दिल्ली में महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की व्यवस्था अब पूरी तरह डिजिटल होने जा रही है। राजधानी में 1 अगस्त से डीटीसी और क्लस्टर बसों में मुफ्त सफर का लाभ लेने के लिए पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड (नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड- NCMC) रखना अनिवार्य होगा।
अब तक महिलाओं को बस में चढ़ने के बाद मिलने वाला कागज का पिंक टिकट 31 जुलाई तक ही मान्य रहेगा। इसके बाद केवल वैध पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड रखने वाली महिलाएँ ही मुफ्त यात्रा कर सकेंगी। हालाँकि यदि किसी महिला के पास दिल्ली का वैध पता नहीं है, तो वह इस योजना के तहत मुफ्त बस यात्रा की पात्र नहीं होगी।
इस नई व्यवस्था का उद्देश्य टिकटिंग प्रणाली को डिजिटल बनाना, कागज आधारित टिकटों को खत्म करना और महिलाओं को एक ऐसा स्मार्ट कार्ड उपलब्ध कराना है, जिसका इस्तेमाल भविष्य में सार्वजनिक परिवहन के साथ-साथ डिजिटल भुगतान के लिए भी किया जा सके।
क्या है पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड और क्यों किया गया लागू?
पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड दिल्ली सरकार और दिल्ली परिवहन निगम (DTC) की नई डिजिटल टिकटिंग व्यवस्था का हिस्सा है। यह नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड (NCMC) पर आधारित स्मार्ट कार्ड है, जिसे केंद्र सरकार की ‘वन नेशन, वन कार्ड’ पहल के तहत विकसित किया गया है। इस योजना की शुरुआत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 2 मार्च को की थी।
अब तक महिलाओं को हर यात्रा के दौरान बस में कंडक्टर से पिंक टिकट लेना पड़ता था, लेकिन नई व्यवस्था में बस में चढ़ते समय कार्ड को टिकट मशीन पर टैप करना होगा। टैप करते ही मुफ्त यात्रा दर्ज हो जाएगी और अलग से कागज का टिकट लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
इससे यात्रा प्रक्रिया तेज होगी और टिकट वितरण का पूरा रिकॉर्ड भी डिजिटल रूप से दर्ज होगा। दिल्ली सरकार के अनुसार, मुफ्त बस यात्रा का लाभ केवल दिल्ली की पात्र महिला निवासियों को मिलेगा। इसी वजह से पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड जारी करने के लिए दिल्ली के पते वाला वैध पहचान पत्र अनिवार्य रखा गया है।
दो तरह के कार्ड, मुफ्त यात्रा के साथ मिलेगी डिजिटल भुगतान की सुविधा
डीटीसी फिलहाल महिलाओं के लिए दो प्रकार के पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड जारी कर रहा है। पहला जीरो केवाईसी (Zero KYC) कार्ड है, जिसे आधार कार्ड और ओटीपी सत्यापन के जरिए आसानी से जारी किया जाता है। यह मुख्य रूप से मुफ्त बस यात्रा के लिए बनाया गया है।
दूसरा फुल केवाईसी (Full KYC) कार्ड है, जिसमें बैंक की पूरी सत्यापन प्रक्रिया पूरी करनी होती है। इसके लिए ऑनलाइन आवेदन, दस्तावेजों की जाँच और वीडियो केवाईसी की प्रक्रिया पूरी की जाती है। सत्यापन पूरा होने के बाद यह कार्ड आवेदक के घर डाक के जरिए भेजा जाता है।
फुल केवाईसी कार्ड की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह डेबिट कार्ड की तरह भी काम कर सकता है। इसमें बैंक खाते या UPI के जरिए राशि जोड़ने के बाद इसका उपयोग दिल्ली मेट्रो, नमो भारत ट्रेनों और एनसीएमसी स्वीकार करने वाले मॉल, दुकानों तथा अन्य स्थानों पर भुगतान के लिए किया जा सकता है।
हालाँकि डीटीसी बसों में मुफ्त यात्रा के लिए कार्ड में बैलेंस होना जरूरी नहीं है। वहाँ केवल कार्ड को टैप करना पर्याप्त होगा।
कैसे बनवाएँ पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड, कौन है पात्र?
पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड का लाभ लेने के लिए आवेदक का दिल्ली का निवासी होना आवश्यक है। महिला के पास दिल्ली के पते वाला वैध आधार कार्ड या अन्य स्वीकृत पहचान पत्र होना चाहिए। फुल केवाईसी कार्ड बनवाने के लिए डीटीसी द्वारा अधिकृत बैंक के ऑनलाइन पोर्टल पर आवेदन करना होगा।
आवेदन के दौरान आधार कार्ड, पासपोर्ट साइज फोटो और अन्य व्यक्तिगत जानकारी देनी होगी। आवश्यकता पड़ने पर बैंक पैन कार्ड भी माँग सकता है। इसके बाद वीडियो केवाईसी पूरी होने पर कार्ड तैयार कर आवेदक के पते पर भेज दिया जाएगा।
इसके अलावा डीटीसी और दिल्ली सरकार ने शहर भर में 50 अधिकृत पिंक कार्ड वितरण केंद्र भी बनाए हैं, जहाँ पात्र महिलाएँ आवश्यक दस्तावेजों के साथ जाकर कार्ड प्राप्त कर सकती हैं। अधिकारियों के अनुसार, अब तक करीब 11 लाख कार्ड जारी किए जा चुके हैं और सरकार ने जुलाई के अंत तक यह संख्या 13 लाख तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है।
इसी उद्देश्य से डीटीसी बसों और डिपो में विशेष जागरूकता अभियान भी चला रही है ताकि अधिक से अधिक महिलाएँ समय रहते कार्ड बनवा सकें।
1 अगस्त से लागू होंगे नए नियम, बिना कार्ड नहीं मिलेगी मुफ्त यात्रा
डीटीसी के नए निर्देशों के अनुसार, 31 जुलाई तक महिलाओं को पहले की तरह पिंक टिकट जारी किए जाएँगे, लेकिन 1 अगस्त से यह व्यवस्था बदल जाएगी। इसके बाद केवल उन्हीं महिलाओं को मुफ्त यात्रा का लाभ मिलेगा जिनके पास वैध पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड होगा और जो बस में चढ़ते समय उसे टिकट मशीन पर टैप करेंगी।
यदि किसी महिला के पास यह कार्ड नहीं होगा, तो उसे मुफ्त पिंक टिकट जारी नहीं किया जाएगा। ऐसी स्थिति में उसे डीटीसी और डीआईएमटीएस (क्लस्टर) बसों में सामान्य यात्रियों की तरह निर्धारित किराया देकर टिकट खरीदना होगा।
डीटीसी ने अपने सभी कंडक्टरों, प्रवर्तन कर्मचारियों और डिपो प्रबंधकों को निर्देश दिए हैं कि वे महिला यात्रियों को नई व्यवस्था की जानकारी दें, पात्र महिलाओं को कार्ड बनवाने के लिए प्रेरित करें और जिन महिलाओं के पास वैध कार्ड हो, उन्हें किसी भी स्थिति में मुफ्त यात्रा से वंचित न किया जाए।
डीटीसी ने यात्रियों के लिए अलग-अलग रंगों के स्मार्ट कार्ड भी तय किए हैं। महिलाओं के लिए गुलाबी, सामान्य यात्रियों के लिए नीला और वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों तथा अन्य रियायत प्राप्त यात्रियों के लिए नारंगी कार्ड निर्धारित किया गया है। हालाँकि विभाग ने स्पष्ट किया है कि नारंगी कार्ड जारी करने की प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई है।
नई व्यवस्था के साथ दिल्ली सरकार सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड महिलाओं को न केवल डीटीसी और क्लस्टर बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा देगा, बल्कि फुल केवाईसी संस्करण के जरिए मेट्रो, नमो भारत ट्रेनों और डिजिटल भुगतान जैसी अतिरिक्त सुविधाओं का लाभ भी मिलेगा।
ऐसे में 1 अगस्त से पहले पात्र महिलाओं के लिए यह कार्ड बनवाना जरूरी हो गया है, ताकि मुफ्त यात्रा की सुविधा बिना किसी रुकावट के जारी रह सके।
राज्यों की पुलिस और देश की सेना से इतर सीआरपीएफ भारत का एक प्रमुख केन्द्रीय पुलिस बल है, जिसे आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने का काम देश ने सौंपा है। इसकी स्थापना 27 जुलाई 1939 को ब्रिटिश शासन के दौरान क्राउन रिप्रेजेंटेटिव्स पुलिस के रूप में हुई थी।
स्वतंत्रता के बाद 28 दिसंबर 1949 को संसद ने CRPF अधिनियम के तहत इसका नाम बदलकर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल कर दिया। यह केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। जानकारी के मुताबिक, अब तक सीआरपीएफ के 2255 बहादुर जवानों ने देश की सेवा में अपने प्राणों की आहूति दी।
क्यों हुई थी सीआरपीएफ की स्थापना
ब्रिटिश सरकार ने तत्कालीन रियासतों में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस बल का गठन किया था। आजादी के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसकी भूमिका का विस्तार करते हुए इसे देश की आंतरिक सुरक्षा की सबसे महत्वपूर्ण केंद्रीय पुलिस बल के रूप में विकसित किया।
28 दिसंबर 1949 में संसद में अधिनियम के जरिए इसका नाम बदलकर केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ किया गया था। इसके बाद इसकी भूमिका भी बदल गई। इसे केन्द्र के अधीन एक सशस्त्र यूनिट बनाई गई। सरदार पटेल ने इसे भारत की जरूरतों के मुताबिक ढाला था।
देशी रियासतों के एकीकरण और देश के विभाजन के दौरान हुए दंगों के निपटने में सीआरपीएफ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे पहले आजादी से पहले 1959 में हुए हॉट स्प्रिंग्स और आजादी के बाद 1965 में हुए सरदार पोस्ट की जंग में इसकी बहादुरी की गाथा आज भी गाई जाती है।
CRPF की भूमिका और जिम्मेदारियाँ
सीआरपीएफ राज्यों की कानून व्यवस्था को बनाए रखने में मदद करता है। देश में आतंकवादियों और उग्रवाद विरोधी अभियानों में सबसे आगे रहता है। नक्सल विरोधी अभियानों में सीआरपीएफ की अहम भूमिका रही, जिसके दम पर देश नक्सल मुक्त हो पाया यानी देश की आंतरिक सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने में इसकी भूमिका अहम है।
इसके अंतर्गत 246 बटालियन शामिल हैं। सीआरपीएफ का नेतृत्व महानिदेशक करता है और इसे चार हिस्सों में विभाजित किया गया है। जम्मू , कोलकाता, हैदराबाद और गुवाहाटी यानी उत्तर-दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों क्षेत्र के लिए अलग- अलग महानिदेशक हैं जो इस अर्धसैनिक बलों को कंट्रोल करते हैं।
कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी- देश के किसी भी क्षेत्र में हो रही सभाओं, विरोध प्रदर्शनों और दूसरे तरह की जमावड़े के दौरान भीड़ को नियंत्रित करना सीआरपीएफ की जिम्मेदारी है और इसके लिए इनके जवानों को तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
आतंकवादियों से निपटने के लिए हर खतरे वाली जगहों पर इसकी तैनाती होती है, जहाँ ये आधुनिक शस्त्रों से लैस होते हैं और इसके लिए इन्हें खास तौर पर प्रशिक्षित किया जाता है।
नक्सल मुक्त भारत बनाने में सीआरपीएफ का अहम रोल
सीआरपीएफ की यूनिट को खास तौर पर नक्सली क्षेत्रों में लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया गया है, इसलिए राज्य पुलिस के साथ मिलकर ये नक्सल प्रभावित राज्यों में अभियान चलाती रही हैं। स्थानीय लोगों के साथ मिलकर उनमें विश्वास पैदा करना और विकास परियोजनाओं को सुरक्षा देना भी इसका काम है।
कोबरा कमांडो बटालियन- नक्सलियों के गुरिल्ला युद्ध और जंगलों में अभियान को अंजाम देने के लिए सीआरपीएफ के कोबरा कमांडो बटालियन को बनाया गया है। ये बटालियन अपने काम को बखूबी अंजाम देता रहा है। देश को नक्सल मुक्त करने में इसकी अहम भूमिका रही है।
माओवादी नक्सलियों से जंगल में उनकी शैली में ही लड़ना कोई आसान काम नहीं है। ‘जंगल योद्धा’ के रूप में कोबरा कमांडो ने सही रणनीति अपना कर इसे निभाया। इसके लिए इन जवानों को खास प्रशिक्षण दिया गया है। 2008 से 2011 के बीच कोबरा की 10 इकाइयाँ बनाई गई। इन्हें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा, झारखंड आंध्रप्रदेश समेत दूसरे वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों में तैनात किया गया। इस बटालियन को जंगलों में अभियान चलाने में महारत हासिल है।
इतना ही नहीं सीआरपीएफ को वीआईपी सुरक्षा में भी लगाया जाता है। करीब 5.68 फीसदी सीआरपीएफ अभी भी वीआईपी सुरक्षा में लगे हुए हैं। देश के प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्रियों, लोकसभा के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति-उपसभापति समेत दूसरे गणमान्य लोगों की सुरक्षा में तैनात हैं।
इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम जैसे राज्यों के राज्यपाल, मुख्यमंत्री समेत तमाम मंत्रियों, सांसद-विधायक आदि की सुरक्षा के लिए इन्हें तैनात किया जाता है।
वीआईपी सुरक्षा विंग- सीआरपीएफ की वीआईपी सुरक्षा विंग को वीआईपी सुरक्षा में विशेषज्ञता हासिल है। जिन्हें ये सुरक्षा प्रदान करती हैं, उनमें केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राजनेता, सरकारी अधिकारी, आध्यात्मिक नेता, व्यवसायी और दूसरी प्रमुख हस्तियाँ शामिल हैं। यह खास इकाई वीआईपी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी सावधानी और पेशेवर अंदाज में काम करती है।
संसद भवन की सुरक्षा का जिम्मा भी पहले सीआरपीएफ निभाती थी। इसलिए जब 2001 में संसद पर हमला हुआ था तो सीआरपीएफ के जवान भी बलिदान हुए, लेकिन अपने अदम्य साहस से आतंकियों के मंसूबों को नाकाम किया था।
सीआरपीएफ का करीब 8.5 फीसदी हिस्सा देश के अहम प्रतिष्ठानों, हैरिटेज और आवास की सुरक्षा में लगे हुए हैं। उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में खास तौर पर इन्हें लगाया गया है। यहाँ सरकारी सचिवालय, दूरदर्शन केन्द्र, बैंक, टेलीफोन एक्सचेंज, विकास परियोजनाएँ और जेलों की सुरक्षा ये करते हैं।
लोकतंत्र के लिए सबसे अहम संसदीय चुनाव के दौरान इनकी भूमिका अहम होती है। चाहे लोकसभा चुनाव हो या किसी राज्य में विधानसभा चुनाव। सीआरपीएफ हर पोलिंग बूथ से लेकर ईवीएम को सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाता है। वोट देने आने वाले हर व्यक्ति पर उसकी नजर होती है।
यह गृह मंत्रालय, चुनाव आयोग और राज्य पुलिस के साथ समन्वय कर काम करता है। निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को सुनिश्चित करने में सीआरपीएफ का अहम रोल है। इसके लिए इन्हें खास ट्रेनिंग दी जाती है।
पर्यावरण, आपदा और यूएन मिशन में योगदान
सीआरपीएफ की यूनिट को जू, वन्यजीव अभ्यारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों की रक्षा के लिए भी तैनात किया जाता है। अवैध कटाई रोकने के अभियान में भी इन्हें लगाया जाता है। देश के किसी क्षेत्र में बाढ़- बारिश आए या भूकंप और सुनामी- चक्रवात जैसे प्राकृतिक आपदा, हर समय सीआरपीएफ मुस्तैद रहता है।
राहत और बचाव कार्यों में इसकी अहम भूमिका होती है। इसके लिए भी इन्हें खास ट्रेनिंग दी जाती है ताकि मानवीय सहायता करने में कोई दिक्कत पेश न आए।
सीआरपीएफ अंतर्राष्ट्रीय मिशन में भी जाता है। यूएन के अंतरराष्ट्रीय शांतिरक्षा के प्रयास में इसका योगदान रहा है। दुनियाभर में भीड़ नियंत्रण, आतंकवाद विरोधी अभियान और कानून व्यवस्था बनाए रखने में इसकी विशेषज्ञता का उपयोग किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय शांति मिशन पर सीआरपीएफ के पुरुष और महिला दोनों जाते हैं। इन्हें इसके लिए ट्रेनिंग दी जाती है।
दंगा नियंत्रण और वीआईपी सुरक्षा से लेकर उग्रवाद से निपटने में इसकी भूमिका अहम है यानी सीआरपीएफ का काम बहुमुखी है।
रैपिड एक्शन फोर्स – सीआरपीएफ की यूनिट रैपिड एक्शन फोर्स एक खास यूनिट है जिसे अक्टूबर 1992 में दंगों और हिंसा से निपटने के लिए बनाया गया था। यह संकट के वक्त तुरंत तैनात किया जाता है और शांति बहाल करना इसकी जिम्मेदारी होती है। आरपीएफ का अपना ध्वज भी है,जो शांति का प्रतीक है। इसे 7 अक्टूबर 2003 में तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने इसे ध्वज प्रदान किया था।
महिला बटालियन: सीआरपीएफ भारत का एकमात्र अर्धसैनिक बल है जिसमें 6 महिला बटालियन हैं। इसकी पहली महिला बटालियन का गठन 1986 में हुआ था। इसका नाम 88(एम) बटालियन है, जिसका मुख्यालय दिल्ली में है।
ये बटालियन खास तौर पर ऐसे आंदोलन या सभा जिसमें महिलाएँ ज्यादा होती हैं, वहाँ तैनात की जाती है, ताकि शांति व्यवस्था बनाने में दिक्कत न हो। इन जगहों पर पुरुष जवानों को तैनात करने में काफी दिक्कत हो सकती है, क्योंकि मामूली सी लापरवाही भी कानून-व्यवस्था की गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। महिला बटालियन यह सुनिश्चित करती हैं कि ऐसी स्थितियों को संवेदनशीलता और कुशलता से संभाला जाए।
सीआरपीएफ की राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता का इतिहास रहा है। इन उपलब्धियों में सीमा पर देश की सुरक्षा करने से लेकर आंतरिक खतरों से निपटने में इसका योगदान अहम है। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान जनता को राहत पहुँचाने और जानमाल की रक्षा में ये लगा रहता है। द
संसद की सुरक्षा से लेकर अयोध्या में हुए हमलों को नाकाम किया
संसद की सुरक्षा में तैनात सीआरपीएफ के जवानों ने 2001 में संसद में आतंकियों के हमले से रक्षा की। यही नहीं जब 2005 में अयोध्या में हमला हुआ तो उसे भी नाकाम किया। 80 के दशक में पंजाब का उग्रवाद हो या पूर्वोत्तर का संघर्ष हर जगह सीआरपीएफ ने स्थिति को नियंत्रित करने में भूमिका निभाई। यही वजह है कि इसे 2001 में प्राथमिक आंतरिक सुरक्षा बल का नाम दिया गया।
देश के अंदर उग्रवादियों से निपटने में सीआरपीएफ हमेशा आगे रहा है। यही वजह है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनात जवानों में एक तिहाई सीआरपीएफ के हैं। पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक और बिहार से लेकर आंध्र प्रदेश तक नक्सलवाद के उन्मूलन में इसका अहम रोल रहा।
ओडिशा, बंगाल और दक्षिण-पश्चिम राज्यों में चक्रवात आए हों या सुनामी, हर जगह सीआरपीएफ मदद के लिए सबसे आगे रहा है। 2001 का गुजरात में आए भयानक भूकंप, 2005 में आए जम्मू कश्मीर भूकंप में इसने राहत कार्यों की सबने सराहना की। हर साल बाढ़ देश के कई राज्यों को डुबोता है। ऐसे में कई गाँव और इलाके मुख्य मार्ग से कट जाते हैं। ऐसे जगहों तक राहत सामग्री बाँटने से लेकर लोगों को निकालने का काम भी सीआरपीएफ करती है।
संयुक्त राष्ट्र शांतिरक्षा अभियानों में सीआरपीएफ की अहम भूमिका रही है। श्रीलंका, हैती, कोसोवो और लाइबेरिया में सीआरपीएफ का काम काफी सराहनीय रहा।
जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ चल रहा छात्र आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खत्म हो गया। GenZ के इस आंदोलन में गाली-गलौज, गुस्सा, पत्थरबाजी, लाठीचार्ज सब देखने को मिला लेकिन अंतत: जंतर-मंतर पर सब समाप्त हो गया। युवाओं की भावनाओं का आवेग थम गया लेकिन सियासी रस्सा-कस्सी अभी भी जारी है। वामी-इस्लामी गुट से लेकर विपक्षी राजनेता तक सब इस आंदोलन की आड़ में अब अपना-अपना हित साधने में लगे हैं।
किसी को वोट चाहिए, किसी को PM मोदी के खिलाफ माहौल बनाना है, किसी को अब हिंदू धर्म और हिंदुओं को गाली देने का मौका मिल गया है। कुछ लोग चाहते हैं कि आंदोलन की यह आग लगी रहे, उन्हें उम्मीद है कि हो सकता है कि इसमें मोदी की सरकार झुलस जाए।
यह आंदोलन छात्रों की आवाज का आंदोलन था इसमें कोई शक नहीं। लाखों छात्र हर साल अपनी उम्र के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष किताबों, कोचिंग, मॉक टेस्ट और अनगिनत उम्मीदों के बीच बिताते हैं। उनके लिए परीक्षा जीवन की दिशा तय करने वाला मोड़ होती है। इसलिए जब किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो गुस्सा आना तो स्वाभाविक है ही। युवाओं में यह आक्रोश किसी राजनीतिक दल ने पैदा नहीं किया बल्कि उस व्यवस्था के प्रति पैदा हुआ जिस पर छात्रों ने भरोसा किया था।
अब धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है तो अब इस आंदोलन के लिए सरकार से भिड़ गए युवाओं सामने एक चुनौती भी है। छात्र और युवाओं का एक वर्ग इस आंदोलन के लिए सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक पर इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि उसने यह महसूस किया कि यह आंदोलन किसी निजी या राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि वास्तविक समस्या के समाधान के लिए हो रहा है लेकिन अब इसके खत्म होने के बाद असली मकसद और चेहरे दिखने लगे हैं।
सरकारी विरोधी और प्रोपेगेंडाबाज लोगों ने अपने-अपने हितों के हिसाब से इंटरनेट पर प्रोपेगेंडा भरना शुरू कर दिया है। इंटरनेट पर सरकार विरोधी सामग्री की भरमार है। दरअसल, आज की पीढ़ी इंटरनेट के युग में जी रही है। पहले किसी आंदोलन को प्रभावित करने के लिए सभाएँ करनी पड़ती थीं, पोस्टर लगाने पड़ते थे और महीनों तक घूमना पड़ता था। आज एक वायरल वीडियो, एक ट्रेंडिंग हैशटैग या एक भावनात्मक पोस्ट लाखों लोगों की सोच को प्रभावित कर सकती है।
यही इस दौर की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ा खतरा भी। आपमें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने PM मोदी को गाली देते, सरकार का विरोध करते और आधी अधूरी जानकारी की आड़ में झूठ और प्रोपेगेंडा फैलाते लोगों के वीडियो नहीं देखे होंगे। यही एल्गोरिद्म का करिश्मा है और यही आपको आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा। ऐसी सब कोशिशें की जाएँगी कि इस गुस्से को भड़काया जाए, चाहे इसके लिए झूठ का ही सहारा क्यों ना लेना पड़े।
ऐसे माहौल में अब GenZ की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह किसी भी वायरल वीडियो को अंतिम सच न माने। हर वीडियो पूरी कहानी नहीं बताता। हर क्लिप संदर्भ नहीं बताती। हर ट्रेंड जनभावना का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यदि युवा केवल एल्गोरिद्म के अनुसार सोचने लगेंगे तो वे अपनी सबसे बड़ी ताकत ‘स्वतंत्र सोच’ को खो देंगे।
GenZ को यह समझने की जरूरत है कि किसी भी आंदोलन में राजनीतिक दल उस मुद्दे पर अपनी राय रख सकते हैं। यह उनका अधिकार है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि छात्र अपनी डोर विरोधी दल के हाथों में ना दे दें। किसी भी दल का समर्थन स्वीकार करना और किसी दल का राजनीतिक मंच बन जाना इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।
भारत का युवा राजनीतिक रूप से अत्यंत सक्रिय है। लगभग हर बड़ा मुद्दा कुछ ही घंटों में राजनीतिक बहस का विषय बन जाता है। यही लोकतंत्र की वास्तविकता भी है। लेकिन युवाओं के सामने चुनौती यह है कि वे स्वयं को केवल एक गुट तक सीमित न कर दें। यदि कोई सरकार अच्छा काम करती है, तो उसकी सराहना हो सकती है। यदि वही सरकार कहीं चूकती है, तो उसकी आलोचना भी होनी चाहिए।
उसी प्रकार यदि विपक्ष कोई उचित प्रश्न उठाता है, तो उस पर विचार होना चाहिए। लेकिन यदि एक गुट छात्रों के मुद्दे को केवल चुनावी हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है तो उस पर सवाल उठने ही चाहिए। लोकतंत्र में सबसे मजबूत नागरिक वही होता है जो किसी दल का अंध समर्थक या अंध विरोधी नहीं होता। यही अब GenZ को समझने की जरूरत है।
यह तो बस शुरुआत है, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के शनिवार (25 जुलाई 2026) को इस्तीफा देने के बाद अपने पहले वीडियो संदेश में एक खुली चेतावनी जारी की है।
सोशल मीडिया पर साझा किए गए इस वीडियो में, दिपके ने सरकार को सीधे तौर पर चेतावनी दी और यह दावा किया कि एक केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ना यह साबित करता है कि एकजुट जन दबाव क्या कुछ हासिल कर सकता है।
अपने मुख्य रुख को दोहराते हुए, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मंत्री का इस्तीफा उनकी लड़ाई का अंत नहीं है, बल्कि यह तो महज एक शुरुआत है।
Dipke just dropped a video from his bed.
Says he’s finally getting some rest after 37 days. Thanks everyone who supported them, apologises for not meeting people at Jantar Mantar because of typhoid, and even thanks the critics for asking hard questions.
बढ़ती अशांति के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दिया
यह राजनीतिक तूफान तब चरम पर पहुँच गया जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार (25 जुलाई 2026) को अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी। यह फैसला NEET-UG पेपर लीक को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों और दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के बीच आया है।
देश के युवाओं के नाम लिखे दो पन्नों के एक विस्तृत सार्वजनिक पत्र में, प्रधान ने कहा कि उन्होंने छात्रों के हित में और यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ के लिए फायदा न उठाया जाए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया है।
एक छात्र, शिक्षक और सुधार समर्थक के रूप में शिक्षा के साथ अपने चार दशक लंबे जुड़ाव को याद करते हुए, प्रधान ने अपने इस मूल विश्वास को दोहराया कि एक मजबूत, समावेशी और पारदर्शी शिक्षा प्रणाली ही एक मजबूत राष्ट्र की आधारशिला होती है।
NEET-UG परीक्षा का जिक्र करते हुए, प्रधान ने 3 मई 2026 को स्वीकार किया कि इसमें गड़बड़ियाँ हुई थीं। उन्होंने रेखांकित किया कि केंद्र सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए इसकी जाँच CBI को सौंपी, परीक्षा रद्द की और एक नई परीक्षा की तारीख तय की।
इसके अलावा उन्होंने यह भी बताया कि पूरी पारदर्शिता लाने के लिए सरकार ने अगले साल से NEET को कंप्यूटर-आधारित परीक्षा (CBT) प्रारूप में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया है।
पूर्व मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार का मुख्य ध्यान यह सुनिश्चित करने पर था कि 20 लाख से अधिक छात्र बिना किसी परेशानी के दोबारा परीक्षा में शामिल हो सकें।
उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे केंद्र व राज्य सरकारों, जिला प्रशासनों, छात्रों और अभिभावकों ने मिलकर 21 जून को नई परीक्षा को सफलतापूर्वक आयोजित करने के लिए तालमेल के साथ काम किया।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों और सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल पर टिप्पणी करते हुए, उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे भ्रम में न पड़ें और न ही लंबे कानूनी और राजनीतिक विवादों में खिंचे चले जाएँ।
उन्होंने आगाह किया कि राष्ट्रविरोधी ताकतों को इस स्थिति का फायदा उठाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और छात्रों से आग्रह किया कि वे अपना ध्यान वापस अपनी पढ़ाई और करियर पर केंद्रित करें।
वामपंथी और इस्लामवादी खुलेआम धमकियां दे रहे हैं और अराजकता का आह्वान कर रहे हैं
मंत्री के इस्तीफे के बाद, इंटरनेट पर मिली-जुली प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। हालाँकि वामपंथियों, उदारवादियों और कट्टरपंथी इस्लामवादियों की ओर से धमकियों की एक साफ़ लहर उभरती हुई दिखाई दी, जहाँ मंत्री के पद छोड़ने के बावजूद बड़े पैमाने पर सड़क आंदोलनों और अराजकता की परोक्ष धमकियाँ खुले तौर पर साझा की गईं।
सोशल मीडिया पर सत्ताधारी सरकार को निशाना बनाते हुए कई भड़काऊ पोस्ट और आक्रामक वीडियो देखने को मिले। वामपंथी प्रोपेगैंडा वेबसाइट द वायर की आरफा खानम शेरवानी ने शनिवार (25 जुलाई 2026) को एक्स पर एक रहस्यमयी ट्वीट पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने लिखा, “धर्मेंद्र प्रधान तो बस ट्रेलर हैं…”, जिसका यह संकेत था कि यह इस्तीफा केवल एक शुरुआत थी और देश में आगे और अधिक उथल-पुथल की माँगों की तरफ इशारा किया गया था।
इसी तरह, वामपंथी विचारधारा समर्थक छात्र संगठन SFI (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) के सदस्यों ने प्रधान के इस्तीफे का जश्न मनाने के लिए सोशल मीडिया पर लाल रंग के प्रतीकों की बाढ़ ला दी। इंटरनेट पर प्रसारित हो रहे एक वीडियो में, SFI की एक कार्यकर्ता को प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ नारेबाजी करते हुए सुना गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जिक्र करते हुए उसने कहा, “चाय वाले चाचा, अब आपका भी जाने का समय आ गया है, जाओ, जाओ, इस्तीफा दो।” यह नारा प्रधान के इस्तीफे के बाद मनाए जा रहे जश्न के बीच लगाया गया था।
अन्य इंटरनेट यूजर्स भी तुरंत इस मुहिम में शामिल हो गए ताकि सत्ताधारी सरकार के व्यापक पतन के लिए दबाव बनाया जा सके। यूजर तरुण गौतम ने विरोध प्रदर्शनों को और बढ़ाने का आह्वान करते हुए एक्स पर लिखा, “धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से ही संतुष्ट मत हो जाना। अब मोदी हैं जिन्हें जाना होगा।”
Do not settle with Dharmendra Pradhan’s resignation. It’s Modi who must go now.
एक अन्य वायरल पोस्ट में भी इसी तरह की भावना देखने को मिली, जिसमें पूरे मंत्रिमंडल के खिलाफ समर्थकों को लामबंद करने का प्रयास किया गया था, “अब धर्मेंद्र, अगला मोदी, अगला अमित शाह, अगला गडकरी, अगला अगला हम कब तक हर एक के लिए लड़ते रहेंगे, एक बार पूरी भाजपा टीम के खिलाफ खड़े हो जाओ, इनमें से किसी की भी कोई जवाबदेही नहीं है।”
Do not settle with Dharmendra Pradhan’s resignation. It’s Modi who must go now.
यहाँ तक कि इस्तीफा मिलने से उत्साहित हुए CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने भी सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो में देश की सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस कर्मियों को खुली चुनौती दी।
उन्होंने लिखा, “यह तो सिर्फ 1 इस्तीफा है, 20 जुलाई और उसके बाद छात्रों पर दर्ज किए गए मामलों को वापस लो। एक कॉकरोच से पंगा मत लो। अगर हम एक मंत्री से इस्तीफा दिलवा सकते हैं, तो तुम पुलिस वाले हमारे सामने कुछ भी नहीं हो।” प्रधान के इस्तीफे के बाद यह बयान इंटरनेट पर बड़े पैमाने पर प्रसारित हुआ।
“It's just 1 resignation; withdraw cases against students on July 20 & later.
Don't mess with cockroach.
If we can make Minister resign then you cops are nothing for us.”
विपक्षी राजनीतिक नेता भी इस घोषणा के बाद तुरंत जीत का दावा करने में जुट गए। AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने जनता और छात्र समुदाय को बधाई देते हुए एक बयान जारी किया, “आप सभी को बधाई। हमारे देश के युवाओं को बधाई। यह बहुत बड़ी खुशी की बात है कि आपका संघर्ष रंग लाया है। अंततः धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना ही पड़ा। यह हमारे लोकतंत्र की एक बड़ी जीत है। हमारे देश में लोगों का लोकतंत्र से भरोसा उठने लगा था। उन्हें लगता था कि सरकारें सुनती ही नहीं हैं। लोग सरकार के सामने अपनी आवाज उठाते थे और हाथ जोड़कर विनती करते थे, लेकिन सरकार कभी नहीं सुनती थी।”
VIDEO | AAP National Convenor Arvind Kejriwal (@ArvindKejriwal) says, "Congratulations to all of you. Congratulations to the youth of our country. It is a matter of great joy that your struggle has borne fruit. Dharmendra Pradhan ultimately had to resign. This is a great victory… pic.twitter.com/yXsDyNLWUQ
पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने भी सत्ताधारी पार्टी पर तीखा तंज कसते हुए कहा, “जब से देश में भाजपा सत्ता में आई है, परीक्षा के पेपर बिकने शुरू हो गए हैं। वे लीक हुए और देश भर में लाखों बच्चे इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतर आए… भाजपा का पतन शुरू हो चुका है। आज से यही बच्चे जो विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, जब भी कोई राज्य या राष्ट्रीय चुनाव आएगा, भाजपा को मुंहतोड़ जवाब देंगे।”
#WATCH | Chandigarh: On the resignation of Union Education Minister Dharmendra Pradhan, Punjab Finance Minister Harpal Singh Cheema says, "Ever since the BJP came to power in the country, exam papers started being sold. They were leaked, and lakhs of children across the country… pic.twitter.com/c6qhv1weJh
जहाँ एक तरफ पंजाब के मंत्री और विपक्ष के नेता केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे से साफ तौर पर बेहद खुश नजर आ रहे थे, वहीं यह उनकी राजनीतिक बयानबाजी में दोहरे मापदंड को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। इन राजनीतिक नेताओं या कार्यकर्ता समूहों में से किसी ने भी गैर-भाजपा शासित राज्यों में हुए इसी तरह के परीक्षा घोटालों, जैसे कि हाल ही में हुए पंजाब फार्मेसी पेपर लीक को न तो स्वीकार किया है और न ही उसकी निंदा की है।
इसके अलावा न तो CJP और न ही विपक्ष के टिप्पणीकारों ने गैर-भाजपा शासित राज्यों के शिक्षा मंत्रियों के इस्तीफे की माँग की है, जैसे कि कर्नाटक में मधु बंगारप्पा या खुद पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस।
Was waiting for this.
Do you know why Abhijeet Dipke didn’t speak about the Punjab paper leak on 19 July 2026? Because the government there is led by AAP. If he can question the BJP so aggressively, why was there complete silence on Punjab?
इस चुनिंदा चुप्पी ने इस बात पर वाजिब सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या यह आक्रोश वास्तव में छात्रों की सुरक्षा को लेकर है या फिर महज़ किसी एक राजनीतिक दल के खिलाफ राजनीतिक माहौल का फ़ायदा उठाने के लिए है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
साल 2024 का NEET-UG पेपर लीक किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रश्नपत्र से भरा ट्रंक खोल देने से शुरू नहीं हुआ था। केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) के अनुसार, यह एक ऐसे संगठित नेटवर्क का नतीजा था, जिसने एडमिशन कंसल्टेंट्स, करियर काउंसलिंग ऑपरेटरों, परीक्षा केंद्र के अधिकारियों, अभ्यर्थियों तक पहुँच बनाने वाले एजेंटों, सॉल्वर के रूप में नियुक्त MBBS छात्रों, गेस्ट हाउस संचालकों, ड्राइवरों, प्रिंटरों और वित्तीय बिचौलियों को एक-दूसरे से जोड़ रखा था।
दो साल बाद तरीका भले ही बदल गया, लेकिन जाँच एजेंसी के अनुसार इस पूरे कारोबारी तंत्र का अस्तित्व बना रहा। NEET-UG 2026 मामले में CBI ने कहा कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) द्वारा विषय विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त लोगों ने गोपनीय प्रश्नों को निजी कोचिंग क्लासों और कोचिंग से जुड़े बिचौलियों के माध्यम से आगे पहुँचाया।
केमिस्ट्री के व्याख्याता पीवी कुलकर्णी को इस पूरे मामले में एक प्रमुख स्रोत बताया गया। जाँच के अनुसार, उनके घर पर आयोजित विशेष कक्षाओं के दौरान बताए गए प्रश्न 3 मई 2026 को आयोजित NEET-UG परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों से मेल खाते थे।
ये दोनों मामले दिखाते हैं कि पेपर लीक को केवल सीलबंद प्रश्नपत्रों की आवाजाही में हुई चूक के रूप में नहीं देखा जा सकता। कोचिंग माफिया एक संगठित बाजार की तरह काम करता है।
यह ऐसे परिवारों की तलाश करता है जो पैसे देने को तैयार हों, गोपनीय जानकारी तक पहुँच रखने वाले अंदरूनी लोगों को खोजता है, प्रश्न हल करने या पढ़ाने में सक्षम लोगों की भर्ती करता है, उम्मीदवारों के रहने और आने-जाने की व्यवस्था करता है, पैसे और जरूरी दस्तावेज इकट्ठा करता है और परीक्षा शुरू होने से पहले ही उन्हें अनुचित लाभ पहुँचाने का काम करता है।
यहाँ कोचिंग माफिया शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि देश के सभी कोचिंग संस्थान, शिक्षक या करियर काउंसलर परीक्षा से जुड़े अपराधों में शामिल हैं।
इस शब्द का उपयोग केवल उन संगठनों और व्यक्तियों के लिए किया गया है, जिन्होंने CBI के बयानों और अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार शिक्षा, काउंसलिंग या एडमिशन से जुड़े अपने नेटवर्क का इस्तेमाल अभ्यर्थियों की भर्ती करने और नकल या परीक्षा में धांधली कराने के लिए किया। ऑपइंडिया देशभर के पूरे कोचिंग नेटवर्क पर किसी भी तरह की आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप नहीं लगा रहा है।
पटना-हजारीबाग से जुड़े मुख्य मामले की शुरुआत शास्त्री नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक FIR से हुई थी। इसके बाद 23 जून 2024 को यह मामला केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया, जहाँ एजेंसी ने एक नई FIR दर्ज की।
जाँच के दौरान CBI ने कुल 45 लोगों के खिलाफ कई चार्जशीट दाखिल कीं। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए ऑपइंडिया ने मुख्य रूप से अदालत के आदेशों और FIR पर भरोसा किया है। इन सभी दस्तावेजों को लेख के अंत में उपलब्ध कराई गई एक ZIP फाइल में एक साथ जोड़ा गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह नेटवर्क 2024 की परीक्षा से पहले से था मौजूद
2024 के नीट पेपर लीक के घटनाक्रम उन दो लोगों द्वारा बनाई गई योजना से शुरू हुई जो 2015-16 से एक-दूसरे को जानते थे। CBI के अनुसार, मुख्य आरोपितों में से एक, अमित कुमार सिंह, राज कुमार सिंह उर्फ राजू सिंह को 2015-16 से जानता था।
दोनों कंसल्टेंसी या एजेंसी सेवाओं में काम करते थे जो प्रोफेशनल कोर्सेज में दाखिला दिलाने का काम करती थीं। पंकज कुमार उर्फ आदित्य उर्फ साहिल भी इसी क्षेत्र में काम करता था और 2021-22 के दौरान अमित के संपर्क में आया था।
जाँच एजेंसी ने अमित और रंजीत कुमार बेउरा उर्फ पिंटू के बीच एक पुराने जुड़ाव का भी जिक्र किया। बेउरा की जमानत कार्यवाही के दौरान, अभियोजन पक्ष ने कहा कि वे दोनों 2019 से एक-दूसरे को जानते थे और उसी साल ओडिशा यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी परीक्षा में गड़बड़ी के एक मामले में गिरफ्तार हुए थे।
हालाँकि यह पुराना मामला नीट पेपर लीक से जुड़ा नहीं था, लेकिन यह इसलिए प्रासंगिक था क्योंकि CBI ने 2024 के इस ऑपरेशन को दाखिले और प्रतियोगी परीक्षाओं के इर्द-गिर्द पहले से बने संबंधों के विस्तार के रूप में पेश किया।
‘करियर एकेडमी एजुकेशन ट्रस्ट’ उम्मीदवारों की भर्ती करने वाले मुख्य चैनलों में से एक बन गया। यह 3 अगस्त 2023 को ओडिशा में रजिस्टर्ड हुआ था। बेउरा ने अदालत को बताया कि यह गरीब छात्रों को शैक्षिक सुविधाएँ और परामर्श प्रदान करने के लिए बनाया गया एक NGO था।
वहीं CBI का कहना था कि इसका इस्तेमाल नीट उम्मीदवारों की पहचान करने, उनके परिवारों से कमिटमेंट लेने और गारंटी के तौर पर असली शैक्षणिक सर्टिफिकेट और चेक इकट्ठा करने के लिए किया जाता था।
बेउरा को इस संगठन का मैनेजिंग डायरेक्टर बताया गया था। अमित प्रसाद महाराणा और धीरेन कुमार पांडा की पहचान इसके पदाधिकारियों के रूप में की गई थी। एजेंसी ने कहा कि अमित कुमार सिंह ने ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और मध्य प्रदेश से उम्मीदवारों का इंतजाम करने के लिए उनके और संजय कुमार के साथ मिलकर काम किया।
सत्रह उम्मीदवारों को हजारीबाग भेजा गया और उन्हें ‘राज गेस्ट हाउस’ या ‘सिंदूर’ स्थित एक घर में ठहराया गया। बाकी उम्मीदवार भुवनेश्वर या पटना में ही रहे। CBI ने उम्मीदवारों, कर्मचारियों और ड्राइवरों के बयानों का हवाला दिया।
एक उम्मीदवार ने करियर एकेडमी को अपने शैक्षणिक सर्टिफिकेट सौंपे थे। एक अन्य ने कहा कि महाराणा ने हल किया हुआ नीट पेपर शेयर किया था। भुवनेश्वर की एक उम्मीदवार ने बताया कि उसे एक होटल में प्रिंटेड कॉपी मिली थी और उसने पांडा की पहचान की थी।
एजेंसी ने कहा कि महाराणा ने स्कोर्पियो से उम्मीदवारों को लाने-ले जाने का काम किया, ‘होटल ट्रीफो पैलेस’ में एक प्रिंटर की व्यवस्था की और हल किए गए पेपर बांटे। CBI ने उसके खाते में 2 लाख रुपए और ‘चिरंजीवी मल्टीवेंचर प्राइवेट लिमिटेड’ (जिसमें वह डायरेक्टर था) द्वारा प्राप्त 12 लाख रुपए का हवाला दिया।
पांडा को करियर एकेडमी का ट्रेजरर बताया गया था और वह भी ट्रांसपोर्ट, होटल ट्रीफो पैलेस में पेपर बांटने और 12 लाख रुपए के भुगतान से जुड़ा हुआ था। CBI ने कहा कि गारंटी के तौर पर असली सर्टिफिकेट और चेक लिए गए थे। इससे आयोजकों को उम्मीदवारों और उनके परिवारों पर काफी दबाव बनाने का मौका मिल गया होगा।
अगली कड़ी परीक्षा प्रणाली के भीतर थी। जमालुद्दीन उर्फ जमाल हजारीबाग का एक पत्रकार था जो ‘प्रभात खबर’ से जुड़ा हुआ था और ओएसिस स्कूल द्वारा आयोजित कार्यक्रमों को नियमित रूप से कवर करता था।
गौरतलब है कि ओएसिस स्कूल वही परीक्षा केंद्र था जहाँ से प्रश्नपत्र चोरी हुआ था। CBI ने कहा कि इस वजह से वह प्रिंसिपल डॉ अहसानुल हक और वाइस-प्रिंसिपल मो इम्तियाज आलम के करीब आ गया।
एजेंसी ने 3 जून 2023 से 18 जून 2024 तक हक और जमालुद्दीन के बीच 814 कॉल्स का हवाला दिया। हालाँकि केवल कॉल की संख्या ही साजिश साबित करने के लिए काफी नहीं थी, लेकिन CBI ने इसका इस्तेमाल उनके निरंतर जुड़ाव को स्थापित करने के लिए किया।
एजेंसी के अनुसार, जमालुद्दीन ने अमित कुमार सिंह की मुलाकात हक और इम्तियाज से कराई थी। अमित ने बाद में पंकज कुमार को उनसे मिलवाया। CBI ने अमित, हक, इम्तियाज, जमालुद्दीन, पंकज, राजू सिंह और अमन कुमार सिंह की बैठकों का भी जिक्र किया।
अभियोजन पक्ष की व्यापक थ्योरी साफ थी, जमालुद्दीन ने बाहर के दाखिला नेटवर्क को उस सुरक्षित केंद्र को नियंत्रित करने वाले अधिकारियों से जोड़ा, जबकि अमित ने पंकज को उस दायरे में शामिल किया।
पेपर चोरी होने से पहले सॉल्वर और कैंडिडेट हुए इकट्ठा
एक कोरे प्रश्नपत्र का तब तक कोई खास व्यावसायिक मूल्य नहीं था जब तक कि उसे जल्दी से हल करके पैसे देने वाले उम्मीदवारों तक न पहुँचाया जाए। CBI ने कहा कि कम से कम तीन सॉल्वर ग्रुप्स को हजारीबाग लाया गया था। इसके कई सदस्य MBBS छात्र थे।
संजय कुमार को उस व्यक्ति के रूप में बताया गया जिसने सॉल्वर, लाभार्थियों, परिवहन और लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था की थी। अभियोजन पक्ष ने कहा कि उसने AIIMS पटना के छात्र चंदन सिंह से पढ़ाई में अच्छे मेडिकल छात्रों को भर्ती करने के लिए कहा था।
पटना ग्रुप में चंदन सिंह, कुमार शानू, राहुल आनंद, करण जैन, सुरभि कुमारी, रौनक राज और अमित कुमार शामिल थे। अमित अपने कॉलेज के साथी सनोज कुमार यादव को लाया था, हालाँकि CBI ने कहा कि सनोज पेपर हल करने के लिए ‘राज गेस्ट हाउस’ के अंदर नहीं गया था।
इन छात्रों से पहले ‘इम्पर्सनेशन’ (दूसरों के स्थान पर परीक्षा देने यानी डमी कैंडिडेट बनने) के लिए संपर्क किया गया था। CBI ने कहा कि संजय चंदन, कुमार शानू, राहुल आनंद और करण जैन को एम्स पटना के पास एक फोटो स्टूडियो में ले गया।
नीट आवेदनों के लिए उनकी तस्वीरें ली गईं। रौनक राज और अमित कुमार ने व्हाट्सएप के जरिए तस्वीरें और सिग्नेचर भेजे। डमी-कैंडिडेट की योजना को बाद में छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हीं नए लोगों को सॉल्वर के रूप में फिर से काम सौंप दिया गया।
राजस्थान ग्रुप का संबंध अमित कुमार सिंह से था। CBI ने कहा कि उसने फरवरी 2024 में भरतपुर की यात्रा की और कुमार मंगलम विश्नोई, दीपेंद्र शर्मा और अन्य मेडिकल छात्रों से मुलाकात की।
श्री जगन्नाथ पहाड़िया सरकारी मेडिकल कॉलेज के MBBS छात्र कुमार मंगलम ने एक ग्रुप का इंतजाम किया, जिसमें दीपेंद्र शर्मा, संदीप कुमार, सुरेश कुमार और इशिता शामिल थे। इनसे भी शुरुआत में संभावित डमी उम्मीदवारों के रूप में संपर्क किया गया था। कुमार मंगलम ने बाद में ट्रेन टिकटों की व्यवस्था की और ग्रुप के सदस्यों को हजारीबाग लेकर आया।
यह ऑपरेशन परीक्षा से एक सप्ताह से भी अधिक समय पहले लोगों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने लगा था। 26 अप्रैल की रात को संजय कुमार, चंदन सिंह, कुमार शानू और राहुल आनंद गंगा दामोदर एक्सप्रेस से पटना से रवाना हुए और कोडरमा पहुँचे।
सुरभि कुमारी रांची से अलग आई थी। यह ग्रुप पहले ‘रैमसन होटल’ और फिर ‘होटल तारा टॉवर’ में रुका। बुकिंग संजय और कुमार अभिषेक द्वारा की गई थी।
अमित कुमार 2 मई को चेन्नई से रांची गया और अगले दिन कोडरमा पहुँचा। रौनक राज मुंबई से आया था। करण जैन ने कुमार अभिषेक द्वारा बुक किए गए टिकट पर पटना से यात्रा की। 3 मई को पटना ग्रुप हजारीबाग के ‘होटल श्री विनायक’ में शिफ्ट हो गया।
उनका इतनी जल्दी आना CBI के इस दावे का समर्थन करता है कि उन्हें गोपनीय सामग्री की उम्मीद में पहले से ही वहाँ तैनात किया गया था। अभियोजन पक्ष ने कहा कि तैयारियाँ ओएसिस स्कूल के भीतर भी चल रही थीं।
इम्तियाज आलम की जमानत कार्यवाही में इसके जवाबी हलफनामे में कहा गया कि 3 मई को कंट्रोल रूम में एक टूलकिट बैग रखा गया था। बाद में इन टूल्स का इस्तेमाल NTA ट्रंक के पीछे के कब्जों से छेड़छाड़ करने, उसकी पैकेजिंग खोलने और पेपर की फोटो खींचने के बाद उसे वापस वैसे ही ठीक करने के लिए किया गया था।
इम्तियाज आलम के जमानत आदेश में शामिल CBI के जवाबी हलफनामे के अनुसार, आलम ने 3 मई को कंट्रोल रूम में टूलकिट बैग रखा था। एजेंसी ने कहा कि पंकज ने बाद में ट्रंक को खोलने और उसे वापस ठीक करने के लिए उन टूल्स का इस्तेमाल किया।
उम्मीदवारों का 3 और 4 मई को हजारीबाग में जुटना शुरू हो गया था। बेउरा करियर एकेडमी के कर्मचारी देबाशीष पाणिग्रही और ड्राइवर रंजन सेठी उर्फ मानस के साथ एक एमजी हेक्टर गाड़ी से पहुँचा था।
इस गाड़ी का इस्तेमाल उम्मीदवारों को लाने-ले जाने के लिए किया गया था। बेउरा ‘एके इंटरनेशनल होटल’ में रुका। ओडिशा के उम्मीदवारों को राज गेस्ट हाउस और सिंदूर भेजा गया।
राजू सिंह राज गेस्ट हाउस का प्रबंधन करता था। CBI ने कहा कि इस परिसर को जानबूझकर खाली और उपलब्ध रखा गया था। खाने-पीने की व्यवस्था की गई थी और उम्मीदवारों व सॉल्वरों को लाने-ले जाने के लिए गाड़ियों का इस्तेमाल किया गया था।
राजू ने अपना पक्ष रखा कि उसने केवल कमरे किराए पर दिए थे और उसे इसके पीछे का मकसद नहीं पता था। पटना हाई कोर्ट ने शुरुआत में अभियोजन पक्ष के इस मामले का हवाला देते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था कि उम्मीदवारों को तैयार करने के लिए जानबूझकर गेस्ट हाउस उपलब्ध कराया गया था।
पटना में सिकंदर यादवेन्दु ने अखिलेश कुमार, अवधेश कुमार, शिवनंदन कुमार और उम्मीदवार अनुराग यादव के साथ तालमेल बिठाया। CBI ने कहा कि उनसे 4 मई को रात करीब 10:30 बजे सेंट करेन्स हाई स्कूल के पास उम्मीदवारों को लाने के लिए कहा गया था।
उस रात तक इस नेटवर्क की अलग-अलग शाखाएँ अपनी-अपनी जगह पर तैनात थीं, स्कूल के भीतर के अंदरूनी लोग, पास के होटलों में सॉल्वर, गेस्ट हाउसों और निजी परिसरों में उम्मीदवार, और गाड़ियाँ, प्रिंटर व ठहरने की जगह पूरी तरह तैयार थीं।
5 मई को पेपर कैसे निकाला और बांटा गया
सुबह लगभग 5:30 बजे, चंदन सिंह, राहुल आनंद, सुरभि कुमारी और करण जैन एक काले रंग की हुंडई क्रेटा कार में ‘होटल श्री विनायक’ से निकले और ‘राज गेस्ट हाउस’ पहुँचे। उनके पीछे-पीछे कुमार शानू, अमित कुमार और रौनक राज भी वहाँ पहुँचे।
CBI ने कहा कि सनोज कुमार यादव को छोड़कर पटना सॉल्वर ग्रुप का हर सदस्य चोरी का पेपर आने से पहले ही गेस्ट हाउस के अंदर मौजूद था। मोबाइल लोकेशन, ट्रैवल रिकॉर्ड और गवाहों की पहचान के जरिए राजस्थान ग्रुप के दीपेंद्र शर्मा और संदीप कुमार की मौजूदगी भी वहीं पाई गई।
2024 में NEET का पेपर कैसे लीक हुआ।
सुबह लगभग 7:40 बजे, ओएसिस स्कूल के प्रिंसिपल अहसानुल हक ने हजारीबाग में SBI के एक वॉल्ट से नीट के प्रश्नपत्रों से भरे दो ट्रंक लिए। हक NTA के सिटी कोऑर्डिनेटर भी थे। ये ट्रंक सेंटर सुपरिटेंडेंट और वाइस-प्रिंसिपल इम्तियाज आलम को सौंप दिए गए, जो सुबह लगभग 7:53 बजे स्कूल पहुँचे और उन्हें कंट्रोल रूम में रख दिया।
CBI ने पैकेजिंग चेन के जरिए चोरी हुई बुकलेट का पता लगाया। ट्रंक संख्या 13093 में 13560 से 13563 तक के बंच थे। बंच 13560 में पैकेट नंबर 38988, 38989 और 38990 शामिल थे।
पैकेट 38990 में 6136465 से 6136488 तक नंबर वाली 24 बुकलेट थीं। बुकलेट संख्या 6136488 की पहचान उस मूल कॉपी के रूप में की गई जिसकी स्कूल के अंदर नकल की गई थी।
पंकज कुमार ओएसिस स्कूल पहुँचा और उसने गार्ड रोहित राम से कहा कि वह इनोवेटिव व्यू का प्रतिनिधि है और इम्तियाज आलम से मिलने आया है। रोहित ने आलम को आवाज लगाई, जो प्रिंसिपल के ऑफिस के पास खड़े थे।
CBI ने कहा कि आलम ने इशारा किया कि पंकज को अंदर आने दिया जाए। इसके बाद पंकज स्टाफ रूम में बैठ गया। गौर करने वाली बात यह है कि ‘इनोवेटिव व्यू’ परीक्षा केंद्रों पर तैनात की गई आधिकारिक सुरक्षा और बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन एजेंसी थी।
यह स्पष्ट नहीं है कि पंकज वास्तव में उस कंपनी का प्रतिनिधित्व कर रहा था या उसने स्कूल में प्रवेश करने के लिए केवल उसके नाम का इस्तेमाल किया था। स्कूल के कर्मचारियों मोहम्मद शाकिब खान और सादुल हसन ने ध्यान दिया कि वह बाहरी व्यक्ति काफी समय से वहाँ रुका हुआ है।
शाकिब ने इसकी जानकारी आलम को और बाद में हक को दी। सादुल ने भी यह मुद्दा उठाया। CBI द्वारा उद्धृत बयानों के अनुसार, आलम इस पर चिढ़ गए और उन्होंने कर्मचारियों से कहा कि वे इस मामले को उन पर छोड़ दें। शाकिब और सादुल ने बाद में मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिए। शाकिब ने एक टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड में पंकज की पहचान भी की।
सुबह 8:02 बजे, पंकज ने दूसरे दरवाजे से कंट्रोल रूम में प्रवेश किया। CBI ने कहा कि उसने ट्रंक 13093 के पिछले कब्जों से छेड़छाड़ करने के लिए टूलकिट का इस्तेमाल किया, बंच 13560 को बाहर निकाला और पैकेट 38990 को खोला। उसने बुकलेट 6136488 को चुना, उसके प्लास्टिक रैपिंग को काटा और एक पेंसिल की मदद से पेपर की सील को खोल दिया।
जाँच एजेंसी ने कहा कि पंकज ने एक आईफोन 13 से पहले और आखिरी पन्ने को छोड़कर हर पेज की फोटो खींची, जिसके बारे में CBI का कहना है कि इसका इस्तेमाल इस पूरे ऑपरेशन में किया गया था। उसने किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करके एक सिम कार्ड भी हासिल किया था।
उसने बुकलेट को वापस पैकेट में रख दिया, बंच को ठीक किया और ट्रंक को दोबारा सील करने की कोशिश की। इस प्रक्रिया के दौरान हटाई गई प्लास्टिक की पट्टियों को टूलकिट बैग के अंदर रख दिया गया, जिसे एक अलमारी के पास छिपा दिया गया था।
CBI ने कहा कि अस्त-व्यस्त हो चुकी टेबल क्लॉथ को स्कूल के CCTV फुटेज में देखा जा सकता था। बाद में इन औजारों को जब्त कर लिया गया और पंकज ने CBI की कस्टडी में इस पूरी प्रक्रिया को दोबारा करके दिखाया।
पंकज सुबह करीब 9:23 बजे कंट्रोल रूम से बाहर निकला और करीब 9:24 बजे स्कूल परिसर से चला गया। परीक्षा दोपहर 2 बजे शुरू होने वाली थी। इस नेटवर्क के पास फोटो भेजने, पेपर हल करने, पढ़ने योग्य कॉपियाँ तैयार करने और उम्मीदवारों को उनके केंद्रों तक पहुँचाने के लिए पाँच घंटे से भी कम का समय था।
खींची गई तस्वीरों को राज गेस्ट हाउस भेजा गया। सॉल्वरों को विषयों के हिसाब से बांट दिया गया। कुमार शानू, दीपेंद्र शर्मा और संदीप कुमार को बायोलॉजी का जिम्मा सौंपा गया था। सुरभि कुमारी और रौनक राज ने केमिस्ट्री को संभाला।
चंदन सिंह, राहुल आनंद और अमित कुमार ने फिजिक्स का पेपर हल किया। करण जैन को कठिन या अधिक समय लेने वाले प्रश्न दिए गए थे। चंदन को पटना ग्रुप के लीडर और कुमार मंगलम को राजस्थान ग्रुप के लीडर के रूप में बताया गया।
एक बार जवाब तैयार हो जाने के बाद चंदन और सुरभि को नीचे ले जाया गया ताकि वे उम्मीदवारों को जवाब समझा सकें और उनके संदेह दूर कर सकें। अन्य सॉल्वर भी उनके साथ शामिल हो गए। CBI ने कहा कि जवाब याद कर लेने के बाद हल की गई कॉपियों को नष्ट करने का आदेश दिया गया था।
इसके बाद सॉल्वर वापस होटल श्री विनायक आ गए, जहाँ संजय कुमार और सनोज कुमार यादव उनका इंतजार कर रहे थे। एजेंसी ने सनोज के बयानों पर भरोसा किया, जिसमें ग्रुप के सदस्यों ने आपस में बातचीत के दौरान कहा था कि उन्होंने पेपर हल कर लिया है।
पंकज ने हल की गई सामग्री की PDF बनाई और उन्हें सिंदूर, एके इंटरनेशनल होटल, बोकारो, भुवनेश्वर और पटना में मौजूद हैंडलर्स को भेज दिया। शशिकांत पासवान ने सिंदूर ब्रांच को संभाला। एक कॉपी अमित कुमार सिंह के भाई अमन कुमार सिंह द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले व्हाट्सएप नंबर पर भेजी गई थी।
भुवनेश्वर में पंकज के भाई घनश्याम से जुड़े हैंडलर्स ने दो इलेक्ट्रीशियन, गौतम और विकास के साथ मिलकर काम किया। 2024 के इस लीक मामले में CBI की जाँच के दौरान ‘करियर एकेडमी’ सबसे व्यापक रूप से दर्ज किए गए उम्मीदवार-भर्ती और लॉजिस्टिक्स चैनलों में से एक बनकर उभरी।
पटना ब्रांच को हल किए गए विषय अलग-अलग मिले। द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा समीक्षा की गई CBI की चार्जशीट के अनुसार, बलदेव कुमार उर्फ चिंटू को सुबह 10:50 बजे व्हाट्सएप पर हल किया हुआ बायोलॉजी का पेपर मिला।
केमिस्ट्री का पेपर सुबह 11:05 बजे और फिजिक्स का पेपर सुबह 11:40 बजे आया। यह क्रम दर्शाता है कि जैसे ही संबंधित सॉल्वर ग्रुप ने अपना हिस्सा पूरा किया, वैसे ही प्रत्येक सेक्शन को आगे भेज दिया गया।
बलदेव और नीतीश कुमार ने कथित तौर पर खेमनीचक के ‘लर्न प्ले स्कूल’ में 15 सेट प्रिंट किए। नीतीश अपने साथ एक ब्रदर प्रिंटर और एक डेल लैपटॉप लेकर आया था। करीब 30 से 32 उम्मीदवारों को दो या तीन के समूहों में इकट्ठा किया गया था।
चार्जशीट के विवरण के अनुसार प्रिंटिंग और वितरण के दौरान बलदेव, पिंटू कुमार, नीतीश कुमार, अभिमन्यु पटेल, आशुतोष कुमार और मनीष प्रकाश उसी परिसर में मौजूद थे। लर्न प्ले स्कूल लीक हुए पेपर नेटवर्क की पटना ब्रांच के लिए वितरण और जवाब याद कराने का एक प्रमुख केंद्र था।
नीतीश हल की गई बायोलॉजी की कॉपियाँ प्रतिभा कॉलोनी स्थित अपने आवास पर भी ले गया, जहाँ सात महिला उम्मीदवारों को रखा गया था। कृष्णनंदन के बेटे आशुतोष कुमार को एक कैंडिडेट एजेंट के रूप में बताया गया जो राशि सिंह को वहाँ लेकर आया था। CCTV फुटेज में नीतीश को उसे हल किए गए पेपर्स के सेट देते हुए देखा गया था।
जाँचकर्ताओं ने कहा कि परीक्षा शुरू होने से काफी पहले, सुबह 11:23 बजे के टाइमस्टैम्प के साथ लीक हुए पेपर का एक पेज नीतीश के फोन पर पाया गया था। दोपहर करीब 12:30 बजे लर्न प्ले स्कूल और नीतीश के आवास पर मौजूद उम्मीदवारों को अपने-अपने केंद्रों के लिए निकलने को कहा गया। उनकी तलाशी ली गई ताकि कोई भी प्रिंटेड कॉपी उनके साथ बाहर न जा सके।
पुलिस इंटरसेप्शन जिसने रैकेट का किया पर्दाफाश
दुपहर लगभग 2:05 बजे, शास्त्री नगर पुलिस स्टेशन के तत्कालीन SHO इंस्पेक्टर अमर कुमार को सूचना मिली कि एक संगठित गिरोह ने NEET प्रश्नपत्र की सुरक्षा शृंखला को तोड़ दिया है। उन्हें यह भी बताया गया कि इस नेटवर्क के सदस्य रजिस्ट्रेशन नंबर JH01BW0019 वाली एक सफेद रेनॉल्ट डस्टर कार में घूम रहे हैं।
पुलिस ने राजवंशी नगर मोड़ के पास डस्टर गाड़ी को रोका और सिकंदर यादवेन्दु, अखिलेश कुमार व बिट्टू कुमार को हिरासत में ले लिया। गाड़ी की आगे की सीट के पास से चार फोटोकॉपी किए गए एडमिट कार्ड मिले। ये एडमिट कार्ड अभिषेक कुमार, शिवनंदन कुमार, आयुष राज और अनुराग यादव के थे। सिकंदर के पास से दो फोन भी बरामद किए गए।
कैसे कुछ लोगों के नेटवर्क ने इस लीक में अपनी भूमिका निभाई।
FIR के अनुसार, सिकंदर ने उम्मीदवारों के इंतजाम के सिलसिले में ‘संजीव सिंह’, रॉकी, नीतीश और अमित आनंद का जिक्र किया। पुलिस ने बरामद एडमिट कार्ड का इस्तेमाल परीक्षा केंद्रों की पहचान करने के लिए किया और उम्मीदवारों को हिरासत में लेने के लिए परीक्षा के खत्म होने का इंतजार किया।
आयुष राज BSEB कॉलोनी के डीएवी पब्लिक स्कूल में परीक्षा दे रहा था। FIR के मुताबिक, उसने बताया कि उसे और लगभग 20 से 25 छात्रों को ‘लर्न बॉयज हॉस्टल’ और ‘लर्न प्ले स्कूल’ ले जाया गया था, जहाँ उन्हें हल किए गए प्रश्न दिए गए और उन्हें याद करने के लिए कहा गया। उसने यह भी कहा कि परीक्षा में आए प्रश्न उपलब्ध कराई गई सामग्री से मेल खाते थे। पुलिस ने उसका एडमिट कार्ड, टेस्ट बुकलेट और पहचान दस्तावेज जब्त कर लिए।
इसके बाद जाँचकर्ताओं ने लर्न प्ले स्कूल की तलाशी ली और छत से नीट पेपर के आधे जले और गीले टुकड़े बरामद किए। CBI ने बाद में कहा कि इन टुकड़ों की मदद से वे लीक के तार ओएसिस स्कूल को आवंटित की गई बुकलेट से जोड़ने में कामयाब रहे। इस बरामदगी ने पटना के वितरण केंद्र को हजारीबाग के पेपर से जोड़ दिया।
अपना काम पूरा करने के बाद, चंदन सिंह, कुमार शानू, राहुल आनंद, अमित कुमार और करण जैन को कुमार अभिषेक और टिंकू कुमार द्वारा हजारीबाग टाउन रेलवे स्टेशन ले जाया गया। वे वंदे भारत एक्सप्रेस में सवार हुए और रात लगभग 10 बजे पटना पहुँचे।
इस तरह मात्र एक दिन के भीतर, सॉल्वर सूर्योदय से पहले राज गेस्ट हाउस में दाखिल हुए, सुबह 8 बजे के बाद पेपर की कॉपी की गई, सुबह 11:40 बजे तक विषय-वार उत्तर पटना पहुँच गए और दोपहर 12:30 बजे तक उम्मीदवार अपने केंद्रों के लिए रवाना हो चुके थे।
मुख्य ऑर्गनाइजर और उनकी बताई गई भूमिकाएँ
CBI ने किसी एक व्यक्ति को इस पूरे नेटवर्क की हर शाखा के नियंत्रक के रूप में चिन्हित नहीं किया। जाँच एजेंसी का मामला एक बहुस्तरीय ऑपरेशन को दर्शाता है, जिसमें अलग-अलग लोगों ने परीक्षा केंद्र तक पहुँच, उम्मीदवारों की भर्ती, पेपर हल करने, वितरण और पैसों के लेनदेन को संभाला।
अमित कुमार सिंह उस चेहरे के रूप में उभरता है जिसने सबसे अधिक शाखाओं को आपस में जोड़ा था। CBI ने कहा कि वह दाखिला व्यवसाय के जरिए राजू सिंह को जानता था, उसने ही पंकज को ओएसिस स्कूल के अधिकारियों के संपर्क में लाया, उम्मीदवारों की व्यवस्था करने वालों के साथ काम किया और पटना व राजस्थान दोनों सॉल्वर ग्रुप्स को जोड़ा।
कुमार मंगलम और दीपेंद्र शर्मा को रांची में अमित से जुड़े एक फ्लैट में ठहराया गया था। एजेंसी ने यह भी कहा कि कुमार मंगलम को रत्ना खान के एक खाते से 2.4 लाख रुपए मिले थे, जिसे अमित ऑपरेट करता था। अमित ने इस फ्लैट, भुगतान और मुलाकातों के दावों का खंडन किया। उसके घर की तलाशी में कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली।
पंकज कुमार को सुरक्षित परीक्षा केंद्र और बाहरी नेटवर्क के बीच की ऑपरेशनल कड़ी बताया गया था। CBI ने उस पर टूल्स और आईफोन खरीदने, झूठी पहचान बताकर ओएसिस स्कूल में प्रवेश करने, ट्रंक खोलने, पेपर की फोटो खींचने और हल किए गए PDF भेजने का आरोप लगाया।
एजेंसी ने उसे हजारीबाग, बोकारो, पटना और भुवनेश्वर में उम्मीदवारों के ठिकानों के साथ-साथ उसके भाई घनश्याम के खाते के जरिए ट्रांसफर किए गए पैसों से भी जोड़ा। पंकज ने इन आरोपों से इनकार किया।
हाई कोर्ट ने उसकी हिरासत की अवधि और अन्य आरोपितों के साथ समानता पर विचार करने के बाद मई 2025 में उसे जमानत दे दी। हालाँकि इस आदेश ने उसे आरोपों से बरी नहीं किया।
राकेश रंजन उर्फ रॉकी को पटना वितरण ऑपरेशन के मुख्य सरगनाओं में से एक बताया गया था। उसकी शाखा ही ‘लर्न प्ले स्कूल’, उम्मीदवारों को इकट्ठा करने, प्रिंटर, लैपटॉप और स्थानीय स्तर पर पेपर पहुँचाने का प्रबंधन करती थी।
बलदेव को विषय-वार फाइलें मिली थीं। नीतीश ने उपकरणों की व्यवस्था की और पेपर्स को अपने आवास पर ले गया। रॉकी ने इस मामले में अपनी संलिप्तता से इनकार किया और बाद में उसे जमानत मिल गई।
राजू सिंह ने राज गेस्ट हाउस उपलब्ध कराया और खाने-पीने व गाड़ियों का इंतजाम किया। उसका कहना था कि उसने केवल कमरे किराए पर दिए थे। उसकी पहली जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी, लेकिन कस्टडी में डेढ़ साल से अधिक का समय बिताने के बाद फरवरी 2026 में उसे जमानत मिल गई।
हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया कि अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं और अभियोजन पक्ष ने 589 गवाहों की सूची पेश की है। जमालुद्दीन को उस मध्यस्थ के रूप में बताया गया जिसने दाखिला नेटवर्क की मुलाकात हक और इम्तियाज से कराई थी।
हक और इम्तियाज ही उस सुरक्षित केंद्र के लिए जिम्मेदार अधिकारी थे। CBI ने कहा कि पंकज के प्रवेश को आसान बनाया गया, स्टाफ के विरोध के बावजूद उसकी मौजूदगी को नजरअंदाज किया गया और कंट्रोल रूम तक उसकी पहुँच सुनिश्चित की गई। दोनों ने इस मामले में शामिल होने से इनकार किया और अभियोजन पक्ष के घटनाक्रम पर सवाल उठाए।
‘करियर एकेडमी’ ने उम्मीदवारों का एक व्यवस्थित नेटवर्क प्रदान किया। बेउरा, महाराणा और पांडा ने उम्मीदवारों की भर्ती की, सर्टिफिकेट या चेक इकट्ठा किए, यात्रा, ठहरने और गाड़ियों की व्यवस्था की और हजारीबाग व भुवनेश्वर में पेपर बांटे।
संजय कुमार ने उम्मीदवारों और सॉल्वरों का इंतजाम किया। चंदन सिंह को पटना सॉल्वर ग्रुप के हेड के रूप में बताया गया। सिकंदर यादवेन्दु ने माता-पिता और उम्मीदवारों को पटना के हैंडलर्स से जोड़ा।
अलग गोधरा नेटवर्क ने OMR शीट को बनाया निशाना
गोधरा मामले में एक अलग तरीका अपनाया गया था। यह पेपर चुराने और उम्मीदवारों को जवाब याद कराने पर निर्भर नहीं था। CBI ने कहा कि कोचिंग से जुड़े एक नेटवर्क ने एक परीक्षा केंद्र को अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास किया था ताकि उम्मीदवारों के जाने के बाद चुनिंदा OMR शीटों पर सही उत्तर भरे जा सकें।
इस मामले में तुषार रजनीकांत भट्ट, परशुराम बिंदनाथ रॉय, आरिफ नूर मोहम्मद वोरा, विभोर उमेश्वर प्रसाद सिंह आनंद, पुरुषोत्तम शर्मा और दीक्षित कांतिभाई पटेल को नामजद किया गया था।
तुषार भट्ट ‘ज्ञान मंदिर करियर इंस्टीट्यूट’ में काम करता था, जो एक निजी कोचिंग संस्थान था। CBI ने कहा कि उसे ‘जय जलाराम स्कूल’ में एक शिक्षक और पर्यवेक्षक के रूप में पेश किया गया था ताकि उसे डिप्टी सेंटर सुपरिटेंडेंट नियुक्त किया जा सके। स्कूल के प्रिंसिपल और NTA के सिटी कोऑर्डिनेटर पुरुषोत्तम शर्मा ने इस नियुक्ति को आसान बनाया।
दीक्षित पटेल ‘जय जलाराम एजुकेशन ट्रस्ट’ का चेयरमैन था, जो परीक्षा केंद्रों के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले इन स्कूलों को चलता था। अभियोजन पक्ष ने कहा कि उसने केंद्रों और अधिकारियों की व्यवस्था करने में भाग लिया था। उसके वकीलों ने कहा कि वे नियुक्तियाँ NTA द्वारा की गई थीं और उसकी संलिप्तता से इनकार किया।
CBI ने कहा कि एजेंटों ने उम्मीदवारों को निर्देश दिया था कि वे पंचमहल या वडोदरा में अपने वर्तमान पते दर्ज करें, गोधरा को अपने परीक्षा शहर के रूप में चुनें और गुजराती को माध्यम के रूप में चुनें।
इसका उद्देश्य यह संभावना बढ़ाना था कि उन्हें इस नेटवर्क के प्रभाव वाले केंद्रों में आवंटित किया जाए। उम्मीदवारों से कहा गया था कि वे केवल उन्हीं प्रश्नों के उत्तर दें जो वे जानते हैं और बाकी को खाली छोड़ दें। इसके बाद उनकी OMR शीट पर सही विकल्प भर दिए जाते हैं। परिवारों से 20 लाख रुपए से 25 लाख रुपए के बीच भुगतान करने को कहा गया था।
‘ऑपइंडिया’ द्वारा प्राप्त गुजरात हाई कोर्ट के आदेश में NEET-UG 2023 से संबंधित बयानों को भी दर्ज किया गया था। विष्णु शर्मा नाम के एक गवाह ने कहा कि उसने तीन रिश्तेदारों के लिए इस नेटवर्क से संपर्क किया था।
बयान के अनुसार, दीक्षित पटेल ने प्रति उम्मीदवार 10 लाख रुपए एडवांस माँगे थे। शर्मा ने कहा कि उसने परीक्षा के दिन तुषार भट्ट को 20 लाख रुपए का भुगतान किया था। भट्ट ने बाद में 25 लाख रुपए और माँगे और दावा किया कि काम पूरा हो चुका है।
गवाह ने यह भी कहा कि भट्ट को अपनी तस्वीर भेजने के बाद उसे 2023 में एक इनविजिलेटर के रूप में नियुक्त किया गया था। अभियोजन पक्ष ने इस बयान के आधार पर तर्क दिया कि कोचिंग और स्कूल नेटवर्क ने परीक्षा स्टाफ को प्रभावित करने के तरीके पहले ही विकसित कर लिए थे।
दीक्षित पटेल ने इस सामग्री को चुनौती दी और कहा कि यह उसे 2024 के अपराध से नहीं जोड़ती है। हाई कोर्ट ने अप्रैल 2026 में उसे बरी करने से इनकार कर दिया और माना कि यह सामग्री गंभीर संदेह पैदा करती है जिसके लिए मुकदमा जरूरी है।
संजीव मुखिया पर शक था, लेकिन CBI ने उसके खिलाफ चार्जशीट फाइल नहीं की
संजीव कुमार सिंह उर्फ संजीव मुखिया शुरुआती जाँच के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले नामों में से एक बन गया था। बिहार की आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने उसे एक अंतर-राज्यीय सॉल्वर गिरोह के संदिग्ध सरगना के रूप में वर्णित किया था।
रिपोर्टों में कहा गया था कि जाँचकर्ताओं का मानना था कि कई राज्यों के परीक्षा-लीक नेटवर्क में उसके संपर्क थे। लगभग 11 महीनों तक फरार रहने के बाद, आखिरकार 25 अप्रैल 2025 को EOU ने उसे पटना के सगुना मोड़ के पास से गिरफ्तार कर लिया। बिहार सरकार ने उसकी गिरफ्तारी में मदद करने वाली जानकारी देने पर 3 लाख रुपए के इनाम की घोषणा की थी।
चूँकि बिहार जाँच के दौरान उसका नाम सामने आया था, इसलिए CBI ने उसे अपनी हिरासत में ले लिया। शुरुआती रिपोर्टों में कहा गया था कि उससे अंतर-राज्यीय संपर्कों और लॉजिस्टिक्स के बारे में पूछताछ की गई थी।
NEET मामले में अगस्त 2025 में मुखिया को डिफॉल्ट बेल मिल गई क्योंकि CBI ने 90 दिनों के भीतर उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं की थी। हालाँकि वह बिहार पुलिस के अन्य मामलों में हिरासत में ही रहा।
23 जुलाई 2026 को, CBI ने स्पष्ट किया कि उसे NEET-UG 2024 पेपर की चोरी या आगे के वितरण से जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं मिला है। जाँच एजेंसी ने कहा कि उसने इसमें शामिल लोगों की पहचान कर ली है और 45 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी है। मुखिया उन आरोपितों में शामिल नहीं था।
बिहार के जाँचकर्ताओं को शुरुआत में संजीव मुखिया पर 2024 के लीक का नेतृत्व करने का संदेह था, लेकिन CBI ने बाद में कहा कि उसे पेपर चोरी या वितरण में उसकी भूमिका का कोई सबूत नहीं मिला और उसने उसके खिलाफ कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की।
2024 का मामला कैसे राष्ट्रीय संकट बन गया
पटना का यह मामला एक गाड़ी, चार एडमिट कार्ड और ‘लर्न प्ले स्कूल’ से जुड़े उम्मीदवारों से शुरू हुआ था। लेकिन 4 जून 2024 को परिणाम घोषित होने के बाद यह एक राष्ट्रीय विवाद बन गया।
शुरुआत में 67 उम्मीदवारों को 720 में से 720 का परफेक्ट स्कोर मिला। इसके अलावा 718 और 719 अंकों पर भी सवाल उठाए गए, जो सामान्य मार्किंग स्कीम के तहत असामान्य लग रहे थे।
NTA ने कहा कि कुछ केंद्रों पर परीक्षा के समय का नुकसान होने के कारण 1563 उम्मीदवारों को प्रतिपूरक अंक दिए गए थे। ग्रेस-मार्क्स का विवाद और पटना-हजारीबाग पेपर चोरी के तथ्य भले ही अलग-अलग थे, लेकिन दोनों एक ही सार्वजनिक संकट का हिस्सा बन गए। 13 जून को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि प्रतिपूरक अंकों को वापस ले लिया जाएगा।
इन 1563 उम्मीदवारों के पास दो विकल्प थे या तो वे बिना ग्रेस मार्क्स के अपना स्कोर स्वीकार करें या 23 जून को दोबारा परीक्षा में बैठें। इसने ग्रेस-मार्क्स के सवाल को तो सुलझा दिया, लेकिन पेपर लीक के भौगोलिक विस्तार का मुद्दा अभी भी बाकी था।
देश भर में छात्रों के विरोध प्रदर्शन फैल गए। कॉन्ग्रेस सहित राजनीतिक दलों और ABVP से जुड़े संगठनों ने जवाबदेही और व्यापक जाँच की माँग की। सरकार ने 21 जून को ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024′ को लागू कर दिया। यह कानून संगठित नकल, पेपर लीक, इम्पर्सनेशन (डमी कैंडिडेट) और परीक्षा सामग्री तक अनधिकृत पहुँच के लिए सजा का प्रावधान करता है।
22 जून को शिक्षा मंत्रालय ने परीक्षा प्रक्रिया, डेटा सुरक्षा और NTA के कामकाज में सुधारों की सिफारिश करने के लिए ISRO के पूर्व अध्यक्ष के राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया।
उसी वीकेंड पर NTA के डायरेक्टर जनरल सुबोध कुमार सिंह को पद से हटा दिया गया। केंद्र ने CBI को व्यापक साजिश और लोक सेवकों की भूमिका सहित इस पूरे मामले की विस्तृत जाँच करने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार पूछा कि सुरक्षा में चूक कब हुई, यह कितनी दूर तक फैली और क्या दागी उम्मीदवारों को बाकी छात्रों से अलग किया जा सकता है। CBI के शुरुआती आकलन में करीब 155 संदिग्ध लाभार्थियों की पहचान की गई थी।
एजेंसी ने बाद में कहा कि लीक मुख्य रूप से हजारीबाग और पटना पर केंद्रित था, जहाँ से चुनिंदा उम्मीदवारों को अंतर-राज्यीय वितरण किया गया था। 23 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी परीक्षा को रद्द करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने माना कि उस समय उपलब्ध सामग्री से यह साबित नहीं होता कि कोई ऐसी व्यवस्थागत चूक हुई थी जिसने देश भर में परीक्षा की पवित्रता को नष्ट कर दिया हो।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे पता चले कि लीक हुआ पेपर सोशल मीडिया पर फैला था या बेकाबू संख्या में उम्मीदवारों तक पहुँचा था। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी मजबूत तथ्यात्मक आधार के 23 लाख से अधिक उम्मीदवारों के लिए दोबारा परीक्षा का आदेश नहीं दिया जा सकता।
इसके बावजूद कोर्ट ने NTA प्रणाली में गंभीर विफलताओं की पहचान की। अपने अंतिम फैसले में कोर्ट ने पेपर तैयार करने, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, सेंटर की सुरक्षा, पहचान के सत्यापन और अनियमितताओं से निपटने के लिए एक मजबूत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने का आह्वान किया। ग्रेस-मार्क्स के फैसले और फिजिक्स के एक विवादित उत्तर के समाधान के बाद परफेक्ट स्कोर पाने वालों की संख्या 67 से घटकर 17 रह गई।
CBI ने पटना-हजारीबाग शाखा में 45 लोगों के खिलाफ पाँच चार्जशीट दाखिल कीं। जाँच को समझने के लिए अदालती आदेश ही मुख्य सार्वजनिक स्रोत बने। हालाँकि मुकदमा धीमी गति से आगे बढ़ा। फरवरी 2026 तक पटना मामले में अभी भी आरोप तय नहीं हो पाए थे और अभियोजन पक्ष ने 589 गवाहों की सूची पेश की थी।
सरकार ने राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों को लागू करना शुरू कर दिया। इन उपायों में सरकारी संस्थानों को परीक्षा केंद्र के रूप में अधिक उपयोग करना, राज्य प्रशासनों के साथ मजबूत समन्वय, NTA में स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति, बेहतर केंद्र आवंटन, डिजिटल निगरानी और सुधार के लिए एक संचालन समिति शामिल थी।
केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने कोचिंग के भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ भी दिशानिर्देश जारी किए। इसने सफलता के झूठे दावों, जानकारी छिपाने और चयन की गारंटी देने पर रोक लगा दी। नवंबर 2024 तक, CCPA ने कहा कि उसने 45 कोचिंग सेंटरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी और 18 संस्थानों पर 54.6 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था।
इन उपायों ने परीक्षा की सुरक्षा को मजबूत किया और भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाई। हालाँकि वे एडमिशन कंसल्टेंट्स और छोटे काउंसलिंग नेटवर्कों के लिए एक पूर्ण ढाँचा तैयार नहीं कर सके।
रिपोर्टों के अनुसार, ‘करियर एकेडमी’ पारंपरिक क्लासरूम के बजाय काउंसलिंग और उम्मीदवारों को संभालने के जरिए काम करती थी। 2024 के इस नेटवर्क ने गेस्ट हाउस, होटल, निजी घरों, असली सर्टिफिकेट, कोरे चेक और थर्ड-पार्टी खातों का इस्तेमाल किया। बहरहाल, 2026 के लीक ने एक और भी बड़ी कमजोरी को उजागर कर दिया, जो कि विषय-विशेषज्ञ के स्तर पर गोपनीय पहुँच का होना था।
2026 का लीक एक गेस पेपर के अंदर छिपा था
NEET-UG 2026 की सुरक्षा में लगी यह सेंध पुलिस द्वारा किसी गाड़ी को रोकने के बाद उजागर नहीं हुई थी। इसका खुलासा तब हुआ जब सीकर के एक शिक्षक को 3 मई को परीक्षा की शाम को 150 पन्नों का एक हस्तलिखित गेस पेपर मिला।
यह दस्तावेज उनके मकान मालिक के बेटे के माध्यम से उन तक पहुँचा था, जो केरल में पढ़ाई कर रहा था। शिक्षक ने इसका मिलान वास्तविक प्रश्नपत्र से किया और बड़े पैमाने पर प्रश्नों के मिलने के बाद उन्होंने अधिकारियों से संपर्क किया।
7 मई को उन्होंने NTA, गृह मंत्रालय और CBI को इसकी जानकारी भेजी। NTA के अधिकारियों ने अगले दिन उनसे संपर्क किया और वह PDF प्राप्त की। रिपोर्टों के अनुसार, उस 150 पन्नों की सामग्री में लगभग 410 प्रश्न शामिल थे। उनमें से तकरीबन 120 प्रश्न 3 मई को आयोजित परीक्षा के केमिस्ट्री के पेपर में आए थे। बायोलॉजी के भी कुछ हिस्सों के प्रसारित होने का संदेह था।
2026 में NEET का पेपर कैसे लीक हुआ।
इसे गेस पेपर कहने से बचने का एक रास्ता मिल जाता था। गोपनीय प्रश्नों को विशेषज्ञों की भविष्यवाणी या उच्च संभावना वाले रिवीजन सेट के रूप में बेचा जा सकता था। राजस्थान के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) ने देहरादून, केरल और राजस्थान में संपर्कों के माध्यम से इस फाइल का पता लगाया।
इसने उन पेड डिजिटल ग्रुप्स की भी जाँच की जिनके जरिए यह सामग्री बेची गई थी। इस जाँच से यह साबित नहीं हुआ कि सीकर का हर कोचिंग संस्थान इसमें शामिल था। लेकिन इसने यह जरूर दिखाया कि एक गोपनीय दस्तावेज एक बड़े कोचिंग हब तक पहुँच गया था और रीसेल के एक बड़े बाजार में दाखिल हो चुका था।
NTA ने 8 मई को इस सामग्री को केंद्रीय एजेंसियों के पास भेज दिया। 12 मई को, इसने परीक्षा रद्द कर दी और मामला CBI को सौंप दिया। दोबारा होने वाली परीक्षा के लिए मौजूदा रजिस्ट्रेशन और सेंटर प्राथमिकताओं को ही आगे बढ़ा दिया गया। उम्मीदवारों को दोबारा रजिस्ट्रेशन करने या कोई अन्य शुल्क देने की आवश्यकता नहीं थी।
यह निर्णय 2024 से अलग था। सुप्रीम कोर्ट ने उस परीक्षा को बरकरार रखने की अनुमति दी थी क्योंकि सबूतों से यह नहीं पता चला था कि कोई ऐसा देशव्यापी लीक हुआ था जिसे संभालना असंभव हो। वहीं 2026 में NTA इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि नौ दिनों के भीतर ही यह साफ हो गया कि इस प्रभावित परीक्षा को बचाना संभव नहीं था।
CBI ने 2026 लीक का पता NTA द्वारा नियुक्त एक्सपर्ट्स से लगाया
CBI ने 12 मई को अपना मामला दर्ज किया और कई राज्यों में ठिकानों की तलाशी ली। उसने फोन, मैसेजिंग एप्लिकेशन, बैंक रिकॉर्ड और NTA के दस्तावेजों की जाँच की। जाँच एजेंसी का यह मामला 2024 की जाँच की तुलना में लीक के मुख्य स्रोत के बहुत करीब पहुँच गया।
पंकज कुमार ने परीक्षा की सुबह एक छपी हुई बुकलेट कॉपी की थी। वहीं 2026 में CBI ने कहा कि विषय-विशेषज्ञों ने हफ्तों पहले ही गोपनीय प्रश्नों तक पहुँच बना ली थी और उन्हें कोचिंग व काउंसलिंग नेटवर्कों तक पहुँचा दिया था।
13 मई को गिरफ्तार किए गए पहले पाँच लोग नासिक के शुभम खैरनार, जयपुर के मांगीलाल बीवाल, विकास बीवाल व दिनेश बीवाल और गुरुग्राम के यश यादव थे। खैरनार ‘एसआर एजुकेशन कंसल्टेंसी’ चलाता था, जो मेडिकल दाखिले के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती थी।
CBI ने दिल्ली की एक अदालत को बताया कि उसने यादव को वितरण के लिए पेपर हासिल करने में मदद की थी। रिपोर्टों के अनुसार, यादव को 29 अप्रैल को टेलीग्राम के जरिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी की PDF मिल गई थीं।
मांगीलाल बीवाल के बारे में कहा गया कि उसने अपने छोटे बेटे के लिए इस नेटवर्क से संपर्क किया था। इस सौदे के लिए बातचीत की कीमत 10 लाख रुपए से 12 लाख रुपए के बीच थी।
नेटवर्क कैसे काम करता था और NEET 2026 पेपर लीक में किसने क्या भूमिका निभाई।
पुणे की मनीषा वाघमारे और अहिल्यानगर के धनंजय लोखंडे को इसके बाद गिरफ्तार किया गया। CBI का कहना था कि लोखंडे ने वाघमारे से सामग्री प्राप्त की और उसे खैरनार को सौंप दिया, जिसने इसे आगे यादव तक पहुँचाने की व्यवस्था की।
वाघमारे मेडिकल काउंसलिंग और उम्मीदवारों को इकट्ठा करने (मोबिलाइजेशन) के काम से जुड़ी थी। एजेंसी ने बाद में बताया कि वह छात्रों को NTA द्वारा नियुक्त केमिस्ट्री और बायोलॉजी के विशेषज्ञों द्वारा ली जाने वाली विशेष क्लासों में लेकर आती थी।
15 मई को CBI ने केमिस्ट्री के लेक्चरर पी वी कुलकर्णी को गिरफ्तार किया गया और उसे केमिस्ट्री शाखा का मुख्य सरगना करार दिया। कुलकर्णी NTA की ओर से परीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा रहा था और गोपनीय प्रश्नों तक उसकी सीधी पहुँच थी। अप्रैल के आखिरी हफ्ते के दौरान, उसने वाघमारे के माध्यम से जुटाए गए छात्रों के लिए अपने पुणे स्थित निजी आवास पर विशेष सत्र आयोजित किए।
CBI के मुताबिक, कुलकर्णी प्रश्नों, उनके विकल्पों और सही उत्तरों को बोलकर लिखवाता था। छात्र उन्हें अपनी कॉपियों में लिख लेते थे। रिपोर्टों के अनुसार, यह सामग्री 3 मई के प्रश्नपत्र से पूरी तरह मेल खाती थी।
इन क्लासों में शामिल होने के लिए छात्रों ने कई-कई लाख रुपए का भुगतान किया था। इस तरीके ने हर खरीदार को NTA का कोई पहचान योग्य आधिकारिक दस्तावेज दिए बिना ही, गोपनीय पहुँच को एक निजी कोचिंग प्रॉडक्ट में तब्दील कर दिया।
16 मई को जाँच एजेंसी ने सीनियर बॉटनी शिक्षिका मनीषा गुरुनाथ मंधारे को गिरफ्तार किया। CBI का कहना था कि उन्हें NTA विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया गया था और बॉटनी व जूलॉजी के पेपरों तक उनकी मुकम्मल पहुँच थी।
उन्होंने भी अपने पुणे स्थित आवास पर विशेष क्लासें ली थीं। वाघमारे यहाँ भी उम्मीदवारों को लाने का काम कर रही थी। छात्र कॉपियों में प्रश्न लिखते थे और टेक्स्टबुक्स के जरूरी हिस्सों पर निशान लगाते थे। रिपोर्टों के मुताबिक, उन प्रश्नों में से अधिकांश परीक्षा में ज्यों के त्यों आए थे।
इस प्राइवेट-रेसिडेंस मॉडल ने किसी कोचिंग सेंटर के तौर पर दिखने वाले लेन-देन की गुंजाइश को खत्म कर दिया। एक रिक्रूटर अपने निजी संपर्कों का इस्तेमाल करता था, विशेषज्ञ एक छोटे से सशुल्क (पेड) समूह को पढ़ाता था और छात्र इस लीक को सामान्य नोट्स की तरह रिकॉर्ड कर लेते थे।
इस पूरे मामले में सबसे मजबूत और डायरेक्ट इंस्टीट्यूशनल लिंक 18 मई को तब सामने आया जब CBI ने लातूर में ‘आरसीसी कोचिंग इंस्टीट्यूट’ के मालिक शिवराज मोटेगांवकर को गिरफ्तार किया।
एजेंसी के अनुसार, RCC नौ शाखाओं का संचालन करता था और नीट उम्मीदवारों को कोचिंग देता था। मोटेगांवकर को कुलकर्णी का बेहद करीबी बताया गया। संस्थान और उसके घर की तलाशी में एक केमिस्ट्री क्वेश्चन बैंक मिला, जिसमें 3 मई की परीक्षा के प्रश्न शामिल थे।
CBI ने बाद में दिल्ली की एक अदालत को बताया कि मोटेगांवकर का बेटा आदित्य कुलकर्णी के उन्हीं सत्रों में शामिल हुआ था और उसने हस्तलिखित नोट्स तैयार किए थे।
जाँचकर्ताओं ने मोटेगांवकर द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे एक फोन से 36 तस्वीरें बरामद कीं, जिनमें से पाँच एक जैसी थीं। बाकी तस्वीरों में 132 हस्तलिखित केमिस्ट्री के प्रश्न थे और उनमें से करीब 111 प्रश्न NTA के मास्टर सेट से मेल खाते थे। रिपोर्टों के अनुसार, ये तस्वीरें परीक्षा से दस दिन पहले, यानी 23 अप्रैल को ही खींच ली गई थीं।
जाँच एजेंसी ने कहा कि यह लेन-देन लातूर के ‘सिद्धिविनायक अस्पताल’ में हुआ था, जिसे बाल रोग विशेषज्ञ (पीडियाट्रिशियन) डॉ मनोज भगवानराव शिरूरे चलाते हैं। शिरूरे को 26 मई को गिरफ्तार किया गया था।
राउज एवेन्यू जिला अदालत के 24 जुलाई के एक आदेश में CBI के इस दावे का जिक्र है कि शिरूरे ने अप्रैल के तीसरे हफ्ते के दौरान अस्पताल के एक डीलक्स कमरे में आदित्य मोटेगांवकर की कुलकर्णी से मुलाकात की व्यवस्था की थी।
एजेंसी ने अस्पताल के एक कर्मचारी के बयान का हवाला दिया, जिसे शिरूरे ने यह इंतजाम करने का जिम्मा सौंपा था। इसके मुताबिक इसी बैठक के जरिए आदित्य को परीक्षा से पहले केमिस्ट्री के प्रश्न हासिल करने का मौका मिला।
CBI का दावा था कि इस पहुँच को मुमकिन बनाने के बदले शिरूरे को शिवराज मोटेगांवकर की पत्नी से 5 लाख रुपए मिले थे। यह रकम 21 मई को शिरूरे की बहन के घर से बरामद की गई थी।
अदालती आदेश के अनुसार, बहन ने जाँचकर्ताओं को बताया कि शिरूरे ने पिछली रात ही उसे यह पैसे रखने के लिए दिए थे। एजेंसी ने यह भी कहा कि शिरूरे ने दो अन्य डॉक्टरों को भी कुलकर्णी के पास भेजा था।
उनके बच्चों को 3-3 लाख रुपए का भुगतान करने के बाद केमिस्ट्री के प्रश्न मिले थे और शिरूरे को उन भुगतानों का आधा हिस्सा (कमीशन के तौर पर) मिला था। संबंधित गवाहों के बयान BNSS की धारा 183 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किए गए।
अदालती आदेश में कहा गया है कि गवाहों ने कुलकर्णी द्वारा दिए गए उन 42 प्रश्नों की पहचान की जो NEET-UG के पेपर में आए थे। दूसरी तरफ शिरूरे के वकीलों का कहना था कि उनके मुवक्किल, उनके उपकरणों, घर या अस्पताल से कोई भी लीक प्रश्न बरामद नहीं हुआ है और उन्होंने उनके तथा इस 5 लाख रुपए के बीच के किसी भी संबंध को खारिज किया।
फिजिक्स शाखा की कड़ियाँ NTA द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ मनीषा संजय हवलदार तक पहुँचीं। CBI के अनुसार, फिजिक्स के पेपर तक हवलदार की पूरी पहुँच थी और उन्होंने हस्तलिखित प्रश्न मंधारे को सौंपे थे।
उन्होंने कथित तौर पर पुणे में ‘डॉ अभंग प्रभु मेडिकल एकेडमी’ के फैकल्टी मेंबर तेजस हर्षदकुमार शाह को भी फिजिक्स के प्रश्न बोलकर लिखवाए थे। शाह पर इस सामग्री को एकेडमी से जुड़े छात्रों तक पहुँचाने का आरोप था।
उपलब्ध सामग्री इस कृत्य का जिम्मेदार शाह को ठहराती है, लेकिन यह साबित नहीं करती कि एकेडमी के मैनेजमेंट ने इसके लिए कोई आधिकारिक अनुमति दी थी। यह कानूनी अंतर बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी एक फैकल्टी मेंबर की कथित संलिप्तता को स्वतः ही पूरी संस्था के खिलाफ निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
मई के अंत तक, CBI ने खैरनार, मांगीलाल बीवाल, विकास बीवाल, दिनेश बीवाल, यश यादव, लोखंडे, वाघमारे, कुलकर्णी, मंधारे, मोटेगांवकर, हवलदार, शिरूरे और शाह सहित कुल 13 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था।
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री विषय-स्तरीय तीन मुख्य स्रोतों की पुष्टि करती है, केमिस्ट्री के लिए कुलकर्णी, बायोलॉजी के लिए मंधारे और फिजिक्स के लिए हवलदार। यह आपस में जुड़े हुए बिचौलियों को तो दिखाता है, लेकिन अभी तक यह स्थापित नहीं करता कि किसी एक अकेले व्यक्ति ने इन तीनों शाखाओं को नियंत्रित किया था।
24 जुलाई को विशेष CBI अदालत ने शिरूरे की जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि जाँच अभी एक बेहद महत्वपूर्ण चरण में है और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
आदेश में यह भी दर्ज किया गया कि गिरफ्तार किए गए सभी 13 आरोपित उस समय न्यायिक हिरासत में थे। यह निष्कर्ष केवल जमानत की अर्जी तक ही सीमित था और इससे दोष का अंतिम फैसला नहीं हुआ था।
इस तरह 2026 का यह नेटवर्क सोर्स के बहुत ज्यादा करीब रहकर और कहीं अधिक समय के साथ काम कर रहा था। यह प्राइवेट क्लासों, हस्तलिखित नोट्स, गेस पेपर्स और टेलीग्राम के जरिए बिक्री की व्यवस्था करने में सक्षम था। इसमें परीक्षा के दिन सिर्फ पाँच घंटे की समय-सीमा के भीतर भाग-दौड़ करने वाले सॉल्वरों के किसी बड़े गिरोह की जरूरत बहुत कम थी।
दोबारा जाँच, सुप्रीम कोर्ट और सरकार का जवाब
NTA ने 21 जून को एक नए प्रश्नपत्र और नए विषय-विशेषज्ञों के साथ NEET-UG 2026 की परीक्षा दोबारा आयोजित की। इस कैन्सलैशन के कारण 22 लाख से अधिक प्रभावित उम्मीदवारों को दूसरी परीक्षा के लिए फिर से तैयारी करने पर मजबूर होना पड़ा।
NTA के अनुसार, 21 जून को आयोजित इस री-टेस्ट में लगभग 20 लाख उम्मीदवार शामिल हुए। रद्द की गई परीक्षा के उम्मीदवार बिना किसी नए रजिस्ट्रेशन या अतिरिक्त शुल्क के इसमें बैठने के पात्र थे। इसके परिणाम 16 जुलाई को जारी किए गए।
शिरूरे की जमानत सुनवाई के दौरान, CBI के अभियोजक ने कहा कि परीक्षा रद्द करने और दोबारा परीक्षा कराने से सरकारी खजाने को 600 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ। अभियोजक ने यह भी बताया कि नए प्रश्नपत्रों को परीक्षा केंद्रों तक हेलीकॉप्टर के जरिए पहुँचाना पड़ा था।
अदालती आदेश में इन बातों को अभियोजन पक्ष की दलीलों के रूप में दर्ज किया गया है, न कि अदालत द्वारा स्वतंत्र रूप से निकाले गए किसी सटीक निष्कर्ष के रूप में।
यह मामला दोबारा परीक्षा होने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया था। याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा रद्द करने, उम्मीदवारों की सुरक्षा और इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति को रोकने की NTA की क्षमता पर सवाल उठाए।
कोर्ट ने पूछा कि 2024 के बाद किए गए सुधारों से पर्याप्त संस्थागत सीख क्यों विकसित नहीं हो सकी। अदालत चाहती थी कि जाँच एजेंसी ऐसी शारीरिक और बौद्धिक क्षमता का प्रदर्शन करे जिससे भविष्य में ऐसी किसी अन्य चूक को रोका जा सके।
यह चिंता केवल तालों और CCTV कैमरों तक सीमित नहीं थी। 2024 के मामले ने उस समय की कमजोरियों को उजागर किया था जब छपे हुए प्रश्नपत्र परीक्षा केंद्र पर पहुँच चुके थे। वहीं 2026 के मामले ने दिखाया कि विशेषज्ञों के चयन और गोपनीयता की प्रणाली अभी भी असुरक्षित बनी हुई थी।
भविष्य के लिए एक स्थायी जोखिम प्रणाली बनाई जानी चाहिए जो यह रिकॉर्ड रखे कि किसके पास पहुँच थी, कौन सा नियंत्रण विफल रहा, क्या किसी विशेषज्ञ का कोचिंग से कोई संबंध था और भविष्य में इन जैसे चेतावनी संकेतों से कैसे निपटा जाना चाहिए।
29 मई की सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत रूप से इस पूरी प्रतिक्रिया और दोबारा परीक्षा कराने की प्रक्रिया की निगरानी कर रहे थे।
परीक्षा रद्द होने के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए, जो बाद में पेपर लीक, एनटीए और मंत्रालय की जवाबदेही को लेकर एक व्यापक आंदोलन में बदल गए। इस विवाद के कारण मानसून सत्र के दौरान संसद की कार्यवाही भी बाधित हुई।
विपक्ष के सांसदों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की, जबकि सरकार ने कहा कि वह बहस के लिए तैयार है लेकिन उसने इस्तीफे को बहस की पूर्व शर्त के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
23 जुलाई को पीएम मोदी ने घोषणा की कि पेपर लीक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित की जाएँगी। उन्होंने कहा कि छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को सख्त से सख्त सजा दी जाएगी।
यह घोषणा एक वास्तविक कमजोरी को दूर करने के उद्देश्य से की गई थी, क्योंकि 2024 के CBI मामले में पाँच चार्जशीट तो दाखिल हो चुकी थीं, लेकिन फरवरी 2026 तक उसका मुकदमा आरोप तय होने के चरण तक भी नहीं पहुँच पाया था।
इसके बाद प्रशासनिक बदलाव भी किए गए। हायर एजुकेशन सेक्रेटरी विनीत जोशी का तबादला कर दिया गया और उनके स्थान पर नरेश पाल गंगवार को नियुक्त किया गया। सरकार ने अतिरिक्त कदम उठाने का वादा किया।
रिपोर्टों में कहा गया कि 2027 से NEET-UG पूरी तरह से कंप्यूटर आधारित फॉर्मेट की ओर बढ़ेगा। 24 जुलाई को NTA ने 47 अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया।
Nothing is more important than the welfare and future of our youth!
We have decided to set up fast-track courts to ensure swift and stringent punishment for those involved in paper leaks. Have directed the concerned authorities and officials to take all necessary steps in this…
कंप्यूटर आधारित परीक्षा छपे हुए प्रश्नपत्रों, उनके परिवहन और OMR शीट से जुड़े जोखिमों को कम कर सकती है। लेकिन यह अपने आप में उस विशेषज्ञ को नहीं रोक सकती जिसके पास गोपनीय प्रश्नों तक पहले से पहुँच हो और वह उन्हें किसी कोचिंग नेटवर्क तक पहुँचा दे।
2026 की केंद्रीय कमजोरी कोई छपी हुई बुकलेट नहीं थी, बल्कि अंदरूनी लोगों, कोचिंग संचालकों और उम्मीदवारों के बीच काम करने वाले बिचौलियों के संबंध थे।
कोचिंग माफिया को तोड़ने के लिए क्या बदलना होगा?
पहला सुधार यह होना चाहिए कि गोपनीय परीक्षा कार्य और कोचिंग इंडस्ट्री के बीच एक सख्त फायरवॉल बनाई जाए। NTA के किसी भी विषय-विशेषज्ञ को प्रासंगिक गोपनीयता अवधि के दौरान निजी ट्यूशन पढ़ाने, पैसे लेकर विशेष कक्षाएँ लेने, कमीशन प्राप्त करने, सलाहकार के रूप में काम करने, किसी कोचिंग व्यवसाय के साथ कमाई साझा करने या किसी करीबी रिश्तेदार द्वारा नियंत्रित संस्थान के माध्यम से काम करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।
केवल कागज पर घोषणा कर देना ही काफी नहीं है। NTA को कंपनी के रिकॉर्ड, प्रोफेशनल प्रोफाइल, भुगतान के लेन-देन और घोषित जुड़ावों का सत्यापन करना चाहिए।
जब तक कार्य के लिए आवश्यक न हो, किसी भी विशेषज्ञ के पास पूरे विषय के प्रश्नपत्र तक पहुँच नहीं होनी चाहिए। प्रश्न तैयार करने, समीक्षा, अनुवाद, मॉडरेशन और अंतिम चयन के काम को अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाना चाहिए।
सिस्टम में यह रिकॉर्ड दर्ज होना चाहिए कि प्रत्येक प्रश्न तक किसने और कब पहुँच बनाई, किस डिवाइस का उपयोग किया गया, क्या इसे प्रिंट या डाउनलोड किया गया था, उत्तर को किसने मंजूरी दी और इसे मास्टर सेट में कब शामिल किया गया। किसी भी असामान्य पहुँच पर एक ऑटोमैटिक अलर्ट जारी होना चाहिए।
कोचिंग सेंटरों और एडमिशन कंसल्टेंसी दोनों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन होना चाहिए। 2024 का मामला दिखाता है कि केवल बड़े क्लासरूम के आधार पर तय की गई परिभाषा क्यों अपर्याप्त है।
एक ऐसा व्यवसाय जो उम्मीदवारों को तैयार करता है, मेडिकल काउंसलिंग की सुविधा देता है, दस्तावेज इकट्ठा करता है, सीटें दिलाने का दावा करता है या परिवारों और कॉलेजों के बीच बिचौलिये के रूप में काम करता है, उसे नियामक प्रणाली रेगुलेटरी सिस्टम के दायरे में आना चाहिए, भले ही वह 50 से कम छात्रों को पढ़ाता हो।
स्वामित्व और वित्त पूरी तरह से पारदर्शी होने चाहिए। नियामकों को प्रमोटरों, निदेशकों, ट्रस्टियों, संबंधित कंपनियों, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं और वास्तविक मालिकों की जानकारी होनी चाहिए। यही जानकारी सभी राज्यों में आपस में जुड़ी होनी चाहिए ताकि एक अधिकार क्षेत्र में प्रतिबंधित किया गया प्रमोटर किसी दूसरी कंपनी या रिश्तेदार के माध्यम से दोबारा काम शुरू न कर सके।
गारंटीड सिलेक्शन, कन्फर्म एमबीबीएस एडमिशन या 100 प्रतिशत सफलता जैसे वादे केवल उपभोक्ता-विज्ञापन नोटिस तक सीमित नहीं रहने चाहिए। ऐसे दावे डमी कैंडिडेट, पेपर तक पहुँच, OMR में हेरफेर या अवैध रूप से सीट की व्यवस्था करने का संकेत हो सकते हैं।
उपभोक्ता प्राधिकरणों, NTA और राज्य पुलिस द्वारा संचालित एक कॉमन प्लेटफॉर्म को असामान्य रूप से अधिक फीस, असली सर्टिफिकेट की माँग, कोरे चेक, परीक्षा शहर बदलने के निर्देश, अंकों से जुड़े भुगतान, सटीक प्रश्नों का वादा करने वाले निजी सत्रों और डमी उम्मीदवारों की व्यवस्था करने के प्रस्तावों को चिन्हित करना चाहिए।
गोधरा मामला दिखाता है कि केंद्र आवंटन में हेरफेर करने के लिए आवेदन डेटा का उपयोग कैसे किया जा सकता है। एक ही जिले में अपना वर्तमान पता बदलने वाले, एक ही शहर को चुनने वाले और एक असामान्य भाषा कॉम्बिनेशन चुनने वाले उम्मीदवारों के समूह की समीक्षा केंद्रों के आवंटन से पहले की जानी चाहिए।
इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें दोषी मान लिया जाए, बल्कि इससे मानवीय सत्यापन की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। जब सबूत स्वयं संस्थान तक पहुँचें, तो कोचिंग संस्थानों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
जहाँ कोई मालिक या निदेशक इसमें भाग लेता है, संस्थागत खातों में पैसा आता है, परिसरों का जानबूझकर उपयोग किया जाता है, संगठन के माध्यम से गोपनीय प्रश्न बांटे जाते हैं या प्रबंधन विश्वसनीय चेतावनियों को नजरअंदाज करता है, वहाँ रजिस्ट्रेशन रद्द करने, कमाई को जब्त करने और दीर्घकालिक प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाए जाने चाहिए।
जवाबदेही फिर भी सबूतों के आधार पर ही तय होनी चाहिए। RCC का मामला अधिक मजबूत रिपोर्ट किए गए आधार पर खड़ा है क्योंकि उसके मालिक को गिरफ्तार किया गया था और उससे जुड़े उपकरणों व परिसरों से सामग्री बरामद की गई थी।
तेजस शाह के कृत्य से स्वचालित रूप से यह साबित नहीं हो जाता कि डॉ अभंग प्रभु मेडिकल एकेडमी के प्रबंधन को फिजिक्स पेपर ट्रांसफर किए जाने के बारे में पता था।
उम्मीदवारों के डेटा को भी सुरक्षा की आवश्यकता है। कोचिंग सेंटर और सलाहकार परीक्षा के अंक, पारिवारिक आय, पसंदीदा कॉलेज, फोन नंबर, पते, पहचान दस्तावेज और परिवार की भुगतान करने की क्षमता के बारे में जानकारी रखते हैं।
यह डेटाबेस भ्रष्ट एजेंटों को हताश या आर्थिक रूप से सक्षम लक्ष्यों की पहचान करने में मदद करता है। छात्रों की जानकारी स्पष्ट सहमति के बिना दाखिला एजेंटों के साथ बेची या साझा नहीं की जानी चाहिए। नियामकों को ऑडिट करना चाहिए कि असली सर्टिफिकेट और पहचान दस्तावेज कैसे एकत्र और संग्रहीत किए जाते हैं।
एक सुरक्षित व्हिसलब्लोअर प्रणाली भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। 2026 का मामला इसलिए सामने आया क्योंकि एक शिक्षक ने गेस पेपर की जाँच की और अधिकारियों से संपर्क किया। शिक्षकों, कोचिंग कर्मचारियों, छात्रों और परीक्षा कर्मियों को एक सुरक्षित पोर्टल के माध्यम से संदिग्ध पेपर, स्क्रीनशॉट और भुगतान की माँगों को जमा करने में सक्षम होना चाहिए।
इस पोर्टल को सामग्री का टाइमस्टैम्प दर्ज करना चाहिए, मूल फाइल को सुरक्षित रखना चाहिए, पहचान की रक्षा करनी चाहिए और NTA व एक स्वतंत्र जाँच इकाई दोनों को अलर्ट करना चाहिए। प्रतिशोध के खिलाफ सुरक्षा आवश्यक है। जहाँ विश्वसनीय जानकारी किसी देशव्यापी परीक्षा को प्रभावित होने से बचाती है, वहाँ वित्तीय इनाम देना भी उचित हो सकता है।
वित्तीय जाँच पहली गिरफ्तारी के साथ ही शुरू हो जानी चाहिए। 2024 में CBI ने माता-पिता, बिचौलियों, कर्मचारियों, रिश्तेदारों, कंपनियों और थर्ड-पार्टी खातों के माध्यम से भुगतानों का पता लगाया था।
जाँचकर्ताओं को संदिग्ध फंडों को फ्रीज करना चाहिए, पेमेंट ऐप्स और कंपनी के रिकॉर्ड की जाँच करनी चाहिए और इस कमाई से खरीदी गई संपत्ति की पहचान करनी चाहिए। मुनाफे को जब्त करना किसी बदले जा सकने वाले स्थानीय हैंडलर को गिरफ्तार करने की तुलना में इस व्यावसायिक मॉडल को अधिक प्रभावी ढंग से नुकसान पहुँचा सकता है।
फास्ट-ट्रैक अदालतों को केवल रिमांड और जमानत याचिकाओं पर तेजी से कार्रवाई करने के बजाय मुकदमों को पूरा करना चाहिए। एक नामित अदालत को एक समेकित (consolidated) डिजिटल चार्जशीट, एक स्पष्ट भूमिका चार्ट, सत्यापित घटनाक्रम, वित्तीय-प्रवाह आरेख, डिवाइस के स्वामित्व का रिकॉर्ड और आवश्यक गवाहों की एक सीमित सूची मिलनी चाहिए।
एक ही FIR का वर्णन करने के लिए किसी मामले में सैकड़ों बार-बार आने वाले गवाहों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। समय-समय पर सार्वजनिक केस-स्टेटस की जानकारी मिलने से प्रभावित छात्रों को भी यह जानने में मदद मिलेगी कि क्या आरोप तय हो चुके हैं और सबूतों को दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
तरीका बदल गया, लेकिन बाजार बच गया
2024 और 2026 के मामलों में अलग-अलग तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया गया था। 2024 में ओएसिस स्कूल पहुँचने के बाद प्रश्नपत्र को एक सीलबंद बक्से से निकाला गया था।
राज गेस्ट हाउस में MBBS छात्र इसे हल करने के लिए इंतजार कर रहे थे। दाखिला एजेंटों ने पहले से ही अलग-अलग शहरों में उम्मीदवारों को इकट्ठा कर लिया था। यह पूरा ऑपरेशन स्पीड, परिवहन, प्रिंटर और स्थानीय हैंडलर पर निर्भर था।
2026 में CBI ने कहा कि परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र के सवाल विषय-विशेषज्ञों से बाहर आ गए थे। सुबह-सुबह की जाने वाली जल्दबाजी वाली गतिविधियों की जगह निजी कक्षाओं, हस्तलिखित नोट्स, गेस पेपर्स, टेलीग्राम फाइलों और कोचिंग नेटवर्क ने ले ली थी।
इस लीक को पढ़ाई का रूप देकर आसानी से छिपाया जा सकता था और इसे एक सामान्य रिवीजन शेड्यूल में शामिल किया जा सकता था। यह तरीका इसलिए विकसित हुआ क्योंकि इसका बाजार मौजूद था। माता-पिता अभी भी पैसे देने के लिए तैयार थे। कंसलटेंट अभी भी उनकी पहचान कर सकते थे। कोचिंग संचालकों के पास उम्मीदवारों का एक बड़ा आधार था। इनसाइडर अभी भी गोपनीय सामग्री बेच सकते थे।
परीक्षा केंद्रों को सुरक्षित करने से एक रास्ता बंद हो सकता है। कंप्यूटर आधारित परीक्षा से दूसरा रास्ता बंद हो सकता है। व्यक्तिगत रूप से शिक्षकों को गिरफ्तार करने से कुछ समय के लिए यह श्रृंखला टूट सकती है। लेकिन इनमें से कोई भी कदम तब तक पर्याप्त नहीं होगा जब तक कि अंदरूनी लोगों, कोचिंग संचालकों, सलाहकारों और उम्मीदवारों को जोड़ने वाले इस पूरे व्यावसायिक नेटवर्क को खत्म नहीं कर दिया जाता।
कोई प्रश्नपत्र अपने आप किसी गोपनीय प्रणाली से निकलकर पैसे देने वाले उम्मीदवारों तक नहीं पहुँचता। 2024 में इस ऑपरेशन के लिए स्कूल के अधिकारियों, ट्रंक खोलने में सक्षम व्यक्ति, MBBS सॉल्वरों, गेस्ट-हाउस संचालकों, उम्मीदवारों को इकट्ठा करने वाले रिक्रूटर्स, प्रिंटर, ट्रांसपोर्टर्स और पैसों का लेन-देन संभालने वालों की आवश्यकता थी।
2026 में इसके लिए NTA से जुड़े विशेषज्ञों, निजी कोचिंग सत्रों, काउंसलिंग बिचौलियों, कोचिंग फैकल्टी और डिजिटल रीसेलर्स की जरूरत थी। जो व्यक्ति पेपर चुराता है या उसे लीक करता है, वह केवल पहला सप्लायर होता है।
कोचिंग माफिया उस पेपर को व्यावसायिक मूल्य प्रदान करता है। उसे पता होता है कि उम्मीदवार कहाँ मिलेंगे और कौन से परिवार इसके लिए भुगतान करेंगे। वह केंद्रों, दस्तावेजों, यात्रा और विशेष कक्षाओं की व्यवस्था कर सकता है। वह चुराए गए प्रश्नों को संभावित प्रश्नों के रूप में पेश कर सकता है और भुगतानों को कंसलटेंसी, ट्रस्टों व निजी खातों के माध्यम से रूट कर सकता है।
सरकार ने इसके लिए एक समर्पित कानून पेश किया है, परीक्षा प्रक्रियाओं का पुनर्गठन किया है, CBI जाँच के आदेश दिए हैं और फास्ट-ट्रैक कोर्ट की घोषणा की है। ये उपाय आवश्यक हैं। अगला कदम उन शिक्षा व्यवसायों को निशाना बनाना होना चाहिए जो गोपनीय पहुँच को एक बिकने वाले उत्पाद में बदल देते हैं।
कोचिंग सेंटरों और एडमिशन कंसलटेंसी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होना चाहिए। उनके स्वामित्व और वित्त का खुलासा होना चाहिए। NTA के विशेषज्ञों को निजी कोचिंग संबंधों से पूरी तरह दूर रखा जाना चाहिए।
प्रश्नों तक पहुँच को विभाजित किया जाना चाहिए और इसे डिजिटली ट्रेस करने योग्य बनाया जाना चाहिए। जो संस्थान जानबूझकर इसमें भाग लेते हैं, उन्हें काम करने का अधिकार खो देना चाहिए। अन्यथा परीक्षा प्राधिकरण पिछले लीक से लड़ता रहेगा जबकि कोचिंग माफिया अगले नए तरीके की तैयारी कर रहा होगा।
जिन कोर्ट डॉक्यूमेंट्स और FIR पर यह रिपोर्ट आधारित है, उन्हें इस लिंक से देखा जा सकता है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
नेपाल घूमने जाने वाले भारतीय पर्यटकों और पड़ोसी देश के साथ कारोबार करने वाले व्यापारियों के लिए एक बेहद राहत भरी और बड़ी खबर सामने आई है। नेपाल सरकार ने करीब एक दशक पुराने प्रतिबंध को खत्म करते हुए ₹200 और ₹500 मूल्यवर्ग के नए भारतीय करेंसी (Currency) नोटों के इस्तेमाल को हरी झंडी दे दी है।
नेपाल राष्ट्र बैंक (NRB) की इस आधिकारिक घोषणा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार के मजबूत द्विपक्षीय (Bilateral) प्रयासों और भारतीय नागरिकों की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। इस फैसले के बाद अब दोनों देशों के नागरिक बिना किसी परेशानी के ये नोट सीमा पार ले जा सकेंगे, जिससे सालों से चली आ रही करेंसी से जुड़ी समस्याएँ पूरी तरह दूर हो जाएँगी।
नेपाल राष्ट्र बैंक द्वारा जारी नए दिशानिर्देशों के अनुसार, यह छूट केवल 9 नवंबर 2016 की नोटबंदी के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी किए गए नए ₹200 और ₹500 के नोटों पर ही लागू होगी। नेपाल सरकार ने यह साफ कर दिया है कि 2016 की नोटबंदी से पहले जारी हुए पुराने ₹500 और ₹1,000 के भारतीय नोट नेपाल में पहले की तरह ही पूरी तरह से प्रतिबंधित (Prohibited) रहेंगे।
इसके अलावा नेपाल जाने वाले या वहाँ से वापस भारत आने वाले यात्रियों के लिए भारतीय मुद्रा ले जाने की एक सीमा तय की गई है, जिसके तहत एक व्यक्ति अधिकतम ₹25,000 मूल्य तक के ही भारतीय नोट अपने साथ रख सकता है।
गाइडलाइन्स भी की गई जारी, भारतीय नोटों की एक सीमा तय
विदेशी मुद्रा के लेनदेन को लेकर नेपाल राष्ट्र बैंक ने नए नियम और गाइडलाइंस (Guidelines) भी सार्वजनिक किए हैं। इन नियमों के तहत नेपाली नागरिक और विदेशी यात्री 5,000 अमेरिकी डॉलर (या इसके बराबर की अन्य विदेशी मुद्रा) तक बिना किसी कस्टम डिक्लेरेशन (Custom Declaration) के नेपाल में ला सकते हैं। यदि किसी यात्री के पास ₹100 या उससे छोटे भारतीय नोट हैं, तो वह 5,000 डॉलर के मूल्य के बराबर की राशि बिना कस्टम घोषणा के अपने साथ ले जा सकता है।
हालाँकि अगर किसी यात्री के पास 5,000 अमेरिकी डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा या तय सीमा से ज्यादा नकदी (Cash) है, तो उसे हवाई अड्डे या सीमा पार कस्टम कार्यालय में इसकी लिखित घोषणा करनी होगी। इसके अलावा नेपाल से किसी तीसरे देश में भारतीय करेंसी ले जाना पूरी तरह से गैर-कानूनी घोषित किया गया है।
इस ऐतिहासिक फैसले और दोनों देशों के बीच बने नए नियमों की जानकारी देते हुए नेपाल राष्ट्र बैंक के प्रवक्ता गुरु प्रसाद पौडेल ने कहा, “हमने भारतीय रिजर्व बैंक के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा और आवश्यक समीक्षा के बाद ही नए नियमों को अंतिम रूप दिया है। नेपाल राष्ट्र बैंक (NRB) ने 23 जुलाई 2026 को इस संबंध में औपचारिक अधिसूचना जारी की है। इस फैसले का सीधा मकसद नेपाल आने वाले भारतीय पर्यटकों, सीमावर्ती इलाकों के निवासियों और दोनों देशों के कारोबारियों को करेंसी संबंधी परेशानियों से निजात दिलाना है। अब भारतीय नागरिक बिना किसी झंझट के नेपाल में अपने वैध भारतीय नोटों से भुगतान कर सकेंगे।”
नोट क्यों हुए थे बैन?
भारत और नेपाल के बीच रिश्तों को नई ऊँचाई देने वाले इस फैसले के पीछे एक लंबा घटनाक्रम रहा है। दरअसल, 8 नवंबर 2016 को जब भारत सरकार ने 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों को बंद करने का फैसला लिया था, तब नेपाल के बैंकिंग सिस्टम (System) में अरबों रुपये के भारतीय नोट मौजूद थे। नोटबंदी के तुरंत बाद नेपाल ने सुरक्षा, विधिक और आर्थिक कारणों से ₹100 से बड़े सभी नए भारतीय नोटों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी।
नेपाल सरकार को मुख्य रूप से यह आशंका थी कि बिना किसी औपचारिक समझौते या तंत्र (Mechanism) के नए नोटों का चलन शुरू होने से सीमा पार जाली नोटों (Counterfeit) का कारोबार बढ़ सकता है और काले धन (Black Money) की जमाखोरी हो सकती है। इसके साथ ही पुराने भारतीय नोटों के निपटारे को लेकर भारत और नेपाल के केंद्रीय बैंकों के बीच लंबे समय तक बातचीत चलती रही, जिसके कारण नए नोटों को हरी झंडी मिलने में एक दशक का समय लग गया।
मोदी सरकार की कूटनीतिक जीत
मोदी सरकार के दौरान भारत ने ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (Neighborhood First) नीति के तहत नेपाल के साथ कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों को लगातार प्राथमिकता दी है। भारत सरकार के वरिष्ठ विदेश अधिकारियों और वित्तीय संस्थानों के निरंतर संवाद का ही परिणाम है कि नेपाल ने अंततः एक दशक पुराने इस कड़े प्रतिबंध को हटाने का निर्णय लिया।
इससे न केवल भारतीय पर्यटकों का नेपाल दौरा सुगम होगा, बल्कि दोनों देशों के बीच जमीनी स्तर पर होने वाले छोटे और बड़े व्यापार को भी एक नई दिशा मिलेगी। भारतीय यात्रियों को अब नेपाल में खरीदारी, होटल बुकिंग और यात्रा के दौरान छोटे भारतीय नोटों की किल्लत का सामना नहीं करना पड़ेगा।
उत्तर प्रदेश के इतिहास और सांस्कृतिक सफर में एक बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ आया है। वाराणसी के पास स्थित सारनाथ को यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर सूची में औपचारिक रूप से शामिल कर लिया गया है। यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है बल्कि इसके पीछे 28 सालों का एक लंबा इंतजार और भारतीय पुरातत्वविदों की मेहनत छिपी हुई है।
🔴 Breaking!
Just inscribed: the Ancient Buddhist Site of Sarnath is now India's 45th UNESCO World Heritage property, announced at the 48th session of the World Heritage Committee in Busan. pic.twitter.com/30RQFXOoXd
— UNESCO South Asia 🏛 #Education #Sciences #Culture (@unescoindia) July 25, 2026
साल 1998 में सारनाथ को यूनेस्को की संभावित सूची में जगह मिली थी, और तब से लेकर अब तक इसके पुरातात्विक अवशेषों को संभालने, उनका रिकॉर्ड तैयार करने और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने की निरंतर कोशिशें चल रही थीं। सारनाथ भारत की पहचान और इतिहास का एक बेहद मजबूत स्तंभ है।
यह वही पवित्र जगह है जहाँ बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था और बौद्ध संघ की नींव रखी थी। बौद्ध धर्म के साथ-साथ यह स्थान जैन धर्म के लिए भी उतना ही पवित्र है, क्योंकि इसे 11वें जैन तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ की जन्मभूमि और तपस्या की धरती माना जाता है।
इतना ही नहीं स्वतंत्र भारत का जो ‘राष्ट्रीय प्रतीक’- चार सिंहों वाला अशोक स्तंभ, हम आज देखते हैं, उसका मूल स्वरूप भी सारनाथ की इसी पावन मिट्टी से निकला है। अब तक उत्तर प्रदेश में केवल तीन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल थे और वे तीनों के तीनों आगरा जिले में स्थित थे- ताजमहल, आगरा का किला और फतेहपुर सीकरी।
सारनाथ के इस सूची में जुड़ते ही उत्तर प्रदेश में विश्व धरोहरों की संख्या बढ़कर चार हो गई है। खास बात यह है कि सारनाथ पूरे पूर्वांचल क्षेत्र का पहला यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बना है, जिससे इस पूरे इलाके के पर्यटन, अर्थव्यवस्था और पहचान को एक नया आयाम मिलेगा।
सारनाथ का यह यूनेस्को सफर कैसे पूरा हुआ, इसका बौद्ध और जैन इतिहास क्या है, सम्राट अशोक का इस जगह से क्या नाता रहा, मिट्टी के नीचे दबे इसके इतिहास की खुदाई कैसे हुई, आइए इन सभी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।
28 साल का लंबा सफर और यूनेस्को की अंतरराष्ट्रीय मान्यता
सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने का प्रयास कोई एक या दो दिन की बात नहीं है। इसकी औपचारिक शुरुआत वर्ष 1998 में हुई थी जब भारत सरकार ने इसे यूनेस्को की संभावित सूची में नामांकित किया था।
इसके बाद लगभग ढाई दशकों से भी ज्यादा समय तक नोडल एजेंसी के रूप में काम कर रहे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग ने मिलकर इस पूरे परिसर के संरक्षण और दस्तावेजीकरण पर काम किया।
दक्षिण कोरिया के बुसान शहर में आयोजित विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र के दौरान 2025-26 चक्र की दावेदारी में ‘सारनाथ के प्राचीन बौद्ध स्थल’ को यह ऐतिहासिक मान्यता दी गई। इस प्रक्रिया के तहत सितंबर 2025 में आईकोमॉस (ICOMOS) का तकनीकी मूल्यांकन मिशन भी सारनाथ की वैज्ञानिक सुरक्षा जाँच करने भारत आया था।
सारनाथ को यह दर्जा मिलते ही यह भारत का 45वाँ यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बन गया है। इसके साथ ही भारत अब सबसे ज्यादा विश्व धरोहर स्थलों के मामले में पूरी दुनिया में छठवें और एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में दूसरे स्थान पर आ गया है। यूनेस्को ने सारनाथ के उस अद्वितीय विश्वव्यापी महत्व को स्वीकार किया, जिसने सदियों से दुनिया को प्रभावित किया है।
भारत की ओर से 69 अन्य पुरातात्विक स्थल फिलहाल यूनेस्को की संभावित सूची में शामिल हैं। इस फैसले के बाद सारनाथ के अवशेषों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ, तकनीकी संसाधन और विशेष सुरक्षा मानकों का लाभ लगातार मिलता रहेगा।
शिष्यों को उपदेश देते बुद्ध की सारनाथ में स्थित प्रतिमा (फाइल फोटो)
भगवान बुद्ध का पहला उपदेश और सारनाथ का धार्मिक इतिहास
सारनाथ का आध्यात्मिक इतिहास भगवान बुद्ध के जीवन की एक सबसे महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा हुआ है। खुद भगवान बुद्ध ने सारनाथ को बौद्ध तीर्थयात्रा के चार सबसे मुख्य तीर्थ स्थलों में से एक बताया था। जब सिद्धार्थ गौतम को बोधगया में पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई, तो उन्होंने अपने इस ज्ञान से पूरी दुनिया के दुखों को दूर करने का फैसला किया।
ज्ञान मिलने के बाद भगवान बुद्ध सबसे पहले सारनाथ आए, जिसे उस जमाने में ऋषिपत्तन या मृगदाव यानी हिरणों का अभयारण्य कहा जाता था। सारनाथ के इस शांत वातावरण में हीं बुद्ध ने आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने प्रथम पाँच शिष्यों को अपना पहला उपदेश दिया, जिसे बौद्ध साहित्य में ‘धम्मचक्कप्पवत्तन’ यानी धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है।
सारनाथ में स्थित शिलालेख (फाइल फोटो)
सारनाथ के विश्व धरोहर घोषित होने के साथ ही बुद्ध द्वारा बताए गए चार सबसे प्रमुख तीर्थ स्थलों में से तीन अब यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हो चुके हैं। इनमें नेपाल का लुंबिनी, बिहार का महाबोधि मंदिर (बोधगया) और अब उत्तर प्रदेश का सारनाथ शामिल है।
बुद्ध ने अपने पहले उपदेश में संसार के दुखों और उनसे मुक्ति के अष्टांगिक मार्ग के बारे में बताया था और यहीं पहले ‘बौद्ध संघ’ की स्थापना की थी। बौद्ध धर्म के अलावा सारनाथ जैन धर्म के लिए भी बेहद पावन है, क्योंकि यह 11वें जैन तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ की जन्मभूमि और तपस्या की धरती मानी जाती है।
कालान्तर में इस क्षेत्र का नाम यहाँ स्थित सारंगनाथ (शिव) मंदिर के नाम से प्रभावित होकर ‘सारनाथ’ पड़ा।
सम्राट अशोक, अशोक स्तंभ और भारत का राष्ट्रीय प्रतीक
सारनाथ के इतिहास में ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी का दौर सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, जब मौर्य वंश के महान सम्राट अशोक का शासन था। कलिंग के भीषण युद्ध और उसमें हुए भारी खून-खराबे के बाद सम्राट अशोक ने हिंसा का रास्ता पूरी तरह त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया था।
इसके बाद उन्होंने सारनाथ को बौद्ध धर्म का एक बहुत बड़ा केंद्र बनाने का निर्णय लिया और यहाँ कई स्तूपों, विहारों और पत्थर के खंभों का निर्माण कराया। इन्हीं निर्माणों में सबसे प्रसिद्ध है सारनाथ का ‘अशोक स्तंभ’, जो प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला और पाषाण शिल्प की एक बेजोड़ मिसाल है।
1904–06 में हुए उत्खनन में मिले अशोक स्तंभ और उसके सिंह शीर्ष के साथ मूलगंधकुटी विहार का दृश्य (स्रोत: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण)।
यह स्तंभ मिर्जापुर के चुनार से लाए गए बलुआ पत्थर के एक ही विशाल टुकड़े को तराशकर बनाया गया था और इसकी कुल ऊँचाई लगभग 15.25 मीटर थी। इस स्तंभ पर मौर्यकाल की एक विशेष चमकदार पॉलिश की गई है, जो हजारों साल बीत जाने के बाद भी आज भी शीशे की तरह चमकती है।
इस बेलनाकार स्तंभ पर तीन अलग-अलग राजाओं और कालखंडों के अभिलेख लिखे गए हैं। सबसे पहला अभिलेख सम्राट अशोक की ब्राह्मी लिपि में है, जिसमें बौद्ध संघ में फूट डालने वाले भिक्षु-भिक्षुणियों को सख्त हिदायत दी गई है। दूसरा अभिलेख कौशांबी के कुषाण राजा अश्वघोष के काल का है और तीसरा अभिलेख गुप्त काल के आचार्यों से संबंधित है।
सारनाथ में स्थित शिलालेख (फाइल फोटो)
इसी स्तंभ के ऊपर चार पीठ से पीठ सटाकर बैठे सिंहों की मूर्ति लगी थी, जो मौर्य कला का सबसे बेहतरीन नमूना है। आजादी के बाद भारत सरकार ने इसी सिंह शीर्ष को अपने ‘राष्ट्रीय प्रतीक’ के रूप में अपनाया और इसके निचले हिस्से में बने 24 तीलियों वाले धर्मचक्र को हमारे राष्ट्रीय ध्वज यानी तिरंगे के बीच में जगह दी।
प्राचीन स्तूप और खंडहर: धम्मेख, चौखंडी और मूलगंधकुटी
सारनाथ का पुरातात्विक परिसर काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है, जहाँ प्राचीन भारत की सुंदर इमारतें और उनके अवशेष आज भी बिखरे पड़े हैं। यहाँ का सबसे विशाल और मुख्य आकर्षण ‘धम्मेख स्तूप’ है। यह विशाल स्तूप ठीक उसी जगह पर बनाया गया है जहाँ खड़े होकर भगवान बुद्ध ने अपने पाँच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था।
सारनाथ में स्थित स्तूप (साभार: encounterstravel)
यह स्तूप लगभग 43.6 मीटर ऊँचा है और इसके निचले हिस्से में पत्थरों पर बहुत बारीक और सुंदर नक्काशी की गई है, जिसमें लताएँ, फूल-पत्तियाँ और ज्यामितीय डिजाइन बने हुए हैं।धम्मेख स्तूप के अलावा परिसर में ‘धर्मराजिका स्तूप’ की नींव के अवशेष भी मौजूद हैं, जिसे सम्राट अशोक ने बुद्ध के पवित्र अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए बनवाया था।
इसके पास ही ‘मूलगंधकुटी विहार’ के अवशेष हैं। यह वह खास जगह मानी जाती है जहाँ भगवान बुद्ध सारनाथ में रुकने के दौरान अपनी मूल कुटिया में ध्यान लगाया करते थे। मुख्य परिसर से थोड़ा पहले ईंटों का बना ‘चौखंडी स्तूप’ स्थित है। माना जाता है कि बोधगया से आते समय भगवान बुद्ध की अपने पाँच शिष्यों से पहली मुलाकात इसी स्थान पर हुई थी।
बाद में मुगल काल के दौरान, 1588 ईस्वी में बादशाह हुमायूं के यहाँ आने की खुशी में राजा टोडरमल के पुत्र गोवर्धन ने इस चौखंडी स्तूप के ऊपर एक आठ कोनों वाली मीनार बनवा दी थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा हाल के दिनों में भी यहाँ ईंटों से बने मन्नत वाले स्तूपों के वैज्ञानिक संरक्षण का काम प्रमुखता से किया गया है।
मलबे के नीचे दबे इतिहास की खुदाई और सारनाथ संग्रहालय
मध्यकाल के बाद देश में हुई राजनीतिक उथल-पुथल और विदेशी आक्रमणों की वजह से सारनाथ का यह भव्य बौद्ध केंद्र धीरे-धीरे उजाड़ हो गया। समय बीतने के साथ-साथ यहाँ की प्राचीन इमारतें ढह गईं और यह पूरा का पूरा ऐतिहासिक इलाका मिट्टी, झाड़ियों और मलबे के नीचे दबकर गुमनाम हो गया।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) पिछले 150 से भी ज्यादा सालों से सारनाथ में प्राचीन बौद्ध स्थलों की खुदाई और संरक्षण का काम लगातार करता आ रहा है। इसी निरंतर प्रयास की वजह से सारनाथ की असली पहचान दुनिया के सामने आ सकी।
साल 1798 में मिस्टर डंकन और कर्नल मैकंजी द्वारा शुरुआती ध्यान आकर्षित करने के बाद, 1835-36 में सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने यहाँ पहली व्यवस्थित खुदाई कराई। इसके बाद मेजर किट्टो, एफओ ऑरटेल, सर जॉन मार्शल और दयाराम साहनी जैसे पुराविदों ने यहाँ बड़े पैमाने पर काम किया।
खुदाई में मिले ऐतिहासिक अशोक स्तंभ के मूल ‘सिंह शीर्ष’ और गुप्त काल की अति दुर्लभ ‘धर्मचक्रप्रवर्तन बुद्ध प्रतिमा’ को सहेजने के लिए साल 1904 में ही कदम उठाए गए थे।
बाद में 1910 में इसे पूरी तरह स्थापित किया गया, जिसे आज भारत का सबसे पुराना साइट म्यूजियम (स्थल संग्रहालय) माना जाता है। आज भी इस संग्रहालय में खुदाई से निकली सैकड़ों प्राचीन मूर्तियाँ और ऐतिहासिक साक्ष्य रखे हुए हैं।
संग्राहलय में सुरक्षित रखी गई हैं मूर्तियाँ (साभार: casualwalker)
उत्तर प्रदेश के अन्य यूनेस्को स्थल
सारनाथ का नाम यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में दर्ज होने के बाद अब उत्तर प्रदेश में कुल चार यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हो चुके हैं। सारनाथ से पहले राज्य के बाकी तीनों स्थल आगरा जिले में स्थित हैं। इनमें पहला है ‘ताजमहल’, जो अपनी सुंदरता के लिए दुनिया के सात अजूबों में गिना जाता है।
दूसरा है ‘आगरा का किला’ और तीसरा स्थल ‘फतेहपुर सीकरी’ है, जिसे सम्राट अकबर ने अपनी नई राजधानी के रूप में बसाया था और जहाँ बुलंद दरवाजा स्थित है। सारनाथ उत्तर प्रदेश का चौथा और पूरे पूर्वांचल क्षेत्र का पहला यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बन गया है। इस अंतरराष्ट्रीय पहचान से भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को बहुत बड़ी ताकत मिलेगी।
जापान, थाईलैंड, म्यांमार, कंबोडिया और वियतनाम जैसे बौद्ध बहुल देशों के साथ भारत के रिश्ते और मजबूत होंगे। पूर्वांचल क्षेत्र में विदेशी तीर्थयात्रियों की आवाजाही बढ़ने से वाराणसी और आसपास के इलाकों में होटल, गाइड, लोकल ट्रांसपोर्ट और बनारसी साड़ी व हस्तशिल्प उद्योग से जुड़े लाखों लोगों को सीधा फायदा और रोजगार मिलेगा।
मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की एक नई स्वास्थ्य सुरक्षा योजना है, जिसका उद्देश्य राज्य के शिक्षकों और शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारियों को कैशलेस इलाज मुहैया कराता है। इस योजना का शुभारंभ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया।
दुर्घटना की चपेट में कोई भी आ सकता है। ऐसे कठिन समय में डबल इंजन सरकार उस व्यक्ति एवं उसके परिवार के साथ पूर्ण संवेदनशीलता, प्रतिबद्धता और विश्वास के साथ खड़ी है, ताकि उन्हें हर संभव सहायता और संबल मिल सके।
योजना के तहत बेसिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग के पात्र शिक्षकों- कर्मचारियों और उनके आश्रितों को लाभ पहुँचाने के बाद आगरा में उच्च शिक्षा विभाग के 7.50 लाख से अधिक शिक्षकों और उनके आश्रित परिजनों को स्वास्थ्य-सुरक्षा प्रदान करने वाली ‘मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना’ का रविवार (26 जुलाई 2026) को आगरा से शुभारंभ किया।
क्या कहा सीएम योगी ने
आगरा में योजना के शुभारंभ के मौके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि शिक्षक राष्ट्र निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं, इसलिए उनके स्वास्थ्य की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है। आर्थिक कारणों से किसी शिक्षक या उसके परिवार का इलाज प्रभावित नहीं होना चाहिए। यह योजना शिक्षकों को सम्मान, सुरक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। सरकार शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ शिक्षकों के सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी कल्याण के लिए भी प्रतिबद्ध है।
उन्होंने कहा कि दुर्घटना की चपेट में कोई भी आ सकता है। ऐसे कठिन समय में डबल इंजन सरकार उस व्यक्ति एवं उसके परिवार के साथ पूर्ण संवेदनशीलता, प्रतिबद्धता और विश्वास के साथ खड़ी है, ताकि उन्हें हर संभव सहायता और संबल मिल सके।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा कार्ड वितरित करने के साथ ही शिक्षकों को सामाजिक सुरक्षा कवच उपलब्ध कराने के लिए उच्च शिक्षा विभाग और पंजाब नेशनल बैंक के बीच समझौतों पर हस्ताक्षर हुए।
सीएम योगी ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि राज्य के शिक्षक इस योजना का समुचित लाभ लेते हुए प्रदेश एवं देश की एकता, अखंडता और प्रगति में अपना योगदान देंगे। उन्होंने शिक्षकों और शिक्षा विभाग के कर्मचारियों को इसके लिए बधाई दी।
योजना के तहत अलग-अलग श्रेणियों के पात्र शिक्षा कर्मियों को शामिल किया गया है, इनमें बेसिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा विभाग के पात्र शिक्षक, शिक्षामित्र, अनुदेशक, विशेष शिक्षक, कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय के कर्मचारी और कुछ दूसरे शिक्षा विभाग के कर्मचारी और उनके पात्र और आश्रित शामिल हैं।
योजना की खासियत क्या है
₹5 लाख तक का कैशलेस इलाज- योजना के तहत हर पात्र परिवार को प्रति वर्ष ₹5 लाख तक कैशलेस चिकित्सा सुविधा मिलेगी। ये लाभ न सिर्फ शिक्षक या शिक्षा विभाग के कर्मचारी को मिलेगा, बल्कि उनपर आश्रित परिजनों को भी इसका लाभ मिलेगा।
सरकारी और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में इलाज- योजना के तहत राज्य सरकार से संबद्ध सरकारी एवं निजी अस्पतालों में कैशलेस उपचार कराया जा सकेगा।
हेल्थ कार्ड की व्यवस्था: पात्र शिक्षकों को डिजिटल या हार्ड कॉपी हेल्थ कार्ड जारी किया जाएगा, जिसके आधार पर अस्पताल में कैशलेस भर्ती कराया जा सकता है और इलाज कराया जा सकता है।
आयुष्मान भारत की पैकेज दरों पर उपचार- योजना के माध्यम से सूचीबद्ध सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में 1900 से अधिक उपचार पैकेजों का लाभ मिलेगा। इनमें कैंसर, हृदय रोग, किडनी रोग, जटिल सर्जरी सहित कई गंभीर बीमारियों का इलाज हो सकेगा। योजना का संचालन साचीज के माध्यम से किया जाएगा।
ऑनलाइन आवेदन और सत्यापन- इलाज आयुष्मान भारत की निर्धारित पैकेज दरों के हिसाब से होगा। आवेदन, दस्तावेज सत्यापन और हेल्थ कार्ड जारी करने की प्रक्रिया ऑनलाइन रखी गई है।
इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह विशेष रूप से शिक्षकों के लिए समर्पित कैशलेस स्वास्थ्य सुरक्षा योजना है। इससे पहले उत्तर प्रदेश में राज्य कर्मचारियों और आयुष्मान भारत के पात्र लाभार्थियों के लिए अलग-अलग स्वास्थ्य योजनाएं थीं, लेकिन शिक्षकों के लिए अलग समर्पित कैशलेस चिकित्सा व्यवस्था नहीं थी।
भारत के कई राज्यों में कर्मचारियों या विशेष वर्गों के लिए कैशलेस स्वास्थ्य योजनाएँ चल रही हैं, लेकिन किसी भी राज्य में सिर्फ शिक्षक और शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के लिए कोई योजना नहीं है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना’ का शुभारंभ किया। इस योजना के तहत बेसिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग के पात्र शिक्षकों व उनके आश्रितों को सूचीबद्ध सरकारी और निजी अस्पतालों में प्रति परिवार ₹5 लाख तक कैशलेस इलाज की सुविधा मिलेगी।
इससे पहले माध्यमिक और प्राइमरी शिक्षा विभाग के कर्मचारियों, शिक्षकों और उनके आश्रितों के लिए इस योजना का क्रियान्वयन 8 जुलाई 2026 को किया गया। योजना में गंभीर बीमारियों, सर्जरी, हृदय रोग, कैंसर, किडनी रोग समेत करीब 1900 उपचार पैकेज शामिल हैं। इस पहल से करीब 12 लाख शिक्षक, रसोइये और अन्य कार्मिक परिवारों को लाभ मिल रहा है।
अमेरिका–ईरान युद्ध की ओर पूरी दुनिया की नजरें है। इस बीच ईरानी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर राजनीतिक विरोधियों, प्रदर्शनकारियों और कथित जासूसों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। ईरान के कई मानवाधिकार संगठनों, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों से ये पता चलता है कि सिर्फ जून महीने में ही 100 से ज्यादा लोगों को फाँसी दी गई है।
हालाँकि ईरानी सरकार का कहना है कि ये कदम ‘विदेशी साजिश’, ‘आतंकवाद’ और ‘इजराइल – अमेरिका के लिए जासूसी करने वालों’ से निपटने के लिए उठाए गए हैं। सरकार न सिर्फ खामोशी से फाँसी दे रही है, बल्कि लोगों की धर- पकड़ भी तेज कर दी है।
राजनीतिक विरोधियों को दी जा रही फाँसी
ईरान दुनिया के उन अग्रणी देशों में शामिल हो गया है, जहाँ राजनीतिक विरोधियों को भी फाँसी की सजा दी जा रही है। यह कदम लोगों में भय पैदा करने के लिए उठाया गया है, ताकि दिसंबर 2025 में ईरानी शासन के खिलाफ हुआ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन फिर कभी न हो सके। दरअसल ईरान ये सब कुछ अमेरिकी हमले की आड़ में कर रहा है। ईरान हाउस की संस्थापक अजादेह अफसाही ने ईरान इंटरनेशनल के आई फॉर ईरान पॉडकास्ट में भी यह बात मानी है।
उनका कहना है कि ईरान में युद्ध के बहाने तेजी से जनवरी में हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने वालों और उसकी अगुवाई करने वालों को फाँसी की सजा दी जा रही है। कई मामलों में परिवारों से भी इसे छिपाया जा रहा है। दरअसल दुनिया उन धमाकों को सुन रही है, जो अमेरिकी मिसाइल-ड्रोन से हो रहे हैं, लेकिन उन खामोश मौतों को नहीं देख पा रही, जो चुपचाप ईरानी सरकार अपने राजनीतिक कैदियों को दे रही है।
ईरान मानवाधिकार संगठन ने भी इसकी पुष्टि की है। संगठनों का मानना है कि अब तक करीब 100 राजनीतिक कैदियों और प्रदर्शनकारियों को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है और 100 से ज्यादा इस कतार में खड़े हैं। संगठन के मुताबिक, इस्फहान की दस्तगेर्द जेल में ही 70 से अधिक राजनीतिक कैदियों को फाँसी दिया जाने वाला है।
संगठन का मानना है कि जनवरी 2026 में हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद गिरफ्तार किए गए लोगों में से 24 लोगों को फाँसी दी जा चुकी है। इनमें 22 जुलाई को कानून स्नातक मेहदी खानेकी शामिल है। जिन लोगों को फाँसी दिया गया है, उनमें से अधिकांश 8 जनवरी को इस्फहान विरोध प्रदर्शन में शामिल थे।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि आरोपितों को निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया से भी वंचित रखा गया। न तो ट्रायल तरीके से हुआ और न ही सुनवाई और फाँसी की सजा मुकर्र कर दी गई।
संयुक्त राष्ट्र के फैक्ट चेक मिशन ने ईरानी अधिकारियों से कहा है कि वे इस्फहान के विरोध प्रदर्शन को लेकर फाँसी की सजा पाए 10 नौजवानों की फाँसी को तुरंत रोके। मिशन ने 19 जुलाई को 2 युवकों को दी गई फाँसी की भी कड़ी निंदा की है। ये लड़के थे 18 वर्षीय एस्फंदियारी और 23 वर्षीय अफगान नागरिक गोल मोहम्मद मोहम्मदी।
मिशन की जानकारी के मुताबिक, 10 लोगों में से 2 के परिजनों को मुलाकात के लिए बुलाया गया है। इसका मतलब है कि जल्द ही उन्हें भी फाँसी दिया जाएगा।
विरोध प्रदर्शन के सारे मामले निपटा दिए गए- प्रॉसिक्यूटर जनरल
28 दिसंबर 2025 को ईरानी इस्लामिक सत्ता के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों को अब फाँसी दिया जा रहा है। मार्च 2026 में सबसे पहले तीन युवकों को फाँसी दी गई। इनपर सुरक्षाकर्मियों की हत्या का आरोप था। इसके बाद अप्रैल 2026 में तेहरान के बासिज अड्डे पर कथित हमले के आरोप में 4 युवकों को फाँसी दी गई।
संयुक्त राष्ट्र के फैक्ट चेक मिशन को आशंका है कि फाँसी की सजा में और बढ़ोतरी होगी, क्योंकि 15 जुलाई 2026 को ईरान के ज्यूडिशरी के प्रमुख गुलाम हुसैन मोहसेनी एजेई ने मामले की जल्दी सुनवाई का निर्देश दिया। इसके बाद तेहरान के प्रॉसिक्यूटर जनरल अली सालेही ने 2025-26 में हुए विरोध प्रदर्शनों के सारे मामले निपटा दिए जाने का ऐलान किया। ईरान के आधिकारिक ऐलान के बाद दुनियाभर के मानवाधिकार संगठन एक्टिव हो गए हैं और ईरान के क्रूरता का विरोध कर रहे हैं।
जून में 100 से ज्यादा लोगों को दी गई फाँसी
आर्टिकल 19 के मुताबिक, ईरान में जून में ही 109 लोगों को फाँसी दी गई, जिनमें 3 महिलाएँ शामिल थी। यह आंकड़ा पिछले साल जून से 10 फीसदी ज्यादा है। संगठन के मुताबिक इनमें से केवल 7 फाँसी दिए जाने की आधिकारिक जानकारी दी गई, बाकी का खुलासा भी नहीं किया गया। यहाँ तक कि कम से कम 12 परिवारों को अपने सदस्यों को फाँसी दिए जाने की खबर बाद में दी गई। कई लोगों को तो स्थानीय मीडिया से ये चला कि उनके परिवार के सदस्य को फाँसी दी जा चुकी है।
एएफपी के मुताबिक, साइंटिस्ट वाहिद बनियामेरियन के परिवार को फाँसी की जानकारी बाद में मिली, उस वक्त परिवार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार अर्जी पर सुनवाई का इंतजार कर रहा था।
युद्ध की आड़ में गिरफ्तारी भी जोरों पर
हाल के महीनों में ईरान में जिस तरह से फाँसी की सजा तेजी से अमल की जा रही है। उसी तरह छात्र नेताओं, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, सोशल मीडिया एक्टिविस्टों, विपक्षी दलों के समर्थकों को राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के तहत गिरफ्तार किए जाने के मामले में काफी वृद्धि हुई है।
सरकार का कहना है कि ये लोग विदेशी एजेंसियों के साथ मिलकर देश में अस्थिरता पैदा कर रहे थे। ईरान इन लोगों को इजरायल और अमेरिका के जासूस, प्रतिबंधित पीएमओआई और एमईके जैसे संगठनों के सदस्य, ‘मोहारेबेह’ यानी ईश्वर के खिलाफ युद्ध छेड़ना और भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर धड़ाधड़ कार्रवाई कर रही है। वहीं मानवाधिकार संगठन इसे असहमति दबाने की कार्रवाई बताते हैं।
मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि आरोपों के पर्याप्त सार्वजनिक सबूत नहीं दिए गए, मुकदमे बहुत जल्दी पूरे किए गए, आरोपियों को स्वतंत्र वकील नहीं मिला, यहाँ तक कि जुल्म के दम पर गुनाह कबूल कराए गए।
सरकार विरोधी प्रदर्शनों को कुचलने के दौरान ईरानी सत्ता ने इंटरनेट और मीडिया पर कड़ा नियंत्रण रखा। कई वेबसाइटें ब्लॉक की गईं, सोशल मीडिया पर प्रतिबंध बढ़े, इंटरनेट की गति कम की गई या कुछ क्षेत्रों में बंद कर दिया गया, लोगों को मीडिया खास कर विदेशी मीडिया के साथ संपर्क नहीं रखने को कहा गया और ऐसे लोगों पर पैनी नजर रखी गई जो मीडिया से बात कर सकते हैं। सरकार का तर्क है कि इससे ‘फर्जी खबरों’ और ‘दुश्मन के साइबर अभियान’ को रोका जा सकता है।
ईरान ने दर्जनों लोगों पर आरोप लगाया कि वे इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के लिए काम कर रहे थे और सैन्य ठिकानों की जानकारी दे रहे थे। यहाँ तक कहा गया कि ईरानी सैन्य ठिकानों पर अमेरिकी इजरायल के ड्रोन हमलों में इनलोगों ने मदद की है। ऐसे कुछ मामलों में लोगों को फाँसी की सजा हुई है। ईरानी सरकार इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम बताती है।
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठन लगातार कह रहे हैं कि ईरान में न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं है। आरोपितों की बंद कमरे में सुनवाई हुई, परिवारों को समय पर जानकारी नहीं दी गई, अपील का पर्याप्त अवसर नहीं मिला, कुछ मामलों में जबरदस्ती और यातना देकर दबाव बनाया गया और सजा दी गई। हालाँकि ईरान इन आरोपों से इनकार करता है और कहता है कि उसकी न्यायिक प्रक्रिया देश के कानूनों के अनुसार चलती है।
ईरान लगातार देश में भय का माहौल बना रहा है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि ईरानी विश्वविद्यालयों में निगरानी बढ़ी है, सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों और बुद्धिजीवियों पर दबाव काफी है। यही वजह है कि कई राजनीतिक कार्यकर्ता देश छोड़कर चले गए हैं।
ईरान ऐसा क्यों कर रहा है
ईरान को जानने वाले विश्लेषकों के अनुसार, ईरानी सत्ता अपने राजनीतिक विरोधियों को कुचल कर देश में ऐसा माहौल बनाना चाहती है कि उसके खिलाफ कोई भी आवाज ऊँची करेगा तो उसकी आवाज को हमेशा हमेशा के लिए खामोश कर दिया जाएगा। इजरायल- अमेरिका युद्ध ऐसा मौका है, जब देश में खामेनेई की सत्ता के साथ विरोधी भी आ गए हैं। राष्ट्रवाद उफान पर है और प्रतिद्वदियों को खामोशी से निपटाने का इससे अच्छा सुनहरा मौका नहीं मिल सकता।
अमेरिका के साथ युद्ध के दौरान जनता को आवश्यक चीजों की कमी हो गई है। लगातार बमबारी को देखते हुए आंतरिक विद्रोह की आशंका है। वैसे भी कुछ महीनों पहले ही सत्ता विरोधी प्रदर्शन हुए थे। ऐसे में भय पैदा कर सत्ता विरोधी लहर को रोकना, साथ ही देश की सुरक्षा व्यवस्था और सत्ता प्रतिष्ठान पर अपना नियंत्रण मजबूत करना ईरानी सरकार का मकसद है। खामेनेई की सत्ता को विदेशी खुफिया एजेंसियों की घुसपैठ का डर है।
पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में स्थित करीब 650 साल पुरानी अदीना ‘मस्जिद’ को लेकर बड़ा धार्मिक और राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। स्थानीय बीजेपी नेताओं के समर्थन से एक हिंदू संगठन ने मस्जिद के पास पूजा-पाठ शुरू कर दिया है। संगठन का कहना है कि यह ऐतिहासिक ढाँचा एक प्राचीन हिंदू मंदिर को तोड़कर बनाया गया था।
‘आदिनाथ पुरातन शिव मंदिर’ संगठन ने घोषणा की कि वह मस्जिद परिसर के बाहर 3.6 फीट ऊँचा और करीब 1.5 टन वजनी शिवलिंग स्थापित करेगा। यह शिवलिंग तारकेश्वर से लाया जा रहा है, जो यहाँ से करीब 289 किलोमीटर दूर है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, संगठन के मुख्य संरक्षक और बीजेपी नेता काजल गोस्वामी ने कहा, “इस तथाकथित मस्जिद में हिंदू और बौद्ध धर्म की मूर्तियाँ मौजूद हैं। आदिनाथ मंदिर को तोड़कर यहाँ मस्जिद बनाई गई थी।” उन्होंने आगे कहा, “हमारा उद्देश्य मंदिर को फिर से स्थापित करना है और शिवलिंग को उसके अंदर रखना है।”
A fresh dispute has emerged around West Bengal's 650-year-old Adina Masjid, with a BJP leader announcing plans to install a Shiva Lingam outside the protected monument while claiming it was originally a temple. The ASI has barred religious activity inside the monument, and… pic.twitter.com/nG5XlCDAL7
हालाँकि, काजल गोस्वामी ने कहा कि उनका संगठन कानून का पूरी तरह पालन करेगा और किसी भी तरह की कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा नहीं होने देगा। उन्होंने बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और पुलिस अधिकारियों ने उन्हें निर्देश दिया कि संरक्षित स्मारक क्षेत्र के बाहर ही पूजा-अर्चना की जाए।
इन घटनाक्रमों के बाद मालदा जिला पुलिस ने सख्त सलाह जारी की। पुलिस ने लोगों को याद दिलाया कि अदीना स्मारक 1958 के AMASR (प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष) अधिनियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक है। इसलिए परिसर के भीतर बिना अनुमति किसी भी तरह की धार्मिक पूजा या अनुष्ठान करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
इस मुद्दे ने अब राजनीतिक रूप भी ले लिया है। BJP के राज्यसभा सांसद समित भट्टाचार्य ने संसद में यह मामला उठाते हुए केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से मूल आदिनाथ मंदिर की सुरक्षा पर ध्यान देने की माँग की। वहीं, विपक्षी नेताओं ने बीजेपी पर निशाना साधा है। CPI(M) के पोलित ब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम ने आरोप लगाया कि BJP आने वाले चुनावों से पहले लोगों को बाँटने के लिए अपनी पुरानी राजनीतिक रणनीति अपना रही है।
प्राचीन मंदिर का मस्जिद में परिवर्तन
बंगाल के मालदा जिले के पांडुआ में स्थित अदीना मस्जिद के बारे में सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है कि इसका निर्माण 1373 से 1375 ईस्वी के बीच इलियास शाही वंश के सुल्तान सिकंदर शाह ने कराया था। इतिहास की कई किताबों में इसे भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मध्यकालीन मस्जिद बताया जाता है।
हालाँकि, पुरातात्विक और वास्तु संबंधी कई प्रमाण बताते हैं कि इस स्थान का इतिहास इससे भी कहीं अधिक पुराना है। इन प्रमाणों के मुताबिक, मस्जिद का निर्माण मुख्य रूप से पाल-सेन काल (8वीं से 12वीं शताब्दी) के पहले से मौजूद हिंदू और बौद्ध धार्मिक स्थलों से लिए गए पत्थरों, स्तंभों और नक्काशीदार सामग्री का उपयोग करके किया गया था।
मस्जिद में मौजूद कई मूर्तियाँ औऱ अन्य अवशेष इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यहाँ पहले भगवान शिव को समर्पित भव्य आदिनाथ मंदिर और भगवान विष्णु का एक मंदिर मौजूद था। मस्जिद का मिंबर (जहाँ से इमाम संबोधन देते हैं) भी काले बेसाल्ट पत्थर से बने एक ऐसे दरवाजे का उपयोग करके बनाया गया है, जिसे मंदिर के खंडहरों से लिया गया था।
इसके अलावा मस्जिद की दीवारों, दरवाजों, मेहराबों और मिहराब (नमाज की दिशा बताने वाला स्थान) पर भगवान शिव, भगवान गणेश और अन्य हिंदू प्रतीकों की नक्काशी दिखाई देती है। यहाँ फूलों की आकृतियाँ, चैत्य मेहराब, कीर्तिमुख, मोतियों की मालाएँ और जंजीर-घंटी जैसे कई डिजाइन भी बने हुए हैं। इस तरह की सजावट आम तौर पर इस्लामी वास्तुकला का हिस्सा नहीं मानी जाती। इसलिए माना जाता है कि ये नक्काशी और डिजाइन पाल-सेन काल के समय के हैं।
इस मस्जिद के केंद्रीय मिहराब में इस स्थान के हिंदू अतीत के कई संकेत दिखाई देते हैं। मिहराब का सामने का हिस्सा तीन पत्तियों जैसी आकृति वाली मेहराब से सजाया गया है। मेहराब के दोनों ओर बने हिस्सों पर फूलों जैसी आकृतियाँ उकेरी गई हैं। मिहराब के अंदर बने पैनलों पर भी मेहराब, फूलों की आकृतियाँ और मेहराब के ऊपरी हिस्से से लटकती जंजीत और घंटी के डिजाइन दिखाई देते हैं।
इतिहासकारों के मुताबिक, जंजीर और घंटी जैसे ये डिजाइन हिंदू वास्तुकला की विशेष पहचान माने जाते हैं। इस तरह की नक्काशी हिंदू काल में बनाए गए स्तंभों पर भी देखी जाती है।
आज भी इस परिसर और इसके आसपास की दीवारों में टूटे हुए शिवलिंग और उलटी पड़ी हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। कई लोगों का मानना है कि ये अवशेष इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मध्यकालीन आक्रमणों के दौरान इस क्षेत्र की हिंदू विरासत को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाया गया था।
इस मुद्दे को कानूनी और सामाजिक स्तर पर तब अधिक चर्चा मिली, जब वरिष्ठ अधिवक्ता हरि शंकर जैन ने हिंदुओं से इस स्थल पर पूजा करने का अपना अधिकार वापस पाने की अपील की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सुल्तान सिकंदर शाह के शासनकाल के दौरान हुए ऐतिहासिक विध्वंस का भी मुद्दा उठाया।
TMC सांसद यूसुफ पठान ने इसे मस्जिद के तौर पर पेश करने की कोशिश की
यह विवाद उस समय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया, जब तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के सांसद यूसुफ पठान ने इस स्थल का दौरा किया और इसे केवल इस्लामी वास्तुकला की एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया।
सोशल मीडिया पर अपनी यात्रा की तस्वीरें साझा करते हुए यूसुफ पठान ने लिखा, “बंगाल के मालदा में स्थित अदीना मस्जिद 14वीं शताब्दी की एक ऐतिहासिक मस्जिद है। इसका निर्माण इलियाह शाही वंस के दूसरे शासक सुल्तान सिकंदर शाह ने 1373 से 1375 ईस्वी के बीच कराया था। अपने समय में यह भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मस्जिद थी और उस दौर की शानदार वास्तुकला का उदाहरण है।”
The Adina Mosque in Malda, West Bengal, is a historic mosque built in the 14th century by Sultan Sikandar Shah, the second ruler of the Ilyas Shahi dynasty. Constructed in 1373-1375 CE, it was the largest mosque in the Indian subcontinent during its time, showcasing the region's… pic.twitter.com/EI0pBiQ9Og
इसके बाद सोशल मीडिया पर कई लोग और राजनीतिक कमेंटेटर ने TMC सांसद की आलोचना की। उनका कहना था कि उन्होंने इस स्थल से जुड़े हिंदू इतिहास और विरासत का कोई उल्लेख नहीं किया। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने परिसर में मौजूद नक्काशियों और मूर्तियों की तस्वीरें साझा करते हुए अपने दावे पेश किए। अधिवक्ता शेखर कुमार झा ने दीवार पर बनी भगवान गणेश की एक नक्काशी की तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “इतिहास: आदिनाथ मंदिर को अदीना मस्जिद बना दिया गया।”
Dear Yusuf Pathan, you are standing in the campus of one of the largest Hindu Temples, Adinath Temple, which was desecrated and occupied by Islamic invaders. Attached are some images for your reference. It is time to undo the injustice and barbarity, and reestablish the temple's… pic.twitter.com/CUc1z5lnHD
वहीं, ‘PlanH’ नाम के एक यूजर ने यूसुफ पठान को जवाब देते हुए लिखा, “प्रिय यूसुफ पठान, आप भारत के सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक आदिनाथ मंदिर के परिसर में खड़े हैं, जिसे इस्लामी आक्रमणकारियों ने अपवित्र कर अपने कब्जे में ले लिया था। आपके संदर्भ के लिए कुछ तस्वीरें अटैच हैं। अब समय आ गया है कि इस अन्याय और बर्बरता को समाप्त कर मंदिर की पुरानी गरिमा को फिर से स्थापित किया जाए।”
एक और यूजर ‘अब्दुल किताबी’ ने लिखा, “एक सच्चे मुसलमान के तौर पर हमें यह मस्जिद हिंदुओं को वापस कर देनी चाहिए।”
वहीं, कुछ अन्य लोगों ने इतिहास को लेकर सवाल उठाते हुए कहा, “क्या
BJP सरकार के दौरान अधिकारों की बहाली और पुनर्स्थापना की दिशा में कदम
कई दशकों तक स्थानीय हिंदुओं को इस विवादित स्थल पर पूजा-पाठ या किसी भी तरह का धार्मिक अनुष्ठान करने की अनुमति नहीं थी। यह परिसर ASI के संरक्षण में था। इसके कारण यहाँ पूजा और आगे पुरातात्विक जाँच कराने की कोशिशों पर रोक लगी रही। हालाँकि, साल 2024 की शुरुआत में इस स्थल को लेकर माहौल बदलना शुरू हुआ।
युवा पुजारी हिरण्मय के नेतृत्व में हिंदू श्रद्धालुओं का एक समूह परिसर के अंदर पहुँचा। उन्होंने वहाँ मौजूद मूर्तियों और वास्तुकला में बने एक शिवलिंग की पहचान की। इसके बाद उन्होंने मंत्रोच्चार करते हुए पूजा शुरू कर दी। स्थानीय मुस्लिमों की शिकायत के बाद पुलिस मौके पर पहुँची और उस समय पूजा रुकवा दी। हालाँकि, इस घटना को स्थानीय हिंदुओं के लिए एक बड़ा मोड़ माना गया।
अब BJP नेताओं के समर्थन के साथ इस स्थल को वापस पाने की माँग और तेज हो गई है। इस अभियान से जुड़े लोग अयोध्या राम जन्मभूमि, ज्ञानवापी और मथुरा जैसे मामलों का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि लोगों की धार्मिक आस्था को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता।
साथ ही, इस मामले में कोलकाता हाई कोर्ट में पूरे परिसर का ASI से सर्वे कराने की माँग करने की तैयारी भी चल रही है। इसके अलावा, परिसर के बाहर शिवलिंग स्थापित करने का काम भी जारी है। हिंदू समुदाय का कहना है कि वह कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी धार्मिक विरासत को वापस पाने की दिशा में कदम उठा रहा है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)