले में मारे गए ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत को लेकर कुछ समूहों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। दिल्ली के जामिया नगर, जंतर मंतर से लेकर उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, लखनऊ और जम्मू-कश्मीर में बुर्का पहने महिलाएँ और कुर्ता-पायजामा पहने मर्द खामेनेई को ‘रहबर’ बताकर आँसू बहा रहे हैं और दूसरी तरफ अपने प्रधानमंत्री मोदी को गाली दे रहे हैं।
इस बीच सरकार ने संभावित हिंसा की आशंका को देखते हुए सतर्कता बढ़ा दी है। राज्य सरकारों को निर्देश दिए गए हैं कि ईरान-समर्थक कट्टरपंथियों की पहचान करें। इसके अलावा प्रो-ईरान कट्टरपंथी संगठनों, वैश्विक आतंकी संगठनों जैसे ISIS और अल-कायदा से जुड़े सोशल मीडिया हैंडल्स पर भी कड़ी निगरानी रखने को कहा गया है।
होली के मद्देनजर नूहं में 600 जवान तैनात
हरियाणा के नूहं का नाम बीते कुछ सालों में कई बार तनाव और सांप्रदायिक हिंसा की खबरों के कारण चर्चा में रहा है। खासकर मजहबी जुलूसों के दौरान यहाँ माहौल बिगाड़ने की घटनाएँ सामने आई थीं, जिसके बाद प्रशासन को कर्फ्यू, इंटरनेट बंदी और भारी पुलिस बल की तैनाती जैसे कदम उठाने पड़े थे। इन घटनाओं ने नूहं को संवेदनशील श्रेणी में ला खड़ा किया, जहाँ हर बड़े त्योहार से पहले अतिरिक्त सतर्कता जरूरी मानी जाती है।
इसी पृष्ठभूमि को देखते हुए साल 2026 की होली से पहले भी नूहं में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। पुलिस के 600 जवान तैनात किए गए हैं। संवेदनशील इलाकों में ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी की तैयारी है और अफवाहों पर नजर रखने के लिए साइबर टीम को सक्रिय किया गया है।
मथुरा की होली पर भ्रामक जानकारी फैलाने के लिए 9 यूट्यूबरों पर FIR
मथुरा की विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार और लड्डूमार होली को लेकर सोशल मीडिया पर गलत और भ्रामक जानकारी फैलाने के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस ने 9 यूट्यूबरों और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स के खिलाफ FIR दर्ज की है। इन लोगों ने पिछले साल के विवादित वीडियो क्लिप्स को इस साल 2026 की होली से जोड़कर वायरल किए।
इन एडिटेड वीडियो के जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई कि बरसाना और नंदगाँव की होली के दौरान अव्यवस्था और अभद्रता हुई है। पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(2) (विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता बढ़ाना) और 353(2) के साथ-साथ IT ऐक्ट की धारा 67/67A के तहत मामला FIR दर्ज की है।
होली पर हिंदुओं को जान से मारने की धमकी
इसी तरह साल 2025 की होली में भी माहौल खराब करने का प्रयास किया गया था। उत्तर प्रदेश के बरेली के बारादरी थाना क्षेत्र से 22 फरवरी 2025 को खबर आई थी कि वहाँ कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंदू युवकों को धमकी दी कि अगर उन्होंने होली मनाई तो उनकी लाशें बिछा दी जाएँगी। जब मामला उठा तो पुलिस ने मामले की जाँच की और इस केस में अयान, सलमान, अमन, रेहान, समेत कई के खिलाफ एक्शन लिया गया।
AMU में हिंदुओं को होली मनाने से इनकार, बाद में मिली परमिशन
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हिंदू छात्रों ने होली मनाने की परमिशन माँगी थी, लेकिन प्रशासन ने ये कहकर साफ इनकार कर दिया कि वो नियमों में बदलाव नहीं करेंगे और जिसे होली मनानी है वो हॉस्टल में रहकर मनाए। हालाँकि, बाद में खबर आई कि वहाँ मशक्कत के बाद हिंदू छात्रों को होली खेलने की परमिशन दी गई।
हिंदू पिता और बेटी पर फैजान ने फेंका खौलता पानी
इसी तरह, साल 2024 में मध्यप्रदेश के धार के घाटाबिल्लोद गाँव से होली वाले दिन हिंदू बेटी-पिता पर खौलता पानी डालने का मामला प्रकाश में आया था। दरअसल, गाँव में पायल तिवारी नाम की लड़की और उसके पिता राकेश तिवारी ने अपने पड़ोसी फैजान से रंग धुलने के लिए पानी माँगा था, उस समय फैजान ने पानी देने की बजाए उनके ऊपर खौलता पानी डाल दिया था।इस घटना में लड़की का चेहरा बुरा तरह जल गया था।
‘नमाज के वक्त नहीं बज सकते गाने’
एक अन्य घटना 25 मार्च 2024 की है। तेलंगाना के मेडचल-मलकजगिरी जिले के चेंगिचेरला इलाके में होली का त्योहार मनाते समय हिंदुओं पर मुस्लिमों की भीड़ ने धावा बोल दिया था और धमकी देकर हिंदुओं को कहा गया था कि नमाज के वक्त कोई गाने नहीं बजा सकते। इस हमले के वक्त भीड़ ने महिलाओं को भी निशाना बनाया था।
होली के वक्त पथराव
साल 2024 में होली पर हिंदुओं को निशाना बनाने का एक मामला आगरा के रकाबगंज से भी आया था। इस घटना में मुस्लिम समुदाय के लगभद दो दर्जन उपद्रवियों ने जमील नामक व्यक्ति के नेतृत्व में हिंदुओं पर पथराव किया था जिसमें कई लोग घायल हुए थे। पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए जमील, सलीम, रहीस, शौकत समेत 34 नामजद और 50 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था।
AMU में होली पर हमला
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इस बार हिंदुओं को जहाँ पहले होली मिलन समारोह आयोजित करने से ही मना कर दिया गया था। वहीं, 2024 में 21 मार्च को जब एएमयू में हिंदुओं ने परिसर में होली खेलने का प्रयास किया था तो उस दिन उनपर इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा बड़ा हमला कर दिया गया था। इस घटना में अलीगढ़ पुलिस ने मिसवा, जाकीउर्ररमान, जैद, शेरबानी, शाहरुख सबरी और अन्य मुस्लिम छात्रों पर एफआईआर भी की थी।
चंदा वसूली के दौरान टूटे इस्लामी कट्टरपंथी
2023 की बात करें तो होलिका दहन के दिन उत्तर प्रदेश के मेरठ में चंदा वसूली के दौरान हालात बिगड़े थे। उस समय चंदा इकट्ठा करने गए हिंदुओं पर मुस्लिम समूह ने न केवल होलिका पर लात मारी थी बल्कि हिंदुओं पर हमला किया था और फिर जमकर पत्थरबाजी हुई थी। पुलिस ने इस विवाद के बाद तीन लोगों को हिरासत में लेकर अपनी कार्रवाई की थी।
रंग लगने पर भड़का शब्बीर, दोस्त को पेट्रोल डाल जलाया
तेलंगाना के मेदक के मारापल्ली गाँव से विवाद 2023 में भी होली पर उठा था। उस समय होली के दिन एक मोहम्मद शब्बीर नामक मुस्लिम व्यक्ति ने रंग लगने से नाराज होकर दोस्त अंजैया को पेट्रोल छिड़ककर आग के हवाले कर दिया था।
होली के दिन मारी गोली
राजस्थान के बीकानेर में 7 मार्च 2023 को कुचीलपुरा इलाके में होली के दिन ही दो मुस्लिम युवकों ने सवाई सिंह नाम के शख्स पर ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई थीं। इस घटना में ताहिर, नियाज और अख्तर की गिरफ्तारी हुई थी।
गुलाल खेलने के बहाने उतारा मौत के घाट
उत्तर प्रदेश के दनकौर में होली के दिन मनीष शर्मा की हत्या का मामला सामने आया था। हत्या करने वाले कोई और नहीं मनीष के दोस्त राशिद और सलमान थे। इन्होंने पहले मनीष को गुलाल खेलने के नाम पर बाहर बुलाया और फिर उसकी जान लेली थी।
‘मस्जिद के सामने से गुजरा जुलूस तो होगा फसाद’
साल 2023 में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में होली के वक्त ही इमाम मौलाना सदाकत हुसैन ने पीस कमेटी की बैठक के दौरान भड़काऊ बयान दिया था और यहाँ तक कहा था कि अगर होली का जुलूस बाजार वाली मस्जिद के सामने से गुजरा तो दंगा और फसाद होंगे। उनके इस बयान के बाद अधिकारियों ने फौरन भाषण रुकवा दिया था और साथ ही मौलाना के विरुद्ध गंभीर धाराओं में केस हुआ था।
जामिया में हिंदुओं पर हमला, DU में त्योहार पर ही रोक
साल 2023 में होली के वक्त एक विवाद जामिया मिलिया इस्लामिया से भी उठा था। उस समय इस्लामी कट्टरपंथियों ने अपना असली रूप दिखाते हुए कॉलेज परिसर में होली खेलने वाले हिंदुओं पर हमला किया था और नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हू-अकबर जैसे नारे लगाए थे। वहीं डीयू की बात करें तो 2023 में डीयू प्रशासन ने यह आदेश दिया था कि यदि छात्र कैंपस में रंग खेलेंगे तो उनपर एंटी रैगिंग, छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न के नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
हिंदू डॉक्टर की हत्या
साल 2023 में होली से ठीक एक दिन पहले यानी छोटी होली के दिन पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हिंदू डॉक्टर की निर्मम तरीके से हत्या का मामला सामने आया था। मृत डॉक्टर की पहचान 60 वर्षीय धर्म देव राठी के तौर पर हुई थी और उनकी हत्या करने का आरोप किसी और पर नहीं बल्कि उनके अपने ड्राइवर हनीफ लघारी पर लगा था।
पंजाब यूनिवर्सिटी में परमिशन लेने के बाद भी हिंदू छात्रों पर हमला
2023 में ही होली के वक्त पाकिस्तान के पंजाब यूनिवर्सिटी में हिंदुओं पर हमला हुआ था। घटना 6 और 7 मार्च 2023 की थी। हमले के वक्त 30 हिंदू छात्र विश्वविद्यालय परिसर में इकट्ठा होकर होली मना रहे थे। इनके पास त्योहार मनाने की अनुमति भी थी लेकिन इस्लामी कट्टरपंथी छात्र संगठन, इस्लामी जमीयत तुलबा (IJT) वहाँ आ पहुँचा और उन्होंने सबको होली खेलने से रोका। इस हमले में करीबन 15 छात्र घायल हो गए थे।
बच्चों का झगड़ा… होली पर मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं पर लाठी-डंडे से किया हमला
साल 2022 में बिहार के बेगूसराय के मुफ्फसिल थाना अंतर्गत रजौरा गाँव में होली के पर्व पर ही मुस्लिमों की भीड़ ने हिंदुओं पर हमला बोला था। इस दौरान दूसरे समुदाय ने धारधार हथियार समेत लाठी डंडा लेकर हिंदू समुदाय के लोगों पर हमला किया था, जिसमें 20 से अधिक हिंदू घायल हो गए थे। छानबीन में सामने आया था कि पूरा विवाद दो बच्चों के झगड़े के कारण हुआ था और उसके बाद मुस्लिम भीड़ हिंदू पक्ष पर टूट पड़ी।
UP, उत्तराखंड, झारखंड… हर जगह बवाल
इसी प्रकार 2022 में जब होली और जुमा एक दिन पड़ा था। उस वक्त कई जगह से पथराव और मारपीट की घटनाएँ सामने आई थीं। उत्तर प्रदेश के अमरोहा में छंगा दरवाजा क्षेत्र में होली में डीजे बजने पर मुस्लिम भड़क उठी थी और जुमे की नमाज के बाद पथराव शुरू कर दिया था। घटना में 2 हिंदू गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
संभल के खग्गू सराय में मुस्लिम भीड़ ने मस्जिद पर रंग लगाने का आरोप लगाकर होली का माहौल बिगाड़ने का प्रयास किया था। इस दौरान हिंदुओं पर जमकर पत्थरबाजी हुई थी। अंत में प्रशासन ने 150 अज्ञात पत्थरबाजों पर कार्रवाई की थी।
वहीं उत्तराखंड के हरिद्वार के लालढांदग में नमाज के बाद मुस्लिम लड़कों ने होली मना रहे युवकों पर हमला किया था। इस दौरान सुनील सैनी नाम का लड़का गंभीर रूप से घायल हुआ था।
झारखंड के तोपचांची में भी मुस्लिम भीड़ ने अपनी आबादी की धौंस दिखाते हुए हिंदुओं पर होली खेलने से मना किया था और जब हिंदू इसके बावजूद होली खेलते मिले तो उनपर खूब पत्थर फेंके गए थे।
बांग्लादेश में होली के दिन इस्कॉन पर हमला
बांग्लादेश की राजधानी ढाका में इस्कॉन के राधाकांत जीव मंदिर पर छोटी होली के एक दिन पहले, 17 मार्च 2022 को, इस्लामी कट्टरपंथियों ने बड़ा हमला किया था। इस हमले में लगभग 200 लोगों की भीड़ ने मंदिर परिसर में घुसकर तोड़फोड़ की और वहाँ मौजूद श्रद्धालुओं पर हमला किया था।
होली पर अशांति फैलाने वाले कौन?
ऊपर दिए सारे माले केवल कुछ उदाहरण है। असलियत में यह आँकड़ा उम्मीद से भी परे है। केवल होली ही नहीं, हर हिंदू त्योहार को निशाना बनाकर हिंसा फैलाई जाती है। लेकिन हिंसा फैलाने वाला कौन है इसका कहीं जिक्र नहीं होता है। हिंदू त्योहारों पर ही पुलिस की एहतियातन, सुरक्षा और कवायद से लोगों को लगने लगता है कि ये त्योहार हिंसा लेकर आते हैं, बल्कि इसकी आड़ में अपना मकसद पूरा करने वाले कोई और होते हैं। होली पर हिंसा और नफरत फैलाने वाली घटनाओं का यह आँकड़ा हर साल बढ़ता जा रहा है, होली को बदनाम करने के लिए साजिश सालों पुरानी है, जो थमने का नाम नहीं ले रही है।
नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी को 2 मार्च 2026 को जम्मू की एक स्पेशल कोर्ट ने चीन में ज्यूडिशियल अथॉरिटी को लेटर रोगेटरी जारी करने की इजाजत दी है। इसमें में एक GoPro कैमरे के खरीदार और शुरुआती यूजर और कमर्शियल ट्रेल से जुड़ी जानकारी माँगी गई है। इसका इस्तेमाल कथित तौर पर पहलगाम आतंकी हमले से पहले कश्मीर की बैसरन घाटी की रेकी करने के लिए किया गया था।
भारत की प्रमुख एंटी टेरर एजेंसी ने कोर्ट से GoPro कैमरे के बारे में जानकारी लेने के लिए चीनी अधिकारियों से संपर्क करने की इजाजत माँगी थी, क्योंकि यह चीन में एक डिस्ट्रीब्यूटर से जुड़ा था। कहा जा रहा है कि चीन में इसे पहलगाम हमले से एक साल पहले एक्टिवेट किया गया था
OpIndia को मिले कोर्ट ऑर्डर के मुताबिक, जाँच में एक GoPro Hero 12 Black कैमरे की पहचान एक ‘जरूरी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस’ के तौर पर हुई। ऐसा ही एक जरूरी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस GoPro Hero 12 Black Camera है, जिसका सीरियल नंबर C3501325471706 है, जो पहलगाम हमले में शामिल आतंकवादी मॉड्यूल की हमले से पहले रेकी करने और घटना को अंजाम देने में इस्तेमाल किया गया था।
NIA ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत नीदरलैंड की बनाने वाली कंपनी GoPro BV को एक नोटिस जारी किया था, जिसमें डिवाइस की सप्लाई चेन और एक्टिवेशन के बारे में जानकारी माँगी गई थी। अपने आधिकारिक जवाब में कंपनी ने बताया, “यह कैमरा AE Group International Limited को सप्लाई किया गया था, जो पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना में मौजूद एक डिस्ट्रीब्यूटर है और कैमरा 30.01.2024 को डोंगगुआन, पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना में एक्टिवेट किया गया था।”
Souce: Jammu Sessions Court
कंपनी के पास कोई एंड-यूज़र डेटा नहीं
GoPro BV ने एजेंसी को बताया कि उसके पास डिवाइस के डाउनस्ट्रीम ट्रांजैक्शन या एंड-यूजर डिटेल्स नहीं हैं। ऑर्डर में कहा गया, “मैन्युफैक्चरर ने आगे कहा है कि उसके पास उस डिवाइस के डाउनस्ट्रीम ट्रांजैक्शन डिटेल्स या एंड-यूजर रिकॉर्ड नहीं हैं।”
इसमें आगे कहा गया कि “उस डिवाइस का एक्टिवेशन, शुरुआती इस्तेमाल और कमर्शियल ट्रेल पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के क्षेत्र में आता है और खरीदार, एंड-यूजर और उससे जुड़े टेक्निकल रिकॉर्ड का पता लगाने के लिए जरूरी जानकारी सिर्फ चीनी अधिकारियों की कानूनी मदद से ही मिल सकती है।”
खास बात यह है कि भारत और चीन ने म्यूचुअल लीगल असिस्टेंस ट्रीटी पर साइन नहीं किए हैं। हालाँकि ट्रांसनेशनल ऑर्गनाइज़्ड क्राइम के खिलाफ यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन का सहारा लिया जा रहा है, जिसे दोनों देशों ने मंजूरी दी है। इसके अलावा, गृह मंत्रालय ने मामले में लेटर रोगेटरी जारी करने के लिए अपनी मंजूरी दे दी है।
कोर्ट ने लेटर रोगेटरी को मंजूरी दी
BNSS के सेक्शन 112 के तहत एप्लीकेशन को मंजूरी देते हुए, स्पेशल जज प्रेम सागर ने माना कि माँगी गई जानकारी केस के लिए बहुत जरूरी है। कोर्ट ने कहा, “ माँगी गई जानकारी जब्त किए गए डिवाइस यानी कैमरा, GoPro BV की कस्टडी, यूजर, एट्रिब्यूशन और सबूतों के लिंक की चेन बनाने के लिए जरूरी है, जिसे पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना में मौजूद एक डिस्ट्रीब्यूटर AE ग्रुप इंटरनेशनल लिमिटेड को सप्लाई किया गया था।”
Source: Jammu Sessions Court
जज ने आदेश दिया कि चीन की ज्यूडिशियल अथॉरिटी को लेटर रोगेटरी जारी किया जाए ताकि बड़ी साजिश का पता लगाने के लिए खरीदार, एंड यूज़र और उससे जुड़े टेक्निकल रिकॉर्ड की जानकारी मिल सके।”
जांच अधिकारी को लेटर रोगेटरी की एक सॉफ्ट कॉपी, चीनी ट्रांसलेशन के साथ, MLAT पोर्टल पर अपलोड करने का निर्देश दिया गया है।
एनआईए को तीन फिजिकल लेटर रोगेटरी (एक ओरिजिनल और दो कॉपी) चीनी में ट्रांसलेट की गई कॉपी के साथ, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन यानी सीबीआई की इंटरनेशनल पुलिस कोऑपरेशन यूनिट को डिप्लोमैटिक चैनलों के जरिए चीनी अधिकारियों को भेजने के निर्देश दिए गए हैं। आगे भेजने के लिए भेजने का निर्देश दिया गया है। सीबीआई की आईपीसीयू यूनिट ग्लोबल एजेंसियों और इंटरपोल के साथ बातचीत के लिए नोडल यूनिट है।
लेटर रोगेटरी क्या है
लेटर रोगेटरी असल में एक फॉर्मल रिक्वेस्ट है जो किसी कोर्ट द्वारा किसी दूसरे देश की कोर्ट या अथॉरिटी को क्रिमिनल जाँच में मदद के लिए भेजी जाती है। इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब जरूरी सबूत देश से बाहर मिलते हैं या उस देश में मिलते हैं जिसे ये भेजा जाता है। जैसे- अगर कोई डिवाइस विदेश में एक्टिवेट किया गया था या कोई कंपनी दूसरे देश में है, तो भारतीय जाँचकर्ता बस उस जानकारी की माँग नहीं कर सकते। उन्हें कानूनी प्रक्रिया के जरिए पूछना होगा।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के सेक्शन 112 के तहत जाँच अधिकारी पहले किसी भारतीय कोर्ट से संपर्क करता है। अगर कोर्ट संतुष्ट होता है, तो वह दूसरे देश को एक फॉर्मल लेटर जारी करता है। फिर वह देश लोगों से पूछताछ कर सकता है, डॉक्यूमेंट्स जमा कर सकता है या टेक्निकल डेटा इकट्ठा करके आधिकारिक तौर पर दे सकता है। यह आग्रह केन्द्र सरकार और डिप्लोमैटिक चैनलों के जरिए भेजी जाती है।
अगर दोनों देशों के बीच कोई ट्रीटी नहीं है, तो भी ये प्रक्रिया काम करता है, लेकिन यह धीमा होता है। दूसरा देश अपने आप मदद करने के लिए मजबूर नहीं होता है। वह अपने कानूनों के तहत तय करता है कि उसे सहयोग करना है या नहीं। आसान शब्दों में कहें तो यह कोर्ट और सरकारों के जरिए किसी दूसरे देश से क्रिमिनल केस में जरूरी सबूत शेयर करने के लिए कहने का एक कानूनी तरीका है।
गौरतलब है कि 22 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने पहलगाम के बैसरन में पर्यटकों पर हमला किया था। उन्होंने 26 बेगुनाह हिंदुओं को उनकी धार्मिक पहचान पूछकर मार डाला था। इस आतंकी हमले ने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव पैदा किया। इसके जवाब में भारत ने मई की शुरुआत में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया और पाकिस्तान के साथ-साथ पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया।
पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की, लेकिन उसके मिसाइल और ड्रोन हमले को नाकाम कर दिया गया। इसके जवाब में भारत ने पाकिस्तान के अंदर मिलिट्री ठिकानों पर हमला किया। 10 मई को सीजफायर का ऐलान किया गया। सरकार ने जुलाई 2025 में संसद को जानकारी दी कि हमले में शामिल तीन आतंकी दाचीगाम जंगल इलाके में एक एनकाउंटर में मारे गए थे।
ताजा जानकारी से पता चलता है कि जाँच एजेंसी अब उस कैमरे की पूरी जानकारी का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर टेररिस्ट हमले से पहले रेकी करने के लिए किया गया था। इसे कोर्ट द्वारा अपने ऑर्डर में हमले के पीछे बताई गई ‘बड़ी साजिश’ का पता लगाने की कोशिशों के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है।
(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने की घोषणा कर दी है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के वरिष्ठ अधिकारी इब्राहिम जबारी ने स्पष्ट चेतावनी जारी की है कि जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद है और कोई भी जहाज वहाँ से गुजरने की कोशिश करेगा तो उसे आग के हवाले कर दिया जाएगा।
यह ताजा घटना 3 मार्च 2026 को सामने आई है, जब ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की कथित हत्या के बाद ईरान-अमेरिका-इजरायल संघर्ष चरम पर पहुँच गया।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ईरान के दावे को खारिज किया है, लेकिन वैश्विक चिंताएँ बढ़ गई हैं क्योंकि यह मार्ग दुनिया के तेल व्यापार का 20% हिस्सा संभालता है।
क्या हैं स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के मायने
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। ये ईरान और ओमान के बीच स्थित है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है। यह संकीर्ण जलडमरूमध्य मात्र 21 मील चौड़ा है, लेकिन यहीं से वैश्विक तेल व्यापार का 20-21% हिस्सा गुजरता है।
ईरान के इस कदम का मतलब है कि खाड़ी के तेल उत्पादक देशों जिनमें सऊदी अरब, UAE, कुवैत, इराक और कतर का निर्यात ठप हो सकता है। ईरान खुद इस मार्ग को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है, क्योंकि इसका अधिकांश हिस्सा उसके जलक्षेत्र में आता है।
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो 1980 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान ‘टैंकर वार’ में इसी तरह की रणनीति अपनाई गई थी, लेकिन आज के ड्रोन, मिसाइल और स्वार्म तकनीक से खतरा कहीं ज्यादा घातक है।
IRGC ने अमेरिकी नौसेना को भी चेतावनी दी है कि उनके जहाजों को प्रवेश की अनुमति नहीं मिलेगी। यह न केवल आर्थिक ब्लैकमेल है, बल्कि ईरान की सैन्य ताकत का प्रदर्शन भी है, जो उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद बदला लेने की कोशिश का हिस्सा लगता है।
वैश्विक स्तर पर यह युद्ध की ओर इशारा करता है, क्योंकि अमेरिका ने पहले ही नौसैनिक टुकड़ियों को तैनात कर दिया है। लंबे समय तक बंदी से वैकल्पिक रूट जैसे सउदी के पाइपलाइन या अफ्रीकी तटों का चक्कर लगाना पड़ेगा, जो शिपिंग लागत को दोगुना कर देगा। ऐसे में यह ऊर्जा बाजार को हिला देने वाली रणनीति है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी की ओर धकेल सकती है।
इंश्योरेंस कंपनियां पहले ही पीछे हट चुकीं
दुनिया के लिए यह संकट विनाशकारी साबित हो सकता है। स्ट्रेट से रोजाना 20 मिलियन बैरल (2 करोड़ बैरल) से ज्यादा कच्चा तेल और 20% LNG गुजरता है। बंदी से तेल कीमतें 100-150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं, जो पहले ही 90 डॉलर के ऊपर चढ़ चुकी हैं।
इस कड़ी में यूरोप, जापान, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे आयातक सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, जहाँ ऊर्जा महँगाई पहले से ही अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचा रही है। इस संकट को भांपते हुए इंश्योरेंस कंपनियां गल्फ और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में जहाजों का कवरेज बंद कर रही हैं, बाजार खुलने से पहले ही 48-72 घंटे के नोटिस जारी कर दिए गए हैं। वॉर रिस्क प्रीमियम 50% तक उछल चुका है, जिससे जहाज मालिकों के लिए यात्रा घाटे में बदल रही है। एक तरह से लाल सागर संकट जैसी स्थिति दोहराई जा रही है।बिना इंश्योरेंस के यात्रा जोखिम भरी हो गई है, जिससे तेल टैंकरों की आवाजाही लगभग ठप हो चुकी है और शिपिंग कंपनियां नई दरों पर बातचीत कर रही हैं। शिपिंग कंपनियां वैकल्पिक रास्ते अपनाएँगी, लेकिन वे इसके लिए 10-15 दिन ज्यादा समय लेंगी और तब तक में ईंधन खपत दोगुनी हो जाएगी। इसके कारण रासायनिक उद्योग, उर्वरक और प्लास्टिक उत्पादन तक ठप हो सकता है।
भले ही अमेरिका पर इस का सीधा असर कम होगा क्योंकि वह ऊर्जा निर्यातक बन चुका है, पर फिर भी वैश्विक मंदी से वहाँ की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान तो होना तय है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि OPEC+ देश उत्पादन बढ़ाने की कोशिश करेंगे, लेकिन अब भी इसकी क्षमता सीमित है। लंबे समय में यह संघर्ष इजरायल-ईरान युद्ध को और भड़का सकता है, जिससे मिडिल ईस्ट में व्यापक अस्थिरता फैलेगी।
भारत और दुनिया पर प्रभाव
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से रोजाना लगभग 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल (विश्व की 20-21% आपूर्ति) गुजरता है, जिसमें सऊदी अरब का 38% हिस्सा, कतर की LNG और अन्य खाड़ी देशों का गैस निर्यात शामिल है।
बंद होने पर तेल कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं, शिपिंग लागत बढ़ेगी, वैश्विक महंगाई चढ़ेगी और ऊर्जा संकट गहरा सकता है- यूरोप, चीन, जापान जैसे आयातक सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
भारत के लिए खतरा सबसे गंभीर है, क्योंकि देश 85% कच्चा तेल आयात करता है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से प्रतिदिन 2.5-2.7 मिलियन बैरल (कुल आयात का 50%) आता है।
भारत के मुख्य स्रोत इराक, जो भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है, के अलावा सऊदी अरब, UAE और कुवैत हैं। इसके अलावा 90% LPG और 60% LNG भी इसी रूट से मिलता है।
इस जलडमरूमध्य की बंदी से पेट्रोल-डीजल की कीमतें 20-30% तक उछल सकती हैं, जो ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और उपभोक्ता महँगाई को बढ़ावा देगी। रिफाइनरियों के पास 10-15 दिनों का स्टॉक है, इसलिए तत्काल संकट टल सकता है, लेकिन उसके बाद रूस, अमेरिका या अफ्रीकी देशों पर निर्भरता बढ़ेगी।
रूस से डिस्काउंट तेल खरीद पहले ही रिकॉर्ड स्तर पर है, लेकिन पाइपलाइन या रेल रूट भी सीमित हैं। ऐसे में रुपए पर दबाव पड़ेगा, क्योंकि तेल डॉलर में खरीदा जाता है।
इसके अलावा उद्योगों जैसे फार्मा, ऑटो और FMCG पर लागत बढ़ेगी, जिससे नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। सरकार ने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) भंडार भरे हैं, लेकिन पूर्ण बंदी में ये भी अपर्याप्त साबित होंगे। लंबे समय में भारत को नवीकरणीय ऊर्जा और जैव ईंधन पर तेजी से स्विच करना पड़ेगा।