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ईरान-अमेरिका-इजरायल जंग के बीच विदेशी सैन्य ठिकानों की चर्चा: जानें- भारत ने किन देशों में बनाए मिलिट्री बेस, क्या है इनकी रणनीतिक अहमियत

मिडिल ईस्ट इस समय इतिहास के सबसे खतरनाक तनावपूर्ण दौर से गुजर रहा है। अमेरिका और इजरायल लगातार ईरान पर हवाई हमले कर रहे हैं, वहीं ईरान भी पूरी ताकत से जवाबी कार्रवाई कर रहा है। इस टकराव का असर सिर्फ इन तीन देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खाड़ी क्षेत्र के कई देश भी इसकी चपेट में आ चुके हैं।

दरअसल अमेरिका के दुनिया के कई देशों में सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल वह अपने सैन्य अभियानों के लिए करता है। यही वजह है कि ईरान ने जवाबी हमलों में खाड़ी क्षेत्र के 8 देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया।

बहरीन, कतर, कुवैत, UAE, सऊदी अरब, जॉर्डन, इराक और ओमान जैसे देशों में हुए इन हमलों से साफ है कि आधुनिक युद्ध अब सिर्फ दो देशों के बीच सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र और कई देशों को प्रभावित करते हैं।

ठीक इसी तरह भारत के भी कई देशों में सैन्य ठिकाने, मॉनिटरिंग सेंटर और रणनीतिक सैन्य सुविधाएँ मौजूद हैं। हालाँकि भारत इन ठिकानों का इस्तेमाल आक्रामक युद्ध के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री निगरानी, आतंकवाद विरोधी अभियानों और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए करता है।

ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि भारत किन-किन देशों में सैन्य मौजूदगी रखता है, वहाँ उसकी क्या भूमिका है और ये ठिकाने भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं।

बदलते युद्धों में विदेशी सैन्य ठिकानों की अहमियत

आज के दौर में युद्ध की परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। अब लड़ाई सिर्फ सीमाओं पर नहीं लड़ी जाती, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी सैन्य ताकत का प्रदर्शन किया जाता है। इसी कारण दुनिया की लगभग हर बड़ी सैन्य शक्ति अमेरिका, चीन, रूस और अब भारत विदेशों में अपने सैन्य अड्डे, रडार स्टेशन, लिसनिंग पोस्ट और लॉजिस्टिक हब बना रही है।

इन ठिकानों की मदद से किसी भी देश को तेजी से सैन्य कार्रवाई करने, दुश्मन पर नजर रखने, समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और संकट के समय तुरंत प्रतिक्रिया देने की क्षमता मिलती है। यही कारण है कि हिंद महासागर क्षेत्र, मध्य एशिया और इंडो-पैसिफिक में सैन्य ठिकानों की होड़ तेज होती जा रही है।

भारत की रणनीति भी इसी वैश्विक समीकरण का हिस्सा है। एक ओर जहाँ चीन हिंद महासागर और अफ्रीका तक अपने सैन्य कदम बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान लगातार भारत के लिए सुरक्षा चुनौती बना हुआ है। ऐसे में भारत ने अपनी सुरक्षा रणनीति को देश की सीमाओं से बाहर तक विस्तार किया है।

भारत की रणनीतिक सोच: क्यों जरूरी हुए विदेशी सैन्य ठिकाने?

भारत की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वह हिंद महासागर के केंद्र में स्थित है। दुनिया का करीब 60 प्रतिशत समुद्री व्यापार इसी महासागर से होकर गुजरता है। भारत की ऊर्जा आपूर्ति, व्यापारिक मार्ग और समुद्री सुरक्षा सीधे तौर पर इस क्षेत्र से जुड़ी हुई है।

इसी कारण भारत की सुरक्षा रणनीति अब केवल थल सीमाओं तक सीमित नहीं रही। समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद पर नजर, ड्रग्स और हथियारों की तस्करी रोकना, समुद्री डकैती से निपटना और रणनीतिक संतुलन बनाए रखना ये सभी कारण भारत को विदेशों में सैन्य उपस्थिति दर्ज कराने के लिए प्रेरित करते हैं।

भारत की यह मौजूदगी दो रूपों में सामने आती है। एक जहाँ भारत ने खुद अपने सैन्य ठिकाने विकसित किए हैं और दूसरा, जहाँ भारत ने मित्र देशों के साथ रणनीतिक समझौतों के जरिए उनके सैन्य अड्डों तक पहुँच बनाई है।

मध्य एशिया में भारत की पहली सैन्य दस्तक: ताजिकिस्तान का फरखोर एयरबेस

ताजिकिस्तान स्थित फरखोर एयरबेस भारत का पहला विदेशी सैन्य अड्डा माना जाता है। इसकी स्थापना का उद्देश्य सिर्फ सैन्य विस्तार नहीं, बल्कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया में उभर रहे आतंकवादी खतरों पर नजर रखना था।

यह एयरबेस अफगान सीमा के बेहद करीब है। 1990 के दशक के अंत में जब अफगानिस्तान में तालिबान का प्रभाव बढ़ रहा था, तब भारत ने इस बेस का इस्तेमाल नॉर्दर्न अलायंस को समर्थन देने, खुफिया सूचनाएँ जुटाने और रणनीतिक निगरानी के लिए किया। इस ठिकाने ने भारत को पाकिस्तान और अफगानिस्तान की गतिविधियों पर सीधी नजर रखने की क्षमता दी।

इस बेस की वजह से पाकिस्तान को यह डर सताने लगा था कि भारत अब उसकी पश्चिमी सीमा के बेहद करीब पहुँच चुका है। यही कारण था कि फरखोर एयरबेस को भारत की सबसे संवेदनशील रणनीतिक उपलब्धियों में गिना जाता है।

हिंद महासागर में भारत का मजबूत सुरक्षा घेरा

भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा फोकस हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) है। यह इलाका न सिर्फ भारत की सुरक्षा, बल्कि वैश्विक व्यापार के लिए भी जीवन रेखा माना जाता है। यही वजह है कि भारत ने इस पूरे क्षेत्र में रडार स्टेशनों, नौसैनिक सुविधाओं और निगरानी केंद्रों का जाल बिछाया है।

मॉरीशस के अगालेगा द्वीप पर भारत एक अत्याधुनिक सैन्य सुविधा विकसित कर रहा है, जिसमें लंबा रनवे, रडार सिस्टम और नौसैनिक समर्थन केंद्र शामिल हैं। इससे भारत पूरे पश्चिमी हिंद महासागर पर कड़ी नजर रख सकता है।

सेशेल्स के असम्पशन आइलैंड पर बनी संयुक्त सैन्य सुविधा समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ने और संदिग्ध जहाजों की निगरानी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह ठिकाना चीन की बढ़ती गतिविधियों पर नजर रखने में भी भारत की मदद करता है।

मालदीव में भारत द्वारा लगाए गए कोस्टल सर्विलांस रडार सिस्टम और हेलिकॉप्टर यूनिट्स पूरे द्वीपीय क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत बनाते हैं। इससे समुद्री आतंकवाद और ड्रग्स तस्करी पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है।

श्रीलंका में स्थापित रडार स्टेशन और कोलंबो पोर्ट में भारत की रणनीतिक मौजूदगी चीन के हम्बनटोटा पोर्ट का संतुलन बनाने के लिए अहम मानी जाती है।

खाड़ी क्षेत्र में भारत की रणनीतिक पकड़: ओमान से लेकर मेडागास्कर तक

ओमान में स्थित रास अल हद्द का लिसनिंग पोस्ट भारत को फारस की खाड़ी में होने वाली हर गतिविधि पर नजर रखने की ताकत देता है। मस्कट में भारतीय नौसेना को बर्थिंग सुविधा मिलती है, जबकि दुक्म पोर्ट भारत के लिए लॉजिस्टिक हब बनता जा रहा है।

मेडागास्कर में भारत का इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस स्टेशन दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर में जहाजों की आवाजाही और समुद्री गतिविधियों की निगरानी करता है। यह भारत का पहला विदेशी लिसनिंग पोस्ट माना जाता है। इन ठिकानों की मदद से भारत अफ्रीका से लेकर मिडिल ईस्ट तक समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।

भारत भूटान में IMTRAT नाम की सैन्य प्रशिक्षण टीम चलाता है। यह टीम हा द्ज़ोंग में स्थित है। यहाँ भारतीय सेना, रॉयल भूटान आर्मी और रॉयल बॉडीगार्ड को प्रशिक्षण देती है। इसका उद्देश्य भूटान की रक्षा क्षमता मजबूत करना और दोनों देशों के मजबूत संबंधों को बनाए रखना है।

ईरान का चाबहार पोर्ट भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण बंदरगाह है। यह कोई सैन्य बेस नहीं है, लेकिन भारत को सामान भेजने और जहाज चलाने में मदद करता है। इस पोर्ट के जरिए भारत पाकिस्तान से गुजरने बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक माल भेज सकता है। भारत पोर्ट के कुछ हिस्सों को बनाने और संभालने में मदद करता है।

रणनीतिक साझेदारी: अमेरिका, जापान और सिंगापुर से भारत को क्या मिला?

भारत ने सिर्फ अपने ठिकाने ही नहीं बनाए, बल्कि रणनीतिक साझेदारियों के जरिए दुनिया के सबसे शक्तिशाली सैन्य नेटवर्क तक पहुँच भी बनाई है। अमेरिका के साथ हुआ LEMOA समझौता भारत को 85 से ज्यादा देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों तक लॉजिस्टिक पहुँचा देता है।

इससे भारत को जरूरत पड़ने पर ईंधन, मरम्मत और सप्लाई में जबरदस्त मदद मिलती है। जापान के साथ हुए समझौते से भारत को जिबूटी स्थित जापानी सैन्य बेस तक पहुँच मिली, जो सीधे तौर पर चीन के जिबूती बेस को संतुलित करता है। सिंगापुर का चांगी नेवल बेस भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के पास मजबूत मौजूदगी देता है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है।

भारत की रणनीति बनाम चीन और पाकिस्तान

भारत की यह पूरी सैन्य रणनीति सीधे तौर पर चीन और पाकिस्तान से मिलने वाली चुनौतियों से जुड़ी है। चीन जहाँ हिंद महासागर में मोती की माला (String of Pearls) रणनीति के तहत बंदरगाह और सैन्य ठिकाने बना रहा है, वहीं पाकिस्तान चीन के सहयोग से अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है।

ऐसे में भारत का यह विदेशी सैन्य नेटवर्क रणनीतिक संतुलन बनाए रखने, दुश्मनों की घेराबंदी रोकने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का मजबूत हथियार बन चुका है। आज जब ईरान-अमेरिका-इजरायल संघर्ष ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया है कि विदेशी सैन्य ठिकाने किसी भी युद्ध में सीधे निशाना बन सकते हैं, तब भारत की रणनीति और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारत इन ठिकानों का इस्तेमाल आक्रामकता के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा, निगरानी, संतुलन और स्थिरता के लिए करता है। यही वजह है कि भारत की यह रणनीतिक सैन्य मौजूदगी उसे आने वाले समय में एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करेगी।

खामेनेई को ‘रहबर’ बता रहे बच्चों ने मौत पर जमकर बहाए आँसू, लेकिन प्रधानमंत्री के खिलाफ उगल रहे जहर: कहा- मोदी ने जाकर बता दिया इजरायल को घर-दफ्तर का पता

ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत को लेकर दुनिया में बवाल मचा हुआ है। भारत में भी यूपी, जम्मू कश्मीर समेत कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इस बीच यूपी के दो बच्चों का एक वीडियो वायरल हो रहा है। बच्चों का कहना है कि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर खोमेनेई की मौत पर जमकर आँसू बहाए। बातचीत में बच्चे की पीएम मोदी से नफरत भी सामने आ गई। उसका कहना है कि पीएम मोदी जिए या मरे, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

खामेनेई के समर्थन में कट्टरपंथी सोच किस तरह से बच्चों का इस्तेमाल कर रही है और उसे कट्टरपंथ के राह पर आगे बढ़ा रही है इसका उदाहरण है ये एक वीडियो..

20 साल जेल काटने को तैयार है बच्चा

बच्चे में नफरत का बीज इतना बोया गया है कि वह इजरायल को खत्म करने के लिए चाकू मारने तक तैयार है। हालाँकि उसे पता है कि किसी की हत्या करने पर उम्रकैद हो सकती है। इसलिए वह कहता है कि वह 20 साल जेल काटने को तैयार है। बच्चे को ये नहीं पता कि इजरालय में मारना किसे है। वह एक बार भी इजरायली पीएम का नाम नहीं बता पा रहा, लेकिन मर्डर करने को तैयार है। इजरालय को मारने में बच्चों की भी जान चली जाएगी, इसका भी उसे कोई गम नहीं है। ये तो बस इजरायल को मारना चाहता है। सीने में चाकू घोपना चाहता है, भले ही उसे 20 साल की सजा ही क्यों न हो जाए।

बच्चे को फिलिस्तीन से भी प्यार है। वहाँ हुए हमले का दुख है। लेकिन भारत में कोई घटना घट जाए तो उसका उसे फर्क नहीं पड़ेगा। बच्चा का कहना है कि यहाँ तो घटना घटते ही रहता है।

इजरायल को मारना चाहिए क्योंकि उन्होंने हमारे खामेनेई साहब को मारा है।

ईरानी नेता खामेनेई को बच्चा अपना ‘रहबर’ कहता है। खोमेनेई के मौत पर बच्चा कह रहा है कि उसके सर पर से साया उठ गया, वह बहुत रोया। भारत में रह रहे इन बच्चों को खोमेनेई की मौत पर बहुत रोना आया। माता-पिता के रहते हुए भी बच्चा कह रहा है कि उसके ‘सर से साया’ उठ गया। आखिर बच्चों को ये ‘ज्ञान’ कौन दे रहा है कि उनका ‘रखवाला’ खोमेनेई था, जिसके मरते ही उनके ‘सर से साया’ हट गया। इस सोच ने ही बच्चे में इजरायल को मिटाने का ‘जज्बा’ पैदा किया है। वह हर हाल में इजरायल को खत्म कर देना चाहता है।

इजरायल ने फिलिस्तीन पर हमला किया। इसलिए इजरायल को मारना चाहिए। बच्चों का कहना है कि हमारे खामेनेई साहब को मार दिया, इसलिए नफरत है इजरायल से।

अपने देश में तो कोई घटना घट जाए तो इन बच्चों को फर्क नहीं पड़ता। इन्हें तो खामेनेई की मौत से फर्क पड़ता है। प्रधानमंत्री मोदी को लेकर बच्चों के दिमाग में कितना जहर भरा गया है। इसका भी पता इस वीडियो से चल रहा है। बच्चे कह रहे हैं कि पीएम मोदी पहले खामेनेई साहब के पास गए और उनसे सबकुछ पता कर लिया और इजरायल को बता दिया, इसलिए खामेनेई के बारे में इजरायल को सबकुछ पता चल गया।

मोदी जिए या मरे मुझे क्यों रोना आएगा- बच्चा

कट्टरपंथियों ने पीएम मोदी को लेकर बच्चे के मन में इतनी नफरत पैदा कर दी है कि पीएम मोदी के साथ कोई ऊँच-नीच होने पर उसे कोई अफसोस नहीं होगा। क्योंकि ये बच्चा अप्रत्यक्ष तौर पर पीएम मोदी को भी खामेनेई की मौत का जिम्मेदार मानता है।

बच्चा कह रहा है कि खामेनेई साहब का घर, दफ्तर से लेकर उनके बेडरूम तक पीएम मोदी ने देखा है और उन्होंने ही इजरायल को सबकुछ बता दिया। इसलिए इजरायल ने घर-दफ्तर पर हमला किया।

कट्टरपंथियों ने पीएम मोदी के खिलाफ कितना जहर बच्चे के मन में डाला है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। बच्चे को ये नहीं पता कि इजरायल को खामेनेई और ईरान के बारे में पता लगाने के लिए किसी की जरूरत नहीं है। मोसाद से लेकर सीआईए तक उसे पल-पल की जानकारी देती हैं। अब तो AI का जमाना है, जो सटीक निशाना लगाने से लेकर दुश्मन को भीड़ में भी पता लगा लेने की क्षमता रखता है। बताया भी जा रहा है कि ईरान युद्ध में इजरायल और अमेरिका ने AI क्लाउड का इस्तेमाल किया। इसलिए सटीक हमले किए गए और एक साथ 40 ईरानी टॉपमोस्ट नेताओं और सेना के अधिकारियों को उड़ा दिया।

बच्चे को साइंस और टेक्नोलॉजी की बातें नहीं बताई जा रही, बस पीएम मोदी के खिलाफ मन में जहर भरा जा रहा है। बच्चे को पता है कि पीएम मोदी इजरायल गए थे। बच्चे को ये पता है कि पीएम मोदी ईरान का दौरा भी पहले कर चुके हैं। इसको लेकर वह कहता है कि पीएम मोदी इजरालय से मिले हुए हैं।

उन्होंने खोमेनेई के घर-दफ्तर से लेकर बेडरूम तक की जानकारी दी, इसलिए इजरायल ने हमला किया। बच्चे को अगर इजरायल दौरे में होने वाले समझौतों और देश के फायदे की बात बताई गई होती, तो शायद वह ऐसी बातें नहीं करता। आखिर देश और पीएम मोदी को लेकर बच्चे के मन में ऐसी नफरत कहाँ से आ रही है।

होली स्पेशल में हिरण्यकश्यप, रावण और शिशुपाल की कथा: वैकुंठ लोक के द्वारपाल जय-विजय को क्यों 3 जन्म बनना पड़ा असुर? भगवान ने दिलाई मुक्ति

होली का अवसर आ रहा है। होली आते ही हमें होलिका, प्रहलाद और प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप का स्मरण आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हिरण्यकश्यप राक्षसी प्रवृत्ति का क्यों बना और उसके बाद के जन्मों में वो क्या बना।

यह अनसुनी रोचक कथा वैकुंठ लोक से शुरू होती है, जो भगवान विष्णु का निवास स्थान है। एक दिन ब्रह्मा के मानस पुत्र सनकादिक ऋषि, भगवान विष्णु से मिलने बैकुंठ लोक गए। सनकादिक ऋषि हमेशा बाल-रूप में विचरण करते थे, उनको बालक समझकर द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें बैकुंठ लोक में प्रवेश करने से रोक दिया। क्रोध में आकर ऋषि सनकदिक ने उन दोनों को असुर योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया।

दोनों भाइयों का यह शाप चलकर तीन जन्मों तक चला। पहले जन्म में वे हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष के रूप में दिति के पुत्र बने। हिरण्याक्ष को भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर मारा, और हिरण्यकश्यप का अंत भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार ने किया।

दूसरे जन्म में वे रावण और कुम्भकर्ण बने, और भगवान राम ने उनका वध किया।

तीसरे जन्म में द्वापर युग में, वो शिशुपाल और दन्तवक्त्र के रूप में जन्मे। इस बार भगवान कृष्ण ने उनका वध किया।

तीसरे जन्म में जब भगवान ने उनका वध किया, तो उसके पश्चात, जय और विजय, सनकादि ऋषियों के शाप से मुक्त होकर पुनः अपने मूल स्वरूप में वैकुंठ लौट गए।

देखें वीडियो

श्रीमद्भागवत पुराण में देवर्षि नारद कहते हैं कि ईश्वर से दूरी और घृणा भी उनकी लीला का हिस्सा होती है। अंततः हर आत्मा को उसी परम चेतना में विलीन होना होता है जहाँ से उसकी यात्रा शुरू हुई थी। यह कथा होली पर भक्ति के गहरे रहस्य को समझाती है।

खामेनेई की मौत पर कॉन्ग्रेसियों और वामपंथियों का रुदन, लाखों ईरानियों की हत्याओं पर साध रखी थी चुप्पी: समझें- कैसे सरकार दे रही भारत के हितों को प्राथमिकता

अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों में 28 फरवरी 2026 को ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह अली खामेनेई की हत्या हो गई। ईरानी राज्य मीडिया ने इसकी पुष्टि की और 40 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ‘इतिहास के सबसे बुरे लोगों में से एक’ की मौत बताया।

दुनिया भर में प्रतिक्रियाएँ आईं। कई लोकतांत्रिक देशों ने चुप्पी साध ली या संयम की अपील की। लेकिन भारत में कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों (सीपीआई, सीपीएम आदि) ने खामेनेई की मौत पर जो रुदन शुरू किया, वह न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर कब्जा करने की जिद को भी उजागर करता है।

कॉन्ग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम खुद को विदेश नीति का ‘मालिक’ समझ रहा है और पीएम नरेंद्र मोदी को ‘चुप्पी’, ‘कायरता’ और ‘मूल्यों की धोखाधड़ी’ का आरोप लगाकर सोशल मीडिया पर घसीट रहा है।

इस लेख में हम विस्तार से देखेंगे कि खामेनेई के 37 साल के शासन में अलग-अलग प्रदर्शनों में कितने निर्दोष मारे गए, कॉन्ग्रेस-वामपंथी कैसे दोहरे मापदंड अपनाते हैं और मोदी सरकार की व्यावहारिक विदेश नीति को क्यों निशाना बना रहे हैं।

सबसे पहले कॉन्ग्रेस और वामपंथियों की प्रतिक्रिया देखें।

कॉन्ग्रेस ने ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की हत्या की कड़े शब्दों में निंदा की है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन बताया है। पार्टी ने इस घटना को क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा करार दिया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बयान जारी कर ‘टारगेटेड मर्डर’ की निंदा की, इसे ‘युद्ध की घोषणा के बिना संप्रभुता का उल्लंघन’ बताया और खामेनेई के परिवार, ईरानी जनता तथा शिया समुदाय को संवेदना व्यक्त की।

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इसे ‘Despicable’ (घृणित) करार दिया और कहा कि ‘तथाकथित लोकतांत्रिक दुनिया के नेता’ ने एक संप्रभु देश के नेता की हत्या की। उन्होंने पीएम मोदी पर ‘इजरायल और अमेरिका के सामने घुटने टेकने’ का आरोप लगाया।

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर लिखा- “भारत और ईरान की दोस्ती इतिहास जितनी पुरानी है, फिर भी मोदी खामेनेई की हत्या पर एक शब्द नहीं बोल रहे। यह भारत-ईरान संबंधों का ऐतिहासिक धोखा और मोदी की नैतिक कायरता है।”

एक अन्य ट्वीट में खेड़ा ने लिखा, “अयातुल्ला खामेनेई और दूसरे ईरानी नेताओं की सुनियोजित हत्या पर मोदी सरकार की चुप्पी दिखाती है कि इसने नैतिक नेतृत्व का सर्वथा त्याग कर दिया है और इस कृत्य के लिए अमेरिका और इज़राइल की आलोचना करने से घबरा रही है। यह भारत के उन मूल्यों के प्रति विश्वासघात है, जिनके पक्ष में वह हमेशा खड़ा रहा है। इतिहास में भारत कभी इतना कमज़ोर नहीं दिखा था।”

वामपंथी दलों ने भी इसी तर्ज पर ईरान के साथ ‘एकजुटता’ जताई और अमेरिका-इजरायल को ‘आक्रांता’ बताया। कुछ वामपंथी कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर ‘मोदी अमेरिका का पिट्ठू’ जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।

इस्लामी कट्टरपंथियों और वामपंथियों प्रोपेगेंडा फैलाने वाली बदनाम अरफा खानुम शेरवानी ने तो यहाँ तक पूछ लिया कि खामेनेई की हत्या पर भारत का क्या रुख है? उसने खामेनेई की हत्या को लेकर पीएम मोदी को निशाना बनाने की कोशिश की। उसने लिखा कि पीएम मोदी कम से कम संवेदना ही जाहिर कर देते।

ये लोग खुद को विदेश नीति का ‘निर्णायक’ मानते हैं। भारत की परंपरागत विदेश नीति ‘अपनी सबसे दोस्ती, नहीं किसी से बैर’ रही है, लेकिन कॉन्ग्रेस-वामपंथी इसे ‘ईरान-रूस-चीन के साथ अंधी दोस्ती’ समझते हैं।

इस मामले में सार्वजनिक तौर पर मोदी सरकार ने संयम की अपील की है। यूएई पर ईरानी हमलों की निंदा की और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की और कश्मीर से लेकर चाबहार पोर्ट तक रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी।

वैसे, कोई जी-7 ‘लोकताँत्रिक’ देशों ने भी तो ने खामेनेई को शोक संदेश नहीं दिया, फिर भी कॉन्ग्रेस मोदी से ‘निंदा’ की माँग कर रही है। यह विदेश नीति पर कब्जे की कोशिश है, जैसे 2005-09 में यूपीए ने IAEA में ईरान के खिलाफ वोट किया था, लेकिन अब ‘दोस्ती’ का राग अलाप रही है। वामपंथी तो हमेशा से सोवियत-चीन-ईरान की तानाशाही का समर्थन करते आए हैं।

खामेनेई के शासनकाल में अनगनित जिंदगियाँ हुई खत्म

अब मुख्य मुद्दे पर आते हैं कि खामेनेई के शासन में अलग-अलग प्रदर्शनों में लाखों लोगों की हत्याएँ होती रही हैं। खामेनेई 1989 से सत्ता में थे। उनके शासन को ‘आयरन फिस्ट’ (लोहे का मुक्का) कहा जाता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और ईरान ह्यूमन राइट्स जैसी संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, विरोध प्रदर्शनों को दबाने में हजारों निर्दोष मारे गए। महिलाओं पर जबरन हिजाब, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, इंटरनेट ब्लैकआउट और IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) की गोलीबारी से प्रदर्शनों का दबाने का यह उनका तरीका था।

ग्रीम मूवमेंट को बर्बरता से कुचलने का इतिहास

पहला बड़ा प्रदर्शन साल 2009 का ग्रीन मूवमेंट था। राष्ट्रपति चुनाव में धांधली के आरोप पर लाखों लोग सड़कों पर उतरे। ‘व्हेयर इज माय वोट’ का लोगों ने नारा’ लगा। हालाँकि खामेनेई ने इसे ‘विदेशी साजिश’ बताते हुए IRGC को दबाने का आदेश दिया। आधिकारिक आँकड़ों में दर्जनों मौतें, लेकिन BBC और अन्य रिपोर्टों के अनुसार कम से कम 72 से 80 लोग मारे गए।

सैकड़ों गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें जमकर यातनाएँ दी गईं। इस दौरान महिलाओं और युवाओं पर विशेष क्रूरता बरती गई। यह प्रदर्शन ईरान की लोकतंत्र की आखिरी उम्मीद था, लेकिन खामेनेई ने कुचल दिया।

साल 2017-18 में आर्थिक स्थिति बिगड़ने के खिलाफ लोग प्रदर्शन पर उतरे तो फिर से खामेनेई ने ‘विदेशी ताकतों’ के नाम पर लोगों को कुचल डाला।

साल 2019 में ईरान का ब्लडी नवंबर

साल 2019 का ‘ब्लडी नवंबर’ यानी ईंधन की कीमतें दोगुनी करने पर राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन। इमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक हफ्ते में 321 मौतों की पुष्टि की की। रॉयटर्स और ईरानी अधिकारियों के अनाम स्रोतों के अनुसार कुल 1500 तक लोग मारे गए। महशहर में IRGC ने दलदल में छिपे 100 प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई। इंटरनेट बंद कर दिया गया।

ईरान ह्यूमन राइट्स ने इसे ‘आधुनिक ईरान का सबसे खूनी दमन’ बताया। खामेनेई ने सार्वजनिक रूप से ‘दंगे करने वालों को सबक सिखाओ’ कहा और इसके बाद विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों का सफाया कर दिया गया।

महसा अमीनी से जुड़ा आंदोलन

सबसे चर्चित रहा साल 2022 का ‘महसा अमीनी’ या ‘वुमन, लाइफ, फ्रीडम’ आंदोलन। 22 वर्षीय कुर्द महिला महसा अमिनी नैतिक पुलिस (मोरालिटी पुलिस) की हिरासत में मारी गई, वो भी कथित तौर पर हिजाब ठीक न पहनने पर। इसके बाद हुए दंगों में ईरान ह्यूमन राइट्स के अनुसार 551 लोग मारे गए, जिनमें 68 नाबालिग थे। ईरानी पुलिस ने लाइव गोलियाँ चलाई।

दिसंबर 2022 तक 476 मौतें पुष्टि हुईं, तो 2 युवाओं को फाँसी दे दी गई। अनगिनत अन्य लोगों को मारा गया, जिनका कोई रिकॉर्ड ही नहीं मिला। यह आंदोलन ईरान की महिलाओं की आजादी की लड़ाई था, लेकिन खामेनेई ने इसे कुचल दिया।

बहरहाल, इस पूरे मुद्दे पर भारत सरकार अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया दे चुकी है। फिर भी, एक दिलचस्प प्रतिक्रिया बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे की तरफ से आई है। उन्होंने खगड़े के ट्वीट को कोट करते हुए पुराना नोट पोस्ट किया है।

निशिकांत दुबे ने अतीत में ईरान के आधिकारिक कदमों को भी गिनाया है। इत्तेफाक की बात है कि उस समय देश में कॉन्ग्रेस की ही सरकारें थी और भारत दुश्मन देश पाकिस्तान के हमले झेल रहा था।

कॉन्ग्रेसियों – वामपंथियों की खुल चुकी है कलई

भारत में ‘लोकतंत्र’ और ‘मानवाधिकार’ का राग अलापने वाले कॉन्ग्रेसी और वामपंथी एक ऐसे तानाशाह के लिए आंसू बहा रहे हैं जिसने अपने ही लोगों पर गोली चलवाई। महसा अमिनी जैसी लड़कियों की मौत पर चुप्पी साधे रखी, लेकिन खामेनेई की हत्या पर छाती पीटे जा रहे हैं। ये इनका दोहरा मापदंड दिखाता है। वो सीधे-सीधे अमेरिका-इजरायल का विरोध न करके, उनका नाम सिर्फ पीएम मोदी को भला-बुरा कहने में ले रहे हैं।

दरअसल, कॉन्ग्रेसियों और वामपंथियों का रुदन न खामेनेई के लिए है, न ईरानी जनता के लिए। उनका यह रुदन यह अपनी प्रासंगिकता बचाने और पीएम मोदी को घेरने का प्रयास है। वे विदेश नीति खुद तय करना चाहते हैं, लेकिन जनता जानती है कि राष्ट्रीय हित ‘भावनाओँ’ से ऊपर होते हैं।

भारत को ऐसी ‘मोरल लीडरशिप’ की जरूरत नहीं जो तानाशाहों का शोक मनाए और लोकतंत्र के प्रतीक मोदी को घसीटे। ऐसे में साफ है कि पीएम मोदी की चुप्पी शक्ति है, जिसमें भारत की शांति और हितों की रक्षा है। लेकिन कॉन्ग्रेस-वामपंथी अभी भी पुरानी तानाशाही के गम में डूबे हैं।


एडिटेड वीडियो के जरिए मथुरा की होली के रंग में डालना चाहते थे भंग, UP पुलिस ने 9 यूट्यूबरों और इन्फ्लुएंसर्स पर दर्ज किया मुकदमा: जानें- FIR की डिटेल्स

उत्तर प्रदेश पुलिस ने मथुरा की विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार और लड्डूमार होली को लेकर सोशल मीडिया पर गलत और भ्रामक जानकारी फैलाने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। ब्रज की हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक परंपरा को बदनाम करने के आरोप में 9 यूट्यूबरों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।

पुलिस की यह कार्रवाई वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) श्लोक कुमार के निर्देश पर की गई जाँच के बाद हुई। जाँच में सामने आया कि कुछ लोगों ने पिछले वर्षों के विवादित वीडियो क्लिप्स को कुछ इस साल की होली से जोड़कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। इन एडिटेड वीडियो के जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई कि बरसाना और नंदगाँव की होली के दौरान अव्यवस्था और अभद्रता हुई है।

दरअसल, बरसाना और नंदगाँव में मनाई जाने वाली ‘लट्ठमार’ और ‘लड्डूमार’ होली को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु और पर्यटक पहुँचते हैं। इसे ब्रज की लगभग 5,000 वर्ष पुरानी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाता है। पुलिस का कहना है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित किए गए भ्रामक वीडियो से न केवल इस परंपरा की छवि खराब हुई बल्कि स्थानीय लोगों में भी भारी गुस्सा फैल गया।

पुलिस के संज्ञान में जैसे ही यह बात आई कि कुछ इन्फ्लुएंसर्स ने होली के पुराने वीडियो को आपत्तिजनक तरीके से एडिट कर उन्हें हालिया आयोजन से जोड़ दिया। तुरंत इसकी जाँच की गई, जाँच में ये वीडियो क्लिप भ्रामक और तथ्यों से छेड़छाड़ किए हुए पाए गए। इस मामले में बरसाना थाने में सभी 9 आरोपितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।

FIR में क्या हैं आरोप और किन पर दर्ज हुआ केस?

पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(2) (विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता बढ़ाना) और 353(2) के साथ-साथ IT ऐक्ट की धारा 67/67A के तहत मामला FIR दर्ज की है।

पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR में लिखा गया है, “26 व 27 फरवरी 2026 को सोशल मीडिया सेल व अन्य प्लेटफॉर्म (जैसे वॉट्सऐप/फेसबुक/इंस्टाग्राम/X आदि) से जानकारी प्राप्त हुई कि कई भ्रामक वीडियो अलग अलग मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किए गए हैं। जिसमें घटनास्थल नंदगाँव व बरसाना दर्शाया गया है।”

इसमें आगे लिखा गया है, “वीडियो में वर्तमान की घटना बताकर शेयर किया जा रहा है जबकि जाँच करने पर ज्ञात हुआ कि यह वीडियो पुरानी हैं। किसी दूसरे स्थान/समय की हैं।” FIR में कहा गया है, “इन भ्रामक वीडियो के कारण क्षेत्र में भ्रम, अफवाह और सामाजिक वैमनस्य की स्थिति उत्पन्न हो रही है। महिलाओं में भय व असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो रही है और सामाजिक तनाव/अफवाह की स्थिति बन रही है।”

FIR में जिन लोगों औ सोशल मीडिया हैंडल्स के नाम हैं उनमें iMayankofficial, पीयूष राय, विशाल ज्योति देव अग्रवाल, Extra2ab (@UdayRoy443477), ममता राजगढ, कवीश अजीज, Prayagraj.vibes, rnagarvlogs और kotafoodexplor शामिल हैं।

FIR का एक हिस्सा

पुलिस ने क्या बताया?

मथुरा में होली से जुड़े भ्रामक वीडियो फैलाने के मामले में पुलिस ने सख्त रुख अपनाया है। अधिकारियों ने साफ कहा है कि धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को बदनाम करने या उनके साथ छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। लोगों से अपील की गई है कि बिना जाँचे-परखे कोई भी वीडियो या संदेश सोशल मीडिया पर साझा न करें।

एसपी देहात सुरेश चंद्र रावत ने बताया कि कुछ वीडियो इस तरह से एडिट और प्रस्तुत किए गए थे, जिससे इलाके में अफवाहें फैलने लगीं। पुलिस ने स्पष्ट किया कि इस साल होली का त्योहार पूरी तरह शांतिपूर्ण संपन्न हुआ। किसी भी श्रद्धालु या स्थानीय व्यक्ति की ओर से कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर भ्रामक सामग्री फैलाकर गलत तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई।

पुलिस की सर्विलांस टीम आरोपितों की लोकेशन ट्रेस कर रही है और जल्द ही आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस ने चेतावनी देते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति सांस्कृतिक परंपराओं को गलत तरीके से पेश करे या समाज में भ्रम और वैमनस्य फैलाए। ऐसे मामलों में कानून के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी।

होली: भारतीय सभ्यता की आत्मा और आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

मैं जब भी होली की बात करता हूँ, मन में पहले अपने ब्रज की याद आती है। मथुरा के उस बाज़ार की, जहाँ फाल्गुन आते-आते गुलाल की दुकानें सज जाती हैं और हवा में टेसू के फूलों की हल्की-सी महक घुल जाती है। शायद यही कारण है कि मैं होली को महज एक त्योहार नहीं मानता।

भारत एक भौगोलिक सीमा में बँधा राष्ट्र तो है ही, लेकिन उससे भी पहले यह एक जीवंत सभ्यता है। दुनिया की सबसे पुरानी, सबसे निरंतर बहने वाली सभ्यताओं में से एक। और इस सभ्यता को एक सूत्र में पिरोने का काम हमारे पर्वों ने किया है। ये उत्सव केवल खुशी मनाने के बहाने नहीं हैं। इनमें दर्शन है, पारिस्थितिकी है, सामाजिक न्याय है और एक गहरी आध्यात्मिक समझ भी है।

होली इन सबमें सबसे अलग है। सबसे खुली। सबसे निडर। यह किसी एक जाति की नहीं, किसी एक क्षेत्र की नहीं। अपने असली रूप में यह पूरी मानवता के भीतर जो आनंद छुपा है, उसका उत्सव है।

प्राचीन जड़ें: जब इतिहास और आस्था एक हो जाते हैं

होली कब शुरू हुई? यह प्रश्न उतना ही कठिन है जितना यह पूछना कि गंगा कब से बहती है। भविष्य पुराण और नारद पुराण में इस पर्व के स्पष्ट उल्लेख मिलते हैं। यानी जब यूरोप में सभ्यता अंकुरित भी नहीं हुई थी, तब भी इस भूमि पर होली के रंग उड़ते थे।

सबसे प्रसिद्ध कथा तो हम सब जानते हैं। प्रह्लाद और होलिका की। लेकिन मैं कहूँगा कि इसे केवल एक धार्मिक कहानी मत समझिए। यह एक राजनीतिक और नैतिक वक्तव्य है। हिरण्यकश्यप के पास सत्ता थी, सेना थी, वरदान था। और प्रह्लाद के पास क्या था? बस एक अटूट विश्वास। और उसी विश्वास ने जीत हासिल की।

होलिका को अग्नि से अभय का वरदान था, फिर भी वह जल गई। प्रह्लाद के पास कोई वरदान नहीं था, फिर भी वह बचा। यही होली का मूल संदेश है: सत्य और भक्ति, अंततः किसी भी बाहरी शक्ति से बड़े होते हैं।

और ब्रज की होली? वह तो बिल्कुल अलग ही दुनिया है। बरसाना की लट्ठमार होली, वृंदावन की फूलों वाली होली। जो एक बार देख ले, भूल नहीं सकता। यहाँ होली केवल उत्सव नहीं रही, यह राधा और कृष्ण के बीच उस दिव्य प्रेम की पुनर्रचना है जिसे हर पीढ़ी अपने रंगों में जीती है।

होली और प्रकृति: जब विज्ञान और परंपरा एक साथ चलते हैं

आधुनिक पीढ़ी के कुछ लोग कहते हैं कि हमारे त्योहार पुराने हो गए, अब इनकी ज़रूरत नहीं। मैं ऐसे लोगों से विनम्रतापूर्वक असहमत हूँ।

होली फाल्गुन और चैत्र के संधिकाल पर आती है। ठंड जा रही होती है, गर्मी दस्तक दे रही होती है। खेतों में फसल पक चुकी होती है। प्रकृति खुद रंगों में नहाई होती है। क्या यह संयोग है? बिल्कुल नहीं। हमारे पूर्वजों ने इस ऋतु-परिवर्तन के ठीक समय पर यह पर्व रखा, बहुत सोच-समझकर।

होलिका दहन की परंपरा लीजिए। पूर्णिमा की रात जलने वाली यह अग्नि हवा को शुद्ध करती है। शीत और बसंत के बीच के इस संक्रमण काल में जो रोगाणु पनपते हैं, यह धुआँ उन्हें नष्ट करता है। यह बात आधुनिक विज्ञान भी अब मान रहा है। और इसी अग्नि में नई फसल के दाने भूनने की परंपरा, वह धरती माँ के प्रति कृतज्ञता का सबसे सादा और सबसे सच्चा तरीका है।

टेसू, हल्दी, नीम, चंदन: इन प्राकृतिक रंगों में केवल सौंदर्य नहीं था, औषधि भी थी। गर्मी शुरू होने से पहले त्वचा को इन रंगों से मज़बूत करना, यह हमारे पूर्वजों की स्वास्थ्य-प्रज्ञा थी। उत्सव के भीतर छुपा विज्ञान। आज हम इसे ‘holistic wellness’ कहते हैं, हमारे पुरखे इसे बस होली कहते थे।

होली: जहाँ ऊँच-नीच की दीवारें रंगों में डूब जाती हैं

भारत की सबसे बड़ी चुनौती क्या रही है सदियों से? सामाजिक विभाजन। जाति, वर्ग, आयु, प्रतिष्ठा के वे बंधन जो मनुष्य को मनुष्य से अलग करते रहे।

होली साल में एक दिन इन सभी बंधनों को तोड़ देती है। जमींदार और मजदूर एक ही रंग में भीगते हैं। बेटा बाप के पैर छूता है और फिर उन्हें गुलाल से पोत देता है। कोई बुरा नहीं मानता। कोई छोटा नहीं महसूस करता। यह जादू कैसे होता है? मैंने बहुत सोचा इस पर।

इसका जवाब ब्रज की होली में मिलता है। श्यामवर्ण कृष्ण और गौरवर्णा राधा। जब कृष्ण राधा के गाल पर रंग लगाते हैं, तो वे वर्ण-भेद को, रंग-भेद को एक हँसी में उड़ा देते हैं। यह कोई आधुनिक प्रगतिशील विचार नहीं है, यह हमारी परंपरा में हज़ारों साल से मौजूद है।

वाराणसी की तंग गलियाँ हों, मथुरा के खुले आँगन हों, अवध के गाँव हों या बुंदेलखंड के मेले, होली हर जगह वही काम करती है। भेद को रंगों में बहा देती है। यह समावेशी भारत का मूल विचार है, किसी से उधार नहीं लिया, हमारी अपनी ज़मीन से उगा हुआ।

रंग बाहर के नहीं, भीतर के भी

एक बात जो अक्सर हम भूल जाते हैं वह यह कि होली केवल बाहरी उत्सव नहीं है। इसका एक भीतरी आयाम भी है, और वह शायद ज़्यादा ज़रूरी है।

गुलाल का लाल रंग, जीवन और प्रेम का संकेत है। हल्दी का पीला, ज्ञान और शुभता का। प्रकृति का हरा, नवीनता और विकास का। जब हम एक-दूसरे पर ये रंग लगाते हैं तो अनजाने ही हम एक-दूसरे में उस परम चेतना को स्वीकार कर रहे होते हैं जिसे वेदांत ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ कहता है। हर चेहरे में वही दिव्य प्रकाश।

और होलिका दहन? वह भी केवल एक प्रतीक नहीं है। हमें उस अग्नि में अपना अहंकार डालना है, अपनी ईर्ष्या, अपना क्रोध, अपनी घृणा। यह वार्षिक आत्मशुद्धि का अवसर है। मन की होली, आत्मा की होली।

आज की होली: क्या हम इसके योग्य हैं?

यह प्रश्न मुझे खुद से भी पूछना होगा। क्या हम होली को उसकी गरिमा के साथ मना रहे हैं?

रासायनिक रंग जो बाज़ार में बिकते हैं, वे त्वचा को नुकसान पहुँचाते हैं। आँखों को और पर्यावरण को भी। यह उस होली का अपमान है जो टेसू और हल्दी से खेली जाती थी, जो देह को नुकसान नहीं, शक्ति देती थी। सुखद बात यह है कि देश भर में प्राकृतिक रंगों की ओर लौटने का एक जागरूक आंदोलन बढ़ रहा है। यह छोटी-सी वापसी है, पर बहुत ज़रूरी है।

पानी का सवाल भी है। जब देश के कई हिस्सों में पानी की किल्लत हो तो हज़ारों लीटर पानी बर्बाद करना क्या उचित है? अनेक समुदायों ने सूखी होली की परंपरा अपनाई है। मुझे लगता है यह कोई समझौता नहीं, यह होली की असली भावना के और करीब जाना है।

होली अब दुनिया की है

एक बात मुझे गर्व से भरती है। होली आज चालीस से अधिक देशों में मनाई जाती है। लंदन में, न्यूयॉर्क में, सिडनी में, टोक्यो में। वहाँ के लोग जो हमारी भाषा नहीं जानते, हमारे शास्त्र नहीं पढ़े, वे भी इस रंगोत्सव में शामिल होना चाहते हैं।

क्यों? क्योंकि इस पर्व में कुछ ऐसा है जो भाषा और सीमा से परे है। जो किसी को भी छू लेता है। यह उस सभ्यता की ताकत है जो जीवन को उत्सव की तरह जीना जानती है।

उत्तर प्रदेश इस विरासत का हृदय है। राम और कृष्ण की यह भूमि, तुलसीदास और सूरदास की यह वाणी-भूमि, कबीर और मीराबाई का यह रंग-मंच। कबीर ने ज्ञान की होली खेली जिसमें विवेक के रंग आत्मा को रँगते हैं। मीरा ने होली को दिव्य प्रेम का उन्माद माना। यह विरासत अतीत नहीं है, यह एक जीती-जागती शक्ति है जो आज भी हमें दिशा देती है।

जब तक रंग हैं, होली है

होली शाश्वत क्यों है? क्योंकि इसका सवाल शाश्वत है। जब तक दुनिया में अंधेरा है, प्रकाश की ज़रूरत रहेगी। जब तक दीवारें हैं, रंगों की ज़रूरत रहेगी। जब तक दिल में ठंडक है, बसंत की घोषणा की ज़रूरत रहेगी।

भारत ने दुनिया को एक विचार दिया है- जीवन उत्सव है। होली उस विचार की सबसे रंगीन, सबसे खुली, सबसे निर्भीक अभिव्यक्ति है।

इस होली पर, जब होलिका दहन हो तो एक पल रुकिए। अपने भीतर झाँकिए। जो जलाना हो, जला दीजिए। और जब रंग खेलें, तो हर चेहरे में वह दिव्य प्रकाश देखिए जिसे कोई रंग ढक नहीं सकता और कोई अंधकार बुझा नहीं सकता।

बुर्के में कैद, 9 साल की उम्र में निकाह, तालीम पर पाबंदी… खामेनेई को नहीं सुहाती थी ईरानी महिलाओं की स्वच्छंदता, बना दिया मजहबी कट्टरपंथ का गुलाम

ईरान में महिलाएँ अब खामेनेई की मौत पर जश्न मना रही हैं। सालों से अधिकारों से वंचित, पर्दे में रहने को मजबूर महिलाओं का मानना है कि अब वह इस्लामी क्रांति से पहले जैसी आजादी का लुत्फ उठा पाएँगी। पिछले कुछ सालों से ईरान में महिलाओं का अधिकार सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा रहा है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ महिलाएँ कई बार सड़कों पर उतर चुकी हैं।

हाल ही में विरोध प्रदर्शन करने वाली एक महिला की तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें वह खामेनेई की तस्वीर से सिगरेट सुलगाते हुए नजर आई थी। खामेनई की मौत पर वह जश्न मनाते भी नजर आई। दरअसल महिलाओं का ये जश्न 1979 में इस्लामी क्रांति के बाद लगी पाबंदियों से ‘आजादी’ को लेकर है। दशकों से सख्त धार्मिक और सामाजिक पाबंदियों में जी रही महिलाओं को अब नई रौशनी मिलती दिख रही है।

इस्लामी क्रांति 1979 से पहले महिलाओं को पढ़ने- लिखने, हिजाब नहीं पहनने और सामाजिक राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने की आजादी थी। सबसे अहम बात यह है कि 1979 से पहले जब मुहम्मद रजा पहलवी के वक्त लोगों को धार्मिक आजादी थी। चाहे वह किसी भी धर्म को माने, ये उसका निजी मसला माना जाता था। किसी धर्म के आधार पर सत्ता नहीं चलती थी।

महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर हिजाब पहनने पर रोक थी। धार्मिक पहचान जाहिर करने पर रोक लगाया गया था। 8 जनवरी 1936 को कश्फ ए हिजाब का कानून लागू किया गया। इसके मुताबिक, महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर किसी तरह की धार्मिक पहचान दिखाने की इजाजत नहीं थीं। यूँ कहें कि महिलाओं को हिजाब पहनने पर प्रतिबंध था।

हिजाब पहनने के लिए बाध्य किया गया

इस्लामी क्रांति के बाद स्कूल जाने वाली छोटी-छोटी बच्चियों को भी काला हिजाब पहनने के लिए मजबूर किया गया। स्कूल में टीचर स्कर्ट टॉप पहनकर आती थीं, उन्हें नकाब और बुर्का पहनना अनिवार्य कर दिया गया। पहले स्कूल में लड़के-लड़कियाँ सभी एक साथ पढ़ते थे। पढ़ाने वाले भी पुरुष और महिला दोनों होते थे।

स्कूलों में फ्रेंच जैसी विदेशी भाषाएँ आम थी। किसी तरह की धार्मिक किताब पढ़ाने की मजबूरी नहीं थी। लेकिन इस्लामी क्रांति ने ऐसे स्कूलों को बंद करवा कर लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग स्कूल की व्यवस्था की। लड़कियों के स्कूल में सिर्फ महिलाओं की एंट्री होती थी। सभी महिलाएँ बुर्के में ढँकी होती थी। यहाँ तक कि छोटी-छोटी बच्चियाँ, जो पहले स्कर्ट-शर्ट पहनकर आती थीं, उन्हें हिजाब पहनकर स्कूल आना पड़ता है।

ग्राफिक नॉवेल राइटर और एनीमेशन आर्टिस्‍ट मरजान सतरापी के मुताबिक, शुरुआत में कई बच्चियाँ हिजाब नहीं पहनती थीं। एक दिन कट्टरपंथियों ने स्कूल जा रही बच्चियों को जबरदस्ती हिजाब पहना दी। लड़कियाँ डरते हुए स्कूल के अंदर भागीं। इसके बाद स्कूलों को नियम की अनदेखी करने पर कठोर कार्रवाई की गई।

इस्लामी क्रांति के बाद सत्ता में आए अयातुल्लाह खोमैनी का मानना था कि महिलाओं का काम पति की सेवा करना, बच्चे पैदा करना, घर में रहना और परिवार की देखभाल करना है।

कट्टर इस्लामिक कानून आ जाने के बाद अंग्रेजी, फ्रेंच जैसी विदेशी भाषाओं पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। विदेशी संगीत, कपड़ों और थियेटरों पर रोक लग गई। इसका पालन नहीं करने पर जेल भेज दिया जाता था या कोड़ों की सजा दी जाती थी।

लेखक नॉवेल ने बताया है कि 1979 के बाद लड़कियों और महिलाओं की हालत बदत्तर हो गई। इस दौरान अमीर घर की 20 लाख महिलाएँ और लड़कियाँ अपना देश छोड़ कर चली गईं।

9 साल की लड़कियों का निकाह

महिलाओं के निकाह की उम्र जो 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले 18 साल थी, उसे घटा कर 13 साल कर दिया गया। हालाँकि ईरानी कानून के तहत जबरदस्ती निकाह नहीं किया जा सकता, लेकिन लड़कियों को निकाह के लिए बचपन में ही मजबूर किया जाता है, चाहे उसकी मर्जी हो या नहीं हो।

कानून के मुताबिक, 13 साल की लड़कियों का निकाह, उसकी मर्जी से या बिना मर्जी के ईरान में धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक आधार पर सही है। 13 साल से कम उम्र होने पर भी उसकी मर्जी से उसके परिवार वाले निकाह कर सकते हैं। यहाँ तक कि अब्बू की मर्जी या कानूनी इजाजत से 8 साल और 9 महीने (9 लीप ईयर) की उम्र में भी उसका निकाह हो सकता है।

ईरान के स्टैटिस्टिकल सेंटर के मुताबिक, 2023 में 18 साल से कम उम्र की लड़कियों के निकाह करीब 135000 रजिस्टर्ड हुए। हालाँकि जो निकाह रजिस्टर्ड नहीं हुए उनकी संख्या इससे ज्यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कोई लड़की यह कहती है कि उसे निकाह के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो कानून के मुताबिक उसे जुल्म माना जाएगा।

हालात ऐसे हैं कि लड़की को सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिलती है। इसके अलावा लड़की की उम्र, फैमिली बैकग्राउंड, पढ़ाई-लिखाई और उसकी सोशियो-इकॉनॉमिक हालात के आधार पर तय होता है कि उसे निकाह के लिए मजबूर किया जा रहा है या नहीं।

दरअसल कानून में 9 साल की उम्र में निकाह की इजाजत दी गई है। 13 साल से उसकी मर्जी के बगैर भी निकाह करने की मान्यता है। ऐसे में कानूनी सुरक्षा भी महिला को नहीं मिल पाती है।

मुस्लिम महिलाएँ सिर्फ मुस्लिम व्यक्ति से निकाह कर सकती है और एक वक्त में एक की बीवी रह सकती है। लेकिन पुरुषों को 4 बीवियों को एक साथ रखने की इजाजत है। इतना ही नहीं अस्थाई तौर पर भी बीवियों को रखे जाने की इजाजत दी गई है।

इस्लामी क्रांति से पहले महिलाओं को वोट देने का अधिकार था

1979 से पहले महिलाओं को लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल होने का अधिकार था। ईरान दुनिया के उन कुछ मुल्कों में शामिल है, जहाँ महिलाओं को वोट देने का अधिकार था। संसद में चुनकर आने का अधिकार था। विमेन पर्सनल लॉ 1967 के अंतर्गत महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गये थे।

लड़कियों के निकाह की उम्र 18 साल तय की गई। इसके लिए लड़कियों की इच्छा अनिवार्य थी। लेकिन इस्लामी क्रांति ने महिलाओं को 200 साल पीछे भेज दिया। खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी शासन ने महिलाओं से सारी स्वायत्ता, स्वतंत्रता और अधिकार छीन लिए।

आज हालात ये है कि ईरान के समाज और उसके कानूनी सिस्टम में पुरुष और महिलाओं के बीच भेदभाव काफी गहरा है। महिलाओं और लड़कियों को पुरुषों और लड़कों से कम अधिकार प्राप्त हैं। उनकी हैसियत कम आंकी जाती है।

हर लड़की या महिला के लिए पुरुष अभिभावक अनिवार्य

मेल गार्जियनशिप कानून के मुताबिक, हर लड़की और महिला का एक पुरुष अभिभावक अनिवार्य कर दिया गया। वह न तो स्कूल या कॉलेज बगैर इजाजत के जा सकती है और न ही निकाह कर सकती है। यहाँ तक कि महिलाओं को संपत्ति खरीदने, यात्रा करने के लिए, बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए पुरुष अभिभावक की लिखित अनुमति अनिवार्य है।

ऐसे देश,जहाँ पहले महिलाएँ प्रतिनिधित्व करती थीं, वैज्ञानिक बनती थीं, उच्च शिक्षा प्राप्त कर आजादी से जिंदगी बिताती थीं,वहाँ उन्हें किसी के रहमोकरम पर रहने के लिए मजबूर कर दिया गया।

कॉस्मैटिक्स के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध

सजना-सवँरना महिलाओं का हक माना जाता है। लेकिन इस्लामी क्रांति ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। महिलाएँ किसी तरह के सौन्दर्य प्रसाधन का इस्तेमाल नहीं कर सकती थीं। व्यूटी पार्लर गैरकानूनी थे। बाल कटवाना भी बैन था। हालाँकि महिलाएँ चोरी-छिपे ब्यूटी पार्लर अपने घर पर ही चलाती थीं और महिलाएँ बुर्का पहनकर वहाँ पहुँचती थीं।

‘गश्त ए एरशाद’ लाकर शरिया कानून लागू किया गया

गश्त ए एरशाद 2006 को लागू कर ईरान में शरिया कानून लागू किया गया था। इसके माध्यम से एक गश्त एक एरशाद यानी मोरैलिटी पुलिस की नियुक्ति की गई थी, जो ये पता लगाता था कि सार्वजनिक जगहों या निजी जिंदगी में भी कौन महिला या पुरुष इस्लामी कानून का पालन नहीं कर रहा है। इसने महिलाओं की घर के अंदर की आजादी भी छीनने की कोशिश की। यही वजह है कि महिलाएँ का विद्रोह कई बार इस्लामी क्रांति के बाद देखा गया।

गोली मारकर खत्म कर सकते थे EX-मुस्लिम की जिंदगी, पर चाकुओं से रेता क्योंकि हर ‘काफिर’ में खौफ भरना चाहते थे इस्लामी कट्टरपंथी

गाजियाबाद के लोनी इलाके में जुमे के दिन 27 फरवरी 2026 की सुबह EX-मुस्लिम सलीम वास्तिक पर जानलेवा हमला किया जाता है। दो नकाबपोश हमलावर चाकू, पेपर कटर और अन्य धारदार हथियारों से वास्तिक के गले और पेट पर वार करते हैं। इससे साफ है कि हमलावर का मकसद सिर्फ मौत नहीं, बल्कि ‘दर्दनाक’ मौत देना था।

दो दिन के भीतर उत्तर प्रदेश पुलिस हमलावरों में से एक अमरोहा के मोहम्मद जीशान को मुठभेढ़ में ढेर कर देती है। जीशान के पास से एक मेड इन इटली पिस्टल, 14 कारतूस, पेपर कटर और एक मोटरसाइकिल बरामद की जाती है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब हमलावरों के पास मजबूत और सटीक निशाने वाली इटली की पिस्टल थी, तो सलीम वास्तिक को चाकू से क्यों काटा गया?

यह हमला किसी साधारण रंजिश का परिणाम नहीं था बल्कि एक सुनियोजित और सोच समझकर किया गया कृत्य था। जिस तरह से सलीम वास्तिक पर हमला किया गया, वह साफ संकेत देता है कि मकसद केवल उनकी जान लेना नहीं था बल्कि समाज में डर का माहौल पैदा करना भी था। हमलावारों ने जानबूझ कर पिस्टल के बजाए चाकू से हमला किया। यह गुलाम-ए-नबी की सजा ‘सर तन से जुदा’ का पाक उदाहरण था, जो कट्टरपंथी अक्सर ‘काफिरों’ के लिए इस्तेमाल करते हैं।

यह घटना उस कट्टरपंथी सोच को उजागर करती है, जो अपने मजहब के खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकते, ‘गुस्ताख-ए-नबी’ और ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाने लग जाते हैं। सलीम भी इसीलिए इन कट्टरपंथियों का निशाना बने। वो एक विद्वान व्यक्ति थे। उन्होंने अपनी दीनी तालीम पूरी की थी। इस्लाम को लेकर उनकी अच्छी-खासी समझ थी। उन्हें इस्लाम में खामियाँ साफ दिखती थीं, वह सार्वजनिक तौर पर इसे कबूल भी कर चुके थे।

उनके अनुसार कुरान को अल्लाह ने नहीं लिखा है और यह जबरन थोपा जा रहा है। यही वजह रही कि वास्तिक ने इस्लाम छोड़ा और अपने यूट्यूब चैनल के जरिए इस्लाम की खामियों और मजहब में महिलाओं की आजादी और हलाला जैसी कृत्यों को लेकर आवाज उठाने लगे। उन्होंने यह भी कहा कि सच्चा मुस्लिम आतंकवादी है। यह सभी ओपिनियन वास्तविक ने कुरान के हवाले से ही दिए हैं।

लेकिन इसके बावजूद यह कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों को रास नहीं आया। वे हिंसा के रास्ते पर जाने के लिए बहानें खोज ही लेते हैं। कभी धर्म के नाम पर, तो कभी धर्म के लिए। उन्होंने वास्तिक के खिलाफ फरमान निकाला। वास्तिक का इस्लाम के खिलाफ बोलना इन कट्टरपंथियों को नागवारा और हत्या की साजिश रची। लेकिन उनके लिए यह हत्या कोई मामूली नहीं, बल्कि समाज के लिए उदाहरण पेश करने वाली होनी चाहिए थी।

इटली की पिस्टल होने के बावजूद आसान मौत देने के बदले कट्टरपंथियों ने ‘कसाईनुमा’ मौत का रास्ता चुना। वास्तिक को चाकुओं से गोदा गया। उनके गले, छाती और पेट को चाकुओं से काटा गया। तब तक जब तक वो मर न जाए। लेकिन गनीमत रही कि हमले के कारण वह बेहोश होकर गिर पड़े, जिससे हमलावरों को लगा कि वास्तिक मर गए और वे मौके से फरार हो गए। वास्तिक को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। आज वो दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं।

पुलिस के बयान में सामने आया कि हमला करने वाले अपराधी अपने मकसद को अंजाम देने के लिए दोबारा से घटनास्थल पर आए थे। हमलावरों को पता लगा कि सलीम सिर्फ घायल है, तो वो घटनास्थल पर जाकर एक बार फिर हमला करने के लिए पहुँचे। हमले में AIMIM के कुछ कट्टरपंथी नेता के भी नाम सामने आए हैं, सलीम के बेटे ने उनके खिलाफ FIR दर्ज करवाई है।

साफ है कि सलीम वास्तिक के जरिए कट्टरपंथियों ने उदाहरण पेश कर दिया। वह बताना चाहते हैं कि कोई भी इस्लाम के खिलाफ बोलेगा तो उसका भी यही हश्र होगा। फायरिंग करते, तो शायद ‘काफिरों’ पर उतना असर नहीं डालता। वास्तिक पर हमला गुलाम-ए-नबी की शान में गुस्ताखी करने के कारण किया गया, और ये उसी ‘सर तन से जुदा’ के नारे का लाइव उदाहऱण है, जो कट्टरपंथी गली-मोहल्लों और सड़कों पर ‘काफिरों’ के लिए चींख-चींखकर देते हैं।

‘सर तन से जुदा’ का नेक्सस, PAK कनेक्शन और टेलीग्राम पर जश्न: ‘मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर’ से जुड़े थे Ex मुस्लिम सलीम की गर्दन रेतने वाले सगे भाई जीशान-गुलफाम

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के लोनी में इस्लामिक कुरीतियों और मजहबी कट्टरता के खिलाफ आवाज उठाने वाले एक्स मुस्लिम सलीम वास्तिक पर हुए जानलेवा हमले के मामले में कई बड़े खुलासे हुए हैं। जाँच में सामने आया है कि हमला किसी व्यक्तिगत विवाद का नहीं बल्कि एक संगठित कट्टरपंथी नेटवर्क और सोशल मीडिया के जरिए फैलाई जा रही नफरत का नतीजा था। पता चला है कि सलीम के हमलावर जीशान और गुलफाम एक कट्टरपंथी ग्रुप ‘मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर’ से जुड़े थे।

मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर ग्रुप: टेलीग्राम पर फैला कट्टरपंथ का जाल

जाँच एजेंसियों के अनुसार, इस हमले के पीछे एक कथित कट्टरपंथी संगठन से जुड़ा ‘मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर’ नामक टेलीग्राम ग्रुप अहम कड़ी के रूप में सामने आया है। इस ग्रुप से करीब 18,200 लोग जुड़े हुए हैं। ग्रुप पर लगातार कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा था और हिंसा को खुलकर समर्थन मिल रहा था।

हमले के बाद इसी ग्रुप पर सलीम की घायल अवस्था की तस्वीरें वायरल की गईं और भड़काऊ संदेश लिखे गए। एक पोस्ट में लिखा गया, “एक्स मुस्लिम सलीम को अस्पताल पहुँचा दिया गया है, पूरा वीडियो चाहिए?” ऐसे बयानों के जरिए ग्रुप में हिंसा का महिमामंडन किया गया। बड़ी संख्या में इस कट्टरपंथी ग्रुप के सदस्यों ने इन पोस्ट पर लाइक और कमेंट कर अपना समर्थन दिया।

जाँच में यह भी सामने आया कि इसी नेटवर्क के जरिए पाकिस्तान के एक यूट्यूबर ने खुलेआम सलीम और अन्य हिंदूवादी नेताओं को जान से मारने की धमकी दी थी। उसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें सीधे तौर पर हत्या के लिए उकसाया गया। इसी उकसावे से प्रभावित होकर आरोपित जीशान और गुलफाम सलीम पर हमले के लिए तैयार हुए।

रमजान और जुमे का दिन: साजिश की सुनियोजित टाइमिंग

पुलिस जाँच में खुलासा हुआ है कि हमले की तारीख और समय भी पूरी तरह सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। रमजान का महीना और शुक्रवार यानी जुमे का दिन जानबूझकर चुना गया ताकि वारदात को मजहबी रंग देकर कट्टरपंथी सोच को मजबूत किया जा सके।

हमलावर तड़के लोनी पहुँचे, सलीम के घर से ही उसका पीछा किया और उसके साथ नमाज पढ़ने वाली जगह तक गए। वहाँ से वे उसके कार्यालय तक पहुँचे और मौके पर बाइक से उतरकर अचानक गले पर धारदार हथियार से हमला कर दिया। हमले का तरीका इतना क्रूर था कि साफ संकेत मिलता है कि सिर धड़ से अलग करने की मंशा थी।

हालाँकि, शोर मचने पर आरोपित भाग निकले। जाँच एजेंसियों का मानना है कि इस वारदात का तरीका उदयपुर के कन्हैया लाल और लखनऊ के कमलेश तिवारी हत्याकांड से मिलता-जुलता है, जहाँ वैचारिक मतभेद के चलते कट्टरपंथियों ने सुनियोजित तरीके से हमला किया था।

दो सगे भाई, एक साजिश: कारपेंटर से हमलावर तक का सफर

सलीम पर हमला करने वाले दोनों आरोपित सगे भाई हैं। मुठभेड़ में मारा गया जीशान और उसका फरार भाई गुलफाम मूल रूप से अमरोहा के सैदनगली गाँव के रहने वाले थे और खोड़ा कॉलोनी में किराए के मकान में रहकर कारपेंटर का काम करते थे।

पुलिस के अनुसार, जीशान खुद भी एक यूट्यूब चैनल चलाता था और कट्टरपंथी विचारधारा से गहराई से प्रभावित था। वह लगातार मेहदी मॉडरेटर ग्रुप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के संपर्क में था। पाकिस्तानी यूट्यूबर की अपील और भड़काऊ वीडियो से प्रभावित होकर दोनों भाइयों ने सलीम पर जानलेवा हमला करने का फैसला किया।

हमले के बाद उन्होंने टेलीग्राम ग्रुप पर वारदात की जिम्मेदारी लेते हुए फोटो पोस्ट की और खुलेआम जश्न मनाया। घटना के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्त चेतावनी और पुलिस की सक्रियता के चलते मुठभेड़ हुई, जिसमें जीशान मारा गया। अब पुलिस फरार आरोपित गुलफाम की तलाश में लगातार दबिश दे रही है।

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति पर हमले का नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के जरिए फैल रहे कट्टरपंथ, विदेशी उकसावे और संगठित नफरत के खतरनाक गठजोड़ का गंभीर उदाहरण बनकर सामने आया है। जाँच एजेंसियाँ पूरे नेटवर्क को खंगालने में जुटी हैं ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी साजिश को समय रहते नाकाम किया जा सके।

चीन का माल निकला बेकार, इजरायल-US के सामने फेल HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम: जानें- ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ में अमेरिका ने कौन-से हथियार किए इस्तेमाल

अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी 2026 को ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम से सैन्य कार्रवाई शुरू की। दोनों देशों ने ईरान पर ताबड़तोड़ हमले किए, जिसमें ईरान के कई शहरों में भारी तबाही हुई। इन हमलों में US ने आधुनिक हथियारों और ड्रोनों का इस्तेमाल किया। ये हथियार इतने ताकतवर हैं कि चीन से खरीदे गए ‘HQ-9B’ एयर डिफेंस सिस्टम से भी ईरान खुद को बचाने में नाकाम रहा।

सबसे पहले जानते हैं कि ईरान के खिलाफ अमेरिका ने किन-किन हथियार और मिसाइलों का इस्तेमाल किया और उनकी विशेषताएँ क्या हैं?

टॉमहॉक क्रूज मिसाइल

सबसे प्रमुख हथियार ‘टॉमहॉक क्रूज’ मिसाइल है। यह लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल है, जिसे युद्धपोत या पनडुब्बी से छोड़ा जाता है। इसकी मारक क्षमता 1600 किलोमीटर तक मानी जाती है और यह जमीन पर बने सटीक सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम होती है। यह बहुत कम ऊँचाई पर उड़ती है, जिससे इसे रडार से पकड़ना मुश्किल होता है।

F-35 फाइटर जेट

F-35 एक आधुनिक स्टेल्थ लड़ाकू विमान है, जिसे रडार आसानी से पकड़ नहीं पाता। यह दुश्मन की सीमा में चुपचाप घुसकर हमला करने में सक्षम है। यह हवा से हवा और हवा से जमीन दोनों तरह के मिशन कर सकता है। इसमें आधुनिक सेंसर और सटीक बम-मिसाइल लगाने की क्षमता होती है।

F/A-18 फाइटर जेट

F/A-18 बहुउद्देश्यीय फाइटर जेट है, जिसे अक्सर एयरक्राफ्ट कैरियर से उड़ाया जाता है। यह तेज गति से दुश्मन के ठिकानों पर हमला कर सकता है। इसमें अलग-अलग तरह की मिसाइल और बम लगाए जा सकते हैं। यह हवाई लड़ाई और जमीन पर हमले, दोनों में काम आता है।

LUCAS कमीकाजे ड्रोन

LUCAS एक बिना पायलट के हमला करने वाला ड्रोन है, जो क्ष्य के ऊपर मंडराता है और मौका मिलते ही टकराकर विस्फोट कर देता है। इसे सस्ता और तेजी से इस्तेमाल करने के लिए बनाया गया है। ऐसे ड्रोन छोटे ठिकानों या वाहनों को निशाना बनाने में कारगर होते हैं।

HIMARS रॉकेट सिस्टम

HIMARS एक चलती-फिरती रॉकेट लॉन्चर गाड़ी है, जो जमीन से ही दूर तक रॉकेट दाग सकती है। इसे जल्दी तैनात किया जा सकता है और फायर करने के बाद तुरंत स्थान बदला जा सकता है। यह दुश्मन के गोदाम, मिसाइल साइट या सैन्य ठिकानों को सटीक निशाना बनाने में इस्तेमाल होता है।

पेट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम

पेट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम अमेरिका का जमीन से दागा जाने वाली रक्षा प्रणाली है, जिसे दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमानों को हवा में ही मार गिराने के लिए बनाया गया है। इसमें ताकतवर रडार लगा होता है, जो दूर से ही खतरे को पहचान लेता है। अमेरिका इसे कई युद्ध में इस्तेमाल कर चुका है, इसे अमेरिका की हवाई सुरक्षा की ढाल माना जाता है।

THAAD

टर्मिनल हाई अल्टीट्यू एरिया डिफेंस (THAAD) अमेरिका का एक उन्नत मिसाइल रक्षा सिस्टम है, जिसे खासतौर पर बैलिस्टिक मिसाइलों को बहुत ऊँचाई पर ही रोकने के लिए बनाया गया है। यह दुश्मन की मिसाइल को वायुमंडल के अंदर या उसके किनारे पर ही नष्ट कर देता है, ताकि नीचे जमीन पर कोई नुकसान न हो।

इस सिस्टम में AN/TPY-2 नाम का बेहद ताकतवर रडार लगा होता है, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर से खतरे को पहचान सकता है। THAAD की खास बात यह है कि यह विस्फोटक वारहेड का इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि सीधे टक्कर मारकर मिसाइल को नष्ट करता है, जिससे सटीकता और सुरक्षा दोनों बढ़ जाती हैं।

चीन का ‘HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम’ भी ईरान को नहीं बचा सका

अमेरिका के ये ताकतवर हथियार ईरान में तबाही मचा रहे हैं। इन हमलों ईरान खुद को बचाने में नाकाम दिख रहा है। खासकर चीन से हाल ही ईरान ने खरीदा ‘HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम‘ पूरी तरह से कमजोर साबित हुआ।

बता दें कि यह वही डिफेंस सिस्टम है, जिसे पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में खुद को बचाने के लिए इस्तेमाल किया था, लेकिन तब भी यह सिस्टम भारत के हमलों को नहीं रोक सका था। अब ईरान में इसके कमजोर प्रदर्शन के बाद इस डिफेंस सिस्टम की सैन्य विशेषज्ञ इसकी क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं।

हालाँकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह सिस्टम पूरी तरह खराब नहीं है, बल्कि संभव है कि अमेरिका और इजरायल की संयुक्त और बेहद ताकतवर वायुसेना ने इसे एक साथ कई दिशाओं से इतना दबाव में डाल दिया कि यह संभल नहीं पाया।

यह भी कहा जा रहा है कि खाड़ी देशों में तनाव बढ़ने के बाद ईरान ने जल्दबाजी में अपनी रक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश की थी, जिससे तैयारी पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाई।

कैसे काम करता है चीन का HQ-98 एयर डिफेंस सिस्टम?

HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम को चीन की कंपनी चीन एयरोस्पेस साइंस एंड इंडस्ट्री कॉरपोरेशन (CASIC) ने बनाया है। इसे रूस के S-300PMU और अमेरिका के पैट्रियट PAC-2 सिस्टम से प्रेरणा लेकर बनाया गया, लेकिन बाद में इसे पूरी तरह चीन का स्वदेशी सिस्टम बना दिया गया।

इसका पहला परीक्षण साल 2006 में हुआ था और पिछले लगभग 10 साल से यह सक्रिय सेवा में है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इसकी मारक क्षमता लगभग 260 किलोमीटर है और यह करीब 50 किलोमीटर ऊँचाई तक जाकर दुश्मन के मिसाइल या विमान को गिरा सकता है।

चीन ने इस सिस्टम को अपने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इळाकों जैसे बीजिंग, तिब्बत और दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में तैनात किया हुआ है। इससे साफ है कि HQ-9B चीन के एयर डिफेंस नेटवर्क का एक अहम हिस्सा है। जहाँ तक ईरान की बात है, खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के दौरान ईरान ने अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए चीन के साथ ‘तेल के बदले हथियार’ समझौते के तहत HQ-9B खरीदा था।

US के हमले में कैसे नाकाम साबित हुआ HQ-9B डिफेंस सिस्टम?

ईरान ने HQ-9B को अपनी लंबी दूरी की सुरक्षा परत के रूप में शामिल किया। ईरान की एयर डिफेंस व्यवस्था कई स्तरों में बनी है। लंबी दूरी के लिए HQ-9B, S300PMU-2 और बावर-373 तैनात हैं। मध्यम दूरी के लिए खोरदाद-15 और राद (Raad) सिस्टम हैं। छोटी दूरी की सुरक्षा के लिए Tor-M2, Pantsir-S1, Zolfaqar और कंधे से दागे जाने वाले MANPADS मिसाइल सिस्टम शामिल हैं।

अमेरिका के हमले की धमकी के बीच ईऱान ने HQ-9B को अपने सबसे महत्वपूर्ण ठिकानों के आसपास तैनात किया था, जैसे नतांज परमाणु केंद्र, फोर्डो एनरिजमेंट सुविधा, IRGC के मिसाइल और ड्रोन बेस और तेहरान व इस्फहान के पास के एयरबेस। इसके बावजूद अमेरिका और इजरायल के हमलों में बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ, जिससे इस सिस्टम की वास्तविक क्षमता और तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।