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CPM नेता को टॉपर बनाने के लिए केरल PCS में स्कैम… जिनका जवाब नहीं जानता था, वो 10 सवाल हटाए: इंटरव्यू में दिए 40 में से 36 नंबर, दूसरे स्थान वाले को मिले 11; पढ़ें डिटेल्स

केरल लोक सेवा आयोग (PSC) परीक्षा में एक बड़े घोटाले को लेकर विवाद हो रहा है। राज्य योजना बोर्ड में ‘चीफ (उद्योग और बुनियादी ढाँचा)’ के बेहद महत्वपूर्ण पद के लिए एक परीक्षा आयोजित की गई थी।

इस परीक्षा में मेरिट और ईमानदारी को ताक पर रखकर, सत्ताधारी दल CPM से जुड़े एक संगठन के नेता अरुण जे प्रताप को अवैध तरीके से पहला रैंक (टॉपर) दिला दिया गया। मामला सामने आने के बाद जब विशेष जाँच टीम (SIT) और क्राइम ब्राँच ने जाँच शुरू की, तो कई चौंकाने वाले खुलासे हुए।

जाँच में सामने आया कि यह कोई छोटी-मोटी लापरवाही नहीं थी, बल्कि बड़े अधिकारियों और राजनेताओं की मिलीभगत से रची गई एक सोची-समझी साजिश थी, ताकि अपने पसंदीदा उम्मीदवार को इस पद पर बैठाया जा सके।

मूल्यांकन में धांधली और मार्क्स का गणित

जाँच टीम SIT को पता चला है कि इस घोटाले को अंजाम देने के लिए परीक्षा के पूरे इवैल्यूएशन प्रोसेस को ही हैक कर लिया गया। जो उम्मीदवार पहले स्थान पर आया, वह असल में केरल वॉटर अथॉरिटी में CPM समर्थित सर्विस ऑर्गनाइजेशन का एक नेता था।

गड़बड़ी यह की गई कि पहली रैंक पाने वाले इस नेता ने परीक्षा के पहले पेपर में 4 सवालों के गलत जवाब दिए थे और 6 सवाल ऐसे थे जिन्हें उसने छुआ तक नहीं था। आरोपित अधिकारियों ने दिमाग लगाया और प्रश्न संख्या 9 से लेकर 18 तक के इन 10 सवालों को डिजिटल इवैल्यूएशन के प्रोसेस से ही बाहर कर दिया।

इसका नतीजा यह हुआ कि जिन 228 से ज्यादा दूसरे उम्मीदवारों ने इन 10 सवालों के सही जवाब दिए थे, उन्हें भी इसके कोई नंबर नहीं मिले। इस तरह से बाकी उम्मीदवारों के लगभग 50 से 54 मार्क्स का नुकसान कर दिया गया।

अगर सभी सवालों की सही तरीके से जाँच होती, तो असली टॉपर कोई और होता। जाँच के मुताबिक, मौजूदा पहले रैंक वाले नेता के नंबर असली हकदार (जो दूसरे नंबर पर रहा) से 53 मार्क्स कम होते। हालत यह थी कि अगर ईमानदारी से कॉपी जाँची जाती, तो यह नेता शॉर्टलिस्ट होने के लायक भी नहीं था, लेकिन धांधली करके उसे टॉपर बना दिया गया।

 इंटरव्यू का खेल और एक लाख से ऊपर की सैलरी

यह पूरा खेल सिर्फ एक ही पद को भरने के लिए खेला गया था। यह नौकरी कोई आम नौकरी नहीं थी, बल्कि इसका वेतन ₹1,23,700 से लेकर ₹1,66,800 प्रति माह तक था। इतनी भारी-भरकम सैलरी और रसूख वाले पद पर अपने आदमी को बैठाने के लिए सिर्फ लिखित परीक्षा में ही नहीं, बल्कि इंटरव्यू में भी जमकर नंबर लुटाए गए।

जब लिखित परीक्षा के बाद इंटरव्यू का दौर आया, तो सेटिंग के तहत इस वामपंथी नेता को 40 में से 36 मार्क्स दे दिए गए। वहीं दूसरी तरफ, जो उम्मीदवार अपनी काबिलियत के दम पर दूसरे नंबर पर था और जो असल में इस पद का असली हकदार था, उसे इंटरव्यू में 40 में से सिर्फ 11 मार्क्स देकर रेस से बाहर कर दिया गया।

इस बेईमानी का भंडाफोड़ तब हुआ जब मुहम्मा के रहने वाले वी एस जयलाल नाम के एक उम्मीदवार ने अपनी आंसर-शीट की कॉपी के लिए अप्लाई किया। आयोग ने जानबूझकर नियुक्ति होने के एक साल बाद उसे कॉपी दी, जिसमें साफ दिख रहा था कि 28 में से सिर्फ 18 सवालों के ही नंबर जोड़े गए थे और 10 सवालों को गायब कर दिया गया था।

 SIT की जाँच का शिकंजा और आगे की कार्रवाई

क्राइम ब्रांच और आईजी अजीता बेगम के नेतृत्व वाली SIT ने अब इस मामले में कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। मूल्यांकन विभाग में इस्तेमाल होने वाले कंप्यूटरों को सील कर दिया गया है और उनके डिजिटल लॉग्स कब्जे में ले लिए गए हैं ताकि फॉरेंसिक जाँच की जा सके।

शुरुआती जाँच के बाद SIT को शक है कि इस पूरे खेल के पीछे भारी लेन-देन यानी रिश्वतखोरी हुई है। इसलिए इस केस में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है। इसके अलावा आपराधिक विश्वासघात और पद के दुरुपयोग की धाराओं में भी जाँच चल रही है।

आरोपितों की बात करें तो जाँच की सुई PSC के परीक्षा विभाग के तीन वरिष्ठ अधिकारियों (एक डिप्टी सेक्रेटरी, एक जूनियर सुपरिटेंडेंट और एक सिस्टम एनालिस्ट) पर टिकी है, जिन्हें जल्द ही आरोपित बनाया जा सकता है।

इसके साथ ही PSC के चेयरमैन एम आर बैजू और इंटरव्यू लेने वाले दो अन्य बोर्ड सदस्यों को भी पूछताछ के लिए नोटिस भेजा जा रहा है। सरकार से इन अधिकारियों पर केस चलाने की मंजूरी माँगी जा रही है।

यह मामला सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं है। अब तक SIT को परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर 90 से ज्यादा शिकायतें मिल चुकी हैं, जिसके बाद जाँच का दायरा बढ़ाने और टीम में और अधिक पुलिस अधिकारियों को शामिल करने का फैसला किया गया है।

पौराणिक कथा से लेकर व्यवहारिक तथ्य… जानिए काँवड़ यात्रा क्यों है आस्था-तप-समरसता का महापर्व: अखिलेश दौर में लगते थे अड़ंगे, योगी सरकार में होती है पुष्प-वर्षा

श्रावण मास के आगमन के साथ ही उत्तर और मध्य भारत का एक विशाल भूभाग ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के दिव्य जयघोषों से गुंजायमान हो उठता है। सड़कों पर उमड़ता गेरुवा वस्त्रधारी श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब, कंधों पर सजी काँवड़ और मन में देवों के देव महादेव के प्रति अगाध श्रद्धा, यही पहचान है काँवड़ यात्रा की।

काँवड़ यात्रा केवल जल अर्पण की एक धार्मिक परंपरा मात्र नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति की उस जीवंत धारा का प्रतीक है जो सदियों से भारतीय जनमानस को एकता, अनुशासन, भक्ति और सामाजिक समरसता के सूत्र में पिरोती आ रही है।

प्रतिवर्ष श्रावण महीने में लाखों-करोड़ों शिवभक्त हरिद्वार, गौमुख, ऋषिकेश, सुल्तानगंज और अन्य पवित्र नदियों से गंगाजल भरकर नंगे पाँव सैकड़ों किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए अपने-अपने क्षेत्रों के शिवालयों में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

यह यात्रा शारीरिक सहनशक्ति, मन के नियंत्रण और आत्मिक समर्पण की एक कठिन परीक्षा होती है। बीते कुछ दशकों में यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बनी है, बल्कि इसने एक विशाल सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप भी धारण कर लिया है।

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा इसे ‘समरसता का महापर्व’ नाम दिया गया है, जो इस यात्रा के वास्तविक चरित्र को सटीक रूप से रेखांकित करता है। समय के साथ-साथ इस यात्रा के सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक आयामों में भी बड़े बदलाव आए हैं, जिसने इसे आज भारत के सबसे भव्य और अनुशासित आयोजनों में से एक बना दिया है। 

काँवड़ यात्रा का इतिहास, पौराणिक कथाएँ और गहरी लोक मान्यताएँ

काँवड़ यात्रा का इतिहास और इसकी शुरुआत भारतीय पौराणिक ग्रंथों तथा लोक-परंपराओं की गहराइयों में समाहित है। यद्यपि किसी एक प्राचीन ग्रंथ में इसका सीधा उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन लोक-परंपरा में इसकी शुरुआत को लेकर कई कथाएँ प्रचलित हैं।

सबसे मूल पौराणिक कथा समुद्र मंथन और नीलकंठ की घटना से जुड़ी हुई है। जब देवताओं और असुरों द्वारा अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन किया गया, तो सबसे पहले उससे हलाहल नामक भीषण विष निकला, जो पूरी सृष्टि के लिए अत्यंत घातक था।

संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने स्वयं उस विष का पान कर लिया और उसे अपने कंठ में धारण कर लिया, जिसके कारण उनका नाम ‘नीलकंठ’ पड़ा। विष के प्रभाव से शिव को अत्यधिक तपन, जलन और पीड़ा हुई, जिसे शांत करने के लिए देवताओं द्वारा पवित्र नदियों के जल से उनका अभिषेक किया गया। 

इसी परंपरा से जुड़ी एक प्रचलित कथा लंकापति रावण से संबंधित है। माना जाता है कि रावण शिव का परम भक्त था और विष की पीड़ा से शिव को राहत दिलाने के लिए उसने गढ़मुक्तेश्वर (उत्तर प्रदेश) से गंगाजल लाकर बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था, जिसके कारण कई लोग रावण को पहला काँवड़िया मानते हैं।

एक अन्य लोकप्रिय कथा भगवान परशुराम से जुड़ती है, जिन्होंने पुरा महादेव मंदिर की स्थापना कर वहाँ नियमित रूप से गंगाजल लाकर शिव-पूजन शुरू किया और श्रावण मास के हर सोमवार को यह क्रम दोहराया। वहीं श्रवण कुमार की कथा में भी काँवड़ का उल्लेख आता है।

वे अपने वृद्ध और दृष्टिहीन माता-पिता को काँवड़ जैसी संरचना में बिठाकर तीर्थ-यात्रा कराते थे, जिसे मातृ-पितृ सेवा और समर्पण की प्रेरणा माना जाता है। काँवड़ यात्रा की कठिन पदयात्रा को भी एक प्रकार की तपस्या और भक्ति-परीक्षा के रूप में देखा जाता है, जहाँ स्थानीय शिवालयों में जल चढ़ाकर कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। 

एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने भी काँवड़ यात्रा की थी। कहा जाता है कि उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। इन कथाओं का साझा भाव यही है कि शिव से जुड़ी पवित्र नदी गंगा के जल द्वारा शिव की पीड़ा शांत की जाए।

ऐतिहासिकता का आयाम और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो काँवड़ यात्रा भारतीय समाज को उसकी सांस्कृतिक और सामाजिक जड़ों से जोड़ने का एक अत्यंत सशक्त माध्यम रही है। प्राचीन भारत में जब आवागमन के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तब लोग दूर-दराज के तीर्थ स्थलों तक पहुँचने के लिए पदयात्राएँ ही करते थे।

काँवड़ यात्रा ने भारत के विशाल भूभाग को भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर एक सांस्कृतिक सूत्र में बाँधने का काम किया। मध्यकाल और आधुनिक काल के शुरुआती वर्षों में काँवड़ यात्रा मुख्य रूप से साधु-संतों, सन्यासियों और ग्रामीण समाज के श्रद्धालुओं तक सीमित थी, लेकिन धीरे-धीरे यह यात्रा जन-आस्था के महापर्व के रूप में परिवर्तित होती चली गई।

इस यात्रा की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि यह रही है कि इसने समाज के विभिन्न वर्गों, जातियों और आर्थिक स्तरों के लोगों के बीच की दूरी को मिटा दिया। जब कोई श्रद्धालु काँवड़ उठाता है, तो वह अपनी सांसारिक पहचान, पद, प्रतिष्ठा और जातिगत अहम् को पीछे छोड़ देता है।

काँवड़ मार्ग पर चलने वाला हर व्यक्ति केवल ‘काँवड़िया’ के रूप में जाना जाता है। एक-दूसरे को ‘भोले’ कहकर पुकारना और एक-दूसरे की मदद करना इस यात्रा की मूल भावना है। इस यात्रा ने औपनिवेशिक काल और उसके बाद के दौर में भी भारतीय लोक संस्कृति, लोकगीतों, भजनों और पारंपरिक वेशभूषा को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इसने ग्रामीण और शहरी भारत के बीच एक जीवंत सांस्कृतिक सेतु का निर्माण किया है, जिससे युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं से सहज रूप से जुड़ पाती है।

काँवड़ यात्रा का तार्किक, व्यावहारिक और सामाजिक-मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

काँवड़ यात्रा के विभिन्न पहलुओं को समझते हुए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इसके पीछे प्रस्तुत किए जाने वाले तर्क किसी नियंत्रित वैज्ञानिक अध्ययन का निष्कर्ष नहीं हैं, बल्कि यह लोक-मान्यता, पर्यावरणीय अवलोकन और तार्किक व्याख्याओं का एक संतुलित मिश्रण है।

श्रावण का समय मानसून काल होता है, जब गंगा और अन्य नदियों के जल-प्रवाह व गुणवत्ता में मौसमी चक्र के कारण स्वाभाविक बदलाव आते हैं। सावन में गंगाजल को विशेष पवित्र मानना इसी पारिस्थितिक समझ को दर्शाता है। 

व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, नंगे पैर या साधारण जूतों में सैकड़ों किलोमीटर की लंबी पैदल यात्रा करना शरीर के लिए दीर्घकालिक सहनशक्ति का अभ्यास है, जो शारीरिक फिटनेस, मानसिक अनुशासन और इच्छाशक्ति को बढ़ाता है।

इसे एक सामूहिक तप-साधना के रूप में देखा जाता है, जिसका मनोवैज्ञानिक लाभ आत्म-नियंत्रण, संयम और सकारात्मक सोच के रूप में मिलता है। इसके अतिरिक्त, सामूहिक रूप से यात्रा करना और रास्ते में मिलने वाले सेवा-शिविरों में भाग लेना समाज में परस्पर सहयोग, आपसी भरोसे और सामाजिक एकजुटता को सुदृढ़ करता है।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से इसे एक मजबूत ‘सामूहिक बंधन’ के रूप में देखा जा सकता है जो आधुनिक जीवन के एकाकीपन और तनाव को दूर करने में सहायक सिद्ध होता है। 

अतीत की चुनौतियाँ: अखिलेश सरकार के दौर में काँवड़ यात्रा की स्थिति

काँवड़ यात्रा के प्रशासनिक इतिहास का विश्लेषण करें, तो उत्तर प्रदेश में 2017 से पूर्व का दौर और उसके बाद का दौर दो स्पष्ट दृष्टिकोणों को दर्शाता है। वर्ष 2012 से 2017 के दौरान उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार में काँवड़ यात्रा को कई प्रकार की प्रशासनिक पाबंदियों और सुरक्षात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ता था।

उस दौर में काँवड़ यात्रा को अक्सर केवल एक कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखा जाता था, न कि किसी विशाल सांस्कृतिक और धार्मिक महोत्सव के रूप में। अखिलेश सरकार के शासनकाल में काँवड़ यात्रा के दौरान डीजे या लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर कड़ी पाबंदियाँ लगा दी गई थीं।

काँवड़ियों के लिए सड़कों पर बुनियादी सुविधाओं जैसे- पीने के स्वच्छ पानी, मोबाइल शौचालय, अस्थायी विश्राम गृहों और प्रकाश व्यवस्था का अभाव रहता था। कई स्थानों पर काँवड़ मार्गों की जर्जर स्थिति, सड़कों पर गड्ढे और लटकते बिजली के तार श्रद्धालुओं के लिए गंभीर दुर्घटनाओं का कारण बनते थे।

सुरक्षा के मोर्चे पर भी संवेदनशील इलाकों से गुजरते समय काँवड़ यात्रियों पर पथराव, इस्लामी कट्टरपंथियों और असमाजिक तत्वों द्वारा व्यवधान पैदा करने की घटनाएँ सामने आती थीं, लेकिन प्रशासनिक रुख अक्सर श्रद्धालुओं के प्रति सख्त रहता था। विभिन्न मार्गों पर जबरन डायवर्ट करने जैसी घटनाओं से काँवड़ियों में आक्रोश और असुरक्षा का भाव बना रहता था।

योगी सरकार का नया दौर: सुविधाओं, सुरक्षा और पुष्प वर्षा से बदला परिदृश्य

वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद काँवड़ यात्रा के प्रति राज्य सरकार के प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टिकोण में एक अभूतपूर्व बदलाव आया। सीएम योगी ने शासन-प्रशासन को स्पष्टनिर्देश दिए कि शिवभक्त काँवड़ियों की सुरक्षा, सम्मान और सुविधा राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने श्रद्धालुओं को महज यात्री न मानकर उन्हें ‘शिव स्वरूप’ के रूप में देखा और उसी भावना के साथ पूरे यात्रा मार्ग पर सुरक्षा व सेवाओं के पुख्ता इंतजाम किए। योगी सरकार के कार्यकाल में काँवड़ यात्रा के व्यवस्थापन में आई इस बदलाव की सबसे प्रमुख और चर्चित पहचान हेलीकॉप्टर से काँवड़ियों पर की जाने वाली पुष्प वर्षा बनी।

मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, लखनऊ और वाराणसी जैसे प्रमुख काँवड़ मार्गों पर वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों द्वारा हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा कर श्रद्धालुओं का अभूतपूर्व स्वागत किया गया, जिसने श्रद्धालुओं के मन में अपनी आस्था के प्रति अपार सम्मान और आत्मगौरव का संचार किया।

सुरक्षा व्यवस्था के मोर्चे पर भी तकनीक का व्यापक इस्तेमाल किया गया, जहाँ एटीएस, ड्रोन कैमरों, सीसीटीवी और बॉडी-वॉर्न कैमरों के माध्यम से पूरे काँवड़ मार्ग की 24 घंटे निगरानी की जाने लगी। संवेदनशील इलाकों में पुलिस बल, पीएसी और केंद्रीय सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की गई।

इसका फायदा ये हुआ कि असमाजिक तत्वों द्वारा किसी भी प्रकार का विघ्न डालने की आशंका काफी हद तक समाप्त हो गई। इसके साथ ही बुनियादी सुविधाओं के स्तर पर व्यापक सुधार किए गए, जिसके तहत काँवड़ मार्गों को पूरी तरह से गड्ढा मुक्त बनाया गया, सड़कों पर लटकते बिजली के तारों को दुरुस्त किया गया और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा गया।

पूरी यात्रा के दौरान सड़कों के किनारे पेयजल के टैंकर, मोबाइल शौचालय, 24 घंटे खुले रहने वाले स्वास्थ्य शिविर और एम्बुलेंस की एहतियाती व्यवस्थाएँ की गईं।

पिछली सरकार के दौरान डीजे और संगीत पर लगे कड़े प्रतिबंधों के विपरीत योगी सरकार ने निर्धारित ध्वनि मानकों के भीतर शिव भजनों और पारंपरिक संगीत को बजाने की छूट दी, जिससे काँवड़ यात्रा का भक्तिमय उत्साह और उल्लास पुनः लौट आया।

अमर उजाला की खबर का स्क्रीनशॉट

धार्मिक पवित्रता बनाए रखने के लिए यात्रा की पूरी अवधि के दौरान काँवड़ मार्गों पर खुले में मांस की बिक्री और शराब की दुकानों को बंद रखने के सख्त निर्देश दिए गए। साथ ही आम नागरिकों, सामाजिक संगठनों और व्यापार मंडलों द्वारा लगाए जाने वाले काँवड़ सेवा शिविरों को सुलभ अनुमति और सुरक्षा मुहैया कराई गई।

योगी सरकार की इस प्रशासनिक संवेदनशीलता और दूरदर्शी प्राथमिकताओं ने काँवड़ियों के मन से पूर्व की असुरक्षा की भावना को पूरी तरह समाप्त कर दिया और यात्रा को एक भव्य, सुरक्षित तथा अनुशासित स्वरूप प्रदान किया।

वामपंथी कुप्रचार को ध्वस्त करता ‘समरसता का महापर्व’

हाल के वर्षों में काँवड़ यात्रा के अभूतपूर्व विस्तार और इसमें उमड़ते करोड़ों श्रद्धालुओं के जनसैलाब को देखकर वामपंथी और लिबरल मीडिया इकोसिस्टम में एक अजीब सी छटपटाहट देखने मिली है। ‘द वायर’, ‘द प्रिंट’ और ‘द कारवां’ जैसे मीडिया संस्थानों ने इसे निशाना बनाने और सनातन धर्म की छवि को धूमिल करने के उद्देश्य से भ्रामक विश्लेषण पेश किए हैं।

कभी काँवड़ियों की जीवनशैली को उपद्रवी और अराजक बताकर खारिज करने का प्रयास किया गया, तो कभी समाजशास्त्र के ‘संस्कृतिकरण’ जैसे क्लिष्ट शब्दों की आड़ लेकर इस विशाल जन-आंदोलन को जातिगत पदानुक्रम और सांस्कृतिक वर्चस्व का परिणाम सिद्ध करने का दुष्प्रचार किया गया।

यहाँ तक कि दलितों और पिछड़ों की इस यात्रा में ऐतिहासिक व अपार भागीदारी को भी ‘समानता’ मानने के बजाय वामपंथी लेखकों द्वारा इसे नीचा दिखाने और दलित समाज को सनातन परंपराओं से दूर करने के लिए भड़काने वाले एजेंडे चलाए गए। लेकिन धरातल पर सनातन संस्कृति और शिवभक्तों की आस्था ने इस पूरे गढ़े गए नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

काँवड़ मार्ग पर बने हजारों सेवा-शिविरों में समाज के हर वर्ग के लोग बिना किसी संकोच या जातिगत भेदभाव के शिवभक्तों के पैर दबाते हैं, उनके लिए भोजन बनाते हैं और उनकी सेवा में लगे रहते हैं। उत्तर प्रदेश के सीएम योगी ने इसे ‘सामाजिक समरसता का महापर्व’ और एकता का महासंगम करार दिया है, जो सनातन समाज की अटूट एकजुटता का जीवंत प्रमाण है।

इतना ही नहीं यह यात्रा करोड़ों रुपए का व्यापार उत्पन्न कर स्थानीय कारीगरों, छोटे विक्रेताओं और गरीब परिवारों को आर्थिक मजबूती प्रदान करती है। काँवड़ यात्रा आज भारतीय जनमानस के आत्मगौरव, अटूट सामाजिक समरसता और सनातन धर्म की सनातन शक्ति का सबसे भव्य प्रतीक बनकर उभरी है।

आतंकवाद, ड्रग्स, साइबर ठगी, क्रिप्टो स्कैम और कट्टरपंथ… Telegram आखिर अपराधियों की पहली पसंद क्यों बन गया?

दुनिया के सबसे लोकप्रिय मैसेजिंग ऐप्स में शामिल टेलीग्राम एक बार फिर बड़े विवादों में घिर गया है। एक तरफ ऑस्ट्रेलिया ने इस ऐप के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, तो दूसरी तरफ रूस ने इसके संस्थापक पावेल ड्यूरोव पर आतंकवादी गतिविधियों में मदद करने जैसे गंभीर आरोप लगा दिए हैं।

दोनों देशों के आरोप अलग-अलग हैं लेकिन सवाल एक ही है कि आखिर टेलीग्राम पर ऐसा क्या हो रहा है कि दुनिया की सरकारें इस पर लगातार सख्त होती जा रही हैं।

पिछले कुछ सालों में टेलीग्राम सिर्फ दोस्तों और परिवार से बातचीत करने वाला ऐप नहीं रह गया है। आज इसका इस्तेमाल करोड़ों लोग पढ़ाई, बिजनेस, न्यूज और कम्युनिटी बनाने के लिए करते हैं। लेकिन इसके साथ ही साइबर ठग, हैकर, ऑनलाइन स्कैम चलाने वाले गिरोह, कट्टरपंथी संगठन और दूसरे अपराधी भी इस प्लेटफॉर्म का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। इसकी वजह है टेलीग्राम के कुछ ऐसे फीचर्स, जो आम लोगों के लिए तो सुविधाजनक हैं लेकिन गलत हाथों में पड़कर बड़े खतरे की वजह बन रहे हैं।

ऑस्ट्रेलिया ने टेलीग्राम के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया?

ऑस्ट्रेलिया की ऑनलाइन सुरक्षा एजेंसी ई-सुरक्षा आयुक्त ने टेलीग्राम के खिलाफ संघीय न्यायालय में कानूनी कार्रवाई शुरू की है। एजेंसी का आरोप है कि टेलीग्राम ने कई बार शिकायत मिलने के बावजूद आतंकवाद और चरमपंथ से जुड़ी सामग्री समय पर नहीं हटाई।

ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि प्लेटफॉर्म पर ऐसे वीडियो और पोस्ट लंबे समय तक उपलब्ध रहे, जिनका संबंध दुनिया के कुछ सबसे चर्चित आतंकी हमलों से था। इनमें न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च मस्जिद हमला, अमेरिका के बफेलो सुपरमार्केट शूटिंग और ISIS द्वारा जारी किए गए सिर कलम करने वाले वीडियो जैसी सामग्री भी शामिल बताई गई है।

ई-सुरक्षा आयुक्त जूली इनमैन ग्रांट का कहना है कि टेलीग्राम को इन पोस्ट के बारे में पहले ही जानकारी दे दी गई थी। इसके बावजूद प्लेटफॉर्म ने इन्हें हटाने में काफी देर कर दी।

उनका मानना है कि जब किसी प्लेटफॉर्म को इस तरह की सामग्री की जानकारी मिल जाती है, तब उसकी जिम्मेदारी बनती है कि वह तुरंत कार्रवाई करे ताकि ऐसी सामग्री लोगों तक न पहुँचे और किसी तरह के कट्टरपंथ या हिंसा को बढ़ावा न मिले।

अगर अदालत टेलीग्राम को दोषी मानती है तो कंपनी पर 54.6 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। यह मामला सिर्फ टेलीग्राम तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इससे यह भी तय होगा कि भविष्य में सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म की कानूनी जिम्मेदारी कितनी होगी।

टेलीग्राम ने आरोपों पर क्या कहा?

टेलीग्राम ने ऑस्ट्रेलिया के सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। कंपनी का कहना है कि वह आतंकवाद के खिलाफ लगातार कार्रवाई करती रही है और उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक है।

टेलीग्राम के मुताबिक उसने केवल साल 2026 में ही आतंकवाद से जुड़े डेढ़ लाख से ज्यादा चैनलों और कम्युनिटी पर कार्रवाई की है। कंपनी का दावा है कि उसके पास ऐसी टीम और सिस्टम मौजूद हैं जो आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े कंटेंट की पहचान करके उसे हटाते हैं। टेलीग्राम का कहना है कि वह अदालत में इन आरोपों का जवाब देगा और कानूनी लड़ाई लड़ेगा।

हालाँकि ऑस्ट्रेलियाई एजेंसी का कहना है कि कार्रवाई तभी मायने रखती है जब वह समय पर की जाए। अगर किसी हिंसक या आतंकी वीडियो को लाखों लोग पहले ही देख चुके हों, तो बाद में उसे हटाने का फायदा बहुत कम रह जाता है। यही बात अब अदालत में भी अहम मुद्दा बनने वाली है।

रूस ने टेलीग्राम के संस्थापक पर क्या आरोप लगाए?

ऑस्ट्रेलिया की कार्रवाई के एक दिन पहले रूस ने भी टेलीग्राम के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पावेल ड्यूरोव के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए। रूस की फेडरल सिक्योरिटी सर्विस यानी FSB का कहना है कि टेलीग्राम पर ऐसे कई चैनल, चैट और बॉट चल रहे थे जिनका इस्तेमाल यूक्रेन की सुरक्षा एजेंसियाँ रूस के अंदर लोगों की भर्ती करने, तोड़फोड़ की घटनाओं की योजना बनाने, साइबर अपराध और आतंकी गतिविधियों के लिए कर रही थीं।

रूस का आरोप है कि टेलीग्राम ने सरकार की ओर से भेजे गए बड़ी संख्या में अनुरोधों के बावजूद ऐसे चैनलों और कंटेंट को नहीं हटाया। FSB का दावा है कि साल 2022 के बाद से टेलीग्राम से जुड़े डेढ़ लाख से ज्यादा मामलों की जाँच की गई है।

इसी आधार पर रूस ने पावेल ड्यूरोव के खिलाफ आतंकवाद में मदद करने का मामला दर्ज किया है और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वांछित घोषित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है।

अगर रूस के कानून के तहत ये आरोप साबित होते हैं तो ड्यूरोव को उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। हालाँकि अभी यह मामला जाँच और कानूनी प्रक्रिया के दौर में है।

पहले भी विवादों में रह चुका है टेलीग्राम

यह पहली बार नहीं है जब टेलीग्राम और उसके संस्थापक कानूनी मुश्किलों में फंसे हैं। साल 2024 में फ्रांस ने भी पावेल ड्यूरोव को हिरासत में लिया था। आरोप था कि टेलीग्राम का इस्तेमाल ड्रग तस्करी, बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री और दूसरे गैरकानूनी कामों के लिए किया जा रहा है तथा कंपनी इन मामलों में पर्याप्त सहयोग नहीं कर रही।

बाद में उन्हें जमानत मिल गई, लेकिन फ्रांस में जाँच अब भी जारी है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में टेलीग्राम पर अलग-अलग देशों की नजर लगातार बनी हुई है।

आखिर टेलीग्राम पर बार-बार सवाल क्यों उठते हैं?

टेलीग्राम को दुनिया भर में एक ऐसा मैसेजिंग प्लेटफॉर्म माना जाता है जो यूजर की निजता को काफी महत्व देता है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ा विवाद भी।

एक तरफ आम यूजर चाहते हैं कि उनकी निजी बातचीत सुरक्षित रहे और कोई उस पर नजर न रख सके। दूसरी तरफ सरकारों और जाँच एजेंसियों का कहना है कि इसी गोपनीयता का फायदा उठाकर अपराधी, साइबर ठग और कट्टरपंथी संगठन अपने नेटवर्क चलाते हैं।

यही वजह है कि हर बार जब किसी बड़े अपराध, ऑनलाइन ठगी या आतंकवादी नेटवर्क का खुलासा होता है तो टेलीग्राम का नाम भी चर्चा में आ जाता है। हालाँकि कंपनी का कहना है कि वह अपराधियों का साथ नहीं देती, बल्कि यूजर की प्राइवेसी और अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करना उसकी प्राथमिकता है। अब अदालतें और जाँच एजेंसियाँ तय करेंगी कि इन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

लेकिन आखिर अपराधियों की पहली पसंद क्यों बन गया टेलीग्राम?

यही सबसे बड़ा सवाल है। आखिर ऐसा क्या है जो साइबर ठग, हैकर, ऑनलाइन स्कैम चलाने वाले गिरोह और कट्टरपंथी संगठन WhatsApp या दूसरे ऐप्स की बजाय टेलीग्राम को ज्यादा पसंद करते हैं? इसके पीछे कई तकनीकी और सिस्टम से जुड़े कारण बताए जाते हैं।

इनमें यूजर की पहचान छिपाने की सुविधा, सीक्रेट चैट, ऑटो डिलीट मैसेज, बड़े चैनल, लाखों लोगों तक एक साथ पहुँच और आसान अकाउंट बनाने जैसी कई सुविधाएँ शामिल हैं। इन्हीं वजहों से पिछले कुछ वर्षों में टेलीग्राम अपराधियों के बीच भी तेजी से लोकप्रिय हुआ है।

पिछले कुछ वर्षों में साइबर अपराध से जुड़े कई मामलों की जाँच में टेलीग्राम का नाम सामने आया है। इसका मतलब यह नहीं है कि टेलीग्राम सिर्फ अपराधियों के लिए बना है, लेकिन इसकी कुछ सुविधाएँ ऐसी हैं जिनका गलत इस्तेमाल करना दूसरे प्लेटफॉर्म की तुलना में आसान माना जाता है।

यही वजह है कि ऑनलाइन ठगी करने वाले गिरोह, हैकर, फर्जी निवेश योजनाएँ चलाने वाले लोग और कई बार कट्टरपंथी संगठन भी इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते पाए गए हैं।

सबसे पहले बात करें पहचान छिपाने की। टेलीग्राम पर किसी से बातचीत करने के लिए हमेशा मोबाइल नंबर दिखाना जरूरी नहीं होता। यूजर सिर्फ अपने यूजरनेम के जरिए भी दूसरे लोगों से जुड़ सकता है।

इसका फायदा यह होता है कि आम लोग अपनी प्राइवेसी बनाए रख सकते हैं, लेकिन दूसरी तरफ साइबर अपराधी भी अपनी असली पहचान छिपाकर कई अलग-अलग अकाउंट बना लेते हैं।

अगर किसी कारण से एक अकाउंट बंद भी हो जाए तो वे कुछ ही मिनटों में दूसरा अकाउंट तैयार कर लेते हैं। इससे जाँच एजेंसियों के लिए असली व्यक्ति तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है।

टेलीग्राम की एक और खासियत सीक्रेट चैट और ऑटो डिलीट मैसेज हैं। इस फीचर में भेजे गए मैसेज तय समय के बाद अपने आप डिलीट हो जाते हैं। इसका फायदा उन लोगों को भी मिलता है जो अपनी निजी बातचीत सुरक्षित रखना चाहते हैं, लेकिन कई अपराधी इसी सुविधा का इस्तेमाल इसलिए करते हैं ताकि बातचीत का कोई स्थायी रिकॉर्ड न बचे।

जाँच एजेंसियों के लिए ऐसे मामलों में सबूत जुटाना काफी मुस्किल हो जाता है। इसके अलावा टेलीग्राम पर बड़े-बड़े चैनल और ग्रुप बनाना भी बेहद आसान है। यहाँ लाखों लोगों तक एक साथ जानकारी पहुँचाई जा सकती है।

कई रिपोर्टों में सामने आया है कि कुछ कट्टरपंथी संगठन और साइबर ठगी करने वाले गिरोह इसी सुविधा का इस्तेमाल अपने प्रचार या फर्जी योजनाओं को फैलाने के लिए करते हैं। अगर उनका एक चैनल बंद हो जाता है तो वे पहले से तैयार दूसरे चैनल पर अपने सभी सदस्यों को भेज देते हैं और उनका नेटवर्क लगभग बिना रुके चलता रहता है।

टेलीग्राम के सुपरग्रुप में दो लाख तक सदस्य जोड़े जा सकते हैं। इतनी बड़ी संख्या में लोगों तक एक साथ पहुँच बनाना किसी भी संगठन के लिए आसान हो जाता है। यही वजह है कि कई साइबर ठग हजारों लोगों को एक साथ जोड़कर फर्जी निवेश योजनाएँ, ऑनलाइन लोन, क्रिप्टोकरेंसी में जल्दी पैसा कमाने का लालच या दूसरी ठगी से जुड़ी जानकारी फैलाते हैं।

टेलीग्राम का सर्च सिस्टम भी अपराधियों के लिए मददगार माना जाता है। वे क्रिप्टोकरेंसी, फॉरेक्स ट्रेडिंग, ऑनलाइन जॉब्स, क्विक मनी जैसे शब्दों को खोजकर ऐसे लोगों तक पहुँच जाते हैं जो जल्दी पैसा कमाने के लालच में आ सकते हैं। इसके बाद उन्हें निजी ग्रुप या चैनल में जोड़कर तरह-तरह की योजनाओं में फंसाया जाता है।

एक और बड़ी वजह यह है कि टेलीग्राम पर किसी कंपनी जैसा नाम, लोगो और प्रोफाइल बनाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। कई ठग खुद को बैंक, सरकारी संस्था या किसी बड़ी कंपनी का प्रतिनिधि बताकर लोगों से संपर्क करते हैं। कई बार लोग उन्हें असली समझ लेते हैं और अपनी निजी जानकारी, बैंक डिटेल या पैसे उनके साथ साझा कर देते हैं।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि टेलीग्राम का कंटेंट मॉडरेशन दूसरे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की तुलना में कम सख्त माना जाता है। आरोप यह है कि कई बार अवैध चैनल, ठगी से जुड़े ग्रुप या आपत्तिजनक सामग्री लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनी रहती है।

हालाँकि टेलीग्राम इन आरोपों से इनकार करता है और कहता है कि वह लगातार आतंकवाद, हिंसा और गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़े कंटेंट पर कार्रवाई करता है। टेलीग्राम का इस्तेमाल करना भी बेहद आसान है। डार्क वेब की तरह यहाँ किसी विशेष तकनीकी जानकारी या अलग सॉफ्टवेयर की जरूरत नहीं पड़ती।

कोई भी व्यक्ति अपने मोबाइल में ऐप डाउनलोड करके कुछ ही मिनटों में इसका इस्तेमाल शुरू कर सकता है। इसी कारण नए लोग भी आसानी से ऐसे नेटवर्क तक पहुँच जाते हैं जिनका इस्तेमाल साइबर अपराधी करते हैं।

कई रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि टेलीग्राम का इस्तेमाल नए लोगों की भर्ती के लिए किया जाता है। शुरुआत में उन्हें वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन कमाई या घर बैठे पैसे कमाइए जैसे आकर्षक ऑफर दिए जाते हैं।

जब लोग इन ऑफरों में रुचि दिखाते हैं तो उन्हें निजी चैनलों में जोड़कर फर्जी निवेश, साइबर ठगी, मनी लॉन्ड्रिंग और दूसरे ऑनलाइन फ्रॉड के तरीके सिखाए जाते हैं। यही कारण है कि कई देशों की जांच एजेंसियाँ टेलीग्राम पर लगातार नजर बनाए रखती हैं।

टेलीग्राम बाकी मैसेजिंग ऐप्स से अलग कैसे है?

टेलीग्राम सिर्फ विवादों की वजह से लोकप्रिय नहीं हुआ है। इसकी कई ऐसी सुविधाएँ हैं जो इसे दूसरे मैसेजिंग ऐप्स से अलग बनाती हैं। इस प्लेटफॉर्म पर बड़ी-बड़ी फाइलें आसानी से भेजी जा सकती हैं, क्लाउड स्टोरेज की सुविधा मिलती है, एक ही अकाउंट को कई डिवाइस पर एक साथ इस्तेमाल किया जा सकता है और बड़े ग्रुप तथा अनलिमिटेड चैनल बनाए जा सकते हैं।

यूजरनेम के जरिए बातचीत, सीक्रेट चैट, ऑटो डिलीट मैसेज और तेज स्पीड जैसी सुविधाओं की वजह से भी करोड़ों लोग टेलीग्राम को पसंद करते हैं। यही फीचर्स आम यूजर्स के लिए सुविधाजनक हैं, लेकिन गलत हाथों में पड़ने पर इनका दुरुपयोग भी हो रहा है।

क्या टेलीग्राम पूरी तरह दोषी है?

इस पूरे विवाद का दूसरा पक्ष भी है। टेलीग्राम लगातार यह कहता आया है कि उसका मकसद लोगों की निजता और अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करना है। कंपनी का दावा है कि वह हर साल लाखों आपत्तिजनक पोस्ट, चैनल और आतंकवादी समूहों को हटाती है।

उसका यह भी कहना है कि केवल 2026 में ही आतंकवाद से जुड़े डेढ़ लाख से ज्यादा समुदायों पर कार्रवाई की गई है। दूसरी तरफ कई देशों की सरकारों और जाँच एजेंसियों का कहना है कि जब किसी प्लेटफॉर्म को किसी आपत्तिजनक या आतंकवादी सामग्री की जानकारी दी जाती है तो उसे तुरंत हटाया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि अगर ऐसी सामग्री लंबे समय तक ऑनलाइन रहती है तो उससे हिंसा और कट्टरपंथ को बढ़ावा मिल सकता है।

यही वजह है कि आज दुनिया भर में यह बहस चल रही है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यूजर की निजता ज्यादा महत्वपूर्ण है या समाज और देश की सुरक्षा। आने वाले समय में अदालतों के फैसले इस सवाल का जवाब काफी हद तक तय करेंगे।

राजेश खन्ना के घर को ‘भूतिया बंगला’ कहने पर बॉम्बे HC ने लगाई रोक, जानिए- क्यों ‘आशीर्वाद’ को कहा जाता है ‘अशुभ- शापित’

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मशहूर अभिनेता दिवंगत राजेश खन्ना के घर ‘आशीर्वाद’ को भुतिया, शापित, मनहूस या अशुभ कहने पर रोक लगा दी है। राजेश खन्ना के निधन के 14 साल बाद ये फैसला आया है। कोर्ट का कहना है कि ये मानहानि से जुड़ा मामला है और मकान मालिक के गरिमा से जीने के अधिकार का उल्लंघन करता है।

दरअसल ये अर्जी अब घर के मालिक बिजनेसमैन शशि किरण शेट्टी ने लगाई थी। उन्होंने कई मीडिया हाउस और यूट्यूब चैनलों पर इस घर को मनहूस, भुतिया कहने पर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। यह घर उन्होंने राजेश खन्ना के निधन के बाद उनकी बेटी ट्विंकल खन्ना और दामाद अक्षय कुमार से 90 करोड़ रुपए में खरीदी थी।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने ‘भूतिया बंगला’ कहने पर लगाई रोक

बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस आरिफ डॉक्टर ने सुनवाई करते हुए घर को लेकर कहे गए अपशब्द पर रोक लगा दी। ये घर मुंबई के बांद्रा इलाके के कार्टर रोड पर स्थित है। शेट्टी ने पुराने बंगले को गिरा कर नया ढाँचा खड़ा करवाया था, लेकिन नए घर का नाम भी आशीर्वाद ही रखा। हालाँकि कुछ मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया पर वीडियो में इसे शापित और भूतिया बताया गया।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वेबसाइट इंडियाडॉटकॉम ने हाल में ’19 रियल हॉन्टेड हाउसेस इन इंडिया दैट विल गिव यू ए कोल्ड स्वीट’ टाइटल से एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें आशीर्वाद बंगले को भी शामिल किया गया था। इससे परेशान होकर शेट्टी ने कोर्ट में अर्जी लगाई।

शेट्टी के वकील वीरेन्द्र सराफ ने अर्जी में माँग की कि मीडिया आउटलेट्स या यूट्यूब ऐसे सोशल मीडिया पर रोक लगाए, क्योंकि इससे उनकी गरिमा और निजता का उल्लंघन होता है। उन्होंने आपत्तिजनक वीडियो हटाने की माँग की।

अर्जी पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस आरिफ डॉक्टर ने कहा, “प्रथम दृष्टया ये मजबूत मामला बनता है। वादी की माँग उचित है। घर पर ऐसी टिप्पणी वादी के लिए अपमानजनक है, क्योंकि इससे ऐसा लगता है कि वादी एक भूतिया और शापित बंगले में रहता है। इसके अलावा ये वादी के शांति और गरिमा से रहने के अधिकार का भी उल्लंघन करता है।”

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मीडिया आउटलेट्स गलत और सनसनी फैलाने के लिए करते हैं। इससे वादी को नुकसान हुआ है। वादी ने अपना पक्ष सही तरीके से रखा है। ऐसे वक्तव्य पर रोक लगनी चाहिए। इस मामले की अगली सुनवाई 21 अगस्त 2026 को होगी। सुनवाई के दौरान मीडिया आउट्लेट्स और यूट्यूब के बचाव के लिए कोई वकील मौजूद नहीं था।

डिंपल ने दिया ‘आशीर्वाद’ नाम

राजेश खन्ना का बंगला ‘आशीर्वाद’ बॉलीवुड के सबसे चर्चित घरों में से एक रहा है। शुरुआत में इसकी चर्चा शानोशौकत के लिए होती थी। हर लग्जरी चीजें यहाँ होने का दावा किया जाता था। इसे खरीदने के बाद ताउम्र राजेश खन्ना यहाँ रहे।

डिंपल कपाड़िया से शादी उन्होंने इस घर से ही की थी। उनकी दोनों बिटिया यहाँ पैदा हुई और फिर आपसी विवाद की वजह से डिंपल इसे छोड़कर चली गई। राजेश खन्ना के अंतिम दिनों में उनकी देखभाल अनीता आडवाणी किया करती थी। उन्होंने राजेश खन्ना के निधन के बाद इस घर पर दावा किया और खन्ना परिवार से कानूनी लड़ाई लड़ी। इस दौरान भी ये घर सुर्खियों में रहा।

कोर्ट से घर का मालिकाना हक डिंपल की बेटियों को मिलने के बाद इसे परिवार ने बेच दिया। इस दौरान इस घर में कोई नहीं रहता था। यह जर्जर हो चुका था और इसे कई जगहों पर ‘भूतिया बंगला’ कहा गया। इस वजह से आशीर्वाद चर्चा में रहा। 2014 में बिजनेसमैन शेट्टी ने इसे खरीदा और ढाँचे को गिरा कर नए घर का निर्माण किया, लेकिन आशीर्वाद नाम नहीं बदला। एक बार फिर ये घर हाईकोर्ट में ‘भूतिया घर’ कहे जाने पर रोक लगाने की वजह से चर्चा में आ गया है।

राजेश खन्ना ने राजेन्द्र कुमार से लिया था ‘आशीर्वाद’

राजेन्द्र कुमार के घर खरीदने से पहले ये घर काफी जर्जर अवस्था में था। कोई खरीदार नहीं मिल रहा था। समुद्र के नजदीक होने की वजह से काफी सुनसान रहता था। तब कार्टर रोड के स्थानीय लोग इसे ‘भूत बंगला’ कहकर बुलाते थे। यह बात बाद में वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अली पीटर जॉन ने 2012 में विस्तार से लिखी। उन्होंने बताया कि बंगला वर्षों तक खाली पड़ा था, इसलिए आसपास के लोगों में इसके बारे में ‘भूतिया बंगला’ कह कर अफवाहें फैला दी थी। मीडिया में भी इसे ‘भूतिया बंगला’ कहा जाने लगा।

1960 के दशक में जब राजेन्द्र कुमार ने इस बंगले को 65000 रुपए ने खरीदा, तो इसकी हालत सुधरी। उन्होंने गृहप्रवेश के वक्त पूजा करवाई। वे सालों तक यहाँ रहे और इस दौरान कई हिट फिल्में दीं। उन्हें जुबली कुमार नाम दिया गया। बाद में नया घर बनाकर वे इस घर में शिफ्ट हो गए।

इसे राजेश खन्ना ने 3.5 लाख रुपए में खरीदा। वे घर का नाम ‘डिंपल’ रखना चाहते थे, लेकिन राजेन्द्र कुमार ने इस पर आपत्ति जताई। दरअसल राजेन्द्र कुमार ने अपने नए बंगले का नाम ‘डिंपल’ रख दिया था। इसके बाद राजेश खन्ना ने पत्नी डिंपल के कहने पर इस घर का नाम आशीर्वाद रख दिया। इस बंगले में ही राजेश खन्ना के सिनेमा का स्वर्णिम काल रहा। उन्होंने एक से बढ़ कर एक सुपर हिट फिल्में दी और देखते ही देखते सुपर स्टार बन गए। राजेश खन्ना अपने निधन तक यहाँ रहे।

राजेश खन्ना के करियर और निजी जीवन से घर को जोड़ा गया

हालाँकि लोगों ने उनके करियर के ढलान को घर से जोड़ दिया। लोगों ने यह कहना शुरू किया कि सुपरस्टार बनने के बाद उनका करियर इस घर में आने के बाद गिरा। निजी जीवन में परेशानियाँ आईं। पत्नी डिंपल कपाड़िया उन्हें छोड़कर चली गई और वे तन्हा रह गए। उनके जीवन में घटी घटनाओं को लोगों ने ‘भूतिया बंगले’ की कहानी से जोड़ दिया, हालाँकि इसका कोई प्रमाण नहीं है।

राजेश खन्ना को अंतिम वक्त में साथ रहने वाली अनीता आडवाणी ने घर पर दावा किया था। उनका कहना था कि वे लगभग 10–12 वर्षों तक राजेश खन्ना के साथ रहीं। उनकी बीमारी के दौरान उन्होंने उनकी देखभाल की। घर संभाला। उन्होंने यहाँ तक दावा किया कि वे करवा चौथ का व्रत रखती थीं और दोनों पति-पत्नी की तरह रहते थे। हालाँकि अनीता आडवाणी के दावे को खन्ना परिवार ने कभी नहीं माना। परिवार का कहना था कि अनीता केवल परिचित थीं और राजेश खन्ना की कानूनी पत्नी नहीं थीं। इसलिए बंगले या संपत्ति पर उनका कोई अधिकार नहीं है। घरेलू नौकरों ने भी मीडिया से कहा कि अनीता स्थाई तौर पर घर में नहीं रहती थी।

अनीता आडवाणी ने खन्ना परिवार को कानूनी नोटिस भेजा। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें बंगले से जबरन निकाल दिया गया।
अनीता ने संपत्ति में हिस्सा माँगते हुए कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया। बाद में यह भी कहा कि बंगले को बेचना नहीं चाहिए, बल्कि इसे राजेश खन्ना का संग्रहालय यानी म्यूजियम बनाया जाना चाहिए, क्योंकि वे ऐसा चाहते थे। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अनीता आडवाणी की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने अपने संबंध को वैवाहिक मान्यता देने की माँग की थी। कोर्ट ने उन्हें राजेश खन्ना की कानूनी पत्नी या उत्तराधिकारी नहीं माना।

इसके बाद खन्ना परिवार ने घर को बेच दिया। इसे तोड़कर फिर से मकान मालिक शेट्टी ने फिर से ‘आशीर्वाद’ बनाया। जुलाई 2026 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने वर्तमान मालिक की याचिका पर यह माना कि बिना आधार के बंगले को ‘भूतिया’ कहना उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाना है। अदालत ने ऐसे दावों पर रोक लगाने का निर्देश दिया।

क्या सरकार सच में CJP प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने वाले उपद्रवियों के खिलाफ दर्ज FIR वापस ले सकती है? जानिए कानून क्या कहता है

NEET पेपर लीक मामले को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का हालिया प्रदर्शन तब खत्म हुआ, जब केंद्र सरकार ने उनकी सभी माँगें मानने का आश्वासन दिया। इन माँगों में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग भी शामिल थी। प्रदर्शन ने सोमवार (20 जुलाई 2026) को गंभीर रूप ले लिया, जब CJP ने संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत के दौरान जंतर-मंतर से आगे बढ़कर संसद तक मार्च करने का फैसला किया। यह मार्च एक उच्च सुरक्षा क्षेत्र से होकर निकाला जा रहा था। उल्लेखनीय है कि प्रदर्शन की अनुमति केवल जंतर-मंतर तक ही दी गई थी, उससे आगे जाने की नहीं।

प्रदर्शनकारी 20 जुलाई तक जंतर-मंतर पर डटे रहे। इसी दिन संसद की ओर बिना अनुमति निकाले गए मार्च के दौरान पथराव और सुरक्षाकर्मियों के साथ झड़प की घटनाएँ हुईं। इसके बावजूद CJP अपनी माँगों पर अड़े रहे, जबकि ‘प्रदर्शनकारियों’ के हंगामे के चलते राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो गई।

क्या CJP और उसके ‘प्रदर्शनकारी’ कानून से ऊपर हैं?

CJP नेताओं की प्रमुख माँगों में एक यह भी थी कि सरकार प्रदर्शन के दौरान किसी भी प्रदर्शनकारी के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई न करे। इसमें वे लोग भी शामिल थे, जिन्होंने पुलिसकर्मियों पर हमला किया, हंगामा किया और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का काम किया।

स्पष्ट रूप से यह माँग उन लोगों को कानूनी कार्रवाई से बचाने की कोशिश थी, जिन्होंने हिंसा के जरिए सरकार पर दबाव बनाने में भूमिका निभाई। इस दौरान हालात ऐसे बने कि सुरक्षा बलों को बल प्रयोग करना पड़ा। वहीं, दिल्ली पुलिस की ओर से जंतर-मंतर और उसके आसपास मौजूद लोगों की जाँच में यह भी सामने आया कि भीड़ में शामिल कई लोगों के खिलाफ पहले से आपराधिक मामले दर्ज थे।

हैरानी की बात यह रही कि केंद्र सरकार ने इस माँग को भी स्वीकार कर लिया। सरकार के इस फैसले ने कानून का पालन करने वाले आम नागरिकों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या सरकार पर दबाव बनाकर असामाजिक तत्व अपनी माँगें मनवा सकते हैं? क्या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और हिंसा करने के आरोपितों को बिना कानूनी कार्ऱवाई के छोड़ दिया जा सकता है? कानूनी नजरिए से देखें तो क्या सरकार उन मामलों की जाँच और कानूनी प्रक्रिया को रोक सकती है, जिनमें कार्रवाई पहले ही शुरू हो चुकी है? क्या सरकार के पास दर्ज FIR वापस लेने का अधिकार है, खासकर उन लोगों के खिलाफ जिन पर कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप हैं? आइए, इन सवालों के जवाब कानून के प्रावधानों के आधार पर समझते हैं।

अपराध केवल व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि राज्य के खिलाफ भी माना जाता है

आपराधिक कानून में किसी अपराध को केवल एक व्यक्ति के खिलाफ किया गया गलत काम नहीं माना जाता, बल्कि इस पूरे समाज और राज्य के खिलाफ अपराध माना जाता है। यही कारण है कि जब कोई अपराध होता है, तो आरोपित के खिलाफ मुकदमा चलाने की जिम्मेदारी राज्य की होती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य पीड़ित के अधिकारों की रक्षा करना और समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। इसी सिद्धांत के तहत एक नियम यह भी है कि एक बार कानूनी प्रक्रिया शुरू हो जाए, तो उसे अदालत की अनुमति के बिना बीच में नहीं रोका जा सकता।

किसी अपराध के संबंध में FIR दर्ज होना भी कानूनी प्रक्रिया शुरू होने का एक महत्वपूर्ण चरण है। एक बार FIR दर्ज हो जाने के बाद उसे सरकार अपने स्तर पर न तो रद्द कर सकती है और न ही वापस ले सकती है। इसके लिए अदालत की मंजूरी जरूरी होती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी प्रभावशाली या ताकतवर आरोपित के दबाव में पीड़ित कानूनी कार्रवाई से पीछे हटने के लिए मजबूर न हो।

मौजूदा मामले में भी, भले ही सरकार ने हिंसा के आरोपों का सामना कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR वापस लेने का आश्वासन दिया हो, लेकिन वह ऐसा सीधे तौर पर नहीं कर सकती। हालाँकि, कानून में कुछ ऐसे प्रावधान जरूर हैं जिनके तहत FIR वापस लेने या आपराधिक कार्यवाही रोकने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। आइए, इन कानूनी प्रावधानों को समझते हैं।

अदालत के बाहर समझौते का प्रावधान

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ( BNSS), 2023 में कुछ आपराधिक मामलों को अदालत के बाहर आपसी समझौते से निपटाने का प्रावधान है। हालाँकि, यह सुविधा केवल कुछ चुनिंदा और अपेक्षाकृत कम गंभीर अपराधों के लिए ही उपलब्ध है। ऐसे अपराधों को कंपाउंडेबल (समझौतायोग्य) अपराध कहा जाता है।

BNS की धारा 359 में कंपाउंडेबल अपराध की सूची और उनसे जुड़े प्रावधान दिए गए हैं। साधारण मारपीट, धोखाधड़ी, घर में अनधिकृत प्रवेश, गलत तरीके से रास्ता रोकने के कुछ मामले और चोरी जैसे अपराध इस श्रेणी में आते हैं। वहीं, हत्या, दुष्कर्म, दंगा और डकैती जैसे गंभीर अपराध कंपाउंडेबल नहीं होते। इनमें से कुछ मामलों में पक्षकार बिना अदालत की अनुमति के समझौता कर सकते हैं, जबकि कुछ मामलों में अदालत की मंजूरी जरूरी नहीं होती है।

CJP के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के मामलों में सरकार इस कानूनी प्रावधान का सहारा नहीं ले सकती। इसकी वजह यह है कि सुरक्षाकर्मियों पर हमला, पथराव, पुलिस वाहनों और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने जैसे आरोप कंपाउंडेबल अपराधों की श्रेणी में नहीं आते। इसलिए ऐसे मामलों का निपटारा अदालत के बाहर समझौते के जरिए नहीं किया जा सकता।

FIR रद्द या वापस लेने की बात

अच्छी बात यह है कि एक बार FIR दर्ज हो जाने के बाद सरकार या कार्यपालिका (Executive) उसे अपनी मर्जी से वापस नहीं ले सकती। जैसे ही FIR दर्ज होती है, मामला अदालत के अधिकार में चला जाता है। इसके बाद सरकार पुलिस स्टेशन को यह आदेश नहीं दे सकती कि FIR वापस ले ली जाए या संबंधित अदालत/मजिस्ट्रेट से यह नहीं कह सकती कि उस FIR पर आगे कार्रवाई न की जाए। यह व्यवस्था इसलिए है ताकि पीड़ित व्यक्ति और कमजोर पक्ष पर किसी ताकतवर व्यक्ति या दबाव का असर न पड़े।

ऐसे में सवाल उठता है कि जब कानून सरकार को FIR वापस लेने का अधिकार ही नहीं देता, तो फिर सरकार यह वादा कैसे कर सकती है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR वापस ले ली जाएँगी?

दरअसल, इसका एक दूसरा कानूनी रास्ता होता है। पुलिस अपनी जाँच पूरी करने के बाद अगर उसे लगता है कि मामला आगे चलाने लायक नहीं है, तो वह अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है। इसके बाद अदालत उस रिपोर्ट पर फैसला करती है। इसी प्रक्रिया के जरिए आरोपित को राहत मिल सकती है, जैसे उसे बरी किया जा सकता है, आरोपों से मुक्त किया जा सकता है या मामला बंद किया जा सकता है।

क्लोजर रिपोर्ट

पुलिस अपनी जाँच पूरी होने के बाद BNSS की धारा 193 के तहत अदालत में क्लोजर रिपोर्ट या फाइनल रिपोर्ट दाखिल करती है। यह रिपोर्ट तब दाखिल की जाती है, जब पुलिस को पहली नजर में ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता जिससे यह साबित हो कि FIR में बताए गए अपराध को अंजाम दिया गया है। या फिर पुलिस आरोपित तक नहीं पहुँच पाती, या जाँच में पता चलता है कि शिकायत झूठी थी।

लेकिन सिर्फ क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर देने से मामला अपने आप बंद नहीं हो जाता। अंतिम फैसला अदालत का होता है। अदालत यह देखती है कि पुलिस की जाँच सही और पूरी है या नहीं।

अगर अदालत पुलिस की जाँच से संतुष्ट हो जाती है, तो वह क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर सकती है और मामला बंद कर सकती है। ऐसी स्थिति में FIR रिकॉर्ड में बनी रहती है, लेकिन उस पर आगे कोई कार्रवाई नहीं होती और केस बंद हो जाता है। वहीं, अगर अदालत को लगता है कि जाँच पूरी नहीं हुई है या पुलिस के निष्कर्ष सही नहीं है, तो वह मामले में दोबारा या आगे की जाँच कराने का आदेश दे सकती है।

मौजूदा मामले में सरकार के इशारे पर पुलिस हिंसक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने की कोशिश कर सकती है। लेकिन ऐसा करना आसान नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि पूरे देश ने इन प्रदर्शनों को हिंसक होते देखा था और कई घटनाएँ लोगों के मोबाइल कैमरों और सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्ड भी हुई हैं। ऐसे में पुलिस के लिए यह कहना मुश्किल हो सकता है कि कोई सबूत नहीं मिला। इसके अलावा, आखिर में मामला बंद होगा या नहीं, इसका फैसला पूरी तरह अदालत के विवेक पर निर्भर करेगा।

अभियोजन वापस लेना

FIR दर्ज होने के बाद आपराधिक मामले को रोकने का एक और कानूनी तरीका है अभियोजन वापस लेना। BNSS की धारा 360 के तहत सरकारी वकील (Public Prosecutor) अदालत से मुकदमा वापस लेने की अनुमति माँग सकता है। लेकिन यहाँ भी अंतिम फैसला अदालत ही करती है।

जब सरकारी वकील अदालत से ऐसी अनुमति माँगता है, तो उसे पहले यह बताना होता है कि उसे केंद्र सरकार से इस संबंध में मंजूरी मिली है। इसके बाद अदालत इस बात की जाँच करती है कि मुकदमा वापस लेने की माँग ईमानदारी से की गई है या नहीं। साथ ही अदालत यह भी देखती है कि यह फैसला न्याय के हित में है, किसी राजनीतिक दबाव में नहीं लिया गया है और किसी प्रभावशाली व्यक्ति को बचाने के लिए नहीं किया जा रहा है।

अगर अदालत को लगता है कि मुकदमा वापस लेने से न्याय का हित पूरा होगा, तभी वह इसकी अनुमति देती है।

लेकिन इस मामले में ऐसा करना आसान नहीं होगा। प्रदर्शन के दौरान हुई तोड़फोड़ और उसके बाद केंद्र सरकार की ओर से उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई न करने का बयान, दोनों ही बातें सार्वजनिक रूप से सामने आई थीं। ऐसे में सरकारी वकील के लिए अदालत को यह भरोसा दिलाना मुश्किल होगा कि मुकदमा वापस लेना न्याय के हित में है।

इसके अलावा, कानून में एक और महत्वपूर्ण रोक भी है। BNSS की धारा 360 के तहत सरकारी वकील उन मामलों में मुकदमा वापस लेने की अनुमति नहीं माँग सकता, जिनमें केंद्र सरकार की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया हो। यानी जिन FIR में यह दर्ज है कि प्रदर्शनकारियों ने सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया, उन्हें इस प्रावधान के तहत वापस नहीं लिया जा सकता।

FIR रद्द कराना

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पास यह विशेष अधिकार होता है कि वे जरूरत पड़ने पर किसी FIR को रद्द कर सकते हैं। यह अधिकार तब इस्तेमाल किया जाता है, तब अदालत को लगता है कि कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल हो रहा है या फिर न्याय सुनिश्चित करने के लिए ऐसा करना जरूरी है।

हालाँकि, अदालतें इस अधिकार का इस्तेमाल बहुत कम मामलों में करती हैं। ऐसा तभी होता है, जब सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट पूरी तरह संतुष्ट हो जाए कि FIR रद्द करना ही न्याय के हित में है और इससे मामले में पूरा न्याय हो सकेगा।

लेकिन मौजूदा मामले में ऐसा होता नहीं दिखता। जिन प्रदर्शनकारियों पर खुलेआम हिंसा और तोड़फोड़ करने के आरोप हैं, उनके खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करना न्याय के हित में नहीं माना जाएगा। इसलिए ऐसे मामलों में अदालत से FIR रद्द कराने की संभावना काफी कम रहती है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र जाँच पर दिया जोर

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सख्त रूख अपनाया। अदालत ने साफ कहा कि CJP के विरोध प्रदर्शन के दौरान जिसने भी कानून अपने हाथ में लिया है, उसे कानून का सामना करना होगा। कोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए पहले से दर्ज FIR की जाँच जारी रखने की अनुमति दी।

भारत के CJI सूर्यकांत ने कहा कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों, दोनों के खिलाफ लगाए गए आरोपों कि निष्पक्ष और स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों को यह निर्देश भी दिया, जहाँ इसी तरह के प्रदर्शन हुए थे, कि जिन प्रदर्शनकारियों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें रिहा किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख CJP नेतृत्व को पसंद नहीं आया। उनका मानना था कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा और तोड़फोड़ करने वाले लोगों को सरकार के बयान के आधार पर कानूनी कार्रवाई से बचाया जाए। लेकिन ऐसा करना न तो कानून के मुताबिक सही है और न ही नैतिक रूप से उचित माना जा सकता है।

कानून के शासन वाले किसी भी सभ्य समाज में यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि लोग आपसी समझौते या किसी राजनीतिक वादे के आधार पर कानून से बच निकलें। लोकतंत्र तभी मजबूत रहता है, जब कानून सबके लिए बराबर हो और कानून तोड़ने वाले हर व्यक्ति, चाहे वह प्रदर्शनकारी हो या आम नागरिक, अपने किए की जिम्मेदारी उठाए।

भारत का रुपया 6 साल में पहली बार हुआ ‘अंडरवैल्यूड’, इंटरनेशनल मार्केट में होगा फायदा: जानिए क्यों आती है ऐसी स्थिति, कैसे चीनी युआन को ₹ देगा टक्कर

आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि भारत का रुपया ने ओवरवैल्यूड नहीं बल्कि अंडरवैल्यूड स्थिति में आ चुका है। ‘बिजनेस लाइन’ के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि ये रुपए की कमजोरी नहीं बल्कि भू राजनीतिक तनाव, अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना और उभरते बाजारों में आई अस्थिरता की वजह से हुआ है।

रुपए को मापने का तरीका

आरबीआई के गवर्नर का कहना है कि भारतीय रुपया NEER और REER सूचकांकों के आधार पर अंडरवैल्यूड स्थिति में आ चुका है। दरअसल ये दोनों रुपए मापने के दो पैमाने हैं।

NEER यानी नॉमिनल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट, जो बगैर महँगाई की जोड़े दूसरे देशों की करेंसी के आधार पर रुपए के बाहरी वैल्यू को आँकता है। वहीं REER यानी रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट जब रुपए की वैल्यू बताता है तो व्यापारिक साझेदारों के बीच महँगाई के अंतर को भी जोड़ता है। अगर REER 100 से ऊपर है तो करेंसी ओवरवैल्यूड है, और 100 से नीचे है तो अंडरवैल्यूड है।

आरबीआई के गवर्नर आम तौर पर बाजार के अस्थिर होने पर रुपए की कीमत को लेकर बयान देने से बचते हैं। ब्लूमबर्ग ने आरबीआई के गवर्नर के बयान को ‘रेयर सार्वजनिक बयान’ कहा है।

रुपए के मूल्य में सबसे बड़ी गिरावट

रुपये में कमजोरी का कारण घरेलू अर्थव्यवस्था की कमजोरी नहीं है। इसके वैश्विक कारण हैं। भू-राजनीतिक तनाव, मजबूत डॉलर और वैश्विक अस्थिरता का इससे पता चलता है। आरबीआई व्यापार को कंट्रोल नहीं करता, बल्कि रुपए के अत्यधिक उतार-चढ़ाव को डॉलर की खरीद-बिक्री कर, मौद्रिक नीति के द्वारा या विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कर रोकता है।

भारतीय रुपया इस वित्त वर्ष यानी 2025-26 के दौरान पिछले 14 साल में सबसे ज्यादा गिरा है। कहा तो ये भी जा रहा है कि एशिया में सबसे ज्यादा भारत का रुपया गिरा है। यूएस ईरान के बीच जंग का असर दुनिया के तेल बाजार पर काफी पड़ा है। हॉर्मुज स्ट्रेट से आवाजाही प्रभावित होने पर दुनियाभर में तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि देखी गई। भारत तेल का सबसे बड़े आयातक देशों में एक है। इसलिए भारत का रुपया कमजोर हुआ। इसकी कीमत में करीब 11 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई। 1 डॉलर की कीमत 96 रुपए से ऊपर तक चला गया। इससे व्यापार घाटे में वृद्धि हुई।

क्या होता है रुपए का ओवरवैल्यूड और अंडरवैल्यूड होना

आम बोलचाल की भाषा में रुपए का ओवरवैल्यूड और अंडरवैल्यूड होने का मतलब है उसकी वास्तविक आर्थिक ताकत और बाजार में उसकी कीमत में अंतर होना। उदाहरण के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के हिसाब से 1 डॉलर की कीमत 80 रुपए हो, लेकिन वह 74 रुपए में मिल रहा हो, तो रुपए ओवरवैल्यूड मानी जाएगी।

इसी तरह अगर 1 डॉलर की कीमत 80 रुपए हो, लेकिन वह 84 रुपए में मिल रहा हो, तो रुपए अंडरवैल्यूड मानी जाएगी।

आरबीआई सिर्फ डॉलर के मुकाबले रुपए का क्या भाव है सिर्फ इस आधार पर रुपए की वैल्यू नहीं आँकता, बल्कि दुनिया के करीब 40 व्यापारिक देशों की करेंसी को सामने रख कर रुपए के वैल्यू को मापता है।

ओवरवैल्यूड होने से विदेशों में घूमना, पढ़ना-लिखना अपेक्षाकृत सस्ता हो जाता है। विदेश से आने वाले सामान जैसे मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, तेल और गैस सस्ते हो जाते हैं, महँगाई को भी कुछ हद तक कंट्रोल करना आसान हो जाता है। लेकिन निर्यात पर असर पड़ता है क्योंकि विदेश में सामान महँगा हो जाता है। इससे व्यापार घाटा बढ़ जाता है।

वहीं दूसरी ओर रुपए के अंडरवैल्यूड होने पर कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रोनिक सामान जो विदेशों से आते हैं, वे महँगी हो जाती है। पेट्रोल- डीजल के दाम बढ़ जाते हैं और महँगाई बढ़ती है। लेकिन इसका फायदा यह है कि निर्यात में बढ़ोतरी होती है और व्यापार घाटा को पाटने में मदद मिलती है। भारतीय सामान विदेशों में सस्ते हो जाते हैं। विदेशी निवेशकों के लिए भारत में संपत्ति या शेयर खरीदना सस्ता हो जाता है, जिससे निवेश बढ़ सकता है।

दोनों ही स्थितियों में ‘बहुत ज्यादा’ से बचने की कोशिश की जाती है। बहुत ज्यादा मजबूत रुपया भी अर्थव्यवस्था के लिए समस्या बन सकता है, क्योंकि इससे निर्यात प्रभावित हो सकता है। वहीं रुपए में नियंत्रित सीमा तक कमजोर हो, तो इससे निर्यात और घरेलू उद्योगों को फायदा मिल सकता है। लेकिन यदि गिरावट बहुत तेज हो जाए, तो आयात महँगा होने और महँगाई बढ़ने जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।

चीन के युआन से भी भारत का रुपया हुआ सस्ता

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ‘RBEER’ इंडेक्स के मुताबिक, नवंबर 2024 में 1 डॉलर की कीमत 84.4 रुपए थी, तब NEER सूचकांक 91.68 पर था। इसका मतलब यह था कि 2015-16 से लेकर अब तक भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों की करेंसी के मुकाबले रुपए में लगभग 8.3% की गिरावट आ चुकी थी। फिर भी चीनी युआन की वैल्यू भारतीय रुपए से अधिक थी।

लेकिन मई 2026 की बात करें, जब रुपये-डॉलर की विनिमय दर औसतन 95.5 थी। NEER न केवल रिकॉर्ड निचले स्तर 77.19 पर आ गया, बल्कि REER भी गिरकर 89.08 पर पहुँच गया। हालाँकि जून में दोनों में थोड़ी रिकवरी हुई है, फिर भी 91.26 का REER रुपये की विनिमय दर में 8.7% की महत्वपूर्ण कमजोरी को दर्शाता है।

जून 2026 आते आते रुपये का इंडेक्स गिरकर 90.15 पर आ गया है, जबकि युआन 92.24 पर है यानी पिछले 6 साल में पहली बार युआन की कीमत भारतीय रुपए से ज्यादा हो गई है।

इसका फायदा ये होगा कि चीनी वस्तुओं से भारतीय वस्तुएँ विदेशी बाजार में प्रतिस्पर्धा की स्थिति में आ गई हैं। उनकी कीमत कम होने पर विदेशी बाजार में भारतीय पैठ बढ़ेगी।

इतना ही नहीं भारतीय निर्यात को नई गति मिलेगी। भारत के टेक्सटाइल, जूते, दवाईयाँ, ऑटो पार्ट्स और दूसरे सामान चीन से सस्ते हो जाएँगे।

आयात महँगा होने की वजह से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और देश के अंदर सामान थोड़े सस्ते होंगे। कुल मिलाकर भारत के लिए फायदे की स्थिति बन रही है।

PM मोदी और सनातन के खिलाफ आग उगलने का ईनाम, स्पॉन्सर की गई चीन ट्रिप: जानिए अमेरिकी पत्रकार शिखा डालमिया के बारे में, जिनका रहा है भारत विरोधी इतिहास

हाल ही में सबस्टैक (Substack) पर प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि कुछ प्रमुख अमेरिकी पत्रकारों को चीन-यूनाइटेड स्टेट्स एक्सचेंज फाउंडेशन (CUSEF) की ओर से चीन की प्रायोजित यात्राओं पर भेजा गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन यात्राओं का मकसद अमेरिकी मीडिया में चीन के पक्ष में माहौल बनाना था।

यह रिपोर्ट नताली विंटर्स ने लिखी है। इसमें उन अमेरिकी पत्रकारों के नाम भी बताए गए हैं, जिन्होंने ये प्रायोजित यात्राएँ की थीं। इस सूची में भारतीय मूल की अमेरिकी पत्रकार, कॉलम लेखक और नीति विश्लेषक शिखा डालमिया का नाम भी शामिल है।

यह रिपोर्ट अमेरिका के फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA) के तहत दाखिल दस्तावेजों पर आधारित हैं। इन दस्तावेजों के मुताबिक, CUSEF ने वॉशिंगटन की कुछ लॉबिंग फर्मों को इस उद्देश्य से नियुक्त किया था कि अमेरिकी मीडिया में चीन के पक्ष में सकारात्मक खबरें और संदेश बढ़ाए जा सकें।

नताली विंटर्स के मुताबिक, FARA के दस्तावेजों में उन अमेरिकी पत्रकारों के नाम सीधे नहीं लिखे गए थे, जिन्हें चीन की ओर से प्रायोजित यात्राओं पर भेजा गया था। इन पत्रकारों की पहचान करने के लिए उन्होंने FARA के रिकॉर्ड का मिलान पुरानी यात्रा सूची, कार्यक्रमों के ब्रोशर और लॉबिंग से जुड़े दस्तावेजों से किया।

उन्होंने चीन एक्सचेंज कार्यक्रमों में शामिल लोगों की पुरानी सूची देखी, मीडिया से जुड़े आंतरिक दस्तावेजों की जाँच की और उन पत्रकारों के आर्टिकल भी पढ़े, जो उन्होंने चीन यात्रा के बाद लिखे थे। विंटर्स के मुताबिक, इन आर्टिकल में चीन को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक रुख दिखाई देता है।

इन आर्टिकल्स में शिखा डालमिया का एक आर्टिकल भी शामिल था, जिसकी हेडलाइन है- “China Bashing is for Losers“,यह लेख फोर्ब्स (Forbes) में प्रकाशित हुआ था। शिखा डालमिया ने यह लेख उसी साल लिखा था, जिस साल उन्होंने चीन की यात्रा की थी। इस आर्टिकल में उन्होंने कहा था कि उस समय चुनावी माहौल में चीन की आलोचना करना अमेरिका की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों के लिए एक तरह का ‘राजनीतिक चलन’ बन गया था।

Forbes का स्क्रीनशॉट

उन्होंने लिखा, “रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों ही चीन विरोधी रुख अपनाकर अपने ही नुकसान की नींव रख रहे हैं। चीन को लगातार निशाना बनाने के बजाय उन्हें उसके साथ व्यापार के फायदों पर बात करनी चाहिए। चीन को लेकर ज्यादा समझदारी वाला नजरिया अपनाने के पक्ष में सिर्फ मजबूत आर्थिक वजह ही नहीं, बल्कि मजबूत राजनीतिक वजह भी हैं।”

इससे पहले आर्टिकल में शिखा डालमिया ने विस्तार से यह तर्क दिया था कि चीन की लगातार आलोचना करना अमेरिकी नेताओं और देश, दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

कौन है शिखा डालमिया?

शिखा डालमिया भारतीय मूल की अमेरिकी पत्रकार, कॉलम लेखर और नीति विश्लेषक हैं। उनके लेख Reason, The Week, The New York Times, The Wall Street Journal, USA Today और Bloomberg Opinion जैसे प्रकाशनों में छप चुके हैं।

शिखा डालमिया अपने उन आर्टिकल्स के लिए भी जानी जाती हैं, जिनमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी और हिंदुत्व विचारधारा की आलोचना की है। उन्होंने कई आर्टिकल्स में यह भी दावा किया कि मोदी सरकार ने भारत के उदार लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर किया, धार्मिक बहुलता को नुकसान पहुँचाया और बहुसंख्यक राजनीति को बढ़ावा दिया।

फरवरी 2020 में, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर आए थे, तब शिखा डाल्मिया ने “While Trump Was Praising Modi for Religious Freedom, Modi-Supporting Hindus Slaughtered Muslims in the Streets” हेडलाइन के साथ एक आर्टिकल लिखा था।

उस आर्टिकल में उन्होंने दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों के बारे में लिखा और दंगों का अपना ही तोड़-मरोड़कर और लीपा-पोती किया हुआ वर्जन पेश किया। उन्होंने दावा किया कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों और ‘हिंदू उग्रवादियों’ के बीच झड़प हुई थी।

उस आर्टिकल में शिखा डालमिया ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐसी योजना बताया, जिसका उद्देश्य “भारत के 14 करोड़ मुस्लिमों में से बड़ी संख्या को नागरिकता के अधिकार से वंचित करना औऱ संभवत: उन्हें डिटेंशन कैंपों में भेजना” था।

Reason का स्क्रीनशॉट

डालमिया ने लिखा, “हिंदू उग्रवादियों ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में मुस्लिमों के घरों पर पेट्रोल बम फेंके, एक मस्जिद में आग लगा दी और उस पर हिंदू झंडा फहरा दिया। साथ ही मुस्लिमों की दुकानों में लूटपाट की।”

इसके अलावा डालमिया ने लिखा कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद “भारत में मुस्लिम विरोधी हिंसा एक दुखद लेकिन आम बात बन गई है।” उन्होंने यह भी आलोचना की कि तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत यात्रा के दौरान देश में कथित रूप से बिगड़ते मानवाधिकारों के मुद्दे पर मोदी सरकार की आलोचना नहीं की।

इससे एक महीने पहले, जनवरी 2020 में, उन्होंने “Indian Prime Minister Modi’s Lawless Reign of Terror” हेडलाइन से एक और आर्टिकल लिखा था। इसमें उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘गुजरात मॉडल’ को पूरे देश में लागू किया है।

आर्टिकल में डालमिया ने आरोप लगाया कि 2002 के गुजरात दंगों के दौरान इसी मॉडल के कारण “कुछ ही दिनों में 1,000 से अधिक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों, जिनमें ज्यादातर मुसलमान थे, की हत्या हुई।” गुजरात दंगों के लिए पीएम मोदी को दोषी ठहराना डालमिया की उस तथाकथित वामपंथी-उदारवादी लॉबी की एक अजीब विशेषता है, जिसका वह खुद हिस्सा हैं।

Reason का स्क्रीनशॉट

इसके बाद शिखा डालमिया ने जेएनयू (JNU) में हुई छात्र हिंसा को प्रधानमंत्री मोदी के ‘निजी उग्रवादियों’ की कार्रवाई बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के सदस्य कैंपस में हिंसा पर उतर आए और उन्होंने मुस्लिम छात्रों व अपने कमरों में डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर रखने वाले छात्रों को निशाना बनाया।

प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा ही नहीं, बल्कि शिखा डालमिया ने अपने कई आर्टिकल्स में हिंदुत्व विचारधारा की भी आलोचना की है। “Hinduism sheds its gentle image in the name of nationalism” हेडलाइन वाले एक आर्टिकल में डालमिया ने दावा किया कि ‘हिंदुत्व-हिंदू राष्ट्रवाद’ की वजह से भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर खतरा बढ़ रहा है।

The Times का स्क्रीनशॉट

इसके बाद शिखा डालमिया ने एक और दावा किया कि भारत के विभाजन के बाद से “हिंदू उग्रवादी” लगातार मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा करते रहे हैं। उन्होंने इस दावे को अपने आर्टिकल में तथ्य के तौर पर पेश किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति डालमिया की आलोचना 2014 में और तेज हो गई, जब मोदी भारी बहुमत से देश के प्रधानमंत्री चुने गए। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की अमेरिका यात्रा पर भी डालमिया ने निराशा जताई। डालमिया ने दावा किया कि यह यात्रा भारत और अमेरिका के रिश्तों को मजबूत करने के लिए नहीं थी, बल्कि उनके मुताबिक यह प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता हासिल करने, खुद की छवि को बढ़ाने और अपने अहंकार को संतुष्ट करने की कोशिश थी।

The Week का स्क्रीनशॉट

एक इंटरव्यू में, जिसमें उनके साथ वाम-उदारवादी विचारों वाले सिद्धार्थ वरदराजन भी शामिल थे, शिखा डालमिया ने सबसे पहले यह कहते हुए हैरानी जताई कि ‘ मोदी जैसे व्यक्ति’ भारत के प्रधानमंत्री कैसे बन गए।

इसके बाद उन्होंने अपनी राय रखते हुए दावा किया कि भारत की स्थिति पाकिस्तान जैसी हो गई है, जहाँ अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकार कम हो रहे हैं। डालमिया और सिद्धार्थ वरदराजन ने मिलकर प्रधानमंत्री मोदी के शासन में भारत में आए बदलावों की आलोचना की और कहा कि उनके अनुसार देश की स्थिति पहले से खराब हुई है।

प्रधानमंत्री मोदी और हिंदुत्व को लेकर शिखा डालमिया की लगातार आलोचनाओं को चीन की ओर से प्रायोजित यात्राओं से जुड़े खुलासे के संदर्भ में देखा गया है।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

स्लैंग्स, लाइक्स और एल्गोरिद्म की पीढ़ी: आखिर Gen Z को ऐसा किसने बनाया… परिवार, स्कूल या सोशल मीडिया?

Gen Z यानी स्क्रीन की दुनिया में पलती पीढ़ी जिसके लिए वीडियो, फ्रैंड चैटिंग, ओटीटी, कुछ खास तरह के रियलिटी शो, स्टेंडअप कॉमेडी लुभाते हैं। इसका असर यह है कि Gen Z अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल धड़ल्ले से करने लगे हैं। पेपर लीक मुद्दे पर जंतर मंतर पर हुए आंदोलन में भी यह दिखा। ये पीढ़ी आगे चल कर सांसद, विधायक, मंत्री भी बनेगी। क्या ऐसी भाषा ही ‘आम’ बन जाएगी।

पिछले कुछ वर्षों में तकनीक ने इंसानी व्यवहार को जिस तेजी से बदला है, शायद ही इतिहास में ऐसा पहले कभी हुआ हो। आज स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में लोग अपने परिवार, दोस्तों या पड़ोसियों की तुलना में मोबाइल, सोशल मीडिया और एआई चैटबॉट्स से अधिक संवाद कर रहे हैं।

यह बदलाव केवल संचार का नहीं, बल्कि समाज में पहचान, लोकप्रियता, आत्मसम्मान और सफलता की परिभाषा का भी है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह परिवर्तन विशेष रूप से Gen Z यानी लगभग 1997–2012 के बीच जन्मी पीढ़ी में सबसे अधिक दिखाई देता है।

इंसानों से ज्यादा मशीनों से संवाद

पहले बच्चे स्कूल से लौटकर परिवार, पड़ोस और दोस्तों के साथ समय बिताते थे। आज कई युवाओं के दिन की शुरुआत और अंत स्मार्टफोन से होता है। बातचीत सोशल मीडिया चैट, एआई चैटबॉट और ऑनलाइन गेमिंग पर हो रही है। हर Gen Z के साथ ऐसा नहीं है कि उनके साथ घर पर बात करने वाले परिजन मौजूद नहीं है। बल्कि परिजनों से बात न कर, घर के किसी कोने में अपने स्मार्ट फोन या टैब, लैपटॉप के साथ ये बिजी हैं।

घर में कौन आया, कौन गया या किसी अहम बातों से इन्हें मतलब नहीं। बस दोस्त, चैटिंग और ऑनलाइन गेम ही इनकी दुनिया है। आज के भागदौड़ भरी दुनिया में एकल फेमिली में माता पिता जॉब कर रहे होते हैं तो Gen Z अकेले भी पड़ जाते हैं। अकेलापन होने पर भी इंसान के बजाय मशीन से बात करना आसान लगने लगता है। कोई हो या न हो, एआई हमेशा उपलब्ध है, इसलिए कई युवा उससे भावनात्मक बातचीत भी करने लगे हैं।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इससे तत्काल राहत मिल सकती है, लेकिन यदि वास्तविक सामाजिक रिश्ते कमजोर पड़ने लगें तो लंबे समय में भावनात्मक विकास प्रभावित होता है।

क्या एक बार फिर गुरुकुल की जरूरत बच्चों को है

प्राचीन काल में बच्चों को शुरुआती लालन-पालन के बाद शिक्षा-दीक्षा के लिए गुरु के पास भेज दिया जाता था। यहाँ वे नैतिक मूल्यों से लेकर तमाम तरह की शिक्षा ग्रहण करते थे। हमारे रामायण महाभारत काल में भी गुरुकुल की महत्ता बताई गई है।

कौरव और पांडव के गुरु द्रोणाचार्य थे, जिनके सबसे प्रिय शिष्य अर्जुन हुए, क्योंकि उन्होंने गुरु के ज्ञान को सबसे ज्यादा मेहनत कर अमली जामा पहनाया। वे सबसे अच्छे तीरंदाज बने। वैसे ही उनके बेटे अभिमन्यु के गुरु स्वयं श्रीकृष्ण थे। उन्होंने काफी कम उम्र में ही अपनी वीरता का लोहा मनवाया।

आगे के दौर में संयुक्त परिवार में बच्चों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा मिलती थी। उस पर न सिर्फ माता-पिता बल्कि पूरे परिवार और समाज की नजर होती थी। धीरे-धीरे ये दौर भी पीछे छूट गया और अब एकल फैमिली में घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी भी अहम है। समाज का रोल बदल गया है।

अब कोई किसी बच्चे को प्रोत्साहित नहीं करता और न ही गलत करने पर डाँटता है। हर घर खुद में सिमट कर रह गए हैं। बच्चों में स्मार्ट फोन और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की आदत खुद ब खुद नहीं पड़ी है। बच्चों को पेरेंट्स ने ही दिया है।

कई बार अपने काम में बिजी पेरेंट्स छोटे से बच्चे को मोबाइल में राइम्स सुनने के लिए दे देते हैं। धीरे धीरे बच्चा राइम्स से छोटे मोटे गेम्स खेलने लगता है और फिर मोबाइल को छोड़ना नहीं चाहता। ये लत ऐसी लगती है कि स्कूल कॉलेज तक बच्चा ऑनलाइन और ऑफलाइन वीडियो गेम, चैटिंग, ओटीटी तक पहुँच जाता है।

क्लास 11 में पढ़ने वाले बच्चे आरव की माँ मोनिका बानी (बदला हुआ नाम) का कहना है कि उन्होंने थक हार कर बच्चे को अब बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया है। उनका बच्चा पढ़ने में काफी अच्छा रहा है। वह फुटबॉल भी काफी अच्छा खेलता है, लेकिन जब से वीडियो गेम की आदत लगी, उसका रिजल्ट खराब होने लगा। वह रात-रात भर मोबाइल में लगा रहता था। वह काफी गुस्सैल हो गया था। उसकी भाषा खराब हो गई थी।

अब ऐसे बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया है, जहाँ मोबाइल बच्चों के लिए बैन है। उनका मानना है कि बच्चों के लिए फिर से गुरुकुल की आवश्यकता है। आज के दौर में बच्चों को संभालना काफी मुश्किल है क्योंकि इंटरनेट उनकी रेंज में है और मोबाइल का अच्छा और बुरा दोनों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

शिक्षा का बाजारीकरण

स्कूल ही बच्चों की पर्सनालिटी निर्माण का आधार होते हैं। लेकिन आज सरकारी स्कूलों का स्तर निम्नतम हो गया है। प्राइवेट स्कूल पैसे कमाने का धँधा बन गए हैं। स्कूलों की फीस देना निम्न और मध्यम वर्ग की जेब पर भारी है। आँकड़े बताते हैं कि माध्यमिक स्तर (9वीं और 10वीं कक्षा) पर स्कूल छोड़ने की दर करीब 11.5% तक पहुँच जाती है।

शिक्षा मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक, 14 से 18 वर्ष की आयु के 2 करोड़ से अधिक बच्चे स्कूल से बाहर हैं और कक्षा 1 में प्रवेश लेने वाले 100 बच्चों में से केवल 62 बच्चे ही कक्षा 12 तक पहुँच पाते हैं। ऐसे में ये Gen Z कहाँ जाएँगे और क्या करेंगे। जाहिर है इनकी भाषा भी भद्दी होती है और ये भीड़ का हिस्सा बन कर रह जाते हैं।

इनके अलावा जो सरकारी स्कूलों का हाल है, वहाँ पढ़ने वाले बच्चों के स्तर को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है। न तो शिक्षक को बच्चों से मतलब है और न ही बच्चों को पढ़ने से। कोई पढ़ाई का माहौल नहीं और न ही खेलकूद की सुविधा। ऐसे में जो यहाँ से निकलते हैं उनमें विरले ही जीवन में सफलता हासिल कर पाते हैं।

प्राइवेट स्कूलों का हाल ये है कि ये मात्र कमाई का अड्डा बन गए हैं। कुछ जाने माने स्कूलों को छोड़ दे तो बाकी स्कूलों में शिक्षकों का स्तर काफी कम है। दरअसल उन्हें वेतन के नाम पर न्यूनतम पैसे दिए जाते हैं। जब टीचर अपने दाल-चावल की हिसाब लगाता रहेगा, तो पढ़ाएगा क्या। उसका ध्यान बच्चों को पढ़ाने पर कैसे टिकी रहेगी। नतीजा स्कूलों का गिरता स्तर। इतना ही नहीं स्कूलों में अब जीवन मूल्यों को पढ़ाया नहीं जाता, सिर्फ ‘रोबॉटिक बच्चे’ बनाए जा रहे हैं। इन्हें सामाजिक मूल्यों की परवाह नहीं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर नवीन सिंह का मानना है कि वैल्यू सिस्टम में गिरावट का दौर है ये। पहले विरोध प्रदर्शन के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सकारात्मक रुख देखने को मिलता था। भूख हड़ताल, अनशन, बैनर और पोस्टर में माँगें होती थी। कोई गाली गलौज नहीं होता था।

पर्सनल अटैक की भी सीमाएँ थी, लेकिन अब वैल्यू सिस्टम दरकता हुआ दिख रहा है। दिल्ली के जंतर मंतर पर हुआ छात्रों के धरना प्रदर्शन में रचनात्मकता के नाम पर भद्दी भद्दी गालियाँ और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल इंटरटेनंमेंट और हताशा दोनों का मिक्चर था। यहाँ तक कि सोशल अवेयनेंस की भी कमी थी।

उनका कहना है कि छात्रों ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को मुख्य मुद्दा बनाया, लेकिन कहीं भी शिक्षा व्यवस्था में सुधार की बात नहीं की। कहीं भी शिक्षा के बाजारीकरण पर कोई वक्तव्य नहीं दिया। शिक्षा के निजीकरण और कोचिंग संस्थानों पर कोई बात नहीं कही। नीट पेपर लीक 2026 में भी आरोपित केमिस्ट्री का टीचर कोचिंग संस्थान ही चला रहा था। अपने कोचिंग के बच्चों को उसने पेपर सॉल्व करवाए थे।

अब सवाल उठता है कि आखिर स्कूलों में पढ़ने के बावजूद बच्चों को कोचिंग क्यों जाना पड़ता है। क्यों परीक्षा पास करने के कोचिंग संस्थानों में सिखाए जा रहे टिप्स बच्चों के लिए जरूरी हैं? स्कूलों की पढ़ाई का स्तर इतना निम्न क्यों है, इस पर छात्र नेताओं का ध्यान क्यों नहीं था। दरअसल ये जमीन की समस्याओं से पैदा हुआ जेन जी आंदोलन नहीं था। अमेरिका में बैठे अभिजीत दिपके कॉकरोच जनता पार्टी बनाते हैं और सोशल मीडिया पर शिक्षा मंत्री के नीट पेपर लीक पर इस्तीफा माँगते हैं। यह आंदोलन बस इतने तक ही सीमित रहा।

मेहनती और फोकस Gen Z की भी कमी नहीं

इसका मतलब ये हरगिज नहीं है कि सभी Gen Z अपना वक्त बर्बाद कर रहे हैं। कम उम्र में बड़ी सफलता पाना भी उनका लक्ष्य है। यही वजह है कि हर परीक्षा में इतनी ज्यादा प्रतियोगिता है। NEET की ही बात कर लें, तो हर साल सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन का कट ऑफ हाई होता जा रहा है। बच्चे जी जान से सालों तैयारी करते हैं। उनका हर मिनट का हिसाब होता है। यानी Gen Z अगर ठान लें, तो आसमान में भी सुराख कर दें।

हाल में जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान भी उन्होंने इसे साबित किया है। लेकिन आंदोलन की सफलता के बाद उनकी पार्टी पर भी सवाल उठे हैं। क्या NEET परीक्षा को लेकर आत्महत्या करने वाले परीक्षार्थियों के प्रति ‘प्रेम’ सिर्फ उनकी माँग का एक हिस्सा भर था, जिसे पूरी होते ही ये पार्टियों में बिजी हो गए।

नेपाल में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़ते हुए सत्ता को उखाड़ फेंका। हालाँकि इनके तरीके पर सवाल हो सकता है। हिंसा और आगजनी करना और अराजकता फैलाने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती, लेकिन इनकी सामाजिक मर्यादा की परिभाषा ही अलग है। गालियों में बातें करना, मीम्स और दूसरे तरीके इन्हें आते हैं। ये इसे सामान्य मानते हैं।

आज ‘वायरल’ होना कई युवाओं के लिए ‘सफल’ होने का पर्याय बन गया है। इसका प्रभाव यह है कि कई बार वास्तविक उपलब्धियों की तुलना में डिजिटल लोकप्रियता अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देने लगती है। पहले समाज सर्टिफिकेट देता था, अब एल्गोरिद्म। एक समय था जब किसी व्यक्ति की पहचान उसके शिक्षक, पड़ोसी, गाँव या समाज तय करते थे।

आज यह भूमिका काफी हद तक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के एल्गोरिद्म निभा रहे हैं। वीडियो वायरल हुआ या ज्यादा व्यू मिले तो आप सफल, वरना असफल। एक तरह से कहा जाए, तो डिजिटल पहचान और वास्तविक व्यक्तित्व की जंग छिड़ जाती है। वास्तविकता से अलग हट कर डिजिटल व्यक्तित्व उसे दूसरी ही दुनिया में ले जाते हैं। जहाँ खुद को वह जैसा चाहता है, फटाफट बना लेता है।

मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर

यह मानसिकता युवाओं के आत्मविश्वास को भी प्रभावित करती है। सोशल मीडिया और एआई से उनका भावनात्मक जुड़ाव समाज को एक अलग दिशा की ओर ले जा रहा है। स्क्रीन टाइम ज्यादा होने से मानसिक और शारीरिक असर भी पड़ रहा है।

गाजियाबाद के मशहूर ऑर्थोपेडिक डॉक्टर आशुतोष झा के मुताबिक, स्क्रीन टाइम अधिक होने से उनके मानसिक विकास पर असर पडता है। जल्दी थकावट होती है और जिस वजह से स्क्रीन टाइम लंबा चला है उस पर उनका दिमाग सोचता रहता है। इससे बाकी चीजें पीछे छूट जाती हैं। शरीर पर भी स्क्रीम टाइम पर बुरा असर पड़ता है।

आम तौर पर मोबाइल देखते वक्त आप नीचे देखते हैं। आँख के बराबर में मोबाइल नहीं होता। इससे गर्दन को छुकने की आदत पड़ जाती है। धीरे धीरे शरीर का पॉस्चर खराब हो जाता है। रीढ़ की हड्डियाँ टेढ़ी होने लगती है। क्योंकि जेन जी शारीरिक विकास के दौर से गुजर रहे होते हैं। ऐसे में शारीरिक बनावट पर भी ये असर डालता है।

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि Gen Z भी समाज का हिस्सा हैं। समाज में होने वाली गिरावट का असर उन पर भी पड़ा है। लेकिन ये उम्र कुछ ठानने और करने की है। वह सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी। Gen Z न तो केवल ‘मोबाइल में खोई हुई पीढ़ी’ है और न ही ‘सबसे प्रतिभाशाली पीढ़ी’। यह ऐसी पीढ़ी है जो अभूतपूर्व डिजिटल अवसरों और नई मनोवैज्ञानिक चुनौतियों—दोनों के बीच बड़ी हुई है।

लोकप्रियता का पैमाना अब समाज से अधिक एल्गोरिद्म तय कर रहे हैं, और वास्तविक पहचान कई बार डिजिटल पहचान से प्रतिस्पर्धा कर रही है, इसलिए भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती तकनीक को छोड़ना नहीं, बल्कि उसके साथ स्वस्थ संतुलन बनाना है। परिवार, स्कूल, समाज, नीति-निर्माता और तकनीकी कंपनियाँ यदि मिलकर डिजिटल साक्षरता, आलोचनात्मक सोच और वास्तविक मानवीय संवाद को बढ़ावा दें, तो यही पीढ़ी भारत के लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखती है।

केवल 90 दिनों में… ₹36,877 करोड़ की परियोजनाएँ, 43 जिलों का तूफानी दौरा और 1.77 लाख बूथों पर तैयारी: जानिए 2027 की हैट्रिक के लिए कैसे मैदान सजा रहे हैं CM योगी

उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनाव को अभी थोड़ा वक्त बाकी है, लेकिन सूबे की राजनीति में सरगर्मी अभी से अपने चरम पर है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। राजनीति की इस बिसात पर एक तरफ मुख्यमंत्री खुद ताबड़तोड़ दौरे कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पार्टी का मजबूत संगठन हर एक बूथ तक अपनी गहरी पैठ बना रहा है।

अगर पिछले कुछ महीनों के आँकड़ों पर नजर डालें, तो साफ पता चलता है कि सरकार ने उत्तर प्रदेश की तस्वीर बदलने के लिए खजाने का मुँह खोल दिया है। विकास के इन पहियों और संगठन की ताकत के आगे विपक्ष फिलहाल केवल बयानबाजी में ही उलझा नजर आ रहा है।

मुख्यमंत्री के तूफानी दौरे और ताबड़तोड़ रैलियाँ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले कुछ महीनों के दौरान राज्य के अलग-अलग जिलों का लगातार और तूफानी दौरा किया है। इसमें कुल 43 जिले शामिल हैं। मुख्यमंत्री ने मई 2026 में गोरखपुर, प्रयागराज, बिजनौर, वाराणसी, देवरिया, महाराजगंज, मऊ और सहारनपुर का दौरा किया। इसके अलावा, जून में हाथरस, आजमगढ़, अलीगढ़, बलरामपुर, गौतम बुद्ध नगर, पीलीभीत, अयोध्या, देवरिया, गोंडा, फिरोजाबाद, कुशीनगर, महोबा, संत कबीर नगर, उन्नाव, झांसी, हमीरपुर, ललितपुर, वाराणसी, मुरादाबाद और गाजियाबाद का दौरा किया।

बात करें जुलाई की तो मुख्यमंत्री ने वाराणसी, बांदा, चित्रकूट, मैनपुरी, अमरोहा, बहराइच, बाराबंकी, बिजनौर, बुलंदशहर, इटावा, कुशीनगर, शामली, प्रतापगढ़, अयोध्या, सुल्तानपुर, बस्ती, आगरा, फतेहपुर, संभल, प्रयागराज, गाजियाबाद और श्रावस्ती का दौरा करने करोड़ों की सौगात और विकास परियोजनाओं का शिलान्यास किया।

इन तमाम जनसभाओं और दौरों के दौरान सिर्फ भाषण ही नहीं दिए गए, बल्कि जनता को सीधे तौर पर लाभ भी पहुँचाया गया। स्थानीय कार्यक्रमों में जरूरतमंदों को सरकारी योजनाओं के तहत चेक, घरों की चाबियाँ, लैपटॉप, आयुष्मान कार्ड और तमाम तरह के प्रमाण पत्र बाँटे गए। इन मंचों से मुख्यमंत्री ने हमेशा से कानून-व्यवस्था की तारीफ करते हुए एक बहुत बड़ा और लोकप्रिय नारा दिया- ‘नो कर्फ्यू, नो दंगा, यूपी में अब सब चंगा।’

हजारों करोड़ की विकास परियोजनाओं की ऐतिहासिक सौगात

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इन दौरों का सबसे बड़ा उद्देश्य उत्तर प्रदेश के हर कोने तक विकास की रोशनी पहुँचाना रहा है। पिछले कुछ महीनों में जितने भी जिलों का दौरा किया गया, वहाँ हजारों करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया गया। अगर इन सभी बड़ी परियोजनाओं की लागत को जोड़ा जाए, तो यह आँकड़ा लगभग 36,877 करोड़ रुपए के आसपास बैठता है।

इसमें गौतमबुद्धनगर में अकेले 6,750 करोड़ रुपए के भारी-भरकम निवेश वाली इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण परियोजनाओं को शामिल कर लिया जाए, तो कुल सौगात और निवेश का यह आँकड़ा 19,200 करोड़ रुपए से भी ज्यादा हो जाता है। इन पैसों से राज्य में शानदार सड़कें, आधुनिक अस्पताल, बेहतरीन कनेक्टिविटी, सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट और युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते तैयार हो रहे हैं। इसके अलावा, शिक्षकों के लिए करोड़ों का बीमा, होमगार्ड्स के लिए मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं और स्टार्टअप फंड जैसे बड़े कदम उठाकर सरकार ने यह साबित कर दिया है कि उसका फोकस समाज के हर वर्ग के उत्थान पर है।

सुरक्षा का मजबूत माहौल

जनसभाओं के दौरान मुख्यमंत्री योगी विपक्षी दलों, खास तौर पर समाजवादी पार्टी और कॉन्ग्रेस पर पूरी तरह आक्रामक नजर आए। उन्होंने पुरानी सरकारों के दौर की याद दिलाते हुए जनता को बताया कि कैसे पहले गरीबों के हक पर डाका डाला जाता था और त्योहारों के समय दंगे कराए जाते थे। मुख्यमंत्री ने बड़े साफ शब्दों में कहा कि आज का उत्तर प्रदेश माफियाओं से मुक्त है और यहाँ कानून का राज है।

उन्होंने युवाओं के भविष्य, किसानों की खुशहाली और महिलाओं की सुरक्षा को अपनी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया। विपक्ष के पास आज जनता को गिनाने के लिए कोई ठोस काम नहीं बचा है, इसलिए वे केवल झूठे नैरेटिव गढ़ने में लगे हैं। वहीं दूसरी ओर, योगी सरकार ने अपने विकास कार्यों और भ्रष्टाचार मुक्त शासन के दम पर आम जनता के दिलों में एक अटूट विश्वास पैदा कर दिया है।

भाजपा संगठन की ताकत: बूथ स्तर तक सक्रियता का मेगा प्लान

सरकार के विकास कार्यों के साथ-साथ पार्टी का संगठन भी 2027 के चुनाव में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासित और मजबूत संगठन है। इसी रणनीति के तहत पार्टी ने उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर एक साथ ऐतिहासिक बूथ सम्मेलनों का आयोजन किया था। इस मेगा अभियान के जरिए राज्य के 1,77,516 मतदान केंद्रों को सीधे तौर पर कवर किया गया, जो अब तक का सबसे बड़ा बूथ-स्तरीय संगठनात्मक अभियान माना जा रहा है।

इस अभियान की कमान खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और प्रदेश के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने संभाली थी। पार्टी लगातार अपने बूथ अध्यक्षों, शक्ति केंद्र प्रमुखों और मंडल स्तर के पदाधिकारियों को ट्रेनिंग, संवाद और समीक्षा बैठकों के जरिए अपडेट रख रही है। हर बूथ पर एक ऐसा मजबूत कार्यकर्ता तंत्र तैयार किया जा रहा है जो घर-घर जाकर सरकार की योजनाओं की जानकारी दे सके और नए मतदाताओं को पार्टी के साथ जोड़ सके।

कमजोर सीटों पर विशेष फोकस और मजबूत डेटाबेस

पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति को धार देते हुए राज्य की सभी 403 सीटों को चार अलग-अलग श्रेणियों में बाँटा है। इनमें से उन लगभग 61 सीटों पर विशेष नजर रखी जा रही है जहाँ पिछले कुछ चुनावों में पार्टी को सफलता नहीं मिल पाई थी। इन सभी सीटों पर नए सिरे से बूथ मैनेजमेंट तैयार किया जा रहा है, स्थानीय जातीय समीकरणों का बारीकी से अध्ययन हो रहा है और संभावित उम्मीदवारों का सर्वे कराया जा रहा है।

इसके अलावा, भाजपा अपने करीब 2.5 करोड़ प्राथमिक सदस्यों का एक बहुत ही सटीक और सत्यापित डेटाबेस तैयार कर रही है। प्रदेश स्तर से लेकर बूथ स्तर तक लगातार रिपोर्ट मँगाई जा रही है। वृक्षारोपण अभियानों, डिजिटल ट्रेनिंग कैंपों और कारगिल विजय दिवस जैसे आयोजनों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को लगातार मैदान में सक्रिय रखा जा रहा है ताकि चुनावी मशीनरी में कभी भी सुस्ती न आने पाए।

क्या है 2027 के चुनाव की पूरी तस्वीर?

उत्तर प्रदेश का यह राजनीतिक परिदृश्य इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि भारतीय जनता पार्टी साल 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर बेहद गंभीर है और वह किसी भी मोर्चे पर ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार जिलों के चक्कर काटकर विकास कार्यों की झड़ी लगा रहे हैं और जनता के बीच सीधा संवाद स्थापित कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पार्टी का अनुशासित संगठन बूथ स्तर पर अपनी पकड़ को और अधिक मजबूत कर रहा है।

विपक्ष के खेमे में आज भी आपसी बिखराव और मजबूत मुद्दों की भारी कमी साफ दिखाई देती है, जबकि NDA सरकार ने बुनियादी ढांचे, कानून-व्यवस्था, धार्मिक पर्यटन और महिला-युवा-शिक्षक कल्याणकारी योजनाओं के जरिए अपनी जमीन बेहद मजबूत कर ली है। हालाँकि महँगाई या स्थानीय स्तर की कुछ छोटी-मोटी समस्याओं जैसे मुद्दे विपक्ष उठाता जरूर है, लेकिन जिस तरह से भाजपा ने समय से पहले अपनी पूरी संगठनात्मक ताकत झोंक दी है और ताबड़तोड़ विकास परियोजनाओं को जमीन पर उतार दिया है, उससे यह साफ हो जाता है कि 2027 की यह राजनीतिक लड़ाई बेहद रोमांचक होगी। सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए भाजपा ने अपनी पूरी ताकत लगा दी है और अब देखना यह होगा कि जनता इस दमदार विकास और सुशासन के मॉडल पर कितनी बड़ी मुहर लगाती है।

कौन हैं प्रो कामकोटी? जिन्हें प्रियंका गाँधी ने कहा ‘गोमूत्र एक्सपर्ट’: दिग्गज वैज्ञानिक, स्वदेशी ‘शक्ति’ प्रोसेसर के जनक और NSAB के सदस्य, जानिए उनके बारे में सब कुछ

देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शामिल आईआईटी मद्रास (IIT Madras) के डायरेक्टर प्रोफेसर वी. कामकोटि इन दिनों अचानक सुर्खियों में आ गए हैं। वजह उनका कोई नया वैज्ञानिक शोध या तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक तीखा राजनीतिक विवाद है। कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी द्वारा प्रोफेसर कामकोटि को ‘गौमूत्र एक्सपर्ट’ (Gaumutra Expert) कहे जाने के बाद से पूरे देश में शैक्षणिक और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है। दरअसल, पीएम मोदी ने परीक्षा में सुधार के लिए एक हाई पॉवर्ड कमेटी बनाने का ऐलान किया, जिसकी कमान उन्होंने नंदन नीलकेणि को सौंपी। इस कमेटी में प्रोफेसर कामकोटि का भी नाम है।

इसी बात को लेकर लोकसभा में कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने तंज कसा था। उन्होंने कमेटी में शामिल प्रोफेसर कामकोटि को गौमूत्र विशेषज्ञ कह कर उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश की। एक तरफ जहाँ कॉन्ग्रेस की वरिष्ठ नेता के इस बयान को लेकर सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर काफी तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं, वहीं दूसरी तरफ लोग यह सवाल भी पूछ रहे हैं कि आखिर प्रोफेसर कामकोटि हैं कौन? वे देश की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति में क्या भूमिका निभाते रहे हैं और उनके पास क्या-क्या डिग्रियाँ व अनुभव हैं?

कौन हैं प्रोफेसर वी. कामकोटि?

प्रोफेसर वी. कामकोटि का पूरा नाम वेझिनाथन कामकोटि है। वे भारत के अग्रणी और सबसे सम्मानित कंप्यूटर वैज्ञानिकों में से एक गिने जाते हैं। वर्तमान में वे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (IIT Madras) के डायरेक्टर (Director) के पद पर कार्यरत हैं। जनवरी 2022 में उन्होंने आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर के रूप में कमान संभाली थी।

आईआईटी मद्रास देश का वह संस्थान है जो शिक्षा मंत्रालय की एनआईआरएफ (NIRF) रैंकिंग में लगातार कई सालों से भारत का नंबर वन इंजीनियरिंग और ओवरऑल शैक्षणिक संस्थान बना हुआ है। ऐसे विश्वस्तरीय संस्थान का नेतृत्व करना अपने आप में यह साबित करता है कि प्रोफेसर कामकोटि की क्षमताएँ और उनका अनुभव कितना ऊँचा है।

वे न केवल कंप्यूटर साइंस के विद्वान हैं, बल्कि भारत सरकार की कई महत्वपूर्ण नीतियों, राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतियों और डिजिटल पहलों में सलाहकार के रूप में भी जुड़े रहे हैं।

शैक्षणिक योग्यता और आईआईटी मद्रास से जुड़ाव

प्रोफेसर कामकोटि की पूरी शैक्षणिक यात्रा असाधारण योग्यताओं और शोध से भरी रही है। उन्होंने कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग (Computer Science and Engineering) विषय में अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की है। आइए उनके शैक्षणिक सफर को संक्षेप में जानते हैं-

एम.एस. (M.S.) और पीएचडी (Ph.D.): प्रोफेसर कामकोटि ने आईआईटी मद्रास से ही कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में अपनी एम.एस. और पीएचडी की डिग्रियाँ हासिल कीं। उनका शोध मुख्य रूप से जटिल गणनाओं, कंप्यूटर आर्किटेक्चर और सिस्टम सुरक्षा पर आधारित था।
फैकल्टी के रूप में शुरुआत: वर्ष 2001 में वे आईआईटी मद्रास के कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग में बतौर फैकल्टी सदस्य शामिल हुए।
प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ: डायरेक्टर बनने से पहले उन्होंने आईआईटी मद्रास में कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और शैक्षणिक पदों को संभाला। वे जेईई (JEE) के चेयरमैन रह चुके हैं, जिसके तहत देशभर के लाखों छात्रों के लिए आईआईटी में प्रवेश की परीक्षा आयोजित की जाती है। इसके अलावा उन्होंने इंडस्ट्रियल कंसल्टेंसी एंड स्पॉन्सर्ड रिसर्च (ICSR) के एसोसिएट डीन के रूप में भी काम किया।

कंप्यूटर आर्किटेक्चर और ‘शक्ति’ माइक्रोप्रोसेसर के जनक

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रोफेसर कामकोटि का सबसे बड़ा योगदान भारत को सेमीकंडक्टर और माइक्रोप्रोसेसर के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना माना जाता है।

  • माइक्रोप्रोसेसर डेवलपमेंट प्रोग्राम: प्रोफेसर कामकोटि आईआईटी मद्रास के ‘माइक्रोप्रोसेसर डेवलपमेंट प्रोग्राम’ का नेतृत्व करते हैं।
  • स्वदेशी ‘शक्ति’ (SHAKTI) प्रोसेसर: उनके ही मार्गदर्शन में भारत का पहला व्यावसायिक स्तर का स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर ‘शक्ति’ विकसित किया गया था। इस सफलता ने भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की कतार में ला खड़ा किया जो खुद का माइक्रोप्रोसेसर डिजाइन करने में सक्षम हैं।
  • इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी: वे कंप्यूटर आर्किटेक्चर के साथ-साथ इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी (सूचना सुरक्षा) और वीएलएसआई (VLSI) डिजाइन के विशेषज्ञ हैं। वे आईआईटी मद्रास में ‘इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी एजुकेशन एंड अवेयरनेस प्रोग्राम’ का भी नेतृत्व कर रहे हैं।

आज जब पूरी दुनिया सेमीकंडक्टर चिप्स की किल्लत और साइबर सुरक्षा की चुनौतियों से जूझ रही है, तब प्रोफेसर कामकोटि का शोध भारत को डिजिटल रूप से सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है।

राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकारी समितियों में प्रोफेसर कामकोटि की भूमिका

प्रोफेसर कामकोटि केवल प्रयोगशालाओं और कक्षाओं तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि भारत सरकार ने उनके अनुभव का उपयोग देश की सुरक्षा और आर्थिक नीतियों को तय करने में भी किया है:

  • राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (NSAB): प्रोफेसर कामकोटि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य के रूप में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं। यहाँ वे साइबर सुरक्षा, डिजिटल सर्विलांस और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर महत्वपूर्ण सुझाव देते रहे हैं।
  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टास्क फोर्स के चेयरमैन: वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा गठित ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टास्क फोर्स’ के वे चेयरमैन रह चुके हैं। इस टास्क फोर्स का मुख्य काम यह तय करना था कि भारत में एआई का इस्तेमाल आर्थिक विकास, रक्षा और जन-कल्याण के लिए कैसे किया जा सकता है।

बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में देते हैं योगदान

डिजिटल तकनीक और सुरक्षा में अपनी पकड़ के कारण देश की शीर्ष वित्तीय संस्थाएं भी प्रोफेसर कामकोटि के मार्गदर्शन पर भरोसा करती हैं:

  • नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE): वे एनएससी की टेक्नोलॉजी कमेटी के सदस्य के रूप में काम करते हैं, ताकि देश का सबसे बड़ा शेयर बाजार तकनीकी रूप से सुरक्षित और तेज बना रहे।
  • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI): वे आरबीआई की विभिन्न तकनीकी समितियों से भी जुड़े रहे हैं, जो देश के बैंकिंग नेटवर्क और डिजिटल पेमेंट सिस्टम को सुरक्षित रखने के लिए नीतियाँ बनाती हैं।

शोध, रिसर्च पेपर्स और R&D प्रोजेक्ट्स

अगर उनके शोध और अकादमिक योगदान की बात करें तो आँकड़े हैरान करने वाले हैं-

  • 150 से अधिक रिसर्च पेपर्स: अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित जर्नल्स और सम्मेलनों में उनके 150 से अधिक शोध पत्र (Research Papers) प्रकाशित हो चुके हैं।
  • पीएचडी और मास्टर स्कॉलर्स का मार्गदर्शन: उन्होंने दर्जनों पीएचडी और मास्टर डिग्री के छात्रों को रिसर्च गाइड के रूप में मार्गदर्शन दिया है। उनके पढ़ाए छात्र आज दुनिया भर की टेक कंपनियों और रिसर्च लैबों में ऊँचे पदों पर हैं।
  • 50 से अधिक प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व: उन्होंने उद्योग जगत और केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित लगभग 50 अनुसंधान एवं विकास (R&D) परियोजनाओं का सफल नेतृत्व किया है।

प्रोफेसर कामकोटि को मिल चुके हैं ढेरो पुरस्कार और राष्ट्रीय सम्मान

विज्ञान और शिक्षा क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें देश-विदेश में कई प्रमुख पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है-

  • डीआरडीओ अकादमिक एक्सीलेंस अवॉर्ड (DRDO Academic Excellence Award): रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा उनके योगदान को मान्यता देने के लिए।
    आईईएसए टेक्नो विजनरी अवॉर्ड (IESA Techno Visionary Award): इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में अभूतपूर्व काम के लिए।
    अब्दुल कलाम टेक्नोलॉजी इनोवेशन नेशनल फेलोशिप: तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देने के लिए मिलने वाली यह देश की बेहद प्रतिष्ठित फेलोशिप है।
    एसीसीएस लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड (ACCS Lifetime Achievement Award): कंप्यूटर और कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी में जीवनभर के योगदान के लिए।
  • इसके अलावा आईबीएम फैकल्टी अवॉर्ड (IBM Faculty Award) और वासविक इंडस्ट्रियल रिसर्च अवॉर्ड (VASVIK Award) भी उन्हें मिल चुके हैं।

प्रियंका गाँधी के बयान से उपजा विवाद

इतने शानदार और विशाल वैज्ञानिक रिकॉर्ड वाले एक शीर्ष शोधकर्ता पर राजनीति का यह तंज तब शुरू हुआ जब कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी ने अपने एक बयान में प्रोफेसर कामकोटि को ‘गौमूत्र एक्सपर्ट’ कहकर संबोधित कर दिया।

इस बयान के बाद मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। लोगों ने सवाल उठाया कि देश के एक शीर्ष वैज्ञानिक और आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर के लिए इस तरह की शब्दावली का प्रयोग करना कितना सही है? विवाद बढ़ते ही कई प्रमुख समाचार चैनलों, अखबारों और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर प्रोफेसर कामकोटि की डिग्रियों और प्रियंका गाँधी की टिप्पणी के बीच तुलनात्मक रिपोर्टें प्रकाशित होने लगीं।

राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी का शैक्षणिक बैकग्राउंड भी जानना अहम

विवाद के तूल पकड़ने के बाद अब लोग गाँधी परिवार के प्रमुख नेताओं की शैक्षणिक योग्यताओं की चर्चा भी कर रहे हैं। अगर प्रियंका गाँधी की शैक्षणिक पृष्ठभूमि की बात करें तो उन्होंने दिल्ली के जीसस एंड मैरी कॉलेज से मनोविज्ञान (Psychology) में स्नातक (Bachelor’s Degree) किया है। इसके बाद उन्होंने बौद्ध अध्ययन (Buddhist Studies) में स्नातकोत्तर (Master’s Degree) की डिग्री प्राप्त की।

निजी जीवन में बात करें तो प्रियंका गाँधी किस धर्म (हिंदू-पारसी-क्रिश्चियन) को मानती हैं, यही साफ नहीं है और वो विदेश से बौद्ध अध्ययन पढ़कर लौटी हैं जबकि खुद भारत बौद्ध धर्म का केंद्र है। ऐसे में उनका हिंदू वैज्ञानिक पर टिप्पणी हिंदूफोबिया या हिंदुओं से नफरत से भी जोड़कर देखा जा सकता है।

वहीं उनके भाई राहुल गाँधी की शिक्षा की बात करें तो उन्होंने शुरुआती पढ़ाई भारत में करने के बाद विदेश का रुख किया था। राहुल गाँधी ने सेंट स्टीफंस कॉलेज (दिल्ली) में दाखिला लिया था, लेकिन सुरक्षा कारणों से उन्हें वहाँ से हटना पड़ा। इसके बाद वे अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी गए और बाद में रोलोन्स कॉलेज से उन्होंने 1994 में अपनी बैचलर डिग्री पूरी की। इसके बाद वर्ष 1995 में उन्होंने ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज से डेवलपमेंट स्टडीज में एम.फिल (M.Phil) किया।

जिन्हें साइंस का ‘S’ भी नहीं पता वो उड़ा रहे विद्वान का उपहार

अब सवाल यह उठ रहा है कि जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी जिंदगी कंप्यूटर आर्किटेक्चर, वीएलएसआई डिजाइन, सेमीकंडक्टर और साइबर सिक्योरिटी जैसे जटिल वैज्ञानिक विषयों को समझने और सिखाने में बिता दी, जिसने देश को पहला स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर ‘शक्ति’ दिया, उसे नीचा दिखाने के लिए ‘गौमूत्र विशेषज्ञ‘ जैसा तंज कसा जा रहा है।

देखा जाए तो राजनीति और मीडिया के गलियारों में अब इस बात का खुलकर उपहास उड़ाया जा रहा है कि जिन नेताओं ने विज्ञान और मॉडर्न टेक्नोलॉजी की ‘एबीसीडी’ भी नहीं पढ़ी है, जिनकी पूरी पढ़ाई साइकोलॉजी, बुद्धिस्ट स्टडीज या डेवलपमेंट स्टडीज जैसे विषयों में हुई है, वे भारत के एक शीर्ष कंप्यूटर वैज्ञानिक और आईआईटी डायरेक्टर की काबिलियत पर तंज कस रहे हैं और उन्हें गौमूत्र एक्सपर्ट बता रहे हैं।