भारत में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) और धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) जैसे कड़े कानूनों के बाद विदेशी फंडिंग से जुड़े कई नेटवर्क्स जाँच के दायरे में आए हैं। जैसे-जैसे कानूनी कार्रवाई बढ़ी, वैसे-वैसे कुछ समूहों ने खुद को पीड़ित बताकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ नैरेटिव खड़ा करना शुरू किया।
इसी कड़ी में आर्चबिशप जोसेफ डिसूजा (Archbishop Joseph D’Souza) का नाम भी सामने आया। डिसूजा ने भारत में वित्तीय जाँच की तुलना नाजी जर्मनी में यहूदियों के उत्पीड़न से कर दी। खुद को दलितों और वंचितों की आवाज बताने वाले डिसूजा पर विदेशी फंडिंग, वित्तीय गड़बड़ियों और जाँच एजेंसियों की कार्रवाई को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इस रिपोर्ट में हम जोसेफ डिसूजा के अतीत, उनके पारिवारिक फ्रॉड, वित्तीय घोटालों, ईडी और सीआईडी की जाँच, राजनीतिक साठगांठ और उनके भारत विरोधी टूलकिट की हर परत को बेनकाब करेंगे।
जोसेफ डिसूजा का अतीत: पारिवारिक पृष्ठभूमि और धर्मांतरण का सच
जोसेफ डिसूजा और उनके पश्चिमी सहयोगियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार यह नैरेटिव बेचा जाता है कि वे भारत के किसी शोषित, पिछड़े या अछूत वर्ग से धर्मांतरित होकर ईसाई बने हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि वे खुद को भारत के दलितों का ‘स्वाभाविक और प्रामाणिक प्रतिनिधि’ साबित कर सकें और विदेशी दाताओं से सहानुभूति बटोर सकें। लेकिन ऐतिहासिक, वंशावली और दस्तावेजी तथ्य इस पूरे विमर्श को एक सुनियोजित झूठ साबित करते हैं।
कुलीन ईसाई परिवार में जन्म और ‘ईसाई गेटोज’ का सच
जोसेफ डिसूजा का जन्म किसी गरीब, वंचित या सामाजिक रूप से पिछड़े परिवार में नहीं हुआ था। वे एक अत्यधिक समृद्ध, आर्थिक रूप से मजबूत और ऊँची जाति के पारंपरिक ईसाई परिवार में पैदा हुए थे। कई अवसरों पर वे खुद स्वीकार करते हैं कि उनका बचपन ‘ईसाई गेटोज’ (Christian Ghettos) यानी विशिष्ट, संपन्न ईसाई बस्तियों में बीता था, जो चारों ओर से निचली जातियों और गरीब दलित आबादी से घिरी हुई थीं। यानी वे बचपन से ही उस शोषित वर्ग से अलग एक विशेषाधिकार प्राप्त जीवन जी रहे थे, जिसका मुखौटा वे आज ओढ़े हुए हैं।
वंशावली का सच: गोवा के ‘गौड़ सारस्वत ब्राह्मण’
पारिवारिक इतिहास और वंशावली संबंधी रिकॉर्ड के अनुसार, जोसेफ डिसूजा का व्यक्तिगत रूप से हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तन का कोई इतिहास नहीं है। उनका परिवार पीढ़ियों से ईसाई है। वे मूल रूप से कर्नाटक के मूडुबेले के प्रसिद्ध ‘मुदर्था’ (Mudartha) परिवार के वंशज हैं।
इस वंश का इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि ये मूल रूप से गोवा के उच्च-जाति ‘गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों’ से जुड़े थे। पुर्तगाली शासन के क्रूर दौर के दौरान इस ब्राह्मण परिवार को जबरन ईसाई धर्म में परिवर्तित किया गया था।
बाद में, 1591 के भीषण अकाल के दौरान यह परिवार गोवा से दक्षिण की ओर (तटीय कर्नाटक) पलायन कर गया। 19वीं और 20वीं शताब्दी के दौरान सामाजिक और औपनिवेशिक लाभ के लिए इस परिवार ने अपना मूल उपनाम बदलकर ‘डिसूजा’ (D’Souza) रख लिया। इस प्रकार, जोसेफ डिसूजा जन्मजात ईसाई हैं और उच्च-जाति पृष्ठभूमि से आते हैं। उनका खुद को ‘दलित पृष्ठभूमि’ का दिखाना केवल विदेशी चंदा उगाहने का एक व्यावसायिक पैंतरा है।
शैक्षणिक जीवन और पारिवारिक ढाँचा
जोसेफ ने कर्नाटक विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान में स्नातक किया। इसके बाद वे पूरी तरह से मिशनरी गतिविधियों में शामिल हो गए। उन्होंने फिलीपींस के ‘एशियन थियोलॉजिकल सेमिनरी’ से संचार में एम.ए. किया। बाद में उन्हें ‘गॉस्पेल फॉर एशिया बिब्लिकल सेमिनरी’ से ‘मानद डॉक्टर ऑफ डिविनिटी’ की डिग्री दी गई, जो इस नेटवर्क के भीतर रसूख बढ़ाने का एक सामान्य जरिया है।
जोसेफ ने मरियम नाम की एक आदिवासी महिला से विवाह किया (जिसका शुरुआती दौर में उनके परिवार और दोस्तों ने उनकी उच्च पृष्ठभूमि के कारण विरोध भी किया था)। आज इनका यह पारिवारिक ढांचा पूरी तरह से एक पारिवारिक कॉर्पोरेट में बदल चुका है; उनकी बेटी, बेरिल डिसूजा, उनके द्वारा ही संचालित और विदेशी फंड से पोषित ‘डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क’ (DFN) में चिकित्सा और मानव तस्करी विरोधी विभाग की वैश्विक निदेशक के रूप में कार्य करती है और ऊंचे वेतन व भत्ते उठाती है।
ओएम इंटरनेशनल, ओएम इंडिया, गुड शेफर्ड और DFN का वैश्विक त्रिकोणीय ढाँचा
जोसेफ डिसूजा के साम्राज्य को समझने के लिए उनके संगठनों के वैश्विक और घरेलू ताने-बाने को समझना आवश्यक है। यह कोई साधारण धार्मिक संस्था या सामान्य चर्च नहीं है, बल्कि यह एक बहु-स्तरीय, अत्यधिक परिष्कृत कॉर्पोरेट मिशनरी नेटवर्क है:
A: ओएम इंटरनेशनल (OM International) से ओएम इंडिया (OM India)
जोसेफ डिसूजा ने अपने करियर की शुरुआत जॉर्ज वेरवर के वैश्विक और अत्यधिक प्रभावशाली संगठन ‘ऑपरेशन मोबिलाइजेशन’ (OM International) के भारतीय प्रभाग ‘ओएम इंडिया’ से की थी। ओएम इंटरनेशनल यूके की चैरिटी कमिशन (UK Charity Commission – OM International) के तहत पंजीकृत एक विशाल वैश्विक नेटवर्क है।
डिसूजा इस वैश्विक संस्था के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद तक पहुँचे और 2012 में इसके भारतीय प्रभाग (OM India) के CEO बने।
साल 2014 में एक रणनीतिक कदम के तहत, ‘ओएम इंडिया’ ने अंतरराष्ट्रीय मूल संस्था से तकनीकी और कानूनी रूप से अलग होने का नाटक किया ताकि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की जांच से बचा जा सके। इस स्वतंत्र प्रभाग को नया नाम दिया गया, ‘गुड शेफर्ड चर्च ऑफ इंडिया’ (Good Shepherd Church of India)। इसके माध्यम से पूरे भारत में चर्चों और स्कूलों का एक समानांतर नेटवर्क खड़ा किया गया, जो विदेशों से सीधे आर्थिक मदद प्राप्त करता था।
B: डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क (Dignity Freedom Network – DFN)
विदेशी धरती से भारत के खिलाफ नैरेटिव सेट करने और बिना किसी रुकावट के चंदा वसूलने के लिए जोसेफ डिसूजा ने साल 2002 में अमेरिका में ‘दलित फ्रीडम नेटवर्क’ की सह-स्थापना की। बाद में जब भारत में इस नाम को लेकर सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हुईं, तो इसका नाम बदलकर ‘डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क’ (DFN) कर दिया गया।
वर्तमान में यह नेटवर्क अमेरिका (DFN USA), ऑस्ट्रेलिया (DFN Australia), कनाडा और यूके में बड़ी ब्रांच के रूप में सक्रिय है। इन देशों की वेबसाइटों और ब्रोशरों पर भारत की एक भयावह तस्वीर बेची जाती है। वहाँ यह दावा किया जाता है कि ‘भारत में दलितों और ईसाइयों को कीड़े-मकौड़ों की तरह मारा जा रहा है और उनके उद्धार का एकमात्र जरिया डीएफएन को दान देना है।’
C: ‘ब्रेकिंग इंडिया’ इकोसिस्टम में DFN की भूमिका
मशहूर शोधकर्ता एवं लेखक राजीव मल्होत्रा और अरविंदन नीलकंदन की प्रसिद्ध पुस्तक ‘Breaking India: Western Interventions in Dalit and Dravidian Faultlines’ में जोसेफ डिसूजा के इस ‘दलित फ्रीडम नेटवर्क’ (DFN) का बेहद बारीकी से खोजी विश्लेषण किया गया है।
पुस्तक में अकादमिक साक्ष्यों के साथ यह प्रमाणित किया गया है कि DFN कोई मानवाधिकार संगठन नहीं है बल्कि यह भारत को अस्थिर करने और उसकी संप्रभुता को खंडित करने वाले एक बड़े पश्चिमी भू-राजनीतिक हस्तक्षेप (Geopolitical Intervention) का हिस्सा है। यह नेटवर्क ‘मानवाधिकारों’ और ‘दलित उद्धार’ की आड़ में विदेशी धन को उन कार्यक्रमों और सेमिनारों में लगाता है, जिनका मूल उद्देश्य भारतीय युवाओं, विशेषकर पिछड़ों को उनकी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पहचान से पूरी तरह विमुख करना, उनके भीतर अपनी ही सभ्यता के प्रति नफरत भरना और देश में गृहयुद्ध जैसी सामाजिक दरारें पैदा करना है।
गंभीर वित्तीय अपराध और धोखाधड़ी
जोसेफ डिसूजा का असली चेहरा तब पूरी तरह बेनकाब हो गया जब तेलंगाना CID और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने उनके और उनके सहयोगियों के खिलाफ धन शोधन (Money Laundering) और वित्तीय गबन के संगीन मामलों में चार्जशीट दाखिल की।
सुरक्षा एजेंसियों की जांच के अनुसार, जोसेफ डिसूजा और उनके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा ने गरीब दलित बच्चों की मुफ्त शिक्षा और सामाजिक कल्याण के नाम पर विदेशों से प्राप्त हुए ₹296.6 करोड़ के विशाल फंड को फर्जी इनवॉइस और शेल कंपनियों के जरिए निजी बैंक खातों, फिक्स्ड डिपॉजिट और विलासितापूर्ण रियल एस्टेट संपत्तियों में डाइवर्ट कर दिया।
जाँच एजेंसियों द्वारा उजागर किए गए प्रमुख घोटालों और उनकी कार्यप्रणाली (Modus Operandi) का विस्तृत विवरण समझते हैं ताकि इस पूरे खेल को आसानी से समझा जा सके:
सुनामी राहत कोष की चोरी (Tsunami Relief Fraud)
क्या था घोटाला: साल 2004 में आई विनाशकारी सुनामी के बाद, तटीय क्षेत्रों के प्रभावित और बेघर हुए मछुआरों के पुनर्वास के नाम पर विदेशों से ₹4 से ₹5 करोड़ का विशेष फंड जुटाया गया था।
हेराफेरी कैसे की गई (Modus Operandi): इस फंड का इस्तेमाल जमीन पर मछुआरों के लिए नए घर और नावें बनाने के लिए होना था। लेकिन जाँच में सामने आया कि जमीन पर कोई राहत कार्य किया ही नहीं गया। डिसूजा के नेटवर्क ने ऐसी कंपनियों और वेंडर्स के नाम पर फर्जी बिल (Fake Invoices) तैयार किए जो असल में थीं ही नहीं। इन फर्जी बिलों के जरिए पूरी रकम को खातों से निकालकर हड़प लिया गया।
बाइबिल बिक्री घोटाला
क्या था घोटाला: इस नेटवर्क को विदेशों से ₹5.9 करोड़ का फंड इस विशेष और वैधानिक उद्देश्य के लिए मिला था कि वे भारत के ग्रामीण और जनजातीय इलाकों में मुफ्त वितरण (Free Distribution) के लिए बाइबिल और अन्य धार्मिक सामग्री छापें।
हेराफेरी कैसे की गई (Modus Operandi): चैरिटी के पैसे का इस्तेमाल व्यापार के लिए किया गया। डिसूजा ने ‘ओएम बुक्स फाउंडेशन’ (OMBF) नामक अपनी एक व्यावसायिक संस्था बनाई। विदेशों से मुफ्त बांटने के लिए मिले पैसे से जो बाइबिल छापी गईं, उन्हें मुफ्त देने के बजाय इस फाउंडेशन के जरिए बाजार में ऊँची कीमतों पर बेचा गया। इस तरह मुफ्त की सामग्री से ₹9.7 करोड़ का अनधिकृत और गुप्त व्यावसायिक मुनाफा कमाया गया, जो FCRA नियमों और टैक्स कानूनों का खुला उल्लंघन था।
‘जोगिनी’ प्रथा के नाम पर अंतरराष्ट्रीय धोखाधड़ी (The Jogini Exploitation Scam)
क्या था घोटाला: यह इस पूरे नेटवर्क का सबसे घिनौना और संवेदनहीन वित्तीय अपराध था, जिसमें अधिक से अधिक विदेशी स्पॉन्सरशिप और डॉलर बटोरने के लिए मासूम बच्चों का इस्तेमाल किया गया।
हेराफेरी कैसे की गई (Modus Operandi): ‘जोगिनी’ या देवदासी प्रथा समाज की एक प्रथा रही है, जिसमें समय के साथ यहाँ नैरेटिव बना दिया गया कि यह हिंदू मंदिरों में महिलाओं का शोषण का जरिया था। डिसूजा के नेटवर्क ने विदेशों में बैठे अमीर ईसाई दाताओं (Foreign Donors) को भावुक करने के लिए अपने गुड शेफर्ड स्कूलों में पढ़ने वाले सामान्य गरीब छात्र-छात्राओं की तस्वीरें खींचीं।
दान करने वालों के सामने इन सामान्य बच्चों को ‘जोगिनी’ (कथित रूप से धार्मिक और यौन रूप से शोषित देवदासी की संतानें) के रूप में पेश किया गया। विदेशी डोनर्स को झूठ बोला गया कि इन बच्चों को नरक से बचाने के लिए फंड चाहिए। इस तरह प्रति बच्चा $27 से $33 (डॉलर) प्रति माह का अतिरिक्त भारी-भरकम दान ऐंठा गया, जो सीधे डिसूजा और उनके परिवार के निजी ट्रस्टों में डाइवर्ट हो गया।
जोगिनी प्रथा का विदेशों में यह दुष्प्रचार इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि ब्रिटिश उपनिवेश के दौरान सनातन की आस्थाओं को कैसे दुष्प्रचार कर उन्हें शोषण का करण साबित किया गया, और आज डिसूजा जैसे लोग इन दुष्प्रचार पर धन उगाही और विदेशी चंदे के फर्जीवाड़े कर रहे हैं।
गरीब बच्चों की फीस और सरकारी फंड का गबन (Fee Siphoning)
क्या था घोटाला: यह घोटाला ‘दोगुनी कमाई’ का सटीक उदाहरण है, जहाँ विदेशों से भी पैसा लिया गया और उन्हीं बच्चों के गरीब माता-पिता को भी लूटा गया।
कैसे की गई हेराफेरी (Modus Operandi): अंतरराष्ट्रीय मंचों पर डीएफएन (DFN) ने दावा किया कि वे भारत में दलित बच्चों को ‘100% पूर्णतः मुफ्त शिक्षा, हॉस्टल और भोजन’ दे रहे हैं और इसके बदले विदेशों से हर साल करोड़ों रुपये लिए।
लेकिन भारत में जमीनी हकीकत इसके उलट थी। यहाँ गुड शेफर्ड स्कूलों के गरीब छात्रों से ट्यूशन फीस, स्कूल यूनिफॉर्म और बस की पूरी फीस वसूली जा रही थी। इसके अलावा, भारत सरकार से मिलने वाले शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत मिलने वाले रिफंड (सूट-बूट और फीस की सरकारी सब्सिडी) के पैसे को भी स्कूल के ऑडिट बुक्स से गायब कर निजी खातों में ट्रांसफर कर दिया गया।
नकली इनवॉइस के जरिए FCRA उल्लंघन (Post-Ban Siphoning)
क्या था घोटाला: केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा नियमों के उल्लंघन के कारण जब इनके मुख्य संगठनों का एफसीआरए (FCRA) लाइसेंस निलंबित और रद्द कर दिया गया, तब भी पिछले दरवाजे से विदेशी पैसा भारत मंगाया गया।
कैसे की गई हेराफेरी (Modus Operandi): लाइसेंस रद्द होने का मतलब था कि अब ये सीधे विदेशी चंदा नहीं ले सकते थे। इस पर डिसूजा ने अपनी व्यावसायिक कंपनी ‘ओएम बुक्स फाउंडेशन’ का इस्तेमाल किया। उन्होंने विदेशों में मौजूद अपने ही डमी संगठनों को प्रिंटिंग और पब्लिशिंग के झूठे और अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए बिल (Fake Commercial Invoices) भेजे। ऐसा दिखाया गया कि विदेशी संस्थाओं ने किताबें छपवाई हैं, और इस व्यावसायिक व्यापार की आड़ में प्रतिबंधित विदेशी फंड को भारत में अवैध रूप से लाना जारी रखा।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा संपत्तियों की जब्ती
क्या था घोटाला: इन सभी घोटालों से कमाए गए ₹296.6 करोड़ के काले धन को सफेद करने (Money Laundering) के लिए उसे रियल एस्टेट में निवेश किया गया।
कैसे की गई कार्रवाई: पीएमएलए (PMLA) के तहत जांच करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पाया कि इस चैरिटी के पैसे से जोसेफ डिसूजा, उनके बेटे जोश लॉरेंस और उनके करीबियों ने महंगी जमीनें, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स और आलीशान विला खरीदे थे। ईडी ने इस ‘अपराध की कमाई’ (Proceeds of Crime) पर कड़ा प्रहार करते हुए उनकी कुल 12 मुख्य अचल संपत्तियां कुर्क (Freeze) और जब्त कर लीं, जिनका वर्तमान बाजार मूल्य ₹15 करोड़ से कहीं अधिक है।
जोसेफ डिसूजा के इस वित्तीय साम्राज्य का काम करने का तरीका बेहद सरल लेकिन शातिर था। भारत की गरीबी और कुप्रथाओं की डरावनी तस्वीर विदेशों में बेचकर डॉलर कमाओ, उन डॉलर्स को गरीब बच्चों तक पहुँचाने के बजाय कागजी हेराफेरी और फर्जी बिलों के जरिए भारत में अपनी निजी अचल संपत्तियों और लग्जरी लाइफस्टाइल में बदल लो।
राजनीतिक कनेक्शन और भारतीय वामपंथी-लिबरल इकोसिस्टम
जोसेफ डिसूजा केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं। वो भारत के भीतर मौजूद वामपंथी-उदारवादी राजनीतिक और मीडिया इकोसिस्टम के एक बेहद मजबूत स्तंभ हैं। जब भी उन पर वित्तीय अपराधों के कारण कानूनी फंदा कसता है, यह पूरा राजनीतिक तंत्र उन्हें बचाने और देश की संप्रभु सरकारों को घेरने के लिए सक्रिय हो जाता है।
सोनिया और राहुल गाँधी के साथ वैचारिक जुगलबंदी
जोसेफ डिसूजा के संबंध कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से बेहद पुराने और गहरे हैं। साल 2004 के लोकसभा चुनाव में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी सरकार की हार हुई और सोनिया गांधी के रिमोट-कंट्रोल वाली यूपीए सरकार सत्ता में आई, तो जोसेफ डिसूजा ने अमेरिकी चर्च नेटवर्क्स को लिखे अपने पत्र और बयानों में इसे ‘ईश्वरीय न्याय’ (Divine Justice) और ‘एक महान चमत्कार’ बताते हुए जश्न मनाया था।
जोसेफ डिसूजा उस समय ‘ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल’ (AICC) के वैश्विक अध्यक्ष के रूप में काम कर रहे थे। इस विशिष्ट घटनाक्रम और उनके इस बयान का पूरा ब्योरा राजीव मल्होत्रा और अरविंदन नीलकंदन की चर्चित खोजी पुस्तक ‘Breaking India’ के अध्याय 8 (The Dalit Freedom Network) में दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ दर्ज है।
हालिया घटनाक्रमों में भी यह राजनीतिक जुगलबंदी खुलकर सामने आई है। जब भारत सरकार ने वक्फ बोर्ड के एकाधिकार को विनियमित करने के लिए कदम उठाए, तो राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया पर बिशपों के सुर में सुर मिलाते हुए दावा किया कि सरकार वक्फ बिल के बाद अब ईसाई चर्चों की संपत्तियों को निशाना बनाने की योजना बना रही है। यह सीधा राजनीतिक बयानबाजी जोसेफ जैसे दागी बिशपों को कानूनी कार्रवाइयों (ED और CID जांच) से सुरक्षा प्रदान करने और इसे ‘धार्मिक उत्पीड़न’ का रंग देने का एक सुनियोजित प्रयास है।
‘द वायर’ (The Wire) और सिद्धार्थ वरदराजन द्वारा मंच प्रदान करना
जब भारत सरकार ने FCRA संशोधनों के जरिए विदेशी फंडिंग के जरिए होने वाले अवैध धर्मांतरण और मनी लॉन्ड्रिंग पर पूरी तरह शिकंजा कसा, तो भारत विरोधी एजेंडा चलाने के लिए कुख्यात डिजिटल पोर्टल ‘द वायर’ (The Wire) के सह-संस्थापक सिद्धार्थ वरदराजन ने बिशप जोसेफ डिसूजा को अपने चैनल पर एक विशेष मंच प्रदान किया।
‘द वायर’ को दिए अपने लंबे वीडियो इंटरव्यू में जोसेफ डिसूजा ने भारत के संप्रभु संसद द्वारा पारित वित्तीय नियमों को ‘चर्च की संपत्तियों की सीधी सरकारी लूट’ करार दिया। इस इंटरव्यू में उन्होंने बेहद शातिर तरीके से अंतरराष्ट्रीय समुदाय (विशेष रूप से अमेरिका और यूरोपीय देशों) से यह अपील की कि वे भारत के इन कड़े कानूनों पर दखल दें और भारत सरकार पर आर्थिक व कूटनीतिक प्रतिबंध लगाएँ। The Wire पर ये साक्षात्कार उनके साथ वरिष्ठ पत्रकार करण थापर कर रहे थे।
नेशनल फेडरेशन ऑफ चर्चेज इन इंडिया (NFCI) का गठन: एक दबाव समूह
जोसेफ डिसूजा की उच्च-स्तरीय लॉबिंग का ही परिणाम है कि भारत में पहली बार कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, इवेंजेलिकल और पेंटाकोस्टल जैसे आपस में वैचारिक मतभेद रखने वाले चर्चों को एक साथ लाकर ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ चर्चेज इन इंडिया’ (NFCI) का गठन किया गया है। इसके अध्यक्ष के रूप में कार्डिनल एंथनी पूला को स्थापित किया गया। इस फेडरेशन का असली उद्देश्य कोई धार्मिक सुधार नहीं बल्कि भारत के विभिन्न राज्यों में लागू कड़े धर्मांतरण-विरोधी कानूनों (Anti-Conversion Laws) और केंद्र सरकार के एफसीआरए नियमों के खिलाफ एक संयुक्त, शक्तिशाली राजनीतिक और सामाजिक दबाव समूह (Pressure Group) के रूप में कार्य करना है, ताकि उनकी वित्तीय सल्तनत सुरक्षित रह सके।
जोसेफ डिसूजा के भारत विरोधी बयान, वीडियो और ब्लॉग
जोसेफ डिसूजा लगातार अंतरराष्ट्रीय मीडिया, अमेरिकी थिंक-टैंक्स और डिजिटल मंचों पर भारत की छवि को एक ‘असहिष्णु’, ‘ईसाई-विरोधी’ और ‘फासीवादी’ राष्ट्र के रूप में पेश करने का एक सतत अभियान चला रहे हैं। उनके बयानों, वीडियो साक्षात्कारों और ब्लॉग पोस्ट का विश्लेषण उनके भारत विरोधी टूलकिट के खतरनाक मंसूबों को उजागर करता है:
1. वैश्विक मीडिया पर जहर उगलना और नाजी जर्मनी से तुलना
- CBN न्यूज पर उगला जहर: अमेरिकी क्रिश्चियन ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क (CBN News) को दिए गए अपने एक बेहद आपत्तिजनक साक्षात्कार में जोसेफ डिसूजा ने भारत के वित्तीय नियमों (FCRA Amendments) की तुलना सीधे नाजी जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर द्वारा यहूदियों के साथ किए गए सुव्यवस्थित और क्रूर उत्पीड़न (Nazi Persecution) से की। उनका यह बयान भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं और उसकी न्यायप्रणाली का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घोर अपमान है।
- भारत को बताया गुलामों का देश: कनाडाई मिशनरी टीवी शो ‘100 Huntley Street’ और अपनी वीडियो सीरीज ‘Dalit Freedom Part 2’ में दिए गए बयानों में जोसेफ डिसूजा ने भारत की गौरवशाली 3000 साल से पुरानी सनातन सभ्यता और संस्कृति को ‘केवल गुलामी, उत्पीड़न और अंधकार का इतिहास’ बताया। वे पश्चिमी दर्शकों को यह समझाते हैं कि ईसाइयत के आने से पहले भारत में कोई मानवीय मूल्य नहीं थे, ताकि उनके कन्वर्जन एजेंडे को नैतिक वैधता मिल सके।
2. भारतीय न्यायपालिका पर सीधा हमला
जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) और विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने प्रलोभन, धोखे और जबरन किए जाने वाले अवैध धर्मांतरण पर रोक लगाने वाले राज्य कानूनों को संवैधानिक रूप से वैध और देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए आवश्यक ठहराया, तो जोसेफ डिसूजा ने भारतीय जजों और न्यायपालिका के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अपनाया। अपने वीडियो बयानों (SC Judges Criticism Videos) में उन्होंने भारतीय न्यायपालिका को ‘एकतरफा और बहुसंख्यकवादी एजेंडे से प्रभावित’ बताया।
आखिर क्यों एक ईसाई धर्म प्रचारक (इवेंजेलिकल पादरी) अचानक भारत की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) को ‘बाइबिल के मूल्यों’ और ‘निर्दोषता’ पर लेक्चर देने लगा? सुप्रीम कोर्ट के जजों को ‘शांत दिमाग’ रखने की सलाह देने के इस पढ़े-लिखे और सभ्य मुखौटे के पीछे, दरअसल एक बहुत ही सोची-समझी चाल छिपी है।
जोसेफ डिसूजा भारतीय अदालतों की कानूनी कार्रवाइयों के बीच चालाकी से बाइबिल की बातों को घुसा रहे हैं। ऐसा करके वे चुपके से भारत के धर्मनिरपेक्ष कानूनों और अदालती जाँच को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। वे एक ऐसा मनोवैज्ञानिक माहौल तैयार कर रहे हैं जिससे उनके खिलाफ चल रही पैसे की हेराफेरी की आम कानूनी जाँच को उनके चर्च के खिलाफ एक ‘धार्मिक युद्ध’ के रूप में पेश किया जा सके।
3. कंचा इलैया शेफर्ड के साथ हिंदू विरोधी मंच साझा करना
जोसेफ डिसूजा अक्सर कट्टर हिंदू-विरोधी और भारत-विद्वेषी विचारक कंचा इलैया शेफर्ड के साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों और पॉडकास्ट (जैसे- Premier Unbelievable Podcast) पर दिखाई देते हैं। कंचा इलैया वही व्यक्ति हैं जो चीनी फंडिंग के गहरे घेरे में आए और दिल्ली पुलिस की जाँच के दायरे में मौजूद ‘न्यूजक्लिक’ (Newsclick) पोर्टल के नियमित लेखक रहे हैं। ये दोनों मिलकर पश्चिमी मंचों पर हिंदू धर्म, उसकी सामाजिक व्यवस्था और भारतीय संस्कृति को पूरी तरह से नीचा दिखाने के लिए डॉ. बी.आर. अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और कार्ल मार्क्स के विचारों की अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़ कर व्याख्या करते हैं और भारत के खिलाफ एक वैचारिक मोर्चा खोलते हैं।
ब्लॉग और पोर्टल्स पर भारत विरोधी एजेंडा
जोसेफ डिसूजा अपने व्यक्तिगत ब्लॉग और अंतरराष्ट्रीय इवेंजेलिकल पोर्टल्स पर लगातार भारत की राजभाषा हिंदी, भारतीय राष्ट्रवाद (Indian Nationalism) और राज्यों के धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के खिलाफ लेख लिखते रहते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि भारत में धर्म परिवर्तन का अधिकार अबाधित होना चाहिए, चाहे उसके लिए विदेशी धन का कितना भी अंधाधुंध इस्तेमाल क्यों न किया जा रहा हो।