Tuesday, March 31, 2026
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क्या होते हैं ‘म्यूल अकाउंट्स’, जिसका इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में किया जा रहा: J&K में बड़े हवाला रैकेट का भंडाफोड़, 8000 बेनामी खाते फ्रीज किए गए

J&K में बड़े हवाला रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है। देश विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल हो रहे 8000 बेनामी खातों को भी पिछले 3 साल में फ्रीज किया गया है। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, म्यूल अकाउंट साइबर क्राइम पाइपलाइन में सबसे कमजोर लेकिन जरूरी हिस्सा हैं। उनके बिना अपराधियों को चोरी के पैसे को क्रिप्टोकरेंसी जैसे अनट्रेसेबल डिजिटल एसेट्स तक पहुँचाना मुश्किल होता है।

सुरक्षा एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर में तेजी से फैल रहे ‘म्यूल अकाउंट्स’ के तेजी से बढ़ते नेटवर्क का पता लगाया है। जाँच एजेंसियों का मानना ​​है कि हो सकता है इंटरनेशनल स्कैम सिंडिकेट के जरिए देश विरोधी गतिविधियों में लगे अलगाववादियों और आतंकियों तक ये पैसा पहुँच रहा हो।

न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, पिछले 3 सालों में पूरे क्षेत्र में 8000 से ज्यादा खातों की ऐसे खातों की पहचान कर उन्हें फ्रीज किया गया। अधिकारी अब ये जानने में लगे हैं कि इन अकाउंट्स से आने वाला पैसा आखिरकार किस-किस को मिला।

क्या है ‘म्यूल अकांउट’

म्यूल अकाउंटस साइबर क्राइम की सबसे कमजोर, लेकिन बेहद जरूरी हिस्सा होते हैं। इनके बिना अपराधियों को चोरी के फंड को क्रिप्टोकरेंसी जैसे अनट्रेसेबल डिजिटल एसेट्स में बदलना मुश्किल होता है। सेंट्रल सिक्योरिटी एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर पुलिस और दूसरी एजेंसियों को इन अकाउंट्स को बैंकों के साथ मिलकर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं।

एजेंसी उन बिचौलियों को भी ट्रैक करने में लगी है, जिन्हें ‘म्यूलर’ कहा जाता है। ये पूरी धोखाधड़ी में अहम रोल निभाते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, 2017 में एनआईए ने जम्मू कश्मीर में गैर-कानूनी फाइनेंशियल फ्लो को रोकने के लिए सख्ती दिखाई, तो इनलोगों ने अपना तरीका बदल लिया और कथित तौर पर ‘डिजिटल हवाला’ का रास्ता अपनाया

एजेंसियाँ लगातार म्यूलर की तलाश कर रही हैं। पारंपरिक तरीकों से अलग ‘डिजिटल हवाला’ देश विरोधी नेटवर्क का नया तरीका है। म्यूलर सीधे ठगी करने के लिए लोगों से संपर्क नहीं करता और न ही किसी तरह का लिंक भेजता है। लेकिन वह ऐसे खातों की व्यवस्था करता है, जिसमें ठगी किए गए रकम सीधे जाएँ या ट्रांसफर किए जाएँ।

सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि भले ही म्यूल अकाउंट धारक सीधे ठगी नहीं करते, लेकिन वे मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल माने जाएँगे। ज्यादातर ऐसे खाते आम लोगों के नाम पर होते हैं। इन्हें पैसों का लालच दिया जाता है और इनके खातों का इस्तेमाल किया जाता है। उनलोगों से ऑनलाइन बैंकिंग समेत खाते की जानकारी लेकर कहा जाता है कि ये खाते अस्थाई रूप से ‘पार्किंग अकाउंट’ की तरह इस्तेमाल होगा। लेकिन ये खाते साइबर ठगी का पैसा इधर से उधर करने में इस्तेमाल किया जाता है।

दरअसल आसान कमाई का लालच देकर आम लोगों को झाँसे में लिया जाता है और ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाता है, जिससे ट्रांसनेशनल क्राइम नेटवर्क फलते-फूलते हैं।

एजेंसी ने एक सीनियर अधिकारी के मुताबिक, स्कैम का पूरा इकोसिस्टम इन अकाउंट्स पर निर्भर करता है। पैसे के लिए कोई अकाउंट न होने पर, स्कैम पहले ही स्टेप में फेल हो जाता है। इसलिए जो लोग अपने अकाउंट किराए पर देते हैं, वे सिर्फ हालात के शिकार नहीं होते, बल्कि वे क्राइम के इंजन की तरह हैं।

जाँच में यह भी सामने आया है कि एक ठग एक वक्त पर 10 से 30 म्यूल खातों का इस्तेमाल कर सकता है। कई बार शेल कंपनियों के नाम का भी खाता खोलने में इस्तेमाल किया जाता है। एक दिन ये 40 लाख रुपए तक की लेने देन करने में इन शेल कंपनियों के खातों का इस्तेमाल किया जाता है। पैसे को कई खातों में तेजी से भेजा जाता है और छोटी-छोटी किश्तों में भेजा जाता है, ताकि एजेंसियों की नजर से बचा जा सके।

प्राइवेट क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट बनाने के लिए कहा जाता है

सेंट्रल एजेंसियों की एक पूरी स्टडी से यह भी पता चला है कि चीन, मलेशिया, म्यांमार और कंबोडिया जैसे देशों में लोग कथित तौर पर केंद्र शासित प्रदेश में नए लोगों को प्राइवेट क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट बनाने के लिए कह रहे हैं।

ये वॉलेट अक्सर डिजिटल फुटप्रिंट को छिपाने के लिए वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क यानी वीपीएन का इस्तेमाल करके बनाए जाते हैं और आमतौर पर इसके लिए केवाईसी वेरिफिकेशन की जरूरत नहीं होती है।

जम्मू कश्मीर पुलिस ने पूरे कश्मीर घाटी में वीपीएन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है, क्योंकि इसका इस्तेमाल आतंकवादी अपनी पहचान छुपाने के लिए करते हैं।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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