सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले शिकायत अपील समिति (जीएसी) ने यूट्यूबर ध्रुव राठी को हिन्दू देवी-देवताओं पर किए गए विवादित वीडियो पर रोक लगा दी है और यूट्यूब को 24 घंटे के अंदर हटाने का निर्देश दिया है। समिति का मानना है कि इस वीडियो से हिन्दू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा है। समिति ने यूट्यूब को लिखित आदेश प्राप्त होने के 24 घंटों के भीतर वीडियो हटाने के लिए कहा है।
यूट्यूबर ध्रुव राठी की ‘क्या हिंदू गोमांस खा सकते हैं?/ केरल स्टोरी 2 का पर्दाफाश’ शीर्षक वाला 21 मिनट का वीडियो 21 मार्च, 2026 को राठी की आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया गया था। इसे लाखों बार देखा जा चुका है और चार लाख से अधिक लाइक मिल चुके हैं।
फिल्म ‘द केरल स्टोरी 2’ पर टिप्पणी करते हुए इस वीडियो में राठी ने हिंदुओं के खान-पान की बात की। गोमाँस के सेवन से जुड़ी संवेदनशीलता को दरकिनार करते हुए सांस्कृतिक विविधता और भारत में सामाजिक धारणाओं की चर्चा की। प्राचीन ग्रंथों, शास्त्रों और आधुनिक सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए राठी ने दावा किया कि रामायण और महाभारत के पात्र अपने वनवास के दौरान हिरण के माँस सहित माँस और शराब का सेवन करते थे। इस दौरान उसने भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण और पांडवों का नाम लिया।
इस वीडियो के खिलाफ वकील अमित सचदेवा ने 22 मार्च 2026 को नई दिल्ली स्थित साइबर क्राइम सेल में शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद 23 मार्च को यूट्यूब के रेजिडेंट ग्रीवेंस अधिकारी के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई।
शिकायत में सचदेवा ने तर्क दिया कि ध्रुव राठी ने रामायण और महाभारत के चुनिंदा संदर्भों का उपयोग करते हुए मनगढंत तरीके से दावा किया कि श्री राम, श्री कृष्ण और पांडवों ने अपने वनवास के दौरान हिरण के माँस सहित दूसरे माँस और शराब का सेवन किया था। उन्होंने इन देवताओं के लिए सात्विक भोजन करने का मजाक उड़ाया और माँ सीता की कथित ‘प्रतिज्ञा’ का उल्लेख किया।
यूट्यूब ने वीडियो को लेकर और जानकारी माँगी और समीक्षा के बाद 25 मार्च को अनुरोध को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कंटेंट स्थानीय कानूनों या उसके सामुदायिक दिशानिर्देशों का उल्लंघन नहीं करती है। प्लेटफॉर्म ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कम प्रचलित विचारों को व्यक्त करने के अधिकार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर जोर दिया, साथ ही शिकायतकर्ता को सलाह दी कि यदि उसे लगता है कि वीडियो भारतीय कानून का उल्लंघन करता है तो वह उसे ब्लॉक कर दे या कोर्ट की शरण में जाए।
इसके बाद सचदेवा ने 27 मार्च 2026 को जीएसी के समक्ष अपील दायर की। दो महीने से अधिक समय तक अपील लंबित रहा। इसके बाद उन्होंने रिट याचिका के माध्यम से दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया। 3 जुलाई 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने अपीलीय प्राधिकारी को मामले का शीघ्र निपटारा करने का निर्देश दिया, साथ ही आदेश की कॉपी 15 दिनों के भीतर कोर्ट में जमा करने का निर्देश दिया।
जीएसी ने धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तर्क को खारिज करते हुए यूट्यूब को अपना कंटेंट हटाने को कहा। समिति का कहना है कि इस वीडियो की जाँच से पता चलता है कि इससे एक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँच सकता है। यह पूरे समाज के लिए भी अच्छा संकेत नहीं है।
इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(2) के तहत कुछ नियमों के अधीन है। जीएसी ने आगे बताया कि सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) अधिनियम 2021 के नियम 3(1)(घ) के तहत मध्यस्थों को सावधानी बरतने के लिए कहा गया है। समिति ने अदालत के आदेश के बिना प्लेटफॉर्म के कंटेंट नहीं हटाने पर आश्चर्य जताया।
🚨 BREAKING: Government of India Orders Immediate Takedown of Dhruv Rathee’s (@dhruv_rathee) Video.
The Grievance Appellate Committee (GAC), Ministry of Electronics & IT, Government of India, has passed an Order dated 15 July 2026 (Appeal No. 8321/2026) directing YouTube to… pic.twitter.com/hP4rpGmLVC
— Amita Sachdeva, Advocate (@SachdevaAmita) July 19, 2026
जीएसी ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के कारण यूट्यूब को निर्देश दिया कि वह विवादित वीडियो को आदेश मिलने के 24 घंटों के भीतर हटा दें। राठी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए सचदेवा ने साकेत की मजिस्ट्रेट अदालत में पहल की है, जो अभी तक लंबित है। इसकी अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 को होगी। जीएसी के निर्देश के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि मजिस्ट्रेट कोर्ट में राठी पर केस दर्ज हो सकता है।
सचदेवा ने सोशल मीडिया पर इस आदेश को साझा करते हुए इसे इस दिशा में उठाया गया कदम बताया। उन्होंने कहा, “कंटेंट क्रिएशन की आड़ में आस्था का मजाक नहीं उड़ाया जा सकता। न्याय चरणबद्ध तरीके से दिया जा रहा है।” दरअसल ऐसे मामले त्वरित निपटाया जाना चाहिए, क्योंकि जब तक इस पर बहस होती है, तब तक इसे लाखों लोग देख चुके होते हैं और यही कंटेंट क्रिएटर की चाह होती है। विवादित वीडियो बनाओ और अधिक से अधिक व्यूज पाओ।
भारत और बांग्लादेश की सीमा पर सुरक्षा और अवैध घुसपैठ हमेशा से ही एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मुद्दा रहा है। हाल ही में इस दिशा में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं।
NIA ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी सिंडिकेट के खिलाफ मामला दर्ज कर एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। इस सिंडिकेट द्वारा भारत-बांग्लादेश सीमा के कमजोर और बिना बाड़ वाले इलाकों का फायदा उठाकर बांग्लादेशी नागरिकों की अवैध रूप से भारत में एंट्री कराई जा रही थी।
इस मामले के सामने आने के बाद भारत-बांग्लादेश सीमा पर जल्द से जल्द पूरी तरह से बाड़ लगाने की माँग और भी ज्यादा तेज हो गई है। NIA की इस कार्रवाई से यह साफ हो गया है कि यह केवल अवैध घुसपैठ का मामला नहीं है, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा को सेंध लगाने की एक बड़ी और सोची-समझी साजिश है।
मामले की पृष्ठभूमि और FIR की मुख्य बातें
इस पूरे मामले की शुरुआत बंगाल पुलिस की कार्रवाई से हुई थी। 27 मई 2026 को पश्चिम बंगाल पुलिस ने उत्तर 24 परगना जिले के बनगाँव थाने में एक FIR दर्ज की थी। यह मामला बनगाँव थाने के सब-इंस्पेक्टर बिल्टू मित्रा की शिकायत पर स्वतः संज्ञान लेते हुए दर्ज किया गया था।
पुलिस की शुरुआती जाँच के बाद, मामले की गंभीरता, इसके अंतर-राज्यीय फैलाव और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को देखते हुए केंद्र सरकार ने इसे एक बेहद गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा माना। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के CTCR डिवीजन ने 1 जुलाई 2026 को आदेश के तहत इस केस की जाँच NIA को सौंप दी।
गृह मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी विमल कुमार शुक्ला के निर्देश पर कार्रवाई करते हुए NIA ने 3 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में इस केस को री रजिस्टर किया। इस मामले की मुख्य जाँच अधिकारी के रूप में कोलकाता की DSP प्रियंका शर्मा को नियुक्त किया गया है।
इस मामले में आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 143(1), 143(3), 144(2) और 61(2) के साथ-साथ इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 की धारा 24 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
सिंडिकेट का मास्टरमाइंड और उसके सहयोगी
NIA की FIR में इस पूरे अवैध मानव तस्करी रैकेट के मास्टरमाइंड और उसके करीबियों को नामजद किया गया है। इस सिंडिकेट का मुख्य आरोपित सहाबुद्दीन मंडल है, सहाबुद्दीन मंडल एक शातिर अपराधी है, जिसे पुलिस ने इस FIR से कुछ दिन पहले 13 मई 2026 को एक अन्य मामले में BNS की धारा और आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया था और वह पुलिस रिमांड पर था।
सहाबुद्दीन मंडल के साथ इस रैकेट में उसके कई स्थानीय सहयोगी भी शामिल हैं, जो सीमा से लेकर रेलवे स्टेशन तक अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते थे। इस मामले में मुख्य आरोपित सहाबुद्दीन मंडल के अलावा भीरा के दुखे उर्फ हारुन रशीद को नामजद किया गया है, जिसका काम घुसपैठियों को गाड़ी से हावड़ा स्टेशन पहुँचाना था।
वहीं हावड़ा रेलवे स्टेशन क्षेत्र से राजू को आरोपित बनाया गया है, जो घुसपैठियों के लिए आगे के सफर के लिए ट्रेन टिकटों की व्यवस्था करता था। सीमा पर घुसपैठ कराने और अवैध रूप से सीमा पार कराने की जिम्मेदारी बागदा पुलिस स्टेशन के अंतर्गत रॉन्गहाट/रौनाघाट निवासी राणा, खैरुल और अजारुल की थी, जबकि धनताला पुलिस स्टेशन के अंतर्गत कुलगाछी के रहने वाले राशेद को भी सीमा पार कराने में सहयोग करने के आरोप में नामजद किया गया है।
कैसे काम करता था घुसपैठ और तस्करी का रूट मैप?
जाँचकर्ताओं और स्थानीय पुलिस की पूछताछ में इस सिंडिकेट के काम करने के बेहद व्यवस्थित और संगठित तरीके का पता चला है, जो पिछले कुछ वर्षों से लगातार सक्रिय था और उसने एक मजबूत ट्रांजिट रूट तैयार कर लिया था।
इस नेटवर्क के तहत सबसे पहले राणा, खैरुल, अजारुल और राशेद जैसे आरोपित भारत-बांग्लादेश सीमा के बनगाँव और बागदा पुलिस स्टेशन क्षेत्रों में स्थित उन हिस्सों की पहचान करते थे जहाँ बाड़ नहीं लगी है।
इन असुरक्षित और अनगार्डेड रास्तों, जैसे भीरा और उसके आस-पास के इलाकों से बांग्लादेशी नागरिकों को भारतीय सीमा में प्रवेश कराया जाता था और इसके बदले में सिंडिकेट इन लोगों से भारी-भरकम रकम वसूलता था। सीमा पार कराने के तुरंत बाद, इन बांग्लादेशी नागरिकों को आगे की यात्रा के लिए मुख्य सरगना सहाबुद्दीन मंडल को सौंप दिया जाता था।
इसके बाद सहाबुद्दीन का एक और साथी, दुखे उर्फ हारुन रशीद, स्थानीय स्तर पर किराए की कारों की व्यवस्था करता था और इन गाड़ियों में छिपाकर इन अवैध घुसपैठियों को सड़क मार्ग के जरिए बनगाँव से सीधे हावड़ा रेलवे स्टेशन भेजा जाता था।
हावड़ा स्टेशन पर मौजूद उनका सहयोगी राजू इन लोगों को रिसीव करता था और देश के अलग-अलग बड़े शहरों के लिए रेलवे टिकटों का इंतजाम करता था, जिससे ट्रेन टिकट मिलते ही इन घुसपैठियों को बेहद तेजी से भारत के अलग-अलग कोनों में भेज दिया जाता था ताकि वे सुरक्षा एजेंसियों की नजरों में न आएँ।
महानगरों में अवैध नेटवर्क: कहाँ भेजे जा रहे थे घुसपैठिए?
NIA की जाँच के अनुसार, यह नेटवर्क केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके तार देश के लगभग सभी बड़े आर्थिक और प्रशासनिक केंद्रों से जुड़े हुए थे। हावड़ा रेलवे स्टेशन से ट्रेन टिकट बुक कराकर इन बांग्लादेशी नागरिकों को दिल्ली, मुंबई, पुणे, सूरत, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे देश के प्रमुख महानगरों में भेजा जा रहा था।
जाँच एजेंसियों का कहना है कि इन शहरों में ले जाकर इन लोगों को अवैध श्रम और अनैतिक गतिविधियों सहित कई तरह के गैर-कानूनी कामों में धकेला जा रहा था। इतने बड़े शहरों में इतनी तेजी से घुसपैठियों का घुल-मिल जाना सुरक्षा के लिहाज से बड़ा खतरा है।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर मंडराता खतरा और अंतरराष्ट्रीय साजिश की आशंका
NIA ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा प्रबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती बताया है। जिस आसानी से यह सिंडिकेट बिना बाड़ वाले इलाकों से देश के भीतर लोगों को ला रहा था और उन्हें देश के अलग-अलग महानगरों में फैला रहा था, वह सीमा सुरक्षा में मौजूद बड़ी कमियों को उजागर करता है।
अधिकारियों को संदेह है कि यह गिरोह केवल कुछ लोगों का एक स्थानीय ग्रुप नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश काम कर रही है। इस बात की पूरी आशंका है कि सीमा के दोनों तरफ कई बड़े प्रभावशाली लोग और पैसे से मदद करने वाले इस रैकेट को हवा दे रहे हैं।
NIA अब इस नेटवर्क के वित्तीय लेन-देन, हवाला नेटवर्क और विदेशी संपर्कों की गहराई से जाँच कर रही है ताकि इस पूरे इकोसिस्टम को समूल नष्ट किया जा सके।
सीमा पर बाड़ लगाने की माँग और राजनीतिक हलचल
इस मामले के सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल में सीमा सुरक्षा और बुनियादी ढाँचे को लेकर एक बार फिर से राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी बहस तेज हो गई है। सुरक्षा एजेंसियाँ लंबे समय से यह माँग करती रही हैं कि घुसपैठ, तस्करी और मानव व्यापार को रोकने का एकमात्र पुख्ता जरिया पूरी सीमा पर अभेद्य बाड़ लगाना ही है।
पश्चिम बंगाल में इस दिशा में प्रशासनिक कदम भी उठाए गए हैं। राज्य प्राधिकारियों के अनुसार, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से अब तक सीमा सुरक्षा बल (BSF) को बाड़ लगाने के काम में तेजी लाने के लिए लगभग 1025 एकड़ भूमि सौंप दी है।
इसके अलावा सीमा सुरक्षा की समीक्षा करने और बाड़ लगाने के काम की प्रगति का जायजा लेने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का भी पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों का दौरा प्रस्तावित है।
एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के प्रवक्ता अनीश गावंडे ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को हटाने की दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की निंदा की है। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के धरना स्थल से हटाया था। वह करीब 20 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे थे। गावंडे ने लोगों से बड़ी संख्या में प्रदर्शन में शामिल होने की अपील भी की।
गावंडे ने दावा किया कि प्रदर्शन स्थल से सोनम वांगचुक को हटाना दरअसल उनकी ‘गिरफ्तारी’ थी। उनका आरोप था कि पुलिस ने बिना कोई कारण बताए और बिना किसी लिखित आदेश के यह कार्रवाई की। हालाँकि, दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटाकर उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया था।
Sonam Wangchuk has been illegally arrested. Without any reason, without any explanation, without any written order. In the national capital. On the eve of the Monsoon Session. Will the temple of democracy remain silent?#FreeSonamWangchuk
इसके बाद गावंडे ने यह भी दावा किया कि पुलिस की यह कार्रवाई वांगचुक की सेहत की चिंता की वजह से नहीं की गई बल्कि इसका मकसद चल रहे प्रदर्शन को बाधित करना था।
Sonam Wangchuk has been picked up from Jantar Mantar and forcefully taken to a hospital.
This is not out of a concern for Sonam Wangchuk's health. This is to shut down a democratic protest.
If this government cared about protesters, they would not have let GD Agarwal die. If… pic.twitter.com/nRw1LcHDme
अनीश गावंडे को किसी राजनीतिक दल का पहला खुले तौर पर समलैंगिक (ओपनली गे) प्रवक्ता बनाए जाने के कारण भी पहचान मिली थी। उन्होंने खुलकर CJP के प्रदर्शन का समर्थन किया है और उससे जुड़े रहे हैं। जब पुलिस सोनम वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटा रही थी, उसी दौरान CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके कपड़े बदलने के लिए गावंडे के घर गए हुए थे। इसी दौरान पुलिस ने दिपके को कुछ समय के लिए हिरासत में लिया था।
गावंडे ने आरोप लगाया कि जब अभिजीत दिपके उनके घर की सीढ़ियों पर थे, तभी पुलिसकर्मियों ने उन्हें हिरासत में लिया और उनके साथ मारपीट की। उन्होंने यह भी दावा किया कि पुलिस की पिटाई के चलते दिपके जोर-जोर से चिल्ला रहे थे।
कौन है अनीश गावंडे?
मीडिया रिपोर्ट्स में मौजूद जानकारी के अनुसार, अनीश गावंडे स्वतंत्रता सेनानी, वकील और प्रसिद्ध शिक्षाविद टी. के. टोपे के परिवार से आते हैं। उनका पालन-पोषण मुंबई में हुआ। उन्होंने वर्ली के ग्रीनलॉन्स स्कूल और फोर्ट स्थित कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल से पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से तुलनात्मक साहित्य (Comparative Literature) की पढ़ाई की। बाद में रोड्स स्कॉलर (Rhodes Scholar) के रूप में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से बौद्धिक इतिहास (Intellectual History) और लोक नीति (Public Policy) में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की।
राजनीति में आने से पहले अनीश गावंडे LGBTQ+ अधिकारों के कार्यकर्ता और लेखक रहे हैं। उन्होंने पिंक लिस्ट इंडिया की भी स्थापना की जो LGBTQ+ अधिकारों का समर्थन करने वाले नेताओं का एक डेटाबेस है।
अपनी समलैंगिक (गे) पहचान सार्वजनिक करने के बाद गावंडे ने फ्रैंकोफोन पश्चिम अफ्रीका और सेनेगल की भाषाई राजनीति पर अध्ययन किया। उनका इरादा अकादमिक क्षेत्र में प्रोफेसर बनने का था। हालाँकि, 2018 में उन्हें भारत में एक चुनावी अभियान से जुड़ने का अवसर मिला, जिसके बाद उन्होंने राजनीति की ओर रुख किया। अगस्त 2024 में उन्हें एनसीपी (शरदचंद्र पवार) का राष्ट्रीय प्रवक्ता नियुक्त किया गया।
गावंडे क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) के समर्थक हैं। उनका मानना है कि जाति आधारित आरक्षण के साथ-साथ खेल कोटा, महिलाओं और दिव्यांगों जैसी श्रेणियों के लिए भी क्षैतिज आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। उनका यह भी मानना है कि देश में भेदभाव की समस्या को दूर करने के लिए एक व्यापक भेदभाव-विरोधी कानून बनाया जाना चाहिए।
हाल ही में अनीश गावंडे ने खालिस्तानी प्रोपेगेंडा फिल्म ‘सतलुज’ का समर्थन किया था। यह फिल्म रिलीज के तुरंत बाद Zee5 ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटा दी गई थी।
फिल्म के समर्थन में इंस्टाग्राम पर लिखी एक पोस्ट में गावंडे ने कहा था, “दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ जिसमें उन्होंने मानवाधिकार जांचकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाई है, भारतीय स्क्रीन पर केवल 48 घंटे ही रह सकी और फिर उसे ‘अगली सूचना तक’ चुपचाप हटा दिया गया। जिन लोगों को गायब कर दिया गया, उन पर बनी एक फिल्म भी गायब कर दी गई।”
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)
डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी टैरिफ (टैक्स) नीति खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वहाँ के आम नागरिकों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अर्थशास्त्रियों की एक नई रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, इन भारी-भरकम शुल्कों से विदेशी निर्यातकों पर कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि अमेरिकी खरीदारों को अब महँगे दामों पर घटिया क्वॉलिटी का सामान खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
दरअसल, जब साल 2025 में ये टैक्स लगाए गए थे, तब दावा किया गया था कि विदेशी कंपनियाँ अमेरिकी बाजार में टिके रहने के लिए अपने दाम कम कर देंगी और इससे अमेरिका में रोजगार बढ़ेंगे। लेकिन आईएमएफ (IMF) के अर्थशास्त्रियों जेबीन आन, लोरेंजो रोटुनो और मिशेल रूटा ने जब अमेरिकी सीमा शुल्क और सेंसस ब्यूरो के आँकड़ों की बारीकी से जाँच की, तो सच कुछ और ही निकला। इस रिसर्च ने यह साबित कर दिया है कि ट्रंप की हाई रेसिप्रोकल टैरिफ नीति अपने उद्देश्यों में न केवल विफल रही है, बल्कि उसने अमेरिकी बाजार को सस्ते और निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों का डंपिंग ग्राउंड बनाने की शुरुआत कर दी है।
IMF पेपर का स्क्रीनशॉट
विदेशी निर्यातकों ने कीमतें घटाने से साफ इनकार
आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार, जब कोई बड़ा देश किसी आयातित वस्तु पर भारी शुल्क लगाता है, तो अगर उस देश की बाजार में धाक (मोनोप्सोनी पावर) हो, तो विदेशी निर्यातक अपनी वस्तुओं की मूल कीमतों में कटौती कर लेते हैं ताकि वे प्रतिस्पर्धी बने रह सकें। इसे अर्थशास्त्र में ‘टैरिफ एब्जॉर्प्शन’ या निर्यातकों द्वारा लागत का बोझ उठाना कहा जाता है। ट्रंप प्रशासन को भी यही उम्मीद थी कि चीन, मैक्सिको, कनाडा और यूरोपीय संघ जैसे बड़े हिस्सेदार अमेरिकी बाजार में टिके रहने के लिए अपने उत्पादों के दाम घटाएंगे।
लेकिन आईएमएफ के बारीक प्रॉडक्ट-लेवल डेटा विश्लेषण से जो बात सामने आई है, वह इसके बिल्कुल विपरीत है। विदेशी निर्यातकों ने अमेरिकी टैरिफ के जवाब में अपनी कीमतों में कोई कटौती नहीं की। यदि उत्पाद के स्तर पर सबसे सूक्ष्म ‘वेरायटी’ (यानी किसी खास देश से आने वाला विशिष्ट उत्पाद) की जाँच की जाए, तो शुल्क हटाने के बाद की कीमतें (Duty-Exclusive Prices) लगभग वैसी ही बनी रहीं जैसी टैरिफ लागू होने से पहले थीं।
IMF द्वारा जारी किया गया चार्ट
इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि ट्रंप द्वारा लगाए गए टैक्स का पूरा का पूरा बोझ अमेरिकी आयातकों (Importers) और अंततः वहाँ के आम उपभोक्ताओं की जेब पर ट्रांसफर हो गया।
इस रिसर्च पेपर के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर गीता गोपीनाथ ने सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए लिखा, “टैरिफ से अभी भी कोई अच्छी खबर नहीं है। नए शोध से पता चलता है कि टैरिफ के कारण अमेरिका द्वारा आयात किए जाने वाले उत्पादों की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है। सीधे शब्दों में कहें तो, टैरिफ ने निर्यात की कीमतों को कम करने में बहुत कम काम किया और इसके बजाय हम सस्ते, कम गुणवत्ता वाले आयात की ओर मुड़ गए। उच्च कीमतों का भुगतान करने के अलावा सामान की गुणवत्ता भी घट गई है।”
Still no good news from the tariffs. New research from Ahn, Rotunno, Ruta show that tariffs have led to a drop in the *quality* of products the US imports. So basically, the tariffs did little to reduce the prices of exports to the US and instead we rotated to cheaper lower…
महँगे लेकिन अच्छे सप्लायर्स OUT, सस्ते और घटिया सप्लायरों की एंट्री
अब सवाल यह उठता है कि यदि व्यक्तिगत स्तर पर वस्तुओं की कीमतें नहीं घटीं, तो फिर अमेरिका के कुल आयात मूल्य (Import Bill) में जो थोड़ी-बहुत गिरावट या बदलाव दिखाई दे रहा है, उसकी असली वजह क्या है? आईएमएफ के शोधकर्ताओं ने इसके पीछे एक बेहद जटिल और महत्वपूर्ण आर्थिक प्रक्रिया को उजागर किया है, जिसे ‘इंपोर्ट रीएलोकेशन’ (आयात का पुनर्वितरण) कहा जाता है।
जब अमेरिका ने कुछ खास देशों या उत्पादों पर भारी शुल्क लगाया, तो उन देशों से आने वाले बेहतरीन और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद अमेरिकी आयातकों के लिए बहुत महँगे हो गए। परिणामस्वरूप अमेरिकी कंपनियों ने उन स्थापित, ब्रांडेड और उच्च कीमत वाले सप्लायर्स से नाता तोड़ना या कम करना शुरू कर दिया। उनके स्थान पर आयातकों ने ऐसे नए देशों और सप्लायर्स की खोज की जिन पर टैरिफ की मार कम थी या जिनके उत्पाद बुनियादी रूप से बहुत सस्ते थे।
इस शोध के आँकड़े बताते हैं कि अध्ययन की अवधि के दौरान अमेरिका की औसत प्रभावी टैरिफ दरें लगभग 8 प्रतिशत बढ़ गईं। इस बढ़ोतरी के कारण कुल आयात मात्रा में करीब 3.6% की गिरावट दर्ज की गई। लेकिन सबसे बड़ा खेल प्रॉडक्ट बास्केट के भीतर हुआ। टैरिफ बढ़ने के बाद अधिक कीमत और उच्च गुणवत्ता वाले सप्लायर्स के अमेरिकी बाजार छोड़ने की संभावना नाटकीय रूप से बढ़ गई, जबकि कम कीमत वाले नए सप्लायर्स ने बड़ी तेजी से अमेरिकी बाजार में एंट्री मारी। आईएमएफ के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कीमतों में जो भी थोड़ी-बहुत गिरावट या स्थिरता ऊपरी तौर पर दिखाई दे रही है, उसमें से लगभग 65% की वजह सप्लायर्स बदलने का यही पैटर्न था।
गुणवत्ता में गिरावट की कड़वी सच्चाई का ‘अपील स्कोर’ में हुआ खुलासा
ट्रंप प्रशासन इस बात की पीठ थपथपा सकता था कि सप्लायर्स बदलने से अमेरिका को कम कीमत पर सामान मिल रहा है, लेकिन आईएमएफ की रिसर्च ने इस भ्रामक खुशी को भी एक बड़े झटके में बदल दिया है। रिसर्चर्स का स्पष्ट तर्क है कि कम कीमत का मतलब हमेशा बेहतर मूल्य या बचत नहीं होता। यह बचत केवल इसलिए दिख रही है क्योंकि अमेरिका अब घटिया उत्पाद खरीद रहा है।
शोधकर्ताओं ने साल 2023 और 2024 के बेसलाइन डेटा का उपयोग करके विभिन्न देशों के उत्पादों का एक ‘अपील स्कोर’ (Product Appeal Score) तैयार किया था। उपभोक्ता माँग के सिद्धांतों के तहत जो उत्पाद ऊँची कीमत के बावजूद बाजार में अपनी मजबूत हिस्सेदारी बनाए रखते हैं, उनका अपील स्कोर अधिक माना जाता है क्योंकि उपभोक्ता उनकी गुणवत्ता, टिकाऊपन और ब्रांड वैल्यू को पसंद करते हैं। जब आईएमएफ ने 2025 के टैरिफ के बाद आए नए सप्लायर्स के उत्पादों के अपील स्कोर की जाँच की तो पाया कि अमेरिकी आयातकों को आकर्षित करने वाले इन नए सप्लायर्स का स्कोर बेहद खराब था।
जब इन गुणवत्ता संबंधी अंतरों को सांख्यिकीय मॉडलों में शामिल किया गया, तो कीमतों में दिखने वाला सारा का सारा फायदा हवा हो गया। आईएमएफ के अध्ययन का अनुमान है कि 2025 के टैरिफ के बाद कीमतों में देखी गई तथाकथित गिरावट का लगभग आधा हिस्सा (तकरीबन 50%) असल में कुछ और नहीं, बल्कि उच्च गुणवत्ता से निम्न गुणवत्ता यानी कम-क्वालिटी वाले सप्लायर्स की ओर मजबूरन किया गया झुकाव था।
साल 2024-25 और 2017-19 के टैरिफ एपिसोड के दौरान विभिन्न उत्पादों के भीतर शुल्क दरों में आए उतार-चढ़ाव का विश्लेषण, फोटो साभार: IMF Report
दिलचस्प बात यह है कि इंपोर्ट का यह पैटर्न पहली बार नहीं देखा जा रहा है। आईएमएफ के अर्थशास्त्रियों ने अपने शोध में साल 2018-19 के दौरान हुए प्रसिद्ध अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध (US-China Tariff Tension) के डेटा की भी दोबारा पड़ताल की। उस दौरान भी ट्रंप ने चीन पर भारी टैरिफ लगाए थे। तब भी यह देखा गया था कि चीन के निर्यातकों ने अपनी कीमतें कम नहीं की थीं, बल्कि अमेरिकी खरीदार वियतनाम, ताइवान और अन्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों की ओर स्थानांतरित हो गए थे।
साल 2018-19 और 2025 के इन दोनों आर्थिक झटकों की तुलना करने पर यह साफ हो जाता है कि टैरिफ का असर निर्यातकों की जेब पर पड़ने के बजाय हमेशा आयात बास्केट की संरचना को बिगाड़ने में होता है। 2018-19 में जहाँ केवल चीन को निशाना बनाया गया था, इसलिए रीएलोकेशन का दायरा थोड़ा सीमित था, वहीं 2025 के टैरिफ अधिक व्यापक और अनिश्चितता से भरे थे। इसके बावजूद, बुनियादी आर्थिक व्यवहार नहीं बदला, बल्कि दोनों ही बार अमेरिकी आयातकों को अंततः निम्न गुणवत्ता वाले इनपुट और उत्पादों की शरण में जाना पड़ा।
अमेरिका पर ही मंडरा रहा लंबे समय का खतरा
यह स्थिति सिर्फ आम उपभोक्ताओं द्वारा रोजमर्रा के इस्तेमाल में लाए जाने वाले कपड़ों, जूतों या इलेक्ट्रॉनिक्स की घटिया क्वॉलिटी तक सीमित नहीं है। इसका एक अधिक खतरनाक पहलू अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र की उत्पादकता (Productivity) से जुड़ा है। अमेरिका में आयात होने वाले सामान का एक बहुत बड़ा हिस्सा कच्चा माल, मध्यवर्ती वस्तुएँ (Intermediate Goods) और पूँजीगत उपकरण (Capital Goods) होते हैं, जिनका उपयोग अमेरिकी फैक्ट्रियाँ अपने अंतिम उत्पाद बनाने के लिए करती हैं।
जब अमेरिकी फैक्ट्रियाँ टैरिफ के डर से उच्च गुणवत्ता वाले पुराने सप्लायर्स को छोड़कर सस्ते और कम अपील स्कोर वाले नए सप्लायर्स से मशीनरी या पुर्जे आयात करती हैं, तो उनकी खुद की उत्पादन क्षमता और उत्पाद की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। औद्योगिक सर्वेक्षणों के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र के अधिकांश गुणवत्ता प्रबंधकों (Quality Leaders) ने स्वीकार किया है कि टैरिफ और व्यापारिक बाधाओं के कारण उनके लिए अपने अंतिम उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखना बेहद कठिन हो गया है।
उदाहरण के लिए, कपड़ा और परिधान उद्योग में स्थापित सप्लायर्स से हटकर नए देशों में ट्रांसफर की गई सप्लाई चेन के कारण शिपमेंट में डिफेक्ट (खामियों) की दरें तेजी से बढ़ी हैं। इसका सीधा नुकसान अमेरिकी कंपनियों को उठाना पड़ रहा है, क्योंकि उनके उत्पाद वैश्विक बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता खो रहे हैं।
डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों में संरक्षणवाद की नीतिगत विफलता का सबक
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की इस रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि डोनाल्ड ट्रंप की यह नीति खुद अमेरिका के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी साबित हुई है। ऐसे में ट्रंप की टैरिफ नीति ‘अँधेरे में तीर चलाने’ जैसी साबित हुई है, जिसका निशाना दुश्मन पर नहीं बल्कि खुद के पैरों पर लगा है। बाहरी देशों को सबक सिखाने के चक्कर में इस नीति ने खुद अमेरिका के बाजार को बिगाड़ दिया है। सस्ते और घटिया सामानों पर निर्भरता भले ही कागजों पर आयात का खर्च थोड़ा कम दिखा दे, लेकिन लंबे समय में यह देश की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रही है।
आईएमएफ का यह वर्किंग पेपर दुनिया भर के नीति निर्माताओं के लिए एक कड़ा सबक है कि संरक्षणवाद की दीवारें अक्सर बाहर के दुश्मनों को रोकने के बजाय, भीतर की आर्थिक खुशहाली और उत्पाद की गुणवत्ता का दम घोंट देती हैं। ट्रंप के टैरिफ ने अमेरिका को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय, अनजाने में एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ महँगाई और घटियापन एक साथ उसकी अर्थव्यवस्था का स्वागत कर रहे हैं। यह पूरी दुनिया के लिए सबक है कि संरक्षणवाद (अपने बाजार को बंद करने) की दीवारें अक्सर फायदे के बजाय खुद का ही दम घोंट देती हैं।
शिक्षा व्यवस्था में सुधारों और परीक्षाओं में गड़बड़ी के खिलाफ शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का आंदोलन अब एक नया मोड़ ले चुका है। 20 दिनों से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस द्वारा सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद, जंतर-मंतर पर चल रहे इस प्रदर्शन की कमान पूरी तरह से ‘डफलीबाज गैंग’ यानी वामपंथी छात्र संगठनों (AISA और SFI) के हाथों में आती दिख रही है।
एक तरफ जहाँ गैर-राजनीतिक होने का दावा करने वाले इस आंदोलन को फ्रंट से लीड करने के लिए वामपंथी नेता आगे आ गए हैं, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया और प्रदर्शन स्थल पर इन लीडर्स के ‘फर्जी अनशन’ और ‘पर्दे के पीछे के ड्रामे’ को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सोनम वांगचुक के जाते ही फ्रंट पर आए AISA के चेहरे
अब तक इस आंदोलन को गैर-राजनीतिक बनाए रखने की कोशिश की जा रही थी, लेकिन जैसे ही शनिवार (18 जुलाई 2026) सुबह को सोनम वांगचुक को खराब स्वास्थ्य के कारण दिल्ली हाई कोर्ट के आदेशानुसार सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, इतने ही पर्दे के पीछे सक्रिय वामपंथी संगठनों ने मंच पर कब्जा जमा लिया।
After Sonam Wangchuk left, the stage was empty, so Abhijeet Dipke put AISA's Fraud, Neha Bora, on the stage instead.
Neha leaves for home every night at 11 PM. A Tata Nexon comes to pick her up every single day, and she returns to the protest only around 12 PM the next… pic.twitter.com/xASSOyffzA
विशेष रूप से ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के तीन बड़े चेहरे नेहा बोरा, अमीन अमितोज और मनीष कुमार जो जेएनयू (JNU), आंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली (AUD) और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के PhD स्कॉलर्स हैं, अब खुद को आंदोलन का मुख्य चेहरा साबित करने में जुटे हैं।
इनका दावा है कि वे सोनम वांगचुक के साथ ही पिछले 21 दिनों से अनशन पर बैठे हैं। लेकिन प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोग और सोशल मीडिया पर आ रही जानकारियाँ कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहे हैं।
अनशन या महज राजनीतिक प्रोपेगेंडा?
जब से AISA की नेहा बोरा की अनशन पर सवाल उठे हैं और उनके बेनकाब होने की बातें सामने आई हैं, तब से प्रदर्शन स्थल पर एक नया ड्रामा देखने को मिल रहा है। खुद को सचमुच 21 दिनों से भूखा दिखाने के लिए अब वह व्हीलचेयर का सहारा ले रही हैं, ताकि यह प्रदर्शित किया जा सके कि वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हैं।
Ever since I exposed AISA's Neha Bora on her fake hunger strike, she has been putting on a full drama to show that she has genuinely been on a hunger strike at the CJP protest for 21 days.
Now she has brought out a wheelchair to show that she can't even walk. Tonight at 11 PM, a… pic.twitter.com/Snj4r18gkd
गंभीर विरोधाभास तब सामने आया जब सरकारी डॉक्टरों की टीम इन AISA सदस्यों का मेडिकल चेक-अप करने पहुँची। 21 दिनों से अनशन का दावा करने वाले इन छात्र नेताओं ने सरकारी डॉक्टरों से इलाज कराने से साफ इनकार कर दिया। इस इनकार ने आंदोलन की साख पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
रात में मटन बिरयानी और सीख कबाब का गुप्त मेन्यू
प्रदर्शन स्थल के आस-पास से सामने आए वीडियोज के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि इन वामपंथियों का अनशन महज दिन के उजाले और कैमरों के सामने तक ही सीमित है। कई ऐसे वीडियो सामने आए है जिनमें ये तथाकथित अनशनकारी रात के अंधेरे में अपनी अनशन तोड़ते हुए मटन बिरयानी और सीख कबाब का लुत्फ उठाते देखे गए हैं।
These AISA and SIF students who have been on a hunger strike for the past 20 days are all frauds.
They eat mutton, chicken, and kebabs at night, and poori-bhaji and rajma-chawal during the day at the CJP protest site.
यही वजह है कि दिल्ली पुलिस ने इन्हें अस्पताल ले जाने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई, क्योंकि इनका स्वास्थ्य सोनम वांगचुक की तरह वास्तव में गंभीर नहीं था। यहाँ तक कि खुद को आंदोलन का कर्ता-धर्ता बताने वाले इन लीडर्स को लेकर प्रदर्शनकारियों के बीच ही फूट पड़ गई है।
अनशन पर बैठे 3 AISA लीडर्स: कौन हैं ये चेहरे और क्या हैं इनके दावे?
नेहा बोरा जेएनयू से PhD की छात्रा है और AISA की एक सक्रिय सदस्य है। आंदोलन के शुरुआती दिनों से ही वह मंच के आस-पास सक्रिय थी। हाल ही में सोशल मीडिया पर उनके फर्जी अनशन के खुलासे के बाद वे भारी विवादों में घिर गई हैं।
आलोचकों का दावा है कि अपनी अनशन को सच साबित करने और सहानुभूति बँटोरने के लिए वे अब व्हीलचेयर का इस्तेमाल कर रही हैं, जबकि डॉक्टरों की जाँच से वे लगातार बच रही हैं।
अंबेडकर यूनिवर्सिटी का PhD स्कॉलर अमीन अमितोज भी नेहा के साथ 21 दिनों से अनशन पर बैठने का दावा कर रहा है। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद वॉलंटियर डॉक्टरों के मुताबिक, लंबे समय तक भूखे रहने के दावों के बीच अमीन के मसूड़ों से खून आने की शिकायत सामने आई है, जिसे डॉक्टर विटामिन-C और प्रोटीन की भारी कमी या लीवर को हो रहे नुकसान का संकेत मान रहे हैं। हालाँकि सरकारी मेडिकल टीम के सामने इसने भी स्वास्थ्य परीक्षण कराने से इनकार कर दिया।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ताल्लुक रखने वाला PhD स्कॉलर मनीष कुमार इस तिकड़ी का तीसरा सदस्य है। दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए मनीष ने कहा था, “जब पुलिस ने सोनम वांगचुक को उठाया, तो उन्होंने हमें भी पकड़ने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने हमें घेर लिया।” मनीष की स्थिति भी अमीन की तरह ही बताई जा रही है, जहाँ शरीर में पोषक तत्वों की भारी कमी के लक्षण दिख रहे हैं।
हालाँकि एक तरफ प्राइवेट डॉक्टरों द्वारा इन्हें गंभीर रूप से बीमार बताया जाना और दूसरी तरफ सरकारी डॉक्टरों को चेक-अप न करने देना, रात में बिरयानी और कबाब खाकर अनशन तोड़ने के वीडियो सामने आने की बातें, इन तीनों लीडर्स को संदेह के घेरे में खड़ा करती हैं।
क्या था असली आंदोलन और कैसे बदला इसका स्वरूप?
दरअसल यह पूरा आंदोलन मई के महीने में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम से एक ऑनलाइन व्यंग्यात्मक मुहिम के रूप में शुरू हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य देश की शीर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे NEET में हुए पेपर लीक और प्रशासनिक अनियमितताओं का विरोध करना था।
सोशल मीडिया पर युवाओं और छात्रों के थोड़े से समर्थन के बाद यह आंदोलन जंतर-मंतर पर जमीनी धरने में बदल गया, जहाँ प्रदर्शनकारी खुद को ‘कॉकरोच’ कहकर संबोधित करते हैं।
इनकी मुख्य माँग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है। शिक्षा मंत्री ने इस आंदोलन को पहले ही माहौल खराब करने वाला करार देकर खारिज कर दिया था। आंदोलन को तब बड़ी ताकत मिली जब सोनम वांगचुक इसमें शामिल हुए और सिर्फ नमक-पानी पर रहकर 20 दिनों तक उपवास किया, जिसके कारण उनका वजन 9 किलोग्राम से अधिक घट गया।
दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
शनिवार (18 जुलाई 2026) की सुबह करीब 07:30 बजे भारी पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने जंतर-मंतर पर पहुँचकर सोनम वांगचुक को चादरों के घेरे में लिया और एम्बुलेंस के जरिए सफदरजंग अस्पताल पहुँचाया। अस्पताल की मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ चारू बांबा के अनुसार, वांगचुक स्थिर और सचेत हैं, हालाँकि लंबे अनशन के कारण उन्हें कमजोरी और डिहाइड्रेशन है।
In the morning, as per directions of Hon’ble High court as well as a routine daily scheduled check up, doctors arrived for medical examination of Shri Sonam Wangchuk. There was obstructions caused by some protestors. This created some commotion also.
पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश के तहत की गई है जिसमें सरकार को नियमित रूप से वांगचुक के स्वास्थ्य की निगरानी करने और जरूरत पड़ने पर तुरंत इलाज मुहैया कराने का निर्देश दिया गया था।
सोनम वांगचुक की अनुपस्थिति में अब CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने अनिश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि 20 जुलाई 2026 को संसद मार्च हर हाल में आयोजित किया जाएगा। वांगचुक के हटाए जाने के बाद अब CJP ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की माँग शुरू कर दी है।
हालाँकि AISA और वामपंथियों द्वारा आंदोलन को हाई जैक करने और सुबह अनशन का दिखावा कर रात में बिरयानी खाने जैसी चर्चाओं ने इस पूरे मोर्चे की साख को भारी नुकसान पहुँचाया है।
पेपर लीक मामले में छात्रों के नाम पर महीनों तक सियासत चमकाने और अंततः वहाँ पूरी तरह फेल रहने के बाद कॉन्ग्रेस ने अब संसद के मॉनसून सत्र से पहले अपनी राजनीति को जीवित रखने के लिए एक नया तमाशा खड़ा करने की कोशिश शुरू कर दी है। अयोध्या के राम मंदिर चंदा चोरी केस को लेकर अब कॉन्ग्रेस की नींद टूटी है, जब उस मामले पर जाँच अपने अंतिम दौर में पहुँच चुकी है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संयुक्त पत्र लिखकर इस मामले में हस्तक्षेप की माँग की है। ध्यान देने वाली बात है कि इन्होंने मॉनसून सत्र से ठीक पहले ये चिट्ठी लिखी है, ताकि इस सत्र में भी देश के बाकी मुद्दों को साइड कर इस संवेदनशील मुद्दे पर हंगामा खड़ा कर सकें।
"Your silence now in the face of such a crime is unacceptable. It is your duty to ensure accountability and restitution."
राजनीतिक लाभ के लिए करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर चोट
यह कोई पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस ने राम मंदिर से जुड़े मुद्दों पर राजनीति करने का प्रयास किया हो, लेकिन इस बार उसने सीधे तौर पर करोड़ों राम भक्तों की श्रद्धा को अपने सियासी एजेंडे का मोहरा बना लिया है। पीएम मोदी को लिखे गए पत्र में राहुल गाँधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, “आप राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में हजारों करोड़ रुपए की चोरी से वाकिफ हैं। जिन लाखों श्रद्धालुओं ने अपनी गाढ़ी कमाई, श्रद्धा, भक्ति और विश्वास के साथ दान की थी, वो इस चोरी से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।”
पेपर लीक मामले में सरकार को घेरने में नाकाम रहने के बाद जनता का ध्यान भटकाने और देश का सियासी पारा गरमाने के लिए कॉन्ग्रेस ने जानबूझकर इस संवेदनशील विषय को चुना है। चिट्ठी के जरिए कॉन्ग्रेस ने न केवल सरकार पर हमला बोला है बल्कि हमेशा की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और विश्व हिंदू परिषद (VHP) को भी लपेटे में ले लिया है।
पत्र में विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि उन्होंने खुद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर संसद में इस ट्रस्ट के गठन की घोषणा की थी लेकिन इसके सदस्यों की नियुक्ति में पक्षपात किया गया। राहुल और खरगे ने पत्र में साफ तौर पर लिखा है, “ये सार्वजनिक रूप से सभी को पता है कि ट्रस्ट के सदस्य RSS, VHP और उनसे जुड़े संगठनों से जुड़े हैं। इसके कलंकित पूर्व महासचिव भी आपके करीबी सहयोगी रहे हैं।”
इस तरह के बयानों से यह साफ झलकता है कि कॉन्ग्रेस का वास्तविक मकसद किसी जाँच से ज्यादा वैचारिक रूप से जुड़े संगठनों की छवि को धूमिल करना है।
क्या है कॉन्ग्रेस की बेवजह की 3 मुख्य माँगे? सीएम योगी पहले गठित कर चुके हैं SIT
अपनी राजनीति को धार देने के लिए कॉन्ग्रेस ने इस मामले में तीन बड़ी माँगें सामने रखी हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी ‘चुप्पी’ तोड़ने को कहा है। पत्र में लिखा गया है, “इतने बड़े अपराध के सामने आपकी मौजूदा चुप्पी बर्दाश्त से बाहर है। जवाबदेही और नुकसान की भरपाई तय करना आपका फर्ज है।”
इसके साथ ही दोनों नेताओं ने सीधे तौर पर माँग उठाई है कि वे तुरंत ट्रस्ट के वित्तीय मामलों की स्वतंत्र और व्यापक जाँच का आदेश दें जिसमें नकद, सोना और चाँदी सहित सभी चढ़ावों का प्रबंधन भी शामिल होना चाहिए। इतना ही नहीं कॉन्ग्रेस नेताओं ने कहा है कि इस जाँच के नतीजे और ट्रस्ट के खाते पूरी तरह सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
ऐसा इसलिए ताकि हर श्रद्धालु को यह पता चल सके कि उनके चढ़ावे का इस्तेमाल कैसे किया गया है और इस पूरे मामले में जो भी लोग जिम्मेदार पाए जाएँ, उनके पद या प्रभाव की परवाह किए बिना उन्हें सख्त रूप से जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। बता दें कि मामला संज्ञान में आने के बाद यूपी की योगी सरकार ने 13 जून 2026 को ही SIT का गठन किया था।
इस टीम की अध्यक्षता लखनऊ मंडल के आयुक्त विजय विश्वास पंत (IAS) को दी गई थी। उनके साथ पुलिस स्तर पर जाँच की जिम्मेदारी आईजी रेंज किरन एस (IPS) को सौंपी गई थी, जो मामले के आपराधिक पहलू और सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों की भी जाँच कर रहे थे।
वहीं, वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन को दान राशि, ऑडिट और सभी वित्तीय प्रक्रियाओं की तकनीकी जाँच की जिम्मेदारी दी गई थी।
आपकी सरकार की विश्वसनीयता अब आपकी कार्रवाई पर निर्भर: राहुल गाँधी
प्रधानमंत्री को आधिकारिक पत्र भेजने के साथ ही राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी इस मुद्दे को लेकर एक पोस्ट लिखी। उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री जी, श्री राम मंदिर में करोड़ों श्रद्धालुओं ने आस्था के साथ अपनी कमाई अर्पित की – वहाँ हुई चंदा चोरी अब किसी से छुपी नहीं है। ट्रस्ट के हर सदस्य को आपकी सरकार ने चुना था।”
प्रधानमंत्री जी,
श्री राम मंदिर में करोड़ों श्रद्धालुओं ने आस्था के साथ अपनी कमाई अर्पित की – वहां हुई चंदा चोरी अब किसी से छुपी नहीं है।
ट्रस्ट के हर सदस्य को आपकी सरकार ने चुना था। इस चंदा चोरी पर आपकी चुप्पी अस्वीकार्य है।
उन्होंने लिखा, “इस चंदा चोरी पर आपकी चुप्पी अस्वीकार्य है। तत्काल स्वतंत्र जाँच कराइए, पूरा हिसाब सार्वजनिक कीजिए और दोषियों को कानून के कटघरे में लाइए। आपकी सरकार की विश्वसनीयता अब आपकी कार्रवाई पर निर्भर है।”
हालाँकि कॉन्ग्रेस इस मामले में जिस प्रकार का तमाशा खड़ा करने की कोशिश कर रही है, उसकी हवा पहले ही निकल चुकी है क्योंकि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस अनियमितता की भनक लगते ही बेहद मुस्तैदी दिखाई थी। यूपी सरकार ने पिछले महीने 13 जून को ही इस पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच के लिए SIT का गठन कर दिया था।
सोशल मीडिया पर उड़ीं अफवाहों का सच आ चुका है सामने
अपनी जाँच के दौरान SIT ने सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों पर चल रही उन खबरों का भी बारीकी से संज्ञान लिया था, जिनमें करोड़ों के चढ़ावे और बहुमूल्य वस्तुओं के गायब होने के आरोप सीधे ट्रस्ट पर लग रहे थे। इसमें मुख्य रूप से तीन बड़ी खबरें थीं।
पहली खबर इंडियन बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन के उत्तर भारत के प्रमुख अनुराग रस्तोगी और सराफा एसोसिएशन द्वारा 38kg और 22 Kg से ज्यादा की चाँदी की ईंटें दान करने और उनके गायब होने से जुड़ी थी। दूसरी खबर विश्व सिंधी सेवा समाज के अध्यक्ष राजू मंडवानी द्वारा बिना रसीद के 200Kg चाँदी की ईंटें भेंट करने के दावे की थी।
तीसरी खबर मुंबई के व्यवसायी अनिल विश्वकर्मा के चाँदी के हार और चरण पादुकाओं को लेकर थी। ऑपइंडिया के पास मौजूद SIT रिपोर्ट के अनुसार, जब ट्रस्ट के बही-खातों और रिकॉर्ड का मिलान किया तो पाया कि सराफा संगठनों की चाँदी को तय प्रक्रिया के तहत गलाकर बैंक लॉकर में सुरक्षित रखा गया है।
वहीं सिंधी समाज और मुंबई के व्यवसायी का सारा सामान भी ट्रस्ट की सुरक्षित अभिरक्षा में मिला। इस तरह सोशल मीडिया के ट्रस्ट पर लगाए आरोप पूरी तरह झूठे साबित हुए, लेकिन SIT ने यह जरूर कहा कि भविष्य में ऐसी अफवाहों से बचने के लिए प्रबंधन व्यवस्था को और मजबूत तथा जवाबदेह बनाने की सख्त जरूरत है।
ऐसे में जब राज्य सरकार पहले ही कड़े कदम उठा चुकी है, तब कॉन्ग्रेस द्वारा पीएम मोदी की सीधी दखल की माँग करना और पत्र का आखिरी हिस्सा, “आपकी सरकार और ट्रस्ट की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि आप कितनी पारदर्शिता और तेजी से काम करते हैं” लिखना केवल अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने का जरिया मात्र दिखाई देता है।
जब साल 1954 में जवाहरलाल नेहरू ने भारत और चीन के बीच तिब्बत मामले को लेकर ‘पंचशील’ का सिद्धांत दुनिया के सामने रखा था, ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारों के बीच उस पंचशील का जो हश्र हुआ, वो आज पूरा देश जानता है- पीठ में छुरा घोंपा गया और नतीजा 1962 की शर्मनाक हार के रूप में सामने आया।
आज ‘पंचशील’ नाम का वही जहर जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शनों के बीच से निकलकर आया है। इसे जारी करने वाले हैं जाने-माने ‘आंदोलनजीवी’ योगेंद्र यादव, जो सोनम वांगचुक के अस्पताल में भर्ती होने के बाद से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के मंच पर बैठने लगे हैं और इस पूरे प्रदर्शन को डायरेक्शन देने में जुट गए हैं।
CJP के मंच से योगेंद्र यादव के इस नए ‘पंचशील’ को देखें तो इसमें बड़ी-बड़ी बातें की गई हैं, जैसे मार्च में सिर्फ तिरंगा झंडा रखना, हाथ में संविधान या गाँधी-अंबेडकर-भगत सिंह की फोटो होना, जुबान पर ‘भारत माता की जय’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ जैसे नारे होना, अनुशासन बनाए रखना और किसी भी हाल में हाथ न उठाना।
इस का पालन सभी को करना है,
पंचशील/ पाँच प्रतिज्ञा 1. मार्च में सिर्फ़ एक झंडा — तिरंगा। किसी पार्टी, किसी संगठन का और कोई झंडा नहीं होगा । 2. हाथ में या तो संविधान या फिर गांधी, आंबेडकर या भगत सिंह की तस्वीर रहेगी। 3. जुबान पर कोई नेगेटिव नारा नहीं — बस “जय हिन्द”, “भारत माता… pic.twitter.com/U0JJvpyiuY
— Cockroach Janta Party (@CJP_for_India) July 19, 2026
इनमें कुछ बातें स्वाभाविक हैं, जो शायद हर देशभक्त जानता है लेकिन पता नहीं योगेंद्र यादव को बताने की क्या जरूरत आन पड़ी? यह तो उनका पास्ट रिकॉर्ड ऐसा रहा है, जो उनको लोगों का भरोसा जीतने के लिए ‘जय हिंद’ बोलने की जरूरत पड़ रही है। क्योंकि हम सब जानते हैं कि योगेंद्र यादव को आंदोलन की कितनी भूख है, और अचानक से उनका इस प्रदर्शन की प्लानिंग में लगना हमें दिल्ली में CAA विरोधी प्रदर्शनों में उनकी वह तस्वीर याद दिलाता है, जिसमें वह शरजील इमाम, उमर खालिद के साथ बैठकें कर रहे थे और नतीजतन दंगे-फसाद भड़काने में आज वही लोग जेल में बंद हैं।
जब एजेंडा हुआ एक्सपोज, तो शुरू हुआ डैमेज कंट्रोल का स्वाँग
खैर, पिछले करीब एक महीने से NEET पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन में भी कुछ ऐसी तस्वीरें नहीं आई हैं, जिन पर भरोसा किया जा सके। चाहे वह माता सीता का अपमान करते हिंदू विरोध का एजेंडा हो, ब्राह्मणवाद का विरोध हो और वहीं दूसरी ओर अल्लाह का नाम हो, स्वरा भास्कर जैसे पुराने चेहरे हों, या हो AISA-SFI जैसे वही लेफ्ट संगठनों से जुड़ा एजेंडा। यही नहीं, चाहे 18 जुलाई 2026 को अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को अस्पताल में शिफ्ट करने का विरोध करते हुए हिंसा का रवैया हो, इसमें ऑपइंडिया के पत्रकार को भी निशाना बनाया गया जब वह शांतिपूर्ण तरीके से सवाल पूछ रहे थे।
जब प्रदर्शन का यह चाल-चरित्र सोशल मीडिया औऱ मीडिया के जरिए देश के सामने आया, तो आम जनता ने इस प्रदर्शन से दूरी बना ली। भीड़ जुटनी बंद हो गई और हर तरफ सिर्फ बदनामी होने लगी। अभिजीत दिपके पर स्याही फेंकना भी इसी बदनामी का नतीजा था। और जब योगेंद्र यादव जैसे ‘प्रदर्शन के रणनीतिकारों’ ने देखा कि उनका एजेंडा और प्रोपेगेंडा पूरी तरह एक्सपोज होने लगा है, तो उन्हें अपनी डूबती नैया को बचाने के लिए ‘डैमेज कंट्रोल’ की याद आई।
आसान शब्दों में समझें तो यह पंचशील कोई मन का बदलाव या अचानक जागी देशभक्ति नहीं है। ‘भारत माता की जय’ और ‘तिरंगे’ का सहारा ये लोग अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि अपनी साख बचाने की मजबूरी में ले रहे हैं ताकि बहुसंख्यक समाज के गुस्से को शांत किया जा सके।
दरअसल, CJP ने 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च करने का ऐलान किया है, यही दिन संसद के मॉनसून सत्र का पहला दिन भी है। इसी प्रदर्शन में भीड़ जुटाने के लिए संविधान और गाँधी की बात हो रही है। क्योंकि इस मार्च के लिए अपनी असलियत जानते हुए अभिजीत दिपके और उसकी गैंग के लिए भीड़ जुटाना मुश्किल होता जा रहा है। इसीलिए योगेंद्र यादव ने पुरानी गलतियों से सीख लेकर काफी सॉफ्ट ढंग से ‘देशभक्ति’ की बात कर दी है। बाकी डैमेज कंट्रोल का हिस्सा, सोनम वांगचुक के बाद खुद को ‘हीरो’ बतलाने वाले अभिजीत का ‘रोना’ तो हम सबने देखा ही।
‘जय भीम’ और ‘इंकलाब’ के नारों के पीछे का असली सच
इस नए पंचशील में जिन दो प्रमुख नारों को बहुत चालाकी से शामिल किया गया है- ‘जय भीम’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’, उसके बारे में आम जनता को जानना भी जरूरी है। क्योंकि ये नारे एक बहुत बड़े छद्म को छुपाने का जरिया बन रहे हैं।
जय भीम, भाईचारे के नाम पर हिंदुओं को ‘चारा’ बनाने का खेल
सीजेपी के प्रदर्शन में ‘जय भीम’ के नारे का इस्तेमाल दलित-मुस्लिम एकता (जिसे ‘जय भीम जय मीम’ का नारा भी कहा जाता है) के नैरेटिव को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है। लेकिन इतिहास के पन्ने पलटें तो यह प्रयोग कोई नया नहीं है। देश के विभाजन के समय जोगेंद्र नाथ मंडल इस भ्रामक भाइचारे के सबसे बड़े पैरोकार थे।
उन्होंने अनुसूचित जातियों को भरोसा दिलाया था कि मुस्लिम लीग के साथ उनका भविष्य पाकिस्तान में सुरक्षित रहेगा और जिन्ना ने उन्हें वहाँ का पहला श्रम मंत्री भी बनाया। सन 1949 में जिन्ना ने उन्हें कॉमनवेल्थ और कश्मीर मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी। लेकिन इसका हश्र क्या हुआ? पाकिस्तान में हिन्दुओं को कुचलना कभी रुका ही नहीं। बलात्कार आम बात थी। हिन्दुओं की स्त्रियों को उठा ले जाना जोगेंद्र नाथ मंडल की नजरों से भी छुपा नहीं था। वो बार-बार इन पर कार्रवाई के लिए चिट्ठियाँ लिखते रहे।
इस्लामिक हुकूमत को ना उनकी बात सुननी थी, ना उन्होंने सुनी। हिन्दुओं की हत्याएँ होती रहीं। जमीन, घर, स्त्रियाँ लूटी जाती रहीं। कुछ समय तो जोगेंद्र नाथ मंडल ने प्रयास जारी रखे। आखिर उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने किस पर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है। जिन्ना की मौत होते ही 1950 में जोगेंद्र नाथ मंडल भारत लौट आए।
इस नेता का नाम किसी इतिहास की किताब में शामिल नहीं किया गया। बस समस्या है कि ना आपने खुद पढ़ने की कोशिश की और दल हित चिन्तक तो आपको सिर्फ एक वोट बनाना चाहते हैं! तो वो क्यों पढ़ने देते भला? अब भी यही हो रहा है। जागिए! इससे पहले देर हो जाए।
इंकलाब जिंदाबाद: भगत सिंह के नाम पर खिलाफत के इतिहास को छुपाना
आम जनमानस में आज भी यह एक गहरा भ्रम फैला हुआ है कि ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा मूल रूप से बलिदानी भगत सिंह ने ही दिया था। जबकि इतिहास के पन्ने खंगालें तो पता लगता है कि यह नारा 1921 में इस्लामी कट्टरपंथी और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख रणनीतिकार मौलाना हसरत मोहानी द्वारा गढ़ा गया था।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जब 1929 में असेंबली में बम फेंका, तब उन्होंने इस नारे को बुलंद किया, जिससे यह देश के कोने-कोने में फैल गया। लेकिन, इस नारे की उत्पत्ति का मूल संबंध भारत की आजादी से नहीं, बल्कि खिलाफत आंदोलन और ‘उम्माह’ (वैश्विक इस्लामी सत्ता) की भावना से जुड़ा हुआ था। बता दें कि खिलाफत आंदोलन तुर्की के खलीफा की सत्ता को बहाल करने के लिए चलाया गया था, जिसका नेतृत्व मोहम्मद अली जौहर (जामिया मिली इस्लामिया के संस्थापकों में से एक) ने किया था।
और इस आंदोलन को महात्मा गाँधी ने भी अंध समर्थन किया था, जिसका खामियाजा खामियाजा भी कोहाट दंगों और मोपला नरसंहार के रूप में ‘हिंदुओं’ को ही भुगतना पड़ा था।
जब आज CJP जैसे प्रदर्शनों में इस नारे को गाँधी, अंबेडकर और भगत सिंह की तस्वीरों के साथ मिलाकर लगाया जाता है, तो यह केवल एक बौद्धिक छलावा होता है। इसका उद्देश्य वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा के मूल एजेंडे को देशभक्ति के रंग में रंगकर प्रस्तुत करना है।
निष्कर्ष: पंचशील सिर्फ दोगलेपन और पाखंड की पराकाष्ठा
योगेंद्र यादव का ‘पंचशील’, दरअसल उस दोगलेपन की पराकाष्ठा है, जहाँ मन में हिंसा और समाज को तोड़ने की प्लानिंग होती है, लेकिन मंच से शांति, संविधान और अनुशासन की दुहाई दी जाती है। अगर मन में वास्तव में अहिंसा का संकल्प होता, तो ऑपइंडिया के पत्रकार पर हमला करने वाले तत्वों को उसी समय मंच से बहिष्कार किया गया होता। अगर वास्तव में ‘भारत माता की जय’ पर अटूट विश्वास होता, तो इस मारने को लगाने के लिए किसी गाइडलाइन या ‘पंचशील’ नाम देने की जरूरत नहीं पड़ती।
नेहरू के पंचशील ने देश को एक बार धोखा दिया था, लेकिन देश की जनता अब इन नए ‘आंदोलनजीवियों’ और उनकी क्रोनोलॉजी को अच्छी तरह समझ चुकी है। 2020 के दिल्ली दंगों के जख्म अभी भरे नहीं हैं और यही कारण है कि जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्च तक के इस नए ड्रामे को लेकर समाज में कोई सहानुभूति नहीं है। यह आंदोलन अपने ही अंतर्विरोधों, वैचारिक पाखंड और हिंसक प्रवृत्तियों के कारण जनता की नजरों में पूरी तरह गिर चुका है। अब तिरंगे और महापुरुषों की आड़ लेकर चाहे जितना भी डैमेज कंट्रोल कर लिया जाए, इस आंदोलन का असली सच देश के सामने पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।
बिहार की राजधानी पटना में फायरिंग से शुरू हुआ ‘खान ग्लोबल स्टडीज’ वाले खान सर उर्फ फैजल खान और ‘ज्ञान बिंदु’ कोचिंग वाले रौशन आनंद का विवाद अब जुबानी जंग में बदल गया है। पिछले दिनों खान सर, उनके स्टाफ और गार्ड को कोर्ट से राहत मिली थी। अब खान सर का एक पॉडकास्ट सामने आया है।
इसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि रौशन आनंद के भाई प्रिंस यादव पर अपहरण और आर्म्स एक्ट के मामले दर्ज थे। उसे पुलिस पहले से ही खोज रही थी। वहीं ऑपइंडिया को रौशन आनंद ने बताया है कि इस पॉडकास्ट में खान सर ने जिन मामलों का हवाला दिया है, उनमें उनके भाई को अदालत कुछ साल पहले ही बरी कर चुकी है।
उल्लेखनीय है कि प्रिंस यादव का शव नेपाल के विराट नगर के एक होटल में मिला था। उस समय 2 जून 2026 को हुए फायरिंग विवाद के मामले में रोशन आनंद जेल में बंद थे। ऑपइंडिया को रौशन आनंद ने बताया है कि जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने 17 जून और फिर 19 जून 2026 को पटना के कदमकुआँ थाना में शिकायत दी थी। लेकिन पुलिस उनकी शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज करने में टालमटोल कर रही है। उन्होंने इस संबंध में बिहार के मुख्यमंत्री और राज्य के पुलिस महानिदेशक को मेल भी किया है। रौशन आनंद का कहना है कि करीब 10 दिन बीत जाने के बाद भी उन्हें इसका जवाब नहीं मिला है।
क्या है खान सर और रौशन आनंद का मामला?
2 जून 2026 की रात पटना के मुसल्लहपुर हाट इलाके में कोचिंग विवाद में फायरिंग की बात सामने आई थी। खान सर का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने मीडिया को बताया था कि ‘आठ-दस राउंड फायरिंग’ होते उन्होंने खुद देखा है। गौरतलब है कि खान ग्लोबल स्टडीज और ज्ञान बिंदु कोचिंग मुसल्लहपुर हाट के किसान कोल्ड स्टोरेज में अगल-बगल ही स्थित है।
इस घटना को लेकर 2 जून को ही कन्हैया कुमार सिंह ने कदमकुआँ थाने में शिकायत दी। सिंह, खान ग्लोबल स्टडीज का प्रबंधन देखते हैं। शिकायत में उन्होंने दावा किया,
दिनांक 02.06.2026 को करीब रात 10:00 बजे तक क्लास चलने के बाद कोचिंग बंद किया गया था। उसी समय 10:10 बजे के समय मेरे कोचिंग का गार्ड चुनचुन, उम्र 25 वर्ष, को ज्ञान बिंदु कोचिंग के डायरेक्टर रोशन आनंद के कहने पर अभिषेक और प्रिंस (रोशन आनंद का भाई) तथा उसका स्टाफ रोशन एवं गौरव के साथ करीब 15-20 लड़के अचानक मेरे कोचिंग के गेट पर आया और गार्ड को खींचकर मारपीट करने लगे, जिससे उसका सिर फट गया।
इस शिकायत में तोड़फोड़, गाली-गलौज, खान ग्लोबल स्टडीज का बोर्ड, खान सर का फोटो फाड़ने की बात कही गई थी। दो दिन के भीतर कोचिंग को बम से उड़ा देने की धमकी देने की बात कही गई थी। बताया गया था कि बिहार पुलिस सिपाही भर्ती में खान सर के कोचिंग के ज्यादा बच्चों का चयन होने को लेकर ये विवाद हुआ।
फायरिंग की खबरों ने कैसे पकड़ा जोर?
कन्हैया सिंह की शिकायत के आधार पर 2 जून को ही केस दर्ज किया गया। इसकी संख्या- 410/26 है। आप ऊपर इस शिकायत के बारे में पढ़ चुके हैं। इसमें कहीं भी फायरिंग की बात नहीं कही गई है।
ऐसे में सवाल उठता है कि फिर फायरिंग की खबरों ने क्यों जोर पकड़ लिया? इसका जिम्मेदार खान सर का वह बयान है, जिसमें उन्होंने खुद आठ से दस राउंड फायरिंग होने का दावा किया था। इसके बाद कुछ वीडियो भी वायरल हुए थे, जिसमें गार्ड फायरिंग करते दिखे थे।
खान सर ने दिया फायरिंग का आदेश
कदमकुआँ थाना के आरक्षी निरीक्षक अनिल कुमार 4 जून को घटनास्थल पर जाकर जाँच की। इसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। इसके आधार पर एक केस 418/26 दर्ज की गई है। इसमें बताया गया है कि जाँच के दौरान पता चला कि वायरल वीडियो में फायरिंग कर रहे प्रदीप सिंह और तालबर सिंह, दोनों खान सर के निजी गार्ड हैं। खान सर ने खुद भी इनकी पहचान की पुष्टि पुलिस के सामने की और बताया कि उनके हाथ में दिख रहे हथियार लाइसेंसी हैं।
पूछताछ में प्रदीप और तालबर ने पुलिस को बताया कि 2 जून की रात विवाद होने के बाद खान सर के साथ वे दोनों ऑफिस से बाहर आए थे। खान सर ने उनसे कहा,
देख क्या रहे हो। भीड़ पर अविलंब फायर करो। जो होगा मैं समझ लूँगा।
गार्ड ने पूछताछ में खान सर के आदेश के बाद फायरिंग करने की बात कही। इसके बाद जाँच रिपोर्ट में दोनों गार्डों के अलावा खान सर और कुछ अज्ञातों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की अनुशंसा की गई है। इसके आधार पर खान सर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है।
इस रिपोर्ट में भी ज्ञान बिंदु कोचिंग के लोगों की तरफ से फायरिंग करने की कोई बात नहीं की गई है। इसमें भी खान ग्लोबल स्टडीज के गार्ड चुनचुन के साथ मारपीट, बैनर फाड़ने और हो-हल्ला होने की बात फायरिंग करने वाले खान सर के दोनों गार्ड के हवाले से कही गई है।
खान सर के झूठ से खड़ा होता है रौशन आनंद का सवाल
ऑपइंडिया को रौशन आनंद ने बताया कि उनकी गिरफ्तारी, उन्हें जेल में धमकी देने और उनके भाई की संदिग्ध मौत एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यह सब कुछ इसलिए हुआ, क्योंकि खान सर ने आठ-दस राउंड फायरिंग का झूठ बोला।
उन्होंने बताया कि जमानत मिलने और भाई के अंतिम संस्कार के बाद इस संबंध में पटना पुलिस के पास वे दो बार औपचारिक शिकायत दर्ज करा चुके हैं। पहली शिकायत उन्होंने 17 जून 2026 को कदमकुआँ थाने में दी थी। इसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।
इसमें उन्होंने बताया है कि 2 जून की रात उनके और खान सर के कोचिंग स्टाफ के बीच पोस्टर हटाने को लेकर मामूली सा विवाद और मारपीट की घटना हुई थी। उस समय मौके पर न वे खुद थे और न उनके भाई प्रिंस तथा अभिषेक। न ही इस घटना को लेकर उनके पास कोई जानकारी थी। लेकिन खान सर, किसान कोल्ड स्टोरेज के मालिक डॉक्टर रमाशंकर प्रसाद और खान ग्लोबल स्टडीज के मैनेजर कन्हैया कुमार सिंह व अन्य ने आपराधिक साजिश करते हुए पहले खुद फायरिंग करवाई, फिर मीडिया के सामने इसका आरोप उन पर लगाते हुए केस दर्ज करवा दिया। रौशन आनंद ने कहा है कि इनलोगों ने उसके बाद अपने रसूख का इस्तेमाल कर उन्हें जेल भिजवा दिया।
शिकायत में रौशन आनंद ने यह भी दावा किया है कि इनलोगों ने 13 जून 2026 को जेल के भीतर उन्हें जान से मरवाने की धमकी भी दिलवाई। साथ ही गिरफ्तारी से बचने का प्रयास कर रहे उनके 24 वर्षीय भाई प्रिंस की हत्या करवा दी, जिसका शव 13 जून को नेपाल के विराटनगर में एक होटल के कमरे में संदिग्ध परिस्थितियों में मिला था।
जमानत मिलने के बाद रौशन आनंद 15 जून को जेल से बाहर निकले थे। इसी दिन उनके भाई का अंतिम संस्कार भी हुआ था।
रौशन आनंद ने ऑपइंडिया को बताया कि पुलिस ने यह कहते हुए उनकी शिकायत के आधार पर मामला दर्ज करने और जाँच से इनकार कर दिया कि उनको धमकी देने और उनके भाई की मौत का मामला कदमकुआँ थाना क्षेत्र से बाहर का है। रौशन आनंद का दावा है कि कदमकुआँ थाना प्रभारी जनमेजय राय ने उनसे कहा कि वे केवल 2 जून की घटना को लेकर शिकायत दें तभी जाँच होगी।
इसके 2 दिन बाद 19 जून को रोशन आनंद ने एक नई शिकायत कदमकुआँ पुलिस को दी। इसकी कॉपी भी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। इसमें खान सर सहित 6 लोग आरोपित बनाए गए हैं। कहा गया है कि ये लोग हथियारों के साथ उनके कोचिंग के पास आए। ज्ञान बिंदु के स्थायी बैनर के ऊपर खान ग्लोबल स्टडीज का बैनर लगा दिया। जब उनके स्टाफ ने इसका विरोध किया तो खान सर आगबबूला हो गए। कथित तौर पर उन्होंने कहा- गोली मारकर सबकी हत्या कर दो। रौशन आनंद के अनुसार इसके बाद ही उनके गार्डों ने फायरिंग की, जिसका वीडियो वायरल हुआ था।
इस शिकायत में रौशन आनंद ने आरोपितों के विरुद्ध संबंधित धाराओं में केस दर्ज कर कार्रवाई की गुहार पुलिस से लगाई है। लेकिन रौशन आनंद ने ऑपइंडिया को बताया कि उनकी इस शिकायत पर भी अब तक कोई एक्शन नहीं लिया गया है। उनसे कहा गया है कि इस मामले की जाँच पुलिस पहले से ही कर रही है।
रौशन आनंद की शिकायतों पर क्या कर रही पटना पुलिस?
रौशन आनंद की शिकायतों और इस मामले की जाँच में हुई प्रगति जानने लिए ऑपइंडिया ने कदमकुआँ थाने के प्रभारी जनमेजय राय को फोन किया। उन्होंने कहा;
उन दोनों (खान सर और रौशन आनंद) के मैटर में यहाँ से अब कोई कमेंट नहीं। आप सीनियर अधिकारियों से संपर्क करिए। आपको जो भी पूछना है सीनियर अफसर से ही पूछिए। जो भी देना होता है यहाँ से हम लोग उनको बता देते हैं। अब क्या देना है, क्या नहीं, वे लोग जानें। इस मैटर में हमसे कोई बात नहीं करिए।
इतना कुछ कहने के बाद थाना प्रभारी राय ने झट से कॉल काट दिया। इसके बाद हमने पटना के एसएसपी कार्तिकेय शर्मा को भी फोन किया। लेकिन उन्होंने कॉल नहीं उठाया। उनसे बातचीत होने पर हम इस खबर को अपडेट करेंगे।
पटना कोचिंग फायरिंग विवाद में अब तक हम क्या जानते हैं?
ऑपइंडिया की पड़ताल से पटना के चर्चित कोचिंग फायरिंग में कुछ बातें स्पष्ट हैं। ये हैं;
2 जून की रात खान ग्लोबल स्टडीज और ज्ञान बिंदु कोचिंग के लोगों के बीच विवाद हुआ था।
ज्ञान बिंदु के लोगों की तरफ से फायरिंग का अब तक कोई तथ्य सामने नहीं आया है।
खान सर ने झूठ बोला था कि उन्होंने खुद आठ से दस राउंड फायरिंग होते देखा है।
फायरिंग करने वाले खान सर के ही गार्ड थे। दोनों ने दो-दो राउंड फायरिंग की। उन्होंने फायरिंग खान सर के आदेश पर की।
खान ग्लोबल स्टडीज के मैनेजर की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने ज्ञान बिंदु के संचालक रौशन आनंद को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन खान सर के गार्ड की गिरफ्तारी मामले के तूल पकड़ने और जाँच आगे बढ़ने के बाद हुई। फायरिंग का आदेश देने वाले खान सर अग्रिम जमानत पाने में कामयाब रहे।
ऑपइंडिया की बात
हमारी मंशा बिहार पुलिस या कोर्ट की भूमिका पर संदेह करना नहीं है। लेकिन इस मामले की निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करना व्यवस्था का ही काम है। रौशन आनंद जेल में खुद को धमकी दिए जाने और अपने भाई की मौत को संदिग्ध बता रहे हैं तो उनकी समुचित सुनवाई भी इसी व्यवस्था का काम है। खान सर के मीडिया में दिए गए बयान और उनके मैनेजर की शिकायत पर फौरन कार्रवाई करते हुए रौशन आनंद को गिरफ्तार करने वाली पुलिस ‘सीनियर से बात करिए’ कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में मुस्लिम लड़की से प्रेम करने वाले शिवशंकर शुक्ला ने कथित तौर पर फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। 26 वर्षीय संविदा बिजली लाइनमैन शिवशंकर का शव राजापुर थाना क्षेत्र के भटरी गाँव के नंदू पुरवा के बाहर एक पेड़ से फंदे पर लटका मिला। परिवार का आरोप है कि यह सिर्फ आत्महत्या नहीं बल्कि लगातार धमकियों, मानसिक प्रताड़ना और एक दरोगा अजहर जमाल के दबाव का नतीजा है। घटना के बाद अजहर जमाल को लाइन हाजिर किया गया है।
मृतक के मोबाइल में कथित तौर पर दरोगा की धमकी भरी कॉल रिकॉर्डिंग मिली है जबकि एक सुसाइड नोट और डायरी में लिखे नंबर भी पुलिस को सौंपे गए हैं। दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि पूरे मामले की जाँच की जा रही है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।
’10 साल जेल में सड़ोगे…’: दरोगा अजहर पर धमकाने और पैसे मांँगने का आरोप
मृतक के पिता राजेश कुमार शुक्ला के अनुसार, सरधुआ बिजली उपकेंद्र में संविदा पर लाइनमैन के रूप में काम करने वाले शिवशंकर शुक्रवार (17 जुलाई 2026) रात ड्यूटी से लौटे थे। कुछ देर बाद वह घर से निकले लेकिन वापस नहीं आए। अगले दिन सुबह उनका शव गाँव के बाहर पेड़ से लटका मिला।
परिजनों का आरोप है कि सरधुवा थाने में तैनात उपनिरीक्षक (दरोगा) अजहर जमाल ने शिवशंकर को फोन पर गालियाँ दीं, जेल भेजने की धमकी दी और कहा, “तुम्हारे दिन पूरे हो गए हैं, अब जेल जाने की तैयारी कर लो, 10 साल जेल में ही सड़ोगे।” परिवार का दावा है कि यह बातचीत शिवशंकर के मोबाइल में रिकॉर्ड है और यही ऑडियो वायरल भी हो रहा है। हालाँकि, वायरल ऑडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
पिता का आरोप है कि कुछ महीने पहले भी इसी दरोगा ने शिवशंकर को थाने बुलाकर धमकाया था। उन्होंने आरोप लगाया कि दरोगा ने समझौते और बचाने के नाम पर पहले 2 लाख रुपए लिए थे और बाद में 3 लाख रुपए की और माँग कर रहा था। परिवार का कहना है कि लगातार मिल रही धमकियों और मानसिक दबाव ने शिवशंकर को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। वहीं, उन्होंने यह आशंका भी जताई है कि बेटे की हत्या कर शव को पेड़ से लटकाया गया हो सकता है।
मृतक के भाई ने कहा, “दरोगा अजहर जमाल बोला था कि मैं तुम्हें उठवा लूँगा। पिछले साल इसने 2 लाख रुपए ले लिए थे और 3 लाख रुपए और माँग रहा था, धमकी दे रहा था।”
#चित्रकूट: राजापुर थाना क्षेत्र के महुवा गांव के सुरजवापुरवा में एक लाइनमैन का शव संदिग्ध परिस्थितियों में पेड़ से फंदे पर लटका मिलने से सनसनी फैल गई। सूचना पर पहुंची @chitrakootpol ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और मामले की जांच शुरू कर दी है। स्थानीय स्तर… pic.twitter.com/dnZIPyninP
— UttarPradesh.ORG News (@WeUttarPradesh) July 18, 2026
8 महीने पुराना प्रेम प्रसंग, मुस्लिम युवती से रिश्ते के बाद शुरू हुआ विवाद
परिजनों के मुताबिक, करीब आठ महीने पहले शिवशंकर का अर्की गाँव की एक मुस्लिम युवती से प्रेम संबंध था। दोनों एक बार घर से चले भी गए थे। उस समय युवती पक्ष ने गुमशुदगी दर्ज कराई थी। बाद में पुलिस दोनों को बरामद कर लाई और दोनों पक्षों के बीच समझौता कराया गया।
परिवार का आरोप है कि समझौते के बाद भी युवती लगातार शिवशंकर को फोन करती रही। जब शिवशंकर ने इसकी शिकायत युवती के अब्बू से की तो उन्होंने कथित तौर पर सरधुवा थाने में तैनात अपने सजातीय दरोगा अजहर जमाल से संपर्क किया। इसके बाद शिवशंकर को लगातार धमकी भरे फोन आने लगे।
हालाँकि, इस मामले में चित्रकूट के एसपी अरुण कुमार सिंह का पक्ष अलग है। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि युवती को वापस लाकर उसके परिजनों को सौंप दिया गया था और युवती के अब्बू ने सामाजिक मान-मर्यादा का हवाला देते हुए कोई कानूनी कार्रवाई नहीं कराई थी। एसपी के अनुसार, बाद में शिवशंकर अलग-अलग नंबरों से युवती के पिता को फोन कर धमका रहा था। इसकी शिकायत मिलने पर दरोगा ने फोन पर उसे कड़े शब्दों में डाँटा था। वायरल ऑडियो की भी जाँच कराई जा रही है।
(नोट: वायरल ऑडियो में अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया है)
सुसाइड नोट, डायरी और 15 नंबरों की सूची: परिवार बोला- इन्हीं लोगों ने बनाया निशाना
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शिवशंकर ने मरने से पहले एक सुसाइड नोट लिखा था। उसमें उसने लिखा है, “मैंने लड़की के पिता को फोन लगाया था कि तुम्हारी बेटी मुझे फोन कर परेशान करती है, उसकी रिकॉर्डिंग सुन लो। तुम्हारी बेटी मुझे कसम देकर गाँव बुला रही है, अगर मैं आता हूँ और कोई समस्या होती है तो इसके जिम्मेदार तुम और तुम्हारी बेटी होगे।”
पिता के मुताबिक, बेटे की डायरी में 15 ऐसे मोबाइल नंबर लिखे मिले हैं, जिनसे उसे लगातार धमकी भरे फोन आते थे। डायरी में युवती और उसके अब्बू का नंबर भी दर्ज है। परिवार ने यह डायरी और अन्य दस्तावेज पुलिस को सौंप दिए हैं।
अजहर जमाल लाइन हाजिर: पुलिस ने क्या कहा?
चित्रकूट पुलिस ने X पर एक विषय में विस्तृत बयान जारी किया है। चित्रकूट पुलिस ने कहा, “इससे पहले मृतक शिवशंकर शुक्ला के विरूद्ध नाबालिक लड़की के पिता के द्वारा 28 अक्टूबर 2025 को स्वयं उपस्थित आकर के कही चले जाने को लेकर प्रार्थना पत्र देकर केस दर्ज कराया था। जिसकी विवेचना स्थानीय थाने के SI अजहर जमाल ने की थी।”
पुलिस ने आगे कहा, “विवेचना के दौरान वादी ने मृतक शिवशंकर शुक्ला का नाम बताया लेकिन साक्ष्य के अभाव में पीड़िता द्वारा दिनाँक 5 नवंबर 2025 को उपस्थित आकर अपना लिखित बयान दिया जिसमें अपने माता पिता से नाराज होकर अपने मौसी के घर जाने की बात कही। बाद में लड़की के नाबालिक होने की स्थिति में पारिवारिक जनों को सुपर्द किया गया। 07 नवंबर 2025 को मुकदमा समाप्त किया गया।”
चित्रकूट पुलिस ने कहा, “फिर से मृतक के पिता के मोबाइल पर फोन कर लड़की से सम्पर्क करने तथा धमकाने का प्रयास किया जिसकी क्षेत्रीय उ0नि0 द्वारा जरिए दूरभाष मृतक को समझाया गया और आगाह किया गया कि न मानने पर जेल जाने की बात कही गयी। मृतक का आचरण सही न होने की वजह से ही बार बार उसका स्थानान्तरण सम्बन्धित विभाग द्वारा किया जा रहा था। ऐसा प्रतीत होता है कि मृतक द्वारा लड़की के प्रेम में पड़कर ही आत्महत्या किया गया है। अजहर जमाल को तत्काल प्रभाव से लाइन हाजिर किया गया व सम्पूर्ण प्रकरण की जाँच क्षेत्राधिकारी राजापुर को दी गई है।”
करीब चार दशकों तक पूर्वी उत्तर प्रदेश एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES) और जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के लगातार खतरे में जीता रहा। हर साल, खासकर मानसून के मौसम में, गोरखपुर, कुशीनगर, महाराजगंज, देवरिया और आसपास के जिलों में इस बीमारी के नए मामले सामने आते थे।
अस्पताल मरीजों से भर जाते थे, माता-पिता अपने बच्चों की जान बचाने की उम्मीद में इमरजेंसी वार्ड के बाहर इंतजार करते रहते थे और डॉक्टर बड़ी संख्या में मरीजों का इलाज करने के लिए लगातार संघर्ष करते थे। गोरखपुर का बाबा राघव दास (BRD) मेडिकल कॉलेज इस संकट का सबसे बड़ा केंद्र बन गया था।
हर साल बीमारी के चरम मौसम में इंसेफ्लाइटिस से पीड़ित सैकड़ों बच्चों को यहाँ भर्ती कराया जाता था और लंबे समय तक यह बीमारी हर वर्ष सैकड़ों मासूमों की जान लेती रही। हालात इतने गंभीर हो चुके थे कि इंसेफ्लाइटिस को सिर्फ मौसमी बीमारी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक माना जाने लगा था।
2017 में जब योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली, तब उनके सामने कई दशकों से बनी इस गंभीर बीमारी पर नियंत्रण पाने की बड़ी चुनौती थी।
सिर्फ बीमारी से नहीं, इंसेफ्लाइटिस के हर कारण से लड़ने के लिए सरकार ने पूरे राज्य में खड़ी की व्यवस्था
योगी सरकार ने यह तय किया कि इंसेफ्लाइटिस जैसी बीमारी को सिर्फ अस्पतालों के भरोसे नहीं हराया जा सकता। इसलिए सरकार ने केवल मरीजों के बीमार होने के बाद उनका इलाज करने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि बीमारी के फैलने से पहले ही उसे रोकने के उद्देश्य से एक व्यापक रणनीति अपनाई।
सरकार बनने के कुछ ही समय बाद एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES) की रोकथाम और उपचार के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए। इसके तहत कई विभागों को शामिल करते हुए एक समन्वित कार्ययोजना तैयार की गई। स्वास्थ्य विभाग को इंसेफ्लाइटिस से प्रभावित 38 जिलों के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया, जबकि चिकित्सा शिक्षा, शहरी विकास, ग्रामीण विकास, पंचायती राज, महिला एवं बाल कल्याण, पशुपालन और बेसिक शिक्षा सहित कई विभागों ने एक साझा ढाँचे के तहत मिलकर काम किया।
यह राज्य की कार्यप्रणाली में एक बड़ा बदलाव था। टीकाकरण, स्वच्छता, जागरूकता, निगरानी, उपचार सुविधाएँ और बुनियादी ढाँचे के विकास को अलग-अलग प्रयासों के बजाय समाधान के समान रूप से महत्वपूर्ण हिस्सों के तौर पर देखा गया।
घर-घर टीकाकरण और जागरूकता अभियान से सुनिश्चित की गई लाखों बच्चों की सुरक्षा
सरकार की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार टीकाकरण और जनजागरूकता के जरिए बीमारी की रोकथाम था। फरवरी 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार ने दस्तक अभियान शुरू किया, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के खतरे वाले क्षेत्रों में कोई भी बच्चा टीकाकरण से वंचित न रहे।
परिवारों के स्वास्थ्य केंद्रों तक आने का इंतजार करने के बजाय आशा कार्यकर्ता, शिक्षक और स्वास्थ्यकर्मी प्रभावित जिलों के गाँवों और घर-घर तक पहुँचे।
उन्होंने लोगों को बताया कि इंसेफ्लाइटिस कैसे फैलता है, शुरुआती लक्षण वाले बच्चों की पहचान की और माता-पिता को समझाया कि चेतावनी के संकेत दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लें। स्कूलों को जागरूकता कार्यक्रमों का केंद्र बनाया गया, जबकि जोखिम वाले मौसम के दौरान गाँवों में लगातार जनजागरूकता अभियान चलाए गए।
सरकार का मानना है कि टीकाकरण और जागरूकता को सीधे लोगों के घरों तक पहुँचाने से बीमारी की शुरुआती पहचान बेहतर हुई और गंभीर संक्रमण के मामलों में कमी आई।
स्वच्छता को भी बनाया गया बीमारी की रोकथाम का मजबूत माध्यम
प्रशासन ने यह समझा कि प्रभावित जिलों में रहने की परिस्थितियों में सुधार किए बिना इंसेफ्लाइटिस पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी उपायों के साथ-साथ सरकार ने इस अभियान को स्वच्छ भारत मिशन से जोड़ा और गाँवों में स्वच्छता तथा साफ-सफाई को बढ़ावा दिया।
जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए लोगों को सुरक्षित पेयजल का उपयोग करने, आसपास का वातावरण साफ रखने और मच्छरों के पनपने की जगहों को खत्म करने के लिए प्रेरित किया गया। लोगों को सलाह दी गई कि बच्चों को सीधे मिट्टी के फर्श पर न सुलाएँ, जहाँ उपलब्ध हों वहाँ सुरक्षित पेयजल के लिए इंडिया मार्क-II हैंडपंप का इस्तेमाल करें।
संवेदनशील क्षेत्रों में सूअर रखने की जगहों को रिहायशी इलाकों से दूर रखें। जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के प्रसार को रोकने के लिए फॉगिंग और मच्छर नियंत्रण के उपायों को भी तेज किया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कई बार कह चुके हैं कि राज्य में इंसेफ्लाइटिस से होने वाली मौतों में कमी लाने में बेहतर स्वच्छता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
बेहतर अस्पतालों से इलाज और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को किया गया मजबूत
समुदाय स्तर पर बीमारी की रोकथाम के उपाय जारी रहने के साथ-साथ सरकार ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में इलाज की सुविधाओं को भी मजबूत किया। ग्रामीण क्षेत्रों में 15 ब्लॉक स्तरीय इंसेफ्लाइटिस उपचार केंद्र और मिनी पीडियाट्रिक केयर सेंटर स्थापित किए गए, ताकि मरीजों को लंबी दूरी तय किए बिना समय पर इलाज मिल सके।
आपातकालीन स्थिति से बेहतर ढंग से निपटने के लिए ब्लॉक स्तर के अस्पतालों में कम से कम तीन-तीन वेंटिलेटर उपलब्ध कराए गए। इंसेफ्लाइटिस की रोकथाम, शुरुआती लक्षणों की पहचान और इलाज की प्रक्रिया को लेकर 3.5 लाख से अधिक अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया।
इन सुधारों से बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज जैसे बड़े अस्पतालों पर मरीजों का दबाव कम करने में मदद मिली और गंभीर रूप से बीमार मरीजों को पहले से अधिक तेजी से चिकित्सा सुविधा मिलनी शुरू हुई।
समन्वित सरकारी कार्रवाई के बाद इंसेफ्लाइटिस के मामले और मौतों में आई बड़ी कमी
टीकाकरण, स्वच्छता, जनजागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार जैसे कदमों का असर कुछ ही वर्षों में दिखाई देने लगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अनुसार, समन्वित अभियान शुरू होने के बाद उत्तर प्रदेश में इंसेफ्लाइटिस के मामलों में करीब 75 प्रतिशत और इससे होने वाली मौतों में लगभग 85 प्रतिशत की कमी आई।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर गोरखपुर में देखने को मिला, जिसे कभी इंसेफ्लाइटिस का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था। मुख्यमंत्री ने कहा है कि वर्ष 1977 से 2017 के बीच गोरखपुर में हर साल औसतन करीब 600 बच्चों की मौत एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) के कारण होती थी।
हालाँकि हाल के वर्षों में मौतों की संख्या में भारी गिरावट आई है, जो बीमारी पर नियंत्रण में हुए बड़े सुधार का संकेत है।
अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज, जहाँ हर साल अगस्त महीने में आमतौर पर 500 से 600 इंसेफ्लाइटिस मरीज भर्ती होते थे, वहाँ प्रभावित जिलों में रोकथाम के उपायों के विस्तार के बाद भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में काफी कमी आई।
जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के मामले, जो कभी सैकड़ों की संख्या में दर्ज होते थे, अब पहले की तुलना में बहुत कम रह गए हैं।
सरकारी आँकड़ों में भी दिखी जापानी इंसेफ्लाइटिस के मामलों में लगातार गिरावट
सरकारी आँकड़े भी जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के मामलों में लगातार आई गिरावट को दर्शाते हैं।
वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में जापानी इंसेफ्लाइटिस के 693 मामले और 93 मौतें दर्ज की गई थीं। इसके बाद हर साल स्थिति में लगातार सुधार देखने को मिला। वर्ष 2018 में 323 मामले और 25 मौतें दर्ज हुईं। इसके बाद 2019 में मामले घटकर 235 रह गए।
वर्ष 2020 में 100 मामले, 2021 में 153, 2022 में 124 और जनवरी से जुलाई 2023 के बीच केवल 17 मामले सामने आए, जबकि इस अवधि में एक भी मौत दर्ज नहीं हुई।
राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र (National Centre for Vector-Borne Disease Control) के अनुसार, इस दौरान जापानी इंसेफ्लाइटिस के मामलों में 80 प्रतिशत से अधिक और मौतों में 95 प्रतिशत से ज्यादा की कमी दर्ज की गई।
9 सितंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की थी कि 1 जनवरी से 7 सितंबर के बीच उत्तर प्रदेश में जापानी इंसेफ्लाइटिस, चिकनगुनिया और मलेरिया से एक भी मौत दर्ज नहीं हुई। उन्होंने इसे 2017 के बाद शुरू किए गए लगातार प्रयासों का परिणाम बताया और कहा कि सरकार का अगला लक्ष्य इस बीमारी का पूरी तरह उन्मूलन करना है।
सैकड़ों मौतों वाले दौर से निकलकर राज्य वर्ष 2024 से इंसेफ्लाइटिस से शून्य मौतों की स्थिति दर्ज कर रहा है। वहीं वर्ष 2026 में अब तक इंसेफ्लाइटिस के केवल 3 मामले सामने आए हैं और सभी मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज किया गया है।
उत्तर प्रदेश के इंसेफ्लाइटिस नियंत्रण मॉडल को यूनिसेफ से मिली अंतरराष्ट्रीय सराहना
उत्तर प्रदेश के प्रयासों की सराहना संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) ने भी की। यूनिसेफ ने दस्तक अभियान के तहत जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) और एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES) के खिलाफ उत्तर प्रदेश के बड़े स्तर पर चलाए गए टीकाकरण अभियान की प्रशंसा की।
संगठन ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि सरकार ने केवल अस्पतालों में इलाज पर निर्भर रहने के बजाय टीकाकरण, स्वच्छता, जनजागरूकता और समुदाय की सक्रिय भागीदारी को एक साथ जोड़कर काम किया।
यूनिसेफ ने स्वास्थ्यकर्मियों, शिक्षकों और आशा कार्यकर्ताओं की भी सराहना की, जिन्होंने प्रभावित जिलों के दूर-दराज के गाँवों तक जागरूकता और टीकाकरण अभियान पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस अंतरराष्ट्रीय सराहना ने उत्तर प्रदेश की उस छवि को और मजबूत किया है, जिसने कई पीढ़ियों से क्षेत्र को परेशान कर रही इस बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण हासिल करने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की।
क्या है जापानी इंसेफ्लाइटिस और कैसे फैलती है यह बीमारी?
जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) एक वायरल बीमारी है, जो संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलती है। यह वायरस प्राकृतिक रूप से सूअरों और कुछ प्रजातियों के पक्षियों में पाया जाता है। मच्छर इन संक्रमित जानवरों से वायरस लेकर इंसानों तक पहुँचाते हैं। यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सीधे नहीं फैलती।
यह वायरस मस्तिष्क पर हमला करता है और तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी, दौरे पड़ना, भ्रम की स्थिति और बेहोशी जैसे लक्षण पैदा कर सकता है। गंभीर मामलों में यह स्थायी रूप से तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुँचा सकता है या मरीज की मौत भी हो सकती है।
बच्चों में इस बीमारी का खतरा सबसे अधिक होता है, इसलिए उनके लिए समय पर टीकाकरण और शुरुआती इलाज बेहद जरूरी माना जाता है।
जापानी इंसेफ्लाइटिस का कोई विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है। इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ टीकाकरण, मच्छर नियंत्रण, स्वच्छता, समय पर बीमारी की पहचान और सहायक उपचार को इससे होने वाली मौतों को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका मानते हैं।
दीर्घकालिक योजना से मिली सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र की बड़ी सफलता
UP में इंसेफ्लाइटिस के खिलाफ लड़ाई यह दिखाती है कि लंबे समय से चली आ रही किसी स्वास्थ्य चुनौती से समन्वित प्रयासों के जरिए प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है।
टीकाकरण, घर-घर जागरूकता अभियान, स्वच्छता, बेहतर अस्पताल, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और कई विभागों के बीच तालमेल को एक साथ जोड़कर राज्य ने इस बीमारी से कई स्तरों पर मुकाबला किया। कई दशकों तक इंसेफ्लाइटिस पूर्वी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य आपदाओं में से एक रहा।
हर मानसून में हजारों परिवार अपने बच्चों को खोते थे और अस्पतालों पर मरीजों का भारी दबाव रहता था। पिछले कुछ वर्षों में मामलों और मौतों में आई लगातार गिरावट ने उत्तर प्रदेश के इस मॉडल को इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण बना दिया है कि लंबे समय तक लगातार किए गए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयास किसी महामारी जैसी चुनौती की दिशा बदल सकते हैं।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)