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सदियों पुराना रहस्यमयी शिवलिंग… नासिक के त्र्यंबकेश्वर मंदिर में ‘अमृत कुंड’ की सफाई के दौरान ASI को मिली धरोहर, जानिए- इस ऐतिहासिक ज्योतिर्लिंग की कहानी

महाराष्ट्र के नासिक में स्थित देश के प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री त्र्यंबकेश्वर मंदिर परिसर से एक बेहद चमत्कारी और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI की टीम जब मंदिर के भीतर मौजूद प्राचीन और ऐतिहासिक जल निकाय ‘अमृत कुंड’ की सफाई कर रही थी, तब उसके तलवे से एक प्राचीन पत्थर का नक्काशीदार शिवलिंग मिला।

यह अद्भुत शिवलिंग अमृत कुंड की तलहटी में दशकों से जमा कीचड़ और मलबे के नीचे पूरी तरह से दबा हुआ था। पुरातत्व विशेषज्ञों के शुरुआती अनुमान के मुताबिक यह शिवलिंग कम से कम 240 साल पुराना है, लेकिन इसके इससे भी कहीं ज्यादा प्राचीन यानी लगभग 335 साल से भी पुराना होने की पूरी संभावना जताई जा रही है।

जब सूख गया कुंड और सामने आया इतिहास

रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरी घटना किसी कहानी जैसी लगती है, जहाँ एक ऐतिहासिक कुंड को सुखाया जाता है और उसके नीचे से कुछ ऐसा निकलता है जिसे आज की पीढ़ी के किसी भी जीवित भक्त ने अपनी आँखों से कभी नहीं देखा था। ASI की टीम पिछले कुछ समय से त्र्यंबकेश्वर मंदिर परिसर के भीतर बने लगभग 65 फीट गहरे पत्थर के इस ऐतिहासिक कुंड को खाली करके उसकी गाद निकालने के काम में जुटी हुई थी।

इस प्राचीन कुंड को स्थानीय लोग ‘अमृत कुंड’ या ‘अमृतवर्षिणी कुंड’ के नाम से भी जानते हैं। जैसे-जैसे कर्मचारियों ने आधुनिक पंपों की मदद से पानी को निकाला और सदियों से जमा कीचड़ को हटाना शुरू किया, वैसे-वैसे कुंड की तलहटी से काले पत्थर का एक सुडौल शिवलिंग आकार लेने लगा। इस शिवलिंग की मौजूदगी अब तक केवल स्थानीय बुजुर्गों की मौखिक कहानियों और यादों में ही जिंदा थी, लेकिन अब यह हकीकत बनकर सबके सामने आ चुका है।

क्या है इस अद्भुत शिवलिंग की उम्र का असली गणित

पुरातत्व विभाग ने अभी तक इस नए मिले शिवलिंग की कोई वैज्ञानिक जाँच जैसे पेट्रोग्राफिक स्टडी, लिथोलॉजी या तलछट विश्लेषण नहीं किया है। इसलिए अभी तक इसकी बिल्कुल सटीक और प्रमाणित उम्र की घोषणा किसी आधिकारिक रिसर्च पेपर में नहीं की गई है।

लेकिन इतिहास और वास्तुकला के जानकार इसके समय का एक पक्का दायरा जरूर तय कर रहे हैं। यह ऐतिहासिक अमृत कुंड जिस मुख्य मंदिर परिसर के भीतर स्थित है, उसका पुनर्निर्माण साल 1755 से 1786 के बीच मराठा साम्राज्य के तीसरे पेशवा बालाजी बाजीराव ने करवाया था। इस ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर यह पत्थर और इस पर की गई नक्काशी कम से कम 240 साल पुरानी तो है ही।

औरंगजेब के हमले और शिवलिंग को छिपाने का रहस्य

इस खोज को लेकर इतिहासकार और स्थानीय लोग एक और बेहद दिलचस्प थ्योरी पर विचार कर रहे हैं। इतिहास बताता है कि साल 1690 में क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की सेना ने यहाँ के प्राचीन मंदिर को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया था। स्थानीय मौखिक इतिहास और पीढ़ियों से चली आ रही कहानियों में यह दावा किया जाता है कि मुगलों के उस भीषण हमले के दौरान पवित्र मूर्तियों और शिवलिंग को खंडित होने से बचाने के लिए पुजारियों ने उन्हें चुपके से पानी के भीतर छिपा दिया था।

अगर यह शिवलिंग उसी काल का है, तो इसकी उम्र आसानी से 335 साल या उससे भी ज्यादा हो सकती है। हालाँकि त्र्यंबकेश्वर देवस्थान ट्रस्ट के अपने लिखित दस्तावेजों में केवल मंदिर के पुनर्निर्माण की तारीखों का जिक्र मिलता है, पानी में किसी पत्थर को छिपाने का कोई पुख्ता लिखित प्रमाण अभी तक नहीं मिला है। अब केवल प्रयोगशाला की जांच ही इस रहस्य पर से अंतिम पर्दा उठा पाएगी।

प्रकृति की मार से कैसे बचा रहा यह बेसाल्ट पत्थर

इस खोज का एक सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि सदियों तक पानी और कीचड़ के नीचे दबे रहने के बावजूद यह शिवलिंग बिल्कुल सही सलामत और अपने मूल आकार में है। इसके पीछे एक गहरा भूवैज्ञानिक कारण काम कर रहा है। दरअसल पूरा नासिक और त्र्यंबकेश्वर का यह इलाका ‘दक्कन ट्रैप’ क्षेत्र में आता है, जहाँ करोड़ों साल पहले हुए भीषण ज्वालामुखी विस्फोटों के कारण मजबूत काले बेसाल्ट पत्थरों की मोटी परतें बन गई थीं।

यहाँ के स्थानीय कारीगरों ने पिछले 2,000 से अधिक वर्षों से इसी काले बेसाल्ट पत्थर को तराश कर कई भव्य मंदिरों, मजबूत किलों और गुफाओं का निर्माण किया है क्योंकि इस पत्थर पर पानी और मौसम की मार का असर बहुत कम होता है। पानी के अंदर डूबे होने के कारण यह पत्थर सीधे सूरज की रोशनी और तापमान के उतार-चढ़ाव से पूरी तरह बचा रहा, जिससे इसकी नक्काशी आज भी वैसी की वैसी ही चमक रही है।

गाद निकालना कैसे बन गया एक ऐतिहासिक उत्खनन

पुरातत्व विभाग के लिए यह काम केवल एक साधारण सफाई अभियान नहीं था, बल्कि यह एक बेहद नियंत्रित और वैज्ञानिक उत्खनन की तरह था। बारिश के हर मौसम में इस तरह के प्राचीन जल निकायों में मिट्टी, रेत और जैविक पदार्थों की एक नई परत जमा होती जाती है, जो समय के साथ ठोस गाद बन जाती है।

ASI के विशेषज्ञों ने बहुत ही धैर्य के साथ कीचड़ की एक-एक परत को हटाया ताकि नीचे छिपी किसी भी प्राचीन कलाकृति को नुकसान न पहुँचे। यह खोज दिखाती है कि बिना किसी बड़ी खुदाई के भी, केवल सही संरक्षण और देखरेख के जरिए हम भारत की समृद्ध और पवित्र सांस्कृतिक विरासत के खोए हुए हिस्सों को कैसे वापस पा सकते हैं।

श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का गौरवशाली इतिहास

श्री त्र्यंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के नासिक शहर से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर बेहद खूबसूरत ब्रह्मगिरि पहाड़ी की तलहटी में स्थित है। समुद्र तल से लगभग 3,000 फीट की ऊंचाई पर बसी यह जगह बेहद पवित्र मानी जाती है क्योंकि इसी ब्रह्मगिरि पर्वत से दक्षिण की गंगा कही जाने वाली पवित्र गोदावरी नदी का उद्गम होता है।

इस मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन है, लेकिन वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण मराठा साम्राज्य के तीसरे पेशवा बालाजी बाजीराव (जिन्हें नानासाहेब पेशवा भी कहा जाता है) ने साल 1740 से 1760 के बीच एक पुराने मंदिर के स्थान पर ही शुरू करवाया था। इस मंदिर का भव्य उद्घाटन 16 फरवरी 1756 को महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर बकायदा पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे शहनाई, चौघड़ा, तुतारी और रणसींग के मधुर और ओजस्वी स्वरों के साथ किया गया था।

इतिहास के झरोखों से देखें तो साल 1742 में मराठों ने इस पूरे क्षेत्र को निजाम के नियंत्रण से जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया था। बाद में साल 1818 में मराठा साम्राज्य के पतन के बाद यह ऐतिहासिक मंदिर ब्रिटिश शासन के अधीन चला गया और आजादी के बाद अब यह भारत सरकार के संरक्षण में है। इस मंदिर का धार्मिक महत्व संत परंपरा से भी बहुत गहरा जुड़ा हुआ है।

महान संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज के बड़े भाई और वारकरी संप्रदाय के प्रणेता संत निवृत्तिनाथ ने इसी पावन भूमि त्र्यंबकेश्वर में महज 24 वर्ष की आयु में संजीवन समाधि ली थी। संत निवृत्तिनाथ के कहने पर ही संत ज्ञानेश्वर ने आम जनमानस के कल्याण के लिए प्राकृत भाषा में भगवद्गीता पर अपनी प्रसिद्ध टीका ‘ज्ञानेश्वरी’ लिखी थी। आज भी हर साल संत निवृत्तिनाथ की पुण्यतिथि पर लाखों की संख्या में वारकरी श्रद्धालु इस पावन नगरी में जुटते हैं।

प्रशासनिक इतिहास की बात करें तो साल 1954 में इस पूरे संस्थान को पब्लिक ट्रस्ट रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत किया गया था। इसके बाद साल 1995 से इस मंदिर के संचालन के लिए एक सुव्यवस्थित ‘बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज’ का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष जिला जज द्वारा नियुक्त माननीय न्यायाधीश होते हैं और त्र्यंबक नगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी इसके सचिव के रूप में काम करते हैं।

वर्तमान में मंदिर ट्रस्ट द्वारा श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस भक्त निवास और अन्य बेहतर व्यवस्थाएं संचालित की जा रही हैं। अमृत कुंड से मिले इस नए शिवलिंग ने इस पावन मंदिर के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गौरव को पूरी दुनिया में एक बार फिर से बढ़ा दिया है।

UP में माँ ने PCS अफसर बेटी के खिलाफ दर्ज कराया केस, कहा- मेरे खाते में डाले ‘काली कमाई’ के ₹15 लाख: पढ़ें- FIR की डिटेल्स

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से हैरान करने वाला मामला सामने आया है। हापुड़ में तैनात जिला पूर्ति अधिकारी सीमा चौधरी के खिलाफ उनकी ही माँ ने FIR दर्ज करा दी है। माँ मुनेश रानी ने अपनी बेटी पर धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज बनवाने, जमीन हड़पने की साजिश और अपने बैंक खाते में कथित काली कमाई के 15 लाख रुपए जमा कराने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।

मामला सहारनपुर के सरसावा थाना क्षेत्र के मीरपुर-सीतापुर गाँव का है। 30 जून की शाम करीब 5 बजे मुनेश रानी ने थाने में तहरीर दी। इसके बाद पुलिस ने सीमा चौधरी समेत 5 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। सीमा चौधरी एलाइड PCS अफसर हैं और फिलहाल हापुड़ में जिला पूर्ति अधिकारी यानी DSO के पद पर तैनात हैं।

FIR में क्या कहा गया है?

मुनेश रानी ने अपनी ही बेटी सीमा चौधरी समेत 5 लोगों के खिलाफ डीआईजी सहारनपुर को शिकायत दी है। FIR में संजीव कुमार चौधरी, राजेंद्र राणा, गंभीर, नरेश कुमार और सीमा चौधरी को आरोपित बनाया गया है। ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR कॉपी के मुताबिक, उनकी बेटी सीमा चौधरी और अन्य आरोपित आपस में मिले हुए हैं और उनका एक भूमाफिया गिरोह है, जो उनकी जमीन पर जबरन कब्जा करना चाहता है।

FIR के मुताबिक, मुनेश रानी का आरोप है कि संजीव कुमार और राजेंद्र राणा ने उनके बैंक खाते में बिना बताए 15 लाख रुपए जमा किए। शिकायत के मुताबिक, यह खाता गाजियाबाद के ICICI बैंक में उनकी बेटी सीमा चौधरी ने खुलवाया था और वही खाते को संचालित करती थी। मुनेश रानी ने दावा किया है कि खाता खुलवाने में सीमा चौधरी ने अपनी ईमेल आईडी का इस्तेमाल किया था।

शिकायत में आगे कहा गया है कि सीमा चौधरी अपनी ‘काली कमाई’ मुनेश रानी के बैंक खाते में जमा करती है, जिसकी जानकारी मुनेश रानी को नहीं थी। उन्होंने कहा कि वह खुद न तो इस खाते में पैसा जमा करती हैं और न ही निकालती हैं।

FIR का एक हिस्सा

जमीन से जुड़े आरोप भी गंभीर हैं। FIR के मुताबिक, संजीव कुमार और राजेंद्र राणा ने गंभीर और नरेश कुमार के साथ मिलकर मुनेश रानी की ग्राम मीरपुर सीतापुर स्थित जमीन से जुड़ी एक फर्जी, जाली और फर्जी रसीद तैयार की। यह रसीद 16 सितंबर 2023 की बताई गई है। शिकायत के अनुसार, इस रसीद पर मुनेश रानी के फर्जी हस्ताक्षर किए गए।

मुनेश रानी ने कहा कि जब उन्हें इसका पता चला तो उन्होंने अपने साइन की जाँच मुजफ्फरनगर के हस्तलेख विशेषज्ञ संजय मलिक से कराई। शिकायत के मुताबिक, रिपोर्ट में फर्जी रसीद पर दिखाए गए हस्ताक्षर उनके असली हस्ताक्षरों से अलग पाए गए। मुनेश रानी का आरोप है कि आरोपियों ने धोखाधड़ी से फर्जी रसीद तैयार की और उसे असली दस्तावेज की तरह इस्तेमाल किया। उनके मुताबिक, आरोपित इसी रसीद के आधार पर उनकी जमीन हड़पना चाहते थे।

मुनेश रानी ने आरोप लगाया है कि आरोपित उन्हें डराते-धमकाते हैं। शिकायत के मुताबिक, आरोपितों ने कहा कि अगर उन्होंने विरोध किया तो वे उन्हें जान से मार देंगे। मुनेश रानी का कहना है कि इसी वजह से मजबूर होकर उन्होंने अपनी संपत्ति के दो बैनामे नैन्सी जोशी पत्नी अनुपम जोशी निवासी देहरादून के पक्ष में कर दिए।

शिकायत के अनुसार, उन्होंने इसके बदले पैसे लिए और दोनों बैनामों का दाखिल-खारिज भी हो चुका है और मौके पर कब्जा भी खरीदार का है। मुनेश रानी ने आरोप लगाया कि इसके बाद आरोपित उनसे और ज्यादा रंजिश रखने लगे। FIR के मुताबिक, आरोपित उन्हें खुलेआम धमकी दे रहे हैं कि वे उन्हें जान से मारकर उनकी लाश ऐसी जगह फेंक देंगे, जहाँ किसी को पता नहीं चलेगा।

मामले की जाँच जारी: पुलिस

पुलिस ने मुनेश रानी की तहरीर के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420, 467, 468, 471 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है। पुलिस के मुताबिक, मामले की निष्पक्ष जाँच की जा रही है और आरोपों की पुष्टि जाँच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

डीआईजी अभिषेक सिंह ने बताया कि उनके पास शिकायत आई थी, जिसे उन्होंने एसएसपी को आगे भेज दिया था और जाँच के बाद इस मामले में मुकदमा दर्ज किया गया है।

फिलहाल पूरा मामला जाँच के अधीन है। सीमा चौधरी या अन्य आरोपितों की तरफ से इस मामले पर अभी तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पुलिस का कहना है कि जाँच में जो तथ्य सामने आएँगे, उसी आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

हर विश्व कप एक नया नायक चुनता है: 17 साल के लड़के ने विश्व कप लूट लिया, फिर शुरू हुई कमबैक्स की रात

ग्रुप स्टेज के दौरान आपने मोरक्को के अठारह वर्षीय मिडफील्डर अयूब बोउदादी को ब्राज़ील जैसी सितारों से सजी टीम के सामने बेखौफ़ होकर खेलते देखा था। विश्व कप केवल चैंपियन नहीं चुनता, वह नई किंवदंतियाँ भी गढ़ता है। हर संस्करण किसी नए सितारे को दुनिया के सामने लाता है। इस बार वह नाम है, गिल्बर्टो राफेल मोरा ज़ामब्रानो। बीती सुबह दुनिया ने उस नए नाम को पहचाना- गिल्बर्टो मोरा; यह नाम याद रखिए। आने वाले वर्षों में विश्व फुटबॉल की कई बड़ी कहानियाँ शायद इसी नाम के इर्द-गिर्द लिखी जाएँगी।

महज़ सत्रह वर्ष की आयु में, ‘मेक्सिकन पेड्री’ के नाम से पहचाने जाने वाले गिल्बर्टो मोरा ने उस मंच पर ऐसा प्रदर्शन किया, जहाँ अक्सर अनुभवी खिलाड़ी भी दबाव में बिखर जाते हैं। पेले (1958) के बाद विश्व कप के नॉकआउट मुकाबले में उतरने वाले दूसरे सबसे युवा खिलाड़ी बने मोरा ने यह एहसास ही नहीं होने दिया कि वह मैदान पर सबसे कम उम्र के फुटबॉलर थे। उनके खेल में परिपक्वता थी, आत्मविश्वास था और सबसे बढ़कर वह निर्भीकता थी, जो महान खिलाड़ियों की पहचान होती है।

इक्वाडोर के अनुभवी मिडफील्डरों के बीच गिल्बर्टो ने जिस सहजता से खेल को नियंत्रित किया, उसने हर दर्शक को प्रभावित किया। दो अवसर तैयार किए, पाँच रिकवरीज़ दर्ज कीं और अपने सभी लॉन्ग पास सफलतापूर्वक पूरे किए। आँकड़े केवल उनके प्रदर्शन की कहानी का एक हिस्सा हैं; असली कहानी उस आत्मविश्वास की थी, जिसके साथ उन्होंने पूरे मुकाबले की गति को प्रभावित किया। अंतिम सीटी बजते ही स्टेडियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। दर्शक जानते थे कि उन्होंने केवल एक बेहतरीन मैच नहीं देखा था, बल्कि विश्व फुटबॉल के एक संभावित भविष्य का जन्म देखा था।

मेक्सिको के टुक्सत्ला गुटिएरेज़ से निकला यह किशोर अब केवल अपने देश की उम्मीद नहीं रहा। यदि उसका विकास इसी गति से जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में वह विश्व फुटबॉल के सबसे प्रभावशाली मिडफील्डरों में गिना जा सकता है।

विश्व कप के पिछले कुछ दिनों ने हमें चौंकाने वाले उलटफेरों का रोमांच दिया है, लेकिन कल रात खेले गए नॉकआउट मुकाबलों ने इस टूर्नामेंट को ऐसे यादगार कमबैक्स दिए, जिनका ज़िक्र आने वाले कई दशकों तक किया जाएगा।

अटलांटा की रात में स्टेडियम इंग्लैंड के समर्थकों से भरा था, लेकिन शुरुआती मिनटों से ही स्पष्ट हो गया कि डीआर कांगो यहाँ केवल भाग लेने नहीं, इतिहास रचने आया है।

अटलांटा में थॉमस टुकेल की इंग्लिश टीम के सामने थी डीआर कांगो- एक ऐसी टीम, जिसने पूरे टूर्नामेंट में अपने अनुशासित और संगठित खेल से बड़े-बड़े प्रतिद्वंद्वियों को परेशान किया था। कोच सेबास्टियन देसाब्रे अपनी स्पष्ट रणनीति के साथ मैदान में उतरे थे। उद्देश्य केवल एक था; किसी भी कीमत पर इंग्लैंड की आक्रमण पंक्ति की धार को कुंद करना, उन्हें गोल से दूर रखना और मुकाबले को जितना संभव हो सके उतना लंबा खींचना।

कोच सेबास्टियन देसाब्रे ने क्वालिफाइंग राउंड में अपनी चार डिफेंडरों वाली पारंपरिक 4-4-2 फॉर्मेशन के विपरीत, इस टूर्नामेंट में पुर्तगाल और कोलंबिया जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ 5-3-2 की फॉर्मेशन अपनाई थी। इसी रणनीति के दम पर वह इन दोनों टीमों के विरुद्ध एक-एक अंक जुटाने में सफल रहे थे। लेकिन कल रात उन्होंने एक बार फिर अपनी टीम को 4-4-2 की फॉर्मेशन के साथ मैदान पर उतारा। उनका प्रयास यही था कि किसी भी तरह इंग्लैंड को गोल के लिए तरसाया जाए और मैच को पेनाल्टी शूटआउट तक खींचा जाए।

मगर इंग्लिश कोच थॉमस टुकेल भी क्लब फुटबॉल के एक उच्च स्तरीय कोच माने जाते हैं, जिन्हें अपनी चुस्त रणनीतियों के लिए जाना जाता है। वह चेल्सी के साथ चैंपियंस लीग का खिताब भी जीत चुके हैं। कोच थॉमस टुकेल ने इंग्लैंड की टीम को 4-3-3 की फॉर्मेशन के साथ मैदान पर उतारा। अटैकिंग लाइन में हैरी केन, नोनी मादुएके और मार्कस रैशफोर्ड मौजूद थे। इनके ठीक पीछे स्टार अटैकिंग मिडफील्डर ज्यूड बेलिंघम खेल रहे थे।

रेफरी की व्हिस्ल के साथ मैच का शंखनाद होता है। इंग्लैंड आज फेवरेट था। लेकिन तमाम दर्शकों को चौंकाते हुए डीआर कांगो ब्रायन सिपेंगा के गोल की बदौलत मैच के सातवें मिनट में ही इंग्लैंड पर बढ़त बना लेता है। यह क्या! क्या इस टूर्नामेंट में एक और बड़ा उलटफेर होने जा रहा था?

एक गोल से पिछड़ने के बाद इंग्लैंड लगातार प्रयास करता रहता है कि किसी तरह बराबरी का गोल दागकर मैच में वापसी की जाए, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा था। वह मिले हुए मौकों को भुना नहीं पा रहे थे। पहला हाफ समाप्त हो जाता है। बढ़त अब भी डीआर कांगो के पास थी। लग रहा था कि आज ‘थ्री लायंस’ का सफर यहीं समाप्त हो जाएगा।

खैर, दूसरे हाफ की शुरुआत होती है। इंग्लैंड को 2016 में आइसलैंड जैसे छोटे राष्ट्र ने उलटफेर करते हुए टूर्नामेंट से बाहर कर दिया था। ऐसा लग रहा था कि आज फिर वैसा ही कुछ होने वाला है। जैसे-जैसे मैच आगे बढ़ रहा था, इंग्लिश टीम काफी दबाव में नज़र आ रही थी। कांगो के गोलकीपर लियोनेल मपासी आज अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ फुटबॉल खेलते दिखाई दे रहे थे। वह लगातार असाधारण सेव किए जा रहे थे। इंग्लिश अटैकिंग तिकड़ी के पास उनका कोई जवाब नहीं था। उनके शानदार बचावों की बदौलत कांगो अब तक मुकाबले में बढ़त बनाए हुए था।

मैच के 61वें मिनट में कोच टुकेल मार्कस रैशफोर्ड को बाहर बुलाते हुए, हाल ही में स्पेनिश क्लब बार्सिलोना से जुड़ने वाले एंथोनी गॉर्डन को मैदान में भेजते हैं। साथ ही बुकायो साका, नोनी मादुएके की जगह लेते हैं। इसके बाद मैच का रुख पूरी तरह बदल जाता है। एकाएक इंग्लैंड बेहद तेज़ गति से आक्रमण करने लगता है।

मैच के 75वें मिनट में आखिरकार वह गोल आ ही जाता है, जिसका स्टेडियम में सफेद जर्सी पहने हजारों दर्शकों को इंतज़ार था। एंथोनी गॉर्डन गेंद को अपने कप्तान की ओर बढ़ाते हैं और हैरी केन क्लोज़ रेंज से शानदार हेडर लगाते हुए स्कोर 1-1 कर देते हैं। बेहद मुश्किलों के बाद अंततः इंग्लैंड की टीम गोलकीपर लियोनेल मपासी के गोलपोस्ट में सेंध लगाने में सफल हो जाती है।

और फिर, महज़ दस मिनट के भीतर, मैच के 86वें मिनट में एक बार फिर एंथोनी गॉर्डन के ही असिस्ट को कप्तान हैरी केन गोल में बदल देते हैं। शुरुआती क्षणों में जो इंग्लिश टीम मैच में पिछड़ रही थी, अब वही बढ़त बना चुकी थी। केवल दस मिनट के भीतर कांगो का यह बेहद हसीन ख़्वाब टूट जाता है। कप्तान हैरी केन के दो गोलों की बदौलत इंग्लैंड शानदार वापसी करते हुए 2-1 के स्कोर से यह मैच जीत लेता है। इस मुकाबले को लियोनेल मपासी के असाधारण सेव्स के लिए भी याद किया जाएगा, जिन्होंने ज्यूड बेलिंघम और हैरी केन को कई मौकों पर बेहतरीन बचाव करते हुए गोल करने से वंचित रखा।

इंग्लैंड आज एक बड़े उलटफेर का शिकार होते-होते रह गया। उनके कप्तान ने आगे बढ़कर जिस अंदाज़ में खेल का रुख मोड़ा, उससे इस टूर्नामेंट में डीआर कांगो की ड्रीम रन का समापन हो गया। डीआर कांगो की टीम आज बहुत अच्छा खेली, मगर इस जीत के साथ इंग्लैंड ने अगले दौर में जगह बना ली, जहाँ उसका सामना होगा मेक्सिको से, वह भी उनके गढ़ एज़्टेका स्टेडियम में। मेक्सिको को उसके गढ़ एज़्टेका स्टेडियम में हराना निश्चित ही टेढ़ी खीर साबित होगा।

इसके बाद, भारतीय समयानुसार रात डेढ़ बजे सिएटल स्टेडियम में बेल्जियम बनाम सेनेगल का मैच खेला गया। तमाम फुटबॉल पंडित इस मुकाबले में रेड डेविल्स को ही फेवरेट मान रहे थे। बेल्जियम की स्टार्टिंग लाइन-अप में केविन डी ब्रुएने के नेतृत्व में लिआंड्रो ट्रोसार्ड और जेरेमी डोकू अटैकिंग जिम्मेदारियाँ निभाने वाले थे। मिडफील्ड में कप्तान यूरी टीलेमांस मौजूद थे और गोलपोस्ट की रक्षा का जिम्मा दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गोलकीपरों में शुमार, रियल मैड्रिड के मुख्य गोलकीपर थिबो कूर्तुआ के कंधों पर था। वहीं, अपने स्टार खिलाड़ी सादियो माने के नेतृत्व में सेनेगल 4-3-3 की फॉर्मेशन के साथ मैदान पर उतरा था। सेनेगल पिछले दौर में इराक को 5-0 से रौंदते हुए यहाँ पहुँचा था।

मैच शुरू होता है। दोनों ही टीमें एक-दूसरे के गोलपोस्ट की दिशा में गेंद ले जाने की कोशिश करती नज़र आती हैं। शुरुआती क्षणों में दोनों टीमों के खिलाड़ी गोल करने के प्रयास करते हैं, मगर उन्हें सफलता नहीं मिलती। सेनेगल लगातार बेल्जियम के किले को भेदने के प्रयास करता रहता है।

लेकिन मैच के 24वें मिनट में हबीब दियारा एक शानदार गोल दाग देते हैं। सेनेगल मैच में बढ़त बना लेता है। केविन डी ब्रुएने लगातार कोशिश करते हैं कि उनकी टीम मैच में वापसी करे, लेकिन पहले हाफ की समाप्ति पर सेनेगल 1-0 के स्कोर के साथ बढ़त बनाए हुए था। उसने अब तक बेहद शानदार खेल का प्रदर्शन किया था और पूरी तरह बिना दबाव के खेल रहा था।

दूसरा हाफ शुरू होता है। बेल्जियम के कोच अनुभवी रोमेलू लुकाकू को मैदान में उतारते हैं। अचानक ही एक मौका मिलते ही सेनेगल की टीम गेंद के साथ बेल्जियम के गोलपोस्ट की ओर बढ़ती है। मूसा नियाखाते, इस्माइला सार को गोलपोस्ट के समीप खाली पाते ही गेंद उनकी ओर बढ़ाते हैं। इस्माइला सार तेज़ राइट फुटर के साथ इस पास को गोल में तब्दील कर देते हैं। सेनेगल 2-0 के स्कोर के साथ एक आरामदायक बढ़त बना लेता है।

खेल आगे बढ़ता है। इस बीच मैक्सिम डी क्यूपर, ट्रोसार्ड और केविन डी ब्रुएने लगातार सेनेगली गोलपोस्ट पर सेंध लगाने के प्रयास करते रहते हैं, लेकिन सेनेगल की रक्षापंक्ति पूरी तरह चौकस थी। जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ता है, दोनों ही टीमें कुछ बदलाव करती हैं। ऐसा लगने लगा था कि जैसे सेनेगल ने 2002 विश्व कप में तत्कालीन विश्व चैंपियन फ्रांस को ग्रुप स्टेज में चौंकाया था, आज वैसे ही वह 2018 विश्व कप की कांस्य पदक विजेता बेल्जियम को घर का रास्ता दिखा देगा।

80 मिनट का खेल खेला जा चुका था। बेल्जियम 2-0 से पीछे थी। क्योंकि अब केवल दस मिनट का खेल बाकी था, ऐसे में बेल्जियम के कई समर्थक स्टेडियम से बाहर निकलने लगे थे। मगर रेड डेविल्स को उनका यह उपनाम यूँ ही नहीं मिला है।

लेकिन विश्व कप में अंतिम सीटी बजने से पहले कहानी कभी समाप्त नहीं होती। अगले चार मिनट में स्टेडियम ने वह देखा जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

मैच के 86वें मिनट में थॉमस म्यूनियर से मिले पास को रोमेलू लुकाकू गोल में तब्दील कर देते हैं। स्कोर 2-1 हो जाता है। सेनेगल की टीम कुछ समझ पाती, उससे पहले ही महज़ तीन मिनट के भीतर लिआंड्रो ट्रोसार्ड के क्रॉस को बेल्जियम के कप्तान यूरी टीलेमांस गोलपोस्ट के भीतर पहुँचा देते हैं। स्कोर बराबर हो जाता है।

स्टेडियम में मौजूद दर्शकों को यकीन ही नहीं होता। अभी तीन मिनट पहले तक सेनेगल 2-0 की आरामदायक बढ़त बनाए हुए था और अचानक यह क्या हो गया! कोई कुछ समझ ही नहीं पा रहा था। कुछ ही मिनट पहले तक ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सेनेगल अगले दौर में जगह बना चुका है और अब यह मुकाबला एक्स्ट्रा टाइम में जाता दिखाई दे रहा था।

90 मिनट का खेल समाप्त होता है। क्योंकि यह नॉकआउट चरण का मुकाबला था और दोनों टीमें बराबरी पर थीं, इसलिए मैच एक्स्ट्रा टाइम में चला जाता है। सभी की धड़कनें तेज़ हो चुकी थीं। अब कुछ भी हो सकता था।

दोनों ही टीमें एक बार फिर मैदान में उतरती हैं। इस बार दोनों टीमें काफी सतर्कता के साथ आगे बढ़ रही थीं। दर्शकों को अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि कुछ मिनटों में मैच की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। खैर, दोनों टीमें सावधानी के साथ खेलते हुए मौका मिलने पर गोल करने का प्रयास भी करती दिखती हैं। 105 मिनट का खेल पूरा हो जाता है। स्कोर अब भी 2-2 ही था।

एक्स्ट्रा टाइम का दूसरा हाफ शुरू होता है। ऐसा लगने लगता है कि मैच का फैसला अब पेनाल्टी शूटआउट से ही निकलेगा। दबाव दोनों ही टीमों पर बराबर बना हुआ था। कोई भी अब हार का दर्द नहीं झेलना चाहता था। 117 मिनट का खेल पूरा हो चुका था। अब केवल तीन मिनट बाद रेफरी मैच समाप्त कर देंगे और फैसला पेनाल्टी शूटआउट से होगा। दोनों टीमों के कोच पेनाल्टी लेने वाले अपने पाँच खिलाड़ियों की सूची तैयार करने में जुट जाते हैं।

लेकिन तभी, 118वें मिनट में बेल्जियम के कप्तान यूरी टीलेमांस को सेनेगल के पेनाल्टी बॉक्स में फाउल कर दिया जाता है। लंबी बहस होती है। रेफरी VAR की सहायता लेते हैं। बेल्जियम को पेनाल्टी मिल जाती है। कप्तान यूरी टीलेमांस पूरे संयम के साथ पेनाल्टी लेने के लिए आगे बढ़ते हैं। शानदार किक के साथ वह गेंद को गोलपोस्ट के भीतर पहुँचा देते हैं। तमाम साथी खिलाड़ी उनसे लिपटने के लिए दौड़ पड़ते हैं। स्टेडियम में लाल जर्सी पहने हजारों दर्शकों की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। वहीं, सेनेगल के समर्थकों की आँखें नम हो जाती हैं। मैच के 86वें मिनट तक उनकी टीम 2-0 से आगे थी, लेकिन अब वही टीम टूर्नामेंट से बाहर हो चुकी थी। यह वाकई बेहद क्रूर अंत था। इतना शानदार खेल दिखाने के बावजूद सेनेगल शायद इस तरह टूर्नामेंट से बाहर होने की हकदार नहीं थी। स्टेडियम में मौजूद तमाम समर्थक नम आँखों से सेनेगल के खिलाड़ियों का हौसला बढ़ा रहे थे। यह दृश्य सचमुच बेहद भावुक कर देने वाला था।

यह शायद एक अद्भुत संयोग था कि 2 जुलाई, 2018 को रूस में खेले गए विश्व कप के राउंड ऑफ 16 मुकाबले में जापान के विरुद्ध दूसरे हाफ के शुरुआती पलों में 2-0 से पिछड़ने के बावजूद बेल्जियम ने शानदार वापसी की थी और स्टॉपेज टाइम में गोल दागकर मुकाबला 3-2 से जीत लिया था। आज भी, 2 जुलाई, 2026 को, उन्होंने सेनेगल के खिलाफ मैच के 86वें मिनट तक पिछड़ने के बावजूद शानदार कमबैक करते हुए 3-2 के स्कोर से अपना नॉकआउट मुकाबला जीत लिया।

यह भी शायद संयोग ही था कि दोनों ही मुकाबलों में कमबैक की पटकथा 86वें मिनट में हुए गोल के साथ शुरू हुई। इंग्लैंड की जीत के नायक उनके कप्तान हैरी केन रहे, वहीं बेल्जियम को टूर्नामेंट में जीवित बनाए रखने का काम उनके कप्तान यूरी टीलेमांस ने किया। ऐसा बिल्कुल नहीं था कि उनकी विरोधी टीमों ने अच्छा खेल नहीं दिखाया, लेकिन कठिन परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखते हुए दोनों टीमों ने जिस तरह शानदार वापसी की, वह लंबे समय तक याद रखी जाएगी। इन दोनों ही टीमों की जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम है।

हालाँकि, ऐसा कुछ जर्मनी के अनुभवी खिलाड़ियों की ओर से देखने को नहीं मिला, जिसके चलते आज उनकी जमकर आलोचना हो रही है। गौरतलब है कि सडन-डेथ के दौरान जब कप्तान जोशुआ किमिख ने अपने अनुभवी साथियों से पेनाल्टी लेने का आग्रह किया, तो कई खिलाड़ियों ने पेनाल्टी लेने से इनकार कर दिया था। ऐसे में आज मैच में पिछड़ने के बावजूद वापसी करते हुए इंग्लैंड और बेल्जियम द्वारा दर्ज की गई ये जीतें और भी बड़ी हो जाती हैं। ये वही मुकाबले हैं, जो नन्हे बच्चों के दिलों में अमिट छाप छोड़ जाते हैं और इस खेल के प्रति उनके मन में आजीवन प्रेम जगा देते हैं।

अगले मैच में, आज सुबह साढ़े पाँच बजे सैन फ्रांसिस्को के स्टेडियम में अपने घरेलू समर्थकों के बीच अमेरिकी टीम का सामना बोस्निया एवं हर्ज़ेगोविना से हुआ। जैसा कि कल चर्चा हुई थी, यहाँ मॉरिसियो पोचेतीनो की अमेरिकी टीम का पलड़ा भारी नज़र आ रहा था। यूएसए ने मैच के दोनों हाफ में एक-एक गोल दागते हुए 2-0 से यह मुकाबला जीत लिया और राउंड ऑफ 16 में जगह बना ली, जहाँ उसका सामना बेल्जियम से होगा। गौरतलब है कि इस मैच में यूएसए का खाता खोलने वाले उनके स्टार सेंटर-फ़ॉरवर्ड फोलारिन बालोगन को मुकाबले के 64वें मिनट में रेफरी ने रेड कार्ड दिखा दिया, जिसके चलते वह अगले दौर के अहम मुकाबले में टीम का हिस्सा नहीं होंगे।

अब नज़रें अगले दो दिनों पर हैं, जहाँ विश्व कप का रोमांच एक बार फिर अपने चरम पर पहुँचने वाला है। फुटबॉल प्रेमियों के लिए कई ऐसे मुकाबले इंतज़ार कर रहे हैं, जो इस टूर्नामेंट की दिशा बदल सकते हैं।

आज रात भारतीय समयानुसार साढ़े बारह बजे लॉस एंजेलिस में स्पेन और ऑस्ट्रिया आमने-सामने होंगे। दोनों टीमें अपनी-अपनी शैली के लिए जानी जाती हैं और ऐसे में यह मुकाबला सामरिक कौशल की एक दिलचस्प परीक्षा साबित हो सकता है।

इसके बाद, कल सुबह साढ़े चार बजे टोरंटो में विश्व फुटबॉल की दो पारंपरिक ताकतों के बीच एक और बड़ा मुकाबला खेला जाएगा, जहाँ पुर्तगाल का सामना क्रोएशिया से होगा। कागज़ पर पलड़ा भले ही पुर्तगाल का भारी दिखाई देता हो, लेकिन नॉकआउट फुटबॉल में इतिहास बार-बार यह साबित कर चुका है कि एक छोटी-सी चूक भी पूरे अभियान का अंत कर सकती है।

यह मुकाबला पुर्तगाल के लिए केवल अगले दौर में पहुँचने की चुनौती नहीं होगा। ठीक एक वर्ष पहले इसी दिन उन्होंने अपने प्रिय साथी और स्टार फ़ॉरवर्ड डियोगो जोटा को एक दुखद कार दुर्घटना में खो दिया था। ऐसे में यह मानना कठिन नहीं कि जब पुर्तगाली खिलाड़ी मैदान पर उतरेंगे, तो उनके मन में केवल जीत का लक्ष्य ही नहीं, बल्कि अपने दिवंगत साथी की स्मृतियाँ भी होंगी। यदि पुर्तगाल विजयी होता है, तो वह जीत निश्चित ही जोटा को समर्पित सबसे भावनात्मक श्रद्धांजलियों में से एक होगी। विश्व कप अक्सर केवल ट्रॉफियाँ नहीं, भावनाएँ भी समेटे होता है। यह मुकाबला भी शायद उन्हीं दुर्लभ क्षणों में से एक बन सकता है।

इसके बाद भी रोमांच थमने वाला नहीं है। कल रात स्विट्ज़रलैंड का सामना अल्जीरिया से होगा, जबकि डलास में मिस्र के ‘फ़राओज़’ ऑस्ट्रेलिया की चुनौती का सामना करेंगे। चारों टीमें अगले दौर में जगह बनाने के लिए अपना सर्वस्व झोंक देंगी और यही विश्व कप की सबसे बड़ी खूबसूरती है- यहाँ हर नब्बे मिनट एक नई कहानी लिख सकते हैं।

विश्व कप अपने निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका है। अब हर मैच इतिहास लिख सकता है, हर गोल किसी देश का सपना बचा सकता है और हर रात किसी नए नायक को जन्म दे सकती है। यही कारण है कि फीफा विश्व कप केवल एक टूर्नामेंट नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे महान खेल उत्सव कहलाता है।

बने रहिएगा साथ। ऑपइंडिया पर फीफा विश्व कप की हर बड़ी कहानी, हर ऐतिहासिक मुकाबला और हर यादगार पल आपके लिए इसी तरह लेकर आते रहेंगे।

‘द गार्जियन’ का लेख हो या कॉकरोचों की आवाज… सबका मकसद एक: जानिए कैसे CJP प्रदर्शन में पीछे छूटा NEET का मुद्दा, उमर खालिद की रिहाई बनी प्राथमिकता

‘द गार्जियन’ ने 30 जून 2026 को उमर खालिद पर एक भावनात्मक लेख प्रकाशित किया, जिसमें 2020 के हिन्दू विरोधी दिल्ली दंगों के साजिशकर्ता को भारत का सबसे प्रमुख ‘राजनीतिक कैदी’ बताते हुए असहमति की वजह से सरकारी कार्रवाई का शिकार बताया गया। जेल और बाहर निकलने की धूमिल होती उम्मीद के बीच इस लेख में कही भी दिल्ली दंगों को लेकर उस पर लगे आरोपों की पड़ताल नहीं की गई ।

इस लेख की पड़ताल न केवल इसमें कही गई बातों के लिए, बल्कि इसमें जानबूझकर छोड़ी गई बातों के लिए भी किया जाना चाहिए। यह प्रकाशन कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा उमर खालिद को दिए गए समर्थन के बीच आया है। ये वही पार्टी है, जिसका विरोध प्रदर्शन नीट पेपर लीक और युवाओं के मुद्दों को लेकर शुरू हुआ था। हालाँकि प्रदर्शनकारियों और सीजेपी समर्थकों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से उमर खालिद की रिहाई की माँग की है।

उमर खालिद के बारे में ‘द गार्जियन’ ने क्या कहा

‘द गार्जियन’ में प्रकाशित लेख का शीर्षक ‘मानवता एक विशेषाधिकार : उमर खालिद का बिना मुकदमे के भारतीय जेल में छह साल का सफर’ है। भारत विरोधी प्रचार के लिए मशहूर दिल्ली संवाददाता हन्ना एलिस-पीटरसन ने यह लेख लिया है। लेख में उन्होंने खालिद को एक वामपंथी मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुखर आलोचक के रूप में उल्लेख किया है। उन्होंने दावा किया कि वह सरकार के विरोधियों के खिलाफ न्यायिक प्रणाली के कथित दुरुपयोग का प्रतीक बन गए हैं।

(साभार- द गार्जियन)

लेखक ने उमर खालिद की मानसिक और शारीरिक पीड़ा का जिक्र किया, उनके अनुभव की तुलना फ्योदोर दोस्तोवस्की के कारागार संस्मरण से की और भगत सिंह के उस कथन के साथ अपनी बात समाप्त की जो उनकी कोठरी की दीवार पर लिखा था। खालिद से हिंदू राष्ट्रवाद, मुसलमानों की स्थिति जैसे मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की।

हालाँकि, प्रकाशन ने खुद स्वीकार किया कि उसने खालिद के कानूनी मामले पर चर्चा न करने पर सहमति जताई थी। प्रकाशन ने खालिद का सीधा साक्षात्कार भी नहीं लिया, बल्कि प्रश्न और उत्तर उनके रिश्तेदारों और दोस्तों के माध्यम से ही भेजे गए।

‘द गार्जियन’ के लेख में दिल्ली में हिन्दू विरोध दंगों की एक बड़ी साजिश के आरोप को कुछ ही वाक्यों में समेट दिया गया, जबकि हिंसा के समय उत्तर-पूर्वी दिल्ली में उसकी गैरमौजूदगी को प्रमुखता से बताया गया, मानो साजिश करने के लिए घटनास्थल पर होना आवश्यक हो।

जाहिर है द गार्जियन की इस रिपोर्ट ने देश के राजनीतिक और वैचारिक माहौल में गर्मी पैदा कर दी। कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने इसे ‘भावुक करने वाला लेख’ बताया और पूछा कि अदालत में ये आरोप साबित क्यों नहीं हुए।

इतिहासकार होने का ढोंग करने वाली प्रचारक रुचिका शर्मा ने कहा कि भारत की ‘सामूहिक चेतना’ मर चुकी है, जबकि द गार्जियन के लिए लिखने वाले कौशिक राज ने दावा किया कि दुनिया खालिद के खिलाफ ‘अन्याय’ पर ध्यान दे रही है।

सीजेपी के संस्थापक और प्रवक्ताओं ने खुले तौर पर खालिद का समर्थन किया

खालिद को मिलने वाला समर्थन केवल कुछ गिने-चुने सीजेपी अनुयायियों तक ही सीमित नहीं था। यह समर्थन संगठन के संस्थापक और दूसरे बड़े चेहरों का भी था।

इस साल की शुरुआत में, सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सवाल उठाया था कि खालिद को बिना मुकदमे के जेल में क्यों रखा गया है और दावा किया था कि उसके साथ अलग तरह से व्यवहार किया जा रहा है।

समदिश भाटिया के साथ हाल ही में हुए एक साक्षात्कार में , ‘अनफिल्टर्ड बाय समदिश’ कार्यक्रम में, दिपके ने दावा किया कि उन्होंने अपने आंदोलन को शांतिपूर्ण, संविधान-केंद्रित और ‘बदनाम से बचा कर’ रखा है। हालाँकि उन्होंने कहा कि उनका उपनाम खालिद नहीं है, अगर वह खालिद, सैफी या मुस्लिम होते, तो जेल में होते।

ऐसा कह कर दिपके ने यह संकेत देने की कोशिश की कि उमर खालिद जैसे तथाकथित मुस्लिम ‘कार्यकर्ताओं’ को उनकी धार्मिक पहचान के कारण जेल में डाला गया और उनके खिलाफ लगे गंभीर आपराधिक और षड्यंत्र के आरोपों को जानबूझकर अनदेखा किया गया। कार्यक्रम में जबरदस्ती खालिद की चर्चा करना अजीब था, लेकिन इससे यह स्पष्ट हो गया कि वे वास्तव में क्या करने की कोशिश कर रहे थे।

प्रवक्ता सौरभ दास ने इससे भी आगे बढ़कर खालिद के खिलाफ लगे आरोपों को ‘झूठा’ और ‘मनगढंत’ बताया और उसकी कैद को भारत की न्यायपालिका पर एक कलंक करार दिया।

मुख्य न्यायिक परिषद की प्रवक्ता विजेता दहिया ने खालिद के खिलाफ मामले को महात्मा गाँधी के उद्धरण वाले भाषण और व्हाट्सएप ग्रुप में उनकी मौजूदगी तक सीमित करने की कोशिश की। जब उनसे दिल्ली दंगों में मारे गए 50 से अधिक लोगों और बड़े षड्यंत्र के मामले के बारे में सवाल किया गया, तो दहिया ने यह कहकर मामला टाल दिया कि कोई मुकदमा नहीं चला है और सवाल पूछने वाले पत्रकार पर ‘गोदी मीडिया’ होने का आरोप लगाया।

इस दौरान ये दलील दी गई कि मुकदमा चलने दो, दोषी पाए जाने पर उसे सजा दो और निर्दोष पाए जाने पर उसे रिहा कर दो। लेकिन बार बार दोषसिद्धि न होने पर आरोपों को झूठा करार दिया गया। साथ ही अदालती कार्यवाही को जल्द से जल्द खत्म करने की माँग की गई।

उमर खालिद की कानूनी कार्यवाही का इतिहास ‘छह साल बिना मुकदमे के’ नारे से कहीं अधिक जटिल रहा है। उनकी जमानत याचिकाएँ लगातार खारिज होती रही हैं। 24 मार्च 2022 में ट्रायल कोर्ट, 18 अक्टूबर 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट, 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में दायर अर्जी खारिज की गई। इसके अलावा 16 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी पुनर्विचार याचिका खारिज की। 19 मई 2026 को दिल्ली की एक अदालत ने उनकी अंतरिम जमानत याचिका भी नामंजूर कर दी थी।

(उमर खालिद की तीसरी जमानत याचिका)

सुप्रीम कोर्ट ने अर्जी खारिज करते हुए दोहराया था कि इस मामले में कई आरोपित शामिल हैं, भारी मात्रा में दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक सबूत मौजूद हैं और आरोप एक सुनियोजित और निरंतर साजिश से संबंधित हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि उमर खालिद और अन्य आरोपी केवल अभियोजन में देरी के कारण जेल में हैं या उन्होंने इस देरी में कोई भूमिका नहीं निभाई है।

हालाँकि व्यापक संदर्भ में बात की जाए तो लंबे वक्त तक हिरासत पर बहस जायज है, लेकिन उमर खालिद के मामले में मुकदमे में देरी न्याय व्यवस्था की वजह से नहीं, बल्कि खुद आरोपितों की वजह से हुई। उमर खालिद और इस बड़े षड्यंत्र मामले के दूसरे आरोपितों ने मुकदमे में देरी करने के लिए हर संभव हथकंडा अपनाया और फिर इस देरी को जमानत माँगने का बहाना बनाया। बार-बार जमानत की अर्जी देने से लेकर मुकदमे की शुरुआत को रोकने की अर्जी देने तक, इस बात के पर्याप्त सबूत थे कि मुकदमे में छह साल की देरी के लिए भारत की न्याय व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है।

सीजेपी के प्रदर्शनकारियों ने उमर खालिद को अपना नेता बताया

6 जून को जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी के विरोध प्रदर्शन में भी खालिद का समर्थन स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। एक प्रदर्शनकारी को यह कहते हुए दिखाया गया कि उमर खालिद हमारे नेता हैं। एक अन्य ने कहा कि वह खालिद का समर्थन करता है और इसमें उसे कोई बुराई नहीं दिखती। सीजेपी के एक समर्थक ने खालिद और शरजील इमाम को देश के सर्वोच्च राजनीतिक पदों के संभावित भावी पदाधिकारी भी बताया।

जब एक महिला ने खालिद के बारे में एक बुजुर्ग समर्थक से सवाल किया, तो उसने आरोपों का जवाब देने के बजाय अभद्र और अपमानजनक टिप्पणी की। हालाँकि प्रदर्शनकारी फैजान अंसारी ने खालिद का समर्थन करने वाले सीजेपी सदस्यों की आलोचना की, जिससे पता चलता है कि यह मुद्दा प्रदर्शनों में मौजूद लोगों के बीच भी विवाद का विषय बन गया था।

फिर भी समर्थन की बार-बार की गई घोषणाएँ संगठन के उद्देश्य को दर्शाती हैं। इसके नेता- प्रवक्ता और सीजेपी के डिस्कोर्ड समुदाय के सदस्य जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे, उससे खालिद के प्रति उनका स्टेंड काफी साफ झलक रहा था।

उमर खालिद को रिहा करने की माँग के बाद सीजेपी के डिस्कोर्ड चैनल पर मैसेज की भरमार हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, लॉन्च होने के कुछ ही दिनों में 20,000 से अधिक सदस्य जुटा चुके CJP के डिस्कोर्ड चैनल ने आंदोलन के कुछ हिस्सों की वैचारिक दिशा की स्पष्ट तस्वीर पेश की। OpIndia की जाँच में खालिद के समर्थन में एक बेहद चिंताजनक प्रवृत्ति का खुलासा हुआ।

जब एक यूजर ने खालिद का समर्थन करने के लिए दिपके की आलोचना की, तो दूसरे सदस्य ने कहा कि खालिद के लिए दिपके का समर्थन ही वह कारण है जिसके चलते अब वह दिपके और सीजेपी दोनों का पूरी तरह से समर्थन करेगा। यूजर ने खालिद की कैद को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया।

ऐसे ही एक चर्चा में संगठन के एक सदस्य ने कहा, “उमर खालिद वही हैं जिनकी इस देश में हमें जरूरत है। इसीलिए तो मुख्य न्यायिक समिति (सीजेपी) का गठन हुआ है।” चैनल पर ‘उमर खालिद को रिहा करो’ के कई संदेश दिखाई दिए। खालिद को ‘क्रांतिकारी’ बताया गया, जबकि उन्हें और दिपके को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ कहा गया। एक यूजर ने दिपके को भारत की प्रधानमंत्री और खालिद को रक्षा मंत्री बनाने की बात भी की।

कुछ लोगों ने खालिद के खिलाफ आरोपों को निराधार बताया, न्यायपालिका के भ्रष्ट होने का दावा किया और तर्क दिया कि उसे उसके धर्म के कारण आतंकवादी करार दिया गया है। एक यूजर ने तर्क दिया कि खालिद आतंकवादी नहीं हो सकता क्योंकि कई वर्षों बाद भी आरोप साबित नहीं हुआ है।

जब व्यापक षड्यंत्र के मामले पर सवाल उठे, तो चर्चा अक्सर सबूतों के आधार पर नहीं, बल्कि भावनाओं से होने लगती है। खालिद को एक छात्र, विद्वान, राजनीतिक कार्यकर्ता, पीड़ित, क्रांतिकारी और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में उल्लेख किया गया। पुलिस, मीडिया और न्यायपालिका को उसके खिलाफ बताया गया। यह मामले की जाँच नहीं थी, बल्कि यह जाँच को ही अनैतिक दिखाने का एक तरीका था।

उमर खालिद कौन है और दिल्ली दंगों की साजिश में उसकी क्या भूमिका है?

कोर्ट में उमर खालिद के खिलाफ जो केस हैं, उसमें उसे ऐसे दंगाई के रूप में पेश नहीं किया गया है जिसने व्यक्तिगत रूप से पत्थर फेंके हों या संपत्ति में आग लगाई हो, बल्कि उस पर फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश रचने, वैचारिक तौर पर संचालन करने और सबका समन्वय करने का आरोप है।

इसलिए बार-बार यह तर्क देना कि खालिद हिंसा के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में शारीरिक रूप से मौजूद नहीं था, अपने आप में उसके खिलाफ लगे आरोपों का जवाब नहीं देता। किसी साजिश के मामले में, अभियोजन पक्ष को कथित योजना में भागीदारी साबित करनी होती है, न कि उस योजना को अंजाम दिए जाने वाले हर स्थान पर शारीरिक तौर पर मौजूदगी।

अभियोजन पक्ष ने खालिद के 20 फरवरी 2020 को अमरावती में दिए गए भाषण का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने 24 फरवरी का जिक्र किया था, जिस दिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का भारत दौरा निर्धारित था। भाषण के चार दिन बाद दंगे शुरू हुए।

उसका नाम एफआईआर 59, एफआईआर 114 और व्यापक साजिश से जुड़ी आरोपपत्रों में दर्ज था। अभियोजन पक्ष ने 8 जनवरी को शाहीन बाग में हुई बैठक, उमर खालिद और ताहिर हुसैन के बीच कथित कड़ी के रूप में खालिद सैफी की भूमिका, नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर पर ‘बड़ी कार्रवाई’ करने की चर्चा, कथित वित्तीय सहायता और रसद संबंधी सहायता, व्हाट्सएप समूह, पर्चे, भाषण, बैठकें, डिजिटल साक्ष्य और गवाहों के बयानों का हवाला दिया।

अभियोजन पक्ष ने दंगों के बाद कार्यकर्ताओं, मशहूर हस्तियों, पत्रकारों और मीडिया जगत की हस्तियों के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए यह तर्क दिया कि हिंसा के बाद एक मनगढंत कहानी गढ़ने का प्रयास किया गया था।

खालिद को एक नेता के रूप में प्रस्तुत करने और उसके अतीत को छिपाने के लिए एक सुनियोजित अभियान चलाया गया।
‘द गार्जियन’ की रिपोर्ट और सीजेपी के अभियान ने एक ही तरह की रणनीति अपनाई। सबसे पहले आरोपों को उनके संदर्भ से अलग कर दिया गया। साजिश, गुप्त बैठक, आर्थिक मदद, समन्वय और लामबंदी के कार्यों को ‘एक भाषण’ और ‘एक व्हाट्सएप ग्रुप’ बोलकर हल्का करने की कोशिश की गई।

लेख में सारा ध्यान खालिद की पहचान और उसके कष्टों पर केंद्रित हो गया। जेल में बिताए उसके वर्षों को उत्पीड़न का प्रमाण माना गया, जबकि मामले से जुड़े सवालों को अमानवीय हमलों के रूप में प्रस्तुत किया गया।

तीसरा हर उस संस्था को अमान्य घोषित कर दिया गया जिसने पसंदीदा कहानी का समर्थन नहीं किया। पुलिस पर मनगढ़ंत बातें गढ़ने का आरोप लगाया गया, न्यायपालिका को भ्रष्ट बताया गया और असुविधाजनक सवाल उठाने वाले पत्रकारों को ‘गोदी मीडिया’ कहकर खारिज कर दिया गया।

अंततः खालिद जमानत की गुहार लगाने वाला एक आरोपी से एक क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रीय नेता और यहाँ तक ​​कि देश का एक भावी मंत्री के तौर पर दिखाने की कोशिश की गई।

इसका उद्देश्य केवल यह तर्क देना नहीं था कि एक कैदी समय पर सुनवाई का हकदार है। बल्कि इसका उद्देश्य कानूनी राहत की माँग करने वाले आरोपी और एक राजनीतिक हस्ती के बारे में बताना था जो ‘निर्दोष’ है। उसने यह नहीं देखा कि दोषमुक्त साबित अभी नहीं हुआ है बल्कि गंभीर मामले में आरोपित है।

सीजेपी और खालिद के लिए चलाए जा रहे अभियान के बीच संबंध

सीजेपी ने 6 जून को जंतर-मंतर पर अपना पहला विरोध प्रदर्शन किया। खालिद की तीसरी जमानत याचिका भी जून की शुरुआत में ही दायर की गई थी, जिसके समर्थन में दिए गए हलफनामे पर 5 जून की मुहर लगी थी। याचिका में लंबी कैद और सुप्रीम कोर्ट के हालिया घटनाक्रमों के आधार पर नियमित या अंतरिम जमानत की माँग की गई थी।

विरोध प्रदर्शन में सीजेपी समर्थकों ने सार्वजनिक रूप से खालिद को अपना नेता बताया। डिस्कॉर्ड पर सदस्यों ने उनकी रिहाई की माँग की और उन्हें देश की जरूरत के हिसाब से ‘सही व्यक्ति’ बताया। संस्थापक और प्रवक्ताओं ने भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का समर्थन किया था। कुछ हफ्तों बाद ‘द गार्जियन’ ने इस तर्क का अंतर्राष्ट्रीय मानवीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया और कॉन्ग्रेस- वामपंथी टिप्पणीकारों ने इसे और भी बल दिया।

सीजेपी खुद को उन युवाओं के लिए एक मंच के रूप में प्रस्तुत करती है जो नीट परीक्षा, परीक्षाओं, बेरोजगारी और राजनीतिक व्यवस्था से निराश हैं। ये मुद्दे इसे एक व्यापक और भावनात्मक रूप से प्रेरित भर्ती आधार प्रदान करते हैं। फिर भी इसके नेताओं के बयानों, विरोध प्रदर्शनों और ऑनलाइन मंचों में उमर खालिद को बार-बार पीड़ित, नायक और भावी नेता के रूप में पेश किया जाता है।

इससे एक गंभीर सवाल उठता है कि क्या NEET इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य है या फिर यह व्यापक वैचारिक लामबंदी के लिए महज एक ‘मुखौटा’ है।

भारतीय न्याय व्यवस्था के तहत हर आरोपित को जमानत माँगने, शीघ्र सुनवाई की माँग करने और अपने खिलाफ लगे हर आरोप का खंडन करने का अधिकार है। अभियोजन पक्ष द्वारा अपना मामला साबित किया गया है या नहीं, यह निर्धारित करना न्यायपालिका का कर्तव्य है। हालाँकि कानूनी बचाव का अधिकार और आरोपों को सार्वजनिक चर्चा से मिटाने का अधिकार एक समान नहीं हैं। न ही लंबे समय तक कारावास में रहने पर कोई निर्दोष साबित हो जाता है।

‘द गार्जियन’ में उमर खालिद का जेल संस्मरण, सीजेपी नेताओं के सार्वजनिक बयान, विरोध स्थल पर की गई घोषणाएँ, डिस्कॉर्ड अभियान और राजनीतिक प्रचार, ये सभी एक ही दिशा में आगे बढ़ते हैं।

पिछले छह वर्षों में उमर खालिद को एक नायक, एक उभरते नेता और भारत सरकार द्वारा सताए गए व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। दिल्ली दंगों में उसकी भूमिका और अफजल गुरु जैसे आतंकवादियों के बारे में उनके विचारों को द गार्जियन जैसे हर लेख के साथ धीरे-धीरे दबा दिया जा रहा है। मुकदमे में जानबूझकर की गई देरी ने इस तथाकथित ‘छात्र नेता’ को राजनीतिक क्षेत्र में एक प्रमुख व्यक्ति बनने का आसान रास्ता प्रदान कर दिया है।

राम मनोहर लोहिया के सिद्धांतों से भटकी समाजवादी पार्टी, ‘PDA’ के नाम पर सिर्फ ‘MY’ समीकरण को तरजीह: समझिए कैसे दलितों की अनदेखी कर रही अखिलेश & गैंग

भारत की राजनीति में समाजवाद के पुरोधा माने जाने वाले डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कभी कहा था कि ‘पिछड़े पावें सौ में साठ’। लेकिन डॉक्टर लोहिया को ये नारा देते समय शायद बिल्कुल भी ये आभास नहीं था कि भविष्य उनके ही नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियाँ पिछड़ा का मतलब सिर्फ दो जातिवर्ग तक समेट देंगीं।

जी हाँ, कुछ ऐसा ही किया है समाजवादी पार्टी ने। आप सबको ये बात पता है कि समाजवादी पार्टी, देश की बाकी कथित सेक्युलर पार्टियों की तरह ही एक परिवार प्राइवेट लिमिटेड है। लेकिन क्या आपको पता है कि पार्टी में अगर टॉप के लोग छोड़ भी दिए जाएँ तो भी तस्वीर नहीं बदलतीं?

दरअसल हम बात कर रहे हैं समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश के संगठन की। समाजवादी पार्टी भले ही आज PDA यानी पिछड़ा दलित और अल्पसंख्यक का राग अलापती हो लेकिन उसका मूल चरित्र यानी मुस्लिम यादव समीकरण नहीं बदला है।

दलितों को तो शायद उसने सिर्फ नाम के लिए ही जोड़ा है। समाजवादी पार्टी का उत्तर प्रदेश में संगठन यादव और मुस्लिमों से डोमिनेटेड है। और ये कोई हवा हवाई बात नहीं है, ना ही कोई पूर्वाग्रह… बल्कि डाटा यह बात कह रहा है।

ऑपइंडिया की जाँच में सामने आए तथ्य चौंकाने वाले हैं। हमारी जाँच में पता चला है कि समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश में 66% जिलाध्यक्ष यादव और मुस्लिम हैं। यानी दो तिहाई पदों पर सिर्फ इन्हीं समूहों का कब्जा है। और इसमें भी ज्यादा बड़ा कब्जा अखिलेश यादव ने अपने सजातीयों यानी यादवों को दिलाया है।

चाहे अमरोहा हो या बलिया, चाहे सोनभद्र हो या बरेली! आपको जिलाध्यक्ष के नाम पर सिर्फ़ एक ही जाति के लोग दिखाई पड़ेंगे। ऊपर से नीचे तक आपको एक ही जाति का नाम बार बार आते हुए दिखेगा। हमने आपको भागीदारी का गणित बताया।

अब आते हैं नंबर्स पर। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का संगठन 76 जिलों में बाँटा हुआ है। इन 76 जिलों में से अभी 75 पर जिलाध्यक्ष नियुक्त हैं और 1 जिलाध्यक्ष का पद खाली है। थोड़ा शॉकिंग और नॉट सो शॉकिंग बात ये है कि इन 75 में से 35 जिलों में जिलाध्यक्ष नियुक्त करने के लिए अखिलेश यादव ने अपने सजातीयों को तरजीह दी है।

और ऐसा करने के पीछे कास्ट पॉलिटिक्स के अलावा और कोई रीजन नहीं समझ आता। क्योंकि ऐसे जिलों में भी उन्होंने अपने सजातीयों को जिलाध्यक्ष बनाया है, जहाँ इस जाति की आबादी एकदम सीमित है। दरअसल, समस्या इस बात से नहीं है कि यादवों को रिप्रजेंटेशन मिल रहा है, बल्कि समस्या ये है कि समाजवादी पार्टी सामाजिक न्याय जैसे शब्द दिन में 40 बार मल्टीविटामिन कैप्सूल की तरह यूज करती है।

अखिलेश यादव PDA पर ज़ोर देते हैं, जिसमें पिछड़ा का मतलब उन्होंने अपनी जाति को मान लिया है और अल्पसंख्यक के नाम पर बस मुस्लिम हैं। दलित इस पूरी कहानी से ग़ायब है। वापस लिस्ट पर लौटते हैं। समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्षों में 35 यादवों के साथ ही 15 मुस्लिम जिलाध्यक्ष हैं।

मुस्लिम जिलाध्यकों को भी लेकिन उन्हीं जिलों तक सीमित कर दिया गया है जहाँ उनकी आबादी ठीकठाक है, अधिकांश मुस्लिम जिलाध्यक्ष पश्चिमी यूपी में हैं जहाँ कई जिलों में मुस्लिम आबादी 25% से ज्यादा है और कई मामलों में तो ये 50% के आसपास है।

लेकिन अखिलेश यादव ने अपनी जाति के विषय में ये बाध्यता नहीं लगा रखी। कन्नौज, फर्रुखाबाद, बदायूँ और आजमगढ़ या चंदौली जैसे जिलों में तो माना जा सकता है कि जाति को प्रतिनिधित्व दिया गया है लेकिन जिन जिलों में दलितों की आबादी ज्यादा है, उन्हें लिस्ट से ग़ायब कर दिया गया है।

समाजवादी पार्टी की पूरी लिस्ट अगर आप देखेंगे तो पता चलेगा कि यहाँ दलित ढूँढने से भी नहीं मिल रहे, जो दलित प्रदेश की आबादी में लगभग 20% का हिस्सा रखते हैं, उन्हें जिलों की जिम्मेदारी इक्का दुक्का ही दी गई है। ये हाल तब है जब समाजवादी पार्टी का पूरा जोर PDA पॉलिटिक्स पर है।

सीतापुर जैसे जिले जहाँ दलित आबादी प्रदेश में सबसे ज्यादा है, वहाँ भी समाजवादी पार्टी ने हाल ही में अपना जिलाध्यक्ष बदला है और शमीम कौसर सिद्दीकी को ये जिम्मेदारी दी है। यानी 15 लाख की आबादी में समाजवादी पार्टी को एक भी उपयुक्त दलित चेहरा नहीं मिला।

समस्या ये है कि समाजवादी पार्टी, बसपा का वोटबैंक तो हिलाना चाहती है, दलितों को अपनी साइड तो करना चाहती है लेकिन अपनी पुरानी आदतें नहीं छोड़ना चाहती। इन फैक्ट वो इस बात के लिए बिल्कुल राजी नहीं है कि संगठन में उनको जगह दी जाए, जिससे उनका कोई दख़ल निर्णय लेने

और दलितों की बात छोड़ दीजिए, ख़ुद को पिछड़ों का पुरोधा बताने वाले अखिलेश यादव ने अपने जिलाध्यक्षों में कहीं भी बाक़ी पिछड़ी जातियों को भी हिस्सा नहीं दिया है। लोधी, कहार, निषाद, कुर्मी जो जातियाँ यूपी में प्रोमिनेंट हैं, उनको भी कोई खास तवज्जो समाजवादी पार्टी ने नहीं दी है।

और ये तब हो रहा है जब ये जातियाँ लगातार अपनी भागीदारी के लिए प्रयास कर रहे हैं, यूपी में इन जातियों को लंबे समय से अपना हक नहीं मिला है। OBC में कुछ जातियों ने ही प्रॉमिनेंस लिया हुआ है और इनकी भी इच्छा है कि इन्हें राजनीतिक भागीदारी मिले।

समाजवादी पार्टी प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा दल होकर ये काम नही कर रही। यानी लोहिया के चेलों ने लोहिया के ही आइडियाज़ की तिलांजलि दे दी है। वैसे लोहिया ने ही कभी कहा था कि आगे चलके मेरे चेले मेरे सारे आदर्शों की तिलांजलि दे दें तो मुझे दुख नहीं होगा। कमोबेश वैसा ही हुआ है।

आप सोच रहे होंगे कि हम लगातार जिलाध्यक्षों की बात क्यों कर रहे रहे हैं, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि जिलाध्यक्ष किसी भी पार्टी संगठन का आधार होते हैं, ये वो पिलर्स होते हैं जिनके ऊपर पार्टी खड़ी होती है। वैसे समाजवादी पार्टी जैसे दलों में निर्णय बेहद केंद्रित तरीके से लिए जाते हैं, लेकिन जिलाध्यक्ष तब भी बड़े स्तर पर निर्णय प्रभावित करते हैं।

वो केंद्रीय नेतृत्व और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच लिंक का काम करते हैं और इससे भी ज्यादा ये दिखाते हैं कि पार्टी कितना डाइवर्सिटी में विश्वास रखती है। और इसी मोर्चे पर समाजवादी पार्टी औंधे मुँह गिर जाती है। समाजवादी पार्टी कभी कभार ब्राह्मणों से भी फ्लर्टिंग करती रहती है, आप इस लिस्ट में शायद कोई भी ब्राह्मण ना पाएँ।

राजपूतों का भी उत्तर प्रदेश में ठीकठाक वोट है और उनकी सहभागिता जरूरी है लेकिन यहाँ भी समाजवादी पार्टी गंभीर नजर नहीं आती। वैसे समाजवादी पार्टी में एक जाति या मज़हब की कहानी सिर्फ़ जिले तक ही सीमित नहीं है। अगर आप इसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की संरचना भी देखेंगे तो यहाँ भी 30% हिस्सा दो कम्युनिटी के पास है।

इसमें भी टॉप के 4 लोगों में से तीन अखिलेश ख़ुद और उनके चाचा शिवपाल और रामगोपाल हैं, इसके अलावा आजम ख़ान का नाम टॉप पर लिखा गया है। कुल मिलाकर बात ये है कि समाजवादी पार्टी अपने आप को कितना भी PDA के रैपर में पैक करे, उसका पुराना MY लिफ़ाफ़ा कहीं नहीं जा रहा।

और वैसे भी समाजवादी पार्टी की पूरी पॉलिटिक्स उत्तर प्रदेश में बसपा और भाजपा के ही ख़िलाफ़ रही है। बसपा के ख़िलाफ़ लड़ाइए का मतलब समाजवादी पार्टी के नेता एंटी दलित पॉलिटिक्स से लेते आए हैं। और इस का सबूत ये है कि जैसे ही 2012 में उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी जीत कर आई थी, तुरंत दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा शुरू हो गई थी।

साल 2012 में 3 मार्च का दिन था, यूपी में विधानसभा चुनाव पूरे हुए थे इलेक्शन रिजल्ट्स में सपा को 224 सीटों के साथ मेजॉरिटी मिली थी और बसपा बाहर हो चुकी थी।

बस बसपा का सत्ता से बाहर होना था और समाजवादी पार्टी के लठैतों को हिसाब चुकता करने का मौक़ा मिल गया था। सपा की जीत के अगले 36 घंटों में दलितों के साथ क्या हुआ, सुनते जाइए। सपा की जीत के बाद तुरंत सीतापुर के भंबिया गाँव में दलितों के लगभग एक दर्जन घर जला दिए गए।

और ऐसा क्यों हुआ? दलितों ने बताया कि उन्होंने इलेक्शन में एक इंडिपेंडेट कैंडिडेट को समर्थन किया था, इसलिए उनके घर पर चुनाव के बाद तुरंत हमला हुआ। लेकिन अगर आप सोच रहे हो कि ये कोई आइसोलेटेड इंसिडेंट था, तो आप गलती कर रहे हैं।

सीतापुर से लगभग 500 किलोमीटर दूर आगरा में बसपा समर्थित एक ग्राम प्रधान पति की हत्या कर दी गई। हत्या का आरोप सपा के लठैतों पर। इसी दिन बलिया के भुज छपरा गाँव में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर पाँच दलित महिलाओं और बच्चों को बुरी तरह मारने−पीटने के आरोप लगे।

बताया गया कि जैसे ही समाजवादी पार्टी वालों को यह पता चला कि इस गांव के ज्यादातर लोगों ने जेडीयू को वोट दिया था तो 40 से ज्यादा लठैत गाँव में घुसे और मारपीट की। और समाजवादी पार्टी आज भले ही अपने हर पोस्ट में PDA का जिक्र करती हो लेकिन उसने सत्ता में आने के बाद दलित प्रतीकों को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

अखिलेश यादव ने सीएम बनने के बाद जुलाई 2012 में उन 8 जिलों के नाम बदल दिए थे, जिनके नाम मायावती ने सीएम रहते हुए दलित विचारकों पर रखें थे। इसमें छत्रपति शाहूजी महाराज नगर को अमेठी, रमाबाई नगर को कानपुर देहात, भीम नगर को संभल, प्रबुद्ध नगर को शामली और पंचशील नगर को हापुड़ कर दिया गया था।

मायावती सरकार में जो भी योजनाएँ दलित आइकॉन्स के नाम पर थीं, उनके नाम बदलना भी समाजवादी सरकार की प्रियोरोटी थी। अखिलेश यादव की सरकार ने मई 2012 में ही अंबेडकर ग्राम सभा विकास योजना, कांशीराम शहरी आवास योजना, सावित्री बाई फुले बालिका शिक्षा सहायता योजना जैसी लगभग 26 स्कीम्स के नाम चेंज कर दिए गए।

ऐसे में आज जब समाजवादी पार्टी PDA पॉलिटिक्स की बात करती है तो मामला काफ़ी हास्यास्पद हो जाता है, हालाँकि ये काम कितना हाफ हार्टेड तरीके से किया जा रहा है, वो मैंने आपको पुरानी घटनाएँ और जिलाध्यक्षों की लिस्ट दिखा कर बता दिया।

असल बात को छुपाओ, शब्दों का हेर-फेर कर प्रोपेगेंडा फैलाओ: UP को बदनाम करने के लिए ये है NewsLaundry की ट्रिक, जानिए कैसे प्रस्तावित MoUs और मिले इन्वेस्टमेंट का घालमेल कर झूठ फैलाया

उत्तर प्रदेश ने वर्ष 2017 के बाद निवेश प्रोत्साहन के क्षेत्र में एक सुनियोजित नीतिगत यात्रा शुरू की, जिसका उद्देश्य राज्य को निवेशकों के लिए एक भरोसेमंद गंतव्य के रूप में स्थापित करना था। हालाँकि प्रपेगेंडा मीडिया न्यूजलॉन्ड्री ने 30 जून 2026 को उत्तर प्रदेश में हुए निवेश और समझौता ज्ञापनों पर आर्टिकल लिखा।

इस आर्टिकल में शब्दों का हेर फेर कर न्यूजलॉन्ड्री ने ये बताने की कोशिश की कि यूपी में निवेश को लेकर हुए MoU केवल कागजी बातें हैं और सरकार सुर्खियों के आधार पर बड़े-बड़े दावे कर रही है।

असल में फरवरी 2018 में शुरू हुए पहले यूपी इन्वेस्टर्स समिट से लेकर फरवरी 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट तथा जून 2026 के उत्तर प्रदेश ग्लोबल ग्रोथ डायलॉग (बेंगलुरु) तक उत्तर प्रदेश सरकार ने निवेश के लिए मेमोरंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी एमओयू के मंच का बार-बार उपयोग किया है।

न्यूजलॉन्ड्री ने शब्दों से खेल कर निवेश को बताया झूठ

न्यूजलॉन्ड्री ने उत्तर प्रदेश में आए निवेश को लेकर एक रिपोर्ट की सीरीज ‘द एमओयू मिराज’ प्रकाशित किया है। इसमें न्यूजलॉन्ड्री ने यूपी के कई एमओयू पर सवाल उठाए हैं।

MoU को कागजी दावे लिखकर न्यूजलॉन्ड्री ने यूपी के पूरे निवेश मॉडल को फर्जी बताने की कोशिश की

रिपोर्ट में कहा गया कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट 2023 में उत्तर प्रदेश सरकार ने लगभग ₹33.50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने का दावा किया था। इस दावे को लेकर न्यूजलॉन्ड्री सवाल खड़े कर रही है। उसका कहना है कि निवेश को बढ़ा चढ़कर और केवल ‘शून्य बढ़ाकर’ कागजी दावे किए जा रहे हैं।

वास्तव में ₹33.50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने के दावे का सही अर्थ यह है कि इतने मूल्य के निवेश प्रस्ताव सरकार को मिले थे, न कि उतना पैसा एक साथ राज्य में आ गया था। निवेश प्रस्ताव और वास्तविक निवेश में बड़ा फर्क होता है, और यह फर्क रिपोर्ट में धुंधला कर दिया गया है।

इसके अलावा रिपोर्ट में यह साफ नहीं किया गया कि किन MoU में बाद में कितनी प्रगति हुई, कौन-सी परियोजनाएँ अप्रूवल तक पहुँचीं और किन्हें रद्द किया गया। यानी रिपोर्ट में साइनिंग का प्रक्रिया को ही पूरा निवेश समझ कर पाठकों को अंतिम सत्य बता दिया बता दिया गया।

Newslaundry ने MoUs को ‘कागजी निवेश’ कहकर वास्तविक निवेश से बराबरी पर रखा। यह गलत है क्योंकि सरकार ने कभी इन्हें realised investment नहीं बताया, बल्कि ‘pipeline’ और ‘commitments’ के रूप में प्रस्तुत किया है।

रिपोर्ट में लिखा गया कि कई MoU बाद में धरातल पर नहीं उतरे। इस बात में बताते हुए लेखक ये बताना भूल गए कि उत्तर प्रदेश सरकार ने MoU के लिए मॉनिटरिंग तंत्र बनाया गया है ताकि राज्य में निवेश प्रस्तावों पर विभागीय स्तर पर फॉलो-अप, नियमित समीक्षा और प्रगति रिपोर्टिंग पर काम किया जा सके।

इसका महत्व इसलिए है क्योंकि यदि कोई राज्य वास्तव में केवल कागजी आँकड़े बढ़ाना चाहता, तो उसे निगरानी और सत्यापन की ऐसी व्यवस्था बनाने की कोई जरूरत नहीं होती।

निगरानी तंत्र यह दिखाता है कि राज्य ने गलती की संभावना को स्वीकार किया, लेकिन उसे सुधारने के लिए संस्थागत ढाँचा भी बनाया। इसीलिए अधूरे और वित्तीय अनियमितताओं वाले MoU पर समय पर कार्यवाही होनी सुनिश्चित हुई। 

MoU से नहीं होता आर्थिक हस्तांतरण

पहली बात जो साफ तौर पर जानने के लायक है वह ये अगर कोई व्यक्ति या कंपनी MoU पर हस्ताक्षर करती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि राज्य का पैसा तुरंत ट्रांसफर हो गया या जनता का धन सीधे खतरे में आ गया।

MoU से पहले भी सरकारी स्तर पर जाँच होती है, और बाद में भी प्रोजेक्ट की क्षमता, वित्तीय स्थिति, भूमि उपलब्धता, अनुमतियों और अनुपालन की समीक्षा होती है। इसलिए केवल किसी असंगत या कम-ज्ञात इकाई के MoU पर हस्ताक्षर कर देने से इसे ‘घोटाला’ कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

इसके अलावा जब भी किसी निवेशक की वित्तीय साख पर कोई सवाल खड़े होते हैं तब राज्य सरकार के पास उसकी समीक्षा, MoU रद्द करने या उस पर अन्य कार्रवाही करने का तंत्र होता है।

अब तक की 4 ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी के माध्यम से ₹15 लाख करोड़ से अधिक की परियोजनाएँ धरातल पर उतर चुकी हैं और लगभग 60 लाख रोजगार सृजित हुए हैं। ये अकेले एमओयू की चर्चा से कहीं आगे की वास्तविकता दर्शाता है।

सत्यापन, निगरानी एवं कार्रवाई की प्रक्रिया

न्यूजलॉन्ड्री ने आयोजनों में आए पुच एआई, ओब्दु डिजिटल हेल्थ केयर जैसी कुछ कंपनियों के निवेश प्रस्ताव में हुई धोखाधड़ी और उनके संदिग्धता पर सवाल करते खड़े करते हुए योगी कार्यकाल में आए सभी तरह के निवेश को ही झूठ बताने की कोशिश की।

सच्चाई यह है कि जिन संदिग्ध कंपनियों के बारे में सरकार को पता चला उस पर जाँच की गई है और कुछ एक निवेश प्रस्ताव को छोड़कर ज्यादातर निवेश प्रस्ताव को धरातल पर उतरने का काम शुरू किया जा चुका है।

राज्य सरकार के पास एमओयू के बाद निवेशक की साख को जाँचने के लिए ‘निवेश मित्र’ सिंगल विंडो पोर्टल है। इसे और अधिक अपडेट कर ‘निवेश मित्र 3.0’ के तौर पर मार्च 2026 में लॉन्च किया गया।

यह पोर्टल राज्य के लगभग 20 विभागों की 70 से अधिक सेवाओं को एक ही जगह पर लाकर निश्चित समय में ट्रांसपेरेंट क्लीयरेंस की सुविधा देता है।

पुच एआई मामला- सक्रिय सत्यापन

23 मार्च 2026 को बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप पुच एआई के साथ ₹25,000 करोड़ के एआई पार्क, डेटा सेंटर व एआई विश्वविद्यालय हेतु एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे।

कंपनी की वित्तीय क्षमता को लेकर सार्वजनिक स्तर पर सवाल उठने के तुरंत बाद नोडल एजेंसी Invest UP ने तुरंत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोटोकॉल (SOP) के तहत कंपनी से वित्तीय दस्तावेज और नेटवर्थ के प्रमाण माँगे।

कंपनी जब तय समय में अपनी वित्तीय साख (Financial Linkages) साबित नहीं कर पाई, तो सरकार ने तुरंत ऐक्शन लेते हुए MoU हस्ताक्षर के मात्र तीन दिन बाद 26 मार्च 2026 को ही इस ₹25,000 करोड़ के MoU को रद्द (Cancel) कर दिया।

ये इस बात का सुबूत है कि सरकार संदिग्ध क्रेडेंशियल्स मिलने पर समझौतों को खारिज करने में देरी नहीं करती। मुख्यमंत्री कार्यालय ने इसके साथ ही भविष्य में अधिक धनराशि वाले एमओयू पर साइन करने से पहले निवेशकों की जाँच पड़ताल करने का निर्देश भी जारी किया।

ओब्दु डिजिटल हेल्थ केयर प्रकरण की शिकायत पर कार्रवाई

फरवरी 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में ओब्दु डिजिटल हेल्थ केयर  ने ₹3,350 करोड़ के एमओयू पर हस्ताक्षर किए। फरवरी 2024 की चौथी ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में 14,701 इकाइयों में इसे ‘ग्राउंडिंग’ चरण में शामिल किया गया था।

हालाँकि बाद में कई निवेशकों ने शिकायत की कि क्लीनिक की स्थापना के लिए जमा की गई धनराशि के बदले न तो क्लीनिक शुरू किए गए और न ही रिफंड मिला।

इससे जुड़े गोंडा में एक शिकायत के आधार पर 28 अप्रैल 2026 को खरगुपुर थाने में कंपनी के निदेशक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 316(2) के तहत FIR दर्ज की गई और अब पुलिस इसकी जाँच कर रही है।

इस मामले में लखनऊ के विभूतिखंड थाने में 40 से अधिक निवेशकों ने अलग से शिकायत भी दर्ज कराई। 8 जून 2026 को पीड़ित निवेशकों के एक समूह ने मुख्यमंत्री जनता दरबार में जाकर अपनी शिकायत भी दी जहां मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने कार्रवाई का आश्वासन दिया।

इन दोनों प्रकरणों को साथ रखकर देखने पर यह जरूर साफ हो जाता है कि दोनों ही मामलों में MOU के दौरान राज्य के नाम पर कोई सरकारी धन नहीं डूबा। पुच एआई मामले में एक भी रुपया नहीं दिया गया। साथ ही ओब्दु प्रकरण में धोखाधड़ी सरकारी निवेश के बजाय निवेशकों की निजी पूंजी से जुड़ी है।

2BE Educate पर उठे सवाल का जवाब

रिपोर्ट में 2BE Educate (India) Private Limited का उदाहरण देते हुए कहा गया कि कंपनी ने ₹18,000 करोड़ का MoU किया। तर्क ये था कि कंपनी का बैलेंसशीट फाइलिंग स्टेटस कमजोर था।

हालाँकि उपलब्ध सार्वजनिक कॉर्पोरेट स्रोत यह बताते हैं कि ये कंपनी एक MCA-registered कंपनी है, जिसकी स्थापना 9 अगस्त 2021 को हुई है यानी ‘कंपनी का कोई रिकॉर्ड ही नहीं था’ कहना गलत है।

न्यूजलॉन्ड्री के इस तर्क का जवाब ये है कि अगर किसी कंपनी की MoU के बाद की जाँच में बैलेंस शीट, नेट वर्थ, फंडिंग क्षमता या प्रोजेक्ट एक्जीक्यूशन एबिलिटी कमजोर निकलती है, तो यहाँ पर ही ड्यू डिलिजेंस मैकेनिज्म काम करता है। इस प्रणाली का यही उद्देश्य है कि ऐसे प्रस्तावों को आगे बढ़ने से रोका जाए।

आरजी स्ट्रैटेजीज ग्रुप और ‘नो रिकॉर्ड’ वाला तर्क

रिपोर्ट में आरजी स्ट्रैटेजीज ग्रुप के बारे में कहा गया कि उसका भारत में कंपनी का रिकॉर्ड नहीं मिला। इस आरोप का जवाब ये है कि किसी कंपनी की व्यावसायिक पहचान, ब्रांड पहचान और कानूनी कंपनी पहचान हमेशा एक जैसी नहीं होती। निवेश सम्मेलनों में कई बार समूह कंपनियाँ, संयुक्त उपक्रम, सलाहकारी ढांचे, प्रवर्तक समूह या सहयोगी संस्थाएँ प्रस्तावों के साथ सामने आती हैं।

अगर किसी कंपनी के पीछे की असली कंपनी बाद में अस्पष्ट मिले तब समझौते के बाद विस्तृत जांच की व्यवस्था है। किसी बड़े प्रस्ताव के मिलने के बाद उसका पूरा कंपनी स्ट्रक्चर बाद की छानबीन में सामने आना स्वाभाविक प्रक्रिया है।

महज एक कंपनी के स्ट्रक्चर में परेशानी या अस्पष्टता होने से पूरे निवेश सम्मेलन को ही झूठा करार दे देना ही असल में न्यूजलॉन्ड्री का असली प्रोपेगेंडा बन कर सामने आया है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि 600 विद्यार्थियों वाली एक यूनिवर्सिटी ने साधारण बैलेंस शीट के साथ ₹40,000 करोड़ का निवेश प्रस्ताव रखा। इसके अलावा NGO के ₹1,400 करोड़ के समझौते पर भी सवाल उठाए गए।

यहाँ भी यह समझना जरूरी है कि MoU कई बार कई चरणों वाली परियोजनाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर, आवास, शैक्षणिक विस्तार, सेवा-व्यवस्था और लंबे समय के पूंजीगत खर्च को जोड़कर बनाए जाते हैं। इसलिए सिर्फ मौजूदा बैलेंस-शीट बनाम प्रस्तावित निवेश की तुलना करके उसे धोखाधड़ी बता देना जल्दबाजी दिखती है।

भले ही कुछ एमओयू कागजी रहे हों, लेकिन वास्तविकता में ₹10 लाख करोड़ से अधिक के असल प्रोजेक्ट्स का भूमि पूजन (Ground Breaking Ceremony 4.0) हो चुका है और उन पर काम चल रहा है। 

एमओयू की कानूनी एवं प्रशासनिक प्रकृति

कानूनी दृष्टि से एमओयू कोई बाध्यकारी अनुबंध नहीं, बल्कि निवेश-आशय का एक प्रारंभिक दस्तावेज है। यह किसी निवेशक को भूमि या किसी भी तरह की सब्सिडी आदि पाने का स्वतः अधिकार नहीं देता। यह केवल विस्तृत परियोजना मूल्यांकन, वित्तीय सत्यापन और अनुमोदन प्रक्रिया की शुरुआत भर है।

यहाँ तक कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मार्च 2026 में पुच एआई (Puch AI) एमओयू प्रकरण के दौरान सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया था कि इन्वेस्ट यूपी द्वारा हस्ताक्षरित एमओयू विस्तृत सत्यापन और परियोजना मूल्यांकन से पहले की एक प्रारंभिक प्रक्रिया मात्र होती है, न कि निवेश को लेकर कई प्रतिबद्धता।

इसका सीधा अर्थ यही है कि अगर कोई कंपनी MOU पर हस्ताक्षर के बाद परियोजना को धरातल पर लाने में अक्षम हो या फिर कंपनी में कई गड़बड़ी मिलती है तो भी इससे राज्य के खजाने को कोई प्रत्यक्ष राजकोषीय हानि नहीं होती।

किसी भी सरकारी निधि का वितरण एमओयू की प्रक्रिया के दौरान नहीं बल्कि उसके बाद की विस्तृत स्वीकृति और अन्य प्रक्रिया में होता है।

नोट करने वाली बात ये है कि यह व्यवस्था भारत के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी निवेश प्रोत्साहन की मानक प्रक्रिया के अनुरूप है। सभी जगह पर एमओयू के दस्तावेजों को निवेश के अंतिम निर्णय से अलग रखा जाता है।

न्यूजलॉन्ड्री को ये समझना जरूरी है कि MoU और वास्तविक निवेश अलग-अलग चीजें हैं और रिपोर्टिंग में इस अंतर को साफ-साफ नहीं रखा गया। ₹33.5 लाख करोड़ का आंकड़ा निवेश प्रस्तावों का था, नकद जमा हो चुके निवेश का नहीं। MoU गैर-बाध्यकारी होते हैं, इसलिए उन्हें धोखा या सरकारी धन का नुकसान कह देना पूरी तरह से गलत है।

रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह MoU के non-binding nature को स्वीकार करने के बावजूद कई जगह ऐसी भाषा इस्तेमाल किया गया जिससे पाठक यह मान ले कि हर बड़ा MoU पहले ही फर्जी निवेश था। यह निष्कर्ष खुद दिए गए तथ्यों से सीधे नहीं निकलता, क्योंकि कोई MoU यह वादा नहीं करता कि पैसा उसी दिन ट्रांसफर हो जाएगा।

उत्तर प्रदेश में क्या है वास्तविक निवेश की ऐतिहासिक प्रगति

MOU के दायरे से परे देखें तो धरातल पर परियोजनाओं के क्रियान्वयन का रिकॉर्ड काफी बेहतर है। फरवरी 2018 के प्रथम यूपी इन्वेस्टर्स समिट में 1,045 एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे, जिनका प्रस्तावित मूल्य लगभग ₹4.28 लाख करोड़ था।

विधानसभा में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 5 वर्ष बाद इस राशि का लगभग 61% भाग वाणिज्यिक उत्पादन के चरण में पहुँच चुका था। इसके अलावा 3 आरंभिक ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी के जरिए लगभग 3.24 लाख रोजगार सृजित हुए।

फरवरी 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में यह प्रगति अधिक बढ़ी। ₹33.52 लाख करोड़ के प्रस्तावित मूल्य के 19,250 एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए। फरवरी 2024 की चौथी ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में अकेले ₹10.23 लाख करोड़ मूल्य की 14,619 परियोजनाओं का शिलान्यास हुआ।

कुल मिलाकर अब तक संपन्न 4 ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में ₹15 लाख करोड़ से अधिक की परियोजनाएँ धरातल पर उतारी जा चुकी हैं। सरकार के अनुसार, इनसे लगभग 60 लाख रोजगार अवसर सृजित हुए हैं।

नवंबर 2025 से लंबित पांचवीं ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी (जीबीसी-5.0) के अंतर्गत ₹7 लाख करोड़ से अधिक की परियोजनाओं के शिलान्यास की तैयारी चल रही है।

बीते 9 वर्षों में UP को ₹50 लाख करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव मिले हैं। प्रस्तावित निवेश के आधार पर सरकार ने इनसे 1.10 करोड़ रोजगार अवसर सृजित होने की संभावना जताई  है।

इसके अलावा अप्रैल 2017 से जून 2025 के बीच UP में ₹17,004 करोड़ का निवेश विदेश से आया। ये जून 2000 से मार्च 2017 में मिले  ₹3,303 करोड़ की तुलना में पाँच गुना से भी अधिक है।

फैक्ट्रीज एक्ट के अंतर्गत पंजीकृत इकाइयों की संख्या 14,169 से बढ़कर 31,459 हो गई और राज्य का निर्यात ₹86,000 करोड़ से बढ़कर ₹2 लाख करोड़ के पार पहुँच गया।

किन क्षेत्रों में रही निवेशकों की भागीदारी

डिजिटल अवसंरचना क्षेत्र इस औद्योगिक बदलाव का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। राज्य में वर्तमान में छह डेटा सेंटर पार्क तथा दो स्वतंत्र डेटा सेंटर संचालित हो रहे हैं।

इसके अलावा 644 मेगावाट की प्रतिबद्ध क्षमता वाले प्लांट का कार्य प्रगति पर है। हिरानंदानी समूह, एनटीटी ग्लोबल डेटा सेंटर्स, अडाणी समूह, एसटी टेलीमीडिया, वेब वर्क्स और सिफी टेक्नोलॉजीज जैसी कंपनियाँ इन पर काम कर रही हैं।

जून 2026 की समीक्षा बैठक में यह भी सामने आया कि 5,410 मेगावाट की अतिरिक्त क्षमता हेतु घरेलू व वैश्विक निवेशकों ने रुचि दिखाई है, जिससे राज्य में लगभग ₹4.9 लाख करोड़ तक का निवेश आ सकता है और 2030 तक भारत की कुल डेटा सेंटर क्षमता में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 8-9% तक पहुँचने का अनुमान है।

एमओयू के लिहाज से ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) क्षेत्र में भी काफी काम किया गया है। 24 जून 2026 को बेंगलुरु में आयोजित उत्तर प्रदेश ग्लोबल ग्रोथ डायलॉग में पंद्रह से अधिक कंपनियों ने कुल ₹50,000 करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्तावों पर हस्ताक्षर किए।

इनमें एलजी, एऑन, मेटलाइफ तथा टेबलस्पेस ने जीसीसी क्षेत्र में एमओयू पर हस्ताक्षर किए, जबकि प्रेस्टीज समूह (₹15,000 करोड़), ब्लैकस्टोन-समर्थित होराइजन (₹10,000 करोड़), एम्बेसी तथा राहेजा माइंडस्पेस रीट (₹5,000 करोड़ प्रत्येक) ने औद्योगिक व व्यावसायिक पार्क विकास हेतु प्रतिबद्धता जताई।

UP सरकार का लक्ष्य वर्ष 2031 तक चार करोड़ वर्ग फुट ग्रेड-ए कार्यालय स्थान तथा 500 जीसीसी इकाइयाँ स्थापित करने का है। अन्य उपलब्धियों में यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में एचसीएल-फॉक्सकॉन द्वारा उत्तर भारत की पहली सेमीकंडक्टर इकाई की स्थापना (₹3,700 करोड़ से अधिक) शामिल है।

जनवरी 2026 के विश्व आर्थिक मंच दावोस सम्मेलन में एआई, डेटा सेंटर व नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में ₹2.94 लाख करोड़ के एमओयू हुए, तथा सिंगापुर व जापान यात्राओं के दौरान ₹1.5 लाख करोड़ के एमओयू के साथ-साथ ₹2.5 लाख करोड़ से अधिक के अतिरिक्त निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए।

न्यूजलॉन्ड्री की ‘एमओयू मिराज’ शृंखला की 30 जून 2026 की रिपोर्ट में यह तर्क दिया गया है कि 2023 के समिट में हस्ताक्षरित कुछ बड़े एमओयू ऐसी कंपनियों अथवा संस्थाओं से जुड़े हैं जिनका भारत में कॉर्पोरेट रिकॉर्ड सीमित है।

इसके अलावा साइन हुए एमओयू की कुल घोषित राशि और वास्तविक क्रियान्वयन क्षमता के बीच का अंतर एमओयू की प्रक्रिया की उपयोगिता पर सवाल खड़े करता है।

इस रिपोर्ट का जवाब यह है कि एमओयू की गैर-बाध्यकारी प्रकृति और पूर्व-स्वीकृति सत्यापन तंत्र राज्य के सरकारी खजाने नुकसान से बचाते हैं। साथ ही निवेश मित्र 3.0 जैसे सुधार भविष्य में तेज और अधिक बेहतर वित्तीय-साख सत्यापन का रास्ता अपनाते हैं।

उत्तर प्रदेश की निवेश-प्रोत्साहन यात्रा राज्य के आर्थिक परिदृश्य को असल धरातल पर लाने में सफल रही है। एमओयू पर हस्ताक्षर मात्र आशय की अभिव्यक्ति है, न कि अंतिम प्रतिबद्धता, और जब भी किसी निवेशक की साख पर सवाल उठे हैं तो उसकी समीक्षा और कार्रवाई की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।

अन्य राज्यों के साथ क्या है UP की तुलना

उत्तर प्रदेश ने 2021 से दिसंबर 2025 तक कुल 702 निवेश प्रस्ताव दाखिल किए जिनकी प्रस्तावित राशि ₹5,30,416 करोड़ रही।

वहीं, IEMs Implemented के आँकड़े बताते हैं कि इसी अवधि में 998 औद्योगिक इकाइयाँ धरातल पर उतरीं, जिनमें ₹5,83,096 करोड़ का वास्तविक निवेश हुआ।

Source- DPIIT

यह आँकड़ा दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश ने केवल कागजी एमओयू नहीं, बल्कि असल औद्योगिक क्रियान्वयन में भी उल्लेखनीय प्रगति की है।

Source- DPIIT

अन्य राज्यों से अगर तुलना करें तो महाराष्ट्र ने 2025 तक ₹6,13,008 करोड़ का निवेश लागू किया, जबकि यूपी ने ₹5,83,096 करोड़ का निवेश जारी किया। यानी यूपी अब औद्योगिक निवेश में देश के शीर्ष तीन राज्यों में शामिल है।

FDI data till sept 2025 (source- DPIIT)

इसके अलावा गुजरात ने ₹4,15,810 करोड़ का प्रस्तावित निवेश दर्ज किया, पर लागू निवेश ₹2,08,025 करोड़ रहा। इसके एवज में यूपी की निवेश लागू करने की दर (implementation ratio) अधिक मजबूत है। वहीं  कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे पारंपरिक औद्योगिक राज्य भी यूपी के निवेश क्रियान्वयन दर से पीछे हैं।

हर राज्य में सभी MoU हकीकत में नहीं बदलते। लेकिन इसी तर्क से यह निष्कर्ष निकाल लेना कि पूरा निवेश मॉडल ही फर्जी है, गलत होगा। किसी भी निवेश प्रोत्साहन व्यवस्था में कुछ परियोजनाएँ सफल होती हैं, कुछ लटकती हैं, और कुछ निरस्त भी होती हैं।

इस बात का महत्व अधिक है कि राज्य सरकार उन मामलों को ट्रैक करे, जवाबदेही तय करे, और संदिग्ध मामलों पर कार्रवाई करे। यूपी के मामले में रिकॉर्ड यही बताता है कि मॉनिटरिंग के लिए औपचारिक व्यवस्था बनाई गई। इसीलिए अब तक धरातल पर उतरी योजनाएँ सरकार के साथ मिलकर लोगों को रोजगार और सुविधा मुहैया करवाने में सफल हो रही हैं।

विश्व कप 2026: नॉर्वे और फ्रांस की जीत, एमबाप्पे बने नॉकआउट के सबसे बड़े गोलस्कोरर

कल रात विश्व कप में हुए अप्रत्याशित उलटफेरों की चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि Round of 32 के अगले मुकाबलों ने फुटबॉल प्रेमियों का ध्यान फिर अपनी ओर खींच लिया। पहला मुकाबला डलास में खेला जाना था, जहां कोटे डी आइवोआर के सामने यूरोप की सबसे विस्फोटक आक्रमण पंक्ति वाली टीमों में से एक नॉर्वे खड़ी थी।

एक ओर एर्लिंग हालांड, एंटोनियो नूसा और अलेक्ज़ेंडर सोरलोथ जैसे खिलाड़ी थे, जो एक पल की चूक को भी गोल में बदलने की क्षमता रखते हैं। दूसरी ओर कोटे डी आइवोआर की युवा, तेज़ और आक्रामक टीम थी, जिसकी निगाहें लगातार पहली बार विश्व कप के अगले दौर में पहुंचने पर टिकी थीं। यान डियोमांडे और निकोलास पेपे आक्रमण की कमान संभाल रहे थे, जबकि मिडफील्ड में फ्रांक केस्सी अनुभव और संतुलन का आधार थे। उधर नॉर्वे के लिए कप्तान मार्टिन ओदेगार्द पूरे खेल की धुरी बनने वाले थे। उनका काम केवल पास बांटना नहीं, बल्कि हालांड तक हर निर्णायक गेंद पहुंचाना भी था।

किक-ऑफ से पहले ही यह साफ़ था कि यह मुकाबला केवल दो टीमों के बीच नहीं, बल्कि दो अलग-अलग फुटबॉल दर्शन के बीच होने वाला था; एक ओर तेज़ ट्रांज़िशन और घातक फिनिशिंग, दूसरी ओर गति, ड्रिब्लिंग और लगातार दबाव बनाकर मैच की लय अपने पक्ष में करने की कोशिश। डलास का मैदान तैयार था, और विश्व कप को एक और यादगार रात मिलने वाली थी।

मैच शुरू होता है। कोटे डी आइवोआर का प्रयास रहता है कि शुरुआती गोल दागकर नॉर्वे पर दबाव बनाया जाए। वह लगातार आक्रमण करते रहते हैं। खासकर मैदान के बाएं छोर से यान डियोमांडे अपनी मंत्रमुग्ध कर देने वाली ड्रिब्लिंग से लगातार नॉर्वे के लिए खतरे पैदा कर रहे थे। नॉर्वे किसी तरह खुद को बचाए हुए था। लेकिन मैच के उनतालीसवें मिनट में कप्तान मार्टिन ओदेगार्द गेंद को बाईं ओर एंटोनियो नूसा की तरफ बढ़ाते हैं। नूसा अपने सामने मौजूद डिफेंडर को छकाते हुए गोलपोस्ट से लगभग बीस मीटर की दूरी से एक शानदार शॉट लगाते हैं। गेंद गोलकीपर को छकाते हुए सीधे गोलपोस्ट के भीतर चली जाती है।

नॉर्वे मुकाबले में 1-0 की महत्वपूर्ण बढ़त हासिल कर लेता है। इसके बाद दोनों टीमों ने कई अवसर बनाए, लेकिन कोई भी उन्हें गोल में तब्दील नहीं कर सका। कोटे डी आइवोआर लगातार घातक मौके बना रहा था, मगर फिनिशिंग में चूक उसके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बनी रही। एंटोनियो नूसा के शानदार गोल की बदौलत नॉर्वे पहले हाफ की समाप्ति तक बढ़त बनाए रखने में सफल रहा।

दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। कोटे डी आइवोआर लगातार अच्छे मौके बना रही थी, लेकिन गोल अब भी उससे दूर था। मैच के साठवें मिनट के आसपास कोटे डी आइवोआर के कोच अपनी आक्रमण क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से बदलाव करते हैं। तेईस वर्षीय अमाद दियालो भी अब मैदान में उतर चुके थे। वहीं सत्तरवें मिनट में नॉर्वे की ओर से एंटोनियो नूसा और अलेक्ज़ेंडर सोरलोथ की जगह क्रमशः आन्द्रेस शेल्डरुप और ऑस्कर बॉब मैदान में आते हैं।

अमाद दियालो मैदान में आते ही अपनी टीम के आक्रमण में नई धार भर देते हैं। मैच के चौहत्तरवें मिनट में निकोलास पेपे गेंद को अमाद दियालो की ओर बढ़ाते हैं। नॉर्वे के दो-तीन खिलाड़ियों से घिरे होने के बावजूद दियालो शानदार फुटवर्क का प्रदर्शन करते हुए अकेले आगे बढ़ते हैं और बेहतरीन गोल दाग देते हैं। सब कुछ इतनी तेजी से होता है कि नॉर्वे के खिलाड़ी संभल भी नहीं पाते और स्कोर 1-1 से बराबर हो जाता है।

अब तो कोटे डी आइवोआर मानो तूफान की तरह लगातार आक्रमण करने लगती है। यान डियोमांडे, निकोलास पेपे और अमाद दियालो हर दिशा से नॉर्वे के डिफेंस पर दबाव बना रहे थे। नॉर्वे एकाएक बैकफुट पर आ गई थी। लेकिन फिर मैच के छियासीवें मिनट में सुपर स्ट्राइकर एर्लिंग हालांड अचानक ही एक गोल दागकर स्कोर 2-1 कर देते हैं। कोटे डी आइवोआर अंतिम क्षणों तक बराबरी के लिए संघर्ष करती रही। इंजरी टाइम में उसे एक फ्री-किक भी मिलती है। एक बार फिर अमाद दियालो गेंद के पीछे खड़े होते हैं। लियोनेल मेस्सी की याद दिलाने वाली उनकी सटीक किक सीधे गोलपोस्ट की ओर बढ़ती है। एक पल को ऐसा लगता है कि गेंद जाल में समा जाएगी, लेकिन नॉर्वे के अनुभवी गोलकीपर ओर्यान नायलांड मानो कह उठते हैं, “Not Today.” वह असाधारण सेव करते हैं। यह बचाव इतना शानदार था कि एक क्षण के लिए विश्वास ही नहीं होता कि गेंद गोलपोस्ट के भीतर नहीं गई।

कोटे डी आइवोआर ने इस मुकाबले में विपक्षी गोलपोस्ट पर कुल चौदह शॉट लगाए, जिनमें से पांच निशाने पर रहे। उसे पूरे मैच में चौदह कॉर्नर भी मिले, लेकिन आज ओर्यान नायलांड का शानदार गोलकीपिंग प्रदर्शन नॉर्वे के लिए ढाल बन गया। परिणामस्वरूप कोटे डी आइवोआर 2-1 से मुकाबला हारकर टूर्नामेंट से बाहर हो गई। जहां कल ओरलांडो गिल का दिन था, वहीं आज एक बार फिर इस विश्व कप में एक गोलकीपर अपनी टीम का सबसे बड़ा नायक बनकर उभरा।

यह मुकाबला इतनी तीव्रता से खेला गया कि मैच समाप्त होने के बाद एर्लिंग हालांड स्वयं भी कुछ क्षणों तक मानो विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि उनकी टीम ने यह कठिन लड़ाई जीत ली है। अर्लिंग हालांड ने आज के गोल के साथ नॉर्वे के लिए अपने 53वें अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में 60 गोल पूरे कर लिए। यह आँकड़ा अपने आप में बताता है कि आधुनिक फुटबॉल में उनके जैसा नैसर्गिक गोलस्कोरर कितनी दुर्लभ चीज़ है। इतनी कम पारियों में इस मुकाम तक पहुंचने वाले वह विश्व फुटबॉल के सबसे तेज़ गोलस्कोररों में शुमार हो गए। अब Round of 16 में नॉर्वे का सामना ब्राज़ील से होगा।

अगला मुकाबला, रात ढाई बजे, न्यू जर्सी स्टेडियम में फ्रांस बनाम स्वीडन के बीच खेला गया। इस मैच में दोनों ही टीमों के पास कई घातक गोलस्कोरर मौजूद थे। इसलिए दोनों ओर से गोल देखने की पूरी उम्मीद थी। जैसा कि हमने चर्चा की थी, स्वीडन को इस मुकाबले में कुछ अच्छा करने के लिए अपनी रक्षापंक्ति बेहद अनुशासित रखनी थी।

पिछले मैच में बत्तीसवें मिनट तक हैट्रिक दागकर उस्मान डेंबेले बता चुके थे कि फ्रांस का आक्रमण कितना घातक हो सकता है। मगर अफसोस, फ्रांसीसी तूफान के आगे स्वीडन की रक्षापंक्ति बीती रात पूरी तरह बेबस नजर आई।
यहां देर रात यह मुकाबला देखना ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आपके शहर के किसी थिएटर में कोई मैटिनी शो चल रहा हो, जिसका नायक किलियन एमबाप्पे हो। फ्रांस के तमाम खिलाड़ियों की व्यक्तिगत प्रतिभा के बावजूद यह मुकाबला पूरी तरह किलियन एमबाप्पे के नाम रहा।

न्यू जर्सी में मैच शुरू होता है। शुरुआती सीटी बजते ही फ्रांस अपनी पूरी आक्रामक क्षमता के साथ मैदान पर उतरता है। मानो उसका उद्देश्य ही विपक्षी टीम पर पूरी तरह हावी हो जाना हो। आक्रमण पंक्ति में किलियन एमबाप्पे के साथ ब्रैडली बारकोला, उस्मान डेंबेले और माइकल ओलीसे लगातार स्वीडिश डिफेंस पर दबाव बनाते रहे। पिछले मुकाबले में जहां डेंबेले ने दाएं छोर से कहर बरपाया था, इस बार वही भूमिका सेंट्रल फॉरवर्ड किलियन एमबाप्पे निभाते दिखाई दिए।

पहले हाफ के अंतिम क्षणों में एमबाप्पे ने स्वीडन की सघन रक्षापंक्ति को भेदते हुए एक दर्शनीय गोल दागकर फ्रांस को बढ़त दिला दी। यह गोल देखने लायक था। बेहद तेज गति से वह हाफ लाइन से गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं, विपक्षी ‘डी’ के बाहर पहुंचकर एक बैकहील के जरिए गेंद ब्रैडली बारकोला की ओर बढ़ाते हैं, स्वयं खाली स्थान बनाते हैं और जैसे ही गेंद दोबारा उनके पास लौटती है, वह बिना कोई गलती किए उसे गोल में बदल देते हैं। पहले हाफ की समाप्ति तक फ्रांस 1-0 की बढ़त हासिल कर चुका था।

दूसरे हाफ की शुरुआत भी फ्रांस ने उसी आक्रामक तेवर के साथ की। खेल शुरू होने के दस मिनट के भीतर माइकल ओलीसे शानदार रन बनाते हुए स्वीडिश डिफेंस को अपनी ओर खींच लेते हैं। सही समय पर वह गेंद ब्रैडली बारकोला की ओर बढ़ाते हैं और बारकोला बिना किसी गलती के उसे गोल में तब्दील कर फ्रांस की बढ़त 2-0 कर देते हैं।

स्वीडन अभी इस झटके से उबर भी नहीं पाया था कि एक बार फिर, चौहत्तरवें मिनट में माइकल ओलीसे स्वीडिश रक्षापंक्ति का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए गेंद किलियन एमबाप्पे के लिए छोड़ते हैं। एमबाप्पे इस अवसर को भी व्यर्थ नहीं जाने देते और शानदार फिनिश के साथ अपना दूसरा तथा टीम का तीसरा गोल दाग देते हैं। इस गोल के साथ वह विश्व कप के नॉकआउट चरण में सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी बन गए। साथ ही विश्व कप के विभिन्न संस्करणों में उनके नाम अब 18 गोल दर्ज हो चुके हैं। महज़ 27 वर्ष की उम्र में वह विश्व कप के इतिहास में सबसे अधिक गोल करने वाले खिलाड़ियों की सूची में वह अब शीर्ष स्थानों के बेहद करीब पहुंच चुके हैं।

फ्रांस इस गोल के साथ मुकाबला 3-0 से अपने नाम कर लेता है और अगले दौर का टिकट भी कटवा लेता है, जहां अब उसका सामना जर्मनी को पेनाल्टी शूटआउट में हराकर उलटफेर करने वाली पराग्वे की टीम से होगा। यह मुकाबला 4 जुलाई को फिलाडेल्फिया में खेला जाएगा।

ले ब्लूज़ की यह टीम कई मायनों में पिछले संस्करणों में उतरी टीमों से अलग है। इस बार यह टीम केवल घातक आक्रमण के भरोसे नहीं उतरी है। उसकी रक्षापंक्ति में विलियम सालीबा, जूल्स कूंदे, दायो उपामेकानो और लूका डीने जैसे अनुभवी खिलाड़ियों का मजबूत संयोजन मौजूद है।

वहीं बेंच पर रेयान शेरकी, जाँ-फिलिप मातेता, मार्कस थुराम और देज़िरे दूए जैसे आक्रमणकारी खिलाड़ी हैं, जो मैदान पर उतरते ही कुछ ही मिनटों में मैच का रुख बदलने की क्षमता रखते हैं। फिलहाल जिस आत्मविश्वास और संतुलन के साथ यह टीम खेल रही है, उसे देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि उसका लक्ष्य केवल अच्छा प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि विश्व कप ट्रॉफी जीतना है।

खैर, अब बात करते हैं तीसरे मुकाबले की। मेक्सिको, अपने ही घर में, ग्रुप चरण में जर्मनी जैसी दिग्गज टीम को हराकर सनसनी मचाने वाले इक्वाडोर के सामने थी। घरेलू परिस्थितियां, भरे हुए स्टेडियम और हजारों समर्थकों का उत्साह पहले से ही मेक्सिको के पक्ष में दिखाई दे रहा था।

लेकिन विश्व कप में केवल माहौल नहीं, मौके भुनाने की क्षमता भी मायने रखती है। मेक्सिको ने पहले ही हाफ में मुकाबले की दिशा तय कर दी। हूलियान क्वीनोनेज़ और 35 वर्षीय अनुभवी स्ट्राइकर राउल जिमेनेज़ ने एक-एक गोल दागते हुए स्कोर 2-0 कर दिया। इसके बाद इक्वाडोर ने वापसी की कोशिश जरूर की, मगर मेक्सिको की रक्षापंक्ति ने कोई बड़ी चूक नहीं की। इसी स्कोरलाइन के साथ मेक्सिको ने मुकाबला अपने नाम किया और Round of 16 में प्रवेश कर लिया, जहां अब उसका सामना इंग्लैंड और डीआर कांगो के बीच होने वाले मुकाबले के विजेता से होगा। उल्लेखनीय है कि अगला मुकाबला भी मेक्सिको अपने घरेलू मैदान पर खेलेगा।

अब निगाहें आज रात अटलांटा पर होंगी, जहां थॉमस टुखेल की इंग्लैंड का सामना डीआर कांगो से होगा। कागज़ों पर इंग्लैंड इस मुकाबले की प्रबल दावेदार दिखाई देती है, लेकिन विश्व कप बार-बार यही सिखाता है कि यहां भविष्यवाणियां अक्सर नब्बे मिनट के भीतर बदल जाती हैं। फुटबॉल अनिश्चितताओं का खेल है, और यही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती भी है।

डीआर कांगो के मुख्य कोच सेबास्टियन देसाब्रे अच्छी तरह जानते हैं कि यदि उनकी टीम खुलकर आक्रामक फुटबॉल खेलने लगी तो इंग्लैंड जैसी प्रतिभाशाली टीम उन्हें भारी नुकसान पहुंचा सकती है। यही कारण है कि इस पूरे टूर्नामेंट में उन्होंने परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति बदली है। पुर्तगाल और कोलंबिया जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ उन्होंने पारंपरिक चार-डिफेंडर प्रणाली की जगह पांच रक्षकों वाली संरचना अपनाई थी। उसी अनुशासन की बदौलत उनकी टीम दोनों मुकाबलों से अंक लेकर बाहर निकली। ऐसे में आज भी यही उम्मीद की जा सकती है कि डीआर कांगो शुरुआत से ही मैच की गति धीमी रखने, इंग्लैंड के आक्रमण को रोकने और मुकाबले को अधिक से अधिक देर तक बराबरी पर बनाए रखने की कोशिश करेगा। यदि वह ऐसा करने में सफल रहा, तो मुकाबला अतिरिक्त समय या पेनाल्टी शूटआउट तक भी जा सकता है।

आज का दूसरा मुकाबला बेल्जियम और सेनेगल के बीच सिएटल में खेला जाएगा। भारतीय समयानुसार इसकी शुरुआत रात डेढ़ बजे होगी। इसके बाद सुबह साढ़े पांच बजे सैन फ्रांसिस्को में मेज़बान अमेरिका का सामना बोस्निया और हर्ज़ेगोविना से होगा। घरेलू परिस्थितियों और मौजूदा फॉर्म को देखते हुए मॉरिसियो पोचेतीनो की अमेरिकी टीम इस मुकाबले में बढ़त रखती दिखाई देती है, लेकिन विश्व कप में कागज़ी समीकरण कितनी जल्दी बदलते हैं, यह पिछले कुछ दिनों में पूरी दुनिया देख चुकी है।

आज के मुकाबलों में किलियन एमबाप्पे, माइकल ओलीसे, अमाद दियालो और एंटोनियो नूसा ने अपने आक्रामक खेल से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। वहीं दूसरी ओर, अंतिम क्षणों में अमाद दियालो की खतरनाक फ्री-किक को रोकने वाले नॉर्वे के गोलकीपर ओर्यान नायलांड भी किसी नायक से कम नहीं रहे। कई बार एक शानदार सेव भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है, जितना कोई निर्णायक गोल।

इस विश्व कप ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यहां कुछ भी संभव है। यहां वही टीम अंत तक टिकती है, जो दबाव के सबसे कठिन क्षणों में भी अपने धैर्य और संयम को बनाए रख सके। यही कारण है कि विश्व कप केवल कौशल की नहीं, बल्कि साहस और मानसिक दृढ़ता की भी परीक्षा है।

इसी संदर्भ में जर्मनी और पराग्वे के बीच खेला गया पेनाल्टी शूटआउट भी लंबे समय तक याद रखा जाएगा। पांच-पांच पेनाल्टी के बाद भी जब दोनों टीमें बराबरी पर थीं, तो मुकाबला ‘सडन डेथ’ में पहुंच गया। अंततः पराग्वे ने शूटआउट अपने नाम किया और जर्मनी, जो विश्व कप इतिहास में पेनाल्टी शूटआउट में लंबे समय तक लगभग अजेय मानी जाती थी, टूर्नामेंट से बाहर हो गई। एक ओर पराग्वे के गोलकीपर ओरलांडो गिल ने शानदार बचाव किए, तो दूसरी ओर जर्मनी निर्णायक क्षणों में अवसरों का लाभ नहीं उठा सकी। विश्व कप अक्सर ऐसे ही छोटे-छोटे पलों में अपने सबसे बड़े नायक और सबसे बड़ी त्रासदियां चुनता है।

ऐसे ही क्षणों को देखकर होमर के महाकाव्य इलियड की ये पंक्तियां सहज ही स्मरण हो उठती हैं:

“Let me not then die ingloriously and without a struggle, but let me first do some great thing that shall be told among men hereafter.”

फुटबॉल केवल एक खेल नहीं है। यह जज़्बे का दूसरा नाम है। यह उम्मीदों, साहस, असंभव को संभव बनाने की जिद और करोड़ों लोगों की सामूहिक धड़कनों का उत्सव है। और इसलिए, फुटबॉल के ये खूबसूरत किस्से आगे भी यूं ही लिखे जाते रहेंगे।

नेहरू से राहुल तक आ गई कॉन्ग्रेस, पर राम मंदिर से खत्म नहीं हो रही घृणा: ‘इमाम-ए-हिंद’ वाली राजनीति को कभी स्वीकार नहीं करेंगे हिंदू

अयोध्या में राम मंदिर के चंदे में कथित हेराफेरी की खबरों और गिरफ्तारियों के बीच देश की सियासत में एक बार फिर भगवार राम का नाम गूँज रहा है। लेकिन इस बार सबसे दिलचस्प नजारा कॉन्ग्रेस पार्टी के खेमे से आ रहा है। राम मंदिर के भूमि पूजन और प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक आयोजनों से दूरी बनाने वाली कॉन्ग्रेस को अचानक भगवान राम की याद सताने लगी है। कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत भगवान राम को ‘इमाम-ए-हिंद’ बताते हुए भी हिंदू घृणा दिखा रही हैं।

यह वही कॉन्ग्रेस है जिसने कुछ महीने पहले 22 जनवरी को अयोध्या में हुए राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के निमंत्रण को ठुकरा दिया था। राजनीति के जानकार और आम जनता आज कॉन्ग्रेस के इस बदले हुए रुख को देखकर हैरान हैं। जो पार्टी कभी अदालत में लिखित रूप से कहती थी कि भगवान राम का कोई ऐतिहासिक वजूद ही नहीं था, वह आज अचानक इतनी बड़ी राम भक्त कैसे हो गई है? आइए कॉन्ग्रेस की इस ‘सीजनल राम भक्ति’ और उसके पीछे छिपी राजनीति की पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं…

चंदे के बहाने घड़ियाली आँसू और सुप्रिया श्रीनेत का अचानक बदला हुआ बयान

अयोध्या राम मंदिर के चंदे और जमीन खरीद में कथित हेराफेरी के कुछ आरोपों को लेकर देश में सियासत तेज हुई है। इस मुद्दे को लपकते हुए कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने दिल्ली में एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। उन्होंने भाजपा और RSS पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि इन लोगों ने भगवान राम के भक्तों का पैसा हड़प लिया है और मंदिर के चढ़ावे में चोरी की है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए इसे एक ‘महा-घोटाला’ बताया और माँग की कि इस पूरे मामले की जाँच सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज से कराई जानी चाहिए।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुप्रिया श्रीनेत ने सरकार को घेरते हुए कहा, “राम मंदिर के भूमिपूजन से लेकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा तक, सब कुछ अपनी देखरेख में कराने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चढ़ावे की इस चोरी पर एक शब्द भी नहीं बोल रहे हैं। उन्हें अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए और इस धोखे के लिए भक्तों से माफी माँगनी चाहिए। उनकी यह चुप्पी कई बड़े सवाल खड़े करती है। यह श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट कोई साधारण ट्रस्ट नहीं है। इसकी घोषणा खुद प्रधानमंत्री ने फरवरी 2020 में की थी और इसके पदाधिकारी वे लोग हैं जो जीवन भर RSS से जुड़े रहे हैं। भाजपा-RSS ने इस ट्रस्ट को अपने ही पसंदीदा लोगों से भर दिया और जानबूझकर इसे आरटीआई (RTI) के दायरे से बाहर रखा।”

सुप्रिया श्रीनेत ने आगे कहा कि भगवान श्री राम का मंदिर आस्था, विश्वास और सम्मान का प्रतीक है, जिससे देश के करोड़ों लोगों की भावनाएँ जुड़ी हैं, लेकिन इस ट्रस्ट ने हिंदुओं के भरोसे के साथ विश्वासघात किया है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और अन्य नेताओं को नजरबंद (हाउस अरेस्ट) किए जाने का मुद्दा उठाया और कहा कि विपक्ष पर यह कार्रवाई इसलिए हो रही है ताकि भगवान राम को लूटने वाले पापी बचकर निकल सकें।

लेकिन इस पूरे बयान में सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि हिंदुओं के गुस्से से बचने के लिए सुप्रिया श्रीनेत ने अचानक पैंतरा बदला और भगवान राम को ‘इमाम-ए-हिंद’ बताते हुए उनकी तारीफों के पुल बाँधने शुरू कर दिए। जो पार्टी कुछ महीने पहले तक राम मंदिर को सिर्फ भाजपा का राजनीतिक एजेंडा बताती थी, वो आज चंदे के बहाने खुद को सबसे बड़ा राम भक्त साबित करने में जुट गई है ताकि हिंदू वोट बैंक को रिझाया जा सके।

जब सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कॉन्ग्रेस ने भगवान राम के अस्तित्व को नकारा था…

कॉन्ग्रेस की इस ‘सीजनल’ राम भक्ति के पीछे का असली सच देखना हो, तो हमें साल 2007 के उस वाकये को याद करना होगा जब केंद्र में कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली UPA सरकार सत्ता में थी। उस समय भारत और श्रीलंका के बीच बने पौराणिक और ऐतिहासिक ‘राम सेतु’ को तोड़कर ‘सेतुसमुद्रम परियोजना’ नाम का एक समुद्री रास्ता बनाने की तैयारी चल रही थी। जब देश भर के करोड़ों हिंदुओं, संतों और भाजपा ने इस बात का विरोध किया कि यह भगवान राम की सेना द्वारा बनाया गया पवित्र ‘राम सेतु’ है और इसे नहीं तोड़ा जाना चाहिए, तब कॉन्ग्रेस सरकार ने हिंदू आस्था की धज्जियाँ उड़ाने का काम किया था।

कॉन्ग्रेस सरकार ने देश की सबसे बड़ी अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट में एक लिखित हलफनामा दायर कर दिया। इस आधिकारिक दस्तावेज में सरकार ने साफ-साफ शब्दों में लिखा, “वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस बेशक प्राचीन भारतीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन इन्हें कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं माना जा सकता जिससे अकाट्य रूप से यह साबित किया जा सके कि इसमें दिखाए गए किरदार (भगवान राम, माता सीता, हनुमान जी) और घटनाएँ सचमुच इतिहास में घटित हुई थीं।”

सरल शब्दों में कहें तो कॉन्ग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में यह लिखकर दे दिया था कि भगवान राम का कोई वैज्ञानिक या ऐतिहासिक अस्तित्व ही नहीं था, वे केवल एक कहानी के पात्र थे। इस हलफनामे के सामने आने के बाद जब देश भर में भारी आक्रोश फैल गया और भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इसे हिंदू भावनाओं पर घोर प्रहार बताते हुए देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी, तब भी कॉन्ग्रेस सरकार अपने अहंकार में चूर रही। सरकार ने इस ईश-निंदा वाले हलफनामे को तुरंत वापस लेने से भी साफ इनकार कर दिया था। कॉन्ग्रेस की इसी सोच के कारण उनके सांसद कुमार केतकर जैसे नेता भी TV चैनलों पर बैठकर खुलेआम कहते रहे कि राम केवल साहित्य की रचना हैं।

नेहरू की पुस्तक ‘Selected Works’ में दर्ज सबूत: जब रामलला के प्रकट होने पर भड़क गए थे देश के PM

कॉन्ग्रेस का भगवान राम और अयोध्या से यह बैर आज का नहीं है, बल्कि यह उनकी विरासत का हिस्सा है जिसकी शुरुआत देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय ही हो गई थी। 22 दिसंबर 1949 की रात जब अयोध्या में राम जन्मभूमि के विवादित ढांचे के भीतर अचानक रामलला की मूर्ति प्रकट हुई और हिंदुओं ने वहाँ भजन-कीर्तन शुरू कर दिया, तो प्रधानमंत्री नेहरू बुरी तरह भड़क गए थे।

जवाहर लाल नेहरू ने 26 दिसंबर 1949 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को एक कड़ा टेलीग्राम भेजा। यह टेलीग्राम ‘Selected Works of Jawaharlal Nehru‘ के वॉल्यूम 14, पार्ट 1 के पेज 443 पर हूबहू छपा हुआ है। इस टेलीग्राम में जवाहर लाल नेहरू ने लिखा था कि अयोध्या की घटना से वे बहुत ज्यादा विचलित हैं और वहाँ जो कुछ भी हुआ है, उससे उन्हें गहरा धक्का लगा है।

जवाहर लाल नेहरू का मानना था कि अगर रामलला की मूर्तियों को तुरंत जन्मभूमि से बाहर नहीं निकाला गया, तो पूरे भारत और विशेषकर कश्मीर में बहुत गलत संदेश जाएगा। नेहरू किसी भी कीमत पर वहाँ से मूर्तियों को हटवाना चाहते थे और इसके लिए वे खुद अयोध्या जाने की जिद पर अड़ गए थे। इस बात का पक्का प्रमाण इसी पुस्तक के वॉल्यूम 14, पार्ट 1 के पेज 444 पर दर्ज उनके दूसरे टेलीग्राम से मिलता है, जो उन्होंने 5 फरवरी 1950 को गोविंद वल्लभ पंत को भेजा था। इस टेलीग्राम में नेहरू ने साफ शब्दों में लिखते हैं, “प्रिय पंत जी, मुझे प्रशन्नता होगी अगर आप अयोध्या के हालात से मुझे अवगत करवाएँगे। जैसा कि आप जानते हैं, मैं इसे समूचे भारत और खासतौर से कश्मीर पर पड़ने वाले इसके असर को बहुत महत्व देता हूँ। अगर आप जरूरी समझें तो मैं स्वयं अयोध्या आउँगा।”

नेहरू की नाराजगी यहीं शांत नहीं हुई, वे रामलला की मूर्तियों को हटाने का विरोध करने वाले स्थानीय अधिकारियों से भी नफरत करने लगे थे। इसका सबसे बड़ा सबूत इसी पुस्तक के वॉल्यूम 14, पार्ट 2 के पेज 445 पर मिलता है, जो टेलीग्राम उन्होंने 5 मार्च 1950 को महात्मा गाँधी के मुख्य सहायक किशोर लाल मशरूवाला को भेजा था। इस पत्र में पंडित नेहरू लिखते हैं, “आपने अयोध्या की मस्जिद का जिक्र किया। यह वाक्या दो या तीन महीने पहले हुआ और मैं इसको लेकर चिंतित हूँ। उत्तर प्रदेश सरकार ने हिम्मत दिखाने का दिखावा किया और हकीकत में जो किया वो कम था। फैजाबाद के अधिकारियों ने या तो बदमाशी की या फिर इस घटना को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। UP में कई कॉन्ग्रेसियों और पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने इस घटना की कई मौकों पर निंदा की, लेकिन वो दंगों के भय से कोई भी कड़ी कार्रवाई करने से बचते रहे। मैं इससे बुरी तरह अशांत हूँ और मैंने बार-बार पंतजी का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है।”

उत्तर प्रदेश को ‘सांप्रदायिक’ बताना और सरकारी खर्च पर बाबरी मस्जिद बनाने की नेहरू की सोच

अयोध्या के इस पूरे घटनाक्रम से पंडित नेहरू को कितना मानसिक कष्ट हो रहा था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के पूरे समाज को ही कटघरे में खड़ा कर दिया था। इसी पुस्तक के वॉल्यूम 14, पार्ट 2 के पेज 293 पर दर्ज एक अन्य पत्र में नेहरू ने अपने दिल का दर्द बयाँ करते हुए लिखा था कि उत्तर प्रदेश अब उनके लिए एक अजनबी और पूरी तरह से सांप्रदायिक जगह बनता जा रहा है, जहाँ वे खुद को बिल्कुल अकेला और अलग-थलग महसूस करते हैं। नेहरू को इस बात का बहुत मलाल था कि UP की सरकार और वहाँ के लोग उनकी तरह ‘सेक्युलर’ सोच नहीं रख रहे हैं।

जवाहर लाल नेहरू की सनातनी प्रतीकों और संतों के प्रति नफरत का एक और बड़ा उदाहरण इसी पुस्तक के वॉल्यूम 14, पार्ट 2 के पेज 295 पर मिलता है। 18 मई 1950 को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय को लिखे एक टेलीग्राम में नेहरू ने देश में बढ़ रही सांप्रदायिकता के लिए सीधे तौर पर सनातनियों, पंडितों और साधु-संतों को जिम्मेदार ठहराया था। इन सभी ऐतिहासिक तथ्यों और पत्रों की भाषा से यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि नेहरू के मन में राम मंदिर को लेकर क्या विचार थे। वे पहली बात तो यह चाहते थे कि रामलला की मूर्तियों को जन्मभूमि से बाहर फेंक दिया जाए, और दूसरी बात यह कि वे सरकारी खर्च पर वहाँ दोबारा बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाना चाहते थे।

इसके लिए नेहरू बार-बार गुजरात के सोमनाथ मंदिर का उदाहरण देते थे, जिसका पुनर्निर्माण उन दिनों पूरे जोर-शोर से चल रहा था। जबकि सरदार वल्लभभाई पटेल और अन्य बड़े नेता नेहरू को बार-बार समझाते थे कि बाबरी मस्जिद की तुलना सोमनाथ मंदिर से नहीं की जा सकती क्योंकि सोमनाथ मंदिर का निर्माण सरकार के पैसे से नहीं, बल्कि आम जनता के दान और चंदे से हो रहा था। लेकिन नेहरू अपनी इस जिद को छोड़ने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे।

सोमनाथ मंदिर का विरोध और राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को नेहरू की वो विवादित चिट्ठी

नेहरू की सेक्युलरिज्म की परिभाषा इतनी अजीब थी कि वे हिंदुओं के गौरव के प्रतीक सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को भी ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद’ का नाम देकर उसका विरोध करते थे। जब सोमनाथ मंदिर का काम पूरा हो गया और उसके प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तारीख तय हुई, तो एक अखबार में गलत खबर छप गई कि सौराष्ट्र सरकार इस उत्सव के लिए सरकारी खजाने से 5 लाख रुपए खर्च करने जा रही है। हालाँकि अगले ही दिन सौराष्ट्र सरकार ने इस खबर का खंडन कर दिया, लेकिन नेहरू को हिंदुओं और मंदिर के खिलाफ माहौल बनाने का एक बड़ा मौका मिल गया।

22 अप्रैल 1951 को प्रधानमंत्री नेहरू ने देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को एक बहुत लंबी और कड़क चिट्ठी लिखी। यह पत्र ‘Selected Works of Jawaharlal Nehru’ के वॉल्यूम 16, सीरिज 2 में प्रमुखता से प्रकाशित है। इस पत्र में नेहरू ने राष्ट्रपति को सोमनाथ मंदिर के उत्सव में न जाने की हिदायत देते हुए लिखा था, “मैं सोमनाथ मंदिर के इस पूरे मामले को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित हूँ। इसकी चर्चा अब विदेशों में भी होने लगी है। हमारे आलोचक कह रहे हैं कि भारत जैसी एक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) सरकार खुद को ऐसे आयोजनों से कैसे जोड़ सकती है जो विशुद्ध रूप से हिंदू पुनरुत्थान के प्रतीक हैं? इसके जवाब में मैं हर जगह यही कह रहा हूँ कि इस आयोजन से भारत सरकार का कोई लेना-देना नहीं है और जो लोग भी इससे जुड़े हैं, वे व्यक्तिगत रूप से ऐसा कर रहे हैं। विदेशी राजदूत भी मुझसे पूछ रहे हैं कि जब देश भुखमरी की कगार पर है और हम हर तरफ से खर्चों में कटौती कर रहे हैं, तब एक राज्य सरकार एक मंदिर के उत्सव पर 5 लाख रुपए कैसे खर्च कर सकती है? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या करूँ, लेकिन मुझे भारत सरकार को इस पूरे मामले से बिल्कुल अलग रखना होगा।”

जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद पर दबाव बनाने की पूरी कोशिश की कि वे देश के मुखिया होने के नाते सोमनाथ न जाएँ, क्योंकि इससे भारत की सेक्युलर छवि खराब होगी। लेकिन धन्य हो इस देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, जिन्होंने नेहरू की इस तुष्टिकरण वाली सोच और तानाशाही दबाव के आगे झुकने से साफ मना कर दिया। वे न केवल सोमनाथ मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए, बल्कि उन्होंने वहां जाकर देश के सांस्कृतिक गौरव पर एक ऐतिहासिक भाषण भी दिया था।

अयोध्या का वो जांबाज कलेक्टर केके नायर, जिसने नेहरू के आदेश को ठेंगा दिखाया और जेल गया

आजादी के तुरंत बाद जब अयोध्या के विवादित ढांचे में रामलला की मूर्ति प्रकट हुई, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और यूपी के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने हिंदुओं की आस्था को कुचलने के लिए मूर्तियों को वहाँ से जबरन हटाने का तानाशाही आदेश दे दिया था। नेहरू की इस राम-विरोधी नीति के खिलाफ अयोध्या के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट (DM) केके नायर दीवार बनकर खड़े हो गए। एक जांबाज IPS अधिकारी के रूप में नायर साहब ने अपने सहायक गुरु दत्त सिंह की उस रिपोर्ट का समर्थन किया, जिसमें जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर निर्माण की सिफारिश की गई थी।

नेहरू के भारी दबाव के बावजूद नायर ने अपनी नौकरी और करियर को दांव पर लगाकर मूर्तियों को हटाने से साफ इनकार कर दिया और सरकार को दो टूक चेतावनी दी कि ऐसा करने से अयोध्या में भारी दंगा और खून-खराबा हो सकता है। नेहरू के इस जनविरोधी आदेश को ठेंगा दिखाने की सजा केके नायर को निलंबन के रूप में भुगतनी पड़ी, हालाँकि बाद में वे अदालत से यह केस जीत गए लेकिन नेहरू सरकार की सनातनी प्रतीकों के प्रति नफरत से तंग आकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद पूरा नायर परिवार राम मंदिर आंदोलन के संकल्प के साथ जनसंघ में शामिल हो गया, जिसके चलते राम भक्तों ने उन्हें और उनकी पत्नी शकुंतला नायर को भारी मतों से जिताकर लोकसभा सांसद बनाया। नेहरू परिवार का राम भक्तों के प्रति यह बैर यहीं शांत नहीं हुआ। बाद में इंदिरा गाँधी ने अपनी राजनीतिक खुन्नस निकालने के लिए आपातकाल (इमरजेंसी) के काले दिनों के दौरान इस बुजुर्ग देशभक्त दंपत्ति को जबरन गिरफ्तार करवाकर जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया था।

जब सोनिया गाँधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने किया राम मंदिर का बहिष्कार

अयोध्या में 500 वर्षों के लंबे संघर्ष और सुप्रीम कोर्ट के सर्वसम्मत फैसले के बाद जब 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक क्षण आया, तब कॉन्ग्रेस ने अपनी पुरानी राम-विरोधी और तुष्टिकरण की मानसिकता का परिचय दिया। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा सोनिया गाँधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी को पूरे सम्मान के साथ भेजे गए निमंत्रण को कॉन्ग्रेस आलाकमान ने ठुकरा दिया।

कॉन्ग्रेस ने इस पवित्र राष्ट्रीय उत्सव को भाजपा और RSS का एक ‘राजनीतिक प्रोजेक्ट’ करार दिया और ‘अर्धनिर्मित मंदिर’ का बहाना बनाकर इस महापर्व का पूरी दुनिया के सामने खुला बहिष्कार किया। कॉन्ग्रेस के इस आत्मघाती फैसले से न केवल देश के करोड़ों राम भक्तों की भावनाएँ आहत हुईं, बल्कि खुद पार्टी के भीतर भी भारी कलह और बगावत शुरू हो गई।

आचार्य प्रमोद कृष्णम और अर्जुन मोढवाडिया जैसे वरिष्ठ नेताओं ने खुलकर नाराजगी जताते हुए कहा कि इस फैसले से उन करोड़ों कार्यकर्ताओं का दिल टूटा है जिनकी आस्था भगवान राम में है। दरअसल, राहुल गाँधी के खेमे और दक्षिण भारत के नेताओं ने वोट बैंक के चुनावी गुणा-भाग और इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों (सपा, टीएमसी और वामपंथियों) को खुश रखने के चक्कर में इस महा-उत्सव से दूरी बनाई, जिसके बाद भाजपा ने साफ कहा कि राष्ट्र के इस भव्य कार्यक्रम का बहिष्कार करने वाली कांग्रेस का जनता खुद चुनावों में पूरी तरह बहिष्कार कर देगी।

चुनाव आते ही ‘सीजनल सनातनी’ बनने वाली कॉन्ग्रेस की दोगली नीति पर विचार

कॉन्ग्रेस पार्टी का भगवान राम, राम मंदिर और सनातन धर्म के प्रति पूरा इतिहास अगर खंगाला जाए, तो यह साफ समझ आता है कि इनकी राम भक्ति कोई वास्तविक श्रद्धा नहीं, बल्कि केवल और केवल चुनावी मौसम को देखकर बदलने वाली ‘मौकापरस्त’ राजनीति है। कॉन्ग्रेस की पूरी बुनियाद ही इस दोहरेपन पर टिकी है। जब इन्हें सत्ता का स्वाद चखना होता है या एक खास अल्पसंख्यक वोट बैंक को मजबूत करना होता है, तब ये सुप्रीम कोर्ट में जाकर हलफनामा दे देते हैं कि ‘भगवान राम तो कभी हुए ही नहीं, रामायण तो बस एक काल्पनिक कहानी है।’ ये संसद और टीवी चैनलों पर अपने नेताओं से राम के वजूद पर सवाल उठवाते हैं।

लेकिन जैसे ही चुनाव सिर पर आते हैं और इन्हें जमीन खिसकती हुई दिखाई देती है, वैसे ही कॉन्ग्रेस के तमाम नेता रातों-रात ‘इच्छाधारी सनातनी’ का चोला ओढ़ लेते हैं। तब अचानक राहुल गाँधी कोट के ऊपर जनेऊ पहनकर गोत्र बताने लगते हैं, प्रियंका गाँधी वाड्रा मंदिरों में जाकर माथा टेकने और नदियाँ में डुबकी लगाने लगती हैं, कमलनाथ खुद को हनुमान जी का सबसे बड़ा भक्त घोषित कर देते हैं, और सुप्रिया श्रीनेत को भगवान राम के भीतर ‘इमाम-ए-हिंद’ नजर आने लगता है। यह कैसी और कितनी खोखली श्रद्धा है जो सत्ता में रहते हुए भगवान के अस्तित्व को ही मिटाने पर तुल जाती है और चुनाव हारने के डर से अचानक उसी भगवान के चरणों में लोटने लगती है?

अगर कॉन्ग्रेस के मन में प्रभु श्री राम के प्रति रत्ती भर भी सच्चा सम्मान होता, तो वे 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के उस ऐतिहासिक और पवित्र निमंत्रण को कभी ठुकराते नहीं। उन्होंने देश के करोड़ों हिंदुओं के 500 सालों के इंतजार के पूरे होने के क्षण को एक ‘राजनीतिक इवेंट’ कहकर उसका अपमान किया। सच यह है कि कॉन्ग्रेस आज अपनी ही बुनी हुई तुष्टिकरण की राजनीति के चक्रव्यूह में बुरी तरह फँस चुकी है।

वह न तो खुलकर हिंदुओं की आस्था का साथ दे पाती है और न ही उसे पूरी तरह छोड़ पाती है। उसे डर है कि अगर वह राम मंदिर का खुलकर समर्थन करेगी तो उसका पुराना खास वोट बैंक उससे छिटक जाएगा, और अगर विरोध करेगी तो देश का बहुसंख्यक समाज उसे राजनीति के नक्शे से ही साफ कर देगा। इसी डर, बौखलाहट और छटपटाहट के कारण कॉन्ग्रेस आज कभी राम को काल्पनिक बताती है, तो कभी ‘इमाम-ए-हिंद’ कहकर पूजने का नाटक करती है। लेकिन इस देश की समझदार जनता अब इनके इस ‘सीज़नल’ और ‘दोहरे’ चरित्र को बहुत अच्छी तरह पहचान चुकी है और वक्त आने पर इसका जवाब देना भी जानती है।

1973 का इजरायल-अरब युद्ध, तेल का संकट और ब्राजील का गन्ना मॉडल: कैसे दुनिया को मिला पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का फॉर्मूला, भारत भी उसी राह पर

भारत में 20% एथेनॉल मिलाए गए पेट्रोल यानी E20 को लेकर विवाद तेज हो गया है। सरकार का कहना है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और प्रदूषण कम होगा। वहीं कई वाहन मालिक, खासकर पुराने वाहनों का इस्तेमाल करने वाले लोग, माइलेज घटने, इंजन पर असर पड़ने और खर्च बढ़ने की आशंका जता रहे हैं। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है और वहाँ एथेनॉल कार्यक्रम से जुड़ी याचिका पर सुनवाई हो रही है।

विवाद तब और बढ़ गया जब कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में E20 योजना को ‘चल रहा प्रयोग’ बताया है। सरकार ने इन रिपोर्ट्स को खारिज करते हुए कहा कि अटॉर्नी जनरल ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया। केंद्र के मुताबिक, एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम कोई प्रयोग नहीं बल्कि सोच-समझकर बनाई गई राष्ट्रीय नीति है

क्यों एथेनॉल मिलाए गए पेट्रोल को बढ़ावा दे रही सरकार?

सरकार का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग सिर्फ ईंधन से जुड़ा फैसला नहीं है बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक रणनीति का हिस्सा है। केंद्र के मुताबिक, गन्ने से बने एथेनॉल से पेट्रोल के मुकाबले करीब 65% और मक्के से बने एथेनॉल से करीब 50% कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन होता है।

सरकार का दावा है कि इससे गन्ना और मक्का किसानों को फायदा हुआ है, उनकी आय बढ़ी है और गन्ना बकाया चुकाने में मदद मिली है। ESY (Ethanol Supply Year) 2014-15 से जुलाई 2025 तक भारत ने ₹1.44 लाख करोड़ से ज्यादा विदेशी मुद्रा बचाई, 245 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात की जगह एथेनॉल का इस्तेमाल किया और कार्बन उत्सर्जन घटाया। इस साल किसानों को एथेनॉल उत्पादन से करीब ₹40,000 करोड़ की आय और देश को करीब ₹43,000 करोड़ विदेशी मुद्रा बचत की उम्मीद है।

वाहनों के प्रदर्शन पर उठ रहे सवालों पर सरकार ने IOCL, ARAI और SIAM की स्टडी का हवाला दिया। सरकार के अनुसार E20 ईंधन E10 की तुलना में बेहतर पिकअप, शहरों में स्मूद ड्राइविंग और कम प्रदूषण देता है। हालाँकि चिंता अभी भी है क्योंकि अप्रैल 2023 से पहले बने वाहन मूल रूप से E20 के लिए डिजाइन नहीं थे। कई वाहन मालिक माइलेज कम होने और इंजन पार्ट्स के घिसने की आशंका जता रहे हैं जबकि सरकार का कहना है कि 2009 के बाद बने ज्यादातर वाहन मामूली बदलाव के साथ E20 चला सकते हैं।

नया आइडिया नहीं है एथेनॉल ब्लेंडिंग

एथेनॉल ब्लेंडिंग कोई नई नीति नहीं है। आज भले इसे लेकर बहस हो लेकिन कई देश दशकों से यातायात ईंधन में एथेनॉल का इस्तेमाल कर रहे हैं। ब्राजील इसका सबसे पुराना और सफल उदाहरण माना जाता है। अमेरिका, जापान और स्वीडन जैसे देशों ने भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने और प्रदूषण कम करने के लिए एथेनॉल को बढ़ावा दिया है।

ब्राजील का मॉडल इतना सफल रहा कि भारत और चीन समेत कई देशों ने अपने एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम बनाते समय उसका अध्ययन किया। ब्राजील में एथेनॉल की शुरुआत जलवायु चिंता से नहीं बल्कि तेल संकट के कारण हुई थी। पहले द्वितीय विश्व युद्ध और फिर 1970 के दशक के मध्य-पूर्व युद्ध ने तेल आपूर्ति को प्रभावित किया।

ब्राजील ने 1930 के दशक में गन्ने से बने एथेनॉल को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया। फरवरी 1931 में सरकार ने सभी आयातित पेट्रोल में 5% एथेनॉल मिलाना अनिवार्य किया। बाद में यह नियम घरेलू तेल पर भी लागू हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान तेल आपूर्ति पर खतरा बढ़ने के बाद एथेनॉल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा और एक समय ब्लेंडिंग 50% तक पहुँच गई थी।

1973 के मिडिल ईस्ट युद्ध ने कैसे बदली ब्राजील की तेल नीति

1973 के अरब-इजरायल युद्ध के बाद अरब देशों ने तेल प्रतिबंध लगाया, जिससे दुनिया भर में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं। उस समय ब्राजील अपने करीब 80% ईंधन के लिए आयात पर निर्भर था, इसलिए उसकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ा। कुछ ही महीनों में देश मंदी में चला गया और विदेशी मुद्रा कमाई का लगभग 40% हिस्सा आयातित तेल खरीदने में खर्च होने लगा।

इसके बाद ब्राजील को समझ आया कि आयातित तेल पर इतनी निर्भरता टिकाऊ नहीं है। 1975 में जनरल अर्नेस्टो गाइजल की सैन्य सरकार ने पेट्रोल में गन्ने से बने 10% एथेनॉल की मिलावट अनिवार्य कर दी। अगले पाँच वर्षों में यह अनुपात बढ़कर 25% तक पहुँच गया। इससे पेट्रोल की बचत हुई और देश के गन्ना किसानों के लिए स्थायी बाजार तैयार हुआ।

सरकार ने एथेनॉल उत्पादन के लिए कर्ज दिए और टेक्नोलॉजी व ईंधन ढाँचे में निवेश किया। वाहन कंपनियों ने भी एथेनॉल से चलने वाली गाड़ियाँ बनाईं। बाद में ब्राजील में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन आए, जिनमें चालक पेट्रोल और एथेनॉल में से सस्ता विकल्प चुन सकता था।

आज ब्राजील में शुद्ध पेट्रोल से चलने वाली हल्की गाड़ियाँ नहीं बिकतीं। वहाँ E25 यानी 25% एथेनॉल वाला पेट्रोल आम है जबकि E100 भी फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए उपलब्ध है। इन्हीं कदमों के कारण ब्राजील को दुनिया की पहली सफल ‘सस्टेनेबल’ बायोफ्यूल अर्थव्यवस्था माना गया और उसका मॉडल कई देशों के लिए उदाहरण बना।

कैसे रही है भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग की यात्रा

भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग की नीति मौजूदा सरकार से कई साल पुरानी है। RTI से मिले सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, इसका पहला औपचारिक कदम अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय उठा था। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में पायलट प्रोजेक्ट सफल रहने के बाद सितंबर 2002 में केंद्र ने नोटिफिकेशन जारी कर जनवरी 2003 से 9 राज्यों और 4 केंद्रशासित प्रदेशों में पेट्रोल में 5% एथेनॉल मिलाना अनिवार्य किया था।

इसका उद्देश्य वही था जो आज बताया जा रहा है: प्रदूषण कम करना, किसानों को फायदा देना और आयातित तेल पर निर्भरता घटाना। बाद में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान 2004 और 2006 में इस कार्यक्रम को और राज्यों तक बढ़ाया गया। 2013 में तेल कंपनियों को 10% तक एथेनॉल मिला पेट्रोल बेचने का निर्देश दिया गया, जिससे इसके देशव्यापी विस्तार की नींव पड़ी।

मोदी सरकार ने इस कार्यक्रम को तेज किया। 2019 में देश के अधिकतर हिस्सों में E10 लागू किया गया, 2021 में E100 को कानूनी मान्यता मिली और उसी साल E20 को मंजूरी दी गई। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से E20 लागू हुआ और इस साल यह देश का मानक ईंधन बन गया।

E20 पर मौजूदा बहस भले ही वाहनों की क्षमता, माइलेज और उपभोक्ताओं की चिंता पर केंद्रित हो लेकिन एथेनॉल ब्लेंडिंग का विचार न तो नया है और न ही केवल भारत तक सीमित है। ब्राजील ने करीब 5 दशक पहले तेल संकट के बाद आयातित ईंधन पर निर्भरता घटाने के लिए यह रास्ता अपनाया था। भारत भी दो दशक से ज्यादा समय पहले इसी दिशा में बढ़ना शुरू कर चुका था और अलग-अलग सरकारों ने समय के साथ इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।

अब जब भारत आने वाले वर्षों में एथेनॉल ब्लेंडिंग को और बढ़ाने की तैयारी कर रहा है, तो बहस इस बात पर नहीं रह जाती कि यह कोई नया प्रयोग है या नहीं। असली सवाल यह है कि देश ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाए जिससे कई सरकारों और पीढ़ियों में विकसित हुई इस नीति को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

लागू हुआ VB-G RAM G: जानिए- कैसे है मनरेगा से बेहतर, UP जैसे बड़े राज्यों की कैसे बदलेगी तस्वीर

देशभर में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका की सुरक्षा को लेकर एक ऐतिहासिक बदलाव लागू हो गया है। दो दशक पुराने महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा MGNREGA, 2005) की जगह पर केंद्र सरकार का नया कानून ‘विकसित भारत – रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) गारंटी अधिनियम’ यानी ‘वीबी-जी राम जी एक्ट’ (VB-G RAM G Act, 2025) 1 जुलाई 2026 से लागू हो चुका है।

इस कानून के लागू होने के साथ ही देश के ग्रामीण विकास के ढाँचे में आमूल-चूल परिवर्तन होने जा रहा है। सरकार जहाँ इसे ‘विकसित भारत @2047’ के विजन को पूरा करने और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने वाला एक क्रांतिकारी कदम बता रही है तो वहीं कॉन्ग्रेस ने इस बदलाव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कॉन्ग्रेस पुराना मनरेगा बंद किए जाने का रोना रो रही है।

कॉन्ग्रेस ने क्या कहा?

कॉन्ग्रेस के लोकसभा सांसद सप्तगिरि उलाका ने बुधवार (1 जुलाई 2014) को प्रेस कॉन्फ्रेस कर कहा कि आज एक बहुत दुखद दिन है, क्योंकि मोदी सरकार ने मनरेगा योजना को खत्म कर दिया है। कॉन्ग्रेस सांसद ने कहा, “मनरेगा को खत्म कर सरकार ने देश के तमाम गरीबों को एक झटका दिया है, क्योंकि ये ‘मांग आधारित’ रोजगार देने वाली योजना थी।”

उन्होंने कहा, “सप्लाई बेस मॉडल में केंद्र सरकार पहले एडवांस में फंड बजट आवंटित करती है और लेबर बजट मंजूर करती है। इसके तहत राज्य सरकार को पैसा और प्रशासनिक क्षमता को मैच करना पड़ेगा जिससे काम हो पाए। मनरेगा में कितने लोगों ने रोजगार माँगा है, उसके आधार पर पैसा आवंटित किया जाता था लेकिन अब VB GRAM G में एक बजट दिया जाएगा जिसमें काम खत्म करना होगा।”

केंद्र सरकार ने क्या बताया?

इस अधिनियम के देश भर में लागू होने से पहले केंद्रीय ग्रामीण विकास और कृषि व किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे ऐतिहासिक दिन बताया है। उन्होंने कहा कि कोई भी पात्र ग्रामीण श्रमिक एक भी दिन काम से वंचित न रहे, यह सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ मिलकर अधिनियम के सुचारु क्रियान्वयन के लिए सभी प्रशासनिक, वित्तीय और तकनीकी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं।

चौहान ने कहा, “पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध करा दिए गए हैं, पूरी व्यवस्था तैयार है और चल रहे सभी कार्य बिना किसी बाधा के जारी रहेंगे। रोजगार की गारंटी को 125 दिनों तक बढ़ाने से ग्रामीण परिवारों की आजीविका और मजबूत होगी, टिकाऊ सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण होगा तथा विकसित भारत के लक्ष्य को गति मिलेगी।”

इस एक्ट के ठीक से क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को ₹95,692.31 करोड़ की अंतरिम राशि पहले ही आवंटित कर दी है। इससे अधिनियम लागू होने के पहले दिन से ही रोजगार उपलब्ध कराने, समय पर मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित करने और विकास कार्यों को बिना किसी बाधा के जारी रखने में मदद मिलेगी।

सरकार ने नए ढाँचे में सीमलेस ट्रांजिशन सुनिश्चित किया है। पहले से चल रहे सभी कार्य जारी रहेंगे और जिन श्रमिकों का ई-केवाईसी पूरा हो चुका है, उनके मौजूदा जॉब कार्ड ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड जारी होने तक मान्य रहेंगे ताकि रोजगार और मजदूरी भुगतान में किसी प्रकार की रुकावट न आए।

मनरेगा VS वीबी जी राम जी: कौन जनता का हितैषी?

विपक्ष द्वारा फैलाए जा रहे बेरोजगारी के इस नैरेटिव की जब तथ्यों के साथ पड़ताल की जाती है, तो तस्वीर पूरी तरह बदली हुई नजर आती है। असल में ‘जी राम जी बिल’ के तहत ग्रामीण रोजगार की गारंटी को खत्म नहीं किया गया है बल्कि इसके दायरे और सामर्थ्य को काफी बढ़ा दिया गया है।

मनरेगा के तहत एक वित्तीय वर्ष में प्रति ग्रामीण परिवार को केवल 100 दिनों के कुशल/अकुशल रोजगार की कानूनी गारंटी मिलती थी लेकिन नए ‘वीबी-जी राम जी एक्ट’ ने इस वैधानिक गारंटी को बढ़ाकर 125 दिन कर दिया है। यानी ग्रामीण परिवारों को अब पहले की तुलना में 25 दिन अधिक सुनिश्चित रोजगार और आय की सुरक्षा मिलेगी।

एक और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य जो विपक्ष के दावों को खारिज करता है, वह है दैनिक मजदूरी दरों में की गई ऐतिहासिक वृद्धि। इस नए कानून के लागू होने के साथ ही केंद्र सरकार ने संशोधित मजदूरी दरों को अधिसूचित कर दिया है, जिसके तहत देश का राष्ट्रीय औसत वेतन बढ़कर 327.4 रुपए प्रति दिन हो गया है। अलग-अलग राज्यों के लिए यह दर 300 रुपए से लेकर 409 रुपए प्रति दिन (सिक्किम के कुछ हिस्सों में 450 रुपए) के बीच तय की गई है।

अगर गाँव का कोई पात्र मजदूर काम के लिए आवेदन करता है और उसे काम नहीं मिलता, तो कानून के तहत उसे बेरोजगारी भत्ता देना जरूरी है। यही बात इस योजना को कानूनी मजबूती देती है।

क्यों मनरेगा की जगह जरूरी थी VB-G RAM G?

साल 2005 में जब मनरेगा बना था, तब ग्रामीण भारत की आर्थिक स्थिति अलग थी। समय बदला तो देश में एक ऐसी योजना की जरूरत थी जो केवल ‘गड्ढे खोदने और भरने’ तक सीमित न रहकर ग्रामीण संपत्तियों का आधुनिकीकरण कर सके।

‘जी राम जी बिल’ इसी सोच के साथ देश में 4 मुख्य प्राथमिक कार्यक्षेत्रों (प्रायोरिटी वर्टिकल्स) पर केंद्रित है। इसमें पहला है जल सुरक्षा, जिसके तहत तालाबों का जीर्णोद्धार और भूजल रीचार्जिंग पर काम होगा। दूसरा मुख्य ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर, तीसरा आजीविका से जुड़ी संपत्तियाँ और चौथा चरम मौसमी घटनाओं (क्लाइमेट चेंज) के प्रभावों को कम करने वाले विशेष कार्य हैं।

देशव्यापी स्तर पर इसके लागू होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक बड़ा संरचनात्मक सुधार देखने को मिलेगा। पहले मनरेगा में यह शिकायत आम थी कि बुवाई और कटाई के मुख्य सीजन में जब किसानों को खेतों के लिए मजदूरों की भारी जरूरत होती थी, तब सरकारी कामों के कारण खेतों में लेबर शॉर्टेज (मजदूरों की कमी) हो जाती थी और कृषि मजदूरी में बेवजह की महँगाई आ जाती थी।

इस समस्या का समाधान करते हुए नए कानून की धारा 6 में यह प्रावधान किया गया है कि राज्य सरकारें मुख्य कृषि सीजन के दौरान इस योजना को अधिकतम 60 दिनों के लिए निलंबित या पॉज कर सकती हैं। इससे किसानों को खेती के समय आसानी से श्रमिक उपलब्ध होंगे, जिससे देश के कृषि उत्पादन और किसानों की आय में सीधे तौर पर बढ़ोतरी होगी।

इसके अलावा, योजना में पारदर्शिता लाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन का इस्तेमाल अनिवार्य किया गया है ताकि मनरेगा के दौर में होने वाले फर्जीवाड़े, घोस्ट बेनेफिशियरी (फर्जी श्रमिक) और करोड़ों रुपयों के फंड मिसएप्रोप्रिएशन (वित्तीय अनियमितताओं) को पूरी तरह से रोका जा सके। डिजिटल अटेंडेंस और सीधे बैंक खातों में आधार-लिंक्ड भुगतान प्रणाली से मजदूरी की चोरी रुकना देश के करोड़ों ईमानदार श्रमिकों के हित में है।

UP को VB-G RAM G से होंगे क्या फायदे?

VB-G RAM G कानून का उत्तर प्रदेश के लिए बड़ा फायदा इसलिए है, क्योंकि राज्य की बड़ी आबादी गाँवों में रहती है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, यूपी की 77.73% आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। ऐसे में ग्रामीण रोजगार से जुड़ा कोई भी कानून सीधे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी और आजीविका के लिए फायदे वाला होता है।

मजदूरों की कमाई बढ़ेगी

इस कानून से उत्तर प्रदेश के ग्रामीण मजदूरों की दैनिक कमाई बढ़ेगी। नए प्रावधानों के तहत यूपी में मजदूरों को ₹300 प्रति दिन की न्यूनतम मजदूरी मिलेगी। साथ ही पुराने मनरेगा में जहाँ 100 दिन का रोजगार मिलता था, वहीं अब 125 दिन का सुनिश्चित रोजगार दिया जाएगा। इससे ग्रामीण परिवारों की सालाना आय बढ़ेगी और गाँवों में आर्थिक मजबूती आएगी।

बुंदेलखंड जैसे सूखे इलाकों को राहत

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड जैसे पठारी और सूखे इलाकों में पानी की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। VB-G RAM G कानून में जल सुरक्षा को पहली प्राथमिकता दी गई है। इसके तहत गाँवों में तालाबों को गहरा करने, नए चेकडैम बनाने और वर्षा जल संचयन जैसे काम वैज्ञानिक तरीके से किए जाएँगे। इससे सूखे क्षेत्रों में भूजल स्तर सुधारने में मदद मिलेगी।

UP को सबसे ज्यादा आवंटन

इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश को सबसे बड़ा अंतरिम आवंटन मिला है। रिपोर्ट के अनुसार केंद्र ने VB-G RAM G के लिए ₹95,692.31 करोड़ की अंतरिम राशि रखी है जिसमें यूपी को सबसे ज्यादा ₹9,721.48 करोड़ मिले हैं। इससे राज्य में मजदूरी भुगतान, नए काम शुरू करने और पुराने ग्रामीण विकास कार्यों को बिना रुकावट आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

कुल मिलाकर VB-G RAM G कानून को ग्रामीण भारत और खासकर उत्तर प्रदेश के लिए एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। इस कानून से गाँवों में रहने वाले गरीब और श्रमिक परिवारों को ज्यादा दिनों का रोजगार, बेहतर मजदूरी और समय पर भुगतान मिलने की उम्मीद है। साथ ही जल सुरक्षा, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर और आजीविका से जुड़े कामों पर जोर देने से गाँवों में स्थायी विकास की राह मजबूत होगी।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और ग्रामीण आबादी वाले राज्य के लिए यह कानून सिर्फ रोजगार देने वाली योजना नहीं बल्कि गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने का अवसर भी साबित हो सकता है। बुंदेलखंड जैसे सूखे इलाकों में पानी से जुड़े काम, मजदूरों की बढ़ी हुई कमाई और सबसे बड़े आवंटन के कारण यूपी को इसका सीधा लाभ मिलेगा।