न सिर्फ भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में छंटनी और भर्ती में गिरावट की रिपोर्टें आ रही हैं। इससे कर्मचारियों में, खासकर उन युवा कर्मचारियों में चिंता बढ़ रही है जो अभी-अभी अपने जॉब में कदम रख रहे हैं। कई कर्मचारी, खासकर सॉफ्टवेयर और IT सेवाओं से जुड़े लोग इस बात से परेशान हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) उस सुरक्षा कवच को कम कर रहा है, जो कभी ‘व्हाइट-कॉलर’ नौकरियों में मिलता था।
उनका यह डर बेबुनियाद नहीं है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ‘फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025’ बताती है कि 41% नियोक्ताओं को उम्मीद है कि वे अपने कर्मचारियों की संख्या कम करेंगे, खासकर उन जगहों पर जहाँ AI से काम लिया जा सकता है। इसके अलावा मीडिया रिपोर्टों में उन उद्योगों में छंटनी और भर्तियों में कमी आने की बात कही गई है, जहाँ AI का इस्तेमाल किया जा सकता है।
‘AI सारी नौकरियाँ छीन लेगा’ ये कहना सही नहीं है। WEF रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक दुनिया भर में 17 करोड़ नई नौकरियाँ पैदा होंगी और 9.2 करोड़ नौकरियाँ खत्म हो जाएँगी। इसका मतलब है कि कुल मिलाकर 7.8 करोड़ नई नौकरियाँ बढ़ेंगी। खास बात यह है कि रिपोर्ट बताती है कि 2030 तक 39% कर्मचारियों के कौशल विकास की जरूरत है।
इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइज़ेशन (ILO) तो इस बारे में और भी स्पष्ट है। ऐसी बहुत कम नौकरियाँ हैं, जिन्हें AI का इस्तेमाल करके पूरी तरह से ऑटोमेट किया जा सकता है। ‘जेनरेटिव AI’ का सबसे ज्यादा असर नौकरियों को पूरी तरह से खत्म करने के बजाय उनमें बदलाव लाने के रूप में दिखेगा।
यह वह अहम सुधार है जो मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया की कहानियों में गायब है। असली कहानी यह नहीं है कि AI काम को खत्म कर देता है, बल्कि यह है कि AI कुछ कामों को छोटा कर देता है, दूसरे कामों का महत्व बढ़ा देता है, और उन कर्मचारियों और संस्थानों को नुकसान पहुँचाता है, जो बदलाव को अपनाने से इनकार करते हैं।
यहाँ तक कि McKinsey भी बड़े पैमाने पर होने वाले व्यावसायिक बदलावों को लेकर बताता है कि उसके शोध इस बात का समर्थन नहीं करता कि जनरेटिव AI नौकरियाँ को खत्म कर देगा। इतिहास गवाह है कि तकनीकी बदलाव पहले व्यवधान लाता है और बाद में रोजगार में व्यापक परिवर्तन लाता है।
AI को इंसान ही बनाते हैं, सुधारते हैं और नियंत्रित करते हैं
सार्वजनिक बहस में सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि AI खुद को प्रशिक्षित करता है, खुद को सुधारता है और खुद को सभ्य बनाता है। ऐसा नहीं है, बल्कि वह ऐसा कर ही नहीं सकता। InstructGPT पेपर प्रशिक्षण के बाद की बुनियादी प्रक्रिया को सरल शब्दों में बताता है। शोधकर्ताओं ने इंसानों के लिखे गए सामग्री जमा किए, फिर इंसानों से मॉडल के आउटपुट को रैंक करने के लिए कहा और उन रैंकिंग का उपयोग करके इंसानी प्रतिक्रिया के साथ मॉडल को और बेहतर बनाया।
इसी तरह OpenAI के GPT-4 रिलीज में भी कहा गया है कि कंपनी ने इंसानों की ज्यादातर प्रतिक्रियाओं को शामिल किया और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शुरुआती प्रतिक्रिया के लिए 50 से ज्यादा विशेषज्ञों के साथ काम किया। Anthropic भी उतनी ही स्पष्टता से कहता है कि Claude को लिखित सिद्धांतों या नियमों के आधार पर निर्देशित करता है।
तो जब लोग पूछते हैं, ‘आखिर इन सिस्टम्स को ट्रेन कौन कर रहा है?’, तो इसका सीधा-सा जवाब है—इंसान और वह भी कई चरणों में। सबसे पहले लोग डेटा इकट्ठा करते हैं या उसका लाइसेंस लेते हैं। फिर लोग अच्छे व्यवहार के उदाहरण लिखते हैं। फिर लोग आउटपुट की तुलना करते हैं और निशान लगाते हैं कि कौन-सा जवाब बेहतर, सुरक्षित, सही या उपयोगी है। उसके बाद सुरक्षा टीमें और बाहरी टेस्टर मॉडल में कमियों की जाँच करते हैं। फिर पॉलिसी टीमें सिस्टम-लेवल के नियम बनाती हैं। फिर इंजीनियर सिस्टम को दोबारा ट्रेन करते हैं, उसे ठीक करते हैं, फिल्टर करते हैं या उसे पिछली स्थिति में वापस ले जाते हैं।
OpenAI का ‘मॉडल’ इसे एक औपचारिक ढाँचे के रूप में बताता है। इस मॉडल को कैसा व्यवहार करना चाहिए, उन्हें आपस में टकराने वाले निर्देशों को कैसे सुलझाना चाहिए और डिप्लॉयमेंट और फीडबैक के जरिए समय के साथ उनके तय व्यवहार में कैसे बदलाव किया जाता है।
सबसे आसान शब्दों में कहें तो इसका मतलब यह है कि मशीन लर्निंग के हर कदम पर इंसान शामिल होते हैं। इस दुनिया की कोई भी मशीन अपने आप नहीं सीख सकती। इंसान ही उन्हें सिखाते हैं— चाहे कोड के जरिए या फिर यह लिखकर कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में ‘अच्छा व्यवहार’ असल में किसे कहते हैं।
GPT-4o में आई ‘चापलूसी’ की समस्या पर OpenAI की सार्वजनिक रिपोर्ट (postmortem) इस बात का एक अच्छा उदाहरण है कि असल दुनिया में यह प्रक्रिया कैसे काम करती है। अप्रैल 2025 में, कंपनी ने एक अपडेट को वापस ले लिया था, क्योंकि उस अपडेट के बाद मॉडल जरूरत से ज़्यादा चापलूसी करने वाला और हर बात पर सहमत होने वाला बन गया था। OpenAI ने बताया कि उसने ‘शॉर्ट-टर्म फीडबैक सिग्नल्स’ पर बहुत ज्यादा ध्यान दे दिया था। इसलिए अब वह फीडबैक इकट्ठा करने के तरीके और उस फीडबैक को मॉडल के व्यवहार में शामिल करने के तरीके दोनों में ही सुधार किए है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह सुधार इसलिए नहीं हुआ कि मॉडल में अचानक कोई ‘अंतरात्मा’ जाग गई हो। बल्कि यह सुधार इसलिए हुआ, क्योंकि इंसानों ने उस कमी को पहचाना, नियमों में बदलाव किया और पूरे सिस्टम को ही बदल दिया।
इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है—‘Grok’ इमेज विवाद। जनवरी 2026 में Grok को बनाने वाली कंपनी xAI को Grok की इमेज एडिटिंग क्षमताओं पर रोक लगानी पड़ी थी। ऐसा इसलिए करना पड़ा, क्योंकि Grok द्वारा बनाई गई कुछ इमेज को लेकर ज़बरदस्त विरोध हुआ था। इन इमेज में असली लोगों को आपत्तिजनक या बगैर कपड़ों के (undressing) दिखाया गया था।
AI की बुनियादी विज़ुअल क्षमता भी इंसानी मेहनत पर निर्भर करती है। ImageNet, जो कंप्यूटर-विजन के बुनियादी डेटासेट में से एक है, अपनी तस्वीरों को ‘क्वालिटी-कंट्रोल्ड’ और ‘इंसानों द्वारा एनोटेट की गई’ बताता है।
OpenAI के GPT-4o सिस्टम कार्ड में बताया गया है कि इस मॉडल की क्षमताओं को पब्लिक डेटासेट, वेब डेटा और दूसरे स्रोतों से ट्रेनिंग दी गई है और फिर सुरक्षा जाँच से गुजारा गया। इसलिए अगर कोई मॉडल भरोसेमंद तरीके से भूरे अंडों और सफेद अंडों में फर्क कर पाता है, तो ऐसा इसलिए नहीं है कि मशीन ने ‘हकीकत को खुद ही समझ लिया।’ इंसानों ने ही श्रेणियाँ बनाईं, उदाहरणों को चुना मशीन को बताया कि भूरे और सफेद अंडों में फर्क कैसे करना है (इसके लिए उन्होंने तस्वीर में टोकरी में रखे हर एक अंडे पर निशान लगाया), बेंचमार्क बनाए, और यह तय किया कि क्या यह सिस्टम इस्तेमाल के लायक है।
खास बात यह है कि यह सब एक बार में नहीं हो जाता। आज भी ऐसी कई कंपनियाँ हैं जो ‘डेटा टैगिंग’ की सेवाएं देती हैं, जहाँ इंसान टेक्स्ट, तस्वीरों और वीडियो को टैग करते हैं, ताकि मशीनें उनसे सीख सकें। इस तरह की नौकरियाँ इतनी जल्दी खत्म होने वाली नहीं हैं।
चलिए एक उदाहरण और देते हैं। एक चीज होती है जिसे ‘वाइब कोडिंग’ कहते हैं, जिसका मतलब है AI की मदद से कोड लिखना। अगर कोई यह कहता है कि मशीन ने खुद ही कोड लिखना सीख लिया है, तो यह झूठ होगा। दुनिया भर में लाखों कोडिंग विशेषज्ञ दिन-रात AI को कोड लिखना सिखा रहे हैं, ताकि कोई भी नया सीखने वाला (नोब) भी एक विशेषज्ञ की तरह कोड लिख सके।
वे डिजिटल नौकरियां बदलेंगी, जो हमेशा एक जैसी रहती हैं
तो फिर, सबसे पहले बदलाव (disruption) कहाँ देखने को मिलेगा? इसका जवाब ‘हर तरह के काम’ नहीं है, बल्कि, यह उन कामों में आएगा जो बार-बार दोहराए जाते हैं, स्क्रीन पर किए जाते हैं, एक तय ढाँचे में होते हैं और जिनमें ज्यादातर काम जानकारी को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने से जुड़े होते हैं।
ILO का कहना है कि जिन नौकरियों पर ‘जेनरेटिव AI’का सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना है, वे ऐसी नौकरियाँ हैं, जिनमें अलग-अलग कामों में ऑटोमेशन की बहुत ज्यादा और लगातार गुंजाइश होती है। साथ ही, ILO इस बात पर भी जोर देता है कि लगभग सभी नौकरियों में अभी भी कुछ ऐसे काम होते हैं, जिनके लिए इंसानी दखल की जरूरत पड़ती है।
WEF का अनुमान है कि जिन नौकरियों में सबसे तेजी से कमी आएगी, उनमें क्लर्क और प्रशासनिक काम शामिल हैं—जैसे कैशियर, टिकट क्लर्क, प्रशासनिक सहायक और दूसरे क्लर्क। वहीं जिन तकनीकी नौकरियों में सबसे तेज़ी से बढ़ोतरी होगी, उनमें AI और मशीन लर्निंग विशेषज्ञ, बिग डेटा विशेषज्ञ, फिनटेक इंजीनियर और सॉफ्टवेयर डेवलपर शामिल हैं।
यह पैटर्न असल इस्तेमाल के डेटा में भी दिखता है। Anthropic की 2026 की रिसर्च, जो Claude के असल इस्तेमाल पर आधारित है, बताती है कि कंप्यूटर प्रोग्रामर, कस्टमर सर्विस रिप्रेजेंटेटिव और डेटा एंट्री करने वालों पर इसका सबसे ज़्यादा असर पड़ा है। कंपनी का कहना है कि AI अभी भी अपनी सैद्धांतिक पहुँच से बहुत दूर है और उसके डेटा में 30% कर्मचारियों के काम पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है।
इसका मतलब यह नहीं है कि कुछ काम को पूरी तरह AI रिप्लेस कर देगा। इसका मतलब यह होता है कि काम का एक बड़ा हिस्सा AI की मदद से किया जाएगा, उसकी रफ्तार बढ़ जाएगी या उसे नए सिरे से व्यवस्थित किया जाएगा।
Microsoft की रिसर्च में पाया गया कि जिन डेवलपर के पास GitHub Copilot की सुविधा थी, उन्होंने एक प्रयोग में कोडिंग का काम 55.8% तेजी से पूरा किया। बाद में Microsoft Research के एक पेपर में, जिसमें लगभग 4900 डेवलपर पर किए गए तीन प्रयोगों के नतीजों को एक साथ मिलाया गया था, पाया गया कि AI कोडिंग असिस्टेंट का इस्तेमाल करने वाले डेवलपर द्वारा पूरे किए गए कामों में 26.08% की बढ़ोतरी हुई और कम अनुभवी डेवलपर को इससे ज्यादा फायदा हुआ।
ये उत्पादकता के लिहाज से बहुत अहम नतीजे हैं, लेकिन ये इस बात को साबित नहीं करते कि कोडर का काम पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। ये नतीजे बताते हैं कि रूटीन कोडिंग, बॉयलरप्लेट, शुरुआती ड्राफ़्ट और बार-बार दोहराए जाने वाले छोटे-मोटे कामों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा, जबकि रिव्यू, आर्किटेक्चर, एज केस, डीबगिंग, इंटीग्रेशन, सुरक्षा और जवाबदेही जैसे काम अभी भी बहुत जरूरी बने रहेंगे।
कोडिंग के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी यही बात लागू होती है। कस्टमर-सपोर्ट पर की गई एक बड़ी रिसर्च में पाया गया कि एक जनरेटिव AI असिस्टेंट की मदद से उत्पादकता में औसतन लगभग 14% से 15% की बढ़ोतरी हुई, और इसका सबसे ज्यादा फायदा नए और कम हुनर वाले कर्मचारियों को मिला।
Erik Brynjolfsson अपने पेपर ‘Generative AI at Work’ में कहते हैं कि इस टूल ने नए कर्मचारियों को अनुभवी कर्मचारियों के काम करने के तरीके से सीखकर, अनुभव हासिल करने की प्रक्रिया में तेजी से आगे बढ़ने में काफी मदद की। यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। इसका मतलब है कि AI इंसानी हुनर के कुछ हिस्सों को सीखकर उन्हें नए सिरे से इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन इसका यह भी मतलब है कि किसी के पास पहले से ही वह हुनर होना चाहिए, उसे AI के लिए एक मॉडल के तौर पर तैयार किया जाना चाहिए, और उस पर अभी भी इंसानी निगरानी की जरूरत बनी रहेगी।
यही कारण है कि मशीन आउटपुट में भारी वृद्धि के साथ ‘मानवीय नजर’ का महत्व कम नहीं, बल्कि और बढ़ जाता है। स्टैक ओवरफ्लो के 2025 डेवलपर सर्वेक्षण में पाया गया कि एआई उपकरणों की सटीकता पर भरोसा करने वालों की तुलना में अविश्वास करने वाले डेवलपर्स की संख्या अधिक है। 46% अविश्वास बनाम 33% भरोसा। पत्रकारिता के क्षेत्र में, एपी का कहना है कि पत्रकार की केंद्रीय भूमिका नहीं बदलेगी, एआई पत्रकारों का विकल्प नहीं है, और किसी भी जनरेटिव-एआई आउटपुट को “अपुष्ट स्रोत सामग्री” के रूप में माना जाना चाहिए।
रॉयटर्स ने अक्टूबर 2025 में रिपोर्ट किया कि बीबीसी-ईबीयू परीक्षण में 45% एआई समाचार उत्तरों में महत्वपूर्ण कमियाँ और 81% में किसी न किसी प्रकार की समस्या पाई गई। लोग एआई स्लोप की बात करते समय इसी का जिक्र करते हैं, जिसका अर्थ है बड़े पैमाने पर सस्ता आउटपुट, जिसमें सच लिखने की जिम्मेदारी मानव की होती है।
वास्तविक दुनिया को अभी भी मानवीय हाथों की जरूरत
जनरेटिव एआई भाषा, पैटर्न पूर्णता, सारांश और स्क्रीन पर कोड जैसे कार्यों में सर्वश्रेष्ठ है। मैकिन्से का कहना है कि कुछ कम वेतन वाली नौकरियों में अनिश्चित शारीरिक काम या कस्टमर से डील जैसे काम शामिल है, जो खुद से संचालित नहीं हो सकते।
इसी रिसर्च में कहा गया है कि शारीरिक काम खत्म नहीं होगा और अनुमानित रूप से कुल समय का लगभग 31% हिस्सा शारीरिक काम में ही बीतेगा, जिसमें परिवहन, निर्माण और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र योगदान दे रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय लेबर संगठन (आईएलओ) भी इस बात पर जोर देता है कि कुछ ही नौकरियाँ पूरी तरह से स्वचालित हो सकती हैं और अधिकांश बिजनेस मानव और मशीन दोनों के मिलने से चलता है।
एंथ्रोपिक के श्रम-बाजार अनुसंधान के अनुसार, कई काम एआई की पहुँच से बाहर हैं, विशेष रूप से पेड़ों की छँटाई और कृषि मशीनरी चलाने जैसे शारीरिक कृषि कार्य। करीब 30% श्रमिकों के कार्यों को एआई नहीं ले सकता। इनमें रसोइया, मोटरसाइकिल मैकेनिक, लाइफगार्ड, बारटेंडर, डिशवॉशर और ड्रेसिंग रूम अटेंडेंट शामिल हैं।
एआई एक प्लंबर के लिए निर्देश लिख सकता है, एक इलेक्ट्रीशियन का काम कर सकता है या एक मैकेनिक की मदद कर सकता है, लेकिन फिर भी यह किसी लीक हो रहे पाइप में पानी के दबाव को महसूस नहीं कर सकता, किसी दीवार में लगे तार अगर जलने लगे तो उसके गंध नहीं सूँघ सकता। शोरगुल वाले कार्यस्थल पर टेढ़ी-मेढ़ी बीम का आकलन नहीं कर सकता या अव्यवस्थित, अस्थिर कार्य वातावरण में सुरक्षित रूप से काम नहीं कर सकता। ये सभी शारीरिक, परिस्थितिजन्य और स्थानीय निर्णय लेने के तरीके हैं।
यही वजह है कि WEF का अपना जॉब्स आउटलुक ऐसा भविष्य नहीं दिखाता जिसमें सिर्फ कोडर और प्रॉम्प्ट-राइटर ही हों। इसके मुताबिक, अगले पाँच सालों में सबसे तेजी से बढ़ने वाली नौकरियों में बिल्डिंग बनाने वाले मजदूर शामिल हैं। इनके साथ खेती-बाड़ी करने वाले मजदूर, डिलीवरी ड्राइवर और फूड-प्रोसेसिंग का काम करने वाले लोग भी हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, AI ऑफ़िसों को बदल सकता है, लेकिन कंस्ट्रक्शन साइटों, रिपेयर की दुकानों, रसोईघरों, खेतों और मेंटेनेंस के कामों वाली जगहों पर लोगों की जरूरत हमेशा रहेगी। भविष्य की अर्थव्यवस्था “डिजिटल मजदूर बनाम शारीरिक काम करने वाले मज़दूर” वाली नहीं होगी। यह एक मिली-जुली अर्थव्यवस्था होगी, जिसमें शारीरिक काम करने वाले लोग AI को एक टूल के तौर पर इस्तेमाल करेंगे, लेकिन साथ ही वे खुद ही ऐसे शारीरिक काम भी करते रहेंगे जिनकी जगह कोई और नहीं ले सकता।
भारत कौशल विकास कर रहा, घबरा नहीं रहा
भारत के लिए व्यावहारिक सवाल यह नहीं है कि AI से डरना है या नहीं, बल्कि यह है कि इसके इर्द-गिर्द पर्याप्त कौशल, भाषाई बुनियादी ढाँचा और डोमेन विशेषज्ञता विकसित की जाए या नहीं। IndiaAI मिशन को भी इसी नज़रिए से तैयार किया गया है। फरवरी 2026 की PIB रिलीज में कहा गया है कि भारत की AI रणनीति का उद्देश्य आर्थिक और रोजगार के अवसर पैदा करना है। इसमें मिशन के लिए ₹10372 करोड़ के बजट का जिक्र है, और बताया गया है कि 38000 से ज्यादा GPUs को सिस्टम में जोड़ा गया है, स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल्स के लिए बारह टीमों को शॉर्टलिस्ट किया गया है, भारत-विशिष्ट 30 AI एप्लीकेशन्स को मंजूरी दी गई है और हजारों अंडरग्रेजुएट, पोस्टग्रेजुएट और PhD छात्रों को प्रतिभा विकास के लिए सहायता दी गई है। इसी रिलीज में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि भारत के फाउंडेशन मॉडल्स को भारतीय डेटासेट्स और भाषाओं के आधार पर तैयार किया जा रहा है।
यह स्थानीय आधार बहुत मायने रखता है। BHASHINI के CEO ने जनवरी 2026 में कहा था कि AI नागरिकों की प्रभावी ढंग से सेवा तभी कर सकता है, जब वह भारतीय भाषाओं को समझे और उसे ऐसे स्वदेशी डेटा पर प्रशिक्षित किया गया हो, जो स्थानीय संदर्भों और उपयोग के तरीकों को दर्शाता हो। इस प्लेटफॉर्म का कहना है कि यह 36 से ज्यादा लिखित भाषाओं, 22 से ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं, 350 से ज्यादा AI भाषा मॉडल्स और सैकड़ों इंटीग्रेशन को सपोर्ट करता है। यह कोई मामूली मुद्दा नहीं है। ऐसे देश में, जहाँ भाषा, बोली, कोड-मिक्सिंग और संदर्भ ही रोजमर्रा के संवाद को आकार देते हैं, वहाँ स्थानीय मानवीय इनपुट कोई वैकल्पिक चीज नहीं है, बल्कि यही तो इस पूरे सिस्टम का आधार है।
भारतीय भाषाओं पर हुए स्वतंत्र शोध भी इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं। AI4Bharat का कहना है कि ज्यादातर भारतीय भाषाओं में उस बड़े पैमाने के प्रशिक्षण डेटा की कमी है, जिसकी जरूरत आधुनिक AI प्रणालियों को होती है। इसके ‘Indic LLM-Arena’ का तर्क है कि वैश्विक मानक बहुत ज्यादा अंग्रेजी-केंद्रित हैं। वे ‘हिंग्लिश’ और ‘टैंग्लिश’ जैसी कोड-मिश्रित बोलियों को नजरअंदाज़ कर देते हैं और भारतीय सांस्कृतिक, प्रासंगिक और सुरक्षा संबंधी जरूरतों को समझने में नाकाम रहते हैं। यह स्पष्ट रूप से ‘भाषा, संदर्भ और सुरक्षा’ के मूल्यांकन के लिए एक ऐसे मॉडल की वकालत करता है, जिसमें मानवीय हस्तक्षेप शामिल हो।
इसका मतलब यह है कि भारत के AI-युक्त भविष्य के लिए न केवल मॉडल बनाने वालों की जरूरत होगी, बल्कि ऐसे मूल्यांकनकर्ताओं, भाषा विशेषज्ञों, डोमेन विशेषज्ञों, सुरक्षा समीक्षकों और ऐसे लोगों की भी जरूरत होगी, जो लगातार इस बात की पुष्टि करते रहें कि ये प्रणालियाँ वास्तव में भारतीय उपयोगकर्ताओं के लिए कारगर साबित हो रही हैं या नहीं।
नीति आयोग का 2025 का रोडमैप एक अहम रणनीतिक विकल्प को साफ तौर पर सामने रखता है। 2031 तक, भारत का टेक्नोलॉजी सेक्टर 1.5 मिलियन नौकरियाँ खो सकता है या 4 मिलियन तक नए अवसर पैदा कर सकता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अभी क्या फैसले लिए जाते हैं। ठीक इसी वजह से, यह आम धारणा कि “AI नौकरियाँ खा रहा है,”। लेकिन, देश की नीति बनाने वाली संस्थाएँ AI के इस बदलाव को सिर्फ एक जोखिम के तौर पर ही नहीं, बल्कि कौशल विकास, क्षमता निर्माण और स्थानीय इकोसिस्टम के एक मुकाबले के तौर पर देख रही हैं।
सबसे ईमानदार निष्कर्ष न तो बेफिक्री है और न ही घबराहट। AI पहले से ही कुछ दोहराए जाने वाले डिजिटल कामों को कम कर रहा है। यह साफ तौर पर शुरुआती स्तर के क्लर्क वाले काम, रोजमर्रा की कोडिंग, बुनियादी तौर पर चीजों को दोबारा लिखने और स्क्रीन पर किए जाने वाले दूसरे बहुत एक जैसे कामों पर दबाव डाल रहा है। साथ ही, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इंसानी मेहनत पूरी तरह से खत्म होने वाली है। असल में जो हो रहा है, वह है काम का फिर से मूल्यांकन: दोहराए जाने वाले कामों के लिए कम इनाम, और सही फैसला लेने, जाँच-पड़ताल करने, चीजों को जोड़ने, जवाबदेही, स्थानीय जानकारी और शारीरिक मौजूदगी के लिए ज्यादा इनाम।
इसलिए इस बात को कहने का बेहतर तरीका यह नहीं है कि ‘AI नौकरियाँ खा जाएगा।’ बल्कि यह है कि “AI उन लोगों को इनाम देगा जो खुद को बदलते हैं और उन लोगों को पीछे छोड़ देगा जो सीखना नहीं चाहते।” जो कोडर सिर्फ घिसे-पिटे कोड बनाते हैं, उन्हें उन कोडर के मुक़ाबले ज़्यादा जोखिम है जो AI की मदद से बने सिस्टम की समीक्षा कर सकते हैं, उनका ढाँचा तैयार कर सकते हैं और उन्हें बेहतर बना सकते हैं। जो लेखक सिर्फ दूसरों की बातों को अपने शब्दों में दोहराते हैं, उन्हें उन संपादकों और फैक्ट-चेकर के मुकाबले ज्यादा जोखिम है, जो मशीन से मिले आउटपुट की जाँच कर सकते हैं और उसे और बेहतर बना सकते हैं। प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, वेल्डर, मैकेनिक, किसान, बढ़ई और निर्माण क्षेत्र के मज़दूर AI के इस दौर में कोई पुरानी और बेकार चीजें नहीं हैं, वे उस इंसानी बुनियाद का हिस्सा हैं जिस पर AI वाली अर्थव्यवस्था आज भी निर्भर करती है।
भविष्य उन कामगारों का है जो अपने काम में माहिर हैं, और जो नए औज़ारों का इस्तेमाल करना जानते हैं, लेकिन अपने फैसले लेने की क्षमता को उन ‘हथियारों’ के हवाले नहीं करते।
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