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बंगाल नगर पालिका भर्ती घोटाले में TMC MLA मदन मित्रा के ठिकानों पर ED की छापेमारी, ₹200 करोड़ का हुआ खेल: जानें- इस संगठित लूट की पूरी कहानी

पश्चिम बंगाल में करीब ₹200 करोड़ के नगर पालिका भर्ती घोटाले की जाँच के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शनिवार (13 जून 2026) को तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) विधायक और पूर्व मंत्री मदन मित्रा से जुड़ी कई संपत्तियों पर छापेमारी की। जाँच एजेंसी ने मदन मित्रा से जुड़े कुल सात ठिकानों पर कार्रवाई की।

ED का कहना है कि जाँच के दौरान ऐसे सबूत मिले हैं जिनसे संकेत मिलता है कि कई नगर पालिकाओं में पैसे और सोना लेकर अवैध नियुक्तियाँ कराने में उनकी भूमिका रही है।

ED के मुताबिक, जाँच में पता चला है कि मदन मित्रा ने बिचौलियों के जरिए रिश्वत ली और नगर पालिकाओं में अयोग्य उम्मीदवारों को नौकरी दिलाने में मदद की। जाँच एजेंसी का दावा है कि खास तौर पर कमरहाटी नगर पालिका में उन्होंने करीब 125 लोगों की नियमों के खिलाफ नियुक्तियाँ करवाने में भूमिका निभाई।

छापेमारी के दौरान ED की टीम कमरहाटी स्थित मदन मित्रा के घर ‘उदय विला’ भी पहुँची। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस कार्रवाई में बैरकपुर पुलिस कमिश्नरेट के अधिकारी भी टीम के साथ मौजूद थे। बताया गया कि घर बंद मिला, जिसके बाद अधिकारियों ने ताला तोड़कर अंदर प्रवेश किया और कई घंटों तक तलाशी अभियान चलाया।

इस दौरान दस्तावेज, डिजिटल डिवाइस और अन्य सामग्री जब्त की गई, जिनकी अब जाँच की जा रही है। जाँच एजेंसियाँ इस बात की भी पड़ताल कर रही हैं कि जिस जमीन पर यह संपत्ति बनी है, वह कहीं किसी केंद्रीय सरकारी एजेंसी की जमीन तो नहीं है।

तलाशी के दौरान कुछ गोपनीय दस्तावेज मिलने की भी बात सामने आई है, जिन्हें अब इस पूरे मामले की जाँच के तहत खंगाला जा रहा है।

TMC विधायक सुजीत बोस को इसी साल की शुरुआत में ED ने किया था गिरफ्तार  

मदन मित्रा पर ED की यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब इसी भर्ती घोटाले से जुड़े मामले में कुछ ही हफ्ते पहले मई 2026 में TMC के एक अन्य वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सुजीत बोस को भी ED ने गिरफ्तार किया था।


ED के मुताबिक, जाँच में सामने आया कि सुजीत बोस ने दक्षिण दमदम नगर पालिका और अन्य नगर निकायों में नौकरी दिलाने के लिए करीब 150 उम्मीदवारों की सिफारिश की थी और इसके बदले पैसे लिए गए थे। जाँच एजेंसी का दावा है कि उन्हें ऐसे सबूत मिले हैं जिनसे पता चलता है कि नगर पालिका में नियुक्तियाँ कराने के बदले बोस को फ्लैट और अन्य संपत्तियाँ मिली थीं, जिन्हें अपराध से अर्जित संपत्ति माना जा रहा है।

ED ने यह भी दावा किया कि उनसे जुड़े बैंक खातों में बड़ी मात्रा में नकदी जमा की गई थी। उनकी गिरफ्तारी से पहले एजेंसी ने कई बार पूछताछ की और उन्हें कई समन भी जारी किए थे। पूर्व मंत्री ने इससे पहले विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान ईडी के सामने पेश होने से छूट मांगते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख किया था।

हालाँकि चुनाव खत्म होने के बाद वह जाँच एजेंसी के सामने पेश हुए। बाद में ED ने दोबारा पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इससे पहले भी ED ने सुजीत बोस से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की थी, जिनमें उनका दफ्तर और उनके परिवार से जुड़े परिसर शामिल थे।

अक्टूबर 2025 में हुई एक ऐसी कार्रवाई के दौरान अधिकारियों को 45 लाख रुपए नकद और कई दस्तावेज मिले थे, जिन्हें जाँच के लिए अहम सबूत माना गया।

क्या है नगरपालिका भर्ती घोटाला और कैसे सामने आया?

दिलचस्प बात यह है कि नगर पालिका भर्ती घोटाला शुरुआत में अलग मामले के तौर पर सामने नहीं आया था। इसका खुलासा पश्चिम बंगाल के चर्चित शिक्षक भर्ती घोटाले की जाँच के दौरान हुआ। साल 2023 में ED ने TMC से जुड़े प्रमोटर और कारोबारी अयान शील के ठिकानों पर छापेमारी की थी।

उस समय एजेंसी स्कूल भर्ती में अनियमितताओं और उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जाँच कर रही थी। तलाशी के दौरान अधिकारियों को बड़ी संख्या में दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और अन्य सामग्री मिली। इन सबूतों की जाँच के दौरान एजेंसी को संकेत मिले कि पश्चिम बंगाल की कई नगर पालिकाओं में भी पैसे लेकर नौकरी देने का ऐसा ही नेटवर्क चल रहा था।

इसके बाद ED ने अपनी जाँच का दायरा बढ़ाया। बाद में कलकत्ता हाई कोर्ट ने नगर पालिका भर्ती में अनियमितताओं की जाँच के लिए CBI जाँच का आदेश दिया।
जैसे-जैसे ED और CBI ने जाँच आगे बढ़ाई, वैसे-वैसे राज्य के कई नगर निकायों में बड़े स्तर पर अवैध नियुक्तियों के नेटवर्क का खुलासा होने लगा।

नगरपालिकाओं में बेची गईं हजारों नौकरियाँ

यह भर्ती घोटाला बंगाल की कई नगर पालिकाओं में साल 2014 से 2018 के बीच हुई नियुक्तियों से जुड़ा है। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, इस दौरान कई पदों पर पैसे लेकर नौकरियाँ दी गईं। इनमें मजदूर, सफाईकर्मी, क्लर्क, चपरासी, एम्बुलेंस अटेंडेंट, ड्राइवर, वार्ड मास्टर, सैनिटरी असिस्टेंट, हेल्पर, पंप ऑपरेटर और मेडिकल स्टाफ जैसे पद शामिल थे।

ED और CBI का दावा है कि इन नियुक्तियों में तय भर्ती प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। आरोप है कि जिन्होंने पैसे दिए उन्हें नगर पालिकाओं में स्थायी नौकरी मिल गई, जबकि योग्य उम्मीदवारों को मौका नहीं मिला।

जाँच एजेंसियों का यह भी कहना है कि अयान शील इस पूरे मामले में एक अहम बिचौलिए की भूमिका में था और उसने कई नगर पालिकाओं में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर नियुक्तियाँ कराने का काम किया।

करोड़ों रुपए और धन का व्यापक जाल 

जैसे-जैसे जाँच आगे बढ़ी, ED और CBI को पश्चिम बंगाल की कई नगर पालिकाओं में फैले पैसे लेकर नौकरी देने के बड़े नेटवर्क के संकेत मिलने लगे। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, यह मामला सिर्फ कुछ नियुक्तियों तक सीमित नहीं था, बल्कि कई नगर निकायों तक फैला हुआ एक बड़ा भर्ती घोटाला हो सकता है।

साल 2023 में कलकत्ता हाई कोर्ट में दाखिल अपनी शुरुआती रिपोर्ट में ED ने बताया था कि नगर पालिका भर्ती घोटाले से जुड़े लेनदेन की रकम करीब 200 करोड़ रुपए तक हो सकती है। एजेंसी के अनुसार, यह अनुमान मुख्य आरोपित अयान शील से पूछताछ में मिले बयानों और उसके ठिकानों से बरामद दस्तावेज, डिजिटल डिवाइस और रिकॉर्ड के आधार पर लगाया गया था।

जाँचकर्ताओं का मानना है कि उम्मीदवारों से नगर पालिका में नौकरी दिलाने के बदले पैसे लिए गए थे। ED के मुताबिक, इन अवैध नियुक्तियों का बड़ा हिस्सा उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना जिलों की नगर पालिकाओं में हुआ। एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि आरोपितों के बयान और जाँच में मिले दस्तावेजी व डिजिटल सबूतों का मिलान करने के बाद इस घोटाले की अनुमानित रकम तय की गई।

जाँच के दौरान ED ने कोलकाता के तारातला इलाके में छापेमारी कर 1.5 करोड़ रुपए से ज्यादा नकद बरामद करने का दावा किया। वहीं लेक टाउन में की गई कार्रवाई के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी, सोने के आभूषण और लग्जरी वाहन मिलने की बात कही गई।

जाँच एजेंसी का दावा है कि भर्ती घोटाले से मिले पैसों को वैध दिखाने के लिए कई निजी कंपनियों का इस्तेमाल किया गया। ED अधिकारियों के अनुसार, अवैध भर्ती से जुटाए गए करोड़ों रुपए अलग-अलग बैंक खातों और कारोबारी संस्थाओं के जरिए घुमाए गए। एजेंसी को शक है कि इस पूरे पैसे के नेटवर्क से कई प्रभावशाली लोगों को फायदा पहुँचा।

जाँच एजेंसियों का मानना है कि इस घोटाले का असली दायरा इससे भी बड़ा हो सकता है क्योंकि अभी कई अन्य नगर पालिकाओं और संभावित लाभार्थियों की जाँच जारी है।जाँचकर्ताओं के अनुसार, यह भर्ती नेटवर्क कई सालों तक चलता रहा, जिसमें बिचौलियों, नगर पालिका अधिकारियों, नेताओं और निजी संस्थाओं की भूमिका की जाँच की जा रही है।

CBI ने की 1,814 अवैध नियुक्तियों की पहचान

इस मामले में सबसे बड़े खुलासों में से एक CBI की जाँच के दौरान सामने आया। सूत्रों के मुताबिक, CBI ने पश्चिम बंगाल की 15 नगर पालिकाओं में कुल 1,814 अवैध नियुक्तियों की पहचान की। जाँच में सामने आया कि इनमें से कई भर्तियाँ अयान शील की कंपनी एबीएस इन्फोजोन प्राइवेट लिमिटेड के जरिए कराई गई थीं।

जाँच एजेंसी ने 17 नगर पालिकाओं के भर्ती रिकॉर्ड की जाँच की। इनमें से 15 नगर निकायों में अनियमित नियुक्तियाँ मिलीं। जाँच के दायरे में आई नगर पालिकाओं में दक्षिण दमदम में सबसे ज्यादा 329 नियुक्तियों को संदिग्ध या नियमों के खिलाफ पाया गया।

इसके अलावा कमरहाटी, बारानगर और टीटागढ़ जैसी नगर पालिकाओं में भी बड़ी संख्या में संदिग्ध नियुक्तियों के मामले सामने आए। CBI ने इन निष्कर्षों की जानकारी कोलकाता की विशेष अदालत को दी और नियुक्तियों से जुड़े विस्तृत रिकॉर्ड भी जमा किए।

जाँच के दौरान एजेंसी को कम से कम 25 ऐसे बैंक खातों की जानकारी मिली, जिनका इस्तेमाल घोटाले से जुड़े पैसों के लेनदेन के लिए किया गया। जाँचकर्ताओं ने पाया कि इन खातों में बड़ी रकम जमा होने के कुछ घंटों के भीतर ही निकाल ली जाती थी, जिससे मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका और मजबूत हुई।

जाँच के तहत CBI अधिकारियों ने 42 अलग-अलग ठिकानों पर छापेमारी की और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े कई अहम दस्तावेज अपने कब्जे में लिए।

फाइनल चार्जशीट में मुख्य आरोपितों के नाम आए सामने

इस मामले की जाँच एक अहम मोड़ पर तब पहुँची जब CBI ने इस साल जनवरी में अलीपुर स्थित विशेष CBI कोर्ट में अपनी अंतिम चार्जशीट दाखिल की। चार्जशीट में जिन बड़े नामों को शामिल किया गया, उनमें पश्चिम बंगाल कैडर के वरिष्ठ IAS अधिकारी ज्योतिष्मान चट्टोपाध्याय का नाम भी शामिल है।

CBI के मुताबिक, साल 2017 से 2019 के बीच वह शहरी विकास और नगर मामलों के विभाग के अंतर्गत स्थानीय निकाय निदेशालय में अहम पद पर तैनात थे और सितंबर 2018 में विभाग के निदेशक बने थे। यह निदेशालय नगर पालिका भर्ती प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसमें नियुक्तियों का आवंटन और भर्ती प्रक्रिया को मंजूरी देना शामिल होता है।

CBI का आरोप है कि अपने कार्यकाल के दौरान ज्योतिष्मान चट्टोपाध्याय ने अपने पद का गलत इस्तेमाल किया और नियमों के खिलाफ नियुक्तियाँ कराने में मदद की। उनके घर से मिले कुछ दस्तावेजों को भी जाँच एजेंसी ने इन आरोपों का आधार बताया है।

अंतिम चार्जशीट में एबीएस इन्फोजोन प्राइवेट लिमिटेड का नाम भी शामिल किया गया है। जाँच एजेंसियों का मानना है कि अयान शील ने इसी कंपनी के जरिए अवैध भर्तियों को अंजाम दिया। इससे पहले की चार्जशीट में अयान शील और दक्षिण दमदम नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन पंचुगोपाल राय को भी आरोपित बनाया जा चुका था।

जाँचकर्ताओं के अनुसार, अयान शील इस पूरे मामले के प्रमुख चेहरों में से एक माना जा रहा है और उसका नाम मुख्य रूप से TMC से जुड़ा बताया गया है। कोलकाता और चिनसुरा स्थित उसके दफ्तरों और घरों पर छापेमारी के बाद ED ने दावा किया था कि उससे जुड़ी करीब 100 करोड़ रुपए की संपत्तियों और कई अहम दस्तावेजों का पता चला है।

अंतिम चार्जशीट दाखिल होने और ED की लगातार कार्रवाई के बाद नगर पालिका भर्ती घोटाला पश्चिम बंगाल के स्थानीय निकायों से जुड़े सबसे बड़े भ्रष्टाचार मामलों में से एक बनकर सामने आया है। हाल में मदन मित्रा के ठिकानों पर हुई छापेमारी और सुजीत बोस की गिरफ्तारी को जाँच के दायरे के लगातार बढ़ने के तौर पर देखा जा रहा है। जाँच एजेंसियाँ अब इस मामले में अन्य लोगों की भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं।

मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।




फीफा विश्व कप 2026 में पुलिसिच की कप्तानी और बालोगन के दमदार गोलों से USA ने पैराग्वे को 4-1 से रौंदा, अब ब्राजील Vs मोरक्को पर सबकी नजर

मेजबान अमेरिका ने लॉस एंजेलिस के सोफी स्टेडियम में 70 हजार से अधिक घरेलू दर्शकों के सामने पैराग्वे को 4-1 से हराकर अपने फीफा विश्व कप 2026 अभियान की धमाकेदार शुरुआत की है। ग्रुप डी के इस मैच में उनका मुकाबला था पैराग्वे की टीम से। पैराग्वे जो नवीं दफा फीफा विश्व कप में खेलने जा रही थी।

इस दफा अमेरिकी फ़ुटबॉल टीम का संपूर्ण दारोमदार युरोपीयन फुटबॉल जगत में बेहद मशहूर कोच/मैनेजर ‘मारियो पोच्चेटीनो’ के सक्षम हाथों में है। पोच्चेटीनो को अपेक्षाकृत छोटी टीमों के संग भी बड़े क्लबों के विरुद्ध उनकी बारीक रणनीतियों को मैदान में सफलतापूर्वक आकार देने के लिए जाना जाता है।

सत्तर हजार घरेलू दर्शकों के अपार समर्थन के मध्य अमेरिकी टीम ने बेहद ही शानदार फुटबॉल खेली। उन्होंने मैच के पहले मिनट से ही विरोधी टीम के गोलपोस्ट के आसपास कई घातक मूव्स बनाए। कभी यूरोपीयन जाएंट्स ‘चेल्सी’ के लिए खेल चुके व फिलहाल ‘एसी मिलान’ के लिए खेल रहे ‘क्रिश्चियन पुलिसिच’ मैदान की बांई फ्लैंक से लगातार साथी खिलाड़ियों के लिए गोल स्कोर करने के मौके बना रहे थे। पैराग्वे को भनक भी न थी की अमेरिकी टीम ऐसी फुटबॉल भी खेल सकती है।

अमेरिकी टीम के आक्रामक खेल के चलते मैच के सातवें मिनट में ही ‘वेस्टन मैक्केनी’ के शॉट को रोकने के प्रयास में पैराग्वे के ‘बोबाडिल्ला’ एक आत्मघाती गोल कर बैठे। फिर तो अमेरिकी टीम ने लगातार विरोधी गोलपोस्ट की दिशा में आक्रमण करना शुरू कर दिया। वर्तमान में फ्रेंच फुटबॉल क्लब मोनाको के सेंट्रल फॉरवर्ड, चौबीस वर्षीय, ‘बालोगन’ ने मैच के इकत्तीसवें व ’45+5′ मिनट में दो शानदार गोल दाग अमेरिका को मैच के पहले हाफ में ही 3-0 से बढ़त दिला दी। मैच के दूसरे हाफ में मानो अमेरिकी लड़ाकों ने अपने घातक टैंकों के गियर से पैर हटा लिया हो।

पैराग्वे फिर भी पहले हाफ में हुए हमलों से उबर ही न सका। मैच के अंतिम क्षणों में ‘जियोवानी राएना’ ने इस टूर्नामेंट में अबतक का सबसे बेहतरीन गोल दाग स्कोर 4-1 कर दिया, जो अंतिम व्हिस्ल बजने तक समान ही रहा। मैच में क्रिश्चियन पुलिसीच की कलात्मकता व बालोगन के दो बेहतरीन गोलों ने सोफी स्टेडियम में दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। ‘जियोवानी राएना’ ने लामीन यमाल के अंदाज में ‘त्रिवेला’ किक लगा जो मैच के अंतिम क्षणों में गोल दागा, वह चैरी ऑन द केक सरीखा था।

विश्व कप का आगाज़ सही मायनों में चुका है। पिछले चार वर्षों से जो धरा बारूद के ढर्रे पर बैठी हुई है उसे फिर मुस्कुराने की वजह मिल गई है। मेजबान देशों अमेरिका, कनाडा व मेक्सिको, खासकर मेक्सिको व कनाडा में विश्व भर से फुटबॉल प्रेमी पहुँच चुके हैं और खेल का आनंद ले रहे हैं। मेक्सिको ने तो अपने सेवा भाव से तमाम आगंतुकों का दिल जीत लिया है।

टूर्नामेंट के पहले दिन मेजबान मेक्सिको ने ओपनिंग मैच में, राउल जिमिनेज़ के बेहतरीन गोल की बदौलत, दक्षिण अफ्रीका को 2-0 से हराया था और दक्षिण कोरिया ने संपूर्ण टीम के शानदार खेल की बदौलत चेक-रिपब्लिक को 2-1 से मात दी थी।

अब है टूर्नामेंट का पहला वीकेंड। अब धीरे-धीरे बड़ी टीमें भी मैदान में उतरेंगी। रोमांच अपने चरम पर होगा। शनिवार (13 जून 2026) की रात होंगे दो मुकाबले। भारतीय समयानुसार रात साढ़े बारह बजे ग्रुप बी की दो टीमें, कतर व स्विट्जरलैंड, आपस में भिड़ने जा रही हैं। वहीं रात साढ़े तीन बजे होगा एक ऐसा महासंग्राम, जिसपर निश्चित ही आपकी नजर बनी रहनी चाहिए। ग्रुप सी में पिछले विश्व कप के ‘जाएंट किलर्स’ मोरक्को का सामना होने जा रहा है ब्राजील से। ग्रुप स्टेज के सबसे बड़े मैचों में एक इस मैच का सभी को इंतजार था।

विनीसीयूस जूनियर, राफिन्हा, ऐलीसन, मार्क्विन्हॉस, कासेमीरो, मार्टेनेली, कुन्हा, गुईमराएज़, पाक्वेता आदि सितारा खिलाड़ियों से सजी ब्राजीली टीम कोच ‘कार्लो एन्सिलोटी’ के मार्गदर्शन में एक दफा फिर घातक दिखने लगी है। कोच एन्सिलोटी ने इस टीम पर काफी काम किया है। हांलांकि, नेमार, द प्रिंस हू नेवर बिकेम द किंग, घायल हैं और इस मैच का हिस्सा नहीं होंगे।

वहीं मोरक्को को एक सूपरपॉवर बनाने वाले उनके कोच ‘वालिद रेग्रागुई’ अब उनका नेतृत्व नहीं कर रहे हैं। फिर भी मोरक्को एक ऐसी टीम है जिसे आप कम तर नहीं आँक सकते। वो सदैव मैदान में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। हाकीमी के नेतृत्व में बोनू, अमराबात और माज़ारूई जैसे खिलाड़ियों से लैस मोरक्को जरूर आज रात बड़ा शिकार करने के लिए आतुर होगी।

मेटलाइफ स्टेडियम में होने जा रहे इस मुकाबले पर आपकी नजर बनी रहनी चाहिए। आगे खेल के इस रोचक महाकुंभ की बातें चलती रहेंगी। आप भी अब जहाँ कहीं भी हों, अपनी तमाम उलझनों को कुछ दिन भूल कर, इस महासम्मेलन के उन्माद में गोते लगाइए।

करोड़ों का इनाम, जेल से शुरुआत… ट्रंप ने जिस आतंकी संगठन ‘ट्रेन डी अरागुआ’ को बताया ‘खून का प्यासा’, पढ़ें- मजदूर से माफिया बनने की उसकी कहानी: सरगना नीनो गुएरेरो को US ने किया ढेर

जुर्म का अंत हमेशा बुरा होता है। अपराधी चाहे कितना भी ताकतवर हो, वह बच नहीं सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक सीधे आदेश ने इस बात को सच साबित कर दिया है। उनके आदेश पर अमेरिकी सेना ने एक बड़ा हवाई हमला किया। इस हमले में वेनेजुएला का सबसे खूंखार गैंगस्टर नीनो गुएरेरो मारा गया है। नीनो गुएरेरो ‘ट्रेन डी अरागुआ’ नाम के खतरनाक आतंकी संगठन का मुख्य सरगना था। ट्रंप ने इस गैंग को ‘खून का प्यासा’ बताया। उसका खूनी साम्राज्य लातिन अमेरिका से लेकर अमेरिका तक फैला हुआ था। ट्रंप ने इस सफलता का खुद एलान किया। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि अब दुनिया में कहीं भी इन अपराधियों के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बची है।

ट्रंप का सीधा आदेश और पेंटागन का बड़ा एक्शन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बड़े सैन्य ऑपरेशन की जानकारी दी। ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी सेना के ‘साउदर्न कमांड’ ने यह हमला किया था। यह हमला बेहद तेज और जानलेवा था। इस हमले का मुख्य मकसद ‘ट्रेन डी अरागुआ’ के कुख्यात लीडर नीनो गुएरेरो को खत्म करना था। ट्रंप ने इस संगठन को धरती का सबसे क्रूर और हिंसक आतंकी गिरोह बताया है।

पेंटागन के प्रमुख पीट हेगसेथ ने भी इस हमले की पुष्टि की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसके बारे में बताया। यह हवाई हमला इसी सप्ताह की शुरुआत में किया गया था। पूरी जाँच के बाद अब साफ हो चुका है कि गुएरेरो इस हमले में मारा गया है। ट्रंप प्रशासन ने इस कार्रवाई का एक Video भी जारी किया है। इस Video में तबाही का मंजर साफ देखा जा सकता है।

वेनेजुएला सरकार की पुष्टि और संयुक्त खुफिया ऑपरेशन

इस खूंखार आतंकी को ढेर करने में वेनेजुएला सरकार ने भी अमेरिका का साथ दिया है। वेनेजुएला के सूचना और संचार मंत्रालय ने एक बयान जारी कर बताया कि यह एक साझा ऑपरेशन था। सुरक्षाबलों और इस आपराधिक संगठन के बीच काफी देर तक भीषण मुठभेड़ चली। इस मुठभेड़ के दौरान ही आतंकी नीनो गुएरेरो को ‘न्यूट्रलाइज’ यानी हमेशा के लिए शांत कर दिया गया।

यह पूरा ऑपरेशन दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों की गहरी सूझबूझ का नतीजा था। इसमें आधुनिक तकनीक और हाई-टेक सपोर्ट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। वेनेजुएला की सरकार ने बताया कि उन्होंने अमेरिका के साथ मिलकर इस खूंखार अपराधी की हर हरकत पर नजर रखी थी। इसके बाद सही मौका मिलते ही इस पर अंतिम प्रहार किया गया।

न्यूयॉर्क कोर्ट में काला चिट्ठा और 41 करोड़ का इनाम

नीनो गुएरेरो लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के निशाने पर था। पिछले साल दिसंबर में न्यूयॉर्क की एक फेडरल कोर्ट में उसके खिलाफ गंभीर धाराओं में चार्जशीट दाखिल की गई थी। उस पर नार्को-आतंकवाद, जबरन वसूली, हत्या की साजिश और आतंकियों को हथियार और पैसा सप्लाई करने जैसे दर्जनों संगीन मामले दर्ज थे। वह एक दशक से ज्यादा समय से इन वारदातों को अंजाम दे रहा था।

अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने गुएरेरो की गिरफ्तारी या उसके बारे में सही जानकारी देने वाले को 50 लाख डॉलर का इनाम देने का ऐलान किया था। भारतीय रुपयों में यह रकम करीब 41 करोड़ रुपए बैठती है। अमेरिकी वकीलों के मुताबिक, नीनो गुएरेरो का यह गैंग (खून का प्यासा) पूरे उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और यूरोप के कई देशों में अनगिनत हत्याओं और ड्रग्स की तस्करी के लिए जिम्मेदार था।

जेल से चला साम्राज्य और ‘डॉन’ का जन्म (2013)

इस खूंखार गैंग ‘ट्रेन डी अरागुआ’ की शुरुआत साल 2005 में एक मजदूर संगठन के रूप में हुई थी। वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के राज में एक रेलवे लाइन का निर्माण हो रहा था। इस प्रोजेक्ट में काम करने वाले मजदूरों ने मिलकर एक यूनियन बनाई। लेकिन जल्द ही इन मजदूरों के मन में लालच आ गया। उन्होंने ठेकेदारों को डराना और उनसे पैसे ऐंठना शुरू कर दिया। साल 2011 में जब सरकार ने यह रेलवे प्रोजेक्ट बंद किया, तो वो मजदूर पूरी तरह एक क्रिमिनल गैंग बन चुके थे। नाम पड़ा- ‘ट्रेन डी अरागुआ’ (अरागुआ की ट्रेन)।

साल 2013 में इस गैंग की कमान मिली हेक्टर रस्टेनफोर्ड गुएरेरो उर्फ नीनो गुएरेरो को। नीनो वेनेजुएला की सबसे बदनाम ‘तोकोरॉन जेल’ (Tocorón Prison) में बंद था। लेकिन वह मामूली कैदी नहीं था, वह वहाँ का ‘प्रान’ (जेल का डॉन) बन गया। उसने जेल के अंदर ही ऐश-ओ-आराम का महल बनाया। वहीं बैठे-बैठे उसने पूरे देश में ड्रग्स, जबरन वसूली और इंसानों की तस्करी का धंधा फैला दिया।

मजबूरी का फायदा और सरहदें पार

साल 2015 में वेनेजुएला में भयंकर गरीबी और भुखमरी फैल गई। लाखों लोग देश छोड़कर भागने लगे। नीनो गुएरेरो ने इस मजबूरी को धंधा बना लिया। उसके गैंग ने बॉर्डर पर कब्जा किया और भागने वाले गरीबों से टैक्स वसूलने लगे। इतना ही नहीं, इस गैंग के शातिर अपराधी आम शरणार्थियों के भेष में कोलंबिया, पेरू, चिली और अमेरिका जैसे देशों में घुस गए।

इन देशों में जाकर उन्होंने वेनेजुएला के ही प्रवासियों को अपना शिकार बनाना शुरू किया। उन्होंने वहाँ महिलाओं की तस्करी की और छोटे स्तर पर ड्रग्स बेचने का धंधा शुरू कर दिया। लातिन अमेरिका की पुलिस के मुताबिक, इस गैंग ने कई देशों में अपनी परमानेंट सेल (गुप्त ठिकाने) बना ली थीं।

चिली में पूर्व सैन्य अधिकारी की हत्या से मचा था हड़कंप

‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग अपनी बेरहमी और खौफनाक हत्याओं के लिए जाना जाता है। मार्च 2023 में इस गैंग ने चिली में एक ऐसी वारदात को अंजाम दिया, जिससे दो देशों के बीच तनाव बढ़ गया। गैंग के शूटरों ने वेनेजुएला की सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट और सरकार के विरोधी रोनाल्ड ओजेडा का अपहरण कर लिया। इसके बाद उनकी बेहद क्रूरता से हत्या कर दी गई।

यह गैंग पनामा से लेकर ब्राजील तक फैल चुका था। अपहरण, मनी लॉन्ड्रिंग, सुपारी लेकर हत्या करना और बड़े-बड़े मॉल में डकैती डालना इनका रोज का काम था। साल 2023 में जब वेनेजुएला की सेना ने इनकी तोकोरॉन जेल पर धावा बोला, तो गुएरेरो जेल के नीचे बनी एक गुप्त सुरंग से अपने साथियों के साथ भाग निकला था। तब से वह लगातार अपनी लोकेशन बदल रहा था।

अमेरिका के ऑरोरा में घुसपैठ और ट्रंप का चुनावी मुद्दा

पिछले साल अगस्त में अमेरिका के कोलोराडो राज्य के ऑरोरा शहर से एक वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में कुछ हथियारबंद वेनेजुएला के प्रवासी एक अपार्टमेंट की बिल्डिंग में जबरन घुसते दिखे थे। इस घटना के बाद वहाँ के मकान मालिक और नेताओं ने दावा किया कि ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग ने अमेरिका की सोसायटियों पर कब्जा करना शुरू कर दिया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे को बहुत जोर-शोर से उठाया था। उन्होंने ऑरोरा शहर में एक बड़ी रैली की थी और मंच पर इन अपराधियों के पोस्टर लगाए थे। ट्रंप ने अमेरिकी जनता से वादा किया था कि वह राष्ट्रपति बनते ही देश में अवैध रूप से रह रहे इन अपराधियों को तुरंत बाहर निकालेंगे। ट्रंप की इस आक्रामक नीति को जनता का भारी समर्थन मिला था।

राष्ट्रपति निकोलस मादुरो से कनेक्शन और अमेरिकी सेना का एक्शन

राष्ट्रपति ट्रंप का हमेशा से आरोप रहा है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने जानबूझकर अपने देश के कैदियों को अमेरिका भेजा ताकि वहाँ अपराध बढ़ सके। हालाँकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट में इस बात के सीधे सबूत नहीं मिले थे। इसके बावजूद, अमेरिकी सेना ने इसी साल जनवरी में एक बेहद गुप्त ऑपरेशन चलाकर निकोलस मादुरो को वेनेजुएला से उठा लिया था। मादुरो पर फिलहाल अमेरिका में नार्को-आतंकवाद का केस चल रहा है।

अदालत में पेश की गई नई चार्जशीट में खुलासा हुआ है कि मादुरो सरकार और नीनो गुएरेरो का गैंग आपस में मिलकर काम कर रहे थे। वे मिलकर ड्रग्स के धंधे से मोटा मुनाफा कमा रहे थे। ट्रंप ने गुएरेरो की मौत पर कहा कि जो बाइडेन की कमजोर नीतियों के कारण अमेरिका की सीमाएं असुरक्षित हो गई थीं। लेकिन अब उनकी सरकार इन राक्षसों को चुन-चुनकर खत्म कर रही है।

जोसलीन और लेकन रीली की मौत का लिया बदला

अमेरिका में अवैध प्रवासियों द्वारा की गई कुछ हत्याओं ने पूरे देश को नाराज कर दिया था। 12 साल की मासूम बच्ची जोसलीन नुंगारे और 22 साल की छात्रा लेकन रीली की बिना दस्तावेज वाले प्रवासियों ने हत्या कर दी थी। ट्रंप ने नीनो गुएरेरो की मौत का ऐलान करते हुए इन दोनों बच्चियों का विशेष रूप से नाम लिया।

ट्रंप ने अपने बयान में लिखा कि अमेरिकी सेना ने इन मासूम बच्चियों और उनके परिवारों के साथ पूरा न्याय किया है। इस खूंखार गैंग के सरगना को मारकर सेना ने उनकी मौतों का बदला ले लिया है। ट्रंप ने साफ किया कि उनके राज में अपराधियों को कोई माफी नहीं मिलेगी और अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा।

‘एलियन एनिमीज एक्ट’ और मास डिपोर्टेशन की तैयारी

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही ‘ट्रेन डी अरागुआ’ को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। उन्होंने देश के 200 साल पुराने ‘एलियन एनिमीज एक्ट’ का इस्तेमाल करने का फैसला किया है। यह कानून सरकार को यह ताकत देता है कि वह किसी भी संदिग्ध विदेशी नागरिक को बिना किसी अदालती सुनवाई के तुरंत गिरफ्तार करके देश से बाहर निकाल सकती है।

अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि यह गैंग कोई मामूली चोर-उचक्कों का ग्रुप नहीं है, बल्कि यह एक हमलावर विदेशी सेना की तरह है। ट्रंप सरकार ने इस गैंग के कई संदिग्ध सदस्यों को बिना कोर्ट की मंजूरी के अल साल्वाडोर की सबसे खतरनाक ‘सेकोट जेल’ में भेजना शुरू कर दिया था। हालांकि अदालतों ने इस पर कुछ पाबंदियां लगाई हैं, लेकिन सरकार अपनी कार्रवाई पर टिकी हुई है।

मैक्सिकन कार्टेल्स के सामने कमजोर था यह गैंग

भले ही अमेरिका में इस गैंग को लेकर काफी डर का माहौल बनाया गया हो, लेकिन खोजी संस्था ‘इनसाइट क्राइम’ की रिपोर्ट कुछ और ही कहानी कहती है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग अमेरिका के अंदर उतना मजबूत नहीं है। अमेरिका के ड्रग मार्केट पर पहले से ही मैक्सिको के बेहद खतरनाक ‘सिनालोआ कार्टेल’ और ‘जालिस्को न्यू जनरेशन कार्टेल’ का पूरी तरह कब्जा है।

वेनेजुएला का यह गैंग मैक्सिकन कार्टेल्स के सामने बहुत छोटा और कमजोर है। अमेरिकी सीमा पर इस गैंग के गुर्गे खुद को बचाने के लिए मैक्सिकन माफियाओं के लिए छोटे-मोटे काम करते हैं। अमेरिकी गृह मंत्रालय के अनुसार, पूरे अमेरिका में इस गैंग के केवल 600 के करीब एक्टिव मेंबर्स हैं। यह संख्या अमेरिका में रहने वाले 7 लाख अच्छे और शांतिप्रिय वेनेजुएला के प्रवासियों का बहुत छोटा हिस्सा है।

इस बड़े सैन्य एक्शन का आगे क्या असर होगा?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बड़े और आक्रामक कदम ने दुनिया भर के अपराधियों को हिलाकर रख दिया है। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि वे इन क्रूर हत्यारों और ड्रग तस्करों को दुनिया के किसी भी कोने से ढूँढ निकालेंगे। अमेरिकी साउदर्न कमांड का यह एक्शन दिखाता है कि अमेरिका अब अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ‘ट्रेन डी अरागुआ’ गैंग ने वेनेजुएला की जेल से निकलकर कई देशों में मौत और खौफ का जो खेल शुरू किया था, उसका अंत अब नजदीक है। इसके मुख्य सरगना नीनो गुएरेरो की मौत ने इस पूरे गैंग की कमर तोड़ दी है।

जानिए किस ‘शर्त’ पर UP चुनावों में सपा के समर्थन को तैयार हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, क्यों हिंदू विरोधी अतीत को दे रहे हैं ‘क्लीनचिट’? अखिलेश के PDA बयान पर कहा- गलतफहमी में न रहें, आरक्षण का भी किया विरोध

गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने और गौहत्या पर प्रतिबंध की माँग को लेकर निकाली जा रही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ‘गविष्ठी यात्रा’ लगातार चर्चाओं में है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को लेकर यह सवाल उठ रहे थे कि इसे समाजवादी पार्टी (सपा) और कॉन्ग्रेस ने हाईजैक तो नहीं कर लिया है। अब अखिलेश यादव के एक बयान के बाद विवाद और बढ़ गया है।

दरअसल, अखिलेश यादव ने शुक्रवार (12 जून 2026) को एटा में कहा कि शंकराचार्य भी PDA हो गए हैं। विधानसभा चुनाव 2026 में टिकट बँटवारे को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “पूजनीय शंकराचार्य जी भी पीड़ित, दुखी, अपमानित हो रहे हैं इस सरकार में। वह भी PDA हो गए हैं, इसलिए हम उनके साथ हैं।” अखिलेश यादव के इस बयान और यात्रा में सपा नेताओं के शामिल होने पर उठ रहे सवालों को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी संजय पांडेय ने ऑपइंडिया से बात की है।

गलफहमी ना पालें अखिलेश: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष

3 मई 2026 से शुरू हुई इस 81 दिवसीय यात्रा को लेकर संजय पांडेय ने कहा कि यात्रा को लेकर जनता का रुख सकारात्मक है और यात्रा के बाद से मुस्लिम और ईसाई भी समर्थन में आ गए हैं। वहीं, अखिलेश यादव के बयान पर उन्होंने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “अगर ऐसा कुछ भी अखिलेश जी ने बयान दिया है कि महाराज जी PDA का हिस्सा हो गए हैं, तो ये उनकी गलतफहमी है। महाराज जी सिर्फ सनातन धर्म के हैं। वो किसी राजनीतिक दल के नहीं हैं।”

हालाँकि, उन्होंने कहा, “अगर PDA अभी यह घोषणा कर दे कि सरकार बनने पर गाय को ‘राज्य माता’ घोषित किया जाएगा और गौकशी पर पूरी तरह रोक लगाई जाएगी, तो उन्हें शंकराचार्य जी का समर्थन और आशीर्वाद मिलेगा। वे और उनके समर्थक PDA के साथ खड़े होंगे। लेकिन अगर ऐसा नहीं किया गया तो शंकराचार्य जी का समर्थन उन्हें नहीं मिलेगा।”

संजय पांडेय ने कहा, “यह किसी विशेष दल का समर्थन करने का मामला नहीं है। अगर बीजेपी, कॉन्ग्रेस या PDA कोई भी दल अपने घोषणा पत्र में गाय को राज्य माता घोषित करने और गोकशी बंद कराने का लिखित व सार्वजनिक वादा करेगा तो उन्हें समर्थन दिया जाएगा। यह मुद्दा किसी पार्टी का नहीं बल्कि गौ माता के प्राणों की रक्षा का है।”

सपा-कॉन्ग्रेस के नेताओं के यात्रा में शामिल होने पर क्या बोले अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को लेकर यह सवाल पूछा जा रहा है कि कहीं उनकी यात्रा को उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों ने हाईजैक तो नहीं कर लिया है। दरअसल, उनकी यात्रा के मंचों पर सपा और कॉन्ग्रेस के नेता खूब नजर आ रहे हैं और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख सरकार को लेकर गोरक्षा के विषय से आगे बढ़कर आक्रामक नजर आ रहा है।

कुछ दिनों पहले उनकी यात्रा जब इटावा के सैफई पहुँची तो उनके मंच पर अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिंपल यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव नजर आए थे। इस दौरान उन्होंने मुलायम सिंह यादव के परिवार की न सिर्फ जमकर तारीफ की बल्कि मुलायम सिंह को ‘संतों का सम्मान करने वाला’ और ‘दशकों पुराना सच्चा हितैषी’ तक करार दे दिया।

उन्होंने अखिलेश यादव और डिंपल यादव को ‘बड़े दिल वाला’ बताते हुए मुलायम सिंह यादव द्वारा पूर्व में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की गिरफ्तारी का भी एक तरह से बचाव कर डाला था। इस बारे में भी संजय पांडेय ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख स्पष्ट किया है।

संजय पांडेय ने कहा, “किसी भी राजनीतिक दल वाले आ रहे हैं तो वो सनातनी ही हैं। जब मुस्लिम समर्थन कर रहे हैं, गौ माता को राष्ट्र माता बोल रहे हैं जबकि उनके धर्म में पशु माना जाता है। तो जब वो तैयार हो गए हैं, किसी भी राजनीतिक पार्टी का हिंदू अगर आ रहा है, तो उसका स्वागत है। उसमें भाजपा के भी लोग आएँ, उनके लिए भी कोई रोक नहीं है।”

‘सपा के हिंदू विरोधी अतीत’ से जुड़े सवालों पर उन्होंने कहा, “शंकराचार्य जी महाराज, परंपरा से जुड़े हुए हैं और सपा की सच्चाई भी इनको मालूम है। सपा जहाँ गड़बड़ है, सपा जो गलत कर रही है धर्म विरोधी, तो सपा का भी विरोध रहेगा। अभी जब राजकुमार भाटी ने बयान दिया था ब्राह्मणों और धर्म के खिलाफ तो महाराज श्री ने उनकी भी निंदा की थी और कहा था कि समाजवादी पार्टी को जनता ठीक कर देगी।”

उन्होंने कहा, “जितना धर्म के अंश में वह काम करेंगे, उतना ही शंकराचार्य जी का उनके साथ समर्थन रहेगा, आशीर्वाद रहेगा। जो भी अधर्म करेगा, यहाँ तक कि हम शिष्य भी अगर अधर्म करेंगे तो हम लोग को वह मार के भगा देंगे। शंकराचार्य जी को केवल शास्त्र और धर्म से मतलब है और किसी से कोई उनका और मतलब नहीं है। अगर कोई ऐसा सोचता है तो उसकी मूर्खता है।”

वहीं, मजहबी आधार पर आरक्षण की माँग करने वाली पार्टियों को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने हर तरह के आरक्षण का विरोध करने की बात कही हैं। उन्होंने कहा, “हम लोग तो किसी आधार पर आरक्षण नहीं चाहते हैं। किसी भी मजहब या किसी भी तरह से, आरक्षण से हम लोग का देश नष्ट ही हो जाएगा। शंकराचार्य जी का मानना है कि आरक्षण नहीं होना चाहिए।”

जब ‘रजस्वला’ होती हैं माँ कामाख्या: 3 दिन रुक जाती है पूजा, खुलते हैं सृजन, शक्ति और साधना के रहस्य; पढ़ें- अंबुबाची मेले की अनोखी कथा

भारत की धार्मिक परंपराएँ केवल पूजा-पाठ या आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें प्रकृति, जीवन, स्त्री शक्ति और सृजन का गहरा दर्शन भी छिपा हुआ है। देश में कई ऐसे पर्व मनाए जाते हैं जो मनुष्य और प्रकृति के संबंध को समझाते हैं। इन्हीं में से एक है अंबुबाची मेला, जो हर साल असम के गुवाहाटी स्थित माँ कामाख्या मंदिर में आयोजित किया जाता है।

यह मेला अपने स्वरूप, मान्यताओं और धार्मिक रहस्य के कारण बाकी मेलों से बिल्कुल अलग माना जाता है। यहाँ न तो केवल दर्शन का महत्व है और न ही केवल अनुष्ठानों का, बल्कि यह आयोजन उस समय से जुड़ा माना जाता है जब देवी स्वयं विश्राम करती हैं।

मान्यता है कि इन दिनों माँ कामाख्या वार्षिक रजस्वला अवस्था (मासिक धर्म) में रहती हैं और इसी वजह से मंदिर के कपाट कुछ दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

पूर्वोत्तर भारत का यह सबसे बड़ा धार्मिक समागम माना जाता है, जहाँ लाखों श्रद्धालु, साधु-संत, तांत्रिक साधक और देश-विदेश से आने वाले पर्यटक जुटते हैं। इन दिनों पूरा क्षेत्र भक्ति, साधना, रहस्य और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है।

क्या है अंबुबाची मेला और इसकी मान्यता क्यों है अलग?

अंबुबाची मेला देवी शक्ति की उपासना से जुड़ा एक वार्षिक धार्मिक आयोजन है। इसकी सबसे विशेष मान्यता यह है कि इस अवधि में माँ कामाख्या को रजस्वला माना जाता है। इस कारण देवी को विश्राम दिया जाता है और मंदिर में सामान्य पूजा-पाठ रोक दिया जाता है।

यह परंपरा स्त्री शरीर और सृजन प्रक्रिया के सम्मान का प्रतीक भी मानी जाती है। जहाँ कई संस्कृतियों में मासिक चक्र को अलग नजर से देखा गया, वहीं इस परंपरा में इसे सृजन शक्ति और जीवन के स्रोत के रूप में सम्मान दिया गया है। अंबुबाची शब्द को भी कई लोग जल, उर्वरता और सृजन से जोड़कर देखते हैं।

यही वजह है कि यह मेला केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व भी रखता है। तंत्र साधना से जुड़े लोगों के लिए भी यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में साधना और मंत्र सिद्धि का विशेष महत्व होता है, इसलिए बड़ी संख्या में साधक यहाँ पहुँचते हैं।

कामाख्या मंदिर अंबूबाची मेला
कामाख्या मंदिर के अंबूबाची मेले में हर साल लाखों श्रद्धालुओं की लगती है भीड़ (फोटो साभार: AI)

अंबुबाची मेला 2026: कब शुरू होगा और क्या रहेगा कार्यक्रम?

साल 2026 में अंबुबाची मेले की शुरुआत 22 जून की रात से होगी। इसी दिन रात लगभग 9 बजकर 8 मिनट पर मंदिर के गर्भगृह के कपाट बंद कर दिए जाएँगे। इसके बाद 23 जून, 24 जून और 25 जून तक मंदिर का गर्भगृह पूरी तरह बंद रहेगा। इस दौरान किसी भी श्रद्धालु को देवी के प्रत्यक्ष दर्शन की अनुमति नहीं होती।

मंदिर परिसर में भी सामान्य धार्मिक गतिविधियों को सीमित रखा जाता है। चार दिवसीय इस आयोजन का समापन 26 जून की सुबह विशेष अनुष्ठानों और शुद्धिकरण प्रक्रिया के बाद होगा। इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए दर्शन दोबारा शुरू किए जाएँगे। हर साल यहाँ आने वाले लोगों की संख्या लाखों में होती है।

पिछले वर्षों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुँचने के बाद प्रशासन और मंदिर समिति विशेष व्यवस्था करती रही है। इस बार भी सुरक्षा, सफाई, पेयजल, चिकित्सा और श्रद्धालुओं की आवाजाही को लेकर व्यापक तैयारियाँ की जा रही हैं।

प्रवृत्ति और निवृत्ति: मेले के दो आध्यात्मिक चरण

अंबुबाची मेले की पूरी प्रक्रिया दो प्रमुख चरणों में पूरी होती है- प्रवृत्ति और निवृत्ति। प्रवृत्ति चरण देवी के रजस्वला काल की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इस समय मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और देवी को विश्राम दिया जाता है। इन दिनों पूजा, आरती और नियमित धार्मिक गतिविधियां नहीं होतीं।

इसके बाद आता है निवृत्ति चरण। इसे देवी के विश्राम काल की समाप्ति और पुनः ऊर्जा के साथ दर्शन देने की अवस्था माना जाता है। विशेष शुद्धिकरण और वैदिक अनुष्ठानों के बाद मंदिर खोला जाता है। यही वह समय होता है जब सबसे ज्यादा श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं और मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक वातावरण देखने को मिलता है।

धरती माँ के विश्राम और स्त्री शक्ति का संदेश

अंबुबाची मेले का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। इससे जुड़ा एक गहरा प्राकृतिक और सांस्कृतिक संदेश भी माना जाता है। लोकमान्यता के अनुसार, जैसे एक स्त्री मासिक धर्म के दौरान विश्राम करती है, उसी तरह इस अवधि में धरती भी विश्राम करती है।

यह समय सामान्य रूप से मानसून के आगमन और भूमि की नई उर्वरता से भी जोड़ा जाता है। इसी सोच के कारण आज भी कई परिवार इन दिनों खेती-बाड़ी, भूमि की खुदाई या कुछ शुभ कार्यों को टालते हैं। इसका उद्देश्य किसी भय से नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और सृजन प्रक्रिया को समझने से जुड़ा माना जाता है।

यह मान्यता बताती है कि धरती केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन देने वाली शक्ति है, जिसे समय-समय पर विश्राम और सम्मान की आवश्यकता होती है।

अंगोदक, अंगवस्त्र और मेले से जुड़ी विशेष परंपराएँ

अंबुबाची मेले की एक महत्वपूर्ण पहचान है यहाँ मिलने वाला विशेष प्रसाद। परंपरा के अनुसार, मंदिर बंद करने से पहले गर्भगृह में विशेष वस्त्र रखे जाते हैं। कपाट खुलने के बाद श्रद्धालुओं को अंगोदक और अंगवस्त्र प्रदान किया जाता है। अंगोदक पवित्र जल को कहा जाता है जबकि अंगवस्त्र लाल वस्त्र के छोटे भाग को माना जाता है।

श्रद्धालु इसे देवी की कृपा और शक्ति का प्रतीक मानकर अपने साथ ले जाते हैं। इन दिनों मंदिर परिसर में देशभर से आए साधु-संतों और तांत्रिक परंपरा से जुड़े लोगों का भी विशेष जमावड़ा देखने को मिलता है, जिससे मेले का आध्यात्मिक स्वरूप और अधिक विशिष्ट हो जाता है।

माँ कामाख्या मंदिर: जहाँ मूर्ति नहीं, शक्ति के प्रतीक की होती है पूजा

अंबुबाची मेले की आत्मा माँ कामाख्या मंदिर ही है। असम के गुवाहाटी शहर की नीलाचल पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी सती के शरीर के विभिन्न अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए। कामाख्या को उस स्थान से जोड़ा जाता है जहाँ देवी का योनि भाग गिरा माना जाता है।

इसी कारण यह मंदिर शक्ति, सृजन और देवी उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहाँ देवी की पारंपरिक मूर्ति नहीं है। गर्भगृह में प्राकृतिक शिला स्वरूप की पूजा की जाती है, जो हमेशा जलधारा से सिक्त रहती है। यही स्वरूप इस मंदिर को बाकी शक्तिपीठों से अलग बनाता है।

मुख्य मंदिर के आसपास देवी के विभिन्न स्वरूपों और भगवान शिव को समर्पित कई मंदिर भी स्थित हैं, जो पूरे नीलाचल क्षेत्र को एक विशाल आध्यात्मिक परिसर का रूप देते हैं। इसी वजह से अंबुबाची मेला केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि आस्था, स्त्री शक्ति, प्रकृति, सृजन और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत उत्सव माना जाता है।

एल्गोरिदम के बँधुआ मजदूर… ‘अटेंशन इकॉनमी’ का डिजिटल सर्वहारा

Netflix की मशहूर सीरीज ‘ब्लैक मिरर’ का वह बेहद चर्चित एपिसोड आपको याद होगा- ‘नोसडाइव’। मुख्य किरदार लेसी स्क्रीन पर अपनी रेटिंग बढ़ाने के लिए अपनी हँसी, अपने आँसुओं और अपनी आत्मा का सौदा कर रही है। वह एक ऐसी दुनिया है जहाँ इंसान की कीमत उसकी धड़कनों के बजाय उसकी स्क्रीन पर चमकते डिजिटल कार्ड्स और फाइव स्टार रेटिंग से तय होती है।  हमारा वर्तमान भी ब्लैक मिरर के उस डायस्टोपियन भविष्य से टकराकर चकनाचूर हो चुका है। फिक्शन और हकीकत के बीच की सीमा रेखा गायब हो चुकी है।

इसकी सबसे वीभत्स बानगी देखने को मिली, जब मुंबई के नामी अस्पताल की डॉक्टर सेजल पवार और स्टैंडअप कॉमेडियन प्रणीत मोरे के शो की एक क्लिप इंटरनेट के एल्गोरिथमिक महासागर में वायरल हुई। एनाटॉमी लैब में मानवता की सेवा के लिए दान किए गए मृत शरीरों के गुप्त अंगों के साइज पर हँसने और उनका मजाक उड़ाने की बात को जिस तरह एक मनोरंजन उत्पाद के रूप में पेश किया गया, वह वस्तुतः अटेंशन इकोनॉमी की सांस्कृतिक सड़न का चरम बिंदु है।

डॉक्टर सेजल पवार का उस मंच पर खड़े होकर अपनी संवेदनहीनता को ‘कूल’ दिखाना ब्लैक मिरर की लेसी के उसी छटपटाहट का विस्तार है, जहाँ वह एक ऊँची सोशल रेटिंग पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। कार्ल मार्क्स ने जिसे थ्योरी ऑफ एलिनेशन/अलगाव का सिद्धांत कहा था, यह उसका आधुनिक संस्करण ही है।

मेडिकल साइंस का छात्र, जिसका बुनियादी रिश्ता जीवन, मृत्यु और मानवीय गरिमा से होना चाहिए था, वह इस डिजिटल पूंजीवाद के सुपरस्ट्रक्चर में अपनी वास्तविक पहचान से पृथक/ एलीनेट  ही हो चुका है।  एक डॉक्टर का पेशा समाज में बुर्जुआ संभ्रांतवाद का प्रतीक रहा है, लेकिन ‘अटेंशन इकोनॉमी’ ने उसे भी डिजिटल सर्वहारा बना दिया, जिसे जीवित रहने और प्रासंगिक बने रहने के लिए लगातार व्यूज और लाइक्स की भीख मांगनी पड़ती है।

कार्ल मार्क्स ने दास कैपिटल में कमोडिटी फेटिशिज्म की व्याख्या करते हुए बताया था कि कैसे पूंजीवादी व्यवस्था मानवीय मूल्यों को निर्जीव वस्तुओं में बदल देती है। एक मेडिकल कॉलेज की एनाटॉमी लैब में रखा कैडेवर कोई साधारण वस्तु तो नहीं ही होगी, वह तो किसी इंसान का अंतिम मानवीय योगदान है।

लेकिन जब डॉक्टर पवार और प्रणीत मोरे उस मृत देह को एक सस्ते सेक्सुअलाइज़्ड जोक में तब्दील करते हैं, तो वे उस लाश का विमुद्रीकरण कर रहे होते हैं। लेट कैपिटलिज्म के इस वीभत्स दौर में मृत शरीर अब सम्मान के काबिल नहीं रह गया; वह केवल एक शॉक वैल्यू है, एक कच्चा माल है जिससे यूट्यूब पर सरप्लस वैल्यू पैदा की जा सके। यह ब्लैक मिरर की उसी क्रूरता का सजीव प्रसारण है, जहाँ किसी की त्रासदी दूसरे के लिए केवल एक डिजिटल रील का स्क्रीनशॉट है।

कॉमेडियन के मंच पर खड़ी वह डॉक्टर और खुद को आर्टिस्ट कहने वाला वह क्रिएटर, दोनों ही इस मुगालते में हैं कि वे FoE का इस्तेमाल कर रहे हैं। मार्क्स इसे फॉल्स कॉन्शियसनेस कहते हैं। वे आजाद कहाँ हैं? वे तो उस डिजिटल एल्गोरिदम के बंधुआ मजदूर हैं, जो उन्हें लगातार और अधिक आक्रामक, अधिक नग्न और अधिक असंवेदनशील होने पर मजबूर करता है। यूट्यूब का एल्गोरिदम कोई मानवीय संस्था नहीं है, वह पूंजी का वह हिंसक इंजन है जो मानवीय संवेदनाओं के मलबे पर चलता है।

ब्लैक मिरर के उस एपिसोड का अंत तब होता है जब लेसी की रेटिंग शून्य हो जाती है, वह जेल की कोठरी में बंद होती है और अपनी आंखों से उस डिजिटल स्क्रीन को हटते हुए देखती है। तब जाकर वह पहली बार आजाद महसूस करती है।

सेजल पवार की यह वायरल क्लिप हमारे पूरे समाज के ‘नोसडाइव’ की बानगी है। जब तक हम इस रेटिंग, सोशल मीडिया कार्ड्स और व्यूज के पूंजीवादी दलदल को ध्वस्त नहीं करेंगे, तब तक चिकित्सा की प्रयोगशालाएँ और इंसानी लाशें इसी तरह डिजिटल स्पेक्टेकल की वेदी पर चढ़ती रहेंगी।

गुजरात के खेड़ा में इस्लामी कट्टरपंथियों के हमले में तबाह हुआ हिंदू परिवार, महिला की मौत-कई घायल: जानिए कैसे आधी रात के हमले से हिंदुओं पर डाला जा रहा पलायन का दबाव

जरा सोचिए… आप सालों से अपनी छोटी-सी दुकान पर मेहनत करके परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। सब कुछ सामान्य चल रहा है। तभी एक रात चीनी माँगने के बहाने कुछ इस्लामी कट्टरपंथी आपकी दुकान पर आते हैं।

देखते ही देखते वहाँ हिंसक भीड़ जमा हो जाती है और आपका पूरा परिवार उनके निशाने पर आ जाता है। भीड़ आपकी दुकान में घुसकर बर्बरता की सारी हदें पार कर देती है।

आपके कपड़े फाड़ दिए जाते हैं, आपकी पत्नी का गला घोंटकर हत्या कर दी जाती है, आपकी बेटी का होंठ नोच लिया जाता है और आपकी गोद में खेल रहे मासूम बच्चे को हवा में उछालकर बेरहमी से जमीन पर पटक दिया जाता है।

यह किसी फिल्म या काल्पनिक कहानी का दृश्य नहीं है, बल्कि गुजरात के खेड़ा जिले के मटर तालुका से सामने आया एक दिल दहला देने वाला मामला बताया जा रहा है। आरोप है कि चीनी माँगने के बहाने पहुँचे इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने एक निर्दोष हिंदू परिवार पर हमला कर उसे खून से लथपथ कर दिया और पूरे इलाके में दहशत फैला दी।

यह कोई साधारण विवाद या अचानक हुई हिंसा की घटना नहीं बताई जा रही, बल्कि इसके पीछे स्थानीय हिंदुओं को डराने, धमकाने और क्षेत्र से पलायन के लिए मजबूर करने की एक बड़ी साजिश होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि इस पूरी घटना ने इलाके के हिंदू परिवारों में डर और असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया है।

वहीं पीड़ित पक्ष का दावा है कि मुख्यधारा के कई मीडिया संस्थानों ने इस संवेदनशील मामले के सभी तथ्यों को प्रमुखता से सामने नहीं रखा। ऐसे में केवल ‘ऑपइंडिया’ की टीम घटनास्थल तक पहुँची, जहाँ उसने पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों से बातचीत कर उनकी आपबीती तथा दर्द को लोगों तक पहुँचाने का प्रयास किया।

ग्राउंड जीरो पर पीड़ित परिवार की दर्दनाक कहानी

हम सबसे पहले गुजरात के खेड़ा जिले के मटर तालुका स्थित GIDC क्षेत्र के पास उस दुकान पर पहुँचे, जहाँ पीड़ित हिंदू परिवार रहता है और अपना व्यवसाय चलाता है। वहाँ हमारी मुलाकात परिवार के मुखिया, उनकी पत्नी और उनकी बेटियों से हुई। परिवार के सभी सदस्यों के शरीर पर हमले के गंभीर निशान साफ दिखाई दे रहे थे।

परिवार के मुखिया, जिन्हें स्थानीय लोग चाचा कहकर बुलाते हैं, इतनी बुरी तरह घायल थे कि उन्हें खड़े होने और चलने-फिरने में भी कठिनाई हो रही थी। उनकी पत्नी के चेहरे पर मारपीट के स्पष्ट निशान थे और पूरा चेहरा सूजा हुआ दिखाई दे रहा था।

वहीं उनकी बेटी भी गंभीर रूप से घायल थी, जिसका होंठ बुरी तरह फट गया था। परिवार के सदस्यों का कहना था कि हमले के दौरान उनके साथ बेहद बेरहमी से मारपीट की गई।

हमने पीड़ित परिवार के मुखिया से बातचीत कर पूरी घटना को विस्तार से समझने की कोशिश की। उन्होंने जो आपबीती सुनाई, वह बेहद भावुक और झकझोर देने वाली थी। परिवार के मुखिया ने बताया कि वह पिछले कई सालों से इसी स्थान पर चाय और नाश्ते की एक छोटी-सी दुकान चला रहे हैं, जिससे उनके परिवार का गुजारा होता है।

उन्होंने बताया कि उनकी दुकान पर आसपास स्थित GIDC में काम करने वाले मजदूर, कर्मचारी और आसपास के गाँवों के लोग नियमित रूप से चाय-नाश्ता करने आते हैं। सालों से वह इसी व्यवसाय के माध्यम से अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं और स्थानीय लोगों के बीच उनकी दुकान एक परिचित स्थान बन चुकी है।

एक चम्मच चीनी के बहाने आतंक और तोड़फोड़

परिवार के मुखिया के अनुसार, पिछले रविवार की रात करीब 8 बजे एक मुस्लिम व्यक्ति उनकी दुकान पर आया। उनका कहना है कि वह व्यक्ति नशे की हालत में दिखाई दे रहा था। उसने बताया कि उसका एक दोस्त बीमार है और उसे तत्काल चीनी की आवश्यकता है।

चाचा के मुताबिक, उन्होंने मानवीय आधार पर उसकी मदद करने का फैसला किया और उससे कहा, “सामने चायदानी के पास रखे डिब्बे में चीनी रखी है, वहीं से ले लो।” उन्हें उम्मीद थी कि वह व्यक्ति जरूरत भर चीनी लेकर चला जाएगा, लेकिन इसके बाद घटना ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया।

परिवार के मुखिया का आरोप है कि चीनी लेने के बाद वह व्यक्ति वहाँ से जाने के बजाय दोबारा दुकान के गोदाम वाले हिस्से में पहुँच गया और वहाँ रखे हिसाब-किताब के कागजात फाड़ने लगा। चाचा के अनुसार, उन्होंने उसे समझाते हुए कहा, “बेटा, तुम्हें जो चाहिए मुझसे माँग लो, मैं दे दूँगा, लेकिन हिसाब-किताब के कागज इस तरह मत फाड़ो।”

चाचा का कहना है कि उनकी यह बात सुनते ही वह व्यक्ति भड़क उठा और उन्हें तथा उनकी पत्नी को अपशब्द कहने लगा। जब उन्होंने इसका विरोध किया, तो आरोप के मुताबिक उस व्यक्ति और उसके साथ मौजूद एक महिला ने उन पर हमला कर दिया। परिवार का दावा है कि हमलावरों ने उनके कपड़े फाड़ दिए और उनके साथ मारपीट करते हुए उन्हें घसीटा।

पीड़ित परिवार के अनुसार, जब चाचा अपनी पत्नी और खुद को बचाने की कोशिश कर रहे थे, तब उनकी भी बेरहमी से पिटाई की गई। कुछ देर तक हंगामा और मारपीट करने के बाद हमलावर वहाँ से चले गए। हालाँकि परिवार का कहना है कि हिंसा यहीं समाप्त नहीं हुई।

उनके मुताबिक, घटना के महज दो से तीन मिनट बाद ही स्थिति और भयावह हो गई। आरोप है कि लगभग 10 से 12 लोगों की एक भीड़, जो लाठियों और धारदार हथियारों से लैस थी, दुकान में घुस आई और फिर पूरे परिवार को निशाना बनाते हुए हमला शुरू कर दिया।

पीड़ितों को जान से मारने की मिल रही धमकियाँ

पीड़ित परिवार के अनुसार, दुकान में घुसी भीड़ ने आते ही चाचा को दोबारा निशाना बनाया और उनके साथ बेरहमी से मारपीट शुरू कर दी। परिवार का आरोप है कि हमलावर लगातार उन पर लाठी-डंडों और मुक्कों से हमला करते रहे, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं।

परिवार के सदस्यों का कहना है कि भीड़ में शामिल एक महिला ने चाची के साथ भी हिंसक व्यवहार किया। आरोप है कि उसने उनका गला दबाने की कोशिश की, उनके चेहरे पर कई थप्पड़ मारे और लगातार घूंसे बरसाए, जिससे उनके चेहरे पर गंभीर चोटें आईं।

इसी दौरान परिवार का दामाद भी मौके पर पहुँच गया। पीड़ित पक्ष के मुताबिक, जैसे ही उसने स्थिति को संभालने और परिवार को बचाने का प्रयास किया, भीड़ ने उसे भी निशाना बना लिया। आरोप है कि उस पर भी जानलेवा हमला किया गया और उसके साथ बुरी तरह मारपीट की गई, जिससे घटनास्थल पर अफरा-तफरी और भय का माहौल पैदा हो गया।

पीड़ित परिवार के अनुसार, हमले के दौरान चाची ने हाथ जोड़कर हमलावरों से अपने दामाद को छोड़ देने की गुहार लगाई। उनका कहना है कि वह रोते हुए कह रही थीं, “उसे जाने दो, उसके छोटे-छोटे बच्चे हैं।”

लेकिन परिवार का आरोप है कि हमलावरों ने उनकी एक नहीं सुनी और लगातार धमकियाँ देते रहे। पीड़ित पक्ष के मुताबिक, हमलावर कह रहे थे कि किसी को नहीं छोड़ा जाएगा और भविष्य में भी मौका मिलने पर उन्हें नुकसान पहुँचाया जाएगा।

परिवार का दावा है कि जब उनकी बेटी ने अपने परिजनों को बचाने और बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो हमलावरों ने उसे भी निशाना बना लिया। आरोप है कि उसके साथ बुरी तरह मारपीट की गई, जिससे उसका होंठ गंभीर रूप से घायल हो गया।

पीड़ित परिवार के अनुसार, उस समय उसकी छोटी बच्ची भी मौके पर मौजूद थी। परिवार का आरोप है कि हमले की अफरा-तफरी के बीच बच्ची को भी नहीं बख्शा गया और उसके साथ भी बेहद खतरनाक व्यवहार किया गया।

परिवार का कहना है कि सौभाग्य से बच्ची दुकान में रखे गद्दे पर गिर गई, जिससे उसे गंभीर चोट नहीं आई। परिजनों का मानना है कि यदि ऐसा नहीं होता, तो स्थिति और भी दुखद हो सकती थी।

पीड़ित परिवार के अनुसार, हमले के दौरान स्थिति उस समय और गंभीर हो गई जब भीड़ में शामिल एक व्यक्ति ने धारदार हथियार निकाल लिया। परिवार का आरोप है कि उसने दामाद के सिर पर सीधा वार किया, जिससे उन्हें गंभीर चोट आई।

परिजनों के मुताबिक, वार इतना तेज था कि उनके सिर से भारी मात्रा में खून बहने लगा और वह घटनास्थल पर ही बेहोश होकर गिर पड़े। परिवार का कहना है कि इस दौरान दुकान का पूरा परिसर चीख-पुकार, अफरातफरी और दहशत से भर गया था।

पीड़ित पक्ष के अनुसार, मारपीट और हिंसा का तांडव मचाने के बाद हमलावर वहाँ से फरार हो गए। उनके जाने के बाद घायल परिवार के सदस्य किसी तरह एक-दूसरे को संभालते हुए मदद की तलाश में जुटे और घायलों को उपचार के लिए अस्पताल पहुँचाया गया।

खेड़ा में केले का मॉडल? हिंदुओं को पलायन कराने की एक बड़ी योजना?

जब हमने पीड़ित परिवार के मुखिया से पूछा कि आखिर उनके परिवार को इस तरह निशाना क्यों बनाया गया, तो उन्होंने अपनी आशंकाएँ और आरोप विस्तार से बताए। उनका दावा था कि वह कई वर्षों से इस क्षेत्र में रहकर अपना व्यवसाय चला रहे हैं, लेकिन कुछ स्थानीय लोगों को उनकी मौजूदगी और कारोबार से आपत्ति है।

परिवार के मुखिया का आरोप है कि इस तरह की घटनाओं के जरिए इलाके के हिंदू परिवारों में भय का माहौल पैदा करने की कोशिश की जाती है, ताकि वे अपना घर-बार और व्यवसाय छोड़कर वहाँ से चले जाएँ।

उन्होंने दावा किया कि यह कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि स्थानीय स्तर पर दबाव और डर का वातावरण बनाने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। हालाँकि इन आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी है और मामले की जाँच संबंधित एजेंसियों द्वारा की जा रही है।

इसी दौरान पीड़ित परिवार का दामाद भी गाँव लौट आया, जो नडियाद के एक अस्पताल में दो दिनों तक उपचार कराने के बाद घर पहुँचा था। उसकी हालत अभी भी कमजोर दिखाई दे रही थी और वह ज्यादा बातचीत करने की स्थिति में नहीं था।

इसके बावजूद उसने बताया कि घटना के समय वह अपने ससुर की दुकान पर कुछ सामान लेने गया था। उसका आरोप है कि वहाँ मौजूद भीड़ ने उस पर धारदार हथियार से हमला किया, जिससे उसके सिर में गंभीर चोट आई और वह बेहोश हो गया।

दामाद ने दावा किया कि हमले में शामिल सभी लोग उसी भीड़ का हिस्सा थे जिसने दुकान और परिवार के अन्य सदस्यों पर भी हमला किया था। फिलहाल पूरे मामले की जाँच जारी है और पुलिस आरोपों की सत्यता की पड़ताल कर रही है।

परिवार के बड़े बेटे ने भी बातचीत के दौरान दावा किया कि यह कोई अचानक भड़की हिंसा नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित हमला था। उनका कहना था कि यदि घटना पूरी तरह से आकस्मिक होती, तो शुरुआती विवाद के महज कुछ ही मिनटों के भीतर बड़ी संख्या में लोग हथियारों के साथ घटनास्थल पर नहीं पहुँच सकते थे।

उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि सामान्य परिस्थितियों में किसी मामूली विवाद के बाद इतनी जल्दी 10 से 12 लोगों का एक समूह एकत्र होकर मौके पर पहुँचना आसान नहीं है। उनके अनुसार, यह हमला पहले से तय हो सकता है।

परिवार के बड़े बेटे ने यह भी दावा किया कि उनके परिवार को पहले भी इसी प्रकार की हिंसा और धमकियों का सामना करना पड़ा है। उनका कहना था कि कुछ साल पहले भी इसी स्थान पर उनके परिवार पर हमला हुआ था।

परिवार का आरोप है कि ऐसी घटनाओं का उद्देश्य उन्हें डराना और इलाके में असुरक्षा का माहौल पैदा करना है। हालाँकि, इन सभी दावों और आरोपों की पुष्टि जाँच एजेंसियों द्वारा की जानी बाकी है और मामले की जाँच जारी है।

एक्सक्लूसिव: गरमाला गाँव से सनसनीखेज खुलासा, अपराधी बेखौफ

पीड़ित परिवार और कुछ स्थानीय लोगों का दावा है कि मातर और उसके आसपास के क्षेत्रों में इस प्रकार की हिंसक घटनाएँ कोई नई बात नहीं हैं। मामले की पड़ताल के दौरान हमारी मुलाकात गरमाला गाँव के एक हिंदू युवक से हुई, जिसने आरोप लगाया कि कुछ महीने पहले उस पर भी जानलेवा हमला किया गया था।

युवक ने कैमरे पर अपनी आपबीती सुनाते हुए कई गंभीर आरोप लगाए, जिनसे क्षेत्र की कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े होते हैं। युवक ने बताया कि जनवरी में उत्तरायण पर्व के दौरान उसके साथ यह घटना हुई थी।

उसका दावा है कि उसके खेत के पास स्थित एक आवासीय क्षेत्र में रहने वाले कुछ लोगों के साथ उसका विवाद हुआ था। युवक के अनुसार, उत्तरायण के दिन छतों पर मौजूद कुछ लोग उसके परिवार की महिलाओं के सामने गलत भाषा का इस्तेमाल करते थे, जिससे तनाव की स्थिति पैदा हो जाती थी।

उसने यह भी आरोप लगाया कि पतंगबाजी के दौरान इस्तेमाल होने वाली डोर और अन्य सामग्री बार-बार उनके खेतों में फेंकी जाती थी, जिससे खेतों में काम करने वाले लोगों, पशुओं और पक्षियों को खतरा पैदा होता था।

युवक का कहना है कि जब उसने इसका विरोध किया, तो विवाद बढ़ गया और बाद में उस पर हमला किया गया। हालाँकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित घटनाओं के बारे में स्थानीय प्रशासन तथा पुलिस के रिकॉर्ड के आधार पर ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

गरमाला गाँव के उस युवक ने बताया कि जब उसने विवाद के दौरान सामने मौजूद लोगों से हाथ जोड़कर कहा, “भाई, घर की महिलाएँ यहाँ खड़ी हैं, उनके सामने इस तरह की गालियाँ मत दो,” तो स्थिति शांत होने के बजाय और अधिक तनावपूर्ण हो गई। युवक का दावा है कि उसकी यह बात सुनकर कुछ लोग भड़क गए और उससे तीखी बहस करने लगे।

युवक के अनुसार, देखते ही देखते विवाद हिंसक हो गया। उसका आरोप है कि भीड़ में शामिल एक व्यक्ति ने अचानक बड़ा चाकू निकाल लिया और पीछे से उसकी पीठ पर वार कर दिया। युवक का कहना है कि वार इतना गंभीर था कि चाकू गहराई तक धंस गया, जिससे उसके शरीर के अंदरूनी अंगों को गंभीर क्षति पहुँची।

उसने बताया कि इसके बाद उसे लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा और कई ऑपरेशनों से गुजरना पड़ा। युवक के मुताबिक, चिकित्सकों के लगातार प्रयासों के बाद ही उसकी जान बच सकी।

युवक ने यह भी आरोप लगाया कि घटना के बावजूद हमले में शामिल लोग आज भी क्षेत्र में खुलेआम घूम रहे हैं। उसका कहना है कि इससे पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों में भय और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है तथा लोगों के मन में कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

मातर क्षेत्र में प्रवास के दौरान हमने कैमरे के सामने और कैमरे के पीछे अनेक स्थानीय लोगों से बातचीत की। बातचीत के दौरान कई लोगों ने गरमाला गाँव का जिक्र किया और दावा किया कि वहाँ से जुड़े कुछ तत्वों का नाम क्षेत्र में होने वाले विवादों और तनावपूर्ण घटनाओं में अक्सर सामने आता है।

स्थानीय निवासियों का कहना था कि क्षेत्र में शांति और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए प्रशासन को निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए। हालाँकि, स्थानीय लोगों द्वारा लगाए गए इन आरोपों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित जाँच एजेंसियों और प्रशासनिक रिकॉर्ड के आधार पर ही की जा सकती है।

झील के किनारे संदिग्ध मंदिर और नशेड़ियों का अड्डा

रिपोर्टिंग के दौरान हमें एक और ऐसा पहलू सामने आया, जिसे स्थानीय लोग इस पूरे विवाद से जोड़कर देख रहे हैं। GIDC क्षेत्र के पास, पीड़ित हिंदू परिवार की दुकान से कुछ दूरी पर एक झील स्थित है।

स्थानीय लोगों का दावा है कि झील के किनारे एक मजहबी संरचना मौजूद है, जिसे वे दरगाह के रूप में पहचानते हैं। कुछ निवासियों ने आरोप लगाया कि रात के समय वहाँ लोगों की आवाजाही रहती है और कई बार वहाँ असामाजिक गतिविधियाँ होने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।

स्थानीय लोगों का यह भी दावा है कि रविवार को हुई हिंसा में शामिल कुछ लोग घटना से पहले इसी क्षेत्र में मौजूद थे। हालाँकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और इनकी सत्यता की जाँच संबंधित एजेंसियों द्वारा ही की जा सकती है।

जब हम स्वयं झील के किनारे पहुँचे, तो वहाँ एक मजहबी संरचना दिखाई दी, जिसका मुख्य द्वार बंद था। इसके बाद कई सवाल स्वाभाविक रूप से सामने आते हैं।

यह संरचना किसकी है? जिस भूमि पर यह बनी है, उसका स्वामित्व किसके पास है? क्या इसके निर्माण के लिए सभी आवश्यक प्रशासनिक और कानूनी अनुमतियाँ प्राप्त की गई थीं? और क्या यह निर्माण-संबंधित नियमों के अनुरूप है?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर प्रशासनिक रिकॉर्ड, राजस्व दस्तावेजों और संबंधित विभागों की जाँच से ही स्पष्ट हो सकते हैं। फिलहाल, स्थानीय स्तर पर इस संरचना को लेकर कई तरह की चर्चाएँ और दावे जरूर मौजूद हैं, लेकिन उनकी पुष्टि आधिकारिक जाँच के बाद ही संभव है।

हिंदू संगठनों ने कड़ी चेतावनी जारी की: जिहादी गतिविधियाँ बंद करो, अन्यथा तुम्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा

रिपोर्टिंग के दौरान हमारी मुलाकात नडियाद जिले के एक स्थानीय हिंदू संगठन के पदाधिकारी से भी हुई। बातचीत के दौरान उन्होंने क्षेत्र की कानून-व्यवस्था और हाल के घटनाक्रमों को लेकर अपनी चिंताएँ व्यक्त कीं।

उनका दावा था कि झील के आसपास कुछ लोगों द्वारा शराब सेवन और अन्य आपत्तिजनक गतिविधियों की शिकायतें पहले भी स्थानीय स्तर पर उठाई गई हैं। हालाँकि, इन आरोपों की पुष्टि संबंधित प्रशासनिक या पुलिस रिकॉर्ड के आधार पर ही की जा सकती है।

उन्होंने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में मटर तालुका में सामुदायिक तनाव से जुड़ी घटनाओं को लेकर स्थानीय लोगों के बीच चिंता बढ़ी है। उनके अनुसार, विभिन्न अवसरों पर विवाद और टकराव की घटनाएं सामने आई हैं, जिनकी निष्पक्ष जाँच और प्रभावी कार्रवाई आवश्यक है।

बातचीत के दौरान उन्होंने नवरात्रि जैसे धार्मिक आयोजनों का भी उल्लेख किया। उनका दावा था कि पूर्व में कुछ लोगों द्वारा गरबा आयोजनों को लेकर आपत्तियाँ और धमकियाँ दी गई थीं, जिससे स्थानीय स्तर पर तनाव का माहौल बना था। हालाँकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित पुलिस रिकॉर्ड, शिकायतों और प्रशासनिक दस्तावेजों के आधार पर ही की जा सकती है।

स्थानीय संगठनों का कहना है कि क्षेत्र में शांति, कानून-व्यवस्था और सभी समुदायों के बीच सौहार्द बनाए रखने के लिए प्रशासन को प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।

हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे घटना के सामने आने के बाद से ही पीड़ित परिवार के संपर्क में हैं और उन्हें उपलब्ध कानूनी प्रक्रियाओं, प्रशासनिक सहायता तथा सामाजिक सहयोग के संबंध में मदद प्रदान कर रहे हैं।

उनका कहना था कि पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए वे संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रख रहे हैं और मामले की निष्पक्ष जाँच की माँग कर रहे हैं।

बातचीत के दौरान संगठन के पदाधिकारियों ने क्षेत्र में कथित असामाजिक और हिंसक गतिविधियों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि किसी भी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधियाँ हो रही हैं, तो उनके खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

साथ ही उन्होंने प्रशासन से माँग की कि दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

संगठन के प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि वे मामले को कानूनी और लोकतांत्रिक तरीकों से आगे बढ़ाएँगे तथा पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए अपने स्तर पर प्रयास जारी रखेंगे।

उनका कहना था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना और अपराधियों को जवाबदेह ठहराना संबंधित प्रशासन और न्यायिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है और इसी प्रक्रिया के तहत दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

जनसांख्यिकीय परिवर्तन और अवैध भूमि सौदों लगा है प्रश्नचिह्न

हमने सुबह से लेकर देर शाम तक पूरे क्षेत्र में रहकर अलग-अलग पक्षों से बातचीत की। इस दौरान हमने पीड़ित परिवार की आपबीती सुनी, स्थानीय निवासियों से बात की, सामाजिक संगठनों का पक्ष जाना और क्षेत्र की परिस्थितियों का जायजा लिया।

बातचीत के दौरान कई स्थानीय लोगों ने दावा किया कि पिछले कुछ सालों में इलाके की जनसांख्यिकीय और सामाजिक परिस्थितियों में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं। कुछ निवासियों का मानना है कि इन परिवर्तनों के साथ-साथ सामुदायिक तनाव और विवादों की घटनाओं को लेकर भी उनकी चिंताएँ बढ़ी हैं।

हालाँकि इन दावों का मूल्यांकन आधिकारिक जनगणना और प्रशासनिक आँकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है। स्थानीय लोगों द्वारा बार-बार गरमाला गाँव का उल्लेख किया गया। कई निवासियों ने वहाँ की स्थिति को संवेदनशील बताते हुए कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए प्रशासनिक सतर्कता बढ़ाने की माँग की।

इसके अलावा कुछ लोगों ने क्षेत्र में कृषि भूमि के उपयोग, भूमि खरीद-बिक्री और निर्माण गतिविधियों को लेकर भी शिकायतें दर्ज कराईं। उनका आरोप था कि कुछ स्थानों पर भूमि उपयोग संबंधी नियमों के उल्लंघन की जाँच की जानी चाहिए। इन आरोपों की पुष्टि संबंधित राजस्व अभिलेखों, भूमि रिकॉर्ड और प्रशासनिक जाँच के आधार पर ही संभव है।

रिपोर्टिंग के दौरान झील के किनारे स्थित एक धार्मिक संरचना को लेकर भी कई सवाल स्थानीय लोगों द्वारा उठाए गए। कुछ निवासियों ने इसकी वैधता, भूमि स्वामित्व और निर्माण संबंधी अनुमतियों की जाँच की माँग की।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)







कॉकरोचों के प्रदर्शन में घुसी नेहा बोरा कौन है? जानिए AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष का चिट्ठा- उमर खालिद को बताती है बेचारा, ब्राह्मणों से करती है नफरत

वामपंथी छात्र संगठन ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA)’ ने हाल ही में ‘कॉकरोचेस ऑन द स्ट्रीट्स’ नाम से एक सप्ताह भर लंबा देशव्यापी अभियान शुरू करने की घोषणा की। यह अभियान दिल्ली में शुरू हुआ और इसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की गई। यह अभियान 11 जून से शुरू होकर 18 जून तक चलेगा।

पहले दिन यानी 11 जून को AISA के कार्यकर्ताओं ने दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस, कमला नगर, पटेल चेस्ट, गुर्मंडी और विजय नगर जैसे इलाकों में प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने कॉकरोच के मुखौटे पहनकर विरोध जताया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।

इस प्रदर्शन की घोषणा 6 जून को कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा जंतर-मंतर पर किए गए प्रोटेस्ट के बाद की गई। उस प्रदर्शन में भी नीट एग्जाम पेपर लीक जैसे मुद्दों को आधार बनाकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग करने की बातें कही गई थी। हालाँकि बाद में प्रोटेस्ट की जमीनी हकीकत ये पता चली कि वहाँ भी वामपंथी ही घुसे थे, जिन्होंने मौका देखकर आजादी-आजादी और ‘जय भीम’ जैसे नारेबाजी की।

AISA ने भले ही आधिकारिक रूप से CJP को अपना समर्थन न दिया हो, लेकिन CJP के प्रदर्शन में AISA की नेहा बोरा सबसे आगे खड़ी दिखीं। अब यहाँ ये बात तो किसी से छिपी नहीं है कि आखिर AISA अपनी विचारधारा और राजनैतिक एजेंडे को धकेलने के लिए क्या-क्या करता है। बस वही काम बोरा भी यहाँ ‘शिक्षा व्यवस्था में सुधार’ के नाम पर करती हुई मिलीं।

बोरा ने मीडिया से बात करते हुए शिक्षा व्यवस्था के पूरे मुद्दे को UAPA केस में आरोपित उमर खालिद और शरजील इमाम से जोड़ दिया। बेशर्मी से नेहा ने खालिद और इमाम पर लगे गंभीर आरोपों को धो-पोंछने काम किया। साथ ही उनकी करतूतों पर रिपोर्ट करने वाली मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ और बीजेपी आईटी सेल वाले करार दिया। उसने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम को गोदी मीडिया ने देशद्रोही दिखाया है।

उसने दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों की साजिश रचने वालों को ‘आम छात्र’ बताया और कहा कि उनका राजनीतिक उत्पीड़न हो रहा है। बोरा ने न्यायपालिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम सालों से जेल में बंद हैं क्योंकि उन्हें जमानत नहीं मिल रही है। हालाँकि ये कहते हुए वह चालाकी से इस सच को छुपा ले गईं कि खुद सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों की जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर की थी कि शुरुआती जाँच में 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश में उनकी भूमिका के साफ सबूत मिलते हैं।

नेहा बोरा की ब्राह्मणों के खिलाफ घृणा और उसकी सफाई

अपने आपको छात्रों के अधिकार के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ता बताने वाली नेहा बोरा दंगे भड़काने और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने जैसे गंभीर अपराधों को ही धो-पोंछने का काम नहीं करतीं, बल्कि वो खुलेआम ब्राह्मण समुदाय के लोगों के खिलाफ जहर उगलने का, नफरत फैलाने का काम करती हैं।

अपनी एक वीडियो में नेहा बोरा समझाती हैं कि ब्राह्मणवाद क्या है। उनके अनुसार- सोसायटी में अगर एक समाज दूसरे वर्ग पर अत्याचार करता है तो वो भी ब्राह्मणवाद है और अगर एक समाज दूसरे समाज को दबाता है तो वो भी ब्राह्मणवाद है। कुल मिलाकर नेहा बोरा के अनुसार भारतीय समाज में किसी भी तरह का भेदभाव, भले ही उसका जाति से कोई लेना-देना न हो, लेकिन उसे ‘ब्राह्मणवाद’ के सिर मढ़ा जा सकता है।

‘डरा हुआ मुसलमान’ नैरेटिव

इसी तरह बोरा के एक पॉडकास्ट इंटरव्यू को देख पता चलता है कि कैसे उन्हें हिंदुओं की एकता देख चुभन होती है और वो मानती हैं कि अगर जाति भुलाकर देश के हिंदू एकजुट होंगे तो देश का मुस्लिम असुरक्षित महसूस करेगा ही।

नेहा बोरा को चाहिए फिलीस्तीन के लिए आजादी

इसमें कोई हैरानी की बात हीं है कि नेहा बोरा भारत में रहते हुए फिलीस्तीन के लिए आए दिन रोना रोती हैं। उसके एक्स हैंडल पर इजरायल की निंदा करने वाले तमाम पोस्ट हैं। इसके अलावा बोरा का कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़कर अपना वैचारिक और राजनैतिक एजेंडा फैलान भी हैरान करने वाला नहीं हैं।

अपने आपको छात्रों का संगठन कहने वाले AISA ने हमेशा से यही किया है कि पहले छात्र अधिकार के नाम पर वो बच्चों से जुड़ते हैं और बाद में उनके दिमाग में वामपंथ वाला जहर घोलना शुरू करते हैं। इस बार भी वह यही कर रहे हैं। उन्हें कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में एक अवसर दिख रहा है, जिसके जरिए वो अपने एजेंडे को हवा दे सकते हैं।

नोट: यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए आर्टिकल के आधार पर बनाई गई है, जिसे आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

गाजियाबाद के सीवर प्लांट में पोलियो वायरस मिलने से स्वास्थ्य विभाग अलर्ट, किसी बच्चे में संक्रमण नहीं: जानिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने कैसे बढ़ाई भारत की चिंता

भारत को साल 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने आधिकारिक रूप से पोलियो-मुक्त घोषित किया था। 13 जनवरी 2011 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में आखिरी पोलियो मरीज मिलने के बाद देश ने इस खतरनाक बीमारी पर लगभग जीत हासिल कर ली थी।

लेकिन अब गाजियाबाद से आई एक खबर ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। गाजियाबाद के विजयनगर क्षेत्र स्थित डूंडाहेड़ा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) के दूषित पानी के नमूनों में वैक्सीन-डेरिवेद पोलियो वायरस (VDPV) टाइप-1 की पुष्टि हुई है।

इसके बाद स्वास्थ्य विभाग अलर्ट मोड में आ गया है। हालाँकि अधिकारियों ने साफ कहा है कि घबराने की जरूरत नहीं है। जिले में 107 से अधिक स्वास्थ्य टीमें सक्रिय की गई हैं, जो घर-घर जाकर बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण कर रही हैं और यह सुनिश्चित कर रही हैं कि कोई भी बच्चा पोलियो की खुराक लेने से वंचित न रह जाए।

गाजियाबाद में आखिर क्या मिला?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि गाजियाबाद में किसी बच्चे में पोलियो की पुष्टि नहीं हुई है। वायरस केवल सीवर के पानी के नमूनों में पाया गया है। स्वास्थ्य विभाग हर महीने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों से नमूने लेकर उनकी जाँच करता है। इसी नियमित निगरानी के दौरान डूंडाहेड़ा STP के नमूने में VDPV टाइप-1 मिला।

VDPV वह वायरस होता है जो ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) के कमजोर वायरस से विकसित होता है। सामान्य परिस्थितियों में यह नुकसान नहीं पहुँचाता, लेकिन यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय तक टीकाकरण कमजोर रहे तो यह वायरस बदल कर फैल सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सीवर में वायरस मिलना इस बात का प्रमाण नहीं है कि पोलियो दोबारा फैल गया है, बल्कि यह एक चेतावनी है कि निगरानी और टीकाकरण को लगातार मजबूत बनाए रखना होगा।

पोलियो क्या है और यह इतना खतरनाक क्यों माना जाता है?

पोलियो एक अत्यंत संक्रामक वायरल बीमारी है जो मुख्य रूप से पाँच साल से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करती है। यह वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद नर्वस सिस्टम पर हमला करता है और कई मामलों में स्थायी लकवे (पैरालिसिस) का कारण बन सकता है।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई संक्रमित लोगों में शुरुआत में कोई गंभीर लक्षण दिखाई नहीं देते। वे सामान्य रूप से स्वस्थ नजर आते हैं, लेकिन वायरस उनके शरीर में मौजूद रहता है और दूसरे लोगों तक फैल सकता है।

गंभीर मामलों में पोलियो सांस लेने वाली मांसपेशियों को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे मरीज की मौत तक हो सकती है। इसी वजह से दुनिया भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ पोलियो को मानव इतिहास की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक मानते हैं।

भारत ने पोलियो पर कैसे पाई थी जीत?

एक समय भारत दुनिया में पोलियो के सबसे बड़े केंद्रों में से एक था। हर साल हजारों बच्चे इस बीमारी का शिकार हो रहे थे। इसके बाद सरकार ने ‘दो बूंद जिंदगी की’ अभियान शुरू किया। गाँव-गाँव, शहर-शहर और घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाई गई। लाखों स्वास्थ्यकर्मी, आशा कार्यकर्ता और स्वयंसेवक इस अभियान से जुड़े।

इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि 13 जनवरी 2011 को हावड़ा में आखिरी पोलियो मामला सामने आया। इसके बाद लगातार तीन साल तक कोई नया मामला नहीं मिला और 27 मार्च 2014 को WHO ने भारत को पोलियो-मुक्त घोषित कर दिया। यह भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक मानी जाती है।

दुनिया में अब भी कहाँ-कहाँ मौजूद है पोलियो?

आज भी दुनिया पूरी तरह पोलियो मुक्त नहीं हुई है। वर्तमान समय में केवल दो देश ऐसे हैं पाकिस्तान और अफगानिस्तान जहाँ वाइल्ड पोलियो वायरस (Wild Poliovirus Type-1) लगातार पाया जाता है।

WHO के अनुसार, 2025 में अक्टूबर तक दुनिया भर में वाइल्ड पोलियो के 38 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2024 की इसी अवधि में यह संख्या 62 थी। सभी मामले केवल पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मिले।

हालाँकि मामलों की संख्या कम हुई है, लेकिन सीवर के पानी और पर्यावरणीय नमूनों में वायरस की मौजूदगी लगातार सामने आ रही है। इसका मतलब है कि वायरस कई क्षेत्रों में चुपचाप फैल रहा है।

यही कारण है कि WHO अभी भी पोलियो को अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति (Public Health Emergency) मानता है।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान में पोलियो खत्म करना इतना मुश्किल क्यों है?

पोलियो एलिमिनेशन की वैश्विक लड़ाई में सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान और अफगानिस्तान बने हुए हैं। आँकड़ों की बात करे तो पाकिस्तान में साल 2023 में वाइल्ड पोलियो वायरस के 6 मामले सामने आए थे, लेकिन 2024 में यह संख्या बढ़कर 74 हो गई।

इसके बाद 2025 में 24 मामले दर्ज किए गए। हालाँकि WHO के अनुसार, 2025 में पाकिस्तान के विभिन्न इलाकों से 245 पर्यावरणीय (सीवेज) नमूनों में पोलियो वायरस की पुष्टि हुई, जिससे साफ है कि वायरस अभी भी कई क्षेत्रों में सक्रिय है। खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान, कराची और क्वेटा जैसे इलाके आज भी पोलियो के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं।

वही अफगानिस्तान में साल 2023 में वाइल्ड पोलियो के 6 मामले दर्ज किए गए थे। 2024 में यह संख्या बढ़कर 25 हो गई, जबकि 2025 में अक्टूबर तक 4 मामले सामने आए हैं। WHO के आँकड़ों के अनुसार, 2025 में 30 पर्यावरणीय नमूनों में भी पोलियो वायरस मिला है।

दक्षिणी और पूर्वी अफगानिस्तान अभी भी वायरस के मुख्य गढ़ माने जाते हैं। अफगानिस्तान के कई इलाकों में राजनीतिक अस्थिरता, सुरक्षा संबंधी समस्याएँ और स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुँच के कारण बच्चों तक टीकाकरण पहुँचाना कठिन हो जाता है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मियों का पहुँचना आज भी चुनौती बना हुआ है।

तालिबान शासन के बाद महिला स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका भी सीमित हुई है। कई समुदायों में महिलाओं के घर-घर जाने पर प्रतिबंध या परेशानियाँ होने के कारण छोटे बच्चों तक वैक्सीन पहुँचाने में दिक्कत आती है।

वहीं पाकिस्तान में भी स्थिति आसान नहीं है। कराची, पेशावर, क्वेटा और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में बड़ी आबादी लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाती रहती है। इसके अलावा कुछ इलाकों में वैक्सीन को लेकर गलतफहमियाँ और विरोध भी देखने को मिलता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, लाखों बच्चे ऐसे हैं जो नियमित टीकाकरण से छूट जाते हैं। यही बच्चे वायरस के प्रसार का सबसे बड़ा कारण बनते हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच खुली आवाजाही भी वायरस को एक देश से दूसरे देश तक पहुँचाने में मदद करती है।

यही वजह है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि जब तक दोनों देशों से पोलियो पूरी तरह समाप्त नहीं होगा, तब तक दुनिया पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकती।

क्या भारत के लिए खतरा बढ़ गया है?

भारत में फिलहाल कोई पोलियो मरीज नहीं मिला है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि देश में पोलियो वापस आ गया है। लेकिन गाजियाबाद में मिले वायरस ने यह जरूर दिखा दिया है कि खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

आज अंतरराष्ट्रीय यात्राएँ पहले से कहीं अधिक हैं। हर दिन हजारों लोग अलग-अलग देशों से भारत आते-जाते हैं। यदि किसी क्षेत्र में टीकाकरण कमजोर पड़ जाए तो वायरस को फैलने का मौका मिल सकता है।

इसी कारण से भारत सरकार और स्वास्थ्य विभाग लगातार सीवेज सर्विलांस, पर्यावरणीय निगरानी और टीकाकरण कार्यक्रम चला रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका मजबूत टीकाकरण नेटवर्क है। यदि यह व्यवस्था लगातार सक्रिय रही तो पोलियो दोबारा पैर नहीं जमा पाएगा।

पोलियो से बचाव के लिए क्या करना जरूरी है?

पोलियो से बचने का सबसे प्रभावी तरीका टीकाकरण है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पाँच साल तक के सभी बच्चों को समय पर पोलियो की खुराक जरूर मिलनी चाहिए।

इसके अलावा कुछ सामान्य सावधानियाँ भी बेहद जरूरी हैं –

  • बच्चों का नियमित टीकाकरण कराएँ।
  • साफ और सुरक्षित पानी का इस्तेमाल करें।
  • खाने से पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ धोएँ।
  • बच्चों को स्वच्छ वातावरण में रखें।
  • सरकारी टीकाकरण अभियानों में सक्रिय सहयोग करें।
  • यदि किसी बच्चे में हाथ-पैर कमजोर पड़ने या लकवे जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

गाजियाबाद के सीवर में पोलियो वायरस जरूर मिला है, लेकिन यह घबराने वाली स्थिति नहीं है। अभी तक किसी बच्चे में पोलियो संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई है और स्वास्थ्य विभाग पूरी सतर्कता के साथ निगरानी कर रहा है।

इससे ये समझ आता है कि भारत ने पोलियो पर जीत जरूर हासिल की है, लेकिन इस जीत को बनाए रखने के लिए लगातार सतर्क रहना होगा। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अब भी वायरस की मौजूदगी पूरी दुनिया के लिए चुनौती बनी हुई है।

रोजगार, रिकॉर्ड टूरिज्म और खुशहाल कश्मीर Vs अँधेरे में डूबा PoK: पढ़ें- 79 साल में LoC के पार कैसे ‘जहन्नुम’ बनी ‘जन्नत’, जहाँ आटे-दाल के लिए सड़कों पर खून बहा रहा पाकिस्तान

कश्मीर की धरती पर आज दो बिल्कुल अलग और विरोधी तस्वीरें दुनिया के सामने हैं। नियंत्रण रेखा यानी LOC के एक तरफ भारत का जम्मू-कश्मीर और लद्दाख है, जहाँ विकास, कनेक्टिविटी और शांति का एक नया दौर जारी है। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला कश्मीर (Kashmir) यानी PoK है, जहाँ की जनता बुनियादी जरूरतों के लिए तरस रही है और सड़कों पर खून बह रहा है।

भारत का कश्मीर जहाँ एशिया की सबसे बड़ी सुरंगों और रिकॉर्ड तोड़ पर्यटन के जरिए खुशहाली की नई इबारत लिख रहा है, वहीं पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आटे, दाल और बिजली के संकट ने एक बहुत बड़े जन-आक्रोश और विद्रोह का रूप ले लिया है। इस पूरे हालात को समझने के लिए आजादी के बाद से लेकर आज तक की पूरी कहानी को जानना जरूरी है, जो यह साफ करती है कि कैसे भारत ने कश्मीर (Kashmir) में अपने नागरिकों को खुशहाली दी और पाकिस्तान ने सिर्फ तबाही और दमन का रास्ता चुना।

आजादी के बाद का इतिहास और पाकिस्तान के कब्जे की शुरुआत

साल 1947 में देश की आजादी के बाद जब भारत और पाकिस्तान का बँटवारा हुआ था, तब कश्मीर के राजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तुरंत बाद पाकिस्तानी फौज ने कबाइलियों के भेष में कश्मीर पर विश्वासघाती हमला कर दिया। भारतीय सेना ने बहादुरी से जवाब देते हुए दुश्मनों को खदेड़ना शुरू किया, लेकिन जब तक युद्ध विराम हुआ, तब तक पाकिस्तान ने कश्मीर (Kashmir) के एक बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया था। भारत के इस हिस्से को ही आज हम पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर यानी Pok कहते हैं।

पाकिस्तान ने इस पूरे क्षेत्र को चालाकी से 2 हिस्सों में बाँट दिया। एक हिस्से को वह खुद ‘आजाद जम्मू कश्मीर’ कहता है, जो दरअसल एक दिखावा है। इसके दूसरे और बड़े हिस्से को पाकिस्तान ने ‘गिलगित-बाल्टिस्तान’ के नाम पर अलग कर दिया। आजादी के बाद से ही भारत ने अपने नियंत्रण वाले कश्मीर (Kashmir) को गले लगाया और उसे देश की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए लगातार काम किया। दूसरी तरफ पाकिस्तान ने Pok के संसाधनों का जमकर दोहन किया, लेकिन वहाँ के नागरिकों को बुनियादी अधिकार और विकास से हमेशा महरूम रखा।

भारत के कश्मीर का सफर: आतंक के साए से बाहर आकर तरक्की की राह

भारत के जम्मू-कश्मीर ने दशकों तक सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद का दंश झेला है। पाकिस्तान ने हमेशा इस खूबसूरत घाटी में खून बहाने और इसे अस्थिर रखने की नापाक कोशिशें कीं। इसके बावजूद भारत सरकार और भारतीय सेना ने कभी भी कश्मीर (Kashmir) के लोगों का साथ नहीं छोड़ा। विपरीत परिस्थितियों में भी भारत ने घाटी में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया और आतंकवादियों का खात्मा करके शांति स्थापित करने में सफलता पाई। स्थानीय युवाओं को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए रोजगार और शिक्षा के अवसर दिए गए।

पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा स्थिति में ऐतिहासिक सुधार हुआ है। घाटी में कभी आम बात बन चुकी पत्थरबाजी और महीनों तक रहने वाले बंद अब पूरी तरह बीती बात हो चुके हैं। सेना और स्थानीय प्रशासन ने मिलकर सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले नागरिकों को एक सुरक्षित माहौल दिया है। आतंकवाद की कमर टूटने के बाFद अब कश्मीर (Kashmir) घाटी के लोग बिना किसी डर के खुलकर सांस ले रहे हैं और व्यापार कर रहे हैं।

रिकॉर्ड तोड़ पर्यटन और आर्थिक खुशहाली का नया दौर

शांति स्थापित होने का सबसे बड़ा और सीधा फायदा जम्मू-कश्मीर के पर्यटन क्षेत्र को मिला है। कश्मीर (Kashmir) घाटी की खूबसूरती को देखने के लिए अब हर साल देश और विदेश से रिकॉर्ड तोड़ संख्या में पर्यटक पहुँच रहे हैं। डल झील के शिकारे से लेकर गुलमर्ग के बर्फ से ढके पहाड़ों तक हर जगह पर्यटकों की भारी भीड़ देखी जा सकती है। पर्यटन में आई इस ऐतिहासिक तेजी ने स्थानीय होटल मालिकों, शिकारे वालों, टैक्सी ड्राइवरों और हस्तशिल्प के छोटे व्यापारियों की आमदनी को कई गुना बढ़ा दिया है।

सिर्फ पर्यटन ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की नई नीतियों के कारण जम्मू-कश्मीर में उद्योग, IT, कृषि और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश हो रहा है। आज कश्मीर का युवा बंदूक और पत्थर छोड़कर स्टार्टअप संस्कृति की तरफ बढ़ रहा है। सरकार की मदद से युवा अब नौकरी खोजने के बजाय खुद का नया कारोबार शुरू कर रहे हैं। दूरदराज के गाँवों तक बिजली, पक्की सड़कें, स्वास्थ्य सुविधाएँ और मजबूत डिजिटल नेटवर्क पहुँच चुका है, जिससे आम लोगों का जीवन स्तर बहुत बेहतर हुआ है।

इंफ्रास्ट्रक्चर का अजूबा: जोजिल सुरंग और वंदे भारत ट्रेन

भारत सरकार ने कश्मीर को देश के बाकी हिस्सों से हर मौसम में जोड़े रखने के लिए हजारों करोड़ रुपए की कई बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएँ शुरू की हैं। इसी कड़ी में लद्दाख को कश्मीर (Kashmir) घाटी से जोड़ने वाली सामरिक रूप से बेहद अहम ‘जोजिला सुरंग‘ का काम अपने अंतिम चरण में पहुँच चुका है। समुद्र तल से लगभग 11,578 फीट की भारी ऊँचाई पर बन रही यह 13.15 किलोमीटर लंबी सुरंग एशिया की सबसे लंबी दो दिशा वाली सड़क सुरंग होगी। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण लद्दाख का संपर्क देश से कट जाता था, लेकिन यह सुरंग बनने के बाद साल के 365 दिन सुरक्षित आवाजाही हो सकेगी।

इसके अलावा दुनिया का सबसे ऊँचा ‘चिनाब रेल पुल’ और जम्मू-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक जैसी अद्भुत परियोजनाएँ बनकर तैयार हो रही हैं। देश की सबसे आधुनिक ‘वंदे भारत एक्सप्रेस’ ट्रेन अब सीधे कश्मीर (Kashmir) तक पहुँचने के लिए तैयार है। इन सड़कों और रेलवे नेटवर्क के बनने से न केवल आम जनता की यात्रा आसान हुई है, बल्कि सीमा पर तैनात भारतीय सैनिकों तक रसद और भारी सैन्य साजो-सामान पहुँचाना भी बेहद आसान और सुरक्षित हो गया है। कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तान ने इसी रास्ते को रोकने की साजिश रची थी, लेकिन जोजिला सुरंग बनकर अब दुश्मन के खिलाफ एक अभेद्य ढाल बन चुकी है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले PoK का सच: आटे, दाल और बिजली के लिए तरसती आवाम

भारत के कश्मीर (Kashmir) की इस सुनहरी तस्वीर के ठीक उलट, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में आज हालात पूरी तरह बेकाबू और खतरनाक हो चुके हैं। रावलकोट, मुजफ्फराबाद, मीरपुर और गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे इलाकों में पिछले कई महीनों से भीषण विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। पाकिस्तान की भयंकर आर्थिक कंगाली की सबसे बड़ी मार Pok की आवाम (जनता) पर पड़ी है। वहाँ आटे और सब्सिडी वाले गेहूँ की भारी कमी हो गई है, जिससे लोग दाने-दाने को मोहताज हैं।

इसके साथ ही पाकिस्तान सरकार ने बिजली के बिलों में बेतहाशा बढ़ोतरी कर दी है। स्थानीय लोगों का सबसे बड़ा गुस्सा इस बात पर है कि Pok के पानी और संसाधनों का इस्तेमाल करके पाकिस्तान बिजली बनाता है, लेकिन वहाँ के निवासियों को ही अँधेरे में रखकर महँगी बिजली बेची जाती है। इस भारी भेदभाव और आर्थिक शोषण के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरकर भारी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

राजनीतिक दमन और ‘आजाद कश्मीर’ का सबसे बड़ा धोखा

Pok में जनता सिर्फ आर्थिक तंगी से ही परेशान नहीं है, बल्कि वे अपने राजनीतिक अधिकारों को कुचले जाने के खिलाफ भी लड़ रहे हैं। जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) नाम का स्थानीय संगठन इस पूरे जन-आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है। प्रदर्शनकारियों की एक बड़ी माँग Pok विधानसभा में पाकिस्तान में रह रहे शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को खत्म करने की है।

स्थानीय निवासियों का साफ आरोप है कि पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियाँ मुजफ्फराबाद में अपनी कठपुतली सरकार बनाने के लिए इन 12 सीटों का इस्तेमाल करती हैं। इन सीटों के जरिए बाहर के लोगों को लाकर चुनाव जिताया जाता है, जिससे असली स्थानीय कश्मीरियों का प्रतिनिधित्व और उनकी आवाज पूरी तरह दबा दी जाती है। जब भी वहाँ के लोग अपने इस हक के लिए आवाज उठाते हैं, तो पाकिस्तानी हुकूमत उन्हें देशद्रोही बताकर जेलों में ठूस देती है।

गिलगित-बाल्टिस्तान का जनसांख्यिकीय बदलाव और शिया उत्पीड़न

पाकिस्तान ने सिर्फ कश्मीरियों की आवाज ही नहीं दबाई, बल्कि गिलगित-बाल्टिस्तान के पूरे सामाजिक ताने-बाने को ही नष्ट कर दिया है। साल 1947 में जब पाकिस्तान ने इस इलाके पर कब्जा किया था, तब यहाँ शिया और इस्माइली मुसलमानों की आबादी लगभग 80 से 85 फीसदी हुआ करती थी। इन लोगों की अपनी एक अलग भाषा, संस्कृति और पहचान थी। ब्रिटिश काल से ही यहाँ ‘स्टेट सब्जेक्ट रूल’ लागू था, जिसके तहत कोई भी बाहरी व्यक्ति यहाँ जमीन नहीं खरीद सकता था और न ही बस सकता था।

लेकिन साल 1974 में पाकिस्तान की जुल्फिकार अली भुट्टो सरकार ने इस नियम को पूरी तरह खत्म कर दिया। इसके बाद पाकिस्तान के पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों से बड़ी संख्या में सुन्नी मुसलमानों को लाकर यहाँ जबरन बसाया गया। इस साजिश के तहत स्थानीय शिया आबादी को अल्पसंख्यक बनाने की कोशिश की गई। सभी अच्छी सरकारी नौकरियाँ और जमीनें बाहरी लोगों को दे दी गईं, जिससे स्थानीय लोगों में पाकिस्तान के खिलाफ गहरी नफरत और नाराजगी पैदा हो गई है।

शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर पाकिस्तानी फौज की बर्बरता और खूनी दमन

Pok में अपनी जायज माँगों को लेकर किया जा रहा जनता का शांतिपूर्ण आंदोलन तब हिंसक विद्रोह में बदल गया, जब पाकिस्तानी प्रशासन ने दमनकारी नीतियाँ अपनानी शुरू कर दीं। पाकिस्तान सरकार ने नागरिक अधिकारों की बात करने वाले संगठन जेएएसी (JAAC) को आतंकवाद विरोधी कानून के तहत एक आतंकी संगठन घोषित कर दिया। पुलिस ने इस संगठन के दफ्तरों को सील कर दिया और 100 से ज्यादा नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

तनाव तब और बढ़ गया जब पुलिस की गोलीबारी में एक स्थानीय व्यापारी और कार्यकर्ता शाहजेब हबीब की मौत हो गई। इस मौत के बाद जब रावलकोट के अस्पताल के बाहर हजारों लोग जमा हुए, तो पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और पैरामिलिट्री फोर्स ने निहत्थे आम नागरिकों पर सीधे गोलियाँ और आंसू गैस के गोले दागे। इस सैन्य बर्बरता में अब तक 20 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और 200 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हैं। स्थिति को छिपाने के लिए पूरे Pok में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएँ बंद कर दी गई हैं और पर्यटकों को इलाका छोड़ने का हुक्म दिया गया है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान बेनकाब

Pok में जारी इस कत्लेआम और मानवाधिकारों के हनन पर भारत सहित पूरी दुनिया ने पाकिस्तान को कड़ी फटकार लगाई है। भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान अपने अवैध कब्जे वाले क्षेत्र में बर्बरता कर रहा है और अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए झूठी कहानियाँ गढ़ रहा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से माँग की है कि पाकिस्तान को इन गंभीर अत्याचारों के लिए जवाबदेह ठहराया जाए।

वैश्विक मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी इस कार्रवाई को मानवाधिकारों का खतरनाक पतन बताया है। इसके अलावा, ब्रिटेन के 50 से ज्यादा सांसदों ने अपनी सरकार को पत्र लिखकर Pok में इंटरनेट बंदी और प्रदर्शनकारियों की मनमानी गिरफ्तारियों पर गहरी चिंता जताई है। दुनिया भर में रहने वाले कश्मीरी और मानवाधिकार कार्यकर्ता अब खुलकर पाकिस्तान के इस दोहरे रवैये की आलोचना कर रहे हैं, जो खुद को कश्मीरियों का हमदर्द बताता है लेकिन अपने कब्जे वाले कश्मीर (Kashmir) के लोगों पर गोलियाँ बरसाता है।

विकास बनाम विनाश का साफ अंतर

आज नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ का अंतर पूरी दुनिया के सामने बिल्कुल साफ हो चुका है। एक तरफ भारत का जम्मू-कश्मीर है, जहाँ केंद्र सरकार ने अरबों रुपए का बजट देकर विकास, रोजगार, आधुनिक शिक्षा और बुनियादी ढांचे की नदियाँ बहा दी हैं। यहाँ का नागरिक आज सुरक्षित महसूस करता है और देश के विकास में अपना योगदान दे रहा है।

दूसरी तरफ पाकिस्तान का अवैध कब्जा है, जहाँ सिर्फ बंदूक की गूँज, महँगाई का रोना, सेना का अत्याचार और जनता की चीखें सुनाई दे रही हैं। कश्मीर (Kashmir) की ये दो तस्वीरें गवाह हैं कि भारत जहाँ अपने लोगों को खुशहाली और तरक्की की राह पर ले जा रहा है, वहीं पाकिस्तान ने कश्मीर के सुंदर हिस्से को सिर्फ एक बदहाल और प्रताड़ित कॉलोनी बनाकर छोड़ दिया है।