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टेरर फंडिंग की जाँच पर ‘प्रोपेगेंडा’ या प्रेस की आजादी? मस्जिदों-मदरसों के सर्वे पर रिपोर्टिंग को लेकर पत्रकारों को पुलिस सम्मन, EGI और प्रेस क्लब ने जताया विरोध, जानें अब तक क्या-क्या हुआ?

जम्मू-कश्मीर में पुलिस द्वारा कुछ पत्रकारों को पूछताछ के लिए बुलाए जाने के बाद एक नया राजनीतिक और मीडिया विवाद खड़ा हो गया है। यह विवाद उन खबरों को लेकर है, जिनमें घाटी की मस्जिदों और मदरसों की जानकारी जुटाने की सुरक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। जहाँ एक तरफ मीडिया संगठनों और क्षेत्रीय नेताओं ने इसे प्रेस की आजादी पर हमला बताया है, वहीं दूसरी ओर इस घटना ने यह भी साफ कर दिया है कि कैसे कुछ प्रभावशाली संस्थाएँ आतंकवाद के खिलाफ उठाए जाने वाले पारदर्शी कदमों को फौरन गलत ठहराने की कोशिश करती हैं। अक्सर इस शोर-शराबे में वर्षों से चले आ रहे टेरर फंडिंग नेटवर्क और उन ढाँचों की सच्चाई छिप जाती है, जो कश्मीर में आतंकी घटनाओं को बढ़ावा देने में आगे रहे हैं।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर की सीमा पाकिस्तान जैसे संवेदनशील देश से लगती है, जिसे ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ (FATF) समेत दुनिया की कई संस्थाएँ आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए बार-बार फटकार लगा चुकी हैं। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए, भारत की सुरक्षा एजेंसियाँ अब अपना पूरा ध्यान टेरर फंडिंग की कमर तोड़ने पर लगा रही हैं, जिसे घाटी में उग्रवाद की जीवनरेखा (लाइफलाइन) माना जाता है।

आतंकी फंडिंग पर केंद्र के फोकस से जुड़ा पुलिस अभियान

पुलिस की वर्तमान कार्रवाई, जिसे कुछ खबरों में मस्जिदों की ‘प्रोफाइलिंग’ (जानकारी जुटाना) कहा जा रहा है, उसे अलग करके नहीं देखा जा सकता। दरअसल, यह मोदी सरकार की उस व्यापक नीति का हिस्सा है जिसका मकसद आतंकवाद की जड़ यानी ‘टेरर फंडिंग’ पर सीधा प्रहार करना है।

सुरक्षा एजेंसियों का हमेशा से यह मानना रहा है कि मस्जिदें और मदरसे भले ही वैध धार्मिक संस्थान हैं, लेकिन इतिहास में इनके एक छोटे हिस्से का इस्तेमाल चरमपंथी संगठनों के लिए चंदा, दान या धार्मिक संग्रह की आड़ में धन जुटाने और उसे ठिकाने लगाने के लिए किया गया है। याद दिला दें कि 1990 के दशक में भी ऐसी खबरें आई थीं कि कैसे आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों को डराने और उन्हें घाटी छोड़ने पर मजबूर करने के लिए मस्जिदों के लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल किया था।

इन्हीं पुराने अनुभवों को देखते हुए, मौलवियों के संपर्क विवरण, उनकी विचारधारा (पंथ) और वित्तीय रिकॉर्ड जैसी बुनियादी जानकारी माँगना आतंकवाद के खिलाफ एक सामान्य सुरक्षा प्रक्रिया है। यह कदम उन इलाकों के लिए बेहद जरूरी हो जाता है जहाँ कट्टरपंथ और विदेशी समर्थन वाले उग्रवाद का खतरा बना रहता है, खासकर एक ऐसे क्षेत्र में जिसकी सीमा एक दुश्मन देश से लगती है जो भारत को अस्थिर करने के लिए लगातार आतंकी घुसपैठ कराता रहता है।

जम्मू-कश्मीर पुलिस की यह मुहिम कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं है, बल्कि यह उस रणनीति का हिस्सा है जिसके सकारात्मक परिणाम पहले भी जमीन पर देखने को मिल चुके हैं।

अतीत से सबक: फंडिंग पर चोट, सड़क पर फैली हिंसा का अंत

टेरर फंडिंग के खिलाफ भारत की इस कड़ाई की सबसे बड़ी सफलता तब देखने को मिली, जब एनआईए (NIA) जैसी एजेंसियों ने व्यवस्थित तरीके से हवाला नेटवर्क, अलगाववादी फंडिंग चैनलों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) व धार्मिक संस्थाओं की आड़ में काम करने वाले पाकिस्तानी हैंडलर्स पर नकेल कसना शुरू किया।

पैसे की इस किल्लत का सीधा और बड़ा असर घाटी में पत्थरबाजी की घटनाओं में आई भारी कमी के रूप में दिखा। एक समय था जब पत्थरबाजी लगभग रोज की बात थी, जिससे जनजीवन पूरी तरह ठप हो जाता था और आतंकी संगठन इसे दबाव बनाने के पैंतरे के रूप में इस्तेमाल करते थे। जाँच में यह साफ हुआ कि इनमें से कई विरोध-प्रदर्शन अचानक नहीं होते थे, बल्कि संगठित चैनलों के जरिए इनके लिए पैसे दिए जाते थे और युवाओं में हिंसा भड़काने के लिए रकम बाँटी जाती थी। जैसे ही फंडिंग के ये स्रोत सूखे, ‘आजादी’ के नाम पर किए जाने वाले खोखले दावों की भी हवा निकल गई।

हाई-प्रोफाइल आतंकी फंडिंग मामलों में सजा

आतंकी ईकोसिस्टम को पूरी तरह खत्म करने के मोदी सरकार के संकल्प को उस समय और मजबूती मिली, जब प्रमुख अलगाववादी नेताओं के खिलाफ कड़े फैसले लिए गए। इसी कड़ी में, प्रतिबंधित संगठन ‘दुख्तरान-ए-मिल्लत’ की प्रमुख आसिया अंद्राबी को गिरफ्तार किया गया और कश्मीर में अलगाववाद व हिंसा भड़काने के लिए फंड जुटाने (टेरर फंडिंग) के मामले में दोषी ठहराया गया।

इससे भी महत्वपूर्ण कार्रवाई जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के प्रमुख यासीन मलिक के खिलाफ हुई। मीडिया के एक वर्ग ने लंबे समय तक यासीन मलिक को एक ‘शांतिप्रिय अलगाववादी’ के तौर पर पेश करने की कोशिश की थी, लेकिन NIA ने उसे टेरर फंडिंग के एक बड़े मामले में गिरफ्तार किया और बाद में वह दोषी भी पाया गया। साल 2022 में, एक विशेष अदालत ने मलिक को गैरकानूनी तरीके से धन जुटाने, आपराधिक साजिश रचने और आतंकी संगठनों से संबंध रखने के जुर्म में ‘UAPA’ के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई।

इस अदालती फैसले ने उस भ्रम को पूरी तरह खत्म कर दिया कि कश्मीर में अलगाववादी हिंसा अपने आप या बिना किसी नेतृत्व के हो रही थी। इसके बजाय, इस केस ने पाकिस्तान और उसके एजेंटों द्वारा समर्थित एक संगठित फंडिंग तंत्र की पोल खोलकर रख दी।

पुलिस मंशा पर सवाल उठाने वाली रिपोर्टों के बाद पत्रकारों को समन

जब कुछ खबरों में पुलिस की इस कार्रवाई को ‘निगरानी’ (surveillance) या ‘प्रोफाइलिंग’ के तौर पर पेश किया गया, तब राष्ट्रीय अखबारों के पत्रकारों को पूछताछ के लिए बुलाया गया। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने इस बात की पुष्टि की कि कश्मीर में उनके असिस्टेंट एडिटर, बशारत मसूद से एक बॉन्ड पर साइन करने को कहा गया, जिसमें यह लिखा था कि वे ऐसी किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे जिससे ‘शांति भंग’ हो सके।

इसी तरह, कुछ अन्य रिपोर्टरों को भी उनकी खबरों के सिलसिले में श्रीनगर के साइबर पुलिस स्टेशन बुलाया गया। हालांकि पुलिस ने अभी तक इस पर कोई सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन खबरों के मुताबिक यह पूछताछ इस बात को लेकर थी कि पूरी प्रक्रिया को किस तरह पेश किया गया। दरअसल, कश्मीर में कुछ ‘पत्रकारों’ पर अक्सर ऐसे नैरेटिव (विमर्श) चलाने के आरोप लगते रहे हैं जो तनाव भड़का सकते हैं या आतंकवाद के खिलाफ उठाए गए कदमों को गलत तरीके से सांप्रदायिक रंग दे सकते हैं।

मीडिया संगठनों का विरोध, आतंकी फंडिंग की सच्चाई से किनारा

‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ (EGI) और ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ (PCI) ने तुरंत पुलिस पर डराने-धमकने और दबाव बनाने का आरोप लगाया और डर का माहौल पैदा होने की चेतावनी दी। इसके बाद ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ (CPJ) और ‘डिजीपब न्यूज इंडिया फाउंडेशन’ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी सुर में सुर मिलाया।

लेकिन, इन बयानों में सुरक्षा से जुड़ी उस सबसे अहम बात को जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया गया कि धार्मिक और चैरिटेबल संस्थाओं के जरिए टेरर फंडिंग कश्मीर में कोई काल्पनिक खतरा नहीं, बल्कि एक हकीकत है जिसके पुख्ता सबूत मौजूद हैं। आतंकवाद के खिलाफ बने वैश्विक ढांचे, चाहे वो FATF हो या संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव, स्पष्ट रूप से ऐसी संस्थाओं की वित्तीय जांँच का निर्देश देते हैं जिनका गलत इस्तेमाल होने की संभावना हो।

मस्जिदों के वित्तीय कामकाज की किसी भी जांच को ‘दमन’ बताकर ये संस्थाएँ और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाने वाले लोग न केवल अपनी ड्यूटी कर रहे अधिकारियों पर दबाव बनाते हैं, बल्कि अनजाने में उन्हीं जगहों को सुरक्षा कवच प्रदान करने का जोखिम उठाते हैं जिनका इस्तेमाल चरमपंथी नेटवर्क ऐतिहासिक रूप से करते आए हैं।

राजनीतिक विरोध और चयनात्मक चुप्पी

महबूबा मुफ्ती जैसे क्षेत्रीय राजनीतिक नेताओं ने मस्जिदों को ‘निशाना’ बनाए जाने पर आपत्ति जताई और तर्क दिया कि अन्य धार्मिक संस्थानों की भी जाँच होनी चाहिए। हालाँकि, आतंकवाद से जुड़ी पिछली जाँचों में यह साफ तौर पर सामने आया है कि कश्मीर में उग्रवाद की फंडिंग का सीधा संबंध कट्टरपंथी इस्लामी नेटवर्क से रहा है, न कि हिंदू या अन्य धार्मिक संगठनों से।

वहीं, सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने पत्रकारों को पूछताछ के लिए बुलाए जाने की निंदा तो की, लेकिन इसकी जिम्मेदारी उपराज्यपाल मनोज सिन्हा पर डालते हुए खुद को पुलिस की इस कार्रवाई से अलग कर लिया। कॉन्ग्रेस नेताओं ने भी प्रेस की आजादी कम होने पर चिंता जताई, लेकिन उन्होंने इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि 1990 और 2000 के दशक की शुरुआत के मुकाबले अब टेरर फंडिंग के तरीके कितने बदल चुके हैं और कितने आधुनिक हो गए हैं।

असहज सच्चाई

देखा जाए तो पत्रकारों को पुलिस सम्मन भेजे जाने पर मचा यह बवाल एक बुनियादी सवाल से ध्यान भटकाता है: क्या किसी आतंक प्रभावित क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियों को सिर्फ इसलिए वित्तीय जाँच (financial trails) करने से हिचकिचाना चाहिए क्योंकि उसमें धार्मिक संस्थान शामिल हैं?

मोदी सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट रहा है- पैसे के लेनदेन पर नजर रखना, हवाला नेटवर्क को खत्म करना, बड़े टेरर फाइनेंसर्स पर मुकदमा चलाना और पारदर्शिता लागू करना। इस नीति से जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था में पहले ही बड़े और सकारात्मक बदलाव आए हैं। पुलिस की वर्तमान मुहिम पूरी तरह से इसी सुरक्षा ढाँचे का हिस्सा है।

ऐसी कोशिशों पर कीचड़ उछालना और इन्हें ‘तानाशाही’ बताना दरअसल उन तंत्रों को ढाल प्रदान करने जैसा है, जो घाटी में आतंकवाद को जिंदा रखते हैं। इसमें स्वार्थी राजनेताओं और मीडिया निकायों की भूमिका, चाहे अनजाने में हो या जानबूझकर, बेहद विवादास्पद है।

दशकों से पाकिस्तान प्रायोजित हिंसा झेल रहे इस क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर पुलिस के सामने चुनौती बिल्कुल साफ है- या तो वे मीडिया संगठनों और अवसरवादी राजनेताओं के इस बनावटी गुस्से के आगे झुक जाएँ, या फिर अपनी ईमानदारी से ड्यूटी करते हुए आतंक की ‘वित्तीय जीवनरेखा’ पर सीधा प्रहार जारी रखें।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अमित केलकर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

स्पेन ने भारत की इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव किया जॉइन, स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप के स्तर पर पहुँचे दोनों देशों के रिश्ते: जानें कैसे मिलेगा यूरोप को भी फायदा

नई दिल्ली में बुधवार (21 जनवरी 2026) को भारत-स्पेन संबंधों में एक बड़ा कदम उठा जब स्पेन ने औपचारिक रूप से इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव (IPOI) जॉइन कर लिया। स्पेन के विदेश मंत्री जोस मैनुअल अल्बारेस ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर को IPOI की एक्सेशन डिक्लेरेशन सौंपी। साथ ही दोनों देशों ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को ‘स्ट्रेटेजिक एसोसिएशन’ के स्तर पर अपग्रेड करने का ऐलान किया, जो भारत-स्पेन रिश्तों का सबसे ऊँचा स्तर है।

यह कदम इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्पेन की बढ़ती दिलचस्पी और भारत के साथ गहरे सहयोग को दिखाता है। भारत ने 2019 में IPOI लॉन्च किया था, जिसका मकसद फ्री, ओपन और रूल्स-बेस्ड इंडो-पैसिफिक को बढ़ावा देना है, जिसमें मैरिटाइम सिक्योरिटी, स्टेबिलिटी और डेवलपमेंट पर फोकस है। अब तक 25 से ज्यादा देश इस इनिशिएटिव से जुड़ चुके हैं।

स्पेन के विदेश मंत्री जोस मैनुअल अल्बारेस ने भारत को ‘विश्वसनीय देश’ बताया और कहा कि भारत अंतरराष्ट्रीय कानून, मल्टीलेटरलिज्म और यूएन चार्टर के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा, “आज की जटिल वैश्विक स्थिति में स्पेन भारत को एक स्थिर और भरोसेमंद पार्टनर मानता है।”

भारत-स्पेन संबंधों के 70 साल पूरे

स्पेन द्विपक्षीय स्तर पर यूरोपीय यूनियन के जरिए और मल्टीलेटरल फोरम में भारत के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है। इस महीने के अंत में होने वाले भारत-ईयू समिट से पहले यह दौरा और भी अहम हो जाता है। अल्बारेस ने स्पेन-इंडिया डुअल ईयर का भी जिक्र किया और दोनों देशों के 70 साल के संबंधों को मजबूत करने की बात कही।

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि वैश्विक व्यवस्था में गहरा बदलाव आ रहा है, ऐसे में समान विचार वाले देशों का सहयोग जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि भारत और स्पेन दोनों आतंकवाद के शिकार रहे हैं और दुनिया में इस खतरे के खिलाफ जीरो टॉलरेंस होना चाहिए। जयशंकर ने स्पेन की IPOI में एंट्री का स्वागत करते हुए कहा कि भारत स्पेन के साथ फ्री और ओपन इंडो-पैसिफिक के लिए काम करने को उत्सुक है।

विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा, “भारत स्पेन का IPOI में स्वागत करता है। विदेश मंत्री जोस मैनुअल अल्बारेस ने आज जयशंकर को साइन किया एक्सेशन डिक्लेरेशन सौंपा। भारत IPOI के फ्रेमवर्क में स्पेन के साथ काम करने को लेकर उत्साहित है।”

दोनों देशों ने आर्थिक और रक्षा सहयोग पर भी जोर दिया। अल्बारेस और जयशंकर ने एयरबस-टाटा जॉइंट वेंचर का उदाहरण दिया, जिसमें भारत में C-295 एयरक्राफ्ट बनाए जा रहे हैं। जयशंकर ने बताया कि गुजरात की फैसिलिटी से पहला मेड-इन-इंडिया एयरबस एयरक्राफ्ट सितंबर 2026 से पहले रोल आउट हो जाएगा, जो तय समय से पहले है।

यह पार्टनरशिप दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और आत्मनिर्भरता का अच्छा मॉडल है। स्पेन की अटलांटिक नेवल एक्सपर्टीज अब इंडियन ओशन रीजन में भारत की ऑपरेशंस को मजबूत बनाएगी, खासकर एंटी-पाइरेसी पेट्रोल्स और हॉर्मुज, बाब-एल-मंदेब जैसे चोकपॉइंट्स की सिक्योरिटी में।

IPOI के सात पिलर्स में मैरिटाइम सिक्योरिटी से लेकर ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ (HADR) तक शामिल हैं। स्पेन की एंट्री से इंडियन नेवी की भूमिका और मजबूत होगी, जो पहले से ही क्षेत्र में ‘प्रिफर्ड सिक्योरिटी पार्टनर’ के रूप में जानी जाती है। भारत की नेवी ने पाइरेसी को 80 फीसदी तक कम किया है और छोटे देशों को ट्रेनिंग, EEZ सर्विलांस और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर दे रही है। स्पेन का जुड़ना क्वाड-प्लस जैसे प्रयासों को और मजबूती देगा और इंडो-पैसिफिक में कलेक्टिव मैरिटाइम सिक्योरिटी को बढ़ावा मिलेगा।

भारत-स्पेन के संबंध यूरोप के लिए भी बेहद अहम

यह दौरा भारत-ईयू संबंधों के लिए भी अहम है। अल्बारेस ने कहा कि भारत-ईयू ट्रेड डील जल्द पूरी होने वाली है और डिफेंस टाइज को मजबूत करने की योजना है। स्पेन भारत में तीसरा कौंसुलेट खोलने वाला है और AI, ट्रेड जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ेगा। फरवरी में स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज की भारत यात्रा भी प्लान है, जहां इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में हिस्सा लेंगे। दोनों देश आतंकवाद, ट्रेड और क्लाइमेट चेंज जैसे ग्लोबल इश्यूज पर एकजुट नजर आ रहे हैं।

कुल मिलाकर स्पेन की IPOI में एंट्री और स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक जीत है। यह इंडो-पैसिफिक में भारत की लीडरशिप को मजबूत करता है और यूरोपीय देशों की बढ़ती दिलचस्पी दिखाता है। दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार और मल्टीलेटरल सहयोग आगे और गहरा होगा, जो बदलते वैश्विक माहौल में दोनों के लिए फायदेमंद साबित होगा।

दीपक यू और डिजिटल लिंचिंग का खौफनाक सच, एक वायरल रील ने छीन ली जिंदगी

केरल के कोझिकोड से सामने आया यू दीपक का मामला आज के भारत में फैलती डिजिटल लिंचिंग की सबसे भयावह मिसाल बन चुका है। दीपक कोई अपराधी नहीं था। वह एक मेहनती सेल्स मैनेजर था। अपने बूढ़े माता-पिता का इकलौता सहारा और परिवार का ब्रेड-अर्नर था। लेकिन एक वायरल रील ने उसकी पूरी ज़िंदगी छीन ली।

केरल का पूरा मामले आखिर था क्या?

शिमजिथा मुस्तफ़ा नाम की महिला ने दीपक का वीडियो रिकॉर्ड किया और उस पर छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए सोशल मीडिया पर डाल दिया। देखते ही देखते वह वीडियो रील बनकर वायरल हो गया। 20 लाख से ज़्यादा लोग उसे देख चुके थे। बिना किसी पुलिस जाँच के, बिना कंप्लेंट/ एफआईआर के, बिना अदालत के फैसले के, सोशल मीडिया की भीड़ ने दीपक को दोषी घोषित कर दिया।

गालियाँ, धमकियाँ, चरित्र हनन और लगातार मानसिक दबाव। इस दबाव को दीपक सह नहीं सका और उसने आत्महत्या कर ली। सवाल सीधा है… क्या अब सोशल मीडिया ही न्यायपालिका है? अगर किसी व्यक्ति को सिर्फ एक वायरल वीडियो के आधार पर अपराधी बना दिया जाए, तो फिर कानून, पुलिस और अदालतों की भूमिका क्या रह जाती है?

दीपक यू को किसी अदालत ने दोषी नहीं ठहराया था लेकिन समाज ने उसे सज़ा दे दी और वह सजा मौत साबित हुई। यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस सिस्टम का आईना है जहाँ डिजिटल ट्रायल पहले होता है, न्याय बाद में।

यह पहली बार नहीं है, करीब 8 साल पहले ‘दंगल’ फिल्म के समय भी ऐसा ही एक मामला सामने आया था। अभिनेत्री ज़ायरा वसीम ने एक युवक विकास पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया। मीडिया और सोशल मीडिया ने युवक को तुरंत दोषी मान लिया। मामला अदालत तक पहुँचा और आज भी न्यायिक प्रक्रिया में लंबित है।

मतलब साफ़ है: अंतिम फैसला आज तक नहीं आया, लेकिन आरोपित को वर्षों तक सामाजिक बदनामी और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी। यही डिजिटल ट्रायल की सबसे खतरनाक सच्चाई है, सज़ा पहले, फैसला बाद में।

एक खतरनाक ट्रेंड

आज देश में एक चिंताजनक ट्रेंड सामने आ रहा है-
आरोप लगते ही वीडियो या रील वायरल कर दी जाती है
बिना जाँच, बिना सुनवाई युवक को अपराधी बना दिया जाता है
कई मामलों में इसके बाद ब्लैकमेल और वसूली भी होती है

यह किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ बयान नहीं है, लेकिन यह सच है कि कई मामलों में हिंदू लड़कों को टारगेट किया गया है। कानूनी प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही उनकी ज़िंदगी बर्बाद कर दी जाती है।

मेरे पास ऐसे कई मामले हैं जहाँ हिंदू लड़कों को झूठे आरोपों में फँसाया गया, उन्हें सामाजिक रूप से तोड़ा गया और इतना मानसिक दबाव डाला गया कि वे आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो गए।

हर महिला झूठी नहीं होती, लेकिन हर आरोप को सच मान लेना खतरनाक है। यह मान लेना कि हर आरोप अपने-आप में सच है, समाज को बेहद खतरनाक दिशा में ले जा रहा है। आज मोबाइल कैमरा हथियार बन चुका है और सोशल मीडिया की भीड़ जज। कानून चुप है, और भीड़ फैसला सुना रही है।

एक ज़रूरी अपील- दीपक यू अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उसके बूढ़े माता-पिता आज भी ज़िंदा हैं- अकेले, टूटे हुए और आर्थिक संकट में।

हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि-

  • दीपक यू के परिवार को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ी जाए।
  • डिजिटल लिंचिंग के दोषियों पर सख़्त कानूनी कार्रवाई हो।
  • समाज मिलकर उसके माता-पिता को आर्थिक सहायता दे।

आज अगर हम चुप रहे, तो कल कोई और दीपक होगा। यह लड़ाई सिर्फ दीपक की नहीं, यह लड़ाई हम सबकी है।

बसंत पंचमी से नहीं होती ‘वसंत ऋतु’ की शुरुआत: जानिए सरस्वती पूजा पर दी जाने वाली ज्यादातर शुभकामनाओं में क्यों है ये गलतफहमी

इस वर्ष भारत में बसंत पंचमी 23 जनवरी 2026 को मनाई जा रही है। बसंत पंचमी माँ सरस्वती ज्ञान, बुद्धि और विद्या की देवी को समर्पित एक प्रमुख हिंदू पर्व है। लेकिन सोशल मीडिया पर किए जा रहे कई पोस्ट और शुभकामनाओं में एक आम गलतफहमी देखने को मिल रही है।

बड़ी संख्या में लोग यह दावा कर रहे हैं कि बसंत पंचमी के दिन ऋतु परिवर्तन होता है और इसी दिन वसंत ऋतु की शुरुआत होती है, जबकि यह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। इसी कड़ी में एक X यूजर ने लिखा, “खुशी और उत्साह के साथ वसंत ऋतु का स्वागत करें। बसंत पंचमी के चमकीले रंग आपके जीवन को गर्मजोशी और सकारात्मकता से भर दें।”

एक अन्य यूजर ने पोस्ट किया, “बसंत पंचमी की खासियत वसंत ऋतु के आगमन और ज्ञान, संगीत और कला की देवी माँ सरस्वती की पूजा में है, जिसे पीले वस्त्र पहनकर मनाया जाता है।”

इसी तरह एक और पोस्ट में लिखा गया, “बसंत पंचमी (जिसे वसंत पंचमी या सरस्वती पूजा भी कहा जाता है) एक सुंदर हिंदू पर्व है, जो वसंत ऋतु के आगमन और ज्ञान, बुद्धि, संगीत, कला और शिक्षा की देवी माँ सरस्वती के सम्मान में मनाया जाता है।”

एक अन्य यूजर ने बसंत पंचमी को ‘ऋतुराज वसंत’ यानी सभी ऋतुओं के राजा के आगमन का पर्व बताया।

क्यों मनाई जाती है बसंत पंचमी?

बसंत पंचमी माँ सरस्वती के प्राकट्य (अवतरण) के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। देवी सरस्वती के चार हाथ होते हैं, जिनमें वे वीणा, वेदों और ज्ञान का प्रतीक पुस्तक, जप माला और कमल धारण करती हैं। बसंत पंचमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को आती है।

पुराणों के अनुसार, जब भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, तो संसार तो था, लेकिन उसमें ध्वनि, संवाद और अभिव्यक्ति का अभाव था। चारों ओर मौन और नीरवता थी। इस अपूर्णता से ब्रह्मा असंतुष्ट थे। भगवान विष्णु की अनुमति से ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल छिड़का। जैसे ही जल पृथ्वी पर गिरा, उसमें कंपन उत्पन्न हुआ और एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई।

यही शक्ति माँ सरस्वती थीं, जिनके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और वरद मुद्रा थी। मान्यता है कि जब माँ सरस्वती ने वीणा का वादन किया, तब सृष्टि को वाणी प्राप्त हुई। पशु, पक्षी, मनुष्य, जल और वायु सभी में ध्वनि और चेतना का संचार हुआ। इसी दिन को बसंत पंचमी के रूप में मनाया गया और इसे सरस्वती जयंती भी कहा जाता है।

ऋग्वेद जो हिंदू धर्म का सबसे प्राचीन और प्रमाणिक ग्रंथ है, में माँ सरस्वती की महिमा मंडल 6 (सूक्त 61) और मंडल 7 में ‘ज्ञान को पवित्र करने वाली नदी’ के रूप में वर्णित है। ऋग्वेद में सरस्वती को माताओं में श्रेष्ठ (अंबितमे), नदियों में श्रेष्ठ (नदितमे) और देवियों में श्रेष्ठ (देवितमे) कहा गया है।

अम्बि॑तमे॒ नदी॑तमे॒ देवि॑तमे॒ सर॑स्वति । अ॒प्र॒श॒स्ता इ॑व स्मसि॒ प्रश॑स्तिमम्ब नस्कृधि ॥
अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ॥ (2.41.16)

ज्ञान और बुद्धि की दात्री होने के कारण विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक, कवि, कलाकार और संगीतकार इस दिन विशेष रूप से माँ सरस्वती की पूजा करते हैं। बसंत पंचमी मकर संक्रांति के कुछ सप्ताह बाद आती है, जब सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करता है। इसी कारण इसका संबंध वसंत ऋतु के आगमन की तैयारी या प्रतीक्षा से जोड़ा जाता है, न कि वास्तविक ऋतु परिवर्तन से।

बसंत पंचमी माँ शारदा (माँ सरस्वती का एक अन्य नाम) की आराधना का शुभ अवसर है, जिसमें लोग ज्ञान, बुद्धि और विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के लिए देवी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। भारत के अलग-अलग हिस्सों में बसंत पंचमी अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है।

पश्चिम बंगाल और ओडिशा में घरों और शिक्षण संस्थानों में सरस्वती पूजा का विशेष महत्व है। राजस्थान, मथुरा और वृंदावन में सांस्कृतिक उत्सव मनाए जाते हैं। पंजाब में यह पर्व पतंगबाजी, सरसों के खेतों और लोकगीतों के साथ मनाया जाता है।

बसंत पंचमी वसंत ऋतु के आगमन का दिन नहीं

हिंदू परंपरा में वर्ष को छह ऋतुओं में बाँटा गया है, शिशिर (अंतिम शीत), वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद और हेमंत। इन ऋतुओं को उत्तरायण और दक्षिणायन में भी विभाजित किया जाता है। लोकप्रिय धारणा के विपरीत, बसंत पंचमी वसंत ऋतु के आगमन का पर्व नहीं है।

इसका कारण यह है कि बसंत पंचमी शिशिर ऋतु के अंतर्गत आती है। यह माघ मास में पड़ती है, जो शिशिर ऋतु का हिस्सा है। शिशिर ऋतु लगभग मध्य जनवरी से मध्य मार्च तक रहती है और इसमें माघ व फाल्गुन मास शामिल होते हैं। वास्तविक वसंत ऋतु बसंत पंचमी के काफी बाद शुरू होती है। वसंत ऋतु चैत्र और वैशाख मास में आती है।

यानी लगभग मध्य मार्च से मध्य मई तक। यह वसंत विषुव (वर्नल इक्विनॉक्स) और मौसम के गर्म होने व फूलों के खिलने से जुड़ी होती है। सरल शब्दों में कहें तो बसंत पंचमी का नाम भले ही वसंत की याद दिलाता हो, लेकिन यह एक भ्रमित नाम है। वास्तविक ऋतु परिवर्तन चंद्र तिथि से नहीं, बल्कि सूर्य की गति और खगोलीय गणनाओं से तय होता है।

वैदिक खगोल शास्त्र के अनुसार, शिशिर के बाद सूर्य के मीन-मेष (मीना-मेष) राशि में प्रवेश के साथ वसंत ऋतु आरंभ होती है। साल 2026 में वसंत ऋतु 18 फरवरी से शुरू होकर 20 अप्रैल तक रहेगी।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

वीणा की नाद, माँ सरस्वती का आशीर्वाद और ज्ञान का प्रकाश: क्यों बसंत पंचमी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का उत्सव है

भारतीय परंपरा में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति, जीवन और चेतना के साथ गहरे संवाद का माध्यम होते हैं। बसंत पंचमी ऐसा ही एक पर्व है, जो मौसम के बदलाव से कहीं आगे जाकर मनुष्य के भीतर नई ऊर्जा, नई संवेदनशीलता और नई दृष्टि का संचार करता है।

यह पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है और इसे माघ पंचमी या श्री पंचमी भी कहा जाता है। हिंदू चूँकि इस पर्व के बाद के समय को शुभ कार्यों, नई शिक्षा, गृह प्रवेश, व्यवसाय आरंभ और विद्यारंभ के लिए अत्यंत मंगलकारी मानते हैं इसलिए इसे ‘बसंत पंचमी’ के तौर पर भी जाना जाता है। यहाँ ‘बसंत’ का अर्थ सिर्फ ऋतु से नहीं, बल्कि इसका तात्पर्य जीवन में गति के आगमन से है।

बसंत पंचमी: ऋतु परिवर्तन नहीं, जीवन में गति का आगमन

बसंत पंचमी केवल ठंड के अंत और गर्मी की शुरुआत का संकेत नहीं है, बल्कि यह ठहराव से गति की ओर बढ़ने का पर्व है। शीत ऋतु को भारतीय दर्शन में निष्क्रियता और जड़ता का समय माना गया है, जबकि बसंत सक्रियता, सृजन और विस्तार का प्रतीक है।

प्रकृति के साथ-साथ मानव जीवन भी इस परिवर्तन से प्रभावित होता है। मन अधिक उत्साही होता है, भावनाएँ प्रबल होती हैं और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है। यही कारण है कि बसंत पंचमी को शुभ कार्यों, नई शिक्षा, गृह प्रवेश, व्यवसाय आरंभ और विद्यारंभ के लिए अत्यंत मंगलकारी माना गया है।

सृष्टि में वाणी और ज्ञान का अवतरण

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, तब संसार दृश्य रूप में तो मौजूद था, लेकिन उसमें ध्वनि, संवाद और अभिव्यक्ति का अभाव था। चारों ओर मौन और निस्तब्धता छाई हुई थी। इस अपूर्णता को देखकर ब्रह्मा संतुष्ट नहीं थे।

भगवान विष्णु की अनुमति से ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल छिड़का। जैसे ही जल धरती पर गिरा, उसमें कंपन उत्पन्न हुआ और एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई। यह शक्ति थीं माँ सरस्वती, जिनके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और वर मुद्रा थी।

जब देवी ने वीणा का नाद किया, तब सृष्टि को वाणी प्राप्त हुई। पशु-पक्षी, मनुष्य, जल और वायु, सबमें ध्वनि और चेतना का संचार हुआ। इसी दिन को बसंत पंचमी माना गया और इसे सरस्वती जयंती के रूप में प्रतिष्ठा मिली।

माँ सरस्वती: विद्या से आगे विवेक की अधिष्ठात्री

भारतीय संस्कृति में ज्ञान को केवल सूचना या डिग्री तक सीमित नहीं माना गया। माँ सरस्वती उस ज्ञान की प्रतीक हैं जो मनुष्य को अधिक शांत, अधिक विचारशील और अधिक संवेदनशील बनाता है। ऋग्वेद में सरस्वती को चेतना की प्रवाहमान धारा कहा गया है, जो मनुष्य की बुद्धि, प्रज्ञा और आचार का आधार बनती है।

इसी कारण इस दिन विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक, कवि, कलाकार और संगीतकार विशेष रूप से माँ सरस्वती की आराधना करते हैं। परंपरागत रूप से बसंत पंचमी को बच्चों के विद्यारंभ के लिए सबसे शुभ माना गया है। आंध्र प्रदेश में तो इसे विद्यारंभ पर्व के नाम से जाना जाता है, जहाँ बच्चों को इसी दिन पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है।

होली का शुभारंभ और ब्रज की परंपराएँ

बसंत पंचमी के साथ ही ब्रज क्षेत्र में होली की औपचारिक शुरुआत हो जाती है। मंदिरों में ठाकुरजी को गुलाल अर्पित किया जाता है और रसिया, धमार और होरी का गायन शुरू हो जाता है। बरसाना की लट्ठमार होली, वृंदावन की रंगपंचमी, बनारस में बाबा विश्वनाथ से लेकर महाश्मशान तक खेली जाने वाली होली, ये सब परंपराएँ इस बात का प्रतीक हैं कि भारतीय संस्कृति में मृत्यु के बीच भी जीवन का उत्सव मनाया जाता है।

भारत के विविध रंगों में बसंत पंचमी

बसंत पंचमी पूरे भारत में अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है। बंगाल में यह सरस्वती पूजा का प्रमुख पर्व है। बिहार और उड़ीसा में इसका गहरा संबंध कृषि अनुष्ठानों से है। राजस्थान, मथुरा और वृंदावन में सांस्कृतिक उत्सवों की धूम रहती है।

पंजाब में यह पर्व पतंगबाजी, सरसों के खेतों और लोकगीतों के साथ मनाया जाता है। विशेष रूप से पंजाब में बसंत पंचमी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि लोकजीवन और खेती से जुड़ा बड़ा उत्सव है।

पश्चिम बंगाल में लश्कर के लिए भर्ती करने वाले आतंकी को 10 साल की सजा, NIA कोर्ट ने सैयद इरदीस को माना दोषी: साथी तानिया परवीन को सजा सुनाना बाकी, पढ़ें फैसले की अहम बातें

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की एक विशेष अदालत ने 21 जनवरी को सैयद एम इदरीस को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। चीफ जस्टिस सुकुमार राय ने यह फैसला सुनाया। इदरीस ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के लिए पश्चिम बंगाल में मुस्लिम युवाओं की भर्ती और उन्हें कट्टरपंथी बनाने की पाकिस्तान समर्थित साजिश में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी। जेल की सजा के साथ-साथ अदालत ने उस पर कुल 70,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है। इस सजा से संबंधित अदालती दस्तावेज ऑपइंडिया (OpIndia) के पास उपलब्ध हैं।

20 जनवरी को अदालत ने इदरीस द्वारा स्वेच्छा से जुर्म कबूल करने की याचिका को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। यह मामला एनआईए (NIA) द्वारा साल 2020 में दर्ज की गई एक पुरानी आतंकी साजिश से जुड़ा है। अदालत ने इदरीस को 10 साल जेल की सजा सुनाई है। वहीं, इसी मामले में आरोपित तानिया परवीन और पाकिस्तान में मौजूद दो अन्य आरोपितों के खिलाफ सुनवाई अभी भी जारी है।

दोषी ठहराए जाने के बाद कोर्ट ने सजा सुनाई

मामले की सुनवाई पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत के सामने अपना जुर्म कबूल करने की इच्छा जताई। अदालत ने उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में जानकारी दी। इसके बाद कोर्ट ने पाया कि इदरीस ने यह फैसला बिना किसी दबाव के, साफ तौर पर और कानूनी पहलुओं को अच्छी तरह समझकर लिया है।

अदालत ने सरकारी और बचाव पक्ष, दोनों की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने कहा कि आरोपित पर लगे जुर्म बहुत गंभीर हैं, जिनमें आतंकवादी गतिविधियाँ और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश शामिल है। इन आरोपों को देखते हुए सख्त सजा देना जरूरी था। हालाँकि, अदालत ने गौर किया कि आरोपित ने अपने किए पर पछतावा जताया है, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामलों में कड़ी सजा का उद्देश्य दूसरों को डराना और सुधार लाना ही होता है।

मामले की पृष्ठभूमि और FIR का विवरण

इदरीस के खिलाफ यह मामला 18 मार्च 2020 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बादुरिया थाने में दर्ज एक एफआईआर (FIR) से शुरू हुआ था। वहाँ की पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि लश्कर-ए-तैयबा के कुछ लोग इंटरनेट के जरिए युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें गुमराह करने का काम कर रहे हैं।

पुलिस ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई गंभीर धाराओं के साथ-साथ आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) और आईटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया था। इन धाराओं में भारत के खिलाफ साजिश रचने और धोखाधड़ी जैसे आरोप शामिल थे।

चूँकि यह मामला सीमा पार की आतंकी गतिविधियों और देश की सुरक्षा से जुड़ा था, इसलिए 3 अप्रैल 2020 को गृह मंत्रालय ने इसकी जाँच एनआईए (NIA) को सौंपने का आदेश दिया। इसके बाद एनआईए ने 5 अप्रैल 2020 को नए सिरे से केस दर्ज कर इस पूरे मामले की जाँच अपने हाथों में ले ली।

जाँचकर्ताओं द्वारा उजागर की गई LeT साजिश की प्रकृति

जांच में पता चला कि पश्चिम बंगाल में लश्कर-ए-तैयबा का एक गुप्त ग्रुप काम कर रहा था। इस ग्रुप में करीब 20 से 25 लोग शामिल थे। यह लोग पाकिस्तान में बैठे आकाओं के इशारे पर काम कर रहे थे। उनका मुख्य मकसद भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को नुकसान पहुँचाना था।

इस साजिश के तहत सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने और जिहाद का महिमामंडन करने के लिए किया गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस मॉड्यूल का काम भोले-भाले युवाओं को पहचान कर उन्हें अपने साथ जोड़ना था। वे समाज में नफरत फैलाने और देश को तोड़ने वाले प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल कर रहे थे, ताकि भारत में बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जा सके।

दोषी ठहराए गए आरोपित को सौंपी गई भूमिका

जाँच एजेंसी के अनुसार, कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ का रहने वाला इदरीस इस साजिश में कोई मामूली सदस्य नहीं था। वह प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक सक्रिय कार्यकर्ता था, जो कम से कम 2014 या उससे भी पहले से इस बड़ी साजिश का हिस्सा रहा था।

सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

अदालत ने गौर किया कि इदरीस ने इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए भारत और विदेशों में लोगों को लश्कर की गैरकानूनी गतिविधियों के लिए उकसाया, उन्हें सलाह दी और भड़काया। वह ऑनलाइन प्रोपेगेंडा फैलाने, आपसी तालमेल बिठाने और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के इरादे से युवाओं की भर्ती करने जैसे कामों में पूरी तरह शामिल पाया गया।

अभियोजन पक्ष ने यह साबित किया कि इदरीस ने आपराधिक बल के दम पर केंद्र और राज्य सरकारों को डराने की साजिश रची थी। उसने डिजिटल माध्यमों का सहारा लेकर आतंकी उद्देश्यों के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की। इन्हीं गंभीर हरकतों की वजह से उस पर आईपीसी की धाराओं और सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत मुकदमा चलाया गया।

अन्य आरोपितों और पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स से संबंध

जाँचकर्ताओं ने पाया कि इदरीस, तानिया परवीन के साथ मिलकर काम कर रहा था, जिसे पश्चिम बंगाल मॉड्यूल की मुख्य साजिशकर्ता माना गया है। वह जम्मू-कश्मीर के अल्ताफ अहमद राथर के संपर्क में भी था। मार्च 2020 में पश्चिम बंगाल पुलिस की एसटीएफ (STF) ने बादुरिया में छापेमारी के दौरान तानिया परवीन को गिरफ्तार किया था। उस समय उसके पास से जिहादी किताबें और कई अन्य आपत्तिजनक चीजें बरामद हुई थीं।

जाँच में यह भी पता चला कि तानिया परवीन एक कॉलेज छात्रा थी, जिसे पाकिस्तान में बैठे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने इंटरनेट के जरिए कट्टरपंथी बनाया था। वह सोशल मीडिया पर ऐसे कई कट्टरपंथी समूहों से जुड़ी थी जो आतंकी विचारधारा फैलाते थे। स्थानीय युवाओं को आतंकी ग्रुप में भर्ती करने और सीमा पार बैठे आकाओं से संपर्क बनाए रखने में उसकी मुख्य भूमिका थी।

एनआईए (NIA) ने इस पूरी साजिश में पाकिस्तान में छिपे दो अन्य भगोड़ों की भी पहचान की है। इनके नाम आयशा (उर्फ आयशा बुरहान/आयशा सिद्दीकी/सैयद आयशा) और बिलाल (उर्फ बिलाल दुर्रानी) हैं।

दोष स्वीकार करना और अदालत का फैसला

मुकदमे की सुनवाई के दौरान, 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत को बताया कि वह अपना जुर्म कबूल करना चाहता है। इस पर अदालत ने आरोपित से विस्तार से बात की और उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में साफ-साफ समझाया।

जब अदालत को यह यकीन हो गया कि आरोपित बिना किसी दबाव के और पूरी समझ के साथ अपना गुनाह मान रहा है, तब कोर्ट ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर पूरी सावधानी बरती जाए, तो आरोप तय होने के बाद भी जुर्म कबूल करने की याचिका को मंजूर किया जा सकता है।

सजा सुनाने की सुनवाई और प्रस्तुतियाँ

21 जनवरी को सजा सुनाए जाने के दौरान, इदरीस ने अदालत को अपने परिवार के बारे में बताया, जिसमें उसकी पत्नी, बच्चा और बीमार माता-पिता शामिल हैं। उसने अपने किए पर पछतावा जताया और कम सजा देने की अपील की। इदरीस ने यह भी दावा किया कि वह अब समाज की मुख्यधारा में वापस लौटना चाहता है। बता दें कि जब इदरीस को कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ से गिरफ्तार किया गया था, तब वह 28 साल का था और अपने भाई के साथ रहता था।

इदरीस के पछतावे को सुनने के बाद भी सरकारी वकील ने उसे कड़ी से कड़ी सजा देने की माँग की। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला आतंकी गतिविधियों से जुड़ा है, जिसका देश की सुरक्षा पर गहरा और बुरा असर पड़ता है। अदालत ने इदरीस और अभियोजन पक्ष, दोनों की बातों पर गौर किया। अंत में कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन का साथ देने जैसे गंभीर मामले में किसी भी तरह की ढिलाई या रियायत देना ठीक नहीं होगा।

अदालत द्वारा सुनाया गया विस्तृत फैसला

अदालत ने सैयद एम इदरीस को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत 10 साल के सश्रम कारावास (कड़ी कैद) की सजा सुनाई और 10,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया। इसके साथ ही, उसे सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) की धाराओं के तहत 5 साल की जेल और 10,000 रुपए के अतिरिक्त जुर्माने की सजा दी गई है।

सोर्स:कलकत्ता जिला कोर्ट

ये सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी, यानी उसे अधिकतम 10 साल जेल में बिताने होंगे। कानून के मुताबिक, जाँच और मुकदमे के दौरान इदरीस पहले ही जितना समय हिरासत में बिता चुका है, उसे उसकी कुल सजा की अवधि में से घटा दिया जाएगा।

बाकी आरोपितों के खिलाफ मुकदमे की स्थिति

भले ही इदरीस को उसके जुर्म कबूल करने के आधार पर दोषी ठहराकर सजा सुना दी गई है, लेकिन इस मामले में तानिया परवीन और अल्ताफ अहमद राथर के खिलाफ सुनवाई जारी रहेगी। ये दोनों आरोपित फिलहाल न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं। इसके अलावा, एनआईए (NIA) ने इस साजिश में शामिल पाकिस्तान में छिपे भगोड़े आरोपितों, आयशा और बिलाल के खिलाफ रेड और ब्लू कॉर्नर नोटिस भी जारी करवा लिए हैं।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

ग्रामीण भारत में शिक्षा से 2 गुना ज्यादा तंबाकू-गुटखे पर खर्च, रिसर्च में सामने आई खौफनाक तस्वीर: ओडिशा की BJP सरकार ने लगाया बैन

तम्बाकू पर ओडिशा सरकार ने पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। इससे पहले महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, गोवा, गुजरात जैसे कई राज्यों में गुटखा, जर्दा और निकोटीन वाले तंबाकू उत्पादों के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था। केन्द्र ने भी युवाओं में लोकप्रिय हो रहे ई सिगरेट पर बैन लगाया, सिगरेट पर स्वास्थ्य चेतावनियाँ लिखी। इसके बावजूद देश में गुटखा और तम्बाकू युक्त उत्पादों की बिक्री और सेवन में बेतहाशा वृद्धि हुई है।

भारत एक गुटका- नेशन बन चुका है। घरेलू इस्तेमाल को लेकर हाल में हुए एक सर्वे में बताया गया है कि गाँवों में गुटखा और दूसरे तम्बाकू वाले उत्पादों पर कुल इनकम का 4 फीसदी खर्च होता है, जबकि पढ़ाई पर 2.5 फीसदी खर्च किया जाता है।

ओडिशा सरकार ने लगाया प्रतिबंध

ओडिशा सरकार ने तंबाकू को लेकर बड़ा फैसला किया है। 22 जनवरी 2026 को ओडिशा सरकार ने बीड़ी, सिगरेट, गुटखा, खैनी और जर्दा समेत सभी तंबाकू वाले पदार्थों पर बैन लगा दिया है। इनके प्रोडक्शन, पैकेजिंग, डिस्ट्रीब्यूशन और बेचने पर भी राज्य में प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसका नोटिफिकेशन 21 जनवरी को आया था।

ओडिशा के स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक गुटखा, जर्दा और तंबाकू उत्पादों का सेवन कैंसर की सबसे बड़ी वजह है। इसके अलावा पान मसाला, धुआँ पत्ता, पान-सुपारी जैसे उत्पाद स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं। इनसे मुँह, गले, पेट, किडनी, फेफड़े आदि के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। ओडिशा में करीब 25 % वयस्क तम्बाकू का इस्तेमाल करते हैं, जो देश के औसत से दोगुणा है।

गुटखा के सेवन में बेतहाशा बढ़ोतरी

नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (NSO) ने अगस्त 2023 से जुलाई 2024 तक घरेलू खपत खर्च पर एक सर्वे किया। स्टडी की एक खास बात देश में गुटखा की खपत में बढ़ोतरी थी, इस बात पर EAC-PM (प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद) की सदस्य शमिका रवि और उनके साथी पार्थ प्रोतिम बर्मन ने भी इंडियन एक्सप्रेस के एक हालिया आर्टिकल पर चर्चा की।

नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस, मिनिस्ट्री ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन (MoSPI) का हिस्सा है। यह खाने और नॉन-फूड दोनों तरह के प्रोडक्ट्स पर डेटा इकट्ठा करता है और उसकी एनालिसिस करता है। जनवरी 2026 में पब्लिश हुए हालिया एनालिसिस ने इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे गुटखा का इस्तेमाल सभी राज्यों, खासकर देश के उत्तरी राज्यों में एक आम बात हो गई है। वहीं दक्षिणी राज्यों में इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, रवि और बर्मन ने बताया कि तंबाकू का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। निचले तबके के लोग इसकी वजह से और गरीब होते जा रहे हैं। यह सब तब हो रहा है जब राज्यों में सब्सिडी वाली हेल्थकेयर बढ़े हैं।

महँगाई के हिसाब से देखें तो 2011-12 और 2023-2024 के बीच तंबाकू पर प्रति व्यक्ति खर्च ग्रामीण इलाकों में 58% और शहरी इलाकों में 77% तक बढ़ गया है। अब तम्बाकू ग्रामीण इलाकों में महीने के प्रति व्यक्ति कंज्यूमर खर्च (MPCE) का लगभग 1.5% और शहरी इलाकों में 1% हिस्सा बन गया है। ये आंकड़े मामूली लग सकते हैं, लेकिन यह चिंता की बात है कि तंबाकू का इस्तेमाल करने वाले परिवारों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है।

ग्रामीण इलाकों से परेशान करने वाले आँकड़े

ग्रामीण भारत में तंबाकू इस्तेमाल करने वाले घरों की संख्या 9.9 करोड़ (कुल घरों का 59.3%) से बढ़कर 13.3 करोड़ (68.6%) हो गई है। महज एक दशक से भी कम समय में 33% की बढ़ोतरी हुई है।

रवि और बर्मन ने बताया कि शहरी भारत में तम्बाकू इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोतरी का आंकड़ा और भी चौंकाने वाला है। तंबाकू सेवन करने वाले परिवारों की संख्या 2.8 करोड़ (34.9%) से बढ़कर 4.7 करोड़ (45.6%) हो गई। परेशान करने वाली बात यह है कि तंबाकू का इस्तेमाल शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में तेजी से बढ़ता जा रहा है। यह अब सिर्फ खास ग्रुप या आबादी तक ही सीमित नहीं है।

ग्रामीण इलाकों में सबसे बड़ा खुलासा गुटखा को लेकर हुआ है। यहाँ गुटखा खाने वाले परिवारों की संख्या 6 गुणा बढ़ी है। पहले यह 5.3% थी, जो बढ़कर अब 30.4% हो गया है। ग्रामीण इलाकों में तंबाकू पर होने वाले कुल खर्च का 41 फीसदी गुटखे पर ही होता है, जिससे यह सबसे बड़ा तंबाकू उत्पाद बन गया है।

दूसरी ओर, शहरी भारत भी इससे अछूता नहीं है. शहरों में सिगरेट सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला तंबाकू उत्पाद है, जिसे 18.1 फीसदी शहरी परिवार इस्तेमाल करते हैं। साथ ही अब करीब 16.8 फीसदी शहरी परिवार भी गुटखा खाते हैं, जो दिखाता है कि यह उत्पाद शहरों में कितनी तेजी से फैल रहा है।

सेंट्रल भारत में गुटखा का इस्तेमाल ज्यादा है

रवि और बर्मन ने बताया कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में देश के ग्रामीण औसत लगभग 30% से ज़्यादा गुटखा का इस्तेमाल होता है। मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में 60% गुटखा खाते हैं और उत्तर प्रदेश पहले ही 50% का आँकड़ा पार कर चुका है। दिक्कत यह है कि शहरी ट्रेंड भी अब ग्रामीण जैसे होने लगे हैं।

मध्य प्रदेश के लगभग आधे शहरी घरों में गुटखा खाया जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में यह आँकड़ा एक-तिहाई से भी ज़्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक, कई नॉर्थ-ईस्ट राज्यों में भी ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में गुटखा का इस्तेमाल नेशनल औसत से ज्यादा है। दक्षिणी भारत में इसका इस्तेमाल आम तौर पर कम होता है, लेकिन नतीजे परेशान करने वाले हैं। कर्नाटक में चार में से एक ग्रामीण परिवार गुटखा का इस्तेमाल करता है।

अलग-अलग वर्ग में सेवन का तरीका अलग

गरीब ग्रामीण परिवार अपने हर महीने के कुल खर्च का 1.7 फीसदी तंबाकू पर खर्च करते हैं, जबकि सबसे अमीर 20 फीसदी परिवार अपनी हर महीने के कुल खर्च का सिर्फ 1.2 फीसदी तंबाकू पर खर्च करते हैं। शहरी भारत में यह अंतर और भी गहरा है। यहाँ निचले वर्ग के 40 फीसदी परिवारों में आधे से ज्यादा तंबाकू का सेवन करते हैं, जबकि सबसे अमीर 20 फीसदी परिवारों में यह आँकड़ा 37 फीसदी से भी कम है।

तंबाकू का इस्तेमाल निचले तबके के घरों में ज्यादा आम है। इनकम डिस्ट्रीब्यूशन के सबसे निचले 40% हिस्से में 70% से ज्यादा ग्रामीण परिवार तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं। यह प्रतिशत बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 85% से ज्यादा है।

गुटखा सेहत और पैसे पर भारी

गुटखा खाने से न केवल पैसे खर्च होते हैं, बल्कि इससे गंभीर बीमारियाँ भी होती है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, तंबाकू से भारत में हर साल लगभग 13 लाख मौतें होती हैं। यह कैंसर, दिल की बीमारी, सांस की बीमारियों और हाइपरटेंशन जैसी नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियाँ (NCDs) होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, देश में होने वाली सभी मौतों में से 63% के लिए NCDs जिम्मेदार हैं।

तम्बाकू के इस्तेमाल से हेल्थकेयर पर काफी असर पड़ा है। केन्द्र ने आयुष्मान भारत जैसी योजना को कमजोर परिवारों को मेडिकल खर्चों से बचाने के लिए बनाया था। अक्टूबर 2025 तक लगभग 12 करोड़ परिवारों को 42 करोड़ से ज्यादा आयुष्मान कार्ड मिल चुके थे। इस प्रोग्राम की वजह से परिवारों को मेडिकल खर्चों में लगभग 1.52 लाख करोड़ रुपये की बचत हुई।

FY 2015 और FY2022 के बीच सरकारी हेल्थ खर्च 29% से बढ़कर 48% हो गया।

जब कम इनकम वाले घरों में तंबाकू के बढ़ते इस्तेमाल से बीमारियों पर खर्च बढ़ गया है। इसकी वजह से देश को हेल्थकेयर पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। ग्रामीण भारत में सबसे गरीब 40% घर अपने MPCE का सिर्फ 2.5% शिक्षा पर खर्च करते हैं, जबकि शराब, तंबाकू और नशीली चीजों पर 4% खर्च होता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि तंबाकू के इस्तेमाल में बिना किसी रोक-टोक के बढ़ोतरी, सरकार के सोशल प्रोटेक्शन और यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के कमिटमेंट के साथ मेल नहीं खाती। HCES (हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे) ने इसको लेकर चेतावनी भी दी है।

इस संवेदनशील मामले से निपटने के लिए सुझाव भी दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि सिर्फ चबाने वाले तंबाकू पर और टैक्स लगाना काफी नहीं होगा, भले ही सेंट्रल एक्साइज़ (अमेंडमेंट) बिल 2025 में इसकी माँग की गई हो। इसके लिए रेगुलेटरी कंट्रोल को मज़बूत करना ज़रूरी है और बॉलीवुड के बड़े सेलेब्रिटीज के ऐसे प्रचार पर रोक लगनी चाहिए, जो ‘चांदी की परत चढ़ी इलायची’ की आड़ में पान मसाला और गुटखा को प्रमोट करने के लिए सरोगेट एडवरटाइजिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

286 किलो वजन, 08 फीट लंबाई, पंच धातु से निर्मित… क्या है ‘कोदंड’ जो अजानबाहु को किया समर्पित: जानिए इसके बारे में क्या कहते हैं धर्मग्रंथ

रामभक्तों के लिए बुधवार (22 जनवरी 2026) का दिन बहुत खास है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ पर अयोध्या को एक अनमोल भेंट मिली है। ये भेंट है 286 किलोग्राम वजनी भव्य कोदंड। पंचधातु से बना यह धनुष ओडिशा से भव्य शोभायात्रा के साथ अयोध्या पहुँचा। मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने इसे विधि-विधान से स्वीकार किया। हजारों श्रद्धालु, संत-महात्मा और ट्रस्ट के पदाधिकारी मौजूद थे। हर कोई इसकी भव्यता और दिव्यता देखकर अभिभूत हो गया।

यह कोदंड सिर्फ एक धनुष नहीं है, बल्कि भगवान श्रीराम के शौर्य, धर्म और मर्यादा का प्रतीक है। यह आस्था, भारतीय शिल्पकला, राष्ट्रभक्ति और नारीशक्ति का अद्भुत मिलन है। ओडिशा के सनातन जागरण मंच ने इसे रामलला को समर्पित किया।

कोदंड क्या है और रामायण में इसका महत्व क्या है

कोदंड भगवान श्रीराम के धनुष का नाम है। वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास जी की रामचरितमानस में इसका बार-बार जिक्र मिलता है। श्रीराम को कोदंडधारी कहा जाता है, क्योंकि यह उनके बल, न्याय और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है।

उदाहरण के लिए, सीता स्वयंवर में श्रीराम ने शिव जी का भारी धनुष (जो कोदंड जैसा ही था) आसानी से उठाया और उसकी डोरी चढ़ाते ही वह टूट गया। इससे राजा जनक की पुत्री माता सीता का विवाह श्रीराम से हुआ। यह घटना बताती है कि श्रीराम कितने बलशाली और मर्यादित थे। परशुराम जी भी गुस्से में आए, लेकिन श्रीराम ने शांतिपूर्वक उनका क्रोध शांत किया।

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में श्रीराम के सौंदर्य का वर्णन करते हुए लिखा है-

“कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।
मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥”

अर्थात, कठिन कोदंड को चढ़ाए हुए, सिर पर जटाजूट बाँधे श्रीराम कितने सुंदर लगते हैं, जैसे हरे पर्वत पर लाखों बिजलियाँ और साँप लहरा रहे हों। यह दोहा श्रीराम के वीर और सुंदर रूप को दिखाता है।

एक और प्रसिद्ध मंत्र राम रक्षा स्तोत्र से है-

“चारु कोदंडं चारु चापं चारु शरं चारु सायकं।
चारुं चारुं चारु रूपं चारु चारु नमो नमः॥”

यह स्तोत्र रोजाना पढ़ने से रक्षा और शक्ति मिलती है। कोदंड यहाँ श्रीराम के दिव्य हथियार के रूप में आता है।

इस कोदंड की विशेषताएँ और निर्माण

यह कोदंड सोना, चाँदी, एल्युमिनियम, जस्ता और लोहे जैसी पाँच धातुओं से बना है। इसका वजन 286 किलो है और लंबाई-मजबूती देखते ही बनती है। सबसे खास बात यह है कि इस पर भारतीय सेना की वीर गाथाएँ उकेरी गई हैं। कारगिल युद्ध के बलिदानियों और अन्य युद्धों के चित्र बने हैं। इससे यह धनुष सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति का भी प्रतीक बन गया है। श्रीराम का कोदंड अधर्म का नाश करता था, वैसे ही आज की सेना देश की रक्षा करती है।

निर्माण की कहानी भी प्रेरणादायक है। तमिलनाडु के कांचीपुरम में 48 महिला कारीगरों ने आठ महीने तक दिन-रात मेहनत की। ये महिलाएं पारंपरिक शिल्पकला की जानकार हैं। उनकी साधना और समर्पण से यह धनुष तैयार हुआ। यह नारीशक्ति की मिसाल है कि कैसे महिलाएं बड़ी से बड़ी चुनौती पूरा कर सकती हैं।

भव्य शोभायात्रा का सफर

यह कोदंड 3 जनवरी 2026 को ओडिशा के राउरकेला से रवाना हुआ। सनातन जागरण मंच के संतोष कुमार विश्वाल ने बताया कि शोभायात्रा ओडिशा के सभी 30 जिलों से गुजरी। रास्ते में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा की, ढोल-नगाड़े बजाए और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए। यह यात्रा सिर्फ धार्मिक नहीं थी, बल्कि सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय एकता का संदेश लेकर चली।

19 जनवरी 2026 को कोदंड पुरी पहुँचा। वहाँ भगवान जगन्नाथ के मंदिर में दर्शन हुए। जगन्नाथ जी के आशीर्वाद के बाद यात्रा आगे बढ़ी। हर जगह भक्तों का उत्साह देखने लायक था। लोग दूर-दूर से आते और कोदंड को छूकर आशीर्वाद लेते।

अयोध्या में आगमन और समर्पण

बुधवार (22 जनवरी 2026) को कोदंड अयोध्या पहुँचा। राम मंदिर परिसर में हजारों लोग इकट्ठा हुए। चंपत राय जी ने इसे रामलला को अर्पित किया। संतों ने मंत्रोच्चार किया और पूजा-अर्चना हुई। यह दिन प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगाँठ का भी था, इसलिए उत्सव दोगुना हो गया।

इस कोदंड का गहरा संदेश

यह कोदंड हमें कई बातें सिखाता है। पहला- भक्ति और समर्पण से कितना बड़ा काम हो सकता है। दूसरा- महिलाओं की शक्ति, 48 कारीगरों ने दिखाया कि नारीशक्ति क्या होती है। तीसरा- राष्ट्रभक्ति, सेना की गाथाएँ बताती हैं कि श्रीराम का शौर्य आज भी जीवित है। चौथा- एकता, ओडिशा से तमिलनाडु तक इसमें पूरे देश का योगदान दिख रहा है।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी कहते हैं: “राम नाम जपना सब सुखों का मूल है।”

ऐसे आयोजन हमें राम नाम की महिमा याद दिलाते हैं।

प्रभु श्रीराम का यह कोदंड अयोध्या पहुँचकर रामभक्तों के दिलों को छू गया। यह बताता है कि राम राज केवल अतीत नहीं, बल्कि आज भी प्रेरणा है। धर्म की जीत, शौर्य की रक्षा और शिल्प की सुंदरता का यह संगम पूरे देश में नई उमंग भर रहा है।

कट्टरपंथी वर्कआउट के बहाने बना रहे हिंदू लड़कियों को निशाना, पहचान छिपाकर करते हैं लव जिहाद: जानें मुस्लिम ट्रेनर्स को जिम के बाहर रखना क्यों है जरुरी?

कुछ साल पहले तक जिम को सिर्फ शरीर बनाने, आत्मविश्वास बढ़ाने और स्वस्थ रहने की जगह माना जाता था। माता-पिता निश्चिंत होकर अपनी बेटियों को जिम भेजते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह एक सुरक्षित, प्रोफेशनल माहौल है। लेकिन धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी घटनाएँ सामने आने लगीं, जिनमें जिम का नाम शोषण, धोखे, ब्लैकमेलिंग, धर्मांतरण और लव जिहाद के आरोपों से जुड़ने लगा।

मुस्लिम ट्रेनर हिंदू लड़कियों को हिंदू नामों से फँसाते और बाद में उन पर धर्मांतरण का दबाव डालते और ना मानने पर उनकी फोटो को एडिट कर अश्लील सामाग्री तैयार कर ब्लैकमेल करते। आगे कुछ ऐसी ही घटनाओं की जानकारी दी गई है, ताकि यह समझना आसान हो कि हिंदु बहन-बेटियों की सुरक्षा के लिए इन जिहादियों और कट्टरपंथियो का एक साधारण से जिम से भी दूर रहना किस तरह से आवश्यक है।

जिम की आड़ में धर्मांतरण और ब्लैकमेलिंग का नेटवर्क

सबसे नए मामले में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में धर्म परिवर्तन और नमाज पढ़ने का दबाव डालकर युवतियों के शोषण की घटना है, जहाँ जिम की आड़ में यह पूरा नेटवर्क चलाए जाने का आरोप है। पुलिस ने इस मामले में मो शेख अली आलम, फैजल खान, जहीर खान और शादाब को गिरफ्तार किया। बाद में पुलिस ने आरोपित जिम मालिक/ट्रेनर फरीद को एनकाउंटर के बाद गिरफ्तार किया।

पीड़ित युवतियों के अनुसार, शहर के अलग-अलग इलाकों में संचालित KGN और आयरन फायर नामक जिमों में वे व्यायाम के लिए जाती थीं। यहाँ जिम संचालक और ट्रेनर पहले उनसे दोस्ती करते, फिर प्रेम जाल में फँसाकर धीरे-धीरे धर्म परिवर्तन और नमाज पढ़ने का दबाव बनाने लगते थे।

आरोप है कि युवतियों के निजी फोटो और वीडियो बनाए गए, जिनके जरिए उन्हें ब्लैकमेल कर मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया गया। विरोध करने पर बदनाम करने और नुकसान पहुँचाने की धमकियाँ दी जाती थीं। पुलिस जाँच में सामने आया है कि आरोपित युवतियों से अलग-अलग मौकों पर पैसे भी वसूलते थे।

पीड़िताओं की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने पाँच जिमों को सील भी कर दिया है।

बरेली के एयू फिटनेस में ‘जिम जिहाद’ का मामला

बरेली में सामने आए जिम ट्रेनर से जुड़े मामले में महिला के भाई ने गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए थे, जिनको लेकर इलाके में तनाव की स्थिति बनी थी। यह पूरा मामला उस समय उजागर हुआ था, जब एक विवाहित महिला अपने पति और पाँच साल के बेटे को छोड़कर जिम में काम के दौरान बने संबंधों के चलते जिम ट्रेनर शोएब के साथ रहने लगी थी।

महिला के भाई का आरोप था कि उसकी बहन को जिम ट्रेनर शोएब ने योजनाबद्ध तरीके से फँसाया था। भाई के अनुसार, एयू फिटनेस जिम में ‘जिम जिहाद’ चलाया जा रहा था, जहाँ मुस्लिम ट्रेनरों के जरिए हिंदू लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाया जाता था और बाद में उन पर धर्मांतरण का दबाव बनाया जाता था।

भाई ने दावा किया था कि उसकी बहन भी इसी साजिश का शिकार हुई थी और उसे परिवार से तोड़ने की कोशिश की जा रही थी। उसने यह भी आरोप लगाया था कि जब वह अपनी बहन को समझाने और वापस पति व बच्चे के पास भेजने के लिए जिम पहुँचा था, तो शोएब और उसके साथियों ने उसे घेर लिया था।

उसके साथ बेरहमी से मारपीट की गई थी और उसे अधमरी हालत में छोड़ दिया गया था। परिवार ने आरोप लगाया था कि शोएब और उसके साथ जुड़े लोग कट्टरपंथी सोच रखते थे और पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दे रहे थे।

घटना के बाद महिला की माँ हिंदूवादी संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ मौके पर पहुँची थीं और जिम के बाहर प्रदर्शन किया गया था। अंत में भाई की तहरीर पर पुलिस ने जिम ट्रेनर शोएब और जिम मालिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर हिरासत में लिया था।

होटल में पकड़ा गया जिम ट्रेनर, पहचान छिपाने के आरोप

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में जिम ट्रेनर और युवती के होटल में पकड़े जाने का मामला सामने आया था। आरोप लगा कि युवक ने अपनी असली पहचान छिपाकर युवती से दोस्ती की थी। पकड़ा गया मजहर खान नाम का ये युवक जिम ट्रेनर था। अपनी पहचान छिपाकर हिंदू युवती को हबीबगंज इलाके के एक होटल में लेकर पहुँचा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, होटल में मजहर की जगह उसने अपना नाम बंटी बताया था। खबर हिंदू संगठनों को लगी तो बड़ी संख्या में कार्यकर्ता होटल पहुँच गए। युवक को पकड़कर उसकी पिटाई कर दी। इसी बीच सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और युवक को पकड़कर अपने साथ थाने लेकर आई।

आरोपित मजहर, विशाल फिटनेस सेंटर में जिम ट्रेनर था। उसने अपना नाम बंटी बताकर युवती से दोस्ती बढ़ाई थी। दोनों की मुलाकात जिम में ही हुई थी। दोस्ती बढ़ने के बाद मजहर युवती को लेकर होटल गया था।

जिम ट्रेनर अमन खान करता था बैड टच

मध्य प्रदेश के जबलपुर की एक जिम में लव जिहाद और धर्मांतरण की कोशिश का मामला सामने आया। मामला आधारताल थाना क्षेत्र में स्थित साईं फिटनेस जिम का था। यहाँ रिसेप्शनिस्ट की जॉब करने वाली 21 वर्षीय युवती ने जिम के ट्रेनर के खिलाफ केस दर्ज करवाया।

युवती का आरोप था कि आरोपित अपना नाम अमन राज बताता था जबकि उसका असली नाम अमन खान था। शिकायत के अनुसार, अमन जिम में आने वाली युवतियों से बैड टच करता था और धर्मांतरण के लिए उनका ब्रेन वॉश करता था।

युवती ने आरोप लगाया कि आरोपित उसे भी बैड टच करते हुए टॉर्चर करता था, युवती हिन्दू टाईगर फोर्स नाम के संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ आधारताल पहुँची थी जिसकी शिकायत पर पुलिस ने अमन खान पर FIR दर्ज की। पुलिस ने साईं फिटनेस जिम पहुँचकर भी जाँच की और जिम ट्रेनर अमन खान को गिरफ्तार कर लिया।

जिम ट्रेनर और युवती के साथ पकड़े जाने पर विवाद, हिंदू संगठनों ने लगाए गंभीर आरोप

मध्य प्रदेश के इंदौर के भंवरकुआँ इलाके में एक जिम ट्रेनर को युवती के साथ घूमते हुए बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पकड़ा और उसकी पिटाई कर उसे थाने ले जाया गया। मामले में जिम ट्रेनर के खिलाफ प्रतिबंधात्मक धाराओं में कार्रवाई की और उसे जेल भी भेज दिया गया। आरोपित ट्रेनर का नाम शादाब मंसूरी था, जो पेशे से एक जिम ट्रेनर था।

बजरंग दल के जिला संयोजक विजय कलखोर ने दावा किया कि शादाब का पहले से निकाह हो चुका है और उसके दो बच्चे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि शादाब जिम में आने वाली हिंदू युवतियों से नजदीकियाँ बढ़ाकर उन्हें इस्तेमाल करता और बाद में धोखा देकर निकल लेता था।

जिमों पर छापे, विरोध और राजनीतिक बयान

लगातार बढ़ते मामलों को देखते हुए मध्य प्रदेश में जिमों को लेकर बड़े स्तर पर विवाद भी खड़ा हुआ था। कुछ जिमों में मुस्लिम ट्रेनरों की मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए गए। हिंदू संगठनों ने छापे मारे और प्रशासन से कार्रवाई की माँग की।

हिंदू संगठन बजरंग दल के कार्यकर्ता भोपाल के उस जिम में पहुँचे जहाँ हिंदू लड़कियों को मुस्लिम ट्रेनर ट्रेनिंग दे रहे थे। बजरंग दल का दावा था कि भोपाल में जिम ‘लव जिहाद’ का अड्डा बन गया है। मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद आलोक शर्मा ने भी कथित ‘लव जिहाद’ का मुद्दा उठाया।

बजरंग दल से जुड़े कमल पिपरिया ने मीडिया से बातचीत में कहा, “भोपाल में जिम ‘लव जिहाद’ का अड्डा बना हुआ है। हिंदू लड़कियों-महिलाओं को मुस्लिम युवक नाम बदलकर ट्रेनिंग दे रहे हैं। सवाल यह है कि नाम बदलकर क्यों ट्रेनिंग दिया जा रहा है। साथ ही लड़कियों के लिए महिला स्टाफ क्यों नहीं रखा गया है? हमारी प्रशासन से माँग है कि सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही यहाँ पर 90 फीसदी हिंदू महिलाओं के लिए ट्रेनर भी हिंदू ही होना चाहिए।”

भोपाल में एक जिम में पुलिस टीम के साथ पहुँचे सब-इंस्पेक्टर (SI) ने कथित तौर पर कर्मचारियों से कहा कि यहाँ न कोई मुस्लिम ट्रेनिंग देने आएगा और न ही लेने। पुलिस टीम के साथ बजरंग दल के कार्यकर्ता भी मौजूद थे। बजरंग दल से जुड़े प्रशांत सिंह पटेल ने कहा कि जो 90 फीसदी हिंदू लड़कियाँ जिम में आती हैं उन्हें ट्रेनिंग देने के लिए कोई भी महिला ट्रेनर नहीं है।

संचालक से माँग की गई की वह महिलाओं के लिए महिला ट्रेनर की नियुक्ति करें। भारतीय जनता पार्टी के विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा कि हम सभी का एक ही मत है कि भोपाल में लव जिहाद करने वाले पकड़े जा रहे हैं। उन पर सख्ती से कार्रवाई होनी चाहिए। प्रशासन को इस बात की गुत्थी सुलझानी चाहिए कि कौन इन्हें पनाह दे रहा है।

इसके साथ ही साथ उन्होंने हिंदू समाज से अपील की कि वह इस बात पर ध्यान दें कि घर के बेटी किस जिम में जा रही हैं और कौन उन्हें ट्रेनिंग दे रहा है। उन्होंने कहा कि अगर अभी भी इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो हो सकता है कि ‘लव जिहाद’ की कड़ी में अगला नंबर आपका हो।

इसके अलावा बीजेपी सांसद अलोक शर्मा ने भी कहा कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में लव जिहाद की अनुमति नहीं दी जाएगी। अगर कोई ऐसा करता है तो कठोर से कठोर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि भोपाल में कई जिम है जिसकी लिस्ट तैयार की जा रही है। इन जिम में ट्रेनर मुस्लिम समुदाय के हैं। प्रशासन को जिम संचालक के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

BJP विधायक ने कहा- मुस्लिम लड़कियाँ भी ना हों जिम में ट्रेनर

ऐसे मामलों में बढ़ोतरी को देखते हुए कई अन्य राजनीतिक नेताओं के बयान भी सामने आए, जिनमें महिलाओं से सतर्क रहने और जिम चुनते समय ट्रेनरों की जानकारी रखने की अपील की गई। BJP के विधायक रामेश्वर शर्मा ने हिंदू महिलाओं से अपील की कि वे मुस्लिम ट्रेनर से सावधान रहें।

उन्होंने हिंदू महिलाओं से हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहा, “सभी बहन-भाइयों से, बेटियों से प्रार्थना करता हूँ कि इस बात का ध्यान रखो, सावधान रहो। आप यह देखो कि जिस जिम में ट्रेनिंग ले रहे हो उसका अपराधिक रिकॉर्ड क्या है?” 

शर्मा ने आगे कहा कि मुस्लिम लड़कियाँ भी ट्रेनर के तौर पर सही नहीं हैं। उन्होंने केरल फाइल्स फिल्म का उदाहरण देते हुए कहा कि मुस्लिम बेटियाँ भी हिंदू लड़कियों को झाँसे में लेकर मुस्लिम लड़कों से दोस्ती करवाती हैं।

एक जैसी घटनाएँ, एक जैसी कहानी, फिर क्यों ना हो मुस्लिम ट्रेनर्स को जिम से दूर रखने की माँग

इन सभी मामलों को जोड़कर देखें तो घटनाएँ अलग-अलग शहरों की हैं, लेकिन तरीका एक जैसा है। जिम में ट्रेनर और ट्रेनी के बीच भरोसे का रिश्ता बनता है। ट्रेनर की भूमिका मार्गदर्शक की होती है, जिससे युवतियाँ जल्दी प्रभावित होती हैं।

इसी भरोसे का गलत फायदा उठाकर कट्टरपंथी भोली-भाली मासूम हिंदू लड़कियों को निशाना बनाते हैं और अंत में कभी उनको नमाज पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है तो कभी सीधे धर्मांतरण के लिए। ऐसे में यह सोचना और इस तरह की माँग करना अपने आप में बेहद जरुरी हो जाता है कि जिम से मुस्लिम ट्रेनर्स को बाहर किया जाए।

सायमा के लिए ‘CRPF’ लिखकर मुस्लिम नाम छिपाना सही, पर आतंकी का वीडियो सामने आना ‘निंदनीय’: एजेंडाधारी वामी-कामी ‘गैंग’ की मानसिकता समझिए

हाल ही में ग्रेटर नोएडा से एक रूह कँपा देने वाला मामला सामने आया है। CRPF जवान तारिक अनवर और उसकी बेगम रिम्पा खातून ने रिश्तेदारी में 10 साल की बच्ची के साथ बेरहमी से मारपीट की। इतना प्रताड़ित किया कि उसकी पसलियाँ टूट गईं, दाँत टूट गए, पूरे शरीर पर जख्म हैं। आज वह बच्ची अस्पताल में वेंटिलेटर पर जिंदगी के लिए लड़ रही है। यहाँ सवाल इंसानियत का है, बच्ची के साथ हुए जुल्म का है और न्याय का है।

लेकिन इस जघन्य अपराध पर रेडियो मिर्ची RJ सायमा की टिप्पणी ने इसे एजेंडा बना दिया। सायमा ने मामले को इंसानियत के नजरिए से देखने के बजाए अपने तयशुदा एजेंडे के तहत पेश किया। सायमा ने सिर्फ ‘CRPF’ को फोकस में रखा और आरोपित का नाम छिपा लिया। और अंत में ‘जय हिंद’ जोड़ दिया।

RJ सायमा का ट्वीट (फोटो साभार: X)

यही RJ सायमा की असली पहचान है। वो हर मामले को इंसान नहीं, पहचान के चश्में से देखती हैं। अगर आरोपित मुस्लिम हो तो नाम छिपाओ। शब्द तौलो। और अपने नैरेटिव के अनुसार तोड़-मरोड़कर सामने रख दो। जिससे अपराधी नहीं, बल्कि वर्दी बदनाम हो और सरकार घेरे में आए।

सायमा ने यहाँ भी यही किया। मुस्लिम नाम छिपाकर ‘CRPF’ को उछाला और वर्दी को कठघरे में लाया गया। सायमा के लिए अपराध मैटर नहीं करता। मैटर करता है अपराधी की पहचान। और फिर आता है सबसे घिनौना हिस्सा- टिप्पणी के आखिर में ‘जय हिंद’। यह कोई देशभक्ति दिखाने को लिए तो यहाँ नहीं ही लिखा गया है, बल्कि यह सेना को ‘मॉक’ करने के इरादे से जरूर लिखा प्रतीत हो रहा है।

RJ सायमा के पुराने बयानों को देखें तो यह तस्वीर और साफ होती है। हिजाब पर सवाल हो, तो ‘इस्लाम में जबरदस्ती नहीं‘ की लाइन तैयार रहती है। कुरान पर आलोचना हो, तो तुरंत उसे गलत समझ और इस्लामोफोबिया बता दिया जाता है। लेकिन जब बात देश की सुरक्षा संस्था से जुड़ी CRPF की हो, तो वही संतुलन गायब हो जाता है। वहाँ पूरी वर्दी को दोषी ठहराने में देर नहीं लगती।

यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बल किसी धर्म के नहीं होते। वे देश के होते हैं। अगर किसी वर्दी वाले ने अपराध किया है, तो उस व्यक्ति पर कार्रवाई होनी चाहिए, न कि पूरी वर्दी को कठघरे में खड़ा करने की साजिश। लेकिन जब ऐसे मामलों में आरोपित की पहचान धुँधली रखी जाए और सेना को टारगेट किया जाए, तो शक होना लाजमी है।

निष्कर्ष साफ है। RJ सायमा को न बच्ची से मतलब है, न इंसाफ से। उन्हें सिर्फ मौका चाहिए। मौका सेना को कठघरे में खड़ा करने का। मौका अपने तयशुदा एजेंडे को आगे बढ़ाने का। अगर यह मामला किसी आम मुस्लिम व्यक्ति का होता और उसमें पुलिस या सेना का नाम नहीं जुड़ा होता, तो सायमा शायद चुप रहतीं। जैसे वो लाल किले के पास फिदायीन हमला करने वाले उमर नबी के मामले में रही थीं। उमर नबी का वीडियो लीक होना उन्हें नामंजूर था, जिसमें वह खुद इस्लाम में फिदायीन बनने को अच्छा बता रहा था। तब एक आतंकी की पहचान उजागर होना सायमा के लिए निंदनीय था।

लेकिन अब जैसे ही सायमा देश की सुरक्षा संस्था CRPF दिखा, तो उनका ट्वीट तैयार हो गया। साथ में लिखा गया- जय हिंद। इसमें भी शब्द चुने गए। नाम गायब किया गया। और अपने एजेंडा के मुताबिक परोसा गया।

यह वही पुरानी चाल है। पहले अपराध को पहचान की आड़ में छुपाओ। फिर देश की सुरक्षा करने वाली वर्दियों को बदनाम करो। और अंत में ‘जय हिंद’ लिखकर खुद को बचा लो। यह सीधा-सीधा जहर है, जो हर बार अलग मुद्दे के बहाने परोसा जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार एक मासूम बच्ची वेंटिलेटर पर है और सायमा का एजेंडा यहाँ भी ऑन ही है।

देश अब यह समझने लगा है कि कौन इंसाफ की बात कर रहा है और कौन इंसाफ का इस्तेमाल कर रहा है। RJ सायमा जैसे लोगों का पर्दाफास होना जरूरी है, क्योंकि ये लोग अपराधी से ज्यादा खतरनाक होते हैं। अपराधी एक होता है, लेकिन ऐसे लोग पूरे सिस्टम को शक के घेरे में डाल देते हैं। वर्दी को बदनाम करते हैं और फिर उसी वर्दी के नाम पर ‘जय हिंद’ लिखकर इंसाफ का ढोंग करते हैं।