गुजरात के गिर सोमनाथ में स्थित प्रभास पाटण में प्रशासन द्वारा चलाई जा रही मेगा डिमोलिशन ड्राइव के दौरान तनावपूर्ण स्थिति बन गई। सरकारी जमीन पर बने निर्माणों को हटाने का काम चल रहा था। इसी दौरान एक दरगाह को हटाने को लेकर मुस्लिम टोला इकट्ठा हो गया, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएँ और बच्चे थे। इस टोले ने पुलिस पर पथराव किया, जिससे दो पुलिसकर्मी घायल हो गए। अब इस घटना के मामले में 100 के टोले खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।
जानकारी के मुताबिक, सोमनाथ में काफी समय से प्रशासन द्वारा गैरकानूनी निर्माणों के खिलाफ मेगा डिमोलिशन ड्राइव चलाई जा रही है। इस ड्राइव में कई रिहायशी और कमर्शियल गैरकानूनी निर्माण ध्वस्त किए जा रहे हैं। इसी कड़ी के तहत 10 नवंबर को प्रभास पाटण पुलिस स्टेशन इलाके के शंख सर्कल के पास सोमनाथ मंदिर के नजदीक दुकानें, मकान और मजहबी स्थल वाली 11 संपत्तियों को हटाने की तैयारी की गई थी।
ज्यादातर कब्जे हटाने के बाद पुलिस सहित टीम शाम के समय गैरकानूनी हजरत रंगीलाशाह दरगाह हटाने पहुँची तो बुर्काधारी महिलाओं और बच्चों के साथ एक ग्रुप वहाँ घुस आया और पुलिस से विवाद शुरू कर दिया। पुलिस ने इस भीड़ को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन भीड़ में मौजूद लोगों ने चिल्लाकर पुलिस पर सीधा हमला कर दिया और पत्थर बरसाने शुरू कर दिए।
दरगाह (फोटो: भास्कर)
इस दौरान पुलिस ने हल्का लाठीचार्ज किया और तीन टीयरगैस के गोले छोड़े। इसके बाद टोला तितर-बितर हो गया और स्थिति काबू में आ गई। इस पथराव की घटना में प्रभास पाटण के पीआई एमवी पटेल तथा सर्विलांस स्क्वॉड के हेड कांस्टेबल कुलदीपसिंह परमार घायल हो गए। पुलिस के मुताबिक, 80 से 100 लोगों के टोले ने पुलिस पर पथराव किया था।
स्थिति काबू में आने के बाद पुलिस ने आरोपियों को पकड़ने के लिए ऑपरेशन शुरू किया। पुलिस के मुताबिक अभी स्थिति पूरी तरह काबू में है और हमलावरों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया गया है। टोले में मौजूद महिलाओं के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया है।
17 नामजद और 100 की भीड़ के खिलाफ मुकदमा
पथराव की इस घटना को लेकर पुलिस ने सख्त कार्रवाई की है। इस मामले में 17 नामजद लोगों सहित 100 के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। हमले की घटना के बाद पुलिस ने वीडियो फुटेज के आधार पर कार्रवाई की।
डिप्टी मामलतदार रणजीतसिंह खेर की शिकायत के आधार पर पुलिस ने 17 नामजद लोगों सहित करीब 100 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। ऑपइंडिया के पास FIR की कॉपी उपलब्ध है।
प्रभास पाटण पुलिस स्टेशन में BNS की धारा 189(2), 189(3), 189(5), 190, 191(2), 195(1), 125, 121(1) और गुजरात पुलिस एक्ट की धारा 135 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। मुकदमा दर्ज मुख्य आरोपितों में रफीक गढ़िया, शबाना हारुन मोठिया, रजिया हुसैन कालवात, साकील उर्फ भूरो, गुलाम साबिर डॉक्टर, राजुशा हिनफशा बानवा, शकील उर्फ गली कालवात, ओबामा, नदीम कालवाणिया, अयूब बदाम, रफीक उर्फ बोदु, सब्बीर मौलाना, सुफियान कालवाणिया, मयुद्दीन हनीफ आमद महमद महिडा, सब्बीर इकबाल और सब्बीर हारुन शामिल हैं।
ऑपइंडिया से बात करते हुए शिकायतकर्ता डिप्टी मामलतदार (सर्कल ऑफिसर) रणजीतसिंह खेर ने बताया कि सरकारी काम के तहत उनकी टीम पुलिस सुरक्षा के साथ हजरत रंगीला दरगाह ध्वस्त करने पहुँची थी। यह दरगाह सरकारी जमीन पर बनी है। जैसे ही टीम वहाँ पहुँची कि स्थानीय महिलाएँ, बच्चे और पुरुषों का ग्रुप चिल्लाने लगा और पुलिस के समझाने के बावजूद सरकारी काम में दखल देने लगा। पुलिस ने और समझाने की कोशिश की तो महिलाओं समेत पूरे ग्रुप ने पथराव शुरू कर दिया।
खेर ने आगे बताया कि पथराव तेज होने के बाद पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू किया और टीयर गैस के गोले छोड़कर स्थिति काबू में ली। उन्होंने यह भी कहा है कि स्थिति काबू में लेने के बाद उनकी टीम ने पुलिस के साथ मिलकर गैरकानूनी दरगाह ध्वस्त कर दी। उन्होंने बताया है कि पुलिस इस मामले में कार्रवाई कर रही है, लेकिन डिमोलिशन ड्राइव अभी भी जारी रहेगी।
बुलडोजर कार्रवाई (फोटो: भास्कर)
हमले के बाद आरोपियों को पकड़ने के लिए पुलिस ने तुरंत कॉम्बिंग ऑपरेशन शुरू किया है। हालाँकि ज्यादातर आरोपित घटना के बाद फरार हो चुके हैं, जिनकी तलाश पुलिस कर रही है। प्रशासन ने साफ कहा है कि सरकारी जमीन से गैरकानूनी कब्जे हटाने का काम जारी रहेगा और कानून हाथ में लेने वाले तथा सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने वाले तत्वों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएँगे।
और जानकारी के लिए प्रभासपाटण पुलिस से भी संपर्क किया गया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका। जवाब मिलने की स्थिति में रिपोर्ट अपडेट की जाएगी।
(मूल रूप से ये खबर गुजराती में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दो चरणों का मतदान पूरा हो चुका है और अब जनता के रुझान एग्जिट पोल के रूप में सामने आने लगे हैं। देशभर की प्रमुख सर्वे एजेंसियों ने अपने-अपने एग्जिट पोल के सर्वे जारी कर दी हैं, जिनमें इस बार बिहार में NDA की सरकार बनती दिखाई दे रही है।
हर एजेंसी के आँकड़े थोड़े-बहुत अलग हैं लेकिन सभी सर्वे में एक समान संकेत है कि बिहार की जनता ने एक बार फिर NDA पर भरोसा जताया है। वहीं तेजस्वी यादव और राहुल गाँधी के नेतृत्व वाला महागठबंधन पिछड़ता नजर आ रहा है, जो एग्जिट पोल के मुताबिक 70-90 सीटों पर ही सिमट सकता है।
इस बीच पहली बार बिहार की राजनीति में कदम रखने वाली प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी को लेकर एग्जिट पोल्स में निराशाजनक संकेत मिले हैं। लगभग सभी प्रमुख सर्वे के मुताबिक जनसुराज पार्टी का खाता खुलना भी मुश्किल लग रहा है। हालाँकि, कुछ इलाकों में पार्टी को सीमित समर्थन जरूर मिला लेकिन यह राज्यव्यापी असर बनाने में नाकाम रही।
कुल मिलाकर एग्जिट पोल्स यह दिखा रहे हैं कि बिहार की सियासत में इस बार फिर NDA की मजबूत वापसी होती दिख रही है जबकि विपक्ष को जनता के रुझान में उम्मीद से कम समर्थन मिला है।
MATRIZE एग्जिट पोल
MATRIZE ने एग्जिट पोल के अनुसार, बिहार चुनाव 2025 में NDA जीत हासिल करेगी। चुनाव में NDA को 147-167 सीटें मिलने वाली हैं। वहीं महागठबंधन को 70-90 सीटों पर सिमटकर रह जाएगा। उधर अन्य पार्टियों को 3-6 सीटें मिलने की संभावना है।
People’s Insight के एग्जिट पोल के हिसाब से बिहार चुनाव में NDA 133-148 सीटें हासिल करेगी। वही महागठबंधन को 87-102 सीटें मिलने का अनुमान है जबकि जनसुराज पार्टी केवल 0-2 सीटों पर सिमटकर रह जाएगी। उधर अन्य पार्टियों की झोली में 3-6 सीटें जाने की संभावना है।
दैनिक भास्कर के एग्जिट पोल में भी NDA को बढ़त मिल रही है। सर्वे के अनुसार, NDA 145-160 सीटों पर जीत सकती है। महागठबंधन को 73-91 सीटें मिलने का अनुमान है। जनसुराज का खाता भी खुल सकता है, पार्टी को 0-3 सीटें मिल सकती हैं। वहीं अन्य दल 5-10 सीटों पर जीत हासिल कर सकते हैं।
रिपब्लिक टीवी के P-Marq के एग्जिट पोल के अनुसार, NDA 142-162 सीटों के साथ बिहार चुनाव में बाजी मारेगी। सर्वे में महागठबंधन को 80-98 सीटें मिलने का अनुमान है। जन सुराज के खाते में 01-04 सीटे आ सकती हैं। वही अन्य दलों को 00-03 सीटे मिल सकती हैं।
Chanakya Strategies के एग्जिट पोल में NDA को 130-138 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है जबकि महागठबंधन को 100 से 108 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। एग्जिट पोल में जनसुराज तो शून्य सीटों के साथ खाता ही नहीं खोल सकी। वहीं अन्य दलों को 3 से 5 सीटें मिलने की उम्मीद है।
न्यूज 24 के एग्जिट पोल में NDA को 152 सीटों से बहुमत मिल सकती है। महागठबंधन की केवल 84 सीटों पर जीतने की संभावना है। वहीं अन्य दल 7 सीट पर बाजी मार सकते हैं।
न्यूज 18 के एग्जिट पोल
न्यूज 18 के एग्जिट पोल में NDA को भारी बहुमत हासिल हो रही है। एग्जिट पोल में NDA को 140 से 150 सीटें मिल सकती हैं। उधर महागठबंधन को 85 से 95 सीटें मिलने की संभावना है। वहीं अन्य दलों को 7 सीटें मिल सकती हैं।
टाइम्स नाउ के एग्जिट पोल
टाइम्स नाउ के एग्जिट पोल में NDA को 143 सीटें के साथ बढ़त मिलती दिख रही है। महागठबंधन को भी 95 सीटें मिलने की संभावना हैं। वहीं अन्य दल 5 सीटें जीत सकते हैं।
क्या है एग्जिट पोल?
एग्जिट पोल (Exit Poll) वह सर्वेक्षण होता है, जो किसी चुनाव में मतदान खत्म होने के तुरंत बाद किया जाता है। जब लोग अपने-अपने मतदान केंद्रों से वोट डालकर बाहर निकलते हैं तो सर्वे एजेंसियों के प्रतिनिधि उनसे पूछते हैं कि उन्होंने किस पार्टी या उम्मीदवार को वोट दिया।
इन जवाबों के आधार पर एजेंसियाँ एक अनुमान तैयार करती हैं कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिल सकती हैं और कौन-सी पार्टी सरकार बना सकती है। यही अनुमान एग्जिट पोल कहलाता है। इसे आम तौर पर मतदान समाप्त होने के बाद लेकिन वोटों की गिनती से पहले, टीवी चैनलों और अखबारों में प्रकाशित किया जाता है।
एग्जिट पोल के मायने?
एग्जिट पोल का असली मतलब होता है जनता के रुझान का अंदाजा लगाना। यह चुनाव के नतीजों की आधिकारिक घोषणा नहीं होती बल्कि केवल ‘संभावित जनमत का आकलन‘ होता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि किन मुद्दों पर मतदाताओं ने वोट दिया, किन क्षेत्रों में किस पार्टी को बढ़त मिली और आम जनता का झुकाव किस ओर रहा।
हालाँकि, एग्जिट पोल हमेशा सटीक नहीं होते है क्योंकि यह सीमित सैंपल पर आधारित होते हैं और हर मतदाता का वोट गुप्त होता है। फिर भी यह चुनावी माहौल का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है, जो मतदान के बाद जनता की सोच और रुझान को समझने में मदद करता है।
मतदान में चुनाव आयोग की 17 नई पहल का प्रभाव
इस बार बिहार में मतदान में सारे रिकॉर्ड टूट गए। पहले चरण में 64.66 प्रतिशत मतदान हुआ जबकि दूसरे चरण में भी रिकॉर्ड तोड़ 68.55 फीसदी मतदान दर्ज किया गया। इसके पीछे चुनाव आयोग की नई तकनीकी और प्रबंधन संबंधी 17 पहलों की बड़ी भूमिका रही। आयोग ने पहली बार राज्य के सभी मतदान केंद्रों पर 100 प्रतिशत लाइव वेबकास्टिंग की व्यवस्था की, जिससे मतदान प्रक्रिया की रीयल-टाइम निगरानी संभव हुई और लोगों में भरोसा बढ़ा।
इसके अलावा हर मतदान केंद्र पर मतदाताओं की अधिकतम संख्या घटाकर 1200 कर दी गई ताकि भीड़ और अव्यवस्था से बचा जा सके। उम्मीदवारों के रंगीन फोटो वाले EVM बैलेट, मोबाइल जमा केंद्र, विकलांग मतदाताओं के लिए व्हीलचेयर और ई-रिक्शा जैसी सुविधाएँ भी इस बार जोड़ी गईं।
इन पहलों का सीधा असर मतदान प्रतिशत पर पड़ा। अधिक पारदर्शिता और सुविधा के कारण मतदाताओं में उत्साह बढ़ा और ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक लंबी कतारें नजर आईं। ECINet नाम की डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए मतदान की रीयल-टाइम जानकारी ने भी प्रशासनिक निगरानी को आसान बनाया। साथ ही मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) अभियान के कारण बड़ी संख्या में नए मतदाता जुड़ सके, जिससे मतदान का दायरा और बढ़ गया।
नतीजा यह रहा कि बिहार ने इस बार पिछले सभी चुनावों का रिकॉर्ड तोड़ते हुए सबसे अधिक मतदान दर्ज किया, जो यह दर्शाता है कि जब चुनाव प्रक्रिया भरोसेमंद और सुविधाजनक बनती है तो लोकतंत्र में लोगों की भागीदारी अपने आप बढ़ जाती है।
9 नवंबर 2025 को गुजरात एंटी-टेररिस्ट स्क्वॉड (ATS) ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया। इनमें तेलंगाना के डॉ. अहमद मोहियुद्दीन सैयद का नाम भी शामिल था। वह राइसिन नाम के जहर को बनाने पर काम कर रहा था।
असल में राइसिन इतना ज्यादा खतरनाक है कि उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित किया गया है। ये लोग ISIS से जुड़े संगठन ‘इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP)’ से संपर्क में थे।
ATS के अनुसार, 35 वर्षीय डॉ. सैयद ने चीन से मेडिकल की पढ़ाई की है। वह अफगानिस्तान निवासी अबू खदीजा के कहने पर काम कर रहा था। खदीजा ISKP से जुड़ा हुआ है। वह पाकिस्तान के कई लोगों से भी संपर्क में था।
पूछताछ के दौरान, डॉ. सैयद ने कबूल किया कि वह राइसिन (जिसे ‘रायजिन’ (Ryzin) भी कहा जाता है) नाम के अत्यधिक जहरीला पदार्थ बनाने की तैयारी कर रहा था। इसे अरंडी के बीजों से तैयार किया जाता है। इसके लिए उसने शोध से जुड़े सामान, केमिकल और जरूरी कच्चा माल भी जुटा लिया था।
एसपी के सिद्धार्थ के नेतृत्व वाली ATS टीम को खुफिया जानकारी मिलने के बाद अहमदाबाद-महेसाना रोड पर अदलाज टोल प्लाजा के पास छापेमारी में सैयद को गिरफ्तार किया। वह सिल्वर रंग की फोर्ड फिगो कार चला रहा था।
कार में अधिकारियों को दो ग्लॉक पिस्टल, एक बेरेटा पिस्टल, 30 जिंदा कारतूस और लगभग 4 लीटर अरंडी का तेल प्लास्टिक के कंटेनर में बरामद हुआ। अरंडी का तेल राइसिन नामक ज़हर बनाने के लिए मुख्य सामग्री होता है।
सैयद के पास से मिले डिवाइसेज की फॉरेंसिक जाँच के बाद पुलिस को दो और लोगों तक पहुँची। इनमें से एक उत्तर प्रदेश के शामली में दर्जी आजाद सुलेमान शेख है और दूसरा उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी का छात्र मोहम्मद सुहैल मोहम्मद सलीम खान था। इन लोगों ने सैयद को हथियार दिलाने में मदद की थी और गुजरात के बनासकांठा से उसके साथ काम कर रहे थे।
ATS के अनुसार, ये दोनों इस्लामिक कट्टरपंथी विचारधारा के हैं। ये लोग लखनऊ, दिल्ली और अहमदाबाद जैसी जगहों पर हमले करने के लिए रेकी कर चुके थे।
इस पूरे मामले में पाकिस्तान का कनेक्शन भी सामने आया है। अधिकारियों ने बताया कि आरोपितों से बरामद किए हथियार राजस्थान के हनुमानगढ़ से मिले थे। इन हथियारों को उनका हैंडलर पाकिस्तान सीमा के पार ड्रोन से भेजता था। ATS ने इस ऑपरेशन में तीन पिस्टल, 30 जिंदा कारतूस और राइसिन से जुड़ी सामान भी जब्त किए।
राइसिन, बायोटेरर और जिहादी संगठन का काफिरों को जहर से मारने का जुनून
राइसिन एक बहुत जहरीला प्रोटीन है जो अरंडी के पौधे या रिसिनस कम्यूनिस से मिलता है। राइसिन न तो वायरस है और न ही बैक्टीरिया बल्कि यह एक लेक्टिन टॉक्सिन है। ये शरीर की कोशिकाओं में प्रोटीन बनने की प्रक्रिया को रोक देता है। इसे खाने, सांस के जरिए या इंजेक्शन से लेने पर इंसान के अंग जल्दी फेल होने लग जाते हैं और मौत हो सकती है।
राइसिन निकालने के लिए सबसे पहले अरंडी के बीजों को अच्छे से पीसकर उनका पेस्ट बनाया जाता है। फिर उससे तेल निकाल दिया जाता है। इसके बाद जो बचा हुआ गूदा होता है उसे केमिकल से प्रोसेस किया जाता है और राइसिन वाला हिस्सा अलग किया जाता है।
हालाँकि यह एक तकनीकी काम है फिर भी इसके लिए सिर्फ सामान्य लैब उपकरण, दस्ताने और एसीटोन से ही ये काम किया जा सकता है।
राइसिन के खतरे को महज इस बात से समझा जा सकता है कि सिर्फ नमक के एक दाने से भी कम 500 माइक्रोग्राम भर खा लेने या हवा के जरिए सांस में ले लेने या इंजेक्शन के जरिए शरीर में पहुँचाने पर यह किसी भी हट्टे-कट्टे इंसान को मार सकता है। सबसे बुरी बात यह है कि इसका कोई इलाज या एंटीडोट भी अब तक नहीं है।
राइसिनजिस तरीके से शरीर के संपर्क में आता है, उसी के हिसाब से ही उसके लक्षण भी बदलते हैं। अगर राइसिन को निगल लिया जाए तो उल्टी, दस्त, पेट में खून निकलना और शॉक हो सकता है।
राइसिन को इंजेक्शन से लेने पर शरीर के अंदरूनी हिस्सों में खून निकलना, टिश्यू का मरना और अंगों का काम बंद हो जाना होता है। साँस से रिजिन के अंदर जाने पर फेफड़ों में जलन, कमजोरी, बुखार, फेफड़ों में घाव, सूजन और अधिक नुकसान होता है।
किसी भी तरीके से राइसिन के शरीर में अंदर जाने पर हर हालत में बेहद दर्दनाक तरीके से 5-6 दिनों के अंदर मौत होना लगभग तय है।
अमेरिका के CDC (सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन) ने राइसिन को ‘कैटेगरी B बायोटेररिज्म एजेंट’ की सूची में रखा है। यह केमिकल वेपन्स कन्वेंशन (CWC) में ‘शेड्यूल-1’ टॉक्सिक केमिकल के तौर पर दर्ज है।
CDC के अनुसार राइसिन एक ‘प्राकृतिक जहर है जो कई तरीकों से शरीर को नुकसान पहुँचा सकता है।’ अगर इसे धुँए, पाउडर या खाने-पीने की चीजों में मिला दिया जाए तो बहुत बड़े पैमाने पर लोगों को नुकसान पहुँचाया जा सकता है।
राइसिन का इस्तेमाल 1970 के दशक से हत्या और आतंकवादी साजिशों के लिए किया जा रहा है। पहली बार 1978 में राइसिन का उपयोग एक बुल्गारियाई पत्रकार जॉर्जी मार्कोव की हत्या में किया गया था।
बुल्गारियाई खुफिया एजेंसी के एक एजेंट ने लंदन के वाटरलू ब्रिज पर एक छतरी से राइसिन की गोली मार्कोव की टांग में मार दी थी। इसके बाद वह कुछ ही दिनों में मर गए।
इस्लामिक आतंकवादी संगठनों ने राइसिन को खास तौर पर अपना लक्ष्य बनाया है, क्योंकि यह ‘गरीब आदमी का परमाणु बम’ माना जाता है। यह सस्ता है लेकिन बहुत खतरनाक है और इसका इस्तेमाल कई तरीकों से जिहाद के लिए किया जा सकता है।
राइसिन को बनाने के लिए सन् 2000 में तैयार की थी प्रयोगशाला
सन् 2000 के शुरूआती वर्षों में अल-कायदा ने राइसिन को अपने जिहादी मकसद पूरे करने के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया। 2003 में अल-कायदा के एक गिरोह ने ब्रिटेन (UK) की सड़कों पर राइसिन और अन्य जहरों से हमले करने के लिए एक लैब बनाई की थी।
ब्रिटिश सुरक्षा एजेंसियों ने ऑपरेशन के जरिए लंदन में एक पते से 22 अरंडी के बीज, लैब उपकरण और राइसिन बनाने की जानकारी बरामद की। इस मामले में छह अल्जीरियाई लोगों को गिरफ्तार किया गया।
बाद में एक अल्जीरियाई नागरिक कैमल बोरगास को ‘जहर या विस्फोटकों के जरिए डर, दहशत या नुकसान पहुँचाने की साजिश’ के आरोप में 17 साल जेल की सजा सुनाई गई।
5 फरवरी, 2003 को संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण में अमेरिका के तत्कालीन विदेश मंत्री कॉलिन पॉवेल ने इस घटना को आतंकवादी अबू मुसाब अल-जरकावी के नेटवर्क से जोड़ा था।
2004 तक जरकावी के ‘अल-कायदा इन इराक (AQI)’ ने फालुजाह की लैब में राइसिन पर प्रयोग करना शुरू किया। इनमें सायनाइड जैसे दूसरे जहर का भी परीक्षण शामिल था।
2003 में ऐसा दो बार हुआ जब अक्टूबर और नवंबर के बीच राइसिन लगे हुए दो पत्र मिले। इनमें से एक पत्र व्हाइट हाउस को भेजा गया था, लेकिन उसे समय रहते प्रोसेसिंग फैसिलिटी पर ही पकड़ लिया गया।
उसी साल उत्तरपूर्वी इराक के खुर्मुल में अमेरिकी सेना (US coalition forces) ने एक रासायनिक हथियार फैक्ट्री पर कब्जा किया। उन्हें वहाँ राइसिन और अन्य जहर के निशान मिले।
सन् 2000 के शुरुआती वर्षों में अमेरिकी गठबंधन सेना ने इराक और सीरिया में ISIS और अन्य आतंकी कट्टरपंथियों की ओर से चलाए जा रहे कई केमिकल लैब को पकड़ा।
माना जाता है कि ISIS ने सद्दाम की सत्ता में जहरीले केमिकल का जखीरा जब्त किया और कैदियों पर राइसिन समेत तरह-तरह के जहर का परीक्षण किया। इनका प्रयोग आतंकी हमलों और सजा-ए-मौत में किया जाता था।
ISIS की सत्ता में हुए राइसिन समेत कई खतरनाक केमिकल के हुए टेस्ट
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, ISIL/ISIS ने 8 अलग-अलग केमिकल एजेंट बनाए। इन केमिकल्स को इंसानों और जानवरों पर आजमाया और अपने 4 साल के शासनकाल में कम से कम 13 हमले किए।
इन एजेंट्स में एल्युमिनियम फॉस्फाइड, बोटुलिनम टॉक्सिन, क्लोरीन, सायनाइड आयन, निकोटिन, राइसिन, थैलियम सल्फेट और सल्फर मस्टर्ड (मस्टर्ड गैस) शामिल थीं।
ISIS ने इन खतरनाक कैमिकल्स इस्तेमाल मोर्टार, रॉकेट और आईईडी में किया। हालाँकि इन केमिकल्स को केमिकल वेपन्स कन्वेंशन (CWC) ने बैन कर रखा है। उस समय खुद ISIS प्रमुख अबू बकर अल-बगदादी ने इन केमिकल हथियारों के प्रयोग की मंजूरी दी थी।
ISIS के रासायनिक हथियारों के प्रयोग को तीन चरणों में समझा जा सकता है। पहले चरण में, जून 2014 से जून 2015 के बीच जिहादियों ने पुराने तरीके और आसानी से मिलने वाले इंडस्ट्रियल कैमिकल्स जैसे क्लोरीन और फॉस्फीन का इस्तेमाल किया। उनका मकसद कच्चे आईईडी को तैयार करना था।
ISIS की प्रोपेगेंडा मैगजीन ‘दाबिक’ और ‘रुमियाह’ में लगातार ‘जहर जिहाद’ का प्रचार किया जाता था और अकेले जिहादियों को आसानी से मिलने वाली चीजों से लोगों को मारने के लिए उकसाया जाता था। ISIS ने पारंपरिक तरीके छोड़कर कैमिकल, बायोलॉजिकल, रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर (CBRN) वाले सामानों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना शुरू किया।
दूसरे चरण में जून 2015 से जनवरी 2017 के बीच ISIS जिहादियों ने सल्फर मस्टर्ड एजेंट बनाने और उसे मोर्टार बम तथा रॉकेटों के जरिए गिराने की क्षमता की तकनीक तैयार की।
इस चरण में कैमिकल हमले सीरिया के अलेप्पो प्रांत से लेकर इराक के किर्कुक तक पूरे ‘खलीफाई इलाकों’ में किए गए। अप्रैल 2016 में ऐसे 8 हमले दर्ज हुए। कुल मिलाकर ISIS ने सीरिया और इराक में 37 से ज्यादा कैमिकल हमले किए, जिनमें से कम-से-कम 20 बार क्लोरीन का इस्तेमाल किया गया था।
तीसरे चरण में, आखिरी रिकॉर्डेड कैमिकल हमला 8 जनवरी 2017 को सीरिया में हुआ। मोसुल के जुलाई 2017 में ISIS के हाथ से जाने के बाद उनका कैमिकल हथियार बनाना लगभग बंद हो गया और कैमिकल हमलों का सिलसिला भी थम गया।
फरवरी 2015 में, ब्रिटेन के लिवरपूल से 31 वर्षीय सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर मोहम्मद अली डार्कनेट से राइसिन खरीदने की कोशिश कर रहा था। ऐसा करते हुए पकड़े जाने पर उसे 8 साल की जेल की सजा सुनाई गई।
अली ने ऑनलाइन अपना नाम ‘Weirdos 0000’ रखा था। डार्कनेट पर ‘साइकोकेम’ (Psychochem) नाम के सप्लायर से उसने 500 मिलीग्राम राइसिन के लिए कीमत पर बातचीत की। यह मात्रा 700 से 1400 लोगों को मारने के लिए काफी थी। लेकिन असल में यह सप्लायर FBI एजेंट था जिसने ब्रिटिश पुलिस को सूचना दी।
अली ने दावा किया कि वह सिर्फ कौतूहल के तहत डार्कनेट की सीमाएँ जानना चाहता था। मामला आतंकवादी हमला योजना का साबित नहीं हो सका, लेकिन जहरीले पदार्थ के खरीद के मामले में उसे सजा दी गई थी। अली ने कहा कि उसने टीवी शो ‘Breaking Bad’ देखने के बाद राइसिन के बारे में जाना था और इसे जानवरों पर टेस्ट करना चाहता था।
इसके अलावा ISIS ने जिहादियों को ट्रक या अन्य वाहनों का इस्तेमाल करके घातक हमले किए। 2016 में फ्रांस में हुआ नाइस हमला, जिसमें 86 से अधिक लोग मरे। 2016 में ही बर्लिन में ट्यूनीशियाई नागरिक अनिस अमरी ने हमला किया, जिसमें 12 लोग हताहत हुए।
2017 में लंदन ब्रिज पर एक इस्लामिक आतंकवादी हमला हुआ, जिसमें पाकिस्तानी-ब्रिटिश नागरिक खुर्रम बट, मोरक्को के राशिद रेदौआने और इटली के यूसुफ जघबा ने 8 लोगों की जान ले ली। 2017 में न्यूयॉर्क में उजबेकिस्तान के सयफुल्लो सैपोव ने हमला किया जिसमें 8 लोगों की मौत हुई।
इसी तरह के हमले कर जिहादियों ने बॉयो और टॉक्सिक हथियारों से हमलों को बढ़ावा दिया।
2018 के कोलोन प्लॉट में, एक ट्यूनीशियाई जिहादी सईफ अल्लाह एच ने जर्मनी के कोलोन में अपार्टमेंट में 84 मिलीग्राम राइसिन बनाया था। वह इसे डोर हैंडल पर फैलाने या सिरिंज के जरिए इंजेक्शन लगाने की योजना बना रहा था। वह 2017 में सीरिया जाने की कोशिश कर चुका था लेकिन तुर्की में रोक दिया गया।
वह जर्मन काउंटरटेरेरिज्म एजेंसियों की नजर में तब आया जब सईफ का ट्यूनीशियाई पासपोर्ट गायब हो गया। 2018 में ब्रिटिश खुफिया एजेंसी ने जर्मनी को एक ट्यूनीशियाई निवासी के संदिग्ध ऑनलाइन शॉपिंग के बारे में सूचित किया। सईफ की पत्नी यास्मीन को भी उसके जिहादी रुझानों का पता था।
जून 2018 में सईफ अल्लाह एच को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन तब तक उसने अपने अपार्टमेंट में 84.03 मिलीग्राम राइसिन बना लिया था और 3,150 अरंडी के बीज जमा कर लिए थे।
अक्टूबर 2024 में, 18 वर्षीय आरोपित एक्सेल रुदाकुबाना पर इंग्लैंड के साउथपोर्ट में टेलर स्विफ्ट-थीम वाली डांस क्लास में चाकू से हमले के बाद 3 हत्याओं और 10 हत्या के प्रयास के आरोप लगाए गए।
यूके पुलिस ने रुदाकुबाना के घर की तलाशी ली और वहाँ एक PDF फाइल बरामद की। इसका शीर्षक था ‘Military Studies in the Jihad Against the Tyrants: The Al-Qaeda Training Manual’. इस दस्तावेज़ के मिलने के बाद उस पर आतंकवाद का आरोप भी लगाया गया।
अधिकारी यह भी दावा करते हैं कि रुदाकुबाना ने घातक टॉक्सिन वाला राइसिन जहर बनाया, जिसके कारण उस पर बॉयोवेपन बनाने का आरोप भी लगा है। ISIS पर भारत की कार्रवाई 2014 से जारी: पारंपरिक हथियार और जिहादी पुराने हैं, राइसिन जैव-आतंकी साजिश ने लाई नई परत
2016 में केरल मॉड्यूल का भंडाफोड़ से लेकर 2019 के श्रीलंका ईस्टर बम धमाकों में भारत के लिंक की जाँच, 2022 बिहार टेरर मॉड्यूल, 2023 पुणे आईएसआईएस टेरर मॉड्यूल, 2025 में पुणे, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली में आतंकी हमलों की साजिश रचने वाले जिहादियों को पकड़ने के लिए बहु-राज्य अभियानों से लेकर, 2024 में बेंगलुरु में लश्कर-ए-तैयबा टेरर मॉड्यूल तथा 2025 में दिल्ली में आईएसआईएस से जुड़े टेरर मॉड्यूल तक राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) और प्रत्येक राज्य की एंटी-टेररिज्म स्क्वाड (ATS) आईएसआईएस और अन्य इस्लामी आतंकी संगठनों से जुड़े जिहादियों को गिरफ्तार कर इन मॉड्यूल्स का पर्दाफाश करती आ रही हैं। भारतीय एजेंसियाँ देश में अपनी जड़ें गहरी करने की कोशिश कर रहे विभिन्न इस्लामी आतंकी संगठनों के भर्ती और फाइनेंशियल नेटवर्क को तोड़ रही हैं।
हालाँकि गुजरात एटीएस की ओर से बताए गए जैविक युद्ध (बायो वार) या जैव-आतंकवाद (बायोटेररिज्म) का यह षड्यंत्र काफी चिंताजनक है। आईईडी, गोलीबारी, बम धमाके और इस्लामी कट्टरपंथ के बाद अब भारत को ‘विषैले खतरे’ का सामना करना पड़ रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, गिरफ्तार किए गए आईएसआईएस से जुड़े जिहादियों ने राइसिन (Ricin) का उपयोग करके लोगों को मारने की साजिश रची थी। इसके लिए आतंकवादी गुजरात और अन्य राज्यों में भीड़भाड़ वाले फूड मार्केट और सप्लाई चेन को अपने लक्ष्य के तौर पर देख रहे थे। जिहादियों का मकसद था कि लोगों की खाद्य आपूर्ति में जहर मिलाकर बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या करने की योजना बनाई थी।
हालाँकि सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं और राइसिन जैव-आतंकी साजिश की जाँच जारी है, लेकिन ऐसे मामलों को ‘भटके हुए नौजवानों’ की मूर्खता या शरारत कहकर अनदेखा नहीं किया जा सकता। बल्कि, इस बायोटेररिज्म साजिश का खुलासा देश के लिए आँखें खोलने वाला है ताकि वह समझ सके कि इस्लामी आतंकवादियों से उसे कितने अलग और घातक खतरे मिल रहे हैं।
ये जिहादी कट्टरपंथी, ‘हूर’ पाने की चाह रखने वाले आतंकवादी हैं, जो एन्क्रिप्टेड नेटवर्क के माध्यम से प्रशिक्षित हैं, विज्ञान और तकनीक का उपयोग निर्दोषों की हत्या के लिए हथियार बनाने में कर रहे हैं और सुनियोजित जिहादी इकोसिस्टम इनकी रीढ़ बने हुए हैं।
हालाँकि पारंपरिक विस्फोटक या हथियार जिहादियों के लिए पुरानी रणनीति बने रहेंगे, लेकिन अलग-अलग युद्धों के इस युग में कैमिकल हथियार आसानी से घातक आतंक फैलाने की क्षमता रखते हैं।
राइसिन या सारिन जैसे रासायनिक पदार्थ सामान्य औद्योगिक रसायनों या अरंडी के बीजों से साधारण प्रयोगशालाओं में तैयार किए जा सकते हैं, जिससे यह अकेले या छोटे आतंकी समूहों के लिए सुविधाजनक विकल्प बन जाता है।
कम लागत, बड़े ढाँचे की कम जरूरत और पकड़े जाने की कम संभावना के कारण ये आतंकवादियों की पहली पसंद बनते हैं। इस तरह के हथियार बॉयोवॉर की आशंका बढ़ा देता है। इससे राइसिन जैसे अन्य जैविक हथियार आधारित साजिशें न केवल शांत बल्कि बड़े स्तर पर लोगों को मारने के लिए अनुकूल बन जाते हैं।
ये खबर मूल रूप से श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ।
बिहार विधानसभा चुनाव में मतदान शांतिपूर्ण रहा है। राज्य में कई ऐसे गाँव और कस्बे हैं जहाँ पहली बार वोटिंग हुई। नक्सलप्रभावित इन क्षेत्रों में पहले कोई पोलिंग बूथ नहीं बनाया जाता था। गाँव के लोग नक्सलियों से डर कर वोट डालने दूसरी जगह जाते भी नहीं थे, लेकिन इस बार नजारा बदला दिखा। इन क्षेत्रों में जमकर वोट पड़े और लोगों की लंबी कतारें सुबह से ही देखी गई।
बिहार चुनाव के पहले चरण में मुँगेर का भीमबाँध, तारापुर, लखीसराय का सूर्यगढ़ा, कछुआ, बाँसकुंड जैसे इलाकों में कई ऐसे बूथ रहे, जो कभी नक्सल प्रभावित हुआ करते थे, वहाँ दशकों बाद मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग किया।
दूसरे चरण में जमुई के चोरमारा, गया के पिछुलिया और रोहतास के रेहल गाँव ऐसे ही क्षेत्र थे, जहाँ पहली बार लोगों ने अपने गाँव में ही वोट डाला। जाहिर है लोगों में उत्साह भी गजब का था। इन क्षेत्रों में पहली बार पोलिंग बूथ बनाया गया। गाँव में पार्टियों के समर्थक भी दिखे, जो पहले नक्सली बायकॉट की वजह से गायब रहते थे।
जमुई, गया के कई गाँव में बने पहली बार पोलिंग बूथ
जमुई के बरहट क्षेत्र के चोरमारा गाँव में 1011 एससी-एसटी मतदाता हैं। इनमें 523 महिला और 488 पुरुष वोटर हैं। इनलोगों ने इस बार वोट डाला।
गयाजी के इमामगंज विधानसभा क्षेत्र का पिछुलिया और तारचुआ गाँव भी नक्सलियों का केन्द्र रहा है। तारचुआ गाँव में तो 2024 लोकसभा चुनाव के वक्त पोलिंग बूथ बनाए गए और वोटिंग प्रक्रिया अपनाई गई, लेकिन पिछुलिया गाँव के लोगों ने पहली बार अपने गाँव में वोट डाला।
औरंगाबाद जिले के मदनपुर का बादाम क्षेत्र भी नक्सल प्रभावित रहा है। यहाँ पहली बार बूथ बनाया गया। यहाँ 894 मतदाता हैं। वोट डालने के लिए इनकी लंबी लाइनें सुबह से ही देखी गई। बुजुर्ग से लेकर पहली बार वोट डालने वाले युवा भी काफी उत्साहित थे। गाँव में सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए गए थे।
चुनाव के दौरान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में वोटिंग का टाइम बदला गया। दूसरे चरण में ऐसे 402 मतदान केन्द्र थे। यहाँ सुबह 7 बजे से शाम 4 बजे तक वोट पड़े। जबकि दूसरे क्षेत्रों में शाम 6 बजे तक वोट डाले गए।
रोहतास जिले के रेहल गाँव में 20 साल बाद 11 नवंबर 2025 को वोटिंग हुई। यहां वोटिंग के दौरान की कई तस्वीरें भी सामने आई। सुरक्षा के कड़े इंतजाम के बीच शांतिपूर्ण माहौल में यहाँ वोटिंग हुई ।
मुँगेर से लखीसराय तक कई गाँव में सालों बाद वोट पड़े
पहले चरण में नक्सल प्रभावित मुँगेर के भीमबाँध समेत 7 मतदान केन्द्रों पर 20 साल बाद वोट डाला गया। इन जगहों पर 5 जनवरी 2005 को नक्सली हमले हुए थे। भीमबांध इलाके के पास बारूदी सुरंग विस्फोट कर मुंगेर के SP समेत 7 पुलिसकर्मियों को मार दिया गया था। इसके बाद उन इलाकों से मतदान केंद्रों को हटा दिया गया था।
भीमबाँध तारापुर विधानसभा के तहत आता है। इसके बूथ संख्या 310 पर 170 महिलाएँ और 204 पुरुषों समेत 374 मतदाता हैं। पहले इस क्षेत्र में पोलिंग बूथ नहीं बनाई जाती थी। लोगों को 20 किलोमीटर दूर जाकर वोट डालना पड़ता था। जाहिर है नक्सलियों का डर और दूरी की वजह से लोग वोट डालने नहीं जा पाते थे, लेकिन इस बार लोगों ने मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
इसी तरह बिहार के कछुआ और बासकुंड गाँव के लोगों ने 16 साल बाद मतदान किया। नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण पहले मतदान करना लोगों के लिए संभव नहीं हो पाता था।
लखीसराय जिले के 56 मतदान केंद्र नक्सल प्रभावित हैं। चानन प्रखंड के दो मतदान केंद्र संख्या 407 सामुदायिक भवन कछुआ में 363 मतदाता है। मतदान केंद्र संख्या 417 बासकुंड-कछुआ में 495 मतदाता हैं। नक्सल प्रभावित इन दोनों इलाकों में पहली बार EVM के जरिए मतदान हुए।
इन दोनों मतदान केंद्रों में वोट डालने के लिए मतदाताओं को पहले 6 से 10 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। साथ ही इसके लिए लोगों को जंगल और पहाड़ पार कर पैदल चलना पड़ता था। जाहिर है नक्सलियों के चुनाव बहिष्कार के बीच इनके लिए वोट डालना लगभग असंभव-सा था।
लोकसभा चुनाव 2024 में 5 माओवाद से प्रभावित मतदान केंद्र को बदलकर मैदानी भाग में लाया गया था। लेकिन एक साल के अंदर इसे नक्सल से मुक्त कर दिया गया। चुनाव आयोग ने उन 5 मतदान केंद्रों को उनके मूल स्थान पर स्थापित कर वोट कराया।
इसी तरह लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र के चार गाँवों में भी इस बार पोलिंग बूथ बनाए गए।
8 जिलों में नक्सलवाद का असर
झारखंड से सटे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों जैसे- गया ,अलवर और रोहतास में बॉर्डर पर खास निगरानी की गई, ताकि वोटिंग प्रक्रिया में किसी तरह की दिक्कत न हो।
राज्य के 8 जिले ऐसे हैं, जो नक्सल प्रभावित माने जाते हैं। इनमें गया, औरंगाबाद, मुँगेर, जमुई, कैमूर, लखीसराय, नवादा और रोहतास शामिल है। नक्सल प्रभावित बांका और पश्चिम चंपारण के बगहा को अब नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया है।
बिहार में इस बार दो चरणों में हुए मतदान
बिहार विधानसभा चुनाव इस बार दो चरणों में संपन्न हुए। पहले चरण में 6 नवंबर को 121 सीटों पर मतदान हुआ जबकि 11 नवंबर को 122 सीटों पर मतदान हुआ।
बिहार में पहले 5 से 7 चरणों में भी मतदान होता था। इसकी वजह थी चुनावी हिंसा। लूटपाट, बूथ कैप्चरिंग और बैलेट बॉक्स का ‘जिन्न’। लेकिन पिछले कुछ सालों से यहाँ चुनाव आयोग शांतिपूर्ण मतदान कराने में सफल रहा है। इस बार तो दो चरणों में चुनाव भी कराए गए।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 और भी खास था, क्योंकि 22 साल बाद हुए एसआईआर के माध्यम से यहाँ वोटर लिस्ट अपडेट किया गया।
देश में पहली बार बूथ कैप्चरिंग बिहार में हुआ
देश में पहली बार बूथ कैप्चरिंग की खास घटना 1957 में बिहार के बेगूसराय के रचियाही में हुई थी। घटना की जानकारी दूसरे दिन लोगों को अखबार से लगी। 1957 की इस घटना ने बिहार में राजनीति की दिशा ही बदल दी। राज्य के चुनाव पर माफिया हावी होने लगे। राजनीतिज्ञों और माफियाओं के साँठगाँठ की शुरुआत भी हो गई।
1980 तक आते-आते चुनाव में बाहुबलियों का बोलबाला देखा जाने लगा। हालाँकि देश में चुनाव सुधारों की चर्चा भी होने लगी। 1957 की घटना के बाद चुनाव आयोग ने सुरक्षाबलों की तैनाती पर जोर देना शुरू किया। धीरे-धीरे केंद्रीय बलों की मौजूदगी जरूरी हो गई।
लालू राज में निकलते थे बैलेट बॉक्स से ‘जिन्न’
लालू राज में चुनाव के दौरान बैलेट बॉक्स खुलते ही जिन्न निकलता था। यानी वोट से पहले के माहौल कुछ और बयां करते थे और जीत का सेहरा किसी और के सिर सजता था। बूथ लूट तो आम बात थी।
हत्या, अपहरण की खबरों से पेपर पटे रहते थे। ये वह दौर था, जब चुनाव लोकतंत्र का उत्सव नहीं बल्कि डर और दहशत बन चुका था।। खुलेआम वोटरों को डराया धमकाया जाता था। मतदाताओं के वोट पहले ही पड़ चुके होते थे, उन्हें वापस भेज दिया जाता था।
बिहार चुनाव 2025 इस मामले में खास है कि यहाँ नक्सल प्रभावित जिलों में भी मतदान केन्द्र की व्यवस्था गाँव-गाँव की गई। इस लिहाज से ये चुनाव ऐतिहासिक रहा। डर से परे लोगों ने अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल किया। दशकों बाद अपने गाँव के बूथ पर वोट डालने की खुशी साफ दिखाई दी। जाहिर है उत्साह भी था। इसका भी असर रहा कि वोटिंग प्रतिशत ने पुराने आँकड़े पार कर दिए।
बिहार में ऐतिहासिक चुनाव का श्रेय मोदी सरकार की नक्सल विरोधी अभियानों और कोशिशों को जाता है, जिसकी वजह से नक्सलवाद अब कुछ जिलों में सिमट कर रह गई है। बड़े बड़े ईनामी नक्सली हथियार डाल रहे हैं। मुख्य धारा में शामिल हो रहे हैं। बिहार में वोटिंग की ‘गूँज’ नक्सली दहशत खत्म होने का सबसे बड़ा सबूत है।
दिल्ली के लाल किले के पास सुनहरी मस्जिद के करीब सोमवार (10 नवंबर 2025) शाम जबरदस्त धमाका हुआ। एक सफेद i-20 कार में हुआ यह विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि 8 लोगों की मौत हो गई और 20 से अधिक घायल हुए। यह धमाका इतना जोरदार था कि आसपास खड़ी कई गाड़ियाँ जलकर खाक हो गईं। पुलिस को घटनास्थल से एक हाथ बरामद हुआ, जिसके DNA की जाँच से हमलावर की पहचान की जा रही है।
शुरुआती जाँच में सामने आया कि कार को डॉ मोहम्मद उमर नाम का संदिग्ध चला रहा था, जो फरीदाबाद के आतंकी मॉड्यूल से जुड़ा था। इस धमाके के बाद सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हो गई हैं और लाल किला 3 दिनों के लिए बंद कर दिया गया है। लाल किला ब्लास्ट की जाँच गृह मंत्रालय ने NIA को सौंप दी है। अभी तक इस मामले की जाँच दिल्ली पुलिस कर रही थी।
कश्मीर में लगे कुछ पोस्टर बने आतंक की जाँच की शुरुआत
यह पूरी कहानी एक छोटी-सी लगने वाली लेकिन बेहद अहम घटना से शुरू हुई। श्रीनगर के नौगाम इलाके में दीवारों पर लगे धमकी भरे पोस्टरों से। अक्टूबर 2019 के बाद पहली बार अक्टूबर 2025 में ऐसे पोस्टर दिखे, जिनमें जैश-ए-मोहम्मद के नाम से सुरक्षा बलों को खुली धमकियाँ दी गई थीं। उस समय इलाके में सामान्य शांति थी, इसलिए अचानक ऐसे पोस्टरों का सामने आना पुलिस के लिए असामान्य संकेत था।
श्रीनगर के SSP जी वी सुनीप चक्रवर्ती ने तुरंत जाँच के आदेश दिए, जिन्होंने इससे पहले कई बड़ी आतंकी कार्रवाइयों को विफल किया था। पुलिस टीमों ने इलाके की CCTV फुटेज खंगालनी शुरू की और कुछ ही दिनों में तीन ऐसे चेहरों की पहचान हुई जो पहले पत्थरबाजी और भड़काऊ गतिविधियों में शामिल रह चुके थे। इन्हीं तीन ओवरग्राउंड वर्करों (OGWs) की गिरफ्तारी ने एक ऐसी कड़ी को खोला, जिसने धीरे-धीरे एक गहरे आतंकी नेटवर्क की परतें उजागर कर दीं।
जो शुरुआत में सिर्फ कुछ पोस्टर लगने की मामूली घटना लग रही थी, वही अब देश के भीतर फैले एक मल्टी-स्टेट आतंकी मॉड्यूल का शुरुआती सुराग बन चुकी थी। ऐसा नेटवर्क, जो कश्मीर से हरियाणा और दिल्ली तक अपनी जड़ें फैला चुका था।
मौलवी इरफान से खुला आतंकी साजिश का जाल
ओवरग्राउंड वर्करों (OGWs) की गिरफ्तारी के बाद जब पुलिस ने पूछताछ शुरू की, तो जाँच की दिशा शोपियाँ के मौलवी इरफान अहमद तक जा पहुँची। यही वह कड़ी थी, जिसने पूरे आतंक नेटवर्क का दरवाजा खोल दिया। इरफान कोई आम व्यक्ति नहीं था, वह स्थानीय मस्जिद में मौलवी था और मजहब के नाम पर युवाओं को कट्टरपंथ की राह पर मोड़ने का काम करता था।
तीन हफ्तों तक चली गहन पूछताछ में यह सामने आया कि इरफान का सीधा संबंध जैश-ए-मोहम्मद (JeM) और अंसार गजवत-उल-हिंद (AGH) जैसे पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों से था। इरफान के मोबाइल फोन से पुलिस को कई चौंकाने वाले सबूत मिले, जिनमें पाकिस्तान में बैठे जैश के आतंकी उमर बिन खत्ताब के टेलीग्राम चैनल से सीधा संपर्क शामिल था।
यही डिजिटल सबूत वह धागा साबित हुआ, जिसने जाँच एजेंसियों को एक ऐसे ‘व्हाइट कॉलर टेरर नेटवर्क‘ तक पहुँचा दिया, जो बाहर से शिक्षित और सभ्य दिखने वाले डॉक्टरों, मौलवियों और प्रोफेशनल्स की आड़ में देश के भीतर गहरी साजिश रच रहा था। इस खुलासे ने सुरक्षा एजेंसियों को झकझोर दिया, क्योंकि अब तक आतंक की परिभाषा बंदूकों और जंगलों तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन यहाँ आतंक ‘डॉक्टरों के लैब कोट’ और ‘मौलवियों के उपदेश’ की ओट में पल रहा था।
डॉक्टरों की दुनिया में छिपा आतंक
मौलवी इरफान अहमद से मिली जानकारी ने पुलिस को एक चौकाने वाली दिशा दी। 3 पढ़े-लिखे डॉक्टरों तक पहुँचाया, जो अपने पेशे का पर्दा डालकर आतंक के असली मंसूबों में लिप्त थे। ये डॉ मुजम्मिल शकील (पुलवामा), डॉ आदिल अहमद राठर (कुलगाम) और डॉ शाहीना शाहिद (लखनऊ) थे।
पूछताछ में सामने आया कि ये डॉक्टर सिर्फ मरीजों का इलाज नहीं कर रहे थे, बल्कि उन्होंने आतंकियों के लिए हथियार और बम बनाने की सामग्री जुटाने में सक्रिय मदद की थी। खुद को मेडिकल प्रोफेशनल दिखाकर उन्होंने लोगों का विश्वास हासिल किया और किसी को शक होने से बचाया।
इन सभी का तार हरियाणा के फरीदाबाद में स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़ा था। यही वह जगह थी, जहाँ से पुलिस ने अब तक के सबसे बड़े विस्फोटक जखीरे में से एक बरामद किया। लगभग 2,900 किलो अमोनियम नाइट्रेट, हथियार और बम बनाने की सामग्री, जो दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में बड़े हमलों की योजना का हिस्सा हो सकती थी। यह खुलासा साफ कर देता है कि कैसे आतंक अब सिर्फ संघर्ष क्षेत्रों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा और पेशेवर संस्थानों के भीतर भी छिपकर काम कर रहा है।
यूनिवर्सिटी से आतंक की लैब तक: शिक्षा का काला इस्तेमाल
जाँच में सामने आया कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी में कार्यरत डॉ मुजम्मिल शकील ने अपने पेशेवर माहौल का दुरुपयोग किया। उसने यूनिवर्सिटी की लैब उपकरणों और रिसर्च सामग्री का इस्तेमाल विस्फोटक तैयार करने के लिए किया। दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट में कहा गया कि यूनिवर्सिटी में छिपाए गए RDX के सैंपल्स प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किए गए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह तैयारी सिर्फ थिएरेटिकल नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप से भी चल रही थी।
साथ ही, पहले अनंतनाग मेडिकल कॉलेज में कार्यरत डॉ आदिल अहमद राठर को सहारनपुर से गिरफ्तार किया गया। उसके कॉलेज लॉकर की तलाशी में AK-47 राइफल और कारतूस बरामद हुए। यह दर्शाता है कि इन डॉक्टरों ने स्वयं को मेडिकल प्रोफेशनल के रूप में छुपाकर, आतंक के लिए उपकरण और हथियार इकट्ठा किए, जिससे यह नेटवर्क पूरी तरह से शहरी और पेशेवर ढाँचे में घुसपैठ कर चुका था।
फरीदाबाद में बरामद 2,900 किलो विस्फोटक
जब पुलिस की टीम फरीदाबाद के धौज और फतेहपुर टगा गाँव में छापेमारी के लिए पहुँची, तो उन्हें वहाँ एक ऐसा खौफनाक जखीरा मिला कि सभी दंग रह गए। इन दो घरों से कुल 2,900 किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट बरामद हुआ, जो बड़े पैमाने पर विस्फोटक बनाने के लिए इस्तेमाल होता है।
सिर्फ इतना ही नहीं, पुलिस ने 20 टाइमर, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट, तार, रिमोट कंट्रोल, बैटरियाँ और धातु की चादरें भी जब्त कीं। ये सभी सामान IED तैयार करने में काम आते हैं, यानी किसी भी बड़े हमले की योजना के लिए पूरी तरह से तैयार सामग्री थी।
इसके अलावा, एक घर से AK-56 राइफल, क्रिंकोव राइफल, चीनी पिस्तौल और बरेटा गन जैसे भारी हथियार भी मिले। जाँच में पता चला कि यह पूरा मॉड्यूल पाकिस्तान स्थित आतंकियों के निर्देशों पर काम कर रहा था और इसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी। इस खुलासे ने साफ कर दिया कि आतंक अब सिर्फ जंगली इलाकों या संघर्ष क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी और शिक्षित माहौल में भी चुपचाप जाल बुन रहा है।
जाँच के बाद गिरफ्तारी का सिलसिला
मौलवी इरफान अहमद और तीन डॉक्टरों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की कार्रवाई और व्यापक हुई। जम्मू-कश्मीर और हरियाणा के अलग-अलग स्थानों से 8 और लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें आरिफ निसार, यासिर-उल-अशरफ, मकसूद अहमद, और जमीर अहमद आहंगर उर्फ मुतलशा शामिल थे।
जाँच में यह भी सामने आया कि मुतलशा एक पैन-इंडिया चैट ग्रुप ‘फर्जंदान-ए-दारुल उलूम देवबंद’ का सक्रिय सदस्य था। यह ग्रुप ऑनलाइन युवाओं को जिहाद के लिए मानसिक रूप से प्रेरित और कट्टरपंथ की ओर मोड़ने का काम करता था। सभी गिरफ्तार आरोपितों को UAPA की धारा 16 और 18 के तहत न्यायिक हिरासत में भेजा गया, जिससे यह नेटवर्क पूरी तरह से न्यायिक नियंत्रण में आ गया।
दिल्ली तक कैसे पहुँची साजिश
जाँच में सामने आया कि फरीदाबाद से सटे इलाकों में विस्फोटक तैयार किए जा रहे थे और इन्हें दिल्ली में लाने की तैयारी थी। पुलिस को शक है कि इस नेटवर्क का मकसद दिल्ली या एनसीआर में बड़ा ब्लास्ट कराना था, ताकि सांप्रदायिक तनाव फैल सके। धौज में बरामद सामग्री से अनुमान है कि विस्फोटक पिछले दो वर्षों में धीरे-धीरे जुटाए गए थे।
फॉरेंसिक टीम ने मौके से मिले अवशेषों में अमोनियम नाइट्रेट फ्यूल ऑयल की मौजूदगी की पुष्टि की। यह वही केमिकल है जो फरीदाबाद में जब्त किए गए विस्फोटकों में भी पाया गया था। NIA और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल अब यह जाँच कर रही है कि क्या यह आत्मघाती हमला (फिदायीन ऑपरेशन) था।
क्या था मकसद और आगे का खतरा
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि डॉ उमर ने यह विस्फोट ‘घबराहट में किया गया हमला’ था। शक है कि फरीदाबाद में छापेमारी और डॉ मुजम्मिल की गिरफ्तारी के बाद उसने जल्दबाज़ी में धमाका कर दिया, ताकि साजिश उजागर होने से पहले कोई ‘प्रभावी वार’ किया जा सके। हालाँकि एजेंसियाँ यह भी जाँच कर रही हैं कि क्या दिल्ली मूल लक्ष्य थी, या यह धमाका किसी और बड़ी योजना का हिस्सा था।
ISIS-India की खौफनाक साजिश: खाना-पानी में जहर घोलने का प्लान
इसके अलावा, गुजरात ATS ने एक खौफनाक साजिश का पर्दाफाश करते हुए तीन आरोपितों ‘कैराना के आजाद सुलेमान शेख (20), लखीमपुर के मोहम्मद सुहैल (23) और एक डॉक्टर को गिरफ्तार किया था, जिन पर खाने-पीने की वस्तुओं में घातक जहर (रिसिन) मिलाकर बड़े पैमाने पर लोगों को मारने और दहशत फैलाने का आरोप है।
उनके निशाने में एक RSS कार्यालय, दिल्ली का आजाद मार्केट और अहमदाबाद का फल बाजार थे और छापे में तीन पिस्तौल, 30 कारतूस और ज़हर बनाने में काम आने वाला अरंडी का तेल बरामद हुआ है। जाँच में यह नाता भी मिला है कि गिरोह ISIS-KP से जुड़ा था और उसे पाकिस्तानी हैंडलर ‘अब्दुल खदीजा’ से टेलीग्राम के जरिए निर्देश मिलते थे, इस समूह का नेटवर्क यूपी, राजस्थान, गुजरात और आंध्र प्रदेश तक फैला पाया गया है और अब ATS साइबर फोरेंसिक से मोबाइल-लैपटॉप की पड़ताल कर संदेश-लेनदेन और धन के स्रोत का पता लगा रही है क्योंकि खाने-पीने में जहर मिलाना छिपकर व्यापक नुकसान और सार्वजनिक भय पैदा करने की नीति है।
यह पूरी कहानी बताती है कि कैसे एक छोटा-सा सुराग, कुछ दीवारों पर चिपके पोस्टर, देश की सुरक्षा एजेंसियों को एक ऐसे आतंकी नेटवर्क तक ले गया जो डॉक्टरों, मौलवियों और पढ़े-लिखे पेशेवरों के रूप में काम कर रहा था। इन लोगों ने ‘ज्ञान’ और ‘सेवा’ के नाम पर आतंक फैलाने की योजना बनाई थी।
अगर फरीदाबाद और कश्मीर में समय रहते छापेमारी न होती, तो दिल्ली एक बहुत बड़े हमले का शिकार हो सकती थी। फिलहाल, जाँच जारी है और देश की सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हैं, ताकि कोई और ‘व्हाइट कॉलर आतंकी’ समाज के भीतर से फिर न उभरे।
बिहार चुनाव में मुस्लिम वोटर्स कॉन्ग्रेस और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के बीच लड़ रहे हैं। किशनगंज में मुस्लिम यह तो समझा नहीं सके कि कॉन्ग्रेस और AIMIM ने उनके लिए किया क्या है लेकिन इतना कहकर बात टाल रहे हैं कि उनका ‘दिमाग ठंडा’ रखा है।
कॉन्ग्रेस का समर्थन करने वाले एक मुस्लिम व्यक्ति कहते हैं, “राहुल गाँधी से खूब मोहब्बत करते हैं। हम मोदी को भी मानते हैं। लेकिन कमाकर तो खुद ही खाना है। बिहार में कॉन्ग्रेस ही आएगी।”
उधर, AIMIM समर्थक कहते हैं, “कॉन्ग्रेस ने नौजवान को बेरोजगारी दिया है। मुस्लिमों को कॉन्ग्रेस ने अंधेरे में रखा है। इस मामले में BJP सही है। BJP ने हिंदू-मुस्लिम के बीच झगड़ा खत्म किया है। कॉन्ग्रेस हिंदू-मुस्लिम झगड़े को बनाकर रखता था। मुस्लिम के लिए कुछ नहीं किया। भाईचारा बनाकर छुरा घोपने का काम करता है।”
बिहार ग्राउंड रिपोर्ट में ऑपइंडिया टीम कटिहार पहुँची, जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठ ने डेमोग्राफी बदल दी और हिंदुओं के लिए खतरा पैदा कर दिया। यहाँ एक प्राचीन मंदिर पर पिछले तीन दशकों से मुस्लिम समुदाय का कब्जा है। हिंदू समुदाय जमीन से लेकर कोर्ट तक लड़ रहा है, लेकिन अपने आराध्य की पूजा का अधिकार नहीं मिल सका।
एक स्थानीय हिंदू निवासी ने कहा, “30 साल से मंदिर पर कब्जा है, हम कोर्ट गए, लेकिन न्याय नहीं मिला। घुसपैठिए बढ़ रहे, हमारी जमीन छीन रहे।”
अनुराग मिश्रा की रिपोर्ट से पता चला कि घुसपैठ ने इलाके की जनसांख्यिकी बदल दी, हिंदू अल्पमत में आ गए। इस मंदिर विवाद में हिंदू संगठन भी सक्रिय हैं, लेकिन मुस्लिम पक्ष दावा करता है कि जमीन उनकी है। कोर्ट केस लंबित है। यह लड़ाई हिंदू अस्तित्व की है।
बिहार में महिला वोट बैंक नीतीश सरकार के साथ हैं। खासकर, जबसे सरकार ने इन महिलाओं के बैंक खाते में ₹10-10 हजार ट्रांसफर किए। ये धनराशि पाकर कोई महिला अपना बिजनेस खड़ा कर चुकी है तो कोई महिला सरकारी नौकरी में आगे बढ़ रही है।
सीतामढ़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में शामिल इन महिलाओं ने कहा कि उन्हें नीतीश सरकार ने आत्मनिर्भर बनाया है, इसीलिए सिर्फ NDA को ही वोट देंगी। एक महिला ने कहा, “नरेंद्र मोदी को ही वोट देंगे। उन्होंने बिजली फ्री किया, जीविका से काम दिया, बच्चों को पढ़ाया। तेजस्वी सिर्फ बोलते हैं, जो किया है पीएम मोदी ने किया है।”
मधु कुमारी कहती हैं, “महिलाएँ आगे बढ़ रही हैं। वे आत्मनिर्भर बन रही हैं। पीएम मोदी बहुत अच्छा कर रहे हैं। मैं दिल्ली रहती थी, अब यहाँ BPSC से टीचर बन गई हूँ।”
बिहार विधानसभा चुनाव में ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए ऑपइंडिया की टीम सीमांचल के कटिहार पहुँची, जो बांग्लादेश सीमा से सटा है। यहाँ घुसपैठ बड़ा मुद्दा है, लेकिन स्थानीय मुस्लिम आबादी इसे अफवाह या राजनीतिक एजेंडा बताकर नकार रही है।
कटिहार में मुस्लिम आबादी 44% है, जो 1951 से 16% बढ़ चुकी। बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिए आ रहे हैं, हिंदू अल्पमत होकर पलायन कर रहे।
एक स्थानीय मुस्लिम निवासी ने कहा, “यह BJP का वोट बैंक गेम है, हम देसी हैं, कोई घुसपैठ नहीं।” लेकिन हिंदू ग्रामीणों का कहना है, “लैंड ट्रांसफर अनौपचारिक तरीके से हो रहा, सुरजापुरी मुस्लिम ब्रदरहुड का नाम लेकर शेरशाहाबादी घुसपैठिए बस रहे।”
NRC-CAA का विरोध इसलिए क्योंकि वे डरते हैं कि असली घुसपैठिए पकड़े जाएँगे। कटिहार जैसे इलाकों में डेमोग्राफी चेंज नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट है। असलियत ये है कि यहाँ भारी घुसपैठ हो रही है, लेकिन इसे स्वीकारना मुश्किल है।
बिहार विधानसभा चुनाव में ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम माँ सीता की जन्मभूमि सीतामढ़ी पहुँची, जहाँ पीएम नरेंद्र मोदी ने भव्य रैली की। पीएम मोदी की रैली में भारी भीड़ उमड़ी। इस दौरान ज्यादातर लोग NDA केविकास और नीतीश कुमार की साफ छवि की तारीफ कर रहे थे। एक ध्रुव राठी फैन ने तेजस्वी यादव के जॉब प्रॉमिस पर भरोसा जताया, लेकिन जंगलराज के काले इतिहास को भूलने की बात पर लोग भड़क गए।
रैली में एक स्थानीय युवक ने कहा, “तेजस्वी के वादे सुन-सुनकर थक गए, लालू राज में बेरोजगारी चरम पर थी। NDA ने सड़कें, बिजली दी है।” अल्पमत में कुछ लोग तेजस्वी को मौका देने की बात कह रहे थे, लेकिन बहुमत ने इसे खारिज किया।
अनुराग मिश्रा की रिपोर्ट बताती है कि महागठबंधन की राह कठिन क्यों है- विकास की कमी और पुराने घोटालों का बोझ। सीतामढ़ी जैसे इलाकों में NDA का जलवा साफ दिखा।