Home Blog Page 11

पाकिस्तानी ने एडिट किया ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का Wikipedia पेज? PAK-बांग्लादेशी फॉलोअर्स के आरोपों के बीच ‘साउथ एशियन’ लेखक पर भी सवाल

कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा नोएडा में औद्योगिक मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के हिंसक होने पर भारत में ‘हलचल’ शुरू होने की बात कहकर खुशी जताने के कुछ हफ्तों बाद, BJP विरोधी राजनीतिक दलों को अब नेपाल या बांग्लादेश जैसी Gen-Z ‘क्रांति’ भड़काने की एक नई उम्मीद मिल गई है।

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम की इस तथाकथित ‘क्रांति’ ने सोशल मीडिया पर अचानक तेजी से लोकप्रियता हासिल की है। हालाँकि, सामने आया है कि इंस्टाग्राम से लेकर विकिपीडिया तक, CJP के कई ‘तिलचट्टे’ यानी समर्थकों में पाकिस्तानी और बांग्लादेशी लोगों और बॉट्स की भी बड़ी मौजूदगी है।

16 मई 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अदालत में बेरोजगार युवाओं, वकीलों, पत्रकारों और RTI एक्टिविस्ट्स पर की गई टिप्पणी के जवाब में व्यंग्य (सटायर) के तौर पर बनाई गई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का अब अपना विकिपीडिया पेज भी बन चुका है।

हालाँकि, CJP के अंग्रेजी विकिपीडिया पेज को एडिट करने वालों में एक कथित पाकिस्तानी व्यक्ति का नाम सामने आया है। इस पेज को काफी हद तक सलीम बिन यूसुफ नाम के एक यूजर ने एडिट किया जिसने अपने विकिपीडिया लेखक प्रोफाइल में खुद को ‘कश्मीर, दक्षिण एशिया’ का निवासी बताया है।

यह बात पहले भी सामने आती रही है कि कई पाकिस्तानी लोग अपनी पहचान छिपाने के लिए ‘साउथ एशिया’ का इस्तेमाल करते हैं। ऐसा या तो अपनी राष्ट्रीयता छिपाने के लिए किया जाता है या फिर भारतीय बनकर भारत के सामाजिक और राजनीतिक मामलों में दखल देने के लिए। नोएडा हिंसा के दौरान भी यह देखा गया था कि कई पाकिस्तानी X (पूर्व ट्विटर) यूजर्स ने हिंदू नामों वाले अकाउंट बनाकर और लोकेशन में ‘दक्षिण एशिया’ लिखकर खुद को भारतीय दिखाने की कोशिश की थी ताकि भारत में माहौल बिगाड़ा जा सके।

भारतीय बनकर सोशल मीडिया पर सक्रिय होने, मुद्दों को हवा देने, समाज में मौजूद मतभेदों का फायदा उठाने, लोगों की राय प्रभावित करने और हिंसा भड़काने की ऐसी घटनाओं को देखते हुए यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि सलीम बिन यूसुफ पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) का निवासी हो सकता है।

हालाँकि, यह संभावना भी जताई जा रही है कि यूसुफ कश्मीर का रहने वाला हो और अलगाववादी विचारधारा का समर्थक हो।

फिलहाल, यूसुफ को आंशिक रूप से ब्लॉक कर दिया गया है और अब उसका नाम ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के विकिपीडिया ‘रिवीजन हिस्ट्री’ में दिखाई नहीं देता। CJP के टॉक पेज के अनुसार, 21 मई को सलीम बिन यूसुफ और अन्य एडिटर्स के बीच CJP के लोगो को बार-बार बदले जाने को लेकर चर्चा भी हुई थी।

इससे पहले भी सलीम बिन यूसुफ द्वारा बनाए गए कई पेज और किए गए कई एडिट्स को हटाने (डिलीट) के लिए नॉमिनेट किया जा चुका है। इनमें कई कश्मीरियों से जुड़े पेज और एडिट्स शामिल हैं। इसके अलावा, गवर्नमेंट डेंटल कॉलेज श्रीनगर, श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल और पाकिस्तान की कई चर्चित हस्तियों से जुड़े पेज भी इसमें शामिल रहे हैं।

CJP और इसके पाकिस्तानी, बांग्लादेशी व तुर्की के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स?

CJP को BJP विरोधी राजनीतिक दलों का तेजी से समर्थन मिल रहा है। इनमें कई पूर्व मुख्यमंत्री, मौजूदा सांसद जैसे महुआ मोइत्रा और BJP विरोधी राजनीति करने वाले चेहरे शामिल हैं। ऐसे दलों द्वारा खुद को ‘एंटी-एस्टैब्लिशमेंट’ बताने वाले किसी तथाकथित आंदोलन का समर्थन करना कोई नई बात नहीं है। लेकिन मामला तब गंभीर हो जाता है, जब भारत के विरोधी पड़ोसी देशों की कथित भूमिका और समर्थन के आरोप सामने आने लगें।

सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने स्क्रीनशॉट और रिकॉर्डिंग साझा कर दावा किया है कि कॉकरोच जनता पार्टी के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स की संख्या में आई अचानक भारी बढ़ोतरी पूरी तरह ‘ऑर्गेनिक’ नहीं है। हालाँकि, CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि उनके 94% फॉलोअर्स भारत से हैं।

इसके बावजूद, कई लोगों का दावा है कि CJP के करीब 2 करोड़ (20 मिलियन) फॉलोअर्स में पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और तुर्की अकाउंट्स की संख्या भी काफी ज्यादा है।

CJI सूर्यकांत की टिप्पणी पर सटायर से शुरू हुई CJP, बनी BJP विरोधी प्रयोगशाला?

CJP का इंस्टाग्राम हैंडल तेजी से लोकप्रिय हुआ और X (पूर्व ट्विटर) पर भी चर्चा का विषय बन गया। लेकिन जल्द ही उसका ‘निष्पक्ष’ होने का दावा कमजोर पड़ता दिखा जब कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके का बीजेपी विरोधी एजेंडा सामने आने लगा।

कई लोगों के मन में सवाल उठा कि एक ऐसा मंच जो CJI सूर्यकांत जैसे गैर-राजनीतिक व्यक्ति की टिप्पणी पर व्यंग्य के रूप में शुरू हुआ तो वह अचानक बीजेपी के साथ इंस्टाग्राम फॉलोअर्स की होड़ का दावा करने और फिर पूरी तरह बीजेपी विरोधी राजनीतिक मंच में कैसे बदल गया?

इस सवाल का जवाब CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके की राजनीतिक पृष्ठभूमि में मिलता है। दिपके फिलहाल अमेरिका में रहते हैं और बॉस्टन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे हैं। खुद को गैर-राजनीतिक और नाराज Gen-Z युवा के रूप में पेश करने की कोशिश के बावजूद यह किसी ने छिप ना सका कि उनका संबंध आम आदमी पार्टी (AAP) के चुनावी और सोशल मीडिया अभियानों से जुड़ा रहा है।

2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान एक मीडिया रिपोर्ट में उन्हें पुणे के 23 वर्षीय ऐसे युवक के रूप में बताया गया था जो AAP के सोशल मीडिया बदलाव के पीछे का चेहरा था। रिपोर्ट में कहा गया था कि AAP, अरविंद केजरीवाल को प्रमोट करने और BJP-कॉन्ग्रेस पर हमला करने के लिए बढ़िया वन-लाइनर, पैरोडी वीडियो, छोटे क्लिप और मीम्स का इस्तेमाल कर रही थी।

अभिजीत दिपके ने उस दौरान कहा था कि मिलेनियल्स और पहली बार वोट देने वालों तक राजनीतिक संदेश पहुँचाने के लिए मीम्स और वीडियो के जरिए बात को सरल बनाना जरूरी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि वह AAP के IT मीडिया प्रमुख अंकित लाल को रिपोर्ट करते थे।

कुछ विश्लेषणों में दावा किया गया है कि हास्य और व्यंग्य के पीछे CJP विपक्षी राजनीतिक नैरेटिव को आगे बढ़ाता है, जिसमें न्यायपालिका, चुनाव आयोग, कॉर्पोरेट जगत, मीडिया और दल बदलने वाले नेताओं को निशाना बनाया जाता है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान के कॉन्ग्रेस और अन्य बीजेपी विरोधी दलों के प्रति सहानुभूति दिखाने की चर्चाएँ भी होती रही हैं।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

जिस जगह श्रीकृष्ण ने पढ़ाया सद्भाव का पाठ, उस मथुरा में क्यों फैलाया जा रहा जातीय भेदभाव: कौन हैं नरहौली में समाज को बाँटने वाले ‘कंस’, फैला रहे प्रोपेगेंडा

मथुरा जिले के नरहौली गाँव में 21 मई 2026 की रात एक शादी होनी थी। लेकिन शादी के बजाय माहौल को इस कदर अराजक बना दिया गया कि समाज दो फाड़ हो गया। ये घटना गुस्से में नहीं बल्कि जानबूझकर और सुनियोजित तरीके से अंजाम दी गई। उद्देश्य था- क्षेत्र के दो समुदायों को आपस में भिड़ाकर हिंदुओं में मनमुटाव पैदा करना।

बरसाना के भरना कलां गाँव के रहने वाले नेमचंद के दो बेटे अशोक और कुलदीप अपनी बारात लेकर नरहौली पहुँचे थे। यहाँ भगवान दास उर्फ बुल्ला की दो बेटियाँ लक्ष्मी और पूनम उनसे विवाह करने वाली थीं। दोनों दलित (जाटव) परिवार थे। लेकिन जैसे ही बारात ठाकुर बाहुल्य इलाके से गुजरी, कुछ अराजक तत्वों ने उन्हें रोकने की कोशिश की।

मामला यहाँ रुका नहीं बल्कि पत्थरबाजी शुरू हो गई, मारपीट हुई, महिलाओं और बच्चों पर हमला हुआ। आरोप है कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर तक तोड़ दी गई। 70 वर्षीय एक महिला घायल हुई।

पुलिस पहुँची तो दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। एसडीएम, इंस्पेक्टर और चौकी इंचार्ज तक चोटिल हुए। महिलाओं ने लाठियाँ लेकर पुलिस पर धावा बोल दिया। शादी की जगह पूरा गाँव रणभूमि में बदल गया।

19 घंटे तक शादी रुकी रही। भारी पुलिस बल, सीआरपीएफ और पीएसी की तैनाती के बाद 22 मई शाम को सात फेरे पूरे कराए गए। बाराती भूखे-प्यासे लौटे, खाना बर्बाद हो गया। पूरा गाँव दहशत और तनाव में डूबा रहा।

एसएसपी श्लोक कुमार ने क्राइम ब्रांच ने जाँच के आदेश दिए। दोनों पक्षों से सैकड़ों लोगों पर एफआईआर दर्ज हुईं। यह घटना मथुरा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जातीय सद्भाव को चोट पहुँचाने के लिए काफी थी।

हालाँकि इससे ज्यादा यह बताती है कि कुछ बाहरी ताकतें छोटी-छोटी घटनाओं को जातीय रंग देकर समाज को किस कदर बाँटने पर तुले हैं।

हमेशा से ही जातीय संवेदनशीलता का केंद्र रहा मथुरा

मथुरा और ब्रज क्षेत्र केवल भगवान कृष्ण की लीला भूमि नहीं है। यह लंबे समय से जातीय तनावों का गढ़ रहा है। छोटी-छोटी बातें जैसे घोड़े पर चढ़ना, डीजे बजाना, रास्ता या संगीत बड़े संघर्ष में बदल जाती हैं।

2016 में चामुहा गांव में पानी के बँटवारे को लेकर दलित और ठाकुर समुदाय में हिंसक झड़प हुई थी। दो लोग घायल हुए। 2025 में होली के मौके पर जाटव और ठाकुरों के बीच रंग फेंकने को लेकर बवाल हुआ। 74 लोगों पर मुकदमा दर्ज हुआ, पत्थर चले, लाठियाँ चलीं और आगजनी की घटनाएँ हुईं।

फरवरी 2025 में मथुरा के भुरेका गाँव में एक दलित दूल्हे को बग्गी पर चढ़ने पर हमला किया गया। 25-30 ठाकुर/जाट युवकों ने बारात रोकी, दूल्हे को घसीटा, जातिसूचक गालियाँ दीं और डीजे तोड़ दिया।

इसी साल करनावल गाँव में दो दलित बहनों की शादी ट्रैफिक विवाद में फँस गई। यदव समुदाय के लोगों ने बारातियों पर हमला किया, दुल्हनों को घसीटा और शादी रद्द कर दी गई। भीम आर्मी पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद ने इसे ‘दलितों पर योजनाबद्ध आतंक’ बताया।

2017 का सहारनपुर कांड तो पूरे देश में चर्चित रहा। महाराणा प्रताप शोभा यात्रा के दौरान ठाकुरों और दलितों में टकराव हुआ। 25 दलितों के घर जलाए गए। ऐसी घटनाएँ मथुरा, सहारनपुर, आगरा, अलीगढ़ में बार-बार दोहराई जाती हैं।

2025 में आगरा में एक दलित दूल्हे को घोड़े से उतारकर पीटा गया। अलवर और दमोह में भी इसी तरह की घटनाएं हुईं जहां दूल्हे को घोड़े पर चढ़ने का अधिकार छीना गया।

ये उदाहरण साफ दिखाते हैं कि मथुरा में जातीय संवेदनशीलता नई नहीं। लेकिन हर बार छोटी घटना को बड़ा चेहरा देकर कुछ तत्व राजनीतिक फायदा उठाते हैं।

इतिहास सिखाता है कि ऐसे संघर्ष किसी की जीत नहीं लाते। वे पूरे गांव को आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से कमजोर करते हैं। पर्यटन, कृषि और रोजगार पर असर पड़ता है।

नरहौली घटना में साजिश की परतें

नरहौली गाँव की इस घटना में विदाई में दुल्हनें रो पड़ीं। उनका ये कहते हुए वीडियो वायरल हुआ कि ‘किसी की शादी में ऐसा न हो।’ दलित पक्ष ने आरोप लगाया कि ठाकुरों ने पहले पत्थर मारे, महिलाओं पर हमला किया, घरों में घुसकर सामान तोड़ा और बाबा साहेब की तस्वीर ईंटों से कुचल दी।

सोशल मीडिया पर दोनों पक्षों के एक-दूसरे पर आरोप लगाने के वीडियो सामने आए। कुछ संगठनों ने इसे ‘ठाकुर आतंक’ बताया। लेकिन सच्चाई यह है कि यह छोटा विवाद था, जिसे जातीय रंग देकर बड़ा बनाया गया।

पुलिस ने दोनों पक्षों पर सैकड़ों एफआईआर दर्ज कीं। सीसीटीवी फुटेज से दोषी पहचाने जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है-कौन सी ताकतें इस छोटी घटना को पूरे समाज में अविश्वास फैलाने का हथियार बना रही हैं?

समाज में अविश्वास के बीज और विभाजन की साजिश

नरहौली की घटना बताती है कि कुछ अराजक तत्व जानबूझकर छोटी बात को जातीय युद्ध में बदलना चाहते हैं। वीडियो वायरल करना, आरोप-प्रत्यारोप, बाहरी संगठनों का हस्तक्षेप-ये सद्भाव तोड़ते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ लोग रोज खेती-मजदूरी में साथ काम करते हैं, वहाँ ऐसे बवाल से पूरा गाँव प्रभावित होता है। पानी का बँटवारा, रास्ते, स्कूल, अस्पताल-सब साझे मुद्दे हैं। लेकिन अविश्वास बढ़ने से विकास रुक जाता है। इसके अलावा युवा पीढ़ी नफरत सीखती है। मथुरा जैसे पर्यटन और कृषि वाले क्षेत्र में यह घातक है।

गाँव की जिंदगी में दलित, क्षत्रिय, पिछड़े सभी एक-दूसरे पर निर्भर हैं। किसान मजदूरों की मदद लेते हैं। मजदूर किसानों के खेतों पर काम करते हैं। शादी-ब्याह में एक-दूसरे की मदद चाहिए। फसल कटाई, त्योहार, आपदा समेत हर सुख-दुःख में सहयोग जरूरी है।

अब बात आती है कि नरहौली जैसे गाँव में अगर बदला बढ़ा तो खेती कैसे चलेगी? मजदूरी कौन करेगा? बच्चे स्कूल कैसे जाएँगे? जिम्मेदार लोग-पंच, सरपंच, बुजुर्ग, दोनों समुदायों के प्रतिनिधि-बैठकर बात करें। प्रशासन से पहले खुद समाधान निकालें। बाहरी हस्तक्षेप समस्या बढ़ाता है, हल नहीं।

भीम आर्मी जैसे संगठनों के उकसावे और बाँटने का खेल

भीम आर्मी जैसी संस्थाएँ दलित अधिकारों की बात तो करती हैं, लेकिन उनके तरीके अक्सर समाज को बाँटने वाले साबित होते हैं। 2017 के सहारनपुर कांड में भीम आर्मी ने महाराणा प्रताप यात्रा के विवाद को बड़ा बनाया। दलित-ठाकुर टकराव हुआ, 25 घर जलाए गए।

भीम आर्मी ने महापंचायत बुलाई, प्रदर्शन किए जो पुलिस-दलित झड़प में बदल गए। आरोप लगा कि वे उकसावा फैलाते हैं, छोटी- छोटी घटनाओं को जातीय युद्ध बना देते हैं। चंद्रशेखर आजाद ने कई बार दलितों को ‘ठाकुरों के खिलाफ एकजुट’ होने का आह्वान किया, जिसकी वजह से नफरत बढ़ी।

मथुरा में भी हाल की घटनाओं (भुरेका, करनावल) में भीम आर्मी नेता पहुँचे, मुआवजे की माँग की, लेकिन स्थानीय संवाद की बजाय उग्रता फैलाई गई। नरहौली जैसी घटना में अगर वे तुरंत हस्तक्षेप करते हैं तो स्थिति और बिगड़ती है।

मथुरा में भी बवाल होते ही भीम आर्मी के नेता घटनास्थल पर पहुँच गए। (साभार- अमर उजाला)

वे दलित युवाओं को बताते हैं कि ऊपरी जातियाँ दुश्मन हैं। लेकिन हकीकत यह है कि वे राजनीतिक फायदा उठाते हैं। वोट बैंक बनाते हैं। छोटे विवाद को ‘दलित उत्पीड़न’ का चेहरा देकर सोशल मीडिया पर वायरल करते हैं।

इसका नतीजा ये निकलता है कि गाँव में स्थायी दुश्मनी पैदा होती है और क्षेत्र के पुलिस-प्रशासन पर दबाव बढ़ता है। इससे कहीं न कहीं विकास भी प्रभावित होता है।

भीम आर्मी जैसे संगठन दलितों की आवाज बनने का दावा करते हैं, लेकिन असल में वे उन्हें ऊपरी जातियों के खिलाफ खड़ा करके अपना राजनीतिक साम्राज्य बनाते हैं। यह समाज को बांटने का खेल है।

एकता ही प्रगति, बँटवारा नहीं

नरहौली की घटना ने दिखाया कि कुछ तत्व समाज को बाँटने के लिए बीज बो रहे हैं। लेकिन मथुरा का इतिहास सिखाता है कि सद्भाव से ही प्रगति होती है। दलित और क्षत्रिय-दोनों भाई हैं। ग्रामीण जीवन में उनका सहयोग अनिवार्य है।

भीम आर्मी जैसे संगठनों से सतर्क रहें, न कि उनके उकसावे में आएँ। जिम्मेदार लोग आगे आएँ, संवाद करें, समझें और सख्ती बरतें। समाज को बांटने वाले बीजों को उखाड़ फेंकें। नरहौली की दुल्हनों के आंसू हमें याद दिलाते हैं-शांति ही सबसे बड़ी शादी है। एकता से ही मथुरा, उत्तर प्रदेश और पूरा देश आगे बढ़ेगा।

जहाँ पहले होते थे दंगे-हत्या, उस UP में कानून-व्यवस्था की बेहतर हुई तस्वीर: NCRB 2024 के आँकड़ों में दिखा बंगाल-तमिलनाडु-केरल-पंजाब से बेहतर माहौल

कुछ समय पहले तक उत्तर प्रदेश का नाम लिया जाता था तो साथ ही इसे एक असुरक्षित प्रदेश के तौर पर भी याद किया जाता था। यहाँ दंगे, अराजकता, हत्या और महिलाओं के लिए सिर्फ असुरक्षा का माहौल था। हालाँकि योगी सरकार के शासन में कानून व्यवस्था की तस्वीर काफी हद तक बदली है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2024 ‘भारत में अपराध’ (Crime in India 2024) रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश की एक अलग और अधिक संतुलित तस्वीर सामने आती है। यह रिपोर्ट बताती है कि राज्य ने अपराध दर, चार्जशीटिंग, पुलिस-कार्रवाई और सुरक्षा समेत कई प्रमुख सूचकांकों पर उल्लेखनीय सुधार किया है।

यहाँ ये समझना जरूरी है कि किसी राज्य की कानून-व्यवस्था का मूल्यांकन केवल दर्ज मामलों की संख्या से नहीं किया जा सकता। देश के बड़े राज्यों में शिकायत दर्ज करने के प्रति जागरूकता, पुलिस तक पहुँच, जनसंख्या का आकार, शहरीकरण और रिपोर्टिंग की संस्कृति भी महत्वपूर्ण होती है।

उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जनसंख्या बहुत अधिक है। वहाँ अपराधों की दर, जाँच की गुणवत्ता, चार्जशीट दाखिल करने की गति और पुलिस निपटान जैसे संकेतक ज्यादा मायने रखते हैं। NCRB 2024 के आंकड़े इन क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश के बेहतर प्रदर्शन की ओर इशारा करते हैं।

समग्र अपराध दर में उत्तर प्रदेश की स्थिति

NCRB की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में देशभर में कुल 35,44,608 IPC/BNS अपराध दर्ज हुए। राष्ट्रीय स्तर पर यह दर 252.3 प्रति लाख जनसंख्या रही। इसके मुकाबले उत्तर प्रदेश की अपराध दर 180.2 प्रति लाख रही, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है।

1981 से 2024 के बीच हुए अपराध के आँकड़े (NCRB)

यह तथ्य अपने आप में अहम है, क्योंकि राज्य की आबादी देश में सबसे अधिक होने के बावजूद अपराध दर का राष्ट्रीय औसत से नीचे रहना प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था की बेहतर स्थिति को दिखाता है।

उत्तर प्रदेश में 2024 के दौरान कुल 4,30,552 IPC/BNS अपराध दर्ज हुए, जबकि 2023 में यह संख्या 4,28,794 थी। संख्या में बहुत बड़ा उछाल नहीं है, लेकिन दर के आधार पर देखें तो स्थिति स्थिर और नियंत्रित दिखाई देती है।

अपराध दर्ज होने की बढ़त को हमेशा कानून-व्यवस्था की गिरावट नहीं माना जा सकता, क्योंकि कई बार यह बेहतर रिपोर्टिंग, ज्यादा जागरूकता और पुलिस व्यवस्था तक आसान पहुँच का संकेत भी होती है।

यह भी उल्लेखनीय है कि अपराध की संख्या के साथ-साथ जाँच और अभियोजन की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होती है। उत्तर प्रदेश की चार्जशीटिंग दर 76.7% रही, जो राष्ट्रीय औसत 72.1% से बेहतर है।

इसका अर्थ यह है कि राज्य की पुलिस दर्ज मामलों में अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी ढंग से जाँच पूरी कर मामलों को अदालत तक पहुँचा रही है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश को केवल अपराध के आँकड़ों से नहीं, बल्कि पुलिस की दक्षता और प्रक्रिया-आधारित सुधारों के आधार पर भी परखा जाना चाहिए।

अन्य राज्यों से बेहतर स्थिति

उत्तर प्रदेश के प्रदर्शन को समझने के लिए इसका तुलना केरल, तमिलनाडु, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से कर सकते हैं। 2024 में तमिलनाडु में 1,97,149 अपराध दर्ज हुए और अपराध दर 255.5 रही। ये उत्तर प्रदेश से अधिक है। केरल में दर 513.0 तक पहुँची जो उत्तर प्रदेश से लगभग तीन गुना है।

पंजाब और पश्चिम बंगाल की दरें कुछ मामलों में कम दिखती हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश की चार्जशीटिंग दर और व्यापक पुलिस-प्रभावशीलता इन राज्यों से कई मानकों पर बेहतर दिखाई देती है। केरल जैसे छोटे और अधिक शहरीकृत राज्य में दर्ज अपराध दर का ऊँचा होना यह दिखाता है कि जनसंख्या घनत्व, रिपोर्टिंग की आदत और सामाजिक संरचना भी आँकड़ों को प्रभावित करता है।

उत्तर प्रदेश की खासियत यह है कि इतनी अधिक जनसंख्या, अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक स्थितियों और बड़े प्रशासनिक ढाँचे के बावजूद वहाँ अपराध दर नियंत्रण में रही। इसी कारण यह कहना उचित होगा कि उत्तर प्रदेश ने कम-से-कम कुछ प्रमुख संकेतकों में दूसरे बड़े राज्यों की तुलना में बेहतर संतुलन बनाया है।

पश्चिम बंगाल और पंजाब के साथ तुलना करते समय भी एक अहम बात सामने आती है। केवल कुछ कैटेगरी में ही कम संख्या होना पर्याप्त नहीं होता। पुलिस कितनी तेजी से आरोपपत्र दाखिल करती है, कितने मामलों का निपटारा करती है, और कितनी प्रभावी जाँच करती है, यह भी उतना ही जरूरी है।

उत्तर प्रदेश की चार्जशीटिंग दर और पुलिस-डिस्पोजल प्रदर्शन यह दिखाते हैं कि राज्य पुलिस सिर्फ मामले दर्ज नहीं कर रही, बल्कि उन्हें निष्कर्ष तक भी पहुँचा रही है।

महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा

NCRB 2024 की रिपोर्ट में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों को लेकर कुछ सकारात्मक रुझान सामने आए हैं। उत्तर प्रदेश में कई प्रमुख श्रेणियों में गिरावट दर्ज की गई, जिनमें विशेष रूप से दहेज मृत्यु और अपहरण मामलों में भारी कमी शामिल है।

रिपोर्ट के अनुसार, दहेज मृत्यु के मामलों में 50.7% की गिरावट आई, जबकि अपहरण और किडनैपिंग मामलों में 62.8% की कमी दर्ज की गई। महिलाओं की सुरक्षा के संदर्भ में यह भी देखा जाना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में महिला हेल्पडेस्क, 112 आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली, मिशन शक्ति, एंटी-रोमियो स्क्वॉड और बढ़ी हुई पेट्रोलिंग जैसी पहलों ने शिकायत-निवारण को अधिक सुलभ बनाया है।

जब शिकायत दर्ज करना आसान होता है और पुलिस प्रतिक्रिया तेज होती है, तो अपराधियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ता है। यही दबाव कई मामलों में दोबारा अपराध करने से रोकता है।

हालाँकि, ये बात भी सही है कि महिलाओं और बच्चों से जुड़े अपराधों में केवल दर्ज मामलों की संख्या देखकर पूरी तस्वीर नहीं बनती। कई बार बढ़ी हुई रिपोर्टिंग भी सकारात्मक परिवर्तन का संकेत होती है, क्योंकि पीड़ित अब अधिक आत्मविश्वास के साथ सामने आते हैं।

ऐसे में राज्य में दर्ज मामलों की संख्या का बढ़ना हमेशा नकारात्मक नहीं माना जा सकता। महत्वपूर्ण यह है कि शिकायत पर कितनी तेजी से कार्रवाई होती है, चार्जशीट कितनी जल्दी दाखिल होती है, और न्यायिक प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रहती है।

बाल अपराध और किशोर न्याय

किशोरों से जुड़े मामलों में भी उत्तर प्रदेश की स्थिति कई अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर दिखाई देती है। आँकड़ों के अनुसार, 2024 में उत्तर प्रदेश में 1,175 मामले दर्ज हुए और अपराध दर 1.4 प्रति लाख बाल जनसंख्या रही। यह राष्ट्रीय औसत 7.9 से काफी कम है। तुलना के लिए तमिलनाडु में यह दर 14.3 बताई गई है, जो उत्तर प्रदेश से कई गुना अधिक है।

किशोर अपराधों की कम दर यह बताती है कि राज्य में सामाजिक निगरानी, शिक्षा तंत्र, परिवार-समुदाय की भूमिका और पुलिस की प्रिवेंटिव पुलिसिंग में कुछ मजबूती है। बच्चों और किशोरों के लिए स्कूल-केंद्रित जागरूकता, पुनर्वास कार्यक्रम, बाल संरक्षण तंत्र और संवेदनशील थानों की मौजूदगी भी इस सुधार में योगदान देती है।

2023 की तुलना में 2024 में मामलों की संख्या कम होना भी इस दिशा में सकारात्मक संकेत है। जब किसी राज्य में किशोरों के मामले घटते हैं, तो इसका अर्थ केवल पुलिस की सख्ती नहीं, बल्कि सामाजिक ढाँचे में भी कुछ हद तक संतुलन का आना होता है। परिवारों, स्कूलों और स्थानीय संस्थानों की जागरूकता इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

बुजुर्गों की सुरक्षा

वरिष्ठ नागरिकों के खिलाफ अपराधों में उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। आँकड़ें बताते हैं कि 2024 में राज्य में 379 मामले दर्ज हुए और अपराध दर 2.5 प्रति लाख रही। यह कई बड़े राज्यों की तुलना में काफी कम है।

इसी श्रेणी में उत्तर प्रदेश की चार्जशीटिंग दर 93.8% है, जो मजबूत अभियोजन और पुलिस की तत्परता को दिखाती है। वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का भी मुद्दा है।

जब राज्य पुलिस ऐसे मामलों में तेज कार्रवाई करती है, तो यह समाज में यह संदेश देती है कि कमजोर और असुरक्षित वर्गों को प्राथमिकता दी जाएगी। उत्तर प्रदेश में हेल्पलाइन, बीट पुलिसिंग, वरिष्ठ नागरिक सहायता और स्थानीय स्तर पर निगरानी जैसी व्यवस्थाओं का लाभ इस क्षेत्र में दिखाई देता है।

तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश के आँकड़े इसलिए भी उल्लेखनीय हैं क्योंकि बड़े और घने आबादी वाले राज्य में वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुरक्षा बनाए रखना आसान नहीं होता। इसके बावजूद कम मामलों और अधिक चार्जशीटिंग दर यह दिखाते हैं कि पुलिस तंत्र इस वर्ग के प्रति अधिक सक्रिय है।

पर्यावरण संबंधी अपराध

पर्यावरण संबंधी अपराधों में भी उत्तर प्रदेश की स्थिति मजबूत बताई गई है। आँकड़ों के अनुसार, 2024 में 1,082 मामले दर्ज हुए और अपराध दर 0.5 प्रति लाख रही। यह राष्ट्रीय औसत से भी नीचे है। चार्जशीटिंग दर 94.6% बताई गई है, जो इस श्रेणी में काफी प्रभावी है।

2022 से 2024 के बीच हुए पर्यावरण संबंधी अपराध का आँकड़ा (NCRB)

यह श्रेणी अक्सर मुख्यधारा की चर्चा में कम आती है, लेकिन इसका महत्व बहुत अधिक है। जंगल कटाई, अवैध खनन, प्रदूषण, प्रतिबंधित पदार्थों का अनियंत्रित उपयोग और संबंधित कानूनों का उल्लंघन किसी राज्य की प्रशासनिक क्षमता को परखने का अच्छा पैमाना हैं। उत्तर प्रदेश में इस क्षेत्र में कम दर्ज मामले और ऊँची चार्जशीटिंग दर यह दिखाती है कि पर्यावरणीय उल्लंघनों पर भी सख्ती बरती जा रही है।

तमिलनाडु और केरल जैसी राज्यों में पर्यावरण संबंधी अपराधों की दर अधिक बताई गई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वहाँ केवल अपराध अधिक हैं, बल्कि यह भी कि रिपोर्टिंग और प्रवर्तन का पैटर्न अलग हो सकता है। फिर भी, उत्तर प्रदेश के आँकड़े इस बात की वकालत करते हैं कि राज्य में पर्यावरण कानूनों के पालन पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है।

साइबर फ्रॉड और आर्थिक नुकसान करने अपराध

आज के समय में कानून-व्यवस्था को केवल पारंपरिक अपराधों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। साइबर अपराध, आर्थिक धोखाधड़ी, नशीले पदार्थों से जुड़े मामले, शराब निषेध उल्लंघन और अन्य विशेष कानूनों के तहत अपराध भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

NCRB रिपोर्ट और संबंधित रिपोर्टिंग के अनुसार, उत्तर प्रदेश ने इन क्षेत्रों में भी जाँच और प्रवर्तन को मजबूत बनाया है। साइबर अपराधों के मामले में देशभर में वृद्धि का रुझान देखा गया है, लेकिन उत्तर प्रदेश ने रिपोर्टिंग, हेल्पडेस्क, त्वरित दर्जीकरण और जाँच की व्यवस्था को बेहतर किया है।

2024 में राज्य में 11,073 साइबर अपराध दर्ज हुए, और चार्जशीटिंग दर लगभग 54% बताई गई। भले ही यह दर कुछ अन्य श्रेणियों की तुलना में कम हो, लेकिन राज्य इस नए तरह के अपराध से निपटने के लिए अपनी क्षमता लगातार बढ़ा रहा है।

आर्थिक अपराधों में भी यूपी पुलिस की सक्रियता बढ़ी है। ऑनलाइन शिकायत, डिजिटल ट्रैकिंग, बैंक-समन्वय, ठगी के मामलों में त्वरित प्रतिक्रिया और संपत्ति जब्ती के कदम यह दर्शाते हैं कि पुलिस अब पारंपरिक गश्त से आगे बढ़कर तकनीकी और वित्तीय जाँच की दिशा में भी काम कर रही है। SLL श्रेणी के अपराधों में भी, खासकर अवैध नशीले पदार्थों, शराब और प्रतिबंधित सामान के खिलाफ कार्रवाई में राज्य ने सख्ती दिखाई है।

पुलिस सुधार और प्रशासनिक दक्षता

उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था में आए सुधार केवल आँकड़ों का खेल नहीं हैं, बल्कि पुलिस सुधारों, तकनीक-आधारित निगरानी और शासन की प्राथमिकताओं का परिणाम हैं। ऑनलाइन FIR, महिला हेल्पडेस्क, 112 आपातकालीन सेवाएँ, CCTV विस्तार, एंटी-रोमियो स्क्वॉड, मिशन शक्ति और तेज चार्जशीटिंग जैसी पहलों ने पुलिस प्रणाली को अधिक उत्तरदायी बनाया है।

जब पुलिस शिकायतों का जवाब तेजी से देती है, तो आम नागरिक का भरोसा बढ़ता है। यही भरोसा कानून-व्यवस्था की असली ताकत बनता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में इस भरोसे को बनाए रखना आसान नहीं है, लेकिन राज्य ने लगातार प्रशासनिक सुधारों के जरिए यह संकेत दिया है कि अपराधियों पर सख्ती और नागरिकों की सुरक्षा दोनों प्राथमिकताएँ हैं।

पुलिस निपटान, गिरफ्तारी, जब्ती और अभियोजन की बेहतर व्यवस्था यह बताती है कि सिस्टम केवल कागजी नहीं रह गया है। ऐसी व्यवस्था का असर यह होता है कि अपराध का संदेश समाज में जाता है और अपराधियों पर दबाव बनता है। यही कारण है कि कई श्रेणियों में उत्तर प्रदेश के आँकड़े अपेक्षाकृत नियंत्रित दिखाई देते हैं।

आँकड़ों की व्याख्या

किसी भी राज्य की कानून-व्यवस्था को समझने के लिए सिर्फ ‘कुल मामले’ देखना पर्याप्त नहीं होता। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में कुल मामले अधिक दिख सकते हैं क्योंकि राज्य की जनसंख्या बहुत बड़ी है और शिकायत दर्ज करने की प्रणाली भी बेहतर हुई है। लेकिन प्रति लाख अपराध दर, चार्जशीटिंग दर और संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा जैसी बातें भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। इन्हीं पर उत्तर प्रदेश कई क्षेत्रों में बेहतर स्थिति में दिखाई देता है।

यह भी समझना जरूरी है कि कुछ राज्यों में अपराध दर अधिक होने का एक कारण बेहतर रिपोर्टिंग प्रणाली हो सकता है इसलिए तुलना हमेशा बहुआयामी होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश की ताकत यह है कि वह बड़ी आबादी के साथ भी अपराध दर को राष्ट्रीय औसत से नीचे रखने में सफल रहा है और जांच-निपटान प्रक्रिया को भी मजबूत कर पाया है।

तमिलनाडु, केरल, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से तुलना करने पर यह स्पष्ट होता है कि उत्तर प्रदेश ने सिर्फ बड़ी जनसंख्या का दबाव नहीं झेला, बल्कि पुलिस सुधार, नागरिक-केंद्रित सेवाएं और कड़े प्रवर्तन के जरिए अपराध नियंत्रण की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं।

विशेष रूप से चार्जशीटिंग, निपटान और शिकायत-प्रतिक्रिया के मोर्चे पर राज्य ने अपनी प्रशासनिक क्षमता को मजबूत किया है। इसलिए, उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था को केवल समस्याओं के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। NCRB 2024 के आंकड़े यह दिखाते हैं कि राज्य अपराध नियंत्रण, पुलिस दक्षता और संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा में लगातार आगे बढ़ रहा है। यही वह दिशा है जो ‘अपराध-मुक्त उत्तर प्रदेश’ की परिकल्पना को साकार करने में मदद करती है।

100 हत्याएँ, 28 रेप, 95 मंदिरों में तोड़फोड़ और ईशनिंदा… बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर नहीं थम रहा जुल्म: 2026 के शुरुआती 4 महीनों में 505 वारदातें, HRCBM रिपोर्ट में खुलासा

बांग्लादेश में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ जारी हिंसा को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और डराने वाली रिपोर्ट सामने आई है। प्रमुख मानवाधिकार संगठन ‘ह्यूमन राइट्स कॉन्ग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज’ (HRCBM) ने अपनी राष्ट्रीय रिपोर्ट जारी की है।

HRCBM की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 के शुरुआती चार महीनों (जनवरी से अप्रैल) के भीतर ही अल्पसंख्यकों के खिलाफ प्रताड़ना और हिंसा की 505 दर्दनाक घटनाएँ दर्ज की जा चुकी हैं। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि बांग्लादेश में सत्ता बदलने के बावजूद हिंदुओं और अन्य कमजोर समुदायों की स्थिति रत्ती भर भी नहीं सुधरी है और वे लगातार हिंसक हमलों, हत्याओं और डकैती का शिकार हो रहे हैं।

पूरे बांग्लादेश में फैला है नफरत का जाल

यह रिपोर्ट बांग्लादेश के मौजूदा हालात का सबसे बड़ा और पुख्ता दस्तावेज है। संगठन ने बताया कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हुई ये 505 वारदातें किसी एक छोटे इलाके या कस्बे तक सीमित नहीं हैं। यह पूरी तरह से एक सोची-समझी साजिश के तहत पूरे देश में फैलाई जा रही नफरत का नतीजा है।

यह हिंसा बांग्लादेश के सभी 8 प्रशासनिक विभागों और कुल 64 जिलों में से 62 जिलों में फैल चुकी है। यानी देश का शायद ही कोई ऐसा कोना बचा है, जहाँ अल्पसंख्यक समाज सुरक्षित महसूस कर सके। इसमें ग्रामीण इलाकों से लेकर बड़े शहर तक शामिल हैं, जहाँ रहने वाले हिंदू परिवार हर पल खौफ के साए में जी रहे हैं।

100 हत्याएँ और 144 अपहरण: रोंगटे खड़े कर देने वाले आँकड़े

इस चार महीने की रिपोर्ट में जो आँकड़े सामने आए हैं, वे किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच 100 लोगों की हत्या और संदिग्ध मौत के मामले सामने आए हैं, जो कि 47 अलग-अलग जिलों में हुए।

इसके अलावा, अगवा करने (किडनैपिंग) और बेरहमी से मारपीट करने की 144 वारदातें 49 जिलों में दर्ज की गईं। डराने वाली बात यह है कि ये आँकड़े केवल वे हैं जिनकी स्वतंत्र रूप से पहचान और पुष्टि हो सकी है। असल संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है, क्योंकि बहुत से लोग डर और सामाजिक दबाव के कारण पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने ही नहीं जाते।

बहू-बेटियों पर अत्याचार और जमीनों पर अवैध कब्जा

अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं और बच्चियों को इस हिंसा के दौरान सबसे ज्यादा निशाना बनाया जा रहा है। रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा, बलात्कार और सामूहिक बलात्कार (गैंगरेप) की 28 खौफनाक घटनाओं का जिक्र किया गया है, जो 23 अलग-अलग जिलों में हुईं।

इसके साथ ही, हिंदुओं और स्वदेशी (आदिवासी) समुदायों की संपत्तियों को नष्ट करने, उनकी पुश्तैनी जमीनों पर जबरन कब्जा करने, घरों में आगजनी करने और लूटपाट की 132 बड़ी घटनाएँ सामने आई हैं। पैसे और ताकत के दम पर आर्थिक रूप से कमजोर अल्पसंख्यक परिवारों को बेघर किया जा रहा है ताकि वे देश छोड़ने पर मजबूर हो जाएँ।

95 मंदिरों पर हमला और ईशनिंदा के झूठे आरोप

बांग्लादेश में धार्मिक स्वतंत्रता पूरी तरह खतरे में नजर आ रही है। केवल चार महीनों के भीतर हिंदू मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर हमले व तोड़फोड़ की 95 वारदातें दर्ज की गई हैं। उपद्रवी भीड़ सरेआम मंदिरों को निशाना बना रही है और पवित्र मूर्तियों को खंडित कर रही है।

इसके अलावा, अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को फँसाने के लिए ‘ईशनिंदा’ (ब्लास्फेमी) का सहारा लिया जा रहा है। कुल 6 ऐसे मामले दर्ज किए गए हैं जहाँ लोगों पर झूठे आरोप लगाकर भीड़ को भड़काया गया और उनके खिलाफ हिंसा की गई।

सरकार बदली लेकिन नहीं बदला हिंदुओं का दर्द

इस रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण विश्लेषण यह है कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन का अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ा है। साल 2025 में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के 18 महीनों के कार्यकाल में भी हिंदुओं पर भीषण अत्याचार हुए थे, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था।

इसके बाद साल 2026 में जब नई चुनी हुई सरकार सत्ता में आई, तो उम्मीद थी कि हालात सुधरेंगे। लेकिन बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) सरकार के तहत भी यह हिंसा उसी रफ्तार से जारी है। इससे साफ होता है कि यह संकट किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि वहां के सिस्टम की गहरी नाकामी का नतीजा है।

प्रशासन की चुप्पी और कानून का मजाक

रिपोर्ट में बांग्लादेश की कानून व्यवस्था और पुलिस प्रशासन पर बेहद गंभीर सवाल उठाए गए हैं। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि जब भी उन पर हमला होता है, तो पुलिस या तो बहुत देर से पहुँचती है या फिर मामले की जांच को कमजोर कर देती है।

अपराधियों को सजा न मिलने के कारण उनके हौसले सातवें आसमान पर हैं। पीड़ितों और गवाहों को डराया-धमकाया जाता है ताकि वे अदालत का दरवाजा न खटखटाएँ। इस तरह की संस्थागत नाकामी के कारण अल्पसंख्यक समाज पूरी तरह टूट चुका है और भारी मानसिक तनाव में जी रहा है।

अन्य संगठनों की रिपोर्ट भी दे रही गवाही

HRCBM के अलावा बांग्लादेश के अन्य मानवाधिकार संगठन भी इन दावों की पुष्टि कर रहे हैं। इससे पहले ‘बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद’ ने भी एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें जनवरी से मार्च के बीच ही 133 सांप्रदायिक घटनाओं का जिक्र था।

उस रिपोर्ट में 25 हत्याएँ, महिलाओं के खिलाफ अत्याचार और 35 मंदिरों में लूटपाट की बात कही गई थी। इन सभी रिपोर्टों का कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता है कि यदि बांग्लादेश सरकार ने तुरंत कड़े कदम नहीं उठाए और दोषियों को सजा नहीं दी, तो आने वाले दिनों में अल्पसंख्यक आबादी का वहाँ टिके रहना नामुमकिन हो जाएगा।

मलिहाबाद में राजा कंस के किले पर मुस्लिमों का कब्जा, मंदिर गायब कर मस्जिद में पढ़ी जा रही नमाज: जानें- इसका इतिहास और गजेटियर में क्या है दर्ज

अपने विश्वप्रसिद्ध दशहरी आमों के लिए खास पहचान रखने वाला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का मलिहाबाद क्षेत्र अब एक अत्यंत संवेदनशील ऐतिहासिक और धार्मिक विवाद का मुख्य केंद्र बन चुका है। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि, काशी में ज्ञानवापी, मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि, संभल की जामा मस्जिद (हरिहर मंदिर दावा), भोजशाला में वाग्देवी मंदिर के बाद अब लखनऊ का ‘कांसमंडी’ (Kasmandi) इलाका देश और प्रदेश की सांस्कृतिक व राजनीतिक बहसों के केंद्र में आ गया है।

विवाद की जड़ें मलिहाबाद के कांसमंडी क्षेत्र में स्थित एक विशाल, प्राचीन और ऊँचे टीलेनुमा परिसर से जुड़ी हैं। लाखन आर्मी, पासी समाज और विभिन्न हिंदू संगठनों का दृढ़ दावा है कि वर्तमान समय में जिस परिसर को मुस्लिम पक्ष द्वारा मस्जिद, मजार या पारंपरिक कब्रिस्तान बताया जा रहा है, वह वास्तव में 11वीं शताब्दी के महान चक्रवर्ती राजपासी शासक राजा कंस का ऐतिहासिक अजेय किला है।

पासी समाज का आरोप है कि इस किले के मूल ऐतिहासिक स्वरूप को ‘जमीन जिहाद’ के माध्यम से नष्ट किया गया है, इसके भीतर स्थित प्राचीन महादेव (शिव) मंदिर को दबाया गया है और परिसर के भीतर से बाहर नई कब्रें तथा उर्दू के शिलापट लगाकर इस पूरी विरासत का इस्लामीकरण करने का प्रयास किया जा रहा है। दूसरी ओर मुस्लिम समाज और स्थानीय वक्फ प्रबंधन इन दावों को पूरी तरह से काल्पनिक और आधारहीन बताते हुए इसे वक्फ तथा सरकारी राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में दर्ज सदियों पुरानी मस्जिद और मकबरा घोषित कर रहा है।

उर्दू नाम पट हाल ही में लगाया गया

इस बीच, शुक्रवार (जुमे की नमाज- 22 मई 2025) के दिन पासी समाज द्वारा नमाज रोकने के ऐलान और उसके बाद उत्पन्न हुए भारी सांप्रदायिक तनाव ने स्थानीय प्रशासन के हाथ-पाँव फुला दिए। पूरे कांसमंडी इलाके को छावनी में तब्दील करना पड़ा और पुलिस के कड़े सुरक्षा घेरे में नमाज तो संपन्न हो गई, लेकिन पर्दे के पीछे सुलग रही यह चिंगारी अब एक बड़े कानूनी मुकदमे और देशव्यापी आंदोलन का रूप धारण करने जा रही है।

राजपासी राजा कंस के किले से जुड़ा क्या है ये पूरा विवाद

कांसमंडी में स्थित यह विवादित स्थल भौगोलिक रूप से एक ऊँचे टीले पर निर्मित है, जो दूर से ही किसी प्राचीन गढ़ या किले जैसा प्रतीत होता है। इस परिसर के भीतर वर्तमान में एक मस्जिद, कुछ प्राचीन व आधुनिक मकबरे (कब्रें) और एक कब्रिस्तान स्थित है।

पासी समाज के स्थानीय युवाओं और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का कहना है कि वे इस स्थान को सदियों से अपने पूर्वजों की विरासत के रूप में देखते आए हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में योजनाबद्ध तरीके से इसके स्वरूप को पूरी तरह बदलने का प्रयास किया गया है। उनकी आपत्तियों में ये बाते काफी अहम हैं-

  • प्राचीन किले की दीवारों और बुर्जों के अवशेष: हिंदू पक्ष का दावा है कि इस टीले की नींव और कुछ ढहे हुए हिस्सों को ध्यान से देखने पर साफ पता चलता है कि यह मध्यकालीन या आधुनिक काल की मस्जिद की स्थापत्य कला नहीं है, बल्कि यह 11वीं सदी की भारतीय दुर्ग निर्माण शैली (Fort Architecture) का हिस्सा है, जिसे राजा कंस पासी ने बनवाया था।
  • महादेव (शिव) मंदिर का अस्तित्व: लाखन आर्मी का दावा है कि किले के ठीक मध्य में राजा कंस के आराध्य भगवान शिव का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर था। राजा कंस पासी कुल के शासक थे और शिव के परम भक्त थे। उनका आरोप है कि विदेशी आक्रांताओं और बाद के शासकों ने इस मंदिर को खंडित किया और उसी के मलबे या उसी स्थान पर वर्तमान मजहबी ढाँचे को खड़ा कर दिया गया।
  • नई कब्रों का निर्माण और भूमि विस्तार: स्थानीय हिंदू निवासियों का आरोप है कि इस परिसर के आसपास की जमीनों पर लगातार नई कब्रें बनाई जा रही हैं ताकि इसके क्षेत्रफल को बढ़ाया जा सके और इसे एक बड़े कब्रिस्तान के रूप में दिखाकर हिंदुओं के प्रवेश को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जा सके।
  • उर्दू शिलापटों पर आपत्ति: किले के मुख्य प्रवेश द्वार और बाहरी दीवारों पर बीते कुछ सालों में उर्दू और अरबी भाषा में बड़े-बड़े शिलापट (साइनबोर्ड) लगा दिए गए हैं। पासी समाज के अनुसार, यह इस ऐतिहासिक स्थल की प्राचीन भारतीय और पासी राजाओं की पहचान को मिटाकर इसे विशुद्ध रूप से एक इस्लामी स्थल साबित करने की प्रशासनिक व सामाजिक साजिश है।
  • जुमे की नमाज पर विरोध: पासी समाज का कहना है कि इस स्थल पर पहले स्थानीय स्तर पर बेहद सीमित लोग आते थे, लेकिन अब जानबूझकर बाहर से भारी भीड़ जुटाकर हर शुक्रवार को यहाँ नमाज पढ़ी जाती है, जो कि हमारी आस्था और ऐतिहासिक धरोहर का अपमान है।

लखनऊ ब्रिटिश गजेटियर में राजा कंस से जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्य

इस पूरे विवाद में पासी समाज का पक्ष केवल मौखिक लोक-कथाओं या सुनी-सुनाई बातों पर निर्भर नहीं है। आंदोलनकारियों ने अपने दावों को पुख्ता करने के लिए ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के सबसे प्रामाणिक सरकारी दस्तावेजों ‘लखनऊ जिला गजेटियर’ (Lucknow District Gazetteer) और प्राचीन ऐतिहासिक संदर्भों को सामने रखा है। इन दस्तावेजों का गहन अध्ययन करने पर इस क्षेत्र के विषय में कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ियाँ जुड़ती नजर आती हैं।

कांसमंडी का नामकरण और राजपासी राजवंश

इतिहासकारों और अंग्रेजी गजेटियर के विवरणों के अनुसार, मलिहाबाद का यह विशेष क्षेत्र जिसे आज ‘कांसमंडी’ कहा जाता है, इसका नामकरण ही सीधे तौर पर राजा कंस के नाम से हुआ है। मध्यकालीन भारत की शुरुआत में, विशेषकर 10वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान, अवध (वर्तमान मध्य उत्तर प्रदेश) के एक विशाल भू-भाग पर पासी राजवंशों का शासन था। इन्हें ‘राजपासी’ या ‘नागवंशी पासी’ शासक कहा जाता था। राजा कंस इसी गौरवशाली राजवंश के एक अत्यंत शक्तिशाली और न्यायप्रिय राजा थे, जिन्होंने कांसमंडी को अपने साम्राज्य की राजधानी या एक प्रमुख सैन्य छावनी (गढ़) के रूप में विकसित किया था।

गजेटियर में कासमंडी
गजेटियर में कांसमंडी के बारे में जानकारी

11वीं शताब्दी का अवध और सालार मसूद गाजी का आक्रमण

लखनऊ गजेटियर में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि 11वीं शताब्दी के अंतिम दौर में काकोरी, मलिहाबाद और उसके आसपास का पूरा क्षेत्र राजा कंस के मजबूत राजनीतिक और सैन्य प्रभाव में था। यह वह समय था जब भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों से विदेशी इस्लामी आक्रांताओं के आक्रमण गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों की तरफ बढ़ रहे थे।

इसी क्रम में सुल्तान महमूद गजनवी का भांजा सैय्यद सालार मसूद गाजी (जिसे स्थानीय इतिहास में गाजी मियाँ भी कहा जाता है) एक विशाल जेहादी सेना लेकर दिल्ली और कन्नौज को लूटता हुआ अवध के क्षेत्र में दाखिल हुआ। उसका मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र के समृद्ध हिंदू राज्यों को नष्ट करना, मंदिरों को लूटना और जबरन धर्म परिवर्तन कराना था। जब सालार मसूद गाजी की सेना मलिहाबाद और काकोरी की सीमाओं पर पहुँची, तब राजा कंस ने विदेशी दासता स्वीकार करने या आत्मसमर्पण करने के बजाय अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध का बिगुल फूँक दिया।

कांसमंडी का ऐतिहासिक युद्ध और सेनापतियों का वध

गजेटियर के अनुसार, कांसमंडी और काकोरी का यह संपूर्ण क्षेत्र सालार मसूद गाजी की विदेशी आक्रमणकारी सेना और स्थानीय हिंदू पासी राजाओं के बीच हुए अत्यंत भीषण और रक्तरंजित संघर्ष का मुख्य रणक्षेत्र (Battlefield) बन गया। राजा कंस ने छापामार युद्ध नीति और अपने किले की भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर सालार मसूद गाजी की सेना को भारी क्षति पहुँचाई।

अंग्रेजी गजेटियर में इस युद्ध की एक ऐतिहासिक घटना का विशेष रूप से उल्लेख है कि युद्ध के दौरान राजपासी राजा कंस और उनके वीर सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए सालार मसूद गाजी के दो सबसे प्रमुख और खूंखार सेनापतियों सैय्यद हातिम और सैय्यद खातिम को इसी कांसमंडी के मैदान में मार गिराया था। इन दोनों सेनापतियों की मृत्यु से विदेशी सेना में हड़कंप मच गया था।

स्थानीय लोक परंपराओं, वीर रस के गीतों (आल्हा) और क्षेत्रीय लिखित इतिहास में राजा कंस को अवध की पावन धरती पर विदेशी आक्रांताओं का प्रतिरोध करने वाले एक महान राष्ट्रभक्त योद्धा और धर्मरक्षक के रूप में पूजनीय स्थान प्राप्त है। राजा कंस महाराजा सुहैल देव के समकालीन रहे हैं। उनके बलिदान के बाद ही इस्लामी फौज बहराइच की तरफ बढ़ पाई, हालाँकि उन्होंने और उनके योद्धाओं ने मसूद की आधी फौज खत्म कर दी थी। इसके बाद महाराजा सुहैल देव ने मसूद समेत उसकी पूरी फौज को गाजर-मूली की तरह काट डाला और उसे मिट्टी में मिला दिया था।

गजेटियर में राजा कंस का जिक्र

पासी समाज का तर्क है कि जिन सेनापतियों (हातिम और खातिम) को राजा कंस ने युद्ध में मारकर अपनी धरती को गौरवान्वित किया था, आज उन्हीं की कथित मजारों और कब्रों के नाम पर राजा कंस के अपने ही किले पर कब्जा कर लिया गया है, जो इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना है। खास बात ये है कि राजपासी राजा कंस के बाद रहे महाराजा बिजली पासी से जुड़े तमाम तथ्य भी सामने हैं, जिनके कब्जे में उस समय 12 किले रहे थे।

पीछे हटने के मूड में नहीं है हिंदू समाज, आर-पार की लड़ाई का ऐलान

कांसमंडी किले के इस विवाद ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। विभिन्न संगठनों के नेताओं की बयानबाजी से स्पष्ट है कि यह मामला आने वाले समय में कानूनी और राजनैतिक रूप से बेहद पेचीदा होने वाला है।

इस पूरे आंदोलन को जमीन पर उतारने और पासी समाज के युवाओं को एकजुट करने का श्रेय लाखन आर्मी के अध्यक्ष सूरज पासी को जाता है।

सूरज पासी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि मुझे 1 दिन पहले ही हाउस अरेस्ट कर लिया गया और प्रशासनिक देखरेख में नमाज अदा कराई गई। उन्होंने कहा कि मैं बीते 24 घंटों से अपने कार्यालय में ही कैद हूँ। मेरे घर और कार्यालय को किले में तब्दील कर दिया गया। सूरज ने कहा, “अगर मुझे नजरबंद नहीं किया जाता, तो इस बार जुमे की नमाज हमारे मंदिर पर नहीं हो पाती।”

सूरज पासी की नजरबंदी के खिलाफ प्रदर्शन करते हिंदू युवा

उन्होंने सोशल मीडिया पर ऐतिहासिक साक्ष्यों और गजेटियर की प्रतियों को सार्वजनिक करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक आधिकारिक पत्र भेजा है।

अपने पत्र और बयानों में सूरज पासी ने कहा, “हम किसी भी समुदाय की वैध धार्मिक संपत्ति के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हमारे पूर्वज महाराजा कंस पासी की विरासत को मिटाने की किसी भी कोशिश को हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। लखनऊ गजेटियर इस बात का चश्मदीद गवाह है कि यह स्थान राजा कंस का किला था और यहाँ उन्होंने विदेशी आक्रांताओं के सेनापतियों को धूल चटाई थी। हमारे आराध्य भगवान शिव के प्राचीन मंदिर को मुक्त कराना हमारी आस्था और हमारे आत्मसम्मान का विषय है।”

लाखन आर्मी द्वारा सीएम को लिखा गया पत्र

सूरज पासी ने कहा, “हम इस मामले को पूरी कानूनी तैयारी के साथ न्यायालय (Court) में लेकर जा रहे हैं। जिस तरह अयोध्या, काशी, मथुरा और संभल के ऐतिहासिक सत्यों को अदालत के माध्यम से दुनिया के सामने लाया जा रहा है, उसी तरह कांसमंडी के सच को भी उजागर किया जाएगा। इसके लिए हमारी संस्था ‘लाखन आर्मी’ पूरे उत्तर प्रदेश के पासी समाज और समस्त न्यायप्रिय हिंदू जनमानस को जागरूक कर रही है। हम बहुत जल्द एक विशाल शांतिपूर्ण आंदोलन की तारीखों की घोषणा करेंगे।”

अखिल भारत हिंदू महासभा ने इस विवाद में बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए पासी समाज को अपना पूर्ण और खुला समर्थन देने की घोषणा की है।

हिंदू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शिशिर चतुर्वेदी ने सीधे तौर पर जिला प्रशासन और राज्य सरकार को अल्टीमेटम देते हुए कहा, “लखनऊ के मलिहाबाद में जो कुछ हो रहा है, वह कुछ और नहीं बल्कि शुद्ध रूप से ‘जमीन जिहाद’ (Land Jihad) का एक और घिनौना उदाहरण है। एक महान हिंदू राजा के किले पर, जहाँ कभी हर-हर महादेव के जयघोष गूँजते थे, वहाँ आज चादरें बिछाकर, जबरन नई कब्रें खोदकर और उर्दू के बोर्ड लगाकर उसे पूरी तरह से हड़पने की साजिश की जा रही है।”

अखिल भारत हिंदू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शिशिर चतुर्वेदी ने कहा, “हिंदू महासभा पासी समाज के भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है। हमारी प्रशासन से स्पष्ट माँग है कि इस विवादित परिसर में शुक्रवार को होने वाली बाहरी लोगों की नमाज को तुरंत और स्थाई रूप से रोका जाए।”

उन्होंने आगे कहा, “अगर प्रशासन ने समय रहते इस अवैध कब्जे को नहीं हटाया और हिंदुओं की आस्था का सम्मान नहीं किया तो हिंदू महासभा के हजारों कार्यकर्ता स्वयं मौके पर कूच करेंगे और अपने हाथों से महाराजा कंस पासी की इस पावन विरासत की रक्षा करेंगे। इसके बाद उत्पन्न होने वाली किसी भी कानून-व्यवस्था की स्थिति की जिम्मेदारी सीधे तौर पर स्थानीय प्रशासन की होगी।”

मुस्लिम पक्ष और स्थानीय वक्फ कमेटी का क्या कहना है?

इस पूरे मामले में मलिहाबाद के स्थानीय मुस्लिम प्रतिनिधियों, धर्मगुरुओं और वक्फ बोर्ड से जुड़े पदाधिकारियों ने हिंदू संगठनों के इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि इस प्रकार के दावे केवल और केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने और क्षेत्र के पुराने शांतिपूर्ण माहौल को खराब करने के उद्देश्य से किए जा रहे हैं।

मुस्लिम पक्ष के प्रतिनिधियों ने अपने संयुक्त बयान में कहा, “यह पूरा परिसर ऐतिहासिक रूप से एक पंजीकृत वक्फ संपत्ति (Waqf Property) है। संभल और अन्य जगहों की घटनाओं के बाद अब मलिहाबाद के भाईचारे को निशाना बनाया जा रहा है। हम मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश पुलिस से माँग करते हैं कि ऐसे अफवाह फैलाने वाले और माहौल बिगाड़ने वाले असमाजिक तत्वों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई (FIR) की जाए और हमारी इबादतगाहों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।”

ग्राउंड जीरो की रिपोर्ट: शुक्रवार का तनाव और छावनी में बदला मलिहाबाद

जब लाखन आर्मी और पासी समाज ने शुक्रवार (22 मई 2026) को कांसमंडी किला परिसर में होने वाली जुमे की नमाज का पुरजोर विरोध करने और वहाँ जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करने या प्रदर्शन करने का ऐलान किया, तो पूरे लखनऊ जिले के प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। संभल में हुई हालिया हिंसक घटनाओं से सबक लेते हुए लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट ने स्थिति को संभालने के लिए तत्काल कड़े कदम उठाए।

इसके लिए प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करते हुए-

  • भारी पुलिस बल की तैनाती: शुक्रवार की सुबह से ही मलिहाबाद, काकोरी और कांसमंडी को जोड़ने वाले सभी मुख्य मार्गों पर भारी संख्या में उत्तर प्रदेश पुलिस के जवान, प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (PAC) की टुकड़ियाँ और त्वरित कार्य बल (RAF) के जवानों को तैनात कर दिया गया।
  • त्रिस्तरीय बैरिकेडिंग: विवादित टीले (किले) की ओर जाने वाली सभी पतली गलियों और मुख्य सड़कों पर लोहे तथा कंक्रीट की मजबूत त्रिस्तरीय बैरिकेडिंग की गई। किसी भी बाहरी व्यक्ति या हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं को उस क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गई।
  • ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी: पूरे परिसर और उसके आसपास के संवेदनशील रिहायशी इलाकों की निगरानी के लिए आधुनिक ड्रोन कैमरों का उपयोग किया गया। स्थानीय पुलिस की खुफिया इकाई (LIU) के सादे कपड़ों में दर्जनों जवान भीड़ पर नजर रखने के लिए तैनात रहे।
  • सड़क चेकिंग और नाकाबंदी: मलिहाबाद आने वाले वाहनों की सघन चेकिंग की गई ताकि बाहर से कोई भी प्रदर्शनकारी भीड़ का हिस्सा न बन सके।

पासी समाज और हिंदू संगठनों के कड़े आक्रोश और अल्टीमेटम के बीच, जिला मजिस्ट्रेट (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) खुद स्थिति की कमान संभाले रहे। प्रशासन ने मुस्लिम पक्ष के स्थानीय मुतवल्लियों से बात करके यह सुनिश्चित किया कि केवल स्थानीय लोग ही नमाज में शामिल हों और किसी भी प्रकार की भड़काऊ बयानबाजी न हो। इस बीच सूरज पासी को उनके दफ्तर में ही नजरबंद कर दिया गया।

विवादित स्थल की ओर जाने वाले रास्तों की नाकाबंदी

भारी पुलिस बल के कड़े पहरे और साये के बीच शुक्रवार की नमाज शांतिपूर्वक संपन्न हो गई। हालाँकि जमीन पर नमाज भले ही हो गई हो, लेकिन मलिहाबाद के स्थानीय हिंदू और मुस्लिम निवासियों के बीच एक गहरा मानसिक विभाजन और तनाव साफ महसूस किया जा सकता है। बाजारों में आम दिनों जैसी चहल-पहल गायब थी और लोग किसी भी अनहोनी की आशंका से डरे हुए दिखाई दिए।

कानूनी विकल्प और सामाजिक चुनौतियाँ

मलिहाबाद का यह ‘कांसमंडी किला विवाद’ अब केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति और न्यायपालिका के सामने एक नया बड़ा मामला बनने जा रहा है। पासी समाज के नेताओं द्वारा उठाए जा रहे कदमों से यह स्पष्ट है कि इस विवाद का समाधान अब सड़कों के बजाय अदालत के कमरों में ही तलाशा जाएगा।

  • अदालत में सिविल सूट (Civil Suit): लाखन आर्मी और पासी समाज के कानूनी सलाहकार बहुत जल्द लखनऊ की दीवानी अदालत (Civil Court) में एक याचिका दायर करने की योजना बना रहे हैं। इस याचिका में ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991’ (Places of Worship Act) की सीमाओं और अपवादों को ध्यान में रखते हुए यह तर्क दिया जा सकता है कि चूँकि यह मूल रूप से एक ऐतिहासिक किला और प्राचीन स्मारक है, इसलिए इसकी वास्तविक स्थिति और स्थापत्य की जाँच होनी चाहिए।
  • ASI सर्वे की माँग: ज्ञानवापी और भोजशाला की तर्ज पर हिंदू पक्ष अदालत से यह माँग कर सकता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के माध्यम से इस पूरे टीले की रडार (GPR System) और वैज्ञानिक खुदाई/जाँच कराई जाए ताकि यह पता चल सके कि वर्तमान ढाँचे के नीचे 11वीं सदी के किले की दीवारें और मंदिर के अवशेष मौजूद हैं या नहीं।
  • राजस्व रिकॉर्ड की चुनौती: हिंदू पक्ष सरकार से माँग कर रहा है कि इस भूमि के मालिकाना हक से जुड़े उन सभी पुराने रिकॉर्ड्स की दोबारा उच्च स्तरीय जाँच कराई जाए, जिनके आधार पर इस ऐतिहासिक किले को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया था।

बहरहाल, प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बेहद संवेदनशील मामले की जाँच के दौरान क्षेत्र में अमन-चैन बनाए रखने की है। मलिहाबाद और काकोरी का इलाका ऐतिहासिक रूप से सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक रहा है, जहाँ दोनों समुदायों के लोग दशकों से मिलकर रहते आए हैं। लेकिन इस विवाद के बाद दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई चौड़ी हो गई है।

मलिहाबाद के कांसमंडी में उपजा यह विवाद इतिहास के उन दबे हुए पन्नों को दोबारा पलटने जैसा है, जहाँ 11वीं शताब्दी के स्थानीय राजाओं का शौर्य, विदेशी आक्रांताओं का क्रूर इतिहास और आज के दौर की धार्मिक-सांस्कृतिक अस्मिता आपस में टकरा रही हैं। जहाँ पासी समाज अपने गौरवशाली इतिहास और महाराजा कंस पासी की विरासत को वापस पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है, वहीं मुस्लिम पक्ष अपने वर्तमान धार्मिक अधिकारों और कानूनी दस्तावेजों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।

अब यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा कि उत्तर प्रदेश सरकार और देश की न्यायपालिका इस ‘इतिहास बनाम कानून’ के पेचीदा मामले को किस प्रकार सुलझाती है, ताकि इतिहास के सत्यों का सम्मान भी हो सके और समाज का ताना-बाना भी सुरक्षित रहे। आने वाले दिनों में यह देखना भी बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस मामले में भी कोर्ट के आदेश पर एएसआई (ASI) सर्वे जैसी कोई कार्रवाई अमल में लाई जाती है या नहीं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चूँकि पासी समाज उत्तर प्रदेश में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बड़ी राजनीतिक ताकत (Voter Base) है, इसलिए कोई भी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर खुलकर पासी समाज की माँगों को नजरअंदाज नहीं कर सकता। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखे गए पत्र के बाद राज्य सरकार के सांस्कृतिक और पुरातत्व विभाग पर भी इस बात का दबाव बढ़ गया है कि वे लखनऊ गजेटियर में दर्ज ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में कांसमंडी की इस धरोहर का आधिकारिक सर्वे कराएँ।

नेताओं को मिल रहा नोटिस, बैठकों से MLA हो रहे गायब, पार्षद ग्रुप बनाकर दे रहे इस्तीफा: क्या बंगाल में हार के बाद टूटने लगी TMC?

पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत के बाद पार्टी का जोश एकदम हाई है तो वहीं ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के भीतर कलह लगातार बढ़ती जा रही है। बीजेपी के हाथों मिली करारी हार के बाद ऐसा साफ तौर पर लग रहा है कि TMC के भीतर सबकुछ सामान्य नहीं है।

राजनीति में हार सीटों की संख्या तो घटाती ही है, साथ ही साथ वो नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के मनोबल की भी परीक्षा लेती है। बंगाल में यही होता दिखाई दे रहा है। TMC के भीतर का असंतोष अब धीरे-धीरे पार्टी से बाहर निकल सतह पर आने लगा है। चुनाव के बाद की घटनाओं के अगर डॉट्स कनेक्ट करने की कोशिश करें तो लग रहा है कि कहीं ममता बनर्जी की पार्टी उसी दौर में तो नहीं पहुँच रही जहाँ यह चुनावी झटका TMC के संगठन के लिए संकट में बदलने लगा है।

विधानसभा चुनाव के बाद जब TMC ने नई सरकार के खिलाफ चुनाव बाद हिंसा, बुलडोजर कार्रवाई और फुटपाथ दुकानदारों के मुद्दे पर विधानसभा परिसर में विरोध प्रदर्शन किया तो पार्टी के भीतर असहज तस्वीर सामने आई। 80 विधायकों वाली पार्टी के धरने में केवल 36 विधायक पहुँचे। यानी आधे से भी कम।

यह केवल कुछ विधायकों की गैर-मौजूदगी का मामला नहीं है बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है। जब कोई पार्टी विपक्ष में जाती है तो उसका पहला बड़ा प्रदर्शन उसके मनोबल और एकजुटता की परीक्षा माना जाता है। अगर उसी मंच पर बड़ी संख्या में विधायक गायब दिखें तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पार्टी के भीतर असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है।

यह कोई एक दिन की घटना नहीं थी। इससे पहले 19 मई को कालीघाट में ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की मौजूदगी में हुई अहम बैठक में भी करीब 15 विधायक नहीं पहुँचे थे। और जो पहुंचे, उनमें भी कई नेताओं ने बंद कमरे की राजनीति पर सवाल उठा दिए। रिपोर्ट्स बताती हैं कि बैठक के दौरान कुछ विधायकों ने साफ कहा कि सिर्फ बैठकों और रणनीति चर्चा से जनता का भरोसा वापस नहीं आएगा, जमीनी स्तर पर काम और आत्ममंथन की जरूरत है।

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि कोलकाता और हावड़ा के कुछ विधायकों ने जहाँगीर खान के चुनाव से हटने को लेकर सीधे शीर्ष नेतृत्व से सवाल पूछे। मतदान से महज दो दिन पहले उम्मीदवार का मैदान छोड़ देना अपने आप में बड़ा मामला था लेकिन पार्टी नेतृत्व ने कोई कार्रवाई ना करके इसे और मुश्किल बना दिया। क्योंकि फालता विधानसभा सीट अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है, इसलिए इन सवालों को अभिषेक के नेतृत्व पर सवाल के तौर पर भी देखा गया।

लंबे समय से पार्टी में यह धारणा बनाई गई थी कि अभिषेक बनर्जी संगठन के भविष्य हैं। लेकिन चुनावी हार के बाद पहली बार उनके फैसलों और नेतृत्व क्षमता पर पार्टी के भीतर ही चर्चा शुरू हुई है। यह चर्चा कोई 1-2 दिन की नहीं है, यह हार के तुरंत बाद ही शुरू हो गई थी। कथित पार्टी विरोध बयानों के लिए TMC ने अपने ही 5 प्रवक्ताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया।

यह कदम अपने आप में बताता है कि पार्टी नेतृत्व भीतर उठ रही आवाजों को लेकर असहज है। किसी भी राजनीतिक दल में जब हार के बाद सवाल उठते हैं और उनका जवाब संवाद से ज्यादा कार्रवाई से दिया जाने लगे तो यह अक्सर अंदरूनी बेचैनी का संकेत माना जाता है।

अगर मामला केवल विधायकों की नाराजगी तक सीमित होता, तब भी इसे सामान्य चुनावी प्रतिक्रिया कहा जा सकता था। लेकिन इस मामले में TMC की टेंशन बढ़ाई है सबसे निचले और महत्वपूर्ण ईकाई स्थानीय निकाय ने। उत्तर 24 परगना की कांचरापाड़ा नगरपालिका में 24 में से 15 पार्षदों का सामूहिक इस्तीफा और हलीशहर नगरपालिका में 23 में से 16 पार्षदों ने सामूहिक तौर पर पद छोड़ दिया है।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि बीजेपी की बंगाल में मजबूत होती स्थिति इस असंतोष को और हवा दे सकती है। बंगाल की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहाँ सत्ता बदलने के बाद दल-बदल की राजनीति भी तेज हो जाती है। जिस तरह कभी वाम दलों के नेताओं ने TMC का रुख किया था, उसी तरह अब TMC के भीतर भी राजनीतिक भविष्य को लेकर नई महत्वकाँक्षाएँ शुरू होना असंभव नहीं है।

हालाँकि, हम यह आज ही नहीं कर सकते कि TMC कल ही टूटने जा रही है। लेकिन यह भी सच है कि राजनीति में संकट अचानक नहीं आता, उसके संकेत पहले दिखने लगते हैं। कभी कम होती बैठकों की उपस्थिति, कभी नेतृत्व पर उठते सवाल, कभी सामूहिक इस्तीफे और कभी पार्टी प्रवक्ताओं पर अनुशासनात्मक कार्रवाई ये सब संकेत अक्सर बड़े राजनीतिक बदलावों से पहले दिखाई देते हैं।

बंगाल की राजनीति फिलहाल एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। बीजेपी अपनी ऐतिहासिक जीत के बाद आत्मविश्वास में है जबकि TMC आत्ममंथन और असंतोष के बीच झूलती दिख रही है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह केवल हार के बाद का अस्थायी झटका है या फिर बंगाल की राजनीति में एक बड़े शक्ति परिवर्तन की शुरुआत।

1877 में इससे मरे थे 5 करोड़ लोग, लेकिन 2026 वाला ‘Super El Nino’ उससे भी खतरनाक: पढ़ें- कैसे आग उगलता सूरज इस साल को बना सकता है महाविनाशक

दुनिया एक बार फिर ऐसे जलवायु संकट की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है, जिसकी तुलना इतिहास की सबसे भयावह प्राकृतिक आपदाओं में से एक से की जा रही है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आने वाला ‘सुपर एल नीनो’ 1877-78 के उस ऐतिहासिक एल नीनो से भी अधिक शक्तिशाली हो सकता है, जो दुनिया भर में भयानक सूखा, अकाल, बीमारियाँ और करोड़ों लोगों की मौत का कारण बना था।

इतिहासकारों के अनुसार, 1877-78 के सुपर एल नीनो के कारण फैले वैश्विक अकाल और बीमारियों में करीब 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। भारत, चीन, ब्राजील और अफ्रीका के कई हिस्सों में लोग भूख, सूखे और महामारी से मरने लगे थे। उस समय यह आँकड़ा दुनिया की कुल आबादी का लगभग 3 से 4 प्रतिशत था।

अगर आज वैसी तबाही दोहराई जाए तो इसका असर 25 करोड़ से अधिक लोगों पर पड़ सकता है। हालाँकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि आज दुनिया 19वीं सदी की तुलना में कहीं अधिक तैयार है, लेकिन बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग ने खतरे को और गंभीर बना दिया है।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर एल नीनो क्या है, 1877 में क्या हुआ था और 2026 का संभावित सुपर एल नीनो दुनिया के लिए कितना बड़ा खतरा बन सकता है।

क्या होता है एल नीनो और क्यों माना जाता है खतरनाक?

एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है, जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी से जुड़ा होता है। यह El Nino Southern Oscillation यानी ENSO नामक जलवायु प्रणाली का हिस्सा है।

सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर की हवाएँ पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं, लेकिन एल नीनो के दौरान ये हवाएँ कमजोर पड़ जाती हैं। इससे समुद्र की गर्म सतह वाला पानी पूर्वी और मध्य प्रशांत क्षेत्र में फैलने लगता है।

इस गर्मी का असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया के मौसम पैटर्न को बदल देता है। कहीं भारी बारिश और बाढ़ आती है, तो कहीं सूखा और जंगलों में आग लगने की घटनाएँ बढ़ जाती हैं। वैश्विक तापमान भी सामान्य से अधिक हो जाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, जब समुद्री सतह का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ जाता है, तो इसे आम बोलचाल में ‘सुपर एल नीनो’ कहा जाता है। हालाँकि वैज्ञानिक आधिकारिक रूप से इस शब्द का कम इस्तेमाल करते हैं।

1877 का सुपर एल नीनो क्यों बना मानव इतिहास की बड़ी त्रासदी?

1877-78 का एल नीनो इतिहास के सबसे विनाशकारी जलवायु संकटों में गिना जाता है। जलवायु पुनर्निर्माण अध्ययनों के अनुसार, उस समय प्रशांत महासागर के एक अहम हिस्से में समुद्री तापमान लगभग 2.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था। इसके बाद दुनिया भर में बारिश का संतुलन बिगड़ गया।

भारत उन देशों में शामिल था, जहाँ इसका सबसे विनाशकारी असर पड़ा। मानसून लगभग गायब हो गया, फसलें बर्बाद हो गईं और भयंकर अकाल फैल गया। उत्तरी चीन में भी लंबे सूखे ने खेती को तबाह कर दिया। ब्राजील में नदियाँ सूख गईं, जबकि अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और जंगलों में आग की घटनाएँ बढ़ीं।

सूखे और फसल बर्बादी के कारण भोजन की भारी कमी हो गई। इसके बाद कमजोर आबादी में हैजा, चेचक, पेचिश, प्लेग और मलेरिया जैसी बीमारियाँ फैल गईं। इतिहासकारों का मानना है कि इस आपदा ने कई समाजों को कमजोर किया, बड़े पैमाने पर पलायन बढ़ाया और कई क्षेत्रों में औपनिवेशिक नियंत्रण को और मजबूत बना दिया।

वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर दीप्ति सिंह के अनुसार, अकाल केवल सूखे की वजह से नहीं आया था। उस समय उपनिवेशवादी नीतियों ने स्थानीय खाद्य और सामाजिक व्यवस्थाओं को कमजोर कर दिया था, जिससे लोग जलवायु संकट का सामना नहीं कर सके।

2026 का सुपर एल नीनो कितना शक्तिशाली हो सकता है?

वैज्ञानिकों के ताजा अनुमान चिंता बढ़ाने वाले हैं। अमेरिकी एजेंसी NOAA, यूरोपीय मौसम केंद्र ECMWF और विश्व मौसम संगठन (WMO) सहित कई संस्थानों का कहना है कि प्रशांत महासागर का तापमान इस बार सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह 1877 के सुपर एल नीनो से भी अधिक शक्तिशाली साबित हो सकता है।

NOAA के अनुसार, इस बात की लगभग 25 प्रतिशत संभावना है कि यह ‘बहुत मजबूत’ एल नीनो बने। वहीं कुछ मॉडल्स यह भी संकेत दे रहे हैं कि इसका प्रभाव 2026 के अंत से 2027 की शुरुआत तक जारी रह सकता है।

जलवायु वैज्ञानिक कैथरीन हेहो ने चेतावनी दी है कि इसका मानव समाज और मानव कल्याण पर गहरा असर पड़ सकता है। वैज्ञानिक पॉल राउंडी ने इसे 1877 के बाद सबसे बड़ा एल नीनो बताया है।

ग्लोबल वार्मिंग क्यों बढ़ा रही खतरा?

वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि 1877 के मुकाबले आज पृथ्वी पहले से लगभग 1.4 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो चुकी है। यानी एल नीनो का प्रभाव अब और अधिक खतरनाक हो सकता है।

दीप्ति सिंह कहती हैं कि 1870 के दशक जैसे कई वर्षों तक चलने वाले सूखे दोबारा हो सकते हैं, लेकिन फर्क यह है कि अब महासागर और वातावरण पहले से ज्यादा गर्म हैं। इसका मतलब है कि गर्मी की लहरें, सूखा, जंगलों की आग और जल संकट कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं।

2023-24 का एल नीनो पहले ही दुनिया को रिकॉर्ड गर्मी दिखा चुका है। विश्व मौसम संगठन के अनुसार, 2024 पृथ्वी का सबसे गर्म वर्ष रिकॉर्ड किया गया। ऐसे में नया सुपर एल नीनो तापमान को और ऊपर धकेल सकता है।

दुनिया के किन हिस्सों पर पड़ सकता है असर?

एल नीनो का असर पूरी दुनिया में अलग-अलग रूप में दिखाई देता है। भारत, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में मानसून कमजोर पड़ सकता है और सूखे का खतरा बढ़ सकता है। दक्षिण अमेरिका और प्रशांत क्षेत्र के कुछ हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ आ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लंबे समय तक सूखा पड़ा तो खाद्य उत्पादन प्रभावित होगा। गेहूँ, चावल, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों की पैदावार घट सकती है। इससे वैश्विक खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं और गरीब देशों में खाद्य संकट गहरा सकता है।

जल संकट, बिजली उत्पादन और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ने की आशंका है। कमजोर अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में यह संकट सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता भी पैदा कर सकता है।

क्या आज दुनिया पहले से ज्यादा तैयार है?

1877 के मुकाबले आज दुनिया के पास बेहतर तकनीक और वैज्ञानिक जानकारी मौजूद है। उस समय यह समझ ही नहीं थी कि एल नीनो क्या होता है और इसके आने का अनुमान कैसे लगाया जाए। लेकिन 1982-83 और 1997-98 के सुपर एल नीनो के बाद जलवायु विज्ञान में काफी प्रगति हुई।

आज प्रशांत महासागर में हजारों सेंसर, उपग्रह और समुद्री उपकरण लगातार तापमान, हवाओं और नमी पर नजर रखते हैं। NOAA, WMO और ECMWF जैसी एजेंसियाँ पहले से चेतावनी जारी कर सकती हैं। इससे सरकारों को खाद्य भंडारण, जल प्रबंधन और आपदा तैयारियों का समय मिल जाता है।

वैज्ञानिक केविन ट्रेंबरथ के अनुसार, अब दुनिया रियल टाइम में एल नीनो की गतिविधियों पर नजर रख सकती है, जो 19वीं सदी में संभव नहीं था।

फिर भी क्यों बनी हुई है चिंता?

विशेषज्ञ मानते हैं कि 1877 जैसी करोड़ों मौतों वाली त्रासदी दोहराने की संभावना कम है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है। आज दुनिया की आबादी कहीं ज्यादा है और वैश्विक अर्थव्यवस्था आपस में गहराई से जुड़ी हुई है। किसी एक क्षेत्र में फसल खराब होने का असर पूरी दुनिया की खाद्य और आर्थिक व्यवस्था पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सुपर एल नीनो के कारण कई देशों में एक साथ सूखा और गर्मी बढ़ती है, तो इसका असर खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों और वैश्विक बाजारों पर दिखाई देगा। सबसे अधिक खतरा गरीब और जलवायु संकट से पहले से जूझ रहे देशों को होगा।

ऐसे में वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, मजबूत चेतावनी प्रणाली और समय रहते तैयारी ही दुनिया को संभावित जलवायु संकट से बचाने का सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकती है।

जिनके राज में नेताओं की भैंस ढूँढती थी पुलिस, वो अखिलेश दे रहे कानून-व्यवस्था पर ज्ञान: पढ़िए- कैसे सपा शासन में बाहुबलियों से लेकर अपराधियों तक को मिलता रहा संरक्षण

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हाल ही में सोशल मीडिया पर यूपी की कानून व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए। सपा प्रमुख ने यूपी पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए उसे ‘भ्रष्टपुतली’ तक कह दिया। अखिलेश का आरोप है कि प्रदेश की पुलिस बीजेपी सरकार के इशारे पर काम कर रही है।

हालाँकि अखिलेश यादव के इन आरोपों के बीच समाजवादी पार्टी की सरकार के वो पुराने किस्से भी फिर चर्चा में आ गए हैं, जब यूपी पुलिस पर माफियाओं, बाहुबलियों और रसूखदार नेताओं के दबाव में काम करने के आरोप लगते थे। सोशल मीडिया पर आज भी ऐसे कई मामले वायरल होते रहते हैं।

जब आजम खान की भैंस खोजने में जुट गई थी पूरी पुलिस

ये मामला साल 2014 का है। प्रदेश में अखिलेश यादव की ही सरकार थी और आजम खान कैबिनेट मंत्री थे। रामपुर स्थित उनके फॉर्महाउस से 7 भैंसें चोरी हो गईं थी। इसके बाद पुलिस प्रशासन पूरी ताकत के साथ भैंसों की तलाश में जुट गया।

हालात ये थे कि बड़े-बड़े अधिकारी मौके पर पहुँच गए। क्राइम ब्रांच को लगाया गया। डॉग स्क्वॉड तक मैदान में उतार दिया गया। कई थानों की पुलिस भैंसें ढूंढने में लगी रही। इस घटना ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरीं।

विपक्ष ने सवाल उठाया कि आम आदमी की एफआईआर पर सुस्ती दिखाने वाली पुलिस आखिर एक मंत्री की भैंसों के लिए इतनी सक्रिय क्यों हो गई?

2005: जब दो विधायकों की हत्या से दहल गया था यूपी

सपा सरकार पर कानून व्यवस्था को लेकर सबसे बड़े सवाल साल 2005 में उठे थे। उस समय प्रदेश में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। उसी साल दो बड़े राजनीतिक हत्याकांड हुए। BSP विधायक राजू पाल और BJP विधायक कृष्णानंद राय की हत्या।

दोनों मामलों में प्रदेश के बड़े बाहुबली अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी के नाम सामने आए। विपक्ष ने आरोप लगाया कि इन माफियाओं को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ था।

बीच सड़क पर गोलियों से भून दिए गए थे राजू पाल

5 जनवरी 2005 को प्रयागराज में बसपा विधायक राजू पाल की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। हमलावरों ने उनकी गाड़ी को चौराहे पर घेर लिया और ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी।

हमला इतना खौफनाक था और अपराधियों के हौसले इतने बुलंद थे कि जब घायल राजू पाल को ऑटो से अस्पताल ले जाया जा रहा था, तब भी बदमाश पीछा करते रहे और गोलीबारी करते रहे।

इस हमले में राजू पाल के साथ देवी दयाल और संदीप यादव की भी मौत हुई। इस हत्याकांड का आरोप अतीक अहमद और उसके गुर्गों पर लगा। यही वो अतीक अहमद था जिसकी तस्वीरें मुलायम सिंह यादव के साथ वायरल हुईं. जिसमें मुलायम सिंह मंच पर अतीक के कुत्तों के साथ हाथ मिलाते नजर आ रहे थे।

कृष्णानंद राय हत्याकांड ने पूरे पूर्वांचल को हिला दिया

29 नवंबर 2005 को गाजीपुर में BJP विधायक कृष्णानंद राय की हत्या कर दी गई। वह एक कार्यक्रम से लौट रहे थे, तभी रास्ते में घात लगाकर उन पर ऑटोमैटिक हथियारों से हमला किया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक 500 से ज्यादा गोलियाँ चलाई गईं। इस हमले में कृष्णानंद राय समेत 7 लोगों की मौत हुई थी।

इस हत्याकांड में मुख्तार अंसारी और मुन्ना बजरंगी गैंग का नाम सामने आया। हैरानी की बात ये है कि उस समय मुख्तार अंसारी जेल में बंद था। लेकिन जेल के भीतर ही रहते हुए उसने इस बड़े हत्याकांड को अंजाम दिया था।

बताया जाता है कि जब कृष्णानंद राय की हत्या की खबर मुख्तार को जेल में मिली तो वह ठहाके मार रहा था और कह रहा था कि चोटी काट दी गई। दरअसल, अपराधियों ने हत्या के बाद कृष्णानंद राय की चोटी भी काट ली थी।

सपा सरकार में जेल सजा या आलीशान अड्डा?

सपा सरकार में मुख्तार अंसारी के जेल में अय्याशी के किस्से आज भी सुर्खियों में रहते हैं जो बताते हैं कि सपा सरकार में अपराधियों को कैसे संरक्षण मिलता था। मुख्तार अंसारी ने अपनी पसंद की मछली खाने के लिए जेल के भीतर ही तालाब खुदवा लिया था।

यही नहीं बड़े-बड़े अधिकारी उसके साथ जेल में बैडमिंटन खेलने आते थे। मुख्तार को इस कदर संरक्षण था कि वो जब मन करे जेल से बाहर आकर घूमता था और फिर जेल में चला जाता था।

जब पुलिस अफसर पर ही चलवा दी गई गोलियाँ

मुख्तार का एक किस्सा मशहूर है जब 1996 में मुख्तार अंसारी ने एक पुलिस अधिकारी उदय शंकर जायसवाल और उनकी टीम पर दिनदहाड़े गोलियाँ बरसाईं थीं। उसने हमला सिर्फ इसलिए किया था क्योंकि पुलिस वाहनों की चेकिंग कर रही थी। तब उसने पुलिस को ललकारते हुए कहा था कि किसकी औकात है जो मुख्तार अंसारी की गाड़ी चेक करे।

वहीं, अतीक ने तो तत्कालीन आईजी जोन आरके चतुर्वेदी तक को धमका दिया था। इस बात का जिक्र खुद आरके चतुर्वेदी ने किया था। उन्होंने एक मीडिया इंटरव्यू में बताया था कि कैसे साल 2016 में जब सपा की सरकार थी तो अतीक एक दिन मेरे दफ्तर आ गया था और मुझे धमकाया था। बाद में उसने अगले ही दिन मेरा ट्रांसफर करा दिया था।

सपा सरकार में यूपी पुलिस के हर थाने को ये आदेश था कि किसी भी मामले में एक जाति विशेष और धर्म विशेष लोगों के खिलाफ मुकदमा नहीं लिखा जाएगा। कई राजनैतिक पार्टियाँ इस बात को लेकर सपा को घेरती भी रही हैं।

“ये सब तनखैया हैं…” वाला बयान भी रहा विवादों में

ये बात इसलिए भी मौजूं हैं क्योंकि हाल ही में कोर्ट ने सपा सरकार में मंत्री रहे आजम खान को एक मामले में सजा सुनाई है। आजम खान ने एक चुनावी सभा में कलेक्टर को धमकी देते हुए मंच से कहा था कि पुलिस और कलेक्टर-फलेक्टर से डरने की जरूरत नहीं। ये सब तनखैया हैं.. इनसे जूता साफ कराऊँगा।

सोचिए अगर सपा का इतना कद्दावर नेता इस तरह का बयान मंच से देता है तो फिर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पुलिस का क्या हाल सपा सरकार में रहा होगा।

अब योगी सरकार पर हमला, तो पुराने सवाल भी लौटे

अब जब अखिलेश यादव यूपी पुलिस और कानून व्यवस्था को लेकर योगी सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। तो राजनीति में उनके विरोधी सपा शासनकाल की उन्हीं पुरानी घटनाओं को याद दिला रहे हैं, जब यूपी में बाहुबलियों और माफियाओं के प्रभाव को लेकर लगातार सवाल उठते थे।

यही वजह है कि जैसे ही अखिलेश यादव पुलिस पर हमला बोलते हैं, सोशल मीडिया पर ‘भैंस कांड’ से लेकर राजू पाल, कृ्ष्णानंद राय तक के पुराने मामले फिर वायरल होने लगते हैं।

बांद्रा के गरीब नगर में चला बुलडोजर, फिर चर्चा में आए सुनील दत्त: पढ़ें- जब अभिनेता और कॉन्ग्रेस नेता पर लगे थे अवैध बस्तियों को संरक्षण देने के आरोप

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई के बांद्रा ईस्ट स्थित गरीब नगर में बुधवार (20 मई 2026) को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान हिंसक झड़पें देखने को मिलीं। यह घनी आबादी वाला और मुस्लिम बहुल इलाका है। यह कार्रवाई बॉम्बे हाई कोर्ट के 29 अप्रैल के आदेश के बाद की जा रही है। निर्मल नगर पुलिस स्टेशन क्षेत्र में पश्चिम रेलवे की एंटी-एन्क्रोचमेंट टीम पर ने पथराव भी किया गया।

स्थानीय लोगों ने पुलिस, रेलवे कर्मचारियों और अन्य अधिकारियों के खिलाफ नारेबाजी की। उन पर बर्तन, पानी से भरी बाल्टियां, बोतलें और अन्य सामान भी फेंके गए। हालात बिगड़ने पर पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए कई लोगों को हिरासत में लिया गया जिनमें महिलाएँ भी शामिल थीं। इस हमले में 7 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं जबकि 10 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। मामले में FIR दर्ज कर ली गई है और आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

अब तक अतिक्रमण हटाने का करीब 60% काम पूरा हो चुका है। लगभग 300 घरों और अन्य अवैध निर्माणों को हटाया गया है जिनमें बांद्रा ईस्ट स्टेशन के पास स्थित एक अवैध मस्जिद भी शामिल है। तय समय में कार्रवाई पूरी करने के लिए मशीनों की संख्या भी बढ़ा दी गई है। इस अभियान के लिए करीब 1,200 सुरक्षाकर्मियों और कर्मचारियों को तैनात किया गया है।

एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार, मस्जिद का एक हिस्सा हटाए जाने के बाद स्थिति बिगड़ी। करीब 50-60 लोग विरोध जताने के लिए जमा हुए लेकिन बार-बार समझाने के बावजूद वे शांत नहीं हुए और पथराव शुरू कर दिया जिसके बाद पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। इलाके में किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

500 अवैध ढांचों को हटाने और करीब 5,300 वर्ग मीटर कब्जाई गई रेलवे जमीन को खाली कराने के लिए 19 मई से 5 दिन का अभियान शुरू किया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांद्रा ईस्ट की ओर जाने वाले ओवरब्रिज के पास रेलवे लाइन के किनारे 700 से ज्यादा अवैध झुग्गियाँ बनी हुई हैं। इनमें कुछ 5 से 6 मंजिला ऊँची इमारतें भी शामिल हैं।

प्रशासन की ओर से लोगों को पहले ही घर खाली करने की सूचना दे दी गई थी, ताकि कार्रवाई के दौरान किसी तरह की परेशानी न हो। पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (CPRO) विनीत अभिषेक ने कहा कि प्रभावित लोगों को जरूरी सुविधाएँ देने की कोशिश की जा रही है। जरूरत पड़ने पर पीने का पानी और खाने के पैकेट भी बाँटे जा रहे हैं।

इस मामले पर भाजपा नेता किरीट सोमैया ने कहा, “मुस्लिम भूमि माफियाओं ने अवैध झुग्गियों पर कब्जा किया था। अब कोर्ट और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्देश के बाद कार्रवाई शुरू हुई है। मुंबई में ‘लैंड जिहाद’ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”

यह कार्रवाई क्यों है रेलवे के लिए जरूरी

इस कार्रवाई के पीछे सिर्फ अवैध निर्माण हटाना ही उद्देश्य नहीं है बल्कि पश्चिम रेलवे के बड़े विस्तार प्रोजेक्ट को भी आगे बढ़ाना है। इस इलाके में रेलवे की क्षमता बढ़ाने, नए स्टेबलिंग लाइन (ट्रेनों को खड़ा करने की जगह), एकीकृत रेलवे कॉम्प्लेक्स और दूसरे इन्फ्रा प्रोजेक्ट शुरू किए जाने हैं। रेलवे की योजना के तहत सांताक्रूज-मुंबई सेंट्रल कॉरिडोर पर 5वीं और 6वीं रेलवे लाइन का विस्तार इसी खाली कराई गई जमीन के जरिए किया जाएगा। करीब 500 मीटर लंबी यह जमीन रेलवे ट्रैक के किनारे स्थित है और रेल भूमि विकास प्राधिकरण (RLDA) की व्यावसायिक योजनाओं के लिए भी बेहद अहम मानी जा रही है।

इस परियोजना के पूरा होने से मुंबई से चलने वाली करीब 50 नई ट्रेनों का संचालन आसान होगा। साथ ही उपनगरीय ट्रेनों में भारी भीड़ कम करने, बांद्रा सबअर्बन स्टेशन और बांद्रा टर्मिनस के बीच बेहतर कनेक्टिविटी बनाने और लोकल व लंबी दूरी की ट्रेनों को अलग-अलग ट्रैक पर चलाने में मदद मिलेगी। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि इससे आसपास की रेलवे जमीन का व्यावसायिक विकास भी तेजी से हो सकेगा।

पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (CPRO) विनीत अभिषेक ने कहा, “जिस जमीन को खाली कराया गया है, वह बांद्रा इंटीग्रेटेड रेलवे कॉम्प्लेक्स का हिस्सा बनेगी। इस नई खाली हुई जमीन से बांद्रा रेलवे स्टेशन का विस्तार किया जाएगा, जिससे नए ट्रैक पर 12 अतिरिक्त ट्रेनें चलाई जा सकेंगी। इतने बड़े पैमाने पर अतिक्रमण शहर को बंधक बनाकर नहीं रख सकता।”

अधिकारियों के मुताबिक यह कार्रवाई रेलवे ट्रैक की सुरक्षा के लिहाज से भी जरूरी है। रेलवे लाइन के आसपास अतिक्रमण और कूड़ा फेंकने की वजह से ट्रेन सेवाओं पर खतरा बना रहता है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी अपने आदेश में इन चिंताओं को ध्यान में रखा था।

गरीब नगर और कॉन्ग्रेस नेता सुनील दत्त का पुराना कनेक्शन

दिलचस्प बात यह है कि गरीब नगर के कई अवैध निवासियों ने इस कार्रवाई के दौरान दिवंगत अभिनेता और कॉन्ग्रेस सांसद रहे सुनील दत्त को याद किया। उनका कहना था कि पहले भी ऐसी कार्रवाई हुई थी लेकिन सुनील दत्त ने उसे रुकवा दिया था। एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा, “अगर आज सुनील दत्त होते तो कोई हमें यहाँ से हटा नहीं पाता।”

कुछ लोगों ने यह भी कहा कि इलाके के लोग लंबे समय तक कुछ राजनीतिक दलों के भरोसे और संरक्षण में रहे। एक शख्स ने कहा, “हम सुरक्षित थे क्योंकि हम सुनील दत्त को वोट देते थे।” वहीं, एक अन्य व्यक्ति ने आरोप लगाया, “चुनाव के समय हम जैसे ‘अनधिकृत’ लोग नेताओं के लिए ‘अधिकृत’ बन जाते हैं। सांसद, विधायक सब वोट माँगने आते थे लेकिन अब जब घर टूट रहे हैं तो कोई मदद के लिए नहीं है।”

एक स्थानीय निवासी ने दावा किया कि चुनाव के दौरान बांद्रा विधायक वरुण सरदेसाई ने भरोसा दिया था कि गरीब नगर के लोगों को कोई दिक्कत हो तो वे उनसे संपर्क करें। स्थानीयों का कहना है कि उनके पास आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी हैं लेकिन बिना किसी सर्वे के तोड़फोड़ कर दी गई।

सुनील दत्त पर लगे थे क्या आरोप

1984 में कॉन्ग्रेस में शामिल हुए सुनील दत्त को अवैध झुग्गियों को संरक्षण देने के आरोपों को लेकर पहले भी आलोचना झेलनी पड़ी थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने मुंबई नॉर्थ-वेस्ट सीट 5वीं बार जीती थी लेकिन बांद्रा-खार-जुहू क्षेत्र में उनके कई समर्थक उनसे नाराज हो गए थे। आरोप था कि उन्होंने सार्वजनिक जगहों पर बढ़ती अवैध झुग्गियों को रोकने के लिए प्रयास नहीं किए। इसका असर चुनाव नतीजों में भी दिखा और उनकी जीत का अंतर 1999 के करीब 85,500 वोटों से घटकर 2004 में लगभग 47,000 रह गया।

सिटीस्पेस समिति की सदस्य विद्या वैद्य ने आरोप लगाया था कि सुनील दत्त ने टैक्स देने वाले नागरिकों की चिंताओं को नजरअंदाज किया। वहीं सामाजिक कार्यकर्ता एडविन ब्रिटो ने शिकायत की थी कि बांद्रा और खार में बढ़ते अवैध निर्माणों को रोकने में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी रही। उन्होंने कहा था कि लिंकिंग रोड जैसे इलाकों में पैदल चलने तक की जगह नहीं बची।

वकील आर. हरिदास के अनुसार, इस इलाके की कुछ जमीनें जो पहले पार्क और खेल मैदानों के लिए तय थीं, बाद में स्लम रिहैबिलिटेशन के लिए चिन्हित कर दी गईं।

स्लम राजनीति और वोट बैंक का खेल

2021 में कॉन्ग्रेस नेताओं ने स्लम निवासियों के समर्थन में बांद्रा कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन भी किया था। माँग की गई थी कि केंद्र सरकार की जमीन, खासकर एयरपोर्ट अथॉरिटी की जमीन पर बसे झुग्गीवासियों को भी 1995 से पहले की स्लम सुरक्षा नीति का लाभ मिले। एयरपोर्ट अथॉरिटी ने सुरक्षा कारणों से इन झुग्गियों को हटाने की बात कही थी लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते कार्रवाई टालने की माँग उठी।

इससे पहले 1980 के दशक में महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई की झुग्गियों को हटाने की कोशिश की थी, जिसका विरोध कई सामाजिक संगठनों और एक्टिविस्ट्स ने किया। अभिनेत्री शबाना आजमी से जुड़े संगठन भी उस समय कट-ऑफ डेट बढ़ाने की माँग कर रहे थे। बाद में सुनील दत्त को कॉन्ग्रेस के लिए ऐसे नेता के रूप में देखा गया जो नाराज वोटरों को वापस ला सकते थे। बताया जाता है कि सुनील दत्त ने सोनिया गाँधी से हस्तक्षेप करवाकर तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासरवा देशमुख से मुंबई की झुग्गियों पर बुलडोजर कार्रवाई रुकवाने की भी कोशिश की थी।

बांद्रा के पास स्थित नर्गिस दत्त नगर स्लम को लेकर भी समय-समय पर विवाद उठे। कुछ स्थानीय संगठनों ने आरोप लगाया कि यह इलाका राजनीतिक वोट बैंक बनाने का माध्यम बन गया। स्थानीय निवासी संगठनों का दावा था कि नेताओं की चुप्पी के कारण अवैध बस्तियां लगातार बढ़ती गईं। 2015 में राज ठाकरे ने भी मुंबई की झुग्गी समस्या के लिए सुनील दत्त, शबाना आजमी और दिवंगत एनसीपी नेता बाबा जियाउद्दीन सिद्दीकी को जिम्मेदार ठहराया था।

धारावी में भी दिखी ऐसी ही कहानी

गरीब नगर की मौजूदा घटना कई मायनों में मुंबई की धारावी बस्ती से मिलती-जुलती नजर आती है, जहाँ पिछले कई वर्षों से रीडेवलपमेंट को लेकर लगातार विवाद और विरोध देखने को मिलता रहा है। एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती मानी जाने वाली धारावी के पुनर्विकास का काम अडानी ग्रुप और महाराष्ट्र सरकार की संयुक्त कंपनी नवभारत मेगा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड (पहले धारावी रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट प्राइवेट लिमिटेड) के जरिए किया जा रहा है।

करीब 2.4 वर्ग किलोमीटर में फैले इस इलाके को आधुनिक टाउनशिप में बदलने की योजना है। इस परियोजना को लेकर लगातार विरोध भी हुआ। 2024 में शिव सेना (UBT) और कॉन्ग्रेस ने धारावी में ‘धारावी न्याय यात्रा’ निकाली और परियोजना का विरोध किया।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले लोकसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस सांसद भी धारावी पहुँचे थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह पुनर्विकास परियोजना एक दिखावा है और इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिर्फ एक कारोबारी को फायदा पहुँचाने के लिए सौंपा है। वहीं, कॉन्ग्रेस सांसद वर्षा गायकवाड ने भी जमीन कब्जाने के आरोप लगाए थे।

निष्कर्ष

परियोजनाओं की जगह भले अलग-अलग हो लेकिन कॉन्ग्रेस की राजनीति को लेकर उठने वाले सवाल अक्सर एक जैसे दिखाई देते हैं। आलोचकों का कहना है कि पार्टी कई मुद्दों को राष्ट्रीय हित के बजाय राजनीतिक फायदे और वोट बैंक के नजरिए से देखती है। इसी वजह से झुग्गी पुनर्विकास और अतिक्रमण हटाने जैसी परियोजनाओं का विरोध सामने आता रहा है। मुंबई जैसे बड़े शहरों में बढ़ती अवैध बस्तियाँ न सिर्फ बुनियादी ढाँचे और विकास के सामने चुनौती बन गई हैं बल्कि कई जगह सार्वजनिक जमीन पर कब्जे और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का कारण भी बनी हैं।

ऐसे में सरकार और प्रशासन का कहना है कि पहले की सरकारों और राजनीतिक संरक्षण के दौरान विकसित हुई अवैध बस्तियों पर कार्रवाई जरूरी है ताकि शहरों का विकास, सार्वजनिक सुविधाओं का विस्तार और सुरक्षा व्यवस्था बेहतर हो सके। कोर्ट के आदेश के अनुसार चल रही ऐसी कार्रवाई बिना किसी हिंसा, राजनीतिक हस्तक्षेप या भ्रामक दावों के पूरी होनी चाहिए ताकि विकास परियोजनाएँ समय पर पूरी हो सकें और प्रभावित लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी सुनिश्चित की जा सके।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

डरने का नहीं, स्किल बदलने का वक्त आया… AI नौकरियाँ खा जाएगा या नए मौके बनाएगा? WEF, ILO और McKinsey की रिपोर्टों ने बताया सच

न सिर्फ भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में छंटनी और भर्ती में गिरावट की रिपोर्टें आ रही हैं। इससे कर्मचारियों में, खासकर उन युवा कर्मचारियों में चिंता बढ़ रही है जो अभी-अभी अपने जॉब में कदम रख रहे हैं। कई कर्मचारी, खासकर सॉफ्टवेयर और IT सेवाओं से जुड़े लोग इस बात से परेशान हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) उस सुरक्षा कवच को कम कर रहा है, जो कभी ‘व्हाइट-कॉलर’ नौकरियों में मिलता था।

उनका यह डर बेबुनियाद नहीं है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ‘फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025’ बताती है कि 41% नियोक्ताओं को उम्मीद है कि वे अपने कर्मचारियों की संख्या कम करेंगे, खासकर उन जगहों पर जहाँ AI से काम लिया जा सकता है। इसके अलावा मीडिया रिपोर्टों में उन उद्योगों में छंटनी और भर्तियों में कमी आने की बात कही गई है, जहाँ AI का इस्तेमाल किया जा सकता है।

‘AI सारी नौकरियाँ छीन लेगा’ ये कहना सही नहीं है। WEF रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक दुनिया भर में 17 करोड़ नई नौकरियाँ पैदा होंगी और 9.2 करोड़ नौकरियाँ खत्म हो जाएँगी। इसका मतलब है कि कुल मिलाकर 7.8 करोड़ नई नौकरियाँ बढ़ेंगी। खास बात यह है कि रिपोर्ट बताती है कि 2030 तक 39% कर्मचारियों के कौशल विकास की जरूरत है।

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइज़ेशन (ILO) तो इस बारे में और भी स्पष्ट है। ऐसी बहुत कम नौकरियाँ हैं, जिन्हें AI का इस्तेमाल करके पूरी तरह से ऑटोमेट किया जा सकता है। ‘जेनरेटिव AI’ का सबसे ज्यादा असर नौकरियों को पूरी तरह से खत्म करने के बजाय उनमें बदलाव लाने के रूप में दिखेगा।

यह वह अहम सुधार है जो मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया की कहानियों में गायब है। असली कहानी यह नहीं है कि AI काम को खत्म कर देता है, बल्कि यह है कि AI कुछ कामों को छोटा कर देता है, दूसरे कामों का महत्व बढ़ा देता है, और उन कर्मचारियों और संस्थानों को नुकसान पहुँचाता है, जो बदलाव को अपनाने से इनकार करते हैं।

यहाँ तक कि McKinsey भी बड़े पैमाने पर होने वाले व्यावसायिक बदलावों को लेकर बताता है कि उसके शोध इस बात का समर्थन नहीं करता कि जनरेटिव AI नौकरियाँ को खत्म कर देगा। इतिहास गवाह है कि तकनीकी बदलाव पहले व्यवधान लाता है और बाद में रोजगार में व्यापक परिवर्तन लाता है।

AI को इंसान ही बनाते हैं, सुधारते हैं और नियंत्रित करते हैं

सार्वजनिक बहस में सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि AI खुद को प्रशिक्षित करता है, खुद को सुधारता है और खुद को सभ्य बनाता है। ऐसा नहीं है, बल्कि वह ऐसा कर ही नहीं सकता। InstructGPT पेपर प्रशिक्षण के बाद की बुनियादी प्रक्रिया को सरल शब्दों में बताता है। शोधकर्ताओं ने इंसानों के लिखे गए सामग्री जमा किए, फिर इंसानों से मॉडल के आउटपुट को रैंक करने के लिए कहा और उन रैंकिंग का उपयोग करके इंसानी प्रतिक्रिया के साथ मॉडल को और बेहतर बनाया।

इसी तरह OpenAI के GPT-4 रिलीज में भी कहा गया है कि कंपनी ने इंसानों की ज्यादातर प्रतिक्रियाओं को शामिल किया और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शुरुआती प्रतिक्रिया के लिए 50 से ज्यादा विशेषज्ञों के साथ काम किया। Anthropic भी उतनी ही स्पष्टता से कहता है कि Claude को लिखित सिद्धांतों या नियमों के आधार पर निर्देशित करता है।

तो जब लोग पूछते हैं, ‘आखिर इन सिस्टम्स को ट्रेन कौन कर रहा है?’, तो इसका सीधा-सा जवाब है—इंसान और वह भी कई चरणों में। सबसे पहले लोग डेटा इकट्ठा करते हैं या उसका लाइसेंस लेते हैं। फिर लोग अच्छे व्यवहार के उदाहरण लिखते हैं। फिर लोग आउटपुट की तुलना करते हैं और निशान लगाते हैं कि कौन-सा जवाब बेहतर, सुरक्षित, सही या उपयोगी है। उसके बाद सुरक्षा टीमें और बाहरी टेस्टर मॉडल में कमियों की जाँच करते हैं। फिर पॉलिसी टीमें सिस्टम-लेवल के नियम बनाती हैं। फिर इंजीनियर सिस्टम को दोबारा ट्रेन करते हैं, उसे ठीक करते हैं, फिल्टर करते हैं या उसे पिछली स्थिति में वापस ले जाते हैं।
OpenAI का ‘मॉडल’ इसे एक औपचारिक ढाँचे के रूप में बताता है। इस मॉडल को कैसा व्यवहार करना चाहिए, उन्हें आपस में टकराने वाले निर्देशों को कैसे सुलझाना चाहिए और डिप्लॉयमेंट और फीडबैक के जरिए समय के साथ उनके तय व्यवहार में कैसे बदलाव किया जाता है।

सबसे आसान शब्दों में कहें तो इसका मतलब यह है कि मशीन लर्निंग के हर कदम पर इंसान शामिल होते हैं। इस दुनिया की कोई भी मशीन अपने आप नहीं सीख सकती। इंसान ही उन्हें सिखाते हैं— चाहे कोड के जरिए या फिर यह लिखकर कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में ‘अच्छा व्यवहार’ असल में किसे कहते हैं।

GPT-4o में आई ‘चापलूसी’ की समस्या पर OpenAI की सार्वजनिक रिपोर्ट (postmortem) इस बात का एक अच्छा उदाहरण है कि असल दुनिया में यह प्रक्रिया कैसे काम करती है। अप्रैल 2025 में, कंपनी ने एक अपडेट को वापस ले लिया था, क्योंकि उस अपडेट के बाद मॉडल जरूरत से ज़्यादा चापलूसी करने वाला और हर बात पर सहमत होने वाला बन गया था। OpenAI ने बताया कि उसने ‘शॉर्ट-टर्म फीडबैक सिग्नल्स’ पर बहुत ज्यादा ध्यान दे दिया था। इसलिए अब वह फीडबैक इकट्ठा करने के तरीके और उस फीडबैक को मॉडल के व्यवहार में शामिल करने के तरीके दोनों में ही सुधार किए है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह सुधार इसलिए नहीं हुआ कि मॉडल में अचानक कोई ‘अंतरात्मा’ जाग गई हो। बल्कि यह सुधार इसलिए हुआ, क्योंकि इंसानों ने उस कमी को पहचाना, नियमों में बदलाव किया और पूरे सिस्टम को ही बदल दिया।

इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है—‘Grok’ इमेज विवाद। जनवरी 2026 में Grok को बनाने वाली कंपनी xAI को Grok की इमेज एडिटिंग क्षमताओं पर रोक लगानी पड़ी थी। ऐसा इसलिए करना पड़ा, क्योंकि Grok द्वारा बनाई गई कुछ इमेज को लेकर ज़बरदस्त विरोध हुआ था। इन इमेज में असली लोगों को आपत्तिजनक या बगैर कपड़ों के (undressing) दिखाया गया था।

AI की बुनियादी विज़ुअल क्षमता भी इंसानी मेहनत पर निर्भर करती है। ImageNet, जो कंप्यूटर-विजन के बुनियादी डेटासेट में से एक है, अपनी तस्वीरों को ‘क्वालिटी-कंट्रोल्ड’ और ‘इंसानों द्वारा एनोटेट की गई’ बताता है।

OpenAI के GPT-4o सिस्टम कार्ड में बताया गया है कि इस मॉडल की क्षमताओं को पब्लिक डेटासेट, वेब डेटा और दूसरे स्रोतों से ट्रेनिंग दी गई है और फिर सुरक्षा जाँच से गुजारा गया। इसलिए अगर कोई मॉडल भरोसेमंद तरीके से भूरे अंडों और सफेद अंडों में फर्क कर पाता है, तो ऐसा इसलिए नहीं है कि मशीन ने ‘हकीकत को खुद ही समझ लिया।’ इंसानों ने ही श्रेणियाँ बनाईं, उदाहरणों को चुना मशीन को बताया कि भूरे और सफेद अंडों में फर्क कैसे करना है (इसके लिए उन्होंने तस्वीर में टोकरी में रखे हर एक अंडे पर निशान लगाया), बेंचमार्क बनाए, और यह तय किया कि क्या यह सिस्टम इस्तेमाल के लायक है।

खास बात यह है कि यह सब एक बार में नहीं हो जाता। आज भी ऐसी कई कंपनियाँ हैं जो ‘डेटा टैगिंग’ की सेवाएं देती हैं, जहाँ इंसान टेक्स्ट, तस्वीरों और वीडियो को टैग करते हैं, ताकि मशीनें उनसे सीख सकें। इस तरह की नौकरियाँ इतनी जल्दी खत्म होने वाली नहीं हैं।

चलिए एक उदाहरण और देते हैं। एक चीज होती है जिसे ‘वाइब कोडिंग’ कहते हैं, जिसका मतलब है AI की मदद से कोड लिखना। अगर कोई यह कहता है कि मशीन ने खुद ही कोड लिखना सीख लिया है, तो यह झूठ होगा। दुनिया भर में लाखों कोडिंग विशेषज्ञ दिन-रात AI को कोड लिखना सिखा रहे हैं, ताकि कोई भी नया सीखने वाला (नोब) भी एक विशेषज्ञ की तरह कोड लिख सके।

वे डिजिटल नौकरियां बदलेंगी, जो हमेशा एक जैसी रहती हैं

तो फिर, सबसे पहले बदलाव (disruption) कहाँ देखने को मिलेगा? इसका जवाब ‘हर तरह के काम’ नहीं है, बल्कि, यह उन कामों में आएगा जो बार-बार दोहराए जाते हैं, स्क्रीन पर किए जाते हैं, एक तय ढाँचे में होते हैं और जिनमें ज्यादातर काम जानकारी को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने से जुड़े होते हैं।

ILO का कहना है कि जिन नौकरियों पर ‘जेनरेटिव AI’का सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना है, वे ऐसी नौकरियाँ हैं, जिनमें अलग-अलग कामों में ऑटोमेशन की बहुत ज्यादा और लगातार गुंजाइश होती है। साथ ही, ILO इस बात पर भी जोर देता है कि लगभग सभी नौकरियों में अभी भी कुछ ऐसे काम होते हैं, जिनके लिए इंसानी दखल की जरूरत पड़ती है।

WEF का अनुमान है कि जिन नौकरियों में सबसे तेजी से कमी आएगी, उनमें क्लर्क और प्रशासनिक काम शामिल हैं—जैसे कैशियर, टिकट क्लर्क, प्रशासनिक सहायक और दूसरे क्लर्क। वहीं जिन तकनीकी नौकरियों में सबसे तेज़ी से बढ़ोतरी होगी, उनमें AI और मशीन लर्निंग विशेषज्ञ, बिग डेटा विशेषज्ञ, फिनटेक इंजीनियर और सॉफ्टवेयर डेवलपर शामिल हैं।

यह पैटर्न असल इस्तेमाल के डेटा में भी दिखता है। Anthropic की 2026 की रिसर्च, जो Claude के असल इस्तेमाल पर आधारित है, बताती है कि कंप्यूटर प्रोग्रामर, कस्टमर सर्विस रिप्रेजेंटेटिव और डेटा एंट्री करने वालों पर इसका सबसे ज़्यादा असर पड़ा है। कंपनी का कहना है कि AI अभी भी अपनी सैद्धांतिक पहुँच से बहुत दूर है और उसके डेटा में 30% कर्मचारियों के काम पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है।

इसका मतलब यह नहीं है कि कुछ काम को पूरी तरह AI रिप्लेस कर देगा। इसका मतलब यह होता है कि काम का एक बड़ा हिस्सा AI की मदद से किया जाएगा, उसकी रफ्तार बढ़ जाएगी या उसे नए सिरे से व्यवस्थित किया जाएगा।

Microsoft की रिसर्च में पाया गया कि जिन डेवलपर के पास GitHub Copilot की सुविधा थी, उन्होंने एक प्रयोग में कोडिंग का काम 55.8% तेजी से पूरा किया। बाद में Microsoft Research के एक पेपर में, जिसमें लगभग 4900 डेवलपर पर किए गए तीन प्रयोगों के नतीजों को एक साथ मिलाया गया था, पाया गया कि AI कोडिंग असिस्टेंट का इस्तेमाल करने वाले डेवलपर द्वारा पूरे किए गए कामों में 26.08% की बढ़ोतरी हुई और कम अनुभवी डेवलपर को इससे ज्यादा फायदा हुआ।

ये उत्पादकता के लिहाज से बहुत अहम नतीजे हैं, लेकिन ये इस बात को साबित नहीं करते कि कोडर का काम पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। ये नतीजे बताते हैं कि रूटीन कोडिंग, बॉयलरप्लेट, शुरुआती ड्राफ़्ट और बार-बार दोहराए जाने वाले छोटे-मोटे कामों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा, जबकि रिव्यू, आर्किटेक्चर, एज केस, डीबगिंग, इंटीग्रेशन, सुरक्षा और जवाबदेही जैसे काम अभी भी बहुत जरूरी बने रहेंगे।

कोडिंग के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी यही बात लागू होती है। कस्टमर-सपोर्ट पर की गई एक बड़ी रिसर्च में पाया गया कि एक जनरेटिव AI असिस्टेंट की मदद से उत्पादकता में औसतन लगभग 14% से 15% की बढ़ोतरी हुई, और इसका सबसे ज्यादा फायदा नए और कम हुनर ​​वाले कर्मचारियों को मिला।

Erik Brynjolfsson अपने पेपर ‘Generative AI at Work’ में कहते हैं कि इस टूल ने नए कर्मचारियों को अनुभवी कर्मचारियों के काम करने के तरीके से सीखकर, अनुभव हासिल करने की प्रक्रिया में तेजी से आगे बढ़ने में काफी मदद की। यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। इसका मतलब है कि AI इंसानी हुनर ​​के कुछ हिस्सों को सीखकर उन्हें नए सिरे से इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन इसका यह भी मतलब है कि किसी के पास पहले से ही वह हुनर ​​होना चाहिए, उसे AI के लिए एक मॉडल के तौर पर तैयार किया जाना चाहिए, और उस पर अभी भी इंसानी निगरानी की जरूरत बनी रहेगी।

यही कारण है कि मशीन आउटपुट में भारी वृद्धि के साथ ‘मानवीय नजर’ का महत्व कम नहीं, बल्कि और बढ़ जाता है। स्टैक ओवरफ्लो के 2025 डेवलपर सर्वेक्षण में पाया गया कि एआई उपकरणों की सटीकता पर भरोसा करने वालों की तुलना में अविश्वास करने वाले डेवलपर्स की संख्या अधिक है। 46% अविश्वास बनाम 33% भरोसा। पत्रकारिता के क्षेत्र में, एपी का कहना है कि पत्रकार की केंद्रीय भूमिका नहीं बदलेगी, एआई पत्रकारों का विकल्प नहीं है, और किसी भी जनरेटिव-एआई आउटपुट को “अपुष्ट स्रोत सामग्री” के रूप में माना जाना चाहिए।

रॉयटर्स ने अक्टूबर 2025 में रिपोर्ट किया कि बीबीसी-ईबीयू परीक्षण में 45% एआई समाचार उत्तरों में महत्वपूर्ण कमियाँ और 81% में किसी न किसी प्रकार की समस्या पाई गई। लोग एआई स्लोप की बात करते समय इसी का जिक्र करते हैं, जिसका अर्थ है बड़े पैमाने पर सस्ता आउटपुट, जिसमें सच लिखने की जिम्मेदारी मानव की होती है।

वास्तविक दुनिया को अभी भी मानवीय हाथों की जरूरत

जनरेटिव एआई भाषा, पैटर्न पूर्णता, सारांश और स्क्रीन पर कोड जैसे कार्यों में सर्वश्रेष्ठ है। मैकिन्से का कहना है कि कुछ कम वेतन वाली नौकरियों में अनिश्चित शारीरिक काम या कस्टमर से डील जैसे काम शामिल है, जो खुद से संचालित नहीं हो सकते।

इसी रिसर्च में कहा गया है कि शारीरिक काम खत्म नहीं होगा और अनुमानित रूप से कुल समय का लगभग 31% हिस्सा शारीरिक काम में ही बीतेगा, जिसमें परिवहन, निर्माण और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र योगदान दे रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय लेबर संगठन (आईएलओ) भी इस बात पर जोर देता है कि कुछ ही नौकरियाँ पूरी तरह से स्वचालित हो सकती हैं और अधिकांश बिजनेस मानव और मशीन दोनों के मिलने से चलता है।

एंथ्रोपिक के श्रम-बाजार अनुसंधान के अनुसार, कई काम एआई की पहुँच से बाहर हैं, विशेष रूप से पेड़ों की छँटाई और कृषि मशीनरी चलाने जैसे शारीरिक कृषि कार्य। करीब 30% श्रमिकों के कार्यों को एआई नहीं ले सकता। इनमें रसोइया, मोटरसाइकिल मैकेनिक, लाइफगार्ड, बारटेंडर, डिशवॉशर और ड्रेसिंग रूम अटेंडेंट शामिल हैं।

एआई एक प्लंबर के लिए निर्देश लिख सकता है, एक इलेक्ट्रीशियन का काम कर सकता है या एक मैकेनिक की मदद कर सकता है, लेकिन फिर भी यह किसी लीक हो रहे पाइप में पानी के दबाव को महसूस नहीं कर सकता, किसी दीवार में लगे तार अगर जलने लगे तो उसके गंध नहीं सूँघ सकता। शोरगुल वाले कार्यस्थल पर टेढ़ी-मेढ़ी बीम का आकलन नहीं कर सकता या अव्यवस्थित, अस्थिर कार्य वातावरण में सुरक्षित रूप से काम नहीं कर सकता। ये सभी शारीरिक, परिस्थितिजन्य और स्थानीय निर्णय लेने के तरीके हैं।

यही वजह है कि WEF का अपना जॉब्स आउटलुक ऐसा भविष्य नहीं दिखाता जिसमें सिर्फ कोडर और प्रॉम्प्ट-राइटर ही हों। इसके मुताबिक, अगले पाँच सालों में सबसे तेजी से बढ़ने वाली नौकरियों में बिल्डिंग बनाने वाले मजदूर शामिल हैं। इनके साथ खेती-बाड़ी करने वाले मजदूर, डिलीवरी ड्राइवर और फूड-प्रोसेसिंग का काम करने वाले लोग भी हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, AI ऑफ़िसों को बदल सकता है, लेकिन कंस्ट्रक्शन साइटों, रिपेयर की दुकानों, रसोईघरों, खेतों और मेंटेनेंस के कामों वाली जगहों पर लोगों की जरूरत हमेशा रहेगी। भविष्य की अर्थव्यवस्था “डिजिटल मजदूर बनाम शारीरिक काम करने वाले मज़दूर” वाली नहीं होगी। यह एक मिली-जुली अर्थव्यवस्था होगी, जिसमें शारीरिक काम करने वाले लोग AI को एक टूल के तौर पर इस्तेमाल करेंगे, लेकिन साथ ही वे खुद ही ऐसे शारीरिक काम भी करते रहेंगे जिनकी जगह कोई और नहीं ले सकता।

भारत कौशल विकास कर रहा, घबरा नहीं रहा

भारत के लिए व्यावहारिक सवाल यह नहीं है कि AI से डरना है या नहीं, बल्कि यह है कि इसके इर्द-गिर्द पर्याप्त कौशल, भाषाई बुनियादी ढाँचा और डोमेन विशेषज्ञता विकसित की जाए या नहीं। IndiaAI मिशन को भी इसी नज़रिए से तैयार किया गया है। फरवरी 2026 की PIB रिलीज में कहा गया है कि भारत की AI रणनीति का उद्देश्य आर्थिक और रोजगार के अवसर पैदा करना है। इसमें मिशन के लिए ₹10372 करोड़ के बजट का जिक्र है, और बताया गया है कि 38000 से ज्यादा GPUs को सिस्टम में जोड़ा गया है, स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल्स के लिए बारह टीमों को शॉर्टलिस्ट किया गया है, भारत-विशिष्ट 30 AI एप्लीकेशन्स को मंजूरी दी गई है और हजारों अंडरग्रेजुएट, पोस्टग्रेजुएट और PhD छात्रों को प्रतिभा विकास के लिए सहायता दी गई है। इसी रिलीज में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि भारत के फाउंडेशन मॉडल्स को भारतीय डेटासेट्स और भाषाओं के आधार पर तैयार किया जा रहा है।

यह स्थानीय आधार बहुत मायने रखता है। BHASHINI के CEO ने जनवरी 2026 में कहा था कि AI नागरिकों की प्रभावी ढंग से सेवा तभी कर सकता है, जब वह भारतीय भाषाओं को समझे और उसे ऐसे स्वदेशी डेटा पर प्रशिक्षित किया गया हो, जो स्थानीय संदर्भों और उपयोग के तरीकों को दर्शाता हो। इस प्लेटफॉर्म का कहना है कि यह 36 से ज्यादा लिखित भाषाओं, 22 से ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं, 350 से ज्यादा AI भाषा मॉडल्स और सैकड़ों इंटीग्रेशन को सपोर्ट करता है। यह कोई मामूली मुद्दा नहीं है। ऐसे देश में, जहाँ भाषा, बोली, कोड-मिक्सिंग और संदर्भ ही रोजमर्रा के संवाद को आकार देते हैं, वहाँ स्थानीय मानवीय इनपुट कोई वैकल्पिक चीज नहीं है, बल्कि यही तो इस पूरे सिस्टम का आधार है।

भारतीय भाषाओं पर हुए स्वतंत्र शोध भी इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं। AI4Bharat का कहना है कि ज्यादातर भारतीय भाषाओं में उस बड़े पैमाने के प्रशिक्षण डेटा की कमी है, जिसकी जरूरत आधुनिक AI प्रणालियों को होती है। इसके ‘Indic LLM-Arena’ का तर्क है कि वैश्विक मानक बहुत ज्यादा अंग्रेजी-केंद्रित हैं। वे ‘हिंग्लिश’ और ‘टैंग्लिश’ जैसी कोड-मिश्रित बोलियों को नजरअंदाज़ कर देते हैं और भारतीय सांस्कृतिक, प्रासंगिक और सुरक्षा संबंधी जरूरतों को समझने में नाकाम रहते हैं। यह स्पष्ट रूप से ‘भाषा, संदर्भ और सुरक्षा’ के मूल्यांकन के लिए एक ऐसे मॉडल की वकालत करता है, जिसमें मानवीय हस्तक्षेप शामिल हो।

इसका मतलब यह है कि भारत के AI-युक्त भविष्य के लिए न केवल मॉडल बनाने वालों की जरूरत होगी, बल्कि ऐसे मूल्यांकनकर्ताओं, भाषा विशेषज्ञों, डोमेन विशेषज्ञों, सुरक्षा समीक्षकों और ऐसे लोगों की भी जरूरत होगी, जो लगातार इस बात की पुष्टि करते रहें कि ये प्रणालियाँ वास्तव में भारतीय उपयोगकर्ताओं के लिए कारगर साबित हो रही हैं या नहीं।

नीति आयोग का 2025 का रोडमैप एक अहम रणनीतिक विकल्प को साफ तौर पर सामने रखता है। 2031 तक, भारत का टेक्नोलॉजी सेक्टर 1.5 मिलियन नौकरियाँ खो सकता है या 4 मिलियन तक नए अवसर पैदा कर सकता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अभी क्या फैसले लिए जाते हैं। ठीक इसी वजह से, यह आम धारणा कि “AI नौकरियाँ खा रहा है,”। लेकिन, देश की नीति बनाने वाली संस्थाएँ AI के इस बदलाव को सिर्फ एक जोखिम के तौर पर ही नहीं, बल्कि कौशल विकास, क्षमता निर्माण और स्थानीय इकोसिस्टम के एक मुकाबले के तौर पर देख रही हैं।

सबसे ईमानदार निष्कर्ष न तो बेफिक्री है और न ही घबराहट। AI पहले से ही कुछ दोहराए जाने वाले डिजिटल कामों को कम कर रहा है। यह साफ तौर पर शुरुआती स्तर के क्लर्क वाले काम, रोजमर्रा की कोडिंग, बुनियादी तौर पर चीजों को दोबारा लिखने और स्क्रीन पर किए जाने वाले दूसरे बहुत एक जैसे कामों पर दबाव डाल रहा है। साथ ही, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इंसानी मेहनत पूरी तरह से खत्म होने वाली है। असल में जो हो रहा है, वह है काम का फिर से मूल्यांकन: दोहराए जाने वाले कामों के लिए कम इनाम, और सही फैसला लेने, जाँच-पड़ताल करने, चीजों को जोड़ने, जवाबदेही, स्थानीय जानकारी और शारीरिक मौजूदगी के लिए ज्यादा इनाम।

इसलिए इस बात को कहने का बेहतर तरीका यह नहीं है कि ‘AI नौकरियाँ खा जाएगा।’ बल्कि यह है कि “AI उन लोगों को इनाम देगा जो खुद को बदलते हैं और उन लोगों को पीछे छोड़ देगा जो सीखना नहीं चाहते।” जो कोडर सिर्फ घिसे-पिटे कोड बनाते हैं, उन्हें उन कोडर के मुक़ाबले ज़्यादा जोखिम है जो AI की मदद से बने सिस्टम की समीक्षा कर सकते हैं, उनका ढाँचा तैयार कर सकते हैं और उन्हें बेहतर बना सकते हैं। जो लेखक सिर्फ दूसरों की बातों को अपने शब्दों में दोहराते हैं, उन्हें उन संपादकों और फैक्ट-चेकर के मुकाबले ज्यादा जोखिम है, जो मशीन से मिले आउटपुट की जाँच कर सकते हैं और उसे और बेहतर बना सकते हैं। प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, वेल्डर, मैकेनिक, किसान, बढ़ई और निर्माण क्षेत्र के मज़दूर AI के इस दौर में कोई पुरानी और बेकार चीजें नहीं हैं, वे उस इंसानी बुनियाद का हिस्सा हैं जिस पर AI वाली अर्थव्यवस्था आज भी निर्भर करती है।

भविष्य उन कामगारों का है जो अपने काम में माहिर हैं, और जो नए औज़ारों का इस्तेमाल करना जानते हैं, लेकिन अपने फैसले लेने की क्षमता को उन ‘हथियारों’ के हवाले नहीं करते।

(ये खबर मूलरूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)