Home Blog Page 172

तमिलनाडु में हिंदुओं को अन्नदान के लिए जाना पड़ा HC, फिर भी सड़क जाम कर बैठे 500 ईसाई: स्टालिन प्रशासन ने भी इजाजत देने से किया था इनकार

तमिलनाडु में एक सार्वजनिक भूमि को लेकर विवाद बढ़ गया है, जिससे धार्मिक समुदायों के बीच तनाव पैदा हो गया है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब कोर्ट ने हिन्दू समुदाय को उस जमीन पर भोज आयोजित करने की अनुमति दी। इस फैसले से नाराज स्थानीय ईसाई समुदाय ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया।

डिंडीगुल में क्या हुआ?

तमिलनाडु के डिंडीगुल शहर में सोमवार (4 नवंबर 2025) को भारी अव्यवस्था देखने को मिली। पंचमपट्टी गाँव के ईसाई समुदाय के 500 से अधिक लोगों ने सड़क जाम कर बड़ा प्रदर्शन किया। उनका विरोध उस ‘अन्नदानम’ कार्यक्रम के खिलाफ था, जो सरकारी जमीन पर आयोजित किया जा रहा था।

यह अन्नदानम एक हिन्दू मंदिर के कुंभाभिषेक का हिस्सा था। प्रदर्शनकारियों ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ विरोध जताया, जिसमें हिन्दू समुदाय को इस भोज की अनुमति दी गई थी।

सुबह के समय सैकड़ों ईसाई पुरुष और महिलाएँ डिंडीगुल कलेक्टर कार्यालय के पास इकट्ठा हुए। वे कोर्ट के फैसले से नाराज थे और विरोध के रूप में अपने सरकारी पहचान पत्र जैसे आधार कार्ड और वोटर आईडी वापस करने की बात कह रहे थे।

प्रदर्शनकारियों ने कलेक्टर कार्यालय जाने वाले मुख्य मार्ग को जाम कर दिया और ज़िला प्रशासन के अधिकारियों के खिलाफ नारेबाज़ी की। हालात तनावपूर्ण हो गए, जिसके बाद कानून-व्यवस्था संभालने के लिए 100 से अधिक पुलिसकर्मियों को तैनात करना पड़ा।

बाद में डिंडीगुल के जिला कलेक्टर एस सरवनन और पुलिस अधीक्षक ए प्रदीप ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की। बातचीत के बाद भीड़ शांत हो गई और प्रदर्शन वापस ले लिया गया।

हालाँकि मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। पुलिस ने बताया कि रविवार (2 नवंबर 2025) की रात कार्यक्रम स्थल पर काले झंडों के साथ हुए विरोध प्रदर्शन के मामले में 100 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।

विवाद कैसे शुरू हुआ

यह घटना पंचमपट्टी गाँव से शुरू हुई, जहाँ स्थानीय हिन्दू समुदाय अपने मंदिर का कुंभाभिषेक समारोह आयोजित कर रहा था। इस पूजा के बाद वे सरकारी जमीन के एक खाली टुकड़े पर अन्नदानम करना चाहते थे। यह जमीन मंदिर और एक स्थानीय चर्च दोनों के पास ही स्थित है।

जब उन्होंने इसकी अनुमति माँगी, तो स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने मंजूरी देने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि इससे तनाव या कानून-व्यवस्था की समस्या हो सकती है।

इस फैसले को एक ग्रामीण ने अनुचित मानते हुए कोर्ट में चुनौती दी। मामला मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ में पहुँचा। पुलिस ने कोर्ट में दलील दी कि उन्होंने अनुमति इसलिए नहीं दी क्योंकि उन्हें कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी।

सार्वजनिक भूमि किसी एक धर्म के लिए आरक्षित नहीं

कोर्ट में यह मामला जस्टिस जी आर स्वामीनाथन के सामने आया। उन्होंने सबसे पहले यह पूछा कि जमीन का मालिकाना हक किसके पास है। जाँच में पता चला कि वह खाली जमीन ग्राममथम के रूप में दर्ज है, यानी यह पंचायत और सरकार की संपत्ति है।

इस आधार पर जस्टिस स्वामीनाथन ने फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि अगर जमीन सरकारी है, तो उसका उपयोग सभी समुदायों के लोग कर सकते हैं, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। उनके शब्दों में, “सार्वजनिक भूमि या तो सभी के लिए खुली होनी चाहिए या किसी के लिए नहीं।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर कोई सार्वजनिक जगह सबके लिए खुली है, तो किसी एक समुदाय को केवल धर्म के आधार पर वहाँ से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। साथ ही, उन्होंने कहा कि इस तरह का धार्मिक आयोजन करने का अधिकार अनुच्छेद 25 के अंतर्गत आता है।

जस्टिस ने पुलिस की कानून-व्यवस्था बिगड़ने वाली दलील को सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि पुलिस का कर्तव्य लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है न कि संभावित परेशानी से बचने के लिए कार्यक्रम पर रोक लगाना।

ईसाई समुदाय का तर्क

सुनवाई के दौरान ईसाई समुदाय की दलीलें भी सुनी गईं। उनका कहना था कि करीब 100 साल पहले मैदान के एक हिस्से में एक मंच बनाया गया था, जिसका उपयोग हर साल ईस्टर त्योहार के कार्यक्रमों के लिए होता है। परंपरागत रूप से इस जगह का इस्तेमाल केवल ईसाई समुदाय करता आया है और हिन्दुओं को यहाँ धार्मिक कार्यक्रम करने की अनुमति कभी नहीं दी गई।

उन्होंने 2017 की शांति समिति की बैठक का भी जिक्र किया, जिसमें यह तय किया गया था कि इस मैदान पर कोई नया कार्यक्रम नहीं होगा, सिर्फ वही आयोजन होंगे जो पिछले 100 सालों से होते आ रहे हैं। रविवार (2 नवंबर 2025) की रात हुए विरोध प्रदर्शन में भी यही माँग उठी थी कि इस जमीन को पाश्का ग्राउंड (ईस्टर ग्राउंड) कहा जाए, ताकि यह स्पष्ट हो कि यह ईसाई समुदाय की परंपरागत जगह है।

जस्टिस स्वामीनाथन ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि अगर ईसाई समुदाय को ईस्टर के लिए इस मैदान का उपयोग करने की अनुमति है, तो हिन्दू समुदाय को भी उसी जगह पर अन्नदानम करने से नहीं रोका जा सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब ईस्टर का कार्यक्रम हो, उस दिन मैदान का उपयोग केवल ईसाई समुदाय को ही करने दिया जाए।

जस्टिस ने यह भी बताया कि गाँव में लगभग 2,500 ईसाई परिवार और करीब 400 हिन्दू परिवार रहते हैं। उन्होंने कहा कि केवल ईसाई समुदाय के विरोध को कानून-व्यवस्था की समस्या बताना पुलिस की बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण सोच है। कोर्ट ने प्रशासन के इनकार वाले आदेश को रद्द कर दिया और अन्नदानम कार्यक्रम के लिए अनुमति देने के निर्देश दिए।

सरकारी जमीन पर अधिकार का सवाल

हाई कोर्ट का आदेश बिल्कुल स्पष्ट था, लेकिन उसके बाद हुए विरोध ने यह दिखा दिया कि दोनों समुदायों के बीच गहरा तनाव मौजूद है। इस घटना ने यह बड़ा सवाल खड़ा किया कि हिन्दू समुदाय को सिर्फ एक दिन का सामुदायिक अन्नदान सरकारी जमीन पर करने के लिए कोर्ट तक क्यों जाना पड़ा?

कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद भी उन्हें बड़े पैमाने पर सड़क जाम और विरोध का सामना करना पड़ा। कई लोगों का कहना है कि यह एकाधिकार की मानसिकता का मामला है, जहाँ एक समूह सार्वजनिक संपत्ति को केवल अपना अधिकार मानता है।

असल बात यह है कि वह जमीन किसी चर्च की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि सरकारी भूमि है। सिद्धांत रूप में सरकारी जमीन देश के सभी नागरिकों की होती है, चाहे वे हिन्दू हों, ईसाई हों, मुसलमान हों या कोई और। जब तक कोई कार्यक्रम शांतिपूर्वक और दूसरों को बिना नुकसान पहुँचाए आयोजित किया जाता है, तब तक किसी भी समुदाय को इसका उपयोग करने का अधिकार है।

भारत जैसे विविधता भरे देश में जहाँ कई धर्म और समुदाय साथ रहते हैं, पारस्परिक सम्मान ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है। साथ ही, विरोध का तरीका भी सवालों में है। विरोध जताना सबका अधिकार है, लेकिन मुख्य सड़कों को जाम करना और आम जनता की आवाजाही रोकना गलत है। इससे आम लोग जो इस विवाद से जुड़े भी नहीं हैं सबसे ज्यादा परेशानी झेलते हैं।

ऐसा ही मामला: विशालगढ़ किले पर बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला

डिंडीगुल की घटना अपने आप में अकेली नहीं है। तमिलनाडु में ही एक और ऐसा मामला तिरुपरंकुंद्रम मुरुगन मंदिर पहाड़ी पर सामने आया था। यह पहाड़ी हिन्दुओं के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है, क्योंकि यह भगवान मुरुगन के छह प्रमुख तीर्थ स्थलों (अरुपदै वेडु) में से एक है।

विवाद 27 दिसंबर 2024 को शुरू हुआ, जब कुछ मुस्लिम श्रद्धालु सिखंदर बादूशा दरगाह जो इसी पहाड़ी पर स्थित है उस पर बकरों और मुर्गों की बलि देने के लिए उन्हें लेकर आए।

मंदिर प्रशासन और पुलिस ने उन्हें रोक दिया, यह कहते हुए कि इतने पवित्र स्थल के पास पशु बलि की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके बाद करीब 20 मुसलमानों ने पहाड़ी के नीचे विरोध प्रदर्शन किया। यह मामला भी मद्रास हाईकोर्ट पहुँच गया।

जस्टिस विजयकुमार ने सरकारी और पुरातात्विक अभिलेखों की जाँच की, जो 1908 तक के थे। उन्होंने निर्णय दिया कि इस स्थल का आधिकारिक और ऐतिहासिक नाम तिरुपरंकुंद्रम हिल है। इसे सिखंदर मलै कहने की कोशिश को उन्होंने भ्रामक और पहचान बदलने की कोशिश बताया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दरगाह पर पशु बलि की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा साबित नहीं हुई। साथ ही कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम समुदाय को नेल्लीथोप्पु क्षेत्र के एक छोटे हिस्से में रमजान और बकरीद के दौरान नमाज अदा करने का अधिकार है, लेकिन वहाँ तक जाने वाली सीढ़ियाँ और पहाड़ी पर स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर मंदिर प्रशासन की संपत्ति हैं और उन्हें अवरुद्ध नहीं किया जा सकता।

हिंदू समुदाय के अधिकारों का हो रहा हनन

डिंडीगुल अन्नदान विवाद और तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी मामले को देखें तो एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है। दोनों ही घटनाओं में हिन्दू समुदाय के अधिकारों को चुनौती दी गई, डिंडीगुल में सार्वजनिक जमीन पर अन्नदान करने के अधिकार को और तिरुपरंकुंद्रम में पवित्र स्थल की पवित्रता की रक्षा के अधिकार को। डिंडीगुल में विरोध एक सामुदायिक भोज को लेकर हुआ, जबकि तिरुपरंकुंद्रम में पवित्र हिन्दू पहाड़ी पर पशु बलि देने की कोशिश की गई।

दोनों मामलों में हिन्दू समुदाय को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। खास बात यह रही कि डिंडीगुल में कोर्ट का साफ आदेश आने के बाद भी बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ, जिससे यह साफ दिखता है कि जमीनी स्तर पर हालात अब भी बेहद नाजुक हैं।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट दिव्या भारती ने अंग्रेजी में लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

हिन्दुओं पर I Love Muhammad वालों का हमला, भागलपुर में हिन्दू अल्पसंख्यक?

बिहार में ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए ऑपइंडिया की टीम भागलपुर पहुँची। यहाँ ‘इस्लामी मोहल्ला’ खौफ की दास्तान सुना रहा था। इस गाँव में Muslims ने हिन्दुओं के एक घर पर हमला किया। यह इलाका मुस्लिम बहुल है। यहाँ आसपास सारे घरों पर हरे झन्डे हैं।

हिन्दू परिवार का इसी के चलते जीना मुहाल है। हाल ही में I Love Muhammad विवाद के दौरान एक हिन्दू घर को घेर कर पत्थर बरसाए गए। ऑपइंडिया इन्हीं पीड़ितों की कहानी लेकर आया है।

देखिए ग्राउंड रिपोर्ट

शहाबुद्दीन के गढ़ सिवान में AIMIM लगा रही सेंध, उसी के पुराने शूटर को टिकट देकर ओवैसी ने खींचा वोटबैंक: पुराने माफिया के समर्थक बौखलाए

आरजेडी के मुस्लिम माफिया शहाबुद्दीन के गढ़ सिवान में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM अपने हाथ पैर पसार रही है। सिवान के मुसलमानों का कहना है कि वे आरजेडी के गमछे को पसीना पोंछने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

वहीं शहाबुद्दीन के समर्थक इससे बौखलाए हुए दिखे और अपने प्रतिस्पर्धी को औकात दिखाने की बात करने लगे। एम-वाय राजनीति करनेवाली आरजेडी के हाथ से मुस्लिम वोट बैंक फिसलती नजर आती है।

देखें- सिवान से ग्राउंड रिपोर्ट

बेगूसराय में बोले लोग- PM मोदी और NDA सरकार ने बदली बिहार की सूरत: राहुल-INDI गठबंधन से फेरा मुँह, कहा- नहीं चाहिए जंगलराज

बिहार विधानसभा चुनाव में ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्टिंग की टीम बेगूसराय पहुँची। इस दौरान बेगूसराय की जनता ने साफ-साफ NDA को समर्थन दिया। चाय की टपरी से लेकर घर-घर तक लोग मोदी-नीतीश की तारीफ करते नहीं थक रहे। एक बुजुर्ग ने कहा, “सड़कें बनीं, बिजली आई, स्कूल-हॉस्पिटल सुधरे, पहले तो जंगलराज में डर लगता था।”

बेगूसराय में राहुल गाँधी और INDI गठबंधन पर कोई चर्चा नहीं होती। एक महिला ने हंसकर कहा, “राहुल जी तो वादे करते हैं, फिर गायब हो जाते हैं। RJD आया तो अपराध लौटेगा, हमें विकास चाहिए, डर नहीं।”

बिहार के बेगूसराय से ग्राउंड रिपोर्ट

राहुल गाँधी ने फिर की GenZ को भड़काने की कोशिश, लोकतंत्र-संविधान की रक्षा की आड़ में PM मोदी का घर घेरने की भी कर चुके हैं अपील: युवराज जी- युवा जागरूक है

हरियाणा से लेकर बिहार तक हर मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी देश के GenZ को भड़काने का कोई मौका नहीं छोड़ते। ताजा मामला हरियाणा विधानसभा चुनाव में कथित ‘वोट चोरी’ के आरोप का है। विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने GenZ को बताने की कोशिश की, कि कैसे हरियाणा चुनाव में ‘वोट चोरी’ की गई।

उन्होंने इस दौरान सीएम सैनी की मुस्कुराहट और व्यवस्था जैसे शब्द को आधार बनाया और आरोप जड़ दिए। ये तब उन्होंने किया है जब हरियाणा के लोगों ने कॉन्ग्रेस पार्टी को चुनाव में मात दे दी। जाहिर है वोटिंग करने वालों में बड़ी संख्या में GenZ थे। ऐसे में राहुल गाँधी चुनाव नतीजों को ‘वोट चोरी’ का नाम देकर राज्य के वोटरों का अपमान कर रहे हैं। इनमें GenZ भी शामिल हैं।

राहुल गाँधी ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि भारत के युवा, GenZ इसे स्पष्ट रूप से समझें, क्योंकि यह आपके भविष्य के बारे में है…मैं भारत में चुनाव आयोग, लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा हूँ, इसलिए मैं इसे 100% सबूत के साथ कर रहा हूँ। हमें पूरा यकीन है कि कॉन्ग्रेस की भारी जीत को हार में बदलने की योजना बनाई गई थी। “

बिहार चुनाव में पीएम मोदी के घर पहुँचने के लिए GenZ को उकसाया

ये पहला मौका नहीं है, जब राहुल गाँधी ने GenZ को भड़काया हो। 29 अक्टूबर 2025 को बिहार विधानसभा चुनाव में दरभंगा की रैली में उन्होंने GenZ को उकसाया कि वो मोदीजी के घर तक पहुँच जाएँ।

राहुल गाँधी ने कहा कि “अगर बेरोजगारों को इंस्टाग्राम और फेसबुक में ‘बिजी’ नहीं रखोगे, तो ये मोदीजी के घर पहुँच जाएँगे” उन्होंने GenZ से बेरोजगारी पर बात करते हुए कहा कि ” युवा 24 घंटे इंस्टा पर इसलिए हैं क्योंकि आपने नौकरी नहीं दी। आप जितना चाहे इंस्टा पर रह सकते हो… अगर आप फेसबुक, इंस्टाग्राम पर नहीं रहोगे, तो रोजगार के लिए मोदीजी के घर पहुँच जाओगे। रील में कुछ नहीं है आपके लिए, एक दो लोग इंफ्लुएंसर बनेंगे और एक दो साल बाद बेरोजगारी में डूब जाएँगे।”

चुनाव आयोग पर सवाल उठा कर युवाओं को भड़काया

हर चुनाव के पहले वे उन्होंने पहले भी चुनाव आयोग पर आरोप लगाया है। 18 सितंबर 2025 को उन्होंने कर्नाटक में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काटे जाने का आरोप आयोग पर लगाया था। हालाँकि कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की सरकार है। फिर भी राहुल गांधी ने कर्नाटक के अलंद विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि उनकी पार्टी के गढ़ रहे क्षेत्रों में 6,000 से ज्यादा मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। ये तब कहा जब अलंद में भी कॉन्ग्रेस का ही विधायक है। इस दौरान राहुल गाँधी ने देश के युवा से ‘लोकतंत्र को बचाने’ की अपील की।

एक्स पर उन्होंने लिखा, “देश के युवा, GenZ संविधान की रक्षा करेंगे, लोकतंत्र की रक्षा करेंगे और वोट चोरी से बचाएँगे”

18 सितंबर को राहुल गाँधी ने ये भी कहा था कि संस्थानों को बचाने का काम उनका नहीं है, बल्कि ये जेनजी का है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने कहा, “सच कहूँ तो, मैं यहाँ जो कर रहा हूँ वह मेरा काम नहीं है। मेरा काम लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाग लेना है। मेरा काम लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करना नहीं है।”

हिंदुस्तान के लोकतंत्र को बचाने का काम उनका नहीं और वे इसकी रक्षा नहीं करेंगे। उसके बाद में ये कहना कि यह काम GenZ का है। यह साफ दिखा रहा है कि राहुल युवाओं को अपने ही देश, अपने ही लोकतंत्र के खिलाफ भड़काने का प्रयास कर रहें हैं। उनकी इस तरह की हरकत के पीछे उनकी क्या मंशा है? यह देश देख रहा है।

नेपाल में GenZ विरोध से हुआ सत्ता परिवर्तन

कॉन्ग्रेस नेता ने अपनी पोस्ट में ‘GenZ’ का जिक्र किया। यह कोई नया शब्द नहीं है, लेकिन इन दिनों यह काफी चर्चा में है। इसकी एक बड़ी वजह नेपाल में हाल ही में हुआ राजनीतिक बदलाव है। बीते दिनों नेपाल में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए, जिनकी अगुवाई GenZ यानी आज की युवा पीढ़ी ने की। यहाँ हुए विरोध प्रदर्शनों को जेनजी आंदोलन कहा गया। इसकी वजह से पीएम ओली को इस्तीफा देना पड़ा।

जेनजी 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए लोगों को जेनरेशन जूमर्स यानी जेन जी कहा जाता है। माना जाता है कि ये जेनरेशन बचपन से ही स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, इंटरनेट की दुनिया में जी रहा है और ‘डिजिटली फिट’ है।

GenZ कौन हैं?

GenZ वे युवा हैं, जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। आज इनकी उम्र 12 से 27 साल के बीच है। भारत में इनकी संख्या करीब 37 करोड़ मानी जाती है, जो देश की आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। यानी भारत का भविष्य GenZ के हाथों में ही है। कंपनियाँ, सरकारें और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक इन्हीं को ध्यान में रखकर अपनी नीतियाँ तय कर रहे हैं।

स्लैंग से मशहूर GenZ

भारत के GenZ की इंटरनेट पर अपनी भाषा है, जिसे स्लैंग के रूप में जाना जाता है। ये स्लैंग अब हर जगह छाए हुए हैं। अब ये स्लैंग सिर्फ व्हाट्सऐप के चैट्स तक सीमित नहीं है बल्कि बॉलीवुड के गानों और विज्ञापनों तक पहुँच गए हैं। कुछ स्लैंग का अर्थ समझते हैं

rizz – मतलब किसी को इम्प्रेस करने की कला।
delulu– जब इंसान हकीकत छोड़कर ख्वाबों में जीने लगे।
brat– थोड़ा बागी, थोड़ा नखरीला अंदाज।

इसले अलावा skibididelulu, और tradwife जैसे कुछ स्लैंग तो कैम्ब्रिज डिक्शनरी तक में भी शामिल किए गए हैं। यह पीढ़ी अपने अलग बोलचाल और अंदाज से बाकी सबको प्रभावित कर रही है।

भारत में GenZ हर साल ₹72 लाख करोड़ करते है खर्च

GenZ न सिर्फ इंटरनेट पर बल्कि अर्थव्यवस्था में भी अपनी पकड़ मजबूत कर चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत के GenZ हर साल 72 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करते हैं। देश के कुल उपभोक्ता खर्च का करीब 43 प्रतिशत हिस्सा GenZ से ही आता है। वहीं अन्य रिपोर्ट बताती है कि GenZ अपनी कमाई का 30 प्रतिशत हिस्सा सेविंग में डालते हैं।

GenZ सबसे ज्यादा फैशन, डाइनिंग और मनोरंजन में खर्च कर रहे हैं। सर्वे के मुताबिक, उनका 50 प्रतिशत खर्च फुटवियर, 48 प्रतिशत डाइनिंग, 48 प्रतिशत बाहरी मनोरंजन और 47 प्रतिशत फैशन और लाफस्टाइल पर खर्च होता है। यही नहीं GenZ ट्रैवलर्स साल में दो से तीन बार ट्रिप पर भी जाते हैं, जिनमें 94 प्रतिशत युवा साल में एक बार तो जरूर ही ट्रैवल करते हैं।

पूर्णिया या पाकिस्तान: जिस हिंदू कार्यकर्ता की हुई हत्या उसके भाई ने खोले पप्पू यादव के राज, बांग्लादेशी घुसपैठ बढ़ाने-हत्या का लगाया आरोप

ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम बिहार के सीमांचल इलाके में पूर्णिया पहुँची। यहाँ सीमांचल में बांग्लादेशी घुसपैठ ने हिंदुओं की जिंदगी मुश्किल बना दी है। कई पार्टियाँ वोटबैंक के लिए इन घुसपैठियों को बसाती आई हैं। निर्दलीय सांसद पप्पू यादव पर भी इस्लामी घुसपैठ बढ़ाने और हत्या कराने के गंभीर आरोप हैं।

साल 1992 में पूर्णिया में एक हिंदू स्वयंसेवक किशोर सिंह की निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई थी। उनके छोटे भाई मनोज सिंह ने अनुराग सिंह से खास बातचीत में सबकुछ उजागर किया। मनोज बोले, “भाई को मारकर हमें चुप कराना चाहते थे, लेकिन आज भी डर नहीं। पप्पू यादव जैसे नेता घुसपैठियों को शह देते हैं, वोट के लिए हिंदू मारते हैं।”

मनोज ने सबूतों के साथ पुरानी कहानी दोहराई कि कैसे राजनीतिक साजिश से हत्या हुई। उन्होंने बताया कि सीमांचल में हिंदू अब जाग रहे हैं। मनोज ने आम लोगों से अपील की है- “वोट दो, लेकिन घुसपैठ रोकने वालों को।”

देखिए ग्राउंड रिपोर्ट

मुस्लिम लीग के इशारे पर सरदार पटेल को मारने के लिए तलवारें-छुरे लेकर दौड़े थे इस्लामी कट्टरपंथी, मस्जिद में जमा थे हथियार: जाने भावनगर का वो इतिहास जो भुला दिया गया

भावनगर और सरदार वल्लभभाई पटेल का रिश्ता बहुत पुराना है। सरदार पटेल का महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी से गहरा संबंध था, और इसी कारण आज भी भावनगर के इतिहास में पटेल का नाम सम्मान के साथ दर्ज है। कहा जाता है कि सरदार पटेल की यादें भावनगर से दो ऐतिहासिक घटनाओं के रूप में जुड़ी हुई हैं। एक स्मृति स्वतंत्रता के बाद देश के बने नक्शे से जुड़ी है। लेकिन एक दूसरी याद भी है जो अब लगभग भुला दी गई है। वह याद अब भावनगर की गलियों में वक्त की धूल में कहीं दब गई है।

यह बात है साल 1939 की। देश तब तक अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद नहीं हुआ था लेकिन उसी समय भावनगर रियासत ने एक ऐतिहासिक घोषणा की थी कि आजादी मिलने के बाद भावनगर भारत में शामिल होने वाली पहली रियासत बनेगी। इस घोषणा के बाद भावनगर में चर्चाओं का माहौल गर्म हो गया। इसी बीच, 14 और 15 मई 1939 को भावनगर में ‘भावनगर स्टेट काउंसिल’ का 5वाँ अधिवेशन आयोजित किया गया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता खुद सरदार पटेल ने की थी और महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी ने उन्हें विशेष रूप से भावनगर आने का निमंत्रण भेजा था।

सरदार पटेल ने आमंत्रण स्वीकार किया और 14 मई को भावनगर पहुँचे। रेलवे स्टेशन से उनका स्वागत एक खुले जीप में जुलूस के रूप में किया गया। सड़कों पर भीड़ उमड़ पड़ी थी, लोग ‘सरदार पटेल की जय!’ के नारे लगा रहे थे। इसी बीच, परदे के पीछे एक खतरनाक साजिश रची जा चुकी थी। मुस्लिम लीग ने पहले ही सरदार पटेल की इस यात्रा को निशाना बनाने की योजना बना ली थी। स्थानीय कट्टरपंथी मुस्लिम, मुस्लिम लीग के इशारे पर, शहर की एक मस्जिद में इकट्ठा होकर हमले की तैयारी कर रहे थे। योजना इतनी भयानक थी कि उसमें सरदार पटेल की हत्या तक की साजिश शामिल थी।

सरदार पटेल का आगमन और मुसलमान कट्टरपंथियों का हमला

सरदार वल्लभभाई पटेल रेलवे स्टेशन से खुले जीप में बैठकर लोगों का अभिवादन करते हुए आगे बढ़ रहे थे। जब उनका जुलूस खारगेट चौक पहुँचा, तो नगीना मस्जिद के पास अचानक हंगामा शुरू हो गया। पहले से बनाई गई साजिश के तहत, मस्जिद में बैठे कई इस्लामी कट्टरपंथी हथियार लेकर बाहर निकल आए और सरदार पटेल की जीप की तरफ दौड़ पड़े। उनके हाथों में तलवारें, छुरे, कुल्हाड़ियाँ और तेज धार वाले हथियार थे।

हालाँकि, सरदार पटेल तक हमला पहुँचने से पहले, कानबिवाड़ के एक नौजवान बचुभाई पटेल और लोकभारती के संस्थापक नानाभाई भट्ट ने अपनी जान की परवाह किए बिना सरदार पटेल की जीप पर चढ़कर उनके लिए ढाल बन गए। कट्टरपंथियों के सारे वार इन दोनों युवकों पर पड़े। इसमें बचुभाई पटेल बुरी तरह घायल हो गए और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। नानाभाई भट्ट भी घायल हुए लेकिन इलाज के बाद वे बच गए।

घटना की खबर मिलते ही भावनगर की पुलिस तुरंत नगीना मस्जिद पहुँची। सिपाहियों ने भाले और बंदूकों के साथ भीड़ को तितर-बितर कर दिया। अगर उस दिन ये कट्टरपंथी अपनी साजिश में सफल हो जाते, तो आजादी के बाद भारत का इतिहास शायद कुछ और ही होता। इस हमले ने पूरे भावनगर शहर को हिला कर रख दिया। हर जगह डर और सन्नाटा फैल गया। बाद में परिषद की बैठक में सरदार पटेल ने खुद कहा था, “यह कोई अचानक गुस्से में किया गया काम नहीं था बल्कि इसके पीछे पहले से रची गई सोची-समझी साजिश थी।”

पूर्व नियोजित थी साजिश: तत्कालीन पुलिस अधिकारी

इस पूरे मामले में उस समय भावनगर की अदालत में मुकदमा भी दर्ज किया गया था। इसमें कुल 14 लोगों को आरोपी बनाया गया था। जिनमें वरस अली, बिलाल इब्राहिम, अब्दुल सत्तार मूसा, अब्दुल्ला सिद्दी, उस्मान खान मोहम्मद खान, उस्मान नूरमिया, अब्दुल गफूर, अब्दुल कादिर, अलीवद, मूसा अब्दुल, कासम, मोहम्मद सुलेमान, इस्माइल और अलरखान इब्राहिम शामिल थे। 12 जुलाई 1939 को उस समय के अखबार ‘द काठियावाड़ टाइम्स’ ने इस मामले पर एक विस्तृत रिपोर्ट छापी थी। यह रिपोर्ट पुलिस अधिकारी पोपटभाई की गवाही पर आधारित थी, जो उन्होंने अदालत में दी थी।

पोपटभाई ने अपनी गवाही में बताया कि कार्यक्रम से पहले मुस्लिम लीग के कुछ लोगों ने एक अर्जी दी थी कि जुलूस के दौरान कोई बाजा या ढोल नहीं बजाया जाए। बाद में पता चला कि यह अर्जी अब्दुल कादर लाखानी नाम के व्यक्ति ने मुस्लिम लीग के उपाध्यक्ष के कहने पर लिखी थी। पोपटभाई ने इस बात की जानकारी परिषद के सचिव जादवजी मोदी को दी और उनसे कहा कि नगीना मस्जिद के सामने बाजे न बजाए जाएँ।

साथ ही, वहाँ ज्यादा पुलिस बल तैनात करने की भी बात की गई थी। इसके अलावा, पोपटभाई ने एक प्रमुख मुस्लिम नेता से भी बात की थी। उन्होंने आश्वासन दिया था कि मुस्लिम समुदाय की ओर से कोई हंगामा नहीं होगा और वे खुद 14 मई 1939 को सरदार पटेल के स्वागत समारोह में मौजूद रहेंगे।

पोपटभाई के दावे पर रिपोर्ट

13 मई की रात करीब साढ़े नौ बजे पुलिस को टेलीफोन से सूचना मिली कि नगीना मस्जिद में डंडे, तलवारें और पत्थर जमा किए गए हैं और वहाँ करीब पाँच सौ मुसलमान इकट्ठा हैं। हालाँकि, पुलिस ने इस सूचना को पुख्ता नहीं माना और मस्जिद पर छापा नहीं मारा। अगली सुबह सरदार पटेल भवनगर पहुँचे। नगीना मस्जिद के सामने सुरक्षा बल तैनात थे।

फिर भी, जब जुलूस वहाँ पहुँचा तो भीड़ में शामिल कुछ इस्लामी कट्टरपंथी भड़क उठे। हालाँकि, वहाँ ढोल या बाजे नहीं बजाए गए थे लेकिन वे गुस्से में हिंदुओं पर टूट पड़े। अचानक “मारो, मारो” की आवाज़ें गूँजने लगीं और भीड़ ने डंडों, तलवारों, छतरियों और चाकुओं से हिंदुओं पर हमला कर दिया।

इधर, पुलिस अधिकारियों ने तुरंत समझदारी दिखाते हुए सरदार पटेल से कहा कि वे दूसरी दिशा से निकल जाएँ। इसी वजह से उनकी जान बच गई। बाद में और पुलिस बल बुलाया गया और स्थिति पर काबू पाया गया। दंगाइयों को गिरफ्तार भी कर लिया गया।

सरदार पटेल ने दी श्रद्धांजलि

21 मई 1939 के ‘गुजरात मित्र’ अखबार में भी इस घटना का ज़िक्र किया गया था। रिपोर्ट में लिखा गया था कि मुस्लिम कट्टरपंथियों के हमले में एक स्वयंसेवक की मौत हो गई और कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए।

इस हंगामे की वजह से कार्यक्रम बीच में ही रद्द कर दिया गया और सरदार पटेल को सीधे उनके निवास स्थान पर पहुँचा दिया गया। इसके बाद शहर में सुरक्षा कड़ी कर दी गई। जगह-जगह भाले लिए हुए सैनिक और पैदल सेना तैनात की गई। नगीना मस्जिद को चारों तरफ से घेर लिया गया ताकि किसी तरह की गड़बड़ी दोबारा ना हो सके।

जब पुलिस ने मस्जिद की तलाशी ली, तो वहाँ से छिपाए गए हथियार बरामद हुए। इसके बाद शहर भर से कई मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया गया। इस हमले में घायल हुए लोगों को सिर तख्तसिंहजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। सरदार पटेल खुद अस्पताल पहुँचे और घायल लोगों से मिले। उसी समय महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी, जो गर्मी के कारण महुवा में ठहरे हुए थे, उन्हें भी इस पूरी घटना की जानकारी दी गई।

सरदार पटेल की जान बचाने वाले बचुभाई पटेल की शहादत के सम्मान में पूरे भावनगर में बंद (हड़ताल) रखा गया। शाम को उनका अंतिम यात्रा जुलूस निकाला गया, जिसमें 20,000 से ज्यादा लोग शामिल हुए। सरदार पटेल भी इस जुलूस में मौजूद थे। श्रद्धांजलि देते हुए सरदार पटेल ने कहा, “ऐसी मौत कुछ ही लोगों को नसीब होती है।” मुस्लिम लीग की साजिश के बारे में उन्होंने कहा, “राष्ट्र सेवा के लिए ऐसी गुंडागर्दी से मैं डरने वाला नहीं हूँ।”

यह सचमुच हैरान करने वाली बात थी कि उस समय जैसी प्रगतिशील और उदार रियासत भावनगर मानी जाती थी, वहीं पर सरदार पटेल की हत्या की साजिश रची गई। अगर यह हमला सफल हो जाता, तो भावनगर के नाम के साथ राष्ट्रीय अपमान का कलंक जुड़ जाता और शायद आजाद भारत का इतिहास ही नहीं बल्कि उसका नक्शा भी कुछ और होता।

मुस्लिम लीग की ऐसी कई साजिशें इतिहास से हमेशा मिटा दी गईं। इसी वजह से सरदार पटेल पर हुए इस हमले के बारे में न तो किताबों में पढ़ने को मिलता है, न ही कहीं इसका जिक्र सुनाई देता है। यह घटना धीरे-धीरे इतिहास की धूल में दब गई जबकि इसका असर उस दौर में पूरे देश को हिला देने वाला था।

काशी में ‘स्वर्ग से उतरेंगे देवता’, लाखों दीपों से जगमगाएँगे घाट: जानिए कैसे 2 कनस्तर तेल से शुरू हुई ‘देव दीपावली’ बनी विश्व का अनोखा दीपोत्सव

कार्तिक पूर्णिमा की वह पावन तिथि आ चुकी है। भगवान शिव की नगरी काशी (वाराणसी) एक अलौकिक ऊर्जा और सौंदर्य से सराबोर होने को तैयार है। बुधवार (5 नवंबर 2025) की शाम, जैसे ही सूर्य देव अस्त होंगे, पतित पावनी माँ गंगा के ऐतिहासिक घाटों पर दीपों की अनगिनत कतारें जल उठेंगी और वह शुभ क्षण आ जाएगा जब धरती पर देवताओं की दीपावली- देव दीपावली मनाई जाती है। यह गहरा विश्वास है कि इस रात स्वयं देवता स्वर्ग से काशी में उतरकर दीप प्रज्ज्वलित करते हैं, और संपूर्ण वाराणसी क्षण भर के लिए देवलोक का रूप ले लेती है।

पौराणिक काल की विजयगाथा: त्रिपुरासुर का वध

देव दीपावली का इतिहास स्कंद पुराण और शिव पुराण के पन्नों में दर्ज है। यह कथा भगवान शिव की एक महान विजय से जुड़ी है। दैत्य त्रिपुरासुर ने अपनी तपस्या से ब्रह्मा जी से वरदान पा लिया था। वरदान के अनुसार, उसे केवल उसी समय मारा जा सकता था जब सूर्य, चंद्र और अग्नि का दुर्लभ संयोग (जिसे त्रिपुर संयोग कहा गया) बने। इस शक्ति के अहंकार में त्रिपुरासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया।

देव दीपावली मनाते हुए बनारस के घाट की तस्वीर (फोटो साभार : Aajtak)

तब, स्वयं भोलेनाथ ने अपने प्रचंड पिनाक धनुष से केवल एक बाण चलाकर, उसके तीन अभेद्य नगरों- स्वर्ण, रजत और लौह के त्रिपुरों का नाश कर दिया। भगवान शिव की इस अजेय विजय से देवताओं का भय दूर हुआ। इस खुशी में, सभी देवताओं ने मिलकर काशी में दीप जलाए और शिव की आराधना की। तभी से यह दिन ‘देव दीपावली’ के रूप में मनाया जाने लगा।

दो कनस्तर तेल से निकले दीपोत्सव की आधुनिक शुरुआत

भले ही यह पर्व सदियों पुराना है, लेकिन इसे आज के भव्य रूप में लाने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। यह आधुनिक परंपरा वर्ष 1984 में शुरू हुई, जब पंडित विजय उपाध्याय ने अकेले सिंधिया घाट पर केवल दो कनस्तर तेल से दीप जलाकर इस भव्य दीपोत्सव की नींव रखी। अगले ही वर्ष, काशी के तत्कालीन नरेश डॉ विभूति नारायण सिंह भी इस अभियान से जुड़े, जिससे आयोजन को जन समर्थन मिला और सहयोग के लिए दुकानों पर दान-पात्र रखवाए गए।

साल 1986 में केंद्रीय देव दीपावली महासमिति का गठन हुआ और धीरे-धीरे यह आयोजन केवल घाटों तक सीमित नहीं रहा। 1990 के दशक तक, दीपों की यह श्रृंखला कुंडों, तालाबों और संपूर्ण नगर में फैल गई, जिससे आज यह काशी का सबसे बड़ा उत्सव बन गया है।

श्रद्धा और भव्यता का महासंगम

आज रात, वाराणसी के सभी प्रमुख घाटों- जिनमें अस्सी, दशाश्वमेध, पंचगंगा, नमो और चेतसिंह घाट शामिल है, पर लाखों दीप प्रज्वलित होंगे। सभी घाट समितियों ने दीपक और तेल का वितरण पहले ही पूरा कर लिया है।

वाराणसी के घाट पर पटाखों की बौछार (The Quint)

इस बार चेतसिंह किला मुख्य आकर्षण का केंद्र रहेगा, जहाँ 25 मिनट का भव्य लेजर शो दिखाया जाएगा। इस शो में शिव-पार्वती की कथाओं, गंगा अवतरण, लक्ष्मी-नारायण की कहानियों के साथ-साथ काशी के गौरवशाली इतिहास, संत कबीर, तुलसीदास और बीएचयू की झलकियाँ दिखाई जाएँगी। यह शो रात 8:15, 9:00 और 9:35 बजे प्रदर्शित किया जाएगा।

अस्सी स्थित पुष्कर तालाब पर एक विशेष दीपदान किया जाएगा, जहाँ महामना पंडित मदनमोहन मालवीय, उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ, विदुषी गिरिजा देवी और प्रो वीरभद्र मिश्र जैसी काशी की महान विभूतियों की स्मृति में दीप जलाए जाएँगे।

गंगा का जलस्तर ऊँचा होने के बावजूद, कलाकार और छात्र मिलकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ थीम पर विशेष दीप डिजाइन तैयार कर रहे हैं, जो काशी की कलात्मकता और श्रद्धा का अद्भुत प्रतीक है। गंगा पार रेत पर ग्रीन क्रैकर्स की आतिशबाजी और संगीत की धुन पर नाचती रोशनी पूरे आकाश को रंगीन कर देगी।

जब गंगा के तट लाखों दीपों से आलोकित होते हैं, तो यह पर्व केवल दीयों की रोशनी का नहीं, बल्कि भक्ति, सौंदर्य और शिव की विजय का उत्सव बन जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र दिन गंगा में दीपदान करने से सभी पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

देव दीपावली काशी के हृदय में बसे उस शाश्वत और शाश्वत संदेश को दोहराती है: ‘जहाँ प्रकाश है, वहीं शिव हैं और जहाँ शिव हैं, वहाँ सृष्टि का उत्सव है।’

QS रैंकिंग में 10 साल में दस गुना बढ़ी भारत की भागीदारी, संस्थान के VP ने कहा- साफ दिख रहा है NEP 2020 का असर: जानें मोदी सरकार ने कैसे बदले उच्च शिक्षा के हालात?

हाल ही में, क्यूएस (QS) नाम की संस्था ने एशिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों की लिस्ट जारी की है, जिसका नाम है क्यूएस एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2026। इस लिस्ट में भारत ने कमाल कर दिया है। एशिया के टॉप 100 सबसे बेहतरीन कॉलेजों में भारत के कुल 7 बड़े शिक्षण संस्थान शामिल हुए हैं। इनमें पाँच बड़े आईआईटी, IIT दिल्ली, IIT मद्रास, IIT बॉम्बे, IIT कानपुर, और IIT खड़गपुर शामिल हैं। अन्य दो में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु और दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU)।

IIT दिल्ली को इस साल 59वीं रैंक मिली है और यह लगातार पाँचवीं बार भारत का नंबर-1 संस्थान बना है। सिर्फ टॉप 100 ही नहीं, बल्कि टॉप 200 में भारत के 20 कॉलेज और टॉप 500 में 66 कॉलेज शामिल हैं। क्यूएस के मुताबिक, भारत में PhD किए हुए टीचरों की संख्या पूरे एशिया में सबसे अच्छी है। इसका मतलब है कि हमारे कॉलेज गुणवत्ता के मामले में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। पिछली बार की तुलना में, भारत के 36 कॉलेजों ने अपनी रैंक सुधारी है, जबकि 105 कॉलेज नीचे चले गए हैं। क्यूएस ने बताया कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस बार रैंकिंग में बहुत सारे नए कॉलेजों को शामिल किया गया था, जिससे रिजल्ट में थोड़ा बदलाव आया है।

आईआईटी, आईआईएससी की बढ़ती धाक और नई शिक्षा नीति का कमाल

हमारे देश के बड़े-बड़े शिक्षण संस्थान, जैसे कि आईआईटी (IITs) और आईआईएससी (IISc), अब सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया में खूब चमक रहे हैं। क्यूएस एशिया रैंकिंग 2026 के जो नंबर आए हैं, वे बताते हैं कि पिछले दस सालों में भारत ने एशिया की टॉप यूनिवर्सिटी की लिस्ट में अपनी जगह दस गुना ज्यादा पक्की कर ली है। इसका मतलब है कि हमारे कॉलेज अब टेक्नोलॉजी, रिसर्च और अच्छी पढ़ाई के मामले में दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं। यह दिखाता है कि भारत अब शिक्षा की दुनिया में एक बड़ा नाम बन रहा है।

इस बड़ी कामयाबी के पीछे एक बड़ी वजह है राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020। इस नई शिक्षा नीति ने पढ़ाई के तरीकों को काफी बदल दिया है। अब पढ़ाई में अलग-अलग विषयों को जोड़कर पढ़ाया जा रहा है, रिसर्च यानी खोजबीन पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है और विदेशी यूनिवर्सिटी से दोस्ती (अंतरराष्ट्रीय सहयोग) बढ़ाई जा रही है। क्यूएस ने खुद कहा है कि पूरे एशिया के कॉलेजों का नाम दुनिया में बढ़ रहा है और भारत इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है। यह नीति हमारे छात्रों और रिसर्च करने वालों को नए मौके दे रही है और कॉलेजों को और ताकतवर बना रही है।

क्यूएस (QS) के वाइस प्रेसिडेंट की प्रतिक्रिया

क्यूएस संस्था के वाइस प्रेसिडेंट, मैटेओ क्वाककेरेली ने भारत की इस कामयाबी पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पिछले दस सालों में भारत ने शिक्षा में बहुत बड़ा बदलाव किया है, जैसे रिसर्च (खोजबीन) को बढ़ाना और नए-नए तरीके अपनाना। उनकी बात से पता चलता है कि रैंकिंग में भारत के कॉलेज दस गुना बढ़ गए हैं, जो एशिया की शिक्षा में भारत के बढ़ते योगदान को दिखाता है।

क्यूएस संस्था के वाइस प्रेसिडेंट मैटेओ क्वाककेरेली ने भारत की तारीफ की

उन्होंने यह भी कहा कि नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के कारण यह असर दिख रहा है, क्योंकि यह नीति कॉलेजों को मजबूत बना रही है और सहयोग के नए रास्ते खोल रही है। उन्होंने माना कि एशिया के कॉलेज दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं, और क्यूएस इस बदलाव में सबको मदद करता रहेगा।

पीएम मोदी ने की सराहना

भारत के नेताओं ने इस उपलब्धि पर बहुत खुशी जताई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि क्यूएस रैंकिंग में भारतीय कॉलेजों की संख्या में हुई इतनी बड़ी बढ़ोतरी देखकर उन्हें बहुत खुशी हुई है। उन्होंने साफ किया कि सरकार चाहती है कि हमारे युवाओं को सबसे अच्छी पढ़ाई मिले, इसलिए उनका ध्यान रिसर्च और इनोवेशन (नई खोजों) पर है।

पीएम मोदी ने कहा कि सरकार देश भर में नए शिक्षण संस्थान खोलकर उनकी ताकत बढ़ा रही है। वहीं, (भारतीय) उपराष्ट्रपति ने भी भारतीय कॉलेजों की इस प्रगति की तारीफ करते हुए इसे शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी जीत बताया। इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि भारत अब शिक्षा और रिसर्च में पूरे एशिया में सबसे आगे निकलने की राह पर है।

भारत की शिक्षा में बड़ा बदलाव: NEP 2020 का असर

पीआईबी की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने ‘विद्या लक्ष्मी योजना’ (2024) शुरू की, जिसके तहत 860 बड़े कॉलेजों के गरीब छात्रों को बिना कुछ गिरवी रखे ₹2,358 करोड़ का लोन दिया गया है, ताकि वे आसानी से पढ़ सकें। इसके अलावा, हमारी IITs अब विदेश में भी खुल रही हैं, जैसे जंजीबार, अबू धाबी और दुबई। साथ ही, ऑस्ट्रेलिया के डेकिन और वोलोंगोंग जैसे बड़े विदेशी कॉलेज भी अब भारत आकर कैंपस खोल रहे हैं। यह सब दिखाता है कि भारतीय शिक्षा अब ग्लोबल हो रही है।

ऑनलाइन पढ़ाई और संस्थानों को मजबूती

ऑनलाइन पढ़ाई के लिए भी बहुत काम हुआ है। ‘स्वयं’ पोर्टल पर 5 करोड़ से ज़्यादा लोगों ने नाम दर्ज कराया है, जिसमें वे ऑनलाइन पढ़कर अपनी डिग्री का क्रेडिट (अंक) कॉलेज में जोड़ सकते हैं। ‘वर्चुअल लैब्स’ ने 900 से ज़्यादा ऑनलाइन प्रयोगशालाएँ बनाई हैं, और ‘डिजिटल लाइब्रेरी’ में 8 करोड़ से ज़्यादा किताबें मौजूद हैं। इसके अलावा, ‘पीएम-ऊषा’ स्कीम के तहत 35 विश्वविद्यालयों को ₹100-100 करोड़ दिए गए हैं, ताकि वे अपनी पढ़ाई की गुणवत्ता सुधार सकें और खुद को आधुनिक बना सकें। ये सारे कदम नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के लक्ष्यों को पूरा कर रहे हैं।

लक्ष्य और कॉलेज का नया ढाँचा

नई शिक्षा नीति (NEP 2020) का सबसे बड़ा लक्ष्य 2035 तक ज्यादा से ज्यादा छात्रों को कॉलेज तक पहुँचाना है (50% GER)। इसके लिए, सरकार चाहती है कि 2040 तक सभी कॉलेज ऐसे बनें जहाँ कई विषय एक साथ पढ़े जा सकें (जैसे साइंस के साथ आर्ट्स)। 2030 तक हर जिले में कम से कम एक बड़ा कॉलेज (HEI) खोलने का भी प्लान है। इसके साथ ही, ‘राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन’ बनाया जा रहा है ताकि रिसर्च (खोजबीन) को बढ़ावा मिले। कॉलेजों को उनके काम के हिसाब से रिसर्च या सिर्फ पढ़ाने वाले कॉलेज में बाँटा जाएगा, ताकि उनकी जिम्मेदारी और अच्छी पढ़ाई की गारंटी बढ़ सके।

छात्रों को आजादी और ऑनलाइन पढ़ाई

इस नीति से छात्रों को पढ़ाई में पूरी आजादी मिल रही है। छात्र अब अपनी जरूरत के हिसाब से बीच में पढ़ाई छोड़ सकते हैं और बाद में फिर से शुरू कर सकते हैं (मल्टीपल एंट्री एंड एग्जिट)। साथ ही, ‘अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ शुरू हुआ है, जिससे छात्र कहीं भी पढ़ें, उनके अंक (क्रेडिट) सुरक्षित रहेंगे। ऑनलाइन पढ़ाई को भी खूब बढ़ावा मिला है, अब छात्र ऑनलाइन कोर्स (जैसे स्वयं MOOCs) से अपनी डिग्री के 40% तक अंक कॉलेज में जोड़ सकते हैं। इससे देश भर के करीब 19 लाख से ज्यादा छात्र ऑनलाइन कोर्स और दूरस्थ शिक्षा (Distance Learning) का फायदा उठा रहे हैं।

अमेरिकी दबाव का नहीं हुआ असर, अक्टूबर में रूस से भारत ने खरीदा ज्यादा कच्चा तेल: जानें भारत की तेल आपूर्ति पर किन चीजों का पड़ा असर

रूस से भारत आने वाले तेल को लेकर अमेरिकी दबाव के बीच अक्टूबर महीने में तेल आयात में उछाल देखी गई है। हालाँकि अमेरिकी प्रतिबंध लागू होने के बाद अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में इसमें गिरावट दर्ज की गई। रूस से तेल खरीद को मुद्दा बना कर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत पर 25% अतिरिक्त शुल्क समेत कुल 50% टैरिफ लगा दिया था। व्हाइट हाउस और उसके अधिकारियों ने नई दिल्ली पर दबाव बनाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए, लेकिन भारत टस से मस नहीं हुआ।

ट्रम्प ने यहाँ तक दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने उन्हें आश्वासन दिया था कि वह मास्को से तेल आयात करना बंद कर देंगे। हालाँकि, विदेश मंत्रालय ने इसका खंडन करते हुए कहा कि दोनों नेताओं के बीच इस मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं हुई। केप्लर (Kpler) की ओर से जारी शिप ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, अक्टूबर में रूस से भारत का कच्चा तेल आयात पिछले महीने की तुलना में बढ़ा है, जो वाशिंगटन के लगातार दबाव के बावजूद मोदी सरकार के दृढ़ इच्छाशक्ति का एक और सबूत है।

केप्लर के आँकड़ों के अनुसार, भारत में रूसी तेल की खपत सितंबर में 1.44 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) से बढ़कर अक्टूबर में लगभग 1.48 मिलियन बीपीडी हो गई है। ऑयलएक्स के मुताबिक, सितंबर में आयात 1.43 मिलियन बैरल प्रति दिन था। इन आँकड़ों में कजाकिस्तान के रास्ते रूस से आने वाले तेल को शामिल नहीं किया गया।

मीडिया हाउस के अनुसार, भारत के प्रमुख रिफाइनरी में रूसी तेल की खपत फिर से शुरू हो गई है। दिसंबर में ऐसी कंपनियाँ जिनपर प्रतिबंध नहीं लगे हैं, उनसे 5 कार्गो दिए गए हैं। देश की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी) ने दिसंबर में पूर्वी भारत के एक बंदरगाह पर डिलीवरी के लिए दुबई से समान कीमतों पर लगभग 3.5 मिलियन बैरल ईएसपीओ (पूर्वी साइबेरिया-प्रशांत महासागर) कच्चा तेल खरीदा।

आईओसी के वित्त प्रमुख अनुज जैन ने पहले बताया था कि रूसी तेल दुबई के रास्ते भारतीय बंदरगाहों तक लाने में सस्ता पड़ रहा है क्योंकि इसके परिवहन पर बाज़ार में 2 से 3 डॉलर प्रति बैरल की छूट मिल रही है।

उन्होंने कहा, “हमने रूसी कच्चे तेल की खरीद कभी नहीं रोका। हम अक्टूबर और नवंबर के लिए पहले से ही खरीद रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा, “अक्टूबर के अंतिम हफ्ते में खरीद में गिरावट इसलिए आई क्योंकि हमारा स्टॉक ज़्यादा था, इसलिए हम अपने स्टॉक के स्तर को भी बेहतर बनाना चाहते थे।”

रूसी तेल की खरीद में मासिक बदलाव आया

रूसी तेल की खरीद का पैटर्न हर महीने बदलता रहा है। आँकड़ों के मुताबिक अक्टूबर के पहले हफ्ते में आयात में बढ़ोतरी हुई, जिससे जुलाई से सितंबर तक तीन महीनों में तेल आपूर्ति में कमी को दूर कर दिया। त्योहारी माँग को पूरा करने के लिए रिफाइनरियों ने जोर शोर से तेल खरीदा।

जून में आयात 20 लाख बैरल प्रतिदिन से घटकर सितंबर में 16 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था। हालाँकि, अक्टूबर के शुरुआती विश्लेषण में सुधार की ओर इशारा किया गया था क्योंकि पश्चिमी बाजारों में कमज़ोर माँग के बीच शिपिंग में दी गई आकर्षक छूट का असर पड़ा और भारत आने वाले यूराल सहित रूसी ग्रेड के तेलों की शिपमेंट में वृद्धि हुई।

वैश्विक व्यापार विश्लेषण करने वाली कंपनी केप्लर के मुताबिक, अक्टूबर में शिपमेंट लगभग 18 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो पिछले महीने की तुलना में लगभग 2,50,000 बैरल प्रतिदिन अधिक है। इसके अलावा, भारतीय रिफाइनरियों ने पुष्टि की है कि उन्हें सरकार से रूसी तेल का आयात बंद करने का आदेश कभी नहीं मिला।

अगस्त में रूसी तेल की आपूर्ति बढ़कर 20 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया, क्योंकि रिफाइनरियों ने अधिक तेल की माँग की। वैश्विक रीयल-टाइम डेटा और केप्लर के अनुसार, अगस्त के पहले पखवाड़े में प्रतिदिन आयात किए गए 52 लाख बैरल कच्चे तेल में रूस का हिस्सा 38% तक था। जुलाई में आयात 16 लाख बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 20 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया।

ट्रम्प प्रशासन के 50% तक टैरिफ इसी महीने लागू हुआ। इसमें रूसी तेल लेने के ‘जुर्म’ में 25% अतिरिक्त शुल्क भी शामिल था। हेलसिंकी स्थित सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के अनुसार, भारत को अगस्त में रूस से 2.9 बिलियन यूरो का कच्चा तेल प्राप्त हुआ, जबकि जुलाई में यह 2.7 बिलियन यूरो था।

आईओसी के अध्यक्ष अरविंदर सिंह साहनी ने बताया, “न तो हमें खरीदने के लिए कहा जा रहा है और न ही न खरीदने के लिए। हम रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी बढ़ाने या घटाने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं कर रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा, “अप्रैल-जून में आईओसी द्वारा संसाधित कच्चे तेल में रूसी तेल का हिस्सा लगभग 22% था और निकट भविष्य में भी इसकी मात्रा समान रहने की उम्मीद है।”

आँकड़ों से पता चला है कि बारिश के मौसम में ईंधन की माँग आमतौर पर भारत में कम हो जाता है। इसलिए जुलाई में देश का रूसी तेल आयात गिर गया, जबकि पिछले महीने कुछ रिफाइनरों ने कम छूट के कारण खरीदारी स्थगित कर दी थी। जुलाई में भारत ने प्रतिदिन 1.5 मिलियन बैरल रूसी तेल खरीदा, जो पिछले महीने की तुलना में 24.5% कम है।

जुलाई में भारत के कुल आयात 4.44 मिलियन बैरल प्रतिदिन में से 34% हिस्सा रूस से आया। दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स की संचालक रिलायंस ने जुलाई में रूसी तेल की अपनी खरीद में पिछले महीने के मुकाबले 19% की कटौती की।

रूसी तेल आयात में आया कुछ समय से उछाल

रूसी तेल आयात में पिछले कुछ समय से लगातार वृद्धि देखी जा रही है। विश्लेषकों के अनुसार, इजराइल और ईरान के बीच तनाव और युद्ध को देखते हुए घरेलू रिफाइनरी कंपनियों ने अपना स्टॉक बढ़ाया। इसलिए जून में रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात 11 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया। केप्लर वेसल ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, भारत में रूसी तेल आयात जून में जुलाई 2024 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर था, जो कुल 2.08 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) था।

1 से 19 जून के बीच यह 2.1 और 2.2 मिलियन बैरल प्रति दिन के बीच रहा। इस दौरान भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 35% से ऊपर बनी रही।

यूरोपीय थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ के मुताबिक, “जून में भारत के कच्चे तेल के वैश्विक आयात में 6% की गिरावट आई, जबकि रूस से आयात की मात्रा में महीने-दर-महीने 8% की वृद्धि देखी गई, जो जुलाई 2024 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गई,”

द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मानकों से कम कीमत पर रूसी कच्चा तेल लगातार भारत को मिल रहा है, इसलिए मई में भारत का आयात 10 महीने के उच्चतम स्तर 1.96 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर पहुँच गया था। रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। कुल आयात का 38% हिस्सा रूस से पूरा होता है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में भारत को रूसी तेल आपूर्ति नौ महीने के उच्चतम स्तर पर रही। केप्लर ने बताया कि भारत का रूसी तेल आयात अप्रैल में मार्च की तुलना में 2.1% बढ़कर 19.2 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया, जबकि कुल तेल आयात 7.3% घटकर 48.8 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। भारत के तेल आयात में रूसी कच्चे तेल का हिस्सा मार्च के 35.7% से बढ़कर अप्रैल में 39.3% हो गया।

रॉयटर्स के मुताबिक, केप्लर के आँकड़ों से पता चलता है कि भारत का रूसी तेल का आयात मार्च में 15.4 लाख बैरल प्रतिदिन था, जो पिछले तीन महीनों में घटकर 11 लाख से 12 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था। सूत्रों ने बताया कि तुर्की की सबसे बड़ी तेल रिफाइनर कंपनी ने रूसी तेल का आयात बंद कर दिया है। इससे एशियाई बाजारों में तेल की आपूर्ति बढ़ गई है।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने बताया कि भारत समुद्री रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है। 2025 के पहले 9 महीनों में प्रतिदिन 1.9 मिलियन बैरल या 2022 के यूक्रेन युद्ध पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस के कुल निर्यात का लगभग 40% समुद्र के रास्ते भारत आता था। घरेलू रिफाइनरियाँ फिर इस कच्चे तेल को पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन में बदल देती हैं।

तेल आपूर्ति पर दो युद्धों का पड़ा असर

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय जर्नल फॉर मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च के अनुसार, 2024-2025 में रूस भारत का कच्चे तेल का शीर्ष आपूर्तिकर्ता होगा, जो कुल आयात में लगभग 36% का योगदान देगा। हालाँकि, हमेशा ऐसा नहीं था क्योंकि 2009-10 में भारत को कच्चा तेल निर्यात करने वाले देशों में रूस का अनुपात 1% से भी कम था।

(साभार-इंटरनेशनल जर्नल)

2021-2022 में भी रूस से कच्चे तेल का आयात केवल 2% से अधिक रहा। इस बदलाव के 2 अहम कारण थे। पहला, ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध। भारत के कुल तेल आयात में ईरान का प्रतिशत इसकी वजह से तेजी से गिरा। दूसरा कारण 2022 में शुरू हुआ रूस और यूक्रेन का युद्ध रहा। इसकी वजह से कूटनीति, तेल व्यापार में बदलाव आया।

पूर्वोक्त कारण रूस से भारत के ऊर्जा अधिग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। इसी प्रकार, वाणिज्यिक, रसद और भू-राजनीतिक कारक रूसी तेल की भारत की मासिक खरीद में उतार-चढ़ाव में योगदान करते हैं, जिसमें भारतीय रिफाइनरियों के आर्थिक विचार प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

भारत के विदेश मंत्रालय ने विश्व तेल बाजार में बदलती गतिशीलता को देखते हुए रूसी कच्चे तेल के आयात पर जवाब दिया। उनका कहना है कि भारत के कच्चे तेल के आयात पर इसका प्रभाव पड़ता है। नई दिल्ली अपने 1.4 अरब लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ऊर्जा खरीद में लचीलेपन पर ज़ोर देता रहा है।रूसी तेल कंपनियों पर हाल ही में लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के असर पर भी विचार किया जा रहा है। उचित मूल्य पर अलग अलग स्रोतों से तेल आपूर्ति मोदी सरकार की रणनीति का हिस्सा है।

आईओसी प्रमुख साहनी ने जोर देकर कहा कि रूसी कच्चा तेल आर्थिक कारणों से खरीदा जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया, “हम पूरी तरह से आर्थिक कारणों से खरीदना जारी रखते हैं, यानी अगर कच्चे तेल की कीमत और विशेषताएँ हमारी योजना के मुताबिक हों, तो हम खरीदते हैं।”

इसके अलावा, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) के निदेशक (वित्त) वेत्सा रामकृष्ण गुप्ता के अनुसार, कीमतों में कटौती घटकर 1.5 डॉलर प्रति बैरल रह गई है, जिसके परिणामस्वरूप जुलाई में आयात कम हुआ है। अगस्त में यह छूट 40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई थी, लेकिन अब यह घटकर 2.70 डॉलर प्रति बैरल रह गई है।

साहनी ने बताया कि यूराल जैसे रूसी कच्चे तेल के ग्रेड पर छूट से खरीद की मात्रा में मासिक उतार-चढ़ाव हो सकता है और इस बात पर ज़ोर दिया कि इंडियन ऑयल को अमेरिकी टैरिफ के जवाब में खरीद में कटौती या वृद्धि करने के लिए नहीं कहा गया है। यह स्पष्ट है कि अमेरिकी टैरिफ ने कोई भूमिका नहीं निभाई। हालाँकि रूसी तेल कंपनियों पर मौजूदा प्रतिबंधों का असर पड़ सकता है।

कच्चे तेल की आपूर्ति को प्रभावित करने वाली वजहें

भारतीय तेल रिफाइनरियों में टर्नराउंड या आवधिक रखरखाव किया जाता है, जिससे उनकी प्रसंस्करण क्षमता और कच्चे तेल की खपत अस्थायी रूप से कम हो सकती है। इन रखरखाव कार्यक्रमों के कारण रूसी कच्चे तेल की कुल माँग में भी उतार-चढ़ाव आता है।

अस्थायी सरकारी आँकड़ों से पता चलता है कि अगस्त में भारतीय रिफाइनरियों का कच्चे तेल का उत्पादन महीने-दर-महीने 4.4% घटकर 5.27 मिलियन बैरल प्रति दिन (22.29 मिलियन मीट्रिक टन) रह गया।

निवेश सूचना एवं क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (आईसीआरए) के उपाध्यक्ष प्रशांत वशिष्ठ ने कहा, “जुलाई की तुलना में अगस्त में रिफाइनरी उत्पादन में गिरावट आई है। इसका मुख्य कारण बारिश का मौसम, निर्धारित रखरखाव और एक रिफाइनरी का जरूरत के मुताबिक कम उत्पादन करना है।”

सरकार के पेट्रोलियम नियोजन एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (पीपीएसी) के आंकड़ों के अनुसार, मानसून के कारण अपेक्षाकृत कम माँग के साथ-साथ निर्धारित रिफाइनरी रखरखाव के कारण बंद होने के कारण, भारत ने जुलाई में 18.6 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) कच्चे तेल का आयात किया, जो पिछले वर्ष के 19.4 एमएमटी से कम है।

भारतीय रिफाइनर अपने कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता ला रहे हैं। ऊर्जा विश्वसनीयता और अनुकूलन क्षमता में सुधार के लिए दुनिया के अन्य क्षेत्रों के विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। इससे तेल आपूर्तिकर्ताओं की संख्या बढ़ रही है। इसका असर रूसी तेल के आयात पर भी पड़ रहा है।

भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, दुनिया के अस्थिर बाजार में भारतीय ग्राहकों के हितों की रक्षा करना नई दिल्ली की सर्वोच्च प्राथमिकता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने घोषणा की, “स्थिर ऊर्जा मूल्य और सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करना हमारी ऊर्जा नीति के दो अहम लक्ष्य रहे हैं। इसमें हमारी ऊर्जा स्रोतों का व्यापक आधार बनाना और बाजार की स्थितियों के अनुसार विविधता लाना शामिल है।”

तेल के लिए अनुबंध आमतौर पर डिलीवरी से चार से छह और यहाँ तक कि आठ हफ़्ते और महीनों पहले तय हो जाते हैं। हफ़्तों बाद आने वाला सौदा इस वक्त की स्थितियों पर निर्भर नहीं करता। ये पहले तय किए गए कीमतों और शर्तों पर आधारित होते हैं, जिससे आयात में मासिक असमानता बढ़ती है।

भारत में रूसी तेल की अलग-अलग मात्रा में आने के पीछे ये सभी पहलू और परिस्थितियाँ निर्णायक रहे हैं।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)