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‘थोड़े से हिंदू बचे हैं, वॉट्सऐप कर दो’: शहबाज शरीफ ने दी दीपावली की बधाई तो भड़के सोशल मीडिया यूजर्स, PAK में हिंदुओं के रेप-हत्या-अपहरण के बीच ‘शांति संदेश’ बेमानी

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोमवार (20 अक्टूबर 2025) को X पर एक लंबा चौड़ा पोस्ट लिखकर दीपावली की बधाई दी। इस संदेश में उन्होंने शांति, करुणा और सर्वधर्म समभाव का संदेश दिया। वो पाकिस्तान जहाँ हिंदू प्रताड़ित है, महिलाएँ असुरक्षित हैं और सनातन के धार्मिक स्थलों को तोड़ा जा रहा है, वहाँ के प्रधानमंत्री की बातें सोशल मीडिया यूजर्स को हजम नहीं हुईं और उन्होंने शहबाज को आड़े हाथों ले लिया।

शहबाज शरीफ ने क्या कहा?

शहबाज ने X पर एक पोस्ट में लिखा, “दीपावली के शुभ अवसर पर, मैं पाकिस्तान और दुनिया भर में हमारे हिंदू समुदाय को अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।” उन्होंने आगे लिखा, “जैसे दीपावली के प्रकाश से घर और दिल रोशन होते हैं, यह त्योहार अंधकार को दूर करे, सद्भावना बढ़ाए और हम सभी को शांति, करुणा और साझा समृद्धि के भविष्य की ओर मार्गदर्शन करे।”

शहबाज ने आगे लिखा, “दीपावली की भावना, जो अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और निराशा पर आशा का प्रतीक है, हमें हमारे समाजों के सामने आने वाली चुनौतियों, असहिष्णुता से लेकर असमानता तक को पार करने के लिए सामूहिक संकल्प लेने की प्रेरणा देती है। आइए हम सब मिलकर यह सुनिश्चित करें कि हर नागरिक, चाहे किसी भी धर्म या पृष्ठभूमि का हो, शांति से जीवन यापन कर सके और प्रगति में योगदान दे सके।”

सीधे वॉट्सऐप ही कर दो: यूजर्स ने शहजाब को लगाई लताड़

पाकिस्तान में हिंदुओं पर हमले और उनकी प्रताड़ना को लेकर सोशल मीडिया यूजर्स ने शहजाब शरीफ को जमकर लताड़ लगाई है। एक X यूजर ने उनके बधाई संदेश पर जवाब देते हुए लिखा, “सीधे पाकिस्तान के हिंदुओं को वॉट्सऐप (पर ही मेसेज) कर दो। वहाँ बमुश्किल ही हिंदू बचे हैं।”

पत्रकार आदित्य राज कौल ने भी शहबाज को जमकर लताड़ा। उन्होंने X पर लिखा, “पहलगाम में हिंदुओं को मारने के बाद अब उन्हें दिवाली की बधाई दे रहे हैं। शर्मनाक है पाकिस्तान। उन्होंने पाकिस्तान में हिंदू, ईसाई और सिख समुदाय को लगातार मार डाला और जबरन धर्म बदलवाया। अहमदियों पर भी हर हफ्ते हमला होता है। दुनिया का सबसे खराब और आतंक पसंद देश।”

अधिकारी और लेखक प्रणव महाजन ने शहबाज को जवाब देते हुए लिखा, “इतना लंबा संदेश देखकर अच्छा लगा लेकिन शब्द खाली लग रहे हैं। एक इंसान की असली पहचान ये होती है कि उसके कहने और करने में कितना अंतर है। आपके मामले में ये अंतर तो धरती और सूरज के बीच की दूरी से भी ज्यादा है।”

उन्होंने आगे लिखा, “आप ‘अंधकार पर उजाला’ की बात करते हैं लेकिन आपके शासन में पाकिस्तान के हिंदू घरों की रोशनी लगातार बुझती जा रही है। जबरन धर्म परिवर्तन, मंदिरों का अपमान, हिंदू लड़कियों का अपहरण हो रहा है।”

पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचारों का कुचक्र

बँटवारे के बाद से ही पाकिस्तान में हिंदुओं पर लगातार अत्याचार हो रहे हैं। सामाजिक-आर्थिक भेदभाव से लेकर उनके धार्मिक अधिकारों को भी आतंकिस्तान में छीना जा रहा है। पिछले हफ्ते की ही बात है जब पाकिस्तान में एक नाबालिग हिंदू का जबरन अपहरण किया गया, उसका धर्म बदलवाया गया और उसका पाकिस्तान के एक ड्रग्स तस्कर से निकाह करवा दिया गया। यह ड्रग तस्कर पहले से ही शादीशुदा था और 7 बच्चों को अब्बू था।

सिंध क्षेत्र की एक हिंदू अधिकार कार्यकर्ता ने दावा किया कि यह ऐसा इस क्षेत्र में एक महीने के भीतर चौथा मामला था। ऐसी घटनाएं जिन्हें सुनकर लोग सिहर जाएँ पाकिस्तान में आए दिन होती रहती हैं। हिंदू लड़कियों को निशाना बना जा रहा है और पुलिस ऐसे मामले में कार्रवाई तो छोड़िए शिकायत दर्ज करने तक की जहमत नहीं उठाती है।

पाकिस्तान के अत्याचारों की दास्तां ऐसी ही कि लगता नहीं है कि कोई आदमी ऐसा कृत्य कर भी सकता है। पाकिस्तान से भागकर भारत आए एक परिवार ने बताया था कि उन्हें काफिर कहा जाता था और तिलक लगाकर बाहर निकलने में भी डर लगता था। परिवार ने बताया कि जब में पाकिस्तान में थे तो एक हिंदू लड़के की मुस्लिम से लड़ाई हो गई तो मामले को धर्म पर लाया गया, उसके साथ मारपीट की गई और हिंदू लड़के के हाथ-पैरों के नाखून तक भीड़ ने उखाड़ लिए।

हिंदुओं का अपहरण, महिलाओं का रेप-जबरन धर्मांतरण और निकाह उस पाकिस्तान में आम चीजें हो गई हैं जिसका प्रधानमंत्री दीपावली पर शांति का संदेश दे रहा है। इस साल के मार्च में केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया था कि किस तरह पाकिस्तान में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ रहे हैं।

केंद्र सरकार ने कहा था, “पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ अत्याचार की खबरें आई हैं, जिनमें हिंदू भी शामिल हैं। धमकी, अपहरण, उत्पीड़न, जबरन धर्मांतरण और जबरन विवाह जैसी घटनाएँ सामने आई हैं, जो उन्हें पलायन करने के लिए मजबूर करती हैं।”

इसके अलावा हिंदू धार्मिक स्थलों पर हमले और मंदिरों का अपमान भी आम बात हो गई है। मंदिरों को तोड़ने, उनकी संपत्ति हड़पने और पूजा की जगहों को बंद करने जैसी घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं। पाकिस्तान में हिंदू परिवार अक्सर शिक्षा, नौकरी और व्यवसाय में अवसरों से वंचित तक रह जाते हैं।

यूरोपियन टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान में ईसाइयों, हिंदुओं और अहमदिया मुसलमानों समेत सभी अल्पसंख्यकों पर मानवाधिकार हनन लगातार बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तान की तथाकथित लोकतांत्रिक संस्थाएँ पूरी तरह से कमजोर हो गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अहमदिया मुसलमानों को हत्याओं, मनमानी गिरफ्तारियों और यहाँ तक कि उनके पूजा स्थलों और कब्रिस्तानों को अपवित्र करने का सामना करना पड़ा है।

प्रयागराज ईसाई धर्मांतरण रैकेट के सभी 13 आरोपितों की जमानत याचिका खारिज, गरीब हिंदुओ को बनाते थे निशाना: बजरंग दल ने किया था पर्दाफाश

प्रयागराज जिला अदालत ने 16 अक्टूबर 2025 को फुलपुर थाने के अंतर्गत बौदई गाँव में चल रहे ईसाई धर्मांतरण गिरोह के 13 आरोपितों की जमानत अर्जी खारिज कर दी। यह आदेश अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने सुनाया।

अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया में यह प्रतीत होता है कि आरोपित गरीब हिंदुओं को लालच देकर, आर्थिक मदद का प्रलोभन देकर, मिशनरी स्कूलों में नौकरी देने के झाँसे और धार्मिक प्रचार के जरिए ईसाई बनाने की कोशिश में शामिल थे।

आरोपितों की पहचान सोनू कुमार, पंकज सरोज, सचिन, अनिल, राममिलन, सोना देवी, आरती देवी, शिवानी यादव, अंजुला, रेखा देवी, संगीता सरोज, शिवानी सरोज और हरीशिव के रूप में की गई है। इन सभी के खिलाफ 19 सितंबर 2025 को बजरंग दल फुलपुर के सह संयोजक शांतनु तिवारी की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया था।

आरोपितों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 191(2), 352, 351(3), 299 और 196(1) के तहत और उत्तर प्रदेश अवैध धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

बजरंग दल नेता ने धर्मांतरण रैकेट का किया पर्दाफाश

यह मामला बजरंग दल के सह-संयोजक शांतनु तिवारी की लिखित शिकायत से शुरू हुआ था। प्राथमिकी के अनुसार, शांतनु को लगातार ऐसी सूचनाएँ मिल रही थीं कि फुलपुर क्षेत्र के बौदई गाँव में कुछ लोग हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने के उद्देश्य से प्रार्थना सभाएँ आयोजित कर रहे हैं। 19 सितंबर 2025 को उन्हें गाँव में ऐसी ही एक सभा के चलने की जानकारी मिली। इसके बाद वे अपने तीन साथियों के साथ सत्यापन के लिए मौके पर पहुँचे।

(फोटो साभार: प्रयागराज जिला अदालत)

गाँव पहुँचने पर शांतनु ने देखा कि कुछ पुरुष और महिलाएँ ईसाई प्रार्थना कर रहे थे। यह सभा उन लोगों ने आयोजित की थी जो खुद को मिशनरी बता रहे थे। उनमें से एक व्यक्ति मुन्‍नीलाल (जो आरोपितों में शामिल है) खुद को ‘पादरी’ कह रहा था। पूछताछ करने पर कुछ उपस्थित लोगों ने बताया कि आरोपित हर हिंदू को ईसाई धर्म में परिवर्तित कराने पर मोटी रकम दी जाती है। उन्हें विदेशी फंडिंग और मिशनरी संगठनों का भी सहारा मिलता है।

धर्म परिवर्तन की रणनीति और झूठे वादे

FIR के मुताबिक, आरोपितों ने हिंदू समुदाय के लोगों से कहा था कि उनके धर्म में ‘कुछ भी नहीं है’ और उन्हें अपने घरों से देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हटा देनी चाहिए। आरोप है कि वे लोगों से कहते थे कि इन मूर्तियों की जगह यीशु मसीह की तस्वीरें लगाओ और ईसाई धर्म अपनाओ। इसके बदले में उन्हें आर्थिक सहायता देने और मिशनरी स्कूलों में नौकरी दिलाने का लालच भी दिया गया था।

शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया कि जब शांतनु और उनके साथी इस गतिविधि का विरोध करने लगे तो आरोपितों ने उनके साथ गाली-गलौज की और धमकी दी कि अगर वे दोबारा वहाँ आए तो उन्हें जान से मार दिया जाएगा। इस झड़प के बाद शांतनु ने तत्काल फुलपुर पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद पुलिस ने कड़े प्रावधानों के तहत अवैध धर्मांतरण निषेध कानून के तहत मामला दर्ज किया।

अदालत ने धर्म परिवर्तन अभियान के ‘प्रथम दृष्टया’ सबूत पर किया गौर

कोर्ट ने अपने आदेश में आरोपितों की जमानत याचिका को खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि याचिकाकर्ता सुनियोजित तरीके से निर्दोष और आर्थिक रूप से कमजोर हिंदू परिवारों को पैसों और नौकरी के प्रलोभन के जरिए धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने की कोशिश कर रहे थे। न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यह अपराध ‘गंभीर प्रकृति’ का है और ऐसे में इस चरण पर जमानत नहीं दी जा सकती।

(फोटो साभार: प्रयागराज जिला अदालत)

जमानत याचिका खारिज करते हुए अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि शिकायतकर्ता शांतनु तिवारी सहित गवाहों के बयानों में निरंतरता है और सभी ने इस बात की पुष्टि की है कि आरोपित नियमित रूप से प्रार्थना सभा के नाम पर धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने वाली बैठकों का आयोजन करते थे।

अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को भी अस्वीकार कर दिया कि वास्तविक तौर पर धर्म परिवर्तन नहीं हुआ था। अदालत ने कहा कि जाँच में आरोपितों की मंशा, प्रलोभन और तैयारी से जुड़े ठोस साक्ष्य स्पष्ट रूप से सामने आए हैं, जो अपराध की गंभीरता को दर्शाते हैं।

जाँच और हिरासत

जमानत याचिका खारिज होने के बाद अब सभी 13 आरोपित न्यायिक हिरासत में रहेंगे। उन्हें 21 सितंबर 2025 को हिरासत में भेजा गया था। पुलिस ने अदालत को बताया कि इस मामले की जाँच अभी जारी है और अधिकारियों की कोशिश है कि धर्मांतरण के इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों का पता लगाया जाए। साथ ही फंडिंग के सोर्स की पहचान की जा रही है।

इस बीच शिकायतकर्ता शांतनु तिवारी ने हाल ही में इसी तरह के एक अन्य मामले में भी फुलपुर थाने में शिकायत दर्ज कराई है। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने 18 अक्टूबर 2025 को तीन ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया, जो हिंदुओं को ईसाई धर्म अपनाने के लिए बहलाने और लुभाने का काम कर रहे थे। उस मामले में भी पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है और जाँच जारी है।

प्रभु राम के लंका से अयोध्या लौटने पर कैसी थी तैयारियाँ, जानें रामायण और रामचरितमानस में क्या है वर्णन?

अयोध्या में 14 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद लोग अपने आराध्य प्रभु राम का इंतजार कर रहे थे। हर गली, हर द्वार, हर हृदय में बस ‘राम’ के नाम की गूँज थी। नंदिग्राम में भरत तपस्वी वेश धारण किए दिन गिन रहे थे। महर्षि वाल्मिकी ने रामायण और तुलसीदास ने रामचरितमानस में उन क्षणों का वर्णन किया है जब लोग प्रभु राम के स्वागत का इंतजार कर रहे थे।

वाल्मिकी रामायण में श्रीराम की वापसी की वर्णन

रावण का वध करने और माँ सीता को उसकी कैद से छुड़ाने के बाद प्रभु श्री राम पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे थे। वाल्मिकी रामायण के युद्धकांड में श्रीराम की वापसी और अयोध्यावासियों की तैयारियों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

कहा जाता है कि श्रीराम ने अयोध्या में आगमन से पहले हनुमान जी को साधु का वेश बनाकर भरत को आगमन की सूचना देने को कहा था। श्रीराम के वनवास के बाद भरत उनकी चरण पादुकाएँ सिहांसन पर रखकर अयोध्या का राजकाज संभाल रखे थे। हनुमान ने उन्हें श्रीराम के आगमन का समाचार दिया तो वह प्रफुल्लित हो गए और पूरा नगर उनके स्वागत की तैयारियों में लग गया।

युद्ध कांड के 127वे सर्ग में महर्षि वाल्मिकी लिखते हैं-
श्रुत्वा तु परमानन्दं भरतः सत्यविक्रमः।
हृष्टमाज्ञापयामास शत्रुघ्नं परवीरहा।। ६-१२७-१

अर्थात् हनुमान जी से अत्यंत प्रसन्नता का समाचार सुनकर, वास्तव में वीर शासक और शत्रुओं का संहार करने वाले भरत ने शत्रुघ्न को आज्ञा दी, जो भी इस समाचार से प्रसन्न हुए।

इसके साथ ही, सदाचार वाले लोग से कुल-देवताओं और नगर के मंदिरों की पूजा मीठी-सुगंधित फूलों से करने और वाद्य-यंत्रों की मधुर ध्वनि के साथ उनका सम्मान करने का आदेश दिया गया। साथ ही, सभी गायकों, वाद्य-यंत्र बजाने वाले कलाकार, नर्तकियों, मंत्री, सैनिकों आदि को श्रीराम के चंद्रमा जैसे मुख-मंडल का दर्शन करने के लिए आने को कहा गया था।

वाल्मिकी रामायण में रामागमन की तैयारियाँ

महर्षि वाल्मिकी लिखते हैं कि भरत के वचन सुनकर, शत्रुओं का संहार करने वाले वीर शत्रुघ्न ने तुरंत हजारों श्रमिकों को बुलाया और उन्हें अलग-अलग टोलियों में बाँटकर आदेश दिया कि सड़कों के सभी गड्ढों को भरकर रास्ते समतल कर दो। जहाँ जमीन ऊबड़-खाबड़ है, उसे भी बराबर कर दो। नंदीग्राम से अयोध्या तक का मार्ग पूरी तरह साफ कर दो और उस पर शीतल जल का छिड़काव करो।

इसके बाद, अन्य लोग रास्ते के दोनों ओर लावा और पुष्प बिखेर दें। अयोध्या की सुंदर सड़कों के किनारों पर ऊँची पताकाएँ फहराई जाएँ। कल सूर्योदय तक नगर के सभी भवनों को सुनहरी फूल-मालाओं, घने पुष्प-गुच्छों, सूत के बंधन से मुक्त कमल-फूलों और पंचरंगी अलंकारों से सजा दिया जाए।

कुछ योद्धा सजे-धजे मदमस्त हाथियों पर ध्वज लहराते हुए सवार हुए। कुछ स्वर्ण जंजीरों से सुसज्जित हथिनियों पर चढ़े। श्रेष्ठ रथी अपने तेज़ रथों में निकले। हजारों घोड़ों पर सवार वीर सैनिक भाले, भाले और फंदे लिए ध्वजाओं के साथ आगे बढ़े। राजा दशरथ की सभी रानियाँ कौशल्या और सुमित्रा को आगे रखते हुए अपने रथों में बैठकर नंदीग्राम की ओर चलीं। भरत ने अपने भाई श्रीराम की खड़ाऊँ सिर पर रखीं अपने भाई से मिलने के लिए मंत्रियों के साथ पहुँचे।

श्रीमदवाल्मिकी रामायण

भरत ने श्रद्धा से झुककर उस पुष्पक विमान के सामने खड़े भगवान श्रीराम को प्रणाम किया, जो मेरु पर्वत पर चमकते सूर्य समान तेजस्वी दिख रहे थे। श्रीराम की आज्ञा से हंसयुक्त वह तेज पुष्पक विमान भूमि पर उतरा।

राम अपने आसन से उठे और वर्षों बाद मिले भरत को गले लगाकर गोद में बिठा लिया। हाथ जोड़कर भरत ने कहा, “प्रभु, यह सम्पूर्ण राज्य-सम्प्रभुता, जो आपके भरोसे मेरे पास थी, अब मैं आपको लौटा रहा हूँ। मेरा जीवन सफल हो गया, क्योंकि आज मैं अयोध्या के सच्चे राजा श्रीराम को पुनः अपने राज्य में देख रहा हूँ। आपका खजाना, अन्न-भंडार, महल और सेना, सब कुछ मैंने पहले से दस गुना बढ़ा दिया है।”

रामचरितमानस में रामागमन की तैयारियाँ

महाकवि तुलसीदास ने रामचरितमानस के उत्तरकांड में प्रभु राम के अयोध्या लौटने का वर्णन किया है। गोस्वामी जी लिखते हैं-
रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग।
जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग॥

अर्थात् (श्रीरामजी के लौटने की) अवधि का एक ही दिन बाकी रह गया, नगर के लोग बहुत अधीर हो रहे हैं। राम के वियोग में दुबले हुए स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ सोच (विचार) कर रहे हैं।

इसके बाद गोस्वामी जी ने हनुमान जी के भरत के साथ मुलाकात करने का वर्णन किया है जिसके बाद भरत, अयोध्या पहुँच गए थे। इसके बाद उन्होंने राजमहल जाकर यह खबर सुनाई। सभी नगरवासी भी यह सुनकर हर्ष से भर गए। गोस्वामी तुलसीदास ने जी ने लिखा-

दधि दुर्बा रोचन फल फूला । नव तुलसी दल मंगल मूला ॥
भरि भरि हेम थार भामिनी । गावत चलिं सिंधुरगामिनी ॥

अर्थात् (श्रीराम जी के स्वागत के लिए) दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और मङ्गल के मूल नवीन तुलसी दल आदि वस्तुएँ सोने के थालों में भर-भरकर हथिनी की-सी चालवाली सौभाग्यवती स्त्रियाँ गाती हुई चलीं।

श्रीरामचरितमानस

प्रभु राम आकाश मार्ग से अयोध्या के दर्शन करते हैं और सुग्रीव, अंगद और लंकापति विभीषण से कहा-
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि । उत्तर दिसि बह सरजू पावनि ॥
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा ॥

अर्थात् यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर दिशा में (जीवों को) पवित्र करने वाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य बिना ही परिश्रम मेरे समीप निवास (सामीप्य मुक्ति) पा जाते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि जब प्रभु राम अपने महल को जाने के लिए आग बढ़े तो आकाश फूलो की वर्षा से भर गया। नगर के स्त्री और पुरुषों के समूह अटारियों पर चढ़कर उनके दर्शन कर रहे थे। उन्होंने लिखा है, “सोनेके कलशों को विचित्र रीति से (मणि-रत्ना से) अलंकृत कर और सजाकर सब लोगोंने अपने-अपने दरवाजों पर रख लिया। सब लोगोंने मङ्गलके लिये बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगाई थीं। सारी गलियाँ सुगन्धित द्रवों से सिंचायी गयीं। अनेकों प्रकार के सुन्दर मंगल-साज सजाये गए और हर्ष पूर्वक नगर में बहुत-से डंके बजने लगे।”

गोस्वामी जी लिखते हैं, “स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है और श्री रघुनाथ जी का विरह सूर्य है। इस विरह-सूर्यके तापसे वे मुरझा गयी थीं। अब उस विरहरूपी सूर्यके अस्त होने पर श्रीराम रूपी पूर्ण चन्द्र को निरखकर वे खिल उठीं। अनेक प्रकारके शुभ शकुन हो रहे हैं, आकाश में नगाड़े बज रहे हैं। नगरके पुरुषों और स्त्रियों को सनाथ करके भगवान् श्रीरामचन्द्र जी महल को चले।

हालाँकि, इस दोनों पुस्तकों में दीपावली या दिवाली शब्द का सीधा उल्लेख नहीं है लेकिन परंपरा की शुरुआत यहीं से माना जाती है। हजारों वर्ष की भारतीय परंपरा में कई स्कंद पुराण और पद्म पुराण जैसे ग्रंथों में इसका जिक्र आता है।

भगवान श्रीराम का अयोध्या आगमन केवल एक राजा की वापसी नहीं बल्कि सत्य, धर्म और मर्यादा की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। चौदह वर्ष के वनवास और अन्याय पर विजय के बाद जब श्रीराम लौटे, तो अयोध्या में केवल दीप नहीं जले, बल्कि आशा और नैतिकता की ज्योति प्रज्वलित हुई।

यह वह क्षण था जब एक आदर्श पुत्र, पति, राजा और मानव के रूप में राम ने दिखाया कि त्याग, संयम और कर्तव्यपालन ही सच्चे नेतृत्व की पहचान हैं। उनका आगमन इस बात का संदेश देता है कि अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो अंततः धर्म की ही विजय होती है।

‘सनातनियों की संगत से बचो’: कर्नाटक के CM सिद्धारमैया ने उगला जहर, बुद्ध-बसावा-अंबेडकर का नाम लेकर हिंदुओं को तोड़ने में जुटी कॉन्ग्रेस

कर्नाटक की राजनीति में एक ऐसा तूफान उठा है, जो देखकर लगता है कि पुरानी घावों को फिर से कुरेदा जा रहा है। कल्पना कीजिए, एक मुख्यमंत्री मंच पर खड़े होकर कहता है- “सनातनियों की संगत से बचो, आरएसएस से दूर रहो।” ये बातें सुनकर दिल दहल जाता है न?

कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया ने शनिवार (18 अक्टूबर 2025) को मैसूर यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में यही कहा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि समाज के भले के लिए काम करने वालों के साथ रहो, न कि उन सनातनियों के साथ जो बदलाव का विरोध करते हैं।

ये सुनकर तो लगता है जैसे सनातन धर्म को ही दुश्मन बना दिया गया हो। लेकिन रुकिए, ये कोई अचानक की बात नहीं है। ये कॉन्ग्रेस पार्टी की पुरानी रणनीति का हिस्सा है – बसावा, बुद्ध और अंबेडकर जैसे महान व्यक्तियों के नामों की आड़ में सनातन हिंदू को निशाना बनाना।

हिंदू समाज को बाँटने की कोशिश में जुटी कॉन्ग्रेस

हम यहाँ बसावा, बुद्ध या अंबेडकर पर कोई हमला नहीं कर रहे और न ही उन पर उंगली उठा रहे हैं। ये तीनों ही समाज सुधार के बड़े प्रतीक हैं। बसावा ने जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाई, बुद्ध ने करुणा और समानता का संदेश दिया और अंबेडकर ने संविधान देकर करोड़ों को अधिकार दिलाए। लेकिन आज की राजनीति में इन नामों का इस्तेमाल कुछ और हो गया है।

ये नाम अब हथियार बन गए हैं, जिनसे सनातन हिंदू को अलग-थलग करने की कोशिश हो रही है। मतलब साफ है – भारत बसावा, बुद्ध और अंबेडकर का देश बने, लेकिन सनातनियों का नहीं। ये स्पष्ट रूप से हिंदू धर्म को बाहर कर रहा है।

खरगे साहब और उनके बेटे प्रियांक खरगे भी यही लाइन ले रहे हैं। वे कहते हैं कि समाज को असमानता से मुक्त करने के लिए बसावा, बुद्ध और अंबेडकर के विचारों को अपनाओ। लेकिन इसमें सनातन का नाम क्यों नहीं? क्यों लगातार सनातन को ‘रूढ़िवादी’ या ‘बदलाव विरोधी’ बताकर बदनाम किया जा रहा है? ये राजनीति का नंगा चेहरा है – इन नामों के पीछे छिपकर हिंदू समाज को बाँटना।

कर्नाटक में कॉग्रेस लगातार सनातन हिंदुओं को बना रही निशाना

थोड़ा पीछे चलते हैं। सिद्धारमैया का ये बयान कोई पहली बार नहीं है। अक्टूबर 2025 में मैसूर में अंबेडकर स्टडी सेंटर के 25 साल पूरे होने पर उन्होंने आरएसएस और संघ परिवार पर जमकर निशाना साधा। कहा कि संघ ने हमेशा अंबेडकर का विरोध किया, संविधान को चुनौती दी। फिर सनातनियों का नाम लेकर चेतावनी दी – “सनातनियों की संगत मत रखो, ये समाज को पीछे खींचते हैं।” उन्होंने हाल ही में चीफ जस्टिस बीआर गवई पर जूता फेंकने वाली घटना का हवाला भी दिया। कहा कि ये सनातनी कट्टरता का नतीजा है और समाज को इससे सावधान रहना चाहिए।

ये तो खुलेआम नफरत फैलाने जैसा है। सनातन को कट्टरता से जोड़ना, जबकि सनातन तो सहिष्णुता और विविधता का धर्म है। गंगा-जमुनी तहजीब यहीं से निकली है। लेकिन कॉन्ग्रेस की नजर में सनातन ही समस्या है।

बसावा, बुद्ध और अंबेडकर का नाम लेकर सनातन को बाँटने की कोशिश

अब देखिए, ये सब कैसे बसावा, बुद्ध और अंबेडकर के नामों की छत्रछाया में हो रहा है। सिद्धारमैया ने उसी स्पीच में कहा कि वे बुद्ध, बसावा और अंबेडकर से प्रेरणा लेते हैं। “विज्ञान और तर्क पर चलो, अंधविश्वास मत फैलाओ।” ये सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन असल में ये सनातन की जड़ों पर प्रहार है। क्योंकि सनातन में भी तर्क और विज्ञान की जगह है – वेदों से लेकर उपनिषदों तक। लेकिन राजनीति में इन नामों का मतलब बदल गया है।

आज ये नाम एंटी-हिंदूइज्म का कोडवर्ड बन चुके हैं। बसावा का नाम लेकर लिंगायत समुदाय को हिंदू से अलग करने की कोशिश हो रही है। कुछ हफ्ते पहले ही अखिल भारतीय वीरशैव-लिंगायत महासभा ने अपील की कि कर्नाटक के जाति सर्वे में खुद को ‘वीरशैव-लिंगायत’ धर्म के तौर पर दर्ज कराओ, न कि हिंदू। ये सर्वे कॉन्ग्रेस सरकार ही करवा रही है, राहुल गाँधी के निर्देश पर।

अगर ये हो गया, तो हिंदू आबादी कम दिखेगी, जो बीजेपी का कोर वोट बैंक है। लिंगायत कर्नाटक में 17% तक हैं, लेकिन पिछले सर्वे में 11% दिखे। अब महासभा कह रही है – धर्म कॉलम में वीरशैव-लिंगायत लिखो। ये बसावा की विरासत का सम्मान लगता है, लेकिन असल में हिंदू समाज को तोड़ने का हथकंडा है।

वोटबैंक की राजनीति कर रही समाज को बर्बाद

कॉन्ग्रेस ये क्यों कर रही है? सरल जवाब – वोट बैंक। वे जानते हैं कि सनातन हिंदू को एकजुट करके निशाना बनाना मुश्किल है। इसलिए बाँटो और राज करो। बुद्ध और अंबेडकर का नाम तो पहले से ही दलित और पिछड़े वोटों को लुभाने के लिए इस्तेमाल होता रहा है। बुद्ध को विष्णु का अवतार मानने वाले हिंदू समाज को ही ‘रूढ़िवादी’ बता दो, तो बौद्ध विचारों को अलग कर लो। अंबेडकर को संविधान का पिता बताकर आरएसएस को दुश्मन ठहराओ।

और बसावा? ये नया एंगल है कर्नाटक में। लिंगायतों को अलग धर्म मान्यता दिलाकर हिंदू वोट बाँट दो। सिद्धारमैया खुद कहते हैं – “अंबेडकर जैसा दूसरा कभी नहीं होगा, लेकिन सबको उनके रास्ते पर चलना चाहिए।” लेकिन उसी स्पीच में सनातनियों को कोसना? ये दोहरा चरित्र है।

खरगे परिवार कर रहा सनातन पर हमलों की अगुवाई

अब खरगे परिवार की बात। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी यही लाइन चलाते हैं। वे कहते हैं – “बुद्ध, बसावा और अंबेडकर समानता के वैश्विक आइकॉन हैं।” मई 2025 में उन्होंने कहा कि अंबेडकर सिर्फ दलितों के नहीं, सबके नेता हैं। लेकिन इसमें सनातन का जिक्र क्यों शून्य? वे देश को इन तीनों का देश बनाना चाहते हैं, लेकिन सनातन को बाहर रखकर।

कर्नाटक के मंत्री और मल्लिकार्जुन के बेटे प्रियांक खरगे ने तो हद पार कर दी। 12 अक्टूबर 2025 को उन्होंने सिद्धारमैया को चिट्ठी लिखी – “सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, पार्कों और मंदिरों में आरएसएस की शाखाओं पर बैन लगा दो।” कहा कि आरएसएस नफरत फैलाती है, बच्चों में गलत विचार डालती है। ये चिट्ठी सीएमओ ने ही पब्लिक की।

प्रियांक ने कहा – “संविधान हमें एकता और समानता के लिए विभाजनकारी ताकतों को रोकने का अधिकार देता है।” लेकिन ये कौन-सी एकता? सनातन को ‘विभाजनकारी’ बताकर? कॉन्ग्रेस ने पहले भी आरएसएस पर तीन बार बैन लगाया – गाँधी हत्या के बाद, इमरजेंसी में और बाबरी विध्वंस के बाद। लेकिन अब फिर वही पुरानी किताब?

कर्नाटक में ये राजनीति क्यों तेज हो रही है? क्योंकि 2028 के चुनाव नजदीक हैं। कॉन्ग्रेस को लगता है कि हिंदू वोट बाँटकर वे सत्ता टिका लेंगे। लिंगायत सर्वे से हिंदू संख्या घटेगी, दलित-मुस्लिम गठजोड़ मजबूत होगा। लेकिन ये समाज को कितना नुकसान पहुँचाएगा? हिंदू समाज सदियों से एकजुट रहा है – रामायण से लेकर महाभारत तक। सनातन ने बुद्ध को अपनाया, अंबेडकर को सम्मान दिया। लेकिन अब इन नामों की राजनीति से समाज टूट रहा है। युवा कन्फ्यूज हो रहे हैं – क्या सनातन बुरा है? क्या आरएसएस दुश्मन है?

देखिए, सिद्धारमैया ने उसी कार्यक्रम में शिक्षा को बराबरी का हथियार बताया। कहा – “शिक्षा किसी का पैतृक संपत्ति नहीं, अवसर दो तो कोई भी विद्वान बन सकता है।” ये सही है। लेकिन फिर सनातन को ‘अंधविश्वास’ क्यों कहें? सनातन में भी ज्ञान की परंपरा है – आर्यभट्ट से लेकर चंद्रगुप्त तक। ये दोहरा मापदंड क्यों?

साफ है कि ये सब कुछ सियासत का काला खेल है। कॉन्ग्रेस दिवाली के त्योहार के आसपास बसावा, बुद्ध, अंबेडकर के नाम से सनातन को निशाना बना रही है। लेकिन हिंदू समाज जागेगा। हमें इन नामों का सम्मान करना है, और राजनीति के जाल में नहीं फँसना। सनातन सहिष्णुता सिखाता है – सबको अपनाओ, किसी को न ठुकराओ। कर्नाटक से ये संदेश पूरे देश को जाना चाहिए। वरना ये बँटवारा और गहरा हो जाएगा। ऐसे में जरूरत है कि हम सभी सनातनी एकजुट रहें, इन विभाजनकारी शक्तियों को अपने मकसद में सफल न होने दें।

PETA का बॉम्बे HC के फैसले के खिलाफ अभियान, ‘मुंबईकर’ को पहनाया कबूतर का मुखौटा: सोशल मीडिया पर जमकर विरोध, जाने सेहत के लिए कितने खतरनाक हैं कबूतर

कबूतरों को दाना देने की परंपरा को बचाने के लिए पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) ने हाल ही में एक अभियान शुरू किया। खासतौर पर यह अभियान मुंबई में कबूतरों को दाना देने पर लगाए गए बैन को देखते हुए लॉन्च किया गया। अब इस अभियान के खिलाफ सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है।

दरअसल, पेटा इंडिया ने अभियान से जुड़ा एक वीडियो जारी किया, जिसमें मुंबई के लोग कबूतरों के मुखौटे पहनकर संदेश दे रहे हैं कि कबूतरों को भी प्यार और देखभाल की जरूरत है। इस वीडियो में यह भी दिखाया गया है कि कबूतरों को खाना देने पर बैन लगाने से ये पक्षी भूख से मर सकते हैं।

पेटा इंडिया ने वीडियो जारी कर लिखा, कबूतरों के बिना मुंबई का आसमान पहले जैसा नहीं रहा। फीडिंग पर लगे बैन के बाद ये कोमल पक्षी भुखमरी का सामना कर रहे हैं। सभी मुंबईवासियों ने ‘कबूतर’ बनकर सबको याद दिलाया कि कबूतर भी यहीं के हैं।

सोशल मीडिया पर पेटा के कबूतर अभियान का विरोध

सोशल मीडिया पर पेटा के इस अभियान की आलोचना शुरू हो गई। लोगों ने कबूतरों को इंसान के लिए खतरा बताया और कहा कि इससे कई बीमारियाँ होती है। इसके साथ पेटा को भारत-विरोधी भी बताया गया क्योंकि ये दिखावे का एक्टिविजम करता है। पेटा पर आर्टिकल 21 के तहत केस करने की भी माँग उठी।

ओपन लेटर नाम के एक्स हैंडल ने लिखा, “एक 400 ग्राम का कबूतर अपने जीवनकाल में लगभग 11 किलोग्राम बीट छोड़ता है। ये बीट सूखकर धूल में बदल जाती है और हवा में मिल जाती है। जब हम उस हवा में साँस लेते हैं तो धूल हमारे फेफड़ों तक पहुँच सकती है और निमोनिया, ब्रोंकाइटिस और अस्थमा जैसे संक्रमण पैदा कर सकती है।”

उन्होंने आगे बताया, “सिंगापुर में कबूतरों को खाना खिलाने पर आपको 500 डॉलर का जुर्माना लग सकता है। उनकी बीट अम्लीय भी होती है, जिसका मतलब है कि वे कारों, एयर कंडीशनर, इमारतों और स्मारकों को नुकसान पहुँचा सकती हैं। लेकिन जब मुंबई के दादर में कबूतरखाने बंद कर दिए गए तब भी कुछ लोग विरोध करने के लिए सामने आए और अब पेटा ऐसे ही बेतुके अभियान चला रहा है।”

एक्स पर राहुल देवधर लिखते हैं, “कबूतर अक्सर लोगों के लिए परेशानी का कारण बनते हैं क्योंकि ये कई तरह की बीमारियाँ फैलाते हैं। इन्हें आमतौर पर ‘आसमान के चूहे’ कहा जाता है। कई शहरों में कबूतरों को सक्रिय रूप से मारा जा रहा है। पेटा सचमुच भारत विरोधी है।”

डिमेंटर नाम के एक्स यूजर लिखते हैं, “किसी को @PetaIndia के खिलाफ केस दर्ज करना चाहिए क्योंकि वे अनुच्छेद 21 के तहत स्वस्थ जीवन के अधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं। कबूतरों को खाना देना फेफड़ों की बीमारियों का कारण बनता है। पेटा वाले केवल दिखावे के लिए एक्टिविज्म कर रहे हैं।”

क्या है कबूतरों को दाना डालने पर रोक लगाने वाला फैसला ?

पेटा ने कबूतरों के समर्थन में ये अभियान मुबंई में कबूतरों को दाना डालने पर रोक के बाद शुरू किया। दरअसल, जुलाई 2025 में BMC ने शहरभर के कबूतरखानों में दाना डालने पर रोक लगा दी। यह कदम सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताओं के मद्देनजर उठाया गया था क्योंकि कबूतरों के मल से फेफड़ों की बीमारियाँ फैलने का खतरा था। मामले में 31 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने BMC को निर्देश दिया कि वह कबूतरों को खाना देने वालों के खिलाफ FIR दर्ज करें।

क्या सचमुच कबूतर इंसान के लिए हानिकारक?

अब सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच कबूतर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं? तो स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कबूतरों के कारण स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएँ पैदा होती हैं। खासकर, कबूतरों के मल में कई तरह के फंगल और बैक्टीरियल संक्रमण मौजूद होते हैं, जो मनुष्यों के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं।

इनमें प्रमुख रूप से हिस्टोप्लास्मोसिस (Histoplasmosis) इंफेक्शन है, जो Histoplasma capsulatum नाम के फंगस से फैलता है और बुखार, खाँसी, थकान और छाती में दर्द जैसे लक्षण पैदा करता है।

इसके अलावा क्रिप्टोकोकोसिस, जो Cryptococcus neoformans नाम का फंगस है, गंभीर स्थिति में दिमाग की सूजन यानी मेंनिंजाइटिस का कारण बनता है। साथ ही सिटिकोसिस नाम के बैक्टीरियल संक्रमण भी कबूतरों के मल से ही फैलता है, जो फ्लू जैसे लक्षण पैदा करता है।

बच्चों, बुजुर्गों और प्रेग्ननेंट महिलाओं में कबूतरों के मल और पंखों से एलर्जी और अस्थमा जैसे समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं। इसके अलावा कबूतरों के मल में Salmonella और E. coli बैक्टीरिया पाया जाता है, जो पाचन तंत्र में संक्रमण का खतरा बढ़ाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन स्वास्थ्य जोखिमों से बचने के लिए कबूतरों के मल के सीधे संपर्क से बचना चाहिए। खासकर जब यह सूखा हो और हवा में उड़ने लगे। अगर मल को साफ करना जरूरी हो तो मास्क और दस्ताने का उपयोग करना चाहिए।

PM मोदी ने INS विक्रांत पर नौसेनिकों के साथ मनाई दीपावली, बोले- ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान को घुटनों पर लाई सेना: प्रधानमंत्री बनने के बाद सैनिकों के साथ मनाते रहे हैं दीपोत्सव

देश के बहादुर सशस्त्र बलों के साथ दिवाली मनाने की परंपरा को जारी रखते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोवा और कारवार के तट पर आईएनएस विक्रांत पर तैनात जवानों के साथ दिवाली मनाई। इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा, “ये हमारी अलौकिक दीपमालाएँ हैं, मेरा सौभाग्य है कि मैं नौसेना के जवानों के बीच दिवाली का पावन पर्व मना रहा हूँ।”

उन्होंने कहा कि आईएनएस विक्रांत सैन्य आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। आज एक तरफ अनंत क्षितिज, अनंत आकाश है, और दूसरी तरफ अनंत शक्तियों का प्रतीक यह विशालकाय आईएनएस विक्रांत है। समुद्र के पानी पर किरणों की चमक और बहादुर जवानों द्वारा जलाए गए दीपमालाएँ हैं।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि युद्ध के मैदान में जो जवान महसूस करता है, उसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता।” उन्होंने कहा कि कुछ महीने पहले ही हमने देखा कि कैसे विक्रांत नाम ने ही पूरे पाकिस्तान में खौफ़ की लहर दौड़ा दी थी। इसकी ताकत ऐसी है – एक ऐसा नाम जो युद्ध शुरू होने से पहले ही दुश्मन के हौसले पस्त कर देता है। यही है INS विक्रांत की ताकत।

उन्होंने याद करते हुए कहा कि विक्रांत के कमीशनिंग का दिन वह था जब भारतीय नौसेना ने पुराने ध्वज को हटाकर शिवाजी महाराज की मुहर के साथ नया ध्वज अपनाया था। इसका मकसद भारत के औपनिवेशिक अतीत मुक्ति था, क्योंकि उस वक्त तक तिरंगे में सेंट जॉर्ज क्रॉस भी था, जो ब्रिटिश काल से चला आ रहा था।

देश में नक्सलवाद के खात्मे के लिए अर्धसैनिक बलों की उन्होंने सराहना की। ‘आत्मनिर्भर भारत’ का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “जब दुश्मन सामने हो, युद्ध की आशंका हो तब जिसके पास अपने दम पर लड़ाई लड़ने की ताकत हो उसका पलड़ा हमेशा भारी रहता है। सेनाओं के सशक्त होने के लिए उनका आत्मनिर्भर होना बहुत आवश्यक है। जैसे-जैसे हमारा हर औजार, शस्त्र, हर पुर्जा जैसे-जैसे भारतीय होते जाएगा, हमारी ताकत को चार-चाँद लग जाएंगे।”

हर दिवाली, जवानों वाली

प्रधानमंत्री मोदी पिछले 10 सालों से हर साल दिवाली देश के वीर जवानों के साथ मनाते रहे हैं। 2025 में भी उन्होंने अपनी परंपरा को निभाते हुए गोवा और कारवार के तट पर आईएनएस विक्रांत का दौरा किया और जवानों के साथ दिवाली मनाई।प्रधानमंत्री सियाचिन बॉर्डर से कच्छ के रण तक तैनात जवानों के बीच दीपावली मनाते रहे हैं

साल 2024 में पीएम मोदी कच्छ के रण गए थे। इस दौरान बीएसएफ, नौसेना, वायु सेना और थल सेना के साथ अपना वक्त बिताया था। उन्होंने जवानों को मिठाइयाँ खिलाई और त्यौहार पर भी परिजनों से दूर रहने वाले जवानों के दिन-रात मातृभूमि की सेवा में लगे रहने पर हौसला बढ़ाया।

कच्छ के क्षेत्र में दिन का तापमान काफी ज्यादा होता है और रात बेहद ठंढा हो जाता है। यहाँ की चुनौतियाँ जवानों के लिए अलग तरह की हैं।

2021 में लेपचा तो 2022 में लद्दाख पहुँचे थे पीएम

हिमाचल प्रदेश के लेपचा में पीएम मोदी ने 2023 में जवानों के साथ दीप जलाकर और मिठाईयाँ खिला कर दिवाली मनाई थी।

पीएम मोदी ने 2022 में दीपावली लद्दाख की बर्फीली चोटियों वाले कारगिल में मनाया था। इस मौके पर एक्स पर पोस्ट कर उन्होंने देशवासियों को दिवाली की शुभकामनाएँ दी। उन्होंने लिखा, कारगिल में दिवाली समारोह की कुछ और झलकियाँ साझा कर रहा हूँ। पूरे भारत से आए सैनिकों से मुलाकात हुई। उनका साहस और दृढ़ संकल्प हमारे सभी नागरिकों को प्रेरित करता है।”

पीएम मोदी ने कारगिल युद्ध में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले जवानों को श्रद्धांजलि दी। साथ ही जवानों के जज्बे को सराहा, जो विषम परिस्थियों में दिन रात सरहद पर डटे हुए हैं।

2021 में नौशेरा का किया दौरा

पीएम मोदी ने जम्मू में एलओसी के नजदीक नौशेरा सेक्टर में तैनात जवानों के साथ दिवाली 2021 मनाई थी। इस मौके पर उन्होंने कहा था, “हमारे जवान ‘माँ भारती’ के सुरक्षा कवच हैं। जवानों की बदौलत ही हमारे देश के लोग रात को चैन से सो पाते हैं और त्योहारों पर खुशी मना पाते हैं।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरी बार रजौरी में जवानों के साथ दिवाली मनाने पहुँचे थे। इससे पहले 2019 में भी वह राजौरी के एक आर्मी डिविजन में जवानों के साथ उन्होंने दिवाली मनाई थी।

2020 में जैसलमेर जाकर जवानों का हौसला बढ़ाया

2020 में पीएम मोदी दिवाली के मौके पर राजस्थान के जैसलमेर पहुँचे और जवानों के साथ मिठाइयाँ खाकर दिवाली मनाई। इस दौरान लोंगेवाला पोस्ट पर तैनात सभी जवान मौजूद रहे। पीएम मोदी ने एक्स पर इसकी तस्वीरें साझा की।

एलओसी पर 2019 में पीएम ने मनाई दिवाली

पीएम मोदी ने जम्मू कश्मीर के राजौरी में एलओसी पर तैनात जवानों के साथ दिवाली मनाई थी। उस वक्त भी पाकिस्तान के साथ तनातनी चल रही थी। पीएम मोदी ने जवानों के बीच जाकर उनका हौसला बढ़ाया।

2018 में पीएम मोदी उत्तराखंड के हर्षिल पहुँचे और सुरक्षाबलों के साथ-साथ आईटीबीपी के जवानों के साथ भी दिवाली मनाई। इस मौके पर सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करते हुए उन्होंने कहा कि सरहद की रक्षा करने वाले वीर जवानों को सलाम किया। जम्मू कश्मीर के गुरेज सेक्टर में दिवाली सेलिब्रेशन के लिए पीएम मोदी 2017 में पहुँचे। यहाँ से पाकिस्तान को उन्होंने ललकारा।

लाहौल स्फीति में पीएम मोदी ने 2016 में मनाई दिवाली

हिमाचल प्रदेश से लगे चीन बॉर्डर पर दिवाली मनाने के लिए 2016 में पीएम मोदी पहुँचे। इस दौरान लाहौल स्फीति में आईटीबीपी जवानों के काम की सराहना की। उन्होंने कहा कि घर परिवार से दूर जवानों के साथ पूरा देश है। जवानों को मिठाइयाँ खिलाई और उनके साथ संवाद किया।

2014 में सियाचिन तो 2015 में पंजाब पहुँचे पीएम

पीएम मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पहली दिवाली सियाचिन के जवानों के साथ मनाई थी। सियाचिन के बर्फीले वादियों में जवानों का हौसला बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि देश उनकी सेवा से सामने नतमस्तक है। सियाचिन देश का सबसे ऊँचा बॉर्डर है, जहाँ तापमान -30 से -40 डिग्री तक पहुँच जाता है। ये दुनिया का सबसे ऊँचा युद्ध क्षेत्र भी है।

2015 में प्रधानमंत्री मोदी दीपावली के दिन पंजाब पहुँचे। उन्होंने अमृतसर के नजदीक पाकिस्तान से सटे अटारी बॉर्डर पर तैनात जवानों के बीच त्योहार मनाया।

दिल्ली-NCR में 400 पार पहुँचा AQI, GRAP-2 प्लान लागू: दीपावली पर ‘पटाखे मत फोड़ो’ का ज्ञान देने वाले बताएँगे बिना आतिशबाजी ही क्यों बिगड़ी राजधानी की हवा?

दिल्ली की हवा फिर से जहर बन चुकी है। अक्टूबर के तीसरे हफ्ते में आते-आते दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) औसत ‘बहुत खराब’ की श्रेणी में पहुँच गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के ताजा आँकड़ों के मुताबिक दिल्ली के कई इलाकों में AQI सोमवार (20 अक्टूबर 2025) दिवाली की सुबह 400 पार पहुँच गया। यानी दीवाली से पहले ही दिल्ली गैस चेंबर में तब्दील होती जा रही है।

ऐसा नहीं हैं कि सरकार और अदालतें स्थिति को लेकर निष्क्रिय हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध के बजाए ‘ग्रीन फायरक्रैकर्स’ के उपयोग की अनुमति दी थी। इन पटाखों को वैज्ञानिक रूप से इस तरह बनाया गया है कि इनमें 30 प्रतिशत तक कम प्रदूषक तत्व उत्सर्जित हों।

साल 2025 में अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में केवल वही ग्रीन फायरक्रैकर्स जलाए जा सकते हैं जो वैज्ञानिक संस्था CSIR-NEERI द्वारा प्रमाणित हों और जिनकी बिक्री और उपयोग केवल तय समय के भीतर ही किए जाएँ।

बढ़ते प्रदूषण का कारण

फिर भी सवाल यह है कि जब दिवाली ‘ग्रीन’ बताई जा रही है तो हवा इतनी जहरीली क्यों है? असल में प्रदूषण के कई स्रोत हैं जो एक साथ मिलकर हवा को जहरीली बना देते हैं। सबसे बड़ा कारण मौसम में बदलाव है। अक्टूबर के दूसरे हफ्ते में दिल्ली और NCR में तापमान गिरने लगता है, हवा की रफ्तार बहुत धीमी हो जाती है और नमी बढ़ जाती है। ऐसे में प्रदूषक कण ऊपर नहीं उठ पाते और जमीन के पास ही फँस जाते हैं। मौसम विभाग के अनुसार, इस हफ्ते हवा की गति केवल 4 से 6 किलोमीटर प्रति घंटा रही, जिससे प्रदूषण का फैलाव रुक गया।

पराली जलाने से बढ़ा प्रदूषण?

बढ़ते प्रदूषण का दूसरा कारण हर साल की तरह पराली जलाने की घटनाएँ हैं। पंजाब और हरियाणा में किसान धान की फसल के बाद खेतों को साफ करने के लिए पराली जलाते हैं। सैटेलाइन डेटा के अनुसार, पिछले हफ्ते पंजाब में 1200 से ज्यादा आग के मामले दर्ज किए गए जबकि हरियाणा में 400 से अधिक। हवा का रुख अगर उत्तर-पश्चिम दिशा में होता है तो इन इलाकों का धुआँ सीधे दिल्ली की ओर आता है।

दिल्ली में लागू GRAP-2

इसके अलावा दिल्ली के भीतर भी प्रदूषण के कई स्थायी स्रोत हैं। सड़क की धूल, लगातार चल रहे निर्माण कार्य, बढ़ते डीजल जनरेटर और भारी ट्रैफिक- ये सब मिलकर हवा को और गंदा बना रहे हैं। ग्रेडेड रिस्पॉन्सस एक्शन प्लान (GRAP) का स्टेज-2 लागू किया गया है, जिसमें निर्माण स्थलों पर सख्ती, पानी का छिड़काव और कचरा जलाने पर रोक जैसी शर्तें शामिल हैं। लेकिन जमीन पर इन उपायों का असर सीमित ही दिखता है क्योंकि निगरानी और पालन कमजोर है।

पटाखों से बढ़ा दिल्ली का AQI?

अब बात आती है ग्रीन पटाखों की। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद बाजार में पारंपरिक पटाखे भी अवैध रूप से बिक रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर 30 प्रतिशत कम प्रदूषण देने वाले पटाखे भी बड़ी मात्रा में जलाए जाएँ तो उनका असर भी बहुत नहीं पड़ता।

नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) की रिपोर्ट के अनुसार, ग्रीन क्रैकर्स तभी प्रभावी हैं जब इनका उपयोग सीमित समय और कम मात्रा में हो। लेकिन दिवाली की रात यह सीमा अक्सर क्रॉस कर जाती है, जिससे हवा में मौजूद कण और गैसें और खतरनाक स्तर पर पहुँच जाती हैं।

क्या दिवाली पर ही प्रदूषण हो सकता है नियंत्रित?

इन सबके बीच सबसे चिंताजनक बात यह है कि हालात हर साल दोहराए जाते हैं। प्रदूषण से निपटने के लिए अस्थायी उपाय जैसे पानी का छिड़काव, ट्रक एंट्री पर रोक और स्कूल करने की बात तो होती हैं लेकिन लंबे समय तक के समाधान पर प्रगति बहुत धीमी है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर दिल्ली-NCR को प्रदूषण से राहत चाहिए तो सिर्फ दिवाली पर ही नहीं बल्कि पूरे साल प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण और हरित नीतियों का पालन करना जरूरी है।

दिवाली के बाद नहीं रहेगा प्रदूषण?

इस समय दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानक से करीब 20 गुना अधिक है। इसका असर बच्चों, बुजुर्गों और सांस की बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है। दिवाली के बाद अगर मौसम में ठंड और बढ़ी और हवा की गति कम रही तो स्थित और खराब हो सकती है।

यानि केवल दिवाली पर ही प्रदूषण पर लगाम लगाने की जरूरत नहीं है बल्कि उसके बाद भी है और पूरे साल भी है। तो वे वामपंथी, लिबरल और फेमिनिस्ट, जो भी दिवाली पर प्रदूषण का ठीकरा फोड़ने के लिए सामने आ रही हैं। वे समझ लें कि प्रदूषण को पूरे साल नियंत्रित करने की जरूरत है तो केवल दिवाली पर प्रदूषण रोकने का ज्ञान न दें।

मोहम्मद जुबैर ने कर्मभूमि एक्सप्रेस से यात्रियों के गिरने की फैलाई ‘फेक न्यूज’, रेलवे ने फैक्ट चेक कर पकड़ा झूठ

कर्मभूमि एक्सप्रेस से 3 यात्रियों के गिरने और दो यात्रियों के मरने की खबर से सोशल मीडिया पर हड़कंप मच गया है। इस बीच पूरी खबर पर सेंट्रल रेलवे ने सफाई देते हुए घटना को सिरे से खारिज कर दिया है।

रेलवे के मुताबिक, एक घटना यह ट्रेन हादसा नहीं, बल्कि ट्रेसपासिंग का मामला है। ट्रेसपासिंग की घटना नासिक और ओढा स्टेशन के बीच हुई थी। हादसे में तीन लोग घायल हुए हैं, जिन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया। आरपीएफ इस मामले की जाँच कर रही है।

रेलवे ने बताया कि रविवार (19 अक्टूबर 2025) शाम कुछ लोग ट्रैक पार करने की कोशिश कर रहे थे। इस दौरान कर्मभूमि एक्सप्रेस आ गई और ये लोग उसकी चपेट में आ गए। रेलवे ने साफ किया है कि तीनों घायल व्यक्ति ट्रेन में सफर नहीं कर रहे थे, बल्कि रेलवे लाइन पार कर रहे थे। ट्रेन आने के सिग्नल दिए जा चुके थे, फिर भी ये ट्रैक पार करने की कोशिश कर रहे थे। ये रेलवे के नियमों का उल्लंघन है।

दरअसल छठ पूजा को देखते हुए रेलवे ने 12000 स्पेशल ट्रेन बिहार के लिए अलग-अलग जगहों से चलाई है। इनमें मुंबई, दिल्ली जैसी जगहों से खास कर ट्रेनें चलाई गई हैं। इसका मकसद लोगों को गंतव्य तक सुरक्षित और आसान सफर कराना है।

स्टेशनों पर काफी भीड़ जमा हो रही हैं। ऐसे में ट्रेन हादसे का झूठ फैलाने का प्रोपेगेंडा सोशल मीडिया पर चलाया गया। मोहम्मद जुबेर ने एक्स पर लिखा, दिवाली और छठ पूजा अपने प्रियजनों के साथ मनाने बिहार जा रहे तीन यात्री मुंबई से बिहार जा रही ट्रेन से गिर गए। दो यात्रियों की मौत हो गई और एक गंभीर रूप से घायल हो गया।

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को टैग करके जुबेर ने पूछा है कि भारतीय रेलवे ने 12000 स्पेशल ट्रेन चलाई थी, उसका क्या हुआ?

यहाँ तक कि कई वेबसाइट ने इस झूठ को सच मानते हुए बगैर रेलवे से घटना की जानकारी लिए हुए खबरें चला दी। इस पर रेलवे ने साफ लिखा है कि जानकारी साझा करने से पहले तथ्यों को जाँच लें।

आजतक ने लिखा है कि मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनस से बिहार जा रही कर्मभूमि एक्सप्रेस से नासिर रोड रेलवे स्टेशन से कुछ दूरी पर 3 यात्री ट्रेन से गिर गए, जिससे दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। जबकि एक की हालत गंभीर है, जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है। आजतक ने ये भी लिखा है कि ये साफ नहीं हो पाया है कि ये लोग त्यौहार मनाने जा रहे थे या आने वाले चुनाव में मतदान करने। आजतक का शीर्षक है, ‘ट्रेनों में भारी भीड़ के बीच मुंबई से बिहार जा रही कर्मभूमि एक्सप्रेस से गिरे 3 यात्री, 2 की मौत’

वहीं दैनिक भास्कर का शीर्षक है, ‘मुंबई से बिहार जा रही कर्मभूमि एक्सप्रेस से गिरे तीन यात्री, दो की मौत, एक की हालत गंभीर’

दैनिक भास्कर ने अपनी खबर में लिखा, ‘मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनस से रक्सौल (बिहार) जा रही कर्मभूमि एक्सप्रेस में शनिवार देर रात एक दुखद हादसा हुआ। नासिक रोड रेलवे स्टेशन के पास तीन युवक ट्रेन से गिर गए, जिसमें दो की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक युवक गंभीर रूप से घायल हो गया। घायल युवक का इलाज जिला अस्पताल में चल रहा है।’

बगैर हकीकत जाने माने वेबसाइटों का इस तरह से गैरजिम्मेदाराना रवैया बेहद खतरनाक है। छठ पूजा के लिए बिहार जाने वाले लोग पूरे देश से जाते हैं। इस दौरान जमकर स्टेशनों में भीड़ भी होती है। ऐसे में गलत हादसों की खबर से लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। भारत की लाइफ लाइन कहलाने वाली रेलवे को इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभाने में दिक्कतें आ सकती हैं। यही वजह है कि रेलवे ने लोगों को अफवाहों पर ध्यान नहीं देने की अपील की है। साथ ही लिखा है, “कृपया साझा करने से पहले तथ्यों की पुष्टि कर लें। आइए जानकारी के साथ ज़िम्मेदारी बरतें।”

पैसे-नौकरी का लालच देकर हिंदुओं को बना रहे थे ईसाई, फूलपुर पुलिस ने बजरंग दल की शिकायत पर किया धर्म परिवर्तन गिरोह का भंडाफोड़: जानें FIR में क्या हैं आरोप?

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में फूलपुर पुलिस ने शनिवार (18 अक्टूबर 2025) को एक गाँव में धर्म परिवर्तन रैकेट के मामले में 3 आरोपितों को गिरफ्तार किया है। चौथा आरोपित फिलहाल फरार है और उसकी तलाश के लिए पुलिस की टीम छापेमारी कर रही है। यह कार्रवाई विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के जिला सह-संयोजक शांतनु तिवारी की शिकायत पर की गई।

शिकायत के मुताबिक, शांतनु ने पुलिस को बताया कि ‘प्रार्थना सभा’ के नाम पर गाँव में धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया और मामले में कानूनी कार्रवाई शुरू की। OpIndia को इस केस की FIR कॉपी भी मिली है।

शिकायतकर्ता ने क्या कहा?

शांतनु ने फूलपुर थाने में लिखित शिकायत दी कि उन्हें कई दिनों से रघुनाथपुर गाँव में ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन कराने की जानकारी मिल रही थी। 18 अक्टूबर को सुबह करीब 10:40 बजे उन्हें ऐसी ही एक सभा की जानकारी मिली है। उन्होंने कहा, “मुझे सूचना मिली कि ‘सामुदायिक चर्चा बैठक’ के नाम पर एक धार्मिक सभा आयोजित की जा रही है, जहाँ हिंदू ग्रामीणों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए लालच दिया जा रहा है।”

फोटो: शांतनु तिवारी

शांतनु अपने बजरंग दल के साथियों के साथ मौके पर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि कुछ मिशनरी लोग ग्रामीणों को हिंदू धर्म छोड़ने के लिए उकसा रहे थे। उन्होंने कहा कि मिशनरी लोगों से कह रहे थे कि जो लोग ईसाई धर्म अपनाएँगे उन्हें पैसे, कपड़े और अन्य सुविधाएँ दी जाएँगी। शांतनु ने कहा, “ये गतिविधियाँ हिंदू समाज के खिलाफ हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि मिशनरी लोग झूठ फैलाकर और गरीब लोगों को लालच देकर धर्म परिवर्तन करा रहे हैं।

FIR में क्या कहा गया है?

OpIndia के पास मौजूद एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, यह मुकदमा शांतनु तिवारी की शिकायत पर दर्ज किया गया है। इसमें चार लोगों रामकुमार पाल, रामशरण गौतम, त्रिभुवन गौतम और सरिता गौतम को आरोपित बनाया गया है। इनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 352, 196(1), 299 और उत्तर प्रदेश अवैध धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत केस दर्ज हुआ है।

FIR में लिखा गया है कि बैठक को ‘सामुदायिक चर्चा’ बताया गया था। इसे ईसाई मिशनरियों द्वारा रघुनाथपुर गाँव (थाना फूलपुर क्षेत्र) में हिंदू समुदाय के लोगों के बीच धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। घटना वाले दिन जब शांतनु को यह जानकारी मिली कि मिशनरियों द्वारा ‘सामुदायिक चर्चा बैठक’ के नाम पर एक सभा आयोजित की गई है, जिसमें बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय के लोग शामिल हो रहे हैं, तो वह तुरंत मौके पर पहुँच गए।

मौके पर पहुँचकर उन्होंने देखा कि ईसाई मिशनरी हिंदुओं को अपना धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने के लिए उकसा रहे थे। वे हिंदुओं से कह रहे थे कि वे अपने देवी-देवताओं को त्याग दें और उसके बदले अपने घरों में यीशु मसीह की तस्वीरें लगाएँ। इसके बदले उन्हें पैसे और मिशनरी स्कूलों में नौकरियाँ दी जाएँगी।

FIR के अंश, फोटो: शांतनु तिवारी

शिकायतकर्ता ने पुलिस को यह भी बताया कि प्रार्थना सभा में मौजूद कुछ लोग कह रहे थे कि उन्हें ईसाई धर्म में लोगों को शामिल कराने के बदले मोटी रकम दी जाती है जबकि हिंदू धर्म में ऐसा कोई इनाम नहीं मिलता।

जब शांतनु ने इस कृत्य का विरोध किया, तो आरोपियों ने उन पर लोहे की रॉड से हमला कर दिया और उन्हें जान से मारने की कोशिश की। किसी तरह शिकायतकर्ता वहाँ से भागकर अपनी जान बचाने में सफल रहे।

पहले भी कई धर्म परिवर्तन रैकेट का हो चुका है भंडाफोड़

OpIndia से बातचीत में शांतनु ने बताया कि बजरंग दल ने इससे पहले भी ऐसे कई धर्म परिवर्तन रैकेट का भंडाफोड़ किया है। इनमें से एक मामले में 13 आरोपितों को जेल भेजा गया था। हालाँकि, उन आरोपियों ने बार-बार अग्रिम जमानत के लिए आवेदन देकर केस की सुनवाई में देरी कराई।

शांतनु के वकील, जो इस मामले में उनकी ओर से पैरवी कर रहे हैं, ने हाल ही में उन सभी जमानत याचिकाओं को निरस्त करवाया है। इस मामले में भी शांतनु ने कहा कि वह इसे पूरी गंभीरता से आगे बढ़ाएँगे ताकि इस तरह की गतिविधियाँ क्षेत्र में पूरी तरह बंद हो सकें।

आगे की कार्रवाई जारी

पुलिस ने बताया कि जाँच में यह पुष्टि हुई है कि आरोपी ग्रामीणों को अपना धर्म छोड़ने के लिए उकसा रहे थे। उन्होंने ईसाई धर्म अपनाने के बदले पैसे और रोजगार देने का वादा किया था। अधिकारियों ने कहा कि यह मामला हमला, उकसावे और अवैध धर्म परिवर्तन से जुड़ा हुआ है, और इसमें कानून के तहत आगे की कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।

अमेरिका के 50+ शहरों में सड़कों पर उतरे हजारों लोग, राष्ट्रपति के एकतरफा फैसलों से नाराज: जानें No King प्रदर्शन की कहानी, ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों पर गंदगी फेंकते AI वीडियो किया शेयर

अमेरिका इन दिनों एक बड़े जनआंदोलन का गवाह बन रहा है। नो किंग (No King) नाम से चल रहे प्रदर्शन डोनाल्ड ट्रंप के विरोध में है। इन प्रदर्शनों में लाखों लोग सड़कों पर उतरे हैं और नारा लगा रहे हैं, “यह देश किसी राजा का नहीं है।” ये प्रदर्शन सिर्फ किसी एक मुद्दे पर नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, सत्ता के केंद्रीकरण और नागरिक अधिकारों के सवाल पर हैं। लोगों की यह माँग है कि देश को ऐसे रास्ते पर न ले जाया जाए, जहाँ राष्ट्रपति किसी राजा की तरह खुद को कानून और संस्थाओं से ऊपर समझे।

क्या है ‘नो किंग’ प्रदर्शन?

‘नो किंग’ यानी ‘कोई राजा नहीं’ नाम का ये जनआंदोलन अमेरिका के 50 से अधिक शहरों में फैल गया है। आंदोलन का नारा उस विचार के खिलाफ है, जिसमें राष्ट्रपति खुद को लोकतांत्रिक नियंत्रण से ऊपर समझने लगे। यहा आंदोलन डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों और उनके शासन-शैली के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप की नीतियाँ और उनका व्यवहार ‘राजशाही’ जैसी प्रवृत्ति दिखा रहा है। जहाँ वे न्यायपालिका, जनता और मीडिया को दरकिनार करते हुए एकतरफा फैसले ले रहे हैं।

जून 2025 में इस आंदोलन की पहली लहर आई थी, जब देशभर के 2 हजार से ज्यादा जगहों पर एक साथ प्रदर्शन हुए। तब लाखों लोग पार्कों, प्लाजा और सड़कों पर उतर आए थे। अक्टूबर 2025 तक आते-आते इस आंदोलन ने भयानक रूप ले लिया। अब यह करीब 2,700 शहरों में फैल चुका है। न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन डीसी, शिकागो, लॉस एंजेलिस जैसे बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक ‘No Kings, No Crowns’ (कोई राजा नहीं, कोई ताज नहीं) जैसे नारे गूँज रहे हैं।

इन प्रदर्शनों के तहत अमेरिका की जनता संदेश देना चाहती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था किसी व्यक्ति की मर्जी पर नहीं चल सकती। लोग यह याद दिला रहे हैं कि देश की स्थापना ही इस विचार पर हुई थी कि ‘यहाँ कोई राजा नहीं होगा।’ यही कारण है कि यह आंदोलन ट्रंप विरोधी तो है लेकिन उससे भी ज्यादा लोकतंत्र समर्थक हैं।

क्यों हो रहे ‘नो किंग’ प्रदर्शन?

इन ‘नो किंग’ प्रदर्शनों के पीछे गहरी राजनीतिक और सामाजिक वजहे हैं। सबसे बड़ा कारण ‘सत्ता का केंद्रीकरण’ है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन ने कई बार संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं की अनदेखी की है। उनके हालिया फैसलों और भाषणों से यह संकेत मिला है कि वे राष्ट्रपति पद को ‘असीमित अधिकारों’ की कुर्सी की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं।

दूसरा बड़ा कारण ट्रंप की नीतियाँ हैं। खासकर प्रवासियों के खिलाफ कड़े कदम और संघीय एजेंसियों का राजनीतिक उपयोग। हाल के महीनों में अमेरिकी प्रशासन ने कई जगहों पर अप्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। लोगों का मानना है कि यह केवल कानून का पालन नहीं बल्कि शक्ति का प्रदर्शन है।

तीसरा पहलू है संस्थाओं पर दबाव। हाल के महीनों में संघीय एजेंसियों और न्यायपालिका के बीच खींचतान बढ़ी है। ट्रंप के आलोचको का कहना है कि राष्ट्रपति अपने विरोधियों पर नकेल कसने और मीडिया पर दबाव बनाने में लगे हैं। कई लोग इसे ‘लोकतंत्र के लिए खतरे’ के रूप में देख रहे हैं। यही वजह है कि सड़कों पर उतरे लोग यह कहते नजर आ रहे हैं, ‘हम किसी राजा के अधीन नहीं, संविधान के अधीन है।’

डोनाल्ड ट्रंप का AI वीडियो

अमेरिका में जारी ‘नो किंग’ प्रदर्शन के बीच एक नया वीडियो सामने आया, जिसने देशभर में माहौल को और भड़का दिया। यह वीडियो डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया एक्स प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर शेयर किया। इस वीडियो ने ‘नो किंग’ प्रदर्शन में शामिल लोगों का गुस्सा दोगुना कर दिया।

इस AI-जेनरेटेड वीडियो ट्रंप को ‘राजा’ के रूप में दिखाया गया। वे एक लड़ाकू विमान के पायलट की तरह नजर आ रहे हैं, विमान पर बडे अक्षरों में लिखा है- ‘KING TRUMP।’ इसके बाद उन्हें विरोध कर रही भीड़ पर कीचड़ गिराते हुए दिखाया गया। वीडियो में ट्रंप ने ताज पहन रखा है और चेहरे पर विजयी मुस्कान है। यह AI वीडियो देखने में किसी फिल्मी सीन जैसा लगता है लेकिन इसका संदेश राजनीतिक था।

वीडियो पोस्ट करने के कुछ ही घंटो बाद वायरल हो गया। इस वीडियो ने न केवल प्रदर्शनकारियों को नाराज किया बल्कि यह सवाल भी उठाया कि क्या किसी सत्तारूढ़ नेता को AI तकनीक का इस तरह से इस्तेमाल करना चाहिए। इस वीडियो के बाद प्रदर्शन और तेज हो गए। भीड में We will not bow down (हम झुकेंगे नहीं) और You are not our King (तुम हमारे राजा नहीं हो) जैसे नारे और जोर से गूँजने लगे।