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क्या है हलाल? जानिए किसे माना गया इस्लाम में ‘हराम’: CM योगी ने कहा- धर्मांतरण-लव जिहाद-आतंकवाद के लिए होती है फंडिंग, कैसे मिलता है हलाल-सर्टिफिकेशन?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर हलाल सर्टिफिकेशन को लेकर सरकार का रुख साफ किया। सीएम योगी ने कहा कि हलाल सर्टिफिकेशन पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। उन्होंने कहा, “सामान खरीदते समय हलाल सर्टिफिकेट जरूर चेक करें। इसके नाम पर साजिश चल रही है। हलाल के नाम पर आतंकवाद के लिए पैसे जुटाए जाते हैं। इसका इस्तेमाल धर्मांतरण और लव जिहाद के लिए होता है।”

सीएम योगी ने ये बात गोरखपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी समारोह के तहत विचार-परिवार कुटुम्ब स्नेह मिलन कार्यक्रम में कही। उन्होंने कहा, “आपको आश्चर्य होगा कि साबुन और कपड़ों का भी हलाल। दियासलाई का भी हलाल। मैं भौचक था।मैंने कहा कि ये तो कडयंत्र है। मैंने कहा कि माचिस तो झटका वाला है, आप एक झटके में लगाएँगे, तभी जलेगा। आप हलाल करते रहेंगे तो कभी नहीं जलेगी माचिस।”

सीएम योगी ने कहा, “जब हमने कार्रवाई की तो देखा कि ₹25 हजार करोड़ देश के अंदर हलाल सर्टिफिकेशन से होता है। और भारत सरकार या राज्य सरकार की किसी भी एजेंसी ने उसे मान्यता नहीं दी है। ये सारा का सारा पैसा आतंकवाद के लिए, लव जिहाद के लिए, धर्मांतरण के लिए दुरुपयोग होता है। इसीलिए यूपी सरकार ने इसके खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। हलाल सर्टिफिकेशन के नाम पर एक फूटी-कौड़ी भी नहीं देना चाहिए।”

हलाल क्या होता है?

हलाल या झटका मीट किसी जानवर के माँस को नहीं बल्कि काटने के तरीके को कहा जाता है। हलाल सिर्फ एक अरबी शब्द है जिसका मतलब मुस्लिमों के लिए जायज होता है। यानी जायज ढंग से काटा गया जानवर ही वो लोग खा सकते हैं।

क्या है हलाल सर्टिफिकेशन?

जब किसी खाने या प्रोडक्ट को हलाल सर्टिफिकेट मिलता है तो इसका मतलब है कि उसे बनाने में कोई ऐसी चीज इस्तेमाल नहीं हुई जो इस्लाम में हराम (मना) है। अगर बात मांस की हो तो हलाल सर्टिफिकेशन तब मिलता है जब जानवर को इस्लामी तरीके से जबह किया गया हो।

भारत में जमीयत उलमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट नाम की संस्था है, जो ये सर्टिफिकेशन देती है। ये लोग जाँचते हैं कि कोई प्रोडक्ट इस्लामिक नियमों के हिसाब से बना है या नहीं। जाँच में प्रोडक्ट के हर हिस्से को देखा जाता है, उसमें क्या-क्या चीजें डाली गई, उसे बनाने का तरीका क्या था, पैकिंग का तरीका आदि।

कैसे होता है जानवर हलाल

जानवर को हलाल करने का एक खास तरीका होता है। इस प्रक्रिया में छुरी से जानवर की गर्दन की नस और सांस लेने वाली नली को काटा जाता है। इस वक्त एक दुआ भी पढ़ी जाती है। गर्दन पर छुरी चलाने के बाद जानवर का पूरा खून निकलने का इंतजार किया जाता है। हलाल करने के दौरान जानवर की गर्दन को फौरन अलग नहीं किया जाता बल्कि जब जानवर मर जाता है तो उसके हिस्से किए जाते हैं। इस्लाम में इसे ‘ज़िबाह’ करना भी कहते हैं।

हलाल कानून के नियम

हलाल मीट का अर्थ केवल जानवर को उस ढंग से काटना नहीं होता बल्कि उस माँस की पैकेजिंग के भी नियम होते हैं। जैसे एक नियम होता है कि केवल एक मुस्लिम व्यक्ति ही जानवर को मार सकता है। जानवर हलाल करते हुए तेज चाकू की मदद से गर्दन की नस इस तरह काटी जाती है कि जानवर का सिर धड़ से अलग न हो। जानवर मारने के बाद उसकी नसों से अधिक से अधिक खून निकलने दिया जाता है।

इसके अलावा इस्लाम में मीट खाने का यह भी नियम है कि मुस्लिम ऐसा जानवर नहीं खा सकते हैं जो कि हलाल प्रक्रिया के अनुसार न मारा गया हो।

कौन-सी वस्तुएँ इस्लाम में ‘हराम’?

इस्लाम में कई चीजों को ‘हराम’ माना गया है, जिन्हें हलाम प्रमाण-पत्र नहीं दिया जाता है। उनमें शामिल हैं:

  • सूअर, जंगली सूअर, कुत्ते और इनकी नस्लों वाले सभी जानवर
  • पंजे और दाँतों से शिकार करने वाले जानवर जैसे शेर, बाघ, भालू, साँप, बंदर आदि
  • शिकारी पक्षी जैसे चील, गिद्ध और इसी तरह के दूसरे पक्षी
  • हानिकारक या गंदे जीव-जंतु जैसे चूहे, बिच्छू, सेंटीपीड आदि
  • वो जानवर जिन्हें इस्लाम में मारना मना है, जैसे चींटी, मधुमक्खी और कठफोड़वा (लकड़हारा पक्षी) भी हराम हैं
  • गंदे या घृणित कीड़े-मकोड़े जैसे जुएँ, मक्खियाँ, कीड़े और मैगॉट्स (सड़ने वाले कीड़े)
  • जो जीव जमीन और पानी दोनों में रहते हैं (उभयचर) जैसे मेंढक, मगरमच्छ आदि
  • घोड़े-खच्चर और घरेलू गधे
  • सभी जहरीले और खतरनाक समुद्री जीव
  • वो जानवर जो इस्लामी तरीके से ज़बह नहीं किए गए, उनका मांस हराम है
  • जो जानवर गला घोंटने, चोट लगने, गिरने, प्राकृतिक मौत या किसी जानवर के हमले से मरे हों
  • खून का सेवन
  • इंसान के शरीर का कोई हिस्सा या उससे बने पदार्थ (जैसे प्लेसेंटा)
  • इंसान या जानवर के शरीर से निकली चीजें जैसे पेशाब, मल, उल्टी, मवाद (पस) आदि
  • नशे वाले या जहरीले पौधे, जब तक उनका जहर या हानिकारक असर पूरी तरह हटाया न जाए
  • शराब और सभी तरह के मादक पेय जैसे वाइन, एथिल अल्कोहल, स्पिरिट आदि
  • सभी नशे वाले और खतरनाक पेय पदार्थ
  • हराम चीजों से बने फूड एडिटिव्स (खाद्य पदार्थों में मिलाए जाने वाले तत्व)
  • नशे वाले या हानिकारक रसायन और प्राकृतिक खनिज

यूपी में हलाल उत्पादों पर बैन क्यों?

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने साल 2023 में हलाल-सर्टिफाइड उत्पादों पर बैन लगा दिया था। यूपी सरकार ने तय किया था कि राज्य की सीमा के भीतर हलाल उत्पादों के उत्पादन, वितरण, भण्डारण पर संपूर्ण बैन लागू हो। ये बैन 18 नवंबर 2023 से लागू है।

हलाल-सर्टिफाइड उत्पादों को बैन करने के पीछे यूपी सरकार की मंशा उपभोक्ताओं के बीच फैला भ्रम था। सरकार का कहना था कि हलाल-सर्टिफिकेशन एक अलग पंथी-प्रणाली बन गई है, जिसमें खाद्य पदार्थों के लिए पहले से मौजूद मानक और प्रक्रिया FSSAI के अलावा दूसरी जाँच प्रमाणन हो रहा था, जिससे सामान्य उपभोक्ता को भ्रम हो रहा था।

सरकार ने यह भी कहा था कि कुछ संस्थाएँ बिना मान्यता के हलाल सर्टिफिकेशन जारी कर रही थीं। इनमें अधिकतर खाद्य, दवाइयाँ और कॉस्मेटिक्स के सामान शामिल थे। सरकार ने कहा कि यह व्यापार-मानदंज और सामाजित संतुलन के लिए समस्या पैदा कर रहा था।

जिनको खुश करने के लिए इमरान मसूद ने कहा था- ‘मोदी को बोटी-बोटी कर देंगे’, उन्होंने मुस्लिम MP की बेटी को भी नहीं बख्शा: दीवाली पोस्ट से टूट पड़े इस्लामी कट्टरपंथी

कॉन्ग्रेस सांसद इमरान मसूद तो आपको याद होंगे, वही मसूद जो आज से करीब 10 साल पहले तब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने की धमकी देकर राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गए थे। उनके जहरीले बयान ने तब उन्हें कट्टरपंथियों का ‘ब्लू आइड बॉय’ यानी दुलारा बना दिया था।

लेकिन अब कट्टरपंथी सहारनपुर से कॉन्ग्रेस सांसद मसूद और उसके परिवार से खफा हो गए हैं। यहाँ तक की उनकी बेटी को निशाना बनाने का मौका नहीं चूक रहे हैं। हुआ यूँ कि इमरान मसूद की बेटी हिबा मसूद ने दीपावली पर लोगों को बधाई देते हुए इंस्टाग्राम पर एक रील अपलोड की।

हिबा ने रील शेयर करते हुए लिखा, “मेरी तरफ से आपको दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ। पापा को (वीडियो के लिए) मजबूर नहीं किया गया है।” इस रील में हिबा मसूद के साथ उनके पिता इमरान मसूद भी नजर आए। इस रील में हिबा इमरान से पूछती हैं कि वह कैसी लग रही हैं और इसके बाद वह लोगों को दीपावली की बधाई देती हैं।

इस वीडियो में सांसद इमरान मसूद भी दीपावली की बधाई देते नजर आते हैं। लेकिन यही बात अब कट्टरपंथियों को रास नहीं आ रही है। कट्टरपंथी इस बात को नहीं पचा पा रहे हैं कि कैसे इमरान या उनकी बेटी ‘काफिरों’ के त्योहार पर बधाई दे सकते हैं।

इस रील के कमेंट्स में कई लोगों ने जहाँ अच्छी बातें लिखीं तो कुछ कट्टरपंथियों को यहाँ भी जहर उगलने का मौका मिल गया। जिस इमरान को कट्टरपंथियों ने अपना पोस्टर ब्यॉय बनाना चाहा था, उनमें अब जिहादियों को अपना जानी दुश्मन नजर आ रहा है।

सरफराज ओवैसी नामक एक यूजर ने हिबा के वीडियो पर कमेंट करते हुए कहा, “अल्लाह इन सब को हिदायत दे।” यानी सरफराज को लगता है कि इमरान और उनका परिवार भटक गया है तो अल्लाह उनको सही रास्ते पर लाएँ।

हिबा के पोस्ट पर कमेंट

ऐसी टिप्पणी करने वाला सरफराज अकेला नहीं है, कट्टरपंथियों की एक पूरी फौज हिबा के विरोध में उतर आई है। शाह फहद इकबाल नामक एक यूजर के लिए तो यह पूरा समुदाय के खतरे की बात हो गई हैं। शाह फहद ने लिखा, “अल्लाह उम्मते की हिफाजत फरमाए” यानी जितने भी मुसलमान हैं, उनको कोई नुकसान ना हो।

हिबा के पोस्ट पर कमेंट

एक यूजर ने तो इमरान मसूद को असदुद्दीन ओवैसी से कम कट्टर समझते हुए उनसे अपनी नाराजगी जाहिर की। समीर बरकत नाम के इस यूजर ने लिखा, “इसलिए मुझे मेरे सदर बैरिस्टर असद ओवैसी पर नाज है।” यानी अगर कट्टरता कम हुई तो आप किसी भी तरह से इन कट्टरपंथियों के ‘हीरो’ नहीं रह सकते हैं।

हिबा के पोस्ट पर कमेंट

यूसुफ नाम के एक यूजर ने दावा कर दिया कि दीवाली की बधाई देना ही गलत है। उसने लिखा, “दूसरे धर्मों के त्योहारों पर बधाई देने पर इस्लाम में सख्त मनाही है।”

एक यूजर ने लिखा कि मसूद और उसकी परिवार केवल नाम के मुसलमान हैं। मुजफ्फर खान नामक इस यूजर ने लिखा, “तुम लोग सिर्फ नाम के मुसलमान हो, हरकतें सारी शैतानों वाली हैं। सहारनपुर की जनता ने बहुत गलत नेता चुन लिया है।”

हिबा के पोस्ट पर कमेंट

रजवी नाम के एक यूजर ने लिखा कि इन्ही सब कामों की वजह से मुस्लिम कौम आज बदनाम और बर्बाद है।

हिबा मसूद के पोस्ट पर ऐसे 2-4 कमेंट नहीं है बल्कि ऐसे कमेंट्स की भरमार है। कट्टरपंथियों की कमेंट्स से साफ है कि उनके लिए इमरान मसूद या उनका परिवार का कोई आदमी तभी तक उनका अपना है जब तक वो उनकी बात को आँख बंद कर मान रहा है।

इन कट्टरपंथियों के लिए इस्लाम का मायना बस एक है कि तुम हमारे झंडे के नीचे रहो, हमारे तौर-तरीके अपनाओ, हमारी हर सलाह को बिना सवाल माने स्वीकार करो तभी कोई उनके लिए सच्चा मुसलमान हो सकता है।

जो इस्लाम से हटा, जो शरीयत से जरा सा टस से मस हुआ बस वही इन कट्टरपंथियों की आँखों में खटकने लगता है। इस कट्टर विचारधारा में बस एक जैसी सोच और एक जैसे विचारों की ही जगह है। अगर कोई इनका ‘अपना’ भी इससे टस से मस होता है तो ये उस पर टूट पड़ते हैं जैसे इमरान मसूद के मामले में हुआ था।

सऊदी अरब में करोड़ों मजदूरों की ‘गुलामी की जंजीर’ टूटी, खत्म हुआ 50 साल पुराना कफाला सिस्टम: जानें कामगारों को क्या मिलेगा फायदा?

सऊदी अरब ने 50 साल से चले आ रहे कफाला सिस्टम को आधिकारिक तौर पर खत्म कर दिया है। अरबी में कफाला का मतलब ‘संरक्षण’ होता है। इस कानून ने खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों विदेशी मजदूरों की जिंदगी को पूरी तरह से कंट्रोल किया हुआ था। यह सिस्टम तय करता था कि मजदूर नौकरी बदल सकते हैं या नहीं, देश छोड़ सकते हैं या नहीं, और अपने साथ हो रहे बुरे बर्ताव के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं या नहीं। आलोचक इस व्यवस्था को ‘आधुनिक गुलामी’ जैसा बताते थे। सऊदी अरब में करीब 1 करोड़ 30 लाख विदेशी मजदूर काम करते हैं, जिनके लिए यह ऐतिहासिक बदलाव है।

कफाला सिस्टम क्या था?

कफाला सिस्टम एक कानूनी ढाँचा था जो खाड़ी देशों में विदेशी मजदूरों की नौकरी और रहने के नियमों को तय करता था। इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी। तेल से अमीर बने देशों को सस्ते मजदूरों की जरूरत थी, लेकिन वे उन्हें देश की नागरिकता या हमेशा रहने का हक नहीं देना चाहते थे। इस सिस्टम में विदेशी मजदूर का कानूनी दर्जा पूरी तरह से उसके मालिक या ‘कफील’ से जुड़ा होता था।

मालिक ही मजदूर का वीजा, देश में रहने का अधिकार, नौकरी बदलने का अधिकार और यहाँ तक कि देश छोड़ने का अधिकार भी कंट्रोल करता था। मालिक की मंजूरी के बिना मजदूर न तो नौकरी बदल सकता था, न देश छोड़ सकता था और न ही बुरे बर्ताव पर कानूनी मदद ले सकता था। इस सिस्टम से मालिक बहुत ताकतवर हो गए थे। वे मजदूरों के पासपोर्ट जब्त कर लेते थे, सैलरी रोक लेते थे और उन्हें देश से निकालने की धमकी देते थे। मजदूरों के पास इसका विरोध करने का कोई रास्ता नहीं था।

सऊदी अरब ने अब यह क्यों बदला?

कफाला को खत्म करने का फैसला क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के ‘विजन 2030’ का हिस्सा है। सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से हटाकर आधुनिक बनाना चाहता है और विदेशी निवेश को आकर्षित करना चाहता है। मानवाधिकार समूहों के बढ़ते दबाव और अंतर्राष्ट्रीय आलोचना के कारण भी यह बदलाव जरूरी था। उदाहरण के लिए, कतर ने भी 2022 फीफा विश्व कप से पहले अपने कानून में कुछ बदलाव किए थे।

नए सिस्टम में क्या-क्या बदला?

कफाला को हटाकर अब अनुबंध-आधारित (Contract-Based) नौकरी का सिस्टम लाया गया है। मजदूर अब अपने मौजूदा मालिक की मंजूरी के बिना ही नई नौकरी कर सकते हैं। उन्हें अब देश छोड़ने के लिए मालिक के ‘एग्जिट वीजा’ या सहमति की जरूरत नहीं होगी। मजदूरों को अब लेबर कोर्ट और शिकायत दर्ज करने के बेहतर तरीके मिलेंगे। सरकार का कहना है कि इससे काम करने वालों का शोषण कम होगा और सऊदी अरब की छवि सुधरेगी।

जिंदगी में कितना बदलाव आएगा?

यह कानून में एक बड़ी सफलता है, लेकिन जानकारों का कहना है कि सिर्फ कानून बदलने से रातों-रात दुर्व्यवहार खत्म नहीं होगा। मानवाधिकार समूहों का कहना है कि कई मालिक अभी भी नौकरी बदलने या देश छोड़ने के लिए मजदूरों की सहमति माँगते हैं। घरेलू कामगारों जैसे सबसे कमजोर लोगों को नए नियमों का बराबर फायदा शायद न मिले।

कई देशों में भर्ती के दौरान होने वाले शोषण (जैसे ज़्यादा फीस लेना) को सऊदी कानून में अभी भी ठीक से नहीं निपटा गया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि कानून बदलना तो पहला कदम है, लेकिन जमीन पर हकीकत बदलने में अभी बहुत समय लगेगा।

यह सिस्टम इतना विवादित क्यों था?

दशकों से कफाला दुनिया के सबसे ज़्यादा आलोचित श्रम कानूनों में से एक बन गया था। मानवाधिकार समूह और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने कहा कि यह सिस्टम जबरदस्ती काम कराने और मानव तस्करी को बढ़ावा देता है। मजदूर बिना इजाजत नौकरी छोड़ने पर गिरफ्तारी या देश से निकाले जाने का जोखिम उठाते थे। इसलिए, वे बुरे हालात में भी काम करते रहने को मजबूर थे।

यह समस्या खासकर घरेलू काम, निर्माण और खेती से जुड़े मजदूरों में ज़्यादा थी। सऊदी अरब में 1 करोड़ 34 लाख प्रवासी मजदूर हैं, जो वहाँ की आबादी का लगभग 42% हैं। इनमें लाखों लोग भारत, बांग्लादेश और फिलीपींस से हैं।

कभी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को टक्कर देती थी कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज, ऐतिहासिक CSE ने 117 साल बाद समेटा काम: केतन पारेख घोटाला बना बर्बादी की वजह

कभी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) से मुकाबला करने वाली 117 साल पुरानी कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज (CSE) ने अपना काम समेट लिया है। कई सालों के कानूनी और नियामक अड़चनों के बाद CSE ने अपनी आखिरी काली पूजा और दिवाली का जश्न मनाया और सोमवार (20 अक्टूबर 2025) को स्थाई रूप से काम करना बंद कर दिया।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने 2013 में CSE का ट्रेडिंग निलंबित कर दिया था क्योंकि यह नियामक मानकों का पालन नहीं कर पा रही थी। पिछले दस साल में ट्रेडिंग को पुनर्जीवित करने और SEBI के फैसले को चुनौती देने के प्रयासों के बावजूद एक्सचेंज ने पूरी तरह से बंद होने का निर्णय लिया।

पहले CSE ने SEBI के आदेशों को अदालत में चुनौती देने का इरादा रखा था, लेकिन अनुकूल फैसला पिछले साल तक संभव नहीं था। दिसंबर 2024 में CSE बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट और कोलकाता हाई कोर्ट में लंबित मामलों को वापस लेने का निर्णय लिया। इसके बाद उसने स्वयं से बाहर निकलने का अनुरोध किया।

CSE के चेयरमैन दीपंकर बोस ने कहा, “25 अप्रैल 2025 को आयोजित EGM (विशेष आम सभा) में शेयरधारकों से एक्सचेंज व्यवसाय से बाहर निकलने की मंजूरी प्राप्त की गई। इसके बाद CSE ने SEBI को बाहर निकलने के लिए आवेदन सौंपा, जिसने अब स्टॉक एक्सचेंज का मूल्यांकन करने के लिए एक वैल्यूएशन एजेंसी नियुक्त की है, जो फिलहाल प्रगति पर है।”

अगर SEBI CSE को बाहर निकलने की अनुमति दे देता है, तो CSE सिर्फ एक होल्डिंग कंपनी के रूप में ही बनी रहेगी। इसके तहत आने वाली सहायक कंपनी CSE कैपिटल मार्केट्स प्राइवेट लिमिटेड (CCMPL) अब भी NSE (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज) और BSE (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) पर कारोबार करती रहेगी।

इसके अलावा, CSE की तीन एकड़ की EM बाईपास संपत्ति को सृजन ग्रुप को 253 करोड़ रुपए में बेचने की योजना को भी SEBI ने मंजूरी दे दी है। यह बिक्री तब पूरी होगी जब CSE का बाहर निकलना आधिकारिक रूप से पूरा हो जाएगा।

व्यापार के एक युग का अंत

CSE की स्थापना 1908 में हुई थी और यह कभी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) की प्रतियोगी थी। यह कोलकाता के वित्तीय इतिहास और लाइयन्स रेंज के हब का भी प्रतीक माना जाता था।

CSE के लिए सबसे बड़ा झटका 2013 में आया, जब SEBI ने ट्रेडिंग रोकने का फैसला लिया। एक्सचेंज ने कई महत्वपूर्ण नियमों का उल्लंघन किया था, जिससे यह कदम उठाना पड़ा। इसके खिलाफ CSE ने कई बार अदालतों का रुख किया, लेकिन इसका नतीजा आर्थिक दबाव और ट्रेडिंग में गिरावट के रूप में सामने आया। यह गिरावट उस समय और भी ज्यादा महसूस हुई जब NSE और BSE पर ट्रेडिंग का बूम चल रहा था।

CSE के पतन के मुख्य कारणों में BSE और NSE का प्रभुत्व, प्रासंगिकता का कम होना और तकनीकी उन्नति के साथ तालमेल न बिठा पाना शामिल है। विशेष रूप से 2000 के दशक की शुरुआत में डॉट कॉम बूम के बाद, CSE तेजी से बदलती वित्तीय दुनिया में खुद को ढाल नहीं पाया और पीछे रह गया।

केतन पारेख घोटाले का खुलासा 2001 में CSE के लिए आखिरी बड़ा झटका साबित हुआ। पेशे से एक स्टॉक ब्रोकर पारेख ने कुछ स्टॉक्स जिन्हें K-10 स्टॉक्स कहा जाता था की कीमतें बढ़ाने के लिए एक्सचेंज की कमजोरियों का फायदा उठाया। इससे सख्त नियम लागू हुए और निवेशकों का विश्वास काफी घट गया। अंततः CSE का पतन इस कारण हुआ कि समय के साथ यह नियमों का पालन नहीं कर सका।

सीनियर स्टॉक ब्रोकरेर सिद्धार्थ थिरानी ने द टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, “हम हर दिन ट्रेडिंग शुरू करने से पहले देवी लक्ष्मी की पूजा करते थे, यह परंपरा अप्रैल 2013 तक चली जब ट्रेडिंग को रेगुलेटर ने निलंबित कर दिया। इस दिवाली का मतलब हमारे उस वैभवपूर्ण समय को अलविदा कहना है।”

शेयरधारकों ने औपचारिक प्रस्ताव को 25 अप्रैल को मंजूरी दी, जिसे पहले 18 फरवरी को SEBI को भेजा गया था। SEBI ने इसे पूरा करने के लिए राजवंशी एंड एसोसिएट्स को नियुक्त किया है और यह प्रक्रिया बाहर निकलने की अंतिम मंजूरी से पहले की आखिरी स्टेज है।

CSE में 1,749 सूचीबद्ध कंपनियाँ और 650 पंजीकृत सदस्य थे। चेयरमैन दीपंकर बोस ने FY25 रिपोर्ट में कहा कि एक्सचेंज ने भारत के पूँजी बाजारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2024-2025 के दौरान उन्हें डायरेक्टर की बैठक फीस के रूप में 5.9 लाख रुपए मिले।

बाहर निकलने से पहले एक्सचेंज ने सभी कर्मचारियों को एक वॉलंटरी रिटायरमेंट स्कीम (VRS) का लाभ दिया। इसके तहत कर्मचारियों को एक बार का भुगतान 20.95 करोड़ रुपए और सालाना लगभग 10 करोड़ रुपए की बचत सुनिश्चित की गई। कुछ कर्मचारियों को केवल अनुपालन कार्यों के लिए अनुबंध पर रखा गया, लेकिन सभी ने इस ऑफर को स्वीकार कर लिया।

CSE के बाहर निकलने के साथ ही भारत के क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंजों का एक युग खत्म हो रहा है। पहले ये एक्सचेंज बहुत सक्रिय थे, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म्स के आने के बाद बाजार का केंद्र मुंबई चला गया।

CSE जैसी संस्थाएँ आज भी वित्तीय इतिहास की पहचान हैं, जो भारत के पूँजी बाजारों के विकास, तकनीकी आधुनिकीकरण और नियमों के सुदृढ़ीकरण का प्रतीक हैं। FY25 वार्षिक रिपोर्ट में चेयरमैन बोस ने कहा, “CSE ने भारत के पूँजी बाजारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।”

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।)

पंजाब के जिस पूर्व DGP मुस्तफा मोहम्मद पर बेटे की हत्या का आरोप, उसकी बीवी रजिया कॉन्ग्रेस सरकार में रही मंत्री: नवजोत सिंह सिद्धू का करीबी, हिंदुओं के खिलाफ उगल चुका है आग

पंजाब के पूर्व DGP मोहम्मद मुस्तफा और उनकी बीवी पंजाब की पूर्व मंत्री रजिया सुल्ताना अपने ही 35 साल के बेटे अकील अख्तर की हत्या के आरोप में फँस चुके हैं। दोनों मियाँ-बीवी पर हरियाणा के पंचकूला में FIR दर्ज हो गई है। हत्या में बहू और बेटी को भी आरोपित बनाया गया है। यह भी सामने आया कि पूर्व DGP के बहू के साथ अफेयर की बात भी सामने आई है।

दरअसल, 16 अक्टूबर 2025 को हरियाणा के पंचकूला के सेक्टर-4 इलाके में अखील अख्तर को बेहोशी की हालत में पाया गया था। अकील को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया। शुरुआत में परिवार ने दावा किया यह ड्रग ओवरडोज का मामला है।

लेकिन अब सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें मृतक अकील अख्तर ने अपने अम्मी-अब्बा और बहन के खिलाफ बयान दिया है। यह वीडियो 27 अगस्त 2025 का बताया गया है। इस वीडियो में अकील कहता है कि उसके अब्बा मोहम्मद मुस्तफा का उसकी पत्नी के साथ अफेयर है। इसीलिए परिवार के लोग उसकी हत्या की साजिश रच रहे हैं। इसमें उसकी अम्मी रजिया सुल्ताना और बहन निशात अख्तर भी शामिल हैं।

इस वीडियो के आधार पर अकील के पहचान वाले शमशुद्दीन ने पंचकूला पुलिस से शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने शिकायत पर आरोपितों पर BNS की धारा 103(1) और 61 के तहत FIR दर्ज की है। पंचकूला की DCP ने बताया कि ACP रैंक के अधिकारी की अगुआई वाली SIT गठित कर जाँच शुरू कर दी है।

कौन है मोहम्मद मुस्तफा?

मोहम्मद मुस्तफा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के निवासी हैं। मुस्तफा पंजाब कैडर के 1985 बैच के IPS अधिकारी हैं। वह साल 2021 में पंजाब पुलिस सेरिटायर हो गए। सेवानिवृत्ति के बाद मुस्तफा ने राजनीति में आने का फैसला किया और वे कॉन्ग्रेस से जुड़े। वह पूर्व क्रिकेटर और कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंद सिद्धू के करीबियों में गिने जाते हैं।

पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरेंद्र सिंह से तनातनी

पूर्व DGP मुस्तफा मोहम्मद के पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंद्रर सिंह से रिश्ते खराब रहे। यही वजह है कि मुस्तफा ने साल 2021 में पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व में पंजाब कॉन्ग्रेस की सरकार के दौरान पार्टी ज्वाइन की।

अमरिदंर सिंह की सरकार के दौरान पूर्व DGP ने कई बार उनका विरोध किया, जिसका उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ा। साल 2019 में जब पंजाब में नए DGP का नामांकन किया गया तो मुस्तफा को उस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया और उसको लेकर विवाद भी हुआ था। मुस्तफा ने सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही और अपनी ‘मान-बहाली’ की माँग की थी। बाद में कैप्टन अमरिंदर सरकार ने उन्हें DGP के पद से हटाकर दिनकर गुप्ता को तैनात किया।

मुस्तफा की हिंदू समुदाय के विरोध में टिप्पणी

पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 के दौरान मुस्तफा और उनकी बीवी कॉन्ग्रेस उम्मीदवार रजिया सुल्ताना पर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने के आरोप में FIR भी दर्ज हुई थी। चुनाव के दौरान भाषण में मुस्तफा ने हिंदू समुदाय के खिलाफ टिप्पणी की थी और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं को मारने की धमकी दी थी।

मुस्तफा ने कहा था, “मैं किसी भी जुलूस को नहीं होने दूँगा… मैँ कौमी फौजी हूँ, RSS का एजेंट नहीं।” इस बयान का वीडियो काफी वायरल हुआ था। मुस्तफा ने यह भी दावा किया था कि उनके इस बयान में हिंदू-मुस्लिम का संदर्भ नहीं था बल्कि यह ‘फितने’ कर रहे AAP कार्यकर्ताओं के खिलाफ था।

मुस्तफा की बीवी पंजाब कॉन्ग्रेस सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री

मुस्तफा की बीवी रजिया सुल्ताना भी पंजाब कॉन्ग्रेस सरकार में मंत्री रह चुकी है। रजिया साल 2002, 2007 और 2017 में मालेरकोटला सीट से विधायक रही हैं। साल 2012 में पंजाब विधानसभा चुनावों में रजिया हार गई थीं। लेकिन 2017 में उसी सीट पर अपने भाई AAP के मुहम्मद अरशद को हराकर दोबारा विधायक बनीं।

2017 से 2022 तक पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में भी काम किया है। इस दौरान वह महिला एवं बाल विकास, जल आपूर्ति आदि विभागों के साथ रहीं। 28 सितंबर 2021 को उन्होंने नवजोत सिंह सिद्धु से एकजुटता में कैबिनेट मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।

बेटे अकील अख्तर का नया वीडियो

अकील अख्तर का अब एक और नया वीडियो सामने आया है, जिसमें वह कहता दिखाई दे रहा है कि उसने जो पुराना वीडियो बनाया था, उस समय उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं थी। हालाँकि, उसने परिवार पर लगाए आरोपों को खारिज नहीं किया है।

केवल इतना कह रहा है कि वह मानसिक रूप से बीमार है और परिवार वाले उसके दवाई खिलाते रहते हैं।

तमिलनाडु-पश्चिम बंगाल को दिखाया ठेंगा, ‘शिक्षा में भगवा रंग घोलने’ का शोर मचाने के बाद केरल ने लिया U-Turn: PM SHRI योजना में शामिल हुई वामपंथी सरकार

कभी संसद की चौखट पर खड़े होकर ‘शिक्षा का भगवाकरण’ चिल्लाने वाली केरल सरकार ने आखिरकार अपनी जिद तोड़ दी है। रविवार को ये खबर फटाफट फैली थी और मंगलवार (21 अक्टूबर 2025) तक शिक्षा मंत्री वी. सिवनकुट्टी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसे पक्का कर दिया– राज्य प्रधानमंत्री उभरते भारत के लिए स्कूल (पीएम श्री) योजना के समझौते पर दस्तखत करेगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, डेढ़ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के केंद्रीय फंड्स अब केरल की ओर बहेंगे, जो टीचरों की बढ़ती बकाया तनख्वाहें चुकाने, स्टूडेंट्स को ग्रांट्स पहुँचाने और शिक्षा विभाग के चरमराते बजट को साँस देने के लिए बेहद जरूरी हो चुके हैं। लेकिन ये यू-टर्न केरल की राजनीति में भूचाल ला चुका है। सहयोगी दल सीपीआई के नेता कैबिनेट में चर्चा न होने का रोना रो रहे हैं, कॉन्ग्रेस वाले ‘सीपीएम-बीजेपी का सीक्रेट गठजोड़’ चिल्ला रहे हैं, जबकि एबीवीपी जैसे संगठन अपनी सड़क-प्रदर्शनों की जीत का बिगुल बजा रहे हैं। सोशल मीडिया पर तो बहस का सैलाब उमड़ पड़ा है – कोई इसे ‘आर्म-ट्विस्टिंग की जीत’ बता रहा है, तो कोई ‘बेहतर लेट देन नेवर’ कहकर ताली बजा रहा।

आखिर ये पीएम श्री योजना है क्या, जो इतने बड़े विवाद का केंद्र बनी हुई है? केरल ने इसे इतने जोर-शोर से क्यों ठुकराया था और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) का ये पुराना झगड़ा अब कहाँ खड़ा है? चलिए इस पूरी घटना को धीरे-धीरे खोलते हैं। हम योजना की बारीकियों से शुरू करेंगे, फिर विरोध की जड़ों तक जाएँगे, फंडिंग के खेल को समझेंगे और आखिर में एनईपी के उस बड़े कैनवास को देखेंगे जो इस सबका बैकग्राउंड है।

क्या है पीएम श्री योजना?

पीएम श्री (प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया) केंद्र सरकार की एक मेगा पहल है, जो 2022 के केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने घोषित की थी। इसका मकसद देशभर के मौजूदा सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों को ‘मॉडल स्कूल’ में बदलना है। कुल 14,500 स्कूलों को टारगेट किया गया है – हर जिले के हर ब्लॉक में कम से कम दो स्कूल। ये स्कूल बाकी सरकारी स्कूलों के लिए लीडरशिप रोल निभाएंगे, यानी ये मिसाल बनेंगे कि अच्छी शिक्षा कैसे दी जा सकती है।

योजना का कोर कनेक्शन है राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 से। पीएम श्री स्कूल्स एनईपी के हर लक्ष्य को शोकेस करेंगे। एनईपी क्या है, वो थोड़ी देर में डिटेल में बताएँगे। अभी योजना की बात करें। फंडिंग का मॉडल साफ है: केंद्र 60% पैसा देगा, राज्य 40%। हर चुने गए स्कूल को 5 साल के लिए औसतन 1 करोड़ रुपये सालाना मिलेंगे। कुल बजट? करीब 27,000 करोड़ रुपये का आउटले। ये पैसा कहाँ जाएगा?

अब सवाल ये कि ये पैसा कहाँ-कहाँ लगेगा?

इंफ्रास्ट्रक्चर: स्मार्ट क्लासरूम जहाँ ब्लैकबोर्ड की जगह टचस्क्रीन और प्रोजेक्टर होंगे, डिजिटल लैब जहाँ बच्चे कोडिंग और साइंस एक्सपेरिमेंट्स करेंगे, लाइब्रेरी जहाँ किताबों का पूरा समंदर होगा और स्पोर्ट्स ग्राउंड जहाँ फिजिकल फिटनेस को बढ़ावा मिलेगा। खासकर केरल जैसे तटीय राज्य में ये सुविधाएँ और भी उपयोगी साबित होंगी – पानी से बचाव वाली मजबूत इमारतें, मछली पालन और पर्यावरण से जुड़े लोकल वोकेशनल कोर्स।

टीचर ट्रेनिंग पर फोकस: जहाँ टीचरों को सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं सिखाने की ट्रेनिंग दी जाएगी, बल्कि क्रिटिकल थिंकिंग, इमोशनल इंटेलिजेंस और लाइफ स्किल्स पर जोर होगा।

एनईपी की यही खूबी है कि ये टीचिंग को रटने से आगे ले जाती है। बच्चों के लिए तो जैसे स्वर्णिम अवसर खुले पड़े हैं – वोकेशनल ट्रेनिंग कोर्स जहाँ कारपेंटरी से लेकर डिजिटल मार्केटिंग तक सिखाया जाएगा, कल्चरल एक्टिविटीज जहाँ लोकल फेस्टिवल्स और आर्ट्स को जगह मिलेगी, योगा और स्पोर्ट्स क्लासेस जहाँ बॉडी और माइंड दोनों मजबूत होंगे। और इंक्लूजन का ख्याल रखते हुए एससी-एसटी, लड़कियों और डिसेबल्ड बच्चों के लिए स्पेशल छात्रवृत्तियाँ, हॉस्टल फैसिलिटी, फ्री मील्स और ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था।

तकनीक का चलेगा जादू: आईसीटी टूल्स से ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन क्लासेस जहाँ गाँव का बच्चा शहर के लेवल पर पढ़ सके। हर स्कूल पर ‘पीएम श्री स्कूल’ का बोर्ड लगेगा, जो ब्रांडिंग से ज्यादा गर्व की बात बनेगा।

निगरानी का सिस्टम भी सख्त: केंद्र की टीमें रेगुलर विजिट करेंगी, रिपोर्ट्स चेक करेंगी कि एनईपी के 100 फीसदी गोल्स पूरे हो रहे हैं या नहीं। केरल के संदर्भ में देखें तो ये योजना 260 से ज्यादा स्कूलों पर लागू होगी।

केरल में ये योजना 260 से ज्यादा स्कूलों में रोलआउट होगी। मिनिस्टर सिवनकुट्टी के मुताबिक, ये फंड्स टेक्स्टबुक प्रिंटिंग, क्वेश्चन पेपर सेटिंग, कोस्टल रीजन की जरूरतों और एससी-एसटी स्टूडेंट्स की सुविधाओं पर खर्च होंगे। राज्य में 7,000 से ज्यादा टीचर्स की सैलरी राज्य खुद देता है, लेकिन बकाये चढ़ रहे थे। समग्र शिक्षा केरल (एसएसके) प्रोग्राम रुका पड़ा था – डिसेबल्ड बच्चों को एड इक्विपमेंट नहीं मिला। साफ है, ये योजना सिर्फ एक स्कीम नहीं, बल्कि शिक्षा के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बदलने वाली क्रांति है। लेकिन राजनीतिक चश्मे ने इसे विवाद की भेंट चढ़ा दिया।

केरल में क्यों हो रहा था पीएम श्री का विरोध?

अब बात करते हैं केरल के उस लंबे विरोध की, जो 2022 से ही एक नाटकीय धारावाहिक की तरह चल रहा था। केरल की सीपीआई(एम)-नीत सरकार ने शुरू से ही पीएम श्री को एनईपी का ‘हथियार’ बताया, और इसका विरोध एक आइडियोलॉजिकल स्टैंड की तरह पेश किया। मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन ने कई बार अपनी आवाज बुलंद करते हुए कहा कि ‘एनईपी राष्ट्र के लिए खतरा है’। उन्होंने इसे ‘कम्युनल एजेंडा’ का हिस्सा ठहराया, जहाँ शिक्षा को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है।

शिक्षा मंत्री वी. सिवनकुट्टी ने मार्च 2025 में एक प्रेस रिलीज में साफ-साफ कहा था कि सरकार एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) पर दस्तखत नहीं करेगी, क्योंकि ये योजना राज्य की शिक्षा परंपराओं और वैल्यूज को कुचल देगी। उनका मुख्य इल्जाम था ‘साफ्रनाइजेशन ऑफ एजुकेशन’ का। सिवनकुट्टी ने कहा, ‘जब केंद्र सरकार ने टेक्स्टबुक्स से महात्मा गाँधी की हत्या जैसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों को मिटा दिया, तो केरल ने वैकल्पिक अध्याय इंट्रोड्यूस किए। पीएम श्री साइन करने से राज्य के स्कूलों में दोहरी सिलेबस हो जाएँगे – एक एनईपी वाली, जो भगवा रंग से रंगी लगती है और दूसरी राज्य की अपनी। इससे बच्चे कन्फ्यूजन में पड़ जाएँगे और हमारी इंक्लूसिव, सेकुलर वैल्यूज खतरे में पड़ेंगी।’

एजुकेशन एक्टिविस्ट और ऑल इंडिया सेव एजुकेशन कमिटी के स्टेट वाइस प्रेसिडेंट एम. शजार खान ने चेतावनी भरी आवाज में कहा, ‘अगर योजना को हरी झंडी मिल गई, तो केंद्र राज्य के स्कूलों पर पूरा कंट्रोल हथिया लेगा। सिलेबस और टीचिंग मेथड्स पर राज्य का कोई असर नहीं बचेगा। ये कोऑपरेटिव फेडरलिज्म का उल्लंघन है।’

केरल स्टूडेंट्स यूनियन (केएसयू) के स्टेट प्रेसिडेंट अलोशियस जेवियर ने तो एक प्रेस स्टेटमेंट में तंज कसते हुए कहा, ‘ये मुद्दा सीपीएम और बीजेपी के अंदरूनी कनेक्शंस को उजागर करता है। लंबे विरोध के बाद यू-टर्न – ये सब संयोग नहीं लगता।’ विरोध सिर्फ बयानों तक सीमित न रहा, बल्कि प्रैक्टिकल चिंताओं पर भी टिका।

केरल का शिक्षा तंत्र तो पहले से ही दुनिया का एक मॉडल है – साक्षरता दर 94 फीसदी से ऊपर, ASER और अन्य रिपोर्ट्स में टॉप रैंकिंग। राज्य का सिलेबस मल्टीलिंगुअल है, लोकल कल्चर और भाषा पर फोकस्ड। एनईपी का 5+3+3+4 स्ट्रक्चर राज्य के मौजूदा बोर्ड सिस्टम को बिगाड़ सकता था, तीन भाषाओं का फॉर्मूला मलयालम को नेगलेक्ट कर सकता था। वोकेशनल एजुकेशन को प्राइवेटाइजेशन का रास्ता खुलने का डर। और सबसे बड़ा मुद्दा ‘पीएम’ प्रिफिक्स वाले बोर्ड का – इसे राज्य ‘केंद्रीय ब्रांडिंग’ और दखलअंदाजी मानता था। ये सब मिलाकर विरोध एक मजबूत दीवार की तरह खड़ा था, लेकिन फंडिंग की दीवार ने उसे तोड़ दिया।

शतरंज के खेल में जीती केंद्र सरकार

फंडिंग का ये खेल तो जैसे एक चालाकी भरा शतरंज का मैच था, जहाँ केंद्र सरकार ने हर मोहरे को सही जगह रखा। केंद्र ने साफ शर्त रख दी- पीएम श्री का एमओयू साइन करो, वरना समग्र शिक्षा अभियान (एसएसए) के फंड्स नहीं मिलेंगे। एसएसए क्या है? ये 2018 में शुरू हुआ वो व्यापक प्रोग्राम है, जो बच्चों के शिक्षा के अधिकार (आरटीई) 2009 को जमीनी स्तर पर लागू करता है। इसमें टीचरों की सैलरी, स्कूलों की बुनियादी सुविधाएँ, आईसीटी इंटरवेंशंस, टीचर ट्रेनिंग – सब कुछ शामिल। फंडिंग का रेशियो 60:40 – केंद्र 60 फीसदी, राज्य 40। लेकिन 2021 में इसे एनईपी से अलाइन कर दिया गया, और 2022 में पीएम श्री को इसमें शामिल कर लिया।

केरल के लिए ये झटका था। 2023-24 में एसएसए के तहत राज्य को 141.66 करोड़ रुपए मिले थे, लेकिन 2024-25 में शून्य। कुल अटके फंड्स 1,466 करोड़ रुपए (कुछ रिपोर्ट्स में इसे 1,500 करोड़ बताया गया)। संसद में 21 जुलाई 2025 को लोकसभा के स्टार्ड क्वेश्चन नंबर 9 के लिखित जवाब में शिक्षा मंत्रालय ने कन्फर्म किया कि तमिलनाडु और केरल को 2024-25 में एसएसए या पीएम श्री के तहत कोई फंड नहीं दिया गया।

क्योंकि दोनों राज्यों ने एनईपी 2020 को एंडोर्स करने वाला एमओयू साइन नहीं किया। तमिलनाडु को 2023-24 में 1,876.16 करोड़ मिले थे, लेकिन अब जीरो। जबकि उत्तरी राज्य फायदा उठा रहे थे – उत्तर प्रदेश को 6,264.79 करोड़ एसएसए + 246.86 करोड़ पीएम श्री, मध्य प्रदेश को 3,434.71 करोड़ एसएसए + 145.32 करोड़ पीएम श्री।

ये डिस्पैरिटी देखकर दक्षिणी राज्यों ने ‘पॉलिटिकल बायस’ का आरोप लगाया। एक सीनियर तमिलनाडु एजुकेशन ऑफिशियल ने कहा, ‘ये कुछ नहीं बल्कि पनिटिव फेडरलिज्म है। हमारे बच्चे सजा भुगत रहे हैं क्योंकि राज्य सरकार केंद्र की आइडियोलॉजिकल लाइन पर नहीं चली।’

साउथ फर्स्ट की 22 जुलाई 2025 की रिपोर्ट ने इसे ‘साइन ऑर स्टार्व’ की नीति बताया – मतलब दस्तखत करो वरना भूखे मरो। 36 स्टेट्स और यूटी में से 33 ने एमओयू साइन कर लिया, सिर्फ पश्चिम बंगाल, केरल और एक अन्य ने नहीं। दिल्ली और पंजाब ने फंड क्रंच से दबाव में मान लिया। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार ने आउटराइट रिजेक्ट कर दिया, जिससे 1,500 करोड़ अटक गए।

मिनिस्टर ऑफ स्टेट फॉर एजुकेशन सुकांता मजूमदार ने संसद में 10 मार्च 2025 को लिखित जवाब में कहा, ‘कई रिमाइंडर्स के बावजूद – 15 सितंबर 2022, 6 फरवरी 2023, 13 मार्च 2023, 9 अक्टूबर 2023, 23 फरवरी 2024 और 7 मार्च 2024 – टीएमसी सरकार ने एक भी एमओयू साइन नहीं किया।’

और फिर आया वो मोमेंट जब यू-टर्न का ऐलान हुआ। रविवार को सिवनकुट्टी ने प्रेस मीट में कहा, ‘फंड्स वर्थ 1,466 करोड़ रुपए, जो सही मायने में राज्य के बच्चों के हैं, केंद्र द्वारा रिलीज नहीं किए गए। हम इस स्थिति को क्यों स्वीकार करें? ये पैसे बीजेपी सरकारों के नहीं, बच्चों के हैं।’ उन्होंने फेस-सेविंग के लिए जोड़ा, ‘योजना राज्य की एजुकेशनल वैल्यूज और ट्रेडिशन्स को नुकसान नहीं पहुँचाएगी। हमने कंसल्टेशंस किए हैं, और ये फैसला बच्चों के हित में है।’

एनईपी 2020 का विवाद तो इस सारे ड्रामे का मूल है। 2020 में लॉन्च हुई ये पॉलिसी 34 साल पुरानी 1986 वाली नीति को बदलने का दावा करती है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का पूरा झगड़ा

स्कूल का ढाँचा: 10+2 से 5+3+3+4। 3-8 साल आधारभूत (खेल+प्राथमिक), 8-11 तैयारी, 11-14 मध्य, 14-18 उच्च।

भाषा: तीन भाषाओं का फॉर्मूला – स्थानीय+हिंदी+अंग्रेजी। लेकिन दक्षिण में हिंदी थोपने का डर।

मूल्यांकन: बोर्ड परीक्षाएँ कम, लगातार जाँच। ग्रेड सिस्टम।

उच्च शिक्षा: बहु-विषयी विश्वविद्यालय, 50 फीसदी नामांकन लक्ष्य।

समावेश: नामांकन 100 फीसदी, लड़कियाँ/अल्पसंख्यक पर जोर।

बहरहाल, केरल का पीएम श्री योजना में शामिल होना केंद्र सरकार की दूरदर्शी नीति की जीत है। पहले ‘साफ्रनाइजेशन’ का शोर मचाने वाली सरकार ने समझ लिया कि बच्चों का भविष्य राजनीति से बड़ा है। 1,466 करोड़ के फंड्स से 260 स्कूल मॉडल बनेंगे, शिक्षकों की तनख्वाहें चुकेंगी, और स्मार्ट क्लासरूम व हुनरमंद कोर्स बच्चों को नई उड़ान देंगे। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को भी केरल से सीख लेनी चाहिए। एनईपी 2020 और पीएम श्री भारत की शिक्षा को वैश्विक स्तर पर ले जाएँगे। ये यू-टर्न बच्चों की जीत है, जिसका फायदा भविष्य में मिलेगा।

हमास आतंकी को अमेरिकी जेल में मिलेगा हलाल खाना और शरिया वाली सुविधाएँ, 60 यहूदियों की हत्या में शामिल होने का आरोप: जानें कौन है महमूद अमीन याकुब अल मुहतादी

हमास का मोस्ट वांडेट आतंकवादी महमूद अमीन याकूब अल मुहतादी को गिरफ्तार कर लिया है। इसने 7 अक्टूबर 2023 को इजराइल पर हुए हमले का नेतृत्व किया था। 20 अक्टूबर 2025 को उसकी गिरफ्तारी हुई है। 33 वर्षीय महमूद वर्तमान में लाफायेट लुइसियाना में रह रहा था।

अटॉर्नी जनरल पामेला बोंडी ने कहा, “अमेरिका में छिपने के बाद, इस खूँखार आतंकी को खोज लिया गया और 7 अक्टूबर की आतंकी कार्रवाई के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। होलोकॉस्ट के बाद यहूदियों पर ये सबसे बड़ा हमला था।” इसमें दर्जनों अमेरिकी नागरिकों की जान गई। अटॉर्नी जनरल के मुताबिक, “हम यहूदी अमेरिकियों और विश्व भर के यहूदी लोगों के साथ यहूदी-विरोधी और आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ खड़े रहेंगे।”

17 अक्टूबर को जारी प्रेस रिलीज में नेशनल सिक्योरिटी के सहायक अटॉर्नी जनरल जॉन ए. आइज़ेनबर्ग ने कहा, “जैसा कि कल दायर दस्तावेजों में बताया गया है, 7 अक्टूबर को, जब अल-मुहतादी को इजराइल और कई देशों के नागरिकों, जिसमें अमेरिका शामिल है, पर हो रहे बर्बर हमले की जानकारी मिली, तो वह तुरंत सक्रिय हो गया। हथियारों से लैस होकर अपनी टीम में कुछ लोगों को शामिल किया और फिर इज़राइल में प्रवेश किया, उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत थे।”

अल-मुहतादी बाद में अमेरिका में प्रवेश के लिए गलत तरीके से वीजा प्राप्त किया। वह छिप कर रहने लगा। यह गिरफ्तारी उस दिन अमेरिकियों को नुकसान पहुंचाने वालों को न्याय के कटघरे में लाने की दिशा में पहला सार्वजनिक कदम है।

हालाँकि न्याय विभाग ने हमास आतंकवादियों को नरसंहार के लिए जिम्मेदार ठहराने की बात कही, लेकिन अब यह खुलासा हुआ है कि लुइसियाना में जेल में बंद इस हमास आतंकवादी को उसकी माँग पर धार्मिक सुविधाएँ दी गई हैं।

न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, शुक्रवार को महमूद अमीन याकूब अल-मुहतादी ने अदालत से अनुरोध किया कि यूएस मार्शल्स को उसे धार्मिक सुविधाएँ प्रदान करने और जेल में रहते हुए अपने धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करने की अनुमति दी जाए। यह ध्यान देने योग्य है कि महमूद अमीन याक़ूब अल-मुहतादी ने न केवल इज़राइल में रक्तपात किया, बल्कि अमेरिकी वीजा आवेदन के वक्त भी झूठ बोला, जिसमें उसने 7 अक्टूबर के नरसंहार में अपनी संलिप्तता से इनकार किया था।

हमास आतंकवादी ने अदालत से हलाल माँस देने, उपवास करने और जेल में अपने धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करने की अनुमति देने का अनुरोध किया।

अदालत ने आरोपी के अनुरोध को स्वीकार करते हुए कहा, “यूएस मार्शल्स को प्रतिवादी को वह सुविधाएँ देनी चाहिए, जो वे दे सकते हैं।” अदालत ने आतंकवादी के वकील को यूएस मार्शल्स के साथ संपर्क में रहने और इन माँगों को पूरा करने की उनकी क्षमता का मूल्यांकन करने के लिए भी कहा।

महमूद अमीन याक़ूब अल-मुहतादी कौन है

महमूद अमीन याक़ूब अल-मुहतादी उस समय गाजा में रहता था। उसने 7 अक्टूबर के नरसंहार में हिस्सा लिया था, जिसमें इजराइल के कफर आजा किबुत्ज में रहने वाले 60 लोगों की हत्या की थी। शिकायत के अनुसार, 7 अक्टूबर के नरसंहार से पहले, उसने अपने एक साथी आतंकवादी से खुशी-खुशी कहा था कि यह नरसंहार ‘तीसरे विश्व युद्ध’ को भड़काएगा।

न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, “अल-मुहतादी, जो नेशनल रेसिस्टेंस ब्रिगेड्स (NRB), डेमोक्रेटिक फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ फिलिस्तीन (DFLP) की सैन्य शाखा में युवाओं का नेतृत्व करता था, ने उस दुखद दिन हमास कमांडर मोहम्मद देइफ के हथियार उठाने के आह्वान को सुना और पास के किबुत्ज़ पर हमला करने के लिए लोगों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया, जैसा कि फेड्स ने दावा किया।”

शिकायत में यह भी खुलासा हुआ कि केवल कफर आज़ा किबुत्ज़ में 60 लोग मारे गए और 19 को अगवा कर लिया गया। मारे गए लोगों में 4 अमेरिकी नागरिक थे। कफर आज़ा से अगवा किए गए 19 लोगों में एक अमेरिकी नागरिक था।

सेलफोन डेटा से पता चलता है कि अल-मुहतादी उस दिन सुबह कफर आज़ा में मौजूद था। उसने नरसंहार से पहले अपने साथी आतंकवादियों को राइफल, बुलेटप्रूफ वेस्ट और गोला-बारूद लाने का निर्देश भी दिया था।

न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, 7 अक्टूबर की सुबह एक अन्य आतंकवादी के साथ फोन पर बातचीत में अल-मुहतादी ने कहा: “बहुत सारे इज़राइल डिफेंस फोर्सेस के सैनिक अगवा किए गए हैं, यह एक गेम है।”

उसने कॉल के दौरान कहा, “अगर सब कुछ ठीक रहा, तो सीरिया हिस्सा लेगा, लेबनान हिस्सा लेगा … यह तीसरा विश्व युद्ध होगा।”

आतंकवादी हमले के एक साल से भी कम समय में अल-मुहतादी अमेरिका चला गया। अपने वीजा आवेदन में, उसने दावा किया था कि वह किसी आतंकवादी समूह का हिस्सा नहीं था, उसने कभी किसी की हत्या नहीं की थी या किसी आपराधिक गतिविधि में भाग नहीं लिया था। ये साफ झूठ था। वह सितंबर 2024 में अमेरिका चला गया।

यह गौरतलब है कि हमास यहूदियों को नष्ट करना और इजराइल पर कब्जा करना अपना धार्मिक कर्तव्य मानता है। 1988 में अपनाया गया हमास चार्टर इजराइल, फिलिस्तीन, और यहूदियों और मुसलमानों के बीच व्यापक संघर्ष के बारे में हमास के वैचारिक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। चार्टर का एक प्रमुख दावा यह है कि जॉर्डन नदी से भूमध्य सागर तक का पूरा इजराइल वक्फ भूमि है, जो विशेष रूप से मुसलमानों की है।

यहूदियों के कत्लेआम का इरादा जताया

हमास ने यहूदियों की हत्या का आह्वान भी किया और दावा किया कि ‘जजमेंट डेट’ तब तक नहीं आएगा, जब तक मुसलमान यहूदियों से लड़कर उन्हें मार नहीं डालते। हिंसा का समर्थन करने के लिए उसने इस्लामी ग्रंथों का हवाला दिया।

हमास चार्टर का अनुच्छेद 7 कहता है: “जजमेंट डे तब तक नहीं आएगा जब तक मुसलमान यहूदियों से लड़कर उन्हें मार नहीं डालते। तब यहूदी चट्टानों और पेड़ों के पीछे छिपेंगे, और चट्टानें और पेड़ पुकारेंगे: ‘ऐ मुसलमान, मेरे पीछे एक यहूदी छिपा है, आओ और उसे मार डालो।’”

हमास चार्टर में उल्लिखित इस्लामी आयत सहीह अल-बुखारी (हदीस और सुन्नत की किताब का संग्रह) से ली गई है, जिसमें लिखा है: “वह घड़ी तब तक नहीं आएगी जब तक मुसलमान यहूदियों से नहीं लड़ते और उन्हें मार नहीं डालते, जब तक कि यहूदी पत्थरों और पेड़ों के पीछे नहीं छिपते और पत्थर या पेड़ नहीं कहते, ‘ऐ मुसलमान, ऐ अल्लाह के दास, मेरे पीछे एक यहूदी है, आओ और उसे मार डालो।”

राँची में वेज की जगह नॉन-वेज बिरयानी देने पर रेस्टोरेंट मालिक की हत्या? कैसे गैंगस्टर और जमीन हड़पने वालों का अपराध तथाकथित लिबरल्स के लिए बना ‘हिंदू घृणा’ का बहाना

झारखंड की राजधानी राँची में एक रेस्टोरेंट मालिक विजय कुमार की हत्या कुछ ऐसे अपराधियों ने कर दी जिनकी पहले से ही आपराधिक पृष्ठभूमि थी। इस घटना के आरोपितों के खिलाफ पहले से कई गंभीर मामले दर्ज हैं। फिर भी यह मामला कथित लिबरल्स के लिए हिंदू घृणा की वजह बन गया और इसके बहाने हिंदुओं को निशाना बनाने की कोशिश की गई।

दरअसल, इस घटना की शुरुआत एक मामूली वजह से हुई, कहा गया कि रेस्टोरेंट में वेज बिरयानी की जगह नॉनवेज बिरयानी परोसी गई थी। इस बहाने से शुरू हुआ झगड़ा इतनी तेजी से बढ़ा कि विजय कुमार की जान ले ली गई। जाँच में पता चला है कि जिन लोगों ने हत्या की, वे स्थानीय आपराधिक गिरोह से जुड़े हुए थे। हत्या के बाद जब पुलिस ने आरोपितों को पकड़ा, तो उनके पास से अवैध हथियार और गोलियाँ बरामद हुईं। यानी यह कोई आकस्मिक या भावनात्मक अपराध नहीं था।

अफसोस की बात यह है कि इस पूरे मामले को सोशल मीडिया पर एक झूठे सांप्रदायिक रंग में पेश किया गया। कुछ तथाकथित लिबरल वर्ग ने इस हत्या को यह कहकर प्रचारित किया कि यह घटना केवल ‘हिंदू घृणा’ या ‘ ‘नॉन-वेज से परहेज’ का नतीजा है। इस वर्ग को हिंदुओं पर हमला करने का जो बहाना चाहिए था वो घटना में केवल ‘नॉन वेज’ बिरयानी होने की वजह से मिल गया।

बिरयानी विवाद क्या था

राँची के कांके पिठोरिया रोड पर शेफ चौपाटी रेस्टोरेंट के मालिक की कुछ बदमाशों ने हत्या कर दी। शनिवार (19 अक्टूबर 2025) को अभिषेक सिंह अपने दोस्तों के साथ बिरयानी खाने पहुँचा था। वहाँ अभिषेक ने वेज बिरयानी का ऑर्डर दिया, लेकिन गलती से नॉनवेज बिरयानी परोस दी गई। इस बात लेकर अभिषेक सिंह का होटल के संचालक विजय कुमार से विवाद हो गया था। गुस्से में अभिषेक सिंह ने रेस्टोरेंट संचालक पर गोलियाँ बरसा दी और मौके से फरार हो गया।

अभिषेक सिंह का एनकाउंटर के बाद गिरफ्तारी

हत्याकांड का मुख्य आरोपित अभिषेक सिंह कांके रिंग रोड के रास्ते फरार होने की कोशिश कर रहा था। पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर राँची पुलिस रिंग रोड सुकुरहुटु आइटीबीपी कैंप के पास वाहन चेकिंग अभियान चलाया। तभी अभिषेक सिंह ने पुलिस की घेराबंदी देख फायरिंग शुरू कर दी। इसके बाद राँची पुलिस के जवानों ने मोर्चा संभालते हुए जवाबी कार्रवाई की, जिसमें अभिषेक सिंह के दोनों पैर में गोली लगी और उसे घायल अवस्था में गिरफ्तार कर लिया गया। उसके दो साथियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया है।

संपत्ति विवाद हो सकता है हत्या का कारण- पुलिस

राँची के एसपी प्रवीण पुष्कर का कहना है, “हाल ही में एक घटना में, एक ढाबे के मालिक की तीन अपराधियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। चार आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, जिसके बाद प्रशांत सिंह को गिरफ्तार किया गया, जिसने खुलासा किया कि अपराध बिरयानी के ऑर्डर को लेकर हुए विवाद के कारण हुआ था। मुख्य आरोपित अभिषेक सिंह, बाद में लातेहार भागने की कोशिश कर रहा था, तभी पुलिस ने उसका पीछा किया। उसने पुलिस पर गोली चलाई, जवाबी गोलीबारी में घायल हो गया और उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस का कहना है कि खुफिया जानकारी के आधार पर हथियार मुहैया कराने वाले हरेंद्र सिंह को पकड़ा गया, जिसके पास से एक बंदूक, गोला-बारूद और नकदी बरामद हुई। उसके घर पर छापेमारी में और भी हथियार बरामद हुए। अभिषेक और हरेंद्र दोनों का आपराधिक इतिहास रहा है, हरेंद्र ज़मीनी विवादों में शामिल रहा है और उसे पुलिस से निलंबित भी किया जा चुका है। जाँच से पता चलता है कि अपराध जमीनी विवादों से भी जुड़ा हो सकता है।”

हिन्दू घृणा फैला रहे लिबरल्स

शाकाहारी भोजन का रेस्टोरेंट मालिक की हत्या में कोई संबंध नहीं है। क्योंकि बंदूकें लेकर आपराधिक किस्म के व्यक्ति ही चलते हैं। गुस्से में गोलीबारी करना उनकी आपराधिक मानसिकता को दर्शाता है, न कि शाकाहार को। लेकिन हिन्दुओं के खाने-पीने पर टिप्पणी होने लगी है।

शुद्ध शाकाहारी भोजन पर टिप्पणी करते हुए एक यूजर ने लिखा कि खुद को दूसरों से भी ज़्यादा पवित्र समझने वाले नफरत फैलाने वालों के बीच असहिष्णुता का एक और मामला सामने आया है। ये मामला हिन्दू-मुस्लिम का भी नहीं है। यहाँ मृतक और अपराधी दोनों हिन्दू हैं। ऐसे में सांप्रदायिक रंग देना काफी मुश्किल है। इसलिए इसका ठीकरा हेंब्रम सरकार पर नहीं बल्कि मोदी सरकार पर फोड़ दिया गया। एक यूजर ने लिखा- 11 साल की कट्टर सरकार हर ब्राह्मणवादी व्यवहार को वैध ठहरा रही है।

सनातन धर्म में अपराधी नहीं हो सकते, ये दावा तो कोई नहीं कर सकता। हाँ, ये कहा जा सकता है कि आतंकवादी प्रवृति इनमें होने की कोई वजह नहीं है। ये अपराध का मामला है, कोई आतंकवाद का नहीं। इसे आतंकवाद से जोड़ना सरासर गलत है। शाकाहार को हिन्दुओं से जोड़ना भी गलत है। एक लिबरल ने एक्स पर पोस्ट कर इस मामले को सनातन से जोड़ा है। एक अपराधी को हिन्दू धर्म से जोड़ कर आलोचना करना बेहद शर्मनाक है, लेकिन लिबरल इससे बाज नहीं आते।

एक यूजर ने लिखा- सनातन हिंदुत्व सनातन की खूबसूरती जहाँ बलात्कारियों को रिहा किया जाता है और माला पहनाई जाती है

राँची में हुए हत्या को मोदी सरकार से जोड़ना भी अपने आप में अजूबा है। वहीं अपराध को शाकाहार और हिन्दुओं से जोड़ना भी। लेकिन लिबरल्स कहाँ मानने वाले हैं। झारखंड में कॉन्ग्रेस-जेएमएम की सरकार है। राज्य की कानून व्यवस्था बनाए रखना और अपराध पर लगाम कसना, उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए थी।

‘स्वदेशी अपनाएँ, स्वच्छता का पालन करें और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें’: दीपावली पर PM मोदी का संदेश, कहा- ऑपरेशन सिंदूर से भारत ने अन्याय का बदला लिया

मेरे प्यारे देशवासियों,

ऊर्जा और उमंग से भरी दीपावली के इस पावन पर्व पर आप सभी को मेरी ढेर सारी शुभकामनाएँ। अयोध्या में राम मंदिर के भव्य निर्माण के बाद ये दूसरी दीपावली है। प्रभु श्रीराम हमें मर्यादा का पालन करना सिखाते हैं और साथ ही हमें अन्याय से लड़ने की भी सीख देते हैं। इसका जीवंत उदाहरण हमने कुछ महीने पहले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी देखा। ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने मर्यादा का पालन भी किया और अन्याय का बदला भी लिया।

इस बार की दीपावली इसलिए भी विशेष है क्योंकि देश के अनेक जिलों में, दूर-दराज के क्षेत्रों में पहली बार दीपावली के दीप जलेंगे। ये वो जिले हैं, जहाँ नक्सलवाद और माओवादी आतंक को जड़ से मिटा दिया गया है। बीते दिनों में हमने देखा है कि कैसे अनेक व्यक्ति हिंसा का रास्ता छोड़कर विकास की मुख्यधारा में शामिल हुए और उन्होंने देश के संविधान के प्रति आस्था जताई है। देश की ये बहुत बड़ी उपलब्धि है।

इन ऐतिहासिक उपलब्धियों के बीते कुछ दिनों पहले देश में नेक्स्ट जनरेशन रिफॉर्म्स की भी शुरुआत हुई है। नवरात्रि के पहले दिन GST की कम दरें लागू हुईं हैं। GST बचत उत्सव में देशवासियों के हजारों करोड़ रुपए बच रहे हैं।

अनेक संकटों से गुजर रहे विश्व में, हमारा भारत स्थिरता और संवेदनशीलता दोनों का प्रतीक बनकर उभरा है। आने वाले कुछ समय में हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बनने वाले हैं।विकसित और आत्मनिर्भर भारत की इस यात्रा में एक नागरिक के तौर पर हमारा प्रमुख दायित्व है- हम देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाएँ।

हम स्वदेशी अपनाएँ और गर्व से कहें ये स्वदेशी है। हम एक भारत-श्रेष्ठ भारत की भावना को बढ़ाएँ। हम हर भाषा का सम्मान करें। हम स्वच्छता का पालन करें। हम अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें। भोजन में तेल की मात्रा 10 प्रतिशत कम करें और योग को अपनाएँ। ये सारे प्रयास हमें और गति से विकसित भारत की ओर ले जाएंगे।

दीपावली हमें यह भी सिखाती है कि जब एक दीप दूसरे दीप को जलाता है, तो उसका प्रकाश कम नहीं होता बल्कि और बढ़ता है। इसी भावना से, हमें भी इस दीपावली पर अपने समाज में, अपने आसपास, सद्भाव, सहयोग और सकारात्मकता के दीप जलाने हैं। एक बार फिर आपको दीप पर्व की ढेर सारी शुभकामनाएँ।

‘थोड़े से हिंदू बचे हैं, वॉट्सऐप कर दो’: शहबाज शरीफ ने दी दीपावली की बधाई तो भड़के सोशल मीडिया यूजर्स, PAK में हिंदुओं के रेप-हत्या-अपहरण के बीच ‘शांति संदेश’ बेमानी

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोमवार (20 अक्टूबर 2025) को X पर एक लंबा चौड़ा पोस्ट लिखकर दीपावली की बधाई दी। इस संदेश में उन्होंने शांति, करुणा और सर्वधर्म समभाव का संदेश दिया। वो पाकिस्तान जहाँ हिंदू प्रताड़ित है, महिलाएँ असुरक्षित हैं और सनातन के धार्मिक स्थलों को तोड़ा जा रहा है, वहाँ के प्रधानमंत्री की बातें सोशल मीडिया यूजर्स को हजम नहीं हुईं और उन्होंने शहबाज को आड़े हाथों ले लिया।

शहबाज शरीफ ने क्या कहा?

शहबाज ने X पर एक पोस्ट में लिखा, “दीपावली के शुभ अवसर पर, मैं पाकिस्तान और दुनिया भर में हमारे हिंदू समुदाय को अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।” उन्होंने आगे लिखा, “जैसे दीपावली के प्रकाश से घर और दिल रोशन होते हैं, यह त्योहार अंधकार को दूर करे, सद्भावना बढ़ाए और हम सभी को शांति, करुणा और साझा समृद्धि के भविष्य की ओर मार्गदर्शन करे।”

शहबाज ने आगे लिखा, “दीपावली की भावना, जो अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और निराशा पर आशा का प्रतीक है, हमें हमारे समाजों के सामने आने वाली चुनौतियों, असहिष्णुता से लेकर असमानता तक को पार करने के लिए सामूहिक संकल्प लेने की प्रेरणा देती है। आइए हम सब मिलकर यह सुनिश्चित करें कि हर नागरिक, चाहे किसी भी धर्म या पृष्ठभूमि का हो, शांति से जीवन यापन कर सके और प्रगति में योगदान दे सके।”

सीधे वॉट्सऐप ही कर दो: यूजर्स ने शहजाब को लगाई लताड़

पाकिस्तान में हिंदुओं पर हमले और उनकी प्रताड़ना को लेकर सोशल मीडिया यूजर्स ने शहजाब शरीफ को जमकर लताड़ लगाई है। एक X यूजर ने उनके बधाई संदेश पर जवाब देते हुए लिखा, “सीधे पाकिस्तान के हिंदुओं को वॉट्सऐप (पर ही मेसेज) कर दो। वहाँ बमुश्किल ही हिंदू बचे हैं।”

पत्रकार आदित्य राज कौल ने भी शहबाज को जमकर लताड़ा। उन्होंने X पर लिखा, “पहलगाम में हिंदुओं को मारने के बाद अब उन्हें दिवाली की बधाई दे रहे हैं। शर्मनाक है पाकिस्तान। उन्होंने पाकिस्तान में हिंदू, ईसाई और सिख समुदाय को लगातार मार डाला और जबरन धर्म बदलवाया। अहमदियों पर भी हर हफ्ते हमला होता है। दुनिया का सबसे खराब और आतंक पसंद देश।”

अधिकारी और लेखक प्रणव महाजन ने शहबाज को जवाब देते हुए लिखा, “इतना लंबा संदेश देखकर अच्छा लगा लेकिन शब्द खाली लग रहे हैं। एक इंसान की असली पहचान ये होती है कि उसके कहने और करने में कितना अंतर है। आपके मामले में ये अंतर तो धरती और सूरज के बीच की दूरी से भी ज्यादा है।”

उन्होंने आगे लिखा, “आप ‘अंधकार पर उजाला’ की बात करते हैं लेकिन आपके शासन में पाकिस्तान के हिंदू घरों की रोशनी लगातार बुझती जा रही है। जबरन धर्म परिवर्तन, मंदिरों का अपमान, हिंदू लड़कियों का अपहरण हो रहा है।”

पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचारों का कुचक्र

बँटवारे के बाद से ही पाकिस्तान में हिंदुओं पर लगातार अत्याचार हो रहे हैं। सामाजिक-आर्थिक भेदभाव से लेकर उनके धार्मिक अधिकारों को भी आतंकिस्तान में छीना जा रहा है। पिछले हफ्ते की ही बात है जब पाकिस्तान में एक नाबालिग हिंदू का जबरन अपहरण किया गया, उसका धर्म बदलवाया गया और उसका पाकिस्तान के एक ड्रग्स तस्कर से निकाह करवा दिया गया। यह ड्रग तस्कर पहले से ही शादीशुदा था और 7 बच्चों को अब्बू था।

सिंध क्षेत्र की एक हिंदू अधिकार कार्यकर्ता ने दावा किया कि यह ऐसा इस क्षेत्र में एक महीने के भीतर चौथा मामला था। ऐसी घटनाएं जिन्हें सुनकर लोग सिहर जाएँ पाकिस्तान में आए दिन होती रहती हैं। हिंदू लड़कियों को निशाना बना जा रहा है और पुलिस ऐसे मामले में कार्रवाई तो छोड़िए शिकायत दर्ज करने तक की जहमत नहीं उठाती है।

पाकिस्तान के अत्याचारों की दास्तां ऐसी ही कि लगता नहीं है कि कोई आदमी ऐसा कृत्य कर भी सकता है। पाकिस्तान से भागकर भारत आए एक परिवार ने बताया था कि उन्हें काफिर कहा जाता था और तिलक लगाकर बाहर निकलने में भी डर लगता था। परिवार ने बताया कि जब में पाकिस्तान में थे तो एक हिंदू लड़के की मुस्लिम से लड़ाई हो गई तो मामले को धर्म पर लाया गया, उसके साथ मारपीट की गई और हिंदू लड़के के हाथ-पैरों के नाखून तक भीड़ ने उखाड़ लिए।

हिंदुओं का अपहरण, महिलाओं का रेप-जबरन धर्मांतरण और निकाह उस पाकिस्तान में आम चीजें हो गई हैं जिसका प्रधानमंत्री दीपावली पर शांति का संदेश दे रहा है। इस साल के मार्च में केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया था कि किस तरह पाकिस्तान में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ रहे हैं।

केंद्र सरकार ने कहा था, “पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ अत्याचार की खबरें आई हैं, जिनमें हिंदू भी शामिल हैं। धमकी, अपहरण, उत्पीड़न, जबरन धर्मांतरण और जबरन विवाह जैसी घटनाएँ सामने आई हैं, जो उन्हें पलायन करने के लिए मजबूर करती हैं।”

इसके अलावा हिंदू धार्मिक स्थलों पर हमले और मंदिरों का अपमान भी आम बात हो गई है। मंदिरों को तोड़ने, उनकी संपत्ति हड़पने और पूजा की जगहों को बंद करने जैसी घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं। पाकिस्तान में हिंदू परिवार अक्सर शिक्षा, नौकरी और व्यवसाय में अवसरों से वंचित तक रह जाते हैं।

यूरोपियन टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान में ईसाइयों, हिंदुओं और अहमदिया मुसलमानों समेत सभी अल्पसंख्यकों पर मानवाधिकार हनन लगातार बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तान की तथाकथित लोकतांत्रिक संस्थाएँ पूरी तरह से कमजोर हो गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अहमदिया मुसलमानों को हत्याओं, मनमानी गिरफ्तारियों और यहाँ तक कि उनके पूजा स्थलों और कब्रिस्तानों को अपवित्र करने का सामना करना पड़ा है।