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गुरु पूर्णिमा: क्यों मनाया जाता है यह पावन पर्व? जानिए गुरु-शिष्य परंपरा, महर्षि वेदव्यास के अमूल्य योगदान और सनातन संस्कृति में गुरु का सर्वोच्च महत्व

भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में गुरु का स्थान ईश्वर से भी सर्वोपरि माना गया है। प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को पूरे भारत और विश्व भर में फैले सनातन धर्मावलंबियों द्वारा ‘गुरु पूर्णिमा’ का पर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पावन तिथि को ‘व्यास पूर्णिमा’ के नाम से भी जाना जाता है।

हमारे देश में ज्ञान अर्जन और आध्यात्मिक उन्नति को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है और इस लक्ष्य की प्राप्ति केवल एक समर्थ गुरु के मार्गदर्शन से ही संभव है। ‘गुरु’ शब्द दो अक्षरों के मेल से बना है- ‘गु’ का अर्थ है अंधकार या अज्ञान, और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश या ज्ञान।

अर्थात जो जीव को अज्ञान रूपी अंधकार से निकालकर ज्ञान रूपी दिव्य प्रकाश की ओर ले जाए, वही सच्चा गुरु है। गुरु पूर्णिमा का यह पावन अवसर केवल एक त्यौहार या कर्मकांड मात्र नहीं है, बल्कि यह उस महान गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक वार्षिक उत्सव है, जिसने युगों-युगों से भारत की ज्ञान सम्पदा को अक्षुण्ण रखा है।

वर्षा ऋतु के इस सुहावने मौसम में जब आकाश बादलों से आच्छादित होता है और आषाढ़ की पूर्णिमा का चंद्रमा अपनी पूरी कांति के साथ चमकता है, तब शिष्य अपने गुरुदेव के चरणों में शीश नवाकर उनके द्वारा दिखाए गए ज्ञान के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।

महर्षि वेदव्यास का प्राकट्य और वेद विभाजन का महान ऐतिहासिक कार्य

गुरु पूर्णिमा के पर्व का सीधा संबंध महर्षि वेदव्यास के जन्म से है। पौराणिक मान्यता और शास्त्रों के अनुसार, आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को ही महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास का जन्म हुआ था। वे महर्षि पराशर और माता सत्यवती के पुत्र थे। यमुना नदी के एक द्वीप पर जन्म लेने और साँवले वर्ण का होने के कारण उन्हें प्रारंभ में ‘कृष्णद्वैपायन’ कहा गया।

आगे चलकर उन्होंने बदरिकाश्रम में कठिन तपस्या की, जिसके कारण उन्हें ‘बादरायण’ भी कहा जाता है। द्वापर युग के अंत में जब ज्ञान की शाखाएँ लुप्त हो रही थीं और आम मानव की स्मरण शक्ति तथा बुद्धि कमजोर हो रही थी, तब महर्षि व्यास ने ज्ञान के अथााह सागर को संरक्षित करने का युगांतरकारी बीड़ा उठाया।

उन्होंने अनादि काल से मौखिक रूप से चले आ रहे एक ही विशाल वेद ज्ञान को समेटकर उसे चार भागों में वर्गीकृत किया। इस महान कार्य के कारण ही उन्हें ‘वेदव्यास’ की उपाधि से विभूषित किया गया। वेदव्यास जी ने मंत्रों की प्रकृति, यज्ञीय उपयोगिता और स्वर-विधान के आधार पर वेद साहित्य को ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विभाजित किया।

उन्होंने ऋग्वेद का ज्ञान अपने शिष्य पैल को, यजुर्वेद का ज्ञान वैशंपायन को, सामवेद का ज्ञान जैमिनी को और अथर्ववेद का ज्ञान सुमंतु को सौंपा। इसके साथ ही उन्होंने पौराणिक कथाओं और इतिहास के संरक्षण का दायित्व अपने शिष्य रोमहर्षण सूत जी को प्रदान किया।

इस प्रकार वेदव्यास जी ने मौखिक परंपरा को एक सुव्यवस्थित ढाँचा दिया, जिससे भावी पीढ़ियाँ ज्ञान के इस विशाल भंडार को सुगमता से समझ और सुरक्षित रख सकें।

ज्ञान के इस महान संरक्षण कार्य के कारण ही महर्षि वेदव्यास को जगत का प्रथम और सार्वभौमिक गुरु माना गया है। यही कारण है कि उनकी जन्म तिथि आषाढ़ पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा अथवा गुरु पूर्णिमा के रूप में समूचे भारतवर्ष में मनाया जाता है।

सनातन संस्कृति, उपनिषद और महाग्रंथों में गुरु तत्व का दर्शन

सनातन ग्रंथों में गुरु केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक चेतना, एक तत्व और आध्यात्मिक प्रकाश का प्रतीक है। उपनिषदों, पुराणों और स्मृतियों में गुरु तत्व की व्याख्या अत्यंत गूढ़ और व्यापक रूप से की गई है। तैत्तिरीयोपनिषद में स्पष्ट निर्देश दिया गया है- ‘आचार्यदेवो भव’, अर्थात आचार्य या गुरु को देवतुल्य मानकर उनका आदर करना चाहिए।

श्वेताश्वतरोपनिषद में यह कहा गया है कि जिस साधक की ईश्वर में पराभक्ति होती है और जैसी भक्ति ईश्वर में होती है, वैसी ही भक्ति यदि गुरु में हो, तो उस महात्मा के द्वारा बताए गए उपनिषदों के सारे गूढ़ अर्थ स्वयं प्रकाशित होने लगते हैं। स्कंद पुराण के अंतर्गत आने वाले गुरु गीता ग्रंथ में गुरु की महिमा का विशद वर्णन करते हुए कहा गया है कि गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही साक्षात महेश्वर शिव हैं। गुरु ही परब्रह्म स्वरूप हैं, इसलिए ऐसे श्री गुरुदेव को बारंबार प्रणाम है।

श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण स्वयं अर्जुन को ज्ञान प्राप्ति का रहस्य समझाते हुए कहते हैं कि उस परम ज्ञान को प्राप्त करने के लिए तत्वदर्शी ज्ञानियों और गुरुओं के पास जाना चाहिए। नम्रतापूर्वक प्रणाम करके, निष्कपट भाव से प्रश्न पूछकर और उनकी सेवा करके ज्ञान की प्राप्ति होती है, क्योंकि वे तत्वदर्शी गुरु ही ज्ञान का उपदेश दे सकते हैं।

इसी प्रकार रामचरितमानस में संत तुलसीदास जी बालकांड के प्रारंभ में ही गुरु वंदना करते हुए लिखते हैं कि गुरु के चरण कमलों की धूल अमिय मूरिमय चूरन चारू है, जो संपूर्ण भवरोगों के परिवार को शांत करने वाली है।

सनातन दर्शन में यह माना गया है कि व्यक्ति स्वयं अपने बल पर अविद्या और माया के जाल से बाहर नहीं निकल सकता। जैसे किसी घने अंधकारमय जंगल में मार्ग तलाशने के लिए एक पथप्रदर्शक की आवश्यकता होती है, ठीक उसी तरह संसार रूपी भवसागर को पार करने के लिए गुरु रूपी नाविक की अत्यंत आवश्यकता होती है।

व्यास पूर्णिमा का पौराणिक इतिहास और ग्रंथों की रचना यात्रा

महर्षि वेदव्यास का भारतीय साहित्य और दर्शन में योगदान केवल वेदों के विभाजन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने महर्षि पराशर से प्राप्त ज्ञान और स्वयं की प्रचंड तपस्या के बल पर मानव समाज के सर्वांगीण विकास के लिए अनेकों अमर ग्रंथों का सृजन किया।

जब उन्होंने देखा कि वेदों की भाषा अत्यंत गूढ़, संस्कृतनिष्ठ और सर्वसाधारण के लिए समझने में कठिन है, तब उन्होंने सामान्य जनमानस तक नैतिक मूल्य, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सिद्धांतों को पहुँचाने के लिए अठारह पुराणों की रचना की।

भागवत पुराण, विष्णु पुराण, शिव पुराण, अग्नि पुराण जैसे महान ग्रंथ व्यास जी की ही अनुपम देन हैं, जिनमें रूपकों, आख्यानों और कथाओं के माध्यम से परम तत्व का ज्ञान बहुत ही सरल रूप में प्रस्तुत किया गया है। वेदव्यास जी का सबसे महान ऐतिहासिक और दार्शनिक अवदान महाभारत महाकाव्य है।

एक लाख श्लोकों से युक्त इस विशाल ग्रंथ को पंचम वेद भी कहा जाता है। महाभारत केवल एक युद्ध की गाथा नहीं है, बल्कि यह मानव समाज, राजनीति, मनोविज्ञान, धर्म और दर्शन का एक जीवित कोष है। कथा के अनुसार, जब व्यास जी ने संपूर्ण महाभारत का ढाँचा अपने मन में रच लिया, तो उन्होंने इसके लेखन के लिए भगवान श्री गणेश से प्रार्थना की।

श्री गणेश जी ने शर्त रखी कि व्यास जी बिना रुके कथा सुनाएँगे और व्यास जी ने शर्त रखी कि गणेश जी हर श्लोक को समझकर ही लिखेंगे। इस प्रकार दो महाचेतनाओं के मिलन से इस अमर ग्रंथ की रचना हुई। इसी महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता जैसा अनुपम दर्शन रत्न अंतर्निहित है, जो आज भी संपूर्ण विश्व को निष्काम कर्मयोग का संदेश दे रहा है।

इसके अतिरिक्त व्यास जी ने वेदांत दर्शन के आधारस्तंभ ‘ब्रह्मसूत्र’ की रचना की, जिसमें 555 सूत्रों के माध्यम से उपनिषदों के दर्शन को एक सूत्र में पिरोया गया है। ज्ञान के इस विशाल वटवृक्ष को रोपने वाले महर्षि व्यास के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ही इस तिथि को व्यास पूर्णिमा नाम से पूजा जाता है।

बौद्ध, जैन और योग परंपरा में आषाढ़ पूर्णिमा का पावन संदर्भ

गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व केवल वैदिक या हिंदू परंपरा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत की अन्य प्रमुख आध्यात्मिक धाराओं जैसे बौद्ध, जैन और योग परंपरा में भी इसका बहुत बड़ा ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। बौद्ध धर्म के इतिहास में आषाढ़ पूर्णिमा की तिथि एक मील का पत्थर मानी जाती है।

बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे महाबोधि ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात, भगवान बुद्ध ने वाराणसी के निकट सारनाथ में इसी आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने प्रथम पाँच शिष्यों (पंचवर्गीय भिक्षुओं) को पहला उपदेश दिया था। इस ऐतिहासिक घटना को बौद्ध साहित्य में ‘धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त’ यानी ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ कहा जाता है।

इसी दिन प्रथम संघ की स्थापना हुई थी और भगवान बुद्ध ने एक गुरु के रूप में अपने ज्ञान की रश्मियों को संसार में बाँटना प्रारंभ किया था। इसलिए बौद्ध समुदाय इस दिन को धर्मचक्र दिवस और गुरु पूर्णिमा के रूप में अत्यंत श्रद्धा से मनाता है। इसी प्रकार जैन धर्म की परंपरा में भी इस तिथि का विशेष पौराणिक महत्व है।

जैन मान्यताओं के अनुसार, 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने केवलज्ञान प्राप्त करने के पश्चात आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही इंद्रभूति गौतम (गौतम स्वामी) को अपना प्रथम शिष्य स्वीकार किया था। इसके साथ ही भगवान महावीर ने अपने प्रथम गणधर की स्थापना की और गुरु-शिष्य परंपरा का सूत्रपात किया।

इसके अलावा योग परंपरा और हठयोग के इतिहास में आषाढ़ पूर्णिमा को अत्यंत अनोखा स्थान प्राप्त है। योगिक संस्कृति के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ‘आदिगुरु’ के रूप में प्रकट हुए थे। कांतिसरोवर के तट पर उन्होंने अपने हजारों वर्षों के मौन को तोड़ा था और योग का संपूर्ण विज्ञान अपने प्रथम सात शिष्यों (‘सप्तऋषि’) कहते हैं, को प्रदान किया था।

इस प्रकार योग परंपरा में भी आषाढ़ पूर्णिमा को ही इस धरती पर प्रथम गुरु के आगमन और योग ज्ञान के प्रथम वितरण का पर्व माना जाता है।

चातुर्मास का शुभारंभ और गुरु-शिष्य संबंध का आध्यात्मिक मर्म

आषाढ़ पूर्णिमा का दिन भारतीय ऋतुचक्र और आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण मोड़ पर आता है। इसी तिथि से ‘चातुर्मास’ यानी चार महीनों के विशेष संयम और साधना काल का शुभारंभ होता है। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन- ये चार महीने वर्षा ऋतु के महीने होते हैं।

प्राचीन काल में नदियाँ उफान पर होती थीं, रास्ते दुर्गम हो जाते थे और छोटे-छोटे कीट-पतंगों की उत्पत्ति के कारण भ्रमण करना कठिन होता था। इसलिए जैन, बौद्ध और सनातन परंपरा के साधु-संत, संन्यासी तथा परिव्राजक इस तिथि से एक ही स्थान पर रुककर चार महीनों के लिए प्रवास करते थे।

इस दौरान वे घूमना-फिरना बंद करके एक जगह रहकर केवल स्वाध्याय, ध्यान, तपस्या और अपने शिष्यों को ज्ञान दान देने का कार्य करते थे। साधक भी इस अवधि में गुरु के सानिध्य में रहकर अपनी आंतरिक चेतना को जागृत करते थे। गुरु-शिष्य का संबंध संसार के अन्य सभी लौकिक संबंधों से सर्वथा भिन्न और अलौकिक होता है।

यह संबंध किसी रक्त-संबंध, स्वार्थ या सांसारिक लेनदेन पर आधारित नहीं होता, बल्कि यह आत्मिक रूपांतरण का संबंध है। सनातन दर्शन में कहा गया है कि शिष्य एक कच्चे घड़े के समान होता है और गुरु उस कुम्हार की तरह होता है जो बाहर से सहारा देकर भीतर से उसे सुंदर रूप प्रदान करता है।

गुरु शिष्य की कमियों, अहंकार और अज्ञान को अपनी ज्ञान रूपी छैनी से काटकर उसमें से दिव्य स्वरूप को निखारते हैं। पूर्णिमा का चंद्रमा जिस प्रकार पूर्णता और कांति का प्रतीक है, उसी प्रकार गुरु पूर्णिमा यह संदेश देती है कि गुरु का सानिध्य प्राप्त करके शिष्य का मन भी अज्ञान के बादलों से मुक्त होकर ज्ञान के पूर्ण चंद्रमा की तरह चमक सकता है।

आधुनिक युग में गुरु पूर्णिमा की प्रासंगिकता

आज के आधुनिक और डिजिटल युग में गुरु पूर्णिमा का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। विज्ञान और तकनीक के इस दौर में इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से सूचनाओं का असीमित भंडार हमारी पहुँच में है, लेकिन केवल जानकारी प्राप्त कर लेना ही वास्तविक ज्ञान नहीं होता।

ज्ञान वह प्रकाश है, जो व्यक्ति को सही निर्णय लेने, जीवन के उद्देश्य को समझने और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है और यह प्रकाश केवल एक योग्य गुरु ही प्रदान कर सकता है। आज का मनुष्य भौतिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद मानसिक तनाव, अकेलेपन, दिशाहीनता और मूल्यों के संकट से जूझ रहा है।

ऐसे समय में गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन का सच्चा मार्गदर्शक बनकर सामने आता है। वह अपने अनुभव, आदर्शों और संस्कारों के माध्यम से शिष्य को धैर्य, संयम, विवेक और सही-गलत में अंतर करने की क्षमता प्रदान करता है। गुरु ही व्यक्ति के भीतर छिपी संभावनाओं को जागृत कर उसे आत्मविकास की दिशा में अग्रसर करता है।

गुरु पूर्णिमा हमें यह संदेश देती है कि चाहे हम विज्ञान, तकनीक और भौतिक उन्नति की कितनी भी ऊँचाइयों तक क्यों न पहुँच जाएँ, अपने गुरु, शिक्षकों और जीवन में सही दिशा दिखाने वाले प्रत्येक मार्गदर्शक के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता का भाव कभी कम नहीं होना चाहिए।

यही विनम्रता और कृतज्ञता मनुष्य के चरित्र को महान बनाती है और समाज में ज्ञान, नैतिकता, सद्भाव और शांति की मजबूत नींव स्थापित करती है।

न सबूत, न तर्क… सिर्फ मनगढ़ंत कहानियाँ: जानिए कैसे न्यूजलॉन्ड्री ने एक ‘ट्रक’ को दिखाकर दिल्ली पुलिस को किया बदनाम, उपद्रवियों को लेकर नहीं पूछे सवाल

सच्ची खोजी पत्रकारिता की पहचान यह होती है कि वह लोगों के सामने छिपे हुए तथ्य लेकर आती है। इसके विपरीत, किसी खास एजेंडे के तहत की जाने वाली पत्रकारिता की पहचान यह है कि वह पहले से ही एक नतीजा तय कर लेती है और फिर अपनी बात को सही साबित करने के लिए सामान्य घटनाओं और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करती है।

न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट-‘CJP के प्रदर्शन के पास पत्थरों से भरा ट्रक कहाँ से आया? हमने पता लगाया’ इसी तरह के एजेंडा को सिद्ध करने वाली पत्रकारिता का एक सटीक उदाहरण है।

साभार: न्यूजलॉन्ड्री

न्यूजलॉन्ड्री ने अपनी इस रिपोर्ट में शब्दों का ऐसा हेर-फेर किया, जिससे पाठकों को ये लगे कि दिल्ली पुलिस ने जानबूझकर पत्थरों से भरा डंपर ट्रक संसद मार्ग थाने के पास खड़ा किया था।

रिपोर्ट बिना कोई सबूत पेश किए, यह दिखाने की कोशिश करती है कि पुलिस का मकसद 20 जुलाई को होने वाले CJP के प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाना था या फिर उन्हें झूठे मामलों में फँसाना था।

दिलचस्प बात यह है कि न्यूजलॉन्ड्री ने अपनी रिपोर्ट में साजिश को साबित करने के लिए जो बिंदु दिए हैं वही उनकी पूर कहानी को खारिज करते हैं।

सामान्य पुलिस कार्रवाई को न्यूजलॉन्ड्री ने दिखाया सनसनीखेज

न्यूजलॉन्ड्री की अपनी ही रिपोर्ट के मुताबिक, 16 जुलाई की सुबह करीब 4:15 बजे फिरोजशाह रोड और कस्तूरबा गाँधी मार्ग के चौराहे पर इस डंपर ट्रक ने एक मारुति ईको गाड़ी को टक्कर मार दी थी। इस हादसे में ईको सवार सात लोग घायल हुए थे और केस भी दर्ज हुआ था। हादसे के बाद क्षतिग्रस्त ईको और टक्कर मारने वाले डंपर ट्रक-दोनों को जब्त करके संसद मार्ग थाने लाया गया था।

अब यहाँ ये समझने की जरूरत है कि सड़क हादसों से जुड़े किसी भी आपराधिक मामले में पुलिस की कार्रवाई ठीक इसी तरह होती है।

जिन गाड़ियों से एक्सीडेंट होता है और लोग घायल होते हैं, उन्हें पुलिस सबूत के तौर पर ज़ब्त करती है। और, जब तक कानूनी औपचारिकताएँ, गाड़ियों की जाँच, बीमा की कागजी कार्रवाई और कोर्ट की प्रक्रियाएँ पूरी नहीं हो जातीं, तब तक वे गाड़ियाँ पुलिस की हिरासत में ही रहती हैं।

ऐसे में जब न्यूजलॉन्ड्री जैसे संस्थान बार-बार ट्रक को हाईलाइट करते हैं कि चार दिन बाद भी डंपर संसद मार्ग के पास क्यों खड़ा था और मारुति ईको कहाँ थी?

तो, क्या साफ तौर पर वह सवाल नहीं उठा रहे कि दिल्ली पुलिस ने ही प्रदर्शनकारियों को पत्थर फेंकने पर मजबूर किया…?

गाड़ियों की दुर्दशा बयां करती हैं असली कहानी

हकीकत यह है कि 16 जुलाई को जो टक्कर हुई थी ऐसी भयावह घटना थी कि उसमें गाड़ी का पिछला हिस्सा पूरी तरह चकनाचूर हो गया था। दोनों गाड़ियाँ इस मामले में अहम सबूत थीं। उन्हें पुलिस हिरासत में रखना कोई अनोखी बात नहीं थी बल्कि यह कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा थी। अगर दिल्ली पुलिस इनमें से किसी भी गाड़ी को छोड़ देती तो उलटा उनकी जाँच करने के ढंग पर ही सवाल खड़े होते।

बावजूद इस तथ्य के न्यूजलॉन्ड्री ने अपनी रिपोर्ट में बार-बार ‘पत्थरों से भरा ट्रक’ शब्द इस्तेमाल किया ताकि लोगों के मन में छवि बने कि दंगे जैसी स्थिति पैदा करने में पुलिस का हाथ था।

ट्रक में पत्थर नहीं है असली सच्चाई

खोजी पत्रकारिता की आड़ में की गई ये रिपोर्ट खुद बताती है कि एक्सीडेंट के वक्त डंपर ट्रक ‘निर्माण सामग्री’ लेकर जा रहा था और एक्सीडेंट के कारण उसे जब्त करके वहाँ खड़ा किया गया।

खुद ट्रक के पुराने मालिक और हादसे में घायल पीड़ितों ने इस बात की पुष्टि की है कि एक्सीडेंट के समय डंपर में क्या था।

इसके अलावा ये बताने की जरूरत नहीं है कि निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाले डंपर का काम ईंट-बजरी और पत्थर ले जाना होता है। ऐसे में अगर जब्त किए गए ट्रक में पत्थर मिला तो यह कोई हैरान करने वाली घटना नही है।

न्यूजलॉन्ड्री ने बस इसे सनसनीखेज बनाकर ऐसे पेश किया है कि लोगों के मन में संदेह खड़ा हो और वो पुलिस की भूमिका पर शक करने लगें।

पुलिसकर्मियों के अलग-अलग बयानों को पेश किया साजिश की तरह

न्यूजलॉन्ड्री की पूरी रिपोर्ट इस बात के इर्द-गिर्द घूमती है कि अलग-अलग पुलिस अधिकारियों ने ट्रक को खाली करने या उसे खड़ा करने की जगह को लेकर थोड़े अलग-अलग बयान दिए।

अब ये समझने की जरूरत है कि प्रशासनिक अधिकारियों के अलग-अलग बयानों पर स्पष्टीकरण तो माँगा जा सकता है लेकिन इससे किसी आपराधिक साजिश के सबूत नहीं मिल जाते।

भारत के पुलिस थानों में जगह की कमी, जाँच की ज़रूरत, अदालत के निर्देशों या प्रशासनिक सहूलियत के हिसाब से ज़ब्त गाड़ियों को हटाना या दूसरी जगह पार्क करना एक आम बात है।

संसद मार्ग पुलिस स्टेशन दिल्ली के सबसे व्यस्त इलाकों में से एक है, जहाँ गाड़ियों के लिए अनगिनत पार्किंग की जगह नहीं होती।

इसके बावजूद, न्यूजलॉन्ड्री ने पुलिस के इस सामान्य-से प्रशासनिक फैसले को एक बड़ी और गहरी साजिश का रूप देने की कोशिश की है।

रिपोर्ट में सिर्फ मनगढ़ंत बातें और इशारे हैं, लेकिन सबूत का एक भी अंश नहीं है।

क्या चाहता था न्यूजलॉन्ड्री

न्यूजलॉन्ड्री की बनाई इस कहानी पर विश्वास करने के लिए पाठकों को एक सिर्फ काल्पनिक बातें सोचनी पड़ेगी। जैसे- दिल्ली पुलिस को एक्सीडेंट के दिन ही बात पहले से पता होगी कि शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट के नाम पर इकट्ठा हो रही भीड़ चार दिन बाद यानी 20 जुलाई को अचानक हिंसक रूप ले लेगी। या सीजेपी प्रदर्शनकारी खुद आकर उस जब्त डंपर से पत्थर उठाएँगे और पुलिस पर ही हमला कर देंगे, ताकि पुलिस का बनाया प्लान कामयाब हो सके!

यह कोई खोजी पत्रकारिता नहीं बल्कि सिर्फ एक मनगढ़ंत कहानियाँ हैं, जिसके जरिए पाठकों को इस दिशा में भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है कि वो हर चीज को आपस में जोड़ें और ये समझें कि इनका पत्थरों से भरे ट्रक का संसद मार्ग पर दिखना और फिर पत्थरबाजी होने के बीच कुछ तो कनेक्शन जरूर है।

मनगढ़ंत कहानियाँ बनाईं, नहीं पूछा असली सवाल

न्यूजलॉन्ड्री ने अपने एजेंडे को फैलाने के लिए ट्रक में रखे पत्थरों, गुमनाम सूत्रों और मनगढ़ंत दावों पर पूरी रिपोर्ट कर डाली लेकिन वो असली सवाल पूछना भूल गए।

अपनी रिपर्ट में उन्होंने एक भी बार ये पूछना उचित नहीं समझा कि प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस के जवानों के ऊपर किसने और क्यों हमला किया।

क्या उनके इस रवैये से ये साफ नहीं होता कि वो सिर्फ ये साबित करने की जुगत में है किसी भी तरह सीजेपी प्रदर्शन में हिंसा करने वाले उपद्रवियों का अपराध कम दिखाई दे और सवाल खड़े हो तो सिर्फ पुलिस पर।

डंपर ट्रक को लेकर कहानी साफ थी कि एक गंभीर एक्सीडेंट के बाद गाड़ियाँ पुलिस कस्टडी में ली गईं। न्यूजलॉन्ड्री ने केवल कुछ एक्सक्लूजिव देने की चाह में अपनी रिपोर्ट को ऐसे पेश किया कि लोग नियम-कानून पर ही सवाल उठा दें।

IIT से इंजीनियरिंग, विदेशी कंपनियों में काम, RSS से पुराना जुड़ाव… जानें कौन हैं जगदीश आफले, जिन्हें राम मंदिर ट्रस्ट का पहला सचिव किया गया नियुक्त?

अयोध्या की श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने राम मंदिर के प्रशासनिक ढाँचे को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। ट्रस्ट ने मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति से पहले जगदीश आफले को पहला सचिव नियुक्त किया है। जगदीश आफले की नियुक्ति पर 2 सितंबर को होने वाली ट्रस्ट की बैठक में औपचारिक मुहर लगेगी।

इसके साथ ही जगदीश आफले ट्रस्ट के भारतीय स्टेट बैंक (SBI) खातों का अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता भी बनाया गया है। काफी समय से राम मंदिर में दान चारो विवाद को लेकर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली में ये बदलाव किया गया है और सचिव की नियुक्ति को भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना गया है।

CEO से पहले सचिव की नियुक्ति क्यों हुई

राम मंदिर ट्रस्ट ने पहले ही CEO, सचिव और प्रवक्ता जैसे नए प्रशासनिक पद बनाने का फैसला किया था। लेकिन CEO की नियुक्ति की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो सकी है।

ट्रस्ट के अनुसार CEO पद के लिए करीब 5200 आवेदन मिले हैं। इन आवेदनों की जाँच और चयन की प्रक्रिया रिटायर्ड जस्टिस प्रमोद कोहली की अध्यक्षता वाली समिति कर रही है। इस प्रक्रिया में समय लगना तय है। ऐसे में प्रशासनिक काम प्रभावित न हो, इसलिए पहले सचिव की नियुक्ति कर दी गई।

कौन है जगदीश आफले?

जगदीश आफले महाराष्ट्र के पुणे के रहने वाले हैं। वह पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं। जगदीश आफले ने IIT मुबंई से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक और एमटेक की पढ़ाई की है। इसके बाद उन्होंने कई बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम किया है। यूरोप और अमेरिका की कंपनियों में भी उन्होंने लंबे समय तक अपनी सेवाएँ दी है।

रिटार्यड के बाद वह भारत लौट आए। जब राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ तो जगदीश आफले ने अपने पेशेवर अनुभव को मंदिर निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने बिना किसी वेतन के प्रोजेक्ट मैनेजर की जिम्मेदारी संभाली। मंदिर निर्माण की निगरानी और परियोजना प्रबंधन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

RSS से है पुराना जुड़ाव

बता दें कि जगदीश आफले बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े रहे हैं। राम मंदिर निर्माण का फैसला आने के बाद संघ ने उन्हें परियोजना प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी थी।

तभी से वह अयोध्या में रहकर मंदिर निर्माण से जुड़े सभी प्रमुख कार्यों की देखरेख कर रहे हैं। वह तीर्थ क्षेत्र भवन में अपनी पत्नी के साथ रह रहे हैं। उनके अनुभव और लंबे जुड़ाव को देखते हुए ट्रस्ट ने अब उन्हें सचिव की नई जिम्मेदारी सौंपी है।

बैंक खातों के संचालन की जिम्मेदारी मिली

जगदीश आफले को केवल सचिव ही नहीं बनाया गया है। उन्हें ट्रस्ट की ओर से भारतीय स्टेट बैंक में अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता भी नियुक्त किया गया है। पूर्व महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ अनिल मिश्रा के पद छोड़ने के बाद बैंक खातों के संचालन को लेकर नई व्यवस्था की जरूरत थी।

इसी कारण ट्रस्ट ने उनका नाम SBI को भेजा। शुरुआती दौर में कानूनी प्रक्रियाओं के चलते कुछ देरी हुई, लेकिन बाद में नया प्रस्ताव भेजे जाने के बाद बैंक ने मंजूरी दे दी। अब ट्रस्ट के खातों का संचालन सामान्य रूप से शुरू हो गया है।

बता दें कि 6 जुलाई को हुई ट्रस्ट की बैठक में तत्कालीन महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार किए गए थे। इसके बाद अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं में बदलाव का फैसला लिया गया।

पहले अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन और जगदीश आफले के नाम SBI को भेजे गए थे। लेकिन ट्रस्ट डीड के प्रावधानों के आधार पर बैंक ने यह सवाल उठाया कि आफले ट्रस्टी नहीं हैं। इसके बाद कानूनी राय माँगी गई, जिससे कुछ समय के लिए खाता संचालन प्रभावित हो गया। बाद में ट्रस्ट ने नया प्रस्ताव भेजा और SBI ने उसे मंजूरी दे दी।

बैंक खातों के संचालन में आई रुकावट का असर ट्रस्ट के वित्तीय कामकाज पर भी पड़ा। करीब एक हजार कर्मचारियों का जून महीने का वेतन समय पर जारी नहीं हो सका था।

इसके अलावा ट्रस्ट से जुड़ी कई आउटसोर्सिंग एजेंसियों के भुगतान में भी देरी हुई। हालाँकि SBI के मुख्य महाप्रबंधक दिपेश राज ने साफ कहा था कि बैंक और ट्रस्ट के बीच कोई विवाद नहीं है। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट के खातों से सभी जरूरी लेन-देन SBI की ओर से किए जा रहे हैं।

2 सितंबर की बैठक में लगेगी औपचारिक मुहर

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की 2 सितंबर को होने वाली बैठक में जगदीश आफले की नियुक्ति पर औपचारिक मंजूरी दी जाएगी। इसके बाद वह सचिव के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ संभालेंगे।

वहीं CEO और प्रवक्ता की नियुक्ति की प्रक्रिया भी आगे बढ़ेगी। ट्रस्ट का मानना है कि नए प्रशासनिक ढांचे से वित्तीय पारदर्शिता बढ़ेगी और मंदिर का प्रशासन पहले से ज्यादा व्यवस्थित और मजबूत होगा।

दान चोरी के मामले के बाद बदला प्रशासनिक ढांचा

हाल ही में राम मंदिर में दान राशि की कथित चोरी का मामला सामने आया था। इसके बाद ट्रस्ट की कार्यप्रणाली और वित्तीय व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठे। इसी के बाद ट्रस्ट ने प्रशासनिक ढांचे को और मजबूत बनाने का फैसला किया। सचिव पद का सृजन और उस पर नियुक्ति इसी बदलाव का हिस्सा है। आने वाले समय में ट्रस्ट प्रवक्ता की भी नियुक्ति करेगा, ताकि सभी आधिकारिक जानकारियाँ एक तय व्यवस्था के तहत सार्वजनिक की जा सकें।

‘समरसता संकल्प अभियान’ चलाएगी BJP, जालंधर से वाराणसी के बीच निकलेगी भव्य यात्रा: जानिए पंजाब-UP चुनाव में रविदासिया समुदाय को कैसे साध रही भारतीय जनता पार्टी

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सोमवार (27 जुलाई 2026) को घोषणा की कि वह 15वीं-16वीं शताब्दी के रहस्यवादी कवि-संत गुरु रविदास जी की 650वीं जयंती (प्रकाश पर्व) मनाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। ‘समरसता संकल्प अभियान’ (सामाजिक समरसता और संकल्प के लिए अभियान) 29 जुलाई 2026 से 20 फरवरी 2027 तक लगभग सात महीनों तक चलेगा।

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर स्थित उनकी जन्मस्थली पर इसका आधिकारिक उद्घाटन होगा। उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने जानकारी दी कि 28 और 29 जुलाई को विशेष कार्यक्रमों के बीच इसकी शुरुआत की जाएगी। 28 जुलाई को सीर गोवर्धनपुर में पवित्र माटी का पूजन किया जाएगा।

गुरु रविदास स्मारक परिसर से 131 कलशों को एक भव्य जुलूस में औपचारिक पूजा के लिए उनके जन्मभूमि मंदिर ले जाया जाएगा। इसके लिए उत्तर प्रदेश के विभिन्न राज्यों और जिलों से कलश लेकर टीमें वाराणसी में एकत्र होंगी। प्रत्येक गाँव को इस मिट्टी से भरे 104 कलश सौंपे जाएँगे और अन्य 27 कलश दूसरे राज्यों में भेजे जाएँगे।

उत्तर प्रदेश के 98 संगठनात्मक जिला इकाइयों और छह क्षेत्रीय प्रभागों तथा 27 अन्य राज्यों के भाजपा प्रतिनिधि कलश प्राप्त करेंगे और फिर उन्हें विभिन्न मंदिरों और संत सम्मेलनों में ले जाएँगे। माघ पूर्णिमा और गुरु रविदास जयंती के अवसरों पर भारत के विभिन्न हिस्सों में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख व गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर के प्रमुख संत निरंजन दास सभी इस औपचारिक शुरुआत के अवसर पर मौजूद रहेंगे।

दीपोत्सव से लेकर महीने भर की यात्रा तक, भाजपा ने बनाई कई कार्यक्रमों की योजना

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और दुष्यंत कुमार गौतम ने जानकारी देते हुए बताया कि वाराणसी से पूरे भारत में 131 कलश भेजे जाएँगे। 21,000 स्थानों पर सामाजिक समरसता की पहल की जाएगी और 51,000 मंदिरों में दीपोत्सव मनाया जाएगा। एक ‘गुरु रविदास महाराज समरसता दीप अभियान’ आयोजित किया जाएगा, जिसके तहत रविदास घाट और उनके स्मारक स्थल पर 11,000 दीपक जलाए जाएँगे। 29 जुलाई को भाजपा के सभी मंडल और संत को समर्पित मंदिर दीपोत्सव मनाएँगे।

पार्टी पदाधिकारियों ने रेखांकित किया कि मोदी सरकार ने गुरु रविदास की विरासत को सहेजने के लिए उनके मूल स्थान, तीर्थ मार्गों, हवाई अड्डों, विशेष ट्रेनों का विकास किया है और उनसे जुड़े कई स्थलों का जीर्णोद्धार किया है। चुघ के अनुसार, इस हालिया प्रयास का उद्देश्य समानता, सामाजिक शांति और जन जागरूकता पर उनके उपदेशों का प्रसार करना है।

उन्होंने ध्यान दिलाया कि उस दौर में सिकंदर खान लोदी, तुगलक और तैमूर या तमेरलेन देश भर में “धर्मांतरण कराने और मंदिरों को ध्वस्त करने में लगे हुए थे।” गौतम ने कहा, “उस समय उनका एक ही नारा था ‘तलवार या कुरान’। उस मध्यकालीन काल में लोगों के पास अपने विचार व्यक्त करने का कोई साधन नहीं था और हर तरफ व्यापक संकट का माहौल था।”

उन्होंने आगे कहा कि “गोस्वामी तुलसीदास, कबीर दास, संत तुकाराम, गुरु नानक और चैतन्य महाप्रभु सहित भक्ति आंदोलन के कई महान संत उभरे,” जिन्होंने “संस्कृत में संरक्षित ज्ञान और मूल्यों को अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम से जनता तक पहुँचाया, जिससे सार्वजनिक जागरूकता पैदा हुई और पूरे देश में समाज को नई दिशा मिली।”

भाजपा प्रवक्ता ने बताया कि गुरु रविदास ने उस समय बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया था और इसलिए कबीर द्वारा उन्हें ‘संत शिरोमणि गुरु रविदास जी’ की उपाधि दी गई थी। गौतम के अनुसार, समतावादी समाज की उनकी 650 साल पुरानी अवधारणा अपने समय से काफी आगे थी। साल 1837 में अब्राहम लिंकन ने गुलामी के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था और डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने संविधान बनाते समय समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को स्थापित किया था।

उन्होंने कहा उन लोगों से बहुत पहले गुरु रविदास पहले ही ‘छोटे-बड़े सब बसे’ का संदेश दे चुके थे। उन्होंने एक जातिविहीन समाज और ‘बेगमपुरा’ की कल्पना की थी, एक ऐसी जगह जहाँ न दुख है और न ही कोई कष्ट।

भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लाल सिंह आर्य ने जोर देकर कहा कि इसका उद्देश्य सभी समूहों के बीच सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना और यह सुनिश्चित करना है कि विकसित भारत के निर्माण में हर समुदाय शामिल हो। उन्होंने कहा कि संत का मार्ग ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास’ की आधारशिला के रूप में कार्य करता है और यह मिशन सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता के लिए एक व्यापक आंदोलन बन जाएगा।

आर्य ने जोर देकर कहा, “गुरु रविदास ने मानव कल्याण, समानता और सामाजिक समरसता के लिए काम किया। वे धर्मांतरण के खिलाफ थे। उनके संदेश और विचारों को 650 जयंती कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों तक पहुँचाया जाएगा।” उन्होंने खुलासा किया कि इस उद्देश्य के लिए 20 से 23 जुलाई तक राज्य स्तरीय कार्यशालाएँ, 25 से 27 जुलाई तक जिला स्तरीय कार्यशालाएँ और 19 जुलाई को दिल्ली में एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया था। ये तैयारियाँ 18 राज्यों में हुईं।

अभियान के मुख्य रूप से पाँच चरण निर्धारित हैं। राष्ट्रीय, राज्य, जिला और मंडल स्तर पर 29 जुलाई से 10 सितंबर तक ‘श्री गुरु रविदास महाराज कलश वंदन अभियान’ चलाया जाएगा।

उत्तर प्रदेश के 98 संगठनात्मक जिला इकाइयों और छह क्षेत्रीय प्रभागों तथा 27 अन्य राज्यों के भाजपा प्रतिनिधि इन कलशों को प्राप्त करेंगे और फिर उन्हें विभिन्न मंदिरों और संत सम्मेलनों में ले जाएँगे। 29 जुलाई से 31 अगस्त तक एक ‘संत संपर्क अभियान’ भी चलाया जाएगा, जिसमें संतों, महात्माओं, गुरुओं और महंतों से आशीर्वाद देने का अनुरोध किया जाएगा।

5 अक्टूबर से 5 नवंबर तक श्री गुरु रविदास महाराज समरसता यात्रा’ जालंधर से वाराणसी के लिए रवाना होगी, जो जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, चंडीगढ़, हरियाणा, दिल्ली और मध्य प्रदेश से होकर गुजरेगी। 26 नवंबर से 15 जनवरी तक ‘श्री गुरु रविदास महाराज छात्रवास संपर्क अभियान’ प्रस्तावित है।

इसके अलावा, छात्र, छात्रावास और धार्मिक संगठन संपर्क अभियान और जुलूसों में भाग लेंगे। भाजपा गुरबाणी पाठ और भजन संध्या का आयोजन करने के लिए भी तैयार है। इसके शीर्ष नेता समरसता संकल्प सभा को संबोधित करेंगे और पार्टी को कम से कम 25,000 लोगों की उपस्थिति सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।

महत्वपूर्ण मोड़ पर लिया गया अहम निर्णय

साल 2027 की शुरुआत में उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। हालाँकि भाजपा नेताओं ने इस यात्रा का इन चुनावों से किसी भी तरह के संबंध का कड़ाई से खंडन किया है। पार्टी ने अतीत में भी बड़े पैमाने पर गुरु रविदास जयंती मनाई है।

द इंडियन एक्सप्रेस ने अंदरूनी सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि यह पहली बार है जब उनके अनुयायी दलित समुदाय, जिन्हें रविदासिया कहा जाता है और जो पंजाब तथा उत्तर प्रदेश में भारी संख्या में केंद्रित हैं, से जुड़ने के लिए इतना लंबा अभियान तैयार किया गया है।

उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी 21% है और राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें उनके लिए आरक्षित हैं। 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा और उसकी सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) ने मिलकर 63 अनुसूचित जाति (एससी) सीटें जीती थीं, जबकि तत्कालीन समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 20 सीटें मिली थीं।

पंजाब की 117 सदस्यीय विधानसभा में जहाँ दलितों की आबादी 32% है, इस समुदाय के लिए 34 सीटें आरक्षित हैं। 2022 के विधानसभा चुनावों में भगवा पार्टी इनमें से एक भी सीट हासिल नहीं कर पाई थी। पंजाब के दोआबा क्षेत्र में 12 लाख से अधिक रविदासिया रहते हैं, जिसमें कपूरथला, होशियारपुर, नवांशहर और जालंधर जिले शामिल हैं। इस क्षेत्र में दलितों की आबादी लगभग 45% है, जो राज्य के औसत से कहीं अधिक है।

दिलचस्प बात यह है कि 2022 के विधानसभा चुनावों की तारीख को 14 फरवरी से बदलकर 20 फरवरी कर दिया गया था, जब पार्टियों ने आपत्ति जताई थी कि तारीखों का गुरु रविदास जयंती से टकराव होगा, जिसके कारण बड़ी संख्या में रविदासिया वाराणसी जाते हैं। उत्तर प्रदेश और पंजाब की राजनीति में दलितों की प्रमुखता ने आगामी चुनावों से पहले समुदाय पर भाजपा का विशेष ध्यान आकर्षित किया है।

विशेष रूप से जालंधर और वाराणसी के बीच यह यात्रा पंजाब और उत्तर प्रदेश के बीच के शहरों और गांवों, विशेष रूप से बड़ी दलित आबादी वाले क्षेत्रों में रुकेगी।

मोदी सरकार ने गुरु रविदास का ऐतिहासिक सम्मान कैसे किया

बता दें कि 1 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरु रविदास की 649वीं जयंती मनाने के लिए पंजाब पहुँचे थे। वे जालंधर में वैश्विक रविदासिया समुदाय के एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र अत्यधिक प्रभावशाली डेरा सचखंड बल्लां गए, जहाँ उन्होंने माथा टेका और सार्वजनिक समारोहों में भाग लिया।

20वीं शताब्दी की शुरुआत में स्थापित डेरा सचखंड बल्लां धीरे-धीरे दलित सशक्तिकरण का एक केंद्र बन गया, विशेष रूप से SC समुदाय की उस जाति के बीच जो ऐतिहासिक रूप से छुआछूत का शिकार रहे हैं और आमतौर पर चमड़ा उद्योग से जुड़े हैं। इसके प्रमुख संत निरंजन दास को इस वर्ष पद्म श्री से सम्मानित किया गया है।

इसी तरह सरकार की ओर से इस महीने अमृतसर और वाराणसी के बीच पहली सीधी एसी ट्रेन ‘संत रविदास एक्सप्रेस’ शुरू की गई है, जिससे पीएम मोदी के संत निरंजन दास से मिलने के कुछ महीनों बाद रविदासिया समुदाय की एक पुरानी इच्छा पूरी हुई है। हर साल अनगिनत श्रद्धालु मुख्य रूप से दोआब क्षेत्र से गुरु रविदास की जयंती मनाने के लिए सीर गोवर्धनपुर जाते हैं।

बरसों से श्रद्धालु इस मार्ग पर सीधी ट्रेन का इंतजार कर रहे थे, खासकर डिब्बों में वातानुकूलन (एसी) की सुविधा के साथ। संत रविदास एक्सप्रेस यात्रा के आराम में सुधार करेगी और वार्षिक उत्सवों के दौरान भारी भीड़ के दबाव को कम करेगी। उनकी 650वीं जयंती के लिए एक विशेष टेंट सिटी की भी योजना बनाई जा रही है, जिसके एक बड़े समागम होने का अनुमान है।

पीएम मोदी 23 फरवरी 2024 को वाराणसी में पूज्य संत की 647वीं जयंती के अवसर पर शामिल हुए और उन्होंने इस अवसर पर भाषण दिया। उन्होंने संत रविदास संग्रहालय की आधारशिला भी रखी और सीर गोवर्धनपुर में उनके मंदिर के पास एक पार्क में उनकी मूर्ति का अनावरण किया।

साल 2022 में रविदास जयंती पर पीएम मोदी ने दिल्ली के करोल बाग स्थित श्री गुरु रविदास विश्राम धाम मंदिर का भी दौरा किया था। उन्होंने ‘शब्द कीर्तन’ में भाग लिया और संत को समर्पित भजनों की धुन पर उत्साहपूर्वक ‘झीका’ बजाया था।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

ओडिशा सरकार करेगी स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के नाम पर मेडिकल कॉलेज का नामकरण: जानिए ST इलाकों में धर्मांतरण रोकने में सक्रिय रहे हिंदू नेता की नक्सलियों ने क्यों की थी हत्या

ओडिशा सरकार ने कंधमाल जिले के फूलबनी में स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का नाम बदलकर पूज्य हिंदू नेता और आध्यात्मिक व्यक्तित्व, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के नाम पर रखने का फैसला किया है। सोमवार (27 जुलाई 2026) को इस कदम की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने कहा कि इस फैसले का उद्देश्य क्षेत्र के जनजातीय समुदायों के लिए स्वामी जी के जीवनभर के समर्पण, सेवा और बलिदान को सम्मानित करना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए उनकी स्मृति सुरक्षित रहे।

मेडिकल संस्थान के नामकरण के साथ ही मुख्यमंत्री ने मुख्यमंत्री विशेष सहायता (सीएमएसए) कोष से ₹13 करोड़ के अनुदान को मंजूरी दी है। यह वित्तीय आवंटन स्वामी जी के आश्रम, आश्रम स्कूल और जलेस्पटा स्थित कन्याश्रम के व्यापक विकास और संरक्षण के लिए निर्देशित किया गया है।

मुख्यमंत्री कार्यालय के एक आधिकारिक बयान के मुताबिक, “यह राशि स्वामी जी के आश्रम की विरासत को सहेजने और उनकी स्मृतियों को जीवित रखने के लिए आवंटित की गई है।” इस वित्तीय पैकेज का उद्देश्य स्थानीय छात्रों की बेहतर सेवा के लिए परिसर में शैक्षणिक और आवासीय दोनों प्रकार की ढांचागत सुविधाओं को मजबूत करना है।

जलेस्पटा परिसर में रहने और सीखने की स्थितियों में सुधार के उद्देश्य से स्वीकृत ₹13 करोड़ के विकास पैकेज के तहत कई प्रमुख बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की रूपरेखा दी गई है। स्वीकृत राशि में से ₹5 करोड़ विशेष रूप से 300 सीटों वाले नए बालिका छात्रावास के निर्माण के लिए रखे गए हैं, जबकि ₹3 करोड़ स्वामी जी के विरासत स्थल के संरक्षण और ऐतिहासिक रखरखाव के लिए तय किए गए हैं।

लंबे समय से चली आ रही बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए, जलेस्पटा आश्रम, इसके स्कूल और आवासीय सुविधाओं के लिए एक विश्वसनीय पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक मेगा रिवर लिफ्ट परियोजना के लिए ₹60 लाख आवंटित किए गए हैं। शेष धनराशि कक्षाओं के निर्माण, चारदीवारी बनाने, शौचालय सुविधाओं का विस्तार करने और मौजूदा छात्रावास भवनों के जीर्णोद्धार सहित आवश्यक कार्यों को पूरा करेगी।

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती का जीवन और मिशन

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती एक प्रमुख समाज सुधारक थे जिन्होंने अपने जीवन के चार दशक से अधिक समय ओडिशा में जनजातीय आबादी के कल्याण, शिक्षा और आध्यात्मिक संरक्षण के लिए समर्पित कर दिए। वनवासियों को सशक्त बनाने में गहरा विश्वास रखते हुए, उन्होंने हिमालय में वर्षों की तपस्या से लौटने के तुरंत बाद 1966 में चकपाद में एक आश्रम की स्थापना की।

यह समझते हुए कि सामाजिक उत्थान के लिए शिक्षा महत्वपूर्ण थी, उन्होंने स्थानीय युवाओं को स्नातक स्तर तक की संरचित शिक्षा प्रदान करने के लिए गुरुकुल संस्कृति विद्यालय की स्थापना की। शिक्षा से परे, स्वामी जी सांस्कृतिक संरक्षण के लिए गहराई से प्रतिबद्ध थे। वे गोहत्या के खिलाफ सक्रिय रूप से अभियान चलाते थे और पारंपरिक जगन्नाथ यात्राओं जैसी पहलों के माध्यम से स्वदेशी समुदायों को उनकी विरासत से फिर से जोड़ने के आंदोलनों का नेतृत्व करते थे।

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती का जीवन और मिशन

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती एक प्रमुख समाज सुधारक थे जिन्होंने अपने जीवन के चार दशक से अधिक समय ओडिशा में जनजातीय आबादी के कल्याण, शिक्षा और आध्यात्मिक संरक्षण के लिए समर्पित कर दिए। वनवासियों को सशक्त बनाने में गहरा विश्वास रखते हुए, उन्होंने हिमालय में वर्षों की तपस्या से लौटने के तुरंत बाद 1966 में चकपाद में एक आश्रम की स्थापना की।

यह समझते हुए कि सामाजिक उत्थान के लिए शिक्षा महत्वपूर्ण थी, उन्होंने स्थानीय युवाओं को स्नातक स्तर तक की संरचित शिक्षा प्रदान करने के लिए गुरुकुल संस्कृति विद्यालय की स्थापना की। शिक्षा से परे, स्वामी जी सांस्कृतिक संरक्षण के लिए गहराई से प्रतिबद्ध थे। वे गोहत्या के खिलाफ सक्रिय रूप से अभियान चलाते थे और पारंपरिक जगन्नाथ यात्राओं जैसी पहलों के माध्यम से स्वदेशी समुदायों को उनकी विरासत से फिर से जोड़ने के आंदोलनों का नेतृत्व करते थे।

ईसाई मिशनरियों के निशाने पर थे स्वामी जी

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के आरएसएस (RSS) के साथ करीबी संबंध थे और वे विश्व हिंदू परिषद (VHP) से जुड़े हुए थे। वे चकपाद में आश्रम स्थापित करके 35 वर्षों से जनजातीय समाज के बीच हिंदुत्व के प्रति जागरूकता फैला रहे थे। वे आदिवासियों के ईसाई धर्मांतरण के खिलाफ मुखर थे और सुदूर क्षेत्रों में धर्मांतरण के प्रयासों के खिलाफ सक्रिय रूप से काम करते थे, जागरूकता पैदा करते थे और जनजातीय समुदायों से जुड़ने के प्रयासों का नेतृत्व करते थे।

कंधमाल के जनजातीय इलाकों में आक्रामक धार्मिक धर्मांतरण के उनके सक्रिय विरोध ने उन्हें स्थानीय असामाजिक तत्वों का निशाना बना दिया। जैसे-जैसे वे स्कूलों, कन्या आश्रमों और सामुदायिक कार्यक्रमों की स्थापना के लिए काम कर रहे थे, जनजातीय आबादी के बीच उनका बढ़ता प्रभाव क्षेत्र में काम कर रहे ईसाई धर्मांतरण नेटवर्क और नक्सलियों के लिए एक बड़ी बाधा के रूप में देखा गया, जो हमेशा आदिवासियों के मुख्यधारा के समाज का हिस्सा बनने के विरोधी थे।

जन्माष्टमी के दिन अपने ही आश्रम में हिंदू नेता और समाज सेवी की हुई थी नृशंस हत्या

साल 2008 वह समय था जब ओडिशा में माओवादी हिंसा अपने चरम पर थी। स्वामी जी के काम को लेकर बढ़ा तनाव 23 अगस्त 2008 की रात, जन्माष्टमी के दिन त्रासदी में बदल गया। जब स्वामी जी तुमुडीबंध के कन्या आश्रम में थे और छोटे छात्रों तथा भक्तों से घिरे हुए थे, तब एके-47, देशी हथियारों और धारदार हथियारों से लैस नक्सलियों के एक सशस्त्र समूह ने परिसर पर हमला कर दिया।

80 वर्षीय संत की उनके चार शिष्यों के साथ, जिनमें एक छोटा बच्चा भी शामिल था, बेरहमी से हत्या कर दी गई। यह भीषण हमला, जिसमें स्वामी जी के शरीर पर कुल्हाड़ियों से वार किया गया था, ने पूरे क्षेत्र में दहशत फैला दी। यह घटना आवासीय परिसर में रह रही लगभग 130 छोटी स्कूली छात्राओं के सामने हुई।

हालाँकि माओवादियों ने बाद में इस हमले की जिम्मेदारी ली, लेकिन इस घटना ने ग्रामीण ओडिशा में नक्सली समूहों और मिशनरी गतिविधियों के आपस में जुड़ने को लेकर गहरी चिंताएँ पैदा कर दीं। आलोचकों और स्थानीय समुदाय के नेताओं ने ध्यान दिलाया कि क्षेत्र में शामिल स्थानीय माओवादी समिति के सदस्यों का एक बड़ा हिस्सा धर्मांतरित ईसाई थे, जिससे यह सवाल उठा कि क्या हिंदू नेताओं को निशाना बनाने वाले लोगों को कवर देने के लिए माओवादी बैनर का इस्तेमाल किया गया था।

साल 2007 में कंधमाल में हिंदू आदिवासियों और धर्मांतरित ईसाइयों के बीच सांप्रदायिक दंगे हुए थे, जो एसटी (ST) दर्जे की माँग कर रहे थे। 24 दिसंबर को ईसाइयों ने एक दुर्गा पूजा स्थल पर हमला करके तोड़फोड़ की थी और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पर भी हमला किया था जब उन्होंने बीच-बचाव करने की कोशिश की थी। इससे हिंसक झड़पें हुईं जहाँ कई घरों को आग के हवाले कर दिया गया।

साल 2015 में 2007 के दंगों की जाँच कर रहे जस्टिस वासुदेव पाणिग्रही आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट में इलाके में हिंसा के पीछे ‘धड़ल्ले से हो रहे ईसाई धर्मांतरण’ को कारण बताया गया था। पूर्व जज ने बताया था कि ओडिशा में कड़े धर्मांतरण विरोधी कानूनों के बावजूद धड़ल्ले से मिशनरी गतिविधियाँ जारी हैं। घने जंगलों वाले छोटे से जिल कंधमाल में 1200 से अधिक चर्च और 300 से अधिक ईसाई संगठन हैं।

अक्टूबर 2013 में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के आरोप में कुल आठ लोगों जिनमें 7 धर्मांतरित ईसाई और पुलारी रामा राव नाम का एक माओवादी नेता शामिल था, को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। इस मामले में दो अन्य माओवादी नेता दुन्ना केशव राव और सब्यसाची पांडा भी आरोपित थे। दोनों जेल में बंद हैं और फिलहाल कंधमाल में हुई हत्या सहित कई अन्य मामलों में विचाराधीन हैं।

मीडिया ने एक बुजुर्ग हिंदू नेता और उनके 4 शिष्यों की हत्या को किया नजरअंदाज

साल 2008 के इस हत्याकांड के बाद कंधमाल में व्यापक दुख और गुस्सा फैल गया, जिससे गंभीर सांप्रदायिक हिंसा और नागरिक अशांति पैदा हुई। इसलिए, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके 4 अनुयायियों की शुरुआती सामूहिक हत्या को खबरों में प्राथमिकता नहीं दी गई, लेकिन जब हिंदुओं ने विरोध प्रदर्शन किया, तो विरोध प्रदर्शनों का स्वरूप ही एक मुद्दा बन गया। हिंदू विरोध प्रदर्शनों को हिंसक बताकर मूल हत्याकांड को भुला दिया गया। ‘पत्रकारों’ ने इन विरोध प्रदर्शनों की तुलना गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुए दंगों से की।

फूलबनी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का नाम बदलने तथा जलेस्पटा की सुविधाओं के लिए समर्पित धन आवंटित करने सहित राज्य की हालिया पहल, स्वामी जी की विरासत को पहचानने के एक आधिकारिक प्रयास को दर्शाती है। स्वास्थ्य सेवा और शैक्षणिक विकास को उनके नाम से जोड़कर, राज्य प्रशासन कंधमाल में जनजातीय शिक्षा, कल्याण और समाज सेवा में उनके योगदान को औपचारिक रूप से सम्मानित करना चाहता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

गुजरात में मकबूल-मुबारक ने हिंदू श्मशान भूमि को कब्जाने के लिए परिजन को दफनाया, जाँच के बाद HC ने कब्रिस्तान में कराया शिफ्ट: 4 साल पहले भी की थी हरकत

भावनगर के गरियाधर जिले के एक गाँव में उस समय विवाद खड़ा हो गया जब एक मुस्लिम व्यक्ति के शव को हिंदू श्मशान घाट के पास विवादित भूमि में दफना दिया गया। गुजरात हाईकोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए शव को स्थानांतरित करने का आदेश दिया।

मुस्लिम परिवार ने कोर्ट के आदेश के बावजूद जब कब्र को नहीं हटाया, तो 27 जुलाई 2026 को अधिकारियों ने कड़ी सुरक्षा के बीच शव को विवादित भूमि से हटाकर कब्रिस्तान में स्थानांतरित कर दिया ।

आखिर मामला क्या है?

यह पूरा विवाद 11 जून 2026 को शुरू हुआ। गरियाधर तालुका के रूपावती गाँव में एक मुस्लिम व्यक्ति की मृत्यु हो गई। उसके बाद परिजनों ने शव को गाँव के कब्रिस्तान में नहीं दफनाया, बल्कि हिंदू श्मशान घाट के पास एक विवादित जमीन में दफना दिया

हालाँकि गाँव के कब्रिस्तान में पर्याप्त जगह मौजूद था, लेकिन श्मशान घाट से सटे जमीन पर उसे सुपुर्द ए खाक किया गया। इस पर स्थानीय हिंदू ग्रामीणों ने आपत्ति जताई और आरोप लगाया कि जानबूझकर गाँव की शांति भंग करने के लिए ये किया गया।

ग्रामीणों के विरोध की वजह से मामला गरियाधर तालुका पुलिस स्टेशन तक पहुँचा। ग्रामीणों ने शव को हटाने का अनुरोध किया। इसी बीच, सरपंच की शिकायत के आधार पर गरियाधर पुलिस स्टेशन में मकबूल, मुबारक, रजाक, अल्ताफ आदि के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 196, 298, 301, 11 और 189 के तहत मामला दर्ज किया गया।

ग्राम पंचायत ने मुस्लिम परिवार को नोटिस जारी कर यह स्पष्टीकरण माँगा कि गाँव में कब्रिस्तान होने के बावजूद विवादित भूमि का उपयोग क्यों किया जा रहा है। नोटिस में यह भी कहा गया कि यदि पंचायत को संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, तो शव को विधिवत तरीके से कब्रिस्तान में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।

इसी बीच मुस्लिम पक्ष ने विवादित भूमि को मुस्लिम कब्रिस्तान के रूप में मान्यता देने के लिए पालीताना के डिप्टी कलेक्टर के समक्ष याचिका दायर की थी, लेकिन यह याचिका खारिज कर दी गई। इसके विरोध में मुस्लिम परिवार ने गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया और ग्राम पंचायत के नोटिस और डिप्टी कलेक्टर के फैसले को चुनौती दी।

मुस्लिम पक्ष ने कहा कि कब्रिस्तान फूलों से भरा हुआ है। इस पर कोर्ट ने जाँच का आदेश दिया, लेकिन यह दावा झूठा निकला। याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय के समक्ष दावा किया कि पुराने वडोदरा राज्य के गायकवाड़ी राजस्व अभिलेखों के अनुसार, विवादित भूमि का कुछ हिस्सा पहले दफनाने के काम आता था, लेकिन बाद में वह उल्लेख हटा दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि मौजूदा कब्रिस्तान भरा हुआ था, इसलिए उन्हें विवादित भूमि पर दफन करना पड़ा।

इन दलीलों के बाद, उच्च न्यायालय ने राजस्व और पंचायत विभागों को घटनास्थल की जाँच करने का आदेश दिया। जाँच के बाद उच्च न्यायालय को सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया कि गाँव का आधिकारिक मुस्लिम कब्रिस्तान लगभग 700 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, जो एक चारदीवारी से घिरा हुआ है और इसका लगभग आधा हिस्सा अभी भी खाली है।

इस रिपोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के दावे को गलत साबित कर दिया और यह भी स्पष्ट कर दिया कि कब्रिस्तान में पर्याप्त जगह उपलब्ध होने के बावजूद, शव को विवादित भूमि पर स्थित हिंदू श्मशान घाट के पास दफनाया गया था। इसलिए न्यायालय ने उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

पहले भी विवादित जमीन पर दफनाने का मामला सामने आया था

जाँच में पता चला कि रूपावती गाँव में इस तरह की घटना पहली बार नहीं हुई है। करीब तीन-चार साल पहले 2021-22 में, इसी परिवार ने अपने एक मृत सदस्य को इसी विवादित जमीन पर दफनाया था। उस समय भी स्थानीय हिंदू समुदाय ने विरोध जताया था।

विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस की मौजूदगी में दोनों समुदायों के लोगों के बीच एक बैठक हुई, जिसके बाद शव को निकालकर मूल कब्रिस्तान में ले जाया गया। यह लिखित गारंटी भी दी गई कि भविष्य में श्मशान घाट के पास किसी भी स्थान पर कोई दफन नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद हाल ही में ऐसी ही एक घटना हुई थी।

अदालत ने शव को हटाने का आदेश दिया, लेकिन 10 दिनों तक कोई कार्रवाई नहीं होने के बाद प्रशासन ने शव को कब्रिस्तान में दफनाने की काम किया।

इस मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने मुस्लिम परिवार की याचिका खारिज करते हुए कहा कि जब मुस्लिम समुदाय के लिए आधिकारिक कब्रिस्तान उपलब्ध है और वहाँ पर्याप्त जगह है, तो सार्वजनिक या विवादित भूमि पर मनमाने ढंग से कब्र को दफन नहीं किया जा सकता।

पहले की घटनाओं का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि मुस्लिम परिवार ने शव को स्थानांतरित करने के फैसले को चुनौती नहीं दी थी और अब चार साल बाद फिर वे अपनी मर्जी से विवादित भूमि पर कब्र को दफन कर फैसले का उल्लंघन कर रहे हैं।

अपने आदेश में अदालत ने कहा कि अगर कब्रिस्तान थोड़ा दूर होता या परिवार वहाँ नहीं पहुँच पाता, तो अदालत इस पर विचार करती, लेकिन यहाँ प्रशासन की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि ऐसी कोई स्थिति नहीं थी, इसलिए इस तरह के दफन की अनुमति नहीं दी जा सकती।

गुजरात हाईकोर्ट ने 13 जुलाई 2026 को याचिकाकर्ताओं को आदेश दिया कि परिवार 10 दिनों के भीतर शव को कब्रिस्तान में दफन करें। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि परिवार निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई नहीं करता है, तो राज्य सरकार और पंचायत व्यवस्था न्यायालय के आदेश को लागू कर सकती है।

न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि यदि शव को ले जाना आवश्यक हो, तो यह पूर्ण धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ और मृतक की गरिमा का ध्यान रखते हुए किया जाना चाहिए।

उच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी याचिकाकर्ता मुस्लिम परिवार ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद 27 जुलाई 2026 को गरियाधर के पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल पर पहुँचकर शव को विवादित स्थल से हटाकर कब्रिस्तान में स्थानांतरित कर दिया। पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गई।

उच्च न्यायालय के निर्देश के मुताबिक स्थानीय प्रशासन ने पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग की। शव को विवादित स्थल से निकालकर रूपावती गाँव के मूल कब्रिस्तान में सभी रीति-रिवाजों के साथ दफनाया गया।

बादल ऐसा जिसमें नमी नहीं, बस आग ही आग होती है: यूरोप के जंगलों को धधका रहा ‘आग उगलने वाला ड्रैगन’, कैसे कहर बरपाता है ‘क्लॉउड फायर’

फ्रांस-स्पेन इन दिनों अजीब तरह की आग से जूझ रहा है। दक्षिण-पश्चिम फ्रांस में फैली आग पर काबू पाना आसान नहीं रह गया है। आग फैलते हुए स्पेन के कई हिस्सों को अपनी चपेट में ले लिया है। इन इलाकों से करीब 4 लाख से ज्यादा लोगों को हटा कर सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। जंगलों की आग ने बड़े पैमाने पर संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया है। इससे बड़ी संख्या में जानवरों के मारे जाने का खतरा पैदा हो गया है।

जंगल में लगी इस आग को पायरोक्यूमुलोनिम्बस या पायरोसीबी बादल कहते हैं। इसे आम बोलचाल की भाषा में फायर क्लाउड यानी आग का बादल कहते हैं। दरअसल यह जलवायु परिवर्तन और मौसमी बदलाव का परिणाम है।

क्या होता है फायर क्लाउड

पायरोक्यूमुलोनिम्बस या पायरोसीबी बादल एक ऐसा बादल है जो आग की वजह से पैदा होते हैं। यूरोप में इस बार रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ी। फ्रांस- स्पेन के कुछ जगहों पर पारा 45 डिग्री तक पहुँचा था। अत्यधिक तापमान और शुष्क मौसम की वजह से जंगलों में आग भी लगी। इन भीषण आग की वजह से काफी ऊष्मा निकली जो तेजी से गुबार के रूप में ऊपर उठी।

ये काफी ऊपर (करीब 10-15 किलोमीटर) उठने के बाद कम वायुमंडलीय दबाव की वजह से ठंडी होकर संघनित होने लगी और बादल का रूप ले लिया। ऐसे बादल बिजली गिरने या तेज हवाएँ चलने की वजह बनते हैं। इन बादलों में स्ट्रेटोस्फीयर यानी पृथ्वी की दूसरी परत समताप मंडल को भेदने की क्षमता होती है। इसलिए नासा इसे ‘आग उगलने वाला ड्रैगन क्लाउड’ कहता है।

न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिक मैक्रे के मुताबिक, आग की लपटों के भीतर तूफान बन रहा होता है और वायुमंडल के निचली सतह से ऊपर करीब 10000 क्यूबिक किलोमीटर पर इसका असर भी काफी होता है। ऐसी जगह ठंडे होकर ये संघनित होते हैं और पायरोक्यूमुलोनिम्बस बादल का निर्माण करते हैं।

ये खुद भी बिजली पैदा कर सकते हैं और तेज हवाओं के साथ आग को और भीषण बना देते हैं। इसके कारण आग बुझाना काफी मुश्किल हो जाता है। इतना ही नहीं ये काफी तेजी से आस-पास के इलाकों को अपनी चपेट में ले लेते हैं।

अब तक कहाँ कहाँ देखी गई फायर क्लाउड

21वीं सदी की शुरुआत में ऑस्ट्रेलिया में फायर क्लाउड दिखाई देने लगे थे। 2022 में अमेरिका के कैलिफोर्निया के जंगलों में लगी भीषण आग के दौरान भी ऐस फायर बादल का निर्माण हुआ था और इसकी वजह से व्यापक तबाही हुई थी। लेकिन यूरोप में पहली बार ऐसी स्थिति बनी है। इसकी वजह से वैज्ञानिक काफी चिंतित हैं।

फ्रांस का दक्षिणी पश्चिम हिस्सा फायर क्लाउड से सबसे ज्यादा प्रभावित है। बोर्डो और सौमोस के जंगलों में लगी आग ने बोर्डो शहर को अपने चपेट में ले लिया है वहीं सौमोस गाँव के ऊपर आग के बादल बन गए हैं। पेरिस के आकार से चार गुना बड़ा फायर क्लाउड गिरोंड क्षेत्र में बन गया है। इसके अलावा बिस्कारोस, फॉनटेनब्लियू का जंगल, लैंडेस, टार्न, लैकेनाउ और वार सहित फ्रांस के कई अन्य इलाके भी आग की चपेट में हैं।

स्पेन के अंदरूनी मामलों के मंत्री फर्नांडो ग्रांडे मार्लास्का ने कहा कि 27 जुलाई और 28 जुलाई 2026 आग पर काबू पाने के लिए अहम है क्योंकि 29 जुलाई से तापमान बढ़ने का अनुमान है। एविला के पहाड़ी इलाकों में अब तक की सबसे भीषण आग लगी हुई है, जिसकी वजह से 50000 हेक्टेयर भूमि राख हो चुकी है। राजधानी मैड्रिड के उत्तर पश्चिम में दो जगहों पर आग लगी हुई है इसकी वजह से 70000 हेक्टेयर भूमि जल गई है। इस साल लगी आग पिछले साल से 6 गुणा से ज्यादा है।

दरअसल दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन की स्थिति ने मौसमी सिस्टम को बदल दिया है। यूरोप में गर्मी आम तौर पर सुहाना हुआ करता था। घरों में लोग एसी नहीं लगाते थे, लेकिन इस साल रिकॉर्डतोड़ गर्मी ने सबको बेहाल कर दिया। इसकी वजह से ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हुई, जिससे पायरोक्यूमुलोनिम्बस क्लाउड का निर्माण हुआ। इससे वायुमंडल में बदलाव, मौसम में बदलाव और दूसरे बदलाव भी हो रहा है। मई महीने में यूरोप में बारिश होती है लेकिन इस बार बारिश की कमी से वन क्षेत्र शुष्क पड़े हैं।

मौसम विशेषज्ञ मैक्रे के मुताबिक, जल्द ही फ्रांस में गर्मी का एक और दौर शुरू हो सकता है। इसमें फिर तापमान 40 डिग्री तक पहुँच सकता है।

क्यों खतरनाक होते हैं आग के बादल

फायर क्लाउड को कंट्रोल करना धरती पर लगी किसी भी आग से ज्यादा मुश्किल है। इतना ही नहीं ये ज्यादा विनाशकारी भी होता है। क्योंकि आग ही उष्मा ही संघनित होकर बादल बनते हैं इसलिए कहा जा सकता है कि ये अपना खुद का मौसम तंत्र विकसित कर लेता है और किसी भी चीज को जला सकता है।

ये बादल काफी शक्तिशाली होते हैं और तेज हवा होने पर उसकी दिशा में जल्दी फैलते हैं यहाँ तक कि बिजली कड़कने का कारण भी बनते हैं यानी बगैर बारिश के बिजली गिरती है। ये बादल काफी बड़ा होता है इसलिए इससे पैदा होने वाली बिजली का दायरा भी काफी बड़ा होता है। यही वजह है कि दूर दराज के इलाके में बेवजह इसके गिरने से आग लग जाती है। इस दौरान अगर तेज हवाएँ चल रही हों, तो आग के लिए यह इंधन का काम करता है।

इन बादलों से लगने वाली आग का पैटर्न इतना अलग और अप्रत्याशित होता है कि इसको कंट्रोल करने की मानवीय क्षमता कम पड़ जाती है। दमकलकर्मियों के पास चाहे जितना ही अत्याधुनिक अग्निशमन साधन उपलब्ध हों, इन पर कंट्रोल करना नामुमकिन-सा होता है। ऐसे में आसपास के लोगों को दूसरी जगह शिफ्ट करना ही एकमात्र उपाय रह जाता है।

हालाँकि पायरोक्यूमुलोनिम्बस या फायर क्लाउड काफी दुर्लभ मौसमी घटना है, लेकिन 4 सालों के अंदर अमेरिका- कनाडा से लेकर यूरोप तक में देखा गया। ये पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन हर देश को किसी न किसी रूप में प्रभावित कर रही है।

2024 के एंटी पेपर लीक कानून से कितना अलग है नया संशोधन विधेयक 2026? जानिए सजा, जुर्माना, जाँच से लेकर फास्ट ट्रैक कोर्ट तक क्या-क्या बदला

देश में NEET-UG और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवादों के बाद मोदी सरकार ने परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाने और पेपर लीक माफिया पर लगाम लगाने के उद्देश्य से बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत लोकसभा में पब्लिक एग्‍जामिनेशन बिल (Public Examinations Prevention of Unfair Means Amendment Bill, 2026) पेश किया गया है।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के लगातार प्रदर्शन, संसद मार्च, परीक्षा प्रणाली पर उठे गंभीर सवालों के बीच सरकार यह कड़ा संशोधित कानून लेकर आई है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मौके पर विपक्ष से अपील भी की है कि बच्चों के भविष्य से जुड़े इस रिफॉर्म पर राजनीति या बहानेबाजी न की जाए और यह बिल सरकार की प्राथमिकता है।

हालाँकि इससे पहले वर्ष 2024 में पहला राष्ट्रीय एंटी पेपर लीक कानून लागू किया गया था, लेकिन पिछले 2 साल में सामने आई गड़बड़ियों के बाद सरकार इस निष्कर्ष पर पहुँची कि सिर्फ कानून बनाना काफी नहीं है बल्कि जाँच, मुकदमे और सजा की प्रक्रिया को तेज करना बेहद जरूरी है।

नए संशोधन के बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट, समयबद्ध जाँच, भारी जुर्माना और कठोर सजा के प्रावधान जोड़े गए हैं। यह विधेयक पास होकर जब कानून बनेगा तो इसका सीधा असर NEET, JEE, CUET, UGC-NET, UPSC, SSC, रेलवे भर्ती बोर्ड, बैंकिंग भर्ती परीक्षाओं और केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य सभी सार्वजनिक परीक्षाओं पर पड़ेगा।

नए संशोधन विधेयक की आवश्यकता क्यों? ये पुराने कानून से कितना अलग?

वर्ष 2024 में जब पहला राष्ट्रीय एंटी पेपर लीक कानून बनाया गया था, तब उसका मुख्य उद्देश्य संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी, रेलवे और बैंकिंग जैसी सार्वजनिक परीक्षाओं में धोखाधड़ी रोकना था। लेकिन बीते सालों में यह बात पूरी तरह साफ हो चुकी है कि पेपर लीक अब किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसके पीछे संगठित गिरोह, तकनीकी नेटवर्क और भारी आर्थिक लाभ कमाने वाले बड़े रैकेट सक्रिय हैं।

NEET-UG 2026 के विवाद के बाद छात्रों ने देशभर में आंदोलन शुरू किया, जिससे परीक्षा तंत्र में व्यापक सुधार की माँग तेज हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी परीक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने और फास्ट ट्रैक कोर्ट जैसी व्यवस्था का संकेत दिया था। इसी के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस संशोधन विधेयक को मंजूरी दी। सरकार का मानना है कि पुराने कानून के बावजूद परीक्षा माफिया में डर पैदा करने और व्यवस्था को पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए कानूनी ढिलाई को समाप्त करना बेहद आवश्यक हो गया था।

सजा और जुर्माने के प्रावधानों में बड़ा इजाफा

नए संशोधन विधेयक संख्या 139-2026 के माध्यम से अपराधियों के लिए सजा और जुर्माने की दरों में काफी भारी बढ़ोतरी की गई है। अधिनियम की धारा 10 के तहत अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वालों के लिए न्यूनतम सजा को 3 साल से बढ़ाकर 5 साल कर दिया गया है, जिसे अधिकतम 10 साल तक बढ़ाया जा सकता है।

इसके साथ ही दोषियों पर अधिकतम 50 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। अगर बात संगठित अपराध की करें तो धारा 11 के तहत न्यूनतम सजा को 5 साल से बढ़ाकर 7 साल कर दिया गया है। 2024 के कानून में पेपर लीक या संगठित अपराध के लिए 10 लाख से 1 करोड़ रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान था।

वहीं अब नए विधेयक में न्यूनतम जुर्माना ही 1 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपए तक कर दिया गया है। कठोर सजा और 10 करोड़ रुपए जैसे भारी जुर्माने का मुख्य उद्देश्य यही है कि आर्थिक लाभ के लिए परीक्षाओं में हेरफेर करने वाले माफियाओं की कमर तोड़ी जा सके और इस तरह के अपराधों पर पूरी तरह रोक लगाई जा सके।

जाँच प्रक्रिया और स्पेशल टास्क फोर्स का गठन

पुराने 2024 के कानून में सबसे बड़ी कमी यह थी कि उसमें जाँच पूरी करने के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की गई थी, जिससे मामले सालों-साल खिंचते रहते थे। नए संशोधन विधेयक में इस व्यवस्था को पूरी तरह बदलते हुए जाँच के लिए 2 महीने यानी 60 दिनों की सख्त समय सीमा तय की गई है।

चाहे जाँच किसी अधिकृत पुलिस अधिकारी द्वारा की जा रही हो या किसी केंद्रीय जाँच एजेंसी द्वारा, FIR दर्ज होने, संदर्भ मिलने या अधिसूचना जारी होने के दिन से 2 महीने के अंदर जाँच पूरी करना अनिवार्य होगा। मामलों की गहन और त्वरित जाँच के लिए केंद्र सरकार को आवश्यकता पड़ने पर एक विशेष स्पेशल टास्क फोर्स (STF) गठित करने का भी अधिकार है।

पहले केंद्रीय जाँच एजेंसियाँ सामान्य प्रक्रिया के तहत काम करती थीं, लेकिन अब STF का गठन होने से पेपर लीक के मामलों में विशेषज्ञता के साथ तेजी से कार्रवाई की जा सकेगी।

स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट में 3 माह के भीतर ट्रायल

कानूनी प्रक्रिया को गति देने के लिए नए विधेयक का सबसे अहम पहलू अदालती सुनवाई को समयबद्ध बनाना है। पुराने कानून में मामलों की सुनवाई सामान्य कोर्ट में होती थी और फैसले की कोई समय सीमा नहीं थी। अब नए संशोधन के तहत राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य जज से परामर्श करके विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट नामित करेंगे।

ये विशेष अदालतें इस अधिनियम के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता 2023 या अन्य संबंधित कानूनों के तहत दर्ज मामलों की संयुक्त सुनवाई करेंगी। इन अदालतों में प्रतिदिन सुनवाई होगी और बिना किसी उचित लिखित कारण के स्थगन नहीं दिया जाएगा। चार्जशीट दाखिल होने के बाद कोर्ट को 3 महीने के भीतर मुकदमा पूरा करके फैसला सुनाना होगा।

इतना ही नहीं संशोधन कानून लागू होने के समय जितने भी मामले लंबित होंगे, उन्हें भी इन स्पेशल Fast Track Courts में स्थानांतरित कर दिया जाएगा और उन्हें भी वहाँ पहुँचने के 3 महीने के भीतर निपटाना अनिवार्य होगा।

अपील की प्रक्रिया और संपूर्ण परीक्षा तंत्र की जवाबदेही

नए कानून के तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को प्रत्येक विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए एक या अधिक विशेष लोक अभियोजक यानी स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त करने होंगे। इन विशेष अदालतों के फैसलों, सजा या आदेश के खिलाफ संबंधित उच्च न्यायालय में दो जजों की पीठ के समक्ष अपील की जा सकेगी।

हाई कोर्ट में अपील करने के लिए सामान्यतः 30 दिनों का समय तय किया गया है, जिसे विशेष परिस्थितियों में अधिकतम 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। हाई कोर्ट को भी ऐसी अपीलों का निस्तारण याचिका दाखिल होने के 3 महीने के भीतर करना होगा। इसके अलावा नए कानून में पूरे परीक्षा तंत्र की जवाबदेही तय की गई है।

कार्रवाई सिर्फ पेपर लीक करने वाले तक सीमित नहीं होगी। यदि किसी परीक्षा आयोजित करने वाली सेवा प्रदाता एजेंसी, आईटी कंपनी, डेटा प्रबंधन संस्था, परीक्षा केंद्र संचालक या उनके वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत पाई जाती है तो उनके खिलाफ भी आपराधिक केस चलेगा।

सेवा प्रदाता एजेंसियों के लिए अधिकतम जुर्माना 1 करोड़ से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपए कर दिया गया है और उन पर प्रतिबंध की अवधि 4 साल से बढ़ाकर 8 साल कर दी गई है। ऐसी संस्थाओं के दोषी निदेशकों या अधिकारियों को भी कम से कम 5 साल की जेल और 5 करोड़ रुपए तक के जुर्माने की सजा मिलेगी।

परीक्षा प्रणाली में तकनीकी सुधार और NTA का पुनर्गठन

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सख्त कानून बनाने से पेपर लीक पूरी तरह नहीं रुकेगा, जब तक कि परीक्षा प्रणाली को भीतर से सुरक्षित न बनाया जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ नेशनल टेस्टिंग एजेंसी में भी व्यापक संस्थागत सुधार कर रही है।

NTA के पुनर्गठन की प्रक्रिया के तहत अब तक 47 अधिकारियों की सेवाएँ समाप्त की जा चुकी हैं और कुछ के खिलाफ कानूनी व आपराधिक कार्रवाई की तैयारी चल रही है। अगले एक महीने के भीतर पूरी होने वाली इस प्रक्रिया में एजेंसी की आउटसोर्सिंग व्यवस्था की समीक्षा की जा रही है और नए वरिष्ठ प्रबंधन के साथ-साथ विषय विशेषज्ञों की नियुक्तियाँ की जा रही हैं।

साइबर सुरक्षा, डिजिटल फॉरेंसिक, टेस्ट सेंटर मैनेजमेंट, साइकोमेट्रिक्स और परीक्षा केंद्रों की निगरानी को मजबूत किया जा रहा है। इसके साथ ही भविष्य में अधिक से अधिक परीक्षाओं को कंप्यूटर आधारित यानी CBT मोड पर आयोजित करने, प्रश्नपत्रों को पूरी तरह एनक्रिप्टेड बनाने और परीक्षा केंद्रों के नियमित ऑडिट पर जोर दिया जा रहा है ताकि छात्रों का विश्वास सरकारी परीक्षा प्रणाली पर पुनः पूरी तरह बहाल हो सके।

लाला जगत नारायण से लेकर ML मनचंदा तक: खाालिस्तानी आतंकवादियों का निशाना बने पत्रकारों की कहानी

यह 9 सितंबर 1981 की शाम थी। ‘हिंद समाचार’ समाचार पत्र समूह के 83 वर्षीय संस्थापक और मुख्य संपादक लाला जगत नारायण पटियाला से जालंधर की ओर अपनी कार से जा रहे थे। कार उनके ड्राइवर सोमनाथ चला रहे थे। एक रॉयल एनफील्ड बुलेट बाइक उनका पीछा कर रही थी, लेकिन शुरुआत में दोनों में से किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

जब वे लुधियाना से लगभग चार किलोमीटर दूर थे, तब मोटरसाइकिल ने रफ्तार बढ़ाई और कार के बगल में आ गई। चलती कार पर गोलियाँ चलाई गईं, लेकिन हमलावरों का निशाना चूक गया। सोमनाथ ने गाड़ी मोड़ने की कोशिश की, लेकिन सामने से आ रही एक बस ने रास्ता रोक दिया।

मोटरसाइकिल रुक गई। दो सशस्त्र व्यक्ति नीचे उतरे और फंसी हुई कार की ओर बढ़े। उन्होंने बिल्कुल करीब से गोलियाँ चलाईं। जगत नारायण को तीन गोलियाँ लगीं और कार के अंदर ही उनकी मौत हो गई। ड्राइवर सोमनाथ भी इस गोलीबारी में घायल हो गए।

लाला जगत नारायण की हत्या पंजाब में उग्रवाद के दौर में कोई अकारण किया गया हमला नहीं था। हमलावरों ने एक विशिष्ट व्यक्ति का पीछा किया था, उसका भागने का रास्ता बंद किया और तब तक गोलियाँ चलाईं जब तक कि वे आश्वस्त नहीं हो गए कि खाालिस्तानी आतंकवादियों के खिलाफ बार-बार लिखने वाला यह संपादक अब दोबारा कभी नहीं लिख पाएगा।

यह हमला पंजाब में उग्रवाद के दौरान प्रेस पर हुए सबसे शुरुआती और सबसे गंभीर हमलों में से एक बन गया। अगले दशक में खाालिस्तानी आतंकवादियों ने संपादकों, संवाददाताओं, रेडियो अधिकारियों और समाचार पत्र के कर्मचारियों की हत्याएँ कीं। उन्होंने डिलीवरी वाहनों पर हमले किए, अखबार बेचने वाले हॉकरों को गोलियाँ मारीं, संवाददाताओं को धमकियाँ दीं और यह तय करने वाले फरमान जारी किए कि कौन से शब्द छापे या बोले जा सकते हैं।

मीडिया अब केवल उग्रवाद को कवर नहीं कर रहा था, बल्कि वह खुद इस लड़ाई का एक मुख्य मैदान बन चुका था।

लाला जगत नारायण क्यों बने खालिस्तानी आतंकियों का निशाना?

लाला जगत नारायण ऐसे संपादक नहीं थे जिनका प्रभाव केवल एक छोटे से न्यूज़रूम तक सीमित हो। उनका हिंद समाचार समूह उर्दू भाषा में ‘हिंद समाचार’, हिंदी भाषा में ‘पंजाब केसरी’ और पंजाबी भाषा में ‘जग बाणी’ का प्रकाशन करता था। 1981 तक इन प्रकाशनों ने पंजाब और पड़ोसी राज्यों में एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार कर लिया था।

वह पंजाब के पूर्व मंत्री, सांसद और एक प्रमुख सार्वजनिक आवाज भी थे। उनके संपादकीय लेखों ने सांप्रदायिक अलगाव का विरोध किया, जरनैल सिंह भिंडरावाले की आलोचना की और सिख राजनीति में हिंसा के बढ़ते इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी।

इस तरह के हमलों के मुख्य कारणों में से एक 1978 में अमृतसर में भिंडरावाले के समर्थकों और संत निरंकारी मिशन के बीच हुई हिंसक झड़प थी। जगत नारायण ने इस घटना से जुड़ी कार्यवाहियों के दौरान निरंकारियों का समर्थन किया था और निरंकारी अनुयायियों की हत्या की कड़ी आलोचना की थी। उनके समाचार पत्र भिंडरावाले और हिंसा को सही ठहराने के लिए धार्मिक लामबंदी का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ संपादकीय छापते रहे।

जगत नारायण के विरोध को सिखों के प्रति दुश्मनी के रूप में पेश नहीं किया गया था। उन्होंने लगातार यह तर्क दिया कि राजनीतिक या धार्मिक मतभेदों को हिंदू-सिख संघर्ष में नहीं बदला जाना चाहिए। हालाँकि उनकी व्यापक पहुँच ने उन्हें उन लोगों के लिए विशेष रूप से खतरनाक बना दिया जो खाालिस्तानी अलगाववाद को पंजाब की सिख आबादी की एकमात्र सर्वमान्य आवाज के रूप में चित्रित करना चाहते थे।

उनके संपादकीय हिंदी, पंजाबी और उर्दू के पाठकों तक पहुँचते थे। इसलिए उनकी हत्या से केवल बदला लेने से कहीं अधिक हासिल किया जा सकता था। यह पंजाब के हर संपादक को यह चेतावनी दे सकता था कि उग्रवादियों का विरोध करने के परिणाम क्या हो सकते हैं।

हत्या की साजिश के सिलसिले में 19 सितंबर 1981 को भिंडरावाले को गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी से हिंसा और राजनीतिक लामबंदी शुरू हो गई, लेकिन इसके तुरंत बाद उसे रिहा कर दिया गया। घटनास्थल से गिरफ्तार किए गए नछत्तर सिंह को बाद में जगत नारायण की हत्या का दोषी ठहराया गया। अदालत के रिकॉर्ड से पता चलता है कि एक अन्य आरोपित स्वर्ण सिंह को बरी कर दिया गया था, जबकि तीसरा आरोपित मुकदमे से पहले ही फरार हो गया था। हालाँकि संस्थापक की हत्या भी उनके समाचार पत्रों को खामोश नहीं कर सकी।

रमेश चंद्र ने जारी रखा अपने पिता का अभियान

लाला जगत नारायण की हत्या के बाद उनके सबसे बड़े बेटे रमेश चंद्र ने हिंद समाचार समूह का कार्यभार संभाला। उन्होंने देखा था कि आतंकवाद के खिलाफ लिखने की क्या कीमत उनके पिता को चुकानी पड़ी थी। वह यह भी जानते थे कि उसी संपादकीय नीति को जारी रखने से वह और उनका संगठन लगातार खतरे में रहेंगे। इसके बावजूद समूह ने खाालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा की जाने वाली हिंसा के खिलाफ अपने रुख में कोई बदलाव नहीं किया।

रमेश चंद्र ने आतंकियों के खिलाफ लिखना जारी रखा और हिंदू-सिख एकता को बढ़ावा दिया। वह ‘बलिदानी परिवार फंड’ की स्थापना से भी जुड़े थे, जो आतंकवाद से प्रभावित परिवारों के लिए धन एकत्र करता था, जिसमें हिंदू और सिख दोनों पीड़ित शामिल थे।

अपने पिता की हत्या के तीन साल से भी कम समय बाद 12 मई 1984 को जालंधर में रमेश चंद्र की गोली मारकर हत्या कर दी गई। मीडिया रिपोर्टों में इस हत्या को खालिस्तानी आतंकियों द्वारा किया गया एक और बड़ा हमला बताया गया, ऐसे समय में जब पंजाब में हिंसा बहुत तेजी से बढ़ रही थी। वह एक कार्यक्रम से लौट रहे थे जब उन्हें गोलियों से भून दिया गया।

रमेश की हत्या के जरिए खाालिस्तानी आतंकवादी जो संदेश देना चाहते थे, वह साफ था। जब एक संपादक को मारने से समाचार पत्र समूह का रुख नहीं बदला, तो आतंकवादी उनकी जगह लेने वाले हर व्यक्ति के पीछे पड़ जाएँगे। लेकिन हिंद समाचार समूह का प्रकाशन जारी रहा।

इसके तीनों समाचार पत्रों की कुल साप्ताहिक प्रसार संख्या 1989 तक लगभग सात लाख प्रतियों तक पहुँच गई थी। यह संगठन उत्तरी भारत के सबसे बड़े समाचार पत्र समूहों में से एक बन गया था, लेकिन इसके कार्यालय तेजी से एक किलेबंद परिसर में बदलते जा रहे थे। इसके परिसरों के आसपास रेत के बंकर, सशस्त्र गार्ड और विशेष बैरियर लगाए गए थे। संपादक अपने साथ हथियार रखते थे। कर्मचारी अजनबियों को यह बताने से बचते थे कि वे कहाँ काम करते हैं। खतरा अब केवल मालिकों तक सीमित नहीं था।

सांप्रदायिक विभाजन के खिलाफ बोलने पर सुमीत सिंह की हत्या

खाालिस्तानी आतंकवादियों ने अपने निशानों को धर्म के आधार पर नहीं बाँटा। अलगाववादी विचारों को चुनौती देने वाले सिख पत्रकार भी उनके निशाने पर थे। सुमीत सिंह 30 वर्षीय पत्रकार थे और अपने परिवार द्वारा स्थापित एक प्रगतिशील पंजाबी साहित्यिक पत्रिका ‘प्रीत लड़ी’ के संपादक थे। वे धर्मनिरपेक्ष राजनीति, सांप्रदायिक सद्भाव और हिंदुओं तथा सिखों के बीच सहयोग का समर्थन करते थे।

22 फरवरी 1984 को खाालिस्तानी आतंकवादियों ने अमृतसर से लगभग 25 किलोमीटर दूर लोपोके गाँव में उन पर हमला किया। सुमीत सिंह के भाई द्वारा हमलावरों से हाथ जोड़कर यह कहने और यह बताने के बावजूद कि सुमीत सिंह खुद एक सिख हैं, उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।

मीडिया रिपोर्टों में उन्हें हिंदू-सिख एकता के समर्थक के रूप में बताया गया। लेकिन खालिस्तानी आतंकियों ने उन्हें गद्दार करार दिया क्योंकि उन्होंने इस विचार को खारिज कर दिया था कि सिखों और हिंदुओं को विरोधी राजनीतिक गुटों में विभाजित होना चाहिए।

उनकी हत्या ने खालिस्तानी आतंकियों के इस अभियान के असली चेहरे को उजागर कर दिया। एक सिख पहचान उस पत्रकार की रक्षा नहीं कर सकी जिसने खाालिस्तान को खारिज कर दिया था। निर्णायक कारक पीड़ित का धर्म नहीं था, बल्कि यह था कि उसके शब्द उग्रवादी मकसद में मदद कर रहे थे या बाधा डाल रहे थे।

बलदेव सिंह मान और सिख वामपंथ का खाालिस्तान विरोध

बलदेव सिंह मान एक और सिख लेखक थे जिनकी राजनीति ने उन्हें सीधे अलगाववादियों के सामने खड़ा कर दिया था। मान एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता और पंजाबी प्रकाशन ‘हीरावल दस्ता’ से जुड़े संपादक थे। उन्होंने खाालिस्तानी हिंसा की निंदा करते हुए और एक धर्मतांत्रिक अलगाववादी राज्य की माँग को खारिज करते हुए लेख लिखे और सार्वजनिक सभाओं को संबोधित किया।

26 सितंबर 1986 की आधी रात से ठीक पहले अमृतसर जिले के हर्षा छीना के पास दो बंदूकधारियों ने मान पर उस समय गोलियाँ चला दीं जब वे एक रिक्शा में यात्रा कर रहे थे। वे अपनी नवजात बेटी को देखने जा रहे थे। मौके पर ही उनकी मौत हो गई। मान की हत्या कम्युनिस्ट नेता दर्शन सिंह कैनेडियन की हत्या के ठीक एक दिन बाद हुई थी। दोनों व्यक्ति सिख थे। दोनों ने खाालिस्तानी उग्रवाद के खिलाफ सार्वजनिक रूप से अभियान चलाया था।

उनकी मौतों ने यह दिखाया कि उग्रवादी सिख कम्युनिस्टों, धर्मनिरपेक्षतावादियों और वर्ग राजनीति के समर्थकों को भी क्यों खत्म करना चाहते थे। ये आवाजें इस दावे का खंडन करती थीं कि यह संघर्ष भारतीय राज्य या हिंदू समुदाय के खिलाफ सिखों द्वारा सामूहिक रूप से लड़ी जा रही लड़ाई का प्रतिनिधित्व करता है। एक सिख का सार्वजनिक रूप से खाालिस्तान का विरोध करना उस आख्यान के लिए विशेष रूप से नुकसानदेह था।

पंजाब के जिलों में रिपोर्टर बने आसान शिकार

लाला जगत नारायण, रमेश चंद्र, सुमीत सिंह और बलदेव सिंह मान की हत्याओं ने अपनी सार्वजनिक पहचान के कारण ध्यान आकर्षित किया। जिला संवाददाताओं के पास वैसी मशहूरियत, संस्थागत सुरक्षा या राजनीतिक पहुँच नहीं थी। उन्हें पहचानना भी आसान था।

एक स्थानीय संवाददाता उन्हीं लोगों के बीच रहता था जिनकी खबरें वह कवर करता था। आतंकवादी उसके घर, कार्यस्थल, परिवार और दैनिक रास्ते को जानते थे। उसे सुबह एक धमकी भरा पत्र मिल सकता था और शाम तक उसका सामना उन लोगों से हो सकता था जिन्होंने वह पत्र भेजा था।

मई 1988 तक ‘इंडिया टुडे’ ने रिपोर्ट दी कि आतंकवादियों ने पिछले सात वर्षों के दौरान पंजाब में कम से कम छह पत्रकारों की हत्या कर दी थी और लगभग एक दर्जन अन्य पर हमला किया था। मृतकों में ज्ञानी जगजीत सिंह, नरेंद्र पाल सिंह और राज्य के सबसे अधिक हिंसा प्रभावित जिलों में काम करने वाले अन्य पत्रकार शामिल थे।

ज्ञानी जगजीत सिंह गुरदासपुर के एक पत्रकार थे, जिनकी एक सशस्त्र हमले में घायल होने के बाद दिसंबर 1986 में अमृतसर के एक अस्पताल में मौत हो गई थी। वे ‘अकाली पत्रिका’ से जुड़े थे।

खाालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा मारे गए हिंद समाचार समूह के कर्मचारियों की एक सूची में जगजीत सिंह नाम के व्यक्ति का भी नाम था। हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि वे अलग-अलग प्रकाशनों में योगदान देने वाले एक ही व्यक्ति थे या दो अलग-अलग व्यक्ति थे।

नरेंद्र पाल सिंह जिन्हें मीडिया में नरिंदर पाल सिंह पाल भी कहा जाता था, तरनतारन से ‘पंजाब केसरी’ और ‘जग बाणी’ के लिए काम करते थे। वे 1987 में मारे गए थे, जब तरनतारन और सीमावर्ती जिले कड़े पहरे वाले समाचार पत्र कार्यालयों से बाहर काम करने वाले रिपोर्टरों के लिए सबसे खतरनाक स्थानों में से एक बन गए थे।

खतरा सिर्फ रिपोर्टिंग के स्तर तक सीमित नहीं था। खबरों के चयन, संपादन और प्रस्तुति के लिए जिम्मेदार डेस्क पत्रकारों को भी निशाना बनाया गया। ‘जग बाणी’ के मुख्य उप-संपादक बंत सिंह की मई 1988 में हत्या कर दी गई थी। एक डेस्क संपादक के रूप में, उन्हें उग्रवादियों की तलाश में गाँवों में जाने की आवश्यकता नहीं थी। उनका कथित अपराध समाचार पत्र में छपने वाली सामग्री से जुड़ा था।

एक महीने बाद 4 जून 1988 को स्कूटर पर आए आतंकवादियों ने होशियारपुर में एक छोटे से स्कूल के बाहर परदुमन सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी, जिसे वे चलाते थे। वे ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ (पीटीआई) और ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के लिए जिले को कवर करते थे और पंजाब आधारित प्रकाशनों में भी योगदान देते थे।

पुलिस ने तुरंत कोई कारण नहीं बताया। हालाँकि मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि खाालिस्तान के खिलाफ लिखने के कारण अन्य पत्रकारों की भी हत्या की गई थी। उस समय परदुमन सिंह को उग्रवाद के दौरान आतंकवादियों द्वारा मारा गया आठवाँ पत्रकार बताया गया था।

अगले ही महीने हिंद समाचार समूह ने अपने समाचार संपादक इंद्रजीत सूद को खो दिया। सूद ने संगठन के भीतर वर्षों बिताए थे और जगत नारायण हत्या मामले की जाँच से जुड़ी मुकदमेबाजी में बचाव पक्ष के गवाह के रूप में भी पेश हुए थे। जुलाई 1988 तक उनके पास एक ऐसी भूमिका थी जो सीधे तौर पर इस बात को प्रभावित करती थी कि समाचार पत्रों में उग्रवादियों की मौतों और आतंकवादी हमलों को कैसे प्रस्तुत किया जाता है।

खाालिस्तान कमांडो फोर्स के चीफ लाभ सिंह की हत्या के बाद जालंधर में समूह के कड़े पहरे वाले कार्यालय के पास उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

उग्रवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले मीडिया घरानों ने खुद दावा किया कि लाभ सिंह की मौत की रिपोर्टिंग के दौरान ‘जग बाणी’ में इस्तेमाल की गई भाषा के बदले में सूद की हत्या की गई थी। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, उनकी हत्या इसलिए की गई क्योंकि समाचार पत्र ने एक मरे हुए आतंकवादी का वर्णन उस सम्मान के बिना किया था जिसकी माँग उसके चाहने वाले करते थे।

बिना सुरक्षा के काम करने वाले संवाददाताओं तक फैले हमले

पत्रकारों पर ये हमले 1990 तक उन कस्बों तक फैल गए जहाँ जिला संवाददाता वरिष्ठ संपादकों को उपलब्ध किलेबंद कार्यालयों और व्यापक सुरक्षा के बिना काम करते थे।

नानक चंद नागपाल सुनाम के एक अनुभवी प्रेस रिपोर्टर थे। 1987 के पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के एक फैसले में उनकी पहचान उर्दू दैनिक ‘प्रताप’ के संवाददाता के तौर पर की गई थी और कस्बे से स्थानीय न्यायिक और राजनीतिक घटनाओं की रिपोर्टिंग में उनकी भूमिका दर्ज की गई थी। 1990 में संगरूर जिले में उनके घर के पास उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

जालंधर समाचार पत्र समूह के जगराँव बेस्ड पत्रकार भाग सिंह खेला की सितंबर 1990 में शेरपुर कलाँ गाँव में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस समय की मीडिया रिपोर्टों में उल्लेख किया गया था कि वे एक कार्यरत पत्रकार थे जिनकी पंजाब में एक खास हिंसा वाले सप्ताह में हत्या कर दी गई थी।

वामपंथी समाचार पत्र ‘नवाँ ज़माना’ से जुड़े रिपोर्टर और फोटोग्राफर बलबीर सिंह सग्गू को आतंकवादियों और पुलिस दोनों के दबाव का सामना करना पड़ा था। 1988 की इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि आतंकवादियों ने उन्हें कई साल पहले स्वर्ण मंदिर के पास अपना फोटोग्राफी स्टूडियो बंद करने के लिए मजबूर किया था। एक असाइनमेंट को कवर करने के दौरान पुलिस ने भी उनके साथ बदसलूकी की थी।

12 नवंबर 1990 को अमृतसर में गुरु नानक देव विश्वविद्यालय परिसर में सशस्त्र खाालिस्तानी आतंकवादियों ने सग्गू की गोली मारकर हत्या कर दी। उसी हमले में ‘पंजाब केसरी’ से जुड़े पत्रकार नरेंद्र शर्मा घायल हो गए थे।

अमर नाथ वर्मा की हत्या 8 फरवरी 1991 को कर दी गई थी। संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश विभाग के उस वर्ष के मानवाधिकार मूल्यांकन में उनकी पहचान एक पत्रकार और साप्ताहिक ‘कौमी बुलहारा’ के संपादक के रूप में की गई थी और कहा गया था कि आतंकवादियों ने उनकी हत्या कर दी थी।

ये हत्याएँ सजा की एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा थीं जिसमें पत्रकारों को खाालिस्तान की आलोचना करने, उनके बयानों को छापने से इनकार करने, किसी आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करने या बहिष्कार के तहत रखे गए प्रकाशन के लिए काम करने के कारण मारा जा सकता था।

हिंद समाचार के हॉकर और एजेंट भी निशाने पर थे

हिंद समाचार समूह ने सबसे लंबे समय तक चले इस अभियान का सामना किया। 1989 तक समूह ने अपने संस्थापक, उनके बेटे और सात संपादकीय कर्मचारियों को खो दिया था। इसके बाद आतंकवादियों ने अपनी रणनीति बदल दी। केवल संपादकों और रिपोर्टरों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, उन्होंने उस व्यवस्था पर हमला करना शुरू कर दिया जो समाचार पत्रों को प्रिंटिंग प्रेस से पाठक तक ले जाती थी।

जून 1989 में खाालिस्तान कमांडो फोर्स के आतंकवादियों ने अपने तीनों समाचार पत्रों का प्रकाशन बंद करने के आदेश को मानने से इनकार करने के बाद हिंद समाचार के कर्मचारियों और समाचार पत्र विक्रेताओं पर हमला किया। चंडीगढ़ के पास दो हमलों में चार कर्मचारी मारे गए।

अगले कुछ हफ्तों में हुए हमलों की सीरीज के दौरान अखबार बाँटने वाले सात कर्मचारियों की मौत हो गई, जिनमें किशोर छात्र भी शामिल थे। लुधियाना में जब हॉकर अखबारों के बंडल खोल रहे थे, तब एक बम विस्फोट हुआ जिसमें लगभग एक दर्जन लोग घायल हो गए।

पुलिसकर्मियों ने साइकिलों पर अखबार विक्रेताओं के साथ जाना शुरू कर दिया। अखबार डिस्ट्रीब्यूशन वाले रूट की सुरक्षा के लिए हर सुबह सैकड़ों पुलिसकर्मियों को तैनात किया जाता था। लगभग 30 हॉकरों ने काम करना बंद कर दिया, जबकि प्रसार संख्या में कथित तौर पर लगभग 60,000 प्रतियों की गिरावट आई।

पीड़ित केवल पत्रकार नहीं थे। हिंद समाचार समूह के नुकसान में शामिल लोगों में संपादक, रिपोर्टर, हॉकर, एजेंट, ड्राइवर, वितरक और सुरक्षाकर्मी शामिल थे। उनके काम अलग-अलग थे, लेकिन उन्हें निशाना बनाए जाने का कारण एक ही था। प्रत्येक ने आतंकवादियों के आदेश के बावजूद समाचार पत्रों को जनता तक पहुँचाने में मदद की कि उन्हें बंद कर दिया जाए।

18 जुलाई 1990 को गरांव के पास फिरोजपुर की ओर जा रही हिंद समाचार के समाचार पत्र वितरण वाहन पर बंदूकधारियों ने हमला कर दिया। तीन पुलिस गार्डों सहित अंदर सवार सभी पाँचों लोग मारे गए। हिंद समाचार समूह से जुड़े लगभग 40 विक्रेता, एजेंट और हॉकर मारे गए। इसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत कर्मचारियों को मारना नहीं था। इसका उद्देश्य प्रकाशन को आर्थिक और भौतिक रूप से असंभव बनाना था।

आतंकवादियों ने यह तय करने की कोशिश की कि किन शब्दों का इस्तेमाल करें पत्रकार

पत्रकारों पर हमलों के साथ-साथ लिखित आदेश, टेलीफोन पर धमकियाँ और कथित आचार संहिता भी जारी की गई। आतंकवादियों के बयानों में अक्सर यह चेतावनी होती थी कि समाचार पत्रों को उनके बयानों को पूरा छापना होगा। संपादन करने, छोटा करने या दावों पर सवाल उठाने पर सजा मिल सकती थी। पत्रकारों को अधिकारियों के दबाव का भी सामना करना पड़ा, जिन्होंने पुलिस के दुर्व्यवहार या उग्रवाद विरोधी अभियान में विफलताओं के बारे में रिपोर्टों पर आपत्ति जताई।

रिपोर्टर एक तरफ उस प्रशासन के बीच फंसे थे जो अनुकूल कवरेज चाहता था और दूसरी तरफ आतंकवादियों के बीच जो मानते थे कि उनके पास संपादकों को मौत की सजा देने का अधिकार है।

नवंबर 1990 में सोहन सिंह के नेतृत्व वाली पंथिक कमेटी ने पत्रकारों, संपादकों और स्तंभकारों के लिए एक कोड जारी किया। खाालिस्तान के लिए अभियान चलाने वालों को ‘उग्रवादी’ या ‘स्वतंत्रता सेनानी’ कहा जाना था, न कि आतंकवादी। सरकारी जनसंपर्क अधिकारियों को हिंदी या अंग्रेजी में सामग्री जारी न करने का आदेश दिया गया।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इस फरमान में घोषणा की गई कि आपस में जुड़े 5 आतंकवादी संगठनों के नेता किसी पत्रकार या संपादक को मौत की सजा सुना सकते हैं। पंथिक कमेटी यह तय करेगी कि सजा पर अमल किया जाए या नहीं और वह किसी भी अपील पर सुनवाई भी करेगी।

उग्रवादियों ने आरोप लगाने, सजा सुनाने और उस पर अमल करने की अपनी व्यवस्था बना ली थी। एक पत्रकार को उसी संगठन द्वारा दोषी ठहराया जा सकता था जिसकी वह रिपोर्टिंग कर रहा था, जिसमें धमकी और गोली के बीच कोई कानून, सबूत या स्वतंत्र प्राधिकरण खड़ा नहीं था।

प्रसारण शब्दावली को लेकर राजेंद्र कुमार तालिब की हत्या

पत्रकारों को निशाना बनाने का खालिस्तानी आतंकियों का यह अभियान जल्द ही निजी स्वामित्व वाले समाचार पत्रों से ऑल इंडिया रेडियो तक फैल गया। चंडीगढ़ में ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन निदेशक राजेंद्र कुमार तालिब एक सम्मानित उर्दू कवि भी थे। 6 दिसंबर 1990 को दो आतंकवादी उनके घर में घुसे और उनकी गोली मारकर हत्या कर दी।

सोहन सिंह के नेतृत्व वाली पंथिक कमेटी का समर्थन करने वाले पाँच संगठनों ने कुछ ही दिनों में जिम्मेदारी ली। समूहों ने कहा कि उनकी तालिब से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी और उन्होंने उनकी हत्या को ‘ऑपरेशन मातृभाषा’ का पहला चरण बताया।

उनकी शिकायत यह थी कि ऑल इंडिया रेडियो ने उनके द्वारा थोपे गए भाषा कोड का पालन नहीं किया था। ‘इंडेक्स ऑन सेंसरशिप’ के एक अध्ययन में यह भी दर्ज किया गया कि तालिब के हत्यारों ने अपने सशस्त्र अभियान को संदर्भित करते हुए ‘आतंकवादी’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई थी। उनकी हत्या का उद्देश्य यह प्रदर्शित करना था कि खाालिस्तानी संगठन एक सार्वजनिक प्रसारक द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा तय कर सकते हैं।

आतंकवादी कोड लागू करने के लिए ML मनचंदा का अपहरण

प्रसारण पर नियंत्रण हासिल करने का सबसे बर्बर प्रयास मई 1992 में हुआ। एमएल मनचंदा पटियाला में ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन निदेशक थे। 18 मई 1992 को बब्बर खालसा के आतंकियों ने उनका अपहरण कर लिया और सरकार के सामने माँगें रखीं।

संगठन चाहता था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उनकी आचार संहिता को लागू करे। माँगों में हिंदी और अन्य गैर-पंजाबी कार्यक्रमों को बंद करना शामिल था। उग्रवादियों ने आतंकवादी हमलों को अंजाम देने वालों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली शब्दावली पर भी आपत्ति जताई और टेलीविजन प्रसारकों के पहनावे और प्रस्तुति पर नियम थोपने की कोशिश की।

वार्ता जारी रहने के दौरान मनचंदा को बंधक बनाकर रखा गया। सरकार द्वारा माँगों को स्वीकार किए बिना समय सीमा समाप्त हो गई। 27 मई को बब्बर खालसा के आतंकवादियों ने उनकी हत्या कर दी और उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। उनका धड़ पंजाब में मिला, जबकि उनका कटा हुआ सिर हरियाणा के अंबाला में मिला।

सरकार द्वारा संगठन की समय सीमा का पालन करने में विफल रहने के बाद मनचंदा की हत्या कर दी गई थी। बब्बर खालसा ने इस हत्या का दावा किया और इसे मीडिया कोड लागू करने के अपने प्रयास से खुले तौर पर जोड़ा। कई अन्य मामलों के विपरीत, जहाँ जिम्मेदारी विवादित रही या बंदूकधारी बिना पहचान के भाग निकले, मनचंदा की हत्या के पीछे का उद्देश्य सार्वजनिक रूप से घोषित किया गया था।

आतंकवादियों ने एक सरकारी रेडियो स्टेशन के निदेशक का अपहरण कर लिया था, संपादकीय और भाषाई नीति पर बातचीत की थी और राज्य द्वारा आत्मसमर्पण न करने पर उनकी हत्या कर दी थी।

इस हत्या के विरोध में ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन के कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया। फिर भी इस खौफ का असर दिखाई दिया। प्रसारण प्रथाएँ बदल गईं, हिंदी कार्यक्रमों को हटा दिया गया और अधिकारी आतंकवादी फरमानों का उल्लंघन करने के बारे में तेजी से सावधान हो गए।

दुश्मन बनने के लिए किसी पत्रकार को हथियार उठाने की जरूरत नहीं थी

लाला जगत नारायण की 1981 में हत्या और 1992 में एमएल मनचंदा का सिर कलम किए जाने के बीच सूचना का निर्माण और वितरण करने वाले लोगों के खिलाफ एक निरंतर अभियान चला।

निशाने के अनुसार तरीके बदलते गए। संपादकों की हत्या की गई। जिला रिपोर्टरों पर उनके घरों के पास हमले किए गए। रेडियो अधिकारियों को गोली मार दी गई या उनका अपहरण कर लिया गया। अखबार के बंडल इकट्ठा करते समय हॉकरों को मार दिया गया। डिलीवरी वाहनों पर घात लगाकर हमला किया गया। न्यूज़रूम को निर्देश और मौत की धमकियाँ देने वाले पत्र मिले।

मूल माँग एक ही रही: आत्मसमर्पण करो। किसी भी प्रकाशन से खाालिस्तानी संगठनों द्वारा चुनी गई शब्दावली का उपयोग करने की उम्मीद की जाती थी। उग्रवादी बयानों को बिना किसी बदलाव के छापना पड़ता था। अलगाववाद की आलोचना को विश्वासघात माना जा सकता था। आतंकवादी अत्याचारों की कवरेज से बहिष्कार या हत्या हो सकती थी। यहाँ तक कि किसी नापसंदगी वाले अखबार का डिस्ट्रीब्यूशन भी दंडनीय बन गया।

इसका प्रभाव उन व्यक्तिगत प्रकाशनों से परे गया जिनके कर्मचारियों की हत्या की गई थी। धमकियों ने स्व-सेंसरशिप को बढ़ावा दिया, प्रभावित जिलों से रिपोर्टिंग को कमजोर किया और उग्रवादी दावों को कम जांच के साथ प्रसारित होने दिया।

फिर भी समाचार पत्र छपते रहे। हॉकर सशस्त्र सुरक्षा के बीच अपने रास्तों पर लौटे। संपादक किलेबंद दीवारों के पीछे से काम करते रहे। रिपोर्टर उन कस्बों से अपनी रिपोर्ट भेजते रहे जहाँ हर कोई उनका नाम और पता जानता था।

जगत नारायण की हत्या इसलिए की गई क्योंकि उनके छपे हुए शब्दों ने आतंकवादी अलगाववाद के उभार को चुनौती दी थी। रमेश चंद्र की हत्या इसलिए की गई क्योंकि उनके पिता की मौत अखबार को खामोश करने में विफल रही थी। सुमीत सिंह और बलदेव सिंह मान की सिख होने के बावजूद हत्या कर दी गई क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिक विभाजन और खाालिस्तान को खारिज कर दिया था। राजेंद्र कुमार तालिब को इसलिए गोली मारी गई क्योंकि एक प्रसारक ने उस शब्दावली का इस्तेमाल किया जिसका उग्रवादियों ने विरोध किया था। एमएल मनचंदा का सिर इसलिए कलम कर दिया गया क्योंकि ऑल इंडिया रेडियो अपनी भाषा और संपादकीय नीति बब्बर खालसा के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेगा।

वे राइफल लेकर नहीं चलते थे और न ही सुरक्षा बलों की कमान संभालते थे। उनका अपराध हथियारों वाले आतंकियों की सत्ता को स्वीकार किए बिना संपादन, रिपोर्टिंग, प्रकाशन या प्रसारण करना था।

पंजाब उग्रवाद का कोई भी इतिहास उन पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को शामिल किए बिना पूरा नहीं हो सकता, जिन्होंने खाालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा यह घोषणा किए जाने के बाद भी प्रकाशन जारी रखा कि एक कॉलम, शीर्षक, प्रसारण या समाचार पत्र का बंडल मौत की सजा दे सकता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

किसी का फोकस ‘अंबेडकरवाद’ पर, किसी का ‘फ्री फिलिस्तीन’ पर: CJP प्रदर्शन से पनपे ‘इंफ्लुएंसर्स’ का अपना-अपना एजेंडा, जानिए कंटेंट की माइनिंग कर कैसे कमाए लाखों फॉलोअर्स

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर टिका कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन आखिरकार अपनी माँग पूरी होने के बाद खत्म हो गया। करीब डेढ़ महीने तक चले इस तथाकथित ‘छात्र आंदोलन’ ने सिर्फ राजनीति ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर भी कई नए चेहरे खड़े कर दिए। इस दौरान कई पुराने इंफ्लुएंसर्स ने अपने लिए भरपूर कंटेन्ट तैयार किया, वहीं कई ऐसे लोग भी थे जिन्हें पहचान ही इस प्रदर्शन ने दिलाई।

किसी ने पीएम नरेंद्र मोदी को गाली देकर वायरल हुआ, किसी ने मीडिया को निशाना बनाकर फॉलोवर्स जुटाए, किसी ने प्रदर्शनकारियों को खाना खिलाने के वीडियो बनाए तो किसी ने पुलिस से बहस और टकराव को अपना कंटेन्ट बना लिया।

इनमें मोहम्मद जुनैद, हर्षित, उज्जवल, रिया अहिर और नीशू जैसे तथाकथित इंफ्लुएंसर्स शामिल हैं। जिनकी पोस्ट पर पहले दो-चार लाइन भी मुश्किल से आते थे, आज वही लाखों फॉलोअर्स के साथ मिलियन में रीच हासिल कर रहे हैं। पिछले डेढ़ महीने में इंस्टाग्राम के बदले हुए एल्गोरिदम ने भी इनकी लोकप्रियता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई।

चिंता की बात यह है कि इन सभी का कंटेन्ट किसी न किसी एजेंडे के इर्द-गिर्द घूमता है। ऐसे में इन्हें फॉलो करने वाले लाखों युवा भी धीरे-धीरे उसी सोच और उसी नैरेटिव से प्रभावित हो सकते हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से मिली लोकप्रियता ने इन लोगों को बड़ा मंच तो दे दिया है, लेकिन यह देखना भी जरूरी है किस उस मंच का इस्तेमाल किस मकसद और किस दिशा में किया जा रहा है।

नीशु आजाद

इस प्रदर्शन में ‘जय भीम’ के नारे तो जमकर लगे। प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले दलित समाज से आने वाले अभिजीत दिपके ने भी खुद को ‘अंबेडकरवादी’ विचारधारा का प्रतिनिधि बताते हुए इसी सोच को आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनाया। लेकिन इसी प्रदर्शन से 15 साल की नीशू आजाद भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

नीशू का पहला वायरल वीडियो वही था, जिसमें वह एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शिक्षा पर सवाल कर रही हैं, वहीं दूसरी वीडियो में वह CBSE और NEET की फुलफॉर्म तक नहीं बता पा रही थी। हैरानी की बात यह थी कि वह खुद 10वीं कक्षा की छात्रा है और उसी CJP प्रदर्शन का हिस्सा बनी हुई थी, जो NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों को लेकर चलाया जा रहा था।

ऐसे में सोशल मीडिया पर कई लोगों ने नीशू को ट्रोल करना शुरू कर दिया। इसके बाद नीशू ने CJP प्रदर्शन के मंच पर जगह पाने के लिए अपने पिता पर हमले की खबर फैलाई। नीशू ने रोते हुए वीडियो बनाया कि उनके पिता को मारने वाले लोग ‘बीजेपी के अंधभक्त’ हैं, बिना उनकी नाम-पहचान जाने नीशू ने यह नैरेटिव गढ़ा और प्रदर्शन में शामिल लोगों को बीजेपी के खिलाफ भड़काया। यह देखा भी गया कि धीरे-धीरे यह प्रदर्शन शिक्षा व्यवस्था के नाम पर नहीं, बल्कि बीजेपी बनाम CJP हो गया, जिसमें विपक्षी दलों के अमूमन हर चेहरे ने भाग लिया।

नीशू आजाद यहीं नहीं रुकी। और ज्यादा वायरल होने के लिए नीशू ने मीडियाकर्मियों को बयान देते हुए खुद को हिंदुओं के खिलाफ जहर तक उगला और एक दलित समाज से आते हुए भी नीशू खुद को ‘हिंदू’ मानने से इनकार कर दिया। और इतना ही नहीं, प्रदर्शन के अंत दिनों में नीशू का एक और वीडियो सामने आता है, जिसमें वह हाथ में समोसा दिखाते हुए लोगों को ‘मोदी की तेरहवीं’ का खाना खाने को कहती है।

वैसे तो इस लोकप्रियता के बाद अब नीशू के 383K फॉलोअर्स हैं, लेकिन यह जान लेते हैं कि प्रदर्शन से वायरल इंफ्लुएंसर बनी नीशू इस प्रदर्शन से पहले क्या कर रही थी? उसकी इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर नजर डालें तो प्रदर्शन से पहले भी नीशू का अधिकतर कंटेन्ट उन लोगों को रोस्ट करने पर केंद्रित था, जो हिंदू हितों की बात करते हैं। इस कंटेन्ट पर भी नीशू को ठीक-ठाक व्यूज आ जाते थे।

लेकिन इस तरह के कंटेन्ट पर शिफ्ट होने की वजह यह थी कि नीशू जब केवल ‘अंबेडकरवाद’ का बखान कर रही थी, तब उन्हें कोई नहीं पूछता था और तब वही किसी तरह की भी ‘इंफ्लुएंसर’ की कैटेगरी में उन्हें नहीं गिना जाता था।

मोहम्मद जुनैद

अभी अगर गूगल पर टाइप करें कि ‘कौन है जुनैद?’ तो गूगल का SEO आपको सबसे पहले जंतर-मंतर के CJP प्रदर्शन से वायरल हुए ‘जुनैद भाई’ के बारे में कंटेन्ट दिखेगा। ये जुनैद भाई वैसे तो एक मामूली वकील है, लेकिन प्रदर्शन में लोगों को मुफ्त खाना-पानी, मुफ्त दवाइयाँ देते जब इनकी वीडियो वायरल हुईं, तो कब ये सोशल मीडिया पर 1 मिलियन फॉलोअर के साथ इंफ्लुएंसर बन गए पता ही नहीं लगा।

मोहम्मद जुनैद की इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखें, तो आज उनका हर वीडियो मिलियंस व्यूज पार कर रहा है। जुनैद के इंस्टाग्राम पर केवल CJP प्रदर्शन का ही कंटेन्ट दिखाई देता है, इससे पता लगता है कि वह भी CJP प्रदर्शन का एक मुख्य चेहरा रहे हैं। प्रदर्शन में CJP ने जुनैद को अपनी ‘सेकुलर’ विचारधारा पेश करने के लिए इस्तेमाल किया, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शन में जय श्री राम के नारों पर बवाल के वीडियो भी खूब सामने आए।

प्रदर्शन के बाद इंफ्लुएंसर के रूप में उभरे मोहम्मद जुनैद का अब रोना सामने आ रहा है, जब पुलिस ने उनसे पूछताछ शुरू की है। पूछताछ भी इसीलिए जिस पर लोगों ने शक जताया है, शक यह है कि एक मामूली वकील के तौर पर जुनैद ने हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों के लिए खाने की सुविधा कैसे जुटाई? पुलिस जब जुनैद को पूछताछ के लिए ले गई तो उन्होंने अपनी सोशल मीडिया रीच का इस्तेमाल कर इसे बवाल बनाकर पेश किया। मीडिया में रोते हुए खूब इंटरव्यू भी दिए।

अब बात करें कि जुनैद प्रदर्शन से पहले क्या कर रहे थे, तो इनका पास्ट रिकॉर्ड ‘आंदोलनजीवी’ का ही रहा है। जुनैद की इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखें तो वह पहले भी ‘फ्री फिलिस्तीन’ के प्रदशनों, बाबरी मस्जिद को दोबारा खड़ा करने, माँस की दुकानों को बंद करने का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरे हैं। दूसरी तरफ जुनैद अपने सोशल मीडिया पर पंडित धीरेंद्र शास्त्री जैसे हिंदू संतों का भी मजाक उड़ाते हैं। लेकिन CJP प्रदर्शन का चेहरा बनने से पहले उनका ये कंटेन्ट उतना वायरल नहीं था।

LGBTQ के उज्जवल और हर्षित

16 जून 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के पहले ही दिन LGBTQ समाज के दो चेहरे वायरल होते हैं। इनमें एक का नाम उज्जवल और दूसरे का नाम है हर्षित। छात्रों के इस प्रदर्शन में दोनों का एक वीडियो वायरल होता है, जिसमें उनकी पहचान को लेकर रिपोर्टर सवाल पूछता है तो दोनों बिफर जाते हैं। इस वायरल वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर कहीं न कहीं उन्हें एक वायरल कंटेन्ट के रूप में पहचान मिल जाती है और इसके जरिए दोनों ने खूब फॉलोवर्स भी इकट्ठा कर लिए।

CJP प्रदर्शन में भी यूट्यूब चैनलों और कई मीडिया संस्थानों ने उज्जवल और हर्षित के जमकर इंटरव्यू किए, जो उनकी लोकप्रियता बढ़ाने का जरिया बना। एक वीडियो में उज्जवल यह भी कहते नजर आए, “आपने मुझे मीठा बोल दिया… लेकिन एप्पल का फोन बनाने वाला टिम कुक भी गे है, ChatGPT का फाउंडर भी गे ही है, AI का फाउंडर भी गे ही है, इसीलिए हम लोग आपसे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं।”

सोशल मीडिया फॉलोइंस की बात करें तो उज्जवल के अब इंस्टाग्राम पर 17.6K फॉलोअर्स और हर्षित के 134K फॉलोअर्स हैं। पहचान की बात करें तो हर्षित खुद को एक कलाकार और उज्जवल 19 वर्षीय एक छात्र बताता है। सोशल मीडिया गतिविधियों से पता लगता है कि दोनों ही ‘ट्रांसजेंडर बिल’ का विरोध भी कर चुके हैं। लेकिन CJP प्रदर्शन से मिली सोशल मीडिया पर लोकप्रियता अब उनकी एकमात्र पहचान बन चुकी है।

रिया अहिर

जंतर-मंतर की तर्ज पर ही मुंबई में हुए प्रदर्शनों से भी एक चेहरा सामने आया, जो अब खूब वायरल है। रिया अहीर, ये वो लड़की है जिनकी पुलिस वैन को एक हाथ से रोकते तस्वीर सामने आई थी। जो रोकने का प्रयास कम और फोटोशूट ज्यादा लग रहा था। दिलचस्प बात यह है कि रिया पेशे से मॉडल ही हैं। शायद यह बात उनको भी नहीं मालूम थी कि उनकी यह तस्वीर इतनी वायरल हो जाएगी कि मीडिया में इंटरव्यू देने पड़ेंगे। लोगों ने उनकी ये तस्वीर ‘महिला शक्ति’ के रूप में प्रस्तुत की।

अब वे इस तस्वीर के पीछे संघर्ष की ‘मनगढ़ंत’ कहानी पूरे मीडिया में सुना रही हैं। रिया का कहना है कि जब उन्होंने देखा कि प्रदर्शनकारियों को पुलिस वैन में भरकर ले जाया जा रहा है, तो वह पुलिस वैन के आगे आकर उसे रोकने लग गईं। और हैरानी की बात तो यह है कि तभी उनके कैमरामैन ने वो तस्वीर खींच ली, जिसे शेयर कर अब ‘महिला शक्ति’ का उदाहरण पेश कर रहे हैं।

खैर रिया अहीर को प्रदर्शनों में मिली लोकप्रियता से उनके फॉलोअर्स की काउंटिंग अब 275K पहुँच गई है। उनका हालिया कंटेन्ट बेशक CJP प्रदर्शन की आवाज बनने और वायरल तस्वीर के फेम में दिए गए इंटरव्यू को लेकर हो, लेकिन बात करें उनके सोशल मीडिया के पास्ट रिकॉर्ड की तो उनका कंटेन्ट अधनग्न तस्वीरें अपलोड करना है। यहाँ तक कि ऐसी और तस्वीरें देखनी हैं तो उन्होंने ₹149 का इंस्टाग्राम सब्सक्रिप्शन प्लान भी चालू किया है, जिसमें उनके 9250 सब्सक्राइबर्स भी हैं। कुल बात यह है कि ‘महिला शक्ति’ का उदाहरण बनने वाली रिया अहीर सोशल मीडिया पर ‘सॉफ्ट पॉर्न’ बेचती हैं।

निष्कर्ष: कौन तय करेगा सोशल मीडिया की नई दिशा?

कुल मिलाकर, CJP का यह प्रदर्शन सिर्फ सड़कों पर हुआ एक आंदलन नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया के लिए एक ऐसा मंच बन गया, जहाँ कई नए इंफ्लुएंसर्स पैदा हो गए। इन लोगों ने आंदोलन के हर पल को कंटेन्ट बनाया और देखते ही देखते लाखों लोगों तक अपनी पहुँच बना ली। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ये लोग वायरल कैसे हुए, बल्कि इससे भी बड़ी सवाल यह है कि वायरल होने के बाद ये अपने उस प्रभाव का इस्तेमाल किस मकसद के लिए कर रहे हैं।

इनमें से कोई ‘अंबेडकरवाद’ के नाम पर अपनी बात रख रहा है, कोई ‘फ्री फिलिस्तीन’ जैसे मुद्दों को आगे बढ़ा रहा है, कोई हिंदुओं के खिलाफ बयान देकर लोकप्रियता कमा रहा है, तो कई LGBTQ की राजनीति को अपनी पहचान बना रहा है। हर किसी का अपना-अपना एजेंडा है, लेकिन सोशल मीडिया पर इन सबकी पहुँच अब लाखों युवाओं तक हो चुकी है। ऐसे में इनके हर वीडियो और हर बयान का असर भी उतनी ही तेजी से फैल रहा है।

जरूरी नहीं कि इनके हर फॉलोअर अंबेडकरवादी हों, फ्री फिलिस्तीन का समर्थन करते हों या LGBTQ की विचारधारा से जुड़े हों। लेकिन जब किसी युवा की सोशल मीडिया फीड पर रोज़-रोज़ एक ही तरह का कंटेन्ट दिखाई देता है, तो धीरे-धीरे वही सोच सामान्य लगने लगती है। यही सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ा खतरा भी। लोग कब किसी विचार को समझकर नहीं, बल्कि सिर्फ बार-बार देखकर स्वीकार करने लगते हैं, इसका उन्हें खुद भी पता नहीं चलता।

यही वजह है कि इस पूरे प्रदर्शन का सबसे बड़ा असर शायद सड़कों पर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर देखने को मिलेगा। इस आंदोलन ने कुछ ऐसे इंफ्लुएंसर्स को जन्म दिया है, जिनकी सबसे बड़ी पहचान किसी उपलब्धि से नहीं, बल्कि विवाद, टकराव और एजेंडा आधारित कंटेन्ट से बनी है। आने वाले समय में ये चेहरे सिर्फ वायरल वीडियो नहीं बनाएँगे, बल्कि लाखों युवाओं की सोच और नैरेटिव को भी प्रभावित करने की कोशिश करेंगे। यही इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी चिंता है।