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अगर विधायिका भी माँगने लगे जस्टिस जामदार जैसी छूट तो… बॉम्बे हाई कोर्ट की ‘वॉशिंग मशीन’ और ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ जैसी टिप्पणी कितनी सही?

बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस माधव जामदार की एक मामले में की गईं मौखिक टिप्पणियों की खूब चर्चा हो रही है। यह मामला मुंबई पुलिस के उस एक्सटर्नमेंट ऑर्डर से जुड़ा था जिसमें SDPI के पदाधिकारी सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी को विरोध-प्रदर्शनों और नारों के चलते शहर से बाहर करने की कार्रवाई का सामना करना पड़ा था। इस मामले में जस्टिस माधव जामदार की टिप्पणियों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि न्यायपालिका की सीमा कहाँ खत्म होनी चाहिए है?

जस्टिस जामदार ने तीखे अंदाज में पुलिस से कहा कि नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है, वे विरोध नहीं कर सकते, वे सरकार के खिलाफ नारे नहीं लगा सकते और लोग प्रदर्शन करेंगे तो आप केस लगा देंगे। इस हिस्से तक अदालत की चिंता बिल्कुल सही थी क्योंकि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का मूल अधिकार है और विरोध प्रदर्शन या आलोचना लोकतंत्र की आत्मा में बसी हुई है।

लेकिन बात इससे आगे की है। जस्टिस जामदार ने इससे आगे बढ़कर महाराष्ट्र की राजनीति, दल-बदल, ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ और ‘वॉशिंग मशीन’ जैसे राजनीतिक मुहावरों का जिक्र कर दिया। लाइव लॉ की रिपोर्ट में जस्टिस जामदार का बयान छपा है। वे कहते हैं, “आपको (सईद) भी पाला बदल लेना चाहिए… वैसे भी पूरे महाराष्ट्र में हॉर्स ट्रेडिंग चल रही है। आपके खिलाफ कुछ FIR हैं… पाला बदलने के बारे में सोचिए, वहाँ एक ‘वॉशिंग मशीन’ है।”

यही वह जगह है जहाँ सवाल उठता है कि क्या अदालत कानून की भाषा में बोल रही थी या वो ऐसी टिप्पणी कर रही थी जिससे बचा जा सकता था? पुलिस की कार्रवाई को गलत ठहराना न्यायिक काम है। नागरिक के विरोध के अधिकार की रक्षा करना अदालत का कर्तव्य है। लेकिन किसी प्रदेश की राजनीतिक संस्कृति पर कटाक्ष करना, दल-बदल पर टिप्पणी करना या ‘वॉशिंग मशीन’ जैसा शब्द इस्तेमाल करना न्यायिक मर्यादा के लिहाज से क्या सही लगता है?

लोकतंत्र में अदालतें सरकार पर अंकुश लगाने के लिए हैं, सरकार की जगह लेने के लिए नहीं। न्यायपालिका का काम यह देखना है कि प्रशासन संविधान और कानून के भीतर काम कर रहा है या नहीं। अगर पुलिस विरोध करने वाले व्यक्ति पर मनमानी कार्रवाई करती है, तो कोर्ट को उसे रोकना चाहिए। यहाँ यह बात भी हम लोगों को याद रखनी चाहिए कि कोर्ट की शक्ति उसकी राजनीतिक चुटकी में नहीं बल्कि उसके आदेश की संवैधानिक मजबूती में है।

यह समस्या इसलिए और बड़ी लगती है क्योंकि न्यायपालिका खुद अपनी छवि को लेकर बहुत संवेदनशील रहती है। हाल ही में NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ को लेकर चैप्टर दिए जाने का सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान तक ले लिया था। यहाँ तक की कोर्ट ने उन 3 लोगों पर बैन तक लगा जिन्होंने यह चैप्टर लिखा था। हालाँकि, बाद में यह बैन हटा दिया गया।

बाद में NCERT को किताब का वितरण रोकना पड़ा और इसे अपनी ओर से ‘त्रुटिपूर्ण निर्णय’ माना। कोर्ट ने तब कहा था, “इससे व‍िद्यार्थ‍ियों के मन में, उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों, छोटे बच्चे-बच्‍च‍ियों के माता-पिता, पूरे समाज में और अंततः अगली पीढ़ी तक… न्‍यायपाल‍िका जैसी संस्‍था के प्रति भरोसे के धीरे-धीरे कमजोर पड़ने का खतरा पैदा होता है।”

यहीं असली प्रश्न खड़ा होता है। अगर न्यायपालिका चाहती है कि उसके बारे में लिखते या बोलते समय समाज संयम रखे, तो क्या वही संयम न्यायपालिका की अपनी भाषा पर लागू नहीं होना चाहिए? अगर किताब में न्यायपालिका पर आलोचनात्मक टिप्पणी बच्चों के मन में कोर्ट के प्रति अविश्वास पैदा कर सकती है, तो क्या अदालत की कुर्सी से आई राजनीतिक टिप्पणी जनता के मन में यह धारणा नहीं बना सकती है कि जज किसी खास राजनीतिक विमर्श से प्रभावित हैं? यह सवाल हम आप पर छोड़ देते हैं।

इस मामले में एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि अगर अदालत से ‘वॉशिंग मशीन’, ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ और ‘साइड बदल लो’ जैसी राजनीतिक टिप्पणियाँ की जा सकती हैं, तो क्या यही स्वतंत्रता कार्यपालिका और विधायिका को भी मिलेगी? क्या कोई मंत्री, विधायक या सांसद किसी जज या कोर्ट के फैसले पर इसी अंदाज में टिप्पणी कर सकता है? हम और आप जानते हैं कि ऐसा होते ही बात तुरंत ‘न्यायपालिका की गरिमा’ और ‘अवमानना’ तक पहुँच जाती है। फिर सवाल यह है कि न्यायपालिका आलोचना सहने में क्या उतनी उदारता दिखाएगी जितनी वह इस मामले में आक्रामक हो रही है?

एक गंभीर मुद्दा और भी है जिस पर ध्यान देना जरूरी है। याचिकाकर्ता SDPI से जुड़ा हुआ था, SDPI उस PFI का अंग है जिसे गृह मंत्रालय ने बैन कर दिया है। PFI और उसके 8 सहयोगी संगठनों को 28 सितंबर 2022 को UAPA के तहत प्रतिबंधित कर दिया गया था। इन पर टेरर फंडिंग और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है।

जब किसी व्यक्ति की पृष्ठभूमि ऐसे संगठन से जुड़ी हों जिसके आसपास कट्टरता, हिंसा, टेरर फंडिंग और दंगा-संबंधी आशंकाएँ हों तो उसे बिल्कुल सामान्य राजनीतिक प्रदर्शन की तरह देखना भी शायद पूरा ठीक दृष्टिकोण नहीं होगा। ऐसे में इसे केवल सामान्य राजनीतिक विरोध मान लेना भी कहाँ तक सही होगा यह भी सोचने की बात है। क्योंकि SDPI-PFI संदर्भ में मामला केवल ‘फ्री स्पीच’ का नहीं रह जाता है?

भारत में न्यायिक आचरण को लेकर ‘Restatement of Values of Judicial Life’ जैसे सिद्धांत भी मौजूद हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में इस 16-सूत्रीय चार्टर को अपनाया था। इसमें कहा गया है कि जजों को राजनीतिक विषयों पर सार्वजनिक बहस में शामिल नहीं होना चाहिए और उन्हें अपने फैसलों को बोलने देना चाहिए। यह बात केवल भाषणों या इंटरव्यू पर लागू नहीं होती बल्कि अदालत की मौखिक टिप्पणियों पर भी नैतिक रूप से लागू होनी चाहिए।

Uber, ओला, Rapido… एक ही जगह का किराया बार-बार क्यों बदलता रहता है?, कैसे बचाएँ अपनी जेब के पैसे

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप और आपका दोस्त एक ही जगह खड़े होकर एक ही मंजिल के लिए कैब बुक कर रहे हों, लेकिन दोनों के फोन में किराया अलग-अलग दिख रहा हो? या कल तक जिस 5 किलोमीटर के सफर के लिए आपने 120 रुपए दिए थे, आज उसी रूट पर ऐप 300 रुपए माँग रहा हो? कभी बारिश आ जाए या ऑफिस छूटने का समय हो, तो कैब और बाइक टैक्सियों का किराया आसमान छूने लगता है।

अक्सर उपभोक्ताओं को लगता है कि ये कंपनियाँ अपनी मनमर्जी से पैसे वसूल रही हैं। सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर कई तरह के दावे किए जाते हैं। लेकिन इसके पीछे एक पूरा गणित, तकनीकी एल्गोरिदम और सरकार के नए नियम काम करते हैं। आइए समझते हैं कि टैक्सियों के किराए का यह पूरा खेल क्या है और आप एक स्मार्ट उपभोक्ता बनकर अपने पैसे कैसे बचा सकते हैं।

किराए के उतार-चढ़ाव का असली गणित: सर्ज प्राइसिंग और सरकारी नियम

टैक्सी ऐप्स का किराया कभी कम तो कभी ज्यादा क्यों होता है, इसका सबसे बड़ा कारण ‘सर्ज प्राइसिंग‘ (Surge Pricing) या ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ है। Uber, ओला और Rapido जैसी कंपनियाँ पूरी तरह डिमांड (माँग) और सप्लाई (ड्राइवर्स की उपलब्धता) के सिद्धांत पर काम करती हैं।

जब किसी खास इलाके में एक ही समय पर कैब बुक करने वाले लोग (डिमांड) बहुत ज्यादा हो जाते हैं और वहाँ गाड़ियाँ या ड्राइवर्स (सप्लाई) कम होते हैं, तो ऐप का कंप्यूटर सिस्टम अपने आप किराया बढ़ा देता है।

कंपनियों का तर्क है कि वे ऐसा इसलिए करती हैं ताकि बढ़े हुए किराए को देखकर दूसरे इलाकों से ड्राइवर्स उस हाई-डिमांड वाले इलाके की तरफ आएँ और यात्रियों को जल्दी गाड़ी मिल सके। सुबह 8 से 11 बजे का ऑफिस टाइम, शाम 5 से 9 बजे का घर लौटने का वक्त, तेज बारिश, त्योहार या एयरपोर्ट-रेलवे स्टेशन जैसे भीड़भाड़ वाले इलाकों में अक्सर यही स्थिति बनती है।

इसके अलावा, सरकार के नए नियमों ने भी इस खेल को बदल दिया है। केंद्र सरकार की मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस के तहत Uber, उबर और Rapido जैसी कंपनियों को पीक आवर्स (ज्यादा भीड़ वाले समय) में बेस किराए का दोगुना (2x) तक वसूलने की कानूनी मंजूरी दी गई है।

पहले यह सीमा केवल डेढ़ (1.5) गुना थी। हालाँकि, सरकार ने ड्राइवरों की सुरक्षा और आय सुनिश्चित करने के लिए नॉन-पीक आवर्स (कम माँग वाले समय) में न्यूनतम किराया बेस किराए का कम से कम 50% रखने का नियम भी बनाया है, जिससे कंपनियाँ अब बहुत ज्यादा सस्ती राइड्स नहीं दे सकती हैं।

स्मार्ट उपभोक्ता कैसे बनें: पैसे बचाने के व्यावहारिक तरीके

अगर आप रोज-रोज के बढ़े हुए किराए से परेशान हैं, तो थोड़ा स्मार्ट बनकर अपनी जेब का बोझ कम कर सकते हैं। इसके लिए कुछ बेहद आसान और व्यावहारिक तरीके नीचे दिए गए हैं।

5 से 10 मिनट का इंतजार करें: अगर आपको कहीं पहुँचने की बहुत ज्यादा जल्दी नहीं है, तो किराया बहुत हाई दिखने पर तुरंत बुक न करें। थोड़ी देर रुक जाएँ। जैसे ही उस इलाके में माँग थोड़ी कम होगी या ड्राइवर्स बढ़ेंगे, सर्ज प्राइसिंग अपने आप खत्म हो जाएगी और किराया अचानक कम हो जाएगा।

मल्टी-ऐप स्ट्रेटेजी (Multi-App Strategy) अपनाएँ: कभी भी केवल एक ऐप के भरोसे न बैठें। बुकिंग करने से पहले अपने फोन में Uber, उबर और Rapido और इनड्राइव (InDrive) जैसी कम से कम दो-तीन ऐप्स पर किराया जरूर चेक करें। कई बार एक ही समय पर दोनों ऐप्स के किराए में 100 रुपए से लेकर 150 रुपए तक का अंतर देखने को मिल जाता है।

हाई-डिमांड जोन से थोड़ा बाहर निकलें: अगर आप किसी बड़े मॉल, एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन के ठीक एग्जिट गेट पर खड़े हैं, तो वहाँ ऐप का एल्गोरिदम बहुत ज्यादा किराया दिखाएगा। ऐसे में थोड़ा सा पैदल चलकर मुख्य सड़क या थोड़ी आगे की लोकेशन डालकर सर्च करें। हाई-डिमांड जोन से बाहर आते ही कीमत काफी गिर जाती है।

पूल या शेयर्ड राइड का इस्तेमाल करें: जहाँ भी संभव हो, शेयर्ड राइड का विकल्प चुनें। यह अकेले सफर करने के मुकाबले आपकी जेब पर काफी हल्का पड़ता है।

क्या वाकई iphone और Android का रेट अलग है?

हाल ही में सोशल मीडिया पर कई ऐसे स्क्रीनशॉट वायरल हुए, जिसमें देखा गया कि एक ही जगह के लिए आईफोन (iPhone) पर ज्यादा और एंड्रॉयड (Android) फोन पर कम किराया दिखाया जा रहा था। या कभी आईफोन पर कम और एंड्रॉयड पर ज्यादा दिखाने लगता है।

इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (CCPA) ने ओला और Uber को नोटिस भेजकर किराया तय करने की पूरी प्रक्रिया का जवाब माँगा है। हालाँकि कंपनियाँ इस बात से इनकार करती हैं कि वे फोन देखकर किराया बदलती हैं, लेकिन तकनीकी एक्सपर्ट्स इसके पीछे ‘यूजर बिहेवियर’ (User Behavior) यानी उपभोक्ता के व्यवहार को बड़ी वजह मानते हैं।

ये ऐप्स आपकी पुरानी राइड्स, आपकी लोकेशन और आपकी हर एक्टिविटी को ट्रैक करते हैं। यदि आप एक रेगुलर कस्टमर हैं और ऐप को पता है कि आप इस रूट पर रोज सफर करते हैं, तो आपको थोड़ा ज्यादा किराया दिख सकता है, चाहे आपके पास कोई भी फोन हो।

ऐप का एल्गोरिदम यह भांप लेता है कि आप जरूरत में हैं और भुगतान करने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा, फोन की बैटरी कम होने पर ज्यादा किराया दिखाने का दावा भी सोशल मीडिया पर बहुत किया जाता है, लेकिन इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और कंपनियाँ इसे सिर्फ एक अफवाह बताती हैं।

कौन सी टैक्सी है सबसे फायदेमंद?

आजकल बाजार में टैक्सी बुक करने के कई नए विकल्प आ गए हैं। हाल ही में दिल्ली जैसे शहरों में ‘भारत टैक्सी’ की शुरुआत हुई है। यह सर्विस ओला और Uber से बिल्कुल अलग तरीके से काम करती है। जहाँ ओला, उबर और रैपिडो का किराया समय और भीड़ के हिसाब से बदलता रहता है, वहीं भारत टैक्सी का किराया हमेशा एक समान (फिक्स्ड) रहता है।

ओला-उबर में बारिश या ऑफिस के समय किराया दोगुना तक बढ़ जाता है, लेकिन भारत टैक्सी में ऐसा कोई बदलाव नहीं होता है। अगर आप ऑफिस के समय या भारी बारिश में 12 किलोमीटर से ज्यादा दूर जा रहे हैं, तो आपके लिए ‘भारत टैक्सी‘ सबसे बेस्ट है।

इसमें कोई सर्ज प्राइसिंग (बढ़ा हुआ किराया) नहीं लगती है। इस वजह से यह ओला और उबर के मुकाबले करीब 20% से 30% तक सस्ती पड़ती है। वहीं सामान्य दिनों में कम दूरी के लिए ओला मिनी या उबर गो भी अच्छे विकल्प हैं।

अगर आप अकेले सफर कर रहे हैं, तो आपके लिए ‘Rapido’ या ‘उबर मोटो’ जैसी बाइक टैक्सी सबसे बढ़िया हैं। दिल्ली जैसे भीड़भाड़ वाले शहरों में ये बाइक टैक्सियाँ तंग गलियों से आसानी से निकल जाती हैं। इससे आपके पैसे और समय दोनों की बचत होती है। इलेक्ट्रिक स्कूटरों के आने से अब इनका किराया भी काफी कम और किफायती हो गया है।

भारतीय और विदेशी टैक्सी मॉडल में क्या अंतर है?

भारत और विदेशों (जैसे अमेरिका या यूरोप) के टैक्सी सिस्टम में नियमों, ड्राइवरों की कमाई और लोगों की जरूरतों का बड़ा अंतर है। विदेशी देशों में लेबर कानून बहुत कड़े होते हैं और वहाँ ड्राइवरों के लिए एक न्यूनतम मजदूरी तय होती है। इस वजह से वहाँ टैक्सियों का शुरुआती (बेस) किराया हमेशा बहुत ज्यादा होता है।

इसके विपरीत, भारत में ओला और Uber जैसी कंपनियाँ ड्राइवरों की कुल कमाई का 20% से 25% तक हिस्सा कमीशन के रूप में खुद रख लेती हैं। लेकिन अब भारत में रैपिडो जैसी देसी ऐप्स ने एक नया ‘ज़ीरो कमीशन मॉडल’ शुरू किया है। इसमें ड्राइवर कंपनियों को रोज का सिर्फ 20 या 30 रुपए का छोटा सा चार्ज देते हैं और बाकी की पूरी कमाई अपने पास रखते हैं।

साथ ही, भारत की सड़कों और ट्रैफिक को देखते हुए यहाँ बाइक टैक्सी और ऑटो बुक करने का चलन विदेशों से कहीं ज्यादा बड़ा और सफल है। एक और अच्छी बात यह भी है कि भारत सरकार ने ड्राइवरों की सुरक्षा के लिए 5 लाख रुपए का हेल्थ इंश्योरेंस और 10 लाख रुपए का लाइफ इंश्योरेंस अनिवार्य किया है, जो कि पूरी दुनिया में एक बहुत बड़ा और सराहनीय कदम है।

जब ड्राइवर माँगे ऐप से ज्यादा किराया, तो???

कई बार कैब या बाइक टैक्सी से सफर करते समय ग्राहकों को धोखाधड़ी का सामना करना पड़ता है। जैसे, एक यात्री ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि Rapido बुक करते समय उसका किराया 450 रुपए तय हुआ था, लेकिन सफर खत्म होने पर ड्राइवर ने अपने फोन में एक फर्जी मीटर ऐप दिखाकर जबरन 784 रुपए वसूल लिए।

अगर आपके साथ भी कभी ऐसी स्थिति बनती है, तो आपको कुछ बातों का खास ख्याल रखना चाहिए। सबसे पहले तो ड्राइवर को ऐप में दिखाए गए किराए से एक भी रुपया अतिरिक्त कैश न दें। बुकिंग के समय ऐप जो ‘अपफ्रंट फेयर’ यानी तय किराया दिखाता है, हमेशा उसी के हिसाब से भुगतान करें और ड्राइवर के किसी भी बाहरी ऐप या अलग मीटर की रीडिंग को पूरी तरह से खारिज कर दें।

इस तरह की धोखाधड़ी से बचने का एक और बेहतरीन तरीका यह है कि आप हमेशा ऑनलाइन पेमेंट को ही प्राथमिकता दें। जब आप ऐप के माध्यम से सीधे डिजिटल पेमेंट (UPI या वॉलेट) करते हैं, तो ड्राइवर आपसे जबरदस्ती नकद पैसे नहीं माँग पाता है। इसके अलावा, अगर आप परिवार के साथ सफर कर रहे हैं और सुरक्षा के लिहाज से आपको उस समय मजबूरी में ड्राइवर को माँगे गए पैसे देने भी पड़ जाएँ, तो बिल्कुल घबराएँ नहीं।

आप सफर खत्म होने के तुरंत बाद ऐप के ‘हेल्प’ सेक्शन में जाएँ और ‘ट्रिप इश्यूज’ के तहत अपनी शिकायत दर्ज कराएँ। इसके साथ ही, आप भारत सरकार की नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन के टोल-फ्री नंबर 1915 पर कॉल करके भी इस धोखाधड़ी की रिपोर्ट आसानी से दर्ज करा सकते हैं।

तकनीक के इस दौर में समझदारी ही सबसे बड़ा डिस्काउंट है

सीधे शब्दों में कहें तो ओला, Uber या Rapido जैसी ऐप्स कोई चैरिटी नहीं चला रही हैं। उनका पूरा सिस्टम एक ऐसे दिमाग (एल्गोरिदम) से चलता है जिसे सिर्फ मुनाफा और संतुलन समझ आता है। वो आपकी मजबूरी, आपका समय और यहाँ तक कि आपके फोन के ब्रांड को भी भाँपने की ताकत रखता है। ऐसे में खीझने या परेशान होने से बेहतर है कि आप खुद एक ‘स्मार्ट यूजर’ बनें।

अपने फोन में दो-तीन विकल्प हमेशा तैयार रखिए। जब कंपनियों के पास एल्गोरिदम की ताकत है, तो आपके पास ‘तुलना करने और चुनने’ की आजादी है। थोड़ा रुककर, ऐप्स बदलकर और सही गाड़ी का चुनाव करके आप हर महीने अपनी जेब से होने वाले फिजूल खर्च को आसानी से रोक सकते हैं। डिजिटल दौर का यही नियम है, जो सतर्क है, वही फायदे में है।

सिनेमाई परदे पर यूरोप की सुलगती हकीकत है Citizen Vigilante Movie: समझें- क्यों परेशान हैं दुनिया भर के इस्लामी कट्टरपंथी और लेफ्ट लिबरल?

सिनेमा हमेशा से समाज का आईना रहा है, लेकिन जब कोई फिल्म समाज के उस हिस्से को दिखाती है जिसे राजनीतिक व्यवस्था और मुख्यधारा का मीडिया छिपाना चाहता है, तो विवाद होना तय है। साल 2026 में आई निर्देशक उवे बोल की फिल्म ‘सिटीजन विजिलांते’ (Citizen Vigilante) इसी तरह के एक बेहद संवेदनशील, कड़वे और सुलगते हुए मुद्दे पर चोट करती है।

यह फिल्म आज के यूरोप की उस जमीनी हकीकत को बयाँ करती है, जिससे वहाँ का आम नागरिक रोज जूझ रहा है यानी अनियंत्रित अवैध अप्रवासन (Illegal Migration), बढ़ता हुआ अपराध और इस्लामी कट्टरपंथ के आगे घुटने टेकती प्रशासनिक व्यवस्था।

यह फिल्म एक साधारण ‘एक्शन-थ्रिलर’ नहीं है, बल्कि यह यूरोप के आम लोगों की उस दबी हुई चीख और हताशा का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे ‘वोक’ (Woke) राजनीति और लिबरल एजेंडे के तहत दबा दिया गया है। यही वजह है कि रिलीज होते ही इस फिल्म को जर्मनी और यूरोपीय संघ (EU) के कई हिस्सों में अघोषित रूप से प्रतिबंधित या सेंसर कर दिया गया। लेकिन इंटरनेट के इस दौर में सच को दबाना नामुमकिन था और यही कारण है कि एलोन मस्क जैसी वैश्विक शख्सियतों के समर्थन के बाद यह फिल्म दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गई है।

क्या है ‘सिटीजन विजिलांते’ की कहानी और क्यों वामपंथियों को हो रहा दर्द?

‘सिटीजन विजिलांते’ की कहानी एक अनाम यूरोपीय शहर की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जो आज के किसी भी बड़े यूरोपीय शहर (जैसे पेरिस, बर्लिन या लंदन) की स्थिति को दर्शाता है। फिल्म की शुरुआत एक बेहद विचलित करने वाले दृश्य से होती है, जहाँ एक युवा माँ को उसके मासूम बच्चे के सामने ही एक अप्रवासी (Migrant) द्वारा सरेआम चाकू मारकर मार दिया जाता है। यह दृश्य ही फिल्म का टोन सेट कर देता है और दिखाता है कि कैसे कभी सुरक्षित माने जाने वाले यूरोपीय शहर अब असुरक्षा के गर्त में जा चुके हैं, जहाँ महिलाएँ शाम के बाद बाहर निकलने से डरती हैं।

फिल्म का मुख्य किरदार ‘माइकल सैंडर्स’ (आर्मी हैमर द्वारा अभिनीत) एक पूर्व अमेरिकी सैन्य अधिकारी है। वह अपने दिवंगत पिता के रियल एस्टेट व्यवसाय को संभालने के लिए यूरोप आता है, लेकिन वहां के बिगड़ते हालात और कानून-व्यवस्था के पतन को देखकर उसका खून खौल उठता है। जब वह देखता है कि पुलिस, अदालतें और सरकारी तंत्र अपराधियों को सजा देने के बजाय उनके मानवाधिकारों और ‘इंटीग्रेशन’ (समाज में घुलने-मिलने) के नाम पर उन्हें छोड़ रहे हैं, तो वह खुद कानून अपने हाथ में लेने का फैसला करता है। वह बनता है ‘सिटीजन विजिलांते’।

माइकल सैंडर्स का निशाना केवल वो अपराधी नहीं हैं जो सड़कों पर महिलाओं का उत्पीड़न करते हैं या अपराध फैलाते हैं, बल्कि उसका असली गुस्सा उन जजों, वकीलों और नेताओं पर है जो अपनी तुष्टिकरण की राजनीति और ‘वोक’ विचारधारा के कारण इन अपराधियों को बचाते हैं। पूरी फिल्म में माइकल एक-एक करके ऐसे अपराधियों और उनके संरक्षकों का खात्मा करता है, जो कानून की कमियों का फायदा उठाकर खुलेआम घूम रहे हैं।

इस्लामी कट्टरपंथ, वामपंथ और लिबरलों की नाराजगी का असली कारण

इस फिल्म को लेकर वामपंथी (Leftists), लिबरल (Liberals) और इस्लामी संगठन इस कदर नाराज क्यों हैं? इसका सीधा जवाब यह है कि यह फिल्म उनके बरसों से बनाए गए नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर देती है। लिबरल और वामपंथी ताकतों ने हमेशा ‘खुली सीमाओं’ (Open Borders) और बिना किसी जाँच-परख के अप्रवासियों के स्वागत की वकालत की है। लेकिन जब इन अप्रवासियों के बीच से निकले कुछ चरमपंथी और अपराधी तत्व वहां के मूल नागरिकों पर हमले करते हैं, तो यही लिबरल गैंग इसे ‘अपवाद’ बताकर दबाने की कोशिश करता है।

‘सिटीजन विजिलांते’ में ऐसी कई बातें दिखाई गई हैं जो इस लॉबी को सीधे तौर पर चुभती हैं-

अपराधियों को ‘विक्टिम’ बताने वाले तंत्र पर चोट: फिल्म का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा वह है जहां एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता न्याय के लिए भटक रही है। छह अप्रवासी उपद्रवियों ने उसका सामूहिक बलात्कार किया, लेकिन अदालत के जज ‘रेनहोल्ड’ ने उन अपराधियों को यह कहकर छोड़ दिया कि “ये लोग बाहरी हैं, इन्हें समाज में घुलने-मिलने में दिक्कतें आ रही हैं, इसलिए ये भी एक तरह से पीड़ित हैं।”

यह दृश्य सीधे तौर पर यूरोप के वास्तविक कोर्ट फैसलों पर करारा व्यंग्य है, जहाँ अपराधियों के सीरियाई/अफ्रीकी/मिडिल ईस्ट की हिंसक बैकग्राउंड का हवाला देकर उन्हें हल्की सजा या माफी दे दी जाती है। जब माइकल सैंडर्स उस जज को उसके घर में घुसकर सजा देता है, तो यह वामपंथी न्याय प्रणाली के मुँह पर एक तमाचा है।

बिना लाग-लपेट के हकीकत दिखाना: फिल्म में यह साफ दिखाया गया है कि कैसे कुछ खास समुदाय के लोग बस में बिना टिकट यात्रा करते हैं, सड़कों पर गुंडागर्दी करते हैं और महिलाओं को वस्तु की तरह समझते हैं। जब माइकल सैंडर्स एक अपराधी ‘यूसुफ’ के घर पहुंचता है, तो उसका परिवार अपने बेटे के अपराध पर शर्मिंदा होने के बजाय उलटा पीड़िता को ही दोषी ठहराता है और अपने मजहब या सामाजिक स्थिति की दुहाई देता है। यह दृश्य दिखाता है कि कट्टरपंथ की जड़ें कितनी गहरी हैं, जहां अपराध को भी सही ठहराने की कोशिश की जाती है।

राजनीतिक गलियारों का पाखंड: फिल्म यह भी उजागर करती है कि कैसे सरकारें जनता के टैक्स के पैसे का इस्तेमाल करके खाली पड़ी संपत्तियों को अप्रवासियों के आवास के लिए हथियाना चाहती हैं, जबकि अपने ही देश के गरीब या बेघर नागरिकों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। माइकल सैंडर्स का किरदार इस सरकारी नीति का डटकर विरोध करता है।

यूरोपीय नागरिकों की मनोस्थिति और जमीनी सच्चाई

यह फिल्म आज के समय में इतनी प्रासंगिक इसलिए है क्योंकि यह यूरोप के बहुसंख्यक मूल निवासियों की वास्तविक मनोस्थिति को दर्शाती है। आज का आम यूरोपीय नागरिक डरा हुआ भी है और गुस्से में भी। सोशल मीडिया और पब्लिक डोमेन में ऐसे हजारों मामले मौजूद हैं जो इस फिल्म की कहानी को पूरी तरह सच साबित करते हैं।

ग्रूमिंग गैंग्स का कड़वा सच: अगर हम वास्तविक दुनिया की बात करें, तो यूनाइटेड किंगडम (UK) में ‘पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स‘ का मामला इसका सबसे बड़ा और भयानक उदाहरण है। रॉदरहैम (Rotherham), रोशडेल और ब्रिटेन के कई अन्य शहरों में सालों तक पाकिस्तानी मूल के गिरोहों ने हजारों श्वेत ब्रिटिश लड़कियों का यौन शोषण किया, उन्हें नशा दिया और उनकी जिंदगी बर्बाद कर दी।

सबसे शर्मनाक बात यह थी कि वहाँ की स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने केवल इसलिए कार्रवाई नहीं की क्योंकि उन्हें डर था कि उन पर ‘नस्लवादी’ (Racist) या ‘इस्लामोफोबिक’ होने का ठप्पा लग जाएगा। राजनीतिक शुद्धता (Political Correctness) के चक्कर में मासूम बच्चियों को दरिंदों के हवाले छोड़ दिया गया।

अवैध घुसपैठ और अपराधों में बाढ़: जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन और इटली जैसे देशों में पिछले एक दशक में अप्रवासियों द्वारा किए जाने वाले चाकूबाजी (Stabbing), बलात्कार और दंगों के मामलों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है। स्वीडन, जिसे कभी दुनिया का सबसे सुरक्षित देश माना जाता था, आज यूरोप की ‘गैंग वार राजधानी’ बन चुका है। फ्रांस के कई इलाकों में पुलिस जाने से डरती है, जिन्हें ‘नो-गो जोन्स’ कहा जाता है।

जब ‘सिटीजन विजिलांते’ में इन वास्तविकताओं को हूबहू दिखाया गया, तो यूरोपीय अभिजात वर्ग (Elites) सिहर उठा। उन्हें लगा कि अगर यह फिल्म आम लोगों ने देख ली, तो उनका बनाया हुआ ‘मल्टीकल्चरलिज्म’ (बहुसंस्कृतिवाद) का महल ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। इसी डर के कारण जर्मनी के सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को एज रेटिंग देने से मना कर दिया, जिसका सीधा मतलब था कि इसे न तो सिनेमाघरों में दिखाया जा सकता था और न ही इसका विज्ञापन किया जा सकता था। यह सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने जैसा था।

एक्स पर एलन मस्क ने सच को दिया मंच

जब यूरोप के पारंपरिक तंत्र ने फिल्म का रास्ता रोकने की कोशिश की, तब डिजिटल दुनिया के सबसे बड़े मंच ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) और उसके मालिक एलन मस्क ने इस सेंसरशिप के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। मस्क ने न सिर्फ इस फिल्म की तारीफ की, बल्कि इसे अपने हैंडल से पूरे 48 घंटों के लिए मुफ्त में प्रसारित कर दिया।

मस्क का तर्क सीधा था कि अगर आप किसी फिल्म को इसलिए प्रतिबंधित कर रहे हैं क्योंकि वह समाज के एक कड़वे सच को दिखाती है, तो यह ‘स्ट्रैसैंड इफेक्ट’ (Streisand Effect) को जन्म देगा, यानी जिसे आप छिपाना चाहेंगे, लोग उसे और ज्यादा देखेंगे। और हुआ भी यही। मस्क के इस कदम के बाद फिल्म को X पर करोड़ों व्यूज मिले। देखते ही देखते यह फिल्म एप्पल टीवी और अमेजन प्राइम वीडियो पर नंबर-1 डिजिटल परचेज बन गई।

सोशल मीडिया पर आम नागरिकों ने इस कहानी का पुरजोर समर्थन किया। लोगों का कहना था कि जो बात उनके राजनेता संसद में स्वीकार करने से डरते हैं, उसे उवे बोल ने बड़े पर्दे पर खुलकर रख दिया है। फिल्म के अंत में माइकल सैंडर्स का यह संदेश कि “जब तक नागरिक खुद की रक्षा करना नहीं सीखेंगे, तब तक यह स्थिति नहीं बदलेगी” आज के यूरोप के लिए एक चेतावनी की तरह गूँज रहा है।

डायरेक्टर से लीड एक्टर तक झेल रहे थे निजी जीवन में समस्याएँ

फिल्म के निर्माण की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। निर्देशक उवे बोल ने इस फिल्म को बनाने के लिए भारी जोखिम उठाया। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि फिल्म के अंतिम हिस्से में एक मुस्लिम परिवार की भूमिका निभाने के लिए कलाकार ढूँढना उनके लिए सबसे कठिन काम था। उन्होंने सैकड़ों अभिनेताओं से संपर्क किया, लेकिन इस संवेदनशील और यथार्थवादी भूमिका को करने के लिए कोई तैयार नहीं हो रहा था, क्योंकि सभी को अपने करियर और सुरक्षा का डर था।

आखिरकार क्रोएशिया के जगरेब में इस फिल्म की शूटिंग बेहद कड़े सुरक्षा इंतजामों के बीच पूरी की गई। फिल्म का शुरुआती नाम ‘The Dark Knight’ रखा गया था, लेकिन वार्नर ब्रदर्स के कानूनी नोटिस के बाद इसे बदलकर ‘Citizen Vigilante’ किया गया।

फिल्म के मुख्य अभिनेता आर्मी हैमर (Armie Hammer) का इस फिल्म से जुड़ना भी उनके करियर का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट है। आर्मी हैमर कभी हॉलीवुड के ए-लिस्ट सितारों में शुमार थे, लेकिन कुछ साल पहले उनके निजी जीवन से जुड़े गंभीर विवादों और आरोपों के कारण हॉलीवुड उद्योग ने उन्हें पूरी तरह दरकिनार (Cancel) कर दिया था। लंबे समय तक काम न मिलने और मानसिक व सामाजिक रूप से कटे रहने के बाद, हैमर ने इस फिल्म के जरिए वापसी की कोशिश की।

हालाँकि मुख्यधारा के आलोचकों ने उनके अभिनय और इस फिल्म की यह कहकर आलोचना की कि यह उनके करियर को और नुकसान पहुँचाएगी, लेकिन जनता के एक बड़े वर्ग ने हैमर के अभिनय की सराहना की है। फिल्म में उनके चेहरे की हताशा, गुस्सा और अकेलापन कहीं न कहीं उनके वास्तविक जीवन के संघर्षों को भी दर्शाता है।

ठीक इसी तरह निर्देशक उवे बोल को भी हॉलीवुड और मुख्यधारा के समीक्षकों द्वारा हमेशा एक विवादित और ‘खराब’ निर्देशक के रूप में पेश किया गया है, लेकिन इस फिल्म के जरिए उन्होंने साबित कर दिया कि वे बिना किसी डर के कड़े फैसले लेने वाले फिल्मकार हैं।

हालाँकि उन्होंने 2010 में होलोकास्ट पर एक बहुत जबरदस्त फिल्म Auschwitz बनाई थी, जो सच्चाई के बेहद करीब थी। उस फिल्म में भी Citizen Vigilante जैसा एकदम रॉ फुटेज एक्शन और डॉक्यूमेंट्री से जुड़े असली फुटेज इस्तेमाल किए गए थे, तब भी उन्हें ‘एकदम’ असली और परेशान करने वाले सीन दिखाने के लिए आलोचना झेलनी पड़ी थी। इस बार उन्होंने असली तो नहीं, लेकिन सिनेमाई कला के जरिए ऐसी साफगोई दिखाई है, जो हैरान-परेशान और रोंगटे खड़ी खरने वाली है।

सिटीजन विजिलांते ने कर दिया काम, छाती पीटता रहे इस्लामी कट्टरपंथी और लेफ्ट लिबरल गैंग

‘सिटीजन विजिलांते’ फिल्म न्याय प्रणाली की विफलता पर कानून को हाथ में लेने का समर्थन करती है, जो नैतिक रूप से बहस का विषय हो सकता है, लेकिन यह उस गुस्से को पूरी तरह से वैध ठहराती है जो आज यूरोप का आम नागरिक महसूस कर रहा है।

लिबरल और वामपंथी समीक्षक ‘सिटीजन विजिलांते’ फिल्म को चाहे कितनी भी कम रेटिंग क्यों न दें, इस फिल्म ने अपना काम कर दिया है। इसने यूरोप के तुष्टिकरण, अवैध अप्रवासन के खतरों और प्रशासनिक रीढ़हीनता को दुनिया के सामने पूरी तरह नंगा कर दिया है। यह फिल्म आने वाले समय में एक ऐसी ‘कल्ट क्लासिक’ (Cult Classic) के रूप में याद की जाएगी, जिसने सिनेमा के जरिए एक वैश्विक राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन को हवा दी। यदि आप आज के बदलते वैश्विक परिदृश्य और यूरोप के संकट को समझना चाहते हैं, तो ‘सिटीजन विजिलांते’ एक बेहद जरूरी और आँखें खोल देने वाली फिल्म है।

कुल मिलाकर एक बात तो साफ है कि ‘सिटीजन विजिलांते’ कोई ऐसी फिल्म नहीं है जिसे देखकर आप मुस्कुराते हुए थिएटर से बाहर आएँ। बल्कि यह एक ऐसी फिल्म है जो आपको परेशान करती है, सोचने पर मजबूर करती है और आपके भीतर एक गुस्सा भर देती है। बंदूकों के रॉ एक्शन, तेज रफ्तार कहानी और हकीकत के ठोस धरातल पर टिकी यह फिल्म उन लोगों के मुँह पर एक करारा तमाचा है जो सच को दबाना चाहते हैं। यह आधुनिक सिनेमा का एक ऐसा साहसिक मोड़ है, जिसे नजरअंदाज करना अब किसी के बस की बात नहीं है।

फिल्म समीक्षा: सिटीजन विजिलांते (Citizen Vigilante)

निर्देशक: उवे बोल (Uwe Boll)

मुख्य कलाकार: आर्मी हैमर, कोस्टास मैंडिलोर, डेसिरी जियोर्गेटी

स्टार : ****1/2

BAT-BMS ऐप से ई-रिक्शा हैक हो सकता है तो EVM क्यों नहीं हैक हो सकती? लेफ्ट-लिबरल्स के ‘लॉजिक’ पर माथा गरम करने से पहले पढ़ लीजिए दोनों सिस्टम में कितना अंतर

BAT-BMS मोबाइल ऐप को लेकर विवाद क्या सामने आया, सोशल मीडिया पर लेफ्ट-लिबरल गैंग ने फिर से EVM वाला अपना पुराना घिसा-पिटा एजेंडा बाहर निकाल लिया। ई-रिक्शा की बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) से जुड़े एक अलग तकनीकी मामले को ऐसे पेश किया जा रहा है, मानो इससे सीधे चुनाव आयोग, सरकार और EVM पर कोई बड़ा खुलासा हो गया हो।

हर चुनाव के बाद जनता के जनादेश को पचा न पाने वाला यही इकोसिस्टम अब एक मोबाइल ऐप के बहाने फिर से EVM पर शक पैदा करने की बदनाम मुहिम चलाता दिख रहा है। दावा किया जा रहा है कि यदि एक मोबाइल ऐप के जरिए चलते हुए ई-रिक्शा को नियंत्रित किया जा सकता है तो EVM को हैक न किए जा सकने की बात कैसे कही जा सकती है।

हालाँकि BAT-BMS से जुड़ा मामला कुछ ब्लूटूथ-सक्षम लिथियम बैटरियों के बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) में मौजूद सुरक्षा कमियों से जुड़ा है, जबकि EVM पूरी तरह अलग उद्देश्य और तकनीकी संरचना वाली प्रणाली है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर दोनों की तुलना करते हुए सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक यूजर ने लिखा, “मेरा देश के पढ़े लिखे लोगों से एक सवाल है। जब एक चाइनीज App से E- रिक्शा कंट्रोल किया जा सकता है तो EVM क्यों नहीं, क्या EVM इतनी सुरक्षित है कि दुनिया की कोई भी ताकत उसे हैक नहीं कर सकती..? अंधभक्त दूर रहें।”

जैकी यादव नाम के एक इन्फ्लुएंसर यूजर ने लिखा, “वैसे से एक बात सोचने वाली है कि चलता हुआ E-Rickshaw मोबाइल ऐप से बंद हो सकता है मगर EVM Hack नहीं हो सकती।”

इसी तरह एक अन्य यूजर ने पोस्ट किया, “पूछना ये था कि अगर चलता हुआ E-Rickshaw मोबाइल ऐप BAT-BMS से बंद हो सकता है तो फिर EVM Hack क्यों नहीं हो सकती?”

एक ने लिखा, “दूर बैठकर मोबाइल से एक व्यक्ति चलते वाहन को कंट्रोल कर रहा है लेकिन EVM हैक नहीं हो सकती? ये भी एक तरह का मजाक ही है! सच तो ये है हर इलेक्ट्रिक मशीन हैक हो सकती है?”

एक अन्य ने लिखा, “क्या यह सच में काम करता है? अगर काम करता है तब यह बहुत चिंता की बात है बताओ एक बैटरी रिक्शा एक app के माध्यम से कंट्रोल किया जा सकता है वो भी चीनी app से चिंता की बात है। अब E रिक्शा कंपनी वालों को EVM बनाने वाली टेक्नोलॉजी का उपयोग करना चाहिए ताकि उसे हैक करना संभव ही न हो?”

इन सभी पोस्ट में समान रूप से BAT-BMS ऐप और EVM के बीच तुलना करते हुए सीधे-सीधे चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं। हालाँकि सरकार और आयोग पर सवाल उठाने वाले इन तथाकथित बुद्धिजीवियों ने अपने दावों में यह नहीं बताया है कि BAT-BMS और EVM का उद्देश्य, तकनीक और कार्यप्रणाली पूरी तरह अलग है।

इनसे बताया भी नहीं जाएगा क्योंकि इससे इनके दावे निर्रथक साबित हो जाएँगे लेकिन हम आपको बताते हैं कि कैसे इसकी तुलना EVM से करना गलत है और ऐप कैसे काम करता है।

क्या है BAT-BMS ऐप और सरकार ने क्यों लिया एक्शन?

BAT-BMS (Battery Management System) एक स्मार्टफोन एप्लिकेशन है, जिसे ब्लूटूथ-सक्षम लिथियम बैटरी पैक की निगरानी और प्रबंधन के लिए विकसित किया गया है। इसे चीन की कंपनी शेन्जेन ग्रेनर्जी टेक्नोलॉजी (Shenzhen Grenergy Technology) ने बनाया है।

इस ऐप का मुख्य उद्देश्य बैटरी की तकनीकी जानकारी को मोबाइल फोन पर उपलब्ध कराना है, ताकि उपयोगकर्ता अलग से किसी मॉनिटरिंग डिवाइस के बिना बैटरी की स्थिति की जाँच कर सके। इस ऐप के जरिए बैटरी का वोल्टेज, तापमान, चार्जिंग स्टेटस, करंट फ्लो, बैटरी की क्षमता और उसकी सेहत (Battery Health) जैसी जानकारियाँ देखी जा सकती हैं।

कुछ कम्पैटिबल बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) में यह ऐप बैटरी के कुछ फंक्शन को नियंत्रित भी कर सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम इसकी अनुमति देता है तो ऐप के जरिए बैटरी के डिस्चार्ज फंक्शन को ऑन या ऑफ किया जा सकता है।

यदि किसी ई-रिक्शा में ब्लूटूथ-सक्षम BMS लगा हो और उसमें पर्याप्त पासवर्ड सुरक्षा या ऑथेंटिकेशन न हो, तो करीब 10 से 15 मीटर की दूरी के भीतर मौजूद व्यक्ति BAT-BMS जैसे ऐप के जरिए उससे कनेक्ट हो सकता है। कनेक्ट होने के बाद वह बैटरी की जानकारी देख सकता है और कुछ कम्पैटिबल सिस्टम में डिस्चार्ज फंक्शन को बंद भी कर सकता है।

हाल के दिनों में BAT-BMS ऐप तब चर्चा में आया, जब सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो वायरल हुए जिनमें कुछ लोग ब्लूटूथ के जरिए ई-रिक्शा की बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम से कनेक्ट होकर उसका डिस्चार्ज फंक्शन बंद कर देते थे। इससे चलते हुए ई-रिक्शा की बिजली आपूर्ति रुक जाती थी और वाहन वहीं रुक जाता था।

इसी का इस्तेमाल कर कुछ लोग ई-रिक्शा के पास जाकर मोबाइल ऐप के जरिए उसकी बैटरी का डिस्चार्ज सिस्टम बंद कर दे रहे थे। बाद में BAT-BMS ऐप में कुछ मामलों में पासवर्ड सुरक्षा जोड़ी गई। हालाँकि जाँच में यह भी सामने आया कि इसी तरह के फीचर वाले दूसरे बैटरी मैनेजमेंट ऐप के जरिए भी असुरक्षित सिस्टम तक पहुँच बनाई जा सकती है।

यानी समस्या किसी एक ऐप से ज्यादा कुछ असुरक्षित बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी है। यही वजह रही कि सरकार ने BAT-BMS ऐप को हटाने के निर्देश दिए और बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम की सुरक्षा व्यवस्था की जाँच शुरू की। मध्य प्रदेश के उज्जैन में पुलिस ने एक 18 वर्षीय युवक को हिरासत में लिया है।

वह मोबाइल ऐप के जरिए ई-रिक्शा बंद कर देता था और फिर उसे दोबारा चालू करने के नाम पर चालकों से 200 से 300 रुपए वसूलता था। इन सब के बाद केंद्र सरकार ने सख्त कदम उठाया और IT मंत्रालय ने गूगल प्ले स्टोर और एप्पल ऐप स्टोर से इस ऐप को हटाने का निर्देश दिया।

BAT-BMS और EVM अलग कैसे हैं?

सोशल मीडिया पर BAT-BMS ऐप के मामले को EVM से जोड़कर दावे किए जा रहे हैं, लेकिन तकनीकी रूप से दोनों प्रणालियाँ पूरी तरह अलग हैं। BAT-BMS एक बैटरी मैनेजमेंट एप्लिकेशन है, जबकि EVM का उद्देश्य मतदान प्रक्रिया को संचालित करना है। दोनों का डिजाइन, कार्यप्रणाली और उपयोग एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है।

EVM यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन भारत निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव कराने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली है। इसका उपयोग मतदाता का वोट दर्ज करने और मतदान प्रक्रिया को संचालित करने के लिए किया जाता है। एक EVM मुख्य रूप से तीन हिस्सों से मिलकर बनी होती है।

बैलेट यूनिट (BU), जिस पर मतदाता अपने पसंदीदा उम्मीदवार के सामने बटन दबाता है। कंट्रोल यूनिट (CU), जिसे मतदान अधिकारी संचालित करता है और जिसमें सभी वोट सुरक्षित रूप से रिकॉर्ड होते हैं तथा VVPAT (वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल), जो कुछ सेकंड के लिए मतदाता को यह दिखाती है कि उसका वोट किस उम्मीदवार के पक्ष में दर्ज हुआ।

मतदान पूरा होने के बाद मशीनों को सील कर दिया जाता है और मतगणना के समय कंट्रोल यूनिट से परिणाम निकाले जाते हैं। वहीं BAT-BMS (Battery Management System) एक स्मार्टफोन एप्लिकेशन है, जिसे ब्लूटूथ-सक्षम लिथियम बैटरी पैक की निगरानी और प्रबंधन के लिए विकसित किया गया है।

यह ऐप मोबाइल फोन को बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) से जोड़कर बैटरी का वोल्टेज, तापमान, चार्जिंग स्टेटस, करंट फ्लो और बैटरी की स्थिति जैसी जानकारी दिखाता है। कुछ कम्पैटिबल बैटरी सिस्टम में यह बैटरी के कुछ फंक्शन, जैसे डिस्चार्ज को ऑन या ऑफ करने की सुविधा भी देता है।

हालिया विवाद इसलिए सामने आया क्योंकि कुछ ई-रिक्शा में इस्तेमाल हो रहे ब्लूटूथ-सक्षम बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम में पर्याप्त पासवर्ड सुरक्षा या ऑथेंटिकेशन नहीं था। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर कुछ लोग BAT-BMS जैसे ऐप के जरिए बैटरी से कनेक्ट हो गए और डिस्चार्ज फंक्शन बंद कर दिया, जिससे ई-रिक्शा रुक गया।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या किसी एक ऐप की नहीं, बल्कि कुछ असुरक्षित बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी है। यहीं से BAT-BMS और EVM के बीच सबसे बड़ा अंतर सामने आता है। BAT-BMS को शुरुआत से ही ब्लूटूथ के जरिए बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम से कनेक्ट होने के लिए बनाया गया है।

इसके काम करने का आधार ही मोबाइल फोन और बैटरी के बीच ब्लूटूथ कनेक्शन है। इसके विपरीत, भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार EVM एक स्टैंडअलोन (Standalone) इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली है। इसमें ब्लूटूथ, वाई-फाई, इंटरनेट, मोबाइल नेटवर्क या किसी अन्य वायरलेस संचार तकनीक का उपयोग नहीं किया जाता है।

यानी BAT-BMS जिस तरीके से किसी बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम से जुड़ता है, वैसी कनेक्टिविटी EVM में होती ही नहीं है। इसके अलावा दोनों प्रणालियों का उद्देश्य भी पूरी तरह अलग है। BAT-BMS का काम बैटरी की निगरानी और उसके संचालन से जुड़ा है, जबकि EVM केवल मतदान कराने और वोट रिकॉर्ड करने के लिए बनाई गई है।

एक सिस्टम ऊर्जा प्रबंधन (Battery Management) के लिए विकसित किया गया है जबकि दूसरा चुनाव प्रक्रिया के संचालन के लिए। इसी वजह से BAT-BMS ऐप से जुड़े मामले को आधार बनाकर EVM के बारे में समान निष्कर्ष निकालना तकनीकी रूप से पूरी तरह गलत है।

दोनों प्रणालियाँ अलग-अलग उद्देश्य, अलग तकनीकी ढाँचे और अलग कार्यप्रणाली पर आधारित हैं। यानी BAT-BMS जिस तरह के सिस्टम के लिए बनाया गया है, EVM उस श्रेणी की तकनीक का हिस्सा ही नहीं है। यही वजह है कि BAT-BMS ऐप को आधार बनाकर EVM के बारे में समान निष्कर्ष निकालना पूरी तरह गलत ही नहीं निराधार भी है।

क्या एक एथेनॉल फैक्ट्री ने ही बर्बाद कर दी बर्नीहाट की हवा? असम-मेघालय सीमा पर बसे ‘दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर’ और उमियाम डिस्टिलेशन की कहानी

असम-मेघालय सीमा पर बसा छोटा-सा औद्योगिक शहर बर्नीहाट (Byrnihat) इन दिनों हर जगह खबरों में बना हुआ है। कभी अपनी खूबसूरती के लिए तारीफें बटोरने वाला यह शहर अब दुनिया का ‘सबसे प्रदूषित महानगरीय इलाका’ घोषित किया गया है।

हाल ही में यह मामला और ज्यादा चर्चा में आ गया, जब पत्रकार सार्थक गोस्वामी की यूट्यूब डॉक्यूमेंट्री ‘दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर से’ (Inside The World’s Most Polluted City) वायरल हो गई।

इस वीडियो में सार्थक एक स्थानीय अनुवादक के साथ बर्नीहाट का दौरा करते हैं, लोगों से बात करते हैं और पेड़ों की पत्तियों, घरों की छतों और सब्जियों पर जमी मोटी काली कालिख दिखाते हैं। वीडियो में प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदारी एक खास फैक्ट्री एथेनॉल डिस्टिलरी पर डाली गई है।

इस वीडियो को अब तक 10 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है। इसके बाद लोगों में गुस्सा बढ़ा, विरोध प्रदर्शन हुए और राज्य सरकार से सीधे सवाल पूछे जाने लगे। लोगों का गुस्सा पूरी तरह समझ में आता है।

बर्नीहाट का प्रदूषण बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया गया है। यहाँ लोग सच में बीमार पड़ रहे हैं, हवा वाकई बेहद खराब है और स्थानीय लोग सालों से इस समस्या के साथ जी रहे हैं। लेकिन जब पूरे घटनाक्रम और समय क्रम को ध्यान से देखा जाता है, तो यह दावा कि सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री की वजह से बर्नीहाट दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बना, तथ्यों के आधार पर सही नहीं ठहरता।

बर्नीहाट में एथेनॉल फैक्ट्री से प्रदूषण: टाइमलाइन जो दूर करती है सारे सवाल

सबसे पहले पूरे घटनाक्रम की टाइम लाइन समझ लेते हैं। इस पूरे मामले के केंद्र में उमियाम डिस्टिलेशन प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक अनाज आधारित एथेनॉल डिस्टिलरी है, जो मेघालय के री-भोई जिले के बर्नीहाट स्थित एक्सपोर्ट प्रमोशन इंडस्ट्रियल पार्क (EPIP) में है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्लांट ने सितंबर 2024 में आधिकारिक तौर पर एथेनॉल का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया।

अब इसकी तुलना उस समय से कीजिए, जब बर्नीहाट में प्रदूषण की समस्या पहली बार सामने आई थी। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने 2022-23 में ही बर्नीहाट को गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्र घोषित कर दिया था। यानी एथेनॉल प्लांट शुरू होने से करीब दो साल पहले ही इस इलाके में प्रदूषण की गंभीर स्थिति दर्ज की जा चुकी थी।

अब उस रिपोर्ट की बात करते हैं, जिसने बर्नीहाट को पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना दिया। 2024 IQ एयर वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट  के मुताबिक, यहाँ PM2.5 का सालाना औसत स्तर 128.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सुरक्षित सीमा 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से 25 गुना से भी ज्यादा है।

यह रिपोर्ट मार्च 2024 में प्रकाशित हुई थी, यानी एथेनॉल प्लांट के शुरू होने से पूरे छह महीने पहले। अब जरा सोचिए कि इसका क्या मतलब निकलता है। जो फैक्ट्री उस समय तक शुरू भी नहीं हुई थी, वह उस प्रदूषण संकट की वजह कैसे हो सकती है, जिसे नियामक एजेंसियाँ पहले ही दर्ज कर चुकी थीं और जिसकी जानकारी एक वैश्विक रिपोर्ट पहले ही दुनिया के सामने ला चुकी थी।

यह किसी राय या अलग-अलग व्याख्या का मामला नहीं है, बल्कि सिर्फ तारीखों का सवाल है। और इस मामले में तारीखें एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं।

कहाँ से आई कोयले की राख?

यह पहली बार नहीं है जब बर्नीहाट के लोगों ने हर सुबह पूरे शहर पर औद्योगिक धूल और कालिख की मोटी परत जमी हुई देखी हो। एथेनॉल प्लांट चर्चा में आने से बहुत पहले ही बर्नीहाट का औद्योगिक इलाका कोयले से चलने वाले कोक ओवन और फेरो-अलॉय भट्टियों के लिए जाना जाता था। इसी तरह के उद्योग वही कालिख और राख जैसी परत पैदा करते हैं, जो आज भी डॉक्यूमेंट्री में पेड़ों की पत्तियों और घरों की छतों पर जमी हुई दिखाई गई है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने 2018 में ही बर्नीहाट औद्योगिक क्षेत्र को क्रिटिकली पॉल्यूटेड एरिया घोषित कर दिया था। उस समय यहाँ 34 छोटे, मध्यम और बड़े उद्योग चलते थे, जिनमें ज्यादातर कोक (कोयले से बनने वाला ईंधन) और सीमेंट का उत्पादन करते थे।

इलाके के रहने वालों के मुताबिक, कई सालों से यहाँ हर सुबह गाड़ियों, पौधों, घरों की छतों और बाहर सूखने के लिए डाले गए कपड़ों पर रात भर में राख और काली धूल की मोटी परत जम जाती थी।

हालिया डॉक्यूमेंट्री में भी यही दृश्य दिखाए गए हैं, लेकिन उन्हें ऐसे दिखाया है की मानो यह कोई नई समस्या हो। जबकि हकीकत यह है कि यह प्रदूषण का वही पुराना पैटर्न है, जो एथेनॉल प्लांट शुरू होने से कई साल पहले से मौजूद था और जिसकी मुख्य वजह कोयले का इस्तेमाल करने वाले उद्योग थे, न कि एथेनॉल डिस्टिलरी।

बाद में राज्य सरकार ने इस पर कार्रवाई भी की। सितंबर 2024 में मेघालय राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MSPCB) ने उत्सर्जन मानकों का पालन न करने पर बर्नीहाट की छह औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का नोटिस जारी किया।

इनमें शिलांग इस्पात और रोलिंग मिल, श्याम सेंचुरी फेरस लिमिटेड, नलारी फेरो अलॉयज, जैंतिया फेरो अलॉयज, मैथन अलॉयज और खासी अलॉयज शामिल थीं। ये सभी कोयले पर आधारित कोक या फेरो-अलॉय उद्योगों से जुड़ी इकाइयाँ थीं।

इसके अलावा, मार्च 2025 में मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने राज्य विधानसभा में बताया कि प्रदूषण नियमों का उल्लंघन करने पर सरकार ने इलाके की सात औद्योगिक इकाइयों को बंद कर दिया है। ये वही उद्योग थे, जिनसे स्थानीय लोगों के अनुसार कोयले की राख और काली धूल की परत बनती थी। इनमें से कई इकाइयाँ सितंबर 2024 में एथेनॉल प्लांट शुरू होने से पहले ही बंद हो चुकी थीं।

ऐसे में अगर आज भी किसी डॉक्यूमेंट्री में बर्नीहाट की सतहों पर काली कालिख या राख दिखाई देती है, तो उपलब्ध रिकॉर्ड और नियामक एजेंसियों के इतिहास को देखते हुए इसकी ज्यादा तार्किक वजह दशकों से चल रहे कोयला आधारित कोक और फेरो-अलॉय उद्योग माने जाएँगे, न कि वह एथेनॉल डिस्टिलरी, जो बाद में शुरू हुई और MSPCB की जून 2026 की जाँच के मुताबिक फिलहाल अपने तय उत्सर्जन मानकों के भीतर काम कर रही है।

बर्नीहाट: दर्जनों फैक्ट्रियों वाला शहर

डॉक्यूमेंट्री में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री ही बर्नीहाट के प्रदूषण की असली वजह है। इस तरह की कहानी लोगों को इसलिए आसानी से समझ आती है, क्योंकि यह बहुत सीधी लगती है, एक ही दोषी, एक ही वजह और एक साफ-सुथरी कहानी। लेकिन बर्नीहाट का औद्योगिक ढाँचा इतना आसान नहीं है।

खुद सार्थक गोस्वामी की डॉक्यूमेंट्री में उनका स्थानीय अनुवादक बताता है कि शहर और उसके आसपास करीब 80 फैक्ट्रियाँ चल रही हैं। इनमें सीमेंट प्लांट, चूना पत्थर (लाइमस्टोन) प्रोसेसिंग यूनिट, फेरो-अलॉय फैक्ट्रियाँ, स्टील प्लांट और कम से कम तीन अलग-अलग शराब और डिस्टिलरी इकाइयाँ शामिल हैं, सिर्फ वही एक फैक्ट्री नहीं जो वायरल वीडियो के बाद चर्चा में आई।

इसके अलावा, बर्नीहाट एक कटोरे जैसी घाटी में बसा हुआ है। इस भौगोलिक स्थिति की वजह से यहाँ निकलने वाला धुआँ और प्रदूषण आसानी से वातावरण में फैल नहीं पाता, बल्कि इलाके के ऊपर ही फंसा रहता है।

यानी इन दर्जनों उद्योगों से निकलने वाला धुआँ और बारीक प्रदूषक कण हवा में दूर जाने के बजाय शहर के ऊपर जमा होते रहते हैं और समय के साथ प्रदूषण बढ़ता जाता है।

इसके साथ ही, बर्नीहाट पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र का एक बड़ा औद्योगिक और परिवहन केंद्र भी है, इसलिए यहाँ हर समय भारी ट्रकों और अन्य वाहनों की आवाजाही बनी रहती है। ऐसे में यहाँ का प्रदूषण किसी एक फैक्ट्री की वजह से नहीं बल्कि कई अलग-अलग कारणों के एक साथ असर का नतीजा है।

मेघालय के स्वास्थ्य मंत्री वैलाडमिकी शायला भी सार्वजनिक रूप से इस जटिल स्थिति को स्वीकार कर चुके हैं। उनका कहना है कि बर्नीहाट के प्रदूषण में योगदान देने वाली ज्यादातर फैक्ट्रियाँ मेघालय नहीं बल्कि असम की सीमा में स्थित हैं। ऐसे में यह तय करना कि किस राज्य या किस फैक्ट्री से कितना प्रदूषण हो रहा है, आसान नहीं है, क्योंकि बर्नीहाट दो राज्यों की सीमा पर बसा हुआ शहर है।

जब अधिकारियों ने जाकर चेक किया तो क्या हुआ?

डॉक्यूमेंट्री वायरल होने और लोगों का दबाव बढ़ने के बाद मेघालय राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MSPCB) ने इंतजार नहीं किया। 29 जून 2026 को बोर्ड ने अपनी पहल पर ही उमियाम डिस्टिलेशन प्लांट का निरीक्षण करने के लिए एक विशेष टीम भेजी।

जाँच के नतीजे 1 जुलाई 2026 को सार्वजनिक किए गए। इस निरीक्षण में कई पहलुओं की जाँच की गई, जिनमें पार्टिकुलेट मैटर (PM) का स्तर, स्टैक वेलोसिटी, डिफरेंशियल प्रेशर और उत्सर्जन स्रोत का तापमान शामिल था।

बोर्ड के मुताबिक, जाँच के दौरान दर्ज किए गए पार्टिकुलेट मैटर के स्तर प्लांट को दिए गए कंसेंट टू ऑपरेट की तय सीमा के भीतर पाए गए। जाँच में यह भी सामने आया कि प्लांट में लगे प्रदूषण नियंत्रण उपकरण सही तरीके से काम कर रहे थे।

इनमें कैप्टिव पावर यूनिट के लिए लगाया गया इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रीसिपिटेटर और डिस्टिलरी के लिए मल्टी-इफेक्ट इवैपोरेटर के साथ जीरो लिक्विड डिस्चार्ज प्रणाली शामिल है। अधिकारियों के अनुसार, कच्चे और शोधन किए गए अपशिष्ट जल (Effluent) के नमूनों की लैब में जाँच कराई गई, जिसमें पुष्टि हुई कि शोधन के बाद पानी को पर्यावरण में छोड़ने के बजाय प्लांट के कूलिंग टावर में दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि बर्नीहाट की हवा पूरी तरह सुरक्षित है, और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी ऐसा कोई दावा नहीं किया है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत बर्नीहाट आज भी आधिकारिक तौर पर नॉन-अटेनमेंट शहर की श्रेणी में है।

यानी यह अब भी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतर रहा है और इसी वजह से इसकी लगातार निगरानी की जा रही है। पिछले दो वर्षों में प्रदूषण मानकों का उल्लंघन करने पर कई अन्य औद्योगिक इकाइयों को बंद भी किया जा चुका है। लेकिन जहाँ तक इस एक एथेनॉल प्लांट का सवाल है, नियामक अधिकारियों ने जब इसकी कानूनी मानकों के आधार पर जाँच की, तो उन्हें किसी तरह का उल्लंघन नहीं मिला।

दोषी भले ही एक ना हो लेकिन त्रासदी तो वास्तविक

डॉक्यूमेंट्री की टाइमलाइन या निरीक्षण के नतीजे उस असल चीज को खत्म नहीं करते जो सार्थक गोस्वामी की वीडियो में दिखाया गया है। जो विजुअल्स हैं, वे वाकई परेशान करने वाले हैं, फसलों और घरों की छतों पर जमी मोटी काली धूल, लोगों का यह कहना कि सब्जियों को खाने से पहले कई बार धोना पड़ता है और परिवारों का अस्थमा, त्वचा की बीमारियों और सांस लेने की दिक्कतों के बढ़ते मामलों का जिक्र भी खौफनाक लगता है।

डॉक्यूमेंट्री के साथ उद्धृत सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, इस इलाके में सांस संबंधी बीमारियों के मामले 2022 में 2082 से बढ़कर 2024 में 3681 हो गए हैं, यानी सिर्फ दो साल में लगभग 77 प्रतिशत की बढ़ोतरी। यह एक वास्तविक और गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर मिल रही चर्चा पूरी तरह से जायज है।

असल सवाल यह नहीं है कि बर्नीहाट में प्रदूषण की समस्या है या नहीं यह तो साफ है कि है। असल सवाल यह है कि इस समस्या को जनता के सामने कैसे समझाया जा रहा है।

इसे सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री की गलती बताना कहानी को आसान और शेयर करने लायक जरूर बनाता है और लोगों को गुस्सा निकालने के लिए एक साफ लक्ष्य भी दे देता है। लेकिन इससे बाकी लगभग 79 फैक्ट्रियाँ, अनियंत्रित वाहन यातायात, दो राज्यों के बीच कमजोर नियामक व्यवस्था और सालों से चल रहा औद्योगिक विस्तार पूरी तरह से चर्चा से बाहर हो जाते हैं।

अगर सार्वजनिक चर्चा सिर्फ उस एक प्लांट पर केंद्रित रह जाती है, जो वैसे भी उस समय शुरू हुआ था जब प्रदूषण संकट पहले ही दर्ज किया जा चुका था, तो बाकी जिम्मेदार कारण आसानी से छिपे रह जाते हैं। इसमें एक और बड़ी विडंबना भी है।

एथेनॉल मिश्रित ईंधन को केंद्र सरकार बड़े पैमाने पर एक साफ और हरित विकल्प के रूप में बढ़ावा दे रही है और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जैसे नेता इसे सुरक्षित, कम उत्सर्जन वाला और किसानों के लिए फायदेमंद बताते रहे हैं।

डॉक्यूमेंट्री के इस फ्रेमिंग के आलोचकों का कहना है कि बर्नीहाट की असली कहानी एथेनॉल उत्पादन को स्वाभाविक रूप से प्रदूषणकारी बताने की नहीं है, बल्कि एक ऐसे शहर में औद्योगिक विकास के खराब नियमन की है जो पहले से ही पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील था, और जहाँ कोई भी एथेनॉल प्लांट आने से बहुत पहले से यह समस्या मौजूद थी।

बर्नीहाट को CPCB ने 2022-2023 में ही पहले से क्रिटिकली पॉल्यूटेड क्षेत्र के रूप में चिन्हित कर दिया था। मार्च 2024 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इसे दुनिया का सबसे प्रदूषित महानगरीय क्षेत्र भी बताया गया। जिस एथेनॉल फैक्ट्री को अभी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, उसने सितंबर 2024 में ही व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया, यानी इन दोनों अहम घटनाओं के बाद।

जून 2026 में की गई एक सरकारी जाँच में पाया गया कि यह प्लांट अपने तय किए गए उत्सर्जन मानकों के भीतर ही काम कर रहा था और उसमें लगे प्रदूषण नियंत्रण उपकरण भी सही तरीके से कार्यरत थे। वहीं दूसरी तरफ, बर्नीहाट और उसके आसपास करीब 80 फैक्ट्रियाँ चलती हैं, जिनमें सीमेंट, स्टील, फेरो-अलॉय और कई डिस्टिलरी इकाइयाँ शामिल हैं, सिर्फ एक नहीं।

बर्नीहाट की हवा वाकई खतरनाक है और वहाँ रहने वाले लोगों को वास्तविक जवाब और वास्तविक जवाबदेही की जरूरत है। लेकिन उपलब्ध टाइमलाइन और सबूतों को देखें तो यह दावा कि सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री ही बर्नीहाट को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बनाने की जिम्मेदार है, तथ्यों के हिसाब से मेल नहीं खाता।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘यह आध्यात्मिक यात्रा परंपरा का एक शाश्वत अध्याय’: अमरनाथ यात्रा पर जा रहे श्रद्धालुओं को PM मोदी ने लिखा पत्र, ये 5 संकल्प अपनाने का किया आग्रह

प्रिय श्रद्धालु
हर हर महादेव!
जय बाबा बर्फानी!
 
जम्मू-कश्मीर में पवित्र अमरनाथ यात्रा में सम्मिलित होना, अपने आप में बहुत बड़ा सौभाग्य होता है। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुई प्रथम पूजा के साथ ही भक्तों के लिए बाबा बर्फानी के दर्शन का क्रम शुरू हो जाता है। देश के कोने-कोने में श्रद्धालु इस पावन यात्रा में सम्मिलित होने के लिए तत्पर रहते हैं।
 
हर वर्ष बाबा बर्फानी के प्रत्यक्ष दर्शन का यह अवसर, लाखों शिवभक्तों के लिए जीवन का एक अत्यंत शुभ और अविस्मरणीय अनुभव होता है। मैं इस वर्ष, यात्रा के इस अवसर पर आप सभी शिवभक्तों को अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।
 
बाबा अमरनाथ के दर्शन की यह यात्रा, भारत की आध्यात्मिक यात्रा परंपरा का एक शाश्वत अध्याय है। हर वर्ष पूरे विश्व से सनातन संस्कृति को मानने वाले लाखों श्रद्धालु इस यात्रा में सम्मिलित होने के लिए जम्मू-कश्मीर पहुँचते हैं। अलग-अलग प्रांतों से, अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले और विविध परंपराओं को मानने वाले लोग, महादेव के दर्शन का संकल्प लेकर इस यात्रा को पूरा करते हैं।
 
बीते कई दशकों से, श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड और जम्मू-कश्मीर सरकार बहुत कुशलता और सेवा भाव से यात्रा का प्रबंधन करते आ रहे हैं। इसके साथ ही, यात्रा को सुरक्षित संपन्न कराने में हमारे प्रशासन और सुरक्षाबलों की भी बहुत बड़ी भूमिका रहती है। इस वर्ष भी हजारों साथी इस दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।

मैं इस अवसर पर भारतीय सेना, CRPF, जम्मू-कश्मीर पुलिस, ITBP, BSF, NDRF, स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े चिकित्सकों और कर्मियों, प्रशासन के अधिकारियों, सफाई मित्रों तथा भक्तों की सेवा में जुटे हर साथी का हृदय से अभिनंदन करता हूँ।
 
इन दो महीनों के दौरान, बाबा बर्फानी के पवित्र धाम में भारत की विविधता में एकता का अद्भुत स्वरूप भी देखने को मिलता है।
 
बाबा बर्फानी के धाम की यह यात्रा, हमें जम्मू-कश्मीर के आतिथ्य भाव और देशभर से आए भक्तों के समर्पण का भी दर्शन कराती है। यात्रा के हर आयोजन में, जम्मू-कश्मीर के हजारों स्थानीय नागरिक श्रद्धालुओं का आत्मीय स्वागत करते हैं।

देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले असंख्य भक्त भी, पवित्र गुफा और यात्रा मार्गों पर भंडारों और लंगरों का संचालन करते हैं। निःस्वार्थ सेवा की यह भावना, हमारी सनातन संस्कृति और सर्वे भवन्तु सुखिनः के आदर्श की सजीव अभिव्यक्ति है।
 
इस वर्ष मैं अमरनाथ यात्रा पर जा रहे सभी श्रद्धालुओं से कुछ संकल्पों का आग्रह करना चाहता हूँ।
 
पहला संकल्प – हम अमरनाथ यात्रा के दौरान स्वच्छता के नियमों का पालन करें और पूरे यात्रा मार्ग में स्वच्छता बनाए रखने में अपना योगदान दें।
 
दूसरा संकल्प – हम प्रशासन के सभी आदेशों, यातायात के नियमों और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पूरी निष्ठा से पालन करें। यात्रा के दौरान बारिश की वजह से फिसलन और ठंड का विशेष ध्यान रखें।
 
तीसरा संकल्प – हम ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना से यात्रा के खर्च का कम से कम 10 प्रतिशत उपयोग स्थानीय उत्पादों को खरीदने में करें। इससे जम्मू-कश्मीर के परिवारों और युवाओं की आजीविका को भी बल मिलेगा।
 
चौथा संकल्प – हम बाबा अमरनाथ यात्रा के समापन दिवस, अर्थात रक्षाबंधन के अवसर पर अपने भाई या बहन को एक पौधा भेंट करें और ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को आगे बढ़ाएँ।
 
पाँचवाँ संकल्प – हम राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ पूरे वर्ष अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें और विकसित भारत के निर्माण में अपना सक्रिय योगदान दें।
 
मुझे विश्वास है कि बाबा अमरनाथ की दर्शन यात्रा, सनातन धर्म की आस्था, भारत की सांस्कृतिक एकता और सेवा की परंपरा का एक भव्य महोत्सव बनकर पूर्ण होगी।
 
मेरी कामना है, बाबा अमरनाथ की असीम कृपा हम सभी पर बनी रहे। आपकी यात्रा सुरक्षित हो, मंगलमय हो और आपके जीवन में नई ऊर्जा, नई चेतना तथा नई आध्यात्मिक शक्ति का संचार हो।
 
बाबा बर्फानी हम सभी को अपने कर्तव्यों के प्रति और अधिक समर्पित बनाएँ ताकि हम मिलकर विकसित भारत के संकल्प को सिद्ध कर सकें।
 
आप सभी को अमरनाथ यात्रा के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
 
आपका,
नरेंद्र मोदी

आतंकियों तक आधार पहुँचाने की साजिश किसकी? MP के ‘क्लोन Aadhar मशीन’ मामले ने बढ़ाई चिंता, अन्य राज्यों में भी फर्जी पंजीकरण के नेटवर्क पर उठे सवाल: पढ़ें पूरा मामला

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल एक बार फिर सुरक्षा से जुड़े सवालों के घेरे में आ गया है। इस बार मामला किसी आतंकी की गिरफ्तारी या हथियारों की बरामदगी का नहीं बल्कि देश की सबसे अहम पहचान व्यवस्था यानी आधार पंजीकरण से जुड़ा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, BSNL के आंतरिक दस्तावेजों में दावा किया गया था कि नवंबर 2023 में UIDAI ने मध्य प्रदेश में क्लोन आधार मशीनों के इस्तेमाल को लेकर चेतावनी जारी की थी। इन दस्तावेजों में कहा गया कि कुछ संदिग्ध मशीनों के जरिए आधार पंजीकरण की प्रक्रिया चलाई जा रही थी और इनके माध्यम से आतंकियों से जुड़े लोगों के आधार कार्ड बनवाने की कोशिश की जा रही थी।

(फोटो साभार – दैनिक भास्कर)

इसके बाद 6 दिसंबर 2023 को BSNL मध्य प्रदेश सर्किल ने अपने सभी संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजा। पत्र में M/s रॉयल कम्युनिकेशन नाम के वेंडर का जिक्र करते हुए 79 आधार पंजीकरण किट को तत्काल डी-रजिस्टर करने का निर्देश दिया गया।

इन मशीनों का संबंध भोपाल, महाराष्ट्र (मालेगाँव), उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, विदिशा, सागर, जबलपुर, ग्वालियर, बालाघाट, मंडला, सतना, शहडोल, छिंदवाड़ा, शिवपुरी समेत कई अन्य जिलों से बताया गया। हालाँकि दस्तावेजों में कहीं यह पुष्टि नहीं है कि इन मशीनों से वास्तव में कितने फर्जी आधार बने या किसी आतंकी ने उनका इस्तेमाल किया।

क्लोन आधार मशीन क्या होती है और इस मामले में क्या कार्रवाई हुई?

आधार पंजीकरण केवल UIDAI से अधिकृत मशीनों और ऑपरेटरों के जरिए किया जाता है। यदि किसी मशीन का अनधिकृत या पैरेलल तरीके से इस्तेमाल हो, तो उसे आम तौर पर क्लोन मशीन कहा जाता है। ऐसी स्थिति में पहचान संबंधी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।

इसी आशंका को देखते हुए UIDAI ने BSNL को सतर्क किया था। इसके बाद BSNL ने संबंधित मशीनों को डी-रजिस्टर किया और बाद में सभी मशीनों को स्थैतिक IP के साथ दोबारा पंजीकृत करने की प्रक्रिया अपनाई, ताकि भविष्य में दुरुपयोग की संभावना कम हो सके।

BSNL मध्य प्रदेश के मुख्य महाप्रबंधक मिथिलेश कुमार ने NDTV से कहा कि निगम ने अपनी जिम्मेदारी के तहत सभी एहतियाती कदम उठाए हैं। मशीनों को निष्क्रिय किया गया और UIDAI के निर्देशों के अनुसार दोबारा पंजीकरण किया गया।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक जाँच करना BSNL के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। वहीं, फरवरी 2026 के एक अन्य पत्र में यह चर्चा सामने आई कि संबंधित वेंडर को ब्लैकलिस्ट करने का अधिकार किस स्तर पर है। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासनिक स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ती रही, जबकि जाँच से जुड़े कई सवाल अब भी खुले हैं।

भोपाल का सुरक्षा रिकॉर्ड क्यों चर्चा में है?

इस मामले की चर्चा इसलिए भी ज्यादा हो रही है क्योंकि पिछले कुछ सालों में भोपाल का नाम कई आतंकी मॉड्यूल की जाँच में सामने आया है। साल 2022 में ऐशबाग इलाके से जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) के संदिग्धों की गिरफ्तारी हुई थी।

इसके बाद हिज्ब-उत-तहरीर, PFI, ISIS और अन्य कट्टरपंथी संगठनों से जुड़े मामलों में भी जाँच एजेंसियों ने कार्रवाई की। हाल ही में मोहम्मद फराज की गिरफ्तारी के बाद भी सुरक्षा एजेंसियाँ सक्रिय हुईं।

मोहम्मद फराज के मामले में जाँच एजेंसियाँ ऑनलाइन कट्टरपंथ और पाकिस्तान स्थित आकाओं से जुड़े एंगल की भी जाँच कर रही हैं। इसी वजह से भोपाल एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चर्चाओं के केंद्र में आ गया।

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, भोपाल केंद्रीय जेल में सिमी (SIMI), पीएफआई (PFI), हिज्ब-उत-तहरीर (HuT), आईएसआईएस (ISIS), जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) और सूफा (SUFA) जैसे संगठनों से जुड़े कुल 71 आतंकी संदिग्ध न्यायिक प्रक्रिया के तहत बंद हैं। इसी वजह से भोपाल का नाम लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी वाले शहरों में शामिल रहा है।

इसी पृष्ठभूमि में क्लोन आधार मशीनों से जुड़ी चेतावनी को गंभीर माना जा रहा है। हालाँकि मध्य प्रदेश ATS के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मीडिया से कहा कि उनके पास ऐसी कोई सूचना नहीं थी कि मध्य प्रदेश के BSNL आधार केंद्रों से आतंकियों के आधार कार्ड बनाए गए हों।

अधिकारी के अनुसार 2022 में पकड़े गए JMB मॉड्यूल के सदस्यों ने पश्चिम बंगाल या असम के दस्तावेजों के आधार पर पहचान पत्र बनवाए थे। यानी इस मामले में अभी तक किसी आतंकी के आधार कार्ड बनने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

किस-किस तरीके से फर्जी आधार कार्ड बनाए जाने के मामले आए सामने?

फर्जी आधार कार्ड बनने के मामले कई तरह के होते हैं। यह समझना जरूरी है कि आधार का पूरा केंद्रीय डेटाबेस (CIDR) हैक होने के प्रमाण नहीं हैं, लेकिन जाँच एजेंसियों ने अलग-अलग मामलों में आधार पंजीकरण प्रक्रिया, ऑपरेटर ID, बायोमेट्रिक और फर्जी दस्तावेजों के दुरुपयोग के तरीके सामने रखे हैं।

क्लोन आधार मशीनों का इस्तेमाल

इस मामले में सबसे बड़ा आरोप यही है। जाँच दस्तावेजों के अनुसार, अधिकृत आधार एनरोलमेंट किट की तरह काम करने वाली क्लोन मशीनों का इस्तेमाल समानांतर आधार पंजीकरण के लिए किया जा रहा था। ऐसी मशीनों के जरिए अधिकृत सिस्टम की तरह डेटा दर्ज करने की कोशिश की जाती है।

ऑपरेटर ID और पासवर्ड का गलत इस्तेमाल

कई मामलों में अधिकृत आधार ऑपरेटर की यूजर आईडी और पासवर्ड का गलत इस्तेमाल सामने आया है। जाँच  एजेंसियों के अनुसार, किसी अधिकृत ऑपरेटर की लॉग-इन जानकारी का उपयोग कर अनधिकृत व्यक्ति आधार पंजीकरण या अपडेट का काम करता था।

फर्जी बायोमेट्रिक

कुछ मामलों में सिलिकॉन या अन्य तकनीक से उंगलियों के निशान की नकली कॉपी तैयार कर बायोमेट्रिक सत्यापन को धोखा देने की कोशिश की गई। इससे बिना असली ऑपरेटर की मौजूदगी के सिस्टम में लॉग-इन करने के आरोप सामने आए हैं।

फर्जी दस्तावेजों के आधार पर आधार बनवाना

जाँच  एजेंसियों ने कई मामलों में पाया कि नकली राशन कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र, वोटर आईडी या अन्य पहचान पत्रों के आधार पर आधार पंजीकरण कराने की कोशिश की गई।

आधार अपडेट प्रक्रिया का दुरुपयोग

कुछ मामलों में पहले से बने आधार कार्ड में नाम, पता, मोबाइल नंबर या अन्य जानकारी बदलने के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। इससे किसी व्यक्ति की पहचान बदलने का प्रयास किया गया।

अनधिकृत आधार सेवा केंद्र

देश के कई राज्यों में ऐसे केंद्र पकड़े गए, जहाँ बिना वैध अनुमति के आधार पंजीकरण या अपडेट का काम किया जा रहा था। इन केंद्रों पर अधिकृत मशीनों या ऑपरेटरों के क्रेडेंशियल का गलत इस्तेमाल किया गया।

दूसरे राज्यों की मशीनों का इस्तेमाल

कुछ जाँचों में सामने आया कि एक राज्य के लिए अधिकृत आधार पंजीकरण किट या ऑपरेटर आईडी का उपयोग दूसरे राज्य में किया जा रहा था। इससे निगरानी व्यवस्था को प्रभावित करने की आशंका जताई गई।

वेंडर नेटवर्क के जरिए गड़बड़ी

कुछ मामलों में जाँच एजेंसियों ने आधार पंजीकरण का काम करने वाले वेंडरों और उनसे जुड़े ऑपरेटरों की भूमिका की भी जाँच  की। आरोप रहे हैं कि अधिकृत व्यवस्था के बाहर समानांतर तरीके से पंजीकरण कराने की कोशिश की गई।

फर्जी नाम और पहचान से पंजीकरण

कुछ मामलों में एक ही व्यक्ति के लिए अलग-अलग पहचान या अलग दस्तावेजों के आधार पर आधार बनवाने की कोशिश की गई। ऐसे मामलों में दस्तावेजों की सत्यापन प्रक्रिया जाँच का विषय बनी।

पहचान बदलकर नए दस्तावेज तैयार करना

कुछ आतंकी और अपराध से जुड़े मामलों की जाँच  में यह सामने आया कि पहले फर्जी पहचान से आधार या अन्य पहचान पत्र बनवाए गए, फिर उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर बैंक खाता, सिम कार्ड या पासपोर्ट जैसे अन्य दस्तावेज तैयार किए गए। हालाँकि हर मामले में यह तरीका अपनाया गया हो, ऐसा नहीं है, यह अलग-अलग जाँचों में सामने आए पैटर्न हैं।

इन मामलों में क्या समानता रही?

जाँच एजेंसियों के सामने आए अधिकांश मामलों में केंद्रीय आधार डेटाबेस को हैक करने की बात नहीं, बल्कि आधार पंजीकरण की प्रक्रिया का दुरुपयोग, फर्जी दस्तावेज, ऑपरेटर ID, बायोमेट्रिक और अनधिकृत मशीनों के इस्तेमाल जैसे तरीके सामने आए हैं। इसलिए ऐसे मामलों में तकनीकी सुरक्षा के साथ-साथ दस्तावेजों और ऑपरेटर स्तर पर निगरानी भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

पुराने फर्जी पासपोर्ट केस

भोपाल में पहचान संबंधी दस्तावेजों का यह पहला चर्चित मामला नहीं है। इससे पहले फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट जारी होने का मामला भी सामने आ चुका है। उस मामले में तत्कालीन पासपोर्ट अधिकारियों, एक क्लर्क और एजेंट को अदालत ने दोषी ठहराया था।

आरोप था कि फर्जी राशन कार्ड, मार्कशीट और अन्य दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट जारी किया गया। बाद में उस पासपोर्ट का इस्तेमाल कर आरोपित देश से बाहर गया और जाँच एजेंसियों के अनुसार पाकिस्तान पहुँचकर ISI के संपर्क में आया। इस मामले में अदालत फैसला भी सुना चुकी है।

क्लोन आधार मशीनों के मौजूदा मामले में भी कई सवालों के जवाब अभी सामने आने बाकी हैं। जैसे क्या इन मशीनों से किसी तरह का फर्जी आधार पंजीकरण हुआ? यदि हुआ तो उसकी संख्या कितनी थी? संबंधित ऑपरेटरों और वेंडर की जाँच किस स्तर तक पहुँची? क्या किसी जाँच एजेंसी को औपचारिक सूचना दी गई थी? फिलहाल उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि मशीनों को बंद किया गया और तकनीकी स्तर पर सुधारात्मक कदम उठाए गए।

मध्य प्रदेश जैसी गंभीर चूक अन्य राज्यों में भी?

उत्तर प्रदेश (रायबरेली), अक्टूबर 2025: रायबरेली में पुलिस ने फर्जी आधार रैकेट का भंडाफोड़ किया। जाँच के अनुसार, आरोपितों ने अधिकृत आधार ऑपरेटर की ID और पासवर्ड का गलत इस्तेमाल कर आधार कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र और अन्य पहचान दस्तावेज तैयार किए। मौके से लैपटॉप, बायोमेट्रिक उपकरण और बड़ी संख्या में आधार पंजीकरण से जुड़े दस्तावेज बरामद किए गए।

मध्य प्रदेश (बालाघाट), नवंबर 2025: बालाघाट पुलिस ने एक ऐसे नेटवर्क का खुलासा किया था, जिसमें आरोपित पर फर्जी बायोमेट्रिक क्लोन बनाकर अधिकृत आधार ऑपरेटरों की पहचान का इस्तेमाल करने का आरोप लगा।

पुलिस के अनुसार, आरोपित ने कई आधार सेवा केंद्रों के टेंडर अपने परिचितों के नाम पर हासिल किए और बाद में उन्हीं मशीनों तथा ऑपरेटर लॉग-इन का उपयोग कर आधार अपडेट का काम करता रहा। जाँच में फिंगरप्रिंट की क्लोन कॉपी बनाकर सिस्टम में लॉग-इन करने की बात भी सामने आई।

उत्तर प्रदेश (बहराइच), नवंबर 2025: उत्तर प्रदेश STF ने एक ऐसे मास्टरमाइंड को गिरफ्तार किया, जिस पर फर्जी आधार कार्ड बनाने वाले नेटवर्क को  चलाने का आरोप था। STF के अनुसार, आरोपित आधार एनरोलमेंट टूल और यूजर ID के जरिए हजारों फर्जी आधार कार्ड तैयार करने तथा दूसरे लोगों को भी ऐसी व्यवस्था उपलब्ध कराने के आरोप में जाँच के दायरे में आया।

महाराष्ट्र (मालेगाँव), नवंबर 2025: नासिक ग्रामीण पुलिस ने मालेगाँव में एक अनधिकृत आधार केंद्र पर छापा मारकर तीन लोगों को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, यह केंद्र दूसरे राज्य के अधिकृत ऑपरेटर के लॉग-इन क्रेडेंशियल का इस्तेमाल कर संचालित किया जा रहा था। मामले में आधार अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की गई।

बीमारी के बहाने निशाने पर भारत… BBC ने ’38 परजीवी’ के सहारे 19 साल पुरानी घटना पर किया बदनाम: पढ़ें- कैसे पश्चिमी मीडिया ने फैलाया प्रोपेगेंडा

ब्रिटिश मीडिया चैनल BBC का भारत विरोधी रवैया एक बार फिर सबके सामने आ गया है। इस विदेशी चैनल ने पत्रकारिता के सारे नियम भूलकर एक ऐसी खबर छापी है, जो लोगों को गुमराह करती है। BBC ने अपनी एक रिपोर्ट की हेडलाइन में लिखा कि ‘भारत घूमने गई महिला के दिमाग में पहुँचे 38 कीड़े (परजीवी)’। यह पूरी रिपोर्ट न तो मेडिकल साइंस के हिसाब से सही है और न ही इसमें कोई सच्चाई है।

यह सिर्फ भारत का नाम खराब करने की एक सोची-समझी कोशिश है। जब इस खबर की गहराई से जाँच की गई, तो पता चला कि हेडलाइन में जो डर फैलाया गया है, उसका रिपोर्ट के अंदर कोई सबूत ही नहीं है। BBC ने केवल एक विदेशी महिला की कही-सुनी बातों और उसके डॉक्टर के एक छोटे से ‘अंदाजे’ को पूरी दुनिया के सामने ऐसे पेश कर दिया, जैसे यह कोई बहुत बड़ा सच हो।

हेडलाइन और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर

BBC ने जिस चालाकी से इस खबर को बुना है, वह साफ तौर पर शरारत से भरा हुआ है। BBC के रिपोर्ट की हेडलाइन ‘A trip to India left me with 38 parasites in my brain’ है। कोई भी आम इंसान जब इस हेडलाइन को देखेगा, तो उसे पहली नजर में यही लगेगा कि भारत बहुत गंदा और असुरक्षित देश है, जहाँ जाते ही लोगों में भयंकर बीमारी पैदा हो जाती हैं। लेकिन जैसे ही आप इस खबर के अंदर का कंटेंट पढ़ेंगे, तो आपको पता चलेगा कि बीबीसी के अपने ही शब्द उसके झूठ की पोल खोल रहे हैं।

BBC की रिपोर्ट की मुख्य हेडलाइन

खबर के अंदर BBC ने खुद लिखा है कि ब्रिटिश महिला के डॉक्टर को केवल ऐसा ‘लगा’ या उनका ‘अंदाजा’ (Believes) था कि यह बीमारी भारत में हुई होगी। यहाँ न तो कोई लैब रिपोर्ट दी गई है और न ही कोई पक्का मेडिकल सबूत पेश किया गया है। डॉक्टर के पास इस बात का कोई प्रूफ नहीं है।

मेडिकल साइंस में किसी बात का ‘सिर्फ अंदाजा लगाने’ और ‘उसे सच साबित करने’ में जमीन-आसमान का फर्क होता है। BBC ने इसी फर्क को जानबूझकर छिपा लिया। एक डॉक्टर के तुक्के या निजी अंदाजे को दुनिया भर की बड़ी खबर बना देना यह साफ दिखाता है कि BBC का मकसद पत्रकारिता करना नहीं, बल्कि भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब करना और भारत के नाम पर सनसनी फैलाना था।

तीन साल का लंबा गैप और BBC की थ्योरी फेल

इस पूरी कहानी का सबसे कमजोर और हास्यास्पद पहलू वह समय सीमा है, जिसे BBC ने बड़ी ही चालाकी से दबाने की कोशिश की। लॉरी डेनमैन नाम की यह ब्रिटिश महिला साल 2007 में तीन महीने के लिए भारत घूमने आई थी। भारत से लौटने के पूरे तीन साल बाद, यानी साल 2010 में उसे पहली बार अपने पेट में टेपवर्म (फीताकृमि) होने का पता चला। इसके बाद साल 2011 में उसे गंभीर दौरे पड़ने शुरू हुए, जिसके बाद स्कैन में दिमाग के अंदर सिस्ट (परजीवी) होने की पुष्टि हुई।

अब कोई भी सामान्य समझ रखने वाला व्यक्ति यह सवाल पूछेगा कि इन तीन सालों के लंबे अंतराल में उस महिला ने ब्रिटेन या दुनिया के किसी अन्य हिस्से में क्या खाया-पिया? तीन साल के भीतर शरीर में पनपने वाले किसी भी बैक्टीरिया या पैरासाइट का सटीक स्रोत ढूँढना मेडिकल साइंस में बेहद पेचीदा और लगभग असंभव माना जाता है। लेकिन BBC के लिए 3 साल का यह अंतराल कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि उन्हें तो बस अपनी स्टोरी में ‘भारत’ का नाम जोड़कर अपनी हेडलाइन को चमकाना था।

शाकाहारी महिला और ‘पोर्क’ से बीमारी का अनोखा दावा

चिकित्सीय तथ्यों के स्तर पर BBC की यह रिपोर्ट इतनी खोखली है कि हँसने का मन करता है। रिपोर्ट के अनुसार महिला ‘न्यूरोसिस्टिसरकोसिस’ नाम की बीमारी से पीड़ित थी। यह बीमारी मुख्य रूप से सूअर के अधपके मांस (Pork) को खाने से या उसके लावे से दूषित हुए भोजन के कारण होती है।

यहाँ सबसे बड़ा झोल यह है कि खुद उस महिला ने स्वीकार किया है कि जब वह 2007 में भारत आई थी, तो उसने फूड पॉइजनिंग से बचने के लिए पूरी यात्रा के दौरान मांस को छुआ तक नहीं था। वह पूरे 3 महीने भारत में शुद्ध शाकाहारी रही थी। भारत में वैसे भी आम तौर पर पोर्क (सूअर का मांस) मिलना और खाना बहुत सीमित है। यह आसानी से हर जगह उपलब्ध भी नहीं होता। इस पर महिला के डॉक्टर डॉ ब्रेंडन हीली ने एक बेहद अजीब थ्योरी दे दी कि महिला ने ‘अनजाने में’ ऐसा पोर्क खा लिया होगा जिसमें टेपवर्म के सूक्ष्म अंडे थे। जब एक महिला खुद कह रही है कि वह शाकाहारी थी, तो उसे जबरन पोर्क खिलाने पर आमादा डॉक्टर और BBC की यह जिद सिर्फ और सिर्फ एजेंडे का हिस्सा लगती है।

मेडिकल साइंस की समझ पर भी उठे गंभीर सवाल

BBC की इस रिपोर्ट में बीमारी के फैलने की वैज्ञानिक प्रक्रिया को भी बहुत गलत और सीधे तरीके से पेश किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, न्यूरोसिस्टिसरकोसिस की बीमारी सीधे तौर पर सूअर का मांस खाने से दिमाग में नहीं पहुँचती। अधपका सूअर का मांस खाने से व्यक्ति के पेट में वयस्क टेपवर्म विकसित हो सकता है। लेकिन दिमाग में कीड़े (परजीवी) या सिस्ट तब बनते हैं जब कोई व्यक्ति टेपवर्म के अंडों से दूषित पानी या बेहद अस्वच्छ भोजन का सेवन करता है।

यह समस्या दुनिया के किसी भी कोने में खराब पर्सनल हाइजीन या दूषित पानी के कारण हो सकती है। खुद ब्रिटेन और अमेरिका जैसे विकसित देशों में हर साल ऐसे कई मामले सामने आते हैं जो वहीं के स्थानीय होते हैं। लेकिन BBC ने अपनी पूरी रिपोर्ट में इस वैश्विक संदर्भ को पूरी तरह से गायब कर दिया। उन्होंने यह कहीं नहीं बताया कि यह बीमारी लातिनी अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के दर्जनों देशों में आम है। संदर्भ को गायब करने का सीधा मकसद यही था कि पाठक का पूरा ध्यान सिर्फ और छोड़ सिर्फ भारत की नकारात्मक छवि पर टिका रहे।

एकतरफा रिपोर्टिंग: भारत का पक्ष पूरी तरह गायब

पत्रकारिता का एक बुनियादी नियम होता है कि अगर आप किसी देश या संस्था पर इतना गंभीर आरोप लगा रहे हैं, तो आपको उनका पक्ष भी शामिल करना चाहिए। BBC की इस लंबी-चौड़ी रिपोर्ट में आपको दूर-दूर तक किसी भी भारतीय डॉक्टर, भारतीय स्वास्थ्य अधिकारी या किसी मेडिकल एक्सपर्ट का बयान देखने को नहीं मिलेगा।

यह पूरी कहानी सिर्फ एक मरीज के व्यक्तिगत और डरावने अनुभवों पर आधारित है। BBC ने भारत के स्वास्थ्य तंत्र या यहाँ के आँकड़ों को शामिल करने की जरूरत ही नहीं समझी। यह दिखाता है कि यह एकतरफा प्रोपेगेंडा था, जिसे बेहद शातिर तरीके से तैयार किया गया था ताकि भारत के खान-पान और पर्यटन उद्योग को चोट पहुँचाई जा सके।

एक संतुलित हेडलाइन यह हो सकती थी कि ‘विदेशी यात्रा के सालों बाद महिला के दिमाग में मिला दुर्लभ परजीवी, डॉक्टर संक्रमण के स्रोत की कर रहे हैं जाँच’। लेकिन ऐसी संतुलित हेडलाइन से भारत की बदनामी कैसे होती?

पश्चिमी मीडिया की पूँछ बना भारतीय मीडिया: बिना सोचे-समझे देश पर उछाला कीचड़

BBC और ‘द इंडिपेंडेंट‘ जैसे पश्चिमी मीडिया घरानों का भारत विरोधी रवैया तो पुराना है और उनकी मजबूरी समझ आती है। लेकिन सबसे ज्यादा दुखद और शर्मनाक स्थिति तब पैदा हुई जब भारत के अपने नामचीन मीडिया हाउस भी इस बहकावे में आ गए।

द टाइम्स ऑफ इंडिया‘, ‘हिंदुस्तान टाइम्स‘ और ‘न्यूज18‘ जैसे बड़े भारतीय अखबारों और न्यूज पोर्टल्स ने बिना कोई दिमाग लगाए, बिना किसी फैक्ट-चेक के BBC की इस कूड़ा रिपोर्ट को ज्यों का त्यों अपनी वेबसाइट पर जगह दे दी।

भारतीय मीडिया ने भी अपनी हेडलाइंस में चिल्ला-चिल्ला कर लिखना शुरू कर दिया कि ‘ब्रिटिश महिला भारत से लौटी तो दिमाग में 38 कीड़े (परजीवी) थे’। हमारे देश के मठाधीश पत्रकारों ने एक बार भी यह सोचने की जहमत नहीं उठाई कि इस रिपोर्ट के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। वे सिर्फ पश्चिमी मीडिया के टूलकिट का हिस्सा बनकर अपने ही देश के खान-पान, स्वच्छता और पर्यटन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम कर रहे थे।

जब देश का अपना मीडिया ही बिना सोचे-समझे विदेशी प्रोपेगेंडा की रील्स और खबरें फॉरवर्ड करने लगे, तो बाहरी दुश्मनों की जरूरत ही नहीं रह जाती। पश्चिमी मीडिया हमेशा से भारत की बढ़ती आर्थिक और वैश्विक ताकत से चिढ़ता रहा है और उसे दबाने के लिए ऐसी मनगढ़ंत कहानियाँ गढ़ता रहता है। लेकिन भारतीय मीडिया का इस आत्मघाती खेल में शामिल होना देश के साथ एक बड़ा वैचारिक धोखा है।

सोशल मीडिया पर नेटीजन्स ने BBC को बुरी तरह धोया

जैसे ही BBC की यह रिपोर्ट इंटरनेट पर लाइव हुई, दुनिया भर के सोशल मीडिया यूजर्स का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। ट्विटर (X) पर लोगों ने BBC की इस नफरत भरी पत्रकारिता की जमकर धज्जियाँ उड़ाईं और उसे बुरी तरह ट्रोल करना शुरू कर दिया।

सोशल मीडिया पर यूजर्स ने लिखा कि BBC के पास ब्रिटेन के अंदर चल रहे पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स और वहाँ महिलाओं के खिलाफ हो रही ढाई लाख से ज्यादा यौन हिंसा की घटनाओं पर रिपोर्ट करने की हिम्मत नहीं है, लेकिन वे भारत को बदनाम करने के लिए 19 साल पुराना मामला ढूँढ लाए हैं।

एक यूजर ने तंज कसते हुए लिखा, “महिला 2007 में भारत आई, कीड़े (परजीवी) 2010 में मिले और BBC इस पर जहर 2026 में उगल रहा है, वाह!”

वहीं कुछ यूजर्स ने ब्रिटिश इतिहास की याद दिलाते हुए लिखा कि भारत में 200 साल के ब्रिटिश शासन ने UK को 38 से कहीं ज़्यादा परजीवी दिए। ब्रिटिश पूरे देश को लूटकर अपने साथ ले गए थे।

सोशल मीडिया पर लोगों ने साफ कहा कि BBC पूरी तरह से भारत विरोधी तत्वों के इशारे पर काम कर रहा है।

‘200 लोगों ने शमशान में पैरों से अस्थियाँ भी रौंद डालीं’: सरला भट्ट के भाई ने सुनाई दर्दनाक दास्ताँ, J&K में नर्स की बर्बर हत्या के बाद भी नहीं रुके इस्लामी कट्टरपंथी

जम्मू-कश्मीर में बर्बरता का शिकार हुई कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट के अपहरण और बर्बर हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। 36 साल बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने इस मामले में बड़ी कार्रवाई की है। एजेंसी ने 700 से अधिक पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है जिसमें प्रतिबंधित संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के प्रमुख यासीन मलिक को मुख्य आरोपित बनाया गया है।

737 पन्नों की चार्जशीट के मुताबिक, यासीन मलिक और उसके 4 साथियों ने मिलकर सरला भट्ट को अगवा करने और उनकी हत्या की साजिश रची थी। इस मामले के तीन अन्य आरोपित अब्दुल हमीद शेख, मोहम्मद युसूफ सोफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू की मौत हो चुकी है जबकि चौथा आरोपित और मुख्य शूटर खुर्शीद अहमद चालको फरार है। इस बीच सरला भट्ट के चचेरे भाई पीके भट्ट ने उनकी हत्या से जुड़ी भयावह घटनाओं को याद किया है।

बर्बर हत्या के बाद पैरों से रौंदी गईं अस्थियाँ

News18 J&K के साथ बातचीत के दौरान पीके भट्ट ने चार्जशीट दाखिल होने को लेकर कहा है कि इंसाफ तो तभी मिलना चाहिए था लेकिन अब वे इससे थोड़े संतुष्ट जरूर हैं। उन्होंने कहा, “अब सरला भट्ट की आत्मा को थोड़ा सा इंसाफ मिल जाएगा। उसकी आत्मा अभी भी भटकती होगी। अगर उस बेचारी को उसकी आत्मा को इंसाफ मिलेगा तब भी इंसाफ है।”

उन्होंने उस भयावह घटना को याद करते हुए बताया कि सरला को ड्यूटी से वापस आते समय किडनैप कर लिया गया था और उसके बाद रेप कर उनकी हत्या कर दी गई। पीके भट्ट ने अंतिम संस्कार के दौरान की गई बर्बरता को भी याद किया है। उन्होंने कहा, “दाह संस्कार करने के बाद जब हम अस्थियाँ उठाने गए, अस्थियाँ उठाते वक्त श्मशान घाट पर कम-से-कम 200 बंदे थे।”

पीके ने आगे कहा, “उन लोगों ने अस्थियाँ अपने पैरों से रौंद दी। वहाँ से हाथ जोड़कर हमने एक मुट्ठी राख उठाई। उसमें कोई अस्थि नहीं थी, खाली राख थी वो उठाई हमने फेरन में डाल दी और वहाँ से चले गए।” उन्होंने कहा, “वहाँ मौजूद लोग गालियाँ देते रहे, तुम सा*, हरा** यहाँ से निकले नहीं अभी तक। दूसरी दिन मकान का ब्लास्ट हो गया तो सब छोड़छाड़ कर वापस जम्मू आ गए।”

उन्होंने कॉन्ग्रेस के राज में यासीन मलिक को मिलने वाले वीआईपी ट्रीटमेंट पर भी अपना दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा, “दर्द की बात है कि यासीन मलिक, मनमोहन सिंह के साथ बैठता था। इससे बड़ी दर्द की बात क्या होगी कि एक देश का प्रधानमंत्री, एक उग्रवादी को अपने साथ बिठा रहा है।”

कौन थीं सरला भट्ट?

27 साल की सरला भट्ट जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में रहने वाली एक कश्मीरी पंडित थीं। शायद यही उनका गुनाह था। जब 1990 में घाटी में कश्मीरी पंडितों का जिहादियों ने नरसंहार किया, तब सरला भी उसका शिकार हुईं।

वे कश्मीर के सौरा स्थित शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SKIMS) में एक नर्स के रूप में कार्यरत थीं। आतंकी उन्हें उठाकर ले गए 5 दिन बाद सड़क पर उनका शव पड़ा मिला था।

सरला भट्ट के शरीर के टुकड़े कर बाजार में फेंके गए

14 अप्रैल 1990 का दिन था। जब सरला भट्ट SKIMS के हब्बा खातून हॉस्टल से आतंकियों ने उन्हें बंदूक की नोक पर अगवा कर ले गए। सरला भट्ट का 5 दिन तक कुछ पता नहीं लगा। रिपोर्टों के अनुसार, उनके साथ गैंगरेप किया गया। उन्हें बुरी तरह टॉर्चर किया गया। 19 अप्रैल 1990 को उनका क्षत-विक्षत शव सड़क पर पड़ा मिला था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सरला भट्ट के शव के पास एक नोट भी मिला था, जिसमें उन्हें पुलिस का मुखबिर बताया गया था। द हिंदू के मुताबिक, इस मामले में निगीन पुलिस थाने में FIR दर्ज की गई थी। इसकी संख्या 56/1990 है। हालाँकि, इसमें हिंदू नर्स के साथ रेप का कोई जिक्र तक नहीं है। इस बर्बर मामले में JKLF के पूर्व नेता पीर नूरुल हक शाह उर्फ एयर मार्शल का भी नाम सामने आया था।

700 से अधिक कश्मीरी पंडितों की हुई हत्या

सरला भट्ट केवल एकलौता नाम नहीं है, जिनकी बर्बरता से हत्या की गई। 1980-90 तक ऐसे 700 कश्मीरी पंडितों की घाटी में हत्या कर दी गई। ये हत्या कश्मीरी पंडितों के बीच दहशत फैलाने के लिए की गई थी।

आतंकी सरेआम हिंदू महिलाओं को घर से उठा ले जाते थे, कई माँ-बाप के सामने उनके बच्चों की हत्या हुई, हिंदुओं का मकान चुनकर निशाना बनाया जाता था। इन सब से परेशान होकर उस समय लगभग 3.5 लाख कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन किया था।

रिपोर्ट के अनुसार साल 2024 तक घाटी में केवल 728 गैर-प्रवासी पंडित ही बचे हैं जबकि 2021 में 808 परिवारों की थी। ‘द कश्मीर फाइल्स’ भी कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार और उनके पलायन को दर्शाने वाली फिल्म थी, जिसमें घाटी की असलियत दिखाई गई थी।

किसी का हिंदू-घृणा फैलाना काम, किसी की हिंसा भड़काने की हिस्ट्री: जानिए कौन हैं CJP प्रोटेस्ट में शामिल हुए ये 6 आंदोलनजीवी, ‘NEET’ नहीं सरकार-विरोध पर रहा फोकस

आंदोलन जब तक सुधार के लिए हो तो क्रांति है, लेकिन जब वह सिर्फ विरोध के लिए हो तो केवल एक पेशा (प्रोफेशन) बन जाता है। इस पेशे को अपनी पहचान बना चुकी उस जमात को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भरी संसद में ‘आंदोलनजीवी’ नाम दे चुके हैं। आंदोलनजीवी की यही जमात अब जंतर-मंतर पर चल रहे सोशल मीडिया से सटायर के तौर पर उभरी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रोटेस्ट (प्रदर्शन) में भी पहुँच चुकी है।

दरअसल, खुद को ‘युवाओं की आवाज’ बताने वाली CJP देश में शिक्षा व्यवस्था के मुद्दे पर, खासकर हाल ही में NEET पेपर लीक के खिलाफ विरोध कर रही है। इनकी मुख्य माँगों में से एक देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है। पहले चरण में 06 जून 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया गया था, जब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा माँगने के लिए CJP के प्रमुख होने का दावा करने वाले अभिजीत दिपके अमेरिका से भारत लौटे थे।

इसके बाद अभिजीत दिपके ने पुणे, बेंगलुरु, लखनऊ, जयपुर समेत कई शहरों में इसी मुद्दे के साथ प्रदर्शन आयोजित किए। इन प्रदर्शनों में अभिजीत दिपके को उतनी मीडिया कवरेज नहीं मिली, जितनी उनके 06 जून 2026 के दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान मिली थी। या यूँ कहें कि ‘आंदोलनजीवी’ की जो भीड़ अब राजधानी में अपना डेरा जमा चुकी है, वह देश के इन शहरों में प्रदर्शन का हिस्सा बनने नहीं पहुँच सकी।

इसीलिए अभिजीत ने 20 जून 2026 से दोबारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की घोषणा की। यहाँ आम छात्र तो पहुँचे ही पहुँचे, लेकिन लाइमलाइट में वो आंदोलनजीवी रहे जिनकी आड़ में अभिजीत और उनकी CJP गैंग को सरकार के विरोध में उतरने का लाइसेंस मिल जाता है। इनमें प्रमुख चेहरा बने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत जेल जा चुके क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक रहे, जो पिछले लगातार 5 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। सिर्फ सोनम वांगचुक ही नहीं, इस प्रदर्शन में कई और नामित आंदोलनजीवी चेहरे भी सामने आए हैं। आइए CJP प्रदर्शन के इन 12 दिनों से चल रहे प्रदर्शन में शामिल हुए उन आंदोलजवियों का रिकॉर्ड हिस्ट्री के बारे में जानते हैं।

सोनम वांगचुक

सोनम वांगचुक ने CJP को तब ही अपने आंदोलनजीवी पेशे का क्लासवर्क समझ लिया था, जब खुद इन ‘कॉकरोचों’ को भी नहीं मालूम था कि ये ऐसा कोई प्रदर्शन शुरू करने जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर मीम और कॉमेडी करने वाली CJP को सोनम वांगचुक ने पहले ही भाप लिया, उन्होंने इसे युवाओं की जनसंख्या वाला एक हुजूम माना और लग गए उसके पीछे उन्हें समर्थन देने। क्योंकि आज हर एक राजनीतिक पार्टी भी यही कर रही है, कोई भी कदम उठाने से पहले देश के लगभग 65% युवाओं के बारे में सोच रही है क्योंकि ये ही उनका वोट बैंक है।

इसी युवाओं की टोली को सोनम वांगचुक ने अपना एजेंडा चलाने के लिए इस्तेमाल किया। सबसे पहले 06 जून को जंतर-मंतर पर हुए CJP के प्रदर्शन में ‘सलाहकार’ के तौर पर काम किया और तभी से ही वह प्रदर्शन का मुख्य चेहरा बन गए। इसके बाद CJP प्रदर्शन के जंतर-मंतर पर 20 जून से शुरू हुए अगले प्रदर्शन के दौरान सोनम वांगचुक विदेश दौरे पर थे लेकिन उन्हें युवाओं के प्रदर्शन पर संदेह हुआ तो उन्होंने खुद मोर्चा संभाला और एक हफ्ते बाद 28 जून को लौटकर अनशन पर उतर गए। अब पिछले 5 दिन से CJP के मंच पर गद्दा बिछाकर भूखे लोटे रहते हैं।

बात करें सोनम वांगचुक के आंदोलनजीवी बनने के अनुभवों की तो वे पिछले साल लद्दाख में आमरण अनशन पर बैठे थे। इस दौरान सोनम वांगचुक ने मोदी सरकार पर टिप्पणी की थी, “ये ऐसे राम निकले जो सीता को रावण से छुड़ा कर लाए, लेकिन घर नहीं ले गए बल्कि भरी बाजार में बिकने के लिए रख दिया।” उनके इसी अनशन के दौरान शांति वाले क्षेत्र लद्दाख में हिंसा भड़की थी। रिपोर्ट्स में सामने आया था कि वांगचुक ने ही ‘हाथ में पत्थर लेने‘ के लिए लोगों को उकसाया था। वांगचुक को NSA के तहत गिरफ्तार किया गया था। लद्दाख से दूर जोधपुर सेंट्रल जेल में उन्हें रखा गया था, जहाँ वे 6 महीने जेल में रहे।

वांगचुक की संस्थाओं पर भी हेराफेरी मिली थीं। उनक प्रमुख संस्था हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख (HIAL) की फंडिंग में गड़बड़ियाँ पाई गई थीं और उनकी स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) में पाए गए उल्लंघनों के बाद एफसीआरए (FCRA) रजिस्ट्रेशन भी रद्द कर दिया गया था।

योगेंद्र यादव

जैसे ही आंदोलन को राजनीतिक और वैचारिक समर्थन देने वाले चेहरों की जरूरत पड़ी, वैसे ही फेल राजनीति के बाद आंदोलनजीवी बने योगेंद्र यादव भी प्रदर्शन स्थल पर पहुँच गए। यहाँ उन्होंने मंच से अपने पुराने प्रदर्शनों को याद करते हुए जंतर-मंतर के साइज की बात की। उन्होंने कहा कि 15 साल पहले वह भी इसी जगह भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे थे, तब में और अब में फर्क सिर्फ यह है कि जंतर-मंतर का आकार छोटा हो गया है और पहले ये बैरिकेडिंग नहीं हुआ करते थे। उन्होंने जंतर-मंतर के सिकुड़े आकार को लोकतंत्र के सिकुड़ने जैसा बताया।

योगेंद्र यादव का इस प्रदर्शन स्थल के लिए भावुक होना बनता भी था क्योंकि बीते कई वर्षों का उनका रिकॉर्ड बताता है कि वे केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने दिल्ली में हिंदू-विरोधी प्रदर्शन, किसान आंदोलन, भारत जोड़ो यात्रा समेत कई बड़े आंदोलनों में शामिल होकर अपनी राजनीति चमकाई है।

किसान आंदोलन को योगेंद्र यादव ने लीड किया और भारत बंद का आह्वान तक किया और जब लोगों ने इसमें व्यापक भागीदारी नहीं दी तो लोगों को उकसाने लगे। इसके अलावा वे नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध प्रदर्शनों में भी सक्रिय दिखाई दिए। बाद में कॉन्ग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गाँधी के साथ उनकी मौजूदगी ने भी यह संदेश दिया कि चुनावी राजनीति से अलग होने के बावजूद वे लगातार विपक्षी राजनीतिक अभियानों के साथ खड़े रहे।

यानी लगभग हर बड़े सरकार-विरोधी आंदोलन में उनकी मौजूदगी दर्ज की जाती रही है। इसी वजह से CJP के जंतर-मंतर प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी से आंदोलन की विचारधारा पर असर पड़ता है। क्योंकि यादव का हिंदू विरोधी रिकॉर्ड भी सबके सामने है। जब ज्ञानवापी विवाद पर उन्होंने कहा था कि कथित मस्जिद पर दावा करने के कारण 500 साल बाद इस्लामी कट्टरपंथियों के हाथों हिंदुओं को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। ये वही योगेंद्र यादव हैं जिन्होंने देश में ‘हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान’ का विरोध किया था।

बृंदा करात

सरकार-विरोधी प्रदर्शन हो और कम्युनिस्ट चेहरे सामने न आए यह तो उचित ही नहीं है। कम्युनिस्टों में CPI(M) नेता बृंदा करात CJP के प्रदर्शन में शामिल हुईं। करात ने मंच से कहा कि जब उन्होंने देखा कि NEET की परीक्षा को लेकर भ्रष्टाचार और लूट हो रही है तो वह खुद को रोक नहीं पाईं। ये वही बृंदा करात हैं जिन्हें 2023 में जब वह पहलवानों के प्रदर्शन में पहुँची और पहलवानों ने उन्हें प्रदर्शन से भगा दिया यह कहकर कि प्रदर्शन को राजनीति मत बनाइए।

वह हर मोर्चे पर सरकार का विरोध करती नजर आ जाती हैं। कभी संसद के बाहर, तो कभी ट्विटर पर तो कभी बिन बुलाए प्रदर्शनों में शामिल होकर। इनके भीतर भी आंदोलनजीवी में पाए जाने वाला वह हिंदुओं से घृणा करने वाला ‘गुण’ है। याद करें जब बृंदा करात अपनी पार्टी का नेतृत्व करते हुए राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में जाने से इनकार कर दिया था और उस कार्यक्रम को राजनीतिकरण बताया था। अब खुद राजनेता के तौर पर छात्रों के प्रदर्शन का चेहरा बन रही हैं। मंच से सीधे सरकार को ललकारने की बात कह रही हैं।

प्रशांत भूषण

पेशे से वकील और कुकर्मों से राजनीति में शामिल होने की इच्छा जता चुके प्रशांत भूषण भी CJP प्रदर्शन का हिस्सा न बने, ऐसा हो ही नहीं सकता क्योंकि उन्होंने कहाँ कोई प्रदर्शन छोड़ा है। वे तो दिल्ली में CAA के विरोध के नाम पर प्रदर्शन कराने के मास्टरमाइंड रह चुके हैं। ऐसे में उनका CJP के प्रदर्शन में आकर प्रदर्शन करने की सीख देना बनता ही था।

उन्होंने तो राहुल गाँधी तक को ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में जुड़कर अपने आंदोलनजीवी होने के सबूत पेश किए। व्यंग्य की बात यह रही कि राहुल गाँधी के साथ कदम मिलाते हुए प्रशांत भूषण ने देश में भतीजावाद के खिलाफ आवाज उठाई। ठीक इसी बेवकूफी के साथ वह CJP के मंच पर युवाओं और छात्रों को सीख देने पहुँचे थे।

क्योंकि अब तक CJP के प्रदर्शन में हिंदू-विरोधी स्वर सामने नहीं आए हैं तो प्रशांत भूषण प्रदर्शनकारियों को बताने गए होंगे कि कैसे किसी भी प्रदर्शन से पहले बैठक की जाती है जहाँ हिंसा भड़काने का प्लान बनाया जाता है और फिर प्रदर्शन की आड़ में हिंदुओं के खिलाफ माहौल बनाया जाता है। और प्रशांत भूषण जैसे वकील को उनके इन्हीं ‘कांडों’ पर सुप्रीम कोर्ट भी लताड़ लगाने से खुद को नहीं रोक पाता।

सागरिका घोष

बंगाल में सत्ता गवा चुकी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की स्टार नेता सागरिका घोष का राजनीतिक करियर डूबने को है लेकिन लाइमलाइट में आने के लिए वह भी CJP के मंच पर पहुँच गईं। बंगाल में पूरी पार्टी खत्म होने को है, पार्टी के सांसद बागी निकल गए, ममता बनर्जी को अब कोई सहारा नहीं बचा लेकिन तब सागरिका घोष सामने आकर ‘अपनों’ के समर्थन में नहीं जुटीं। अगर दो-तीन बयान या ट्वीट कहीं कर भी दिए तो उनमें भी पार्टी के आंतरिक विवाद को सरकार के ऊपर ही मढ़ दिया।

लेकिन यहाँ बात नहीं बनी तो अब सागरिका घोष CJP प्रदर्शन में शामिल होकर देश के युवाओं का समर्थन का बहाना लेकर सरकार-विरोधी बयानबाजी करने के लिए पहुँच गईं।

विजेंद्र चौहान

छात्रों के बीच मशहूर प्रोपेगेंडाबाज और हिंदू-विरोधी बयानों का बैकग्राउंड लेकर चलने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के प्रोफेसर विजेंद्र सिंह चौहान ने भी CJP का प्रदर्शन ज्वाइन किया। लेकिन एक शिक्षक के तौर पर जहाँ उन्हें NEET पेपर लीक के मुद्दे पर छात्रों की आवाज बनना था वहीं वो मंच से ‘निकोबार प्रोजेक्ट’ पर सरकार को घेरने लग गए।

विजेंद्र चौहान वही चेहरा हैं, जो शिक्षा क्षेत्र में अपना बड़ा नाम कमा कर हिंदू-विरोधी बयानबाजी और जातिवाद की बात करते हैं। उनका दावा है कि ChatGPT (Generative Pre-trained Transformer) हिंदू समाज के सवर्णों द्वारा प्रशिक्षित किया गया है, इसका डेटा सवर्णों की तरफ झुका हुआ है क्योंकि इसे ट्रेन करने वाले लोग उसी वर्ग से आते हैं।

‘आंदोलनजीवी’ से CJP के प्रदर्शन का सच

ये सिर्फ कुछ नाम हैं, इनके अलावा अंजली भारद्वाज, कम्युनिस्ट एमए बेबी, यूट्यूब टीचर अभिनय सर, किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी, काशिफ सर समेत कई आंदोलनजीवी इस प्रोटेस्ट का हिस्सा बने हैं। और इनके पास्ट रिकॉर्ड से साफ है कि ये हर उस आंदोलन में शामिल हुए हैं जिसमें मोदी सरकार के खिलाफ आवाज उठाई जा रही हैं, बाकी देश में तमाम मुद्दों पर इनके होंठ सिल जाते हैं।

लेकिन CJP जैसा प्रोटेस्ट इनके लिए खुद की राजनीति चमकाने का जरिया बन जाता है। ऐसे प्रोटेस्ट से ये युवाओं का समर्थन तो हासिल कर ही लेते हैं साथ ही उन विरोधी पार्टियों की नजर में भी आ जाते हैं जो खुद मोदी सरकार को आए दिन गालियाँ देती हैं। उदाहरण के लिए, कन्हैया कुमार को देख लीजिए। उन्होंने JNU में डफली बजाकर सरकार के लिए जहर उगला और यहाँ तक कि दिल्ली में हुए हिंदू-विरोधी दंगों में भी शामिल हुए और आज देखिए… भाईसाहब ठाठ से कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए नेतागिरी कर रहे हैं।

ऐसे आंदोलनजीवियों को छात्रों और युवाओं के असल मुद्दों से कुछ फर्क नहीं पड़ता, इनके लिए लाइमलाइट में आना जरूरी है। इनके लिए आंदोलन अब पेशा बन चुका है इसीलिए जहाँ भी मोदी-विरोधी या सरकार विरोधी नारे सुनाई देने लगते हैं तो ये झोला उठाकर वहाँ की ओर मार्च करने लग जाते हैं।

कुल मिलाकर बात यह है कि अब अगर ‘कॉकरोचों’ का NEET पेपर लीक के विरोध में जो प्रदर्शन जारी है, उसमें अगर दो-तीन छात्र वाकई में अगर परेशान हैं तो इन आंदोलनजीवियों के चलते उन्हें भी गंभीर नहीं लिया जा सकता। क्योंकि कॉकरोच जनता पार्टी का हाईकमान का पास्ट रिकॉर्ड तो सबके सामने ही है, चाहे वह अभिजीत दिपके हो, सौरव दास हो, विजेता दाहिया हो या आशुतोष रांका हो… इन सभी चेहरों का जुड़ाव तो पहले से ही दिल्ली दंगों के साजिशकर्ता उमर खालिद से लेकर आम आदमी पार्टी (AAP) से रहा है। इसीलिए अब तक जंतर-मंतर के उस मंच से NEET पेपर लीक के समाधान की बात के बजाए जातिवाद, अंबेडकरवाद, सरकार-विरोधी बयान से लेकर हर प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है।