वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अपने अंतिम चरण में है। नक्सली सरेंडर करने के लिए 3 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख कर समय देने की गुहार रहे हैं। नक्सलियों के खात्मे से जुड़ी मुहिम को लेकर ऑपइंडिया ने RTI के माध्यम केंद्र सरकार से कुछ सवाल पूछे थे, जिनके जवाब आ चुके हैं।
आरटीआई के माध्यम से पूछे गए सवाल के जवाब में गृह मंत्रालय के लेफ्ट विंग एक्स्ट्रीमिज्म डिवीजन ने बताया कि पीएम नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक जंग लड़ी जा रही है, जिस पर भारी रकम भी खर्च की गई है। मोदी सरकार ने नक्सलियों के खात्मे और उनका असर खत्म करने के लिए मोटी रकम खर्च की है।
गृह मंत्रालय ने बताया है कि साल 2014-15 से अब तक SRE स्कीम के तहत राज्यों को कुल 3,507.86 करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। ये रकम हथियार छोड़कर मुख्य धारा में आए नक्सलियों के पुनर्वास से लेकर नक्सलियों से खात्मे में जुटे सुरक्षा बलों पर खर्च की गई है।
मोदी सरकार द्वारा SRE के तहत जारी किया गया साल-वार फंड (सोर्स: मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स, LWE डिवीजन)
ताजा आँकड़ों से साफ होता है कि केंद्र सरकार नक्सल प्रभावित जिलों में राज्य पुलिस की ताकत बढ़ाने, खुफिया तंत्र मजबूत करने और आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास पर लगातार बड़ा खर्च कर रही है।
पहले मिले RTI जवाबों में ऑपइंडिया को नक्सलियों के सरेंडर या मारे जाने के आँकड़े, नक्सल ऑपरेशनों में शहीद हुए जवानों की संख्या, बरामद हथियार और नक्सल क्षेत्रों में पुलिस के आधुनिकीकरण पर हुए खर्च जैसी जानकारी मिल चुकी है। यह इस श्रृंखला की तीसरी रिपोर्ट है।
इन तीनों RTI जवाबों को मिलाकर देखा जाए तो मोदी सरकार की एंटी-नक्सल रणनीति एक व्यापक ढाँचा बनाती है, जिसमें लगातार फंडिंग, योजनाबद्ध बल कार्रवाई, इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास और लंबे समय की स्थिरता सुनिश्चित करने के कदम शामिल हैं।
वित्त वर्ष 2014-15 से राज्यवार सुरक्षा संबंधी व्यय
ऑपइंडिया को मिली जानकारी के अनुसार, SRE स्कीम के तहत सबसे ज्यादा पैसा छत्तीसगढ़ को मिला है, कुल 1,219.28 करोड़ रुपए। इसके बाद झारखंड को 917.32 करोड़ रुपए दिए गए।
इसी बीच में ओडिशा को 453.62 करोड़, महाराष्ट्र को 262.53 करोड़, आंध्र प्रदेश को 182.21 करोड़, बिहार को 175.25 करोड़, तेलंगाना को 107.52 करोड़, पश्चिम बंगाल को 108.83 करोड़, मध्य प्रदेश को 38.61 करोड़, उत्तर प्रदेश को 36.37 करोड़ और केरल को 6.32 करोड़ रुपए मिले।
ये आंकड़े पहले मिले RTI जवाबों से भी मेल खाते हैं, जिनमें बताया गया था कि नक्सलवाद (LWE) से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ और झारखंड ही हैं।
SRE के तहत राज्यवार जारी फंड (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिवीजन)
शीर्ष पाँच लाभार्थी राज्य
शीर्ष पाँच राज्यों में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद हर साल कितनी धनराशि मिली, इसका साल-दर-साल विवरण सामने आया है।
छत्तीसगढ़ को देश में सबसे ज्यादा SRE फंड मिला है, कुल 1,219.28 करोड़ रुपए (2014-15 से अब तक)। सालाना आंकड़ों में साफ दिखता है कि जिस साल बस्तर और आस-पास के इलाकों में अभियान तेज हुए, उस साल फंड भी सबसे अधिक जारी किया गया। खासकर वित्त वर्ष 2024-25 में, जब राज्य को एक ही साल में सबसे ज्यादा राशि मिली।
छत्तीसगढ़ के लिए SRE के तहत साल-दर-साल जारी फंड (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिवीजन)
झारखंड को SRE के तहत 917.32 करोड़ मिले हैं, जिससे यह दूसरा सबसे बड़ा बेनिफिशियरी बन गया है।
SRE के तहत झारखंड के लिए साल-दर-साल जारी फंड (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिवीजन)
ओडिशा का कुल SRE सपोर्ट 453.62 करोड़ है।
ओडिशा के लिए SRE के तहत साल-दर-साल जारी किए गए फंड (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिवीजन)
महाराष्ट्र को SRE के तहत 262.53 करोड़ मिले हैं।
महाराष्ट्र के लिए SRE के तहत साल-दर-साल जारी फंड (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिवीजन)
आंध्र प्रदेश को कुल 182.21 करोड़ मिले हैं।
आंध्र प्रदेश के लिए SRE के तहत साल-दर-साल जारी किए गए फंड (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिवीजन)
SRE स्कीम में क्या-क्या शामिल है
गृह मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, सिक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडिचर (SRE) योजना नक्सल प्रभावित राज्यों को रीइम्बर्समेंट के आधार पर मदद देती है। इस फंड का मकसद राज्यों को नक्सल समस्या का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने की क्षमता मजबूत करना है।
गृह मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, SRE स्कीम में सुरक्षा बलों की ट्रेनिंग और ऑपरेशन से जुड़ी जरूरतें, नक्सली हिंसा में मारे गए या घायल नागरिकों और जवानों के परिवारों को मुआवज़ा, आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों का पुनर्वास, कम्युनिटी पुलिसिंग, गाँव रक्षा समिति और जागरूकता सामग्री जैसी चीजें शामिल होती हैं।
सालाना बजट में काफी बढ़ोतरी की गई है और नई मदें भी जोड़ी गई हैं, जैसे नक्सल ऑपरेशन के दौरान अपंग हुए जवानों को मुआवज़ा और संपत्ति के नुकसान पर मुआवजा। यह योजना राज्यों को मैदान में चल रहे एंटी-नक्सल अभियान की लागत वापस देकर रीइम्बर्समेंट एक तरह की ऑपरेशनल बैकबोन का काम करती है।
ANM और ACALWEM के तहत केंद्रीय एजेंसियों को दिए गए फंड
राज्यों को मदद देने के अलावा, गृह मंत्रालय (MHA) नक्सल विरोधी अभियान में लगी केंद्रीय एजेंसियों को भी फंड देता है। इसके लिए दो योजनाएँ चलती हैं, ‘असिस्टेंस टू नक्सल मैनेजमेंट’ (ANM) और ‘असिस्टेंस टू सेंट्रल एजेंसीज़ फॉर LWE मैनेजमेंट’ (ACALWEM)। गृह मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इन दोनों योजनाओं के तहत अब तक कुल 1,217.16 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं।
ANM और ACALWEM स्कीम के तहत सेंट्रल एजेंसियों के लिए जारी फंड। (सोर्स: मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स, LWE डिवीजन)
ये नतीजे क्यों मायने रखते हैं
इन सभी आंकड़ों से यह साफ होता है कि 2014 से मोदी सरकार ने नक्सल समस्या से निपटने के लिए एक बेहद व्यापक और बहु-स्तरीय रणनीति अपनाई है। SRE और SIS जैसे फंड राज्यों को मजबूती देते हैं, जबकि ANM और ACALWEM के जरिए केंद्र सरकार सीधे तौर पर बड़ी एजेंसियों को सहायता देती है। राज्यों के ऑपरेशन, बड़े पैमाने पर सरेंडर और कई नक्सलियों के खात्मे ये सब मिलकर दिखाते हैं कि सरकार की नीति में बल-प्रयोग, स्थिरता और पुनर्वास तीनों पर बराबर जोर है।
गृहमंत्री अमित शाह पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद खत्म कर दिया जाएगा। वह कई बार सार्वजनिक रूप से यह समयसीमा दोहरा चुके हैं।
सरकार के लगातार दबाव और समयसीमा के प्रभाव से नक्सलियों की मानसिकता पर भी असर पड़ा है। हाल ही में प्रतिबंधित CPI की महाराष्ट्र–मध्य प्रदेश–छत्तीसगढ़ स्पेशल जोनल कमेटी ने तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर अपने दो वरिष्ठ सदस्यों सोनू और सतीश के आत्मसमर्पण के फैसले का समर्थन किया और कुछ समय के लिए हिंसा रोकने की इच्छा जताई।
मोस्ट वॉन्टेड नक्सलियों में से एक माड़वी हिड़मा की मौत ने तो नक्सलियों के मनोबल को ही तोड़ कर रख दिया है। हालाँकि नक्सलियों ने पहले भी कई बार बातचीत जैसी माँगें की हैं, लेकिन गृहमंत्री अमित शाह ने साफ कहा है कि कोई बातचीत नहीं होगी, नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए आत्मसमर्पण ही करना होगा।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)
शिमला का संजौली सुर्खियों में हैं। वजह है एक पाँच मंजिला मस्जिद। इसका इतिहास करीब 30 साल पुराना है। अपने अस्तित्व में आने के साथ ही ये विवादित हो गया, क्योंकि ये अवैध तरीके से बनाया गया। यहाँ आसपास हिन्दू आबादी है। इनके बीच बहुमंजिला मस्जिद और यहाँ आने वाले बाहरी मुस्लिम, जो नमाज अदा करने के लिए खास तौर पर यहाँ आते हैं।
यहाँ की पूरी आबादी हिन्दू है। राजनीतिक लाभ के लिए कॉन्ग्रेस ने मस्जिद निर्माण को नजरअंदाज किया। पहले एक कमरा बनाया गया, फिर दूसरा बना और फिर धीरे-धीरे पाँच मंजिला मस्जिद तैयार हो गया। नगर निगम के कागजों में ये अवैध रहा। सरकारी आदेशों में उसे तोड़ने का फरमान जारी हुआ, लेकिन जैसे ही तोड़ने की बात आती है, आदेश पर स्टे लग जाता है।
शिमला और संजौली की हिन्दू आबादी स्टे और दूसरी कानून प्रक्रिया से परेशान हो चुकी है। हिन्दू संघर्ष समिति अब मस्जिद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहा है। समिति ने मस्जिद की बिजली पानी काट कर सील करने की माँग रखी थी। इसमें बिजली-पानी काटने की बात माँगी गई है। नगर निगम की ओर से कहा गया है कि बिजली-पानी काट दिया जाएगा । लेकिन अब तक उस पर अमल नहीं हुआ है।
विरोध प्रदर्शन कर रहे हिन्दू संगठनों का मंच संजौली पुलिस स्टेशन के पास में है। दिन तो धूप के साथ खुशनुमा रहता है, लेकिन रात में तापमान 3 से 4 डिग्री तक पहुँच जाता है। इसके बावजूद लोग टस से मस होने के लिए तैयार नहीं हैं। हिमाचल की कॉन्ग्रेस सरकार और लोकल प्रशासन के रवैये से लोग खासे नाराज हैं।
ऑपइंडिया ने विरोध प्रदर्शन कर रहे हिन्दू समाज के लोगों से खास बातचीत की और उनकी समस्याओं को जाना। समिति से जुड़े कमल गौतम के मुताबिक, ये मामला दुनिया के सामने तब आया, जब 30 अगस्त 2024 को एक स्थानीय युवक के साथ 5-6 प्रवासी मुस्लिमों के समूह ने मारपीट की और सिर फोड़ दिया। आरोपित को मस्जिद ने पनाह दिया। इसी मस्जिद से उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था।
हिन्दुओं के सब्र का बाँध टूट गया। हमेशा शांत रहने वाला पहाड़ इन दिनों बाहरी मुस्लिम आबादी के बढ़ते अपराध से त्रस्त हो गया है। अवैध मस्जिद इन अपराधियों के छिपने का ठिकाना बन गयी है।
डेमोग्राफी बदलने की साजिश
ऑपइंडिया ने जब स्थानीय व्यक्ति और विरोध प्रदर्शन में बढ़चढ़ कर भाग लेने वाले विजय शर्मा से बात की। उनका कहना है कि हिमाचल प्रदेश में बाहर से आने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। उनकी गतिविधियाँ संदिग्ध नजर आती है। हर दिन नए नए चेहरे देखने को मिल रहे हैं। हमारी माताओं बहनों की सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है।
विजय शर्मा के मुताबिक, पहले 3 फीसदी स्थानीय मुस्लिम थे, अब तो बढ़ गई है। बाहर से आने वाले घुसपैठिए चाहे वे अवैध बांग्लादेशी, रोहिग्या हों या दूसरे राज्यों से आए मुस्लिम भीड़। इनकी संख्या काफी तेजी से बढ़ी है।
उन्होंने कहा, “डेमोग्राफी बदल रही है पूरा साजिश के तहत। हिन्दुओं को दबाने के लिए सुनियोजित षडयंत्र हो रहा है। शिमला कोई बड़ा शहर नहीं है और संजौली तो छोटा-सा कस्बा है। शिमला से दूर संजौली जैसे छोटे इलाके में जाकर बसना कोई छोटी बात नहीं है। यहाँ पर मुस्लिम आबादी नहीं है इसलिए यहाँ धीरे धीरे भीड़ जमा होने लगी, ताकि डेमोग्राफी बदला जा सके। फल वाला भी सस्ते दाम में फल देने लगता है। अब हालात ये हो गए हैं कि स्थानीय लोगों से मारपीट शुरू हो गयी है। हमें तो भविष्य की चिंता है। आगे आने वाली पीढ़ी नमाज पढ़ने लगेगी, ऐसा मुझे लगता है।
मस्जिद बनाने वाला मोहम्मद सलीम सबसे बड़ा साजिशकर्ता
विजय शर्मा के मुताबिक, स्थानीय युवक का सिर फोड़े जाने के बाद लोगों का गुस्सा फूट गया। 5 सितंबर 2024 और 11 सितंबर 2024 को जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ। ये वर्षों से दबी चिंगारी थी।
उनका कहना है कि 1990 में मोहम्मद सलीम संजौली पहुँचा। वह दर्जी था, उसने स्कूल के शिफ्ट होने के बाद सरकारी जमीन पर कब्जा कर एक ढाँचा बना लिया। एक मंजिल का ये ढाँचा धीरे धीरे दूसरी मंजिल तक पहुँच गया। इसे मस्जिद के रूप में विकसित करने लगा। राजनीतिक फायदे के लिए वक्फ बोर्ड से मस्जिद को NOC दिलवाया गया।
मस्जिद को पैसे मिले और धीरे धीरे उसका फ्लो बढ़ने लगा। जैसे जैसे मंजिल बढ़ी, यहाँ आने वाले नमाजियों की जमात भी बढ़ने लगी। 5 मंजिल का ये ढाँचा पूरी तरह मस्जिद की तरह इस्तेमाल होने लगा। यहाँ बड़ी संख्या में लोग नमाज अदा करने के लिए आने लगे। गौरतलब है कि यहाँ आसपास मुस्लिम बस्तियाँ नहीं है। बहुत मुश्किल से एकाध व्यक्ति नजर आता है। ऐसे में भीड़ बाहरी मुस्लिम की है, जो यहाँ पहुँच कर नमाज अदा करते हैं।
सबसे बड़ी बात है कि इतनी बड़ी मस्जिद में ग्राउंड पर सिर्फ दो टॉयलेट है। जब नमाज पढ़ने आते हैं तो बड़ी संख्या में नमाजी होते हैं। नमाज से पहले वजू करने के लिए दो टॉयलेट कम पड़ जाते है। ऐसे में ये लोग खुले में वजू करते हैं।
आसपास हिन्दू आबादी। दोपहर में महिलाएँ अपने बच्चों को लेकर स्कूल से आती हैं या दिनचर्चा के काम के लिए बाहर निकलती हैं। इन महिलाओँ को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। महिलाओं ने शुरुआत में खुले में वजू करने पर एतराज जताया, तो उन्हें गंदे कमेंट सुनने पड़े। हालाँकि महिलाओं ने पुलिस को इसकी शिकायत नहीं की। क्योंकि पहाड़ों पर आम प्रचलन है कि आपसी बातों में जल्दी पुलिस को शामिल नहीं करते हैं।
अमृता चौहान के मुताबिक, हमारी बहनें बच्चों को स्कूल से आती हैं, तो उन्हें नमाज के वक्त रोक दिया जाता है, जब तक कि नमाजी वहाँ से चले नहीं जाते। यहाँ तक कि मुस्लिमों की ठेले और रेडी की दुकानें बड़ी संख्या में लगने लगी है। महिलाओं के सामान खरीदने जाने पर भी गंदे कमेंट सुनने को मिलते हैं।
असिस्टेंट टाउन प्लानर बनते ही महबूब शेख ने मारी पलटी
अवैध मस्जिद की नींव रखने वाला मोहम्मद सलीम का कार्यकलाप संदिग्ध था। 1990 से 2024 के दौर में मुस्लिम भीड़ के जुटने और अवैध मस्जिद निर्माण को लेकर नगर निगम ने भी कहा था कि मोहम्मद सलीम के खिलाफ कार्रवाई की जाए। उस वक्त जेई महबूब शेख ने मोहम्मद सलीम को जाँच में दोषी ठहराया था लेकिन बाद में पलट गया।
ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि असिस्टेंट टाउन प्लानर बनते ही महबूब शेख ने अपनी रिपोर्ट में मोहम्मद सलीम को क्लीनचिट दे दी। उन्होंने कहा कि मोहम्मद सलीम का इससे कोई सरोकार नहीं है। उसने वक्फ बोर्ड को ‘पार्टी’ बनाने की बात कही।
स्थानीय नागरिक का कहना है कि मस्जिद को बड़ा बनाने में पैसों के इंतजाम में असिस्टेंट टाउन प्लानर महबूब शेख का बड़ा हाथ था। विजय शर्मा के मुताबिक, लोग माँग करते रह गए कि महबूब शेख के खिलाफ जाँच की जाए। उसकी संपत्तियों की जाँच की जाए, लेकिन किसी भी सरकार ने लोगों की नहीं सुनी।
हिन्दू विरोधी नैरेटिव सेट करने की कोशिश
कॉन्ग्रेस के शासन काल में हिन्दू विरोधी नैरेटिव सेट करने की कोशिश की गई। हाल ही में नामी गिरामी कॉन्वेंट स्कूल में छोटे छोटे बच्चों को मैसेज भेजा गया। ईद के दिन सफेद कुर्ता-पैजामा, जालीदार टोपी पहन कर, लंच में सेवईयाँ लेकर आने के लिए कहा गया।
अधिकांश बच्चों के पैरेंट्स बिफर गए। कमलेश मेहता के मुताबिक, खानपान में सेवइयाँ कोई ट्रेडिंशन नहीं है पहाड़ों की, लेकिन हमने पूछा कि क्या महावीर जयंती मनाई, दुर्गापूजा मनाई, जन्माष्टमी मनाई, अगर नहीं मनाई तो ईद क्यों मनाने के लिए बोल रहे हो। अंत में पैरेंट्स के दबाव में स्कूल ने निर्णय बदल दिया।
कमलेश का कहना है कि सनातन समाज अपने बच्चों और उनके भविष्य की चिंता कर रहा है। आगे आने वाली पीढ़ी की चिंता है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस विधायक का वीडियो वायरल हो गया है जिसमें उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मुस्लिम पक्ष से कह रहे थे कि मुझे धन्यवाद करना। दरअसल जब सीएम ने कहा कि हम 98 फीसदी हिन्दू विचारधारा को हरा कर सत्ता में आए हैं, तो हम क्या इनसे उम्मीद करें।
दिल्ली के फरवरी 2020 एंटी-हिंदू दंगों से जुड़े UAPA केस (FIR 59/2020) में सुप्रीम कोर्ट में जमानत सुनवाई तेज हो गई। उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा समेत सात आरोपित जमानत माँग रहे हैं, लेकिन ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट जमानत याचिका कई बार खारिज कर चुकी हैं।
पुलिस का आरोप है कि ये दंगे अचानक नहीं हुए, बल्कि CAA विरोध प्रदर्शनों की आड़ में संगठित ढंग से प्लान किए गए थे। ताकि ट्रंप की विजिट के दौरान भारत की छवि खराब हो। ASG एस वी राजू ने कहा, “ये अचानक हिंसा नहीं, बल्कि रेजीम चेंज ऑपरेशन था।”
यह केस UAPA के तहत दर्ज FIR 59/2020 से शुरू हुआ था, जिसे बड़ी साजिश का मामला माना गया। आरोपितों पर आरोप है कि इन्होंने CAA-NRC के विरोध प्रदर्शनों को एक कवर की तरह इस्तेमाल करके हिंसा की प्लानिंग की। उसे भड़काया और फंडिंग करवाया।
पुलिस के अनुसार, इस पूरी योजना का उद्देश्य दंगों को इस तरीके से अंजाम देना था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब हो और यह सब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान हुआ।
ट्रायल कोर्ट ने मार्च 2022 में उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि चार्जशीट के शुरुआती अध्ययन से ही यह लगता है कि दंगे अचानक हुए हादसे नहीं थे, बल्कि एक सोची-समझी साजिश के तहत की गई थी, जिसमें उमर की अहम भूमिका है।
इसके बाद अक्टूबर 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी कहा कि UAPA की धारा 43D(5) के हिसाब से आरोप इतने गंभीर हैं और शुरुआती जाँच में सही लगे हैं कि जमानत नहीं दी जा सकती।
2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट की एक और डिवीजन बेंच ने उमर खालिद, शरजील इमाम और बाकी आरोपितों की जमानत याचिकाएँ खारिज करते हुए कहा कि यह हिंसा किसी सामान्य झड़प का नतीजा नहीं था, बल्कि एक योजनाबद्ध प्रक्रिया का हिस्सा था। हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष की थ्योरी एक संगठित नेटवर्क और समयबद्ध प्लानिंग की ओर इशारा करती है।
अब सुप्रीम कोर्ट में आरोपित यह दलील दे रहे हैं कि उनके खिलाफ हिंसा में शामिल होने का कोई सबूत नहीं है। उनका कहना है कि कुछ लोग दंगों के समय नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में मौजूद भी नहीं थे।
वे यह भी कहते हैं कि केस ज्यादातर व्हाट्सअप ग्रुप की चैट, देर से मिले प्रोटेक्टेड गवाहों के बयान और उन भाषणों पर टिका है जो उनके अनुसार सिर्फ CAA-NRC के खिलाफ राजनीतिक विरोध और सरकार की आलोचना थे, जिन्हें अपराध नहीं माना जा सकता।
इसके मुकाबले दिल्ली पुलिस का कहना है कि मामला सिर्फ नारेबाजी या अव्यवस्थित प्रदर्शन का नहीं है, बल्कि एक गहरी और पहले से तय की गई साजिश का है। पुलिस के अनुसार, CAA विरोध प्रदर्शनों को हिंसा फैलाने के लिए एक सॉफ्ट कवर बनाया गया, जिसमें पूरी प्लानिंग, समन्वय और फंडिंग शामिल थी। उनकी दलील है कि यह सब देश की संप्रभुता और राज्य की शक्ति को चुनौती देने वाली गंभीर मंशा के साथ किया गया।
सरकार बदलने का ऑपरेशन चला रहे थे आरोपित
सुप्रीम कोर्ट में अब तक अभियोजन पक्ष ने साफ तौर पर यह कहा है कि फरवरी 2020 की हिंसा कोई अचानक भड़की भीड़ नहीं थी, बल्कि पहले से की गई साजिश का नतीजा थी। राज्य की तरफ से पेश हो रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस वी राजू ने कोर्ट में दो बातें जोर देकर रखीं।
पहली यह कि आरोपितों को निर्दोष एक्टिविस्ट या बौद्धिक वर्ग के लोग बताने वाली कहानी गलत है और दूसरी यह कि आरोपितों के भाषणों, व्हाट्सऐप चैट और पूरी टाइमलाइन से साफ दिखता है कि दिल्ली को ठप करने, ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अशांति दिखाने और यहाँ तक कि रेजीम चेंज ऑपरेशन जैसी कोशिशों की एक बड़ी प्लानिंग थी।
20 नवंबर 2025 को हुई सुनवाई में शरजील इमाम के भाषण और इस पूरी साजिश की वैचारिक सोच मुख्य चर्चा का विषय रहे। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच के सामने ASG राजू ने कई वीडियो क्लिप चलाए।
इन क्लिप्स में शरजील इमाम देशभर में चक्का जाम कराने, दिल्ली को घुटनों पर लाने और सिलिगुड़ी कॉरिडोर जिसे चिकन नेक भी कहा जाता है, उसको निशाना बनाने की बात करते सुनाई देते हैं। यह कॉरिडोर उत्तर-पूर्व को बाकी भारत से जोड़ने वाला बेहद रणनीतिक रास्ता है।
जो वीडियो सुप्रीम कोर्ट में अभियोजन पक्ष ने चलाया, वही वीडियो सबसे पहले ऑपइंडियाने एक्सक्लूसिव रूप से जारी किया था।
EXCLUSIVE! Delhi Riot bail hearing
ASG Raju plays a video of Sharjeel Imam speeches. Imam referred to CAA, NRC and Kashmir. He spoke about Chakka Jam, incited violence, urging Muslims to take to streets. He spoke about cutting off Chicken’s Neck and NE
प्रोफेशन छोड़कर राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं। राज्य का कहना है कि ऐसे शिक्षित लोग, जिन्हें सरकारी खर्च पर पढ़ाया गया, जब अपनी क्षमता और पहुँच का इस्तेमाल अवैध कामों के लिए करते हैं, तो वे उन लोगों से कहीं अधिक खतरनाक हैं जो सिर्फ पत्थर फेंकते हैं या सड़क पर छोटे स्तर पर हिंसा करते हैं।
अभियोजन पक्ष का मुख्य तर्क यह है कि प्रताड़ित बुद्धिजीवी वाली कहानी हकीकत नहीं है। रिकॉर्ड बताता है कि यह जानबूझकर की गई उकसाहट, जरूरी सप्लाई रोकने की कोशिश और प्रदर्शन स्थलों को बड़े नेटवर्क के नोड की तरह इस्तेमाल करने की योजना थी।
व्हाट्सऐप चैट का सबूत भी इस मामले में बड़ा हिस्सा निभा रहा है। ASG राजू ने कोर्ट को कई ग्रुप्स की बातचीत दिखाई जैसे दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप (DPSG), मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑफ JNU (MSJ), जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी (JCC) और अन्य।
राज्य के मुताबिक ये सिर्फ अनौपचारिक स्टूडेंट फोरम नहीं थे, बल्कि समन्वय केंद्र थे, जहाँ पैसों की व्यवस्था, प्रदर्शन स्थलों की मरम्मत, चक्का जाम प्लान करना और मीडिया नैरेटिव प्रभावित करने जैसी चर्चाएँ होती थीं।
ASG के अनुसार, इन चैट्स को भाषणों और जमीन पर हुई घटनाओं के साथ मिलाकर देखें तो यह साफ होता है कि आरोपित आयोजक और प्लानर थे, न कि भीड़ में खड़े सामान्य लोग। उन्होंने बंद कमरे वाली, एन्क्रिप्टेड चैट्स के माध्यम से ऐसी योजना बनाई जो तब के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की दिल्ली यात्रा के दौरान देशभर में तनाव बढ़ाने की कोशिश थी।
राज्य का कहना है कि दिल्ली पुलिस के हलफनामे में आया शब्द रेजीम चेंज ऑपरेशन ठीक उसी मंशा को दिखाता है, जो इन बातचीतों, भाषणों और प्लानिंग से सामने आती है, यानी चुनी हुई सरकार को कमजोर दिखाना, राजधानी को अराजक बनाना और दुनिया के सामने भारत को आग में झुलसता हुआ दिखाना।
ऑपइंडिया ने DPSG व्हाट्सऐप ग्रुप का वह मैसेज भी एक्सक्लूसिव रूप से सामने लाया था, जिसमें दंगों और प्रदर्शन को एक बड़े रेजीम चेंज ऑपरेशन की तैयारी बताया गया था और इस ग्रुप में सभी कथित सह-साजिशकर्ता मौजूद थे।
यह मैसेज राहुल रॉय ने 20 जनवरी 2020 को भेजा था, यानी दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों से पूरे एक महीना पहले। इस मैसेज में राहुल रॉय ने साफ लिखा था कि चल रहे प्रदर्शन दरअसल एक बड़े रेजीम चेंज ऑपरेशन की शुरुआत हैं और इस पूरी योजना को जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी (JCC) आगे बढ़ा रही है।
सुनवाई के दौरान बेंच ने ASG एस वी राजू से पूछा कि क्या जमानत सुनवाई में पुरी जानकारी देखना जरूरी है। इस पर राजू ने शांत और साफ जवाब दिया। उन्होंने कहा कि बचाव पक्ष (डिफेंस) कोशिश कर रहा है कि बहस में देरी हो, ताकि यह तस्वीर बनाई जा सके कि ये लोग निर्दोष आंदोलनकारी हैं जो बिना वजह जेल में पड़े हैं।
लेकिन अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी यह दिखाना है कि पहली नजर में यह एक गंभीर और बड़ी साजिश थी। UAPA की धारा 43D(5) के अनुसार, अगर अदालत को यह मानने के लिए उचित आधार मिल जाए कि आरोप सही हो सकते हैं, तो जमानत नहीं दी जा सकती।
जमानत के दौरान अदालत का काम सिर्फ यह देखना होता है कि क्या सबूत इस शुरुआती कसौटी को पूरा करते हैं, ना कि हर सबूत की गहराई से जाँच वैसे ही करना जैसे ट्रायल में किया जाता है। इसी वजह से, ASG राजू ने कहा कि वीडियो चलाना और बातचीत दिखाना जरूरी है, ताकि यह साबित हो सके कि मामला सिर्फ राजनीतिक विरोध या कमजोर सबूतों पर नहीं टिकता, बल्कि सामग्री गंभीर है।
अपनी दलील को मजबूत करने के लिए ASG राजू ने एक और वीडियो दिखाया, जिसमें यह दिखाई देता है कि प्रदर्शनकारियों की भीड़ कैसे संगठित तरीके से इकट्ठी हुई और कैसे इसी माहौल में कांस्टेबल रतन लाल की हत्या हुई।
उन्होंने CCTV फुटेज दिखाकर बताया कि कैसे दंगाइयों ने पहले से योजना बनाकर कैमरों को ढका, जो कैमरे ऊँचाई पर थे उन्हें तोड़ दिया या नुकसान पहुँचाया और उसके बाद कैमरों के बंद हो जाने पर हिंसा शुरू कर दी। इस वीडियो को ऑपइंडिया ने चार्जशीट के आधार पर दोबारा तैयार किया था और वही वीडियो कोर्ट को दिखाया गया।
Important Delhi Riots EXCLUSIVE update ?
The video feed of the bail hearing in SC was disrupted. But our reporter has informed us of a video played by ASG SV Raju showing how cameras were disrupted, the mobilisation of the mob, and the diversion of CCTV right before the first… pic.twitter.com/H87eKX7v0R
सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान ASG एस वी राजू ने उस दलील का भी जवाब दिया जिसमें कहा जा रहा था कि आरोपित करीब पाँच साल से जेल में हैं, इसलिए उन्हें जमानत मिलनी चाहिए।
ASG राजू ने ट्रायल कोर्ट के आदेशों का हवाला देकर बताया कि मामले में हुई देरी का बड़ा कारण खुद आरोपितों की तरफ से लिए गए बार-बार के स्थगन (कार्यवाही को रोकने) और लंबी-लंबी दलीलें हैं, न कि पुलिस या अभियोजन की धीमी कामगिरी।
उन्होंने कहा कि कई बार ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड में लिखा है कि बचाव पक्ष के वकील हफ्तों तक समय माँगते रहे। इसी संदर्भ में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सलीम खान फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि गंभीर अपराधों में साढ़े पाँच साल की कैद भी जमानत का स्वचालित आधार नहीं है।
अगले दिन ASG राजू ने जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच के सामने अपनी दलीलें जारी रखीं। उन्होंने तथ्य और UAPA की कानूनी धाराओं को जोड़कर बताया कि UAPA की धारा 43D(5) में जो कठोर जमानत मानदंड हैं, वे इस मामले पर पूरी तरह लागू होते हैं।
उन्होंने फिर याद दिलाया कि फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में कैसी हिंसा हुई पेट्रोल बम, एसिड जैसी चीजें, पत्थर, डंडे और पुलिस व आम लोगों पर हमले। 53 लोगों की मौत हुई और 530 से ज्यादा लोग घायल हुए।
CCTV कैमरों को पहले से प्लानिंग करके तोड़ा गया, पुलिस पर निशाना साधा गया और स्थान ऐसे चुने गए जहाँ से शहर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया जा सके। उन्होंने साफ कहा यह कोई अचानक हुई भिड़ंत नहीं थी, बल्कि सोच-समझकर रची गई योजना थी।
इसके बाद उन्होंने UAPA की धारा 16(1)(a) (जिसमें आतंकी गतिविधि की परिभाषा है) और धारा 43D(5) का हवाला देकर इस सारे घटनाक्रम को आतंकी गतिविधि से जोड़ा। उन्होंने कहा कि कोर्ट पहले ही चार्जशीट स्वीकार कर चुका है, जिसमें UAPA सेक्शन 16 लगाया गया है और आरोपितों ने उस आदेश को कभी चुनौती भी नहीं दी।
इसलिए, उन्होंने कहा, “जब एक कोर्ट पहले ही कह चुकी है कि UAPA का अपराध बनता है, तो जमानत देने का सवाल ही नहीं उठता।” फिर ASG ने साजिश के खास पहलुओं पर बात की।
उनका कहना था कि आरोपित जान-बूझकर दिल्ली की सप्लाई दूध, पानी, सब्ज़ी आदि बंद करवाना चाहते थे, ताकि शहर ठप हो जाए और राज्य की क्षमता पर सवाल उठे। राज्य की तरफ से यह भी कहा गया कि दंगों में बम, पेट्रोल बम और हथियारों का इस्तेमाल हुआ, जो ‘आतंकी गतिविधि’ की श्रेणी में आता है।
उन्होंने सिलिगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) का भी उल्लेख किया और कहा कि सबूतों के अनुसार उत्तर-पूर्व भारत को देश से काटने की योजना भी बातचीत में दिखाई देती है। ASG ने बताया कि यह सामग्री चार्जशीट के साथ दी गई पेन ड्राइव में है और आरोपितों ने इसे कभी चुनौती नहीं दी, इसलिए उनकी कोई सबूत नहीं है वाली दलील कमजोर पड़ जाती है।
इसके बाद उन्होंने आरोपितों की व्यक्तिगत भूमिका समझाई। उन्होंने पूरक आरोप पत्र पढ़कर बताया कि अभियोजन के मुताबिक उमर खालिद सिर्फ एक प्रदर्शनकारी नहीं थे, बल्कि चक्का जाम की योजना बनाने वालों में आगे थे।
ASG के अनुसार, उमर खालिद ने शरजील इमाम और आसिफ इकबाल तन्हा को समझाया था कि साधारण धरने और चक्का जाम में क्या फर्क है और उन्हें अलग-अलग इलाकों में चक्का जाम शुरू करने की जिम्मेदारी दी थी। राज्य का दावा है कि चक्का जाम शांतिपूर्ण विरोध नहीं, बल्कि शहर को ठप करने की हिंसक रणनीति थी।
ASG राजू ने 164 CrPC के तहत दर्ज प्रोटेक्टेड विटनेस के बयानों का भी हवाला दिया, जिसमें पैसे के लेन-देन और प्लानिंग का जिक्र है। उन्होंने कहा कि एक बयान में बताया गया कि आरोपित मीरान हैदर ने दंगों के लिए 2.86 लाख रुपए खर्च किए। उन्होंने यह भी कहा कि ED की जाँच में और भी बातें सामने आई हैं, लेकिन वे अभी सिर्फ पुलिस रिकॉर्ड पर ही निर्भर हैं।
साजिश से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को समझाते हुए ASG ने साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 10 का जिक्र किया। इस धारणा के अनुसार, एक बार अगर साजिश होने की पर्याप्त संभावना दिख जाए, तो साजिश के दौरान किसी एक आरोपित की कही या की गई बात बाकी आरोपितों के खिलाफ भी पढ़ी जा सकती है।
इसका मतलब यह हुआ कि किसी आरोपित का हर दंगे की जगह पर मौजूद होना जरूरी नहीं अगर उसने प्लानिंग, फंडिंग या विचार देने में भूमिका निभाई, तो वह उतना ही जिम्मेदार है।
डिजिटल सबूतों की तरफ बढ़ते हुए ASG ने व्हाट्सऐप चैट्स का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि चैट्स से साफ दिखता है कि शांतिपूर्ण विरोध चाहने वालों और हिंसक रास्ता चाहने वालों में फूट थी और याचिकाकर्ता उस गुट में थे जो टकराव और हिंसा चाहता था।
ASG ने राज्य का केस समेटते हुए कहा कि यह एक ऐसी साजिश थी जिसमें हत्या, आतंकी गतिविधियाँ और रेजीम चेंज जैसे दंगे शामिल थे, कुछ वैसा जैसा बांग्लादेश या नेपाल में हुआ था।
इसके बाद उन्होंने ‘parity’ और ‘delay’ पर भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अन्य आरोपितों को मिली जमानत का लाभ ये आरोपित नहीं उठा सकते, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि वे आदेश मिसाल नहीं हैं। देरी पर उन्होंने कहा कि ट्रायल में ज्यादा समय रक्षा पक्ष की वजह से लगा है और अगर आरोपित सहयोग करें तो वह दो साल में मुकदमा पूरा करवा सकते हैं।
बेंच ने भी कुछ स्पष्टीकरण माँगे। जब पूछा गया कि कितने गवाहों के 164 बयान दर्ज हैं, ASG ने बताया 47 में से 38 गवाहों ने बयान दिया है, जो साजिश के पक्ष में मजबूत गवाही मानी जा सकती है।
जब बचाव पक्ष ने अगली तारीख आज यानि सोमवार (24 नवंबर 2025) को सुने जाने का अनुरोध किया, ASG ने कहा कि वे मेरिट्स पर बहस नहीं कर सकते, क्योंकि पहले उन्होंने खुद कहा था कि वे मेरिट्स पर बहस नहीं करेंगे।
लेकिन बेंच ने साफ किया कि वे बचाव पक्ष को बहस से रोका नहीं जा सकता और चाहें ASG मौजूद हों या नहीं डिफेंस की बहस सुनी जाएगी। आज जो अगली सुनवाई 24 नवंबर 2025 को होनी है, उसमें बचाव पक्ष अपनी दलीलें पेश करेगा।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में दिव्यांश तिवारी ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से सटे संजौली में बने अवैध मस्जिद को हटाने के लिए स्थानीय हिन्दू आंदोलन कर रहे हैं। हिन्दू संघर्ष समिति का कहना है कि शिमला नगर निगम और सेशंस कोर्ट के आदेश के बावजूद हिमाचल की कॉन्ग्रेस सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। दरअसल सेशंस कोर्ट ने मस्जिद को अवैध घोषित कर ध्वस्तीकरण का आदेश दे चुका है। स्थानीय लोगों के विरोध के बाद यहाँ नमाज पढ़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जा रही है।
ऑपइंडिया की टीम शिमला के अवैध मस्जिद स्थल पर पहुँची और स्थानीय लोगों से बातचीत कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मस्जिद जानेवाले नमाजी राह चलती हिन्दू बहन-बेटियों को छेड़ते हैं। मस्जिद जाने का एकमात्र रास्ता हिन्दू आबादी वाले इलाके से होकर जाता है। ऐसे में नमाज अदा करने आने वाले नमाजी मस्जिद के आस-पास रहनेवाले हिन्दू घरों में ताक झाँक करते हैं। घर से बाहर निकल रही बहन-बेटियों को कमेंट करते हैं। उनका निकलना दुश्वार हो जाता है, खासकर शुक्रवार को जम्मू की नमाज के वक्त।
ऑपइंडिया ने मस्जिद जाकर इमाम से भी बातचीत करने और अपना पक्ष रखने को कहा। काफी मेहनत के बावजूद न तो मस्जिद कमेटी का कोई सदस्य बोलने को तैयार हुआ और न ही इमाम।
मस्जिद के बगल से एक और सीढ़ी थी, जिससे होकर ऊपर पहुँचने पर एक व्यक्ति से बात हुई। उन्होंने पत्रकार का नाम लेते ही बात करने से मना कर दिया। उन्होंने एक नंबर दिया, जिससे बात करने की कोशिश कई बार की गई, लेकिन उन्होंने कॉल काटा और कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया।
यहाँ जो आरोप लग रहा है, तो आप इस पर क्या कहेंगे। इस पर कॉल कट कर दिया गया।
ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय निवासी राजकुमार शर्मा ने कहा कि ये मस्जिद बहुत धीरे-धीरे बनाया गया है। पहले यहाँ प्राइमरी स्कूल होता था। उन्होंने कहा कि इस स्कूल में उन्होंने भी पढ़ाई की थी। बाद में स्कूल को धर्मशाला शिफ्ट कर दिया गया। कुछ दिनों बाद इस जगह पर छोटे-छोटे टीले बने। समय के साथ यहाँ छोटी-सी मस्जिद बनाई गई और धीरे-धीरे इसे बड़ा किया गया।
यही वजह है कि मस्जिद के नीचे फ्लोर पर प्लास्टर लगे हुए हैं और ऊपर के दो फ्लोर पर मस्जिद की दीवारें प्लास्टरविहीन हैं। दरअसल पहला फ्लोर पहले बन गया और दो फ्लोर धीरे धीरे बाद में बनाया गया है। नीचे के फ्लोर पर नमाज पढ़ा जाता है। ऊपर इमाम रहते हैं। मस्जिद में घुसते ही दो वॉशरूम है, जो बेहद गंदा है। वजू करने की व्यवस्था वाली जगह पर भी काफी गंदगी है।
राजकुमार के मुताबिक, आसपास हिन्दुओं की आबादी है। मस्जिद बनने के बाद मुस्लिम बस मस्जिद के पास हैं। इस मस्जिद में नमाज पढ़ने दूर दूर से लोग आते हैं। क्योंकि यहाँ तक जाने का रास्ता एक सीढीनुमा रास्ते से होकर गुजरता है। इस रास्ते को देख कर ही बताया जा सकता है कि ये रास्ता कुछ लोगों के आने-जाने के लिए बनाया गया है।
"प्राथमिक स्कूल बना मस्जिद, सलीम टेलर ने इकट्ठा किए मुसलमान"
खिड़कियों से अब करते हैं आसपास के घरों में ताक-झाँक, बच्चियों को कहते हैं 'माल' @Anurragmishra को शिमला की अवैध मस्जिद के पास रहने वाले स्थानीय व्यक्ति ने बताई परेशानी! pic.twitter.com/mTcHmfroDL
ऑपइंडिया की टीम जब थोड़ा आगे बढ़ी तो उसने कुछ लोगों से बात करने की कोशिश की। मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े आरके सिंह का कहना है कि हिमाचल में बीजेपी और कॉन्ग्रेस की ही सरकार रहती है। उन्होंने सवाल किया कि जब मस्जिद बन रही थी, तो सरकार कहाँ सोई हुई थी।
उनका कहना है कि मस्जिद बन चुकी है, कोर्ट में मामला चल रहा है, अवैध निर्माण के लिए सरकार जिम्मेदार है। देश के सभी नागरिकों के लिए कानून बराबर है। कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए। यदि अवैध है तो इसे हटना चाहिए
वहीं थोड़ी दूर पर मिले सब्जी का व्यापार करने वाले रवि कुमार से बात की। इनका कहना है कि कुछ लोग यहाँ मस्जिद हटाने की माँग कर रहे हैं। वो 1990 से यहाँ रह रहे हैं। उस वक्त छोटी सी मस्जिद थी। यहाँ नमाज पढ़ने बाहरी लोग आते हैं। इनमें कश्मीरियों की संख्या काफी है। उनका कहना है कि संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर इस समस्या का समाधान होना चाहिए।
ऑपइंडिया की टीम जब पगडंडी जैसे रास्ते से होकर गुजर रही थी, तो उन्होंने देखा कि आसपास छोटे-छोटे घर थे। यहाँ वर्षो से हिन्दू रहते आए हैं। ये लोग विवाद को देखते हुए इस मुद्दे पर बात करने से कतराते नजर आए। कई लोगों ने नाम लेते ही दरवाजे बंद कर लिए। इससे पता चलता है कि आसपास के लोगों में कितनी दहशत है।
यहाँ मस्जिद का होना ही बड़ा सवाल है, क्योंकि मुस्लिम आबादी यहाँ नहीं रहती है। यहाँ के कल्चर से भी मस्जिद बिल्कुल मैच नहीं करता। पहले फ्लोर पर प्लास्टर है, लेकिन उसके दो फ्लोर पर प्लास्टर नहीं किया गया है। मस्जिद जाने के लिए सीढ़ियों से होकर गुजरना पड़ता है। रास्ते के दोनों ओर हिन्दुओं का घर है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, घरों में बनी खिड़कियों में नमाज अदा करने के लिए आते-जाते वक्त ये झाँकते हैं। आने-जाने वाली लड़कियों को छेड़ते हैं। इसलिए यहाँ के लोग मस्जिद को हर हाल में शिफ्ट कराना चाहते हैं।
राजधानी दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण लगातार खतरनाक स्तर पर बना हुआ है। इसी गंभीर स्थिति का हवाला देते हुए कुछ युवाओं ने इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। शुरुआत में वे ये दिखा रहे थे कि वे हवा की खराब गुणवत्ता को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद उनका असली रंग सामने आ गया। वामपंथी प्रदर्शनकारियों ने हाल ही में मारे गए खूंखार नक्सली हिडमा के समर्थन में नारेबाजी शुरू कर दी और ‘कॉमरेड हिडमा अमर रहे’ के नारे लगाए।
"Comrade Hidma Amar Hahe"
Does this look like an environmental protest against Air pollution? Leftists are out here in support of Maoists who killed countless police personnels. pic.twitter.com/xMoZA9cOB8
इन वापपंथी प्रदर्शनकारियों की तैयारी देखकर साफ समझा जा सकता है कि प्रदूषण तो एक बहाना था, इनका मुद्दा कुछ और था, क्योंकि प्रदर्शनकारी अपने साथ हिडमा के नाम लिखी तख्तियाँ और पोस्टर ही नहीं बल्कि पेपर स्प्रे भी लेकर आए थे। पुलिस ने जब इनसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की माँग की तो इन्होंने पुलिसकर्मियों पर इसका इस्तेमाल किया।
Delhi Police confirms pollution protesters used chilli spray against police personnel at India Gate, directly targeting their eyes. This is the first such assault on officers in the national capital. Injured cops are under treatment at RML Hospital.
पुलिस के अनुसार,रविवार (23 नवंबर 2025) को करीब 4:30 बजे ये प्रदर्शनकारी इंडिया गेट के सी-हेक्सागन क्षेत्र में जुटे। वहाँ मौजूद पुलिस ने उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से हटने को कहा, लेकिन वे लगातार हिडमा के पक्ष में नारे लगाते रहे और निर्देशों को नजरअंदाज करते रहे।
पुलिस पर किया पेपर स्प्रे, घायल सुरक्षाकर्मियों का अस्पताल में चल रहा इलाज
स्थिति तब बिगड़ गई जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाना शुरू किया। इसी दौरान प्रदर्शन कर रहे कुछ लोगों ने पुलिस पर पेपर स्प्रे कर दिया, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई। कई पुलिसकर्मियों की आँखों में तेज जलन हुई और तीन से चार कर्मियों को तुरंत आरएमएल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उनका इलाज जारी है।
नई दिल्ली के DCP देवेश कुमार ने बताया, “पहली बार, हमने पुलिसवालों पर मिर्च स्प्रे का इस्तेमाल होते देखा। हमारे कुछ अधिकारियों की आँखों में स्प्रे लग गया और अभी उनका RML हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है। इस बारे में कानूनी कार्रवाई की जा रही है।”
#WATCH | Delhi | New Delhi DCP Devesh Kumar Mahla says, "…For the first time, we encountered the use of chilli spray against police personnel. A few of our officers were sprayed in the eyes and are currently receiving treatment at RML Hospital. Legal action is being taken in… https://t.co/fNMeaffsFbpic.twitter.com/M97aUbWNJV
मामले की जानकारी देते उन्होंने आगे कहा, “कुछ प्रदर्शनकारी C-हेक्सागन के अंदर जमा हो गए और फिर उस बैरिकेड को पार करने की कोशिश की जिसे हमने आने-जाने पर रोक लगाने के लिए लगाया था। हालाँकि, वे नहीं माने, उन्होंने बैरिकेड तोड़ दिया, सड़क पर आ गए, और वहीं बैठ गए। हमने उनसे हटने की रिक्वेस्ट की, क्योंकि उनके पीछे कई एम्बुलेंस और मेडिकल कर्मचारी इंतजार कर रहे थे और उन्हें इमरजेंसी एक्सेस की जरूरत थी…हमने ट्रैफिक में रुकावट से बचने के लिए उन्हें C-हेक्सागन से हटा दिया। हटाने के दौरान, कई प्रदर्शनकारियों की पुलिस से हाथापाई हुई, और हमारे कई कर्मचारी घायल हो गए।”
हंगामे के कारण ट्रैफिक व्यवस्था भी प्रभावित हुई। सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि कुल 15 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है और उनके खिलाफ पुलिस पर हमला करने और हिंसक गतिविधियों में शामिल होने जैसी गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई की जाएगी।
वामपंथी प्रदर्शनकारियों ने हिडमा को लेकर क्या बयान दिया?
असल में इन्हें दिल्ली में बढ़ रहे प्रदूषण से तो कोई लेना-देना ही नहीं था। इनका टार्गेट ही अशांति पैदा करना था। एक वामपंथी ने इस पर बयान देते हुए तो भारत के सबसे खूँखार और मोस्ट वांटेड माओवादी कमांडरों में शुमार माड़वी हिड़मा के तारीफ के पुल ही बाँध दिए।
Delhi: A protester says, "Hidma is a tribal person who took up arms to fight for their rights. People may disagree with the method and call it wrong, but they cannot deny the reason behind it. The struggle against corporatization is the fight of the tribals—it is a fight for… pic.twitter.com/SKLJ3Y6KuZ
उसने कहा, “हिडमा एक जनजातीय है जिसने अपने हक के लिए हथियार उठाए। इसे गलत कह सकते हैं, लेकिन वे इसके पीछे के कारण को नकार नहीं सकते। कॉर्पोरेटाइजेशन के खिलाफ लड़ाई जनजातीयों की लड़ाई है, यह पानी, जंगल और जमीन की लड़ाई है। इस वजह से नारायण कान्हा को देशद्रोही नहीं कहा जा सकता। अपने हक की रक्षा करने वाले लोगों पर ऐसा दबाव नहीं डाला जा सकता।”
शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को हिंसक बनाने की वापपंथियों की ये हरकते नई नहीं
यह पहली बार नहीं जब ये वामपंथी गुट किसी भी अन्य मुद्दे को ढाल बनाकर सामने आया हो और बाद में असली रंग दिखाया हो। किसान आंदोलन के समय भी किसानों के साथ उनकी लड़ाई में शामिल होने को ढोंग कर के इन वामपंथियों ने एक शांत से धरने को दूसरा रंग दे दिया। उस समय किसानों के हितों की माँग का दावा करने वाले प्रदर्शनकारी अचानक उमर खालिद और शरजील इमाम की तख्तियाँ लेकर बैठ गए थे। इतना ही नहीं, उस समय भी पुलिस को टार्गेट करके हिंसा के प्रयास हुए थे।
इसके अलावा, साल 2019-20 का समय याद करें तो दिल्ली समेत जगह-जगह CAA-NRC के विरोध में सड़क पर आकर बैठे प्रदर्शनकारियों ने अपने प्रोटेस्ट का रंग बदल दिया था। उन्हीं प्रदर्शनों का नतीजा था कि दिल्ली को हिंदू विरोधी दंगे झेलने पड़े। 40-50 लोगों की निर्ममता से मौत हुई। पुलिस को निशाना बनाया गया। उनके ऊपर कहीं गर्म पानी फेंका गया था तो कीं हथियार लेकर उन्हें दौड़ाया गया था। उन्हें टारगेट करने के लिए दिल्ली दंगों में आरोपित गुलफिशा फातिमा जैसे लोगों ने उमर खालिद के कहने पर लाल मिर्च पाउडर, एसिड, बोतलें, डंडे तक जमा किए थे।
आज स्थिति दोबारा वैसी ही देखने को मिली है। जिसका मतलब साफ है कि पर्यावरण जैसा मुद्दा भी इन वामपंथियों के लिए सिर्फ अपना प्रोपेगेंडा फैलाने का एक साधन मात्र है। अंत में इनका असली चेहरा कभी नक्सल समर्थक, कभी आतंक समर्थक के तौर पर उभर कर आता है। इन्हें समस्या देश, देश की सरकार और देश के कानून से होती है और इनकी संवेदना देश विरोधी तत्वों से।
आज जिस हिडमा के लिए इन्होंने दिल्ली में पुलिस पर हमला किया है। क्या उसकी लड़ाई सच में अपनी जमीन और अधिकार की थी? क्योंकि अगर ऐसा होता तो उसके हाथ मासूमों की हत्या से लाल नहीं होते।
कौन था 26 बड़े हमलों का मास्टरमाइंड हिडमा?
हकीकत यही है कि हिडमा बस्तर में नक्सलियों का वह सबसे बड़ा कमांडर था और सेंट्रल टीम को सँभाल रहा था। माना जाता है कि कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों पर जब नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया गया था, तब माड़वी हिडमा भागने में कामयाब रहा था। लेकिन इस बार सुरक्षाबलों ने उसे खत्म कर दिया।
हिडमा 150 से अधिक जवानों की जान ले चुका था। साल 2004 से अब तक 26 से अधिक हमलों में वह शामिल था। इन हमलों में 2013 का झीरम अटैक और 2021 का बीजापुर अटैक शामिल है।
3 अप्रैल 2021 को सुरक्षाबलों ने माड़वी हिडमा को पकड़ने के लिए अभियान चलाया था। बीजापुर में नक्सलियों ने जवानों पर हमला बोल दिया और इस मुठभेड़ में 22 जवान बलिदान हो गए थे। दंतेवाड़ा हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों की बलिदानी हुई थी, इसका नेतृत्व भी इसी ने किया था।
उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पर्यटन एवं संस्कृति विभाग ने पाँच प्रमुख मंदिरों के सौंदर्यीकरण और विकास पर सहमति दे दी है। हाल ही में भेजे गए बजट प्रस्तावों को मुख्यमंत्री पर्यटन योजना के तहत मंजूरी मिल चुकी है। कुल 7.50 करोड़ रुपए इन मंदिरों के कायाकल्प पर खर्च किए जाएँगे।
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह के अनुसार, हनुमान मंदिर, नगला हरी सिंह की मरम्मत व विकास पर 1.97 करोड़ रुपए, सिद्ध काली माता मंदिर, गाँव कनवार रैमजा पर 1.93 करोड़ रुपए, पसीने वाले हनुमान मंदिर पर 1 करोड़ रुपए, स्वामी गुदरिया वाले महाराज आश्रम, रजौरा पर 1.47 करोड़ रुपए और गोगा जी काली मंदिर, पिपरौली जलेसर रोड पर 1.12 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँगे।
इन पाँचों मंदिरों में से एक पसीने वाले हनुमान जी के मंदिर की अपनी एक अलग विशेषता और मान्यता है। आईए जानते हैं कि आखिर इसको पसीने वाले हनुमान जी का मंदिर क्यों कहते हैं?
पसीने वाले हनुमानजी: चंद्रवार के चमत्कार की सजीव कहानी
यमुना नदी की शांत तलहटी में बसा चंद्रवार गाँव आज भी एक रहस्य समेटे हुए है। यहाँ स्थित पसीने वाले हनुमानजी का प्राचीन मंदिर लोगों की आस्था को ऐसा आकार देता है, जिसे देखकर विज्ञान भी उलझन में पड़ जाता है।
कहा जाता है कि जैसे ही यहाँ हनुमानजी की प्रतिमा पर सिंदूर लगाया जाता है, वह गीली हो जाती है। भक्तों का मानना है कि यह सिर्फ चमत्कार नहीं बल्कि यह प्रमाण है कि यहाँ श्री हनुमानजी जीवंत स्वरूप में विराजते हैं और अपने भक्तों की हर मनोकामना ना सिर्फ सुनते हैं, बल्कि उसे पूरी भी करते हैं।
हर मंगलवार और शनिवार को इस मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है, मानो किसी ऊर्जा का प्रवाह उन्हें यहाँ खींच लाता हो।
जहाँ इतिहास और आस्था मिलकर रचते हैं चमत्कार
स्थानीय परंपराओं के अनुसार, यह मंदिर करीब दो हजार वर्ष पुराना है। उस समय चंद्रवार राजा चन्द्रसेन की राजधानी हुआ करता था और इसी काल में इस दिव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। समय बदलता गया लेकिन यहाँ की मान्यता और रहस्य वही रहे।
मंदिर के महंत बताते हैं कि पहले प्रतिमा पर इतना पसीना आता था कि भक्त उसे बोतलों में भरकर प्रसाद की तरह घर तक ले जाते थे। महंत इसे इस भूमि की अलौकिक शक्ति का परिणाम बताते हैं।
भक्त कहते हैं कि यहाँ हर प्रार्थना पूरी होती है, क्योंकि उनके सामने हनुमानजी सिर्फ मूर्ति नहीं बल्कि जीवंत रूप में विद्यमान हैं। इसी विश्वास ने इस मंदिर को भक्तों के हृदय का सबसे पवित्र स्थान बना दिया है।
भक्तों की मेहनत से बदली मंदिर की तस्वीर
आज जो मंदिर दिखाई देता है, वह हमेशा ऐसा नहीं था। करीब 30-40 साल पहले यहाँ सिर्फ एक छोटी-सी मढ़िया थी। भक्तों ने अपने श्रम, धन और समर्पण से धीरे-धीरे इसे भव्य रूप दिया। फिर यहाँ राम, सीता और लक्ष्मण का मंदिर बना और पास में ही भगवान भोलेनाथ के लिए महाकाल स्वरूप वाला मंदिर भी स्थापित किया गया।
भगवान राम, लक्ष्मण और माँ सीता की मूर्ति भी है स्थापित
भक्तों का कहना है कि जबसे सामने श्रीराम मंदिर बना, प्रतिमा पर आने वाले पसीने की मात्रा थोड़ी कम हुई है लेकिन हनुमानजी आज भी अपना चमत्कार दिखाते हैं। यहाँ समय-समय पर भंडारा और धार्मिक आयोजन होते रहते हैं, जो इसे हमेशा जीवंत बनाए रखते हैं।
चंद्रवार: युद्धभूमि से पवित्र धाम तक का सफर
बात करें चंद्रवार गाँव की तो यह सिर्फ धार्मिक महत्व वाला क्षेत्र नहीं बल्कि यह इतिहास का एक जीवंत रूप है। कहा जाता है कि 1193 में यहीं राजा जयचंद्र और मोहम्मद गोरी के बीच युद्ध हुआ था। गाँव के आसपास फैले खंडहर आज भी उस युग की दास्तान सुनाते हैं।
पुरातत्व से जुड़े प्रमाण भी यहाँ समय-समय पर मिलते हैं, जो इस भूमि की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक समृद्धि को उजागर करते हैं। पुराना नाम भी फिरोजाबाद नहीं बल्कि चंद्रवार ही हुआ करता था। यही कारण है कि आज भी इस शहर का नाम पुनः चंद्रवार करने की माँग उठती रहती है और प्रस्ताव शासन स्तर पर लंबित है।
यमुना किनारे फैली प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण इसे दिव्यता और इतिहास का अद्भुत संगम बना देते हैं। यहाँ आकर हर कोई एक ही बात महसूस करता है कि मूर्ति पत्थर की हो सकती है लेकिन विश्वास हमेशा जीवित होता है।
स्पेन के कैडिज व सेउटा डायोसीज के बिशप राफेल जोर्नोसा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। 76 वर्षीय जोर्नोसा पर 1990 के दशक में एक किशोर लड़के के यौन शोषण का आरोप है और इसी मामले की जाँच चर्च ट्रिब्यूनल द्वारा की जा रही है। वे स्पेन के पहले ऐसे कैथोलिक बिशप हैं जिनके खिलाफ वैटिकन के स्तर पर सार्वजनिक रूप से जाँच की जा रही है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, वैटिकन ने अपने संक्षिप्त बयान में केवल इस्तीफा स्वीकार करने की घोषणा की है और इसमें आरोपों का कोई जिक्र नहीं है। वहीं, कैडिज व सेउटा डायोसीज ने इस महीने बताया कि आरोपों की जाँच मैड्रिड स्थित स्पेन में वैटिकन के दूतावास पर बुलाए गए चर्च ट्रिब्यूनल के माध्यम से चल रही है। यह घटना केवल एक इस्तीफे की खबर भर नहीं है बल्कि इसने एक बार फिर कैथोलिक चर्च में लंबे समय से चले आ रहे यौन शोषण के मुद्दे को उठा दिया है।
क्या है जोर्नोसा के खिलाफ आरोप?
स्पैनिश अखबार ‘EL PAIS’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जोर्नोसा पर 1990 के दशक में एक नाबालिग का बार-बार यौन शोषण करने का आरोप है। जिस समय यह घटना हुई उस वक्त जोर्नोसा गेटाफे में पादरी थे और डायोसेसन सेमिनरी (धार्मिक विद्यालय) का संचालन करते थे।
पीड़ित ने ‘डिकैस्टरी फॉर द डॉक्ट्रिन ऑफ फेथ’ को डाक से एक शिकायत भेजी जिसमें अपने साथ हुए शोषण का विवरण दिया था। पीड़ित ने बिशप पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उसका 14 साल की उम्र से लेकर 21 वर्ष की उम्र तक शोषण किया था। पीड़ित ने लिखा, “मैं यह पत्र सिर्फ इस उद्देश्य से लिख रहा हूँ कि जो मेरे साथ हुआ, वह किसी और बच्चे के साथ न हो।” पीड़ित के साथ शोषण की शुरुआत 1994 में हुई थी।
पीड़ित ने अपने पत्र में लिखा है, “14 से 18 साल की उम्र तक मैं लगभग हर हफ्ते ‘सैरो दे लॉस आंजेलेस’ के मेजर सेमिनरी जाता था। इसी दौरान वह मेरा शोषण करता था। रात में वह मेरे कमरे में आता था और मैं यह सब सहता था। वह मेरे बिस्तर में घुस जाता, मुझे सहलाता और चूमता था। सुबह भी वह इसी तरह मुझे जगाता था। मैं डर के मारे शून्य हो जाता था।” पीड़ित के साथ ‘निजी अंगों को छूना, सहलाना और होंठों पर किस करना’ जैसी घटनाएँ रिट्रीट्स और कैंपों के दौरान भी हुई।
राफेल जोर्नोसा
पीड़ित के अनुसार शोषण तब तक जारी रहा जब तक वह 2000 के शुरुआती वर्षों में 21 साल का नहीं हो गया। पीड़ित ने वयस्क होने पर सेमिनरी में प्रवेश लिया। पत्र में पीड़ित ने लिखा, “उसी समय मैंने उसे बताया कि मैं समलैंगिक हूँ। जोर्नोसा ने मुझे सेमिनरी में प्रवेश दिया और मुझे ‘कन्वर्जन थेरेपी’ ले गया ताकि मेरी समलैंगिकता ठीक की जा सके।”
पीड़ित ने बताया कि दो साल तक सेमिनरी में रहने के दौरान जोर्नोसा लगभग हर रात और सुबह उसके बिस्तर में आता था, उसे चूमता और उसके निजी अंगों को छूता था। उसने लिखा, “कई बार मैंने जोर्नोसा से कहा कि हम जो कर रहे हैं, वह सही नहीं है। वह हमेशा इसे सच्ची दोस्ती बताता था।”
पीड़ित का कहना है कि वह जोर्नोसा की हर बात पर आँखें बंद करके भरोसा करता था। पीड़ित अपने कन्फेशन के दौरान समलैंगिक संबंधों को स्वीकार करता और अपने बिस्तर पर चला जाता जिसके कुछ ही मिनटों बाद जोर्नोसा उसके बिस्तर पर होते थे। जब वह सेमिनरी छोड़कर बाहर आया तो पीड़ित को इस बात का अहसास तक नहीं था कि वह शोषण का शिकार हुआ है।
कई साल बाद थेरेपी लेते समय उसे समझ आया कि जोर्नोसा ने उसके साथ यौन शोषण किया था। इसके बाद 32 वर्ष का होने पर पीड़ित ने जोर्नोसा को एक ईमेल लिखा और अपने यौन शोषण का जिक्र किया। पीड़ित ने कहा, “उसने कभी जवाब नहीं दिया और उसी दिन के बाद उसने मुझसे कभी संपर्क नहीं किया।”
इस साल वह जोर्नोसा से मिला और आमने-सामने जाकर उससे शोषण किए जाने की बात कही। पीड़ित ने लिखा, “उसने मुझे आसानी से बस इतना कह दिया कि उसका कोई ऐसा इरादा नहीं था।” इसके बाद पीड़ित ने आगे शिकायत की थी। यह पहली बार है जब स्पेन में किसी बिशप की इस तरह जाँच की जा रही हो। हालाँकि, यह यह शोषण का इकलौता मामला नहीं है बल्कि ऐसे मामलों की संख्या हजारों में है।
यौन शोषण के मामलों पर ‘EL PAIS’ का डेटाबेस
स्पेन में दशकों तक चर्च में होने वाले यौन शोषण के मामलों को नकारा जाता रहा या उन पर चुप्पी साध ली गई। यौन शोषण को लेकर कोई बात तक नहीं की जाती थी और कई अन्य देशों के मामलों का जब जिक्र होता तो स्पैनिश एपिस्कोपल कॉन्फ्रेंस (CEE) कह देती कि स्पेन एक अपवाद है यानी यहाँ ऐसे केस नहीं हैं। कई केसों को लेकर चर्चा होती रही लेकिन उस पर सार्वजनिक चुप्पी ही रही।
दशकों तक इस स्थिति के बाद अक्टूबर 2018 में ‘EL PAÍS’ ने इस मुद्दे की जाँच शुरू करने का फैसला किया। ‘EL PAÍS’ ने जो इस केसों की शुरुआती रिपोर्ट बनाई उसमें सिर्फ 34 केस दर्ज थे जो अदालतों और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर लिए गए थे। चर्च प्रशासन की इस अस्पष्ट व्यवस्था के कारण, अखबार ने एक ईमेल जारी किया ([email protected]), जहाँ कई वर्षों के दौरान सैकड़ों पीड़ितों और गवाहों ने अपनी कहानियाँ भेजीं।
अप्रैल 2021 में अखबार ने स्पेनिश कैथोलिक चर्च में पैडोफीलिया पर पहला और अब तक का एकमात्र डेटाबेस प्रकाशित किया, जिसे हर नए मामले के सामने आने पर लगातार अपडेट किया जाता है। अखबार के डेटा के मुताबिक, अब तक चर्च द्वारा शोषण का शिकार 2,936 पीड़ित उनके सामने आए हैं जिन्होंने कुल 1,564 आरोपितों पर शोषण के आरोप लगाए हैं।
EL PAIS का डेटाबेस (साभार:elpais.com)
अखबार ने ऐसे केसों की एक लंबी लिस्ट जारी की है। जिसमें हजारों घटनाओं का जिक्र है और उनके बाद हुई कार्रवाई का भी वर्णन है। इस डेटाबेस में उन पादरियों, बिशप और धार्मिक पदाधिकारियों का जिक्र किया गया है जिन्होंने इस घटनाओं को अंजाम दिया था। अखबार को जिस सबसे पुराने मामले की जानकारी मिली है वो 1927 का है। आँकड़ों के मुताबिक, 1960 के दशक में सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए, जो कुल मामलों का एक-चौथाई है।
स्पेन में 1940 से अब तक चर्च के लोगों द्वारा 4 लाख+ बच्चों के शोषण का अनुमान
2023 में एक स्वतंत्र आयोग की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि स्पेन में 1940 से अब तक रोमन कैथोलिक चर्च के धर्मगुरुओं द्वारा लगभग 2,00,000 बच्चों का यौन शोषण किए जाने का अनुमान है। रिपोर्ट में कोई सटीक संख्या नहीं दी गई थी लेकिन 8,000 से अधिक वयस्कों पर किए गए एक सर्वे में 0.6% लोगों ने बताया कि बचपन में उनका यौन शोषण चर्च के पादरियों ने किया था। स्पेन की लगभग 3.9 करोड़ वयस्क आबादी पर यह प्रतिशत लागू करने पर अनुमानित संख्या करीब 2 लाख बनती है।
करीब 700 पेज की यह रिपोर्ट बनाने वाले लोकपाल (ओम्बुड्समैन) एंज़ेल गाबिलोंदो ने बताया कि जब इसमें चर्च से जुड़े गैर-पादरी (ले-मेंबर्स) द्वारा किए गए शोषण को भी जोड़ते हैं तो यह प्रतिशत 1.13% हो जाता है। इसका मतलब है कि 4 लाख से अधिक स्पेनिश नागरिक बचपन में चर्च से जुड़े व्यक्तियों द्वारा यौन शोषण का शिकार हुए हो सकते हैं।
इन मामलों की जाँच के लिए बने आयोग ने 487 पीड़ितों का इंटरव्यू भी किया था। गाबिलोंदो ने दावा किया था, “शोषण के शिकार कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने आत्महत्या कर ली है… कई ऐसे लोग हैं जो अपनी जिंदगी को फिर से पटरी पर नहीं ला पाए हैं।” पीड़ित इसके कारण होने वाली ‘भावनात्मक समस्याओं’ से जूझ रहे हैं। स्पेन की संसद ने मार्च 2022 में भारी बहुमत से एक स्वतंत्र आयोग के गठन को मंजूरी दी थी। हालाँकि, स्पेनिश कैथोलिक चर्च ने इस स्वतंत्र जाँच में आधिकारिक रूप से हिस्सा नहीं लिया था।
द गार्जियन की रिपोर्ट
इस वर्ष अब तक यौन शोषण की 101 शिकायतें मिली: चर्च का दावा
स्पेन की कैथोलिक चर्च ने बीते शुक्रवार (21 नवंबर 2025) को बताया कि इस वर्ष अब तक उसे यौन शोषण की 101 शिकायतें प्राप्त हुई हैं। ये सभी शिकायतें उस नई मुआवजा प्रणाली के तहत दर्ज की गई हैं। यह फैसला चर्च पर लगातार बढ़ रहे आरोपों और नाबालिगों के शोषण मामलों में पारदर्शिता की कमी को लेकर उठी आलोचनाओं के बाद लिया गया था।
स्पेनिश एपिस्कोपल कॉन्फ्रेंस के महासचिव फ्रांसिस्को गार्सिया मागान के अनुसार, इनमें से 58 मामले ‘सुलझाए’ जा चुके हैं जबकि 11 मामले समाधान के करीब हैं। बाकी शिकायतों पर समीक्षा अभी जारी है। हालाँकि, मागान ने यह स्पष्ट नहीं किया कि जिन मामलों को निपटाया गया है उनमें पीड़ितों को मुआवजा मिला या नहीं। माना जा रहा है कि यह संख्या असल संख्या जैसे EL PAIS के आँकड़ों से काफी कम है।
चर्च में शोषण पर पादरियों का पहरा?
चर्च में यौन शोषण से जुड़े मामलों में कार्रवाई का होना स्पेन में समस्याओं को और बढ़ा रहा है। अलग-अलग रिपोर्ट्स में इन समस्याओं और शोषण के तंत्र के पीछे की कई वजहें होने का जिक्र किया गया है। पादरी या बिशप जैसे अधिकारियों और बच्चों के बीच पावर डायनेमिक्स शोषण की परिस्थितियाँ बना देती है। बच्चे ताकतवर पादरी या बिशप के खिलाफ आवाज उठाने से कतराते हैं जिससे उनका हौसला बढ़ता है।
इसके अलावा चर्च की इनकार (denial) की नीति और आरोपितों को छिपाने की वजह से भी इस समस्या का समस्या बढ़ी हुई है। ओम्बड्समैन की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि कई मामलों में आरोपितों को दूसरे शैक्षणिक केंद्रों में भेजा गया था, या दूसरे देशों में ट्रांसफर कर गया ताकि उन्हें बचाया जा सके। इसके अलावा, रिपोर्ट बताती है कि canonical (चर्च का धार्मिक कानून) प्रक्रियाओं में पीड़ितों को पर्याप्त अधिकार नहीं दिए गए हैं। अक्सर पीड़ितों को अपनी आवाज रखने का वो स्थान नहीं मिलता है जो उन्हें मिलना चाहिए था।
ऐसे मामलों की जाँच के लिए जब लोकपाल की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया गया तो उसे भी चर्च के द्वारा मदद नहीं की गई। रिपोर्ट बताती है कि जाँच के दौरान चर्च की प्रतिक्रिया बहुत सीमित और न्यूनतम रही है। चर्च के पुराने आर्काइव तक अधिकतर शोधकर्ताओं की पहुँच नहीं है जिससे इस बारे में और अधिक जानकारी जुटाने में मदद नहीं मिलती है। जैसे ही पीड़ितों को कहीं भी अपनी बात कहने का मौका नजर आया, हजारों की संख्या में लोग बाहर आकर अपना पक्ष रख रहे हैं।
किनका शोषण हुआ, कौन-कौन दोषी हैं और कितनी संख्या में पीड़ितों को न्याय और मुआवजा मिला इसका भी कोई सही-सही डेटाबेस मिलना मुश्किल है। जो है भी तो उसके सही होने पर खुद ही कई सवाल हैं। अब समय है कि चर्च को अपने बनाए नियमों की समीक्षा करनी चाहिए। पीड़ितों को न्याय मिले, मुआवजा मिले और दोषियों को सजा मिले यह तय किया जाना बेहद जरूरी है।
स्पेन के कैथोलिक चर्च में बच्चों के साथ होने वाला यौन शोषण कोई पुरानी बात नहीं है बल्कि आज भी जारी है और काफी गंभीर है। बिशप का इस्तीफा और वैटिकन की जाँच एक बड़ा कदम जरूर है लेकिन इससे पूरी समस्या हल नहीं हो जाती। पुरानी रिपोर्ट्स, पीड़ितों की संख्या और नए मामले बताते हैं कि यह मुद्दा बहुत बड़ा है और सिर्फ मुआवजा देकर इसे खत्म नहीं किया जा सकता।
चर्च को सच में अपनी गलतियों को समझकर खुलकर काम करना होगा और अंदर से बड़े सुधार करने होंगे। वरना जिम्मेदारी लेने की बातें तो होती रहेंगी लेकिन असली दर्द झेलने वाले लोगों की आवाज ठीक से नहीं सुनी जाएगी।
आगामी शीतकालीन सत्र में चंडीगढ़ को लेकर केन्द्र सरकार के संशोधन विधेयक की अफवाह और विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया के बीच केन्द्र सरकार ने साफ कर दिया है कि चंडीगढ़ की शासन प्रणाली जैसी चल रही है वैसी ही चलेगी। सरकार इसमें किसी तरह का बदलाव नहीं करने जा रही है। पंजाब और हरियाणा के साथ जैसा संबंध चंडीगढ़ का है, वैसा ही बना रहेगा।
संघ राज्य क्षेत्र चंडीगढ़ के लिए सिर्फ केंद्र सरकार द्वारा कानून बनाने की प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रस्ताव अभी केंद्र सरकार के स्तर पर विचाराधीन है| इस प्रस्ताव पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है| इस प्रस्ताव में किसी भी तरह से चंडीगढ़ की शासन-प्रशासन की व्यवस्था या चंडीगढ़…
— PIB – Ministry of Home Affairs (@PIBHomeAffairs) November 23, 2025
गृह मंत्रालय ने लोगों को आश्वस्त किया है कि चंडीगढ़ के हितों को ध्यान रखते हुए, सभी पक्षों से व्यापक चर्चा के बाद ही कोई फैसला सरकार लेगी।
दरअसल ये अफवाह उड़ी थी कि सरकार शीतकालीन सत्र में 131 वां संविधान संशोधन बिल पेश करने जा रही है और चंडीगढ़ को अन्य केन्द्र शासित प्रदेशों मसलन लक्षद्वीप, अंडमान- निकोबार द्वीप समूह, दादर नागर हवेली आदि की तरह केन्द्र शासित प्रदेश बनाएगी।
विपक्ष के उठे विरोध के स्वर
चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 में शामिल की अफवाह उड़ते ही विपक्षी दलों खास कर कॉन्ग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी की कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इसे पंजाब की पहचान से जोड़ा है। उन्होंने कहा है कि सरकार संविधान के फेडरल स्ट्रक्चर की धज्जियाँ उड़ा रही है।
BJP की केंद्र सरकार द्वारा संविधान संशोधन के माध्यम से चंडीगढ़ पर पंजाब के अधिकार को खत्म करने की कोशिश किसी साधारण कदम का हिस्सा नहीं, बल्कि पंजाब की पहचान और संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है। फेडरल स्ट्रक्चर की धज्जियाँ उड़ाकर पंजाबियों के हक़ छीनने की यह मानसिकता बेहद खतरनाक… https://t.co/Ed9Q3KNGYi
वहीं पंजाब के सीएम भगवंत मान ने इसे पंजाब की आत्मा पर चोट पहुँचाने वाला फैसला करार दिया। उनका कहना है कि चंडीगढ़ पर पंजाब का अधिकार कम करने की कोशिश की जा रही है।
To plan and formulate a strong and decisive response against the anti-Punjab Constitution (131st Amendment) Bill, which aims to demolish Punjab’s rightful claim over Chandigarh, I have called an EMERGENCY MEETING of the Core Committee of the party at 2 PM on Monday at the Party… pic.twitter.com/f3cmFsIq9c
वहीं शिरोमणि अकाली दल ने संघीय ढाँचे पर कुठाराघात करार देते हुए कहा है कि चंडीगढ़ पर पंजाब का हक है और इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता।
हालाँकि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रविवार (23 नवंबर 2025) को साफ किया कि चंडीगढ़ के लिए सिर्फ केंद्र सरकार की तरफ से कानून बनाने की प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रस्ताव अभी विचाराधीन है और इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। मंत्रालय ने यह भी साफ कर दिया कि आने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में इस संबंध में कोई बिल लाने की सरकार की मंशा नहीं है।
बीजेपी ने इसे जबरदस्ती विवाद खड़ा करने और अनावश्यक राजनीतिक करने का आरोप विपक्ष पर लगाया। बीजेपी पंजाब के अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने कहा कि बीजेपी की प्राथमिकता पंजाब और चंडीगढ़ के हित में रही है। उन्होंने भरोसा दिया कि किसी भी तरह के भ्रम की स्थिति में केन्द्र सरकार से बातचीत कर जानकारी स्पष्ट की जाएगी।
आर्टिकल 240 क्या है
राष्ट्रपति को केन्द्र शासित प्रदेशों जैसे लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, दादर नागर हवेली में सीधा हस्तक्षेप कर जरूरी नियम और कानून बना सकते हैं और बदलाव भी कर सकते हैं।
दरअसल अनुच्छेद 240 के मुताबिक, राष्ट्रपति जो भी नया नियम बनाएँगे, वह पुराने को खत्म कर सकता है या पुराने कानून में बदलाव कर सकता है। राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए नियम संसद में पारित कानून के बराबर ताकतवर होगा।
दरअसल पुद्दुचेरी जैसे केन्द्र शासित प्रदेशों में विधानसभा हैं। ये अनुच्छेद 239ए के तहत आते हैं। यहाँ विधानसभा की पहली बैठक के दिन से ही राष्ट्रपति का सीधा कानून बनाने का अधिकार निरस्त हो जाता है। विधानसभा निलंबित या भंग होने की स्थिति में ही राष्ट्रपति सीधा इन क्षेत्रों के लिए नियम बना सकते हैं।
पहले अफवाह उड़ी कि चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 के अंतर्गत ले आया जाएगा। अगर ऐसा होता तो यहाँ अलग प्रशासक यानी एलजी की नियुक्ति की जाती। अभी तक पंजाब के राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में चंडीगढ़ आता है। संविधान संशोधन के जरिए चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 के अंतर्गत लाने पर ये खत्म हो जाता। सीधे राष्ट्रपति को कानून बनाने का अधिकार मिल जाता।
चंडीगढ़ पूरी तरह केन्द्र शासित प्रदेश बन जाता, जैसा अंडमान निकोबार, दादर नागर हवेली और लक्षद्वीप है। इन क्षेत्रों में विधानसभा नहीं है और ये केन्द्र शासित प्रदेश हैं।
आरोप लगाया गया कि लोकसभा और राज्यसभा की बुलेटिन के मुताबिक, विधेयक 1 दिसंबर 2025 को संसद के पटल पर रखा जाएगा। इसके बाद चंडीगढ़ उन केन्द्र शासित प्रदेशों में लाया जाएगा, जो पहले से अनुच्छेद 240 के अंतर्गत आते हैं।
चंडीगढ़ को लेकर क्या है विवाद
चंडीगढ़ फिलहाल पंजाब और हरियाणा दोनों की राजधानी है। इस पर हक जताने की वजह से दोनों राज्य एक-दूसरे से भिड़ते रहते हैं। पंजाब के राज्यपाल ही अभी चंडीगढ़ के प्रशासक के तौर पर काम करते हैं। यानी राजधानी भले ही हरियाणा-पंजाब दोनों की हो, लेकिन प्रशासनिक शक्ति पंजाब के पास है।
अगर 131संशोधन विधेयक पारित होता, तो चंडीगढ़ में बड़ा बदलाव आ जाता। केन्द्र को चंडीगढ़ का एलजी नियुक्त करना पड़ता और केन्द्र के पास चंडीगढ़ की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी होती।
पंजाब का कहना है कि चंडीगढ़ में पंजाबी भाषा बोलने वाले ज्यादा है। इसे पंजाब के क्षेत्र को खाली कर बसाया गया और विकसित किया गया था। इसलिए आज भी यह पंजाब का ही पार्ट है। वहीं, हरियाणा का कहना है कि इस क्षेत्र में गैर पंजाबियों की संख्या काफी है। जब हरियाणा बना तो उसे हरियाणा में शामिल होना चाहिए।
चंडीगढ़ का इतिहास
भारत विभाजन के वक्त 1947 में लाहौर पर पाकिस्तान का अधिकार हो गया। इस वक्त पंजाब के पास अपनी राजधानी नहीं थी। इसको देखते हुए 1950 के दशक में नई आधुनिक राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया। इनमें से ही एक है चंडीगढ़, जिसे प्लान सिटी भी कहते हैं।
1966 में Punjab Reorganisation act लाया गया। इसके तहत पंजाब का विभाजन हुआ। पंजाबी भाषा भाषी क्षेत्र को पंजाब में रखा गया जबकि हिन्दी या हरियाणवी भाषा भाषी क्षेत्र को हरियाणा में रखा गया। उस वक्त हरियाणा की राजधानी भी चंडीगढ़ को बना दिया गया।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) का एक नया फीचर सामने आया है। अब तक एक्स पर केवल आप ये देख सकते थे कि ये अकाउंट कब क्रिएट किया गया है या कब वैरिफाइड हुआ है, लेकिन अब आप ये भी देख सकते हैं कि ये अकाउंट कहाँ से संचालित किया जा रहा है।
X पर अब जहाँ से कोई अकाउंट चल रहा है उस देश या क्षेत्र का नाम कोई भी व्यक्ति देख सकता है। उदाहरण के तौर पर आप ‘ऑपइंडिया’ का यह अकाउंट देख सकते हैं।
X का कहना है कि यह उनके पोर्टल पर दिखाई देने वाले कॉन्टेंट की प्रमाणिकता को सत्यापित करने की दिशा में उठाया गया कदम है। लंबे वक्त से ये शिकायत की जा रही थी कि सोशल मीडिया पर कहीं और बैठे लोग किसी और देश का व्यक्ति बनकर वहाँ शांति के लिए खतरा पैदा कर रहे थे और भारत में भी ऐसी कोशिशें किए जाने की शिकायतें मिली थीं।
अब इस फीचर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर एक नई बहस शुरू हो गई है। सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने कई अकाउंट के स्क्रीनशॉट्स शेयर किए हैं, जिसमें यह दावा किया गया है कि अब तक जिन अकाउंट्स से लगातार केवल देश विरोधी या सरकार विरोधी भड़काऊ पोस्ट शेयर की जाती थी, असल में वह सभी भारत से नहीं बल्कि अन्य देशों से संचालित हो रहे हैं।
मोटे तौर पर इस फीचर के सामने आने के बाद यह सामने आया है कि कुछ लोग जो X पर खुद को भारतीय दिखाकर लोगों को देश या सरकार के खिलाफ भड़का रहे थे वो भारत के हैं ही नहीं। हालाँकि, देश के खिलाफ गतिविधियाँ करने के लिए इसी देश के नागरिक का एक मुखौटा उन्होंने पहना हुआ था। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल देश की सुरक्षा पर उठता है।
लोगों के स्क्रीनशॉट्स देखने के बाद जब हमने खुद भी जाकर अकाउंट्स को चेक किया तो इस बात की पुष्टि हुई है कि वाकई इनमें से कोई अमेरिका, कोई साउथ एशिया, तो कोई हॉन्ग-कॉन्ग से भारत पर न सिर्फ नजर रखे हुए है बल्कि भारतवासियों को भड़काने का भी काम भी कर रहे हैं।
Alt News क्या अमेरिका से हो रहा संचालित?
सोशल मीडिया पर अपने कई उकसाने वाले पोस्ट के लिए कुख्यात Alt News के कुछ स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं। इन स्क्रीनशॉट में दावा किया जा रहा है कि असल में Alt News का अकाउंट भारत से संचालित ना होकर अमेरिका से संचालित हो रहा है। हालाँकि, Alt News द्वारा VPN का इस्तेमाल किए जाने का संदेह है लेकिन वायरल दावों में इसे US से चलने वाला अकाउंट ही बताया गया है।
यह कंपनी फैक्ट चेक संस्था होने का दावा करती है लेकिन यह भी देखा जा चुका है कि Alt News के संस्थापक, मोहम्मद जुबैर और प्रतीक सिन्हा, बेहद पक्षपाती हैं। जुबैर को कई बार सोशल मीडिया पर फर्जी खबरें पोस्ट करते और फिर चुपचाप उन्हें डिलीट करते हुए पकड़ा गया है।
वहीं, Annusi Tiwari नाम से चल रहा एक अकाउंट, जिससे ना सिर्फ भारत विरोधी पोस्ट शेयर होती है, बल्कि हिंदुओं को आपस में ही लड़ाने की चालें चली जाती थी, उस अकाउंट के असल में भारत से नहीं बांग्लादेश संचालित होने का दावा किया जा रहा है।
This account is based in Bangladesh and his name is Mohammad Asif, they are pretending to be hindu so that they can create chaos among us!
एक और अकाउंट जिसने हमेशा ही ध्यान खींचा, वह था ‘इंडियन मुस्लिम आर्काइव’, जिसका हैंडल ‘Rustum_0’ है। इस अकाउंट का लोकेशन ‘दक्षिण एशिया’ है और यह भ्रामक इतिहास सामग्री पोस्ट करने के लिए जाना जाता है।
इसी तरह @DrNimoYadav का अकाउंट साउथ एशिया से संचालित किए जाने का दावा किया गया है। हालाँकि, स्क्रीनशॉट देखने के बाद जब हमने चेक किया तो लोकेशन अपडेट हो चुकी थी और फिलहाल उसका लोकेशन इंडिया ही दिखने लगा है। जबकि फिचर आने के बाद अकाउंट बेस्ड इन साउथ एशिया दिख रहा था।
इसके अलावा ExposeIT नाम से चलाया जा रहा अकाउंट, जिससे भारत के खिलाफ लोगों को भड़काने के लिए फेक फोटो वीडियो भी शेयर होती रहीं हैं, उसके भी यूनाइटेड स्टेट्स से संचालित होने का दावा किया जा रहा है।
यह नया फीचर उन अकाउंट्स पर भी ध्यान आकर्षित कर रहा है, जो लंबे समय से सोशल मीडिया पर उकसावे से भरी पोस्ट शेयर कर रहे थे। ऐसे ही एक हैंडल का नाम Tractor2twitr_P है। यह अकाउंट अक्सर पंजाब, सिख पहचान, किसान आंदोलन और कथित भेदभाव जैसे मुद्दों पर टिप्पणी करता है। नए फीचर में यह दिखाई देता है कि यह अकाउंट ‘ऑस्ट्रेलएशिया’ से चल रहा है जबकि इसकी प्रोफाइल में दावा किया गया है कि इसका मालिक लुधियाना से है।
यह अकाउंट लगातार भारत-विरोधी कंटेंट पोस्ट कर रहा है और पंजाब में उकसावे वाले अभियान चलाने में सक्रिय रहा है। किसान आंदोलन के दौरान भी ऐसे कई अकाउंट सामने आए थे, जो ऑनलाइन सबसे ज्यादा शोर मचा रहे थे। इसी तरह का एक और हैंडल tractor2twitr पहले भारत में बैन किया जा चुका है।
कारण यह है कि वह भारत-विरोधी सामग्री फैला रहा था। माना जा रहा है कि Tractor2twitr_P या तो उसी समूह द्वारा चलाया जा रहा है या वही विचारधारा और एजेंडा फैला रहा है। हाल ही में यह अकाउंट पंजाब यूनिवर्सिटी के विरोध-प्रदर्शन को लेकर लगातार नैरेटिव सेट करने वाली पोस्ट्स कर रहा है और माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है।
सरकार की बातों को मिला समर्थन
किसान आंदोलन के दौरान सरकार ने कहा था कि कई बड़े सोशल मीडिया अकाउंट भारत के बाहर से संचालित हो रहे हैं। उस समय इन बातों को कई लोगों ने नजरअंदाज कर दिया था। लेकिन अब X का यह नया फीचर दिखा रहा है कि आंदोलन से जुड़े कुछ प्रमुख अकाउंट वास्तव में भारत में नहीं थे।
पहली बार किसी प्लेटफॉर्म ने खुद यह बताया है कि वे अकाउंट, जिन्होंने आंदोलन की ऑनलाइन दिशा तय की, असल में कहाँ से चलाए जा रहे थे। इस तरह यह फीचर अनजाने में सरकार की बातें सही साबित कर रहा है।
हजारों किलोमीटर दूर से नैरेटिव गढ़ने का खेल
अब बातचीत केवल सोशल मीडिया पर आवाज उठाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह सवाल भी हो रहा है कि कौन बोल रहा है और कहाँ से। जब कोई अकाउंट खुद को भारत की सामाजिक या राजनीतिक बातों से जुड़ा दिखाए लेकिन असल में विदेश से चल रहा हो, तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जाति विवादों, सांप्रदायिक तनावों, पंजाब के मुद्दों और राजनीतिक नाराजगी पर कई ऑनलाइन चर्चाएँ उन लोगों ने चलाईं, जो भारत से बहुत दूर बैठे हैं। X पर आए नए ‘लोकेशन लेबल’ अब लोगों को यह समझने का तरीका देते हैं कि कौन सच में जमीन की हकीकत बता रहा है और कौन विदेश में बैठकर खुद को स्थानीय बताने की कोशिश कर रहा है।
लोकेशन छिपाने की वजह पर सवाल
हर विदेशी हैंडल को संदिग्ध मानना गलत है। बहुत से भारतीय विदेशों में रहते हैं और स्वाभाविक रूप से भारत से जुड़े मुद्दों पर बोलते हैं। लेकिन चिंता तब होती है जब ऐसे अकाउंट, जो तनाव पैदा करने वाले मुद्दों को बढ़ाकर पेश करते हैं, अपनी सही लोकेशन छुपाते हैं। अगर पारदर्शिता से कोई दिक्कत नहीं होती, तो वे अपनी असली लोकेशन क्यों छुपाते?
यह सवाल सहयोग, फंडिंग और जानबूझकर हस्तक्षेप जैसी आशंकाएँ पैदा करता है। और बड़ा सवाल यह है, किसे फायदा होता है जब संकट के समय भारत से बाहर बैठे लोग गलत सूचना और उकसाने वाले विचार फैलाते हैं?
पारदर्शिता से घबराहट क्यों?
इस फीचर का मकसद सिर्फ इतना था कि यूजर्स सही जानकारी के आधार पर फैसले ले सकें। मगर भारत में इसका असर काफी बड़ा दिख रहा है। अब सामने आ रहा है कि भारत से जुड़े कई एक्टिविस्ट और राजनीतिक कमेंट्री करने वाले अकाउंट असल में विदेशों से ऑपरेटेड हैं।
जो अकाउंट पहले अपनी पहचान छुपाकर असर डालते थे, उन्हें अब असहजता हो रही है। क्योंकि अब भारत के लोग यह पहचान सकते हैं कि बोलने वाला असल में कहाँ से बोल रहा है। यह पारदर्शिता उन लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है, जो खुद अंधेरे में छिपकर भारत के खिलाफ नैरेटिव गढ़ते थे। इसमें में खासतौर पर वे, जो भारत के बाहर बैठकर ऐसा कर रहे थे।
मुजफ्फरपुर की रहने वाली करिश्मा अजीज नाम की युवती आजकल पुलिस के लिए पहेली बनी हुई है, जिसने बिहार और उत्तराखंड दो अलग-अलग राज्यों को निशाना बनाया है। करिश्मा अजीज पर इन दोनों राज्यों में आईटी एक्ट और कई गंभीर आरोपों के तहत FIR दर्ज है। इसके बावजूद, करिश्मा अजीज का डिजिटल ऑपरेशन लगातार जारी है, जहाँ उसके सोशल मीडिया अकाउंट से लगातार भ्रामक और विवादित कंटेंट पोस्ट किए जा रहे हैं।
हैरत की बात यह है कि उसका एक्स अकाउंट केवल आठ महीने पुराना है, जिसे मई 2025 में एक्स प्लेटफॉर्म द्वारा वेरीफाई भी कर दिया गया था। वर्तमान में, उसके इस अकाउंट के 19.3 हजार से अधिक फॉलोवर्स हैं और उसके प्रत्येक वीडियो पर 50 हजार से ज्यादा व्यूज मिलते हैं। उसका ऑपरेशन एक अकाउंट तक सीमित नहीं है, बल्कि वह करिश्मा अजीज के नाम से जुड़े 7 से 8 अतिरिक्त बैकअप अकाउंट्स का पूरा नेटवर्क चला रही है।
साजिश का इतिहास: बिहार से पहले उत्तराखंड को बनाया निशाना
जाँच में सामने आया है कि करिश्मा अजीज की यह भड़काऊ गतिविधि केवल बिहार तक सीमित नहीं थी। उसने सबसे पहले उत्तराखंड को टारगेट किया था। उत्तराखंड के उत्तरकाशी में धराली आपदा के बाद जब शोक का माहौल था, तब करिश्मा अजीज सहित कुछ अकाउंट्स ने जवानों की मौत और आम नागरिकों की त्रासदी पर अभद्र और सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाली टिप्पणियाँ की थीं।
देहरादून के हिंदू संगठनों की शिकायत पर करिश्मा अजीज सहित तीन लोगों के खिलाफ उत्तराखंड में पहली FIR दर्ज की गई थी। इसके बाद, बिहार विधानसभा चुनाव (2025) समाप्त होने पर उसने बिहार को निशाना बनाया। मुजफ्फरपुर साइबर थाने को इनपुट मिला कि करिश्मा अजीज ने 16 नवंबर की शाम को अपने एक्स हैंडल पर 32 सेकेंड का एक वीडियो शेयर किया, जिसमें दावा किया गया कि बिहार चुनाव की मतगणना के बाद युवा सड़क पर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं।
साइबर थाने के एएसआई दयाल नारायण सिंह ने तुरंत इसकी जाँच की, तो पता चला कि यह वीडियो नेपाल में हुए GenZ जैसे हिंसक प्रदर्शनों का फुटेज था, जिसे बिहार का बताकर जानबूझकर नफरत और हिंसा फैलाने की कोशिश की गई थी। इसके बाद मुजफ्फरपुर में उसके खिलाफ दूसरी FIR दर्ज की गई। मुजफ्फरपुर की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास है।
कानून की गिरफ्त से दूर, मेटा से माँगी गई जानकारी
मुजफ्फरपुर की रहने वाली करिश्मा एजाज का X आईडी @KarishmaAziz_ है। इस पर वह लगातार भ्रामक वीडियो और विवादित कंटेंट पोस्ट कर रही है, लेकिन वह अभी भी कानून की पहुँच से बाहर है। पुलिस जाँच में यह पता चला है कि वह अपनी लोकेशन छिपाने के लिए वीपीएन और प्रॉक्सी सर्वर का इस्तेमाल कर रही है।
इसके अलावा, वह अलग-अलग अकाउंट्स में अलग-अलग मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी का उपयोग कर रही है, जिससे लोकेशन बार-बार बदल रही है और उसे ट्रेस करने में मुश्किलें आ रही हैं। साइबर DSP हिमांशु कुमार ने पुष्टि की है कि युवती के ID से जुड़ी पूरी जानकारी पाने के लिए मेटा और एक्स को मेल भेजा गया है।
पुलिस फिलहाल एक्स से पूरा डाटा मिलने का इंतजार कर रही है, जिसके बाद ही उसके खिलाफ आगे की बड़ी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस का कहना है कि करिश्मा अजीज का यह कृत्य स्पष्ट रूप से बिहार में भी नेपाल जैसा हिंसक विरोध प्रदर्शन का माहौल तैयार करने या उसे उकसाने का प्रयास है, जो जन-शांति भंग करने और समाज में वैमनस्य उत्पन्न करने वाला गंभीर अपराध है।