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कौन हैं अल्लूरी सीताराम राजू, जिनके नाम पर आंध्र में PM मोदी ने किया एयरपोर्ट का उद्घाटन: अंग्रेजों को हमले की तारीख पहले बताते थे, फिर भी नहीं रोक पाती थी ब्रिटिश फौज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (1 अगस्त 2026) को आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले के भोगपुरम में अनेक महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। इस अवसर पर पीएम मोदी ने भोगपुरम में निर्मित अत्याधुनिक अल्लूरी सीताराम राजू अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के विशाल और आधुनिक पैसेंजर टर्मिनल भवन का औपचारिक उद्घाटन किया।

इसके साथ ही उन्होंने 17,900 करोड़ रुपए से अधिक की विभिन्न विकास परियोजनाओं को राष्ट्र को समर्पित किया। प्रधानमंत्री का यह दौरा केवल एक हवाई अड्डे के उद्घाटन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह राज्य में आधुनिक बुनियादी ढाँचे का विस्तार करने की दिशा में उठाया गया दूरगामी कदम है।

इस पूरे आयोजन ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान और अमर जनजातीय नायक अल्लूरी सीताराम राजू के बलिदान को एक राष्ट्रीय स्तर का सम्मान भी प्रदान किया है, जिनके नाम पर इस आधुनिक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नामकरण किया गया है।

जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “हमने अयोध्या में एयरपोर्ट का नाम वाल्मीकि के नाम से जोड़ा। हमने पंजाब में संत रविदास जी के नाम से एयरपोर्ट का नाम जोड़ा और केंद्र की NDA सरकार ने ये निर्णय किया है कि इस नए एयरपोर्ट का नाम श्री अल्लूरी सीताराम राजू के नाम पर होगा।”

आंध्र प्रदेश को मिली विकास परियोजनाओं की ऐतिहासिक सौगात

प्रधानमंत्री के इस ऐतिहासिक दौरे से आंध्र प्रदेश के इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक परिदृश्य को भी मजबूती मिली है। भोगपुरम में ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे का उद्घाटन करने के साथ-साथ पीएम ने राज्य में प्रौद्योगिकी और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी कई बड़ी परियोजनाओं की आधारशिला रखी और कई पूर्ण हो चुकी परियोजनाओं का लोकार्पण किया।

इनमें सबसे प्रमुख परियोजनाओं में से एक विशाखापत्तनम में 460 करोड़ रुपए से अधिक के भारी निवेश से स्थापित की जा रही राज्य की पहली सेमीकंडक्टर विनिर्माण सुविधा (ASIP Semiconductor Project) की आधारशिला रखना है।

इस अत्याधुनिक संयंत्र का विकास ASIP टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दक्षिण कोरिया की प्रतिष्ठित कंपनी APACT के साथ साझेदारी में किया जा रहा है। भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत स्वीकृत यह संयंत्र प्रतिवर्ष लगभग 96 मिलियन सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन करेगा, जो भारत की इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण आत्मनिर्भरता को बल देगा।

इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री ने कुरनूल-IV नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के एकीकरण के लिए 4.5 गीगावाट की क्षमता वाली ट्रांसमिशन प्रणाली की आधारशिला रखी, जिसका कार्यान्वयन पावरग्रिड द्वारा लगभग 5,550 करोड़ रुपए के निवेश से किया जा रहा है।

इसके साथ ही लगभग 3,550 करोड़ रुपए की लागत से विकसित कुरनूल पवन व सौर ऊर्जा क्षेत्र तथा 820 करोड़ रुपए से अधिक की लागत से निर्मित अनंतपुरम और कुरनूल सौर ऊर्जा क्षेत्रों के लिए ट्रांसमिशन योजनाओं का भी उद्घाटन किया गया।

ये विशाल ट्रांसमिशन लाइनें आंध्र प्रदेश के दूरदराज क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाली विशाल हरित और स्वच्छ बिजली को सीधे राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ेंगी, जिससे देश भर के माँग केंद्रों तक स्वच्छ ऊर्जा पहुँचेगी और भारत के कार्बन उत्सर्जन कम करने के वैश्विक संकल्प को एक नई दिशा और गति मिलेगी।

भोगपुरम हवाई अड्डे की अत्याधुनिक तकनीक और सुविधाएँ

सार्वजनिक-निजी भागीदारी यानी PPP मॉडल के तहत 5,640 करोड़ रुपए से भी अधिक की लागत से बना भोगपुरम का यह नया ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा आधुनिक तकनीक का एक बेहतरीन नमूना है। शुरुआत में इस हवाई अड्डे को हर साल 60 लाख यात्रियों की आवाजाही को आसानी से संभालने के हिसाब से तैयार किया गया है।

भविष्य में जैसे-जैसे यात्रियों की संख्या बढ़ेगी, इसे और बड़ा किया जा सकेगा। इस हवाई अड्डे के पैसेंजर टर्मिनल भवन को इस तरह से बनाया गया है कि यहाँ आने वाले हर यात्री को एक बेहद आसान, तेज और आरामदायक यात्रा का अनुभव मिले।

हवाई अड्डे के काम-काज को बेहतर और तेज बनाने के लिए यहाँ कई आधुनिक डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिल्डिंग इंफॉर्मेशन मॉडलिंग, एयरसाइड 4.0 तकनीक और एयरपोर्ट प्रेडिक्टिव ऑपरेशंस सेंटर जैसी प्रणालियाँ शामिल हैं।

यात्रियों को लंबी लाइनों से बचाने और उनकी सुरक्षा के लिए चेहरे की पहचान वाली बायोमेट्रिक एंट्री यानी डिजियात्रा सिस्टम, अपने आप बैग संभालने वाला ऑटोमेटेड बैगेज सिस्टम और स्मार्ट मॉनिटरिंग सिस्टम लगाए गए हैं। तकनीक के साथ-साथ यह हवाई अड्डा पर्यावरण का ध्यान रखने में भी बहुत आगे है।

इसे हरित भवन यानी ग्रीन बिल्डिंग के मानकों के अनुसार डिजाइन किया गया है और यह यूएस ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल में रजिस्टर्ड है। हवाई अड्डा परिसर की बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए यहाँ 5 मेगावाट का एक बड़ा सौर ऊर्जा प्लांट लगाया गया है।

इसके अलावा कम बिजली खर्च करने वाले कूलिंग सिस्टम, स्मार्ट लाइटिंग, बारिश के पानी को बचाने का सिस्टम, गंदे पानी को साफ करके दोबारा इस्तेमाल करने की सुविधा और इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए चार्जिंग स्टेशन बनाए गए हैं, जो इसे देश के सबसे पर्यावरण-अनुकूल हवाई अड्डों में से एक बनाते हैं।

स्थानीय संस्कृति, प्रकृति और वास्तुकला का अनूठा संगम

भोगपुरम में बने अल्लूरी सीताराम राजू अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का डिजाइन सिर्फ काँच और कंक्रीट से बनी कोई साधारण इमारत नहीं है बल्कि इसमें आंध्र प्रदेश की पुरानी संस्कृति, लोक कला और प्रकृति की सुंदर झलक देखने को मिलती है।

इस हवाई अड्डे के पैसेंजर टर्मिनल भवन को इस तरह से बनाया गया है कि यहाँ आते ही लोगों को आंध्र प्रदेश की पहचान और खूबसूरती का अहसास हो जाए। इस इमारत की छत की बनावट आंध्र प्रदेश के तटीय गाँवों में पाई जाने वाली पुरानी गोल झोपड़ियों यानी ‘चुट्टिलू’ की शैली से ली गई है, जो हमारी लोक कला को एक बड़े मंच पर दिखाती है।

इसके अलावा छत का घूमता हुआ और लहरदार डिजाइन पास में मौजूद खूबसूरत अरकु घाटी की पहाड़ियों और हरे-भरे नजारों की याद दिलाता है। इस पूरी इमारत का आकार पानी के ऊपर हवा में छलांग लगाती हुई ‘उड़ती हुई मछली’ यानी फ्लाइंग फिश की सुंदर चाल से प्रेरित है।

आधुनिक तकनीक और अपनी पुरानी संस्कृति के इस अनोखे तालमेल ने भोगपुरम हवाई अड्डे को सिर्फ एक एयरपोर्ट नहीं, बल्कि पूरे आंध्र प्रदेश की कला और पहचान का एक बड़ा और सुंदर प्रतीक बना दिया है, जो यहाँ आने वाले हर यात्री का मन मोह लेता है।

स्वतंत्रता संग्राम के अमर नायक अल्लूरी सीताराम राजू का ऐतिहासिक योगदान

इस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नामकरण जिस महान विभूति के नाम पर किया गया है, वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अमर नायक अल्लूरी सीताराम राजू हैं। 4 जुलाई 1897 को जन्मे अल्लूरी सीताराम राजू ने अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों के खिलाफ आंध्र प्रदेश के जंगलों और पहाड़ियों में क्रांति का अलख जगाया था।

जब ब्रिटिश सरकार ने 1882 में ‘मद्रास फॉरेस्ट एक्ट’ लागू करके जनजातीयों के जंगलों में रहने, खेती करने और लघु वन उपज इकट्ठा करने के सदियों पुराने पारंपरिक अधिकारों को छीन लिया, तब अल्लूरी सीताराम राजू जनजातीयों के मसीहा बनकर उभरे।

उन्होंने स्थानीय जनजातियों को संगठित किया और उनके हक की लड़ाई लड़ी। रंपा और मान्यम क्षेत्र के जनजातीय उनसे इतना प्रेम और सम्मान करते थे कि वे उन्हें श्रद्धापूर्वक ‘मान्यम वीरुडु’ यानी ‘जंगलों का नायक’ कहकर पुकारते थे।

रंपा विद्रोह और अंग्रेजों के खिलाफ अनोखा गोरिल्ला युद्ध

वर्ष 1922 से 1924 के बीच लड़ा गया ऐतिहासिक रंपा विद्रोह अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का एक स्वर्ण अध्याय है। विशाल ब्रिटिश सेना और उनके आधुनिक हथियारों का मुकाबला करने के लिए राजू और उनके जनजातीय साथियों ने आंध्र के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों का सहारा लेते हुए गोरिल्ला युद्ध नीति अपनाई।

उन्होंने पारंपरिक धनुष-बाण, भालों और सीमित संसाधनों के बल पर अंग्रेजी सेना के पसीने छुड़ा दिए। अल्लूरी सीताराम राजू की एक बेहद अनोखी और साहसी कार्यशैली यह थी कि वे जिस किसी ब्रिटिश पुलिस स्टेशन पर हमला कर हथियार जब्त करने वाले होते थे, वहाँ पहले से एक लिखित पत्र भेजकर हमले की तारीख और समय की अग्रिम चेतावनी देते थे।

इसके बावजूद अंग्रेज अफसर उन्हें रोक पाने में नाकाम रहते थे। लगभग दो वर्षों तक अल्लूरी सीताराम राजू ने मुट्ठी भर जनजातीय वीरों के साथ मिलकर शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य की पुलिस और असम राइफल्स जैसी प्रशिक्षित सैन्य टुकड़ियों को नाकों चने चबवा दिए।

अंततः मई 1924 में एक विश्वासघात के परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और 7 मई 1924 को कोय्यूरू के जंगलों में एक पेड़ से बाँधकर बिना किसी मुकदमे के गोली मार दी। मात्र 27 वर्ष की अल्पायु में अल्लूरी सीताराम राजू ने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

भारतीय सिनेमा और ‘RRR’ के माध्यम से अल्लूरी सीताराम राजू को मिली वैश्विक पहचान

भारत के जाने-माने फिल्म निर्देशक एस एस राजामौली द्वारा निर्देशित बहुचर्चित, विश्वविख्यात और ऑस्कर पुरस्कार विजेता फिल्म ‘RRR’ (2022) मुख्य रूप से दो महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों- अल्लूरी सीताराम राजू और कोमाराम भीम के जीवन, उनके महान चरित्रों और उनके एक काल्पनिक ऐतिहासिक मिलन की पृष्ठभूमि पर ही रची गई है।

इस भव्य और महाकाव्यीय फिल्म में दक्षिण भारतीय सिनेमा के शीर्ष अभिनेता राम चरण ने अल्लूरी सीताराम राजू की ओजस्वी भूमिका को पर्दे पर जीवंत किया, जबकि अभिनेता जूनियर एनटीआर ने कोमाराम भीम के जुझारू और निष्छल चरित्र को बेहद सशक्त रूप से चित्रित किया।

इस फिल्म ने अल्लूरी सीताराम राजू के असीम त्याग, उनकी बेजोड़ तीरंदाजी व युद्ध कला, उनके महान चरित्र और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ उनके प्रचंड विद्रोह की भावना को बेहद भव्य और भावनात्मक रूप से पर्दे पर उकेरा।

इस फिल्म के विश्वव्यापी प्रदर्शन और ऐतिहासिक सफलता ने केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका, जापान, यूरोप और दुनिया के कोने-कोने में रहने वाले करोड़ों लोगों को अल्लूरी सीताराम राजू और भारत के जनजातीय स्वाधीनता संग्राम के इस महान इतिहास से परिचित कराया है।

नेपाल में इस्लामी कट्टरपंथियों ने काँवड़ियों पर किया हमला, पुलिस फायरिंग में गई 3 की जान: वामी मीडिया ने ‘झड़प’ बता हिंसा पर किया ‘वाइटवॉश’, जानिए कैसे झुकी बालेन सरकार Exclusive

​नेपाल, जिसे कभी दुनिया के शांत और सहिष्णु हिंदू राष्ट्र के रूप में जाना जाता था, आज इस्लामी कट्टरपंथ और जनसांख्यिकीय असंतुलन (डेमोग्राफी चेंज) के भयंकर संकट से जूझ रहा है। इस वर्ष नेपाल में पवित्र सावन मास का शुभारंभ 17 जुलाई 2026 से हुआ। सावन चढ़ते ही नेपाल की तराई से लेकर पहाड़ियों तक ‘बम-बम भोले’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष गूँजने लगे। लाखों सनातनी श्रद्धालु शिवभक्ति के उल्लास में काँवड़ लेकर बाबा भोलेनाथ के जलाभिषेक के लिए निकलने लगे।

लेकिन नेपाल के सुनसरी जिले के कप्तानगंज में काँवड़ियों पर हमले की जो रिपोर्ट्स सामने आई, उसने यह साफ कर दिया कि भारत की तरह नेपाल में भी सनातनी त्योहार और धार्मिक यात्राएँ इस्लामी कट्टरपंथियों की आँखों में खटकने लगी हैं। 26 जुलाई 2026 की रात काँवड़ियों पर हुआ जानलेवा हमला कोई अचानक हुआ हादसा या दो गुटों की मामूली कहासुनी नहीं था, बल्कि यह नेपाल की बदली डेमोग्राफी का नतीजा है।

स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक, हिंदुओं की जान जाने के बाद नेपाल के सनातनी समाज ने अपनी चुप्पी तोड़ी। जनकपुर, विराटनगर से लेकर चितवन तक जिस तरह से हिंदू सड़कों पर उतरे और विरोध का परचम लहराया, उससे बालेन सरकार की चूलें हिल गईं। सरकार को न सिर्फ बैकफुट पर आना पड़ा, बल्कि पूरे इलाके में कर्फ्यू लगाना पड़ा।

हालाँकि बताया ये भी जा रहा है कि बाद की हिंसा में भी कम से कम 2 अन्य यानी 4 लोगों की मौत हुई है, लेकिन सरकार की तरफ से 2 ही मौतों की पुष्टि हुई है, क्योंकि समझौते भी 2 ही मृतकों के परिजनों के साथ हुए हैं। इस दौरान 15 साल के गणेश यादव की भी मौत की जानकारी मीडिया में सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स में ये दावा किया जा रहा है कि ये जानें पुलिस की गोलियों से गई हैं और नेपाल सरकार भी इसी तरह के दावे कर रही है।

इस खास रिपोर्ट में हम बता रहे हैं कि कैसे नेपाल की बदलती डेमोग्राफी, वामपंथी मीडिया और इसके पीछे सक्रिय अंतरराष्ट्रीय साजिशों ने कभी हिंदू राष्ट्र रहे नेपाल में अब हिंदुओं को ही असुरक्षित बना दिया है। इस खास रिपोर्ट के लिए ऑपइंडिया के पत्रकार श्रवण शुक्ल ने नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार आचार्य डिल्ली से भी बातचीत की है।

​जानिए 26 जुलाई की हिंसा की पूरी क्रोनोलॉजी

​नेपाल के सुनसरी जिले में 26 जुलाई की रात जो घिनौना और खूनी खेल खेला गया, उसकी तैयारी कट्टरपंथियों द्वारा पहले ही कर ली गई थी। सोमवार की सुबह सनातनी काँवड़ियों को भगवान शिव का जलाभिषेक करना था।

इसके लिए श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ रात करीब 12 बजे ही अपने-अपने घरों से निकलने लगे थे। हाथों में जल, काँवड़, ढोल-डीजे और मुख में भगवान शिव का नाम पूरा माहौल भक्तिमय था।

काँवड़िये अपनी धुन में ‘बम-बम भोले’ की हुंकार भरते हुए शांतिपूर्वक अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। तभी मुस्लिम बाहुल्य इलाके के पास घात लगाकर बैठे इस्लामी कट्टरपंथियों की उग्र भीड़ ने काँवड़ियों के जत्थे को घेर लिया।

कट्टरपंथियों ने यह कुतर्क देते हुए विवाद शुरू किया ‘तुम लोग हमारी तरफ से क्यों गुजर रहे हो? यहाँ DJ और जयकारे क्यों लगा रहे हो?’ इससे पहले कि निर्दोष और निहत्थे काँवड़िये कुछ समझ पाते, उपद्रवियों ने लाठी-डंडों, धारदार हथियारों और पत्थरों से हमला बोल दिया।

इस सुनियोजित हमले का सबसे खतरनाक और रणनीतिक पहलू यह था कि हिंसा शुरू होते ही पूरे इलाके की बिजली काट दी गई। गहरे अंधेरे का फायदा उठाकर इस्लामी भीड़ ने काँवड़ियों को बर्बरता से पीटना और काटना शुरू कर दिया।

हमले के काफी देर बाद पुलिस मौके पर पहुँची, लेकिन तब तक हमलावर अंधेरे में फरार हो चुके थे। नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार आचार्य डिल्ली का स्पष्ट दावा है कि इस खूनी हिंसा में मुस्लिम पक्ष के किसी भी व्यक्ति को खरोंच तक नहीं आई।

हिंसा का शिकार पूरी तरह से सनातनी हिंदू हुए। इस हमले में पटेल और मेहता समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया। इस हमले में दर्जनों काँवड़िये गंभीर रूप से घायल हो गए। यह सीधी और एकतरफा हिंसा थी। इस हमले के बाद पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा, जिसमें पुलिस की गोलीबारी में 2 हिंदुओं की मौत हो गई।

​सनातनी प्रतिरोध से थर्राया नेपाल: सड़कों पर उतरा हिंदू समाज, बैकफुट पर बालेन सरकार

​सुनसरी में सनातनी आस्था पर हुए इस बर्बर हमले के बाद पूरे नेपाल का वातावरण गरमा गया। दशकों से सहने और चुप रहने की नीति पर चल रहे नेपाल के हिंदू समाज का सब्र का बाँध इस बार टूट गया। हिंसा की खबर फैलते ही जनकपुर में हजारों की संख्या में हिंदू सड़कों पर उतर आए।

माता सीता की इस पावन भूमि पर सनातनियों ने अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए विरोध जताया। विराटनगर में हिंदुओं ने विशाल रैलियाँ निकालीं और हत्यारों की तत्काल गिरफ्तारी की माँग की।

चितवन जिले में स्थानीय हिंदू संगठनों और आम जनता ने ऐतिहासिक बंद का आह्वान किया, जिसके चलते पूरा इलाका ठप्प हो गया। व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहे, सड़कों पर चक्का जाम हो गया और हर तरफ सिर्फ एक ही माँग गूँज रही थी, सनातनियों के कातिलों को फाँसी दो और कट्टरपंथ को संरक्षण देना बंद करो।

नेपाल के इतिहास में यह पहला मौका था जब हिंदुओं ने इस स्तर पर संगठित होकर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया। इस अभूतपूर्व जनाक्रोश और सनातनी एकजुटता को देखकर काठमांडू में बैठी बालेन सरकार और प्रशासन का पसीना छूट गया।

बालेन शाह की सरकार जो अब तक इस तरह के मामलों में ढुलमुल रवैया अपनाती रही थी, उसे तुरंत बैकफुट पर आना पड़ा। स्थिति को हाथ से निकलता देख सुनसरी और आसपास के कई संवेदनशील इलाकों में आनन-फानन में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लागू करना पड़ा।

भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की गई। सनातनियों के इस प्रचंड आक्रोश ने बालेन सरकार को यह सख्त संदेश दे दिया कि अब नेपाल का हिंदू अपने खून का हिसाब माँगेगा और चुपचाप जुल्म नहीं सहेगा।

बालेन शाह सरकार ने 7 सूत्रीय समझौते के तहत हिंसा में मारे गए 2 हिंदुओं को शहीद यानी बलिदानी घोषित किया। उनके परिजनों को सरकारी नौकरी के साथ 10-10 लाख नेपाली रुपए का मुआजवा घोषित किया। इसके अलावा साथ ही हिंसा में घायल हुए हिंदुओं को 2-2 लाख रुपए की भी आर्थिक मदद की घोषणा की।

इस मामले में बालेन शाह सरकार की गृह मंत्रालय को सीधा हस्तक्षेप करना पड़ा। गुरुवार (30 जुलाई 2026) की देर रात गृह मंत्री सुदन गुरुङ की मौजूदगी में ओमप्रकाश मेहता और जयप्रकाश मेहता के परिजनों के साथ यह समझौता हुआ।

नेपाल सरकार और मृतकों के परिजनों के बीच लिखित समझौते की कॉपी (फोटो साभार: AAJ TAK)

समझौते का एक अहम बिंदु देवानगंज स्थित मदरसे की जाँच भी है। सरकार ने मदरसे की कानूनी स्थिति की तत्काल जाँच शुरू करने और वहाँ मौजूद किसी भी दोषी व्यक्ति को कानून के दायरे में लाने की प्रतिबद्धता जताई है। इसके साथ ही यह भी तय हुआ कि स्थानीय सरकार के सहयोग से घटना स्थल के आसपास मृतकों की स्मृति में एक स्मारक पार्क बनाया जाएगा।

इस समझौते के बाद शुक्रवार को मारे गए दोनों हिंदुओं के शव परिजनों को सौंपे गए और उनका अंतिम संस्कार हो सका। पर इन मीडिया रिपोर्ट्स में कहीं नहीं बताया गया कि ये हिंसा सांप्रदायिक थी और इस्लामी कट्टरपंथियों के हमलों में हिंदुओं की जान गई, बल्कि कहा गया कि ये हत्याएँ पुलिस ने की।

नेपाली मीडिया का घिनौना चेहरा आया सामने

​नेपाल में जब भी कोई इस्लामी हिंसा होती है, तो उसके पीछे सिर्फ कट्टरपंथियों की ताकत नहीं होती, बल्कि वहाँ के बिके हुए और हिंदू विरोधी मीडिया का एक बहुत बड़ा सुरक्षा कवच होता है।

ऑपइंडिया से बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार आचार्य डिल्ली ने नेपाल के मुख्यधारा के मीडिया का ऐसा सच उजागर किया है, जो रोंगटे खड़े कर देने वाला है। आचार्य डिल्ली ने बताया कि नेपाल के लगभग 80 प्रतिशत पत्रकार, संपादक और साहित्यकार वैचारिक रूप से घोर वामपंथी और हिंदू विरोधी हैं।

यह वामपंथी इकोसिस्टम पूरी तरह से इस्लामी कट्टरपंथियों के बचाव में खड़ा रहता है। भारत के लिबरल और वामपंथी मीडिया की तर्ज पर नेपाल का मीडिया भी सनातन धर्म को बदनाम करने के लिए हिंदू आतंकवाद और उग्रवादी हिंदू जैसे मनगढ़ंत और घिनौने शब्दों का इस्तेमाल खुलेआम करता है।

जब सुनसरी में काँवड़ियों पर एकतरफा हमला हुआ, 3 हिंदू मारे गए और बिजली काटकर कत्लेआम किया गया, तब भी नेपाल के इस वामपंथी मीडिया ने हमलावरों का नाम तक छापने से परहेज किया।

स्थानीय मीडिया ने अपनी रिपोर्टिंग में इस जघन्य हत्याकांड को दो समुदायों के बीच मामूली झड़प बताकर पेश किया। यह वामपंथी मीडिया का वह पुराना पैंतरा है, जिसके जरिए इस्लामी हिंसा पर वाइटवॉश पोती जाती है। नेपाल के नेता भी ऐसे ही करते आ रहे हैं।

अपराधियों और जिहादियों के मुस्लिम नामों को छिपा दिया जाता है और पूरी कहानी को ऐसा बना दिया जाता है जैसे गलती हिंदुओं की ही थी जो वे वहाँ से गुजर रहे थे। नेपाल का यह वामपंथी गैंग पत्रकारिता के नाम पर इस्लामी कट्टरपंथ के एजेंडे को खाद-पानी देने का काम कर रहा है।

​नेपाल में मुसलमानों का इतिहास: 1825 से 2017 तक, कैसे चार चरणों में बदली आबादी

​नेपाल में अचानक इस्लामी कट्टरपंथ का यह तूफान कहाँ से आया, इसे समझने के लिए नेपाल में मुस्लिम आबादी के आगमन और उनकी जनसांख्यिकी के इतिहास को समझना बेहद जरूरी है। आचार्य डिल्ली ने ऑपइंडिया के श्रवण शुक्ला को नेपाल में मुसलमानों के बसने की पूरी क्रोनोलॉजी चरणबद्ध तरीके से समझाई।

नेपाल में मुसलमानों का आगमन मुख्यतः चार ऐतिहासिक चरणों में हुआ। पहला चरण 1825 के आसपास का था जब नेपाल का एकीकरण हुआ और उस दौरान वाराणसी से कुछ मुस्लिम कारीगरों व व्यवसायियों को नेपाल लाया गया।

इसी कालखंड में जब तत्कालीन राजा कृष्णा महाराज ने वाराणसी में विवाह किया, तो उनके साथ भी कुछ मुस्लिम सेवक और नागरिक नेपाल आकर बसे, जो उस समय बेहद सीमित और शांत आबादी थी। दूसरा चरण 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय आया जब अंग्रेजों ने लखनऊ पर कब्जा किया और अवध की बेगम हज़रत महल भागकर नेपाल की शरण में गईं।

उनके साथ बड़ी संख्या में उनके समर्थक और मुस्लिम नेपाल की सीमा में दाखिल हुए और तराई के इलाकों में बस गए। तीसरा चरण 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय का था जब सीमावर्ती जिलों के लोग नेपाल में जाकर बस गए।

चौथा और सबसे खतरनाक चरण 2017 के बाद देखा गया जब उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभाली और अपराधियों तथा कट्टरपंथियों पर नकेल कसी गई, जिससे डरकर यूपी के सीमावर्ती जिलों से भागकर सैकड़ों संदिग्ध तत्व नेपाल की खुली सीमा का फायदा उठाकर वहाँ छुप गए। इस चरण की शुरुआत रोहिंग्या की एंट्री से ही शुरू हो गई थी, लेकिन यूपी में योगी सरकार आने के बाद घुसपैठियों का भारत से नेपाल पलायन तेज हो गया और अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता जाने के बाद इस्लामी भीड़ बड़ी-बड़ झुंडों में नेपाल में घुसपैठ करने लगी।

इन चार चरणों के बाद और विशेष रूप से नेपाल में राजशाही के अंत के बाद स्थिति पूरी तरह से बिगड़ गई। लोकतंत्र की आड़ में नेपाल में मुस्लिम आयोग का गठन किया गया और उसे संवैधानिक दर्जा दे दिया गया, जिसके बाद से नेपाल में इस्लामी गतिविधियों और कट्टरपंथ को कानूनी व राजनीतिक ढाल मिल गई।

​बिहार से सटे जिलों में ओवैसी का प्रभाव, रोहिंग्या-बांग्लादेशी घुसपैठ और नकली दस्तावेजों का खेल

​भारत और नेपाल की सीमा खुली होने का सबसे बड़ा खामियाजा आज नेपाल के सीमावर्ती जिलों को भुगतना पड़ रहा है। बिहार से सटे नेपाल के जिलों जैसे सुनसरी, मोरंग, पर्सा, बारा और रौतहट में मुस्लिम आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है।

इस इलाके में भारत के कट्टरपंथी नेता असदुद्दीन ओवैसी की विचारधारा का प्रभाव तेजी से बढ़ा है और स्थानीय इस्लामी तत्व उसी आक्रामक राजनीति का अनुसरण कर रहे हैं। इससे भी ज्यादा भयावह बात रोहिंग्याओं और अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों का नेपाल में जमघट है।

आचार्य डिल्ली ने खुलासा किया कि जब से पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के शासन के दौरान जनसांख्यिकी बदली, तब से बांग्लादेशी और रोहिंग्या भारत के रास्ते नेपाल में घुसपैठ कर रहे हैं और वर्ष 2011 के बाद से इनकी संख्या में हजारों का इजाफा हुआ है।

इस पूरे खेल के पीछे भारत और नेपाल के एजेंटों का एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा है, जो फर्जीवाड़ा करके पहले इन घुसपैठियों के भारत के जाली आधार कार्ड और वोटर ID बनाता है, फिर नेपाल की खुली सीमा पार कराकर स्थानीय राजनीतिक आकाओं की मदद से उनके नेपाली नागरिकता के कागजात और पासपोर्ट तक बनवा देता है।

चिंता की बात यह है कि ये रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिये अब केवल तराई तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नेपाल के शांत और संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में भी अपनी जगह बना रहे हैं।

​सऊदी-कतर की फंडिंग, 25 मस्जिद-मदरसे और कतरी शेख का राज: सांसद अमरेश सिंह का बड़ा खुलासा

​नेपाल में अचानक उग आई हजारों नई मस्जिदें और आलीशान मदरसे इस बात का सबूत हैं कि यह सब बिना बेहिसाब पैसे के संभव नहीं है। नेपाल में इस कट्टरपंथ के आर्थिक ताने-बाने का पर्दाफाश नेपाल के निर्भीक सांसद डॉ अमरेश कुमार सिंह ने किया था। उन्होंने नेपाल की संसद में पूरे 5 बार इस गंभीर मुद्दे को उठाया है कि कैसे विदेशी पैसा नेपाल की राष्ट्रीय सुरक्षा को खोखला कर रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार आचार्य डिल्ली ने बताया, “सांसद अमरेश सिंह ने संसद में कहा था कि जब कतर का एक शेख नेपाल के दौरे पर आया था, तो उसका असली मकसद निवेश नहीं बल्कि सीधे तौर पर 25 नई मस्जिदों और 25 बड़े मदरसों की स्थापना करना था और वह बांग्लादेश के रास्ते नेपाल पहुँचा था। जब कतर के इस गुप्त एजेंडे की जानकारी भारत की खुफिया एजेंसियों को मिली, तो भारत सरकार ने तत्काल इस पर अत्यंत कड़ा ऐतराज जताया, जिसके बाद कतरी शेख को वापस लौटना पड़ा।”

इसके अलावा आचार्य डिल्ली और स्थानीय सूत्रों का कहना है कि सऊदी अरब और कतर जैसे खाड़ी देशों से हर महीने नेपाल के सीमाई इलाकों में बेहिसाब फंडिंग आ रही है, जिसका इस्तेमाल मस्जिद-मदरसे बनाने, स्थानीय गरीब आबादी का धर्मांतरण कराने और सनातनी परंपराओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।

​नेपाल के अस्तित्व पर मँडराता संकट और भारत के लिए चेतावनी

​सुनसरी में सावन के महीने में काँवड़ियों पर हुआ हमला कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह उस बड़े चक्रव्यूह की एक कड़ी है जो नेपाल को एक शांत हिंदू बहुल देश से कट्टरपंथी वामपंथी-इस्लामी प्रयोगशाला में बदलने के लिए रचा जा रहा है।

17 जुलाई 2026 से शुरू हुए इस पावन महीने में जब सनातनी अपने ईश्वर की आराधना कर रहे थे, तब उन्हें अपनी जान गँवानी पड़ी। 3 सनातनी भाइयों का बलिदान, वामपंथी मीडिया का पक्षपाती रवैया, रोहिंग्याओं की अनियंत्रित घुसपैठ और खाड़ी देशों की पेट्रो-डॉलर फंडिंग यह बताने के लिए काफी है कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है।

हालाँकि इस पूरे काले अध्याय में उम्मीद की एकमात्र किरण नेपाल के सनातनियों का अप्रत्याशित जागरण है। जनकपुर, विराटनगर और चितवन में हिंदुओं ने जिस तरह से अपनी एकजुटता दिखाई और बालेन सरकार को बैकफुट पर धकेला, उसने यह साबित कर दिया है कि नेपाल की आत्मा अभी मरी नहीं है।

नेपाल सरकार को यह समझना होगा कि तुष्टिकरण और वामपंथी दबाव में आकर कट्टरपंथियों को दी जा रही ढील अंततः नेपाल की अपनी संप्रभुता को निगल जाएगी। वहीं भारत के लिए भी यह एक बहुत बड़ा चेतावनी संकेत है कि नेपाल की खुली सीमा का इस्तेमाल करके रचा जा रहा यह डेमोग्राफिक चेंज भारत के सीमावर्ती राज्यों की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है।

जिस पियरे-हेनरी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारत के राफेल गिरने का फैलाया झूठ, वो निकला चीनी जासूस: फ्रांस में गिरफ्तार हुआ पूर्व पायलट, राहुल गाँधी समेत विपक्ष ने माना था इसका प्रोपेगेंडा

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल को लेकर झूठ फैलाने वाला फ्रेंच एयरफोर्स का पूर्व पायलट पियरे-हेनरी शुए (Pierre-Henri Chuet) को गिरफ्तार कर लिया गया है। उसने ही दावा किया था कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के वक्त भारत का राफेल गिरा था।

दरअसल यह पाकिस्तान-चीन के युद्ध रणनीति का हिस्सा था, क्योंकि ये दावा किया गया था राफेल विमान को पाकिस्तान द्वारा इस्तेमाल किए गए चीनी विमान ने मार गिराया है। इसमें चीन ने उसका साथ दिया और उसके लिए जासूसी कर रहे इस फ्रांस के एक्स पायलट का इस्तेमाल किया।

इस दावे को भारत की विपक्षी पार्टियों ने हाथों हाथ लिया। सरकार और सेना के लाख समझाने के बाद भी कहते रहे कि कितने राफेल गिराए गए? संसद से सड़क तक उनलोगों ने पाकिस्तान-चीन के प्रोपेगेंडा को हवा देने का काम किया। अब दावा करने वाले का ‘असली चेहरा’ दुनिया के सामने आ गया है।

फ्रांस के इस पूर्व पायलट को चीन के लिए संवेदनशील दस्तावेज चोरी करने को लेकर फ्रांस ने गिरफ्तार किया है और उससे पूछताछ की जा रही है। इससे पहले रणनीति के तहत उसने चीनी जेट विमानों की तारीफ की थी। उसने चीन के लिए सैन्य विशेषज्ञता उपलब्ध कराई और चीन के सैन्य पायलटों के प्रशिक्षण से जुड़ी गतिविधियों में हिस्सा लिया।

वह फ्रांसीसी नौसेना में राफेल M उड़ाने वाला पायलट रह चुका है। वह एयर कनाडा में कमर्शियल पायलट रह चुका है। बाद में एविएशन यूट्यूबर और विश्लेषक बन गया।

फ्रांसीसी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उसने 2028-19 में फ्रांस की नौसेना में रहते हुए दो बार चीन की यात्रा बगैर अधिकारियों को बताए की। इस दौरान उसने दक्षिणी विमानन कंपनी के माध्यम से चीनी सैन्य पायलटों को ट्रेनिंग सत्र आयोजित किए। उसने संवेदनशील और सामरिक दृष्टि से अहम जानकारियाँ शेयर की। दावा किया जा रहा है कि उस वक्त से ही वह चीन के लिए ‘काम’ करने लगा। फ्रांस की खुफिया एजेंसी उसे अब हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है। उसे न्यायिक जाँच के तहत रखा गया है।

राफेल को लेकर क्या कहा था शुए ने?

भारत ने जब पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान से आतंकों के तार जुड़ने पर पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों को उड़ाने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया और पाकिस्तान में घुस कर इन ठिकानों को उड़ा दिए। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर में भारत के राफेल विमानों ने पाकिस्तानी सीमा से 100 किलोमीटर अंदर बहावलपुर तक को निशाना बनाया। ये हमले SCALP मिसाइलों से किए गए और खास बात ये रही कि हमला करने के लिए इन्हें पाकिस्तानी सीमा में घुसने की जरूरत भी नहीं पड़ी।

इसके बावजूद चीन के टुकड़ों पर पलने वाले इस फ्रांस के एक्स पायलट शुए ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि भारतीय वायुसेना के राफेल विमान पाकिस्तान के चीनी मूल के लड़ाकू विमानों और PL-15 मिसाइलों के सामने कमजोर साबित हुए। उसने चीनी J-10C और JF-17 की तारीफ करते हुए उन्हें ‘राफेल किलर’ कहा था। ये सारे दावे उसने अपने यूट्यूब पर किए थे, जिसे ate chut के नाम से जाता जाता है। उसने दावा किया था कि चीनी तकनीक के सामने पश्चिमी देश नहीं ठहर रहे हैं।

शुए के इस दावे का भारतीय सेना ने जोरदार खंड़न किया था और कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कोई राफेल नहीं गिरा। यहाँ तक कि राफेल बनाने वाली कंपनी डसॉल्ट एविएशन ने भी इस दावे को बकवास बताया था।

उसने ऐसा क्यों कहा? इसका पता भी अब दुनिया को चल गया है। फ्रांस ने उसे चीन के लिए जासूसी करने और संवेदनशील रक्षा से जुड़ी जानकारियाँ चीन को मुहैया कराने के आरोप में गिरफ्तार किया है।

चीन पश्चिमी सैन्य विशेषज्ञों का कर रहा इस्तेमाल

चीन पर अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया समेत तमाम विकसित देश सालों से जासूसी करने का आरोप लगाते रहे हैं। चीन इन देशों के पूर्व रक्षा विशेषज्ञों और पायलटों को अपने देश में जासूसी करने के काम में लगाता है और उसे कई तरह से फायदा पहुँचाता है। उन्हें ‘फ्लाइट इंस्ट्रक्टर’ या ‘एविएशन कंसल्टेंट’ जैसे पद ऑफर कर काफी पैसे देता है। पहले नागरिक विमानन प्रशिक्षण के नाम पर अनुबंध करता है और फिर सैन्य प्रशिक्षण से जुड़े काम में लगाता है, लेकिन उसका मुख्य काम चीन के लिए गुप्त सैन्य तकनीक और दस्तावेज लाना होता है।

यह काम वह कई देशों में कर रहा है। रॉयटर्स के मुताबिक, फरवरी 2026 में अमेरिका में भी वायुसेना के एक पूर्व पायलट को चीन के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। फ्रांस का एक्स पायलट शुए भी चीन में सैन्य प्रशिक्षण से जुड़ा था। उसको मुखौटा के रूप में इस्तेमाल कर चीन ने भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के प्रहार को कमतर दिखाने के लिए ‘राफेल के गिरने की’ झूठी खबर फैला कर कूटनीतिक चाल चली।

इस कूटनीतिक चाल में फँस गई भारत की विपक्षी पार्टियाँ, जो ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सरकार की कमियाँ निकालने में लगी थी। उन्हें शुए के बयान से मौका मिला और देश में गला फाड़ फाड़ कर कहने लगी कि सरकार बताए कि हमारे कितने राफेल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान गिरे? सरकार से सवाल तो समझ में आता है, लेकिन विपक्षी नेताओं ने सेना के आधिकारिक बयान को भी खारिज कर दिया और राफेल पर सवाल दागते रहे।

राहुल गाँधी ने राफेल गिरने का दावा किया था

राहुल गाँधी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान ही विदेशी बयानों और दावों का हवाला देते हुए सरकार से पूछा था कि सैन्य कार्रवाई में भारतीय वायुसेना के कितने राफेल विमानों को नुकसान पहुँचा या गिरे हैं। इस दौरान सरकार हर स्तर पर ये स्पष्ट करती रही कि कोई भी राफेल या भारतीय विमान ऑपरेशन सिंदूर के दौरान क्षतिग्रस्त नहीं हुआ। संसद में भी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने साफ शब्दों में ये बातें कही थी। लेकिन राहुल गाँधी और दूसरे विपक्षी नेताओं को विदेशी एजेंटों पर भरोसा था इसलिए सवाल जारी रहे।

यहाँ तक कि भारतीय वायुसेना ने बाद में आधिकारिक तौर पर 36 राफेल के रखरखाव के लिए टेंडर जारी किए। इससे साफ था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारे सारे राफेल सुरक्षित हैं। दस्तावेज में साफ लिखा था कि भारतीय सेना के 36 राफेल के रखरखाव के लिए 5 महीने के लिए ब्रिज सपोर्ट की जरूरत है। दस्तावेज में यह भी जिक्र था कि प्रस्तावित ब्रिज सपोर्ट अनुबंध के दौरान सभी 36 राफेल विमानों के संचालन को ध्यान में रखते हुए उड़ान के घंटे गिने गए।

यह एक तरह से राहुल गाँधी और दूसरे नेताओं के मुँह पर तमाचे की तरह था। दरअसल राहुल गाँधी का चीन प्रेम काफी पुराना है। इस मामले में भी चीनी विमान की बात थी। क्योंकि दावा किया जा रहा था कि चीनी विमान ने ही राफेल को गिराया।

राहुल गाँधी का चीन प्रेम

मार्च 2023 में कैम्ब्रिज जज पब्लिक स्कूल में एक विवादास्पद बयान दिया। इसमें उन्होंने चीन को ‘उभरती हुई महाशक्ति’ बताया था। उन्होंने ये भी दावा किया था कि चीन में सामाजिक समरसता है। चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी से राजीव गाँधी फाउंडेशन को पैसे मिलने की बात भी सामने आई

2022 में द प्रिंट की कॉलमिस्ट श्रुति कपिला के साथ बातचीत के दौरान राहुल गाँधी ने चीन के विवादास्पद वेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (BRI) के भी कसीदे पढ़े थे। इसे उन्होंने ‘समृद्धि’ कहा जबकि चीन की ये पहल कई देशों को कर्ज के जाल में फँसाने के लिए बदनाम है।

2023 में लद्दाख का दौरा करने के दौरान राहुल गाँधी ने दावा किया था कि चीन ने लद्दाख में भारत की चरागाह भूमि पर कब्जा कर लिया है। इससे पहले मई 2022 में अपने यूके दौरे के दौरान उन्होंने कहा था कि “लद्दाख चीन के लिए वही है जो यूक्रेन, रूस के लिए है।”

मार्च 2023 में कैम्ब्रिज जज पब्लिक स्कूल में एक विवादास्पद बयान दिया। इसमें उन्होंने चीन को ‘उभरती हुई महाशक्ति’ बताया था। उन्होंने ये भी दावा किया था कि चीन में सामाजिक समरसता है।

इससे पता चलता है कि राहुल गाँधी का चीनी प्रेम कोई आज का नहीं है। राफेल के विमान को दुनियाभर में बदनाम करने के लिए जो चीनी साजिश रची गई उसमें कॉन्ग्रेस पार्टी और वामपंथी मीडिया भी शामिल रहे। भारत के 36 राफेल खरीदने को लेकर घोटाले का आरोप लगाया। जब इससे बात नहीं बनी तो ऑपरेशन सिंदूर में राफेल के गिरने की कहानी गढ़ी गई।

अब साफ हो चुका है कि न तो राफेल गिरा और न ही ऑपरेशन सिंदूर में भारत को किसी तरह की क्षति हुई। भारत ने पाकिस्तान में घुसकर दुश्मन के छक्के छुड़ाए और विपक्ष को भी लगातार चुनावों में हरा कर ये साबित कर दिया कि देश की जनता उसके साथ है। वह विपक्ष के बहकावे में नहीं आ सकती है।

‘निकालो राम को… तुम्हारी सीता मैया को ले जाएँगे’: रामनवमी में हिंदुओं ने ही झेला हमला, 11 आरोपितों के बरी होने पर वही न्याय के इंतजार में

  1. इबादत
  2. सादिक
  3. अब्दुल्ला
  4. साहेब उर्फ शाहिब
  5. शेरयार
  6. फैजल
  7. आजम
  8. शब्बीर
  9. इमरान
  10. मुस्ताक
  11. राजिक

ऊपर जो 11 नाम हैं, वो रामनवमी शोभा यात्रा के दौरान हिंदुओं पर हमले के आरोपी रहे हैं। 2022 में मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में कट्टर मुस्लिम भीड़ ने शोभा यात्रा में DJ बजाने को लेकर हमला किया था। जिले के SP तक को गोली मारी थी इसी भीड़ ने। अनेकों घर जला दिए थे, हिंदू बहन-बेटियों को रेप की धमकी दी गई थी। भगवान श्रीराम और माता सीता को लेकर आपत्तिजनक बात कही थी। जहाँ इतना सब कुछ हुआ, उसी जिले के सेशन कोर्ट ने लगभग 4 साल बाद 27 जुलाई 2026 को उपरोक्त सभी 11 आरोपितों को बरी कर दिया।

अभियोजन पक्ष की ओर से आरोपितों पर निम्नलिखित गंभीर आरोप लगाए गए थे:
(a) भीड़ जमा करने
(b) घातक हथियारों से लैस होकर हमला करने
(c) पत्थरबाजी करने
(d) मकान-वाहन व अन्य सामानों की तोड़-फोड़ करने
(e) पेट्रोल बम फेंकने
(f) घरों में आग लगाने
(g) पीड़ितों के जीवन को खतरा में डालने
(h) संपत्ति की क्षति करने
पुलिस की ओर से इनसे संबंधित सुसंगत धाराएँ भी आरोपितों पर लगाई गई थी।

इन आरोपों को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने कुल 13 साक्षी लोगों के बयानों को भी कोर्ट के सामने रखा, सभी 13 का परीक्षण भी कराया गया। कोर्ट ने इन 13 में से 11 लोगों को प्रत्यक्ष व चश्मदीद साक्षी भी माना। इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में सभी 11 आरोपितों का कहना था कि वे लोग निर्दोष हैं, उनको झूठे केस में फँसाया गया है – हालाँकि किसी भी आरोपित की ओर से अपने बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।

अभियोजन पक्ष ने अपनी ओर से साक्ष्य सहित कुल 10 आरोप कोर्ट के सामने रखे। खरगोन (मंडलेश्वर) के चतुर्थ अपर सत्र न्यायाधीश मुकेश नाथ के समक्ष सभी 11 आरोपितों की संलिप्तता से संबंधित कुल 8 विचारणीय प्रश्न भी रखे गए। हालाँकि जज ने आदेश देते हुए 50 पॉइंट में सभी आरोपों और प्रश्नों पर कोर्ट का तर्क रखा। अंततः “अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल” की बात रखते हुए जज मुकेश नाथ ने सभी 11 आरोपितों को उनके ऊपर लगाए गए अपराधों के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। अपने आदेश के पीछे न्यायाधीश ने 50 पॉइंट में निम्नलिखित महत्वपूर्ण तर्क दिए:

(i) साक्षी लोगों के कथनों में विरोधाभास
(ii) 2 दिन की देरी से दर्ज FIR
(iii) एक महत्वपूर्ण साक्षी के बयान को पुलिस द्वारा 51 दिन बाद दर्ज किया जाना
(iv) शिकायती आवेदन पत्र और शुरुआती FIR में 11 आरोपितों की जगह केवल 6 आरोपितों के ही नाम दर्ज
(v) कानूनी कार्रवाई के दौरान पुलिस द्वारा चश्मदीद साक्षी लोगों से आरोपितों की पहचान परेड नहीं कराया जाना
(vi) किसी भी साक्षी द्वारा कोर्ट में आरोपितों को नाम से नहीं पहचानना
(vii) दंगा करने आए लगभग 50 लोगों की भीड़ में से 11 आरोपितों की पहचान और उनके नाम किस आधार पर
(viii) एक साक्षी द्वारा आरोपितों को चेहरे से पहचानने का दावा जबकि दूसरे के द्वारा सभी दंगाई के चेहरे पर कपड़े बंधे होना बताना
(ix) भीड़ द्वारा विस्फोटक सामग्री के उपयोग संबंधित कोई भी विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जाना

अब सवाल उठता है कि जब कोर्ट ने आरोपितों को उनके ऊपर लगे अपराधों से बरी कर दिया है तो लंबी-चौड़ी खबर लिखी ही क्यों जाए? इसका उत्तर जानने से पहले यह देखना जरूरी है कि खरगोन में रामनवमी शोभा यात्रा में जो दंगे हुए थे, उसकी भयावहता क्या थी? तब मीडिया में क्या-क्या छपा था?

2022 की खरगोन रामनवमी शोभा यात्रा पर दंगाई मुस्लिम भीड़ के हमले को लेकर प्रकाशित खबरें

ऊपर जो खबरें दी गई हैं, वो सिर्फ ऑपइंडिया में प्रकाशित खबरें नहीं हैं। मुख्य धारा की मीडिया ने भी इसे प्रमुखता से कवर किया था। ग्राउंड रिपोर्टिंग की गई थी। दंगा पीड़ित हिंदुओं के अलावे घायल पुलिस वालों की आपबीती भी मीडिया ने बखूबी चलाया था। मतलब दंगा हुआ था, इसको इनकार नहीं किया जा सकता। बात अगर सिर्फ दंगे की हो तो मीडिया “अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में सफल” रहा था। व्यक्ति विशेष को अपराधी घोषित करना या नहीं – यह न्यायालय का काम है, उन्होंने किया भी।

“अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल” Vs “अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में सफल”

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 1984 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। Sharad Birdhi Chand Sarda vs State Of Maharashtra – इस केस के मामले में। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधारित मामलों वाले इस केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि आरोपित पर लगाए गए आरोपों और अपराधों को साबित करने का दायित्व अभियोजन पक्ष का होता है। अभियोजन पक्ष मतलब राज्य, राज्य मतलब पुलिस-वकील-डॉक्टर-फॉरेंसिक-लैब आदि।

अब सवाल उठता है कि जब खरगोन में रामनवमी शोभा यात्रा पर दंगाई मुस्लिम भीड़ ने हमला किया और अभियोजन पक्ष को उससे संबंधित चश्मदीद की गवाही में एकरूपता नहीं दिखी, तो न्यायालय में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को लेकर जाने की जिम्मेदारी किसकी थी? मार खाए पीड़ित हिंदुओं की? जिनके घर जलाए गए, उन हिंदुओं की? जिनके बहू-बेटियों को रेप की धमकी मिली, उनकी? या राज्य सरकार और उसके तंत्र की?

दंगों के समय हिंदू अपनी जान बचाए या घड़ी में यह देखे कि कितना बजा है क्योंकि 2/4 साल बाद किसी न्यायालय में उससे समय पूछा जाएगा? दंगाई कितनी संख्या में थे, सभी हिंदू पीड़ित उसकी सटीक गिनती करें क्योंकि न्यायालय में अलग-अलग संख्या से संदेह उत्पन्न होगा। अगर हिंदू ऐसा नहीं करते हैं तो उनको ‘परिस्थितिजन्य साक्ष्य’, ‘अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल’ – जैसे तकनीकी शब्दों में उलझाया जाएगा, तारीख पर तारीख मिलेगी… और अंततः न्याय के इंतजार में भटकना होगा।

भारतीय हॉकी टीम की नई भगवा जर्सी पर विवाद, कप्तान ने बताई रंग बदलने की वजह: जानिए केसरिया से क्यों है वामी-कामी गैंग को नफरत, पहले भी खड़ा कर चुके हैं बखेड़ा

भारतीय हॉकी टीम का रंग बदलने के फैसले को लेकर विवाद हो रहा है। दरअसल, हॉकी इंडिया ने भारतीय हॉकी टीम के रंग को गहरे नीचे से बदलकर केसरिया रंग का कर दिया है, जिसके बाद पुराने खिलाड़ी ही नहीं, राजनेता भी इस विवाद में कूद पड़े हैं। ये वही नेता हैं, जो अब तक कहते थे कि खेल में राजनीति को न घुसाया जाए।

कैसी है नई जर्सी की डिजाइन?

एफआईएच हॉकी विश्व कप के लिए हॉकी इंडिया (Hockey India) ने पुरुषों और महिलाओं की राष्ट्रीय टीम के लिए एक नई किट लॉन्च की। इस नई जर्सी में पारंपरिक नीले रंग (Navy Blue) की जगह प्रमुख रूप से भगवा/नारंगी (Saffron/Orange) रंग को जगह दी गई।

इस डिजाइन में कंधों और किनारों पर तिरंगे रंग की पाइपिंग, स्टाइलिश देवनागरी लिपि में लिखा ‘इंडिया’ और भारतीय हॉकी के लिए ओडिशा के लंबे समय से चले आ रहे समर्थन को मान्यता देने वाली ब्रांडिंग भी शामिल है। हॉकी इंडिया ने कहा कि जर्सी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को दर्शाती है।

जैसे ही हॉकी इंडिया ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर इस जर्सी का वीडियो शेयर किया, वैसे ही इंटरनेट पर बहस छिड़ गई।

पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान और ओलंपियन वीरेन रसकिन्हा (Viren Rasquinha) ने इस फैसले पर हैरानी जताते हुए इसे ‘शर्मनाक’ करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय हॉकी की विरासत और पहचान हमेशा नीला रंग ही रहा है।

रसकिन्हा ने अपने ट्वीट में लिखा, “हॉकी इंडिया ने कई अच्छे काम किए हैं, लेकिन यह शर्मनाक है। भारतीय टीम की विरासत और पहचान हमेशा से नीला रंग रही है। मैंने सालों तक गर्व से नीली जर्सी पहनी है। फैंस भारतीय टीम को नीले रंग में ही देखना चाहते हैं। इस नारंगी रंग के पीछे क्या तर्क है?”

इस बीच, जब लोगों ने उनके ट्वीट पर राजनीतिक टिप्पणियाँ शुरू कीं, तो रसकिन्हा ने एक और पोस्ट में स्पष्ट किया कि उनकी चिंता केवल खेल की पहचान (Heritage & Identity) को लेकर है, किसी राजनीति से नहीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए पूछा कि “क्या अर्जेंटीना की फुटबॉल टीम कभी अपनी पहली जर्सी के नीले-सफेद स्ट्राइप्स को हटाकर नारंगी पहन सकती है?”

हॉकी इंडिया और कप्तान हरमनप्रीत सिंह का स्पष्टीकरण बढ़ते विवाद के बीच हॉकी इंडिया और वर्तमान भारतीय हॉकी कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने सामने आकर स्थिति साफ की।

कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने कहा, “इसमें कोई राजनीति नहीं है। यह टीम और कोचों का सामूहिक फैसला था। आजकल हॉकी नीले रंग के सिंथेटिक टर्फ (Astroturf) पर खेली जाती है। जब खिलाड़ी नीले टर्फ पर नीली जर्सी पहनकर खेलते हैं, तो एक-दूसरे को पास देते समय दृश्यता (Visibility) प्रभावित होती है। नारंगी रंग नीले टर्फ पर साफ दिखता है।”

हॉकी इंडिया ने भी आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि भगवा रंग हमारे राष्ट्रीय ध्वज का हिस्सा है, जो साहस, त्याग और विजय का प्रतीक है। इस बारे में खिलाड़ियों से भी सलाह ली गई थी।

राजनीतिक बयानबाजी हुई तेज

जैसे ही इस जर्सी की तस्वीरें सामने आईं, राजनीतिक विरोध शुरू हो गया। ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक (BJD) ने भी इस जर्सी बदलाव पर नाराजगी जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि ओडिशा में सत्ता बदलने के बाद जानबूझकर राज्य और राष्ट्रीय पहचान से नीले रंग को हटाकर राजनीतिक कारणों से भगवा रंग थोपा जा रहा है। इसके जवाब में भाजपा नेताओं ने कहा कि भगवा राष्ट्रीय ध्वज का रंग है और इस पर राजनीति करना अनुचित है।

इस मामले में भी कॉन्ग्रेस अपनी राजनीति पर उतर आई। उसके साथ इंडी गठबंधन के नेता भी भारतीय टीम की नई जर्सी पर सवाल उठा रहे हैं। संसद भवन के बाहर कॉन्ग्रेस सांसद प्रियंका गाँधी, सुखदेव भगत, राजद सांसद सुधाकर सिंह, समाजवादी पार्टी के नेता उदयवीर सिंह सहित कई नेताओं ने सवाल उठाए। प्रियंका गांधी ने तो जर्सी बदलने को इतिहास बदलने की कोशिश बता डाला।

पहले क्रिकेट टीम की ‘ऑरेंज जर्सी’ पर मचा था बवाल

यह पहली बार नहीं है जब किसी भारतीय खेल टीम के परिधान में नारंगी या भगवा रंग आने पर बवाल हुआ हो। साल 2019 के आईसीसी क्रिकेट विश्व कप (England) के दौरान भी ऐसा ही एक बड़ा विवाद देखने को मिला था।

बता दें कि 2019 विश्व कप में ‘अवे जर्सी‘ का मामला भी ऐसे ही सामने आया था। विश्वकप में आईसीसी के नियमों के अनुसार, जब दो ऐसी टीमों का मैच होता है जिनकी जर्सी का रंग एक जैसा हो (जैसे भारत और इंग्लैंड, दोनों का रंग नीला था), तो मेहमान टीम को ‘अवे जर्सी’ पहननी पड़ती है। बीसीसीआई ने इस मैच के लिए नारंगी और नीले रंग के मिश्रण वाली जर्सी पेश की, जिसकी पीठ और बाजू पूरी तरह नारंगी थे।

रिफत जावैद जैसे वामी-इस्लामी पत्रकार ने तब भी विवाद पैदा करने की कोशिश की थी।

इसके अलावा सपा नेताओं ने जर्सी के लेकर अपनी मानसिकता खुलकर दिखाई थी, जिसपर वरिष्ठ पत्रकार गौरव सावंत ने सपा नेताओं को आड़े हाथों लिखा था।

विश्व कप 2023 की ट्रेनिंग किट को लेकर भी हुआ था विवाद

साल 2023 में भारत में खेले गए वनडे वर्ल्ड कप के दौरान जब भारतीय क्रिकेट टीम प्रैक्टिस के लिए नारंगी रंग की ट्रेनिंग टी-शर्ट पहनकर मैदान पर उतरी, तो फिर से सोशल मीडिया पर मीम्स और तंज कसने का दौर शुरू हो गया। आलोचकों ने इसकी तुलना स्विगी (Swiggy) डिलीवरी बॉयज और पेट्रोल पंप कर्मचारियों की यूनिफॉर्म से कर डाली। इस मामले में साउथ के एक्टर सिद्धार्थ ने व्यंग्य करते हुए क्रिकेट टीम की नई जर्सी की तुलना इंडियन ऑयल/पेट्रोल पंप वर्कर से की थी।

‘खेल और राजनीति को न मिलाएँ’ वाला राग

इस पूरे विवाद में सबसे दिलचस्प बात वह दोहरा मापदंड (Double Standard) है, जिसकी ओर अक्सर खेल प्रेमी इशारा करते हैं। आमतौर पर वामपंथी और लिबरल विचारकों का एक बड़ा वर्ग यह तर्क देता है कि खेल और राजनीति को आपस में नहीं मिलाया जाना चाहिए (Keep Politics Out of Sports)। लेकिन जब भी राष्ट्रीय टीम की किट, लोगो या ट्रेनिंग गियर में भगवा/नारंगी रंग का इस्तेमाल होता है, तो सबसे पहले इसे ‘राजनीतिक एजेंडा’ या ‘भगवाकरण’ बताने की शुरुआत भी इसी वर्ग द्वारा की जाती है।

भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है, जिसमें सबसे ऊपर ‘केसरिया’ (Saffron) रंग है जो शौर्य और साहस का प्रतीक है। अगर राष्ट्रीय टीम तिरंगे के ही एक रंग को पहनती है, तो उसे किसी राजनीतिक दल विशेष से जोड़ना तर्कसंगत नहीं है।

तकनीकी कारणों की अनदेखी कर रहे विवाद फैलाने वाले लोग

हॉकी इंडिया और कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने स्पष्ट रूप से बताया कि नीले एस्ट्रोटर्फ (Blue Turf) पर नारंगी जर्सी से बॉल और खिलाड़ियों की विजिबिलिटी बेहतर होती है। लेकिन खेल के इस तकनीकी पहलू (Scientific/Technical reason) को समझे बिना राजनीतिक रंग देना इस बात को साबित करता है कि विरोध केवल रंग को लेकर है, खेल के प्रदर्शन से नहीं।

भारतीय खेलों में जर्सी के रंग को लेकर होने वाली बहस यह दर्शाती है कि हमारे देश में खेल केवल मनोरंजन या प्रतिस्पर्धा नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक और राजनीतिक विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम भी बन चुके हैं। हालाँकि जब खिलाड़ी मैदान पर उतरते हैं, तो उनके सीने पर लिखा ‘INDIA’ और तिरंगा ही सबसे ज्यादा मायने रखता है। चाहे नीली जर्सी हो या भगवा, खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करने उतरते हैं। खेल प्रशंसकों का मानना है कि जर्सी के रंग पर राजनीति करने के बजाय ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि हमारी टीम मैदान पर कैसा प्रदर्शन कर रही है और देश के लिए कितने पदक जीत रही है।

PM मोदी की 4 REEL के पीछे छिपे सरकार के 4 बड़े एक्शन: 1 हफ्ते में पेपर लीक पर फास्ट ट्रैक कोर्ट से लेकर नए बिल तक, जानें क्या-क्या हुआ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले एक हफ्ते में इंस्टाग्राम पर लगातार चौथी सेल्फी-स्टाइल रील (Reel) पोस्ट की है। आमतौर पर किसी प्रधानमंत्री का इतने कम समय में लगातार सोशल मीडिया के जरिए युवाओं से संवाद का विषय बनता है। लेकिन इस बार सिर्फ रीलें ही चर्चा में नहीं हैं, बल्कि उन 4 रील के पीछे दिख रहे सरकार के 4 बड़े एक्शन भी हैं। खासकर NEET पेपर लीक मामले में केंद्र सरकार ने पिछले एक हफ्ते के भीतर जिस तेजी से फैसले लिए हैं, उस पर भी नजर डालनी चाहिए।

फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का ऐलान, परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए हाई पावर्ड टास्क फोर्स का गठन, CBI की चार्जशीट दाखिल होना और फिर पेपर लीक रोकने वाले कानून को और सख्त बनाने के लिए संशोधन विधेयक संसद से पास कराना… एक के बाद एक कई बड़े कदम उठाए गए।

इन सभी फैसलों की जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी समय-समय पर इंस्टाग्राम रील के जरिए देश के युवाओं तक पहुँचाई। अब चौथी रील में पीएम मोदी ने अब तक हुई कार्रवाई का पूरा अपडेट देते हुए भरोसेमंद परीक्षा व्यवस्था बनाने की दिशा में सरकार की आगे की रणनीति भी बताई।

उन्होंने कहा कि टास्क फोर्स बनाई गई है, फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था की जा रही है, राज्यों के सुझाव लिए जा रहे हैं और शिक्षा व्यवस्था में टेक्नोलॉजी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जाएगा ताकि भविष्य में पेपर लीक जैसी घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाई जा सके।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि संसद के दोनों सदनों में व्यापक चर्चा के बाद पेपर लीक से जुड़े विधेयक को भी मंजूरी मिल चुकी है और अब बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले पेपर लीक माफियाओं पर पहले से ज्यादा सख्त कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है।

पहली रील में GenZ युवाओं से फास्ट ट्रैक कोर्ट का वादा

जब NEET पेपर लीक को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में प्रदर्शन तेज हो रहे थे, उस माहौल में पीएम मोदी ने पिछले हफ्ते आधी रात को इंस्टाग्राम पर अपनी पहली सेल्फी-स्टाइल रील जारी की। उन्होंने युवाओं को ‘मेरे दोस्तों’ कहकर संबोधित किया और कहा कि जिन लोगों ने मेहनत करने वाले छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है, उन्हें किसी भी कीमत पर छोड़ा नहीं जाएगा।

इस रील को 24 घंटे से भी कम समय में 300 मिलियन से ज्यादा लोगों ने देखा।

इसी वीडियो में उन्होंने सबसे बड़ा ऐलान किया कि पेपर लीक और परीक्षाओं में गड़बड़ी से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएँगे। इस फास्ट ट्रैक कोर्ट में दिल्ली हाई कोर्ट के जज अनु ग्रोवर बलीगा को विशेष न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। सरकार का मानना है कि अभी ऐसे मामलों में जाँच और मुकदमे लंबे समय तक चलते हैं, जिससे अपराधियों के मन में कानून का डर कम हो जाता है। फास्ट ट्रैक कोर्ट बनने के बाद ऐसे मामलों की सुनवाई तेजी से होगी और दोषियों को जल्द सजा मिल सकेगी।

बता दें कि फास्ट ट्रैक कोर्ट सामान्य अदालतों से अलग होते हैं। इन्हें किसी खास या गंभीर मामलों की जल्द सुनवाई के लिए बनाया जाता है। इससे सरकार बताना चाहती है कि पेपर लीक जैसे संगठित अपराधों में अगर फैसला जल्दी आएगा तो भविष्य में ऐसे गिरोहों पर प्रभावी रोक लग सकेगी। यही वजह है कि सरकार ने इसे परीक्षा में सुधार की दिशा में पहला बड़ा कदम भी बताया।

दूसरी रील में युवाओं का किया धन्यवाद

पहली रील को सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने देखा और उस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। इसके बाद अगले ही दिन प्रधानमंत्री मोदी ने दूसरी इंस्टाग्राम रील पोस्ट की। इस वीडियो में उन्होंने किसी नई योजना का ऐलान नहीं किया, बल्कि युवाओं को पहले वीडियो पर मिले समर्थन के लिए धन्यवाद कहा।

इस दौरान उन्होंने एक बार फिर GenZ युवाओं को ‘मेरे दोस्त’ कहकर संबोधित किया। उन्होंने कहा कि छात्रों की चिंताओं को सरकार गंभीरता से सुन रही है और परीक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लगातार फैसले लिए जा रहे हैं। उन्होंने युवाओं से भरोसा बनाए रखने की अपील भी की और कहा कि सरकार केवल बयान नहीं दे रही, बल्कि लगातार कार्रवाई भी कर रही है।

तीसरी रील में हाई पावर्ड टास्क फोर्स बनाने का ऐलान

फास्ट ट्रैक कोर्ट के ऐलान के तीन दिन बाद प्रधानमंत्री मोदी ने तीसरी इंस्टाग्राम रील जारी की। इस बार उनका फोकस सिर्फ दोषियों को सजा दिलाने पर नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा व्यवस्था में सुधार करने पर था।

प्रधानमंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार ने परीक्षा प्रणाली की समीक्षा और उसमें सुधार के लिए एक हाई पावर्ड टास्क फोर्स का गठन किया है। इस टास्क फोर्स की अध्यक्षता इंफोसिस के सह-संस्थापक और आधार परियोजना के पूर्व प्रमुख नंदन नीलेकणी को सौंपी गई है। इसमें शिक्षा, तकनीक, साइबर सुरक्षा और प्रशासन से जुड़े विशेषज्ञ शामिल किए गए हैं।

इस टास्क फोर्स का काम केवल पेपर लीक की जाँच करना नहीं है। इसका उद्देश्य पूरी परीक्षा प्रणाली की समीक्षा करना, कमजोर कड़ियों की पहचान करना, डिजिटल सुरक्षा बढ़ाना, प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर परीक्षा केंद्र तक की पूरी प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाना और भविष्य के लिए ऐसे सुझाव देना है, जिनसे पेपर लीक जैसी घटनाओं की संभावना न्यूनतम हो सके।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी तीसरी रील में कहा कि सरकार अब केवल अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना चाहती है जिसमें भविष्य में किसी भी छात्र का भविष्य पेपर लीक माफिया की वजह से खतरे में न पड़े।

CBI की चार्जशीट ने जाँच को निर्णायक मोड़ पर पहुँचाया

इसी बीच NEET पेपर लीक मामले की जाँच कर रही CBI ने भी कार्रवाई तेज कर दी। सरकार की ओर से परीक्षा व्यवस्था में सुधार के फैसले लिए जा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ जाँच एजेंसी अदालत में सबूत पेश करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही थी।

CBI ने NEET पेपर लीक मामले में अपनी चार्जशीट दिल्ली की राउड एवेन्यू कोर्ट में दाखिल करते हुए 13 आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), भ्रष्टाचार निरोधक कानून और सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम से जुड़े कानून की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए। जाँच एजेंसी ने अदालत को बताया कि यह कोई सामान्य नकल का मामला नहीं था, बल्कि एक संगठित नेटवर्क के जरिए प्रश्नपत्र लीक करने, उसे अभ्यर्थियों तक पहुँचाने और इसके बदले मोटी रकम वसूलने की साजिश रची गई थी।

CBI की आर्थिक अपराध शाखा की ओर से दाखिल चार्जशीट में 360 गवाहों के बयान, 422 महत्वपूर्ण दस्तावेज और 43 भौतिक साक्ष्यों को शामिल किया गया है। जाँच एजेंसी के अनुसार, डिजिटल फॉरेंसिक रिपोर्ट, हस्तलेखन विशेषज्ञों की राय और विषय विशेषज्ञों की जाँच से यह पुष्टि हुई है कि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र का अवैध रूप से प्रसार किया गया था।

चार्जशीट में कुल 13 लोगों को आरोपित बनाया गया है। इनमें राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) से जुड़े बायोलॉजी विशेषज्ञ मनीषा मंधारे, केमिस्ट्री विशेषज्ञ प्रह्लाद विठ्ठलराव कुलकर्णी और फिजिक्स विशेषज्ञ मनीषा संजय हवालदार के अलावा कई बिचौलिए शामिल हैं। आरोपितों में यश यादव, मंगलिलाल बिवाल, दिनेश बिवाल, विकास बिवाल, शुभम माधुकर खैरनार, धनंजय निवृत्ति लोखंडे, मनीषा संजय वाघमारे और डॉ मनोज भगवानराव शिरुरे के नाम भी हैं।

संसद से पास हुआ एंटी पेपर लीक बिल

मामले में जाँच के साथ-साथ सरकार ने भविष्य के लिए भी ठोस कदम उठाए। केंद्र सरकार ने पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक, 2026 संसद में पेश किया। लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों में इस पर चर्चा हुई और बाद में इसे पारित कर दिया गया।

इस संशोधित विधेयक में पेपर लीक जैसी गंभीर अपराधों को लेकर, अधिनियम की धारा 10 के तहत अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वालों के लिए न्यूनतम सजा 3 वर्ष से बढ़ाकर 5 वर्ष कर दी जाएगी, जबकि अधिकतम सजा 10 वर्ष तक हो सकेगी। इसके साथ ही दोषियों पर अधिकतम 50 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा।

परीक्षा आयोजित करने वाली सेवा प्रदाता एजेंसियों के लिए अधिकतम जुर्माना 1 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपए कर दिया गया है। साथ ही सार्वजनिक परीक्षाएँ आयोजित करने से प्रतिबंधित किए जाने की अवधि 4 वर्ष से बढ़ाकर 8 वर्ष कर दी जाएगी।

अगर किसी सेवा प्रदाता संस्था के निदेशक या जिम्मेदार अधिकारी दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें भी कम से कम 5 वर्ष की कैद होगी, जो पहले 3 वर्ष थी, और उन पर 5 करोड़ रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। वहीं धारा 11 के तहत संगठित अपराध के मामलों में न्यूनतम सजा 5 वर्ष से बढ़ाकर 7 वर्ष कर दी जाएगी। जबकि न्यूनतम जुर्माना 1 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपए कर दिया जाएगा।

एक हफ्ते में सरकार के ताबड़तोड़ फैसले

अगर पिछले एक हफ्ते के घटनाक्रम को क्रमवार देखा जाए तो साफ दिखाई देता है कि सरकार ने NEET पेपर लीक मामले पर अलग-अलग स्तरों पर कार्रवाई की। सबसे पहले छात्रों से सीधे संवाद किया गया और फास्ट ट्रैक कोर्ट का ऐलान हुआ। इसके बाद परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए हाई पावर्ड टास्क फोर्स बनाई गई। इसी दौरान CBI ने अपनी जाँच को आगे बढ़ाते हुए चार्जशीट दाखिल की। फिर संसद ने संशोधित एंटी पेपर लीक विधेयक को मंजूरी दी और आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चौथी इंस्टाग्राम रील के जरिए इन सभी कदमों को जोड़ते हुए देश के युवाओं को सरकार की पूरी कार्ययोजना बताई।

यानी पिछले एक हफ्ते में सरकार की रणनीति केवल बयान देने तक सीमित नहीं रही। एक तरफ जाँच एजेंसियाँ कार्रवाई करती रहीं, दूसरी तरफ परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए संस्थागत बदलाव किए गए और साथ ही कानून को भी पहले से ज्यादा सख्त बनाने की दिशा में कदम उठाए गए। यही संदेश प्रधानमंत्री की चारों इंस्टाग्राम रील में भी लगातार दिखाई देता है।

स्पेन में घुसे हजारों अफ्रीकी घुसपैठियों को संभालने के लिए सेना तैनात, SC का आदेश बना ढाल: जानिए 6 साल पहले कैसे तबाही की कगार पर पहुँचा था यूरोप, भारत में भी घुसपैठियों के पास कानूनी ढाल

यूरोप एक बार फिर अवैध शरणार्थियों के नाम से काँप रहा है। दरअसल अफ्रीकी देश मोरक्को से बड़ी संख्या में अवैध शरणार्थी स्पेन में घुस गए हैं। ये लोग समुद्र तैर कर या जमीनी बॉर्डर के जरिए अवैध तरीके से स्पेन में घुस रहे हैं। सेउटा में घुसने से माइग्रेंट स्पेन के इलाके और आगे चलकर EU के इलाके में आ सकते हैं, जहाँ वे शरण माँग सकते हैं।

इन शरणार्थियों ने 8 साल पहले सीरिया संकट की याद ताजा कर दी है, जब यूरोप में बड़े पैमाने पर कट्टरपंथी शरणार्थी के तौर पर आए थे। स्पेन, फ्रांस, स्वीडन, जर्मनी समेत कई देशों में इनकी संख्या इतनी बढ़ गई कि प्रशासनिक व्यवस्था चरमराने लगी। इसकी याद दिलाते हुए इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने शरणार्थियों के नए दौर पर चिंता जाहिर की है और कहा है कि वे स्पेन के साथ शेंगेन समझौता रद्द कर सकते हैं।

क्या है मामला

सेउटा मोरक्को के उत्तरी तट पर स्पेन के कंट्रोल वाला एक छोटा सा इलाका है। इससे सटे मेलिला एन्क्लेव में अफ्रीका और यूरोपियन यूनियन का जमीनी बॉर्डर है। सेउटा में हजारों शरणार्थी ब्रेकवॉटर के आस-पास तैरकर या बॉर्डर की बाड़ तोड़कर घुस गए हैं, जिससे छोटा-सा यूरोपियन देश स्पेन पर काफी दबाव बढ़ गया है। यहाँ तक कि स्पेन को सेना और ज्यादा पुलिस बल तैनात करनी पड़ी है।

अवैध तरीके से घुस आए बेलगाम शरणार्थियों के चलते बवाल मच गया है। यहाँ बड़ा मानवीय और सुरक्षा संकट पैदा हो गया है। दरअसल अचानक हजारों शरणार्थी सीमा पार कर घुसने लगे। फॉक्स न्यूज के मुताबिक, हजारों शरणार्थी मोरक्को की सीमा पार कर स्पेन के शहर सेउटा में दाखिल हुए। नए जत्थे में 1500 से ज्यादा शरणार्थी हैं, जो समुद्र के रास्ते शहर में दाखिल हो रहे हैं। सेउटा के प्रशासनिक अधिकारी जुआन जीसस विवास के मुताबिक, पिछले हफ्ते भर से शरणार्थियों का आना काफी बढ़ गया है और संसाधनों की कमी हो रही है।

स्पेन में घुस रहे शरणार्थियों का वीडियो भी सामने आया है। सैकड़ों लोग इन्फ्लेटेबल ट्यूब और दूसरे फ्लोटेशन डिवाइस का इस्तेमाल करके ब्रेकवाटर के आसपास तैरते हुए दिखे। हजारों लोग जमीनी सीमा के गेट से घुसते दिखाई दिए। इससे घबरा कर सीमा पर तैनात सुरक्षाकर्मी घबरा कर भाग गए।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेन के सरकारी ब्रॉडकास्टर TVE ने अंदाजा लगाया है कि करीब 3000 लोग इस इलाके में घुसे हैं। समुद्र पार करते वक्त 9 शरणार्थियों की लाश भी पुलिस ने बरामद की है। इन शरणार्थियों में ज्यादातर मोरक्को के नागरिक हैं। दरअसल यूरोप में जमीन से घुसने का एकमात्र रास्ता मोरक्को और स्पेन की सीमा है। यहाँ तक कि सबसे आसान समुद्री रास्ता भी स्पेन तक ही जाता है। इसलिए 2021 के बाद 30 जुलाई 2026 को सबसे ज्यादा शरणार्थी स्पेन में घुस आए हैं। इसके साथ ही लगातार इनके आने का सिलसिला जारी है।

स्थानीय प्रशासन ने केन्द्र को आर्मी तैनात करने और नेशनल इमरजैंसी घोषित करने की माँग की है। स्पेन में आर्मी की हलचल तेज है। बख्तरबंद गाड़ियाँ घूमने लगी हैं। हालाँकि आपातकाल की घोषणा नहीं की गई है।

क्या कहा मेलोनी ने

स्पेन में बॉर्डर पर बवाल के बाद इटली भी सचेत हो गया है। अवैध शरणार्थियों के आने पर इटली ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने कहा कि वह ‘कड़े उपायों’ पर विचार कर रही हैं। उन्होंने स्पेन के साथ शेंगेन समझौते (Schengen Agreement) को अस्थायी रूप से निलंबित करने की चेतावनी दी है।

यूरोपीय देशों के बीच सीमा खुला रखने से जुडा शेंगेन समझौता इसके सदस्य देशों के बीच 1985 में हुई थी। जिसके तहत सदस्य देशों ने अपनी आपसी सीमाओं पर नियंत्रण समाप्त कर दिया है यानी इटली ने अपनी सीमा सील करने की चेतावनी दी है।

मेलोनी ने X पर लिखा, “सेउटा से आ रही तस्वीरें चौंकाने वाली हैं और एक बार फिर दिखाती हैं कि बिना कंट्रोल के अवैध घुसपैठ यूरोप के बॉर्डर की सिक्योरिटी के लिए एक बड़ा खतरा है।”

उन्होंने कहा कि इटली इस पर विचार कर रहा है कि वह स्पेन के साथ शेंगेन एरिया को सस्पेंड कर दिया जाए। हालाँकि मेलोनी ने यह नहीं बताया कि ऐसा कैसे किया जाएगा।

स्पेन के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आई शरणार्थियों की बाढ़

शरणार्थियों को लगता है कि यहाँ पहुँचने पर स्पेन के मुख्य भाग में एंट्री हो जाएगी और फिर यूरोपीय यूनियन के देशों तक पहुँचना आसान हो जाएगा।

स्पेन का मानना है कि मोरक्को और दूसरे अफ्रीकी देशों से जो शरणार्थी आ रहे हैं, उसके पीछे तस्करी करने वाले नेटवर्क का हाथ है। हाल ही में स्पेन के सुप्रीम कोर्ट ने बिना सही प्रक्रिया के समुद्र के रास्ते सेउटा में आने वाले शरणार्थियों को तुरंत वापस लौटने पर रोक लगा दी थी। स्पेन के सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मोरक्को के रास्ते सेउटा-मेलिला आने वाले शरणार्थियों को पकड़े जाने पर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के सीधा मोरक्को नहीं भेजा जा सकता है। इससे तस्करी करने वाले नेटवर्क को बढ़ावा मिला है।

शरणार्थी सेउटा पहुँचने से पहले मोरक्को के शहर फनीडेक में इकट्ठा हो रहे हैं। मोरक्को के सुरक्षा बल इन पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हैं और इन पर पानी की बौछारें की जा रही हैं, लेकिन ये टस से मस नहीं हो रहे।

स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज और गृह मंत्री फर्नांडो ग्रांडे-मार्लास्का के शुक्रवार को सेउटा जाकर लोकल अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों से मुलाकात की है। साथ ही मोरक्को के साथ कोऑर्डिनेट कर जो लोग अवैध तरीके से आए हैं, उन्हें वापस भेजने को लेकर वार्ता करेंगे।

2011-21 के बीच सेउटा में घुस आए थे शरणार्थी

स्पेन के साथ डिप्लोमैटिक विवाद के बीच मई 2021 में मोरक्को ने सीमा पर ढील दे दी थी, जिससे मात्र दो दिनों में हजारों लोग सेउटा घुस आए थे। इन अवैध शरणार्थियों में कई नाबालिग शामिल थे। नई शरणार्थियों की घुसपैठ से स्पेन और मोरक्को के रिश्तों पर असर पड़ने की आशंका है। हालाँकि अभी तक दोनों देशों ने सहयोग करने की बात कही है।

साल 2011 में शुरू हुए सीरियाई गृहयुद्ध और आईएसआईएस के आतंक से बचने के लिए लाखों सीरियाई यूरोपीय यूनियन के देशों में शरणार्थी बन कर आए। इनके यूरोप पहुँचने के कई मार्ग थे, जिनमें मोरक्को से होते हुए स्पेन तक पहुँचना भी एक था। उस वक्त भी इनलोगों ने समुद्री और जमीनी रास्ते को वैसे ही चुना था, जैसा अभी हो रहा है।

यहाँ से यूरोप के दूसरे देशों में ये पहुँचे। जर्मनी, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड जैसे अमीर यूरोपीय देशों ने इनके लिए अपनी ‘मानवीयता’ दिखाई। इनलोगों को शरण दी गई। इसके बाद 2015 में यूरोप का प्रवासी संकट भी आया और यूरोप के ज्यादातर देशों में कट्टरपंथियों की जमात बढ़ गई। हालात ये है कि इंग्लैंड, फ्राँस, जर्मनी समेत सारे देश अब क्राइम काफी बढ़ गया है। इस्लामी ग्रूमिंग गैंग लगातार स्थानीय नाबालिग लड़कियों को अपना निशाना बना रहे हैं। रेप, लूट-पाट, नशे की तस्करी जैसे क्राइम से निपटना स्थानीय सुरक्षा बलों के लिए मुश्किल हो रहा है।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में घुसपैठियों को लेकर कहा है कि अफ्रीका और दुनिया के दूसरे हिस्सों से आने वाले घुसपैठिए यूरोपीय देशों और यूके के लिए खतरा हैं। ये लोग यूरोप की पहचान और संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं। उन्होंने इसको लेकर यूरोपीय नेताओं की आलोचना भी की थी कि उन्होंने नरमी बरती और कड़े कदम नहीं उठाए।

यूरोप की इस समस्या से भारत भी दो चार होता रहा है। यहाँ अवैध घुसपैठियों की वजह से दशकों से कई दिक्कतें पेश आ रही हैं। असम से पश्चिम बंगाल तक बांग्लादेशी घुसपैठियों से सिर्फ आबादी ही नहीं बढ़ी है, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में जबरदस्त तरीके से डेमोग्राफी भी बदली है।

संसद में विदेश मामलों की स्थाई समिति ने बांग्लादेश से भारत में होने वाली अवैध घुसपैठ पर चिंता जताते हुए इस पर ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप तैयार करने की बात कही है। ताकि बांग्लादेशी घुसपैठियों की राष्ट्रीयता की पुष्टि होने और उनके प्रत्यर्पण पर निगरानी रखने में आसानी हो। समिति के मुताबिक, अभी 2369 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों की राष्ट्रीयता की पुष्टि के मामले बांग्लादेश सरकार के पास लंबित हैं।

ये तो उन नागरिकों की बात है, जिनके मामले सामने आए हैं। लेकिन भारत में ऐसे अवैध घुसपैठियों के मामले अक्सर सामने आते हैं, जिनका पता सालों बाद चलता है। इनके वजह से भारत के संसाधनों पर असर पड़ता है और रोजगार प्रभावित होते हैं। चुनाव में ये लोग पार्टियों के वोट बैंक बन जाते हैं और उनके पास भारत के वोटर कार्ड से लेकर आधार कार्ड तक पहुँच जाता है। ये लोग रोजगार पर बहुत ज्यादा दबाव डालते हैं। चुनावों में इसका असर भी दिखता है।

न सिर्फ राजनीतिक- सामाजिक तौर पर बल्कि आर्थिक तौर पर भी इससे देश कमजोर होता है। घुसपैठियों के खिलाफ अभियान चलाने के दौरान कई बार मानवाधिकार की बात की जाती है। सुप्रीम कोर्ट तक में कई ऐसे मामले दर्ज हैं। कोर्ट ने घुसपैठियों को लेकर कहा है कि उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

लेकिन स्थानीय स्तर पर मिलने वाले फर्जी दस्तावेज और कानूनों की कुछ सीमाएं उन्हें अनौपचारिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और मिलीभगत से आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे कागजात बन जाने के कारण पुलिस या प्रशासन के लिए तुरंत पहचान करना मुश्किल होता है। अगर पहचान हो भी गई तो कोर्ट में मामला लंबित रहता है। बड़े बड़े वकील से लेकर पूरा लिबरल इकोसिस्टम उन्हें बचाने में लग जाता है।

CPM नेता को टॉपर बनाने के लिए केरल PCS में स्कैम… जिनका जवाब नहीं जानता था, वो 10 सवाल हटाए: इंटरव्यू में दिए 40 में से 36 नंबर, दूसरे स्थान वाले को मिले 11; पढ़ें डिटेल्स

केरल लोक सेवा आयोग (PSC) परीक्षा में एक बड़े घोटाले को लेकर विवाद हो रहा है। राज्य योजना बोर्ड में ‘चीफ (उद्योग और बुनियादी ढाँचा)’ के बेहद महत्वपूर्ण पद के लिए एक परीक्षा आयोजित की गई थी।

इस परीक्षा में मेरिट और ईमानदारी को ताक पर रखकर, सत्ताधारी दल CPM से जुड़े एक संगठन के नेता अरुण जे प्रताप को अवैध तरीके से पहला रैंक (टॉपर) दिला दिया गया। मामला सामने आने के बाद जब विशेष जाँच टीम (SIT) और क्राइम ब्राँच ने जाँच शुरू की, तो कई चौंकाने वाले खुलासे हुए।

जाँच में सामने आया कि यह कोई छोटी-मोटी लापरवाही नहीं थी, बल्कि बड़े अधिकारियों और राजनेताओं की मिलीभगत से रची गई एक सोची-समझी साजिश थी, ताकि अपने पसंदीदा उम्मीदवार को इस पद पर बैठाया जा सके।

मूल्यांकन में धांधली और मार्क्स का गणित

जाँच टीम SIT को पता चला है कि इस घोटाले को अंजाम देने के लिए परीक्षा के पूरे इवैल्यूएशन प्रोसेस को ही हैक कर लिया गया। जो उम्मीदवार पहले स्थान पर आया, वह असल में केरल वॉटर अथॉरिटी में CPM समर्थित सर्विस ऑर्गनाइजेशन का एक नेता था।

गड़बड़ी यह की गई कि पहली रैंक पाने वाले इस नेता ने परीक्षा के पहले पेपर में 4 सवालों के गलत जवाब दिए थे और 6 सवाल ऐसे थे जिन्हें उसने छुआ तक नहीं था। आरोपित अधिकारियों ने दिमाग लगाया और प्रश्न संख्या 9 से लेकर 18 तक के इन 10 सवालों को डिजिटल इवैल्यूएशन के प्रोसेस से ही बाहर कर दिया।

इसका नतीजा यह हुआ कि जिन 228 से ज्यादा दूसरे उम्मीदवारों ने इन 10 सवालों के सही जवाब दिए थे, उन्हें भी इसके कोई नंबर नहीं मिले। इस तरह से बाकी उम्मीदवारों के लगभग 50 से 54 मार्क्स का नुकसान कर दिया गया।

अगर सभी सवालों की सही तरीके से जाँच होती, तो असली टॉपर कोई और होता। जाँच के मुताबिक, मौजूदा पहले रैंक वाले नेता के नंबर असली हकदार (जो दूसरे नंबर पर रहा) से 53 मार्क्स कम होते। हालत यह थी कि अगर ईमानदारी से कॉपी जाँची जाती, तो यह नेता शॉर्टलिस्ट होने के लायक भी नहीं था, लेकिन धांधली करके उसे टॉपर बना दिया गया।

 इंटरव्यू का खेल और एक लाख से ऊपर की सैलरी

यह पूरा खेल सिर्फ एक ही पद को भरने के लिए खेला गया था। यह नौकरी कोई आम नौकरी नहीं थी, बल्कि इसका वेतन ₹1,23,700 से लेकर ₹1,66,800 प्रति माह तक था। इतनी भारी-भरकम सैलरी और रसूख वाले पद पर अपने आदमी को बैठाने के लिए सिर्फ लिखित परीक्षा में ही नहीं, बल्कि इंटरव्यू में भी जमकर नंबर लुटाए गए।

जब लिखित परीक्षा के बाद इंटरव्यू का दौर आया, तो सेटिंग के तहत इस वामपंथी नेता को 40 में से 36 मार्क्स दे दिए गए। वहीं दूसरी तरफ, जो उम्मीदवार अपनी काबिलियत के दम पर दूसरे नंबर पर था और जो असल में इस पद का असली हकदार था, उसे इंटरव्यू में 40 में से सिर्फ 11 मार्क्स देकर रेस से बाहर कर दिया गया।

इस बेईमानी का भंडाफोड़ तब हुआ जब मुहम्मा के रहने वाले वी एस जयलाल नाम के एक उम्मीदवार ने अपनी आंसर-शीट की कॉपी के लिए अप्लाई किया। आयोग ने जानबूझकर नियुक्ति होने के एक साल बाद उसे कॉपी दी, जिसमें साफ दिख रहा था कि 28 में से सिर्फ 18 सवालों के ही नंबर जोड़े गए थे और 10 सवालों को गायब कर दिया गया था।

 SIT की जाँच का शिकंजा और आगे की कार्रवाई

क्राइम ब्रांच और आईजी अजीता बेगम के नेतृत्व वाली SIT ने अब इस मामले में कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। मूल्यांकन विभाग में इस्तेमाल होने वाले कंप्यूटरों को सील कर दिया गया है और उनके डिजिटल लॉग्स कब्जे में ले लिए गए हैं ताकि फॉरेंसिक जाँच की जा सके।

शुरुआती जाँच के बाद SIT को शक है कि इस पूरे खेल के पीछे भारी लेन-देन यानी रिश्वतखोरी हुई है। इसलिए इस केस में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है। इसके अलावा आपराधिक विश्वासघात और पद के दुरुपयोग की धाराओं में भी जाँच चल रही है।

आरोपितों की बात करें तो जाँच की सुई PSC के परीक्षा विभाग के तीन वरिष्ठ अधिकारियों (एक डिप्टी सेक्रेटरी, एक जूनियर सुपरिटेंडेंट और एक सिस्टम एनालिस्ट) पर टिकी है, जिन्हें जल्द ही आरोपित बनाया जा सकता है।

इसके साथ ही PSC के चेयरमैन एम आर बैजू और इंटरव्यू लेने वाले दो अन्य बोर्ड सदस्यों को भी पूछताछ के लिए नोटिस भेजा जा रहा है। सरकार से इन अधिकारियों पर केस चलाने की मंजूरी माँगी जा रही है।

यह मामला सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं है। अब तक SIT को परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर 90 से ज्यादा शिकायतें मिल चुकी हैं, जिसके बाद जाँच का दायरा बढ़ाने और टीम में और अधिक पुलिस अधिकारियों को शामिल करने का फैसला किया गया है।

पौराणिक कथा से लेकर व्यवहारिक तथ्य… जानिए काँवड़ यात्रा क्यों है आस्था-तप-समरसता का महापर्व: अखिलेश दौर में लगते थे अड़ंगे, योगी सरकार में होती है पुष्प-वर्षा

श्रावण मास के आगमन के साथ ही उत्तर और मध्य भारत का एक विशाल भूभाग ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के दिव्य जयघोषों से गुंजायमान हो उठता है। सड़कों पर उमड़ता गेरुवा वस्त्रधारी श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब, कंधों पर सजी काँवड़ और मन में देवों के देव महादेव के प्रति अगाध श्रद्धा, यही पहचान है काँवड़ यात्रा की।

काँवड़ यात्रा केवल जल अर्पण की एक धार्मिक परंपरा मात्र नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति की उस जीवंत धारा का प्रतीक है जो सदियों से भारतीय जनमानस को एकता, अनुशासन, भक्ति और सामाजिक समरसता के सूत्र में पिरोती आ रही है।

प्रतिवर्ष श्रावण महीने में लाखों-करोड़ों शिवभक्त हरिद्वार, गौमुख, ऋषिकेश, सुल्तानगंज और अन्य पवित्र नदियों से गंगाजल भरकर नंगे पाँव सैकड़ों किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए अपने-अपने क्षेत्रों के शिवालयों में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

यह यात्रा शारीरिक सहनशक्ति, मन के नियंत्रण और आत्मिक समर्पण की एक कठिन परीक्षा होती है। बीते कुछ दशकों में यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बनी है, बल्कि इसने एक विशाल सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप भी धारण कर लिया है।

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा इसे ‘समरसता का महापर्व’ नाम दिया गया है, जो इस यात्रा के वास्तविक चरित्र को सटीक रूप से रेखांकित करता है। समय के साथ-साथ इस यात्रा के सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक आयामों में भी बड़े बदलाव आए हैं, जिसने इसे आज भारत के सबसे भव्य और अनुशासित आयोजनों में से एक बना दिया है। 

काँवड़ यात्रा का इतिहास, पौराणिक कथाएँ और गहरी लोक मान्यताएँ

काँवड़ यात्रा का इतिहास और इसकी शुरुआत भारतीय पौराणिक ग्रंथों तथा लोक-परंपराओं की गहराइयों में समाहित है। यद्यपि किसी एक प्राचीन ग्रंथ में इसका सीधा उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन लोक-परंपरा में इसकी शुरुआत को लेकर कई कथाएँ प्रचलित हैं।

सबसे मूल पौराणिक कथा समुद्र मंथन और नीलकंठ की घटना से जुड़ी हुई है। जब देवताओं और असुरों द्वारा अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन किया गया, तो सबसे पहले उससे हलाहल नामक भीषण विष निकला, जो पूरी सृष्टि के लिए अत्यंत घातक था।

संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने स्वयं उस विष का पान कर लिया और उसे अपने कंठ में धारण कर लिया, जिसके कारण उनका नाम ‘नीलकंठ’ पड़ा। विष के प्रभाव से शिव को अत्यधिक तपन, जलन और पीड़ा हुई, जिसे शांत करने के लिए देवताओं द्वारा पवित्र नदियों के जल से उनका अभिषेक किया गया। 

इसी परंपरा से जुड़ी एक प्रचलित कथा लंकापति रावण से संबंधित है। माना जाता है कि रावण शिव का परम भक्त था और विष की पीड़ा से शिव को राहत दिलाने के लिए उसने गढ़मुक्तेश्वर (उत्तर प्रदेश) से गंगाजल लाकर बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था, जिसके कारण कई लोग रावण को पहला काँवड़िया मानते हैं।

एक अन्य लोकप्रिय कथा भगवान परशुराम से जुड़ती है, जिन्होंने पुरा महादेव मंदिर की स्थापना कर वहाँ नियमित रूप से गंगाजल लाकर शिव-पूजन शुरू किया और श्रावण मास के हर सोमवार को यह क्रम दोहराया। वहीं श्रवण कुमार की कथा में भी काँवड़ का उल्लेख आता है।

वे अपने वृद्ध और दृष्टिहीन माता-पिता को काँवड़ जैसी संरचना में बिठाकर तीर्थ-यात्रा कराते थे, जिसे मातृ-पितृ सेवा और समर्पण की प्रेरणा माना जाता है। काँवड़ यात्रा की कठिन पदयात्रा को भी एक प्रकार की तपस्या और भक्ति-परीक्षा के रूप में देखा जाता है, जहाँ स्थानीय शिवालयों में जल चढ़ाकर कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। 

एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने भी काँवड़ यात्रा की थी। कहा जाता है कि उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। इन कथाओं का साझा भाव यही है कि शिव से जुड़ी पवित्र नदी गंगा के जल द्वारा शिव की पीड़ा शांत की जाए।

ऐतिहासिकता का आयाम और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो काँवड़ यात्रा भारतीय समाज को उसकी सांस्कृतिक और सामाजिक जड़ों से जोड़ने का एक अत्यंत सशक्त माध्यम रही है। प्राचीन भारत में जब आवागमन के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तब लोग दूर-दराज के तीर्थ स्थलों तक पहुँचने के लिए पदयात्राएँ ही करते थे।

काँवड़ यात्रा ने भारत के विशाल भूभाग को भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर एक सांस्कृतिक सूत्र में बाँधने का काम किया। मध्यकाल और आधुनिक काल के शुरुआती वर्षों में काँवड़ यात्रा मुख्य रूप से साधु-संतों, सन्यासियों और ग्रामीण समाज के श्रद्धालुओं तक सीमित थी, लेकिन धीरे-धीरे यह यात्रा जन-आस्था के महापर्व के रूप में परिवर्तित होती चली गई।

इस यात्रा की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि यह रही है कि इसने समाज के विभिन्न वर्गों, जातियों और आर्थिक स्तरों के लोगों के बीच की दूरी को मिटा दिया। जब कोई श्रद्धालु काँवड़ उठाता है, तो वह अपनी सांसारिक पहचान, पद, प्रतिष्ठा और जातिगत अहम् को पीछे छोड़ देता है।

काँवड़ मार्ग पर चलने वाला हर व्यक्ति केवल ‘काँवड़िया’ के रूप में जाना जाता है। एक-दूसरे को ‘भोले’ कहकर पुकारना और एक-दूसरे की मदद करना इस यात्रा की मूल भावना है। इस यात्रा ने औपनिवेशिक काल और उसके बाद के दौर में भी भारतीय लोक संस्कृति, लोकगीतों, भजनों और पारंपरिक वेशभूषा को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इसने ग्रामीण और शहरी भारत के बीच एक जीवंत सांस्कृतिक सेतु का निर्माण किया है, जिससे युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं से सहज रूप से जुड़ पाती है।

काँवड़ यात्रा का तार्किक, व्यावहारिक और सामाजिक-मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

काँवड़ यात्रा के विभिन्न पहलुओं को समझते हुए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इसके पीछे प्रस्तुत किए जाने वाले तर्क किसी नियंत्रित वैज्ञानिक अध्ययन का निष्कर्ष नहीं हैं, बल्कि यह लोक-मान्यता, पर्यावरणीय अवलोकन और तार्किक व्याख्याओं का एक संतुलित मिश्रण है।

श्रावण का समय मानसून काल होता है, जब गंगा और अन्य नदियों के जल-प्रवाह व गुणवत्ता में मौसमी चक्र के कारण स्वाभाविक बदलाव आते हैं। सावन में गंगाजल को विशेष पवित्र मानना इसी पारिस्थितिक समझ को दर्शाता है। 

व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, नंगे पैर या साधारण जूतों में सैकड़ों किलोमीटर की लंबी पैदल यात्रा करना शरीर के लिए दीर्घकालिक सहनशक्ति का अभ्यास है, जो शारीरिक फिटनेस, मानसिक अनुशासन और इच्छाशक्ति को बढ़ाता है।

इसे एक सामूहिक तप-साधना के रूप में देखा जाता है, जिसका मनोवैज्ञानिक लाभ आत्म-नियंत्रण, संयम और सकारात्मक सोच के रूप में मिलता है। इसके अतिरिक्त, सामूहिक रूप से यात्रा करना और रास्ते में मिलने वाले सेवा-शिविरों में भाग लेना समाज में परस्पर सहयोग, आपसी भरोसे और सामाजिक एकजुटता को सुदृढ़ करता है।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से इसे एक मजबूत ‘सामूहिक बंधन’ के रूप में देखा जा सकता है जो आधुनिक जीवन के एकाकीपन और तनाव को दूर करने में सहायक सिद्ध होता है। 

अतीत की चुनौतियाँ: अखिलेश सरकार के दौर में काँवड़ यात्रा की स्थिति

काँवड़ यात्रा के प्रशासनिक इतिहास का विश्लेषण करें, तो उत्तर प्रदेश में 2017 से पूर्व का दौर और उसके बाद का दौर दो स्पष्ट दृष्टिकोणों को दर्शाता है। वर्ष 2012 से 2017 के दौरान उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार में काँवड़ यात्रा को कई प्रकार की प्रशासनिक पाबंदियों और सुरक्षात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ता था।

उस दौर में काँवड़ यात्रा को अक्सर केवल एक कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखा जाता था, न कि किसी विशाल सांस्कृतिक और धार्मिक महोत्सव के रूप में। अखिलेश सरकार के शासनकाल में काँवड़ यात्रा के दौरान डीजे या लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर कड़ी पाबंदियाँ लगा दी गई थीं।

काँवड़ियों के लिए सड़कों पर बुनियादी सुविधाओं जैसे- पीने के स्वच्छ पानी, मोबाइल शौचालय, अस्थायी विश्राम गृहों और प्रकाश व्यवस्था का अभाव रहता था। कई स्थानों पर काँवड़ मार्गों की जर्जर स्थिति, सड़कों पर गड्ढे और लटकते बिजली के तार श्रद्धालुओं के लिए गंभीर दुर्घटनाओं का कारण बनते थे।

सुरक्षा के मोर्चे पर भी संवेदनशील इलाकों से गुजरते समय काँवड़ यात्रियों पर पथराव, इस्लामी कट्टरपंथियों और असमाजिक तत्वों द्वारा व्यवधान पैदा करने की घटनाएँ सामने आती थीं, लेकिन प्रशासनिक रुख अक्सर श्रद्धालुओं के प्रति सख्त रहता था। विभिन्न मार्गों पर जबरन डायवर्ट करने जैसी घटनाओं से काँवड़ियों में आक्रोश और असुरक्षा का भाव बना रहता था।

योगी सरकार का नया दौर: सुविधाओं, सुरक्षा और पुष्प वर्षा से बदला परिदृश्य

वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद काँवड़ यात्रा के प्रति राज्य सरकार के प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टिकोण में एक अभूतपूर्व बदलाव आया। सीएम योगी ने शासन-प्रशासन को स्पष्टनिर्देश दिए कि शिवभक्त काँवड़ियों की सुरक्षा, सम्मान और सुविधा राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने श्रद्धालुओं को महज यात्री न मानकर उन्हें ‘शिव स्वरूप’ के रूप में देखा और उसी भावना के साथ पूरे यात्रा मार्ग पर सुरक्षा व सेवाओं के पुख्ता इंतजाम किए। योगी सरकार के कार्यकाल में काँवड़ यात्रा के व्यवस्थापन में आई इस बदलाव की सबसे प्रमुख और चर्चित पहचान हेलीकॉप्टर से काँवड़ियों पर की जाने वाली पुष्प वर्षा बनी।

मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, लखनऊ और वाराणसी जैसे प्रमुख काँवड़ मार्गों पर वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों द्वारा हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा कर श्रद्धालुओं का अभूतपूर्व स्वागत किया गया, जिसने श्रद्धालुओं के मन में अपनी आस्था के प्रति अपार सम्मान और आत्मगौरव का संचार किया।

सुरक्षा व्यवस्था के मोर्चे पर भी तकनीक का व्यापक इस्तेमाल किया गया, जहाँ एटीएस, ड्रोन कैमरों, सीसीटीवी और बॉडी-वॉर्न कैमरों के माध्यम से पूरे काँवड़ मार्ग की 24 घंटे निगरानी की जाने लगी। संवेदनशील इलाकों में पुलिस बल, पीएसी और केंद्रीय सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की गई।

इसका फायदा ये हुआ कि असमाजिक तत्वों द्वारा किसी भी प्रकार का विघ्न डालने की आशंका काफी हद तक समाप्त हो गई। इसके साथ ही बुनियादी सुविधाओं के स्तर पर व्यापक सुधार किए गए, जिसके तहत काँवड़ मार्गों को पूरी तरह से गड्ढा मुक्त बनाया गया, सड़कों पर लटकते बिजली के तारों को दुरुस्त किया गया और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा गया।

पूरी यात्रा के दौरान सड़कों के किनारे पेयजल के टैंकर, मोबाइल शौचालय, 24 घंटे खुले रहने वाले स्वास्थ्य शिविर और एम्बुलेंस की एहतियाती व्यवस्थाएँ की गईं।

पिछली सरकार के दौरान डीजे और संगीत पर लगे कड़े प्रतिबंधों के विपरीत योगी सरकार ने निर्धारित ध्वनि मानकों के भीतर शिव भजनों और पारंपरिक संगीत को बजाने की छूट दी, जिससे काँवड़ यात्रा का भक्तिमय उत्साह और उल्लास पुनः लौट आया।

अमर उजाला की खबर का स्क्रीनशॉट

धार्मिक पवित्रता बनाए रखने के लिए यात्रा की पूरी अवधि के दौरान काँवड़ मार्गों पर खुले में मांस की बिक्री और शराब की दुकानों को बंद रखने के सख्त निर्देश दिए गए। साथ ही आम नागरिकों, सामाजिक संगठनों और व्यापार मंडलों द्वारा लगाए जाने वाले काँवड़ सेवा शिविरों को सुलभ अनुमति और सुरक्षा मुहैया कराई गई।

योगी सरकार की इस प्रशासनिक संवेदनशीलता और दूरदर्शी प्राथमिकताओं ने काँवड़ियों के मन से पूर्व की असुरक्षा की भावना को पूरी तरह समाप्त कर दिया और यात्रा को एक भव्य, सुरक्षित तथा अनुशासित स्वरूप प्रदान किया।

वामपंथी कुप्रचार को ध्वस्त करता ‘समरसता का महापर्व’

हाल के वर्षों में काँवड़ यात्रा के अभूतपूर्व विस्तार और इसमें उमड़ते करोड़ों श्रद्धालुओं के जनसैलाब को देखकर वामपंथी और लिबरल मीडिया इकोसिस्टम में एक अजीब सी छटपटाहट देखने मिली है। ‘द वायर’, ‘द प्रिंट’ और ‘द कारवां’ जैसे मीडिया संस्थानों ने इसे निशाना बनाने और सनातन धर्म की छवि को धूमिल करने के उद्देश्य से भ्रामक विश्लेषण पेश किए हैं।

कभी काँवड़ियों की जीवनशैली को उपद्रवी और अराजक बताकर खारिज करने का प्रयास किया गया, तो कभी समाजशास्त्र के ‘संस्कृतिकरण’ जैसे क्लिष्ट शब्दों की आड़ लेकर इस विशाल जन-आंदोलन को जातिगत पदानुक्रम और सांस्कृतिक वर्चस्व का परिणाम सिद्ध करने का दुष्प्रचार किया गया।

यहाँ तक कि दलितों और पिछड़ों की इस यात्रा में ऐतिहासिक व अपार भागीदारी को भी ‘समानता’ मानने के बजाय वामपंथी लेखकों द्वारा इसे नीचा दिखाने और दलित समाज को सनातन परंपराओं से दूर करने के लिए भड़काने वाले एजेंडे चलाए गए। लेकिन धरातल पर सनातन संस्कृति और शिवभक्तों की आस्था ने इस पूरे गढ़े गए नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

काँवड़ मार्ग पर बने हजारों सेवा-शिविरों में समाज के हर वर्ग के लोग बिना किसी संकोच या जातिगत भेदभाव के शिवभक्तों के पैर दबाते हैं, उनके लिए भोजन बनाते हैं और उनकी सेवा में लगे रहते हैं। उत्तर प्रदेश के सीएम योगी ने इसे ‘सामाजिक समरसता का महापर्व’ और एकता का महासंगम करार दिया है, जो सनातन समाज की अटूट एकजुटता का जीवंत प्रमाण है।

इतना ही नहीं यह यात्रा करोड़ों रुपए का व्यापार उत्पन्न कर स्थानीय कारीगरों, छोटे विक्रेताओं और गरीब परिवारों को आर्थिक मजबूती प्रदान करती है। काँवड़ यात्रा आज भारतीय जनमानस के आत्मगौरव, अटूट सामाजिक समरसता और सनातन धर्म की सनातन शक्ति का सबसे भव्य प्रतीक बनकर उभरी है।

आतंकवाद, ड्रग्स, साइबर ठगी, क्रिप्टो स्कैम और कट्टरपंथ… Telegram आखिर अपराधियों की पहली पसंद क्यों बन गया?

दुनिया के सबसे लोकप्रिय मैसेजिंग ऐप्स में शामिल टेलीग्राम एक बार फिर बड़े विवादों में घिर गया है। एक तरफ ऑस्ट्रेलिया ने इस ऐप के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, तो दूसरी तरफ रूस ने इसके संस्थापक पावेल ड्यूरोव पर आतंकवादी गतिविधियों में मदद करने जैसे गंभीर आरोप लगा दिए हैं।

दोनों देशों के आरोप अलग-अलग हैं लेकिन सवाल एक ही है कि आखिर टेलीग्राम पर ऐसा क्या हो रहा है कि दुनिया की सरकारें इस पर लगातार सख्त होती जा रही हैं।

पिछले कुछ सालों में टेलीग्राम सिर्फ दोस्तों और परिवार से बातचीत करने वाला ऐप नहीं रह गया है। आज इसका इस्तेमाल करोड़ों लोग पढ़ाई, बिजनेस, न्यूज और कम्युनिटी बनाने के लिए करते हैं। लेकिन इसके साथ ही साइबर ठग, हैकर, ऑनलाइन स्कैम चलाने वाले गिरोह, कट्टरपंथी संगठन और दूसरे अपराधी भी इस प्लेटफॉर्म का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। इसकी वजह है टेलीग्राम के कुछ ऐसे फीचर्स, जो आम लोगों के लिए तो सुविधाजनक हैं लेकिन गलत हाथों में पड़कर बड़े खतरे की वजह बन रहे हैं।

ऑस्ट्रेलिया ने टेलीग्राम के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया?

ऑस्ट्रेलिया की ऑनलाइन सुरक्षा एजेंसी ई-सुरक्षा आयुक्त ने टेलीग्राम के खिलाफ संघीय न्यायालय में कानूनी कार्रवाई शुरू की है। एजेंसी का आरोप है कि टेलीग्राम ने कई बार शिकायत मिलने के बावजूद आतंकवाद और चरमपंथ से जुड़ी सामग्री समय पर नहीं हटाई।

ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि प्लेटफॉर्म पर ऐसे वीडियो और पोस्ट लंबे समय तक उपलब्ध रहे, जिनका संबंध दुनिया के कुछ सबसे चर्चित आतंकी हमलों से था। इनमें न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च मस्जिद हमला, अमेरिका के बफेलो सुपरमार्केट शूटिंग और ISIS द्वारा जारी किए गए सिर कलम करने वाले वीडियो जैसी सामग्री भी शामिल बताई गई है।

ई-सुरक्षा आयुक्त जूली इनमैन ग्रांट का कहना है कि टेलीग्राम को इन पोस्ट के बारे में पहले ही जानकारी दे दी गई थी। इसके बावजूद प्लेटफॉर्म ने इन्हें हटाने में काफी देर कर दी।

उनका मानना है कि जब किसी प्लेटफॉर्म को इस तरह की सामग्री की जानकारी मिल जाती है, तब उसकी जिम्मेदारी बनती है कि वह तुरंत कार्रवाई करे ताकि ऐसी सामग्री लोगों तक न पहुँचे और किसी तरह के कट्टरपंथ या हिंसा को बढ़ावा न मिले।

अगर अदालत टेलीग्राम को दोषी मानती है तो कंपनी पर 54.6 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। यह मामला सिर्फ टेलीग्राम तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इससे यह भी तय होगा कि भविष्य में सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म की कानूनी जिम्मेदारी कितनी होगी।

टेलीग्राम ने आरोपों पर क्या कहा?

टेलीग्राम ने ऑस्ट्रेलिया के सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। कंपनी का कहना है कि वह आतंकवाद के खिलाफ लगातार कार्रवाई करती रही है और उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक है।

टेलीग्राम के मुताबिक उसने केवल साल 2026 में ही आतंकवाद से जुड़े डेढ़ लाख से ज्यादा चैनलों और कम्युनिटी पर कार्रवाई की है। कंपनी का दावा है कि उसके पास ऐसी टीम और सिस्टम मौजूद हैं जो आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े कंटेंट की पहचान करके उसे हटाते हैं। टेलीग्राम का कहना है कि वह अदालत में इन आरोपों का जवाब देगा और कानूनी लड़ाई लड़ेगा।

हालाँकि ऑस्ट्रेलियाई एजेंसी का कहना है कि कार्रवाई तभी मायने रखती है जब वह समय पर की जाए। अगर किसी हिंसक या आतंकी वीडियो को लाखों लोग पहले ही देख चुके हों, तो बाद में उसे हटाने का फायदा बहुत कम रह जाता है। यही बात अब अदालत में भी अहम मुद्दा बनने वाली है।

रूस ने टेलीग्राम के संस्थापक पर क्या आरोप लगाए?

ऑस्ट्रेलिया की कार्रवाई के एक दिन पहले रूस ने भी टेलीग्राम के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पावेल ड्यूरोव के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए। रूस की फेडरल सिक्योरिटी सर्विस यानी FSB का कहना है कि टेलीग्राम पर ऐसे कई चैनल, चैट और बॉट चल रहे थे जिनका इस्तेमाल यूक्रेन की सुरक्षा एजेंसियाँ रूस के अंदर लोगों की भर्ती करने, तोड़फोड़ की घटनाओं की योजना बनाने, साइबर अपराध और आतंकी गतिविधियों के लिए कर रही थीं।

रूस का आरोप है कि टेलीग्राम ने सरकार की ओर से भेजे गए बड़ी संख्या में अनुरोधों के बावजूद ऐसे चैनलों और कंटेंट को नहीं हटाया। FSB का दावा है कि साल 2022 के बाद से टेलीग्राम से जुड़े डेढ़ लाख से ज्यादा मामलों की जाँच की गई है।

इसी आधार पर रूस ने पावेल ड्यूरोव के खिलाफ आतंकवाद में मदद करने का मामला दर्ज किया है और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वांछित घोषित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है।

अगर रूस के कानून के तहत ये आरोप साबित होते हैं तो ड्यूरोव को उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। हालाँकि अभी यह मामला जाँच और कानूनी प्रक्रिया के दौर में है।

पहले भी विवादों में रह चुका है टेलीग्राम

यह पहली बार नहीं है जब टेलीग्राम और उसके संस्थापक कानूनी मुश्किलों में फंसे हैं। साल 2024 में फ्रांस ने भी पावेल ड्यूरोव को हिरासत में लिया था। आरोप था कि टेलीग्राम का इस्तेमाल ड्रग तस्करी, बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री और दूसरे गैरकानूनी कामों के लिए किया जा रहा है तथा कंपनी इन मामलों में पर्याप्त सहयोग नहीं कर रही।

बाद में उन्हें जमानत मिल गई, लेकिन फ्रांस में जाँच अब भी जारी है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में टेलीग्राम पर अलग-अलग देशों की नजर लगातार बनी हुई है।

आखिर टेलीग्राम पर बार-बार सवाल क्यों उठते हैं?

टेलीग्राम को दुनिया भर में एक ऐसा मैसेजिंग प्लेटफॉर्म माना जाता है जो यूजर की निजता को काफी महत्व देता है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ा विवाद भी।

एक तरफ आम यूजर चाहते हैं कि उनकी निजी बातचीत सुरक्षित रहे और कोई उस पर नजर न रख सके। दूसरी तरफ सरकारों और जाँच एजेंसियों का कहना है कि इसी गोपनीयता का फायदा उठाकर अपराधी, साइबर ठग और कट्टरपंथी संगठन अपने नेटवर्क चलाते हैं।

यही वजह है कि हर बार जब किसी बड़े अपराध, ऑनलाइन ठगी या आतंकवादी नेटवर्क का खुलासा होता है तो टेलीग्राम का नाम भी चर्चा में आ जाता है। हालाँकि कंपनी का कहना है कि वह अपराधियों का साथ नहीं देती, बल्कि यूजर की प्राइवेसी और अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करना उसकी प्राथमिकता है। अब अदालतें और जाँच एजेंसियाँ तय करेंगी कि इन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

लेकिन आखिर अपराधियों की पहली पसंद क्यों बन गया टेलीग्राम?

यही सबसे बड़ा सवाल है। आखिर ऐसा क्या है जो साइबर ठग, हैकर, ऑनलाइन स्कैम चलाने वाले गिरोह और कट्टरपंथी संगठन WhatsApp या दूसरे ऐप्स की बजाय टेलीग्राम को ज्यादा पसंद करते हैं? इसके पीछे कई तकनीकी और सिस्टम से जुड़े कारण बताए जाते हैं।

इनमें यूजर की पहचान छिपाने की सुविधा, सीक्रेट चैट, ऑटो डिलीट मैसेज, बड़े चैनल, लाखों लोगों तक एक साथ पहुँच और आसान अकाउंट बनाने जैसी कई सुविधाएँ शामिल हैं। इन्हीं वजहों से पिछले कुछ वर्षों में टेलीग्राम अपराधियों के बीच भी तेजी से लोकप्रिय हुआ है।

पिछले कुछ वर्षों में साइबर अपराध से जुड़े कई मामलों की जाँच में टेलीग्राम का नाम सामने आया है। इसका मतलब यह नहीं है कि टेलीग्राम सिर्फ अपराधियों के लिए बना है, लेकिन इसकी कुछ सुविधाएँ ऐसी हैं जिनका गलत इस्तेमाल करना दूसरे प्लेटफॉर्म की तुलना में आसान माना जाता है।

यही वजह है कि ऑनलाइन ठगी करने वाले गिरोह, हैकर, फर्जी निवेश योजनाएँ चलाने वाले लोग और कई बार कट्टरपंथी संगठन भी इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते पाए गए हैं।

सबसे पहले बात करें पहचान छिपाने की। टेलीग्राम पर किसी से बातचीत करने के लिए हमेशा मोबाइल नंबर दिखाना जरूरी नहीं होता। यूजर सिर्फ अपने यूजरनेम के जरिए भी दूसरे लोगों से जुड़ सकता है।

इसका फायदा यह होता है कि आम लोग अपनी प्राइवेसी बनाए रख सकते हैं, लेकिन दूसरी तरफ साइबर अपराधी भी अपनी असली पहचान छिपाकर कई अलग-अलग अकाउंट बना लेते हैं।

अगर किसी कारण से एक अकाउंट बंद भी हो जाए तो वे कुछ ही मिनटों में दूसरा अकाउंट तैयार कर लेते हैं। इससे जाँच एजेंसियों के लिए असली व्यक्ति तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है।

टेलीग्राम की एक और खासियत सीक्रेट चैट और ऑटो डिलीट मैसेज हैं। इस फीचर में भेजे गए मैसेज तय समय के बाद अपने आप डिलीट हो जाते हैं। इसका फायदा उन लोगों को भी मिलता है जो अपनी निजी बातचीत सुरक्षित रखना चाहते हैं, लेकिन कई अपराधी इसी सुविधा का इस्तेमाल इसलिए करते हैं ताकि बातचीत का कोई स्थायी रिकॉर्ड न बचे।

जाँच एजेंसियों के लिए ऐसे मामलों में सबूत जुटाना काफी मुस्किल हो जाता है। इसके अलावा टेलीग्राम पर बड़े-बड़े चैनल और ग्रुप बनाना भी बेहद आसान है। यहाँ लाखों लोगों तक एक साथ जानकारी पहुँचाई जा सकती है।

कई रिपोर्टों में सामने आया है कि कुछ कट्टरपंथी संगठन और साइबर ठगी करने वाले गिरोह इसी सुविधा का इस्तेमाल अपने प्रचार या फर्जी योजनाओं को फैलाने के लिए करते हैं। अगर उनका एक चैनल बंद हो जाता है तो वे पहले से तैयार दूसरे चैनल पर अपने सभी सदस्यों को भेज देते हैं और उनका नेटवर्क लगभग बिना रुके चलता रहता है।

टेलीग्राम के सुपरग्रुप में दो लाख तक सदस्य जोड़े जा सकते हैं। इतनी बड़ी संख्या में लोगों तक एक साथ पहुँच बनाना किसी भी संगठन के लिए आसान हो जाता है। यही वजह है कि कई साइबर ठग हजारों लोगों को एक साथ जोड़कर फर्जी निवेश योजनाएँ, ऑनलाइन लोन, क्रिप्टोकरेंसी में जल्दी पैसा कमाने का लालच या दूसरी ठगी से जुड़ी जानकारी फैलाते हैं।

टेलीग्राम का सर्च सिस्टम भी अपराधियों के लिए मददगार माना जाता है। वे क्रिप्टोकरेंसी, फॉरेक्स ट्रेडिंग, ऑनलाइन जॉब्स, क्विक मनी जैसे शब्दों को खोजकर ऐसे लोगों तक पहुँच जाते हैं जो जल्दी पैसा कमाने के लालच में आ सकते हैं। इसके बाद उन्हें निजी ग्रुप या चैनल में जोड़कर तरह-तरह की योजनाओं में फंसाया जाता है।

एक और बड़ी वजह यह है कि टेलीग्राम पर किसी कंपनी जैसा नाम, लोगो और प्रोफाइल बनाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। कई ठग खुद को बैंक, सरकारी संस्था या किसी बड़ी कंपनी का प्रतिनिधि बताकर लोगों से संपर्क करते हैं। कई बार लोग उन्हें असली समझ लेते हैं और अपनी निजी जानकारी, बैंक डिटेल या पैसे उनके साथ साझा कर देते हैं।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि टेलीग्राम का कंटेंट मॉडरेशन दूसरे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की तुलना में कम सख्त माना जाता है। आरोप यह है कि कई बार अवैध चैनल, ठगी से जुड़े ग्रुप या आपत्तिजनक सामग्री लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनी रहती है।

हालाँकि टेलीग्राम इन आरोपों से इनकार करता है और कहता है कि वह लगातार आतंकवाद, हिंसा और गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़े कंटेंट पर कार्रवाई करता है। टेलीग्राम का इस्तेमाल करना भी बेहद आसान है। डार्क वेब की तरह यहाँ किसी विशेष तकनीकी जानकारी या अलग सॉफ्टवेयर की जरूरत नहीं पड़ती।

कोई भी व्यक्ति अपने मोबाइल में ऐप डाउनलोड करके कुछ ही मिनटों में इसका इस्तेमाल शुरू कर सकता है। इसी कारण नए लोग भी आसानी से ऐसे नेटवर्क तक पहुँच जाते हैं जिनका इस्तेमाल साइबर अपराधी करते हैं।

कई रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि टेलीग्राम का इस्तेमाल नए लोगों की भर्ती के लिए किया जाता है। शुरुआत में उन्हें वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन कमाई या घर बैठे पैसे कमाइए जैसे आकर्षक ऑफर दिए जाते हैं।

जब लोग इन ऑफरों में रुचि दिखाते हैं तो उन्हें निजी चैनलों में जोड़कर फर्जी निवेश, साइबर ठगी, मनी लॉन्ड्रिंग और दूसरे ऑनलाइन फ्रॉड के तरीके सिखाए जाते हैं। यही कारण है कि कई देशों की जांच एजेंसियाँ टेलीग्राम पर लगातार नजर बनाए रखती हैं।

टेलीग्राम बाकी मैसेजिंग ऐप्स से अलग कैसे है?

टेलीग्राम सिर्फ विवादों की वजह से लोकप्रिय नहीं हुआ है। इसकी कई ऐसी सुविधाएँ हैं जो इसे दूसरे मैसेजिंग ऐप्स से अलग बनाती हैं। इस प्लेटफॉर्म पर बड़ी-बड़ी फाइलें आसानी से भेजी जा सकती हैं, क्लाउड स्टोरेज की सुविधा मिलती है, एक ही अकाउंट को कई डिवाइस पर एक साथ इस्तेमाल किया जा सकता है और बड़े ग्रुप तथा अनलिमिटेड चैनल बनाए जा सकते हैं।

यूजरनेम के जरिए बातचीत, सीक्रेट चैट, ऑटो डिलीट मैसेज और तेज स्पीड जैसी सुविधाओं की वजह से भी करोड़ों लोग टेलीग्राम को पसंद करते हैं। यही फीचर्स आम यूजर्स के लिए सुविधाजनक हैं, लेकिन गलत हाथों में पड़ने पर इनका दुरुपयोग भी हो रहा है।

क्या टेलीग्राम पूरी तरह दोषी है?

इस पूरे विवाद का दूसरा पक्ष भी है। टेलीग्राम लगातार यह कहता आया है कि उसका मकसद लोगों की निजता और अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करना है। कंपनी का दावा है कि वह हर साल लाखों आपत्तिजनक पोस्ट, चैनल और आतंकवादी समूहों को हटाती है।

उसका यह भी कहना है कि केवल 2026 में ही आतंकवाद से जुड़े डेढ़ लाख से ज्यादा समुदायों पर कार्रवाई की गई है। दूसरी तरफ कई देशों की सरकारों और जाँच एजेंसियों का कहना है कि जब किसी प्लेटफॉर्म को किसी आपत्तिजनक या आतंकवादी सामग्री की जानकारी दी जाती है तो उसे तुरंत हटाया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि अगर ऐसी सामग्री लंबे समय तक ऑनलाइन रहती है तो उससे हिंसा और कट्टरपंथ को बढ़ावा मिल सकता है।

यही वजह है कि आज दुनिया भर में यह बहस चल रही है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यूजर की निजता ज्यादा महत्वपूर्ण है या समाज और देश की सुरक्षा। आने वाले समय में अदालतों के फैसले इस सवाल का जवाब काफी हद तक तय करेंगे।