Homeरिपोर्टमीडियानेविल रॉय सिंघम के चीनी प्रोपेगेंडा फैलाने वाला 'मास्टरमाइंड' होने का Fox News ने...

नेविल रॉय सिंघम के चीनी प्रोपेगेंडा फैलाने वाला ‘मास्टरमाइंड’ होने का Fox News ने किया खुलासा, किए करोड़ों डॉलर खर्च: जानें- भारत में न्यूजक्लिक समेत कौन से 3 संगठन करते रहे भारत विरोधी काम

नेविल रॉय सिंघम के नेतृत्व वाला चीन-समर्थक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क एनजीओ, एक्टिविस्ट ग्रुप, थिंक टैंक और मीडिया संस्थानों से मिलकर बना है। यह इन्हें लाखों डॉलर फंडिंग करता है और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के प्रचार तंत्र के रूप में काम करवाता है।

फॉक्स न्यूज की एक खोजी रिपोर्ट से पता चला है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्यादे नेविल रॉय सिंघम ने अपने चीन-समर्थक सूचना और नैरेटिव लॉन्ड्रिंग नेटवर्क में लगभग $600 मिलियन यानी 5692 करोड़ रुपए का निवेश किया है, जो पाँच महाद्वीपों में फैला हुआ है। सिंघम कई ऐसे संगठनों को फंडिंग दे रहा है, जो भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं।

सिंघम का नेटवर्क को ‘हाउस ऑफ सिंघम’ कहा जाता है। एक ‘सूचना लॉन्ड्रिंग’ या ‘नैरेटिव लॉन्ड्रिंग’ मशीनरी चला रहा है। यह मशीनरी कुछ खास मुद्दों को उठाती है और उसे प्रोपेगैंडा में बदल देती है। इसका मकसद अमेरिका, भारत और दूसरे बड़े लोकतंत्रिक देशों में फूट डालना है। वहीं दूसरी तरफ चीन की छवि को ‘साम्राज्यवाद’ और ‘फासीवाद’ से बाहर निकालना और दूसरों की मदद करने वाला ‘परोपकारी’ देश के रूप में प्रचार करना है।

नेविल रॉय सिंघम के नेतृत्व वाला यह चीन-समर्थक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क एनजीओ, एक्टिविस्ट ग्रुपों, थिंक टैंक और मीडिया आउटलेट्स से मिलकर बना है, जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की प्रोपेगैंडा मशीनरी के तौर पर काम करते हैं। सिंघम के कई संगठन भारत में लगातार भारत-विरोधी और चीन-समर्थक नैरेटिव को बढ़ावा दे रहे हैं।

TriContinental:सिंघम फंडिंग करता है, प्रोपेगैंडा मशीनरी उसे फैलाती है।

TriContinental मैसाचुसेट्स स्थित एक मार्क्सवादी थिंक टैंक है। ‘पत्रकार’ विजय प्रसाद इसके संस्थापक हैं, इसे नेविल रॉय सिंघम से फंडिंग मिलती है। यह चीनी प्रोपेगैंडा को बढ़ावा देता है। नेविल रॉय सिंघम इस थिंक टैंक के अंतरराष्ट्रीय सलाहकार बोर्ड में शामिल हैं। इन पर अमेरिकी गैर-लाभकारी संगठनों का इस्तेमाल करके चीनी प्रोपेगैंडा को आगे बढ़ाने का आरोप है। वह Left Word Books के संपादक और Globetrotter के मुख्य संवाददाता भी हैं।

TriContinental अपने लेखों और न्यूजलेटर्स के जरिए लगातार चीन-समर्थक और भारत-विरोधी बातें फैला रहा है। ईरान और अमेरिका-इजरायल के संयुक्त मोर्चे के बीच चल रहे युद्ध के दौरान TriContinental ने मोदी सरकार की विदेश नीति की आलोचना की। उसने हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत IRIS Dena के डूबने के बाद भारत की कथित चुप्पी को ‘खुद की कराई बेइज्जती’ बताया। अर्थशास्त्री बोडापति सृजना ने एक लेख में PM मोदी की इजरायल यात्रा पर भी खूब हंगामा मचाया।

TriContinental ने हिंद महासागर में IRIS Dena के डूबने को भारत की ‘नाकामी’ के तौर पर पेश किया। उसने कहा कि भारत उस ईरानी युद्धपोत की रक्षा नहीं कर पाया, जिसने भारत के मिलन 2026 नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लिया था। यह चौंकाने वाली गलतबयानी तब की गई, जब वह जहाज गाले से लगभग 20 नॉटिकल मील पश्चिम में, श्रीलंका की ज़िम्मेदारी वाले SAR क्षेत्र में जा चुका था।

अमेरिका ने जब हमला किया, तो वह भारत के समुद्री क्षेत्र के आस-पास भी नहीं था। भारत ने IRIS Dena को पनाह देने की पेशकश भी की थी। सिर्फ इसलिए कि IRIS Dena ने एक भारतीय नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लिया था, भारतीय नौसेना की यह कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी कि वह उस ईरानी युद्धपोत को उसके घर तक सुरक्षित पहुँचाए। भारत सिर्फ मानवीय आधार पर खोज और बचाव में मदद कर सकता था, जो भारतीय नौसेना पहले से ही कर रही थी।

इस संगठन की वेबसाइट चीनी कम्युनिस्ट इतिहास और तकनीकी विकास की तारीफ करने वाले लेखों से भरी पड़ी है। इससे ऐसा लगता है कि कम्युनिस्ट शासन के तहत चीन एक ऐसी ‘आदर्श देश’ है, जिसकी नकल बाकी दुनिया को भी करनी चाहिए।

TriContinental को जनवरी 1966 में क्यूबा में हुई Tricontinental Conference से प्रेरणा मिलती है। इससे ‘राष्ट्रीय मुक्ति मार्क्सवाद’ का जन्म हुआ था। एक अंतर-क्षेत्रीय कार्यालय के अलावा TriContinental के ऑफिस अर्जेंटीना, ब्राज़ील, भारत और दक्षिण अफ्रीका में भी हैं। कार्ल मार्क्स और उनके विचार ही इस संगठन की प्रेरणा हैं।

साल 2024 में TriContinental ने कुल $857,945 का राजस्व दर्ज किया, जबकि इसका खर्च लगभग $3,745,069 रहा। इसके कोषाध्यक्ष विजय प्रशांत हैं।

चीन समर्थक ‘पीपल्स डिस्पैच’ भारत विरोधी प्रोपेगैंडा फैला रहा है

नेविल रॉय सिंघम ने चीन समर्थक और भारत विरोधी प्रोपेगैंडा फैलाने वाले कई अलग-अलग माध्यमों में लाखों डॉलर लगाए हैं। इनमें ‘पीपल्स डिस्पैच’ भी शामिल है। यहाँ विजय प्रसाद ने कई लेख लिखे हैं। ‘पीपल्स डिस्पैच’ एक मीडिया पोर्टल है, जो खुद को एक ‘अंतरराष्ट्रीय मीडिया प्रोजेक्ट’ बताता है। इसका मकसद ‘पूरी दुनिया में लोगों के आंदोलनों और संगठनों की आवाज को दुनिया के सामने लाना’ है। जनवरी 2020 के एक लेख में, प्रसाद ने JNU के प्रदर्शनकारियों के प्रति सहानुभूति जताई थी और मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की थी।

जून 2025 में ‘पीपल्स डिस्पैच’ ने एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें भारत की विदेश नीति को ‘शर्मनाक’ करार दिया गया। भारत ने गाजा में तत्काल युद्धविराम की माँग करने वाले स्पेन के UN प्रस्ताव पर वोटिंग से खुद को अलग कर लिया था। इसको लेकर लेख लिखा गया, जिसमें मार्क्सवादी प्रोपेगैंडा लेखक डॉ. जोसेफिन वर्गीस और वर्गी पराक्कल ने भारत की आलोचना की। उनलोगों ने फिलिस्तीन और इजरायल के प्रति भारत की नीति में आए इस कथित बदलाव का कारण तथाकथित ‘हिंदुत्व-जायोनी’ गठबंधन को बताया था।

भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी प्रोपेगैंडा के अलावा ‘पीपल्स डिस्पैच’ फर्जी खबरें भी फैलाता है। फरवरी 2026 में मार्क्सवादी प्रोपेगैंडा आउटलेट ने एक लेख प्रकाशित किया था। इसका शीर्षक था- ‘भारत में एक ऐतिहासिक राष्ट्रीय हड़ताल में 30 करोड़ लोग सड़कों पर’। इसमें दावा किया गया था कि करोड़ों लोग नए श्रम कानूनों और अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के विरोध में सड़कों पर उतरे थे।

हालाँकि आंदोलन हुआ था, लेकिन ’30 करोड़’ लोगों के शामिल होने का दावा बिल्कुल गलत है। इसे वाम-उदारवादी गुट ने भी खूब प्रचारित किया था। इस तरह के बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए आँकड़ों को अक्सर अराजकता फैलाने वाले ग्रुप, वैचारिक संकट के रूप में प्रचार प्रसार करते हैं। भारत की आबादी 140 करोड़ से भी ज्यादा है। इतने बड़े देश में, बड़े-बड़े जन-आंदोलन भी बिना पूरे देश को ठप किए हो सकते हैं।

हर विरोध प्रदर्शन को ‘अभूतपूर्व’ कहना या उसे व्यवस्था के ढहने का सबूत बताना, लोगों को गुमराह करना है। छिटपुट कुछ विरोध प्रदर्शनों के बावजूद ज्यादातर राज्यों में सामान्य जनजीवन पर कोई असर नहीं पड़ा था।

‘पीपल्स डिस्पैच’ ने कई मौकों पर हिंदुओं के प्रति अपनी खुली अवमानना ​​दिखाई है। यह प्रोपेगैंडा आउटलेट नरेंद्र दाभोलकर, गौरी लंकेश, गोविंद पानसरे, कलबुर्गी और अन्य जैसे कट्टर वामपंथियों के प्रति सहानुभूति भी रखता है और उनका महिमामंडन भी करता है।


पीपुल्स डिस्पैच ने भारत और इजरायल के रिश्तों पर भी जमकर अपनी भड़ास निकाली थी।

‘द डिस्पैच’ इजराइल को ‘नरसंहार करने वाला’ बताकर उसे खलनायक के रूप में पेश करता रहा है, लेकिन हमास ने 7 अक्टूबर को इजरायल में नरसंहार किया, उसकी कभी भी खुलकर निंदा नहीं करता। इतना ही नहीं हैदराबाद में अडानी और एल्बिट के ड्रोन निर्माण से जुड़े संयुक्त उद्यम, टाटा के ‘प्रोजेक्ट निम्बस’ सिस्टम और इजरायल में रिलायंस जियो की साझेदारियों से बने उपक्रम को फिलिस्तीनियों के ‘नरसंहार’ से जोड़ कर भारतीय कंपनियों को बदनाश करने की कोशिश करता है।

यह प्रोपेगैंडा लेख विजय प्रसाद और सुधनवा देशपांडे के नाम से लिखा गया था। इसमें अडानी-एल्बिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग वेंचर के बारे में सरासर झूठ फैलाया गया था। हालाँकि यह सच था कि इजरायल ने गाजा में अपने ऑपरेशन्स में हेमर्स 900 ड्रोन का इस्तेमाल किया था, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं है कि भारत ने ईरान के खिलाफ इस्तेमाल के लिए इजराइल को हेमर्स 900 ड्रोन या कोई मिसाइल एक्सपोर्ट की है। यह पूरा दावा कि हैदराबाद में अडानी-एल्बिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट ईरान के खिलाफ इजरायल के युद्ध के लिए ड्रोन बना रही है, पूरी तरह से एक प्रोपेगैंडा है।

ज्यादातर इस्लामो-वामपंथी प्रोपेगैंडा पोर्टल की तरह पीपुल्स डिस्पैच ने 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों को दबे-कुचले, पीड़ित मुस्लिम ‘अल्पसंख्यकों’ के खिलाफ ‘हिंदुत्व’ हिंसा के रूप में पेश करता है। जबकि, यह हिंदुओं के खिलाफ एक पहले से सोची-समझी इस्लामी साजिश थी।

यह उमर खालिद, खालिद सैफी, शरजील इमाम और गुलफिशा फातिमा जैसे इस्लामी कट्टरपंथियों को भी ‘पीड़ित’ के रूप में दिखाता है, जिन पर CAA-विरोधी प्रदर्शनों की आड़ में दंगों की साजिश रचने और उन्हें भड़काने का आरोप है।

एक लेख में पीपुल्स डिस्पैच दंगों के आरोपी मास्टरमाइंड उमर खालिद की सुनवाई में हो रही देरी पर अफसोस जताता है और इसका दोष अदालतों द्वारा बेल की सुनवाई टालने को देता है।

इस्लामी-वामपंथी प्रोपेगैंडा गुट द्वारा फैलाए जा रहे ‘पीड़ित होने’ के नैरेटिव के विपरीत, उमर खालिद का इतने लंबे समय तक जेल में रहना उसी के अपने किए का नतीजा है। OpIndia ने पहले भी रिपोर्ट किया है कि 2023 और 2024 में हुई 14 सुनवाइयों में से, 7 बार सुनवाई में देरी या उसे टालने की गुजारिश खुद उमर खालिद ने ही की थी। इससे साफ हो जाता है कि बेल याचिका वापस लेने की वजह निश्चित रूप से सुनवाई में होने वाली तथाकथित ‘देरी’ नहीं थी। जहाँ एक ओर इस्लामी-वामपंथी इकोसिस्टम लगातार ‘अन्याय’ का रोना रो रहा है, वहीं दूसरी ओर आरोपी के वकील ‘फोरम शॉपिंग’ यानी अपनी पसंद की अदालत या जज चुनने में लगे रहे। इसमें हो रही देरी की वजह से खालिद इतने लंबे समय से जेल में सड़ रहा है।

OpIndia के इस विश्लेषण की पुष्टि पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ के उस बयान से भी होती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि असली समस्या कुछ वकीलों और राजनीतिक समूहों की मानसिकता में है, जो चाहते हैं कि उनके मामलों की सुनवाई केवल कुछ खास जजों द्वारा ही की जाए।
OpIndia द्वारा कई बार रिपोर्ट की गई बात को दोहराते हुए पूर्व CJI ने कहा कि अदालत के रिकॉर्ड से पता चलता है कि सिब्बल के नेतृत्व वाली खालिद की कानूनी टीम ने फरवरी 2024 में ज़मानत याचिका को वापस लेने से पहले, कम से कम सात बार सुनवाई टालने की गुजारिश की थी।इसके बाद याचिका वापस लेते समय ‘परिस्थितियों में बदलाव’ का हवाला दिया था।

NewsClick नेविल रॉय सिंघम की फंडिंग से चलने वाला मीडिया आउटलेट, चीन-समर्थक प्रोपेगैंडा फैलाने के कारण लगातार निगरानी में रहा

नेविल रॉय सिंघम के ‘जस्टिस एंड एजुकेशन फंड’ ने दिल्ली स्थित चीन-समर्थक प्रोपेगैंडा आउटलेट न्यूजक्लिक को 10.5 मिलियन डॉलर का दान दिया था। विजय प्रसाद ने न्यूजक्लिक के लिए कई प्रोपेगैंडा लेख लिखे हैं। सीपीएम नेता वृंदा करात के भतीजे विजय प्रसाद हैं। वृंदा करात पूर्व सीपीएम ने जेनरल सेक्रेटरी प्रकाश करात की पत्नी हैं। न्यूजक्लिक को चीनी फंडिंग मिलने से जुड़े घोटाले के दौरान वृंदा करात और नेविल रॉय सिंघम के बीच हुए ईमेल आदान-प्रदान से उनके बीच के गहरे संबंधों का खुलासा पहले ही हो चुका है।

न्यूजक्लिक पहली बार तब सुर्खियों में आया, जब 2021 में यह प्रवर्तन निदेशालय की नजर उस पर पड़ी। खबरों के मुताबिक, इस पोर्टल पर धोखाधड़ी से करीब 38 करोड़ रुपए का विदेशी फंड लेने का आरोप लगा था। जब 2023 में न्यूयॉर्क टाइम्स की एक खोजी रिपोर्ट में सिंघम के नेटवर्क को कथित तौर पर चीन से मिलने वाली फंडिंग और उसके प्रोपेगैंडा का खुलासा हुआ, तो विजय प्रसाद ने इसे बकवास करार दिया।

विजय प्रसाद ‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ के काउंसिल सदस्य भी रहे हैं। यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो दुनिया भर में वामपंथी कार्यकर्ताओं और समूहों को लामबंद करता है। OpIndia ने पहले ही इस बात को उजागर किया था कि कैसे यह संगठन लगातार ऐसे प्रोपेगैंडा लेख और बयान प्रकाशित करता है, जो मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए मुसलमानों को पीड़ित दिखाने वाले खतरनाक नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं। प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल अपने मंच पर भारत-विरोधी, खासकर हिंदू-विरोधी प्रोपेगैंडा वाले दर्जनों लेखों को जगह देता है। ये लेख हर्ष मंदर जैसे कुख्यात हिंदू-विरोधी और इस्लामी आतंकवाद के पैरोकारों द्वारा लिखे जाते हैं। प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की काउंसिल में जयति घोष और लेबर पार्टी के पूर्व सांसद जेरेमी कॉर्बिन जैसे इस्लामी-वामपंथी समर्थक भी शामिल हैं।

प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल का ‘टाइड्स फाउंडेशन’ से भी जुड़ाव है। इस संगठन का एक सदस्य ‘अरब रिसोर्स एंड ऑर्गनाइजिंग सेंटर’ (AROC) है। यह हमास का समर्थन करता है और जिसे टाइड्स फाउंडेशन से फंडिंग मिलती है। टाइड्स फाउंडेशन का न्यूजक्लिक से भी सीधा रिश्ता सामने आया है।

टाइड्स फाउंडेशन कई हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी संगठनों को फंडिंग करता है। इस फाउंडेशन ने ‘हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) को भी फंड दी है। इस संगठन के तार इस्लामी कट्टरपंथियों और खालिस्तानियों से जुड़े हैं। HfHR की स्थापना 2019 में दो इस्लामी कट्टरपंथी समूह ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) और ‘ऑर्गनाइजेशन फॉर माइनॉरिटीज ऑफ इंडिया’ (OFMI) ने मिलकर की थी।

टाइड्स फाउंडेशन ने ‘अमन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट’ (AMAN) को भी फंडिंग दी थी। इस ट्रस्ट का संबंध न्यूजक्लिक-चीन फंडिंग घोटाले से है। इस घोटाले में आरोप है कि चीनी संस्थाओं ने भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुँचाने के मकसद से न्यूजक्लिक को फंडिंग की थी।

नेविल रॉय सिंघम ने अपनी बड़ी टीम में जिन भारतीयों को शामिल किया था और जिन्होंने ‘ट्राइकंटिनेंटल’ (Tricontinental) जैसे गैर-लाभकारी संगठनों के साथ काम किया था, उनके बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स ने कहा था कि वे चीन के एजेंडे को आगे बढ़ाने में शामिल थे। इनमें प्रबीर पुरकायस्थ, सृजना, प्रशांत और विजय प्रसाद प्रमुख थे। प्रसाद के अर्बन नक्सल पी. साईनाथ से भी गहरे संबंध हैं। साईनाथ के प्रोपेगैंडा पोर्टल PARI ने हाल ही में सिंघम के साथ संबंधों का खुलासा होने के बाद, सिंघम से जुड़े सभी संदर्भ हटा दिए थे।

न्यूजक्लिक का हिंदू-विरोधी रवैया किसी से छिपा नहीं है। इसके अलावा न्यूजक्लिक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ कथित संबंधों को लेकर भी जाँच चल रही है। 2023 में द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक जाँच में एक्टिविस्ट संगठनों, गैर-लाभकारी संस्थाओं और शेल कंपनियों का एक ऐसा नेटवर्क सामने आया, जिनके चीन और चीनी प्रोपेगैंडा के साथ गहरे संबंध थे।

इस पूरे नेटवर्क की कमान नेविल रॉय सिंगहम के हाथों में थी। 2024 में दिल्ली पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट में चीनी सरकार को ‘अंतिम वित्तपोषक’ (ultimate paymaster) बताया गया था। चार्जशीट के अनुसार, भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए इन संगठनों को फंड भेजा गया था। खासकर कश्मीर और किसानों के विरोध प्रदर्शनों के दौरान फंडिंग का पता चला था। यह मामला अभी भी अदालत में विचाराधीन है।

2021 में OpIndia ने न्यूजक्लिक के लिंक्स की डिटेल में जाँच की और पता लगाया कि यह कैसे कई ऐसे लोगों से जुड़ा था, जो नियमित रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। अर्बन नक्सल से लेकर तीस्ता सीतलवाड़, अभिसार शर्मा और कई दूसरे लोग। OpIndia की वह जाँच यहाँ पढ़ी जा सकती है।

‘पीपुल्स फोरम’ में कश्मीर अलगाववाद, हिंदू विरोधी बातें और केरल के ‘कम्युनिस्ट’ मॉडल का जुनून था

फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट ने पब्लिक में मौजूद रिकॉर्ड के जरिए हाउस ऑफ सिंघम के फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन फ्लो का एनालिसिस किया और पाया कि ‘पीपल्स फोरम’ को नेविल रॉय सिंघम से $22.4 मिलियन यानी 212.49 करोड़ रुपए दिए थे।

GS डोनर्स एडवाइज़्ड फिलैंथ्रॉपी फंड फॉर वेल्थ मैनेजमेंट इंक और दो शेल कंपनियों के माध्यम से सिंघम ने कथित तौर पर छह नॉन-प्रॉफिट्स में $278 मिलियन यानी 2637 करोड़ रुपए से अधिक डाले, जिनमें से एक पीपल्स फोरम भी है।

अक्टूबर 2023 से अमेरिका में इजरायल-विरोधी प्रदर्शनों को भड़काने वाले मुख्य संगठनों में से एक पीपल्स फोरम रहा है। कोडपिंक की सह-संस्थापक और नेविल रॉय सिंघम की पत्नी जोडी इवांस ने 2017 और 2022 के बीच इस संगठन को $20.4 मिलियन यानी 24 करोड़ से ज़्यादा का दान दिया। हालाँकि, पीपल्स फोरम की प्रोपेगैंडा फैलाने वाली गतिविधियाँ सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि ये भारत तक फैली हुई हैं। यह संगठन 2019 से ही भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दे रहा है।

पिछले कुछ सालों में ‘द पीपल्स फोरम’ अपने वैश्विक दर्शकों के बीच जम्मू और कश्मीर की एक गलत तस्वीर पेश करने के लिए सेमिनार और फिल्म स्क्रीनिंग करता रहा है।

इससे पहले चीन-समर्थक प्रोपेगैंडा संगठन ने जम्मू और कश्मीर के अभिन्न अंग को भारत से अलग करने की माँग की थी और ‘आज़ादी’ की माँग करने वाले चरमपंथियों को अपना समर्थन दिया था। 18 मार्च 2019 को इस संगठन ने 1 घंटे 50 मिनट का एक सेशन आयोजित किया, जिसमें भारत को जम्मू और कश्मीर में एक ‘कब्जा करने वाली’ ताकत के तौर पर पेश किया गया। यह फोरम भारतीय क्षेत्र के इस अभिन्न अंग को ‘भारत के कब्जे वाला’ इलाका बताता है। असल में जम्मू और कश्मीर का एकमात्र हिस्सा जिस पर गैर-कानूनी कब्जा है। वह है पीओके यानी पाकिस्तान के कब्जे वाला जम्मू और कश्मीर।

इस संगठन का एक इतिहास यह भी रहा है कि यह भारत से नफरत करने वाले कट्टर लोगों और पाकिस्तान की ISI से जुड़े तत्वों को मंच देता रहा है, ताकि भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दिया जा सके। ऐसा ही एक महिला हैं हफ्सा कंजवाल। उसने ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ में लिखे एक लेख में पुलवामा आतंकी हमले की गंभीरता को कम करके दिखाने की कोशिश की थी।

2019 में कंजवाल पीपल्स फोरम द्वारा आयोजित एक सेमिनार में एक प्रशिक्षक के तौर पर शामिल हुई थीं। कंजवाल ने अपने संगठन ‘स्टैंड विद कश्मीर’ के जरिए ISI के एजेंट गुलाम नबी फई के साथ करीबी रिश्ते बनाए रखे हैं। वह एक कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और ‘द पीपल्स फोरम’ के कई कार्यक्रमों में शामिल होती रही हैं।

14 सितंबर 2019 को नेविल रॉय सिंघम से पैसा पाने वाले एक संगठन ने एक कार्यक्रम आयोजित किया। इसका नाम ‘कश्मीर में आत्मनिर्णय और एकजुटता’ रखा गया था। भारत-विरोधी इस कार्यक्रम को ‘कोडपिंक’ जैसे संगठनों ने स्पॉन्सर किया था, जिसकी स्थापना नेविल रॉय सिंघम की पत्नी, जोडी इवांस ने की थी।

यह सेशन कश्मीरी और फिलिस्तीन आंदोलनों को एकजुटता करने पर केंद्रित था। इसमें कश्मीर के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करते हुए इसके इतिहास को बताया गया। भारत और इजरायल के संबंधों का विश्लेषण किया गया, साथ ही फिलिस्तीनी और कश्मीरी एकजुटता पर जोर दिया गया।

मार्च 2023 में हफ्सा कंजवाल को उनकी किताब ‘Hostile Homelands: The New Alliance between India and Israel’ के प्रचार के लिए द पीपुल्स फोरम ने मंच दिया।

पीपल्स फोरम ने भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर पर बनी उनकी प्रोपेगैंडा फ़िल्म,‘आउट ऑफ साइट’ का भी प्रचार किया।

2019 के लोकसभा चुनावों से पहले, ‘द पीपल्स फोरम’ ने कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े ‘स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया’ (SFI) के नेता वी. श्रीनिवास राव के साथ मिलकर एक सेमिनार आयोजित किया।

इस कार्यक्रम का शीर्षक था ‘जमीन को गर्व महसूस कराएं: भारत के किसान संघर्ष और 2019 के चुनाव’। इसका मकसद मोदी सरकार के प्रति किसानों में बढ़ रहे असंतोष का फायदा उठाना और चुनावों के नतीजों पर असर डालना था।

सेमिनार के विवरण से ही इस भारत-विरोधी संगठन का नापाक एजेंडा जाहिर हो गया था

इसमें कहा गया, “इस साल (2019) की शुरुआत में, भारत में 16 करोड़ से ज्यादा किसानों और मजदूरों ने हड़ताल की। ​​पिछले कुछ सालों में भारत में किसान संघर्षों में जबरदस्त तेजी देखी गई, क्योंकि मोदी के शासन में भारतीय राजनीति ‘अति-दक्षिणपंथ’ की ओर झुक गई है। यह दुनिया की सबसे बड़ी आम हड़तालों में से एक थी।

लगभग तीन दशकों की नव-उदारवादी नीतियों और अपने अधिकारों पर हो रहे हमलों से थक-हारकर मजदूर सड़कों पर उतर आए। वे बेहतर आजीविका और कार्यस्थल पर लोकतंत्र की अपनी माँगों को लेकर आवाज उठा रहे थे। भारत सरकार की नीतियों के कारण, कृषि संकट बहुत गहरा गया है। मोदी सरकार के दौरान हर साल औसतन 12000 किसानों ने आत्महत्या की है।”

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि नेविल रॉय सिंघम द्वारा वित्तपोषित यह चीन-समर्थक और कम्युनिस्ट-समर्थक प्रचार संगठन ने ‘केरल मॉडल’ से जुड़ी ‘अच्छाईयों’ को फैलाता रहा है।

अप्रैल 2020 में आयोजित एक कार्यक्रम में, ‘द पीपल्स फोरम’ ने यह दावा किया, “जहाँ एक ओर भारत के प्रधानमंत्री मोदी दुनिया भर के नव-उदारवादी ‘कट्टर नेताओं’ की मिसाल पर चलते हुए, महामारी से लोगों की जान बचाने में नाकाम रहे हैं और संकट की गंभीरता को कम करके आँक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केरल एक बिल्कुल अलग मिसाल पेश करता है।”

इसमें कहा गया, “वामपंथी और कम्युनिस्ट पार्टियों के गठबंधन के नेतृत्व वाला केरल राज्य, अपने लोगों की भलाई के लिए सफल टेस्टिंग, संक्रमण की रोकथाम और ‘सामाजिककृत देखभाल’ के मामले में एक नया मानक स्थापित किया है। केरल में यह सब कैसे संभव हो पाया? और हम इस अनुभव से क्या सीख सकते हैं? इस चर्चा में शामिल होने के लिए शोधकर्ता सुबिन डेनिस और पत्रकार प्रशांत आर. के साथ जुड़ें।”

अक्टूबर 2019 में, नेविल रॉय सिंघम द्वारा वित्तपोषित संगठन ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी पर एक सेमिनार आयोजित किया और ‘हिंदुत्व’ की निंदा करने की आड़ में हिंदू धर्म पर हमला बोला।

इस कार्यक्रम का सारांश कुछ इस प्रकार था।

“गाँधी, जो स्वयं एक हिंदू थे, प्रेम को एक बुनियादी मानवीय भावना और आचरण मानते थे और सभी मनुष्यों तथा समस्त सृष्टि के प्रति इस प्रेम को अपने सभी विश्वासों, सिद्धांतों और व्यवहारों में पिरोने में सफल रहे। गाँधी का हिंदू धर्म न तो संकीर्ण था और न ही किसी को बाहर करने वाला और न ही वह किसी ‘अन्य’ की पहचान करता था। गाँधी के हिंदू धर्म और आज के ‘हिंदुत्व’ के बीच अंतर करना अत्यंत आवश्यक है।”

इस्लामी-वामपंथियों के लिए हिंदुत्व शब्द का इस्तेमाल करके हिंदू धर्म पर हमला करना एक आसान तरीका बन गया है। खास बात यह है कि कार्यक्रम को ‘हिंदूज़ फ़ॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) ने भी मिलकर प्रायोजित किया था।

इससे पहले, HfHR को ‘डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ नाम के हिंदू-विरोधी कार्यक्रम का भी समर्थन करते देखा गया था। OSINT हैंडल ‘Disinfo Lab’ के अनुसार, HfHR का गठन साल 2019 में ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) और ‘ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइनॉरिटीज ऑफ इंडिया’ (OFMI) ने मिलकर किया था।

‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ ने भी साल 2019 में ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन’ (NRC) को लेकर भारतीय मुसलमानों के बीच डर और अफरा-तफरी फैलाने की कोशिश की थी।

उन्होंने दावा किया, “हम कश्मीर के लोगों के हालिया बुरे अनुभव से और भारत के उन 19 लाख लोगों की स्थिति से खास तौर पर बहुत दुखी हैं, जो ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन’ जैसी बेतुकी चीज को थोपे जाने की वजह से बेघर हो गए हैं।”

सुनीता विश्वनाथ ‘Women for Afghan Women’ नाम के एक संगठन की सह-संस्थापक भी हैं, जिसे जॉर्ज सोरोस के Open Society Foundations (OSF)/ Open Society Institute (OSI) से फंडिंग मिलती है। अक्टूबर 2023 में, भारत में HfHr के एक्स (पहले Twitter) अकाउंट को रोक दिया गया था।

अपने Open Society Foundation के जरिए जॉर्ज सोरोस ने भारत में अशांति फैलाने की पूरी कोशिश की है। सोरोस से जुड़े संगठन भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए भारत-विरोधी तत्वों को समर्थन देते हैं और यह सब वे इसे ‘मजबूत’ करने के नाम पर करते हैं।

2023 में, विश्वनाथ ने Stanford University के National Press Club में एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जहाँ कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी भी मौजूद थे।

सुनीता विश्वनाथ ने NYC मेयर चुनाव प्रचार के दौरान जोहरान ममदानी का समर्थन किया था। ममदानी एक डेमोक्रेट सोशलिस्ट, लगातार झूठ बोलने वाला और हिंदू-विरोधी व्यक्ति है। ममदानी ने एक बार हिंदुओं को ‘हरामी’ कहा था। उसने 2002 के गुजरात दंगों के बारे में खुलेआम झूठ फैलाया और गुजरात के मुसलमानों के काल्पनिक रूप से मिटाए जाने का दावा किया। उसे CAIR और IAMC जैसे भारत-विरोधी इस्लामी संगठनों से आर्थिक समर्थन मिला।

विश्वनाथ के संगठन HfHR की स्थापना वर्ष 2019 में दो इस्लामी समर्थक समूहों द्वारा की गई थी, जिनके नाम Indian American Muslim Council (IAMC) और Organisation for Minorities of India (OFMI) हैं।

दिलचस्प बात यह है कि नेविल रॉय सिंघम की बहन शांति सिंघम ने ‘New Yorkers for Lower Cost’ नाम की Parliamentary Action Committee (PAC) में आर्थिक योगदान दिया था। इस PAC ने पिछले New York City मेयर चुनावों के दौरान डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट जोहरान ममदानी का समर्थन किया था। शांति सिंघम ने जून 2025 में लगभग $1,000 का योगदान दिया, जबकि उनके पति, डैनियल गुडविन ने $3,500 दान किए। गुडविन पहले नेविल रॉय सिंघम के स्वामित्व वाली Thoughtworks सॉफ्टवेयर कंपनी में एग्जीक्यूटिव के तौर पर काम कर चुके हैं।

शांति मैरी सिंघम शंघाई में CCP से जुड़े East China Normal University में एक अहम पद पर हैं। वह अपने भाई की राजनीतिक विचारधारा को मानती हैं और बताया जाता है कि इस विचारधारा को आगे बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका है। नेविल रॉय सिंघम ने CCP की मदद से जो नेटवर्क तैयार किया है, वह एक मार्क्सवादी-माओवादी अंतरराष्ट्रीय तंत्र है।

इसे प्रतिद्वंद्वी देशों को कमजोर करने, नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करने और भू-राजनीतिक बढ़त हासिल करने के उद्देश्य से, विभिन्न मुद्दों, गैर-लाभकारी कानूनों, डिजिटल मीडिया के माध्यम से एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह आधुनिक विध्वंस का ही एक रूप है। स्याही और रक्त—दोनों से पोषित, यह एक सूक्ष्म, परिष्कृत और प्रभावी गठजोड़ है। इसके जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि दुश्मन देश को CCP द्वारा पाली-पोसी गई दीमक ही भीतर से चाट जाएँ।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Shraddha Pandey
Shraddha Pandey
Senior Sub-Editor at OpIndia. Email: [email protected]

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

नरेंद्र मोदी स्टेडियम से SVP स्पोर्ट्स एन्क्लेव तक: समझें भारत का स्पोर्ट्स कैपिटल बनने की दिशा में कैसे आगे बढ़ रहा है अहमदाबाद

आज जब अहमदाबाद स्पोर्ट्स कैपिटल की बात होती है, तो यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे आकार लेती एक वास्तविकता जैसा लगता है।

आयातित नहीं अनादि है भारत की सभ्यता, विदेशी प्रोपेगेंडा फैलाना बंद करो: मोहनजोदड़ो की पशुपति मुहर पर ‘एलामाइट प्रभाव’ बताने वाली ऑड्रे ट्रुश्के की...

पशुपति मुहर को लेकर फिर शुरू हुई इतिहास की बहस। संस्कृति मंत्रालय, ऑड्रे ट्रुश्के और भारतीय विद्वानों के तर्कों के बीच समझिए पूरा विवाद।
- विज्ञापन -