Homeविविध विषयअन्यअमेरिकी दबाव का नहीं हुआ असर, अक्टूबर में रूस से भारत ने खरीदा ज्यादा...

अमेरिकी दबाव का नहीं हुआ असर, अक्टूबर में रूस से भारत ने खरीदा ज्यादा कच्चा तेल: जानें भारत की तेल आपूर्ति पर किन चीजों का पड़ा असर

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी टैरिफ दबाव के बावजूद, अक्टूबर में रूस से भारत का कच्चा तेल आयात बढ़ा। केप्लर और ऑयलएक्स के आँकड़ों से पता चलता है कि आयात बढ़कर लगभग 1.48 मिलियन बैरल प्रतिदिन हो गया है, जो वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच मोदी सरकार के सामर्थ्य, रिफाइनरी आवश्यकताओं और आपूर्ति की विविधता को दर्शाता है।

रूस से भारत आने वाले तेल को लेकर अमेरिकी दबाव के बीच अक्टूबर महीने में तेल आयात में उछाल देखी गई है। हालाँकि अमेरिकी प्रतिबंध लागू होने के बाद अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में इसमें गिरावट दर्ज की गई। रूस से तेल खरीद को मुद्दा बना कर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत पर 25% अतिरिक्त शुल्क समेत कुल 50% टैरिफ लगा दिया था। व्हाइट हाउस और उसके अधिकारियों ने नई दिल्ली पर दबाव बनाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए, लेकिन भारत टस से मस नहीं हुआ।

ट्रम्प ने यहाँ तक दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने उन्हें आश्वासन दिया था कि वह मास्को से तेल आयात करना बंद कर देंगे। हालाँकि, विदेश मंत्रालय ने इसका खंडन करते हुए कहा कि दोनों नेताओं के बीच इस मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं हुई। केप्लर (Kpler) की ओर से जारी शिप ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, अक्टूबर में रूस से भारत का कच्चा तेल आयात पिछले महीने की तुलना में बढ़ा है, जो वाशिंगटन के लगातार दबाव के बावजूद मोदी सरकार के दृढ़ इच्छाशक्ति का एक और सबूत है।

केप्लर के आँकड़ों के अनुसार, भारत में रूसी तेल की खपत सितंबर में 1.44 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) से बढ़कर अक्टूबर में लगभग 1.48 मिलियन बीपीडी हो गई है। ऑयलएक्स के मुताबिक, सितंबर में आयात 1.43 मिलियन बैरल प्रति दिन था। इन आँकड़ों में कजाकिस्तान के रास्ते रूस से आने वाले तेल को शामिल नहीं किया गया।

मीडिया हाउस के अनुसार, भारत के प्रमुख रिफाइनरी में रूसी तेल की खपत फिर से शुरू हो गई है। दिसंबर में ऐसी कंपनियाँ जिनपर प्रतिबंध नहीं लगे हैं, उनसे 5 कार्गो दिए गए हैं। देश की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी) ने दिसंबर में पूर्वी भारत के एक बंदरगाह पर डिलीवरी के लिए दुबई से समान कीमतों पर लगभग 3.5 मिलियन बैरल ईएसपीओ (पूर्वी साइबेरिया-प्रशांत महासागर) कच्चा तेल खरीदा।

आईओसी के वित्त प्रमुख अनुज जैन ने पहले बताया था कि रूसी तेल दुबई के रास्ते भारतीय बंदरगाहों तक लाने में सस्ता पड़ रहा है क्योंकि इसके परिवहन पर बाज़ार में 2 से 3 डॉलर प्रति बैरल की छूट मिल रही है।

उन्होंने कहा, “हमने रूसी कच्चे तेल की खरीद कभी नहीं रोका। हम अक्टूबर और नवंबर के लिए पहले से ही खरीद रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा, “अक्टूबर के अंतिम हफ्ते में खरीद में गिरावट इसलिए आई क्योंकि हमारा स्टॉक ज़्यादा था, इसलिए हम अपने स्टॉक के स्तर को भी बेहतर बनाना चाहते थे।”

रूसी तेल की खरीद में मासिक बदलाव आया

रूसी तेल की खरीद का पैटर्न हर महीने बदलता रहा है। आँकड़ों के मुताबिक अक्टूबर के पहले हफ्ते में आयात में बढ़ोतरी हुई, जिससे जुलाई से सितंबर तक तीन महीनों में तेल आपूर्ति में कमी को दूर कर दिया। त्योहारी माँग को पूरा करने के लिए रिफाइनरियों ने जोर शोर से तेल खरीदा।

जून में आयात 20 लाख बैरल प्रतिदिन से घटकर सितंबर में 16 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था। हालाँकि, अक्टूबर के शुरुआती विश्लेषण में सुधार की ओर इशारा किया गया था क्योंकि पश्चिमी बाजारों में कमज़ोर माँग के बीच शिपिंग में दी गई आकर्षक छूट का असर पड़ा और भारत आने वाले यूराल सहित रूसी ग्रेड के तेलों की शिपमेंट में वृद्धि हुई।

वैश्विक व्यापार विश्लेषण करने वाली कंपनी केप्लर के मुताबिक, अक्टूबर में शिपमेंट लगभग 18 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो पिछले महीने की तुलना में लगभग 2,50,000 बैरल प्रतिदिन अधिक है। इसके अलावा, भारतीय रिफाइनरियों ने पुष्टि की है कि उन्हें सरकार से रूसी तेल का आयात बंद करने का आदेश कभी नहीं मिला।

अगस्त में रूसी तेल की आपूर्ति बढ़कर 20 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया, क्योंकि रिफाइनरियों ने अधिक तेल की माँग की। वैश्विक रीयल-टाइम डेटा और केप्लर के अनुसार, अगस्त के पहले पखवाड़े में प्रतिदिन आयात किए गए 52 लाख बैरल कच्चे तेल में रूस का हिस्सा 38% तक था। जुलाई में आयात 16 लाख बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 20 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया।

ट्रम्प प्रशासन के 50% तक टैरिफ इसी महीने लागू हुआ। इसमें रूसी तेल लेने के ‘जुर्म’ में 25% अतिरिक्त शुल्क भी शामिल था। हेलसिंकी स्थित सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के अनुसार, भारत को अगस्त में रूस से 2.9 बिलियन यूरो का कच्चा तेल प्राप्त हुआ, जबकि जुलाई में यह 2.7 बिलियन यूरो था।

आईओसी के अध्यक्ष अरविंदर सिंह साहनी ने बताया, “न तो हमें खरीदने के लिए कहा जा रहा है और न ही न खरीदने के लिए। हम रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी बढ़ाने या घटाने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं कर रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा, “अप्रैल-जून में आईओसी द्वारा संसाधित कच्चे तेल में रूसी तेल का हिस्सा लगभग 22% था और निकट भविष्य में भी इसकी मात्रा समान रहने की उम्मीद है।”

आँकड़ों से पता चला है कि बारिश के मौसम में ईंधन की माँग आमतौर पर भारत में कम हो जाता है। इसलिए जुलाई में देश का रूसी तेल आयात गिर गया, जबकि पिछले महीने कुछ रिफाइनरों ने कम छूट के कारण खरीदारी स्थगित कर दी थी। जुलाई में भारत ने प्रतिदिन 1.5 मिलियन बैरल रूसी तेल खरीदा, जो पिछले महीने की तुलना में 24.5% कम है।

जुलाई में भारत के कुल आयात 4.44 मिलियन बैरल प्रतिदिन में से 34% हिस्सा रूस से आया। दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स की संचालक रिलायंस ने जुलाई में रूसी तेल की अपनी खरीद में पिछले महीने के मुकाबले 19% की कटौती की।

रूसी तेल आयात में आया कुछ समय से उछाल

रूसी तेल आयात में पिछले कुछ समय से लगातार वृद्धि देखी जा रही है। विश्लेषकों के अनुसार, इजराइल और ईरान के बीच तनाव और युद्ध को देखते हुए घरेलू रिफाइनरी कंपनियों ने अपना स्टॉक बढ़ाया। इसलिए जून में रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात 11 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया। केप्लर वेसल ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, भारत में रूसी तेल आयात जून में जुलाई 2024 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर था, जो कुल 2.08 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) था।

1 से 19 जून के बीच यह 2.1 और 2.2 मिलियन बैरल प्रति दिन के बीच रहा। इस दौरान भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 35% से ऊपर बनी रही।

यूरोपीय थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ के मुताबिक, “जून में भारत के कच्चे तेल के वैश्विक आयात में 6% की गिरावट आई, जबकि रूस से आयात की मात्रा में महीने-दर-महीने 8% की वृद्धि देखी गई, जो जुलाई 2024 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गई,”

द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मानकों से कम कीमत पर रूसी कच्चा तेल लगातार भारत को मिल रहा है, इसलिए मई में भारत का आयात 10 महीने के उच्चतम स्तर 1.96 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर पहुँच गया था। रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। कुल आयात का 38% हिस्सा रूस से पूरा होता है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में भारत को रूसी तेल आपूर्ति नौ महीने के उच्चतम स्तर पर रही। केप्लर ने बताया कि भारत का रूसी तेल आयात अप्रैल में मार्च की तुलना में 2.1% बढ़कर 19.2 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया, जबकि कुल तेल आयात 7.3% घटकर 48.8 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। भारत के तेल आयात में रूसी कच्चे तेल का हिस्सा मार्च के 35.7% से बढ़कर अप्रैल में 39.3% हो गया।

रॉयटर्स के मुताबिक, केप्लर के आँकड़ों से पता चलता है कि भारत का रूसी तेल का आयात मार्च में 15.4 लाख बैरल प्रतिदिन था, जो पिछले तीन महीनों में घटकर 11 लाख से 12 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था। सूत्रों ने बताया कि तुर्की की सबसे बड़ी तेल रिफाइनर कंपनी ने रूसी तेल का आयात बंद कर दिया है। इससे एशियाई बाजारों में तेल की आपूर्ति बढ़ गई है।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने बताया कि भारत समुद्री रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है। 2025 के पहले 9 महीनों में प्रतिदिन 1.9 मिलियन बैरल या 2022 के यूक्रेन युद्ध पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस के कुल निर्यात का लगभग 40% समुद्र के रास्ते भारत आता था। घरेलू रिफाइनरियाँ फिर इस कच्चे तेल को पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन में बदल देती हैं।

तेल आपूर्ति पर दो युद्धों का पड़ा असर

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय जर्नल फॉर मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च के अनुसार, 2024-2025 में रूस भारत का कच्चे तेल का शीर्ष आपूर्तिकर्ता होगा, जो कुल आयात में लगभग 36% का योगदान देगा। हालाँकि, हमेशा ऐसा नहीं था क्योंकि 2009-10 में भारत को कच्चा तेल निर्यात करने वाले देशों में रूस का अनुपात 1% से भी कम था।

(साभार-इंटरनेशनल जर्नल)

2021-2022 में भी रूस से कच्चे तेल का आयात केवल 2% से अधिक रहा। इस बदलाव के 2 अहम कारण थे। पहला, ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध। भारत के कुल तेल आयात में ईरान का प्रतिशत इसकी वजह से तेजी से गिरा। दूसरा कारण 2022 में शुरू हुआ रूस और यूक्रेन का युद्ध रहा। इसकी वजह से कूटनीति, तेल व्यापार में बदलाव आया।

पूर्वोक्त कारण रूस से भारत के ऊर्जा अधिग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। इसी प्रकार, वाणिज्यिक, रसद और भू-राजनीतिक कारक रूसी तेल की भारत की मासिक खरीद में उतार-चढ़ाव में योगदान करते हैं, जिसमें भारतीय रिफाइनरियों के आर्थिक विचार प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

भारत के विदेश मंत्रालय ने विश्व तेल बाजार में बदलती गतिशीलता को देखते हुए रूसी कच्चे तेल के आयात पर जवाब दिया। उनका कहना है कि भारत के कच्चे तेल के आयात पर इसका प्रभाव पड़ता है। नई दिल्ली अपने 1.4 अरब लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ऊर्जा खरीद में लचीलेपन पर ज़ोर देता रहा है।रूसी तेल कंपनियों पर हाल ही में लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के असर पर भी विचार किया जा रहा है। उचित मूल्य पर अलग अलग स्रोतों से तेल आपूर्ति मोदी सरकार की रणनीति का हिस्सा है।

आईओसी प्रमुख साहनी ने जोर देकर कहा कि रूसी कच्चा तेल आर्थिक कारणों से खरीदा जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया, “हम पूरी तरह से आर्थिक कारणों से खरीदना जारी रखते हैं, यानी अगर कच्चे तेल की कीमत और विशेषताएँ हमारी योजना के मुताबिक हों, तो हम खरीदते हैं।”

इसके अलावा, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) के निदेशक (वित्त) वेत्सा रामकृष्ण गुप्ता के अनुसार, कीमतों में कटौती घटकर 1.5 डॉलर प्रति बैरल रह गई है, जिसके परिणामस्वरूप जुलाई में आयात कम हुआ है। अगस्त में यह छूट 40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई थी, लेकिन अब यह घटकर 2.70 डॉलर प्रति बैरल रह गई है।

साहनी ने बताया कि यूराल जैसे रूसी कच्चे तेल के ग्रेड पर छूट से खरीद की मात्रा में मासिक उतार-चढ़ाव हो सकता है और इस बात पर ज़ोर दिया कि इंडियन ऑयल को अमेरिकी टैरिफ के जवाब में खरीद में कटौती या वृद्धि करने के लिए नहीं कहा गया है। यह स्पष्ट है कि अमेरिकी टैरिफ ने कोई भूमिका नहीं निभाई। हालाँकि रूसी तेल कंपनियों पर मौजूदा प्रतिबंधों का असर पड़ सकता है।

कच्चे तेल की आपूर्ति को प्रभावित करने वाली वजहें

भारतीय तेल रिफाइनरियों में टर्नराउंड या आवधिक रखरखाव किया जाता है, जिससे उनकी प्रसंस्करण क्षमता और कच्चे तेल की खपत अस्थायी रूप से कम हो सकती है। इन रखरखाव कार्यक्रमों के कारण रूसी कच्चे तेल की कुल माँग में भी उतार-चढ़ाव आता है।

अस्थायी सरकारी आँकड़ों से पता चलता है कि अगस्त में भारतीय रिफाइनरियों का कच्चे तेल का उत्पादन महीने-दर-महीने 4.4% घटकर 5.27 मिलियन बैरल प्रति दिन (22.29 मिलियन मीट्रिक टन) रह गया।

निवेश सूचना एवं क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (आईसीआरए) के उपाध्यक्ष प्रशांत वशिष्ठ ने कहा, “जुलाई की तुलना में अगस्त में रिफाइनरी उत्पादन में गिरावट आई है। इसका मुख्य कारण बारिश का मौसम, निर्धारित रखरखाव और एक रिफाइनरी का जरूरत के मुताबिक कम उत्पादन करना है।”

सरकार के पेट्रोलियम नियोजन एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (पीपीएसी) के आंकड़ों के अनुसार, मानसून के कारण अपेक्षाकृत कम माँग के साथ-साथ निर्धारित रिफाइनरी रखरखाव के कारण बंद होने के कारण, भारत ने जुलाई में 18.6 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) कच्चे तेल का आयात किया, जो पिछले वर्ष के 19.4 एमएमटी से कम है।

भारतीय रिफाइनर अपने कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता ला रहे हैं। ऊर्जा विश्वसनीयता और अनुकूलन क्षमता में सुधार के लिए दुनिया के अन्य क्षेत्रों के विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। इससे तेल आपूर्तिकर्ताओं की संख्या बढ़ रही है। इसका असर रूसी तेल के आयात पर भी पड़ रहा है।

भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, दुनिया के अस्थिर बाजार में भारतीय ग्राहकों के हितों की रक्षा करना नई दिल्ली की सर्वोच्च प्राथमिकता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने घोषणा की, “स्थिर ऊर्जा मूल्य और सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करना हमारी ऊर्जा नीति के दो अहम लक्ष्य रहे हैं। इसमें हमारी ऊर्जा स्रोतों का व्यापक आधार बनाना और बाजार की स्थितियों के अनुसार विविधता लाना शामिल है।”

तेल के लिए अनुबंध आमतौर पर डिलीवरी से चार से छह और यहाँ तक कि आठ हफ़्ते और महीनों पहले तय हो जाते हैं। हफ़्तों बाद आने वाला सौदा इस वक्त की स्थितियों पर निर्भर नहीं करता। ये पहले तय किए गए कीमतों और शर्तों पर आधारित होते हैं, जिससे आयात में मासिक असमानता बढ़ती है।

भारत में रूसी तेल की अलग-अलग मात्रा में आने के पीछे ये सभी पहलू और परिस्थितियाँ निर्णायक रहे हैं।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Rukma Rathore
Rukma Rathore
Accidental journalist who is still trying to learn the tricks of the trade. Nearing three years in the profession.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

दिल्ली दंगों में इस्लामी कट्टरपंथियों को दी क्लीन चिट, कुंभ और राम मंदिर को लेकर हिंदुओं को घेरा: जानें- कौन हैं CJP प्रदर्शन में...

दिल्ली में CJP प्रदर्शन के दौरान The Guardian पत्रकार हन्ना एलिस-पीटरसन भी मौजूर रहीं, जिनका भारत विरोधी भ्रामक खबरें फैलाने का इतिहास रहा है।

चीन-जापान की राह पर भारत, रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जन्म दर: पढ़ें- क्या होता है TFR, क्यों घट रही है जन्म दर और आने...

भारत में जन्म दर लगातार घट रही है। TFR 1.9 पहुँचने के बाद विशेषज्ञों ने जापान और चीन जैसे भविष्य की आशंका जताई है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
- विज्ञापन -