हरियाणा में एक हफ्ते के भीतर एक आईपीएस और एक एएसआई के आत्महत्या कर लेने के बाद पूरे प्रशासनिक महकमे में खलबली मची हुई है। सबसे गंभीर बात ये है कि दोनों ने प्रशासनिक अधिकारियों पर सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। कानून की नजर में सुसाइड नोट व्यक्ति द्वारा दिया गया अंतिम वक्तव्य होता है, हालाँकि परिस्थितियों को भी इसके साथ देखा जाता है। ऐसे में दोनों अधिकारियों के सुसाइड नोट का काफी महत्व है। मनोवैज्ञानिक इसे मानसिक तनाव, डिप्रेशन और एंजाइटी से जोड़ रहे हैं।
आईपीएस पूरन कुमार ने कई आईएएस अधिकारियों पर जातिवाद, करप्शन समेत कई आरोप लगाए, वहीं एएसआई ने आईपीएस पूरन कुमार और उनके परिवार पर करप्शन और जातिवाद का सहारा लेने का आरोप लगाया। दोनों ने ही जान देने से पहले सुसाइड नोट में सारी जानकारी दी। एएसआई संदीप कुमार लाठर ने एक वीडियो भी बनाया है।
एएसआई संदीप लाठर और आईएएस पूरन कुमार के ‘फाइनल नोट’ की तुलना
एएसआई संदीप लाठर ने अपने सुसाइड नोट में दिवंगत आईपीएस पूरन कुमार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। एएसआई के मुताबिक पूरन कुमार के खिलाफ बहुत से सबूत मौजूद हैं। संदीप ने लिखा है कि भ्रष्टाचारी परिवार को नहीं छोड़ा जाए।
पूरन कुमार की तरह अपने सुसाइड नोट पर संदीप लाठर ने ‘फाइनल नोट’ लिखा। वीडियो में वह कहते हैं, ”मैं भगत सिंह का भक्त हूं. ये लड़ाई अधूरी नहीं छोड़ी जाएगी. अगले जन्म में भी इसे पूरा करूंगा।” उन्होंने पूरन कुमार और उनके परिवार की संपत्ति की जाँच की माँग की है।
उन्होंने कहा है कि पूरन कुमार ने अपने मातहत आने वाले कई ईमानदार अफसरों को फँसाया। उनका ट्रांसफर करवाया। अपने पसंद के अधिकारियों को लगाए। कई महिला अफसरों के यौन शोषण किए गए। भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हैं और पूरन कुमार के खिलाफ शिकायत हुई थी। परिवार को बचाने के लिए उन्होंने जान दी।
एएसआई संदीप ने पूरन कुमार की आईएएस पत्नी और विधायक साले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, संदीप लाठर ने नोट में लिखा-“पूरन कहते थे कि मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा. घरवाली आईएएस है, साला एमएलए है और परिवार एससी आयोग में है.”
एएसआई ने कहा, “आईपीएस पूरन कुमार ने सदर थाना मर्डर केस में पैसे लिए। राव इंद्रजीत को बचाने के लिए 50 करोड़ की डील की गई। ” उन्होंने कहा कि पूरन कुमार अपनी जाति के भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देते थे।
दरअसल आईपीएस पूरन कुमार के करीबी गन मैन सुशील कुमार की गिरफ्तारी में एएसआई संजीव कुमार का अहम रोल था। गन मैन सुशील को वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उस पर शराब कारोबारी से पैसे की उगाही के आरोप हैं। शराब कारोबारी ने वीडियो जारी कर आईपीएस पूरन कुमार पर वसूली के आरोप लगाए थे। इसकी जाँच चल रही है।
एडीजीपी पूरन कुमार ने अपने सुसाइड नोट में इसकी जानकारी देते हुए आलाधिकारियों द्वारा फँसाए जाने की बात कही है। उन्होंने मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी और डीजीपी समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों पर जातिगत प्रताड़ना, अपमानित करने और भ्रष्टाचार के केस में फँसाने के आरोप लगाए।
करीब 1 दर्जन अधिकारियों और पूर्व अधिकारियों का नाम लिखकर पूरन कुमार ने अपने सुसाइड नोट में लिखा, “मैं अब नहीं सह सकता, जो लोग मुझे इस स्थिति तक पहुँचाया कि मैं जीना नहीं चाहता, वही मेरी मौत के जिम्मेदार हैं।” उन्होंने अपने साथ प्रोमोशन, पोस्टिंग और सामाजिक बहिष्कार तक के आरोप लगाए।
आईपीएस पूरन कुमार ने जिस डीजीपी पर प्रताड़ना का आरोप लगाया, उसे एएसआई संदीप लाठर ने ईमानदार अधिकारी कहा। उन्होंने कहा, “राज्य में कई आईएएस अफसर भ्रष्ट हैं, लेकिन बीजेपी सरकार में कुछ ईमानदार अधिकारी हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की कोशिश की। डीजीपी साहब ईमानदार और निडर हैं।”
सुसाइड नोट का कानूनी महत्व
दोनों पुलिस अधिकारियों ने खुद को गोली मारने से पहले सुसाइड नोट लिखा। कानून की नजर में डाइंग डिक्लिरेशन ( dying declaration) यानी मरने से पहले कही गई बातों का काफी महत्व होता है। ये कोर्ट में सबूत के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है। इसका महत्व उस वक्त और बढ़ जाता है, जब व्यक्ति की मौत हो जाती है। ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि माना जाता है कि व्यक्ति मरने से पहले झूठ नहीं बोलता। ये अहम सबूत बन सकता है, अगर झूठ बोलने का कोई कारण न नजर आए।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत यह मान्य है। इसमें कहा गया है कि जब कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु या मृत्यु के लिए जिम्मेदार किसी भी परिस्थिति के बारे में बताता है, तो उन मामलों में ये प्रासंगिक होता है।
दोनों अधिकारियों के आत्महत्या के मामले में ये साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। जाँच के दौरान सच्चाई उजागर करने में ये सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है और इस मामले में अहम भूमिका निभा सकता है।
क्या कहता है सुसाइड को लेकर मनोविज्ञान
दिल्ली यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर नवीन कुमार ने ऑपइंडिया से बात करते हुए आत्महत्या करने की वजहों पर प्रकाश डाला। उनका कहना है कि आत्महत्या करना एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जब व्यक्ति खुद को कई समस्याओं से घिरा महसूस करता है और उसका समाधान खुद को खत्म करने में पाता है। उनका कहना है, “आम तौर पर सुसाइड करना, तुरंत का निर्णय नहीं होता है। ये कुछ दिनों से दिमाग में चल रहा होता है। हो सकता है कि पूरन कुमार या संदीप लाठर डिप्रेशन या एंजाइटी के शिकार हों। मानसिक तौर पर तनावग्रस्त हों।”
मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर कुमार का मानना है कि पुलिस विभाग में काम करने वाले लोगों पर अक्सर अपने काम को लेकर कई तरह के दबाव होते हैं। उन्हें राजनीतिक परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ता है। कई बार न चाहते हुए भी वैसे काम करने पड़ जाते हैं, जो वह नहीं करना चाहता। इससे कुंठा घर कर जाती है।
आईपीएस पूरन कुमार और एएसआई संदीप लाठर को लेकर ऐसा माना जा सकता है कि विभागीय परिस्थितियाँ उनके अनुकूल नहीं रही होंगी। ऐसा उन्होंने अपने सुसाइड नोट में भी लिखा है। घर बाहर अपने मन की बात वो किसी से शेयर नहीं कर पा रहे होंगे। मनोबल लगातार गिरता जा रहा होगा, नकारात्मकता हावी हो गई होगी। इसलिए ये कदम उठाया होगा।
इन परिस्थितियों से बचने के लिए दिनचर्या में बदलाव, बातों को शेयर करना, मनोरोग विशेषज्ञों से परामर्श लेना जरूरी होता है। डिप्रेशन, एंजाइटी का गरीबी या आर्थिक हालत से संबंध नहीं होता। ये किसी भी वजह से ये हो सकता है।
(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है। अगर आप भी तनाव से गुजर रहे हैं, तो भारत सरकार की हेल्पलाइन नंबर 1800 233 3330 पर मदद ले सकते हैं। आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए। दिनचर्या में बदलाव करना चाहिए।)
भोजपुरी के एक गायक अभिनेता हैं- रितेश पांडे। जन सुराज ने इन्हें अपने नेता प्रशांत किशोर की जन्मभूमि करगहर से उम्मीदवार बनाया है। रितेश पांडे का एक चर्चित गाना रहा है- पियवा से पहिले हमार रहलू। पर ऐसा लगता है कि प्रशांत किशोर अपनी बातों के भी नहीं हैं।
बिहार में जन सुराज की राजनीति शुरू करने के बाद से ही वे नीतीश कुमार या तेजस्वी यादव के खिलाफ चुनाव लड़ने की बात कहते रहे हैं। नीतीश कुमार चुनाव लड़ते नहीं हैं, इसलिए बाद में प्रशांत किशोर भी जन्मभूमि या कर्मभूमि से लड़ने की बात करने लगे। कर्मभूमि से उनका तात्पर्य तेजस्वी यादव की सीट राघोपुर से था।
लेकिन अब जन सुराज ने राघोपुर से चंचल सिंह को मैदान में उतारा है। यानी प्रशांत किशोर कर्मभूमि या जन्मभूमि से चुनाव नहीं लड़ेंगे। इतना ही नहीं उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि बिहार विधानसभा चुनाव में वे राज्य की किसी भी सीट से चुनाव नहीं लड़ेंगे।
प्रशांत किशोर का कहना है कि चुनाव के दौरान वे प्रचार और संगठन के काम पर ध्यान केंद्रित करेंगे। उनका यह भी कहना है कि पार्टी ने उन्हें इसी भूमिका का आदेश दिया है।
प्रशांत किशोर और जन सुराज की राजनीतिक शैली की तुलना अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी से होती रही है। यह दूसरी बात है कि प्रशांत किशोर इस टैग से खुद को बचाने की कोशिश करते रहे हैं, क्योंकि दिल्ली में करीब एक दशक तक AAP की सरकार रहने के बाद केजरीवाल की छवि ‘राजनीतिक धूर्त’ की बन चुकी है। पर इस मामले में केजरीवाल का साहस प्रशांत किशोर से कहीं अधिक था। उन्होंने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को सीधे मैदान में उतरकर चुनौती दी थी।
यह बात सत्य है कि सीटों, जनसंख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से दिल्ली और बिहार में काफी अंतर है। लेकिन राजनीति में ‘ज्वाइंट किलर’ का हमेशा से काफी महत्व रहा है। चुनाव लड़ने से पीछे हटकर प्रशांत किशोर ने यह मौका गँवा दिया है।
प्रशांत किशोर चुनाव न लड़ने की वजह संगठन के कार्य को बता रहे हैं पर सच्चाई इसके उलट है। सुनियोजित कैंपेन की बदौलत जनसुराज भले सोशल मीडिया में खुद को विकल्प के तौर पर पेश करने में सफल रही हो, लेकिन जमीन पर वह अपने संगठन का उस तरह से विस्तार नहीं कर पाई है।
ऐसे में यदि प्रशांत किशोर खुद चुनाव हार जाते हैं तो जनसुराज की भविष्य की राजनीति के लिए ही संकट पैदा हो जाएगा। इससे पीके की ब्रांड वैल्यू सीधे तौर पर प्रभावित होगी। उनके इसी ब्रांड वैल्यू के दम पर फिलहाल जनसुराज का मायाजाल टिका हुआ है।
प्रशांत किशोर ने खुद की छवि देश के सफल चुनावी रणनीतिकार के तौर पर गढ़ी है। लेकिन खुद की चुनावी हार से जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि दूसरों को जीत दिलाने का दावा करने वाला खुद एक चुनाव नहीं जीत सकता।
इसके अलाव, प्रशांत किशोर ने जन सुराज की सारी गतिविधियों को अपने ईद-गिर्द समेट कर रखा है। वे पार्टी के एकमात्र चेहरे है। ऐसे में राघोपुर में तेजस्वी को चुनौती देने की स्थिति में प्रशांत किशोर इसी सीट की परिधियों में बंध जाते, क्योंकि यह सीट लालू परिवार का गढ़ रहा है। प्रशांत किशोर अगर इसी सीट पर अपना पूरा ध्यान देते, तो पार्टी का बाहर प्रचार-प्रसार कौन करता।
प्रशांत किशोर को अपने पैतृक जिला बक्सर या गोपालगंज के बाहर ज़्यादा लोग नहीं जानते है। उन्होंने लंबी पदयात्रा की, लोगों से संवाद किया, लेकिन वो जन नेता वाली छवि अब तक नहीं बना सके हैं। कुछ वैसी ही स्थिति पप्पू यादव के साथ भी रही। वो अपने गाँव या सीमित इलाके तक ही पहचान रखते हैं, लेकिन राज्य या देशभर में उनकी पकड़ कमजोर है। पप्पू यादव ने भी चुनावी राजनीति में कई बार बड़ा दावा किया, लेकिन जब वोटिंग का समय आया, तो जमीनी सच्चाई सामने आ गई।
पैसे लेकर भी नहीं दिया टिकट, जलाए लाभ कार्ड और झंडे
प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जन सुराज’ में टिकट बँटवारे को लेकर मची कलह अब सरेआम आ गई है। बिहार विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं मिलने से नाराज एक संभावित प्रत्याशी ने विरोध जताते हुए पार्टी के हजारों ‘जन सुराज लाभ कार्ड’ और झंडे जला दिए।
बिहार विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं मिलने से नाराज़ संभावित प्रत्याशी ने जलाए हज़ारों जनसुराज लाभ कार्ड और झंडे,
कहा: “ प्रशांत किशोर ने मुझसे टिकट का वादा कर लगभग 50 लाख रुपये खर्च करवाए, लेकिन टिकट किसी और को दिया गया।” pic.twitter.com/iy3HcqIH0Z
नाराज नेता ने प्रशांत किशोर पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया कि पीके ने उनसे टिकट देने का वादा किया था। इसी वादे के भरोसे पर उन्होंने चुनाव क्षेत्र में लगभग 50 लाख रुपए खर्च कर दिए थे। हालाँकि, अंतिम समय में उन्हें टिकट नहीं दिया गया और वह टिकट किसी और उम्मीदवार को दे दिया गया।
इसके अलावा, उजियारपुर में टिकट बँटवारे के बाद राजू सहनी और जनसुराज के प्रदेश अध्यक्ष के बीच हुई बातचीत का ऑडियो क्लिप वायरल हो रहा है, जिसमें राजू सहनी कह रहे हैं कि काम हमसे करवाया और टिकट किसी और को मिला।
ऑपइंडिया का दावा- जन सुराज में होगी ‘कलह’
‘ऑपइंडिया’ प्रशांत किशोर की राजनीतिक शैली और पार्टी के अंदर होने वाली बगावत पर चर्चा पहले ही कर चुकी है। बिहार के वोटकटुआ कहे जा रहे ‘प्रशांत किशोर का मायाजाल’ अब खुलकर सामने आ रहा है और पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी पैसों के बदले सीटें बाँटने का आरोप लगा दिया है। इसका वीडियो आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं।
प्रशांत किशोर कई बार कह चुके हैं कि वे बिहार में जो कुछ भी कर रहे हैं, वह वे कॉन्ग्रेस के बैनर तले करना चाहते थे। कई जानकारों का मानना भी है कि वे जिस तरह से काम कर रहे हैं वह महागठबंधन की बी टीम जैसा है। अब राघोपुर में तेजस्वी यादव का रास्ता आसान कर उन्होंने इस पर मुहर लगा दी है।
प्रशांत किशोर का ‘जनधन पार्टी’
प्रशांत किशोर ने जन सुराज की शुरुआत ‘बदलाव’ के नारे के साथ की थी। कहा था कि ये पार्टी आम लोगों की होगी, पारदर्शिता से चलेगी। लेकिन टिकट बँटवारे को लेकर जो हालात दिखे, उससे यही लग रहा है कि राजनीति का वही पुराना खेल यहाँ भी दोहराया जा रहा है। जहाँ पैसे वालों को टिकट मिलता है, जमीन से जुड़े लोग सिर्फ ताली बजाते रह जाते हैं। अब ये तो जनता के हाथ में है कि जन सुराज की असली पहचान क्या है, जनता की पार्टी या जनधन पार्टी?
अक्टूबर 2007 की बात है, पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने एक इंटरव्यू में कहा था, “आतंकवाद पाकिस्तान की एकता और अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अगर इसे खत्म न किया गया तो पाकिस्तान बिखर सकता है और उसके लोग खूनी गृहयुद्ध में झोंक दिए जाएँगे।” इस इंटरव्यू के 2 महीने के भीतर भुट्टो की हत्या कर दी गई।
बेनजीर भुट्टो का यह डर बेजा नहीं था, दशकों से अपने आँगन में उन्होंने आतंकवाद के साँप को पलते देखा था। आज इस बात को 18 साल बीत गए और भुट्टो की कही हर एक बात सच साबित हो रही है। आतंकवाद का वही साँप आज पाकिस्तान की छाती पर कुंडली मारकर बैठा है।
पाकिस्तान एक या दो तरफा नहीं बल्कि चौतरफा घिरा हुआ है। अफगानिस्तान के तालिबान से लेकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) तक, बलूच स्वतंत्रता सेनानियों से लेकर POK और सिंध के आंदोलनों तक हर ओर से पाकिस्तान की पिटाई हो रही है जिससे वह खोखला हुआ जा रहा है। इस्लामी कट्टरपंथ ने पाकिस्तान को बरबाद कर दिया है।
मगर जो बाज आ जाए वो पाकिस्तान कैसा? आज भी वो अपनी बरबादी के लिए भारत को जिम्मेदार बता रहा है। यानी पाकिस्तान की जनता वहाँ के हुक्मरानों से सवाल पूछे इससे पहले ही वो देश के भीतर लगी आग के लिए भारत को जिम्मेदार बताने पर तुले हैं।
बीते 12 अक्टूबर को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने TTP के घातक हमले के बाद एक बयान जारी किया। इसमें पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने कहा, “पाकिस्तान को अफगान तालिबान, फितना-अल-ख्वारिज और फितना-अल-हिंदुस्तान द्वारा 11 और 12 अक्टूबर 2025 की रात को पाक-अफगान सीमा पर की गई अनावश्यक और अनुचित हिंसा पर गहरी चिंता है।”
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का बयान
इस लेख में जानेंगे कि फितना-ए-ख्वारिज और फितना-ए-हिंदुस्तान क्या हैं और कैसे इनके आड़ में पाकिस्तान देश के भीतर लगी आग का ठीकरा भारत और इस्लाम पर फोड़ना चाहता है।
TTP को पाकिस्तान ने घोषित किया फितना-अल-ख्वारिज?
26 जुलाई 2024 को पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने एक आदेश जारी किया। इसमें पाकिस्तान सरकार ने प्रतिबंधित ‘आतंकी संगठन’ तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को अब ‘फितना-अल-ख्वारिज’ घोषित कर दिया था।
पाकिस्तान के गृह मंत्रालय के इस आदेश में कहा गया, “तथाकथित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की गतिविधियाँ इस्लामी धर्म और उसके सही शिक्षाओं के विपरीत हैं। इन्हें ध्यान में रखते हुए फैसला लिया गया है कि अब से इस संगठन को ‘फितना-अल-ख्वारिज’ कहा जाएगा।”
साथ ही, इस TTP से जुड़े लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहीं मजहबी उपाधियों जैसे ‘मौलवी’, ‘मुफ्ती’ और ‘हाफिज’ अब इस्तेमाल पर रोक लगा दी और इसकी जगह इनके लिए ‘खारिजी’ शब्द इस्तेमाल करने का आदेश दे दिया।
पाकिस्तान के गृह मंत्रालय का 26 जुलाई 2024 का आदेश
इसके अर्थ पर गौर करें तो ‘फितना’ एक अरबी मूल का शब्द है जिसका मतलब ‘विद्रोह या बगावत’ होता है। वहीं, ख्वारिज का मतलब ‘चरमपंथ के रास्ते पर चले जाने वाले लोग’ होते हैं।
रिसर्च डेटाबेस से जुड़ी EBSCO की एक रिपोर्ट में कहा गया है, “ख्वारिज जिन्हें अक्सर खारिजी कहा जाता है, इस्लाम के शुरुआती समय में उभरी एक कट्टरपंथी शाखा थी। यह समूह पहले फितना के बाद पैदा हुआ था, जो 656 से 661 ईस्वी के बीच चला गृहयुद्ध था।”
इसमें कहा गया है, “ख्वारिज का मतलब ‘बगावती’ या ‘अलग होने वाले’ लोगों से है। इस्लामी शिक्षाओं की अपनी अतिवादी व्याख्याओं और चौथे खलीफा अली इब्न अबी तालिब के नेतृत्व को अस्वीकार करने के कारण ये मुसलमानों के मुख्य समूह से अलग हो गए थे।”
पाकिस्तान सिर्फ इन्हें ‘खारिजी’ बताने पर ही नहीं रुका बल्कि इन्हें भारत से भी जोड़ दिया है। पाकिस्तान की सेना की 13 सितंबर 2025 की एक प्रेस रिलीज में कहा गया है, “10 से 13 सितंबर के बीच खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में दो अलग-अलग ऑपरेशनों में 35 ख्वारिज को खत्म कर दिया गया है।
पाकिस्तानी सेना की प्रेस रिलीज
पाकिस्तानी सेना ने कहा कि मारे गए ख्वारिज भारतीय प्रॉक्सी ‘फितना-अल-ख्वारिज’ से जुड़े हुए थे। यह ट्रेंड अब लगातार चल रहा है। बीते 12 अक्टूबर को पाकिस्तानी सेना ने कहा, “10/11 अक्टूबर 2025 की रात एक कायरतापूर्ण आतंकी हमले में, भारतीय प्रॉक्सी ‘फितना-अल-ख्वारिज’ से जुड़े ख्वारिजों ने डेरा इस्माइल खान जिले में स्थित पुलिस ट्रेनिंग स्कूल को निशाना बनाया।”
जिस TTP को आज पाकिस्तान भारत का प्रॉक्सी बता रहा है असल में वो उसका ही पाला हुआ है। TTP की जड़ें अल-कायदा से जुड़ी हैं, वही अल-कायदा जिसके मुखिया और आतंकी ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान ने अपने घर में शरण दी थी।
UNSC की वेबसाइट बताती है, “TTP पहले अलग-अलग सक्रिय आतंकवादी समूहों का गठजोड़ है, जो 2007 में फेडरल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्राइबल एरिया (FATA) में पाकिस्तान की सेना द्वारा अल-कायदा से जुड़े आतंकवादियों के खिलाफ अभियान के बाद एक साथ आए।” बैताल्लाह मेहसूद के नेतृत्व में इस संगठन की नींव पड़ी थी।
FATA अफगानिस्ता से सटा एक कबीलाई इलाका है और 2018 से पहले यह क्षेत्र सेमी-ऑटोनोमस हुआ करता था। यानी फैसले कबीलाई कानूनों के मुताबिक भी होते थे। 9/11 के हमले के बाद जब अमेरिका ने ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ छेड़ा और सेना अफगानिस्तान में घुसी तो वहाँ से आतंकी/चरमपंथी संगठनों के लोग भागकर FATA आ गए।
तब पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ की सरकार थी और अमेरिका ने इन्हें FATA से निकालने के लिए पाकिस्तान को खूब पैसा दिया। पाकिस्तान ने FATA में अपनी सेना भेजी और कबीलों पर जुर्म भी किए गए। इससे स्थानीय लोग भड़के और चरमपंथी संगठनों ने इस नाराजगी को भुनाया और साथ मिलकर पाकिस्तानी सेना के खिलाफ लड़ना शुरू कर दिया। यहीं से आगे चलकर TTP की नींव पड़ी थी जो पूरे पाकिस्तान में अपना इस्लामिक कानून लागू करना चाहता था।
बलूच विद्रोहियों को पाकिस्तान ने बनाया ‘फितना-अल-हिंदुस्तान’
पाकिस्तान ने केवल TTP पर ही ठप्पा नहीं लगाया है बल्कि बलूच विद्रोहियों को भी ‘फितना-अल-हिंदुस्तान’ का नाम दिया है। पाकिस्तान की सेना के अत्याचारों से प्रताड़ित होकर अपने हक की लड़ाई लड़ रहे बलूचों को पाकिस्तान ने भारत द्वारा प्रायोजित बता दिया है।
मई 2025 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार ने बलूचिस्तान में सक्रिय सभी विद्रोही गुटों को ‘फितना-अल-हिंदुस्तान’ घोषित कर दिया। पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने 31 मई 2025 को इसे लेकर एक आदेश भी जारी किया।
पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने भारत पर आरोप मढ़ते हुए कहा, “हिंदुस्तान के इशारे पर बलूचिस्तान में आतंकवादी गतिविधियों में कुछ संगठनों और समूहों की संलिप्तता को ध्यान में रखते हुए, जो पाकिस्तान की इस्लामी आस्था और संप्रभुता और पारंपरिक परंपराओं के लिए हानिकारक हैं, यह निर्णय लिया गया है कि अब से बलूचिस्तान में सक्रिय सभी आतंकवादी समूहों और संगठनों को ‘फितना-अल-हिंदुस्तान’ कहा जाएगा।”
इसमें आगे कहा गया, “इस बदलाव का उद्देश्य इन आतंकवादी संगठनों और समूहों की वास्तविक प्रकृति और विचारधारा तथा पाकिस्तान के लोगों के खिलाफ भारत (हिंदुस्तान) के नापाक मंसूबों को सामने लाना है।”
पाकिस्तान के गृह मंत्रालय का आदेश
इसके बाद से पाकिस्तान की सेना द्वारा इस शब्द का बार-बार जिक्र किया जा रहा है। पाकिस्तान की सेना की कोशिश है कि किसी तरह लोगों को मन में यह बात बिठा दी जाए तो बलूचिस्तान में जो हो रहा है वो उनके कुकर्मों को फल नहीं है बल्कि उसमें हिंदुस्तान का हाथ है।
पाकिस्तानी सेना ने 1 अक्टूरब 2025 के अपने X पोस्ट में लिखा, “1 अक्टूबर 2025 को सुरक्षा बलों ने भारतीय प्रॉक्सी, ‘फितना-अल-हिंदुस्तान’ से संबंधित आतंकवादियों की उपस्थिति की सूचना पर बलूचिस्तान के खुजदार जिले में एक खुफिया जानकारी पर आधारित अभियान चलाया।”
PAK सेना का ट्वीट
अब पाकिस्तान से त्रस्त बलूचिस्तान के लड़ाके जो भी घटनाएँ करते हैं उन्हें पाकिस्तान भारत के मथे मढ़कर अपनी कारगुजारियों से बचने की कोशिश करता है। स्कूल में हमला हो या जाफर एक्सप्रेस का हाईजैक सभी को पाकिस्तान ने भारत से जोड़ दिया है।
इस्लाम और हिंदुस्तान के नाम पर जान बचाने की कोशिश में लगा पस्त पाकिस्तान
पाकिस्तान ने दशकों तक इस्लामी कट्टरपंथ के नाम पर आतंक फैलाया है। पाकिस्तान से चलने वाले आतंकियों संगठनों ने मजहब की आड़ में आतंकी तैयार किए और भारत उनका निशाना बनता रहा। ऐसा वक्त तक आया कि जब दुनिया के हर आतंकी हमले के तार पाकिस्तान से जुड़े निकलने लगे और यह सब मजहब की आड़ में किया जा रहा था।
पाकिस्तान के हुक्मरान अपनी नाकामी छिपाने के लिए इस्लाम का सहारा लेते आए हैं। पाकिस्तान का फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पाकिस्तान को कलमें की बुनियाद पर मदीना के बनी दूसरी रियासत तक बता चुका है। जाहिर है कि इस तरह के शब्दों के प्रयोग से वो इस्लामी कट्टरपंथियों को अपने काबू में करने की कोशिश करता है।
पहले तो पाकिस्तान ने लोगों को इस्लाम के नाम पर भड़काया, दुनिया को इकट्ठा करने की कोशिश की और जब इससे भी उसकी दाल ना गली तो उसके इस्लाम के नाम पर ही अपने लोगों को बाँटकर नया पैंतरा चलने की कोशिश की है।
दरअसल, तहरीक-ए-तालिबान के नाम को लेकर भी पाकिस्तान परेशान था। ‘तहरीक’ का अर्थ होता है ‘आंदोलन’ जबकि ‘तालिबान’ या ‘तालिब’ का अनुवाद ‘छात्र’ होता है। इसलिए, इसे समूह को ‘पाकिस्तान के छात्रों का आंदोलन’ समझा जाता था जिससे पाकिस्तान परेशान था और इस जुड़ाव को खत्म करने के लिए ही ‘ख्वारिज’ शब्द दिया गया है। जो इन्हें ‘इस्लामी विद्रोही’ साबित करने की कोशिश है।
पाकिस्तान TTP को इस्लाम का दुश्मन बता रहा है लेकिन इस्लाम और उसके पैंगबर के नाम पर बने जैश-ए-मोहम्मद (मुहम्मद की सेना), लश्कर-ए-तैयबा (पवित्र सेना), हिज्बुल मुजाहिदीन (इस्लामी पवित्र लड़ाकों का दल) जैसे दलों को खुलकर आतंकवाद फैलाने के लिए संरक्षण देता है।
अब यही आतंकवाद जब पाकिस्तान पर भारी पड़ रहा है तो वो किसी भी स्थिति में इससे बचना चाहता है। पाकिस्तान में फौज और आतंकवाद का गठजोड़ किसी से भी छिपा नहीं है। हाल ही में जब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान पर भारत ने हमला किया और आतंकियों को मार गिराया तो उनके लिए नमाज-ए-जनाजा पढ़ने के लिए पाकिस्तानी फौज के जवान मौजूद थे।
पाकिस्तान को अगर आतंकवाद और गृह युद्ध से बचना है तो इस तरह भारत पर आरोप लगाकर या इस्लाम के नाम पर लोगों को बरगलाकर वो नहीं बच सकता है। उसे अपनी नीतियों में बदलाव लाने होंगे और अपने यहाँ पल रहे आतंकवाद को जड़ से खत्म करना होगा। वरना वो दिन अब दूर नहीं पाकिस्तान टुकड़े-टुकड़े में टूट जाएगा।
भारत के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस यानी डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने मंगलवार (14 अक्टूबर 2025) को खुलासा किया कि पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू होने के मात्र 88 घंटों के भीतर ही युद्धविराम की गुहार लगाई थी। पाकिस्तान के 100 से ज्यादा फौजी इस दौरान मारे गए। ये जानकारी उन्होंने मरणोपरांत दिये गए पाकिस्तानी पुरस्कारों की सूची का हवाला देते हुए कही।
डीजीएमओ घई ने कहा, “संभवतः उन्होंने 14 अगस्त को अपने पुरस्कारों की सूची जारी की। उनके द्वारा मरणोपरांत दिए गए पुरस्कारों की संख्या से असली तस्वीर सामने आई, नियंत्रण रेखा पर उनके हताहतों की संख्या 100 से ज़्यादा थी।”
पाकिस्तान ने मई महीने में 12 से ज्यादा एयरक्राफ्ट खो दिए। 7 मई को भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसके बाद पाकिस्तान ने सीमा पार से गोलीबारी शुरू कर दी थी।
संयुक्त राष्ट्र में सैन्य योगदान देने वाले देशों (यूएनटीसीसी) के प्रमुखों के सम्मेलन में उन्होंने ये खुलासे किए। डीजीएमओ ने कहा कि भारत का इरादा आतंकियों पर कार्रवाई के बाद मामले को आगे बढ़ाना नहीं था, जब तक कि ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं किया जाता।
लेफ्टिनेंट जनरल घई ने कहा कि पाकिस्तान के जल्दबाजी में किए गए आत्मसमर्पण ने भारत के राजनीतिक और सैन्य उद्देश्यों को पुष्ट किया। उन्होंने चेतावनी दी, “आगे का संघर्ष उनके लिए विनाशकारी होता।” उन्होंने बताया कि कैसे भारत की सोची-समझी प्रतिक्रिया ने इस्लामाबाद के पास कोई रणनीतिक विकल्प नहीं छोड़ा।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान रणनीतिक परिवर्तन
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सैद्धांतिक बदलाव आया कि आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों में कोई अंतर नहीं है। इससे रणनीतिक बदलाव देखा गया। डीजीएमओ ने ज़ोर देकर कहा कि ऑपरेशन सिंदूर न केवल एक सैन्य हमला था, बल्कि भारत के आतंकवाद-रोधी सिद्धांत में एक रणनीतिक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता था, जिसे खुद प्रधानमंत्री मोदी ने बताया था।
लेफ्टिनेंट जनरल घई ने कहा, “आतंकवाद के विरुद्ध हमारी रणनीति में सैद्धांतिक बदलाव आया है। हमारे प्रधानमंत्री ने इस बारे में बात की है। उन्होंने तीन बातें स्पष्ट रूप से कही हैं। पहला, आतंकवादी हमला युद्ध जैसा ही हैं। दूसरा, भारत निर्णायक जवाबी कार्रवाई करेगा और तीसरा, हम परमाणु ब्लैकमेल के आगे नहीं झुकेंगे। आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों में कोई अंतर नहीं है।”
यह अभियान 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में शुरू किया गया था, जिसमें पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार करके 26 पर्यटकों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। उन्हें धर्म पूछ- पूछकर मारा गया था। हालाँकि शुरुआत में एक आतंकी संगठन ने इसकी ज़िम्मेदारी ली थी। लेकिन उन्हें जल्द ही एहसास हो गया कि स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर हो गई है और वे तुरंत पीछे हट गए।
डीजीएमओ ने कहा कि हालाँकि भारत की प्रतिक्रिया अपेक्षित थी, लेकिन यह सोची-समझी कार्रवाई थी, जिसके बाद तनाव को रोकने और नागरिकों की सुरक्षा के लिए सीमा पर अहम तैनाती की गई।
थलसेना, वायुसेना और नौसेना की समन्वित कार्रवाई
डीजीएमओ घई के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर भारतीय थलसेना, वायुसेना और नौसेना की भागीदारी वाली ‘सैन्य क्षमता और सफल रणनीति’ की जीत थी।
घई ने विस्तार से बताया, “हमने उनके 11 हवाई ठिकानों पर हमला किया, आठ प्रमुख ठिकानों, तीन हैंगरों और चार रडारों को क्षतिग्रस्त कर दिया। जमीन पर पाकिस्तानी हवाई संपत्तियाँ नष्ट कर दी गईं, जिनमें एक C-130 विमान, एक AEW प्रणाली और कई लड़ाकू विमान शामिल थे।”
नौसेना ने भी निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, “भारतीय नौसेना पहले ही अरब सागर में आगे बढ़ चुकी थी। अगर पाकिस्तान इसे और आगे बढ़ाता, तो समुद्र और उसके पार, उसके लिए परिणाम विनाशकारी होते।”
पहलगाम हमलावरों को मार गिराया- DGMO घई
डीजीएमओ ने खुलासा किया कि भारतीय सेना ने पहलगाम हमले के तीन मुख्य साजिशकर्ताओं का लगभग 96 दिनों तक पीछा किया और खत्म किया।
घई ने कहा, “हमने उन्हें आराम नहीं करने दिया। जब हमने आखिरकार उन्हें ढूंढा, तो वे थके हुए और कुपोषित लग रहे थे, दौड़ने से थके हुए थे।” हमने सभी को मार गिराया गया था।
उन्होंने 7 मई की तड़के लश्कर-ए-तैयबा के मुरीदके मुख्यालय और बहावलपुर के शिविरों सहित, आतंकवादी ठिकानों पर किए गए सटीक हमलों की तस्वीरें भी साझा किए। इन हमलों में 100 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए।
सिंधु जल संधि स्थगित कर दी गई
लेफ्टिनेंट जनरल घई ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की प्रतिक्रिया युद्ध के मैदान से कहीं आगे तक फैली हुई थी। उन्होंने कहा, “पहलगाम हमले के तुरंत बाद 1960 की सिंधु जल संधि को स्थगित करना उसी रणनीति का हिस्सा था जो यह संकेत देती थी कि आतंक और बातचीत की पुरानी रणनीति एक साथ नहीं चल सकती।”
उन्होंने कहा कि इससे भारत की सैन्य शक्ति को कूटनीतिक और आर्थिक साधनों के साथ जोड़ने की क्षमता का पता चलता है।
पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद वर्षों से जारी
सीमा पार से दशकों से जारी आतंकवाद पर बात करते हुए, लेफ्टिनेंट जनरल घई ने वैश्विक समुदाय को बताया कि भारत में इससे कितने लोग मारे गए और कितना नुकसान हुआ। उन्होंने कहा, “1980 के दशक में अकेले जम्मू और कश्मीर में 28,000 से ज्यादा आतंकवादी घटनाएँ हुई। 60,000 से ज्यादा परिवार यानी एक लाख से ज्यादा लोग, अपने घरों से भागने को मजबूर हुए। 15,000 नागरिक और 3,000 सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं।”
‘हमने रणनीति बदली है, विचारधारा नहीं।’ भारत के इस्लामी कट्टरपंथियों को अपनी वैचारिक और मजहबी सीमाओं की जितनी साफ समझ है, शायद ही किसी और को हो। उन्होंने दिखावे के तौर पर लिबरल्स और वामपंथियों को गले लगाया ताकि उन्हें अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए ‘यूजफुल इडियट्स’ की तरह इस्तेमाल किया जा सके। लेकिन जैसे ही कोई इनके बिना सवाल किए सरेंडर वाले अनकहे नियमों से जरा भी हटता है, तभी ये लोग तुरंत उन्हें किनारे कर देते हैं, नकार देते हैं और उनकी बेइज्जती करने लगते हैं।
इसी सिलसिले में एक नया मामला ‘लिबरल्स भी संघियों से अलग नहीं है’ सामने आया है। इस्लामी कट्टरपंथी Alt News जैसे वामपंथी झुकाव वाले पोर्टल को फंड न देने की माँग कर रहे हैं क्योंकि इसके फाउंडर प्रतीक सिन्हा ने भारत के इस्लामी कट्टरपंथियों की आलोचना कर दी। उन्होंने तालिबान को गले लगाने और अफगानिस्तान वाले ‘इस्लामी मॉडल’ को सही ठहराने पर सवाल उठाया था।
ये सब शुरू हुआ 12 अक्टूबर 2025 को, जब ‘प्रोफेसर नूरुल’ नाम के एक चर्चित इस्लामी कट्टरपंथी ने X (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट की। पोस्ट में एक शेर था, “तेरी तहजीब ने उतारा है तेरे सर से हिजाब, मेरी तहजीब ने मेरी नजरों को झुका कर रखा है।”
तेरी तहज़ीब ने उतारा है तेरे सर से हिजाब, मेरी तहज़ीब ने मेरी नज़रों को झुका कर रखा है। pic.twitter.com/wAv3zsVJVL
इसमें एक तस्वीर शामिल थी, जिसमें तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी पांरपरिक पोशाक और तालिबानी हेडगियर में नजर आ रहे थे। उनके सामने एक महिला पत्रकार गुलाबी ब्लेजर और पैंट्स में खुले बालों के साथ (यानी बिना हिजाब के) उनसे सवाल पूछ रही थी। यह तस्वीर साल 2022 में एंटाल्या डिप्लोमेसी फोरम के दौरान ली गई थी।
यह पोस्ट उस समय सामने आई जब मुत्ताकी भारत के दौरे पर थे। इस दौरान मुत्ताकी उत्तर प्रदेश के देवबंद भी पहुँचे थे, जो तालिबान की विचारधारा का स्थान है।
इस पोस्ट पर Alt News के को-फाउंडर प्रतीक सिन्हा ने इस्लाम के इस प्रतिगामी संस के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने इस कट्टरपंथी इस्लामी सोच की तुलना हिंदुत्व से की और लिखा, “जो लोग इस इस्लाम के संस्करण को मानते हैं और तालिबानी को गले लगाने में खुश हैं। वे उतने ही खतरनाक है, जितना हिंदुत्व ब्रिगेड।”
The followers who believe in and uphold this version of Islam, and are happy to embrace the Talibanis, are as dangerous as the Hindutva brigade. https://t.co/beXVcmusKO
प्रोफेसर नूरुल/इलाहाबादी ने दो टूक जवाब देते हुए कहा कि प्रतीक सिन्हा जैसे नास्तिकों को किसी की मजहबी भावनाओं पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने अपने हममजहब लोगों से अपील की कि Alt News को फंड देना बंद करें क्योंकि उनके मुताबिक सिन्हा जैसे लोग ‘संघियों से भी ज्यादा जहरीले’ हैं।
तुम जैसे नास्तिक जो ना हिंदू धर्म में विश्वास करते हैं और ना इस्लाम में।
ऐसे लोगों की किसी भी धार्मिक भावनाओं पर लिखने का कोई अधिकार नहीं है।
मुसलमानों आप लोग फैक्ट चेक के नाम पर इसको 13 लाख देते हो और अंदर से संघियों से भी ज़्यादा ज़हरील! है। आप लोग जुबैर को टैग कर दें। https://t.co/IkdDOQbBuQ
उन्होंने लिखा, “तुम जैसे नास्तिक जो ना हिंदू धर्म में विश्वास करते हैं और ना इस्लाम में। ऐसे लोगों की किसी भी धार्मिक भावनाओं पर लिखने का कोई अधिकार नहीं है। मुस्लिमों आप लोग फैक्ट चेक के नाम पर इसको 13 लाख देते हो और अंदर से संघियों से भी ज्यादा जहरीला है। आप लोग जुबैर को टैग कर दें।”
इस बहस में को आगे बढ़ाते हुए प्रतीक सिन्हा ने एक बार फिर हिंदुत्ववादियों की तुलना इस्लामी कट्टरपंथियों से की और कहा, तुम लोग हिंदुत्व ब्रिगेड से अलग नहीं हो, उनकी रणनीति भी बिल्कुल यही होती है और वे भी पूछते हैं कि हिंदू Alt News को डोनेट क्यों कर रहे हैं। तुम उसी सिक्के के दूसरे पहलू हो। अगर तुम सोचते हो कि सिर्फ मुस्लिम ही Alt News को डोनेट करते हैं तो तुम भी उतने ही गलतफहमी मे हो। Alt News को हर तबके के लोग डोनेट करते हैं।”
इसके जवाब में नूरुल ने आरोप लगाया कि सिन्हा लगातार मुस्लिमों को इस्लाम से दूर करने की कोशिश करते हैं और बीच-बीच में कुछ हिंदू कट्टरपंथियों को उजागर करना उनका एक ‘बैलेंसिंग एक्ट’ है।
वहीं एक और इस्लामी कट्टरपंथी आसिफ खान भी इस बहस में कूद पड़े और इशारा किया कि सिन्हा इस्लामी कट्टरपंथियों की पिछड़ी ‘तहजीब’ को महिमामंडित करने वालों की आलोचना करके लगभग पूरे ‘मुस्लिम-विरोधी’ हो गए हैं।
आसिफ खान ने लिखा, “ऐ पैगंबर! ईमान वाले मर्दों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी पवित्रता की रक्षा करें। यही उनके लिए ज्यादा पवित्र है, निस्संदेह अल्लाह उनसे वाकिफ है, जो वे करते हैं। और ईमान वाली औरतों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी पवित्रता की रक्षा करें और अपने शृंगार को केवल वही दिखाएँ जो सामान्य रूप से दिखाई देते हैं।”
"O Prophet!" Tell the believing men to lower their gaze and guard their chastity. That is purer for them. Surely Allah is All-Aware of what they do.
And tell the believing women to lower their gaze and guard their chastity, and not to reveal their adornments except what normally… https://t.co/1hthQbumVO
उन्होंने आगे लिखा, “~ क़ुरान (24:30-31) यह क़ुरान की एक आयत है… एक ऐसी किताब जिस पर एक अरब से ज़्यादा लोग विश्वास करते हैं। और प्रतीक सिन्हा ने इन अरबों मुस्लिमों की तुलना मुस्लिमों की लिंचिंग और उन पर अत्याचार करने वाली हिंदुत्व ब्रिगेड से की है। मुस्लिमों के प्रति पूर्वाग्रह का स्तर इतना ज्यादा है कि आप उन्हें सिर्फ इसलिए ‘खतरनाक’ कहते हैं क्योंकि वे आस्था रखते हैं।”
जवाब में प्रतीक सिन्हा ने शर्मनाक तरीके से तालिबान और मुस्लिम कट्टरपंथियों की तुलना हिंदुत्व ब्रिगेड से कर दी जबकि दोनों में दूर-दूर तक कोई समानता नहीं है। जहाँ तालिबान ने महिलाओं की शिक्षा और अफगान महिलाओं की नौकरी करने, महरम या परिवार के पुरुषों के बिना सार्वजनिक स्थानों पर घूमने की आजादी पर प्रतिबंध लगा दिया है। वहीं तथाकथित हिंदुत्व ब्रिगेड महिलाओं पर ऐसी कोई प्रतिगामी प्रथा लागू नहीं करती और महिला सशक्तिकरण का जश्न मनाती है।
The reason I am against religion is because it brainwashes people and produces logic like, "If you don’t follow religion, you can’t criticize it."
Every bit of progress the world has seen has come from people who refused to conform to conservative practices, who wrote about… https://t.co/v3GlgkQQVx
इसके अलावा, तालिबान ने भूकंप के मलबे से महिलाओं को बचाने तक की कोशिश नहीं की क्योंकि उनकी शरीयत मान्यताओं के अनुसार पुरुषों को अपनी बीवी के अलावा किसी भी महिला को छूना मना है। इसके उलट, RSS और ‘हिंदुत्व ब्रिगेड’ हमेशा संकट के समय सबसे पहले आगे आकर पुरुषों, महिलाओं, बच्चों और बुज़ुर्गों की मदद करते रहे हैं।
प्रतीक सिन्हा ने लिखा, “असल जिंदगी में जितने भी मुस्लिम पुरुषों को मैं जानता हूँ, वे महिलाओं से बात करते समय अपनी नजरें नहीं झुकाते। साफ है कि वे कुरान को शब्द दर शब्द नहीं मानते। धर्मों का गठन मध्यकाल में हुआ था और उनमें से बहुत कुछ अब अप्रासंगिक हो चुका है, जिसे छोड़ देना चाहिए। आधुनिक देश धर्म के नियमों से नहीं, कानून के शासन से चलते हैं। और यही वजह है कि वर्तमान सरकार में जिस तरह कानून का शासन कमजोर किया जा रहा है, उसके खिलाफ लड़ाई जरूरी है। हाँ, कुछ मुस्लिम पुरुष मजहब कट्टरपंथी होते हैं और मैं उनकी तुलना हिंदुत्व ब्रिगेड से कर रहा हूँ। शायद समझने के लिए कुछ क्लासेस जरूरी हैं, आसिफ।”
All the Muslim men I know in real life don't lower their gaze when they talk to women. Clearly, they don't follow Quran word-by-word. Religions were formed in medieval times, and a lot of it deserves to be discarded because it is not relevant anymore. Modern countries work… https://t.co/ltJJdAVAcA
इसी बीच ‘मुस्लिम पीड़ित’ नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए फेक न्यूज फैलाने वाले मोहम्मद शादाब खान नाम का एक शख्स ने प्रतीक सिन्हा की तुलना बीजेपी के पूर्व फायरब्रांड नेता टाइगर राजा सिंह से कर दी। शादाब खान ने लिखा, “इनको मुस्लिमों से नफरत है, इस्लाम से नफरत है। बस 19-20 का ही फर्क है।”
यहाँ एक और चर्चित इस्लामी कट्टरपंथी वसीम अकरम त्यागी ने भी प्रतीक सिन्हा पर निशाना साधा और लिखा, “बहुत सारे ‘फ्री थिंकर’ इस तस्वीर की आलोचना कर रहे हैं। आलोचना की वजह बस यह है कि महिला पत्रकार के सामने तालिबान सरकार के विदेश मंत्री नजर नीचा करके बात कर रहे हैं, वो उस महिला पत्रकार की आँखों में आँखें डालकर बात क्यों नहीं कर रहे हैं। कमाल है! वो आँखों में आँखें डालकर बात करें तो भी बवाल, और ना करें तब भी बवाल। अगर वो आँखों में आँखें डालकर बात करेंगे तब यही ‘फ्री थिंकर’ उस पर चटखारे लेकर फब्तियाँ कसेंगे! लेकिन अब इसे ‘खतरनाक’ बता रहे हैं।”
बहुत सारे ‘फ्री थिंकर’ इस तस्वीर की आलोचना कर रहे हैं। आलोचना की वजह बस यह है कि महिला पत्रकार के सामने तालिबान सरकार के विदेश मंत्री नज़र नीचा करके बात कर रहे हैं, वो उस महिला पत्रकार की आँखों में आँखें डालकर बात क्यों नहीं कर रहे हैं। कमाल है! वो आँखों में आँखें डालकर बात करें… pic.twitter.com/Lgn12WgdZB
दिलचस्प बात यह है कि Alt News और उसके सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा और मोहम्मद ज़ुबैर को इस्लामी कट्टरपंथियों की नाराजगी का सामना करना पड़ा, जब उन्होंने इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा गढ़ी गई ‘भगवा लव ट्रैप’ साजिश थ्योरी पर रिपोर्टिंग की। वही इस्लामी कट्टरपंथी जो असली और दर्ज लव जिहाद और ग्रूमिंग जिहाद के मामलों को ‘झूठा’ बताकर खारिज कर देते हैं या कभी-कभी उनका जश्न भी मनाते हैं। उन्होंने Alt News की उस रिपोर्टिंग की आलोचना की, जिसमें मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदू लड़कों और उनकी मुस्लिम महिला दोस्तों या पार्टनर्स पर हमले की घटनाओं को कवर किया गया था और इन हमलों को ‘भगवा लव ट्रैप’ कहकर जायज ठहराया गया।
प्रतीक सिन्हा की बार-बार तालिबान की आलोचना को ‘संतुलित’ दिखाने के लिए जबरन हिंदुत्व को घसीटने की कोशिशें किसी काम नहीं आईं।
मजे की बात यह है कि मजबी कट्टरता और महिला विरोधी सोच का बचाव करते हुए पुरुष इस्लामी कट्टरपंथी मुस्लिम महिलाओं को भी नहीं बख्शते। इसी संदर्भ में जब RJ सायमा, जो अक्सर मुस्लिम विक्टिम कार्ड खेलने और अपने हिंदू-विरोधी सोशल मीडिया बयानों को लेकर आलोचना झेलती हैं, उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी महिला से नजरें झुकाकर बात करना तालिबान मंत्री के महिलाओं पर किए गए अत्याचारों को माफ कर देता है?
उन्होंने लिखा, “जो लोग औरतों पर ज़ुल्म की सारी हदें पार कर चुके हैं, क्या उन्हें लगता है कि किसी से नजरें झुकाकर बात करने से उनके गुनाह माफ हो जाएँगे? क्या वे अब अच्छे किरदार वाले लोग बन गए हैं? वाकई, वसीम?”
जिन लोगों ने औरतों के साथ नाइंसाफी की इंतहा की है, वो किसी एक से आँखें झुका के बात कर रहे हैं, इससे उनके गुनाह माफ हो गए? वो अच्छे अख़लाक़ के हो गए? वाक़ई वसीम? https://t.co/C3ehoP1sv9
इसके जवाब में वसीम अकरम त्यागी ने न सिर्फ तालिबान द्वारा अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों पर लगाए गए कट्टरपंथी प्रतिबंधों और उनके शासन में महिलाओं को झेलनी पड़ी तमाम ज़्यादतियों को हल्के में लिया बल्कि तालिबान की महिला-विरोधी नीतियों की तुलना उन देशों से कर दी जो ‘आधुनिक’ संस्कृति के दावे करते हैं।
इस्लामी कट्टरपंथी पूरी तरीके से समर्पण चाहते हैं, आलोचना नहीं
हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब सेक्युलर लिबरल्स को इस्लामो-लेफ्टिस्ट ‘प्रोग्रेसिव’ इकोसिस्टम से बाहर कर दिया गया हो, उन्हें ‘संघी’ कहकर बदनाम किया गया हो या पूरी तरह से किनारे कर दिया गया हो। इसी साल सितंबर में केरल की एक यूनिवर्सिटी में हुए एक कार्यक्रम को लेकर बवाल मच गया था, जहाँ हिजाब पहनी मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों से अलग बैठाया गया, वो भी बिल्कुल तालिबानी अंदाज में।
इस Profcon नाम के इवेंट की जो तस्वीरें और वीडियो ऑनलाइन सामने आए, उन पर प्रतिक्रिया देते हुए रुचिका शर्मा, जो खुद को ‘इतिहासकार’ बताती हैं और जिनका मानना है कि इस्लामी आक्रांताओं के हिंदू-विरोधी अपराधों को सफेदपोश बनाना उनका मिशन है, उन्होंने लिखा, “सिर्फ हिजाब काफी नहीं है, महिलाओं को अलग बैठाओ, पीछे बैठाओ, पर्दे के पीछे रखो। यानी उन्हें सिर्फ औरत होने की सजा दो और इसे ‘उनकी पसंद’ कहकर पेश करो।”
मुस्लिम महिलाओं को जानबूझकर अदृश्य करने की इस आलोचना पर वही इस्लामी कट्टरपंथी, जो रुचिका शर्मा की तारीफ करते नहीं थकते थे, उन्हें ‘ईमानदार’ और ‘बहादुर’ इतिहासकार कहते थे क्योंकि उन्होंने औरंगजेब जैसे मध्यकालीन इस्लामी शासकों के अत्याचारों को हल्का करके पेश किया। अब वही लोग उन्हें ‘इस्लामोफोब’ कहने लगे।
यहाँ तक कि शर्मा को इस्लामोफोब कहने वाले भूल गए कि उन्होंने खुद एक बार यह स्वीकार किया था कि उन्होंने अपने मुस्लिम अब्यूजर का नाम सिर्फ इसलिए नहीं लिया था ताकि ‘संघी’ लोग उस घटना का इस्तेमाल अपने ‘इस्लामोफोबिक सांप्रदायिक एजेंडे’ के लिए न कर सकें।
ठीक इसी तरह, जब इस्लामो-लेफ्टिस्ट प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ से जुड़ी अर्फा खानम शेरवानी ने रुचिका शर्मा की राय का समर्थन किया तो वे भी इस्लामी कट्टरपंथियों के गुस्से से नहीं बच सकीं। उन्हें यह समझाया गया कि इस्लाम में पुरुषों और महिलाओं का आपस में खुलकर मेल-जोल रखना जायज नहीं है।
दरअसल, इस्लामी कट्टरता और मजहब आधारित महिला-विरोधी सोच से कोई भी सुरक्षित नहीं है। इसका असर ऑनलाइन नाराजगी, ‘संघी’ कहकर लेबलिंग, तालिबानी महिला-विरोधी नीतियों और बड़े मामलों में ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारों तक में देखा जा सकता है। इस्लामी कट्टरपंथी न सिर्फ अपने लिबरल सहयोगियों को जरा सी असहमति पर खारिज कर देते हैं बल्कि अपने ही हममजहब लोगों को भी इसलिए निशाना बनाते हैं क्योंकि वे उनके तय किए गए ‘मुस्लिम होने के मानकों’ पर खरे नहीं उतरते।
(मूलरूप से यह खबर अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)
जम्मू कश्मीर में करीब 100 करोड़ के गन लाइसेंस घोटाले में एमएचए ने अहम कदम उठाया है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से तीन अधिकारियों, यशा मुद्गल, शाहिद इकबाल चौधरी और नीरज कुमार को लेकर जानकारी माँगी है। ये कार्रवाई राजस्व सचिव कुमार राजीव रंजन पर राज्य में हथियार लाइसेंस में कथित अनियमितताओं के लिए मुकदमा चलाने की अनुमति देने के दो महीने बाद माँगी गई है।
गन लाइसेंस स्कैम में 8 वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संदेह के घेरे में हैं। अब गृह मंत्रालय ने सीबीआई से पूछा है कि यशा मुर्दल, शाहिद इकबाल और नीरज कुमार समेत तमाम अधिकारियों के खिलाफ हथियार डीलरों से जुड़ने के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं या नहीं। ये घोटाला 2012 से 2016 के बीच 2.74 लाख हथियारों के लाइसेंस को अवैध तरीके से जारी किए जाने को लेकर है।
जम्मू कश्मीर के मुख्य सचिव से पूछा गृह मंत्रालय ने
गृह मंत्रालय में अवर सचिव सीपी विनोद कुमार ने 21 फरवरी 2025 को एक खत जम्मू -कश्मीर के मुख्य सचिव को लिखा है। इसमें बताया गया है कि तीन वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति देने की सिफारिश करने वाले पत्रों के साथ न तो केंद्रीय जाँच ब्यूरो के पत्र/प्रस्ताव और डीवीडी थे और न ही जम्मू-कश्मीर के कानून विभाग की कोई कानूनी राय।
इस घोटाले में 16 पूर्व जिलाधिकारी (13 आईएएस अधिकारी और तीन केएएस अधिकारी) शामिल हैं। इनमें ये तीनों अधिकारी भी शामिल हैं, जिनको लेकर सवाल पूछे गए हैं। सभी पूर्व जिलाधिकारियों पर तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य के अलग-अलग जिलों में तैनाती के दौरान लाखों अवैध हथियारों के लाइसेंस जारी करने के आरोप हैं।
गृह मंत्रालय ने सीबीआई से क्या पूछा
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सीबीआई को गृहमंत्रालय ने 1 सिंतबर 2025 को पत्र लिखा है।
पत्र में ये साफ करने को कहा है कि क्या इन अधिकारियों को अवैध हथियार लाइसेंस जारी करने के बदले आर्थिक फायदा हुआ था। क्या जाँच में किसी आईएएस अधिकारी के आर्म्स डीलरों के साथ साँठ-गाँठ के सबूत मिले हैं। क्या संपत्ति के सौदे या पैसों के लेन-देन के सबूत मिले हैं।
सीबीआई की जाँच में क्या सामने आया
सीबीआई ने अपनी जाँच कर आरोप लगाया कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर ज्यादातर हथियारों के लाइसेंस जारी किए गए। लाइसेंस जारी करने में कई डीलर, बिचौलिए और प्रशासनिक अधिकारियों की संलिप्तता थी। जम्मू कश्मीर प्रशासन ने 2021 में KAS अधिकारियों और क्लर्कों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दे दी थी। इसके बाद सीबीआई ने चार्जशीट दायर की थी। लेकिन आईएएस अधिकारियों का मामला अब तक लंबित है, क्योंकि इसके लिए गृहमंत्रालय से अनुमति की जरूरत है। गृहमंत्रालय इस मामले में काफी फूँक-फूँक कर कदम रख रहा है। कोर्ट के आदेश के बाद गृहमंत्रालय पर फैसला लेने का दबाव भी आ गया है।
जम्मू-कश्मीर गन घोटाला क्या है
2017 में राजस्थान की एंटी टेररिज्म स्क्वाड की एक जाँच में जम्मू कश्मीर में बड़ी संख्या में फर्जी दस्तावेज के आधार पर लाइसेंस जारी करने का पता चला था। इस मामले को सीबीआई को जाँच के लिए सौंपा गया। सीबीआई को पता चला कि 2012 से 2016 तक के बीच 2.74 लाख हथियारों के लाइसेंस जारी किए गए थे। इनमें से 95 फीसदी वे लोग थे, जो जम्मू-कश्मीर के निवासी नहीं थे। यहाँ तक कि उनका राज्य से कोई लेना-देना नहीं था।
सीबीआई के मुताबिक, ये लाइसेंस सेना, अर्धसैनिक बलों और दूसरे बाहरी लोगों को पैसों की लेन-देन के बाद जारी किए गए।
इस मामले में 9 आईएएस अधिकारियों के खिलाफ जाँच की गई। इनमें से 8 वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों पर अभियोजन की अनुमति गृहमंत्रालय ने दी। ये सभी अधिकारी 2012 से 2016 के बीच जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में पदस्थापित थे।
जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस अरुण पाली और जस्टिस राजनेश ओसवाल की खंडपीठ ने इस मामले में गृहमंत्रालय से 6 हफ्तों में फैसला लेने को कहा था कि इन आईएएस अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दी जाएगी या नहीं। इसको देखते हुए गृहमंत्रालय ने जम्मू कश्मीर के उच्चाधिकारी को पत्र लिखा है।
हाईकोर्ट में इससे संबंधित एक जनहित याचिका शेख मोहम्मद शफी और अन्य ने दायर की थी। याचिका में कहा गया है कि आरोपित अधिकारी अभी भी राज्य के उच्च पदों पर पदस्थापित हैं और अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए कोर्ट उन पर निगरानी रखे।
राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर ये मामला काफी अहम है। ये कोई प्रशासनिक गलती भी नहीं है, बल्कि जम्मू कश्मीर प्रशासन की छवि से जुड़ा मामला है। गृहमंत्रालय अब इस पर जल्दी निर्णय लेने के मोड में आ गई है।
महिलाओं की सुरक्षा और अधिकार के क्षेत्र में महिला मुख्यमंत्री का राज्य आदर्श होना चाहिए। लेकिन ममता बनर्जी की अगुवाई वाली पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं है। लगातार हो रहे यौन अपराध की घटनाएँ और हाल ही में प्रकाशित नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की रिपोर्ट दर्शाती है कि राज्य सरकार महिलाओं की सुरक्षा को कमतर आँकती है।
दुर्गापुर में हुए एमबीबीएस की दूसरी वर्ष की छात्रा के साथ गैंगरेप के मामले में अब तक अपू बाउरी, फिरदौस शेख और शेख रिजाउद्दीन समेत 5 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। पीड़िता के पिता ने कहा है कि पश्चिम बंगाल में उनकी बेटी सुरक्षित नहीं है। उनका विश्वास टूट गया है और हम यहाँ नहीं रहना चाहते। उनका कहना है कि उनकी बेटी अपनी आगे की शिक्षा ओडिशा में पूरा करेगी। उन्होंने कहा है कि बंगाल में ‘औरंगजेब का शासन’ है।
#WATCH | Paschim Bardhaman, West Bengal | Father of the Durgapur alleged gangrape victim, says, "… She is unable to walk and is on bedrest. The Chief Minister, DG, SP, and Collector are all helping us a lot and regularly enquiring about her health… I have requested the Chief… pic.twitter.com/W4u54SMnwl
विश्वास का टूटना कोई आश्चर्य में डालने वाली बात नहीं है। कुछ महीने पहले ही कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में एमबीबीएस की छात्रा के साथ दर्दनाक तरीके से रेप और हत्या की खबर सामने आई थी। वर्तमान स्थिति में सबसे खराब बात ये है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस मामले पर तुरंत कार्रवाई करना तो दूर, पीड़िता को ही दोषी ठहराने और राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को कम करके आँकने की कोशिश की।
जिम्मेदारी से बचने के लिए पीड़िता को दोषी ठहराना? पश्चिम बंगाल की महिला मुख्यमंत्री की असंवेदनशीलता को दर्शाता है। हालाँकि मुख्यमंत्री बनर्जी ने हमले पर दुख व्यक्त किया और अपराधियों के खिलाफ ‘कड़ी कार्रवाई’ का वादा भी किया, लेकिन अंत में उन्होंने पीड़िता को ही अपने साथ हुई क्रूरता के लिए दोषी ठहरा दिया। उन्होंने कहा, “पीड़िता को रात के 12.30 बजे परिसर से बाहर कैसे जाने दिया गया? निजी संस्थान को इसकी अनुमति नहीं देनी चाहिए… लड़कियों को रात में बाहर (कॉलेज) जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उन्हें अपनी सुरक्षा भी करनी होगी।”
हालाँकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का यौन उत्पीड़न के मामलों को कम करके आँकने वाली टिप्पणियाँ करने का शर्मनाक रिकॉर्ड रहा है। पिछले कुछ वर्षों में, बनर्जी और उनकी तृणमूल कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ सदस्यों को बलात्कार की घटनाओं पर अपनी असंवेदनशील प्रतिक्रियाओं के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है।
साल 2012 का पार्क स्ट्रीट सामूहिक बलात्कार सबसे चर्चित रहा। 6 फरवरी, 2012 को कोलकाता के पार्क स्ट्रीट से घर लौट रही एक एंग्लो-इंडियन महिला सुज़ेट जॉर्डन के साथ चलती कार में 5 लोगों ने बलात्कार किया था। खबर सामने आने के तुरंत बाद, टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने आरोपितों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। उन्होंने इस घटना को ‘शजानो घोटोना’ (मनगढ़ंत घटना) करार दिया था, जो कथित तौर पर ‘सरकार को बदनाम करने के लिए रची गई’ थी।
टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार सहित उनकी पार्टी के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाया और इस घटना को ‘एक महिला और उसके मुवक्किल के बीच गलतफहमी’ बताया। 2015 में कोलकाता की एक अदालत ने इस मामले के तीन आरोपितों को दोषी ठहराया, जिससे यह साबित हुआ कि हमला वास्तव में हुआ था।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में राज्य में बलात्कार के बढ़ते मामलों पर एक बहस के दौरान, 2013 में मुख्यमंत्री ने यह आरोप लगाया था कि यह राज्य की जनसंख्या में वृद्धि के कारण है। उन्होंने बलात्कार के बढ़ते मामलों के लिए आधुनिकीकरण, शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स की बढ़ती संख्या को भी जिम्मेदार ठहराया था।
2024 के संदेशखली दंगों के दौरान भी, ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के गुंडों द्वारा महिलाओं के उत्पीड़न और यौन शोषण को ‘मामूली घटना’ बताकर कमतर आँकने की कोशिश की थी। ममता बनर्जी ने कहा, “इसके बाद, कुछ मीडिया संस्थानों ने इस घटना का फ़ायदा उठाया। एक मामूली घटना को लेकर शोर मचाया।”
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों को ‘मामूली घटना’ बताया। एनसीआरबी के आँकड़े राज्य की स्थिति को उजागर करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने हाल ही में वर्ष 2023 के लिए अपनी ‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में बताया गया है कि पश्चिम बंगाल में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और विशेष एवं स्थानीय कानूनों (एसएलएल) के तहत महिलाओं के खिलाफ अपराधों के 34,691 मामले दर्ज किए गए। यह देश में किसी भी राज्य में हुए महिलाओं के प्रति अपराध की सबसे ज्यादा मामलों में एक है। हालाँकि यह 2022 के 34,738 मामलों से थोड़ा कम है।
राज्य में क्राइम रेट हर एक लाख महिलाओं में 71.3 है। राज्य की जनसंख्या 48.64 मिलियन यानी 4.864 करोड़ है।
कुल मिलाकर ममता बनर्जी की टीएमसी सरकार कुछ खास तरह की हिंसा में देश में सबसे आगे है। राज्य में 2023 में विदेशियों द्वारा किए गए अपराधों की सबसे अधिक दर्ज की गई। विदेशी अधिनियम, 1946 और विदेशियों के पंजीकरण अधिनियम, 1939 के तहत ये मामले दर्ज किए गए।
वर्ष 2023 में, पश्चिम बंगाल में विदेशियों ने 1,021 आपराधिक मामले दर्ज किए गए। इन दोनों अधिनियमों के तहत 989 मामले दर्ज किए गए, जबकि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट 1985 के तहत 7 मामले, आर्म्स एक्ट 1959 के तहत दो मामले दर्ज किए गए। विदेशियों से जुड़े कुछ मामले धोखाधड़ी, मानव तस्करी जैसे अपराधों के तहत दर्ज किए गए।
2023 में, भारत में एसिड हमलों के 207 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से अकेले पश्चिम बंगाल में 57 मामले सामने आए। एनसीआरबी के आँकड़ों से पता चला है कि एसिड हमलों के 57 मामलों में पश्चिम बंगाल में 60 पीड़ित थे, जबकि देश भर में 207 मामलों में 220 पीड़ित थे।
एनसीआरबी के आँकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2023 में देश भर में हुए सभी एसिड हमलों में से 27.5% अकेले पश्चिम बंगाल में दर्ज किए गए। 2022 में, देश भर में हुए 202 मामलों में से, पश्चिम बंगाल में 48 एसिड हमले दर्ज किए गए, जिनमें 52 पीड़िता थी। इसमें बंगाल 2018 से देश में सबसे आगे है। एनसीआरबी के आँकड़ों के अनुसार, देश भर में एसिड हमलों के सभी मामलों में 267 गिरफ्तारियाँ हुईं और गिरफ्तार लोगों में 246 पुरुष और 21 महिलाएँ थीं।
पश्चिम बंगाल में 2023 में बलात्कार/सामूहिक बलात्कार के साथ हत्या के 7 मामले, दहेज हत्या के 350 मामले और महिलाओं को आत्महत्या के लिए उकसाने की 419 घटनाएँ दर्ज की गईं।
पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा किए गए क्रूरता से जुड़े आईपीसी की धारा 498 ए के तहत दर्ज मामलों में पश्चिम बंगाल दूसरे स्थान पर है। यहाँ 19698 मामले दर्ज किए गए और 20462 पीड़ित हैं। देश भर में पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता से संबंधित कुल 128814 मामले दर्ज किए गए। इनमें उत्तर प्रदेश 19889 मामलों के साथ सबसे आगे रहा।
कुल मिलाकर, ‘पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता’ के मामलों में सबसे ज़्यादा 29.8% (1.33 लाख मामले) मामले दर्ज किए गए, जिनमें 1.35 लाख पीड़ित शामिल थे। इस श्रेणी में वर्ष 2022 में ऐसे अपराधों का हिस्सा 31.4% था।
इस बीच, पश्चिम बंगाल में वर्ष 2023 में धारा 364ए के तहत फिरौती के लिए अपहरण के 17 मामले और 18 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को शादी के लिए मजबूर करने (आईपीसी की धारा 366) के तहत अपहरण के 515 मामले दर्ज किए गए। नाबालिगों के मामले में पश्चिम बंगाल में यह संख्या 390 थी। जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में सबसे ज़्यादा नाबालिगों के साथ अपराध दर्ज की गईं।
महिलाओं के अपहरण और अपराध की (आईपीसी की धारा 363ए, 365, 367, 368, 369) के तहत, देश भर में 7964 मामले दर्ज किए गए। इनमें पश्चिम बंगाल में सबसे ज़्यादा 2054 घटनाएँ दर्ज की गईं। इस बीच, पश्चिम बंगाल में महिलाओं के अपहरण कुल संख्या 6544 रही, जो देश में सबसे ज़्यादा है।
एनसीआरबी रिपोर्ट के राज्यों के आँकड़ों से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में बलात्कार की 1110 घटनाएँ दर्ज की गईं। इनमें 1112 पीड़िताएँ थीं। इनमें से 917 मामलों में अपराधी पीड़िता के परिचित थे, 27 मामलों में अपराधी परिवार के सदस्य, 11 दोस्त/ऑनलाइन दोस्त/लाइव पार्टनर थे, और 193 मामलों में अपराधी पीड़िताओं के लिए अजनबी या अज्ञात थे।
‘बलात्कार के प्रयास’ अपराध श्रेणी में, पश्चिम बंगाल दूसरे स्थान पर था, जहाँ 825 मामले दर्ज किए गए, जिनमें सभी पीड़िताएँ 18 वर्ष से अधिक आयु की थीं। इस श्रेणी में राजस्थान सबसे आगे रहा, जहाँ 845 मामले दर्ज किए गए।
‘महिलाओं की गरिमा भंग करने के इरादे से उन पर हमला’ श्रेणी में, पश्चिम बंगाल में 2023 में 2487 पीड़िताओं से जुड़े 2479 मामले दर्ज किए गए। वहीं, ‘महिलाओं की गरिमा का अपमान’ श्रेणी में पश्चिम बंगाल के आंकड़े 412 थे। महिलाओं के खिलाफ आईपीसी के तहत कुल अपराध 31928 थे, जो देश में सबसे अधिक हैं।
पश्चिम बंगाल में वर्ष 2023 में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) के तहत 2721 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 1798 मामले बच्चों के साथ बलात्कार (POCSO अधिनियम की धारा 4 और 6/आईपीसी की धारा 376) से संबंधित थे, 644 घटनाएँ बच्चों के यौन उत्पीड़न (POCSO अधिनियम की धारा 8 और 10/आईपीसी की धारा 354) से संबंधित थीं और 244 घटनाएँ यौन उत्पीड़न (POCSO अधिनियम की धारा 12/आईपीसी की धारा 509) के थे।
पश्चिम बंगाल में पोर्नोग्राफी के लिए बच्चों का इस्तेमाल/बाल पोर्नोग्राफी सामग्री रखने (POCSO अधिनियम की धारा 14 और 14) के 29 मामले दर्ज किए गए।
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के मामलों में 125 घटनाएँ ऐसी मिलीं जो झूठी पाई गई। 1165 मामले ऐसे थे जिनमें मामले कानून या दीवानी विवाद के रूप में समाप्त हुए। पश्चिम बंगाल पुलिस ने 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 34344 मामलों का निपटारा किया, जिनमें लंबित मामलों की दर 23.2% रही।
एनसीआरबी की रिपोर्ट में दिए गए तथ्य और आँकड़े बताते हैं कि घरेलू हिंसा और अपहरण की घटनाएँ अभी भी प्रमुख हैं, जो 2023 में दर्ज घटनाओं में 75% से अधिक हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या न केवल पश्चिम बंगाल में, बल्कि दूसरे राज्यों में भी कहीं अधिक हो सकती है। आँकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में सजायाफ्ता दर केवल 3.7% है, जो राष्ट्रीय दर 21.3% से काफी कम है। 3,68,000 से अधिक लंबित मामलों की संख्या स्थिति को और भी बदतर बना देती है, हालाँकि पश्चिम बंगाल में आरोप-पत्र दाखिल करने की दर अच्छी है।
एनसीआरबी की भारत में अपराध 2023 रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर प्रति लाख महिला जनसंख्या पर 71.3 है, जो राष्ट्रीय औसत 65.3 मामलों के काफी अधिक है।
Every time an unfortunate incident makes headlines, @BJP4India is first in line, not to act, but to politicise, lecture, and spin it into slogans. Yet their own Home Ministry’s NCRB 2023 report has exposed their favourite fiction: women’s safety under @narendramodi.
इन आँकड़ों के बावजूद, पश्चिम बंगाल सरकार ने अपनी पीठ थपथपाने और कोलकाता को महिलाओं के लिए ‘सबसे सुरक्षित शहर’ बता रही है। हालाँकि, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष अर्चना मजूमदार ने तृणमूल कॉन्ग्रेस पर एनसीआरबी के आँकड़ों को ‘गलत तरीके से पेश करने’ का आरोप लगाया और कहा कि पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराधों से संबंधित लगभग 4 लाख मामले लंबित हैं, जो भारत में सबसे ज़्यादा हैं, और जिनमें न तो कोई कार्रवाई हुई है और न ही कोई दोषी साबित हुआ है।
उन्होंने कहा, “यह एनसीआरबी के आँकड़ों की आधी-अधूरी व्याख्या और गलत व्याख्या है… 2023 में, राज्य सरकार ने महिलाओं के खिलाफ अपराध पर अपनी रिपोर्ट पेश की। इसमें पश्चिम बंगाल में चार लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं, जिनमें किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया है या कोई कार्रवाई नहीं की गई है। यह देश में सबसे ज़्यादा है… पुलिस प्रशासन इन पर काम नहीं कर रहा है। प्रशासन और पुलिस के असहयोग के कारण न्यायपालिका भी विफल हो रही है। वे समय पर आरोप-पत्र दाखिल नहीं कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में यह सब चल रहा है, और वे तथ्य छिपा रहे हैं… यह तो बस एक छोटी सी बात है… ये कुछ मामले हैं।”
आरजी कर मामले के जख्म अभी भरे भी नहीं हैं उससे पहले दुर्गापुर में मेडिकल कॉलेज की छात्रा से गैंगरेप की खबर आ गई। बीरभूम में भी ऐसी ही घटनाएँ सामने आईं और स्थानीय पुलिस की निष्क्रियता की दिखी, फिर भी टीएमसी खुद की पीठ थपथपा रही है। जाहिर है, टीएमसी पर राजनीतिक हमले के लिए महिला सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। इसलिए ममता सरकार जवाबदेही से बचने की कोशिश में इसे ‘मामूली मुद्दा’ बता देती है।
(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में बनी है। इसे देखने के लिए यहाँ क्लिक करें)
उत्तर प्रदेश के जिला अलीगढ़ के जवाँ कस्बे में रहने वाले 20 वर्षीय करन की फेसबुक पोस्ट से नाराज मोहम्मद असद ने बेरहमी से हत्या कर दी। पहले से नाराज असद ने करन को बात करने के बहाने घर के बाहर बुलाया और फिर उसे मामूली कहासुनी के बाद पास के ही खंडहर पड़े अपने मकान में खींचकर ले गया। इसके बाद असद ने दोस्तों के साथ मिलकर करन का पहले तो सिर दीवार में मारा, फिर चाकू से गले को काटा और फिर शरीर पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर उसे मौत के घाट उतार दिया।
बड़े भाई की चीखपुकार सुन घर से बाहर आए 12 वर्षीय छोटे भाई के शोर मचाने पर सभी आरोपित मौके से भाग गए। हैरानी की बात ये कि करन की हत्या करने के बाद असद सीधे पास के पुलिस स्टेशन पहुँचा और फिर उसने थाने के नल पर अपने खून से सने हाथ-पैर धोए और अंदर पुलिस को जाकर बोला कि मैं हत्या करके आया हूँ।
आरोपित के कबूलनामे को सुन पुलिस ने असद को हिरासत में लिया और घटनास्थल की ओर दौड़ी। पीड़ित माँ महारानी ने लिखित शिकायत में बताया कि शनिवार(11 अक्टूबर) रात करीब साढ़े 9 बजे मेरे बेटे करन को मौहल्ले का ही निवासी इदरीश पुत्र अब्दुल कलाम बहाने से अपने घर ले गया। इसके बाद करीब साढ़े 11 बजे इदरीश, नफीश खाँ, असद, अयान, अनश, अरमान, अल्तमश और चाँद ने मिलकर मेरे बेटे की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी।
वहीं रविवार सुबह होते ही करन की हत्या को लेकर हिंदुओं में आक्रोश फैल गया। पोस्टमार्टम के बाद जवां पहुँचे शव का परिजनों ने दाह संस्कार करने से इंकार कर दिया और देखते ही देखते हजारों की सँख्या में भीड़ इकट्ठा हो गई। महिलाओं ने मुरादाबाद हाईवे बाईपास को जाम कर दिया। जब पुलिस ने उन्हें हटाने का प्रयास किया तो गुस्साई भीड़ ने पुलिस की गाड़ियों पर पथराव कर दिया।
लोगों के गुस्से को देख पुलिस के हाथ पैर फूल गए। गुस्साए लोग पीड़ित परिवार को आर्थिक मदद और आरोपितों के घर पर बुलडोजर चलाने की माँग पर अड़े रहे। पुलिस से मिली लिखित आश्वासन के बाद ही शाम को गुस्साई भीड़ सड़क से हटी और फिर परिजन शव को दाह सँस्कार के लिए ले गए।
अहेरिया समाज से आने वाले करन तीन भाईयों में दूसरे नंबर का था। सबसे बड़े भाई अपनी पत्नी के साथ पंजाब में रहते हैं। करन नोएडा में मजदूरी करता था और माँ गाँव में 12 वर्षीय छोटे बेटे सनी संग रहती थी। पिता मेघ सिंह की करीब 10 वर्ष पूर्व सीढ़ियों से गिरकर मौत हो गई थी। करन की माँ महारानी ने बिलखते हुए बताया कि जब से गली में मँदिर बना है, तब से यह(असद का परिवार) लोग हमारे परिवार से खुन्नस मानते आ रहे हैं। इसी खुन्नस में खुद असद ने उनके बेटे को नोएडा से बहाने से बुलाकर हत्या की।
मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक, मौहल्ले में अहेरिया समाज की आबादी अधिक है। जबकि मुस्लिम परिवार कुछ ही सँख्या में हैं। कुछ वर्ष पहले अहेरिया समाज ने मिलकर एक मँदिर का निर्माण कराया था। तब आरोपित असद के परिवार और अन्य मुसलमानों ने मंदिर निर्माण का विरोध किया था। तभी से असद का परिवार करन के परिवार से खुन्नस मानता है।
अलीगढ़ पुलिस ने बताया कि पुलिस तो करन की हत्या की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची। मामले में मिली तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर मुख्य आरोपित सहित सभी आठ आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है। शांति व्यवस्था के लिए बड़ी संख्या में कस्बे में पुलिस बल तैनात किया गया है। फिलहाल मौके पर शांति है। हालाँकि अलीगढ़ पुलिस ने अभी तक इस बात का खुलासा नहीं किया है कि आखिर करन की हत्या किस बात पर हुई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 साल पूरे होने का जश्न अभी थमा भी नहीं था कि कर्नाटक की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे और राज्य के मंत्री प्रियाँक खरगे ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को एक पत्र लिखकर सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, पार्कों और मंदिरों में आरएसएस की शाखाओं और कार्यक्रमों पर पूरी तरह बैन लगाने की माँग की है।
खरगे का कहना है कि संघ की ये गतिविधियाँ बच्चों और युवाओं के दिमाग में नकारात्मक और विभाजनकारी विचार भर रही हैं, जो देश की एकता और संविधान के खिलाफ है। ये पत्र 4 अक्टूबर को लिखा गया था, लेकिन 12 अक्टूबर को सीएम ऑफिस ने इसे मीडिया के साथ साझा किया।
सिद्धारमैया ने तुरंत राज्य की मुख्य सचिव शालिनी राजनिश को निर्देश दिए कि इस मामले की पूरी जाँच करें और जरूरी कदम उठाएँ। इससे साफ लग रहा है कि कर्नाटक सरकार में आरएसएस के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की तैयारी चल रही है।
लेकिन ये सिर्फ एक पत्र की बात नहीं है। सोशल मीडिया पर वामपंथी, सेकुलर पार्टियाँ और कुछ इस्लामी कट्टरपंथी धड़े मिलकर आरएसएस को बैन कराने की मुहिम चला रहे हैं। एक तरफ जहाँ संघ समाज को एकजुट करने का काम कर रहा है, वहीं विपक्षी ताकतें इसे खत्म करने पर तुली हुई हैं। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
प्रियाँक खरगे ने पत्र में क्या लिखा है और क्यों?
प्रियाँक खरगे कर्नाटक सरकार में आईटी, ग्रामीण विकास और पंचायत राज मंत्री हैं। वो चित्तापुर से विधायक भी हैं। उनके पिता मल्लिकार्जुन खरगे कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, जो खुद दलित समुदाय से आते हैं और संघ की विचारधारा के पुराने आलोचक रहे हैं। प्रियाँक ने पत्र में साफ-साफ आरोप लगाया है कि आरएसएस सरकारी स्कूलों, सहायता प्राप्त संस्थानों, खेल के मैदानों, सार्वजनिक पार्कों, धार्मिक ट्रस्टों के मंदिरों और पुरातत्व विभाग के स्थलों पर बिना अनुमति के शाखाएँ चला रही है।
खरगे ने लिखा, “आरएसएस की शाखाओं में लाठी लेकर नारे लगाए जाते हैं, जो बच्चों और युवाओं के मन में नफरत का बीज बोते हैं। ये गतिविधियाँ संविधान की मूल भावना एकता, समानता और अखंडता के खिलाफ हैं। जब समाज में नफरत फैलाने वाली ताकतें सिर उठाती हैं, तो हमें उन्हें रोकने का अधिकार है।” प्रियाँक ने आगे कहा कि देश के बच्चों, युवाओं और समाज के मानसिक स्वास्थ्य के हित में इन सभी गतिविधियों चाहे शाखा हो, संघिक हो या बैठक, इन पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।
Karnataka Minister Priyank Kharge writes a letter to CM Siddaramaiah, urging that permission to conduct RSS programs in government school and college grounds should not be granted. He has also appealed to CM Siddaramaiah that RSS programs should not be allowed in public parks and… pic.twitter.com/pqt76hk5Kw
ये माँग सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं लग रही। जुलाई 2025 में प्रियाँक ने ही एक बयान दिया था कि अगर कॉन्ग्रेस केंद्र में सत्ता में आती है, तो पूरे देश में आरएसएस पर बैन लगा देंगे। वो बोले थे, “कानूनी प्रक्रिया के तहत हम ऐसा करेंगे।” ये बयान वायरल हो गया था और बीजेपी ने इसे ‘हिंदू-विरोधी’ बताकर हमला बोला था। अब ये पत्र उसी दिशा में एक कदम लग रहा है।
आरएसएस का इतिहास: तीन बार बैन, लेकिन हर बार लौटा और मजबूत हुआ
आरएसएस की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। इसका मकसद था समाज को संगठित करना, अनुशासन सिखाना और राष्ट्रभक्ति जगाना। लेकिन स्वतंत्र भारत में इसे तीन बार बैन का सामना करना पड़ा – तीनों बार कॉन्ग्रेस की सरकारों ने ऐसा किया।
पहला बैन: 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या के बाद। नाथूराम गोडसे के आरएसएस से जुड़े होने की बात कही गई (हालाँकि बाद में जाँच में साफ हो गया कि संगठन का इससे कोई लेना-देना नहीं था)। सरदार पटेल ने 4 फरवरी 1948 को बैन लगाया। पटेल ने लिखा था कि आरएसएस की गतिविधियाँ ‘विभाजनकारी’ हैं और देश की सुरक्षा के लिए खतरा। लेकिन 18 महीने बाद 12 जुलाई 1949 को बैन हट गया।
दूसरा बैन: 1975 में इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी के दौरान। आरएसएस को ‘अवैध संगठन’ घोषित कर दिया गया। लाखों स्वयंसेवकों को जेल हुई। लेकिन इमरजेंसी खत्म होते ही 1977 में बैन हटा। इसी दौर में संघ ने भूमिगत आंदोलन चलाया, जो आजादी की लड़ाई जैसा था।
तीसरा बैन: 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद। तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल पर बैन लगाया। लेकिन ट्रिब्यूनल में कोई सबूत न मिलने पर 1993 में बैन हट गया।
इन बैनों के बावजूद आरएसएस ने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया। इसके उलट उसने देश के संकटों में हमेशा मदद की। 1962 के भारत-चीन युद्ध में स्वयंसेवकों ने बॉर्डर पर तैनाती की। 1971 के बांग्लादेश युद्ध में शरणार्थियों की मदद की। कोविड-19 में लाखों लोगों को भोजन, दवा पहुँचाई। 2024 में मोदी सरकार ने सरकारी कर्मचारियों पर 1966 से चले आ रहे आरएसएस गतिविधियों के बैन को हटा दिया। आज संघ के 1 लाख से ज्यादा शाखाएँ हैं, जो 50 हजार से ज्यादा जगहों पर चल रही हैं।
क्यों हो रही है ये मुहिम? चिढ़ की राजनीति या कुछ और?
अब सवाल ये कि आखिर ये सब क्यों हो रहा है? प्रियाँक का पत्र तो बस एक ट्रिगर है। असल में वामपंथी, कथित सेकुलर पार्टियाँ और कुछ इस्लामी कट्टरपंथी धड़े आरएसएस से चिढ़ते हैं। वजह? संघ आज उनसे कहीं बड़ा हो चुका है। 100 साल बाद भी ये संगठन समाज से कटने की बजाय और गहरा रहा है। हिंदू समाज को एकजुट कर रहा है, बिना किसी भेदभाव के। दलित, आदिवासी, पिछड़े सबको साथ लेकर चलता है।
सोशल मीडिया पर देखिए। #BanRSS जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। वामपंथी हैंडल्स जैसे CPI(M) के समर्थक लिख रहे हैं कि “आरएसएस फासीवादी है, इसे कुचलो।”
कुछ सेकुलर पेज बाबरी और गाँधी हत्या के पुराने मुद्दे गढ़ रहे हैं। PFI जैसे बैन संगठनों से जुड़े इस्लामी कट्टरपंथी ग्रुप्स चुपके से इसे बढ़ावा दे रहे हैं।
एक कथित एक्टिविस्ट संदीप ट्विटर पर लिख रहा है, “आरएसएस को बैन कराने के लिए संगठित अभियान चलाओ। सबूत जमा करो।” उसके पोस्ट्स में हजारों रीट्वीट्स हैं। ये मुहिम बिना किसी ठोस सामाजिक, राजनीतिक या कानूनी आधार के चल रही है।
कॉन्ग्रेस को खास समस्या ये है कि आरएसएस ने हमेशा सकारात्मक भूमिका निभाई। विभाजन के दौरान हिंदू शरणार्थियों की रक्षा की। प्राकृतिक आपदाओं में सबसे आगे रहता है। लेकिन विपक्षी ताकतें इसे ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का नाम देकर बदनाम करना चाहती हैं। प्रियाँक का पत्र हास्यास्पद लगता है क्योंकि अगर सरकारी जगहों पर बैन लगेगा, तो कॉन्ग्रेस की रैलियाँ, वामपंथियों की मीटिंग्स, सब पर क्या असर पड़ेगा? ये तो समाज की मूल कार्यप्रणाली के खिलाफ है।
बीजेपी ने इस पर तीखा पलटवार किया है। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा, “नेहरू, इंदिरा, सोनिया – सबने बैन लगाने की कोशिश की, सब फेल हो गए। प्रियाँक कौन होते हैं?”
कर्नाटक बीजेपी चीफ बीवाई विजयेंद्र बोले, “कॉन्ग्रेस अपनी नाकामियों से ध्यान भटकाने के लिए ये कर रही है। आरएसएस की लोकप्रियता उन्हें चुभ रही है।”
एक लड़के का सुसाइड: शोषण के आरोप और हकीकत
इस मुहिम को हवा देने के लिए एक और घटना का सहारा लिया जा रहा है। एक लड़के ने सुसाइड कर लिया और उसके सुसाइड नोट में लिखा कि आरएसएस के शिविर में शोषण हुआ था। ये खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। वामपंथी और कॉन्ग्रेस समर्थक इसे भुनाने में जुटे हैं। लेकिन जाँच में साफ हो गया कि लड़के का संघ से कोई सीधा संबंध नहीं था। ये अफवाहें फैलाई जा रही हैं ताकि संघ की छवि खराब हो। संघ के शिविर तो लाखों युवाओं को अनुशासन और सेवा का पाठ पढ़ाते हैं। ऐसे आरोप बिना सबूत के लगाना अन्याय है।
समाज से कटते विपक्षी, बढ़ता संघ का विस्तार
दरअसल, असली चिढ़ की वजह ये है कि कॉन्ग्रेस और वामपंथी समाज से कटते जा रहे हैं। उनकी रैलियाँ तो सार्वजनिक जगहों पर होती हैं, लेकिन वो समाज की जड़ों तक नहीं पहुंच पाते। जबकि आरएसएस 100 साल बाद भी बढ़ रहा है। गाँव-गाँव में शाखाएँ, सेवा कार्य, आपदा राहत, ये सब समाज को घोल-मिल रहा है। दलित एकता के कार्यक्रम जैसे समरसता संनाद चलाता है। महिलाओं के लिए संघिका शाखाएं हैं। ये सब देखकर विपक्ष जलता है।
कर्नाटक में ये मुहिम राज्य की आंतरिक कलह से भी जुड़ी लग रही। डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया के बीच सीएम पद की जंग चल रही है। महिलाओं पर अपराध बढ़ने, मातृ मृत्यु दर ऊँची होने जैसे मुद्दों पर सरकार घिरी हुई है। ऐसे में आरएसएस बैन का मुद्दा ध्यान भटकाने का हथियार बन गया। लेकिन जनता समझदार है।
बैन की धमकी, लेकिन संघ अटल
ये सब देखकर लगता है कि आरएसएस पर बैन की माँग राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है। कोई कानूनी आधार नहीं, बस चिढ़। संघ ने कभी सत्ता की भूख नहीं की, लेकिन सेवा से सबका दिल जीता। अगर कर्नाटक में बैन लगा भी, तो इतिहास गवाह है कि संघ और मजबूत लौटेगा। समाज को एकजुट करने वाला संगठन कभी खत्म नहीं हो सकता। ये मुहिम असफल होगी, जैसे पहले हुईं। जनता तय करेगी कि कौन सही है- नफरत फैलाने वाले या पूरे समाज को एकता के सूत्र में पिरोने वाले।
उत्तर प्रदेश के लखनऊ में समाजवादी पार्टी (सपा) कार्यकर्ता मोहम्मद फरहान हुसैन ने नाबालिग हिंदू लड़की को ‘ग्रूमिंग जिहाद’ में फँसाया। फरहान ने नाबालिग को इस्लाम के प्रति इस तरह से ब्रेनवॉश किया कि वह रोजा और कुरान को मानने लग गई। यहाँ तक कि फरहान ने नाबालिग को घर से भगाने की भी पूरी साजिश रची।
नाबालिग के भाई ने लखनऊ के सादत गंज में आरोपित फरहान हुसैन और उसके अब्बा इसरार हुसैन के खिलाफ छल, शोषण, धर्मांतरण और लव जिहाद मामले में 12 अक्टूबर 2025 को शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत पर संज्ञान लेते हुए पुलिस ने संबंधित धाराओं में FIR दर्ज की है। इस FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास भी उपलब्ध है।
नाबालिग रोजे और कुरान की बातें करने लगी, फरहान ने घर में चोरी भी करवाई
पीड़िता के भाई के बयान पर दर्ज FIR में बताया गया कि साल 2023 में फरहान हुसैन ने उनकी नाबालिग बहन की मासूमियत का फायदा उठाकर झूठे प्रेम जाल में फँसाया। हुसैन ने पीड़िता का इस हद तक ब्रेनवॉश किया कि वह घर में केवल कुरान और रोजे रखने की बातें करने लगी।
शिकायत में भाई ने बताया कि उनकी नाबालिग बहन ने फरहान हुसैन के कहने पर घर से नगदी और जेवर चुराए। इसकी शिकायत जब घर के नजदीकी थाने में की तो सामने आया कि इसके पीछे फरहान का हाथ है। फरहान ने ही उनकी बहन को भगाने की साजिश के तहत उसे इस चोरी के लिए उकसाया।
इतना ही नहीं पीड़िता के भाई ने बताया कि कई बार बहन के पास से ताबीज, अँगूठी जैसी असामान्य वस्तुएँ भी मिली हैं। भाई ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि फरहान ने उसका पूरी तरीके से ब्रेनवॉश कर लिया है। अब उनकी बहन का परिवार के प्रति आक्रामक व्यवहार हो गया है और उसने दूरी बना ली है।
फरहान हुसैन ने पीड़ित परिवार को दी धमकी
मामले में दर्ज FIR के अनुसार, नाबालिग लड़की के परिवार ने पहले भी कई बार पुलिस से फरहान की शिकायत की है। इस पर फरहान ने परिवार को धमकी दी कि उसके मजहब के लोगों कि संख्या ज्यादा है इसीलिए उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा।
पीड़िता के भाई ने कहा कि फरहान हुसैन का पहले भी कई हिंदू लड़कियों से संबंध रहा है। वह उन लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाकर पैसे ऐंठ चुका है। भाई ने आरोप लगाया कि ऐसे ही फरहान उनकी बहन को भी लव जिहाद में फँसा रहा है। उन्होंने शक जताया है कि फरहान ने शारीरिक और मानसिक शोषण भी किया है।
FIR के मुताबिक, पीड़ित परिवार ने माँग की है कि फरहान हुसैन और उसके अब्बा इसरार हुसैन के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए। साथ ही नाबालिग बहन की सुरक्षा के लिए कदम उठाए जाएँ। पीड़ित परिवार ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लव जिहाद की सख्त नीति के अनुसार कार्रवाई की जाए।
पुलिस की कार्रवाई
FIR के मुताबिक, पुलिस ने फरहान हुसैन के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 49, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 351(2), उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 5(1) की धाराओं के तहत आरोपित बनाया है।
पुलिस ने मामले में आरोपित फरहान को गिरफ्तार कर लिया है।
सपा के बड़े नेताओं के साथ तस्वीरें वायरल
आरोपित फरहान हुसैन समाजवादी पार्टी (सपा) का सक्रिय कार्यकर्ता है। सपा के बड़े नेताओं के साथ उसकी तस्वीरें भी सामने आई हैं। इनमें सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी शामिल हैं।
फरहान हुसैन समाजवादी पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता है ..और सबसे गंभीर बात ये कश्मीरी मोहल्ले में अपने मजहब की संख्या की अधिकता बता कर अपनी हनक बनाता रहता है .. https://t.co/BCgjIzKPVipic.twitter.com/Pf3IrVR3FE