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UP के मेडिकल कॉलेजों में धर्मांतरण पर सख्त योगी सरकार, बनेंगे विशेष निगरानी सेल: जानें- इनका काम और कैसे कॉलेजों में चलता है मुस्लिम बनाने का खेल

उत्तर प्रदेश के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों, जैसे- लखनऊ के केजीएमयू, सीजीपीजीआई में हाल में सामने आए धर्मांतरण के मामलों को देखते हुए योगी सरकार इस पर अंकुश लगाने के लिए एक सेल बनाने जा रही है। इससे पहले राज्य भर में जबरन धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ को रोकने के लिए योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म समपरिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक लागू किया था, जिसके तहत दोषियों को 20 साल तक की कैद या आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है।

अब राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने मेडिकल कॉलेजों में धर्मांतरण और लव जिहाद के मामले की गंभीरता को समझते हुए चिकित्सा संस्थानों में धर्मांतरण रोकथाम के लिए विशेष निगरानी सेल बनाने के निर्देश दिए है। कुलाधिपति के विशेष कार्याधिकारी डॉ. सुधीर एम बोबड़े की ओर से विश्वविद्यालय को पत्र भेज कर जरूरी कदम उठाने को कहा है।

क्या है धर्मांतरण रोकथाम निगरानी सेल

केजीएमयू के बाद लखनऊ पीजीआई से लव जिहाद का मामला सामने आने से हड़कप मच गया। यहाँ एक लड़की पिछले कई दिनों से लापता है। इसको देखते हुए राज्यपाल ने निगरानी सेल बनाने के निर्देश दिए। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी यूनिवर्सिटी से जुड़े सभी उत्तर प्रदेश के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में ऐसे सेल का निर्माण किया जा रहा है, जो धर्मांतरण संबंधी गतिविधियों को रोकेगा।

कैसे काम करेगा सेल

  • सेल छात्रो, डॉक्टरों और कॉलेज के कर्मचारियों को धर्मांतरण को लेकर जागरूक करेगा।
  • किसी भी तरह के संदिग्ध गतिविधियों पर कड़ी नजर रखेगा।
  • छात्रों और कर्मचारियों को नियमों, अधिकारों और जिम्मेदारियों के बारे में जानकारी दी जाएगी।
  • समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाया जाएगा, ताकि सभी अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सचेत रहें।
  • किसी भी तरह की शिकायत मिलने पर उसे कॉलेज दबाएगा नहीं, बल्कि मामले के तह तक जाकर नियमानुसार एक्शन लेगा।
  • विश्वविद्यालय प्रशासन का उद्देश्य है कि शैक्षणिक संस्थानों में स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण बना रहे, इसलिए सेल का निर्माण किया जा रहा है।

धर्मांतरण से जुड़ी एक के बाद एक कई मामले सामने आने के बाद छात्र-छात्राओं समेत संस्थान के तमाम लोगों की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए। जाँच में ये पता चला कि संस्थानों के हॉस्टल और मेडिकल कॉलेज परिसर में धर्मांतरण गिरोह सक्रिय है, जो जूनियर छात्रों, डॉक्टरों, नर्सिंग के छात्र, डॉक्टरों और कर्मचारियों को निशाना बना रहा है। सेल के माध्यम से इन गिरोहों पर लगाम कसी जाएगी।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने सभी कॉलेजों को जल्द सेल गठित करने और उसकी सूचना विश्वविद्यालय को देने को कहा है। धर्मांतरण को लेकर किसी भी तरह की शिकायत मिलने पर नियम के मुताबिक कार्रवाई करने के लिए कहा गया है। इसको लेकर सतर्कता बढ़ाने के लिए कहा गया है।

एसजीपीजीआई में ‘लव जिहाद’ का मामला

एसजीपीजीआई परिसर में रहने वाले एक हिन्दू परिवार की 21 साल की बेटी अचानक 26 मई 2026 को लापता हो गई। परिवार के संपर्क में रहने वाले इरशाद अली पर परिवार ने धर्मांतरण करने और उसे सीरिया भेजने का आरोप लगा रहा है। इरशाद अली ने युवती को प्रेमजाल में फँसा कर परिवार से ‘दोस्ती’ कर ली थी।

वह लड़की को सीरिया ले जाने की बात कह रहा था। इरशाद अली को पीजीआई के डॉक्टर अजमल का समर्थन मिला हुआ था। डॉक्टर अजमल ने पीजीआई परिसर में मस्जिद बनवाया था। एक और मस्जिद उसने पहलगाम में बनवाया था। डॉक्टर अजमल के विदेश जाने पर फिलहाल रोक लगी हुई है। इस घटना ने पीजीआई में युवती को बहला फुसला कर सीरिया जैसे इस्लामिक देश भेजने, धर्मांतरण करने और उसमें संस्थान की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

केजीएमयू में धर्मांतरण मामला

लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में हिंदू महिला डॉक्टर के लव जिहाद का मामला हाल ही में सामने आया था। महिला डॉक्टर को प्रेम जाल में फँसाकर डॉ. रमीजुद्दीन ने उसका शोषण किया और उस पर धर्मांतरण का दबाव बनाया। रमीजुद्दीन शादीशुदा था और उसने हिन्दू लड़की का धर्मांतरण करा कर उससे निकाह कर रखा था।

रमीजुद्दीन की बीवी ने ही हिन्दू महिला डॉक्टर को पूरी कहानी बताई थी। मामला सामने आने के बाद परत-दर-परत कट्टरपंथियों की साजिश का पता चला। इस धर्मांतरण का राजनीतिक गठजोड़ भी सामने आया और पता चला कि कैसे सपा-बसपा जैसे राजनीतिक दल सालों से इनलोगों के संरक्षक बने हुए थे। इस दौरान पता चला कि सिर्फ डॉक्टर रमीजुद्दीन ही नहीं उसका अब्बू सलीमुद्दीन भी 4 हिन्दू महिलाओं से निकाह कर रखा था और उन्हें इस्लाम कबूलने के लिए मजबूर किया था।

आगरा मेडिकल कॉलेज में धर्मांतरण के मामले

डॉक्टर रमीजुद्दीन ने अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई आगरा मेडिकल कॉलेज से की थी। 2012 में वहाँ इस्लामिक मेडिकोज मीट नाम से संगठन बनाया था। इसकी बैठकों में मौलाना छात्रों को बताते थे कि कैसे हिन्दू लड़कियों से नजदीकी बढ़ाकर इस्लाम कबूल करवाया जाए और निकाह करने के लिए मजबूर किया जाए।

इस्लामिक मेडिकोज नाम का एक वॉट्सऐप ग्रुप भी था जिसमें ये कट्टरपंथी जुड़े हुए थे। डॉक्टर रमीजुद्दीन की तरह की 4-5 डॉक्टर बस इस काम में ही लगे हुए थे। रमीजुद्दीन लड़कियों को सेक्स पॉवर दिखाने के लिए अमेरिका से गाँजा भी मँगवाता था और उसका सेवन करता था।

रमीजुद्दीन जब केजीएमयू आया तो उसक वक्त 4-5 मुस्लिम डॉक्टर कट्टरपंथी भगोड़ा जाकिर नाइक के संपर्क में थे। 2004 के आसपास केजीएमयू में इनका प्रभाव इतना था कि हिजाब पहनना और बकरदाढ़ी रखना आम हो गया। ये लोग हिन्दू लड़कियों को फँसाने लगे थे।

केजीएमयू और आगरा मेडिकल कॉलेज दोनों में ही इस्लामिक मेडिकोज मीट होती थी। यही वजह है कि हिन्दू लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाने और धर्मातरण कराने का तरीका भी दोनों जगहों पर एक जैसा था।

वर्षों से चल रहा धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ का खेल

यह साफ नहीं है कि KGMU और आगरा के ये समूह आपस में जुड़े थे या अलग-अलग काम कर रहे थे। इतना जरूर है कि मेडिकल कॉलेजों में मौलानाओं का आना-जाना धीरे-धीरे सामान्य होता गया। बस्ती मेडिकल कॉलेज में पिछले एक साल से मौलाना आने लगे। बुलंदशहर मेडिकल कॉलेज में तो एक फर्स्ट-ईयर के HOD पर मेडिकल साइंस पढ़ाते समय हदीस के उदाहरण देने का आरोप लगा, जिसे बाद में साथी फैकल्टी ने समझाकर रोका।

बुलंदशहर में मुस्लिम छात्रों की संख्या अधिक होने के कारण नमाज की व्यवस्था के लिए प्रिंसिपल पर दबाव भी बनाया गया। हालाँकि, विरोध के बाद यह संभव नहीं हो पाया। कुल मिलाकर, मौलानाओं की मौजूदगी अब कई मेडिकल कॉलेजों में आम हो गई है।

डॉ भूपेंद्र बताते हैं कि आज से करीब 10-15 साल पहले भी KGMU धर्मांतरण का बड़ा अड्डा बना हुआ था। उस समय सपा-बसपा की सरकारें थीं और आसपास की मस्जिदों से मौलाना अक्सर कैंपस में आते-जाते थे। बाद में योगी सरकार आने के बाद काफी समय तक हालात शांत रहे। पिछले कुछ सालों से यह गतिविधियाँ फिर से शुरू हो गई हैं।

रमीज का दिल्ली विस्फोट के अपराधी से संबंध

दिल्ली के लाल किले के पास हुए बम विस्फोट के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए डॉ. परवेज अंसारी के साथ रमीज़ के संबंधों का भी खुलासा हुआ है। उन्होंने एसएन मेडिकल कॉलेज की छात्राओं का धर्म परिवर्तन कराने के उद्देश्य से एक नेटवर्क बनाया था। दोनों एक ही छात्रावास में साथ रहते थे और हिंदू लड़कियों को लुभाने की योजना बनाते थे। उन्होंने कई मौलवियों को मिलाकर एक समूह बनाया था। कॉलेज में दाखिला लेने वाली हर नई मुस्लिम छात्रा को उनके समूह में शामिल कर लिया जाता था।

मेडिकल के छात्र और जूनियर डॉक्टर सबसे पहले अपनी महिला सहपाठियों से धर्म परिवर्तन कराने के उद्देश्य से दोस्ती करते थे। वे उनकी हर हरकत पर बारीकी से नज़र रखते थे, व्याख्यान कक्ष से लेकर पुस्तकालय तक उनके साथ रहते थे। एक बार घनिष्ठता स्थापित हो जाने पर, वे लड़कियों के आपत्तिजनक वीडियो रिकॉर्ड करते थे और फिर उनका इस्तेमाल उन्हें इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए दबाव डालने के लिए करते थे। ऐसी खबरें हैं कि कई महिलाएँ और छात्राएँ इस साजिश का शिकार हुईं।

राज्यभर में जबरन धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ को रोकने के लिए योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म समपरिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक लागू किया था, जिसके तहत दोषियों को 20 साल तक की कैद या आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है ।

ऐसे मामलों पर अंकुश लगाने के लिए योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म समपरिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक लागू किया है। लालच, धोखाधड़ी से धर्मांतरण कराने पर 3 से 10 साल की जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान है। विदेशी फंडिंग या बड़े पैमाने पर अवैध धर्मांतरण कराने पर 7 से 14 वर्ष तक की सजा और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का नियम है।

शादी का झाँसा देकर, ब्लैकमेल कर या जबरन धर्म परिवर्तन कराने जैसे मामलों में 20 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। नए संशोधनों के अनुसार, अब किसी भी व्यक्ति को पीड़ित होने पर या अवैध धर्मांतरण की सूचना देने पर FIR दर्ज कराने का अधिकार दिया गया है। ऐसे मामलों में जमानत पर भी सख्ती बरती गई है।

बीफ का शौकीन और ध्रुव राठी का ‘फैन’: जानें- कौन है जैनों के खिलाफ हिंदुओं को भड़काने चला प्रसाद वेदपाठक, पहलगाम के ‘इस्लामी जिहाद’ पर कर रहा था लीपापोती

आज के समय में सोशल मीडिया पर समझदारी से ज्यादा गुस्सा और विवाद तेजी से फैलते हैं। ऐसे माहौल में कई बार सिर्फ ध्यान खींचने के लिए लोग बिना वजह विवाद खड़ा कर देते हैं। इसी महीने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर प्रसाद वेदपाठक ने भी कुछ ऐसा ही किया, जब उन्होंने महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई की एक हाउसिंग सोसाइटी में जैन मुनियों की सुविधा के लिए बनाए गए सफेद रास्ते को लेकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की।

सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा से जुड़ी इस व्यवस्था को प्रसाद वेदपाठक ने सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। उन्होंने इसे ‘जैन जिहाद’ जैसा भड़काऊ और विवादित शब्द कहकर पेश किया जिसके बाद जैन समुदाय ही नहीं बल्कि दूसरे लोगों ने भी इस पर आपत्ति जताई और विरोध किया।

फोटो साभार: X

यह विवाद एक बार फिर एक अहम सवाल खड़ा करता है कि आखिर प्रसाद वेदपाठक कौन हैं और वे ऐसी परंपरा को लेकर जैन समुदाय पर निशाना क्यों साध रहे हैं, जिसकी जड़ें करुणा और मानवता में निहित हैं?

कैसे एक सफेद रास्ते को बना दिया गया ‘जैन जिहाद’

पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब प्रसाद वेदपाठक ने मुंबई के घाटकोपर इलाके की एक हाउसिंग सोसाइटी के वीडियो पोस्ट किए। इन वीडियो में उन्होंने जैन मुनियों के आने-जाने की सुविधा के लिए बनाए गए सफेद रास्तों पर आपत्ति जताई।

गौरतलब है कि जैन मुनि अक्सर नंगे पैर चलते हैं और अहिंसा व सादगी के बेहद सख्त नियमों का पालन करते हैं। गर्मियों के दौरान कई जगह रास्तों पर अस्थायी रूप से सफेद कोटिंग की जाती है ताकि जमीन कम गर्म रहे और मुनियों को चलने में आसानी हो।

वहीं, बारिश के मौसम में सीमेंट के रास्तों पर अक्सर काई जम जाती है। जैन दर्शन के अनुसार, काई सिर्फ एक परत नहीं बल्कि जीवित तत्व मानी जाती है, जिसमें अनगिनत सूक्ष्म जीव मौजूद होते हैं। चूँकि जैन मुनि हर जीव के प्रति अहिंसा के सिद्धांत का पालन करते हैं इसलिए वे काई पर चलने से बचते हैं क्योंकि ऐसा करने से उन सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुँच सकता है।

इसी वजह से कई बार रास्तों के कुछ हिस्सों पर सफेद पेंट या सफेदी की जाती है। इससे एक तरफ गर्मियों में जमीन ठंडी रहती है, वहीं बारिश में काई जमने की संभावना भी कम हो जाती है। इसका उद्देश्य किसी तरह का अलगाव, कब्जा या क्षेत्र पर दावा करना नहीं होता जैसा कि वेदपाठक और कुछ अन्य लोगों ने दिखाने की कोशिश की। इसका मकसद सिर्फ इतना होता है कि जैन मुनि सुरक्षित तरीके से चल सकें और गोचरी (भोजन के लिए घर-घर जाना) जैसी अपनी धार्मिक परंपरा निभाते हुए अनजाने में किसी जीव को नुकसान न पहुँचे।

यानी जिसे प्रसाद वेदपाठक ने धार्मिक दबदबे या ‘जैन जिहाद’ की तरह दिखाने की कोशिश की वह असल में जैन धर्म के सबसे मूल सिद्धांतों में से एक ‘हर छोटे से छोटे जीव के प्रति करुणा’ का हिस्सा है।

इस परंपरा को पहले समझने की कोशिश करने के बजाय वेदपाठक ने इसे ‘जैन जिहाद’ जैसा भड़काऊ नाम दे दिया। सोशल मीडिया पर कई लोगों जिनमें जैन समुदाय के सदस्य भी शामिल थे ने इसके पीछे की परंपरा और वजह समझाने की कोशिश की। एक सोशल मीडिया यूजर ने सोसाइटी में सफेद रास्ता बनाए जाने की जैन परंपरा को विस्तार से समझाया जिसका वीडियो नीचे देखा जा सकता है।

हालाँकि, लोगों द्वारा वजह समझाने के बाद भी प्रसाद वेदपाठक अपने दावे पर अड़े रहे। उन्होंने इस पूरे मामले को ‘इलाके पर कब्जा दिखाने’, ‘धार्मिक राजनीति’ और जैन समुदाय द्वारा कथित दबदबा बनाने से जोड़कर पेश करना जारी रखा।

बाद में उन्होंने उस सफेद रास्ते को दोबारा पेंट भी करवा दिया। लेकिन तब तक ऐसा लग रहा था कि उनका मकसद पूरा हो चुका था कि खुद को इस लड़ाई का विजेता दिखाना, खुद को पीड़ित पक्ष बताना और विवाद को लगातार जिंदा रखकर चर्चा और ध्यान बटोरना।

विवाद भड़काने के बाद खुद को पीड़ित बताने की कोशिश

जब उनके बयान को लेकर आलोचना बढ़ने लगी, तब प्रसाद वेदपाठक का रुख अचानक बदलता दिखा। एक लंबे सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने दावा किया कि वे हमेशा से जैन धर्म की करुणा, विनम्रता और अहिंसा की भावना की प्रशंसा करते रहे हैं। उन्होंने जैन समुदाय से अपील भी की कि वे उन सोसाइटी निवासियों के प्रति सहानुभूति दिखाएँ जिन्हें कथित तौर पर इस सफेद रास्ते से परेशानी हुई।

हालाँकि, उनके इस बयान में सबसे अहम सवाल का जवाब नहीं था कि आखिर उन्होंने शुरुआत में जैन समुदाय को ‘दबदबा बनाने वाला’ क्यों बताया और एक सामान्य धार्मिक परंपरा को ‘जैन जिहाद’ जैसा भड़काऊ नाम क्यों दिया?

दिलचस्प बात यह रही कि जैन धर्म के प्रति सम्मान जताने का दावा करने के बावजूद वे बार-बार यह संकेत देते रहे कि यह सफेद रास्ता किसी तरह की धार्मिक ताकत दिखाने का तरीका है और जैन समुदाय दूसरों पर अपनी बात थोप रहा है।

यही बात लोगों को खटकती रही और उनके रुख में विरोधाभास साफ नजर आया। अगर मामला सिर्फ सोसाइटी की सहमति या स्थानीय व्यवस्था का था, तो फिर ऐसी भाषा का इस्तेमाल क्यों किया गया जो साफ तौर पर सांप्रदायिक प्रतिक्रिया भड़काने वाली मानी जा सकती है?

जैनों के खिलाफ हिंदुओं को खड़ा करने की कोशिश?

इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहलू शायद यह था कि प्रसाद वेदपाठक ने मामले को ‘महाराष्ट्र के लोग बनाम जैन’ के रूप में पेश करने की कोशिश की। वीडियो, कैप्शन और लगातार सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए उन्होंने यह माहौल बनाने का प्रयास किया कि जैन समुदाय कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा प्रभाव रखने वाला और दबदबा बनाने वाला समूह है।

उनकी यह बात सोशल मीडिया पर पहले से कट्टर सोच रखने वाले कुछ लोगों के बीच तेजी से फैली और उन्होंने इस नैरेटिव को आगे बढ़ाया।

इसी दौरान ‘विवादित एक्टिविस्ट’ तीस्ता सीतलवाड़ ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। 2002 के गुजरात दंगों और फर्जी दस्तावेज, गवाहों को प्रभावित करने जैसे आरोपों से जुड़े मामले में 2022 में गुजरात ATS द्वारा गिरफ्तार की जा चुकी तीस्ता सीतलवाड़ ने सफेद रास्ते के विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जैन ‘नए दबदबा बनाने वाले’ बनते जा रहे हैं और मुंबईकरों के खिलाफ काम कर रहे हैं।

विडंबना यह है कि भारत की कुल आबादी में जैन समुदाय की हिस्सेदारी करीब 0.4 प्रतिशत ही है। इसके बावजूद, वही समूह जो अक्सर इस्लामी कट्टरता या मुस्लिम वर्चस्ववाद को लेकर उठने वाली चिंताओं को ‘बहुसंख्यक मानसिकता’ कहकर खारिज कर देता है, उसने अचानक इस छोटे से समुदाय को सामाजिक सौहार्द के लिए खतरे की तरह पेश करना शुरू कर दिया।

जब जमीन कब्जाने, जबरन धर्मांतरण की कोशिशों या धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाने जैसे मामलों पर सवाल उठते हैं, तब ऐसे कई एक्टिविस्ट मुसलमानों को बहुसंख्यक पूर्वाग्रह का शिकार बताने लगते हैं। लेकिन जैन समुदाय के मामले में तस्वीर उलटी दिखाई गई और एक छोटे अल्पसंख्यक समुदाय को उसकी सदियों पुरानी, अहिंसा, करुणा और हर जीव के सम्मान पर आधारित परंपरा का पालन करने के लिए निशाना बनाया गया।

कुल मिलाकर, सफेद रास्ते को लेकर प्रसाद वेदपाठक द्वारा शुरू किए गए विवाद से लेकर जैन समुदाय को ‘दमनकारी’ की तरह दिखाने की कोशिश तक, पूरे घटनाक्रम में एक सुनियोजित अभियान जैसी झलक दिखी जिसका मकसद जैन समुदाय और हिंदू समाज के बीच दूरी पैदा करना प्रतीत हुआ।

वेदपाठक ने पहलगाम आतंकी हमले को ‘इस्लामिक जिहाद’ कहने से किया परहेज

प्रसाद वेदपाठक का सेलेक्टिव आक्रोश उस समय और साफ नजर आता है, जब उसकी तुलना अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले पर उनकी प्रतिक्रिया से की जाती है। इस हमले में पाकिस्तानी आतंकियों ने पर्यटकों की धार्मिक पहचान पूछकर उन्हें निशाना बनाया था और उनकी हत्या कर दी थी।

हालाँकि, इस घटना के पीछे मौजूद इस्लामी जिहादी सोच पर खुलकर सवाल उठाने के बजाय, वेदपाठक ने लोगों को ‘एकता’ का संदेश देना ज्यादा जरूरी समझा। उन्होंने लोगों को पीड़ितों की हिंदू पहचान पर चर्चा न करने की सलाह दी और कहा कि ऐसा करने वाले लोग अनजाने में आतंकियों के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रहे हैं।

उन्होंने लोगों से सुरक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने की बात कही और इस हमले को मुख्य रूप से प्रशासनिक या सुरक्षा व्यवस्था की विफलता के रूप में पेश किया, न कि धार्मिक नफरत से प्रेरित हिंसा के तौर पर।

जब आतंकियों ने लोगों को हिंदू होने की वजह से चुनकर निशाना बनाया, तब वेदपाठक सांप्रदायिक चर्चा से बचने, एकता बनाए रखने और प्रशासनिक जवाबदेही की बात करते दिखे। लेकिन जब मामला जैन धर्म की एक पुरानी और अहिंसा पर आधारित धार्मिक परंपरा का आया, तब उन्होंने बिना हिचक इसे ‘जैन जिहाद’ कह दिया और एक छोटे अल्पसंख्यक समुदाय को सामाजिक समस्या की तरह पेश करने लगे।

पहली बार नहीं जब वेदपाठक ने जैन परंपराओं को निशाना बनाया

दिलचस्प बात यह है कि सफेद रास्ते को लेकर हुआ विवाद जैन परंपराओं से वेदपाठक का पहला टकराव नहीं था। अप्रैल 2025 में उन्होंने मशहूर रणकपुर जैन मंदिर जाने के बाद भी सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जताई थी। वेदपाठक ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि मंदिर में प्रवेश से पहले लोगों को बेल्ट, वॉलेट जैसी चमड़े (लेदर) की चीजें बाहर रखनी पड़ती हैं।

इसके अलावा, उन्होंने मंदिर में मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान महिलाओं के प्रवेश से जुड़े नियम पर भी सवाल उठाए थे। हालाँकि, ये दोनों बातें जैन धार्मिक परंपराओं में कोई नई या असामान्य चीज नहीं मानी जातीं।

जैन धर्म में चमड़े से बनी चीजों पर रोक का सीधा संबंध उसके सबसे मूल सिद्धांत अहिंसा से है। इसी तरह, जैन धर्मग्रंथों जिन्हें जैन आगम कहा जाता है, में यह उल्लेख मिलता है कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर परिसर में प्रवेश से बचना चाहिए। यह नियम सिर्फ रणकपुर मंदिर तक सीमित नहीं है बल्कि दुनिया भर के कई जैन मंदिरों में लंबे समय से धार्मिक परंपरा के रूप में माना जाता रहा है।

वेदपाठक: मूर्ति पूजा का विरोधी, बीफ खाने की बात और ध्रुव राठी का फैन

प्रसाद वेदपाठक खुद को अक्सर हिंदू हितों की आवाज उठाने वाले व्यक्ति के रूप में पेश करते हैं। लेकिन उनका पुराना सोशल मीडिया रिकॉर्ड एक अलग तस्वीर दिखाता है।

एक वायरल पोस्ट में वेदपाठक ने उन्हें गिफ्ट में मिली भगवान गणेश की एक कलाकृति को लेकर नाराजगी जताई थी। उन्होंने एक यूजर पर निशाना साधते हुए लिखा था, “तुम्हें पता था कि मैं मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करता, फिर भी तुमने मुझे गणपति की म्यूरल गिफ्ट की।”

वेदपाठक के सोशल मीडिया पोस्ट में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं, जहाँ उन्होंने खुले तौर पर बीफ खाने की बात की है। हिंदू समाज के बड़े हिस्से में बीफ खाना धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से वर्जित माना जाता है। एक पोस्ट में उन्होंने अपने फॉलोअर्स से ‘Beef and Bacon Burger’ को लेकर सुझाव भी माँगे थे।

वेदपाठक की वैचारिक पसंद भी किसी से छिपी नहीं रही है। अप्रैल 2024 में उन्होंने जर्मनी में रहने वाले यूट्यूब ध्रुव राठी का एक पुराना इंटरव्यू शेयर किया था और उन्हें भारतीय मीडिया का भविष्य बताया था।

यह इसलिए भी चर्चा का विषय बना क्योंकि ध्रुव राठी और उनके समर्थक समूह पर अक्सर हिंदू समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर विवादित नैरेटिव बनाने के आरोप लगते रहे हैं जबकि वे खुद को निष्पक्ष टिप्पणीकार के रूप में पेश करते हैं।

जैन समुदाय के सफेद रास्ते वाले विवाद में भी वेदपाठक का तरीका कुछ इसी पैटर्न जैसा दिखाई दिया कि पहले किसी संवेदनशील मुद्दे को उठाना, फिर उसे सबसे भड़काऊ तरीके से पेश करना, विवाद और प्रतिक्रियाएँ बटोरना और बाद में आलोचना बढ़ने पर खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश करना।

गुस्से और विवाद को बना लिया ‘बिजनेस मॉडल’?

अगर सफेद रास्ते वाले विवाद को अलग-थलग देखा जाए तो यह एक छोटा सा मामला लग सकता है। लेकिन जब इसे प्रसाद वेदपाठक के पुराने व्यवहार और बयानों के साथ जोड़कर देखा जाता है तो एक पैटर्न साफ नजर आने लगता है।

एक सामान्य जैन परंपरा को ‘जैन जिहाद’ बता दिया जाता है। मंदिरों की धार्मिक परंपराओं को भेदभाव का उदाहरण कहा जाता है। भगवान गणेश की तस्वीर वाला एक गिफ्ट नाराजगी की वजह बन जाता है।

ऐसा लगता है कि धार्मिक भावनाओं का मुद्दा भी चुनिंदा तरीके से उठाया जाता है क्योंकि यहाँ ज्यादा विवाद, बहस और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया मिलने की संभावना है। यहाँ मुख्य बात कोई सिद्धांत या विचारधारा नहीं बल्कि ध्यान खींचना दिखाई देता है।

आज सोशल मीडिया के दौर में गुस्सा, विवाद और आक्रोश भी एक तरह का ‘कंटेंट’ बन चुका है जिससे लोकप्रियता और कमाई दोनों हासिल की जा सकती हैं। कई इन्फ्लुएंसर्स के लिए ऐसे मुद्दों को विवाद में बदलना फायदे का सौदा बन जाता है। जितना बड़ा विवाद, उतनी ज्यादा चर्चा और उतना ज्यादा एंगेजमेंट। जैन समाज के सफेद रास्ते वाला मामला भी कुछ ऐसा ही नजर आता है।

जैन परंपरा को समझने की कोशिश करने के बजाय, वेदपाठक ने उसे विवाद का मुद्दा बनाया। सदियों पुरानी अहिंसा और करुणा पर आधारित धार्मिक व्यवस्था को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई। जब इस पर विरोध शुरू हुआ, तो खुद को पीड़ित पक्ष की तरह पेश करने का प्रयास भी देखने को मिला।

हो सकता है कि सोसाइटी का वह सफेद रास्ता अब हट गया हो लेकिन पूरे जैन समुदाय को शक और नाराजगी के नजरिए से देखने का माहौल बनाने की कोशिश ने प्रसाद वेदपाठक के बारे में कहीं ज्यादा बातें उजागर कर दीं बजाय जैन समुदाय के।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

अंतरिक्ष में भी अमेरिका-रूस टकराव: ISS में ‘एयर लीक’ को लेकर भिड़े दोनों देश, समझें- सबसे महँगी अंतरिक्ष प्रयोगशाला के संकट की पूरी कहानी

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) एक बार फिर सुर्खियों में है लेकिन इस बार वजह कोई बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग या नई खोज नहीं बल्कि एक ऐसा तकनीकी संकट है जिसने अंतरिक्ष एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी। ISS में लगातार बढ़ रहे एयर लीक ने हालात इतने गंभीर कर दिए कि NASA को एहतियातन कुछ अंतरिक्ष यात्रियों को ‘सेफ हेवन’ में भेजना पड़ा और आपातकालीन निकासी तक की तैयारी करनी पड़ी।

हालाँकि स्थिति बाद में नियंत्रण में आ गई लेकिन इस घटना ने दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे महँगी अंतरिक्ष प्रयोगशाला की बढ़ती उम्र, उसकी सुरक्षा और अंतरिक्ष मिशनों के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ISS पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर ऊपर परिक्रमा करने वाली मानव निर्मित सबसे बड़ी अंतरिक्ष प्रयोगशाला है। यहाँ अंतरिक्ष यात्री रहते हैं और वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं। यह करीब 28000 km/h की रफ्तार से चलता है और हर 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है। इसका पहला मॉड्यूल 1998 में लॉन्च किया गया था और तब से यह लगातार सक्रिय है।

अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और कनाडा सहित कई देशों की साझेदारी से चल रहा यह स्टेशन पिछले करीब तीन दशकों से अंतरिक्ष अनुसंधान का केंद्र बना हुआ है। यहाँ वैज्ञानिक माइक्रोग्रैविटी में ट्रीटमेंट, बायोलॉजी, फिजिक्स, कृषि और स्पेस टेक्नोलॉजी से जुड़े प्रयोग करते हैं।

स्टेशन का आकार लगभग एक फुटबॉल मैदान जितना है और यह मानव उपस्थिति वाला अंतरिक्ष में सबसे बड़ा ठिकाना माना जाता है।

आखिर कहाँ से हो रहा है एयर लीक?

मौजूदा समस्या ISS के रूसी हिस्से में मौजूद ज्वेज्दा (Zvezda) सर्विस मॉड्यूल के भीतर स्थित PrK ट्रांसफर टनल से जुड़ी हुई है। यह टनल एक डॉकिंग पोर्ट को मुख्य मॉड्यूल से जोड़ती है। सितंबर 2019 में पहली बार यहाँ दबाव में कमी दर्ज की गई थी। जाँच में पता चला कि इस हिस्से में छोटी दरारें मौजूद हैं जिनसे धीरे-धीरे हवा बाहर निकल रही है।

तब से रोस्कोस्मोस इस समस्या को दूर करने के लिए कई बार अस्थायी और स्थायी सीलेंट का इस्तेमाल कर चुका है। हालाँकि हर मरम्मत के बाद कुछ समय के लिए स्थिति बेहतर हुई लेकिन रिसाव पूरी तरह बंद नहीं हो सका। पिछले कई वर्षों में यह समस्या बार-बार सामने आती रही और अब इसे स्टेशन की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौतियों में गिना जा रहा है।

हाल में क्यों बढ़ गई चिंता?

जून 2026 के पहले सप्ताह में प्रोग्रेस-95 कार्गो यान के संचालन के दौरान रोस्कोस्मोस इंजीनियरों ने पाया कि स्थिति पहले की तुलना में अधिक गंभीर हो चुकी है। पहले जहाँ हर दिन लगभग एक पाउंड हवा का नुकसान हो रहा था, वहीं अब यह बढ़कर करीब दो पाउंड प्रतिदिन तक पहुँच गया।

इसके अलावा इंजीनियरों को PrK टनल में कुछ नए संदिग्ध क्षेत्र भी मिले, जहाँ से हवा के रिसाव की आशंका जताई गई। यही वजह थी कि रूसी अंतरिक्ष एजेंसी ने सामान्य पैचवर्क मरम्मत की बजाय अधिक व्यापक निरीक्षण और संरचनात्मक मरम्मत की योजना बनाई।

बढ़ती रिसाव दर ने NASA और रोस्कोस्मोस दोनों को सतर्क कर दिया क्योंकि लगातार दबाव में कमी स्टेशन की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन सकती है।

मरम्मत के दौरान क्यों अलर्ट पर आया पूरा स्टेशन?

लीकेज के सोर्स तक बेहतर पहुँच बनाने के लिए रोस्कोस्मोस ने एक विशेष मेटल ब्रैकेट को काटने की योजना तैयार की थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रूसी कॉस्मोनॉट्स एक आरी (Saw) की मदद से उस हिस्से तक पहुँचने वाले थे जहाँ उन्हें दरार होने की आशंका थी।

NASA को चिंता थी कि इस प्रक्रिया से आसपास की स्ट्रक्चर को नुकसान पहुँच सकता है और स्थिति और खराब हो सकती है। इसी वजह से अमेरिकी मिशन कंट्रोल ने एहतियातन पाँच अंतरिक्ष यात्रियों को ‘सेफ हेवन‘ प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया। इसके तहत उन्हें स्पेस एक्स ड्रैगन अंतरिक्ष यान में जाकर बैठने के लिए कहा गया, ताकि यदि कोई आपात स्थिति पैदा हो तो वे तुरंत स्टेशन छोड़ सकें।

यह स्थिति लगभग दो घंटे तक बनी रही। बाद में जब रोस्कोस्मोस ने मरम्मत कार्य रोकने और अतिरिक्त जाँच करने का फैसला किया तो NASA ने भी राहत की साँस ली और अंतरिक्ष यात्रियों को वापस सामान्य कार्यों पर लौटने की अनुमति दे दी।

किन अंतरिक्ष यात्रियों को भेजा गया था सेफ हेवन में?

NASA के निर्देश के बाद क्रू-12 मिशन के चार सदस्यों और NASA के एक अन्य अंतरिक्ष यात्री को ड्रैगन कैप्सूल में जाने के लिए कहा गया। इनमें NASA की जेसिका मीर, जैक हैथवे, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की सोफी एडेनॉट, रोस्कोस्मोस के आंद्रेई फेड्यायेव और NASA के क्रिस विलियम्स शामिल थे।

दूसरी ओर रूसी कॉस्मोनॉट्स सर्गेई कुड-स्वेर्चकोव और सर्गेई मिकायेव स्टेशन पर ही रहे और संभावित मरम्मत अभियान की तैयारियों में जुटे रहे। ड्रैगन कैप्सूल इस दौरान एक लाइफबोट की तरह तैयार रखा गया था, जो जरूरत पड़ने पर कुछ ही मिनटों में स्टेशन से अलग होकर पृथ्वी की ओर रवाना हो सकता था।

NASA और रोस्कोस्मोस के बीच कहाँ है मतभेद?

ISS में एयर लीक को लेकर दोनों एजेंसियों के बीच लंबे समय से नजरिए का अंतर देखा गया है। NASA का मानना है कि समस्या की वास्तविक जड़ अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है और किसी भी बड़े स्ट्रक्चरल इन्वेन्शन से पहले अधिक डेटा जुटाना जरूरी है।

दूसरी ओर रोस्कोस्मोस अपेक्षाकृत आक्रामक मरम्मत रणनीति अपनाने के पक्ष में दिखाई देता है। यही वजह थी कि जब रूसी एजेंसी ने स्ट्रक्चर को काटकर अंदर तक पहुँचने की योजना बनाई तो NASA ने इस पर आपत्ति जताई।

2024 में NASA के इंस्पेक्टर जनरल की रिपोर्ट में भी यह उल्लेख किया गया था कि दोनों एजेंसियाँ इस बात पर भी पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि किस स्तर पर पहुँचकर इस रिसाव को अस्थिर या अस्वीकार्य माना जाए।

हालाँकि मौजूदा मामले में रोस्कोस्मोस द्वारा मरम्मत कार्य रोकने के फैसले का NASA ने समर्थन किया और दोनों एजेंसियों ने संयुक्त रूप से आगे की जाँच जारी रखने पर सहमति जताई।

फिलहाल स्थिति क्या है?

रोस्कोस्मोस के अनुसार हालिया निरीक्षण के दौरान दो संभावित रिसाव बिंदुओं की पहचान की गई थी। इनमें से एक को सफलतापूर्वक सील कर दिया गया है, जबकि दूसरे क्षेत्र की जाँच जारी है। साथ ही उन सभी स्थानों का पुनः निरीक्षण किया जा रहा है जहाँ पहले सीलेंट लगाए गए थे।

NASA ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल ड्राइवर ग्रुप की सुरक्षा को कोई तत्काल खतरा नहीं है। सभी अंतरिक्ष यात्री सामान्य कार्यों पर लौट चुके हैं और वैज्ञानिक गतिविधियाँ पहले की तरह जारी हैं। फिर भी एजेंसियाँ इस समस्या को पूरी तरह समाप्त करने के लिए दीर्घकालिक समाधान तलाश रही हैं।

क्या ISS को खाली कराने की नौबत आ सकती है?

ISS के 27 वर्षों के ऑपरेशनल हिस्ट्री में अब तक कभी पूरी तरह से निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ी है। हालाँकि अंतरिक्ष मलबे के खतरे या तकनीकी समस्याओं के दौरान कई बार सेफ हेवन प्रक्रिया लागू की गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा एयर लीक चिंता का विषय जरूर है, लेकिन फिलहाल यह उस स्तर तक नहीं पहुँचा है जहाँ पूरे स्टेशन को खाली कराना पड़े। फिर भी यदि रिसाव लगातार बढ़ता रहा और प्रभावी समाधान नहीं मिला तो भविष्य में स्टेशन के कुछ हिस्सों को स्थायी रूप से बंद करने जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।

ISS पर इस समय कौन-कौन से वैज्ञानिक प्रयोग चल रहे हैं?

तकनीकी चुनौतियों के बावजूद ISS पर वैज्ञानिक अनुसंधान लगातार जारी हैं। हाल के दिनों में अंतरिक्ष यात्री 3D बायोप्रिंटिंग के जरिए मानव कार्टिलेज ऊतक तैयार करने, स्टेम सेल अनुसंधान, माइक्रोबायोलॉजी प्रयोग और अंतरिक्ष में पौधों की वृद्धि से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं।

इसके अलावा अल्फाल्फा फसलों की खेती, मानव शरीर पर माइक्रोग्रैविटी के प्रभावों का अध्ययन और लंबी अवधि के अंतरिक्ष अभियानों के लिए हेल्थ से जुड़े रिसर्च भी जारी हैं। इन प्रयोगों का उद्देश्य भविष्य में चंद्रमा और मंगल जैसे मिशनों के लिए आवश्यक वैज्ञानिक आधार तैयार करना है।

ISS पर कितना खर्च हुआ, कौन देता है पैसा और क्यों माना जाता है दुनिया का सबसे महँगा वैज्ञानिक प्रोजेक्ट?

ISS को मानव इतिहास की सबसे महंगी वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग परियोजनाओं में गिना जाता है। जब 1998 में इसका निर्माण शुरू हुआ था, तब इसकी लागत का अनुमान काफी कम था, लेकिन समय के साथ नए मॉड्यूल जोड़ने, अंतरिक्ष यात्रियों के मिशन, कार्गो उड़ानों, रखरखाव और चलाने में लगने वाले खर्चों के कारण इसकी कुल लागत लगातार बढ़ती गई।

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के अनुसार, ISS के विकास, निर्माण, असेंबली और शुरुआती वर्षों के संचालन पर लगभग 100 अरब यूरो (करीब 10 लाख करोड़ रुपए) खर्च हुए थे।

वहीं बाद के वर्षों में इसको चलाने और रखरखाव लागत जुड़ने के बाद अलग-अलग अंतरिक्ष एजेंसियों के अनुमान बताते हैं कि ISS पर अब तक कुल खर्च 150 से 170 अरब डॉलर (करीब 12.5 से 14 लाख करोड़ रुपए) के बीच पहुँच चुका है। इसी वजह से इसे दुनिया की सबसे महँगी मानव निर्मित संरचनाओं में शामिल किया जाता है।

ISS किसी एक देश की संपत्ति नहीं है बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय साझेदारी परियोजना है। इसके प्रमुख साझेदार अमेरिका (NASA), रूस (रोस्कोस्मोस), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA), जापान (JAXA) और कनाडा (CSA) हैं।

इनमें सबसे बड़ा वित्तीय योगदान अमेरिका का है। NASA न केवल स्टेशन के अधिकांश ऑपरेशन का खर्च उठाता है, बल्कि हर साल इसके रखरखाव, रिसर्च और क्रू तथा कार्गो मिशनों पर अरबों डॉलर खर्च करता है। NASA के लिए अकेले ISS का सालाना ऑपरेशन का खर्च लगभग 3 अरब डॉलर माना जाता है।

रूस ने भी ISS के निर्माण और ऑपरेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रूसी अंतरिक्ष निगम एनर्जिया के अनुसार, 1994 से 2023 के बीच रूस ने ISS कार्यक्रम में लगभग 14.2 अरब डॉलर (करीब 1.36 लाख करोड़ रुपए) का निवेश किया है। वहीं ESA, जापान और कनाडा ने अपने-अपने मॉड्यूल, वैज्ञानिक उपकरणों और तकनीकी संसाधनों के जरिए अरबों डॉलर का योगदान दिया है।

विशेषज्ञों के मुताबिक ISS पर हुआ खर्च केवल अंतरिक्ष स्टेशन बनाने तक सीमित नहीं है। इसमें अंतरिक्ष में मॉड्यूल पहुँचाने के लिए किए गए दर्जनों स्पेस शटल मिशन, लगातार होने वाली सप्लाई उड़ानें, वैज्ञानिक प्रयोग, ग्राउंड कंट्रोल नेटवर्क और अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा व प्रशिक्षण जैसी लागतें भी शामिल हैं। यही कारण है कि लगभग तीन दशक बाद भी यह परियोजना दुनिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग के उदाहरणों में गिनी जाती है।

कब तक सेवा में रहेगा ISS?

NASA फिलहाल ISS को 2030 तक चलने की योजना पर काम कर रहा है। इसके बाद स्टेशन को नियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कराकर नष्ट कर दिया जाएगा। हालाँकि अमेरिका की कॉन्ग्रेस में एक विधेयक पर चर्चा चल रही है जिसके तहत ISS को 2032 तक चलाने की बात कही जा रही है।

इस प्रस्ताव को अमेरिकी सीनेट के कई वरिष्ठ नेताओं का समर्थन प्राप्त है। उनका मानना है कि निजी अंतरिक्ष स्टेशनों के पूरी तरह तैयार होने तक ISS को सक्रिय रखना जरूरी है। साथ ही यह कदम अंतरिक्ष क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी के मुकाबले अमेरिका की स्थिति मजबूत बनाए रखने में भी मदद कर सकता है।

‘वीडियो बनाकर फैसला वापस लो’: दाऊदी बोहरा विवाद में पूर्व जस्टिस के परिवार को मिल रहीं श्मशान की धमकियाँ, लंदन में बेटी पर हमला; विस्तार से जानें- उत्तराधिकार का वो मामला

बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस गौतम सिंह पटेल और उनके परिवार को 2024 में दाऊदी बोहरा समुदाय के एक उत्तराधिकार विवाद में दिए गए उनके फैसले के कारण पिछले करीब 10 महीनों से लगातार धमकियों और जानलेवा हमलों का सामना करना पड़ रहा है। स्थिति इंतनी गंभीर हो गई कि लंदन में रहने वाली उनकी बेटी के घर पर हमला भी किया गया। पूर्व जस्टिस से माँग की जा रही है कि वे वीडियो रिकॉर्ड कर उसमें फैसला वापस लेने की बात कहें।

इस मुद्दे पर अब भारत के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने दखल दिया है। उन्होंने लंदन की अपनी यात्रा के दौरान इस मुद्दे को भारतीय उच्चायोग के सामने रखा। CJI सूर्यकांत ने भारतीय उच्चायुक्त पी कुमारन से इस मामले पर चर्चा की और जस्टिस पटेल और उनके परिवार की सुरक्षा के संबंध में आश्वासन प्राप्त किया। उच्चायुक्त ने भरोसा दिलाया कि पटेल या उनके परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा और इसके लिए लंदन पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं।

पूर्व जस्टिस गौतम पटेल से वीडियो बनाकर फैसला वापस लेने की माँग

पूर्व जस्टिस गौतम पटेल ने द वायर को बताया कि खुद को दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रभावशाली लोगों का समूह बताने वाले कुछ लोगों ने उनसे फैसला वापस लेने की माँग की। उनसे कहा गया कि वे भारत से बाहर जाकर एक यूट्यूब वीडियो जारी करें, जिसमें यह स्वीकार करें कि उन्होंने दबाव या किसी प्रलोभन के कारण गलत फैसला दिया था।

साथ ही उनसे यह भी कहा गया कि वे बॉम्बे बार एसोसिएशन से भी यह वीडियो अपलोड करने को कहें और पत्रकारों को इंटरव्यू देकर इन बातों को दोहराएँ। धमकी देने वालों से इन माँगों को पूरा करने के लिए सितंबर (2025) के आखिर तक का समय दिया।

लेकिन पूर्व जस्टिस पटेल ने इन माँगों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उनका कहना है कि किसी न्यायिक फैसले को इस तरह ‘वापस लेना’ कानून में संभव ही नहीं है। इसके बाद से ही पटेल और उनके परिवार पर खतरा मंडराने लगा। अब तक उनके परिवार पर 5 बार निशाना बनाया जा चुका है, इनमें चार बार लंदन में और एक बार मुंबई में।

लंदन में पटेल की बेटी के घर पर हमले से लेकर पत्नी को धमकियाँ तक, क्या-क्या हुआ?

अगस्त 2025 में लंदन में रहने वाली जस्टिस पटेल की बेटी अदिति के घर में घुसपैठ की घटना हुई। शुरुआत में इसे सामान्य चोरी या सेंधमारी का मामला माना गया, लेकिन कुछ सप्ताह बाद तस्वीर साफ होने लगी। अदिति को एक पत्र मिला, जो उनके पिता के नाम लिखा गया था। पत्र में जस्टिस पटेल के फैसले को ‘गलत’ बताते हुए उनसे उसे वापस लेने की माँग की गई थी।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि पत्र लिखने वालों ने अदिति के घर में हुई घुसपैठ की जिम्मेदारी भी ली। इसके सबूत के तौर पर उन्होंने एक एसडी कार्ड भेजा, जिसमें घर में घुसने का वीडियो होने का दावा किया गया था। इसके कुछ दिन बाद 9 सितंबर 2025 को मुंबई में जस्टिस पटेल की पत्नी को भी यही पत्र मिला। इस संबंध में मुंबई पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।

लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। 22 अप्रैल 2026 को अदिति पर लंदन में उनके घर के पास हमला किया गया। वह अपने बच्चे को स्कूल छोड़कर लौट रही थीं, तभी एक नकाबपोश व्यक्ति ने उन पर हमला कर दिया। उन्हें कई बार मुक्के मारे गए और जमीन पर गिरने के बाद भी लातों से पीटा गया। पड़ोसियों के मौके पर पहुँचने के बाद हमलावर वहाँ से भाग निकला। इस हमले में अदिति की नाक टूट गई। खास बात यह रही कि उनके पास मौजूद फोन और पर्स नहीं छीना गया, जिससे यह सामान्य लूटपाट की घटना नहीं लगी और इसके पीछे की मंशा साफ हुई।

अब जस्टिस के परिवार को जान से मारने की धमकी

अब 5 जून 2026 को अदिति के लंदन स्थित घर पर एक और पत्र पहुँचा, जिसमें जस्टिस पटेल और उनके परिवार को सीधे जान से मारने की धमकी दी गई। पत्र में कहा गया कि उन्हें पहले ही काफी चेतावनी दी जा चुकी है और अगला कदम ‘श्मशान’ होगा। धमकी देने वालों ने फिर वही पुरानी माँग दोहराई कि अगर जस्टिस पटेल पहले वाले पत्र में बताई गई शर्तें मान लें, तभी कथित ‘कॉन्ट्रैक्ट’ रद्द किया जाएगा।

इस पत्र के साथ भी एक एसडी कार्ड भेजा गया। हालाँकि परिवार ने उसे खुद देखने के बजाय सीधे पुलिस को सौंप दिया। जस्टिस पटेल का कहना है कि उन्हें पूरा विश्वास है कि धमकी भरे पत्रों और उनकी बेटी पर हुए हमलों के बीच सीधा संबंध है। फिलहाल लंदन पुलिस इस पूरे मामले की जाँच कर रही है, जबकि भारत और ब्रिटेन दोनों देशों के अधिकारियों ने जस्टिस पटेल और उनके परिवार की सुरक्षा को लेकर कदम उठाने का भरोसा दिया है।

आखिर दाऊदी बोहरा उत्तराधिकार विवाद क्या है?

इस पूरे विवाद को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि शिया इस्लाम के दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘दाई-अल-मुतलक’ (Dai-al-Mutlaq) का पद क्या होता है। दाई-अल-मुतलक समुदाय का सर्वोच्च आध्यात्मिक प्रमुख माना जाता है। उनके धार्मिक फैसलों और नेतृत्व को समुदाय में विशेष महत्व दिया जाता है।

विवाद की शुरुआत जनवरी 2014 में हुई, जब दाईदी बोहरा समुदाय के 52वें दाई-अल-मुतलक सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन का निधन हो गया। उनके निधन के तुरंत बाद उनके बेटे सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन ने 53वें दाई-अल-मुतलक के रूप में नेतृत्व संभाल लिया। लेकिन यहीं से उत्तराधिकार को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया।

दूसरी तरफ बुरहानुद्दीन के सौतेले भाई खुझैमा कुतुबुद्दीन ने दावा किया कि उन्हें वर्ष 1965 में ही गुप्त रूप से उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया था। दाऊदी बोहरा परंपरा में उत्तराधिकारी घोषित करने की प्रक्रिया को ‘नस्स’ (Nass) कहा जाता है। कुतुबुद्दीन का कहना था कि उन्हें वैध उत्तराधिकारी बनाया गया था, इसलिए 53वें दाई का पद उन्हें मिलना चाहिए था।

2014 से 2024 तक, अदालत में कैसे चली 10 साल की लड़ाई?

मार्च 2014 में खुझैमा कुतुबद्दीन ने बॉम्बे हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया। उन्होंने अदालत से माँग की कि उन्हें दाऊदी बोहरा समुदाय का वैध 53वाँ दाई-अल-मुतलक घोषित किया जाए। इसके जवाब में सैयदना मुफद्दीन ने कहा कि उनके अब्बा ने सार्वजनिक रूप से कई मौकों पर उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।

मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों ने दस्तावेज, धार्मिक परंपराओं से जुड़े तर्क, गवाह और अन्य सबूत पेश किए। इसी बीच 2016 में खुझैमा कुतुबुद्दीन का निधन हो गया। इसके बाद उनके बेटे ताहेर फखरुद्दीन ने अदालत में यह लड़ाई आगे बढ़ाई। यह मामला धीरे-धीरे भारत के सबसे चर्चित धार्मिक उत्तराधिकार मामलों में बदल गया। सुनवाई कई वर्षों तक चली। नवंबर 2022 से अंतिम बहस शुरू हुई और 5 अप्रैल 2023 को सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया।

पूर्व जस्टिस गौतम पटेल ने क्या फैसला दिया और विवाद क्यों बढ़ा?

करीब एक साल बाद 23 अप्रैल 2024 को बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस गौतम पटेल ने अपना फैसला सुनाया। उन्होंने ताहेर फखरुद्दीन की याचिका खारिज कर दी और माना कि सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन को ही वैध रूप से 53वाँ दाई-अल-मुतलक नियुक्त किया गया था। अदालत ने कहा कि उनके पक्ष में पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, जबकि विरोधी पक्ष अपने दावे को साबित करने में सफल नहीं रहा।

फैसला सुनाते समय जस्टिस पटेल ने यह भी कहा था कि उन्होंने मामले को ‘आस्था नहीं, बल्कि सबूतों’ के आधार पर तय किया है। अदालत का काम धार्मिक मान्यताओं पर फैसला देना नहीं, बल्कि प्रस्तुत साक्ष्यों की जाँच करना है। फैसले पर दाऊदी बोहरा समुदाय ने एक प्रेस रिलीज जारी करके इसे ‘ऐतिहासिक फैसला’ बताते हुए तारीफ भी की थी।

अब इसी फैसले पर जस्टिस गौतम पटेल को निशाना बनाया जा रहा है। इसीलिए यह मामला केवल एक रिटायर्ड जस्टिस और उनके परिवार की सुरक्षा का नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या किसी न्यायाधीश को उसके फैसले के लिए इस तरह निशाना बनाया जा सकता है। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है।

‘ईरान युद्ध के डर से नहीं रुका स्टारलिंक का भारत आना’: स्पेसएक्स VP लॉरेन ड्रायर ने ब्लूमबर्ग के दावों को किया खारिज, बोलीं- सरकार से बातचीत जारी; जानिए भारत सरकार का जवाब

स्पेसएक्स की स्टारलिंक बिजनेस ऑपरेशंस की वाइस प्रेसिडेंट लॉरेन ड्रायर (Lauren Dreyer) ने ब्लूमबर्ग (Bloomberg) के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। ब्लूमबर्ग ने कहा था कि ईरान युद्ध से जुड़ी सुरक्षा चिंता के कारण भारत में स्टारलिंक का लॉन्च रुक गया है।

लॉरेन ड्रायर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर पोस्ट करके इस रिपोर्ट को ‘भ्रामक’ और ‘अज्ञात स्रोतों के नाम पर किया गया निराधार दावा’ करार दिया। उनके अनुसार, लॉन्च में देरी की खबरें पूरी तरह से गलत हैं और उनकी कंपनी के भारत सरकार के साथ सार्थक चर्चा चल रही है।

ड्रायर ने बताया कि स्टारलिंक ने आवश्यक नियामक और अनुपालन प्रक्रियाओं (regulatory and compliance processes) को पूरी पारदर्शिता के साथ पूरा किया है। भारत सरकार के साथ पूरी जिम्मेदार के साथ काम किया है। उन्होंने आगे कहा कि स्टारलिंक ने देश के लिए एक ‘खास डिप्लॉयमेंट मॉडल’ तैयार किया है, जो देश की संप्रभुता को ध्यान में रखते हुए टेक्नोलॉजी, रेगुलेटरी और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करेगा।

ड्रायर ने कहा कि कंपनी को सरकार से देश के दूरदराज और कम सेवा वाले क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को आगे बढ़ाने के लिए काफी उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिल रही है। हम भारत के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं और सरकार के साथ मिलकर जल्द ही देश में स्टारलिंक की सेवाएँ शुरू करने के लिए काम कर रहे हैं।

मामले से जुड़े जानकारों का भी कहना है कि ईरान युद्ध जैसी कोई बात नहीं है और केवल तकनीकी मंजूरी तथा स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़े तकनीकी मुद्दे विचाराधीन हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के एक सूत्र ने भी कहा, “हाँ, क्योंकि तकनीकी मंजूरी और स्पेक्ट्रम के आवंटन को लेकर एक मसला है। बाकी सब ठीक है। मुझे नहीं लगता कि ईरान युद्ध की वजह से कोई चिंता की बात है।”

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में क्या है?

9 जून (मंगलवार) को ब्लूमबर्ग ने “Starlink India Launch Hits Security Roadblock Before SpaceX IPO” (SpaceX IPO से पहले Starlink के भारत में लॉन्च में सुरक्षा संबंधी अड़चन) नाम से एक लेख छापा। इसमें दावा किया गया कि मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, भारत ने एलन मस्क की स्पेस-बेस्ड इंटरनेट सर्विस Starlink को कमर्शियल ऑपरेशन शुरू करने की मंजूरी देने की प्रक्रिया को रोक दिया है। इसकी वजह ईरान युद्ध में इसके सैटेलाइट टर्मिनल का इस्तेमाल है।

लेख में अंदरूनी सूत्रों का हवाला देते हुए कहा गया कि Starlink को ऑपरेशन शुरू करने के लिए जो आखिरी मंजूरी चाहिए थी, उन्हें गृह मंत्रालय के तहत आने वाली सुरक्षा एजेंसियों ने रोक दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मिडिल ईस्ट में संकट के दौरान स्टारलिंक टर्मिनल का इस्तेमाल किया गया था, जबकि ईरानी क्षेत्र में इस सर्विस का लाइसेंस नहीं था, इसलिए भारत को भू-राजनीतिक तनाव के समय अमेरिका स्थित ऑपरेटर को नियंत्रित करने को लेकर चिंता है।

ब्लूमबर्ग ने बताया, “यह झटका ऐसे समय में लगा है जब SpaceX इतिहास का सबसे बड़ा IPO लाने की तैयारी कर रहा है। 12 जून 2026 को Nasdaq पर लिस्टिंग के जरिए 1.75 ट्रिलियन डॉलर के वैल्यूएशन का लक्ष्य है। कंपनी के मुख्य रेवेन्यू इंजन के तौर पर Starlink उस वैल्यूएशन के लिए अहम है।”

इसमें यह भी कहा गया है कि चीन ने इस सर्विस तक पहुँच को असल में रोक दिया है, जबकि दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश और इंटरनेट के सबसे बड़े बाजार भारत तक अब पहुँच नहीं हो पा रही है। आर्टिकल में यह भी बताया गया है कि किसी भी कमर्शियल लॉन्च (चाहे वह स्टारलिंक का हो या किसी और का) के लिए जरूरी सैटेलाइट-स्पेक्ट्रम प्राइस प्लान, इस गतिरोध की वजह से रुका हुआ है।

सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया है कि भारत के टेलीकम्युनिकेशन विभाग ने इसका फ्रेमवर्क तो तैयार कर लिया है, लेकिन मंजूरी के लिए इसे अभी तक यूनियन कैबिनेट के पास नहीं भेजा गया है।

ब्लूमबर्ग ने कहा, “स्टारलिंक को भारत में लगभग एक साल पहले ‘ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशन बाय सैटेलाइट’ लाइसेंस मिला था। इससे उसे समझौता करने और ऑपरेशन की तैयारी करने की इजाजत मिली, लेकिन यह लाइसेंस एक बड़ी रेगुलेटरी प्रक्रिया का सिर्फ एक पड़ाव था, जो अब रुक गई है।”

इसमें बताया गया कि स्टारलिंक ने पिछले साल सिक्योरिटी से जुड़े डेमो दिखाए थे, जिनकी जाँच एक स्पेशल सिक्योरिटी पैनल और टेलीकॉम अधिकारियों ने की थी। आर्टिकल में कहा गया है कि तब से भारतीय अधिकारियों ने और पूछताछ की है और नियमों का ज्यादा सख्ती से पालन करने की माँग की है।

ब्लूमबर्ग के अनुसार, स्टारलिंक की सिक्योरिटी मंजूरी तब तक पेंडिंग रहेगी, जब तक वह यह साफ नहीं कर देती कि अपनी ग्लोबल पहुँच और अमेरिकी मालिकाना हक के बावजूद, वह भारतीय सिक्योरिटी नियमों का पालन कैसे सुनिश्चित करेगी। खासकर जियोपॉलिटिकल तनाव की वजह से पड़ने वाले दबाव के वक्त क्या करेगी।

आर्टिकल में लिखा है, “यह जाँच सिर्फ स्टारलिंक तक सीमित नहीं है। लोगों ने बताया कि ईरान संघर्ष के बाद भारतीय अधिकारियों ने सैटेलाइट-कम्युनिकेशन सेक्टर के प्रति ज्यादा सतर्कता बरती है। यह चिंता जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता के बीच विदेशी नियंत्रण वाले कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता को लेकर व्यापक बेचैनी को दिखाती है।”

इसमें बताया गया है कि स्टारलिंक भारतीय अधिकारियों के साथ लगातार बातचीत कर रही है, हलफनामे दे रही है और यह दिखा रही है कि वह क्षेत्रीय डेटा स्टोरेज मानकों का पालन करती है। कंपनी ने जमीनी स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर भी बनाया है, जिसमें मुंबई में एक हब और भारत में लगभग दस गेटवे शामिल हैं।

कंपनी के सीनियर अधिकारी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों से नियमित रूप से मिलते रहे हैं। हालाँकि, ब्लूमबर्ग ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि भारत अभी स्टारलिंक को मंजूरी देने में हिचकिचा रहा है, जब तक कि उसके सिक्योरिटी से जुड़े मुद्दों को सुलझा नहीं लिया जाता।

ब्लूमबर्ग के दावों का खंडन

ब्लूमबर्ग के दावों को स्टारलिंक और केंद्र सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया है। हालाँकि यह कोई अकेली घटना नहीं है। हाल ही में इस मीडिया प्लेटफॉर्म को तब शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी जब उसने RBI को लेकर कहा था कि उसने विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के लिए 12 अरब डॉलर का सोना बेचा। बाद में ब्लूमबर्ग ने उस मनगढ़ंत लेख के लिए माफी माँगी।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

भारत के विकास को नई दिशा, नई गति और नया विश्वास मिला: PM मोदी को CM योगी का पत्र, 12 साल की उपलब्धियों का किया उल्लेख

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

राष्ट्रसेवा, सुशासन एवं जनकल्याण को समर्पित आपके 12 वर्षों के सफलतम कार्यकाल पर आपको समस्त प्रदेशवासियों की ओर से अनंत शुभकामनाएँ। आपके यशस्वी नेतृत्व में उत्तर प्रदेश आस्था और अर्थव्यवस्था का अद्भुत संगम बन कर उभरा है। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर रामलला का विराजमान होना, काशी विश्वनाथ धाम के सफल पुनरुद्धार आदि के साथ ही “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के आपके मूल मंत्र ने विगत 12 वर्षों में भारत के विकास को नई दिशा, नई गति और नया विश्वास प्रदान किया है। राष्ट्र ने सेवा, सुरक्षा, सुशासन और समृद्धि के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं।

इसी प्रेरणा से उत्तर प्रदेश भी जनकल्याण, सुशासन और समावेशी विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियाँ अर्जित करते हुए ‘विकसित भारत’ के संकल्प को साकार करने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
आपके प्रेरक नेतृत्व में संचालित जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ उत्तर प्रदेश के करोड़ों नागरिकों तक पहुँचा है।

स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत प्रदेश में लगभग 3 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ जबकि प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से लगभग 65 लाख परिवारों को पक्का आवास उपलब्ध कराया गया। आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत लगभग 10 करोड़ पात्र नागरिकों को स्वास्थ्य सुरक्षा कवच प्राप्त हुआ। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना एवं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के माध्यम से लगभग 15 करोड़ लोगों को निःशुल्क राशन उपलब्ध कराया जा रहा है।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से 1.86 करोड़ महिलाओं को धुएँ से मुक्ति मिली, जबकि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के माध्यम से प्रदेश के 3 करोड़ से अधिक किसानों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता प्राप्त हुई। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, सॉयल हेल्थ कार्ड, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना तथा अन्य किसान हितैषी कार्यक्रमों ने कृषि उत्पादन, उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

आपके मार्गदर्शन में उत्तर प्रदेश ने रोजगार और कौशल विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। मिशन रोजगार के अंतर्गत 9 लाख से अधिक युवाओं को पारदर्शी एवं निष्पक्ष प्रक्रिया के माध्यम से सरकारी सेवाओं में नियुक्ति प्रदान की गई है। वहीं कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से 25 लाख युवाओं को उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण एवं प्लेसमेंट उपलब्ध कराए गए हैं। निवेश आधारित औद्योगिक विकास, एमएसएमई, ओडीओपी, स्टार्टअप तथा स्वरोजगार योजनाओं के माध्यम से प्रदेश में 3 करोड़ से अधिक रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर सृजित हुए हैं, जिससे युवा शक्ति प्रदेश की विकास यात्रा की प्रमुख भागीदार बनी है।

आपके दूरदर्शी नेतृत्व में उत्तर प्रदेश आधुनिक आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी देश का अग्रणी राज्य बनकर उभरा है। दिल्ली-मेरठ 12-लेन एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मेरठ नमो भारत (RRTS), देश का प्रथम इनलैंड वाटरवे, उत्तर प्रदेश से होकर गुजरने वाले ईस्टर्न और वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, वंदे भारत एवं नमो भारत जैसी आधुनिक रेल सेवाओं ने प्रदेश की कनेक्टिविटी को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। आज उत्तर प्रदेश अपनी विश्वस्तरीय एक्सप्रेस-वे श्रृंखला के कारण देशभर में ‘एक्सप्रेस-वे प्रदेश’ के रूप में स्थापित हो चुका है।

स्मार्ट सिटी मिशन, आधुनिक हवाई अड्डों, मेट्रो परियोजनाओं, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तथा औद्योगिक कॉरिडोर के विकास ने निवेश, व्यापार, पर्यटन और औद्योगिक गतिविधियों को नई गति प्रदान करते हुए प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाई दी है। आपकी प्रेरणा से उत्तर प्रदेश में रूल ऑफ लॉ की स्थापना हुई है। आज प्रदेश माफिया-मुक्त, दंगा-मुक्त और भयमुक्त वातावरण की पहचान बना चुका है। व्यापारी, निवेशक, उद्योगपति तथा मातृशक्ति स्वयं को सुरक्षित अनुभव कर रहे हैं। बेहतर कानून-व्यवस्था और निवेश-अनुकूल वातावरण ने उत्तर प्रदेश को देश के सबसे आकर्षक निवेश गंतव्यों में स्थापित किया है।

इन प्रयासों का परिणाम है कि आज उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था वर्ष 2017 की तुलना में लगभग तीन गुना हो चुकी है। प्रति व्यक्ति आय में लगभग तीन गुना वृद्धि हुई है तथा बेरोजगारी दर लगभग 18 प्रतिशत से घटकर लगभग 3 प्रतिशत के स्तर पर आ गई है। उत्तर प्रदेश आज वन ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य की ओर तीव्र गति से अग्रसर है तथा ‘विकसित भारत’ के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

आज इस गौरवपूर्ण अवसर पर हम पुनः यह विश्वास व्यक्त करते हैं कि उत्तर प्रदेश आपके प्रेरक नेतृत्व एवं सतत मार्गदर्शन में ‘विकसित भारत’ के संकल्प के अनुरूप ‘विकसित उत्तर प्रदेश’ के निर्माण हेतु पूर्ण समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ कार्य करता रहेगा तथा राष्ट्र निर्माण में अपना सर्वोत्तम योगदान देता रहेगा।

FIFA 2026: समय के खिलाफ आखिरी मुकाबला, जब दुनिया एक गेंद के पीछे चल पड़ती है

कुछ आयोजनों का कैलेंडर में आना केवल तारीखों का बदलना नहीं होता। वे ऋतुओं की तरह आते हैं और फुटबॉल विश्व कप उनमें सबसे बड़ी ऋतु है। 11 जून 2026 से अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको की धरती पर एक बार फिर वही मौसम उतरने वाला है, जिसमें करोड़ों लोग अपने-अपने देशों की सीमाओं से निकलकर एक गोल गेंद के नागरिक बन जाते हैं।

इस बार मंच और भी विशाल है। 48 टीमें। 104 मैच। तीन मेजबान देश। लेकिन सच पूछिए तो विश्व कप कभी आँकड़ों का उत्सव नहीं रहा। विश्व कप दरअसल स्मृतियों का उत्सव है। किसी को याद होगा कि कैसे कतर की उस सुनहरी रात में लियोनेल मेसी ने ट्रॉफी को अपने होंठों से लगाया था। वह केवल एक खिलाड़ी नहीं था जो कप को चूम रहा था, वह एक अधूरी पीढ़ी थी जो अपने सबसे सुंदर सपने को छू रही थी।

किसी को याद होगा कि कैसे किलियन एम्बाप्पे हारकर भी विजेता की तरह मैदान छोड़ रहे थे। किसी को याद होगा कि मोरक्को ने दुनिया को बताया था कि चमत्कार केवल परीकथाओं में नहीं होते। और किसी को शायद आज भी वह तस्वीर याद होगी जिसमें क्रिस्टियानो रोनाल्डो अकेले सुरंग की ओर बढ़ रहे थे, जैसे समय स्वयं उन्हें धीरे-धीरे विदा कह रहा हो। विश्व कप यही करता है। गोल से ज़्यादा यादें बनाता है।

अमेरिका इस बार केवल मेजबान नहीं है। यह उस देश की मेजबानी है जिसने दशकों तक दुनिया को हॉलीवुड, एनबीए और सुपर बाउल दिए लेकिन फुटबॉल को कभी अपने सांस्कृतिक सिंहासन का हिस्सा नहीं बनाया। अब वही अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजन का केंद्र बनने जा रहा है।

लॉस एंजेलिस की रोशनी, न्यूयॉर्क की बेचैनी, डलास की गर्मी, मेक्सिको सिटी का शोर और टोरंटो की बहुभाषी भीड़… पूरा उत्तरी अमेरिका अगले एक महीने तक एक विशाल स्टेडियम में बदल जाएगा। और फिर शुरू होगा वह अनुष्ठान जो हर चार साल में दुनिया को कुछ समय के लिए युद्धों, चुनावों, आर्थिक संकटों और वैचारिक लड़ाइयों से ऊपर उठा देता है।

दर्शक फिर इंतजार कर रहे हैं। अर्जेंटीना के प्रशंसक मेसी को आखिरी बार विश्व कप में देखने के लिए तैयार बैठे हैं। 39 वर्ष की आयु में शायद यह उनका अंतिम नृत्य हो। शायद आखिरी बार हम उन्हें नीली-सफेद जर्सी में कप्तान की पट्टी बाँधे देखेंगे। शायद आखिरी बार किसी कॉर्नर फ्लैग के पास खड़े होकर वे दुनिया को यह याद दिलाएँगे कि प्रतिभा उम्र से बड़ी होती है।

दूसरी तरफ रोनाल्डो हैं। 41 वर्ष। छठा विश्व कप। समय के साथ लड़ता हुआ एक मनुष्य। फुटबॉल इतिहास में शायद ही कोई खिलाड़ी अपनी महत्वाकांक्षा को इतने लंबे समय तक जीवित रख पाया हो।

यह विश्व कप उनके लिए केवल एक टूर्नामेंट नहीं, इस विरासत का अंतिम अध्याय भी हो सकता है। लेकिन विश्व कप केवल विदाई का मंच नहीं होता। यह आगमन का भी मंच है। कहीं लामिन यामाल अपने समय की घोषणा करने को तैयार हैं। कहीं एरलिंग हालैंड पहली बार विश्व कप के बड़े रंगमंच पर अपने गोलों की भूख लेकर उतरेंगे।

कहीं जूड बेलिंघम, मुसियाला, पेड्री और अर्दा गुलर जैसी नई पीढ़ी दुनिया से कहेगी, कि ‘अब कहानी केवल मेसी और रोनाल्डो की नहीं रही।’ हर विश्व कप एक पीढ़ी को विदा करता है और दूसरी को जन्म देता है।

और फिर वे टीमें हैं जिनका इंतज़ार पूरी दुनिया कर रही है।

  • स्पेन अपनी तकनीकी कविता लेकर उतरेगा।
  • फ्रांस अपनी गति और शक्ति के साथ।
  • ब्राजील अपनी शाश्वत सांबा आत्मा के साथ।
  • इंग्लैंड अपनी उम्मीदों और पुराने अभिशापों के साथ।
  • अर्जेंटीना अपने गौरव की रक्षा करने के लिए।
  • पुर्तगाल अपने महानतम खिलाड़ी के लिए।
  • मोरक्को फिर साबित करना चाहेगा कि पिछली बार का सफर दुर्घटना नहीं था।
  • और नॉर्वे… शायद हालैंड के साथ अपनी नई कथा लिखना चाहेगा।

फिर उद्घाटन समारोह, रोशनी। संगीत होगा और कैमरे होंगे। दुनिया के सबसे बड़े कलाकार। और उन सबके बीच लाखों दर्शकों की धड़कनें होंगी जो अपने-अपने शहरों में रात भर जागने वाले हैं। दिल्ली से लेकर ढाका तक। ब्यूनस आयर्स से लेकर कासाब्लांका तक। लिस्बन से लेकर सियोल तक। कहीं कोई बच्चे की तरह जर्सी पहन रहा होगा। कहीं कोई पुराने विश्व कप की तस्वीरें देख रहा होगा। कहीं कोई मेसी की आखिरी जादूगरी की प्रतीक्षा कर रहा होगा। कहीं कोई रोनाल्डो के आखिरी गोल का सपना देख रहा होगा।

और यही विश्व कप की सबसे सुंदर बात है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य केवल राजनीति, धर्म, अर्थव्यवस्था और संघर्षों का प्राणी नहीं है। हम सभी के भीतर अब भी एक शिशु जीवित है। एक शिशु जो एक गेंद को उड़ते हुए देखकर अपनी साँस रोक लेता है। जो अंतिम मिनट के गोल पर अजनबियों को गले लगा लेता है। जो हारने पर रो पड़ता है। और जीतने पर पूरी रात नहीं सोता। 11 जून से वही बच्चा फिर जागने वाला है।

दुनिया फिर से एक गेंद के पीछे चल पड़ेगी। और अगले कुछ सप्ताहों तक पृथ्वी का सबसे बड़ा धर्म न राष्ट्रवाद होगा, न विचारधारा। वह होगा, फुटबॉल।

‘₹370 वसूल लूँगा’ कहने वाले की हेकड़ी निकली: कॉमेडी शो में महिलाओं पर अश्लील कमेंट करने वाले हिमांशु जांगरा को कंपनी ने नौकरी से निकाला, दी सख्त नसीहत

गुरुग्राम के युवक हिमांशु जांगरा को स्टैंड-अप कॉमेडियन प्रणीत मोरे के शो में महिलाओं पर अश्लील टिप्पणी करने की वजह से नौकरी से हाथ धोना पड़ा। लड़के ने शो के दौरान कहा था कि ‘370 रुपये की बिरयानी खिलाई है, वसूल तो करूँगा…’ इस दौरान महिलाओं के लिए अश्लील बातें कही।

इस पर गुरुग्राम स्थित सोशल मीडिया और ब्रांडिंग फर्म स्टारविक डिजाइन ने हिमांशु जांगरा के खिलाफ एक्शन लेते हुए उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया। दरअसल महिलाओं पर की गई घटिया जोक सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। इस दौरान यूजर्स ने उसे जमकर भला-बुरा कहा।

वीडियो के खिलाफ ऑनलाइन गुस्सा और कंपनी को भेजे गए मैसेज, ईमेल और कॉल को देखते हुए कंपनी ने उसे निकालने की घोषणा की। स्टारविक डिजाइन के संस्थापक विवेक विश्वकर्मा ने कहा कि विवाद ने कार्यस्थल और कंपनी की प्रतिष्ठा को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

उन्होंने कहा, “कार्यस्थल के बाहर जो कुछ हुआ है, उसका असर अब कार्यस्थल पर भी पड़ रहा है। कंपनी, हमारी टीम, हमारे ग्राहकों और यहाँ के वातावरण के प्रति मेरी जिम्मेदारी है। इसीलिए हमने हिमांशु से अलग होने का फैसला किया है।”

हिमांशु की इंस्टाग्राम ID पर पुराना कॉन्टेंट भी बेहद खराब है। मामला बढ़ने पर प्रणीत मोरे और हिमांशु ने माफी माँग ली।

यह विवाद कॉमेडियन प्रणित मोरे के एक लाइव शो के दौरान शुरू हुआ। जांगरा ने कॉमेडियन से बातचीत करते हुए एक महिला को खाने पर ले जाने और बदले में कुछ उम्मीद करने के बारे में बात की।

उन्होंने कहा कि जब महिला ने खाना खाने के बाद उन्हें घर छोड़ने के लिए कहा तो उन्हें आश्चर्य हुआ। चिकन बिरयानी पर खर्च किए गए 370 रुपये का जिक्र करते हुए जांगरा ने कहा कि वह खर्च की गई रकम महिला से शारीरिक तौर पर ‘वसूलेंगे’। इस टिप्पणी की सोशल मीडिया पर जबरदस्त आलोचना हुई।

हालाँकि विरोध के बाद जांगरा ने माफी माँगी और अपना सोशल मीडिया अकाउंट निष्क्रिय कर दिया। लेकिन वायरल वीडियो पर यूजर्स का गुस्सा फूट पड़ा जिसको देखते हुए उसे बर्खास्त कर दिया गया। विश्वकर्मा ने कहा कि ये टिप्पणियाँ आपत्तिजनक थीं और कंपनी के मूल्यों के खिलाफ थी।

उन्होंने कहा, “आपमें से कई लोगों की तरह, मैंने भी ऑनलाइन प्रसारित हो रहे उन वीडियो क्लिप्स को देखा। उन क्लिप्स में दिखाए गए बयान आपत्तिजनक हैं। मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। हमारी कंपनी ऐसे विचारों का समर्थन नहीं करती और निश्चित रूप से उन्हें युवाओं के लिए खराब मैसेज है और उन्हें इससे दूर रहना चाहिए।”

वहीं, विश्वकर्मा ने कहा कि कार्यस्थल पर जांगरा के आचरण पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया गया। उन्होंने महिला सदस्यों सहित सभी कर्मचारियों से बात की है। ज्यादातर ने जांगरा को पेशेवर और मेहनती और सम्मानित व्यक्ति बताया।

कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि यद्यपि लोगों को उनके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, फिर भी उन्हें अपनी गलतियों से सीखने का अवसर दिया जाना चाहिए।

कंपनी का मानना है, “एक व्यक्ति भयानक गलती कर सकता है। व्यक्ति को उसके परिणामों का सामना करना चाहिए, लेकिन उम्मीद है कि हम कभी भी ऐसा समाज नहीं बनने देंगे, जो यह मानता हो कि लोग सीख नहीं सकते, आत्मचिंतन नहीं कर सकते, माफी नहीं माँग सकते या बदल नहीं सकते।”

कंपनी का मानना है कि यह विवाद हिमांशु जांगरा के साथ लंबे समय तक बने रहेंगे और वह इस घटना से सबक लेंगे।

पश्चिम बंगाल में CBI को जाँच की खूली छूट, BJP सरकार ने दिया ‘जनरल कंसेंट’: 8 साल पहले ममता बनर्जी ने लिया था वापस, जानिए सबकुछ

पश्चिम बंगाल में ममता काल के भ्रष्टाचार को खत्म करने की दिशा में अहम कदम उठाया गया है। 8 जून 2026 को पश्चिम बंगाल की बीजेपी सरकार ने CBI के लिए ‘सामान्य सहमति’ (General Consent) बहाल कर दी। राज्य ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (DSPE) अधिनियम 1946 की धारा 6 के तहत यह अधिसूचना जारी की है, जिससे सीबीआई केंद्र सरकार के कर्मचारियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के मामलों की राज्य में बिना किसी बाधा के जाँच कर सकेगी।

यह अधिसूचना जारी होने के बाद से सीबीआई को केंद्रीय मामलों की जाँच के लिए हर बार राज्य सरकार की विशेष अनुमति लेने की आवश्यकता समाप्त हो गई। हालाँकि राज्य सरकार के कर्मचारियों से जुड़े मामलों में जाँच शुरू करने से पहले राज्य की लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है। यह निर्णय करीब 8 साल बाद लिया गया है, क्योंकि नवंबर 2018 में तत्कालीन टीएमसी सरकार ने केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग का हवाला देते हुए ‘सामान्य सहमति’ वापस ले ली थी।

8 साल बाद बहाल हुई ‘जनरल कंसेंट’

सामान्य स्वीकृति की बहाली से सीबीआई को पश्चिम बंगाल में केंद्र सरकार के कर्मचारियों, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (सीपीएसयू) के साथ-साथ निजी व्यक्तियों के अपराध की जाँच सीबीआई कर सकेगी। इसके लिए हर मामले को लेकर अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होगी।

पश्चिम बंगाल सरकार के गृह एवं पर्वतीय मामलों के विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के मुताबिक, दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (DSPE) एक्ट, 1946 के सेक्शन 6 के तहत, पश्चिम बंगाल सरकार “सेंट्रल गवर्नमेंट, सेंट्रल पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स और प्राइवेट लोगों (चाहे वे अलग-अलग काम कर रहे हों या सेंट्रल गवर्नमेंट और सेंट्रल गवर्नमेंट अंडरटेकिंग्स के कर्मचारियों के साथ मिलकर काम कर रहे हों) के अपराधों की जाँच के लिए राज्य में दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (CBI) के सदस्यों की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के लिए अपनी सहमति देती है।”

हालाँकि अधिसूचना में एक शर्त का उल्लेख किया गया है। जनरल कंसेंट बहाल होने के बावजूद, पश्चिम बंगाल राज्य के लोक सेवकों के खिलाफ जाँच के लिए अभी भी राज्य की अनुमति आवश्यक है।

अधिसूचना में कहा गया है, “पश्चिम बंगाल राज्य सरकार के नियंत्रण में आने वाले लोक सेवकों से संबंधित मामलों में राज्य सरकार की लिखित अनुमति के बिना ऐसी कोई जाँच नहीं की जाएगी। राज्य सरकार द्वारा अन्य किसी भी अपराध के लिए पहले दी गई सभी सामान्य सहमति और मामले-दर-मामले आधार पर दी गई सहमति भी लागू रहेगी।”

‘जनरल कंसेंट’ बहाल करने का मकसद टीएमसी काल के कई घोटालों में अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए सीबीआई को खास स्वीकृति देने के तुरंत बाद लिया गया। ये स्वीकृति शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने दी है।

सीबीआई के लिए राज्य सरकार की जनरल कंसेंट बहाल होने से केंद्रीय जाँच एजेंसी लंबित मामलों पर कार्रवाई में तेजी ला पाएगी, जवाबदेही में सुधार होगा और केंद्र-राज्य संबंधों को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

ममता बनर्जी ने 2018 में सीबीआई के लिए ‘जनरल कंसेंट’ क्यों रद्द की?

नवंबर 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार ने ‘जनरल कंसेंट’ वापस ले लिया था। ममता सरकार का दावा था कि सीबीआई- ईडी सहित अन्य केंद्रीय जाँच एजेंसियों को भाजपा सरकार विपक्षी दलों वाली राज्य सरकार के खिलाफ ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ के लिए ‘हथियार’ के रूप में इस्तेमाल कर रही है।

भ्रष्टाचार और लचर कानून व्यवस्था वाली टीएमसी सरकार, अपने नेताओं पर एक के बाद एक घोटाले के खुलासे को लेकर हो रहे एक्शन से परेशान थी। केन्द्रीय एजेंसियों के कसते शिकंजे पर लगाम लगाने के लिए टीएमसी सरकार ने यह कदम उठाया था। उस वक्त कोयला घोटाला, पशु तस्करी घोटाला, शिक्षकों की भर्ती घोटाला, सहकारी समिति घोटाला, नगरपालिकाओं में नौकरी के बदले नकद घोटाला, शारदा चिट फंड घोटाला और दूसरे भ्रष्टाचार के मामले सामने आए थे, जिस पर एक्शन हो रहा था।

ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री के रूप में मिली ताकत का दुरुपयोग किया। उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपित अपनी पार्टी नेताओं को बचाने के लिए सीबीआई सहित दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान के सदस्यों की जनरल कंसेंट वापस ले ली। यह मूल रूप से केंद्रीय जाँच एजेंसियों द्वारा की जा रही जाँच में राजनीतिक हस्तक्षेप का एक उदाहरण था, जिसे ‘फेडरलिज्म पर हमले’ के आड़ में छिपाया जा रहा था।

जनरल कंसेंट वापस ले लिए जाने के बाद, सीबीआई को बार-बार मामले-दर-मामले अनुमति लेनी पड़ी, जिससे कई मामलों में कार्रवाई में देरी हुई। यहाँ तक ​​कि टीएमसी सरकार ने सीबीआई के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार के अलावा, मेघालय, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मिजोरम, कर्नाटक, झारखंड, महाराष्ट्र, पंजाब और केरल में भी हाल ही में ‘जनरल कंसेंट’ वापस लेने के मामले सामने आए हैं। इन राज्यों में सामान्य स्वीकृति रद्द करने की अधिसूचनाएँ तब जारी की गईं जब विपक्षी दल सत्ता में थे।

पश्चिम बंगाल ने आंध्र प्रदेश के तुरंत बाद 2018 में सीबीआई को दी गई सहमति वापस ले ली। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ सरकार ने जनवरी 2019 में ऐसा ही किया। कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान सरकार ने जुलाई 2020 में ‘जनरल कंसेंट’ रद्द कर दी। आम आदमी पार्टी शासित पंजाब ने नवंबर 2020 में ऐसा किया। शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी सरकार ने अक्टूबर 2020 में ऐसा ही किया। कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक ने सितंबर 2024 में ‘जनरल कंसेंट’ वापस ले ली ।

लगभग सभी मामलों में, सीबीआई को दी गई ‘जनरल कंसेंट’ ठीक उसी समय वापस ले ली गई, जब एजेंसी इन राज्यों में घोटालों और अन्य अनियमितताओं की जाँच कर रही थी।

शुभेंदु अधिकारी सरकार टीएमसी काल की व्यवस्थागत खामियों को ठीक करने में जुटी

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी एक के बाद एक ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिनका उद्देश्य जवाबदेही बहाल करना और टीएमसी काल के दौरान हुए व्यवस्थागत भ्रष्टाचार को दूर करना है। इस साल मई में, भाजपा सरकार ने शिक्षक भर्ती घोटाला, नगर निगम भर्ती घोटाला और सहकारी घोटाला मामलों में अभियोजन की अनुमति दी , जिसकी जाँच में ममता सरकार बाधा बनी।

6 जून 2026 को, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने 2019 में सीएए विरोधी दंगों की जाँच का आदेश दिया। ये दंगे मुस्लिम भीड़ ने किए गए थे और राज्य में भारतीय रेलवे को करीब 93 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था।

मुख्यमंत्री अधिकारी ने डीजीपी सिद्ध नाथ गुप्ता के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल पुलिस को नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ 2019 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान आगजनी, तोड़फोड़ और सार्वजनिक संपत्ति, विशेष रूप से रेलवे संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने की सभी शिकायतों की समीक्षा करने और जाँच करने का निर्देश दिया।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार ने संस्थागत भ्रष्टाचार और महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों की जाँच के लिए 18 मई को सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से मिलकर दो जाँच आयोगों का गठन किया । इन जाँच आयोगों ने 1 जून 2026 से अपना काम शुरू किया।

इससे पहले मुख्यमंत्री अधिकारी ने 2024 के आरजी कर मेडिकल कॉलेज बलात्कार और हत्या मामले में लापरवाही बरतने के आरोप में तीन आईपीएस अधिकारियों को निलंबित कर दिया था।

पुलिस और नौकरशाही के राजनीतिकरण से लेकर, जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार के नेटवर्क और कैडर आधारित राजनीति तक, शुभेंदु सरकार टीएमसी शासन के कुकर्मों की जाँच और निवारण के लिए कदम उठा रही है। ‘जनरल कंसेंट’ की बहाली इस दिशा में एक और सकारात्मक कदम है।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

MOU के बाद भी सुस्ती में रहा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश ने फुर्ती से पकड़े मझगाँव डॉक के ₹29000 करोड़: समझिए कैसे चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में NDA सरकार ला रही बड़े निवेश

आंध्र प्रदेश देश में निवेश के सबसे बड़े केंद्र के रूप में उभर रहा है। तमिलनाडु की द्रमुक सरकार के ढुलमुल रवैए का फायदा उठाते हुए अब मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने एक और बड़ा दाँव मारा है। यह रफ्तार आगे भी जारी रहने वाली है क्योंकि सरकारी जहाज बनाने वाली कंपनी मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) तिरुपति जिले के दुगराजपटनम में आंध्र प्रदेश के प्रस्तावित मेगा शिपबिल्डिंग क्लस्टर में 29,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश कर रही है।

मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) नाम की यह बड़ी डिफेंस पीएसयू (PSU) आंध्र प्रदेश के शिपबिल्डिंग प्रोजेक्ट में मुख्य निवेशक बनने के लिए तैयार है, जिसका लक्ष्य 1.2 मिलियन टन सालाना क्षमता का है। इस मेगा प्रोजेक्ट में राज्य सरकार और विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी जमीन और समुद्री बुनियादी ढाँचे के लिए 5,289 करोड़ रुपए का योगदान देंगे, जबकि मुख्य निवेशक MDL इसमें 23,964 करोड़ रुपए का निवेश करेगा।

मझगांव डॉक लिमिटेड के प्रतिनिधि जल्द ही इस जगह की संभावनाओं का आकलन करने के लिए आंध्र प्रदेश का दौरा कर सकते हैं।

तमिलनाडु की सुस्ती बनी आंध्र प्रदेश के लिए मौका

आंध्र प्रदेश सरकार और MDL के बीच राज्य के प्रस्तावित शिपबिल्डिंग क्लस्टर में भारी निवेश को लेकर बातचीत शुरू होने से पहले इस डिफेंस पीएसयू ने तमिलनाडु की तत्कालीन द्रमुक (DMK) सरकार के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे।

सितंबर 2025 में MDL ने ‘मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047’ के तहत थूथुकुडी में 15,000-18,000 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत से एक ग्रीनफील्ड शिपयार्ड बनाने के लिए तमिलनाडु सरकार के साथ समझौता किया था। हालाँकि द्रमुक सरकार ने इसमें ढुलमुल रवैया अपनाया और बाद में MDL के साथ तय प्रक्रिया को छोड़कर दक्षिण कोरिया की एचडी हुंडई हेवी इंडस्ट्रीज (HD Hyundai Heavy Industries) के साथ एक विशेष समझौता कर लिया।

MDL को तमिलनाडु सरकार से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) का इंतजार था, हालाँकि द्रमुक सरकार ने न तो प्रोजेक्ट शुरू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और न ही इस प्रस्ताव को सीधे तौर पर मना किया।

तमिलनाडु सरकार के इस कदम से MDL-थूथुकुडी प्रोजेक्ट अधर में लटक गया और भारत की एक प्रमुख डिफेंस पीएसयू किनारे हो गई। MDL ने आरोप लगाया कि द्रमुक सरकार द्वारा तय चयन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और भारतीय शिपबिल्डिंग कंपनियों को प्रतिस्पर्धा करने का सही मौका नहीं दिया गया। पीएसयू ने पारदर्शिता और जिस तरह से तमिलनाडु सरकार ने एंकर शिपयार्ड का चयन किया, उस पर भी सवाल उठाए।

अब जब MDL के आंध्र प्रदेश में बड़ा निवेश करने की खबरें आ रही हैं, तो तमिलनाडु के कई लोग द्रमुक सरकार की आलोचना कर रहे हैं कि उनकी वजह से राज्य के हाथ से रक्षा क्षेत्र से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निवेश निकल गया।

आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के बीच रक्षा, मैन्युफैक्चरिंग और बंदरगाह से जुड़े निवेश को लेकर लंबे समय से मुकाबला चल रहा है। दोनों राज्य निवेश को आकर्षित करने के लिए अपने तटीय इलाकों, कुशल कामगारों और रियायतों का इस्तेमाल करते हैं। तेलुगु देशम पार्टी (TDP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) गठबंधन के शासन वाले आंध्र प्रदेश ने ‘बिजनेस करने की रफ्तार’ (speed of doing business) को लेकर बड़े स्तर पर मार्केटिंग की है, जिसमें जमीन की उपलब्धता, नीतिगत स्थिरता और राज्य व केंद्र दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के कारण केंद्रीय समन्वय को प्रमुखता से दिखाया गया है।

चंद्रबाबू नायडू की NDA सरकार में आंध्र प्रदेश बना उद्योगों के लिए आकर्षक

बीते कुछ महीनों में तमिलनाडु और कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक से एनडीए शासित आंध्र प्रदेश में कई बड़े निवेशकों का ट्रांसफर देखा गया है।

अगस्त 2025 में तमिलनाडु की द्रमुक सरकार ने थूथुकुडी में दक्षिण कोरिया की ह्वासुंग फुटवियर (Hwaseung Footwear) द्वारा 1,720 करोड़ रुपये के नॉन-लेदर फुटवियर प्लांट की घोषणा की थी, जिससे 20,000 से अधिक नौकरियों का वादा किया गया था। हालाँकि तमिलनाडु सरकार की ओर से हुई देरी और लापरवाही के कारण ह्वासुंग को बेहतर विकल्पों की तलाश करनी पड़ी। नवंबर 2025 तक यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के कुप्पम में शिफ्ट हो गया।

दक्षिण कोरियाई कंपनी ह्वासुंग ने एनडीए के नेतृत्व वाले राज्य आंध्र प्रदेश में 150 मिलियन डॉलर के निवेश के साथ अपना नॉन-लेदर स्पोर्ट्स शू मैन्युफैक्चरिंग हब स्थापित करने की घोषणा की। राज्य सरकार ने ह्वासुंग को 100 एकड़ जमीन आवंटित की। अब यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की विधानसभा सीट कुप्पम में आकार ले रहा है।

मई 2026 में तमिलनाडु के हाथ से प्रस्तावित एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) फ्लाइट टेस्टिंग और इंटीग्रेशन कॉम्प्लेक्स डिफेंस एयरोस्पेस प्रोजेक्ट भी निकल गया और यह आंध्र प्रदेश के पास चला गया। हालाँकि तमिलनाडु सरकार डीआरडीओ (DRDO) से जुड़े इस 15,000 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट को हासिल करने की कोशिश में थी और उसने बेंगलुरु के एयरोस्पेस क्लस्टर के पास होसुर में जमीन और रनवे की पेशकश की थी। लेकिन आंध्र प्रदेश ने तेजी से मंजूरी देने और एक एकीकृत डिफेंस कॉरिडोर के विजन की पेशकश करके यह बाजी जीत ली।

यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के पुट्टपार्थी में गया, और इस साल मई में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री नायडू ने 600 एकड़ की इस फैसिलिटी का शिलान्यास किया। इस पर केंद्र द्वारा पक्षपात करने के आरोप भी लगे, हालाँकि खबरों में कहा गया कि आंध्र प्रदेश को प्रोजेक्ट सौंपना विभिन्न राज्यों में रक्षा निर्माण क्षमताओं को बाँटने की रणनीति का हिस्सा था।

जहाँ तमिलनाडु ने होसुर में 100 एकड़ जमीन मुफ्त देने की पेशकश की थी, वहीं आंध्र प्रदेश ने पुट्टपार्थी में 650 एकड़ का एक बड़ा डेडिकेटेड हब ऑफर किया।

राज्यों के बीच यह मुकाबला सिर्फ आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार कर्नाटक तक भी है। जुलाई 2025 में कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार को तीन साल से चल रहे किसानों के लगातार विरोध प्रदर्शनों के कारण बेंगलुरु हवाई अड्डे के पास एक प्लान्ड एयरोस्पेस पार्क के लिए देवनहल्ली में कृषि भूमि का अधिग्रहण करने के प्रस्ताव को रद्द करना पड़ा था।

राज्य ने पहले इस एयरोस्पेस प्रोजेक्ट के लिए चन्नरायपटना और देवनहल्ली तालुक के आसपास के गाँवों में 1,777 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन किसानों ने पहले दिन से ही इस कदम का विरोध करते हुए दावा किया था कि यह जमीन उपजाऊ है और उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है।

जब कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने इस प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया, तो आंध्र प्रदेश ने तुरंत इस मौके का फायदा उठाया। राज्य के मानव संसाधन विकास मंत्री नारा लोकेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक खुला निमंत्रण देते हुए लिखा, ‘प्रिय एयरोस्पेस इंडस्ट्री, इसके (विरोध प्रदर्शन) बारे में सुनकर दुख हुआ। मेरे पास आपके लिए एक बेहतर विचार है। आप इसके बजाय आंध्र प्रदेश को क्यों नहीं देखते? हमारे पास आपके लिए एक आकर्षक एयरोस्पेस नीति है, जिसमें बेहतरीन प्रोत्साहन और 8000 एकड़ से अधिक तैयार जमीन (बेंगलुरु के ठीक बाहर) उपलब्ध है! उम्मीद है कि टेबल पर बैठकर बात करने के लिए आपसे जल्द ही मुलाकात होगी।”

साफ है कि आंध्र प्रदेश की एनडीए सरकार न केवल राज्य को मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट्स के लिए एक आदर्श जगह के रूप में पेश कर रही है, बल्कि तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे प्रतिस्पर्धी राज्यों में दिक्कतों का सामना कर रहे निवेशकों को भी आक्रामक रूप से अपने साथ जोड़ रही है।

टेक, डेटा सेंटर, एआई (AI) और एयरोस्पेस से लेकर आंध्र प्रदेश ने दूसरे राज्यों से निवेश हासिल किया है और वह इसका दावा करने से पीछे नहीं हटता।

साल 2025 में गूगल (Google) ने भारत के सबसे बड़े एआई और डेटा सेंटर्स में से एक के लिए विशाखापत्तनम में 15 बिलियन डॉलर या 1.25 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश का ऐलान किया।

बेंगलुरु के पास आईटी की ताकत और बुनियादी ढाँचा होने के बावजूद गूगल द्वारा इस दौड़ में अपने प्रतिस्पर्धी कर्नाटक के बजाय आंध्र प्रदेश को चुनना कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार को रास नहीं आया। कर्नाटक के आईटी मंत्री प्रियांक खड़गे की X पर आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री नारा लोकेश के साथ तीखी बहस भी हुई थी।

आंध्र प्रदेश सरकार ने 22,000 करोड़ रुपए के बड़े प्रोत्साहन पैकेज की पेशकश करके गूगल का यह निवेश सुरक्षित किया। इस पैकेज में जमीन पर 25% की छूट, पानी के टैरिफ पर 25% की छूट, 100% मुफ्त बिजली ट्रांसमिशन के साथ-साथ स्टेट जीएसटी (SGST) की पूरी प्रतिपूर्ति शामिल थी।

आंध्र प्रदेश ने पिछले साल कर्नाटक की सरला एविएशन के 1,300 करोड़ रुपए के इलेक्ट्रिक एयर-टैक्सी मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट ‘स्काई फैक्ट्री‘ को भी अपने नाम कर लिया। यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के अनंतपुरम जिले में विकसित किया जाएगा। कर्नाटक की एक कंपनी का अपने गृह राज्य को छोड़कर मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट के लिए दूसरे राज्य को चुनना कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा गया।

इसके अलावा आंध्र प्रदेश की ‘काम करने की रफ्तार’ का असर कॉन्ग्रेस शासित तेलंगाना पर भी पड़ा है। मार्च 2025 में हैदराबाद की प्रीमियर एनर्जीज (Premier Energies) ने घोषणा की कि वह तेलंगाना के सीतारामपुर से आंध्र प्रदेश के नायडूपेटा में अपना 1,700 करोड़ रुपये का प्रस्तावित 4 GW सोलर फोटोवोल्टिक सेल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट शिफ्ट कर रही है। इस प्रोजेक्ट से करीब 3,500 नौकरियाँ पैदा होंगी।

प्रतिस्पर्धी राज्यों की तुलना में आगे निकलकर एक और प्रोजेक्ट को हासिल करने की जानकारी देते हुए आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री नारा लोकेश ने X पर लिखा, “एपी (AP) ने रिकॉर्ड समय में एपीआईआईसी (APIIC) के माध्यम से 269 एकड़ जमीन को तेजी से मंजूरी दी। ये बातचीत अक्टूबर 2024 में शुरू हुई थी और फरवरी 2025 तक जमीन आवंटित कर दी गई। यह जमीन बंदरगाहों के करीब है और सक्रिय प्रोत्साहनों से समर्थित है। यह आंध्र प्रदेश को एक अग्रणी सौर विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करता है, जिससे औद्योगिक विकास और राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, जिसकी क्षमता को 7 GW तक बढ़ाने की योजना है। आंध्र प्रदेश को भारत के दूसरे सबसे बड़े एकीकृत सौर सेल और मॉड्यूल निर्माता का एपी में स्वागत करते हुए गर्व हो रहा है – जो हमारे युवाओं के लिए बैकवर्ड इंटीग्रेशन और ग्रीन जॉब्स को बढ़ावा देगा।”

नारा लोकेश के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

यहाँ एक दिलचस्प बात यह है कि खबरों के मुताबिक आंध्र प्रदेश ने एनडीए शासन के दो सालों के भीतर लगभग 23 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है।

मुख्यमंत्री नायडू ने इस बारे में कहा, “कल्याण, विकास और सुशासन प्रदान करने के साथ-साथ एनडीए सरकार विशाखापत्तनम, अमरावती और तिरुपति क्षेत्रों का विकास कर रही है। रायलसीमा में रक्षा, ड्रोन, स्पेस, एयरोस्पेस और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों के उद्योग आ रहे हैं। एनडीए शासन के दौरान राज्य ने अब तक 23 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है। हम हर घर में सोलर रूफटॉप के जरिए बिजली पैदा करने का अवसर दे रहे हैं। रॉयल एनफील्ड तिरुपति में 18 महीनों में एक मोटरसाइकिल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित कर रही है।”

हालाँकि आंध्र प्रदेश की आक्रामक निवेश रणनीतियों से अन्य राज्य सरकारों का सतर्क होना स्वाभाविक है, लेकिन एनडीए शासित यह राज्य भारत की विकास गाथा में योगदान देने में जितना हो सके आगे रहना चाहता है। आंध्र प्रदेश सरकार वैश्विक और घरेलू कंपनियों को राज्य में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाने के लिए सिंगल-विंडो क्लीयरेंस, लैंड बैंक, सब्सिडी और केंद्रीय सहयोग का पूरा इस्तेमाल कर रही है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)