बंगाल की खाड़ी में चक्रवात तूफान का खतरा मंडरा रहा है। इस चक्रवात को मोंथा (Montha) नाम दिया गया। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इसे लेकर आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा में रेड अलर्ट जारी किया है। IMD ने चेतावनी दी है कि आंध्र प्रदेश के तट पर 28 अक्टूबर 2025 तक पहुँचने पर ये एक खतरनाक चक्रवात तूफान में बदल सकता है।
IMD ने सोमवार (26 अक्टूबर 2025) तड़के चक्रवात मोंथा की जानकारी देते हुए कहा कि बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पूर्व में बना दबाव का क्षेत्र पश्चिम की ओर बढ़ गया है और इसके गहरे दबाव में तब्दील होने और आगे चलकर इसके चक्रवात तूफान में बदलने के आसार हैं।
The depression over southeast Bay of Bengal moved nearly west-northwestwards with a speed of 8 kmph during past 6 hours and lay centred at 2330 hrs IST of yesterday, the 25th October 2025, over the same region, near latitude 11.0°N & longitude 87.7°E, about 550 km west of Port… pic.twitter.com/JjJJ6Iz15g
— India Meteorological Department (@Indiametdept) October 25, 2025
मौसम विभाग ने बताया कि 26 अक्टूबर 2025 तक ये चक्रवात तूफान गहरे दबाव में तब्दील होने और 27 अक्टूबर 2025 की सुबह तक दक्षिण-पश्चिम और उससे सटे पश्चिम-मध्य बंगाल की खाड़ी में चक्रवात तूफान में तब्दील होने की संभावना है। यह भी कहा कि इसके बाद यह उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ते हुए 28 अक्टूबर 2025 की सुबह तक एक प्रचंड चक्रवात तूफान में परिवर्तित हो सकता है।
कहाँ-कहाँ रेड अलर्ट?
मौसम विभाग ने आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु के लिए रेड अलर्ट जारी किया है। जहाँ 28 और 29 अक्टूबर 2025 को भारी बारिश होने की संभावना है। आंध्र प्रदेश के 9 जिलों में रेड अलर्ट है जबकि बाकी हिस्सों जैसे कि तमिलनाडु और ओडिशा में ऑरेंज अलर्ट लागू है। पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ में भी भारी बारिश का अनुमान है।
इसके अलावा हवा की गति 110 किमी प्रति घंटा तक पहुँच सकती है, जिससे पेड़ उखड़ने और बाढ़ का खतरा है। मौसम विभाग ने मछुआरों को 29 अक्टूबर 2025 तक समुद्र में न जाने की सलाह दी है।
तटीय इलाकों में तूफान की तैयारियाँ
चक्रवात मोंथा तूफान के रेड अलर्ट के बाद राज्यों ने भी तैयारियाँ शुरू कर दी हैं। आंध्र प्रदेश में काकीनाडा और कोनासिमा के 34 तटीय गाँवों से 6000 से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया जा रहा है, जिसमें 428 गर्भवती महिलाएँ शामिल हैं। विशाखापट्टनम, अनाकापल्ले और वेस्ट गोदावरी में 27 और 28 अक्टूबर 2025 को स्कूल बंद रहेंगे।
ओडिशा के 8 दक्षिणी जिलों मल्कानगिरी, कोरापुट आदि को रेड जोन घोषित किया गया है, जहाँ साइक्लोन शेल्टर बनाए गए हैं। NDRF और SDRF टीमें तैनात हैं। विभाग के लोगों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गई हैं और जलाशयों से पानी छोड़ा जा रहा है।
वहीं एलुरु, कृष्णा औऱ पश्चिम गोदावरी जिलों में मोंथा चक्रवात चेतावनी के बाद सभी समुद्री तटों को बंद कर दिया गया है। यहाँ बोटिंग भी प्रतिबंधित कर दी गई है। पुलिस ने इन क्षेत्रों में पिक्टिंग लगाकर लोगों को समुद्र तटों में प्रवेश करने से रोक दिया है।
चक्रवात ‘मोंथा’ क्या है?
बंगाल की खाड़ी में आए चक्रवात तूफान का नाम ‘मोंथा’ रखने के पीछे भी एक वजह है। मोंथा शब्द थाईलैंड से आया है, जिसका थाई भाषा में अर्थ ‘खुशबूदार फूल’ है। हर चक्रवात तूफान का नामकरण किया जाता है, जिससे मौसम विभाग को रिकॉर्ड रखने में आसानी हो जाती है और लोगों को इसके प्रति आगाह करन में भी सुविधा होती है।
ये नामकरण तब किया जाता है, जब कोई तूफान एक निश्चित तीव्रता तक पहुँच जाते हैं और IMD द्वारा उन्हें ‘चक्रवात तूफान’ घोषित कर दिया जाता है। इन तूफान का नाम विश्व मौसम संगठन (WMO) और ESCAP (Economic and Social Commission for Asia and the Pacific) एक प्रणाली के तहत तय करती है। ये 13 देशों का एक समूह है, जिसमें भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार, थाईलैंड, ईराम, ओमान, कतर, सऊदी, अरब, UAE और यमन।
साल 2004 से पहले तूफानों को केवल तारीख से याद रखा जाता था, जिससे भ्रम की स्थिति बन जाती थी और रिकॉर्ड रखने में भी परेशानी होती थी।
वर्तमान सीजेआई गवई ने अगले सीजेआई के तौर पर सबसे वरिष्ठ जस्टिस सूर्यकांत के नाम को आगे बढ़ाया है। इसके साथ ही उनके अगले सीजेआई बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। वे हरियाणा के पहले व्यक्ति होंगे जो देश के चीफ जस्टिस बनेंगे। जस्टिस सूर्यकांत ने बीजेपी नेता नूपुर शर्मा से लेकर मुहम्मद जुबैर तक के मामले में ऐसी टिप्पणियाँ की, जिस पर देशभर में बहस हुई।
अगला सीजेआई होंगे जस्टिस सूर्यकांत
भारत के मुख्य न्यायाधीश भूषण आर गवई ने सोमवार (27 अक्टूबर 2025) को केंद्र सरकार से जस्टिस सूर्यकांत को अगला सीजेआई नियुक्त करने की सिफारिश की। जस्टिस सूर्यकांत सुप्रीम कोर्ट के सबसे सीनियर जस्टिस हैं। इसके साथ ही सीजेआई गवई के उत्तराधिकारी की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
सीजेआई गवई 23 नवंबर 2025 को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। जस्टिस सूर्यकांत का शपथ ग्रहण समारोह 24 नवंबर 2025 को होगा। वे भारत के 53वें चीफ जस्टिस होंगे। उनका कार्यकाल 14 महीने का होगा। 9 फरवरी 2027 को वे अपने पद से सेवानिवृत्त हो जाएँगे।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश गवई ने न्यायमूर्ति सूर्यकांत को ‘हर तरह से पदभार संभालने के लिए उपयुक्त और सक्षम’ बताया। उन्होंने कहा कि उनके उत्तराधिकारी ‘संस्था के प्रमुख के रूप में वे एक एसेट साबित होंगे।’ कानून की बारीकियों पर उनकी गहरी पकड़ है।
जस्टिस सूर्यकांत ने अब तक के करियर में कई ऐतिहासिक फैसले सुनाए। कई बार ऐसी टिप्पणियाँ की, जिस पर देशभर में बहस छिड़ गई।
नूपुर शर्मा मामले में जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी
बीजेपी की प्रवक्ता रहीं नूपुर शर्मा के मामले में सुनवाई कर रहे जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था, “देश में जो कुछ हो रहा है, इसके लिए वह अकेली जिम्मेदार हैं।” दरअसल नूपुर शर्मा के बयान के समर्थन में सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वाले राजस्थान में कन्हैयालाल की इस्लामी कट्टरपंथियों ने हत्या कर दी थी। जस्टिस सूर्य कांत ने सुनवाई के दौरान नूपुर शर्मा को जिहादियों द्वारा की गई हत्या का जिम्मेदार ठहराया था।
बोलने की आजादी की वकालत करने वाले जस्टिस सूर्य कांत ने नूपुर शर्मा को उनके बयान पर माफी माँगने और डिबेट में हिस्सा लेने के लिए फटकारा भी था। नूपुर शर्मा ने एक टीवी डिबेट में पैगंबर मुहम्मद को लेकर अपनी बात रखी थी। लेकिन ऑल्ट न्यूज वाले मोहम्मद जुबैर ने उनकी आधी वीडियो को शेयर किया और इस्लामी कट्टरपंथी इसे पैगंबर मोहम्मद का अपमान बताकर नूपुर शर्मा की जान लेने पर तुल गए।
उन्हें देश के कट्टरपंथियों से ही नहीं बल्कि दूसरे इस्लामी देशों तक से धमकियाँ आईं। विवाद इतना बढ़ा कि जिन लोगों ने नूपुर शर्मा का समर्थन किया उन्हें भी धमकियाँ दी गईं और कन्हैया लाल जैसों को तो मौत के घाट उतार दिया गया।
जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ महाभियोग चलाने की हुई थी माँग
नूपुर शर्मा केस में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पादरीवाला की टिप्पणी के खिलाफ सोशल मीडिया पर उन पर महाभियोग चलाने की माँग की गई थी। इसके लिए जोरदार हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। www.change.org प्लेटफॉर्म पर कुछ घंटों में करीब 10 हजार लोगों ने इस पर साइन किया था। इसके भीतर सांसदों को संबोधित करते हुए कहा गया था, “सभी सांसदों, ये जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला के विरुद्ध महाभियोग चलवाने के लिए शुरुआत है।” हालाँकि महाभियोग नहीं चलाया जा सका।
स्वाति मालीवाल केस में जमकर फटकारा
आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सांसद रहीं स्वाति मालीवाल पर तत्कालीन सीएम अरविंद केजरीवाल के घर पर हुए हमले को लेकर उन्होंने सत्ता को झकझोरने वाली टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, “मुख्यमंत्री का आवास है या किसी गुँडे का अड्डा?” आरोपित विभव कुमार की ओर मुखातिब होकर पूछा, “एक महिला के साथ ऐसा व्यवहार करते हुए शर्म नहीं आई? जब एक महिला रो रही थी, अपनी शारीरिक स्थिति बता रही थी, तभी भी आरोपित न रुका और न ही रोका गया- ये निंदनीय है।” दरअसल स्वाति मालीवाल को सीएम आवास पर केजरवाल के करीबी विभव कुमार ने पीटा था। इसका वीडियो भी सामने आया था। ये मुद्दा अखबारों की सुर्खियाँ बनी थी।
मोहम्मद जुबैर मामले में फैसला
दुनिया भर में ‘फैक्ट चेक’ का ठेका लेकर दूसरों को ज्ञान बाँटने वाले मोहम्मद जुबैर के मामले में 2022 में जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था, “किसी नागरिक को अपनी राय रखने से रोकना असंवैधानिक है। सोशल मीडिया पर अपनी बात कहने से रोकना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा”। मोहम्मद जुबैर ने हिन्दुओं के खिलाफ जमकर जहर उगला था। उसपर विदेशी फंडिंग के आरोप हैं। कई राज्यों में उस पर धार्मिक भावनाएँ भड़काने के आरोप में केस दर्ज किया गया।
रणवीर अल्लाहबादिया को ‘अश्लीलता’ के मुद्दे पर फटकारा
यूट्यूबर समय रैना के शो ‘इंडियाज गॉट टैलेंट’ में भद्दी टिप्पणी करने वाले यूट्यूबर रणवीर अल्लाहबादिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत ने जमकर फटकारा था। उन्होंने कहा, “इस व्यक्ति के दिमाग में कुछ गंदा है जो समाज में फैल गया है. वह माता-पिता का भी अपमान कर रहा है. अदालत क्यों उसका पक्ष ले?” उन्होंने साफ कहा था कि सस्ती लोकप्रियता के लिए सामाजिक मर्यादाएँ तोड़ने का अधिकार किसी को नहीं है। इस मामले ने सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर देशभर में नई बहस छेड़ दी।
हरियाणा के पहले सीजेआई होंगे जस्टिस सूर्यकांत
हरियाणा के हिसार में 10 फरवरी 1962 में पैदा हुए जस्टिस सूर्यकांत की शिक्षा दीक्षा यही हुआ। 1981 में ग्रेजुएशन भी गर्वमेंट पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, हिसार से किया। 1984 में रोहतक के महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी से बैचलर ऑफ लॉ किया। इसके बाद जिला अदालत में प्रैक्टिस शुरू की। 1985 में वे पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में प्रैक्टिस के लिए चंडीगढ़ चले गए।
हिमाचल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने
साल 2000 में जस्टिस सूर्यकांत हरियाणा के सबसे युवा एडवोकेट जनरल नियुक्त हुए। 2001 में वरिष्ठ अधिवक्ता बनने के बाद 2004 में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायाधीश के तौर पर नियुक्त हुए । 2007 और 2011 में राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण के शासी निकाय के सदस्य रहे। 2018 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। 2019 में जस्टिस सूर्यकांत सुप्रीम कोर्ट आ गए और जस्टिस के रूप में कार्यभार संभाला।
गुजरात और असम में स्थापित सेमीकंडक्टर संयंत्र इस साल के अंत तक सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन शुरू कर देंगे। कॉन्ग्रेस इसे नहीं पचा पा रही है। कर्नाटक के ग्रामीण विकास मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने एक बार फिर इन संयंत्रों पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि भाजपा ने कर्नाटक से ये संयंत्र ‘छीन’ लिए हैं। इन संयंत्रों का वे पहले भी विरोध कर चुके हैं। रविवार को उन्होंने नस्लवादी टिप्पणी की और कहा कि गुजरात और असम में सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए कोई ‘प्रतिभा’ नहीं है।
कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पुत्र प्रियांक खड़गे ने सवाल उठाया कि क्या इन राज्यों में प्रतिभाओं का भंडार है? उन्होंने मोदी सरकार पर कर्नाटक से सेमीकंडक्टर निवेश हटाने का आरोप लगाया। शनिवार को बेंगलुरु में पत्रकारों को संबोधित करते हुए, खड़गे ने केंद्र से उद्योगों को गुजरात और असम की ओर कथित तौर पर ‘ठेलने’ को लेकर स्पष्टीकरण माँगा। उन्होंने दावा किया कि कर्नाटक या तमिलनाडु को प्राथमिकता देने के बावजूद उद्योगपतियों को वहाँ भेजा जा रहा है।
खड़गे ने कहा, “सेमीकंडक्टर उद्योग जब बेंगलुरु आना चाहते हैं, तो असम और गुजरात क्यों जा रहे हैं? मैंने यह मुद्दा पहले भी उठाया है। कर्नाटक में आने वाला सारा निवेश केंद्र सरकार गुजरात जाने के लिए मजबूर कर रही है। गुजरात में क्या है? क्या वहाँ प्रतिभा है? असम में क्या है? क्या वहाँ प्रतिभा है?” उन्होंने आगे कहा, “जब उद्योगपति आवेदन दे रहे हैं कि वे कर्नाटक या तमिलनाडु आना चाहते हैं, तो उन्हें गुजरात क्यों भेजा जा रहा है?”
Congress has always hated Assam’s progress. Every time the state takes a step forward, Congress tries to pull it back!
खड़गे की टिप्पणियों को अपमानजनक और विभाजनकारी करार देते हुए निंदा की गई है। असम के मंत्री जयंत मल्लाबरुआ ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कॉन्ग्रेस पर असम से नफरत करने का आरोप लगाया। उन्होंने एक्स पर लिखा, “कॉन्ग्रेस हमेशा से असम की प्रगति से नफरत करती रही है। जब भी राज्य एक कदम आगे बढ़ता है, कॉन्ग्रेस उसे पीछे खींचने की कोशिश करती है!” उन्होंने इसे हर मेहनती असमिया युवा का घोर अपमान बताया।
असम बीजेपी के एक अन्य नेता और मंत्री पीयूष हजारिका ने कहा कि खड़गे की टिप्पणी आश्चर्यजनक नहीं है, और यही कॉन्ग्रेस का असली चेहरा है। उन्होंने कहा, “एक ऐसी पार्टी जिसने हमेशा असम और पूर्वोत्तर को हीन माना है, हमारी क्षमता को नजरअंदाज किया है और हमारे विकास में बाधा डाली है। इस क्षेत्र के प्रति उनका तिरस्कार इतिहास में गहराई तक समाया हुआ है और आज उनके शब्द इसकी पुष्टि ही करते हैं।”
Earlier, we saw how @INCIndia President Shri @kharge Ji opposed conferring Bharat Ratna on Sudhakantha Dr Bhupen Hazarika, one of Assam’s greatest icons.
हजारिका ने यह भी याद दिलाया कि खड़गे के पिता मल्लिकार्जुन खड़गे ने असम के महानतम नेताओं में से एक डॉ. भूपेन हजारिका को भारत रत्न दिए जाने का विरोध किया था। इससे पता चलता है कि खरगे परिवार में असम विरोधी भावनाएँ अंदर तक समाई हुई हैं।
यह पहली बार नहीं है जब खड़गे ने भारत के उभरते सेमीकंडक्टर उद्योग को कुछ राज्यों स्थापित करने के बजाए, देशभर में लगाए जाने का विरोध किया हो। पिछले साल सितंबर में, उन्होंने कहा कि स्किल का कोई इकोसिस्टम नहीं होने के बावजूद गुजरात को 4 और असम को 1 सेमीकंडक्टर इकाइयाँ मिलीं।
उन्होंने ट्वीट किया था, “पाँच सेमीकंडक्टर निर्माण इकाइयाँ, जिनमें से चार गुजरात में और एक असम में हैं, लेकिन वहाँ स्किल का कोई इकोसिस्टम नहीं है। उनके पास अनुसंधान का कोई पारिस्थितिकी तंत्र नहीं है। उनके पास इनक्यूबेशन का कोई पारिस्थितिकी तंत्र नहीं है। उनके पास नवाचारों का कोई पारिस्थितिकी तंत्र नहीं है…जब चिप डिज़ाइनिंग की 70% प्रतिभा कर्नाटक में है, तो मुझे समझ नहीं आता कि सरकार राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके उन्हें दूसरे राज्य में क्यों धकेलना चाहती है। यह अनुचित है।”
इस पोस्ट पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर असम के विकास का विरोध करने का आरोप लगाया।
Once again, Congress shows its true colors by opposing Assam’s development. A Karnataka minister, who is also the son of the Congress national president, claims that Assam has no right to host a semiconductor industry! I urge Assam Congress leaders to reject this divisive… https://t.co/YBxcBTgVeW
सरमा ने X पर लिखा, “एक बार फिर, कॉन्ग्रेस असम के विकास का विरोध करके अपना असली रंग दिखा रही है। कर्नाटक के मंत्री और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के बेटे प्रियांक खरगे ने दावा किया है कि असम को सेमीकंडक्टर उद्योग स्थापित करने का कोई अधिकार नहीं है! मैं असम के कॉन्ग्रेस नेताओं से आग्रह करता हूँ कि वे इस विभाजनकारी सोच को खारिज करें और असम के उचित विकास और प्रगति के लिए खड़े हों।”
गौरतलब है कि देश में कई कंपनियाँ अपने सेमीकंडक्टर संयंत्र विकसित कर रही हैं। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स गुजरात के धोलेरा में एक चिप निर्माण इकाई स्थापित कर रही है। कंपनी असम के जगीरोड में एक सेमीकंडक्टर असेंबली और परीक्षण सुविधा भी स्थापित कर रही है।
इसके अलावा, माइक्रोन टेक्नोलॉजी गुजरात के साणंद में एक सेमीकंडक्टर इकाई स्थापित कर रही है, सीजी पावर गुजरात के साणंद में एक इकाई स्थापित कर रही है, केन्स सेमीकॉन भी साणंद में एक संयंत्र स्थापित कर रही है, और एचसीएल, फॉक्सकॉन के साथ साझेदारी कर उत्तर प्रदेश के जेवर में एक सेमीकंडक्टर संयंत्र स्थापित करने की योजना बना रही है।
सेमीकंडटर संयंत्र केवल गुजरात और असम में स्थापित नहीं किए जा रहे हैं, बल्कि ये महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे अन्य राज्यों में भी स्थापित किए जा रहे हैं। लेकिन कॉन्ग्रेस नेता असम और गुजरात को ही टारगेट क्यों कर रहे हैं, ये ध्यान देने वाली बात है।
वॉशिंगटन पोस्ट ने मोदी सरकार के खिलाफ एक और झूठी रिपोर्ट छापी। उसमें आरोप लगाया गया कि सरकार ने लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन यानी एलआईसी को गौतम अडानी की कंपनियों में जबरदस्ती निवेश करने को मजबूर किया। कॉन्ग्रेस पार्टी को लगा कि उसे मोदी सरकार पर हमला करने का सबसे बड़ा हथियार मिल गया है। वो इस आरोप को लेकर सरकार पर लगातार हमला कर रही है और एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर कई मीम्स पोस्ट कर रही है।
कॉन्ग्रेस के आधिकारिक हैंडल से कई ट्वीट आए। एक में मजाक उड़ाते हुए लिखा गया- ‘केवल 3,30,00,00,00,000 रुपए मात्र’ यानी सिर्फ 33,000 करोड़ रुपए। साथ में एक मीम था जिसमें प्रधानमंत्री मोदी गौतम अडानी को एलआईसी का बहुत बड़ा चेक सौंप रहे हैं। नीचे लिखा- ‘मोदी है तो मुमकिन है’। ऐसे ही कई मीम्स और ट्वीट्स कॉन्ग्रेस ने डाले।
हालाँकि एलआईसी ने इन सारे आरोपों को साफ-साफ खारिज कर दिया। उसने कहा कि उसके सारे निवेश, जिनमें अडानी पोर्ट्स एंड एसईजेड में 570 मिलियन डॉलर की हिस्सेदारी भी शामिल है, पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से किए गए। ये निवेश क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा AAA रेटिंग प्राप्त कंपनी में किया गया और पूरी जाँच-पड़ताल के बाद, पूरी ईमानदारी से हुआ।
वॉशिंगटन पोस्ट और कॉन्ग्रेस ने जो नुकसान का आरोप लगाया, वो गलत है। असल में एलआईसी को अडानी के निवेश से अच्छा-खासा मुनाफा हुआ है। खास बात ये है कि एलआईसी की रिलायंस में 6.9% हिस्सेदारी है जो करीब 1.3 लाख करोड़ रुपए की है और टाटा में 15.9% हिस्सेदारी है जो 82,800 करोड़ रुपए की है। ये अडानी से कहीं ज्यादा है, लेकिन कॉन्ग्रेस सिर्फ अडानी ग्रुप के निवेश पर ही हमला कर रही है।
जब कॉन्ग्रेस मोदी को एलआईसी का पैसा अडानी को देने का आरोप लगाकर मीम्स बना रही है, तो वो भूल गई कि उसकी अपनी सरकार ने एलआईसी के पैसे को कैसे इस्तेमाल किया था। यूपीए सरकार खासकर अपने दूसरे कार्यकाल में एलआईसी को सरकारी घाटा छुपाने और डिसइन्वेस्टमेंट टारगेट पूरा करने के लिए बेलआउट खरीदार की तरह यानी निजी एटीएस की तरह इस्तेमाल करती थी।
दोहरा घाटा था, डिसइन्वेस्टमेंट टारगेट पूरा नहीं हो रहे थे क्योंकि घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों के शेयरों में मार्केट में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वित्तीय घाटा बढ़ता जा रहा था। ऐसे में कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली सरकार ने बार-बार एलआईसी को मजबूर किया कि वो इन घाटे वाले PSU शेयरों को खरीद ले। पॉलिसीधारकों का पैसा सरकार की किताबें सजाने में लगाया गया। कम रिटर्न वाले निवेश करवाए गए, सिर्फ मनमाने डिसइन्वेस्टमेंट टारगेट पूरे करने के लिए।
आज जहाँ एलआईसी के निवेश पारदर्शी हैं और अच्छा मुनाफा दे रहे हैं, वहीं यूपीए ने एलआईसी को PSU डिसइन्वेस्टमेंट में जबरदस्ती शामिल कर घाटे में डाला। 2013 के इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कई PSU शेयरों में एलआईसी को सरकार बचाने के लिए खरीदे थे, उनमें 3,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ।
यूपीए का डिसइन्वेस्टमेंट प्लान कागज पर तो बड़ा था, लेकिन प्राइवेट सेक्टर से खरीदार नहीं मिल रहे थे। अर्थव्यवस्था सुस्त थी, PSU शेयर महँगे या खराब परफॉर्म कर रहे थे। प्राइवेट निवेशक दूर भाग रहे थे। ऐसे में सरकार एलआईसी पर पूरी तरह निर्भर हो गई कि वो बाकी बचे शेयर उठा ले। नतीजा ये हुआ कि डिसइन्वेस्टमेंट टारगेट तो पूरे हो गए, लेकिन असल में ये प्राइवेटाइजेशन का दिखावा था। सरकार को राजस्व दिखाने और वित्तीय स्थिति सुधारने का रास्ता मिल गया।
यूपीए-2 (2009-2014) के दौरान एलआईसी ने कई बड़े ऑफर फॉर सेल (OFS) और फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (FPO) में 40 से 70 प्रतिशत तक हिस्सा लिया। कुल मिलाकर 30,000 करोड़ रुपए से ज्यादा डाले गए, सिर्फ बिक्री बचाने के लिए।
एलआईसी कई मामलों में सबसे बड़ा निवेशक थी। मिसाल के तौर पर 2010 में NTPC के FPO में एलआईसी ने 49.48% हिस्सा लिया, यानी 8,200 करोड़ के इश्यू में से करीब 4,058 करोड़ रुपए। ये उस साल NMDC समेत 10,000 करोड़ से ज्यादा के प्रयास का हिस्सा था। उसी साल NMDC के FPO में एलआईसी ने 63.72% उठाया, यानी 9,900 करोड़ के माइनिंग स्टेक सेल में से करीब 6,310 करोड़ रुपए। कम बोली आने पर एलआईसी ने मुख्य एंकर की भूमिका निभाई। 2012 में NMDC के फॉलो-अप OFS में एलआईसी ने करीब 47% यानी 597 करोड़ के ऑफर में से 278 करोड़ रुपए के शेयर लिए, क्योंकि रिटेल निवेशक नहीं आए।
साल 2013 में ये सिलसिला और तेज हुआ। ONGC के 12,700 करोड़ के OFS में एलआईसी ने 96% यानी 12,179 करोड़ रुपए के शेयर लिए। ये तेल-गैस सेक्टर में सबसे बड़ा सिंगल खरीद था। SAIL के 1,500 करोड़ के OFS में एलआईसी ने 70.57% यानी करीब 1,058 करोड़ रुपए लिए, जिससे उसकी स्टील PSU में हिस्सेदारी करीब 9% हो गई।
फरवरी 2013 में NTPC के OFS में एलआईसी ने करीब 49% हिस्सा लिया, यानी 3,570 करोड़ के ऑफर में से 1,765 करोड़ रुपए। हिंदुस्तान कॉपर के 1,225 करोड़ के OFS में एलआईसी का हिस्सा करीब 44% था, यानी 608 करोड़ रुपए। आखिर में 2014 में BHEL के 2,685 करोड़ के ब्लॉक डील को एलआईसी ने पूरी तरह उठा लिया, 5.94% हिस्सेदारी ली और इंजीनियरिंग PSU में उसकी होल्डिंग 14.99% हो गई।
ये अलग-अलग निवेश नहीं थे, बल्कि एक पैटर्न था। एलआईसी की खरीदारी से यूपीए को हर साल 40,000 करोड़ का टारगेट पूरा करने में मदद मिली, जबकि ग्लोबल निवेशक मुँह फेर चुके थे। अडानी की हाई-ग्रोथ कंपनियों के उलट इनमें से कई PSU खराब परफॉर्म कर रहे थे, जिससे एलआईसी के कोष की वैल्यू घटी।
सिर्फ डिसइन्वेस्टमेंट ही नहीं, यूपीए ने एलआईसी का और भी बुरा इस्तेमाल किया। वित्तीय घाटा छुपाने के लिए। 2011-12 में घाटा जीडीपी का 6.5% तक पहुँच गया। कर्ज महँगा हो रहा था, बॉन्ड मार्केट सरकार के कागजात नहीं ले रहा था। ऐसे में सरकार ने एलआईसी को ‘कैप्टिव फंड सोर्स’ बना दिया। लंबी अवधि के बॉन्ड खरीदने को कहा, घाटे में चल रहे बैंकों को रिकैपिटलाइज करने को एयर इंडिया और BSNL जैसे घाटे वाले PSU में पूँजी डालने को मजबूर किया।
यूपीए-2 के आखिरी सालों में एलआईसी ने कई PSU बैंकों को बचाया जो ऊँचे NPA से जूझ रहे थे। इक्विटी और बॉन्ड में निवेश किया। यूपीए सरकार द्वारा जारी हजारों करोड़ के ऑयल बॉन्ड एलआईसी ने ही खरीदे। ये ऑयल बॉन्ड भविष्य के बजट पर बोझ थे।
ये नहीं कि एनडीए सरकार में एलआईसी PSU शेयर बिल्कुल नहीं खरीदती। खरीदती है लेकिन वो रेगुलर निवेश होते हैं, बेलआउट नहीं। प्राइवेट इक्विटी और बॉन्ड में निवेश अडानी ग्रुप समेत भी रेगुलर निवेश का हिस्सा हैं, ताकि फंड पर रिटर्न मिले।
साथ ही एलआईसी की रणनीति है कि अच्छे स्टॉक्स जब गिरे हों, तब खरीदो और कीमत बढ़ने पर बेचो। ये स्टॉक मार्केट के लिए उल्टा लग सकता है, लेकिन एलआईसी की कंजर्वेटिव निवेश नीति के लिए ये बिल्कुल फिट बैठता है। यही वजह है कि हिंडेनबर्ग के आरोपों के बाद अडानी स्टॉक्स गिरे तो एलआईसी ने खरीदा और बाद में कीमत बढ़ने पर बेचकर मुनाफा कमाया।
मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
उत्तराखंड के खटीमा में सिदारी प्रसाद दलित समुदाय के लोगों को ईसाई धर्मांतरण के लिए ब्रेनवॉश कर रहा है। सिदारी दलित लोगों को इलाज और पैसों का लालच देकर ईसाई बनाने का काम कर रहा है। हिंदू संगठन ने आरोपित के खिलाफ शिकायत की है। पुलिस ने भी आरोपित के खिलाफ संबंधित धाराओं में FIR दर्ज कर ली है।
मामला उधम सिंह नगर जिले के खटीमा के झनकिया थाना क्षेत्र का है। यहाँ सिदारी प्रसाद प्रार्थना सभा आयोजित कर दलित लोगों को ईसाई बनने के लिए ब्रेनवॉश करता है। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के प्रखंड संयोजक जितेंद्र विश्वकर्मा ने आरोपित के खिलाफ शिकायत की, जिसके बाद पुलिस ने एक्शन लेते हुए FIR दर्ज की। ऑपइंडिया के पास FIR की कॉपी मौजूद है।
अंधविश्वास और लालच के सहारे दलितों का ब्रेनवॉश
धर्मांतरण के पीछे मिशनरियों का हाथ है और सिदारी प्रसाद भी इनसे जुड़ा हुआ है। आरोपित सिदारी प्रसाद अंधविश्वास और सामाजिक भेदभाव का लाभ उठाकर दलित लोगों को ईसाई बन सब कुछ ठीक होने का भरोसा दिलाता है। वह कहता है कि ईसाई बनोगे तो बीमारियाँ ठीक हो जाएँगी, परिवार में समस्याएँ दूर होंगी और शराब की आदत भी छूट जाएगी।
इन लोगों को प्रार्थना सभा में इकट्ठा किया जाता है, जहाँ लोगों को धर्मांतरण के लिए बेनवॉश किया जाता। ये सभाएँ हर रविवार को आयोजित की जाती हैं, जिनमें पुरानी रीति-रिवाजों का त्याग करने और हिंदू धर्म छोड़ने के बारे में उकसाया जाता है। इसके साथ ही सभा में भूत-प्रेथ जैसी भ्रमित कहानियाँ सुनाई जाती। इन लोगों को पैसों का लालच भी दिया जाता है।
खटीमा के अलावा मेलाघाट, सिसैया, बरी अंजनिया, नौसर और दियाँ जैसे इलाकों में भी मिशनरियाँ सक्रिय हैं। जो कमजोर वर्ग के लोगों को निशाना बनाती हैं और लालच देकर धर्मांतरण करने के लिए ब्रेनवॉश करती हैं।
इन प्रार्थना सभाओं के नाम पर धर्मांतरण किए जाने की सूचना हिंदू संगठन को लगी। संगठन ने मौके पर पहुँचकर आरोपित सिदारी का पर्दाफाश किया। उसके पास से ईसाई से जुड़ी पुस्तकें और प्रार्थना की सामग्री बरामद हुई। इन सबूतों के आधार पर हिंदू संगठन ने पुलिस से शिकायत की।
पुलिस ने दर्ज की FIR
हिंदू संगठन की शिकायत पर पुलिस ने आरोपित सिदारी प्रसाद के खिलाफ उत्तराखंड धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2018 की धारा 3 और 5, भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 351(3) और धारा 352 के तहत FIR दर्ज की है।
हिंदू संगठन के खटीमा प्रखंड संयोजक जितेंद्र विश्वकर्मा ने अपनी शिकायत में बताया कि 24 अक्टूबर 2025 की सुबह 10 बजे उन्हें जानकारी मिली कि सिदारी प्रसाद अपने साथियों संग मिलकर अपने घर में बनी अवैध चर्च में दलित हिंदुओं का धर्मांतरण कर ईसाई बनाने का प्रयास कर रहा है।
सिदारी ने बताया कि ये सभी लोग उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से आए थे। इन्हें ईसाई रीति-रिवाज के बारे में बताया जा रहा था, जिसे वे ‘सर्वोत्तम धर्म’ बता रहे थे और धर्मांतरण कराने के लिए तरह-तरह के लालच दिए जा रहे थे। यहाँ तक कि सिदारी ने शिकायतकर्ता जितेंद्र को भी धर्मांतरण के लिए दबाव डाला।
FIR का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: Uttarakhand police)
जितेंद्र अपने साथी विशाल सिंह, आकाश राठौर और प्रदीप सिंह के साथ मिलकर सिदारी के घर पहुँचे थे। यहाँ सिदारी ने उन्हें भी परिवार सुखी होने का लालच देकर धर्मांतरण का दबाव बनाया। इसके साथ ही सिदारी ने एक ईसाई पुस्तक भी दिखाई और कहा कि इसमें ईसाई से जुड़ी अच्छी-अच्छी बातें लिखी हुई हैं, जिसे पढ़कर जीवन बेहतर हो जाएगा।
इतना ही नहीं जब जितेंद्र ने धर्मांतरण का विरोध किया तो सिदारी ने गाली-गलौज की और जान से मारने की भी कोशिश की। जितेंद्र ने कहा, सिदारी ने हिंदू अनुसूचित जाति के व्यक्तियों को इस तरह बहला-फुसलाया है कि उन्हें ईसाई बनने में कोई कठिनाई महसूस नहीं हो रही है। जितेंद्र ने पुलिस से अनुरोध किया है कि सिदारी जैसे देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति एवं उसके साथियों के विरुद्ध दण्डात्मक कार्यवाही करने की कार्रवाई की जाए।
मामले में थाना प्रभारी निरीक्षक देवेंद्र गौरव ने मीडिया को दिए बयान में कहा कि फिलहाल धर्मांतरण घटना को लेकर जाँच जारी है। गौरतलब है कि सिदारी फरार है और पुलिस उसकी गिरफ्तारी के प्रयास कर रही है।
(मूलरूप से यह खबर अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)
अरुणाचल प्रदेश के 27 जिलों, 26 प्रमुख जनजातियों और 100 उप-जनजातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले हजारों मूल निवासियों ने धर्मांतरण विरोधी अधिनियम (APFRA 1978) को लागू करने की माँग को लेकर रैली निकाली। शनिवार (20 अक्टूबर 2025) को पारंपरिक कपड़ों में इन लोगों ने ईटानगर तक मार्च किया। राज्य के ईसाई इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं।
धर्मांतरण को रोकने के लिए 48 साल पहले अरुणाचल प्रदेश फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट 1978 लागू हुआ था।
ईसाइयत के प्रचार- प्रसार की वजह से अरुणाचल के मूल निवासी यहाँ अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। ये लोग डोनी पोलो की पूजा करते हैं, जहाँ ‘डोनी’ का अर्थ है ‘सूर्य’ और ‘पोलो’ का अर्थ है ‘चंद्रमा’। ये वे सिंबल हैं, जिस पर अरुणाचल प्रदेश के लोगों की आस्था है।
फोटो साभार- TOI
डोनी पोलो, ईसाई धर्म और हिंदू धर्म के अलावा, अरुणाचल प्रदेश में महायान और थेरवाद बौद्ध धर्म के अनुयायियों की भी अच्छी खासी तादाद है।
इंडिजिनस फेथ एंड कल्चरल सोसाइटी ऑफ अरुणाचल प्रदेश (IFCSAP) के अध्यक्ष एमी रूमी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि स्वदेशी आस्था को मानने वालों ने राज्य के स्वदेशी विश्वास और परंपरा को बचाने के लिए अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम (एपीएफआरए) को पूरी तरह लागू करने की माँग को लेकर रैली निकाली। उन्होंने कहा कि इस कानून को 1978 में तत्कालीन राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई थी, लेकिन अभी तक इसे लागू नहीं किया गया है।
रूमी ने कहा, “अगर यह कानून लागू होता है, तो हमारी संस्कृति, परंपरा और धार्मिक पहचान की रक्षा हो पाती।”
फोटो साभार- इंडिया टुडे
प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए वकील आर.एस. लोडा ने कहा, “हम नहीं चाहते कि अरुणाचल प्रदेश मिजोरम या नागालैंड की तरह अपनी मूल पहचान खो दे, जहाँ विदेशी धर्म के प्रचार- प्रसार के कारण स्थानीय मान्यताएँ नष्ट हो गई हैं।”
अरुणाचल प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू करने की माँग करने वालों का कहना है कि यह कानून किसी भी धर्म या संप्रदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह केवल ‘जनजातीय समुदाय को प्रलोभन या लालच देकर हो रहे धर्मांतरण से बचाता है’।
अरुणाचल प्रदेश के स्वदेशी आस्था और सांस्कृतिक समाज (IFCSAP) के एक प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्री मामा नटुंग से मुलाकात की और अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 1978 (APFRA) को तत्काल लागू करने का आग्रह किया। उन्होंने राज्य की स्वदेशी आस्था, संस्कृति और आदिवासी पहचान की रक्षा के लिए इस अधिनियम को लागू करने पर जोर देते हुए एक ज्ञापन सौंपा।
इनका कहना है कि बाहरी प्रभावों से अरुणाचल की संस्कृति पर संकट मंडरा रहा है। इसे संरक्षित करने और जनजातीय विरासत को बचाने के लिए कानून का लागू करना जरूरी होता जा रहा है। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य में ईसाई आबादी और धर्मांतरण गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
1971 की जनगणना के मुताबिक, अरुणाचल प्रदेश में ईसाई आबादी 0.79% थी, जो 2011 की जनगणना में 30.26% हो गई। 1971 में अन्य धर्मों और मतों (ORP) का हिस्सा 63.46% था, जबकि 2011 की जनगणना में यह 26.20% रह गया।
1971 में हिंदुओं की आबादी 22% थी और 2011 में यह 29.04% हो गई। 1971 की जनगणना में बौद्धों की आबादी लगभग 13% थी, लेकिन 2011 में यह घटकर 11.77% रह गई। वहीं, मुसलमानों की आबादी 1971 में 0.18% थी, जो बढ़कर 2011 की जनगणना में 1.95% हो गई।
ईसाई APFRA का कर रहे विरोध
अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (ACF) APFRA कानून का विरोध कर रहा है। फोरम के अध्यक्ष तारह मिरी का तर्क है कि ‘धर्मांतरण विरोधी कानून धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है और ईसाइयों को निशाना बनाता है।” फरवरी 2025 में ACF ने धर्मांतरण विरोधी कानून के विरोध में 8 घंटे की भूख हड़ताल किया था।
नागा बैपटिस्ट चर्च काउंसिल के महासचिव रेव जेलहोउ कीहो ने जनवरी 2025 में मुख्यमंत्री पेमा खांडू को एक पत्र लिखा था और दावा किया था कि APFRA का उद्देश्य पारंपरिक धर्म का संरक्षण करना नहीं, बल्कि ईसाइयों का दमन करना है।
पत्र में कीहो ने लिखा, “APFRA का असली उद्देश्य पारंपरिक धर्म का संरक्षण करना नहीं, बल्कि उस समय के एक खास धार्मिक समूह का दमन करना था… इस आधार पर यह अधिनियम असंवैधानिक है। उस वक्त आपके लोग और क्षेत्र इस विधेयक का विरोध कर रहे थे, लेकिन देश के हालात बहुत बदल गए हैं। अब आपके लोगों, खासकर आपके राज्य के ईसाईयों का क्या होगा।”
पत्र में आगे कहा गया है, “हमें यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि देश के अन्य हिस्सों में ईसाइयों को बेवजह सताने के लिए इस कानून (धर्मांतरण विरोधी कानून) का कैसे दुरुपयोग किया जाता है। हमारी व्यावहारिक समझ हमें बताती है कि आपके शांतिप्रिय लोगों के साथ भी यही होगा, और यह पूरे क्षेत्र में फैल जाएगा।”
मुख्यमंत्री खांडू ने परंपराओं के संरक्षण की बात कही
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने राज्य की स्वदेशी आस्थाओं को बढ़ावा देने और परंपराओं को संरक्षित करने की भाजपा सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने इन्हें जनजातीय समुदायों की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आत्मा बताया।
Why are Indigenous faiths so important to preserve, unlike major religions?
Because they don’t come from books, but from land, memory, and lived tradition. They are not exported, they are rooted. They hold the soul of our people, our forests, mountains, rivers, and ancestors.… pic.twitter.com/RVhXUdqVq4
— Pema Khandu པདྨ་མཁའ་འགྲོ་། (@PemaKhanduBJP) July 24, 2025
मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा किया। इसमें उन्होंने विस्तार से बताया कि स्वदेशी आस्थाओं को संरक्षित करना क्यों आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रमुख धर्मों के विपरीत, स्वदेशी आस्थाएँ “किताबों से नहीं, बल्कि ज़मीन, स्मृति और जीवित परंपराओं से आती हैं। ये बाहर से थोपी नहीं जाती, बल्कि इसकी जड़ें हजारों सालों से जमी हुई हैं। ये हमारे लोगों, हमारे जंगलों, पहाड़ों, नदियों और पूर्वजों की आत्मा को संजोए हुए हैं।”
Indigenous faiths have been an integral part of humanity since time immemorial, even before the advent of organized religions. I am delighted to announce that the Department of Indigenous Affairs will now be renamed to include the words Indigenous Faith and Culture, a step… pic.twitter.com/TfIoeF54dh
स्वदेशी आस्थाओं को बढ़ावा देने और संरक्षित करने के लिए, मुख्यमंत्री खांडू ने आदि, गालो, न्यीशी और तांगसा जनजातियों के लिए 6 स्वदेशी गुरुकुल, 3,000 से अधिक पंजीकृत पुजारियों के वेतन, सभी जिलों में जनजातीय सांस्कृतिक केंद्र और राज्य भर में 50 स्वदेशी केंद्रों की स्थापना की घोषणा की।
दिसंबर 2024 में मुख्यमंत्री खांड स्वदेशी मामलों के विभाग का नाम बदलकर स्वदेशी आस्था और संस्कृति कर दिया। उन्होंने इसे ‘स्वदेशी परंपराओं की समृद्ध विरासत के संरक्षण, संवर्धन और सुरक्षा की प्रतिबद्धता की दिशा में एक कदम’ बताया।
अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम क्या है?
अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम अक्टूबर 1978 में अस्तित्व में आया था। इसका उद्देश्य ‘ताकत, लालच या धोखा देकर होने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना’ था। भारत के राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी दे दी थी।
राज्य में कई ‘स्वदेशी आस्थाओं’ की पहचान की गई। इनमें बौद्ध धर्म (मोनपा, मेम्बा, शेरदुकपेन, खम्बा, खम्पती और सिंगफो द्वारा प्रचलित), वैष्णव धर्म (नोक्टेस द्वारा प्रचलित), आका और प्रकृति पूजक (दुन्यी-पोलो के उपासकों सहित) शामिल हैं।
अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 3 में स्पष्ट रूप से कहा गया है – “कोई भी व्यक्ति किसी व्यक्ति को बल प्रयोग, प्रलोभन या किसी कपटपूर्ण तरीके से, प्रत्यक्ष रूप से या अन्यथा, एक धार्मिक आस्था से दूसरी धार्मिक आस्था में परिवर्तित नहीं करेगा या परिवर्तित करने का प्रयास नहीं करेगा और न ही कोई व्यक्ति ऐसे किसी धर्मांतरण के लिए उकसाएगा।”
कानून में आगे कहा गया है कि धारा 3 का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति पर ₹10,000 तक का जुर्माना और अधिकतम 2 वर्ष तक की कैद की सजा हो सकती है।
यह अधिनियम किसी व्यक्ति के धर्मांतरण के बारे में संबंधित जिले (अरुणाचल प्रदेश में) के जिलाधिकारी को सूचित करने का भी आदेश देता है। ऐसा न करने पर 1 वर्ष तक की कैद और ₹1000 तक के जुर्माने का प्रावधान है।
कानून की धारा 6 में कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत अपराध को संज्ञान में लिया जाएगा और पुलिस निरीक्षक से नीचे के अधिकारी इसकी जाँच नहीं करेंगे। अधिनियम के तहत अभियोजन के लिए पुलिस उपायुक्त की पूर्व अनुमति या अतिरिक्त सहायक आयुक्त से नीचे के पद के अधिकारी से सत्यापित कराने की आवश्यकता होती है।
धर्मांतरण विरोधी कानून के कार्यान्वयन के लिए अरुणाचल प्रदेश सरकार द्वारा नियम बनाने की माँग करते हुए गुवाहाटी हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई थी। इस मामले में बड़ी सफलता सितंबर 2024 में मिली।
न्यायमूर्ति कर्दक एटे और न्यायमूर्ति बुदी हाबुंग की खंडपीठ ने महाधिवक्ता आई. चौधरी के जवाब की जाँच के बाद जनहित याचिका को बंद कर दिया। सरकार ने कोर्ट को बताया है कि इसके नियमों को सूचीबद्ध करने के लिए 6 महीने का वक्त चाहिए।
गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर 2024 को अपने आदेश में कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि संबंधित अधिकारी अपने दायित्वों के प्रति सचेत रहेंगे और मसौदा नियमों को आज से 6 (छह) महीने की अवधि के भीतर अंतिम रूप दे दिया जाएगा।”
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री खांडू पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि गुवाहाटी उच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार, सरकार को छह महीने के भीतर मसौदा नियम तैयार करना है। यह समय सीमा अक्टूबर 2025 में समाप्त हो रही है।
यह अत्यंत आवश्यक है कि राज्य सरकार धार्मिक जनसांख्यिकी की रक्षा और स्वदेशी आस्थाओं एवं परंपराओं के संरक्षण के लिए एपीएफआरए या धर्मांतरण-विरोधी कानून लागू करे। हालाँकि ईसाई समूह इस कानून को अपनी धार्मिक पहचान पर हमले के रूप में देख रहे हैं। उन्हें ये समझने की जरूरत है कि एपीएफआरए अगर लागू होता है, तो यह ताकत से, प्रलोभन से या किसी झाँसे में आकर किए जा रहे धर्मांतरण के खिलाफ होगा।
तुर्की इन दिनों भारत की मशहूर कंपनी टाटा ग्रुप पर गुस्सा निकाल रहा है। उसका ब्रॉडकास्टर टीआरटी कह रहा है कि टाटा ने इजरायल को गाजा युद्ध के लिए हथियारों के पार्ट्स दिए। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने तुर्की की पोल खोल दी। रिपोर्ट में साफ लिखा है कि तुर्की खुद इजरायल की मदद कर रहा था।
पत्रकार सिद्धांत सिब्बल ने यूएन की रिपोर्ट की कॉपी शेयर की है। सिद्धांत ने लिखा, “जिन बंदरगाहों ने एफ-35 के पुर्जों, हथियारों, जेट ईंधन, तेल और अन्य सामग्रियों को इजरायल तक पहुँचाने में मदद की है, उनमें तुर्की भी शामिल है।”
Turkish broadcaster TRT targets Indian company over Israel ties, but forgets to mention, a UN report this month said, "ports known to have facilitated trans-shipment to Israel of F-35 parts, weapons, jet fuel, oil and/or other materials include Türkiye" pic.twitter.com/EYlBxvMZel
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगस्त 2025 में जब गाजा पर इजरायल का कब्जा कर लिया, उस वक्त भी मिस्र ने इजरायल के साथ 35 बिलियन यूएस डॉलर के गैस डील की। ये इजरायल के इतिहास में सबसे बड़ी गैस डील थी। यूरोपीय यूनियन और मिस्र लगातार गाजा से नजदीक से अवैध तरीके से होकर जाने वाले गैस पाइप लाइन से गैस मँगाते रहे हैं। ये तभी भी था जब फिलिस्तीन पर इजरायल ने ताबड़तोड़ हमला किया और अभी भी है, जब गाजा पर इजरायल का कब्जा हो चुका है।
इजरायल का व्यापार और सामानों की आवाजाही दूसरे देशों के परिवहन तंत्र पर ही निर्भर रही है। अमेरिका के अलावा तुर्की, फ्रांस, इटली, बेलजियम, नीदरलैंड,ग्रीस, मोरक्को आदि देशों के बंदरगाहों से एफ-35 के पुर्जों, हथियारों, जेट ईंधन, गैस और ऑयल समेत दूसरी सामग्रियों को इजरायल तक पहुँचाए गए।
टाटा समूह पर तुर्की के आरोप
तुर्की गाजा के विनाश के लिए भारतीय कंपनी ‘टाटा समूह’ पर आरोप लगा रहा है। टीआरटी का कहना है कि इजरायल को हार्ड वेयर और दूसरे साजो सामान टाटा ने उपलब्ध कराए। टाटा समूह की कंपनी टाटा मोटर्स की सहायक कंपनी जगुआर लैंड रोवर पर एमडीटी डेविड हल्के वाहनों के चेसिस की आपूर्ति करने का आरोप लगाया।
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) पर इजरायल की वित्तीय और सरकारी प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा प्रदान करने और प्रोजेक्ट निम्बस में भागीदारी करने का आरोप लगाया है। टीआरटी का कहना है कि इसका इस्तेमाल इजरायल ने गाजा की निगरानी में किया।
टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) पर आरोप लगाया गया कि सभी नए F-16 लड़ाकू विमानों के लिए विंग और सभी AH-64 अपाचे हमलावर हेलीकॉप्टरों के लिए फ्यूज़लेज उपलब्ध कराया। जबकि इन विमानों के फ्यूल की व्यवस्था तुर्की के बंदरगाहों ने किया। इन बंदरगाहों से विमानों के कलपुर्जें और दूसरे सामान मँगाए गए। इनका इस्तेमाल गाजा युद्ध में इजरायल ने किया। तुर्की पहले अपने गिरेबान में झाँक ले। इजरायल को मदद करने के सबूत संयुक्त राष्ट्र के पास हैं।
इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध और गाजा में बमबारी के दौरान इजरायल द्वारा इस्तेमाल विस्फोटकों को पहुँचाने में तुर्की का हाथ रहा। जबकि भारत ने इस युद्ध से दूरी बनाई और मानवीय आधार पर इजरायल के साथ-साथ गाजा में रहने वाले लोगों की मदद की। तुर्की के दोगले रवैये का ये एक उदाहरण है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान का दिया था साथ
दरअसल ये वही तुर्की है, जिसने गाजा युद्ध के दौरान अपनी हवाई अड्डों को इजरायल के लिए बंद करने का ऐलान किया था। यहाँ तक कि अपने बंदरगाहों पर इजरायली जहाजों के आने पर पाबंदी लगा दी थी, लेकिन अब उसकी असलियत सामने आ गई है।
तुर्की उन चंद देशों में शामिल है, जिसकी नीति ‘भारत विरोध’ की रही है। तुर्की पर जब प्राकृतिक आपदा आई, तो उसकी मदद के लिए सबसे पहला हाथ भारत ने उठाया। लेकिन जब भारत पर पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकियों ने पर्यटकों पर हमला किया और भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकियों के ठिकानों को निशाना बनाया, तो तुर्की को ‘सार्वभौमिकता’ याद आ गई।
उसने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के वक्त भारत के खिलाफ और पाकिस्तान के समर्थन में बयान दिए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्लामाबाद के पक्ष में खड़े दिखाई दिया था। अब साजिश के तहत भारतीय कंपनियों को टारगेट किया जा रहा है। दरअसल ये सभी सामने आया था कि तुर्की में भारतीय पर्यटकों की संख्या काफी कम हो गई है।
पहले भारतीयों की पसंदीदा जगहों में इस्तांबुल हुआ करता था। हिन्दी फिल्मों की शूटिंग भी काफी यहाँ होती थी, लेकिन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान तुर्की के स्टेंड की वजह से भारत में नाराजगी दिखाई दी। सोशल मीडिया पर #BoycottTurkey हैशटैग ट्रेंड करने लगा। तुर्की की यात्रा रद्द करने की अपील की जाने लगी और पर्यटन एजेंसियों ने अपनी सेवाएँ रोक दी।
तुर्की के पर्यटन उद्योग पर काफी असर पड़ा। अनुमान के मुताबिक ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद 33.3% भारतीय पर्यटकों की संख्या यहाँ कम हो गई। इसकी खीझ निकालने के लिए अब तुर्की भारतीय कंपनियों को टारगेट कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जिन देशों ने इजरायल को जरूरी सामानों यहाँ तक कि ऑयल और गैस के आवाजाही के लिए अपनी बंदरगाह का इस्तेमाल करने दिया, उनमें तुर्की, फ्रांस, इटली,मोरक्को भी शामिल हैं। अब तुर्की से पूछा जाना चाहिए कि उसने किस आधार पर टाटा समूह पर उँगली उठाई। इजरायल के साजो सामान के लिए अपने बंदरगाह के इस्तेमाल करने की इजाजत दी। न सिर्फ तुर्की बल्कि यूरोपियन देशों और मिस्र ने गैस डील की। ये गाजा पर आक्रमण करने से अब तक जारी है।
ग्रेटर नोएडा में 17 साल के दलित लड़के के साथ बेरहमी से की गई मारपीट मामले में सोशल मीडिया पर कुछ लोग अलग खेल को खेल रहे हैं। बताया जा रहा है कि अनिकेत जाटव को मारने वाले ऊँची जाति के लोग थे इसलिए उत्तरप्रदेश सरकार उसे नहीं दिलाएगी।
देख सकते हैं कि सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने अपने ट्वीट में लिखा है- “एक 17 के दलित लड़के की उसके जन्मदिन पर ऊँची जाति वालों ने ग्रेटर नोएडा में बुरी तरह पिटाई की। उसे मारते हुए कहा गया- तेरी औकात क्या है?”
शमा लिखती हैं, “हर हफ्ते- दो हफ्ते में हम ऐसी खबरें देखते हैं जहाँ भाजपा राज में दलितों को मारा जा रहा है। नरेंद्र मोदी और उनकी डबल इंजल की सरकार पूरी तरह से दलितों को बचाने में विफल हो चुकी है।”
शमा के इस ट्वीट को पढ़कर शायद किसी को भी अपर कास्ट लोगों से घृणा हो जाए कि जातिवाद के कारण एक दलित को मारा गया और आपके मन में सवर्णों के लिए यही घृणा डालना शमा मोहम्मद का मकसद है।
इस केस में हकीकत यह है कि आरोपित अनुसूचित जनजाति से आने वाले लड़के थे। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में यह बात साफ लिखी गई है कि अनिकेत के साथ जो दुर्व्यवहार और मारपीट की घटना हुई वो मीणा समुदाय से आने वाले लड़कों ने की। उन्होंने ही अनिकेत और उनके चाचा सुमित कुमार को डंडे और रॉड से पीटा था।
— POLICE COMMISSIONERATE GAUTAM BUDDH NAGAR (@noidapolice) October 25, 2025
बाद में पुलिस ने इस केस में युवराज मीणा और जीतू मीणा को गिरफ्तार भी किया है। मगर शमा मोहम्मद जैसे लोग एक दलित लड़के की हत्या पर भी अपनी राजनीति करने में लगे हैं। उन्हें ये जानकारी भी नहीं है कि जिस समय वह ट्वीट कर रहीं थीं, उस वक्त अनिकेत की हालत क्या थी।
बता दें कि सिर्फ शमा मोहम्मद ही नहीं, समाजवादी पार्टी और भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद तक ने भी इस मामले में बिन सच्चाई को जानें सवाल उठाए। नीचे स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं कि कैसे पूरे मामले को दलित बनाम अपर कास्ट बनाने का प्रयास हुआ है।
अनिकेत ने अस्पताल में तोड़ा दम
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, घटना 15 अक्टूबर की है। अंबेडकर नगर के रबूपुरा इलाके में हुई मारपीट के बाद अनिकेत गंभीर स्थिति में अस्पताल में भर्ती में था। एक हफ्ते तक उसने यहाँ जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ी और फिर उसने दम तोड़ दिया।
खबर आने के बाद भाजपा विधायक धीरेंद्र सिंह भी परिवार को सांत्वना देने पहुँचे। उनकी सीएम योगी से बात कराने की भी जानकारी सामने आई है। मुख्यमंत्री ने खुद कार्रवाई का आश्वासान दिया है।
रबूपुरा के अनिकेत प्रकरण में दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी। मेरी सांत्वना पीड़ित परिवार के साथ हैं। मौके पर पीड़ित के घर जाकर परिवार को ढांढस बंधाया और प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री @myogiadityanath जी से फ़ोन पर वार्ता भी कराई। #MLAJewarpic.twitter.com/jqeMoukvrW
फिर भी कॉन्ग्रेस नेत्री, भीम आर्मी के नेता समेत उन जैसे लोग इस पूरे मामले में परिवार के साथ खड़े होने की जगह अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं। कभी आरोपितों को ‘अपर कास्ट’ का कहकर केस को उछाला जा रहा है तो कभी इसे ‘योगी सरकार की नाकामयाबी’ बताकर पेश किया जा रहा है।
FIR में क्या है?
इस पूरे मामले में हुई एफआईआर की कॉपी ऑपइंडिया के पास है। एफआईआर पढ़कर पता चलता है कि 15 अक्टूबर को जब सुमित और अनिकेत उसके जन्मदिन पर घूमने के लिए सयद पोखर गए थे तभी वहाँ आसिफ नाम का लड़का आया और उन्हें देखकर गया। इसके बाद ही युवराज, जीतू, रचीत, सुनील समेत कई लड़के आए और लाठी डंडे से दोनों को मारा गया। इस दौरान उनके साथ गाली-गलौच भी हुई। उन्हें जातिसूचक शब्द भी कहे गए। एफआईआर में युवराज, जीतू, रचीत, भरत, अंकित, पवन, सुनील को नामजद किया गया है। इनके अलावा 10-12 लोग अज्ञात पर केस दर्ज हुआ है।
अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में शुक्रवार (24 अक्टूबर 2025) को अरुणाचल प्रदेश इंडिजिनस यूथ ऑर्गेनाइजेशन (APIYO) के नेतृत्व में सैकड़ों की संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए। इनके हाथों में ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस जाओ’ और ‘अरुणाचल प्रदेश को बचाओ’ जैसे नारे लिखे पोस्टर थे।
दरअसल, म्यांमार से सटा अरुणाचल प्रदेश, ईसाई धर्मांतरण और इस्लामी कट्टरपंथियों की घुसपैठ की दोहरी मार झेल रहा है। सड़कों पर उतरे ये युवा भी इन्हीं इस्लामी कट्टरपंथियों की घुसपैठ से परेशान हैं। इन युवाओं की माँग है कि राजधानी ईटानगर और नाहरलागुन (जिन्हें अरुणाचल प्रदेश की जुड़वाँ राजधानियाँ कहा जाता है) में मुस्लिमों ने जमीन पर कब्जा कर 15-20 मस्जिद व अन्य इस्लामी धार्मिक स्थल बना लिए हैं जिन्हें हटा दिया जाना चाहिए।
युवाओं का यह विरोध प्रदर्शन आकाशदीप से शुरू होकर आईजी पार्क के पास टेनिस कोर्ट तक पहुँचा जहाँ सैकड़ों युवाओं ने धरना दिया। इस प्रदर्शन में APIYO के साथ ऑल कैपिटल कॉम्प्लेक्स यूथ वेलफेयर एसोसिएशन और ऑल नाहरलागुन यूथ वेलफेयर एसोसिएशन भी शामिल थे।
हर दिन 1-2 हजार मुस्लिम राज्य में कर रहे प्रवेश: APIYO अध्यक्ष लियाक
इस प्रदर्शन को लेकर ऑपइंडिया ने APIYO के अध्यक्ष तारो सोनम लियाक से बातचीत की है। लियाक ने इस बातचीत में कई हैरान करने वाले दावे किए हैं। उन्होंने बताया है कि अरुणाचल प्रदेश में हर दिन अन्य राज्यों या देशों से एक हजार से दो हजार मुस्लिम व्यक्ति इनर लाइन परमिट (ILP) दिखाकर प्रवेश कर रहे हैं।
हालाँकि, उन्होंने इसके बाद जो बताया वो भी खतरनाक है। लियाक के मुताबिक, ये लोग ILP दिखाकर घुस जाते हैं लेकिन फिर भीड़ में गायब हो जाते हैं और वापस अपने मूल स्थान पर नहीं लौटते हैं।
लियाक का कहना है कि मुस्लिमों की बढ़ती जनसंख्या डेमोग्राफी में बदलाव का मामला तो है ही। इसके अलावा राज्य की सांस्कृतिक और सामाजिक सुरक्षा पर भी इससे गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
लियाक ने आरोप लगाया कि बाहरी लोगों के बढ़ते ठिकानों के कारण ड्रग्स और नशे की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है, जिससे स्थानीय युवाओं पर गहरा असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा, “अगर सरकार ने समय रहते कदम नहीं उठाए, तो अरुणाचल की सांस्कृतिक पहचान खतरे में पड़ जाएगी।”
APIYO ने राज्य के मुख्य सचिव को लिखा पत्र
APIYO ने इन घटनाओं को लेकर अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव को भी पत्र लिखा है। ऑपइंडिया के पास मौजूद दो पन्नों के इस पत्र में माँग की गई है कि जुड़वाँ राजधानी परिसर के भीतर जामा मस्जिद/मदरसा के अवैध निर्माण को तत्काल रद्द किया जाए और जुड़वाँ राजधानी शहर ईटानगर और नाहरलागुन में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को तत्काल हटाया जाए।
APIYO ने पत्र में लिखा है, “जुड़वाँ राजधानी शहर 13730 से अधिक मुस्लिम आबादी रह रही है लेकिन इसमें से 20% मुस्लिम आबादी बांग्लादेशी है, जो राज्य के हमारे मूल निवासियों के लिए एक बड़ा खतरा है।”
APIYO ने लिखा, “राज्य सरकार की जानकारी के बिना जुड़वाँ राजधानी परिसर के भीतर 10 से अधिक अवैध जामा मस्जिदें चल रही हैं, जो मूल निवासियों के लिए बहुत असुरक्षित है। इसलिए, जुड़वाँ राजधानी शहर के भीतर केवल 2 जामा मस्जिदों की अनुमति देना आवश्यक है और राज्य के मूल निवासियों के हित में अन्य को तुरंत हटा दिया जाना चाहिए।”
इसके अलावा संगठन ने राजधानी परिसर और उसके नजदीक दोईमुख, होलोंगी आदि जगहों पर साप्ताहिक बाजार पर प्रतिबंध लगाए जाने की माँग की है। पत्र में लिखा गया है, “राजधानी परिसर और उसके पड़ोसी क्षेत्रों जैसे दोईमुख और होलोंगी आदि में हर दिन साप्ताहिक बाजार लगता है, जहाँ बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी व्यापारिक उद्देश्य से बाहर से हमारे राज्य में आते हैं और राजधानी परिसर में किराए के कमरों में रहते हैं, जो हमारे स्थानीय स्वदेशी व्यापारिक समुदाय के लिए एक खतरा है।”
साथ ही, संगठन की चिंता है कि राज्य में बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी प्रवेश कर रहे हैं और अगर इसे समय रहते नहीं रोका गया तो अपराध दर बढ़ने की बहुत संभावना है।
मुख्य सचिव को APIYO का पत्र (फोटो साभार: तारो सोनम लियाक)
प्रशासन ने शुक्रवार को प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए और पूरा विरोध शांतिपूर्वक संपन्न हुआ। हालाँकि, संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने उनकी माँगों पर जल्द कार्रवाई नहीं की, तो आंदोलन को राज्यव्यापी स्तर पर तेज किया जाएगा।
हालाँकि, प्रशासन ने कार्रवाई का भरोसा दिया है और मस्जिदों की जाँच की है लेकिन संगठन के लोग इस जाँच से संतुष्ट नहीं हैं। लियाक का कहना है कि वह चाहते हैं कि सरकार 15 दिनों के भीतर-भीतर इस पर सही तरीके से कार्रवाई करे वरना वह इस विरोध को राज्य स्तर तक लेकर जाएँगे।
गौरतलब है कि सीमावर्ती राज्य होने के कारण अरुणाचल प्रदेश में बाहरी राज्यों के लोगों को प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट (ILP) लेना अनिवार्य है। APIYO जैसे स्थानीय संगठनों का आरोप है कि इस व्यवस्था का दुरुपयोग कर बड़े पैमाने पर अवैध बसावट की जा रही है।
अमेरिकी अखबार द वाशिंगटन पोस्ट ने शुक्रवार (24 अक्टूबर 2025) को अडानी समूह और मोदी सरकार की छवि को खराब करने की कोशिश की। अखबार ने बिना सबूत दिए ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ (सरकार-उद्योगपतियों के बीच साठगांठ) या ‘भ्रष्ट पूँजीवाद’ के आरोप लगाते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की।
यह रिपोर्ट ‘India’s $3.9 billion plan to help Modi’s mogul ally after U.S. charges’ शीर्षक से प्रकाशित की गई है। इसमें दावा किया गया कि मोदी सरकार ने भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) पर दबाव डालकर अडानी समूह में निवेश कराने की योजना बनाई थी।
‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने कहा कि उसने आंतरिक दस्तावेज हासिल किए हैं, जिनसे यह पता चलता है कि सरकारी अधिकारियों ने मई महीने में एक प्रस्ताव तैयार कर उसे आगे बढ़ाया, जिसके तहत लगभग $3.9 बिलियन (करीब 32,000 करोड़ रुपए) का निवेश LIC के जरिए अडानी समूह की कंपनियों में कराने की बात थी। अखबार का आरोप है कि यह कदम मोदी सरकार के प्रभाव में लिया गया ताकि अडानी समूह को मदद मिल सके।
वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित प्रचार लेख का स्क्रीनशॉट
जहाँ ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने इसे किसी ‘एक्सक्लूसिव जानकारी’ के रूप में पेश करने की कोशिश की, वहीं वास्तव में यह निवेश अडानी समूह ने खुद मई महीने में एक प्रेस रिलीज में घोषित किया था।
अडानी समूह ने कहा था, “देश की सबसे बड़ी ट्रांसपोर्ट कंपनी अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड (APSEZ) ने 15 साल की अवधि के लिए 5,000 करोड़ रुपए जुटाए हैं। यह रकम कंपनी ने नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) जारी करके जुटाई है। कंपनी की मजबूत आर्थिक स्थिति और ‘AAA/Stable’ क्रेडिट रेटिंग के चलते इस पर 7.75% सालाना ब्याज दर तय की गई है। इस पूरे इश्यू को भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने खरीदा है। ये डिबेंचर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर सूचीबद्ध किए जाएँगे।।”
साधारण शब्दों में, NCD एक फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रूमेंट है, जिसमें निवेशक को ब्याज मिलता है लेकिन इसे कंपनी के शेयर में बदलने का विकल्प नहीं होता। इस LIC-अडानी डील में, LIC को 7.75% वार्षिक ब्याज मिलेगा और 5000 करोड़ रुपए की मूल राशि परिपक्वता यानी 2040 में वापस मिल जाएगी।
LIC जैसी संस्था के लिए, अडानी पोर्ट्स में यह निवेश एक सुरक्षित और पूर्वानुमानित आय का स्रोत होगा, क्योंकि इसमें जोखिम कम है और क्रेडिट रेटिंग AAA/Stable है।
साथ ही यह बताना भी जरूरी है कि भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की जीवन बीमा कंपनी LIC ने कई निजी कंपनियों में भारी निवेश किया है।
उदाहरण के लिए, LIC के प्रमुख निवेशों में रिलायंस इंडस्ट्रीज (1.38 लाख करोड़ रुपए), ITC Ltd (82,342 करोड़ रुपए), HDFC बैंक, TCS, IDBI बैंक, ICICI बैंक, भारती एयरटेल, SBI, L&T और इंफोसिस शामिल हैं।
इसलिए, यह असामान्य नहीं है कि LIC ने अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन लिमिटेड (APSEZ) में भी 5000 करोड़ रुपए का निवेश किया।
फिर भी ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने बिना ठोस सबूत के आरोप लगाया कि मोदी सरकार किसी तरह करदाता के पैसे का इस्तेमाल करके एक भारतीय समूह की मदद कर रही है, जो कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है।
‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने ‘आंतरिक दस्तावेज’ के हवाले से दावा किया कि भारत के वित्तीय सेवा विभाग (DFS) ने LIC को अडानी ग्रुप में निवेश करने से सावधान किया था। हालाँकि, ऐसे किसी ‘आंतरिक दस्तावेज’ के होने की पुष्टि नहीं हुई है।
अखबार ने एक दस्तावेज के हवाले से दावा किया, “DFS के दस्तावेजों में यह स्वीकार किया गया कि प्रस्तावित निवेश योजना में जोखिम हैं। अडानी की सिक्योरिटीज विवादों के प्रति संवेदनशील हैं… जिससे अल्पकालिक कीमत में उतार-चढ़ाव हो सकता है।”
रिपोर्ट में अखबार ने एक तथाकथित ‘स्वतंत्र विशेषज्ञ’ हेमिंद्रा हजारी का हवाला देते हुए भारतीय सरकार, LIC और अडानी ग्रुप की ईमानदारी पर सवाल उठाने की कोशिश की।
इसके बावजूद, ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ को यह मानना पड़ा कि LIC द्वारा किया गया निवेश पूरी तरह पारदर्शी प्रक्रिया के तहत हुआ था यानी सभी नियामक नियमों का पालन करते हुए, पूरी जाँच-पड़ताल (due diligence) के साथ और आर्थिक लाभ को ध्यान में रखकर निवेश किया गया था।
अखबार ने Hindenburg रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसे अब खारिज कर दिया गया है, ताकि अडानी समूह के खिलाफ बिना सबूत भ्रष्ट पूँजीवाद के आरोप फैलाए जा सकें।
एलआईसी ने वाशिंगटन पोस्ट के दावों को खारिज किया
भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने शनिवार (25 अक्टूबर 2025) को जारी बयान में कहा, “द वाशिंगटन पोस्ट द्वारा लगाए गए यह आरोप कि LIC के निवेश निर्णय बाहरी दबावों से प्रभावित होते हैं, पूरी तरह झूठे, बेबुनियाद और वास्तविकता से दूर हैं।”
सार्वजनिक क्षेत्र की इस बीमा कंपनी ने किसी भी आंतरिक दस्तावेज के अस्तित्व के दावे को भी खारिज किया, जो अखबार की रिपोर्ट की एकमात्र आधारशिला थी।
LIC ने स्पष्ट किया, “इस तरह का कोई दस्तावेज या योजना कभी तैयार नहीं की गई है, जो LIC के द्वारा अडानी समूह में निवेश के लिए रोडमैप बनाए। निवेश निर्णय LIC अपने बोर्ड-स्वीकृत नीतियों के अनुसार स्वतंत्र रूप से, विस्तृत परिश्रम (due diligence) करने के बाद ही लेता है।”
अडानी ग्रुप ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि वित्तीय सेवा विभाग (DFS) या कोई अन्य सरकारी संस्था उसके निवेश निर्णयों में किसी भी तरह की भूमिका नहीं निभाती है।
कंपनी ने कहा, “LIC ने हमेशा उच्चतम स्तर की जाँच-पड़ताल (due diligence) सुनिश्चित की है। उसके सभी निवेश निर्णय मौजूदा नीतियों, कानूनी प्रावधानों और नियामक दिशानिर्देशों के पूरी तरह पालन के साथ, अपने सभी निवेशकों और हितधारकों के सर्वोत्तम हित में लिए गए हैं।”
अडानी समूह ने क्रोनी कैपिटलिज्म के आरोपों से इनकार किया
अडानी समूह ने भी द वाशिंगटन पोस्ट द्वारा लगाए गए भ्रष्ट पूँजीवाद के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
समूह ने कहा, “हम यह साफ तौर पर कहते हैं कि हमारा किसी भी कथित सरकारी योजना से कोई संबंध नहीं है, जिसके तहत LIC के फंड्स को निर्देशित किया गया हो। LIC कई कॉरपोरेट समूहों में निवेश करती है, इसलिए यह कहना कि अडानी ग्रुप को कोई विशेष तरजीह दी गई, भ्रामक है।”
LIC ने आगे कहा, “इसके अलावा, LIC को हमारे पोर्टफोलियो में किए गए निवेश से अच्छा रिटर्न मिला है। राजनीतिक पक्षपात या किसी विशेष सरकारी समर्थन के दावे पूरी तरह निराधार हैं। हमारा विकास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय नेतृत्व से पहले ही शुरू हो चुका था।”
अडानी और मोदी सरकार पर निशाना साधने वाली संदिग्ध रिपोर्ट के पीछे ‘पत्रकार’
इस तथाकथित ‘हिट-पीस’ रिपोर्ट के पीछे जिन कथित पत्रकारों का नाम सामने आया है, उनमें से एक प्रांशु वर्मा हैं।
ऑपइंडिया ने दिसंबर 2023 में रिपोर्ट किया था कि वह अमेरिकी राजनीतिक टिप्पणीकार जैक पोसोबिक से भारतीय OSINT (ओपन सोर्स इंटेलिजेंस) हैंडल ‘Disinfo Lab’ के बारे में जानकारी माँग रहे थे।
प्रंशु वर्मा, जो फरवरी 2022 से The Washington Post में काम कर रहे हैं, कथित तौर पर जैक पोसोबिक को ‘Disinfo Lab’ से जुड़ी जानकारियाँ साझा करने से रोकना करना चाहते थे।
उन्होंने जनवरी 2023 में एक लेख ‘Tracking rising religious hatred in India, from half a world away’ में इस्लामवादी रकीब हामिद नाइक की सकारात्मक झलक पेश की। रकीब हामिद नाइक एक कुख्यात फर्जी समाचार फैलाने वाला है और ‘Hindutva Watch’ नाम के एक एंटी-हिंदू प्रोपेगेंडा प्लेटफॉर्म का संस्थापक भी है।
प्रांशु वर्मा के लेख का स्क्रीन शॉर्ट
वह (रकीब हामिद नाइक) कश्मीर घाटी में 1990 के दशक की शुरुआत में कट्टर इस्लामवादियों द्वारा किए गए हिंदू जनसंहार को नकारने के लिए भी कुख्यात है। नाइक ने काशी में ज्ञानवापी मस्जिद के भीतर पाए गए हिंदू शिवलिंग का भी मजाक उड़ाया था।
प्रांशु वर्मा ने जनवरी 2023 में अपने लेख में DOTO द्वारा उपलब्ध कराए गए डेटाबेस का हवाला देकर भारत में धार्मिक घृणा बढ़ने का दावा किया। ‘Disinfo Lab’ ने पहले DOTO की फर्जी रिपोर्टों को उजागर किया था, जिसके बाद DOTO ने डेटाबेस को पहले संशोधित किया और फिर हटा दिया।
लेख के सह-लेखक एक अन्य ‘पत्रकार’ रवि नायर हैं, जो वामपंथी प्रचार पोर्टल ‘द वायर’ के कॉलमिस्ट हैं।
इस साल सितंबर में, दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें ऐसा कथित defamatory content हटाने का आदेश दिया, जो उन्होंने हिंडनबर्ग रिसर्च के झूठ पर आधारित प्रकाशित किया था ताकि व्यवसायी गौतम अडानी की छवि खराब की जा सके।
रवि नायर ने फरवरी 2025 में ब्रिटिश अखबार द गार्जियन में अडानी समूह के बारे में झूठ फैलाए। मोदी सरकार पर निशाना साधने की हताशा में, इस ‘पत्रकार’ ने खुद को बेवकूफ बनाते हुए भारतीय रुपए की तुलना अफगानिस्तान की मुद्रा से कर दी।
Bhakt Mandali and their media should ask Rishi Sunak whether he eats beef or not ?
ऑपइंडिया ने पहले यह भी बताया था कि ऑस्ट्रेलिया की NGO समर्थित पोर्टल ‘Adani Watch’ लगभग सभी भ्रामक लेखों को रीट्वीट करता है, जो रवि नायर द्वारा प्रकाशित किए जाते हैं। यह पत्रकार हिंदू भावनाओं का मजाक उड़ाने और नियमित रूप से हिंदू विरोधी (Hinduphobic) सामग्री फैलाने के लिए जाना जाता है।
उन्होंने पहले स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के बारे में झूठ फैलाए और उसके ध्वस्त करने की भी माँग की। रवि नायर राफेल डील के बारे में भी झूठ फैलाने और भारत की रक्षा खरीद को रोकने में आगे रहे, हालाँकि इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में दिबाकर दत्ता ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)