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कैसे कॉकरोच जनता पार्टी का ‘संसद मार्च’ दिल्ली को हिंसा की आग में झोंकने की है साजिश

दिल्ली को एक बार फिर ‘बंधक’ बनाने की नापाक साजिश रची जा रही है, लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी की इस नापाक इरादे को करारा झटका लगा है।

आम आदमी पार्टी से जुड़े सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके को उम्मीद थी कि वे ‘ सामाजिक कार्यकर्ता’ सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का लाभ उठाते हुए नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ जनता को सड़कों पर ले आएँगे, लेकिन शनिवार (18 जुलाई 2026) को पुलिस वांगचुक को उठाकर अस्पताल ले गई और इनके मनसूबे पर पानी फिर गया।

लाखों छात्रों के करियर से जुड़े एक अति संवेदनशील मुद्दे को भटकाने की पूरी कोशिश की गई और इसका राजनीतिक लाभ उठाने के लिए संसद मार्च का आह्वान भी किया गया। सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, और सूत्रों का कहना है कि उनकी भूख हड़ताल जल्द ही समाप्त हो जाएगी।

इस तरह का घटनाक्रम कॉकरोच जनता पार्टी के लिए गंभीर चिंता का विषय है, जिसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ सोनम वांगचुक की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति से निर्धारित होतीं।

जब जनता को ‘अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल’ का सहारा लेकर भावनात्मक रूप से प्रभावित करने वाला कोई नहीं बचा, तो अभिजीत दिपके (जो अब तक मौज-मस्ती करते रहे हैं) ने अनुपस्थित कार्यकर्ता के नक्शेकदम पर चलने का फैसला किया है और उन्होंने यह निर्णय तब लिया जब सोशल मीडिया पर उनकी गिरफ्तारी के बारे में झूठ फैलाकर दहशत और घबराहट पैदा करने के प्रयास विफल रहे।

कॉकरोच जनता पार्टी की भड़काऊ बयानबाजी

यह साफ है कि आम आदमी पार्टी (AAP) समर्थित वायरल मार्केटिंग के आधार पर अस्तित्व में आई कॉकरोच जनता पार्टी इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देगी। यही वजह है कि समर्थक और नेता अब हिंसा की भाषा बोलने लगे हैं, लेकिन काफी चालाकी से। इसकी शुरुआत अभिजीत दिपके ने कर दी है।

(अभिजीत दिपके की ट्वीट का स्क्रीनशॉट)

मुख्य न्यायिक समिति के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने भी रणनीति के तहत जानबूझकर सोनम वांगचुक की ‘गिरफ्तारी’ और अभिजीत दिपके पर हमले के बारे में फर्जी खबरें फैलाईं।

उन्होंने घोषणा की, “दिल्ली पुलिस ने अपना असली रंग दिखा दिया है। अब चुप रहने का समय नहीं है। हमें पूरे भारत में ‘शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन’ शुरू करने की जरूरत है।”

मुख्य न्यायिक समिति के प्रवक्ता सौरभ दास ने सबसे पहले यह दावा करके जनमानस में दहशत पैदा की कि सोनम वांगचुक को ‘अज्ञात स्थान’ पर ले जाया जा रहा है।

इसके बाद उन्होंने समर्थकों से झटपट ‘जंतर मंतर’ पहुँचने का आह्वान किया और दावा किया कि यह भारत और सोनम वांगचुक को ‘बचाने’ की लड़ाई है।

सौरव दास भली-भांति जानते हैं कि हजारों प्रदर्शनकारियों की अचानक भीड़ अशांति पैदा कर सकती है और कानून-व्यवस्था को बिगाड़ सकती है। भीड़ हिंसा और तोड़फोड़ भी कर सकती है।

लेकिन सीजेपी के प्रवक्ता इसके बजाय लोगों की भावनाओं को भड़काने और बड़ी संख्या में लोगों को लामबंद करने में व्यस्त हैं, उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोगों का जमावड़ा हिंसक भी हो सकता है। ऐसा लगता है कि इसके परिणाम को लेकर उनकी जवाबदेही तो बिल्कुल भी नहीं है।

(सौरभ दास के ट्वीट का स्क्रीनशॉट)

इन सबके बीच सारा ध्यान (20 जुलाई 2026) सोमवार को प्रस्तावित ‘संसद मार्च’ पर है। मुख्य न्यायाधीश को उम्मीद है कि इस सरकार विरोधी जुलूस में 15 लाख लोग सड़कों पर उतरेंगे।

2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों से भी नहीं सीख रहे ये लोग

हिंसा के अप्रत्यक्ष आह्वान का पैटर्न और रणनीति वैसी ही लगती है, जो 2020 में हुए दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों में देखा जा सकता है।

सीएए विरोध प्रदर्शनों की आड़ में, शाहीन बाग की ‘शेरनियों’ ने सड़कों पर धरना दिया, जनजीवन ठप्प कर दिया और उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 52 लोगों की जान लेने वाले 2020 के दंगों की नींव रखी।

इस्लामवादियों का जमावड़ा दिसंबर 2019 में ही शुरू हो गया था। उस वक्त जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से संसद तक मार्च निकाला गया था। हालाँकि पुलिस ने इसे नाकाम कर दिया था। शरजील इमाम जैसे भारत विरोधी इस्लामिस्ट भी इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा थे, जिसमें हिंसा, संपत्ति की तोड़फोड़ और सुरक्षा बलों के साथ झड़पें हुईं।

इस घटना के बाद, भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद जामा मस्जिद पहुँचे और भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद विरोध प्रदर्शन पर लगे प्रतिबंध का उल्लंघन किया। शुक्रवार की नमाज के बाद जामा मस्जिद के गेट के अंदर अपने समर्थकों का नेतृत्व करते हुए आजाद को संविधान की प्रस्तावना की एक प्रति और बीआर अंबेडकर के पोस्टर पकड़े हुए देखा गया।

बाद में पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के मुताबिक, आजाद ने भीड़ को उकसाया था , जिसके कारण दिल्ली गेट के पास हिंसा भड़क गई और एक कार में आग लगा दी गई।

‘जय भीम’ के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद अब फिर कॉकरोज जनता पार्टी (सीजेपी) का समर्थन करते नजर आ रहे हैं।

‘आंदोलनजीवी’ योगेंद्र यादव ने भी सोनम वांगचुक का समर्थन किया। वह सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके को सांत्वना देते हुए देखे गए। दिसंबर 2019 में यादव की मुलाकात शरजील इमाम से उमर खालिद के जरिए हुई थी।

दिल्ली पुलिस द्वारा दायर आरोपपत्र के अनुसार , योगेंद्र यादव, शरजील इमाम और उमर खालिद के बीच यह तय हुआ था कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल मुसलमानों को कट्टरपंथी विचारधारा में ढालने और चक्का जाम के लिए लोगों को लामबंद करने के लिए किया जाएगा। वह सीएबी-जैम नामक एक व्हाट्सएप ग्रुप का भी सदस्य था, जिसने सीएए विरोधी हिंसक प्रदर्शनों के बीच सामंजस्य स्थापित की थी।

डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के समय हुए दंगों से पहले 10 फरवरी 2020 को इस्लामवादियों ने एक और विरोध मार्च निकाला था। यह मार्च जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से शुरू होकर संसद के सामने समाप्त होना था। बाद में दिल्ली पुलिस ने इसे रोक दिया।

सीजेपी के प्रति अपना समर्थन कॉन्ग्रेस ने पहले ही जता दिया है। उसने सीएए विरोधी प्रदर्शनों को भी याद किया है लोगों के जमावड़े के बारे में भी इशारों-इशारों में बता रही है।

गौरतलब है कि फरवरी 2020 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों के दौरान नफरत फैलाने वाले भाषण देने के आरोप में कॉन्ग्रेस नेताओं सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की माँग करने वाली याचिका को लेकर दिल्ली पुलिस, राज्य सरकार और केंद्र को नोटिस जारी किया था।

हमने यह भी देखा है कि कैसे खालिस्तानियों ने किसान विरोध प्रदर्शनों की आड़ में 2021 में लाल किले तक मार्च निकाला और भारतीय तिरंगे का अपमान किया ।

इसलिए इस बार सतर्क रहने की जरूरत है। सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाना भी इस दिशा में एक बड़ा कदम है। फिर भी पुलिस और केन्द्र सरकार को पूरी तरह तैयार रहना होगा, ताकि ‘प्रदर्शनकारी’ एक बार फिर राज्य को बंधक न बना सकें।

जो लोग इतिहास से सबक नहीं सीखते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं। कॉकरोच जैसी जनता पार्टी 20 जुलाई 2026 को एक खतरनाक खेल खेलने जा रही है। दिल्ली को बचाने के लिए इसका विफल होना बेहद जरूरी है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

नीति आयोग के निवेश अनुकूलता सूचकांक में शीर्ष पर गुजरात, बंदरगाहों से सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के विकास तक: पढ़ें कैसे ये राज्य बना निवेशकों की पहली पसंद

जब देश का कोई उद्योगपति 500 करोड़ या 5000 करोड़ रुपए का निवेश करने का फैसला करता है, तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि उसे सस्ती जमीन कहाँ मिलेगी या सबसे ज़्यादा टैक्स छूट कौन देगा।

उसका पहला सवाल होता है अगर मैं इस राज्य में निवेश करता हूँ, तो क्या मेरी फैक्ट्री तय समय पर बन पाएगी? क्या सरकार मेरे साथ एक साझेदार की तरह काम करेगी या मुझे महीनों तक फाइलों और मंजूरियों के चक्कर लगाने पड़ेंगे? बंदरगाह कितनी दूर है? क्या 24 घंटे बिजली उपलब्ध रहेगी? क्या तैयार सामान देश और विदेश के बाजारों तक तेजी से पहुँच सकेगा? और सबसे अहम बात, क्या आज लागू नीतियों पर अगले पाँच साल बाद भी भरोसा किया जा सकेगा?

ये सवाल भले ही सामान्य लगें, लेकिन दुनिया भर में अरबों डॉलर का निवेश किस देश या किस राज्य में जाएगा, इसका फैसला अक्सर इन्हीं सवालों के जवाब तय करते हैं। यही वजह है कि निवेश की दुनिया में एक मशहूर कहावत है कि कोई भी कारोबारी सबसे पहले नक्शा नहीं देखता, बल्कि सरकार का रवैया देखता है। नक्शा बाद में देखा जाता है।

भारत में भी निवेश आकर्षित करने के लिए राज्यों के बीच लंबे समय से प्रतिस्पर्धा चल रही है। कुछ राज्य सस्ती जमीन उपलब्ध कराते हैं, कुछ टैक्स में छूट देते हैं, कुछ विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) विकसित करते हैं।

जबकि कुछ बड़े-बड़े निवेश शिखर सम्मेलन आयोजित कर दुनिया भर के उद्योगपतियों को निवेश के लिए आमंत्रित करते हैं। लेकिन इन सभी प्रयासों के बीच एक सवाल का व्यवस्थित और स्पष्ट जवाब कभी सामने नहीं आया निवेशक के नजरिए से भारत का सबसे अनुकूल राज्य कौन सा है?

इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए नीति आयोग ने पहली बार पूरे देश के लिए ‘निवेश अनुकूलता सूचकांक’ तैयार किया है। इस सूचकांक के तहत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का एक समान मानदंडों पर आकलन किया गया।

इसमें सिर्फ सरकारों के दावों को ही आधार नहीं बनाया गया, बल्कि निवेशकों के वास्तविक अनुभवों को भी बराबर महत्व दिया गया। इस मूल्यांकन के नतीजों में गुजरात देश का सबसे निवेश-अनुकूल राज्य बनकर सामने आया। इसके बाद महाराष्ट्र दूसरे और तमिलनाडु तीसरे स्थान पर रहा।

इस खबर को सिर्फ ‘गुजरात नंबर 1’ के तौर पर नहीं देखना चाहिए। क्योंकि यह कोई सामान्य रैंकिंग नहीं है, न ही किसी मीडिया संस्थान का दिया गया पुरस्कार है और न ही किसी एक विभाग का मूल्यांकन।

यह सरकार की एक ऐसी पहल है, जिसके जरिए पहली बार यह समझने की कोशिश की गई है कि अगर कोई निवेशक अपना पैसा लेकर भारत आता है, तो निवेश के लिए उसे किस राज्य पर सबसे ज्यादा भरोसा होता है।

और जब इस सवाल का जवाब गुजरात के पक्ष में आता है, तो यह सिर्फ एक साल की मेहनत का नतीजा नहीं माना जा सकता। इसके पीछे कई वर्षों से लगातार अपनाई गई एक व्यापक रणनीति है, जिसका असर आम लोगों को अक्सर तुरंत दिखाई नहीं देता।

यह सूचकांक केवल रैंकिंग के लिए नहीं है, यह भारत के भविष्य के लिए है

आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। आने वाले दो दशकों में भारत को विनिर्माण, निर्यात और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का प्रमुख केंद्र बनाने की लगातार बात की जा रही है। लेकिन सिर्फ इच्छा जताने से निवेश नहीं आता।

दुनिया की बड़ी कंपनियाँ अब केवल सस्ते श्रम को नहीं देखतीं। वे नीतिगत स्थिरता, कानूनी स्पष्टता, मजबूत बुनियादी ढाँचा, कुशल मानव संसाधन, बिजली, पानी, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स और सरकारी फैसले लेने की गति जैसे सभी पहलुओं का एक साथ आकलन करती हैं।

नीति आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में इसी बात पर जोर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य केवल केंद्र सरकार के प्रयासों से हासिल नहीं किया जा सकता।

आखिरकार उद्योग राज्यों में स्थापित होते हैं, रोजगार भी राज्यों में ही पैदा होता है और निवेश का सबसे बड़ा असर भी राज्यों पर ही दिखाई देता है। इसलिए यदि भारत को वैश्विक निवेश केंद्र बनना है, तो यह आकलन करना जरूरी है कि हर राज्य इसके लिए कितना तैयार है।

यह सोच एक दिन में विकसित नहीं हुई। जुलाई 2024 में नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यों के लिए निवेश-अनुकूल ढाँचा तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया था।

इसके बाद केंद्रीय बजट 2025-26 में इसकी औपचारिक घोषणा की गई और अंततः यह सूचकांक तैयार किया गया। इसका उद्देश्य केवल राज्यों की रैंकिंग तय करना नहीं था, बल्कि उन्हें एक-दूसरे से सीखने, अपनी कमियों को पहचानने और बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित करना भी था। इसी वजह से इस सूचकांक को केवल एक साधारण रैंकिंग नहीं, बल्कि राज्यों के लिए एक ‘मार्गदर्शक’ के रूप में देखा जाना चाहिए।

निवेशक को अंततः क्या दिखता है?

मान लीजिए कोई जर्मन ऑटोमोबाइल कंपनी भारत में निवेश करना चाहती है। या फिर अमेरिका, जापान या ताइवान की कोई सेमीकंडक्टर कंपनी करोड़ों रुपए की लागत से अपना प्लांट लगाने की योजना बना रही है।

ऐसे में वह सबसे पहले क्या करेगी? सबसे पहले वह बाजार का आकलन करेगी। फिर कच्चे माल की उपलब्धता की जाँच करेगी। इसके बाद सरकारी नीतियों का मूल्यांकन करेगी। वह यह जानना चाहेगी कि जरूरी मंजूरियाँ मिलने में कितना समय लगता है, पर्यावरण संबंधी प्रक्रियाएँ कितनी पारदर्शी हैं, बिजली और पानी की आपूर्ति कितनी भरोसेमंद है, कानून-व्यवस्था कैसी है और अगर भविष्य में सरकार बदल भी जाए, तो क्या नीतियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा।

नीति आयोग ने इन्हीं सभी सवालों के जवाबों को आंकड़ों के रूप में मापने की कोशिश की है। इसके लिए कुल 84 संकेतकों को आठ प्रमुख स्तंभों में बाँटा गया है। बुनियादी ढाँचे से लेकर संस्थागत व्यवस्था, कारोबारी माहौल से लेकर वित्तीय स्थिति और पर्यावरणीय लचीलेपन तक, हर महत्वपूर्ण पहलू को इसमें शामिल किया गया है।

इतना ही नहीं, सिर्फ सरकारों के दावों पर भरोसा करने के बजाय निवेशकों की धारणा का भी सर्वेक्षण किया गया, ताकि कागज पर दर्ज तथ्यों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर भी सामने आ सके।

यहीं से गुजरात की कहानी शुरू होती है। क्योंकि गुजरात की सफलता किसी एक योजना या एक फैसले का नतीजा नहीं है। यह कई वर्षों में लगातार लिए गए ऐसे फैसलों का परिणाम है, जिन्होंने धीरे-धीरे राज्य को न सिर्फ एक मजबूत औद्योगिक केंद्र बनाया, बल्कि निवेशकों के लिए सबसे भरोसेमंद राज्यों में भी शामिल कर दिया।

गुजरात की सबसे बड़ी ताकत सड़कें या बंदरगाह नहीं, बल्कि भरोसा है

गुजरात के पास समुद्र था, लेकिन सिर्फ समुद्र होने से कोई राज्य अपने आप उद्योग का केंद्र नहीं बन जाता। देश के कई अन्य राज्यों के पास भी बंदरगाह हैं। गुजरात के पास पर्याप्त जमीन भी थी, लेकिन केवल जमीन होने से वैश्विक कंपनियाँ करोड़ों रुपए का निवेश करने नहीं आतीं।

असली सवाल यह था कि क्या कोई राज्य अपनी भौगोलिक ताकत को नीतिगत ताकत में बदल सकता है? गुजरात ने पिछले दो दशकों में इस चुनौती को शायद सबसे सफल तरीके से पूरा किया है।

जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वाइब्रेंट गुजरात की शुरुआत हुई, तो कई लोगों ने इसे सिर्फ निवेशकों का एक भव्य सम्मेलन माना। लेकिन समय के साथ यह साफ हो गया कि इसका मकसद केवल समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर करवाना नहीं था।

इसका असली उद्देश्य दुनिया को यह भरोसा दिलाना था कि गुजरात निवेश के लिए पूरी तरह तैयार है, सरकार निवेशकों की बात सुनने के लिए तत्पर है और फैसले लेने में अनावश्यक देरी नहीं होगी।

यह सिर्फ एक संदेश नहीं था। लेकिन केवल संदेश देने से काम नहीं चलता। उसके पीछे एक मजबूत व्यवस्था भी खड़ी करनी पड़ती है और शायद यहीं से गुजरात ने कई अन्य राज्यों से अलग रास्ता अपनाया।

जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वाइब्रेंट गुजरात की शुरुआत हुई, तो कई लोगों ने इसे सिर्फ निवेशकों का एक भव्य सम्मेलन माना। लेकिन समय के साथ यह साफ हो गया कि इसका मकसद केवल समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर करवाना नहीं था।

इसका असली उद्देश्य दुनिया को यह भरोसा दिलाना था कि गुजरात निवेश के लिए पूरी तरह तैयार है, सरकार निवेशकों की बात सुनने के लिए तत्पर है और फैसले लेने में अनावश्यक देरी नहीं होगी। यह सिर्फ एक संदेश नहीं था।

लेकिन केवल संदेश देने से काम नहीं चलता। उसके पीछे एक मजबूत व्यवस्था भी खड़ी करनी पड़ती है और शायद यहीं से गुजरात ने कई अन्य राज्यों से अलग रास्ता अपनाया।

नीतियाँ नहीं, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की रणनीति

गुजरात के औद्योगिक विकास का विश्लेषण करने पर एक बात साफ दिखाई देती है कि राज्य ने कभी भी किसी एक बड़ी परियोजना के भरोसे अपनी विकास रणनीति नहीं बनाई। इसके बजाय, उसने धीरे-धीरे ऐसा निवेश पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया, जिसमें निवेशक की लगभग हर जरूरत एक-दूसरे की पूरक बन गई।

अगर किसी कंपनी को जमीन मिल जाए लेकिन बिजली न हो, तो निवेश रुक जाएगा। अगर बिजली हो लेकिन बंदरगाह तक पहुँचने के लिए बेहतर सड़क न हो, तो उत्पादन की लागत बढ़ जाएगी। अगर बंदरगाह भी हो, लेकिन सरकारी मंजूरियाँ मिलने में वर्षों लग जाएँ, तो कंपनी किसी दूसरे राज्य का रुख कर सकती है।

यही वजह है कि गुजरात ने अलग-अलग परियोजनाओं को स्वतंत्र योजनाओं की तरह नहीं, बल्कि एक समग्र विकास मॉडल के हिस्से के रूप में आगे बढ़ाया। इसी कारण आज जब गुजरात के नक्शे को देखा जाता है, तो वहाँ सिर्फ शहर नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े आर्थिक केंद्र दिखाई देते हैं।

कांडला और मुंद्रा जैसे बंदरगाह देश के व्यापार के प्रमुख प्रवेश द्वार बन चुके हैं। दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर राज्य को सीधे उत्तर भारत से जोड़ता है। समर्पित माल ढुलाई कॉरिडोर माल परिवहन को तेज और अधिक प्रभावी बनाते हैं।

धोलेरा जैसे नए औद्योगिक शहर भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किए जा रहे हैं। वहीं सानंद ऑटोमोबाइल उद्योग से लेकर सेमीकंडक्टर विनिर्माण तक, नए उद्योगों का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है।

अगर इन सभी परियोजनाओं को अलग-अलग देखा जाए, तो इनका प्रभाव उतना बड़ा नहीं लगता, लेकिन जब इन्हें एक साथ देखा जाता है, तो गुजरात एक संपूर्ण और मजबूत निवेश पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में सामने आता है।

शायद यही वजह है कि नीति आयोग ने बुनियादी ढाँचे को केवल सड़कों और पुलों तक सीमित नहीं रखा। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने स्पष्ट कहा है कि निवेश आकर्षित करने के लिए भौतिक सुविधाओं के साथ-साथ संस्थागत क्षमता और नीतिगत स्थिरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

इसी सोच के तहत इस सूचकांक में बुनियादी ढाँचे के अलावा कारोबारी माहौल, सुशासन, संसाधन उपलब्धता और संस्थागत वातावरण जैसे प्रमुख स्तंभों को भी समान महत्व दिया गया है।

गुजरात ने न केवल उद्योगों को आमंत्रित किया, बल्कि उद्योगों को आत्मविश्वास भी प्रदान किया

भारत में कई राज्य निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बड़े-बड़े सम्मेलन आयोजित करते हैं, हजारों करोड़ रुपए के समझौता ज्ञापनों (MoU) की घोषणा करते हैं और टैक्स में अलग-अलग तरह की छूट भी देते हैं। लेकिन निवेशक केवल विज्ञापनों या घोषणाओं से प्रभावित नहीं होते। वे वर्षों तक किसी राज्य के काम करने के तरीके और उसके व्यवहार का आकलन करते हैं।

किसी भी उद्योगपति के लिए सबसे बड़ी पूंजी सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि समय होता है। अगर किसी प्लांट को शुरू होने में दो साल की देरी हो जाए, तो इससे हजारों करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है।

यही वजह है कि दुनिया भर की कंपनियों के लिए ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस का मतलब केवल कोई प्रमाणपत्र या रैंकिंग नहीं, बल्कि सरकार के हर विभाग के साथ उनका वास्तविक अनुभव होता है।

गुजरात ने इसी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य ने मंजूरी प्रक्रियाओं को सरल और तेज बनाने की दिशा में लगातार काम किया है। सिंगल-विंडो सिस्टम, समयबद्ध मंजूरी, डिजिटल प्रक्रियाएँ और उद्योग विभाग की सक्रिय भूमिका ने निवेशकों को यह संदेश दिया कि सरकार केवल एक नियामक नहीं, बल्कि विकास की साझेदार भी है।

नीति आयोग ने भी इस पहलू को विशेष महत्व दिया है। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने स्पष्ट कहा है कि निवेशकों के लिए नीतिगत पारदर्शिता, तेज निर्णय प्रक्रिया और सरकार के साथ बेहतर समन्वय निवेश को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में शामिल हैं। शायद यही वजह है कि जब कोई नई वैश्विक कंपनी भारत में निवेश की संभावना पर विचार करती है, तो चर्चा में सबसे पहले गुजरात का नाम सामने आता है।

आज जो कुछ भी देखने को मिलता है, उसकी तैयारी कई साल पहले शुरू हो गई थी

भारत में कई राज्य निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बड़े-बड़े सम्मेलन आयोजित करते हैं, हजारों करोड़ रुपए के समझौता ज्ञापनों (MoU) की घोषणा करते हैं और टैक्स में अलग-अलग तरह की छूट भी देते हैं।

लेकिन निवेशक केवल विज्ञापनों या घोषणाओं से प्रभावित नहीं होते। वे वर्षों तक किसी राज्य के काम करने के तरीके और उसके व्यवहार का आकलन करते हैं।

किसी भी उद्योगपति के लिए सबसे बड़ी पूंजी सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि समय होता है। अगर किसी प्लांट को शुरू होने में दो साल की देरी हो जाए, तो इससे हजारों करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है।

यही वजह है कि दुनिया भर की कंपनियों के लिए ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस का मतलब केवल कोई प्रमाणपत्र या रैंकिंग नहीं, बल्कि सरकार के हर विभाग के साथ उनका वास्तविक अनुभव होता है।

गुजरात ने इसी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य ने मंजूरी प्रक्रियाओं को सरल और तेज बनाने की दिशा में लगातार काम किया है। सिंगल-विंडो सिस्टम, समयबद्ध मंजूरी, डिजिटल प्रक्रियाएँ और उद्योग विभाग की सक्रिय भूमिका ने निवेशकों को यह संदेश दिया कि सरकार केवल एक नियामक नहीं, बल्कि विकास की साझेदार भी है।

नीति आयोग ने भी इस पहलू को विशेष महत्व दिया है। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने स्पष्ट कहा है कि निवेशकों के लिए नीतिगत पारदर्शिता, तेज निर्णय प्रक्रिया और सरकार के साथ बेहतर समन्वय निवेश को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में शामिल हैं।

शायद यही वजह है कि जब कोई नई वैश्विक कंपनी भारत में निवेश की संभावना पर विचार करती है, तो चर्चा में सबसे पहले गुजरात का नाम सामने आता है।

लेकिन इस सफलता की असली कसौटी कहाँ है?

कोई भी सरकार अपने विकास के दावे कर सकती है। वह बड़ी-बड़ी परियोजनाओं की घोषणा भी कर सकती है। लेकिन उसकी वास्तविक सफलता की परीक्षा तब होती है, जब कोई निष्पक्ष संस्था समान मानदंडों पर सभी राज्यों का मूल्यांकन करे और यह सवाल पूछे कि निवेशकों के लिए सबसे अनुकूल माहौल आखिर कहाँ है।

नीति आयोग का यह पहला निवेश अनुकूलता सूचकांक इसी कसौटी पर आधारित है। इसमें गुजरात का पहले स्थान पर आना इस बात का संकेत है कि पिछले दो दशकों में राज्य द्वारा अपनाया गया विकास मॉडल केवल बड़ी परियोजनाएँ खड़ी करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने निवेशकों का भरोसा लगातार मजबूत करने में भी सफलता हासिल की है।

आम गुजरातियों के बारे में क्या?

अक्सर जब ऐसी रिपोर्टें सामने आती हैं, तो आम आदमी के मन में यह सवाल उठता है कि अगर किसी राज्य को निवेश के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है, तो उससे उसे क्या फायदा होगा? पहली नजर में ऐसा लगता है कि निवेशक आएँगे तो उद्योगपतियों को लाभ होगा, सरकार अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाएगी, लेकिन आम नागरिक के जीवन में क्या बदलेगा? वास्तव में, निवेश की पूरी व्यवस्था ऐसी है कि इसका सबसे बड़ा और सबसे व्यापक असर आम लोगों पर ही पड़ता है।

मान लीजिए कोई कंपनी गुजरात में 10000 करोड़ रुपए की लागत से एक नया प्लांट लगाने का फैसला करती है। खबरों में यह बात प्रमुखता से आएगी कि इतने करोड़ रुपए का निवेश हुआ है। लेकिन इसकी असली कहानी तो इसके बाद शुरू होती है।

प्लांट बनने से पहले ही निर्माण कार्य में हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। इसके साथ ही मशीनरी पहुँचाने वाले, ट्रांसपोर्टर, गोदाम संचालक, स्थानीय सप्लायर, छोटे-बड़े ठेकेदार और आसपास के कारोबारियों की आय और कामकाज भी बढ़ने लगता है। जब प्लांट शुरू होता है, तो केवल प्रत्यक्ष रोजगार ही नहीं मिलता, बल्कि उससे जुड़े कई छोटे और सहायक उद्योग भी विकसित होने लगते हैं।

किसी एक बड़े उद्योग के आसपास धीरे-धीरे पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था आकार लेने लगती है। नए आवासीय क्षेत्र विकसित होते हैं। स्कूल, अस्पताल, होटल, रेस्टोरेंट, बैंक और दूसरी जरूरी सेवाओं का विस्तार होता है। यही वजह है कि अर्थशास्त्री किसी बड़े निवेश को केवल एक कंपनी का निवेश नहीं मानते, बल्कि पूरे क्षेत्र की आर्थिक प्रगति का इंजन मानते हैं।

शायद इसी कारण से नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में निवेश को केवल उद्योग स्थापित करने तक सीमित नहीं रखा है। रिपोर्ट में निवेश को रोजगार सृजन, उत्पादन, निर्यात, उत्पादकता और दीर्घकालिक आर्थिक समृद्धि से सीधे जोड़ा गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट कहा गया है कि बेहतर निवेश वातावरण किसी भी राज्य की समग्र आर्थिक क्षमता को मजबूत बनाता है।

लेकिन प्रथम स्थान प्राप्त करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है

गुजरात के लिए यह पहला स्थान निश्चित रूप से गर्व की बात है, लेकिन शायद इससे भी बड़ी बात यह है कि अब पूरे देश की निगाहें गुजरात पर होंगी। क्योंकि यह सूचकांक कोई ऐसा दस्तावेज नहीं है, जिसे एक बार तैयार करके बंद कर दिया जाए।

नीति आयोग का स्पष्ट उद्देश्य है कि इस मूल्यांकन को समय-समय पर दोहराया जाए, राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिले और हर राज्य दूसरे राज्यों से सीखकर अपने प्रदर्शन में सुधार करे।

यही वजह है कि आने वाले वर्षों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्य भी अपनी नीतियों को और बेहतर बनाने की कोशिश करेंगे। इससे राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा और अधिक मजबूत होगी।

ऐसे में गुजरात के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पहला स्थान हासिल करना नहीं, बल्कि उसे लगातार बनाए रखना है। क्योंकि निवेश की दुनिया में अतीत की उपलब्धियों से कहीं ज्यादा महत्व वर्तमान प्रदर्शन और लगातार सुधार का होता है।

जो राज्य आज सबसे आगे है, अगर वह समय के साथ खुद को नहीं बदलेगी, तो कल पीछे भी छूट सकती है। दुनिया की बड़ी कंपनियाँ केवल भारत के राज्यों की आपस में तुलना नहीं करतीं, बल्कि वे भारत की तुलना वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, मैक्सिको और पूर्वी यूरोप जैसे देशों से भी करती हैं। इसलिए गुजरात के लिए अब प्रतिस्पर्धा सिर्फ देश के भीतर नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर है।

इस चर्चा का शायद सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है

इस सूचकांक को ध्यान से पढ़ने पर एक बात बार-बार सामने आती है। नीति आयोग ने कहीं भी यह नहीं कहा कि सिर्फ सस्ती जमीन उपलब्ध करा देने से निवेश आ जाएगा। न ही रिपोर्ट में यह कहा गया है कि केवल टैक्स में छूट देकर कोई राज्य निवेश का केंद्र बन सकता है।

इसके विपरीत, पूरी रिपोर्ट में एक स्पष्ट और लगातार उभरने वाला विचार यह है कि निवेश तभी आता है, जब पूरा पारिस्थितिकी तंत्र निवेशकों का भरोसा जीतता है। इसका मतलब है, अच्छी और स्थिर नीतियाँ, मजबूत बुनियादी ढाँचा, तेज और पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया, प्रभावी शासन और भविष्य के लिए स्पष्ट रणनीति।

शायद यही वजह है कि गुजरात की सफलता को केवल किसी एक विभाग या किसी एक सरकार की उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह कई वर्षों में विकसित हुए एक ऐसे समग्र विकास मॉडल का परिणाम है, जिसमें बंदरगाह, सड़कें, औद्योगिक गलियारे, निवेश-अनुकूल नीतियाँ, निवेशकों के साथ लगातार संवाद, नई तकनीकों को अपनाने की तैयारी और सुशासन की दक्षता इन सभी ने मिलकर एक-दूसरे की पूरक भूमिका निभाई है।

सिर्फ प्रथम स्थान ही नहीं, बल्कि विकास मॉडल की एक परीक्षा भी

भारत में विकास पर होने वाली चर्चा अक्सर राजनीतिक दावों और प्रतिदावों के बीच उलझ जाती है। जब कोई सरकार किसी उपलब्धि का श्रेय लेती है, तो विपक्ष उसकी आलोचना करता है।

लेकिन कुछ अवसर ऐसे भी होते हैं, जब बहस राजनीतिक बयानों पर नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और निष्पक्ष मूल्यांकन पर आधारित होती है। नीति आयोग का पहला निवेश अनुकूलता सूचकांक ऐसा ही एक उदाहरण है।

यह सूचकांक यह नहीं कहता कि गुजरात में कोई समस्या नहीं है या वहाँ सुधार की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके उलट, इसका उद्देश्य राज्यों को लगातार बेहतर प्रदर्शन करने और सुधार की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि निवेशकों को आकर्षित करने के लिए जरूरी विभिन्न मानकों पर गुजरात फिलहाल देश के अन्य सभी राज्यों से आगे है।

इसलिए गुजरात के इस पहले स्थान को केवल एक ट्रॉफी या रैंकिंग के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे पिछले दो दशकों में राज्य द्वारा तय की गई विकास यात्रा की एक महत्वपूर्ण परीक्षा और उसकी सफलता के प्रमाण के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

यही इस पूरी रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश भी है। निवेशक केवल उन जगहों पर नहीं जाते, जहाँ सबसे बड़ी घोषणाएँ होती हैं, बल्कि वे वहाँ निवेश करते हैं, जहाँ उन्हें सबसे अधिक भरोसा दिखाई देता है।

नीति आयोग के पहले निवेश अनुकूलता सूचकांक ने कम से कम इतना स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल भारत के राज्यों में निवेशकों के भरोसे का सबसे मजबूत केंद्र गुजरात है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)






डोनाल्ड ट्रंप ने US के चुनावी सिस्टम में चीनी घुसपैठ के रखे सबूत: अब फिर से समझें न्यूजक्लिक केस, जो बताता है कि भारत में क्यों थी SIR की जरूरत

चीन पर लंबे समय से दुनिया के प्रमुख लोकतांत्रिक देशों के चुनावों में अलग-अलग तरीकों से दखल देने और उन्हें प्रभावित करने के आरोप लगते रहे हैं। अब अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने वर्ष 2020 से जुड़े खुफिया और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के कई दस्तावेजों को सार्वजनिक किया है।

इन दस्तावेजों में दावा किया गया है कि चीन ने 20 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का डेटा हासिल कर लिया था और अमेरिकी चुनाव प्रणाली की कमजोरियों का फायदा उठाकर चुनाव को जो बाइडेन के पक्ष में प्रभावित करने की कोशिश की थी।

चीन ने अमेरिकी वोटर्स का डेटा चुराकर किया इस्तेमाल, ट्रंप ने गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए जाँच के दिए आदेश

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 जुलाई 2026 को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में 2020 के चुनावों से जुड़े कई गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक किए। उन्होंने दावा किया कि इन दस्तावेजों से अमेरिकी चुनावी व्यवस्था की गंभीर कमजोरियाँ सामने आती हैं और इसी वजह से उन्होंने यह जाँच कराने का आदेश दिया है कि चीन के कथित चुनावी हस्तक्षेप से जुड़ी खुफिया जानकारी उनके पहले कार्यकाल के दौरान आखिर क्यों दबाई गई या सार्वजनिक नहीं की गई।

अपने संबोधन में ट्रंप ने कहा, “आज रात मैं महत्वपूर्ण खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की घोषणा कर रहा हूँ। ये दस्तावेज हमारी चुनावी व्यवस्था की चौंकाने वाली कमजोरियों को उजागर करते हैं। इससे पता चलता है कि चुनाव प्रणाली हैकिंग, दुरुपयोग और विदेशी हस्तक्षेप के लिए पहले से कहीं अधिक संवेदनशील रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि वर्षों तक यह महत्वपूर्ण जानकारी अमेरिकी जनता से छिपाकर रखी गई।”

ट्रंप ने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों पर आरोप लगाया कि उन्होंने चीन के कथित चुनावी हस्तक्षेप और उन्हें हराने की साजिश से जुड़ी जानकारी को दबाकर रखा। उन्होंने इस मामले की जाँच के लिए ऑफिस ऑफ द डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (ODNI), न्याय विभाग (DOJ), फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) और सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) को जाँच शुरू करने का निर्देश दिया।

ट्रंप ने यह भी कहा कि अब स्थिति बदल रही है और जिन दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जा रहा है, उन्हें व्हाइट हाउस की गवर्नमेंट ट्रांसपेरेंसी टास्क फोर्स और राष्ट्रपति के इंटेलिजेंस एडवाइजरी बोर्ड ने तैयार किया है। उनके अनुसार, अमेरिका की शीर्ष खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों ने इन दस्तावेजों की समीक्षा की है और उनकी प्रामाणिकता की पुष्टि की है।

ट्रंप का दावा है कि सार्वजनिक किए गए दस्तावेज पाँच बड़े मुद्दों से जुड़े हैं। इनमें सबसे बड़ा आरोप यह है कि 2020 के चुनाव के दौरान चीन ने अमेरिकी चुनावी डेटा में इतिहास की सबसे बड़ी सेंध लगाई और अवैध रूप से 22 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का डेटा हासिल कर लिया।

ट्रंप के मुताबिक, इस डेटा में मतदाताओं के नाम, पते, फोन नंबर, राजनीतिक दलों से जुड़ी जानकारी और अन्य संवेदनशील विवरण शामिल थे, जिनका इस्तेमाल वोटर पंजीकरण में गड़बड़ी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों के लिए किया जा सकता था।

उन्होंने इसे ‘अमेरिकी चुनावी सुरक्षा के लिए अभूतपूर्व संकट’ बताते हुए दावा किया कि अमेरिकी खुफिया जानकारी के अनुसार, चीन ने इस डेटा का इस्तेमाल करने के लिए एक विशेष डेटा एक्सप्लॉइटेशन यूनिट भी बनाई थी।

गुरुवार (16 जुलाई 2026) को जारी किए गए दस्तावेजों के दूसरे हिस्से में दावा किया गया है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के तथाकथित ‘डीप स्टेट’ से जुड़े अधिकारियों ने चीन के कथित चुनावी हस्तक्षेप की गंभीरता से जुड़ी जानकारी को जानबूझकर दबाया और उसे कम करके दिखाया।

ट्रंप के अनुसार, यह जानकारी न केवल तत्कालीन राष्ट्रपति से बल्कि अमेरिकी जनता से भी छिपाकर रखी गई। गोपनीयता से मुक्त किए गए मेमो का हवाला देते हुए ट्रंप ने आरोप लगाया कि वर्ष 2020 में चीन ने अमेरिका के 18 राज्यों में करोड़ों मतदाताओं का डेटा खरीदा, चुराया या हैक कर लिया था।

ट्रंप ने कहा, “राष्ट्रपति होने के बावजूद मुझे या किसी और को इसकी जानकारी नहीं दी गई। हमारी जानकारी के अनुसार कॉन्ग्रेस को भी इससे अवगत नहीं कराया गया। इसके बजाय बार-बार यही कहा जाता रहा कि यह हमारे देश के इतिहास का सबसे सुरक्षित चुनाव था।”

सार्वजनिक किए गए गोपनीय दस्तावेजों के अनुसार, अप्रैल 2020 से चीन की खुफिया एजेंसियाँ अमेरिका के विभिन्न राज्यों के मतदाता पंजीकरण से जुड़े कई डेटा सेट का विश्लेषण कर रही थीं। व्हाइट हाउस द्वारा जारी जिप फाइल में ऐसे कई गोपनीय मेमो शामिल हैं, जिनमें मतदाता पंजीकरण रिकॉर्ड तक पहुँच या उनमें कथित सेंध लगाए जाने का उल्लेख किया गया है।

सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों में से एक में दावा किया गया है कि अगस्त 2020 में चीनी सरकार ने बड़ी संख्या में नकली अमेरिकी ड्राइविंग लाइसेंस तैयार कर उन्हें गुप्त रूप से अमेरिका भेजा था। दस्तावेज के अनुसार, इन फर्जी लाइसेंसों का इस्तेमाल ऐसे हजारों चीनी छात्रों और प्रवासियों, जिन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का समर्थक बताया गया है, को अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडेन के पक्ष में मतदान कराने के लिए किया जाना था, जबकि वे अमेरिका में मतदान करने के पात्र नहीं थे।

गोपनीयता से मुक्त किए गए एक दस्तावेज में दावा किया गया है कि चीन ने टिकटॉक के लाखों अमेरिकी यूजर्स का निजी डेटा, जिसमें उनके नाम, पहचान संबंधी जानकारी और पते शामिल थे, इकट्ठा किया था। दस्तावेज के अनुसार, इस जानकारी का इस्तेमाल असली अमेरिकी नागरिकों के नाम पर फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस बनाने के लिए किया जा सकता था।

इन नकली लाइसेंसों में अमेरिकी नागरिकों के वास्तविक पहचान नंबर और पते शामिल होने से उन्हें पकड़ना बेहद मुश्किल होता। दस्तावेज में यह भी दावा किया गया है कि चीन की योजना इन फर्जी लाइसेंसों के जरिए हजारों मेल-इन वोट डलवाने की थी।

सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों में यह भी आरोप लगाया गया है कि चीन ने टिकटॉक, फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ-साथ प्रभावशाली लोगों, पत्रकारों और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से जुड़े नेटवर्क के माध्यम से अमेरिकी जनमत को प्रभावित करने की रणनीति बनाई थी।

दस्तावेजों के अनुसार, चीन ने अमेरिका में प्रवासी समुदायों के बीच सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ाने, ब्लैक लाइव्स मैटर (Black Lives Matter) आंदोलन को हवा देने और विभिन्न प्रमुख मुद्दों पर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की।

ट्रंप ने यह भी दावा किया कि चीनी सरकार ने ऐसे अमेरिकी पत्रकारों की पहचान करने की कोशिश की, जिन्होंने राष्ट्रपति के खिलाफ नकारात्मक रिपोर्टिंग की थी और उन्हें राष्ट्रपति के खिलाफ और अधिक नकारात्मक लेख लिखने के लिए बड़ी रकम देने का प्रयास किया।” हालाँकि उन्होंने किसी भी ऐसे पत्रकार का नाम सार्वजनिक नहीं किया।

दस्तावेजों के अनुसार, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने अमेरिका के उन आंतरिक मुद्दों की पहचान की, जिनका इस्तेमाल समाज में विभाजन बढ़ाने के लिए किया जा सकता था।

इनमें प्रवासी समुदायों में सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा करना, कथित मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर विरोध प्रदर्शनों को बढ़ावा देना, प्रवासी विरोधी और प्रवासी समर्थक समूहों के बीच तनाव बढ़ाना तथा आव्रजन विरोधी प्रदर्शनों को भड़काने जैसी गतिविधियाँ शामिल होने का दावा किया गया है।

दस्तावेजों में यह भी आरोप लगाया गया है कि चीन ने नस्लीय तनाव भड़काने की भी कोशिश की। इसके लिए उसने यह नैरेटिव फैलाया कि ट्रंप के नेतृत्व वाला व्हाइट हाउस अश्वेत लोगों से नफरत करता है। दस्तावेजों के अनुसार, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने नस्लीय विभाजन के सबूत के तौर पर प्रदर्शन और मार्च आयोजित कराने या उन्हें बढ़ावा देने का प्रयास किया।

इसके अलावा चीन ने यह नैरेटिव भी फैलाया कि अमेरिकी सरकार और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बुनियादी स्तर पर गंभीर मतभेद हैं।

इन दस्तावेजों में कुछ राज्यों की मतदाता सूचियों में गैर-नागरिकों के पंजीकरण जैसे अन्य प्रमुख विषय भी शामिल हैं। व्हाइट हाउस के अनुसार, गोपनीयता से मुक्त किए गए दस्तावेज़ों से संकेत मिलता है कि अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (Department of Homeland Security) का मत था कि कई प्रमुख राज्यों की मतदाता सूचियों में कम से कम 2.5 लाख गैर-नागरिक दर्ज थे।

कुल मिलाकर ट्रंप प्रशासन का मानना है कि गोपनीयता से मुक्त कर सार्वजनिक किए गए दस्तावेज यह संकेत देते हैं कि चीन ने सीधे तौर पर मतपत्रों में बदलाव नहीं किया (हालाँकि ट्रंप ने FBI की 2020 की ‘रॉ इंटेलिजेंस’ का हवाला देते हुए दावा किया कि चीन ने जो बाइडेन के लिए मतपत्र तैयार करने की कोशिश की थी), न ही उसने वोटों की कुल संख्या बदली और न ही मतगणना में इस तरह का हस्तक्षेप किया जिससे 2020 के चुनाव का परिणाम पलट गया हो। लेकिन चीन ने ट्रंप की हार और बाइडेन की जीत सुनिश्चित करने के लिए अमेरिकी चुनावों में हस्तक्षेप जरूर किया।

हालाँकि ट्रंप के आलोचक, जिनमें अमेरिका की पारंपरिक मीडिया भी शामिल है, राष्ट्रपति की इस प्रस्तुति को उनके राजनीतिक लाभ के लिए डेटा तक पहुँच से जुड़े निष्कर्षों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना बता रहे हैं। लेकिन दूसरे देशों की घरेलू राजनीति और चुनावों को प्रभावित करने की चीन की व्यापक प्रवृत्ति को देखते हुए, उनके दावे विश्वसनीय प्रतीत होते हैं।

OpIndia ने पहले रिपोर्ट किया था कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने गैर-लाभकारी संगठनों, एक्टिविस्ट समूहों, थिंक टैंक और मीडिया संस्थानों का एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क खड़ा किया, जो उसके प्रचार तंत्र के रूप में काम करता है।

CCP ने अमेरिका में जन्मे टेक उद्योगपति नेविल रॉय सिंघम के नेतृत्व में एक प्रो-चीन सूचना-प्रचार (information laundering) नेटवर्क तैयार किया।

सिंघम ने 2017 में अपनी आईटी कंसल्टिंग कंपनी Thoughtworks को लगभग 78.5 करोड़ डॉलर में बेचने के बाद शंघाई में जाकर निवास करना शुरू किया था। यह इन्फॉर्मेशन लॉन्ड्रिंग नेटवर्क कच्चे सामाजिक आंदोलनों (raw activism) को व्यवस्थित प्रचार (polished propaganda) में बदलता है।

इसके बाद रॉय सिंघम द्वारा वित्तपोषित नेटवर्क उसे अमेरिका और अन्य लोकतांत्रिक देशों में मतभेद पैदा करने के लिए फैलाता है, जबकि चीन की छवि को ‘साम्राज्यवाद’, विशेष रूप से अमेरिकी साम्राज्यवाद, के मुकाबले एक ‘हितैषी’ विकल्प के रूप में पेश करता है। रिपोर्ट के अनुसार, क्यूबा में जारी वामपंथी सक्रियता इसका एक स्पष्ट उदाहरण है।

अमेरिका में फिलिस्तीन समर्थक आंदोलन, ट्रंप की क्यूबा में बढ़ती रुचि के बीच वहाँ बड़ी संख्या में वामपंथी कार्यकर्ताओं का पहुँचना और ईरान युद्ध को लेकर ‘नो वॉर’ अभियान जैसे आंदोलन देखने में स्वतःस्फूर्त और वास्तविक लगते हैं। लेकिन रिपोर्ट का दावा है कि ये वास्तव में सुनियोजित, पर्याप्त वित्तपोषित और राजनीतिक उद्देश्य से चलाए गए अभियान हैं, जिनके पीछे नेविल रॉय सिंघम के परोपकारी संगठनों, थिंक टैंक, मीडिया, कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, हस्तियों, राजनीतिक संगठकों और सहयोगियों का नेटवर्क है।

रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से नेविल रॉय सिंघम ने अपने चीन समर्थक प्रचार नेटवर्क में सीधे 27.8 करोड़ डॉलर से अधिक की फंडिंग की, जबकि 2025 तक पाँच महाद्वीपों में 223 लेनदेन के जरिए कुल धन प्रवाह 59.1 करोड़ डॉलर से अधिक रहा। यह भारी धनराशि 1,000 से अधिक आपस में जुड़े संगठनों तक पहुँची, जिनमें से करीब 200 संगठन सीधे तौर पर CCP के निर्देश पर चीन समर्थक और अमेरिका विरोधी संदेश तैयार करने और फैलाने में शामिल थे।

दूसरे देशों की राजनीति और चुनावों में चीन का हस्तक्षेप: क्या है CCP की ‘यूनाइटेड फ्रंट’ रणनीति

चीन के लिए सिर्फ अपने देश में ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों में भी नैरेटिव, सत्ता और अपने हितों का सबसे अहम माध्यम है। तियानआनमेन स्क्वायर नरसंहार की सच्चाई दबाने से लेकर सरकार-विरोधी आलोचनाओं पर रोक लगाने तक, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का मानना है कि उसका अस्तित्व और निर्विवाद शासन नैरेटिव पर नियंत्रण पर निर्भर करता है।

दरअसल CCP की एक राजनीतिक रणनीति है, जिसे ‘यूनाइटेड फ्रंट (United Front)’ कहा जाता है। इसका उद्देश्य विरोधियों को अलग-थलग करना और व्यापारिक समूहों, गैर-कम्युनिस्ट संगठनों तथा अल्पसंख्यक समुदायों जैसे संभावित सहयोगियों को अपने पक्ष में करना है।

CCP का यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट (UFWD) एक अच्छी तरह से वित्तपोषित इकाई है, जो विभिन्न देशों में कई फ्रंट संगठनों के माध्यम से चीन के हितों को आगे बढ़ाने और उसका प्रभाव बढ़ाने का काम करती है। ये फ्रंट संगठन खुलकर यह नहीं बताते कि उनका संबंध CCP से है।

इन संगठनों के जरिए सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों, चीन में पंजीकृत निजी कंपनियों, चीनी छात्र संगठनों, विदेशी सांस्कृतिक संस्थाओं, विदेशी मीडिया, चीनी मूल के समुदायों तथा प्रभावशाली कारोबारी और राजनीतिक हस्तियों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं के माध्यम से CCP के उद्देश्यों का समर्थन करने के लिए जोड़ा जाता है।

‘यूनाइटेड फ्रंट’ रणनीति, जिसे माओ जेदोंग अपनी ‘जादुई हथियार (Magic Weapon)’ कहा करते थे, के तहत CCP प्रभाव संचालन (Influence Operations) चलाती है, दुष्प्रचार (Disinformation) तैयार करती और फैलाती है, प्रभावशाली लोगों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश करती है, आर्थिक दबाव बनाती है, साइबर जासूसी करती है और प्रॉक्सी नेटवर्क खड़े करती है, ताकि दूसरे देशों में अपने हितों के अनुरूप नैरेटिव, नीतियों और जनमत को प्रभावित किया जा सके।

इस रणनीति के तहत मीडिया, थिंक टैंक, शैक्षणिक संस्थानों और प्रवासी संगठनों को वित्तीय सहायता देना या उन्हें प्रभावित करना, विदेशी सरकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की कमजोरियों का फायदा उठाना और कुछ मामलों में अशांति भड़काना भी शामिल होता है।

चीन यूनाइटेड फ्रंट वर्क का इस्तेमाल खुफिया जानकारी जुटाने और विरोधियों के दमन के लिए भी करता है। हालाँकि दूसरे देशों के चुनावों में हस्तक्षेप करने या उन्हें प्रभावित करने की कोशिश केवल चीन तक सीमित नहीं है, लेकिन CCP जैसी केंद्रीकृत व्यवस्था के जरिए इतने बड़े पैमाने पर इस तरह के प्रभाव या शासन परिवर्तन (Regime Change) के प्रयास करने वाला शायद ही कोई दूसरा देश है।

कनाडा के संघीय चुनावों में चीनी हस्तक्षेप के आरोप

अमेरिका से पहले चीन पर कनाडा के चुनावों में हस्तक्षेप करने के भी आरोप लग चुके हैं। जून 2024 में कनाडा की खुफिया निगरानी संस्था नेशनल सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस कमेटी ऑफ पार्लियामेंटेरियंस (NSICOP) ने ‘Special Report on Foreign Interference in Canada’s Democratic Processes and Institutions’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की।

इस रिपोर्ट में कनाडा की चुनावी और विधायी प्रक्रियाओं में चीन के व्यापक हस्तक्षेप का दावा किया गया। रिपोर्ट के संपादित (Redacted) संस्करण में यह भी उल्लेख है कि कुछ कनाडाई सांसदों ने चीन के साथ मिलीभगत की थी।

रिपोर्ट के अनुसार, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के समर्थन से कुछ चीनी नागरिक कनाडा की शासन व्यवस्था और अर्थव्यवस्था के हर स्तर में घुसपैठ करने और उसे प्रभावित करने के लिए सुनियोजित प्रयास करते रहे हैं और अब भी कर रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि CCP ने कनाडा के चुनावों में अवैध हस्तक्षेप, कनाडाई अधिकारियों को रिश्वत देने और संसाधनों के दोहन के लिए कनाडा के मूल निवासियों (Indigenous people) का गुप्त तरीकों से इस्तेमाल करने की कोशिश की। इसका उल्लेख रिपोर्ट के 2019 के गैर-संपादित (Non-redacted) संस्करण में भी किया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने कनाडा और अन्य देशों में ‘ओवरसीज पुलिस स्टेशन’ (Overseas Police Stations) भी स्थापित किए थे। ट्रंप द्वारा अमेरिकी चुनावों में चीनी हस्तक्षेप के लगाए गए आरोपों की तरह ही NSICOP की रिपोर्ट में कहा गया कि चीन ने सोशल मीडिया और पारंपरिक मीडिया (Legacy Media) का इस्तेमाल कर कनाडाई मतदाताओं, विभिन्न जातीय-सांस्कृतिक समुदायों और सांसदों की राय को प्रभावित करने की कोशिश की।

2021 के कनाडाई संघीय चुनाव के दौरान सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस थ्रेट्स टू इलेक्शंस टास्क फोर्स (SITE) ने पाया कि मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया पर ऐसी गतिविधियाँ चल रही थीं, जिनका उद्देश्य मतदाताओं को कंजर्वेटिव पार्टी के समर्थन से हतोत्साहित करना था।

हालाँकि इन गतिविधियों का सीधा संबंध चीनी सरकार से स्थापित नहीं हो सका, लेकिन जाँच में सामने आए पैटर्न ने चीन द्वारा संचालित एक समन्वित अभियान की ओर संकेत किया। कनाडियन सिक्योरिटी इंटेलिजेंस सर्विस (CSIS) के आँकलन और हॉग आयोग (Hogue Commission) 2024 की सार्वजनिक जाँच में कहा गया कि बीजिंग ने 2019 और 2021 के कनाडाई संघीय चुनावों में गुप्त और भ्रामक तरीके से हस्तक्षेप किया।

रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने जस्टिन ट्रूडो के नेतृत्व वाली लिबरल पार्टी का समर्थन किया। इसके लिए अनुकूल सोशल मीडिया प्रचार, चीनी-कनाडाई समुदाय में प्रॉक्सी एजेंटों का इस्तेमाल और अनुकूल उम्मीदवारों के चुनाव अभियान को वित्तीय सहायता देने जैसे तरीकों का उपयोग किया गया।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कनाडाई सांसदों पर CCP का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि संसद में चीन के पक्ष या विपक्ष में व्यक्त किए गए विचारों के आधार पर सांसदों को पुरस्कृत या दंडित किया जाता था। चीन का चुनावी हस्तक्षेप अमेरिका और कनाडा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत जैसे उसके प्रतिद्वंद्वी पड़ोसी देश तक भी पहुँचता है।

भारतीय राजनीति में चीनी हस्तक्षेप: न्यूजक्लिक मामला

अमेरिकी चुनावों में CCP के हस्तक्षेप के ताजा आरोप भारत की चुनावी राजनीति में चीन के लगातार हस्तक्षेप की याद दिलाते हैं। वर्षों से चीन से जुड़े प्रभाव अभियानों, चाहे वे मीडिया संस्थान हों, राजनेता हों या संदिग्ध NGO ने मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव गढ़े हैं, जिनका अंतिम उद्देश्य सत्ता परिवर्तन (Regime Change) बताया गया है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण न्यूज़क्लिक (NewsClick) मामला है। चीन समर्थक प्रचार पोर्टल पहली बार 2021 में उस समय सुर्खियों में आया, जब वह प्रवर्तन निदेशालय (ED) के रडार पर आया। इस पोर्टल पर कथित तौर पर करीब 38 करोड़ रुपए की विदेशी फंडिंग धोखाधड़ी से प्राप्त करने का आरोप लगा था।

2023 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत न्यूजक्लिक के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ, एचआर प्रमुख अमित चक्रवर्ती समेत अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और बाद में विस्तृत आरोपपत्र दाखिल किया।

अमेरिका में प्रो-चीन इन्फॉर्मेशन लॉन्ड्रिंग नेटवर्क चलाने वाले वही नेविल रॉय सिंघम भारत में भी अपना नेटवर्क फैला चुके हैं। रॉय सिंघम के Justice and Education Fund ने दिल्ली स्थित चीन समर्थक प्रचार पोर्टल न्यूज़क्लिक को 1.05 करोड़ डॉलर (10.5 मिलियन डॉलर) का दान दिया।

रॉय सिंघम के नेटवर्क के सबसे प्रमुख सदस्यों में विजय प्रसाद शामिल हैं। उन्होंने न्यूजक्लिक के लिए भारत विरोधी प्रचार वाले कई लेख लिखे हैं। विजय प्रसाद CPI(M) नेता बृंदा करात के भतीजे हैं। बृंदा करात, प्रकाश करात की पत्नी हैं, जो CPI(M) के वरिष्ठ नेता हैं।

न्यूजक्लिक की चीनी फंडिंग मामले में पहले सामने आए ईमेल आदान-प्रदान से नेविल रॉय सिंघम और करात परिवार के बीच करीबी संबंधों का खुलासा हुआ था। विजय प्रसाद प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल (Progressive International) के काउंसिल सदस्य भी रह चुके हैं।

यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जो दुनिया भर के वामपंथी कार्यकर्ताओं और संगठनों को संगठित करता है। OpIndia पहले भी बता चुका है कि यह संगठन लगातार ऐसे प्रचार लेख और बयान प्रकाशित करता है, जिनमें मुस्लिम पीड़ित होने (Muslim Victimhood) के नैरेटिव को आगे बढ़ाकर मोदी सरकार को बदनाम किया जाता है।

यह मंच नियमित रूप से हर्ष मंदर जैसे हिंदू विरोधी और इस्लामवादी समर्थकों को जगह देता है, जबकि जयति घोष और ब्रिटेन के पूर्व लेबर सांसद जेरेमी कॉर्बिन इसके काउंसिल सदस्यों में शामिल हैं। रॉय सिंघम के प्रचार नेटवर्क का संबंध हमास समर्थक Tides Foundation से भी है।

यह फाउंडेशन कई हिंदू विरोधी और भारत विरोधी संगठनों तथा तत्वों को फंडिंग देने के लिए बदनाम है। इसने हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) को भी अनुदान दिया, जिसके संबंध इस्लामवादी और खालिस्तानी तत्वों से बताए गए हैं। HfHR की स्थापना 2019 में इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) और ऑर्गनाइजेशन फॉर माइनॉरटीज ऑफ इंडिया (OFMI) नामक दो इस्लामवादी वकालत करने वाले संगठनों ने की थी।

Tides Foundation ने AMAN पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट (AMAN) को भी फंडिंग दी। इस ट्रस्ट का संबंध न्यूजक्लिक-चीन फंडिंग मामले से बताया गया है, जिसमें आरोप है कि भारत की संप्रभुता को बाधित करने के लिए चीनी संस्थाओं ने न्यूज़क्लिक को धन उपलब्ध कराया।

नेविल रॉय सिंघम ने भारत से जिन लोगों को अपने बड़े नेटवर्क से जोड़ा और जिन्होंने Tricontinental के साथ काम किया, उनमें प्रबीर पुरकायस्थ, सृजना, प्रशांत और विजय प्रसाद शामिल थे। The New York Times ने Tricontinental को उन गैर-लाभकारी संस्थाओं में शामिल बताया था, जो चीन के पक्ष में प्रचार करती थीं।

विजय प्रसाद के अर्बन नक्सल पी साईनाथ से भी करीबी संबंध हैं। उनके प्रचार पोर्टल PARI ने बाद में नेविल रॉय सिंघम के संदर्भ हटा दिए, जब उनके चीन के प्रचार नेटवर्क से जुड़े होने का मामला सामने आया। OpIndia लगातार न्यूजक्लिक के हिंदू विरोधी प्रचार को उजागर करता रहा है।

इसके अलावा न्यूजक्लिक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से कथित संबंधों को लेकर भी जाँच होती रही है। 2023 में The New York Times की जाँच में कार्यकर्ताओं, गैर-लाभकारी संस्थाओं, शेल कंपनियों और चीन से जुड़े प्रचार नेटवर्क का खुलासा हुआ, जिसके केंद्र में नेविल रॉय सिंघम थे।

2024 में दिल्ली पुलिस द्वारा दाखिल आरोपपत्र में चीनी सरकार को ‘Ultimate Paymaster’ बताया गया और कहा गया कि कश्मीर तथा किसान आंदोलन जैसे मुद्दों पर भारत विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए धन भेजा गया। यह मामला फिलहाल कोर्ट में लंबित है।

2021 में OpIndia ने न्यूजक्लिक के संबंधों पर एक विस्तृत जाँच की थी और बताया था कि उसका संबंध ऐसे कई लोगों से था, जो नियमित रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलते रहे हैं। इनमें अर्बन नक्सल, तीस्ता सीतलवाड़, अभिसार शर्मा और कई अन्य नाम शामिल थे।

ऑपइंडिया की वह रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है।

रॉय सिंघम के नेटवर्क से जुड़े कई चीन समर्थक प्रचार तंत्र आज भी भारत विरोधी और सरकार विरोधी नैरेटिव चला रहे हैं। OpIndia ने People’s Dispatch, TriContinental, People’s Forum समेत ऐसे कई संगठनों के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की है।

कश्मीरी अलगाववाद, हिंदू विरोधी नैरेटिव, केरल के ‘कम्युनिस्ट मॉडल’ का महिमामंडन, मुस्लिम पीड़ित होने का नैरेटिव और भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाने वाले प्रचार से लेकर, CCP से जुड़े नेविल रॉय सिंघम समर्थित ये संस्थाएँ मुद्दों, गैर-लाभकारी संस्थाओं से जुड़े कानूनों, डिजिटल मीडिया और उपलब्ध हर संसाधन का इस्तेमाल प्रतिद्वंद्वी देशों को कमजोर करने, नीतिगत फैसलों को प्रभावित करने, भारत को कमजोर करने और चीन को भू-राजनीतिक बढ़त दिलाने के लिए करती हैं।

इस वर्ष फरवरी में, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत विदेशी फंडिंग नियमों के उल्लंघन के मामले में न्यूजक्लिक और उसके संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ पर 184 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।

न्यूजक्लिक के संस्थापक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के सदस्य नेविल रॉय सिंघम के साथ मिलकर भारत सरकार और कोविड-19 के प्रसार को रोकने के उसके प्रयासों को बदनाम करने, तथा भारत बायोटेक द्वारा विकसित भारतीय वैक्सीन ‘कोवैक्सिन’ की प्रभावशीलता पर सवाल उठाने की साजिश रचने के आरोप लगे।

चीन से फंडिंग पाने वाले न्यूजक्लिक ने भारत विरोधी आवाजों को दिया मंच, 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के आरोपितों तक पहुँची फंडिंग

न्यूजक्लिक पर आरोप है कि उसने चीन से फंडिंग प्राप्त कर भारत में अशांति फैलाने, विशेषकर नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान मोदी सरकार को गिराने की कोशिश की। इसके अलावा उसके संबंध गौतम नवलखा जैसे भारत विरोधी चेहरों से भी बताए गए हैं।

दिल्ली पुलिस के आरोपपत्र में न्यूजक्लिक के संस्थापक पर लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के आतंकियों से संबंध रखने, 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के आरोपित शरजील इमाम तथा नक्सलियों को धन उपलब्ध कराने के आरोप लगाए गए हैं।

17 तारीख को राजामणिकम पी (All India Peoples Science Network- AIPSN) की ओर से ‘Share Notes on CAA docs’ शीर्षक वाला एक ईमेल भेजा गया था। AIPSN की स्थापना प्रबीर पुरकायस्थ ने की थी। ईमेल में CAA और NRC को लेकर दुष्प्रचार फैलाया गया और डर का माहौल बनाने की कोशिश की गई।

इसमें कहा गया कि NRC के जरिए मुसलमानों को प्रताड़ित किया जाएगा, जबकि उस समय NRC का कोई मसौदा तक मौजूद नहीं था और CAA का किसी भी भारतीय नागरिक से कोई संबंध नहीं था।

OpIndia ने पहले रिपोर्ट किया था कि तीस्ता सीतलवाड़, हर्ष मंदर, प्रबीर पुरकायस्थ, गीता हरिहरन और अन्य लोगों ने CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और पत्थरबाजी भड़काने तथा प्रदर्शनकारियों के लिए फंडिंग की व्यवस्था करने की रणनीति बनाई थी।

8,000 पन्नों के आरोपपत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि न्यूजक्लिक ने जानबूझकर अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर का नक्शा इस तरह विकृत दिखाया, जिससे यह प्रदर्शित हो कि ये क्षेत्र चीन के हैं।

न्यूजक्लिक के संस्थापक और नेविल रॉय सिंघम ने भारत समेत अन्य देशों के अलगाववादी आंदोलनों से गठजोड़ पर की चर्चा

चार्जशीट के अनुसार, न्यूजक्लिक के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ और नेविल रॉय सिंघम ने इस बात पर चर्चा की थी कि भारत और अन्य देशों में अलगाववादी (Separatist) आंदोलनों के साथ प्रभावी तरीके से गठजोड़ कैसे किया जा सकता है।

आरोपपत्र के अनुसार, इस कथित साजिश की शुरुआत उन ईमेल से हुई, जिन्हें प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के साथ साझा किया था। स्पेशल सेल के अनुसार, 29 जून 2016 को प्रबीर पुरकायस्थ द्वारा नेविल रॉय सिंघम को भेजा गया एक ईमेल इस कथित साजिश की शुरुआत को दर्शाता है।

ED को मिले इस ईमेल का विषय था ‘Social Media Group in India’। ईमेल में प्रबीर ने नेविल से कहा कि ‘उनके’ मीडिया प्रोजेक्ट में एक समूह केवल डेटा एकत्र करने और उसका विश्लेषण करने वाले टूल्स पर ध्यान केंद्रित करे। इसके अलावा उन्होंने सोशल मीडिया अभियानों के लिए एक अलग समर्पित टीम बनाने का सुझाव दिया।

इन सोशल मीडिया अभियानों के लिए उन्होंने 60,000 से 80,000 अमेरिकी डॉलर का बजट प्रस्तावित किया। इसके कुछ समय बाद, 17 सितंबर 2016 को ईमेल के माध्यम से न्यूजक्लिक का एक लेख साझा किया गया, जिसमें माओवादी शैली में बड़े जनआंदोलन खड़े करने की बात कही गई थी।

रॉय सिंघम और प्रबीर पुरकायस्थ के बीच हुए ईमेल आदान-प्रदान से यह भी सामने आया कि उन्होंने इस बात पर चर्चा की थी कि ‘अलगाववादी’ या पहचान आधारित (Identity) आंदोलनों के साथ प्रभावी ढंग से गठजोड़ कैसे किया जाए।

चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को घरेलू अनियमितताओं और विदेशी हस्तक्षेप से बचाने के लिए SIR की आवश्यकता

अमेरिका, कनाडा और भारत की चुनावी राजनीति तथा चुनावी नतीजों में चीन के कथित हस्तक्षेप या प्रभाव के मामलों से यह स्पष्ट होता है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) अपने भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिद्वंद्वी या विरोधी देशों में उदारवादी (लिबरल) सरकारों को सत्ता में देखना पसंद करती है।

यह भी दिलचस्प है कि भारत, अमेरिका और कनाडा में चीन समर्थक प्रचारक और राजनेता अक्सर उन सरकारों को, जो चीन के हितों के अनुकूल नहीं होतीं, फासीवादी, अधिनायकवादी, प्रतिगामी, असहिष्णु, नस्लवादी, धार्मिक वर्चस्ववादी और न जाने किन-किन विशेषणों से संबोधित करते हैं।

भारत के संदर्भ में, अमेरिका के हालिया आरोप कि चीन ने 20 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का डेटा हासिल कर उसका इस्तेमाल 2020 के चुनावों को प्रभावित करने के लिए किया, और चुनावों को प्रभावित करने की विदेशी संस्थाओं की बढ़ती आशंकाएँ, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision- SIR) की आवश्यकता की ओर संकेत करती हैं।

हाल के वर्षों में भारत निर्वाचन आयोग ने बिहार और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में चुनावों से पहले SIR अभियान चलाया। इस प्रक्रिया के तहत निर्वाचन अधिकारियों ने घर-घर जाकर सत्यापन, मतदाता सूची का मिलान, डुप्लीकेट मतदाताओं, मृत व्यक्तियों, स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं और अवैध मतदाताओं के नाम हटाने का काम किया।

हालाँकि मतदाता सूचियों को साफ और अद्यतन करने के उद्देश्य से चलाए गए इस अभियान के बाद लाखों अवैध या फर्जी मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने पर भारत में राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। विपक्षी दलों ने मुस्लिमों को निशाना बनाकर मताधिकार से वंचित करने का आरोप लगाया, जबकि निर्वाचन आयोग ने मजहबी आधार पर की गई किसी भी कार्रवाई से इनकार किया।

इसी दौरान रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य रूप से बांग्लादेश से आए कई अवैध मुस्लिम प्रवासियों में भी घबराहट देखी गई। अमेरिका के आरोप यह दिखाते हैं कि मतदाता डेटा एक अत्यंत महत्वपूर्ण लक्ष्य होता है और यदि मतदाता सूचियों से छेड़छाड़ हो जाए या वे समझौता का शिकार हो जाएँ, तो फर्जी मतदाताओं की एंट्री संभव हो सकती है।

वहीं मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए चलाए जाने वाले प्रॉक्सी प्रचार अभियान उस सरकार के खिलाफ जनमत को एकजुट करने का काम करते हैं, जिसे कोई विदेशी सरकार या संस्था सत्ता से हटाना चाहती है।

विदेशी नैरेटिव वॉरफेयर और सत्ता बदलने की साजिशों से भारतीय लोकतंत्र और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए SIR एक्सरसाइज, FCRA नियमों को सख्ती से लागू करने और तथाकथित ‘बुद्धिजीवियों’ व ‘एक्टिविस्टों’ की भारत-विरोधी गतिविधियों की गहन जाँच करने की जरूरत है, जो लगातार भारत-विरोधी और चीन-समर्थक प्रोपेगैंडा फैलाते रहते हैं।

चुनावों में विदेशी दखलअंदाजी को रोकने के लिए भले ही SIR कोई रामबाण उपाय ना हो, लेकिन यह चुनावी ढाँचे में मौजूद कमजोरियों को सीधे तौर पर दूर करता है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

मादर***, रं## का बच्चा… क्या इस तरह की गाली देना अपराध है, हो सकती है सजा? जानिए- सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

अगर कोई किसी को गुस्से में ‘मादर***’ या दूसरी कोई गाली दे दे, तो क्या यह अपने आप में अपराध माना जाएगा? क्या ऐसी भाषा को कानून ‘अश्लीलता’ मानता है या यह सिर्फ अभद्र व्यवहार है? इन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस को जन्म दिया है। कोर्ट ने साफ किया है कि हर गाली अपने आप में ‘अश्लील’ नहीं होती, लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि ऐसी भाषा पूरी तरह कानूनी सुरक्षा पा जाती है।

यह पूरा मामला तमिलनाडु के एक गाँव से जुड़ा है, जहाँ जमीन के झगड़े में एक बुजुर्ग शख्स ने सामने वाले को बुरी तरह गालियाँ दे दी थीं। मामला निचली अदालत से होते हुए हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पांचोली की बेंच ने इस पर सुनवाई करते हुए साफ कहा, “कानूनी तौर पर अश्लीलता… वल्गैरिटी, गाली या अभद्रता का पर्यायवाची नहीं है।” कोर्ट के इसी एक वाक्य ने पूरे मामले की दिशा तय कर दी। आइए पूरा मामला सिलसिलेवार समझते हैं।

पूरा मामला क्या था?

बात अगस्त 2017 की है। तमिलनाडु में जमीन के एक विवाद को लेकर मणि नाम के शख्स की पहले शिकायतकर्ता के जीजा से बहस हुई। दो दिन बाद इसी जमीन को लेकर मणि का झगड़ा शिकायतकर्ता के भतीजे से भी हो गया। जब शिकायतकर्ता बीच बचाव करने आया तो मणि ने उसे बुरी तरह गालियाँ दीं और जातिसूचक शब्द भी बोले। इतना ही नहीं गुस्से में मणि घर से एक बिलहुक यानी खेती में इस्तेमाल होने वाला हथियार उठा लाया और शिकायतकर्ता पर हमला कर दिया। इस हमले में शिकायतकर्ता के माथे, नाक और अँगूठे में चोटें आईं। बाद में सीटी स्कैन में पता चला कि उसकी नाक की हड्डी टूट गई है।

निचली अदालत ने मणि को कई धाराओं में दोषी ठहराया। इनमें IPC की धारा 294(B) यानी अश्लीलता, धारा 326 यानी गंभीर चोट पहुँचाना और धारा 506(2) यानी आपराधिक धमकी शामिल थी। इसके अलावा Sc/St एक्ट की धाराएँ भी लगीं। मद्रास हाई कोर्ट ने बाद में Sc/St एक्ट वाले आरोपों से तो बरी कर दिया लेकिन बाकी IPC की धाराओं में सजा बरकरार रखी। इसके बाद मणि सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

मामला में सुप्रीम कोर्ट का रुख

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट के सामने सवाल यह था कि क्या गाली देना अश्लीलता की श्रेणी में आता है। इस पर कोर्ट ने कहा कि सिर्फ गाली या अभद्र शब्दों का इस्तेमाल, चाहे वो कितने भी घटिया या असभ्य क्यों न हों, उन्हें अश्लीलता के बराबर नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने आगे कहा, “सिर्फ गाली या अभद्र शब्द सुनकर घिन, गुस्सा या झटका लग सकता है, लेकिन इतने भर से वो शब्द कानून की नजर में अश्लील नहीं बन जाते।”

अब सवाल यह उठता है कि फिर अश्लीलता किसे माना जाएगा। कोर्ट ने इसका भी जवाब दिया। बेंच ने कहा कि IPC की धारा 294(B) के तहत किसी शब्द को अश्लील मानने के लिए तीन शर्तें पूरी होनी जरूरी हैं। पहली यह कि वो बातें अश्लील होनी चाहिए, जो लोगों की गंदी इच्छाओं को भड़काएँ, दूसरी यह कि जिनका असर सुनने वाले लोगों को बिगाड़ने और तीसरा यह कि उनमें लोगों को भ्रष्ट या बिगाड़ने की प्रवृत्ति हो। साथ ही ये भी साबित करना होगा कि उस बात से पब्लिक प्लेस पर दूसरों को परेशानी या तकलीफ हुई थी।

मणि ने क्या गाली दी?

कोर्ट के फैसले में मणि के कहे शब्द भी दर्ज हैं। कोर्ट ने फैसले में जिक्र किया कि झगड़े के दौरान मणि ने कहा, “अरे मादर***! तू रं## का बच्चा! क्या तू अपने भाँजे का साथ देने आया है? दफा हो जा, तू ‘कुरुथा’ मादर***…”

इस पर कोर्ट ने कहा, “ऐसे शब्द, चाहे कितने भी गाली गलौज वाले, बदस्वादी या असभ्य क्यों न हों, धारा 294 (B) की शर्तें पूरी नहीं करते। साथ ही यह किसी का भी मामला नहीं था कि इन शब्दों से किसी सार्वजनिक जगह पर किसी और को नाराजगी हुई हो, जो कि इस धारा के लिए जरूरी शर्त है।”

इसी आधार पर कोर्ट ने अश्लीलता के आरोप से मणि को बरी कर दिया।

यहाँ तक कि कोर्ट ने मणि पर लगा आपराधिक धमकी का आरोप भी हटा दिया। कोर्ट ने कहा कि झगड़े के दौरान सिर्फ धमकी भरे शब्द बोल देना भर काफी नहीं है। यह साबित करना जरूरी है कि आरोपित की मंशा सामने वाले को डराने की थी या उसे किसी काम को करने या न करने पर मजबूर करने की थी। चूँकि यह साबित नहीं हो पाया, इसलिए यह आरोप भी खारिज हो गया।

लेकिन हमले की सजा बरकरार रही

गाली और धमकी के मामले में राहत मिलने के बावजूद मणि पूरी तरह बरी नहीं हुआ। कोर्ट ने बिलहुक से हमला करके गंभीर चोट पहुँचाने वाली धारा 326 में उसकी सजा बरकरार रखी है। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल सबूत शिकायतकर्ता की बात की पुष्टि करते हैं कि उस पर बिलहुक से हमला हुआ था और उसकी नाक की हड्डी टूटी थी, जो गंभीर चोट की परिभाषा में पूरी तरह फिट बैठता है।

कोर्ट ने कहा, “रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से साफ पता चलता है कि शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूटी थी। ये चोट सीधे तौर पर IPC की धारा 320 के तहत ‘गंभीर चोट’ की श्रेणी में आती है। ये भी साबित हुआ है कि ये चोट बिलहुक से की गई थी, जो एक खतरनाक हथियार है। इसलिए रिकॉर्ड के सबूतों को ध्यान से देखने के बाद हम अपीलकर्ता को IPC की धारा 326 में दोषी ठहराने के फैसले में कोई गलती नहीं पाते और उस सजा को सही मानते हैं।”

निचोड़ क्या निकला?

इस फैसले से एक बात बिल्कुल साफ हो गई कि सड़क पर, झगड़े में या गुस्से में किसी को गाली दे देना भर अश्लीलता के जुर्म में नहीं फँसाया जा सकता। कानून की नजर में अश्लीलता के लिए कामुकता, प्रुरिएंट अपील और लोगों को बिगाड़ने की प्रवृत्ति जैसी शर्तें साबित करनी पड़ती हैं। सिर्फ भद्दी और अभद्र भाषा बोल देने से यह जुर्म नहीं बनता। हाँ, अगर गाली के साथ मारपीट या हमला हो जाए तो उसकी सजा से कोई छूट नहीं मिलती, जैसा मणि के मामले में हुआ।

तेल दो, फौजी लो… सऊदी से समझौता बना गले की फाँस, पाकिस्तान अब कुवैत का बनना चाहता है ‘रक्षक’: खुद अपनी बर्बादी की स्क्रिप्ट तो नहीं लिख रहा ‘आतंकिस्तान’?

पाकिस्तान इस समय आर्थिक संकट से जूझ रहा है। उसे निवेश चाहिए, तेल चाहिए और खाड़ी देशों का भरोसा भी चाहिए। शायद यही वजह है कि वह एक के बाद एक खाड़ी देशों के साथ रक्षा समझौते बढ़ाने में लगा है। पहले सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग किया और अब कुवैत के साथ भी इसी तरह के समझौते पर बातचीत चल रही है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान और कुवैत के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने को लेकर बातचीत चल रही है। यह बातचीत अभी शुरुआती दौर में है और इसकी जानकारी मामले से जुड़े पाँच सूत्रों ने दी है।

लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू भी है। सवाल यह है कि अगर भविष्य में ईरान और खाड़ी देशों के बीच बड़ा संघर्ष छिड़ गया, तो क्या पाकिस्तान खुद को ऐसी स्थिति में पहुँचा देगा, जहाँ किसी भी फैसले की कीमत उसे ही चुकानी पड़े?

कुवैत के साथ पाकिस्तान की नई डील में क्या तय हो रहा है?

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक यह बातचीत अभी शुरुआती दौर में है। कुवैत चाहता है कि पाकिस्तान के साथ समझौता सऊदी अरब जैसा व्यापक हो, जिसमें सैनिकों की तैनाती, लड़ाकू विमान, ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम तक शामिल हों। बदले में पाकिस्तान ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग और निवेश चाहता है। पाकिस्तान अपने तेल और ईंधन भंडार बढ़ाने के लिए कुवैत में फ्यूल स्टोरेज सुविधा बनाने पर भी विचार कर रहा है।

यहाँ एक जरूरी बात समझनी होगी। सूत्रों ने साफ कहा है कि पाकिस्तान फिलहाल कुवैत में लड़ाकू सैनिक टुकड़ियाँ भेजने की स्थिति में नहीं है और अभी इस पर विचार भी नहीं कर रहा। यानी जिस तरह से यह मामला सुनने में लग सगकता है कि पाकिस्तान भाड़े के सैनिक भेजने जा रहा है, हकीकत उतनी सीधी नहीं है। कुवैत की चाहत लंबी लिस्ट जैसी है, लेकिन इस्लामाबाद अभी सतर्क कदम रख रहा है।

मिडिल ईस्ट के एक सूत्र ने यह भी कहा कि अभी यह साफ नहीं है कि यह बातचीत किसी पूर्ण रक्षा समझौते में बदलेगी भी या नहीं। क्योंकि पाकिस्तान और कुवैत के बीच 2023 में पहले से एक रक्षा समझौता होने की कोशिश की गई थी, जिसमें सैन्य अभ्यास और प्रशिक्षण जैसी चीजें शामिल हैं। यह नई बातचीत उसी को आगे बढ़ाने की कोशिश है।

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव इस बातचीत की रफ्तार पर सीधा असर डाल रहा है। एक सूत्र के मुताबिक यह डील और उलझ भी सकती है क्योंकि क्षेत्र में हालात लगाकार बदल रहे हैं।

सऊदी अरब वाला समझौता पहले से पाकिस्तान की गले की फाँस क्यों बना हुआ?

यह समझने के लिए कि पाकिस्तान किस मुश्किल में फँसता जा रहा है, पिछले साल हुए सऊदी अरब समझौते को समझना जरूरी है। पिछले साल 2025 में कतर की राजधानी दोहा में इजरायल के हमास आतंकियों को निशाना बनाकर किए गए हमले के बाद सऊदी अरब और पाकिस्तान ने ‘सामरिक पारस्परिक रक्षा समझौता‘ किया था। इसके तहत दोनों देशों में से किसी एक पर हमले को दोनों पर हमला माना जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे नाटो (NATO) देशों में होता है।

इस समझौते के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब में हजारों सैनिक, JF-17 लड़ाकू विमानों का एक पूरा स्क्वाड्रन और चीन निर्मित एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर दिए। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि यह समझौता सऊदी अरब को पाकिस्तान की ‘परमाणु सुरक्षा छतरी’ के नीचे भी ला सकता है।

अब हालात यह बन गए हैं कि यमन के ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने सोमवार (14 जुलाई 2026) को सऊदी अरब पर हमला किया। इसके जवाब में पाकिस्तान ने साफ कह दिया कि सऊदी अरब पर हमले को वह अपने ऊपर हमला मानेगा। यानी पाकिस्तान अब सिर्फ कागजी वादे से आगे बढ़कर सार्वजनिक रूप से चेतावनी देने की स्थिति में पहुँच चुका है। यही वजह है कि रॉयटर्स ने बताया कि इस्लामाबाद में चिंता बढ़ रही है कि सऊदी अरब से समझौता पाकिस्तान को अमेरिका-ईरान युद्ध में सीधे घसीट सकता है।

ईरान अगर जमीनी हमला करता है तो पाकिस्तान कैसे फँसेगा?

पाकिस्तान की सबसे बड़ी दिक्कत उसकी भौगोलिक स्थिति और पहले से बँटी हुई फौज है। पाकिस्तान की फौज का बड़ा हिस्सा भारत सीमा पर तैनात रहता है। इसके अलावा अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के साथ उत्तर-पश्चिमी सीमा पर पहले से तनाव और सैन्य कार्रवाइयाँ चल रही हैं। ऐसे में अगर ईरान के साथ पश्चिमी सीमा पर भी हालात बिगड़ते हैं, तो पाकिस्तान के लिए तीन मोर्चों पर एक साथ निपटना लगभग नामुमकिन हो जाएगा।

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने खुद संसद में यह कबूल किया कि उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से सीधे बात करके सऊदी अरब वाले रक्षा समझौते का जिक्र किया। डार के मुताबिक ईरान ने जवाब में यह भरोसा माँगा कि सऊदी अरब की जमीन को ईरान के खिलाफ किसी हमले के लिए लॉन्चपैड के तौर पर इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा।

बलूचिस्तान का इलाका ईरान और पाकिस्तान, दोनों तरफ फैला हुआ है और दोनों ही देशों में अलगाववादी गुट सीमा पार से मौका उठाते रहे हैं। अगर ईरान में अंदरूनी अस्थिरता बढ़ती है या सरकार कमजोर पड़ती है, तो पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा खाली जगह बन सकती है, जिसका फायदा अलगाववादी उठा सकते हैं। जनवरी 2024 में भी पाकिस्तान और ईरान के बीच मिसाइल हमलें हुए थे, जिसे दोनों देशों ने महज 72 घंटों में सुलझा लिया था क्योंकि किसी को भी अपने परमाणु और मिसाइल प्रोग्राम पर अंतरराष्ट्रीय नजर नहीं चाहिए थी। लेकिन इस बार हालात कहीं ज्यादा उलझे हुए हैं, क्योंकि अमेरिका-ईरान युद्ध, सऊदी पर हूती हमले और अब कुवैत के साथ नई बातचीत, यह सब एक साथ चल रहा है।

पाकिस्तानी सैन्य विश्लेषकों का भी मानना है कि अभी तक इस्लामाबाद सभी पक्षों को साधने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अगर हूती हमलों का दायरा सऊदी अरब के भीतर और बढ़ता है, तो यह संतुलन बिगड़ सकता है।

निष्कर्ष

फिलहाल की तस्वीर यह है कि पाकिस्तान कुवैत के साथ बातचीत के शुरुआती चरण में है और कुवैत में ‘भाड़े के सैनिक’ भेजने का कोई फैसला अभी नहीं हुआ है। लेकिन सऊदी अरब वाला समझौता पहले से पाकिस्तान को अमेरिका-ईरान युद्ध के करीब खींच चुका है और सैनिकों की तैनाती व सार्वजनिक चेतावनी के जरिए इस्लामाबाद पहले ही आधा कदम आगे बढ़ा चुका है।

अगर ईरान अपनी पश्चिमी सीमा से जमीनी स्तर पर किसी तरह की कार्रवाई की तरफ बढ़ता है तो पाकिस्तान के पास भारत, अफगानिस्तान और अब संभावित रूप से ईरान, तीन मोर्चों पर एक साथ ध्यान देने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। ऐसे में कुवैत के साथ नई डील पाकिस्तान की ताकत बढ़ाने की बजाय उसकी जिम्मेदारियों और जोखिम, दोनों को और बड़ा कर सकती है। यही वजह है कि यह सवाल जायज है कि क्या पाकिस्तान खाड़ी देशों को खुश करने की कोशिश में खुद अपने लिए मुश्किलों की स्क्रिप्ट लिख रहा है?

मानसिक तनाव से लेकर कम नंबर आने तक: आत्महत्या करने वाले उन छात्रों की कहानियाँ, जिनकी तस्वीरें दिखा राहुल गाँधी ने NEET पेपर लीक पर की राजनीति

उत्तराखंड के देहरादून में शुक्रवार (17 जुलाई 2026) को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने पेपर लीक पर भ्रम फैलाकर वोट बैंक को साधने की भरपूर कोशिश की। राहुल गाँधी के ‘छात्रों की गूँज’ को एक संवेदनशील राजनीतिक कार्यक्रम की जगह एक इवेंट की तरह से ऑर्गेनाइज किया गया था। कॉन्ग्रेस की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाइए कि जिस स्थल पर कार्यक्रम से ठीक पहले पार्टी के एक कार्यकर्ता की जान चली गई हो वहाँ पर हो रहे कार्यक्रम में रैपर गा रहे थे और कार्यकर्ता डाँस कर रहे थे।

हम सब यह मानते हैं कि आत्महत्या जैसे संवेदनशील विषय का इस्तेमाल राजनीतिक हितों को साधने के लिए नहीं होना चाहिए। ऐसे में जब छात्रों की आत्महत्याओं को एक चुनावी मुद्दे की तरह उठाया जाता है और उसके बहाने लोगों को बरगलाने की कोशिश की जाती है तो सवाल तो उठते ही हैं।

राहुल गाँधी जब मंच से ‘NEET पेपर लीक सिंड्रोम’ की वजह से छात्रों की आत्महत्या की बात कर रहे थे तो उनकी प्रेजेंटेशन में ऐसे 25 छात्र/छात्राओं का जिक्र था जिन्होंने पिछले कुछ समय में आत्महत्या कर ली थी। राहुल गाँधी ने दावा किया इन छात्रों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया गया। यानी यह संदेश देने की साफ कोशिश की गई कि पेपर लीक के तनाव की वजह से छात्रों ने आत्महत्या की है।

राहुल गाँधी के कार्यक्रम की प्रेजेंटेशन (साभार: YouTube/INC India)

राहुल गाँधी ने जिन छात्रों की तस्वीरें अपनी प्रेजेंटेशन में दिखाई वो NEET के अभ्यर्थी थे इसमें कोई दो मत नहीं है लेकिन क्या उन्होंने केवल NEET पेपर लीक के चलते ही अपनी जान दे दी, जैसे कि राहुल गाँधी और विपक्ष के द्वारा माहौल बनाए जाने की कोशिश हो रही है। ये इन छात्रों में से ही कुछ के उदाहरण द्वारा समझने की कोशिश करते हैं।

राहुल गाँधी की इस प्रेजेंटेशन में तीसरा नाम रितिक मिश्रा का है। लखीमपुर खीरी के 22 साल के NEET अभ्यर्थी रितिक मिश्रा ने 14 मई 2026 को आत्महत्या कर ली थी। राहुल गाँधी ने तब भी इसे हत्या बताया था। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट बताती है कि पुलिस जाँच में सामने आया कि जान देने से पहले छात्र ने 2 मोबाइल नंबरों पर लंबी बात की थी और इसमें परीक्षा के तनाव जैसी कोई बात सामने नहीं आई थी। एसडीएम अश्विनी सिंह और सिटी मजिस्ट्रेट विवेक तिवारी ने लोगों से यह अपील तक कर दी थी कि इसे लेकर भ्रामक खबर ना फैलाई जाए।

आत्महत्या जाहिर तौर पर दुखद है और किसी के चले जाने से बड़ा दुख शायद की कोई दूसरा होता हो लेकिन जब राजनीतिक मंचों पर इस तरह तस्वीरें लगाकर उसका राजनीतिक इस्तेमाल किया जाता है तो फिर यह देखना भी हमारी ही जिम्मेदारी बनती है कि क्या इन आत्महत्याओं की आड़ में कोई अपने लिए राजनीतिक मंच तो नहीं तैयार कर रहा है। इस लिस्ट में रितिक मिश्रा का नाम ऐसा इकलौता नाम नहीं है।

राहुल गाँधी की लिस्ट में कर्नाटक की भाग्यश्री का भी नाम था। NEET परीक्षा देने वाली भाग्यश्री कुछ दिनों बाद ही फंदे से लटकी मिली था। खबर यही चली की NEET पेपर लीक के तनाव के चलते आत्महत्या कर ली है लेकिन यह खबर अधूरी थी। दरअसल, भाग्यश्री ने अपने परिवार से झूठ बोला था कि उसके 12वीं कक्षा में 92% नंबर आए थे।

असल में भाग्यश्री 12वीं क्लास में वो फेल हो गई थी। फिजिक्स में भाग्यश्री को 45 मार्क्स मिले थे जिसमें 30 इंटरनल मार्क्स थे। मैथ्स में उसे कुल 24 मार्क्स मिले थे जिसमें 20 इंटरनल मार्क्स थे। पुलिस को इस मामले में कोई सुसाइड नोट तक नहीं मिला था। अब भाग्यश्री के नाम का इस्तेमाल पेपर लीक से जोड़कर हो रहा है।

राहुल गाँधी के मंच पर एक तस्वीर तमिलनाडु की 19 वर्षीय छात्रा आर रोशनी की थी। रोशनी NEET की तैयारी कर रही थी और री एग्जाम के ठीक पहले उसने आत्महत्या कर ली। New Indian Express की रिपोर्ट में बताया गया है। NEET के दबाव में आत्महत्या किए जाने की खबरों पर पुलिस ने कहा, “हम अभी यह कन्फर्म नहीं कर सकते कि उसकी मौत एग्जाम के प्रेशर की वजह से हुई या नहीं। यह सच है कि उसे धर्मपुरी के एक सेंटर पर NEET की परीक्षा देनी थी। हम जांच कर रहे हैं।”

ऐसी ही कहानी काहन पटेल की भी है। राहुल गाँधी के मंच पर लगी तस्वीरों में एक नाम काहन का भी था। काहन NEET की तैयारी कर रेह थे और इन 17 साल के युवक ने गुजरात के अहमदाबाद में एक रेजिडेंशियल अपार्टमेंट की छठी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। घटनास्थल पर कोई सुसाइड नोट नहीं मिला और आज तक पुलिस नहीं पता कर पाई है कि उसकी मौत क्यों हुई। ऑपइंडिया ने जब साबरमती पुलिस स्टेशन से इस मामले की जानकारी चाही तो पुलिस आज भी जाँच कर रही है कि काहन ने जान क्यों दी।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में 22 साल के छात्र जतिन कुमार ने 18 जून 2026 की रात आत्महत्या कर ली थी। जतिन ने NEET का एग्जाम दिया था और यह उसकी पाँचवी कोशिश थी। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, छात्र के मोबाइल फोन से करीब एक मिनट का एक वीडियो मिला। इस वीडियो में जतिन ने कहा कि वह यह कदम किसी के दबाव में नहीं उठा रहा है बल्कि अपनी मर्जी से ऐसा कर रहा है। वीडियो में जतिन ने यह भी कहा कि उसका सभी चीजों से मोह खत्म हो गया है। जाहिर है कि वो केवल NEET की तैयारी कर रहा था और इसके कारण उसका नाम भी इस राजनीति में घसीट लिया गया।

तमिलनाडु की गोपिका और हैदराबाद की शेख सना की बात करें तो उन्होंने भी पिछले दिनों आत्महत्या कर ली है। दोनों NEET की अभ्यर्थी थीं लेकिन लंबे वक्त से तनाव से गुजर रही थीं और इसी तनाव को वे सहन नहीं कर पाईं। शेख सना को लेकर इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट बताती है, “पुलिस को शक है कि पढ़ाई का दबाव, परिवार की उम्मीदें और पिछली नाकामियों की वजह से हुई बेचैनी उसके तनाव का कारण हो सकती हैं।” वहीं, गोपिका को लेकर एक New Indian Express की रिपोर्ट कहती है, “गोपिका ने पहले अपने पिता को बताया था कि परीक्षा की तैयारी में बढ़ती कठिनाई के कारण वह काफी तनाव में थी।”

तमिलनाडु के कृष्णागिरी में 20 जून 2026 को NEET के री-एग्जाम से एक दिन पहले 20 वर्ष के वेत्रियानंथम ने अपनी जान दे दी। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि वेत्रियानंथम लगातार तीन साल से NEET परीक्षा की तैयारी कर रहा था। पिछली कोशिशों में मिली नाकामियों की वजह से वह भारी दबाव में था और उसे डर था कि आज होने वाली परीक्षा में भी वह फेल हो जाएगा।

उसके पास से पुलिस को एक सुसाइड नोट भी मिला। उसमें लिखा था, “NEET परीक्षा के डर से मैं पिछले एक महीने से ठीक से सो नहीं पाया हूँ। इस डर से कि मैं इस बार भी फेल हो जाऊँगा, मैं यह बड़ा कदम उठा रहा हूँ। अम्मा, अप्पा, अन्ना… मुझे माफ कर देना।”

राहुल की लिस्ट में एक नाम गोवा के छात्र सिद्धार्थ हेगड़े का भी था। 17 साल के सिद्धार्थ ने आत्महत्या कर ली थी और उसके पास से एक सुसाइड नोट भी मिला था। वन इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है, “वह पिछले दो साल से लगातार पढ़ाई और भविष्य को लेकर तनाव में था।”

इस रिपोर्ट में आगे लिखा गया है, “छात्र ने नोट में लिखा कि वह पिछले दो साल से पढ़ाई के दबाव से जूझ रहा था। उसने यह भी बताया कि पढ़ाई और हॉकी के बीच संतुलन बनाना उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था। सिद्धार्थ हॉकी को गंभीरता से खेलता था और साथ ही मेडिकल परीक्षा की तैयारी भी कर रहा था। नोट में उसने कथित तौर पर यह भी लिखा कि अब वह किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में शामिल नहीं होना चाहता।”

राहुल गाँधी की प्रेजेंटेशन में आखिरी नाम दान्विता का था। हरियाणा के फरीदाबाद में 18 साल की NEET कैंडिडेट दान्विता ने गुरुवार (16 जुलाई 2026) को रेजिडेंशियल सोसाइटी की 16वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली है। मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि दान्विता ने NTA द्वारा जारी की गई आंसर-की से अपने संभावित स्कोर का पता लगाया था। पुलिस के मुताबिक, जब दानविता ने आंसर-की से अपने संभावित स्कोर का पता लगाया तो वह परेशान हो गई क्योंकि उसे जो स्कोर मिला वह उसकी उम्मीदों से कम था।

पेपर लीक का समाधान राजनीतिक नहीं हो सकता

जब हम एक समाज के तौर पर, व्यवस्था के तौर पर पिछड़ जाते हैं तो छात्र की आत्महत्या जैसे केस सामने आते हैं। जब कोई युवा अपने सपनों, संघर्षों और उम्मीदों के बीच हार मान लेता है तो यह हम सभी के लिए आत्ममंथन का विषय होता है।

यह भी सच है कि परीक्षाओं में पेपर लीक के मामलों ने लाखों युवाओं के तनाव को बढ़ाया होगा। पेपर लीक जैसी घटनाएँ छात्रों के मानसिक दबाव को बढ़ाती हैं और इस समस्या को हल्के में नहीं लिया जा सकता। लेकिन एक दूसरा पक्ष भी उतना ही गंभीर है। इसे राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल करना किसी भी तरह से उचित नहीं है।

इसका इस्तेमाल केवल सरकार को घेरने या राजनीतिक लाभ लेने के लिए किया जाए तो इससे वास्तविक समस्या का समाधान नहीं निकलता है। इससे समाज में भावनाएँ तो भड़क सकती हैं लेकिन व्यवस्था में सुधार नहीं आ पाता है, जो सबसे अधिक जरूरी है। हो सकता है कि इस मुद्दे के जरिए राहुल गाँधी जनता की भावनाओं को ही भड़काने की कोशिश कर रहे हों।

पेपर लीक कोई नई समस्या नहीं है और न ही यह किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित रही है। विभिन्न राज्यों में अलग-अलग सरकारों के दौरान ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। राजस्थान में अशोक गहलोत के कार्यकाल में कॉन्ग्रेस की सरकार भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक के लिए किस कदर बदनाम थी यह किसी से छिपा नहीं है। अन्य राज्यों में भी चाहे BJP की सरकार हो, कॉन्ग्रेस की हो या अन्य दलों की भी हों, पेपर लीक के मामले सामने आते ही रहे हैं।

पेपर लीक की समस्या का समाधान निकालना ही होगा लेकिन उसका समाधान राजनीति नहीं हो सकता। यह समस्या किसी एक सरकार या किसी एक दल की नहीं है, इसलिए इसका हल भी आरोप-प्रत्यारोप से नहीं निकलेगा। हर बार कोई घटना होने पर सिर्फ राजनीतिक बयान देने से छात्रों का भविष्य सुरक्षित नहीं होगा।

जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल ऐसी व्यवस्था बनाएँ, जहाँ पेपर लीक होना लगभग असंभव हो जाए। दोषियों को सख्त सजा मिले, परीक्षा प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी बने और मेहनत करने वाले छात्रों का भरोसा वापस लौटे। क्योंकि छात्रों का भविष्य किसी भी राजनीति से बड़ा है और इस मुद्दे पर राजनीति नहीं बल्कि स्थायी समाधान सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। ये आरोप लगाकर, छात्रों के नाम पर वोट लेकर तो इन मसलों का स्थाई हल निकले से रहा।

देश के वीर सपूत को श्रद्धांजलि, कठुआ रेलवे स्टेशन का नामकरण बलिदानी कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के नाम पर: जानें नया कोड

जम्मू-कश्मीर के कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम अब आधिकारिक तौर पर बदल दिया गया है। अब इस स्टेशन का नया नाम ‘शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी रेलवे स्टेशन, कठुआ’ होगा।

रेल मंत्रालय ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी है और स्टेशन का नया कोड MSKT तय किया गया है। केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यह फैसला जनता और बलिदानी अफसर के परिवार की लंबे समय से चली आ रही माँग के बाद लिया गया है।

लंबे समय से उठ रही थी नाम बदलने की माँग

स्थानीय लोग और कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के परिजन काफी समय से कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम उनके नाम पर रखने की माँग कर रहे थे। लोगों का कहना था कि जिस तरह उधमपुर रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर बलिदानी कैप्टन तुषार महाजन के नाम पर रखा गया, उसी तरह कठुआ स्टेशन का नाम भी कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के नाम पर होना चाहिए।

उनका मानना था कि जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति को इस वीर सपूत का नाम याद रहना चाहिए। अब सरकार ने इस माँग को स्वीकार करते हुए स्टेशन का नाम बदल दिया है।

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने दी जानकारी

केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने X पर पोस्ट करते हुए बताया कि जनता की माँग पर कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर ‘शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी रेलवे स्टेशन, कठुआ’ कर दिया गया है।

उन्होंने कहा कि कैप्टन सुनील ने देश की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था और उनके सम्मान में यह फैसला लिया गया है। रेल मंत्रालय ने भी इस बदलाव की अधिसूचना जारी कर दी है।

कौन थे कैप्टन सुनील कुमार चौधरी?

कैप्टन सुनील कुमार चौधरी का जन्म 22 जून 1980 को जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले के गोविंदसर गाँव में हुआ था। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल पी एल चौधरी भारतीय सेना में अधिकारी थे, इसलिए बचपन से ही उन्हें अनुशासन और देशसेवा का माहौल मिला।

वे तीन भाइयों में सबसे बड़े थे। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई केंद्रीय विद्यालय से की। इसके बाद पुणे के गरवारे कॉलेज ऑफ कॉमर्स से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और फिर सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय से MBA की पढ़ाई शुरू की।

कैप्टन मनोज पांडेय से मिली सेना में जाने की प्रेरणा

MBA की पढ़ाई के दौरान उनके छोटे भाई अंकुर चौधरी का चयन नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) में हुआ। भाई से मिलने के दौरान सुनील चौधरी ने परमवीर चक्र विजेता कैप्टन मनोज कुमार पांडेय की वीरता की कहानी जानी।

कैप्टन मनोज भी 11 गोरखा राइफल्स से जुड़े थे। उनकी बहादुरी से प्रभावित होकर सुनील ने एमबीए बीच में छोड़ दिया और 1 जुलाई 2003 को इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) में दाखिला ले लिया।

बाद में 10 दिसंबर 2004 को उन्हें 11 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट की 7/11 गोरखा राइफल्स बटालियन में कमीशन मिला। उनकी पहली पोस्टिंग कोलकाता के फोर्ट विलियम में हुई।

असम में आतंकियों के खिलाफ कई बड़े अभियान

फरवरी 2005 में गोरखा राइफल्स में शामिल होने के बाद मई 2006 में उनकी तैनाती असम के तिनसुकिया जिले में ULFA आतंकियों के खिलाफ चल रहे काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन में हुई।

इस दौरान उन्होंने कई सफल अभियानों का नेतृत्व किया और दो ULFA कमांडरों को मार गिराया। उनकी बहादुरी और नेतृत्व क्षमता के लिए उन्हें 26 जनवरी 2008 को सेना मेडल से सम्मानित किया गया।

सम्मान मिलने के 24 घंटे बाद हो गए शहीद

सेना मेडल मिलने के अगले ही दिन यानी 27 जनवरी 2008 को कैप्टन सुनील कुमार चौधरी को रंगागढ़ गाँव में 7 से 9 ULFA आतंकियों के छिपे होने की सूचना मिली।

वह लेफ्टिनेंट वरुण राठौर और जवानों की टीम के साथ तुरंत ऑपरेशन के लिए निकल पड़े। ऑपरेशन के दौरान उन्होंने आतंकियों की घेराबंदी की और खुद आगे बढ़कर मोर्चा संभाला।

मुठभेड़ में उनकी छाती में गोली लगी, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने लगातार लड़ाई जारी रखी और दो आतंकियों को मार गिराया।

इसके बाद जंगल की ओर भाग रहे एक अन्य आतंकी का पीछा कर उसे भी ढेर कर दिया। हालाँकि इस दौरान लगी गंभीर चोटों के कारण उन्होंने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

कीर्ति चक्र और सेना मेडल से किया गया सम्मानित

कैप्टन सुनील कुमार चौधरी की अदम्य वीरता और साहस को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया।

इससे पहले उन्हें सेना मेडल भी मिल चुका था। सेना में करीब तीन साल की सेवा के दौरान उन्होंने अपने साहस, नेतृत्व और देशभक्ति से एक ऐसी मिसाल कायम की, जिसे आज भी याद किया जाता है।

फीफा विश्वकप फाइनल में अर्जेंटीना Vs स्पेन की जंग, जादूगर मेस्सी का हो सकता है आखिरी मुकाबला: पढ़ें फुटबॉल के जादूगरों ने कैसे बिखेरी पूरी दुनिया में मुस्कान

मेरठ कैंट में अपना बचपन बिताने वाले हमारे एक पाठक ने जो दफ्तर में मेरे सीनियर भी हैं, गुरुवार की सुबह अपने बचपन से जुड़ा एक वाकया साझा किया।

उन्होंने पहले तो साथ बैठ विश्व कप के चल रहे मैचों से जुड़ी चर्चाएँ की। रोनाल्डो बनाम मेस्सी की डिबेट भी हुई। फिर आगे बातें की होसे मोरीनियो व पेप गार्दियोला के दिनों होने वाले ‘एल क्लासिको’ के मैचों की। जैसे क्रिकेट प्रधान इस देश में भारत बनाम पाकिस्तान की एक प्रतिद्वंद्विता है, वैसे ही स्पेनिश लीग के दो सबसे बड़े फुटबॉल क्लबों के मध्य भी एक प्रतिद्वंद्विता है जिसे ‘एल क्लासिको’ कहा जाता है। जब भी इन दोनों क्लबों का मैच होता है, सारी ही दुनिया दो धड़ों में बँट जाती है। बार्सिलोना बनाम रियाल मैड्रिड। इस मैच में फुटबॉल नहीं महासंग्राम होता है मैदान पर।

आगे उन्होंने बताया कि उन्हें काका, ज़िदान व माल्दीनी का खेल कितना ज्यादा पसंद था और अब भी वो अक्सर ही यूट्यूब पर जाकर काका, ज़िदान व माल्दीनी की क्लिप्स देख लेते हैं। क्रिस्टियानो रोनाल्डो व लियोनेल मेस्सी के बीच बँटी दुनिया में जब किसी ने काका, ज़िदान व माल्दीनी का नाम लिया तो मन को बेहद सुकून मिला था। क्रिस्टियानो रोनाल्डो व मेस्सी से आगे भी फुटबॉल है। जिसने काका व ज़िदान को मैदान पर जादू बिखेरते नहीं देखा उसने भला क्या देखा। जिसने नेस्ता व माल्दीनी को मैच के अंतिम क्षणों तक जी जान लगा देते नहीं देखा उसने भला क्या देखा।

हम पेले, माराडोना, रॉबर्टो बाज़ियो, योहान क्रुएफ आदि को खेलते तो न देख सके परन्तु हमारी पीढ़ी को कई बेहतरीन फुटबॉलरों को विश्वभर के हरे मैदानों पर जादूगरी करते देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हमारे लिए अटैक का मतलब होता है ब्राजीली रोनाल्डो व एलेसान्द्रो देल पियरो। फिर बातीस्तुता, ड्रोग्बा, हरनन क्रेस्पो व फर्नान्दो तोरेस आदि हुआ करते थे। मिडफील्ड में हमने केविन डि ब्रुएना, टोनी क्रूस व मोद्रिच आदि से सालों पूर्व उनसे बेहतर कारीगरी पेश करते हुए चावी, इनिएस्ता, ज़िदान, काका, रोनाल्डिन्हो, डेविड बैकहम, फ्रैंक लैंपार्ड, जेरार्ड, चेक फैब्रेगास आदि को देखा था। पिछले ही दशक में डेविड सिल्वा व मोद्रिच जैसे बेहतरीन खिलाड़ी भी हुए। रक्षापंक्ति में हमने नेस्ता व माल्दीनी की जोड़ी देखी। फैबियो कैनावारो रहे। मैदान में किसी शेर की भांति खेलते हुए कार्लेस पुयोल को देखा। नेमांजा विदिच़, जॉन टेरी आदि भी शानदार खिलाड़ी रहे।

गोलकीपरों की भी एक पूरी फ़ौज थी। ओलिवर कॉन, गियानलुइगी बुफॉन, जेंस लेहमन, एडविन वेन डर सर, पीटर क्राउच व दीदा आदि के अपनी टीम के हित हेतु सब कुछ झोंकते दृश्यों को कोई कैसे भुला सकता है भला। फुदबैक्स की बात करूँ तो रॉबर्टो कार्लोस, दानी आल्वेस व काफू जैसा खेल खेलते मैंने तो फिर कभी किसी को भी नहीं देखा। अगर आप फुटबॉल की खुबसूरती देखने की मंशा रखते हैं तो आपको दानी आल्वेस व मेस्सी का तालमेल देखना चाहिए।

उन्होंने आगे बताया कि कैसे वह बचपन के दिनों में मेरठ कैंट के लंबे हरे मैदानों में स्कूल से लौटने पर फुटबॉल खेला करते थे। इस देश में जहाँ हम सभी क्रिकेट को जुनून की हद तक चाहते हैं, फुटबॉल उन्हें सुकून दिया करता था। वह लगातार गेंद के पीछे भागते रहा करते। यह करना उन्हें सुख देता था।

मुझे स्वयँ आज भी जनवरी की वो सर्द सुबहें याद हैं, जब माँ के हाथों से बुना स्वैटर पहन कर हम गेंद-मेले जाया करते थे। माँ की बुनी स्वैटर जैसी गर्माहट ये महँगी जैकेटें नहीं दे पाती।

मेरे बचपन का एक वाकया मुझे अब भी अक्सर रह रह के याद आता है। मुझे फुटबॉल का खेल बेहद प्रिय है और क्लब स्तर पर स्पैनिश लीग का इक बड़ा क्लब ‘ F.C. बार्सिलोना’ मेरा सबसे पसंदीदा क्लब है। बार्सिलोना दरअसल यूरोपीय महाद्वीप में बसे एक देश स्पेन के तटीय क्षेत्र में स्थित एक बेहद ही खूबसूरत प्रान्त है। यहाँ विश्वभर से सैलानी साल भर आते हैं सिर्फ इस शहर की खूबसूरती को देखने।

जानते हो, वूडी एलेन जैसे नामी गिरामी फिल्म-रचियता ने तो इस शहर की खूबसूरती को दरसाती ‘विक्की- क्रिस्टीना बार्सिलोना’ नामक एक पूरी फिल्म ही बना डाली थी। यह शहर न सिर्फ अपनी प्राकृतिक खूबसूरती बल्कि कला और अटूट वास्तुकला के लिए भी जाना जाता है। यहाँ का सबसे बड़ा फुटबॉल क्लब है ‘ फुटबॉल क्लब दे बार्सिलोना’।

तब डेको, थुर्रम, पूयोल, ज़ावी, युवा सनसनी मेस्सी, इनिएस्ता, जैम्ब्रोटा, वाल्देस, राफेल मार्खेज़, सैम्युएल इटो और स्वयं फुटबॉल के जादूगर रोनाल्डिन्हो जैसे एक से एक विश्व-स्तरीय खिलाड़ी बार्सिलोना की टीम में खेला करते थे। ऐसे ही तमाम बड़े बड़े सूरमा बार्सिलोना के प्रतिद्वंद्वी रियाल मैड्रिड के लिए भी खेला करते थे।

मुझे बार्सिलोना की फुटबॉल-जर्सी बेहद पसंद थी। हमारे कस्बे के मुख्य बाजार में जो कि हमारे गाँव से यही कोई 10-12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, खेल के सामान की जो सबसे बड़ी ‘स्टार-स्पोर्टस’ नामक दुकान थी, वहाँ वो जर्सी सजी रहती थी। तब इतनी गाड़ियाँ नहीं होती थीं। लोग बाजार बहुत कम ही जाया करते थे। बाजार जाना भी इक उत्साह समान ही हुआ करता था उन दिनों। यदा कदा जब भी बाजार जाना हो पाता, ‘स्टार-स्पोर्टस’ के बाहर सजी वो जर्सी देख मेरी आँखों में एक अजीब सी चमक आ जाती। लेकिन फिर एकाएक मैं अक्सर मायूस हो जाया करता था। मुझे आज भी याद है, उस वक्त, मेरी जेब में वो जर्सी खरीद पाने लायक पैसे नहीं थे।

मेरे गुल्लक में भी मैं कभी इतने पैसे नहीं जोड़ पाता था कि वो जर्सी खरीद पाऊँ। हर बार गेंद मेले से दो महीने पहले यही सोचकर गुल्लक फोड़ता कि मेले पर माँ/ नानाजी से मिलने वाले पैसों और गुल्लक से निकली रकम मिलाकर जमा किए पैसों से भले मेले में जलेबी और समोसे नहीं खाऊँगा, पर इस बार तो अपनी पसंदीदा जर्सी ले ही लूँगा। परन्तु ‘स्टार-स्पोर्टस’ के बाहर सजी वो प्यारी सी जर्सी लेने का मेरा ख्वाब भी हर बार मेरे गुल्लक की तरह ही चकनाचूर हो जाया करता था।

माँ तो माँ ही होती है ना। माँ यह जानती थी। सो इक रोज़ माँ झटपट गयी बाजार और झंडा- चौक से कुछ ही दूरी पर पुरी-भाई की दुकान से कोई दस कदम आगे हनुमान मंदिर से लग कर जो सरदार जी की ऊन की दुकान है, माँ वहाँ से लाल-नीली फैदर वाली ऊन के दो गोले ले आई। माँ रात-दिन बुनाई में लगी रहती और माँ ने गेंद के मेले से पहले मुझे मेरी वो स्वैटर बुनकर भी दे दी। लाल-नीली पट्टियों वाली मेरी वो स्वैटर। मेरी चमचमाती बार्सीलोना वाली स्वैटर।

उस साल मैं मेले में वही स्वैटर पहन कर गया था। लाल-नीली पट्टियों वाली मेरी वो स्वैटर। मेरी चमचमाती बार्सीलोना वाली स्वैटर। पता है, मेरी सब मौसियों, गाँव की औरतों ने मुझे घेर लिया था मेले में। कोई मुझे इधर खींचता तो कोई उधर। सब बुनाई के फंदे गिनने में लगे पढ़े थे। उस स्वैटर में कुछ तो जादू था। उसको पहनते ही मैं सेलिब्रिटी बन गया था। मेरे दोस्त भी बार बार मुझसे एकबार पहनने को वो स्वैटर माँगते फिरते। ना जाने कब और कैसे, उस स्वैटर के आते ही मैं अचानक ही गाँव का हीरो हो गया था।

जब माँ ने वो स्वैटर बुना था, मैं यही कोई 12-13 साल का था। पर मैंने वो स्वैटर कॉलेज तक पहनना नहीं छोड़ा। पता जब मैं कॉलेज जाने लगा, तो माँ ने उसके कॉलरों को बढ़ाकर इक टोपी की शक्ल दे दी थी। अब मेरी बार्सिलोना वाली वो स्वैटर और भी मस्त हो गई थी।

पर मैं अब वो स्वैटर नहीं पहन पाता। अब मैं बड़ा जो हो गया हूँ। वो बेहद छोटी हो गई है मुझपे अब। पर आज भी वो लाल-नीली स्वैटर माँ ने दीवान में संभाल कर रखी है। वक्त के तूफानों के तीखे थपेड़े छू भी न सके माँ की बुनी स्वैटर को। वो आज भी बेहद मुलायम, बिल्कुल नई सी ही लगती है। मानो उसे आजतक किसी ने कभी पहना ही न हो। उसके बाद मैंने लगभग हर फुटबॉल-सीज़न में अपने पसंदीदा क्लब की जर्सी खरीदी, पर जाने क्यों उन सभी जर्सीयों में वो बात नहीं थी जो माँ के हाथों की बनी उस स्वैटर में थी।

खैर, ये सब तो गुजरे सालों की बातें हैं। काफी वक्त बीत गया। अब काम के सिलसिले में मैं मुंबई आ गया हूँ। अब तो फुटबॉल भी कहीं पीछे ही छूट गया है। मैं यहीं एक छोटे से कमरे में रहता हूँ। यहाँ मेरे पहाड़ नहीं हैं। यहाँ बिल्कुल ठंड नहीं पड़ती। यहाँ कोई माँ के हाथों से बुना स्वैटर भी नहीं पहनता।

पर मैं जानबूझ कर कुछ वर्ष पूर्व बार जब घर गया था तो माँ से इक मफलर की जिद कर बैठा था। फिर क्या था; माँ झटपट बाजार गई और झंडा-चौक से कुछ ही दूरी पर, पुरी-भाई की दुकान से कोई दस कदम आगे हनुमान मंदिर से लग कर जो सरदार जी की ऊन की दुकान है, माँ वहाँ से लाल-नीली ऊन के दो गोले ले आई। अब माँ की आँखों में वो चमक, वो तेजी नहीं रही। फिर भी माँ ने झटपट झटपट मात्र चार दिन में ही मेरा मफलर बुन दिया। लाल-नीली पट्टियों वाला मेरा मफलर। मेरा चमचमाता बार्सीलोना वाला मफ़लर।

दूर हजारों किलोमीटर दूर पहाड़ों के उस पार मेरे गाँव में कड़ाके की ठंड पड़ती है। गाँव के सभी बच्चे-बूढ़े अलाव किनारे साथ बैठकर मूँगफली लिए आग तापते हैं। सूरज अक्सर देर से निकलता है। स्कूलों में छुट्टियाँ पड़ जाती हैं। बच्चे गेंद और बसंत-पंचमी के मेलों को लेकर उत्सुक होते हैं। बच्चे जरुर माँ के हाथों के बने स्वैटर पहन मेले जाते हैं। और मैं? मैं यहाँ मुंबई की तपती दुपहरी में गले में अपना लाल-नीला मफलर डाले बैठा अपने हिस्से की सर्दियाँ जी रहा होता हूँ।

ये लाल-नीला मफलर मुझे याद दिलाता है दूर, हजारों किलोमीटर दूर, पहाड़ों के उस पार बसे मेरे गाँव की, गाँव में पड़ती सर्दियों की और सर्दी के अलसाए दिनों में भी झटपट सारा काम निपटा कर चश्मा लगाए एक स्वैटर बुनती मेरी माँ की।

फीफा विश्व कप अब एक सुखांत की ओर बढ़ चला है। सर्वप्रथम आज देर रात भारतीय समयानुसार ढाई बजे तीसरे स्थान के लिए मियामी में फ्रांस बनाम इंग्लैंड का मुकाबला खेला जाएगा। तत्पश्चात रविवार की देर रात भारतीय समयानुसार साढ़े बारह बजे खेला जाएगा, विश्व कप का फाइनल मुकाबला गत विजेता अर्जेंटीना व यूरोपीयन चैंपियन स्पेन के बीच।

अर्जेंटीना आज से ठीक दो दिन बाद स्पेन के खिलाफ न्यूजर्सी स्टेडियम में विश्व कप का फाइनल मुकाबला खेलने उतरेगी। स्पेन यूरोपीयन चैंपियन है तो अर्जेंटीना विश्व विजेता। यहाँ एक अप्रेंटिस का सामना अपने माएस्ट्रो से होगा। वैश्विक फुटबॉल के अगले बड़े स्टार 19 वर्षीय लामीन यमाल का सामना खुद फुटबॉल के भगवान से होगा। स्पेन का काव्यात्मक शैली का खेल अर्जेंटीना के कठोर दक्षिण अमेरिकी फुटबॉल से टकराएगा। स्पेनिश टुकड़ी अर्जेंटीनी बेड़े को रोकने के लिए पूरी जान लगा देगी। जिस बार्सिलोना की जड़ों को कभी लियोनेल मेस्सी ने अपूर्व प्रेम से अपनी मेहनत से सींचा, उसके आठ खिलाड़ी स्पेन का हिस्सा हैं। यह फाइनल कहीं न कहीं ‘ला मासिया’ में पला पोसा है। विश्व विजेता व यूरोपीयन चैंपियन का यह ‘फिनालिस्मा’ एक जबरदस्त टक्कर होगी। यह टकराव ऐतिहासिक होगा।

मुंबई में तो कई कैफे, पबों आदि के साथ ही साथ लगभग दस-पंद्रह सिनेमा हॉल दो-दो/ चार-चार स्क्रीन पर इस मुकाबले का लाइव प्रसारण करने जा रहे हैं। खेलप्रेमियों में इस मैच को लेकर जबरदस्त माहौल बन चुका है।

इस मैच में हारे जीते कोई भी, जीत अंततः फुटबॉल की होगी।

यह मैच फुटबॉल जगत के सबसे ज्यादा जगमगाते सितारे का आखिरी मैच भी हो सकता है। आज से सालों पहले जब इस सितारे ने बार्सिलोना की तीस नंबरी गहरी मरून व नीली धारियों वाली फुल बाजू की जर्सी पहने खेलना शुरू किया था तो पहली दफा यकीन हुआ था कि हाँ, सचमुच में इस दुनिया में जादू होता है।

जब जब भी वह मैदान में उतरता स्टेडियम में मौजूद दर्शक खुशी से झूमने लगते। विपक्षी भी उसे एकटक निहारते रह जाते। वह खुशियों का पर्यायवाची शब्द हो गया था। वह जब भी खेलने मैदान पर उतरता, सब अपने अपने काम छोड़ बस उसे ही खेलते हुए देखते रहते। जाने वो कैसा जादू था उसके खेल में। जब जब गेंद उसके कदमों को चूमती है, तो मानो कुछ जादुई घटित हो रहा होता है। उसे खेलते हुए देख कर हम, कुछ पलों के लिए ही सही, अपने तमाम दुख-दर्द भूल जाते थे।

उसने हमारी हथेलियों पर खुशियाँ रख दी थीं।

उसने हमें सिखलाया – अंतिम क्षणों तक लड़ना।

वो था तो इस खेल में जादू था। वह चला जाएगा तो शायद उसके साथ ही इस खेल का जादू भी चला जाएगा।

हमने इस विश्व कप में क्रिस्टियानो रोनाल्डो (शायद), नेमार, लुका मॉद्रिच, गुइलेर्मो ओचोआ आदि को एक अंतिम दफा खेलते देखा।

हम खेत खलिहानों में बिना फुटबॉल बूट्स और बिना जर्सी पहने बारिशों में फुटबॉल खेलने वाले लड़कों ने वैश्विक मंच पर जिस जमात के खिलाड़ियों को खेलते देख इस खेल से इश्क किया था, उस जमात के अंतिम खिलाड़ी के संभवतः इस आखिरी मुकाबले को हमें तमाम मनमुटाव मिटा कर देखना चाहिए। हमारी खुशियों का सौदागर हमेशा के लिए शहर छोड़ कर जा रहा है। उसके जाने के साथ ही तमाम रोशनियाँ भी धूमिल हो उठेंगी।

हमें इस मैच को रोसारियो के उस नन्हें लड़के के एक अंतिम जश्न के तौर पर देखना चाहिए जो तमाम दुख दर्द के समंदर के मध्य हमारी खुशियों का लाइट हाउस था।

रोसारियो का वह नन्हा लड़का जिसने दुनिया भर के लाखों नन्हें लड़कों की आँखों को जगमगाते ख्वाब दिए थे।

सोनम वांगचुक अस्पताल में भर्ती, CJP ने ‘अपहरण’ और अज्ञात स्थान पर ले जाने का किया दावा, अभिजीत दिपके ने हिरासत को लेकर लगाए आरोप: जानिए अब तक क्या हुआ

दिल्ली पुलिस ने ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को शनिवार (18 जुलाई 2026) की सुबह जंतर-मंतर से हटाकर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल पहुँचाया। यह घटनाक्रम उनके उस ‘अनिश्चितकालीन’ भूख हड़ताल के 20 दिन पूरे होने के बाद सामने आया। इस बीच, अभिजीत दिपके ने पहले तो खुद की पिटाई का आरोप लगाया और फिर खुद भूख हड़ताल पर बैठ गए।

दिल्ली पुलिस की यह कार्रवाई दिल्ली हाई कोर्ट के उस निर्देश के बाद हुई, जिसमें वांगचुक की रोजाना मेडिकल निगरानी करने और जरूरत पड़ने पर आवश्यक चिकित्सीय हस्तक्षेप सुनिश्चित करने को कहा गया था।

DCP (नई दिल्ली) के आधिकारिक एक्स हैंडल पर जारी बयान में कहा गया, “माननीय हाई कोर्ट के आदेशों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह के अनुसार, श्री सोनम वांगचुक की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें आवश्यक चिकित्सीय देखभाल के लिए अस्पताल स्थानांतरित किया गया है।”

बयान में आगे कहा गया, “माननीय हाई कोर्ट के आदेशों का पालन करते समय प्रदर्शनकारियों ने बाधा उत्पन्न करने की कोशिश की, जिसके कारण हल्की अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हुई। हालाँकि पुलिस ने संयम बरता और पूरी कार्रवाई सुरक्षित तरीके से संपन्न कराई। हम जंतर-मंतर पर मौजूद प्रदर्शनकारियों से अनुरोध करते हैं कि वे जल्द से जल्द शांतिपूर्वक वहाँ से हट जाएँ।”

संयोग से भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के वरिष्ठ और सम्मानित अधिकारी अनुराग शर्मा, जो पहले भारत के इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) में भी सेवाएँ दे चुके हैं, उनको शुक्रवार (17 जुलाई 2026) को दिल्ली का नया पुलिस आयुक्त (कमिश्नर) नियुक्त किया गया।

कॉकरोच जनता पार्टी ने सोनम वांगचुक के बारे में गलत जानकारी फैलाई

दिल्ली पुलिस द्वारा सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने के तुरंत बाद, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सदस्यों ने लोगों को भड़काने के उद्देश्य से भ्रामक जानकारी फैलानी शुरू कर दी।

CJP के विवादित प्रवक्ता आशुतोष रांका ने दावा किया कि पुलिस ने सोनम वांगचुक को ‘गिरफ्तार’ कर लिया है।

एक वीडियो में रांका कहते सुनाई दिए, “सोनम वांगचुक को जबरन हिरासत में लेकर गिरफ्तार कर लिया गया है। जंतर-मंतर जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए गए हैं… दिल्ली पुलिस ने अपना असली चेहरा दिखा दिया है। अब चुप रहने का समय नहीं है।”

इसके बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आधिकारिक एक्स हैंडल ने भी दावा किया कि दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक का ‘अपहरण’ कर लिया है।

जनता के बीच व्यापक दहशत फैलाने के कथित उद्देश्य से, CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने आरोप लगाया कि ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस किसी ‘अज्ञात स्थान’ पर ले गई है।

सौरव दास के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

अभिजीत दिपके ने विक्टिम कार्ड खेला

आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व सदस्य और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने भी इस मौके का इस्तेमाल कर झूठा पीड़ित होने का नैरेटिव फैलाने के लिए किया।

सबसे पहले उन्होंने दावा किया कि जंतर-मंतर पर लोगों के साथ मारपीट की जा रही है और सोनम वांगचुक को जबरन वहाँ से ले जाया जा रहा है।

हिरासत में लिए जाने का दावा करने वाले CJP संस्थापक अभिजीत दिपके ने बाद में मीडिया से भी बातचीत की। उन्होंने आरोप लगाया, “सुबह 7 बजे जब मैं फ्रेश होने के लिए बाहर निकला, तभी पुलिस के गुंडे यहाँ आ गए। उन्होंने सोनम सर को गालियाँ देते हुए जबरन वहाँ से घसीटकर ले गए।”

उन्होंने आगे दावा किया, “हमें बिल्कुल नहीं पता कि उन्हें कहाँ ले जाया गया है।” इसके साथ ही अभिजीत दिपके ने बिना किसी पुष्टि वाले अपने इस आरोप को भी दोहराया कि उनके साथ मारपीट की गई थी और उन्होंने दिल्ली पुलिसकर्मियों को ‘RSS के गुंडे’ बताया।

उन्होंने आगे कहा, “जब मुझे इसकी जानकारी मिली और मैं अपने एक दोस्त के घर से जंतर-मंतर जा रहा था, तब पुलिस ने मेरे साथ भी मारपीट की… ये पुलिस अधिकारी नहीं हैं, बल्कि RSS के गुंडे हैं। मैं विदेश से अपने देश वापस आया हूँ, क्या मैं कोई अपराधी हूँ? ये गुंडे हैं, पुलिस नहीं, बल्कि RSS के गुंडे…”

पूरे घटनाक्रम से एक और बात भी स्पष्ट हुई कि अभिजीत दिपके रात के समय सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर पर छोड़कर चले जाते थे। इससे पहले भी सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरों को लेकर उनकी आलोचना हुई थी, जिनमें वह भूख हड़ताल पर बैठे वांगचुक के बगल में बैठकर भोजन करते दिखाई दिए थे। अब यह भी सामने आया है कि दिपके रात में जंतर-मंतर पर रुकते भी नहीं थे।

खुद अभिजीत दिपके के इस बयान कि वह अपने दोस्त के घर पर थे और CJP प्रवक्ता सौरव दास की पोस्ट से यह साफ होता है कि दिपके प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर से दूर किसी अन्य स्थान पर ठहरे हुए थे।

CJP की नई माँग- मोदी इस्तीफा दें

जंतर-मंतर पर शुरू हुआ यह प्रदर्शन शुरुआत में नीट (NEET) पेपर लीक के विरोध में था, लेकिन बाद में इसका स्वरूप बदल गया और इसमें ‘मेरी लिंग, मेरी मर्जी’ जैसे नारे सहित अन्य माँगें भी शामिल हो गईं।

‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक पिछले 20 दिनों से भूख हड़ताल पर हैं और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग कर रहे हैं। लेख के अनुसार, यह माँग अब तक पूरी नहीं हुई है और अब यह मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की माँग तक पहुँच गया है।

लेख के अनुसार, अभिजीत दिपके, जो इन दिनों भोजन करते हुए भी देखे गए थे, अब उन्होंने ‘अनिश्चितकालीन’ भूख हड़ताल पर बैठने की घोषणा की है।

संसद तक मार्च और हिंसा की धमकियाँ

इस बीच, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने घोषणा की है कि वह अपनी पहले से घोषित 20 जुलाई को संसद भवन तक मार्च निकालने की योजना पर कायम रहेगी, जिसके बारे में लेख में दावा किया गया है कि उसके दौरान अव्यवस्था और तनाव की आशंका है।

पार्टी का दावा है कि इस विरोध मार्च में शामिल होने के लिए 1.5 लाख से अधिक छात्र और समर्थक मिस्ड कॉल और ऑनलाइन अभियानों के जरिए पहले ही पंजीकरण करा चुके हैं।

लेख में आगे कहा गया है कि सोनम वांगचुक के अस्पताल में भर्ती होने के बाद CJP के प्रवक्ताओं, समर्थकों और उनके वित्तपोषकों को लोगों को कथित तौर पर भड़काने का नया मुद्दा मिल गया है। लेख के अनुसार, उनकी भाषा शांतिपूर्ण मार्च की अपील से बदलकर सीधे शारीरिक टकराव की बातों तक पहुँच गई है।

‘वंदे मातरम’ का अपमान किया तो होगी 3 साल की जेल… मुस्लिमों के दबाव में नेहरू ने जिस राष्ट्रीय गीत का किया ‘अपमान’, उसे मोदी सरकार ने दिया सम्मान: अब नया बिल बदलेगा इतिहास

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक बहुत बड़ा कदम उठाने जा रही है। सरकार 20 जुलाई, 2026 से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में एक नया और कड़ा कानून पेश करने वाली है। इस कानून का नाम है- ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’। देश की केंद्रीय कैबिनेट ने इस नए बिल को पहले ही मंजूरी दे दी है।

इस नए बिल को लाने का सीधा मकसद यह है कि जो लोग भी हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का अपमान करते हैं, या इसे गाने के दौरान जानबूझकर कोई रुकावट डालते हैं, उन्हें सख्त सजा दी जा सके। ऐसे लोगों को अब सीधे जेल की हवा खानी पड़ेगी।

आसान शब्दों में समझें तो इस कानून के पास होने के बाद ‘वंदे मातरम’ को भी कानूनी तौर पर वही इज्जत और सुरक्षा मिल जाएगी, जो आज हमारे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को मिली हुई है। अब तक राष्ट्रीय गीत का अपमान करने पर इस तरह की सीधे जेल भेजने वाली कड़ी कानूनी कार्रवाई का कोई नियम नहीं था।

लेकिन अब मोदी सरकार इस कमी को पूरी तरह दूर करने जा रही है। खास बात यह है कि सरकार यह ऐतिहासिक कदम ऐसे समय पर उठा रही है, जब पूरा देश इस गौरवशाली गीत की 150वीं सालगिरह (वर्षगाँठ) मना रहा है।

वंदे मातरम का अपमान किया तो क्या होगी सजा?

केंद्र सरकार जो नया कानून ला रही है, वह बहुत कड़ा है। इसके तहत अगर कोई भी व्यक्ति सबके सामने या जानबूझकर हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का अपमान करता है, तो उसे 3 साल तक की जेल हो सकती है। कोर्ट चाहे तो उस पर भारी जुर्माना भी लगा सकता है।

इसके अलावा, अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोषी को जेल और जुर्माना दोनों की सजा एक साथ भी भुगतनी पड़ सकती है। अब सवाल उठता है कि यह कानून किस तरह काम करेगा? इस नए कानून में साफ कहा गया है कि सजा केवल ‘जानबूझकर’ किए गए अपमान या गड़बड़ी पर ही मिलेगी। इसका मतलब है कि अगर किसी व्यक्ति से अनजाने में या गलती से कोई चूक हो जाती है, तो उसे मुजरिम नहीं माना जाएगा।

लेकिन, अगर कोई शख्स बुरी नीयत से ‘वंदे मातरम’ के गायन को बीच में रोकता है, इसे गाने वाली भीड़ या सभा में हंगामा खड़ा करता है, या फिर सबके सामने इसका मजाक उड़ाता है, तो पुलिस उसे बिल्कुल नहीं बख्शेगी। ऐसे लोगों के खिलाफ इस नए कानून के तहत तुरंत और सख्त आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।

पुराना नियम: पहले किन चीजों के अपमान पर होती थी जेल?

हमारे देश में राष्ट्रीय प्रतीकों (देश की पहचान से जुड़ी चीजों) की इज्जत के लिए पहले से एक कानून बना हुआ है। इसे ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971‘ कहते हैं। अब तक इस पुराने कानून के तहत केवल तीन ही चीजों को सुरक्षा मिली हुई थी- हमारा तिरंगा झंडा, देश का संविधान और हमारा राष्ट्रगान ‘जन गण मन’।

पुराने नियम के हिसाब से, सिर्फ इन तीनों का अपमान करना ही कानूनी तौर पर अपराध माना जाता था। उदाहरण के लिए, अगर कोई राष्ट्रगान गाने से रोकता था या तिरंगे को फाड़ता-जलाता था, तो उसे 3 साल तक की जेल या जुर्माना होता था। लेकिन, इस 55 साल पुराने कानून में हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का कहीं कोई जिक्र नहीं था।

अब मोदी सरकार साल 2026 के इस नए बिल के जरिए पुराना नियम बदलने जा रही है। इस नए बदलाव के बाद ‘वंदे मातरम’ को भी उसी लिस्ट में जोड़ दिया जाएगा जिसमें तिरंगा और राष्ट्रगान शामिल हैं। यानी अब राष्ट्रीय गीत का मजाक उड़ाने या इसे रोकने पर भी वही धाराएँ लगेंगी और सीधे 3 साल की जेल होगी।

इस कानून में एक और बहुत जरूरी और कड़ा नियम है। अगर कोई इंसान एक बार राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान का अपमान करने का दोषी पाया जाता है, और जेल से छूटने के बाद वही गलती दोबारा दोहराता है, तो कानून उसे बिल्कुल नहीं बख्शेगा। दूसरी बार पकड़े जाने पर उसे कम से कम 1 साल की जेल अनिवार्य रूप से काटनी ही पड़ेगी।

अचानक नहीं आया बिल, गृह मंत्रालय की थी पूरी तैयारी

वंदे मातरम को लेकर आ रहा यह नया बिल अचानक से नहीं टपक पड़ा है। इसके पीछे देश के केंद्रीय गृह मंत्रालय का एक बड़ा और सोचा-समझा प्लान है। असल में, पिछले कुछ महीनों से सरकार देश के राष्ट्रीय प्रतीकों को और ज्यादा सम्मान देने के लिए लगातार नए नियम बना रही थी। इसी सिलसिले में इस साल फरवरी में गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को एक कड़ा आदेश भेजा था।

इस आदेश में साफ-साफ कहा गया था कि देश में जितने भी आधिकारिक या सरकारी प्रोग्राम होते हैं, जहाँ राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ बजाया या गाया जाता है, वहाँ अब से ‘वंदे मातरम’ को भी बजाना और गाना एकदम जरूरी (अनिवार्य) होगा। कोई भी सरकारी कार्यक्रम अब इसके बिना नहीं होगा।

इसके बाद इसी जुलाई के महीने में गृह मंत्रालय ने नियमों को और ज्यादा साफ करते हुए राज्यों के बड़े अफसरों (मुख्य सचिवों) को एक और चिट्ठी भेजी। इस नए नियम के मुताबिक, अगर किसी भी सरकारी कार्यक्रम में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों होने हैं, तो सबसे पहले ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा और उसके बाद ही ‘जन गण मन’ की बारी आएगी।

इतना ही नहीं, मंत्रालय ने इस बार यह भी बिल्कुल साफ कर दिया है कि वंदे मातरम के केवल शुरुआती हिस्से नहीं, बल्कि उसके सभी 6 अंतरे (पूरा पैराग्राफ) गाए जाने चाहिए। गृह मंत्रालय के इन्हीं सब नियमों को कानूनी तौर पर और ज्यादा मजबूत और पक्का करने के लिए अब सरकार संसद में यह नया बिल पास कराने जा रही है।

सिर्फ एक गीत नहीं, भारत की आत्मा है ‘वंदे मातरम’

‘वंदे मातरम’ केवल कुछ शब्दों को मिलाकर लिखी गई कविता नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की आत्मा, संस्कृति और शान का प्रतीक है। इस शानदार गीत को महान लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने साल 1870 के आस-पास लिखा था। इसके बाद उन्होंने साल 1882 में आए अपने मशहूर उपन्यास ‘आनंदमठ’ में भी इसे जगह दी थी।

अगर इसका बिल्कुल आसान मतलब समझें तो ‘वंदे मातरम’ का अर्थ होता है- “माँ, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ।” इस खूबसूरत गीत में हमारी भारत भूमि (देश) को एक बहुत ही समृद्ध, हरी-भरी और प्यार लुटाने वाली माँ या देवी के रूप में दिखाया गया है, जो अपने बच्चों का पेट पालती है।

जब हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने के लिए लड़ रहा था, तब यह गीत देशभक्तों के दिलों में जोश भरने का सबसे बड़ा जरिया बना था। साल 1905 में जब अंग्रेजों ने चाल चलते हुए बंगाल को दो टुकड़ों में बांट दिया (बंग-भंग), तो उसके खिलाफ देश में एक बड़ा आंदोलन छिड़ गया। उस दौर में ‘वंदे मातरम’ पूरे देश को एकजुट करने वाला सबसे बड़ा नारा बन गया था।

देश को आजाद कराने का जज्बा ऐसा था कि हमारे वीर क्रांतिकारी हँसते-हँसते फाँसी के फँदे पर झूलते समय भी ‘वंदे मातरम’ का नारा बुलंद करते थे। इस गीत के इसी ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए 24 जनवरी 1950 को हमारी संविधान सभा ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने ‘जन गण मन’ को देश का राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ को भारत का ‘राष्ट्रीय गीत’ घोषित किया। तब संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद ने साफ-साफ कहा था कि वंदे मातरम को भी राष्ट्रगान के बराबर ही पूरा सम्मान और दर्जा मिलेगा।

क्या है 2 और 6 अंतरों का चक्कर? मुस्लिमों के दबाव में आकर नेहरू ने देश के गीत को बांटा

इस नए बिल के आने के बाद देश में एक बार फिर पुराना और ऐतिहासिक विवाद गर्मा गया है। पूरा मामला इस गीत के अंतरों (पैराग्राफ) को लेकर है। दरअसल, साल 1937 में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस ने फैसला लिया था। तय हुआ था कि किसी भी सरकारी या सार्वजनिक प्रोग्राम में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाएँगे

उस दौर में मुस्लिम समुदाय के कुछ नेताओं और संगठनों ने इसके बाद वाले अंतरों पर ऐतराज जताया था। उनका कहना था कि बाद के हिस्सों में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र आता है, जिससे उनकी मजहबी भावनाओं को ठेस पहुँचती है। बस, तभी से यह गीत आधा गाने की परंपरा चल पड़ी थी, जिसे अब मोदी सरकार बदलने जा रही है।

अब सरकार ने जब से पूरा गीत (सभी 6 अंतरे) गाने का नियम बनाया है, तब से बीजेपी और विपक्ष की पार्टियों के बीच बहस-बाजी चल रही है। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने सीधा आरोप लगाया है कि कॉन्ग्रेस और उससे जुड़े लोग हमेशा से ही वंदे मातरम से नफरत करते रहे हैं। उनका कहना है कि नेहरू जी ने मुस्लिम लीग को खुश करने के लिए (तुष्टिकरण के दबाव में) हमारे इतने बड़े राष्ट्रीय गीत को दो हिस्सों में काट दिया था।

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस को घेरा था। PM मोदी ने कहा था कि अपनी वोट बैंक की राजनीति के लिए कॉन्ग्रेस ने वंदे मातरम के गौरव को कम किया। गीत के अंतरों को हटाना देश को बांटने वाली सोच को बढ़ावा देने जैसा था।

वंदे मातरम ही नहीं, मानसून सत्र में आ रहे हैं ये बड़े बिल

20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के इस मानसून सत्र में सरकार सिर्फ वंदे मातरम से जुड़ा बिल ही नहीं ला रही है। लोकसभा सचिवालय की लिस्ट के मुताबिक, इस बार मोदी सरकार कई और बड़े और जरूरी कानून बनाने की तैयारी में है, जो सीधे तौर पर आम जनता और देश की व्यवस्था से जुड़े हैं। आइए जानते हैं कि इस बार संसद की टेबल पर कौन-कौन से बड़े बिल आने वाले हैं।

जन्म-मृत्यु का रजिस्ट्रेशन: सरकार ‘जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026’ लाने जा रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब जन्म या मौत का सर्टिफिकेट (प्रमाण पत्र) बनवाना पहले से ज्यादा कड़ा हो जाएगा। अगर कोई व्यक्ति बच्चे के जन्म या परिवार में किसी की मृत्यु के 2 साल बाद तक उसका रजिस्ट्रेशन नहीं कराता है, तो उसका सर्टिफिकेट अब आसानी से नहीं बनेगा। इसके लिए अब सीधे प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (जज) से ऑर्डर लेना जरूरी हो जाएगा। सरकार का मानना है कि इस कड़े नियम से देश में फर्जी कागज (दस्तावेज) बनाने के खेल पर पूरी तरह से ताला लग जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट में बढ़ेंगे जज: अदालतों में सालों-साल लंबित रहने वाले मुकदमों की समस्या को दूर करने के लिए सरकार ‘सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक’ ला रही है। इस नए कानून के पास होने के बाद देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी जाएगी। जजों की संख्या बढ़ने से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि कोर्ट में सालों से लटके पड़े मुकदमों की सुनवाई बहुत तेजी से हो सकेगी और लोगों को समय पर इंसाफ मिल पाएगा।

विदेशी चंदे (NGO) पर कसेगा शिकंजा: सरकार एक और बड़ा बिल ला रही है, जिसका नाम ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ (FCRA) है। यह बिल पहले पास नहीं हो पाया था, लेकिन इस बार सरकार इसे हर हाल में पास कराना चाहती है। इसके जरिए देश में काम करने वाले एनजीओ (NGO) को विदेशों से मिलने वाले चंदे (फंड) पर कड़ी नजर रखी जाएगी, ताकि कोई भी पैसे का गलत इस्तेमाल देश के खिलाफ न कर सके।

इसके साथ ही, आम जनता और नौकरीपेशा लोगों के लिए राहत की बात यह है कि सरकार ‘आयकर (संशोधन) विधेयक, 2026’ भी ला रही है। इसका मकसद इनकम टैक्स से जुड़े पेचीदा नियमों को बिल्कुल आसान और साफ-सुथरा बनाना है, ताकि लोगों को टैक्स भरने में कोई परेशानी न हो।

राष्ट्र के सम्मान के लिए जरूरी है यह कदम

इस पूरे मामले पर केंद्र सरकार का स्टैंड बिल्कुल साफ है। सरकार का कहना है कि इस नए बिल का सिर्फ एक ही मकसद है- हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को वह कानूनी सुरक्षा और हक दिलाना, जिसका वह हकदार है। सरकार का तर्क है कि जिस गीत ने हमें आजादी की लड़ाई में एकजुट किया, उसे भी तिरंगे और राष्ट्रगान की तरह ही पूरा कानूनी कवच मिलना चाहिए। सरकार के मुताबिक, उनका इरादा किसी पुराने विवाद को दोबारा खड़ा करना बिल्कुल नहीं है, बल्कि देश के गौरव और सम्मान को सबसे ऊपर रखना है।