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12 बजे रात नहीं, 8 बजे हॉस्टल से बाहर गई थी पीड़िता: दुर्गापुर में मेडिकल छात्रा से गैंगरेप केस पर अस्पताल का बयान, CM ममता बनर्जी पर उठे सवाल

दुर्गापुर के मेडिकल कॉलेज की छात्रा से हुए गैंगरेप मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ‘झूठ’ बोलने को लेकर सियासत गर्म है। ममता बनर्जी ने लड़की के रात 12 बजे एक लड़के के साथ बाहर जाने पर सवाल उठाया है। जबकि लड़की रात 8 बजे बाहर गई थी। अस्पताल के बाहर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की होनी चाहिए, न की सिर्फ मेडिकल कॉलेज की। ममता बनर्जी इस मामले पर भी राजनीति करती नजर आ रही हैं।

विपक्षी दलों और महिला अधिकार समूहों ने उन पर ‘पीड़िता को दोषी ठहराने’ का आरोप लगाया है। रविवार (12 अक्टूबर) को इस दर्दनाक घटना पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि लड़कियों को अपनी सुरक्षा के लिए रात में कॉलेज परिसर से बाहर निकलने से बचना चाहिए।

कोलकाता हवाई अड्डे पर पत्रकारों से बात करते हुए, मुख्यमंत्री ने कहा, “लड़कियों को रात में कॉलेज से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उन्हें अपनी सुरक्षा भी करनी होगी।”

सीएम ममता बनर्जी ने कहा, “वह एक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में पढ़ रही थी, तो जिम्मेदारी किसकी है? रात 12.30 बजे बाहर क्यों गई? जाँच चल रही है, लेकिन प्राइवेट मेडिकल कॉलेज को अपने छात्रों पर ध्यान देने की जरूरत है। खास तौर पर रात को छात्राओं को बाहर जाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।”

इस बीच पीड़िता के पिता ने उसकी सुरक्षा के मद्देनजर उसे ओडिशा शिफ्ट करने को कहा है। उनका कहना है कि लड़की की जान खतरे में है।

ममता बनर्जी ने झूठ बोला- बीजेपी

बीजेपी ने सीएम ममता बनर्जी पर जनता को गुमराह करने और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ट्वीट कर पूछा है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लड़की के रात 12:30 बजे बाहर होने के बारे में कहा, जो गलत था। सच्चाई यह है कि आईक्यू सिटी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के अनुसार, लड़की रात 8 बजे बाहर गई थी, जो किसी भी मानक से उचित समय है।

दलित छात्रा के साथ कॉलेज परिसर में सामूहिक बलात्कार नहीं हुआ था। बल्कि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी पुलिस और राज्य प्रशासन की है। मुख्यमंत्री ने मेडिकल कॉलेज पर दोष मढ़ने की कोशिश की।

मेडिकल कॉलेज के पास का वन क्षेत्र आपराधिक गतिविधियों का केन्द्र माना जाता है। यहाँ उचित स्ट्रीट लाइटिंग की व्यवस्था नहीं है। दुर्गापुर के स्थानीय लोग ये जानते हैं। पश्चिम बंगाल पुलिस इस क्षेत्र की सुरक्षित बनाने में विफल रही।

मेडिकल कॉलेज की छात्रा के साथ गैंगरेप

दुर्गापुर की एक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज के दूसरे वर्ष की छात्रा के साथ गैंगरेप हुआ था। वह रात 8 बजे अपने पुरुष दोस्त के साथ खाना खाने बाहर गई थी। लड़की का कुछ लोगों ने पीछा किया और दोनों पर हमला किया। इस दौरान उसका दोस्त भाग गया, लेकिन लड़की का गैंगरेप किया गया।

पीड़िता ओडिशा की रहने वाली है। उसके पिता के मुताबिक, अब वह बार बार कहती है कि उसे जीने की इच्छा नहीं रही। उसे मर जाना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वह खुद को नुकसान पहुँचा ले। इस मामले में पुलिस ने तीन आरोपितों अपु बाउरी, फिरदौस शेख और शेख रियाजुद्दीन को गिरफ्तार किया है। जबकि चौथा आरोपित अभी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है।

बंगाल की बिगड़ी कानून व्यवस्था पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। एमबीबीएस द्वितीय वर्ष की छात्रा के साथ हुआ सामूहिक बलात्कार भी राज्य की कानून व्यवस्था की पोल खोल रही है। कॉलेज के नजदीक का वह इलाका आपराधिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है, तो पुलिस यहाँ चौकन्ना क्यों नहीं थी। क्यों यहाँ आपराधिक तत्व मौजूद थे।

बीजेपी का कहना है कि आगामी चुनाव को देखते हुए मुस्लिम समुदाय का समर्थन पाने के लिए ममता बनर्जी जाँच ठीक से न कराएँ और आरोपितों को रिहा करने के लिए क्षेत्र के मुस्लिम समुदाय के नेताओं से बातचीत करती हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। उनकी राजनीतिक स्वार्थ के सामने एक महिला की जान और गरिमा की कोई कीमत नहीं है।

ममता बनर्जी का रेप को कमतर आँकने का इतिहास रहा

ममता बनर्जी ने एक बार फिर यौन उत्पीड़न के मामलों को कम आँकने की कोशिश की और विवादास्पद टिप्पणी की। पिछले कुछ वर्षों में, सीएम बनर्जी और उनकी टीएमसी के वरिष्ठ सदस्यों को बलात्कार की घटनाओं पर अपनी असंवेदनशील प्रतिक्रियाओं को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है।

सबसे अहम मामलों में एक 2012 का पार्क स्ट्रीट सामूहिक बलात्कार मामला था। 6 फरवरी 2012 को कोलकाता के पार्क स्ट्रीट से घर लौट रही एक एंग्लो-इंडियन महिला सुजेट जॉर्डन के साथ चलती कार में 5 लोगों ने रेप किया था।

खबर सामने आने के तुरंत बाद, टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने आरोपितो को क्लीन चिट दे दी। उन्होंने घटना को ‘शजानो घोटोना’ (मनगढ़ंत घटना) करार दिया, जो कथित तौर पर ‘सरकार को बदनाम करने के लिए रची गई थी।’

टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार समेत उनकी पार्टी के नेताओं ने पीड़िता के चरित्र पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए और घटना को ‘एक महिला और उसके मुवक्किल के बीच गलतफहमी’ बताया। 2015 में, कोलकाता की एक अदालत ने तीन आरोपियों को दोषी ठहराया, जिससे साबित हुआ कि हमला हुआ था।

2013 में, पश्चिम बंगाल विधानसभा में राज्य में बलात्कार के बढ़ते मामलों पर एक बहस के दौरान, मुख्यमंत्री ने इशारों-इशारों में कहा कि यह राज्य की बढ़ती आबादी के कारण है। उन्होंने बढ़ते बलात्कार के मामलों के लिए आधुनिकीकरण, शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स की बढ़ती संख्या को भी ज़िम्मेदार ठहराया था।

इसी साल बर्धवान समेत दूसरे रेप मामले में भी उन्होंने आरोपों को दरकिनार किया। उस वक्त जाँच चल रही थी। उन्होंने विपक्ष पर बंगाल को बदनाम करने का आरोप लगाया

अप्रैल 2022 में, ममता बनर्जी उस समय विवादों में घिर गईं जब उन्होंने एक 14 वर्षीय लड़की के साथ हुए बलात्कार और हत्या के आरोपों को ‘प्रेम प्रसंग’ का मामला बताकर कमतर आँकने की कोशिश की। पीड़िता नदिया जिले के हंसखाली की रहने वाली थी।

आरोपी की पहचान तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के गजना ग्राम पंचायत सदस्य समर गौला के बेटे ब्रजगोपाल के रूप में हुई है।

11 अप्रैल 2022 को उन्होंने दावा किया, “एक आम आदमी के रूप में, मैं कह रही हूँ कि किसी को यह सबूत कहाँ से मिलेगा कि लड़की के साथ वास्तव में बलात्कार हुआ था या वह गर्भवती थी। या कोई और कारण था, जैसे किसी ने उसे पीटा था या वह किसी बीमारी से मर गई थी?”

ममता बनर्जी ने आरोप लगाया, “निश्चित रूप से प्रेम संबंध था, उसके परिवार को इसके बारे में पता था, और उनके पड़ोसियों को भी। अब अगर कोई लड़की और लड़का एक-दूसरे से प्यार करते हैं, तो मैं उन्हें सजा नहीं दे सकती।”

यहाँ तक कि 2023 में, उत्तर दिनाजपुर के कालियागंज में मृत पाई गई एक 17 वर्षीय दलित लड़की के मामले में भी, बनर्जी ने इस घटना को कम करके आँका और कहा कि यह एक प्रेम संबंध के कारण हुई आत्महत्या थी। पुलिस जाँच पूरी होने से पहले ही उन्होंने कहा, “हमने व्हाट्सएप संदेश देखे हैं… प्रेम संबंध था।”

पीड़ितों को दोषी ठहराने का एक पैटर्न

पार्क स्ट्रीट से लेकर दुर्गापुर तक, बनर्जी के बयानों ने पुलिस व्यवस्था और महिला सुरक्षा में व्यवस्थागत कमियों को दूर करने के बजाय, पीड़ितों पर दोष मढ़ने की प्रवृति रही है। विपक्षी दलों और महिला संगठनों का कहना है कि उनकी बार-बार की गई टिप्पणियाँ ‘इनकार की एक खतरनाक संस्कृति’ को दर्शाती हैं जो पीड़ितों को आगे आने से हतोत्साहित करती है।

दुर्गापुर की जाँच जारी रहने के दौरान ममता बनर्जी के पीड़िता की हॉस्टल से निकलने की टाइमिंग को झूठ बता कर सियासी बवाल पैदा कर दिया है। ये न केवल एक जघन्य अपराध के बारे में, बल्कि सत्ता में बैठे उन लोगों की मानसिकता के बारे में भी सवाल खड़े करती है, जो महिलाओं की सुरक्षा को राज्य की बजाय अपनी ज़िम्मेदारी मानते हैं।

UP के चित्रकूट में ईसाई धर्मांतरण रैकेट का भंडाफोड़, बजरंग दल की सूचना पर 2 गिरफ्तार, तीसरा फरार: 1 साल में 40% ग्रामीणों का कराया धर्मांतरण

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में शनिवार (11 अक्टूबर 2025) को पुलिस ने रायपुरा थाना क्षेत्र के घुनुवा गाँव में एक ईसाई धर्मांतरण रैकेट को नाकाम किया। यह कार्रवाई तब हुई जब विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने इलाके में हो रहे जबरन धर्मांतरण की सूचना पुलिस को दी।

पुलिस ने दो पुरुषों को गिरफ्तार किया, जबकि एक आरोपित फरार हो गया। मौके से ईसाई धार्मिक साहित्य भी जब्त किया गया। बजरंग दल के जिला सह-समन्वयक शिवेंद्र प्रताप सिंह ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि इलाके में करीब 40% गरीब हिंदू पहले ही ईसाई मजहब में परिवर्तित हो चुके हैं।

घुनुवा गाँव में धर्मांतरण गतिविधि की सूचना

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बजरंग दल के जिला सह-समन्वयक शिवेंद्र प्रताप सिंह को जानकारी मिली कि घुनुवा गाँव में एक भारत वर्मा के घर पर धर्मांतरण बैठकें हो रही हैं। शिवेंद्र और उनके साथी कार्यकर्ताओं ने विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के साथ गाँव पहुँचकर रायपुरा पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने तुरंत घर पर छापा मारा, जिससे कई लोग मौके से भाग गए।

शुरुआत में पुलिस ने पूछताछ के लिए सात लोगों को हिरासत में लिया। शुरुआती पूछताछ के बाद चार ग्रामीणों को छोड़ दिया गया। तीन लोगों पर स्थानीय लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए पैसे देने का आरोप लगा। मौके से पुलिस ने कई नोटबुक और ईसाई मजहब से संबंधित धार्मिक सामग्री जब्त की।

ग्रामीणों ने आर्थिक प्रलोभन और हिंदू देवी-देवताओं के अपमान का आरोप लगाया

छापे के बाद स्थानीय ग्रामीणों ने शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उन्होंने घुनुवा गाँव के भारत वर्मा और रामविशाल तथा मौ थाना क्षेत्र के हटवा गाँव के महेश पर आरोप लगाया कि वे करीब एक साल से उन्हें जबरन ईसाई मजहब अपनाने के लिए मजबूर कर रहे थे। आरोपितों ने पैसे देने के साथ-साथ हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियाँ भी कीं। आरोपित गरीब हिंदू परिवारों को प्रभावित करने के लिए प्रार्थना बैठकें और बाइबल की कहानियाँ सुनाने के कार्यक्रम आयोजित कर रहे थे।

बजरंग दल के शिवेंद्र प्रताप सिंह कहते हैं, ‘40% गरीब हिंदुओं ने धर्म परिवर्तन किया।’

बजरंग दल के शिवेंद्र सिंह और अश्विनी तिवारी ने इस मामले में शिकायत दर्ज कराई, जिसे ऑपइंडिया ने देखा। शिकायत में उन्होंने बताया कि भारत वर्मा रामविशाल और महेश की मदद से एक साल से अधिक समय से प्रार्थना बैठकें आयोजित कर रहा था। आरोप है कि उन्होंने गरीब हिंदू परिवारों को पैसे देकर ईसाई मजहब में परिवर्तित किया। बैठकों के दौरान वे हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते और ईसा मसीह की तारीफ करते थे।

ऑपइंडिया से खास बातचीत में शिवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि चित्रकूट में कई ईसाई और इस्लामिक समूह धर्मांतरण रैकेट में शामिल हैं। उन्होंने बताया की “स्थानीय गरीब हिंदू आबादी का लगभग 40% हिस्सा पहले ही ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुका है। हम उनके लिए घर वापसी का प्रयास कर रहे हैं,”

शिवेंद्र ने कहा, “बजरंग दल इन समूहों और व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। जब हमें सूचना मिलती है, तो हम पहले पुष्टि करते हैं कि हिंदुओं को ईसाई मत में बदलने के लिए प्रार्थना बैठकें हो रही हैं। पुष्टि होने पर हम तुरंत स्थानीय पुलिस स्टेशन से संपर्क करते हैं। ज्यादातर मामलों में पुलिस तुरंत कार्रवाई कर इन रैकेट को बंद कर देती है। केवल ईसाई समूह ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समूह भी हिंदुओं को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि केवल बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद ही फर्क नहीं कर सकते। “हम धर्मांतरण रोकने के लिए व्यापक रूप से काम कर रहे हैं, लेकिन अकेले हम सबको रोक नहीं सकते। यह हर स्थानीय हिंदू का कर्तव्य है कि वे मिलकर इस तरह की गतिविधियों के खिलाफ आवाज उठाएँ।” शिवेंद्र ने पुष्टि की कि मामले में रविवार (12 अक्तूबर 2025) की सुबह FIR दर्ज की गई है और तीसरे आरोपित की तलाश जारी है।

पुलिस जाँच जारी

मीडिया से बात करते हुए रायपुरा थाना के थानाध्यक्ष इंस्पेक्टर विनोद शुक्ला ने पुष्टि की कि दो आरोपितों भारत वर्मा और रामविशाल सविता को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है। तीसरा आरोपित महेश फरार हो गया है और उसे पकड़ने के लिए तलाश शुरू कर दी गई है। जब्त किए गए मजहबी साहित्य की जाँच की जा रही है और ग्रामीणों के बयान दर्ज किए गए हैं।

अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि जाँच में आरोपों की पुष्टि होने के बाद उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस मामले ने स्थानीय लोगों में चिंता पैदा कर दी है और दक्षिणपंथी समूह जिले में गैरकानूनी धर्मांतरण गतिविधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

इंदिरा गाँधी को ‘शहीद’ बताने वाली कॉन्ग्रेस की पूर्व गृह मंत्री चिदंबरम ने खोली पोल, कहा- टाला जा सकता था ऑपरेशन ब्लू स्टार: जानें- दिल्ली में कैसे हुआ था सिख नरसंहार

कॉन्ग्रेस की वो पुरानी पोल अब खुद उनके बड़े नेता और पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने खोल दी है। कॉन्ग्रेस इंदिरा गाँधी को ‘शहीद’ बताकर हमेशा पॉलिटिकल फायदा उठाती रही है, लेकिन चिदंबरम ने साफ कहा कि ऑपरेशन ब्लू स्टार एक बड़ी ‘गलती’ थी, जिसे टाला जा सकता था।

इस गलती की कीमत इंदिरा गाँधी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी और फिर 1984 में सिखों का खौफनाक कत्लेआम हुआ। कॉन्ग्रेस ने आज तक इन दंगों के लिए माफी नहीं माँगी।

दरअसल, इंदिरा गाँधी ने पहले तो जरनैल सिंह भिंडरावाले को बढ़ावा दिया, ताकि अकाली दल की पॉलिटिक्स को कमजोर कर सकें और पंजाब में अपनी पकड़ मजबूत करें। लेकिन जब बात हाथ से निकल गई, तो उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार करवाया। इसके बाद उनकी हत्या हो गई, और दिल्ली समेत कई जगहों पर कॉन्ग्रेस वालों ने सिखों का नरसंहार कर डाला। चलिए, पूरी कहानी को समझते हैं

भिंडरावाले को बढ़ावा देने की शुरुआत

पंजाब में 1980 के दशक में हालात बिगड़ रहे थे। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई पंजाब को भारत से अलग करने की साजिश रच रही थी। भारत ने 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश छीना था, तो बदला लेने के लिए आईएसआई ने सिख आतंकवाद को हवा दी। जरनैल सिंह भिंडरावाले को उन्होंने अपना हथियार बनाया, जो खालिस्तान की माँग कर रहा था।

भिंडरावाले को प्रश्रय देने में कॉन्ग्रेस का हाथ था। इंदिरा गाँधी की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने उसे सपोर्ट किया, ताकि अकाली दल की पॉलिटिक्स पर हावी हो सकें। अकाली दल सिखों की मुख्य पार्टी थी और कॉन्ग्रेस चाहती थी कि पंजाब में उसकी ताकत कम हो।

साल 1981 में गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह (जो बाद में राष्ट्रपति बने) ने भिंडरावाले को जेल से छुड़वाया और कहा कि उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। 1982 में इंदिरा गाँधी ने बड़ा पॉलिटिकल मूव खेला और ज्ञानी जैल सिंह को राष्ट्रपति बना दिया।

अप्रैल 1983 से भिंडरावाले ने स्वर्ण मंदिर को अपना हेडक्वार्टर बना लिया। कॉन्ग्रेस की ये रणनीति थी, जिसमें अरुण नेहरू, अरुण सिंह, कमलनाथ और संजय गाँधी जैसे लोग शामिल थे। अंत में ये आग पूरे पंजाब को जला गई, सिखों और पूरे देश का नुकसान हुआ।

ऑपरेशन ब्लू स्टार: राजनीतिक फायदे के लिए करवाया

जब पंजाब हिंसा की आग में जलने लगा, तो इंदिरा गाँधी ने समझौते की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। भिंडरावाले ने हथियारबंद आतंकियों के साथ स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया। खालिस्तानी अलगाववादी पंजाब की स्वायत्तता की माँग को उग्र बना रहे थे। 1984 में लोकसभा चुनाव होने वाले थे और खुद को ‘देशभक्त’ दिखाने के लिए इंदिरा गाँधी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को हरी झंडी दे दी।

ऑपरेशन ब्लू स्टार 3 से 6 जून 1984 तक चला। भारतीय सेना का मकसद अमृतसर के हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) को भिंडरावाले और उसके समर्थकों से मुक्त कराना था। 1 जून 1984 को खालिस्तानी आतंकियों से समझौता फेल होने के बाद 3 जून को सुरक्षा बलों ने मंदिर घेर लिया। एक बड़ी वजह ये भी थी कि 3 जून को गुरु अर्जुन देव का शहीदी दिवस था, और हजारों श्रद्धालु वहाँ जुटने वाले थे। मंदिर के अंदर भिंडरावाले की मोर्चाबंदी और बाहर सेना की, पूरे इलाके को छावनी बना दिया।

4 जून को सेना ने गोलीबारी शुरू की, 5 जून को भारी टक्कर हुई। 83 सैनिक मारे गए, 249 घायल हुए। 6 जून को भिंडरावाले की मौत की खबर आई, और सेना ने मंदिर को मुक्त कर लिया। लेकिन सिखों के पवित्र मंदिर में सेना का घुसना दुनिया भर के सिखों को गुस्सा दिला गया।

चिदंबरम ने कहा कि ये गलत तरीका था। उन्होंने बताया, “मैं किसी सैन्य अधिकारी का अनादर नहीं कर रहा, लेकिन स्वर्ण मंदिर को कब्जे में लेने का वो गलत रास्ता था। कुछ साल बाद हमने सेना को बाहर रखकर सही तरीका दिखाया। ऑपरेशन ब्लू स्टार सभी उग्रवादियों को पकड़ने के लिए था। मैं मानता हूँ कि श्रीमती गाँधी ने उस गलती की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। वो गलती सेना, पुलिस, खुफिया और सिविल सर्विस का मिला फैसला था। सिर्फ श्रीमती गाँधी को दोषी नहीं ठहरा सकते।”

बीजेपी नेता अमित मालवीय ने उनका बयान शेयर कर पूछा है कि क्या अब कॉन्ग्रेस सच बोलने और उनके झूठे बयानों का पर्दाफाश करने के लिए चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई करेगी?

बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ट्वीट किया कि कॉन्ग्रेस इंदिरा और राजीव गाँधी को ‘शहीद’ बताकर माइलेज लेती है, लेकिन चिदंबरम ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को गलती बताकर इस मिथक को तोड़ दिया। राजीव गाँधी की हत्या भी पड़ोसी देशों से निपटने में फेल होने का नतीजा थी। अब क्या कॉन्ग्रेस चिदंबरम के खिलाफ एक्शन लेगी, क्योंकि उन्होंने सच बोला और उनके झूठ का पर्दाफाश किया?

राजनीतिक फायदे के लिए किया ऑपरेशन- बीजेपी

बीजेपी नेता आरपी सिंह कहते हैं, “ये विवादास्पद नहीं, सच है। ऑपरेशन टाला जा सकता था। गुरुद्वारे की बिजली-पानी काटकर या दूसरे रास्तों से आतंकियों को निकाला जा सकता था। लेकिन इंदिरा गाँधी सिर्फ चुनाव की चिंता में थीं। कॉन्ग्रेस को माफी माँगनी चाहिए। इससे बड़ा अपराध नहीं हो सकता। देश ऐसे अपराध को माफ नहीं करेगा। कॉन्ग्रेस के सारे फैसले पॉलिटिकल हैं।”

इंदिरा गाँधी की हत्या और सिखों का नरसंहार

3 से 6 जून 1984 तक भारतीय सेना द्वारा चलाए गए सैन्य कार्रवाई को ऑपरेशन ब्लू स्टार कहा जाता है। इसका मकसद अमृतसर (पंजाब) में हरिमंदिर साहिब परिसर को खालिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों से मुक्त कराना था।

ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला 31 अक्टूबर 1984 को लिया गया। इंदिरा गाँधी के दो सिख बॉडीगार्ड्स, सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने उन्हें गोली मार दी। हत्या के तुरंत बाद देश भर में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे। दिल्ली समेत 40 से ज्यादा शहरों में ये हुआ। दिल्ली में सबसे खराब हालत थी, जहाँ 3,000 से ज्यादा सिख मारे गए। कुल मिलाकर करीब 15,000 लोग मारे गए, और कम से कम 50,000 सिखों को घर छोड़कर भागना पड़ा।

आरोप कॉन्ग्रेस नेताओं पर लगा कि उन्होंने ये दंगे भड़काए। फरवरी 2025 में दिल्ली की एक कोर्ट ने पूर्व कॉन्ग्रेस सांसद सज्जन कुमार को 1984 दंगों में सरस्वती विहार में दो सिखों की हत्या का दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा दी। कॉन्ग्रेस ने इन दंगों के लिए कभी माफी नहीं माँगी।

कॉन्ग्रेस का पुराना चरित्र और चिदंबरम की चुप्पी का टूटना

कॉन्ग्रेस हमेशा पॉलिटिकल फायदे के लिए फैसले लेती रही। मनमोहन सिंह सरकार में 26/11 मुंबई अटैक हुआ, तो पाकिस्तान पर सबूतों के बावजूद अटैक नहीं किया, क्योंकि डर था कि बीजेपी को फायदा हो जाएगा। ये खुलासा पूर्व अमेरिकी प्रेसिडेंट ओबामा ने अपनी किताब में किया। कॉन्ग्रेस के इसी चरित्र को जानते हुए चिदंबरम ने अब चुप्पी तोड़ी।

कॉन्ग्रेस की इन गलतियों का खामियाजा देश और जनता को भुगतना पड़ा। भिंडरावाले को बढ़ावा दिया, फिर हिंसा रोकने के नाम पर ऑपरेशन किया, हत्या हुई तो सिखों का कत्लेआम करवाया। चिदंबरम का बयान पुराने जख्म ताजा कर गया और साफ है कि कॉन्ग्रेस को इन सबके लिए माफी माँगनी चाहिए।

15 वर्षों में भारत में होगा ₹8884000 करोड़ का निवेश, भारतीयों को मिलेंगे 10 लाख रोजगार: भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के बीच लागू हुआ ऐतिहासिक व्यापार समझौता

भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के बीच व्यापार और आर्थिक भागीदारी समझौता (TEPA) आधिकारिक तौर पर 1 अक्टूबर, 2025 से लागू हो गया है। इससे आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड के साथ आर्थिक सहयोग के एक नए युग की शुरुआत हुई है। 10 मार्च, 2024 को नई दिल्ली में इस समझौते पर हस्ताक्षर हुआ था।

इस समझौते से अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर यानी 8 लाख 88 हजार 4 सौ करोड़ रुपए का निवेश होगा। साथ ही 10 लाख से ज्यादा सीधा रोजगार मिलेगा। इसके अलावा इससे जुड़े अप्रत्यक्ष रोजगार अलग होंगे। यह इन चार विकसित यूरोपीय देशों के साथ भारत का पहला मुक्त व्यापार समझौता है। वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच व्यापारिक समझौतों की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

क्या है EFTA

चार यूरोपीय देशों, आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड का ये संगठन व्यापार के दृष्टिकोण से काफी अहम हबै। इसकी स्थापना 1960 में सदस्यों के बीच मुक्त व्यापार और आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। यूरोप में यूके और यूरोपीय संघ के बाद EFTA अहम संगठन माना जाता है।

संगठन यूपोपीय संघ का हिस्सा नहीं हैं। चारों विकसित देश अपनी मजबूत अर्थव्यवस्थाओं, उच्च जीवन स्तर और इनोवेशन के लिए मशहूर हैं। इस समूह में मौजूद स्विट्जरलैंड पहले से ही भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। उसके बाद नॉर्वे का स्थान आता है। इस समझौते से भारतीय वस्तुओं और सेवाओं को नया बाजार मिलेगा। साथ ही अत्याधुनिक तकनीक और निवेश से भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

TEPA समझौता से कितना होगा फायदा

TEPA एक व्यापक और दूरदर्शी समझौता है। इसमें 14 अध्याय हैं, जो व्यापार के महत्वपूर्ण पहलुओं से जुड़े हैं। वस्तुओं के लिए बाज़ार तक पहुँच बनाना, व्यापार करना आसान बनाना, बेवजह की रुकावटों को दूर करना, पर्यावरण मानकों को मानना, व्यापार में तकनीकी बाधाएँ दूर करना, निवेश प्रोत्साहन, सेवाएँ, बौद्धिक संपदा अधिकार शामिल हैं।

किसी भी भारतीय मुक्त व्यापार समझौते में पहली बार ऐसा हुआ है कि समझौते में निवेश और रोजगार सृजन को बाध्यकारी बनाया गया है। ये ‘आत्मनिर्भरता भारत’ की दिशा में अहम कदम है। इस समझौते का लक्ष्य अगले पंद्रह वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर यानी 8 लाख 88 हजार 4 सौ करोड़ रुपए का निवेश और दस लाख प्रत्यक्ष रोजगार सृजित करना है, जो इसे देश के आर्थिक इतिहास की सबसे दूरदर्शी व्यापारिक साझेदारियों में से एक बनाता है।

टीईपीए के मूल में एक मजबूत निवेश प्रक्रिया है। इसमें ईएफटीए देशों को शुरुआती 10 वर्षों के दौरान भारत में 50 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने और उसके बाद के पाँच वर्षों में 50 अरब डॉलर का अतिरिक्त निवेश करने की प्रतिबद्धता होगी। ये रकम अल्पकालिक पोर्टफोलियो निवेशों के बजाय विनिर्माण, इनोवेशन और अनुसंधान में दीर्घकालिक परियोजनाओं में लगाई जाएँगी।

इनसे भारत के प्रतिभाशाली लोगों को यूरोप के उन्नत तकनीकी नेटवर्क से जोड़कर दस लाख प्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का अनुमान है। इसे आसान बनाने के लिए, फरवरी 2025 में निवेशकों के लिए एक भारत-ईएफटीए डेस्क की स्थापना की गई है। जो नवीकरणीय ऊर्जा, विज्ञान, इंजीनियरिंग और डिजिटल बदलाव जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हुए, छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों को प्रोत्साहित करने के लिए संयुक्त उद्यमों और सहयोग को बढ़ावा देगा।

यह समझौता रणनीतिक रूप से टैरिफ को कम या पूरी तरह समाप्त करके संतुलित बाजार तक पहुँच को सुनिश्चित करेगा। EFTA ने अपनी 92.2 प्रतिशत उत्पादों पर टैरिफ में छूट दी है, जिसमें भारत के 99.6 प्रतिशत निर्यात शामिल हैं, जिसमें सभी गैर-कृषि वस्तुएँ और प्रोसेस्ड कृषि उत्पाद शामिल हैं। बदले में, भारत ने अपनी 82.7 प्रतिशत टैरिफ पर रियायतें दी हैं, जिसमें EFTA के 95.3 प्रतिशत निर्यात शामिल हैं।

खास बात ये है कि भारत EFTA से 80 प्रतिशत से अधिक सोना आयात करता है, जहाँ प्रभावी शुल्क अपरिवर्तित रहते हैं। डेयरी, सोया, कोयला, फार्मास्यूटिकल्स, चिकित्सा उपकरण और कुछ खाद्य उत्पादों जैसे संवेदनशील घरेलू क्षेत्रों को या तो बाहर रखा गया है या पाँच से दस वर्षों में सिलसिलेवार तरीके से इन पर टैरिफ कटौती की जाएगी। इससे मेक इन इंडिया और उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना जैसे कार्यक्रमों के तहत भारतीय उद्योगों को बदलाव के साथ- साथ प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त समय मिल रहा है।

इसकी एक प्रमुख विशेषता नर्सिंग, चार्टर्ड अकाउंटेंसी और वास्तुकला जैसे क्षेत्रों में पारस्परिक समझौतों का प्रावधान है। इससे कुशल पेशेवरों के लिए आने-जाने की सुविधा होगी। इसके अलावा, यह समझौता डिजिटल क्षेत्र के विकास में अहम भूमिका अदा करेगा। क्योंकि भारतीय टैलेंट को अस्थायी प्रवास के माध्यम से बाजार में प्रवेश करने का मौका मिलेगा। इससे सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा।

तालिबान का उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में दारुल उलूम देवबंद से रिश्ता क्या? तालिबान का मतलब ‘छात्र’ और देवबंद उसका ‘स्कूल’

अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने शनिवार (11 अक्टूबर 2025) को तालिबान सरकार की ओर से दारुल उलूम देवबंद का दौरा किया। मुत्ताकी का भारत दौरा पहले से ही चर्चा में है, क्योंकि 2021 में अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद यह तालिबान सरकार का पहला ‘कूटनीतिक’ दौरा है।

मुत्ताकी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पाबंदियों से अस्थाई छूट मिली। वे 9 अक्टूबर को दिल्ली पहुँचे, जब UNSC ने उन्हें 9 से 16 अक्टूबर तक यात्रा प्रतिबंध से छूट दी।

मुत्ताकी ने भारतीय राजनयिकों, विदेश मंत्री जयशंकर से मुलाकात की और दिल्ली में अफगान दूतावास में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इससे पहले भारत ने काबुल मिशन को ‘दूतावास’ का दर्जा दिया था।

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर स्थित दारुल उलूम देवबंद में मुत्ताकी का सैकड़ों मुस्लिमों, मौलवियों, छात्रों और इस्लामी नेताओं ने स्वागत किया। पाँच घंटे के दौरे में उन्होंने सेमिनरी के रेक्टर मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी और जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी से मुलाकात की, अफगान छात्रों से बात की और लाइब्रेरी का दौरा किया।

मुत्ताकी ने सार्वजनिक सभा को संबोधित किया, कुरान की आयतें पढ़ीं और अफगानिस्तान के इस्लामी विरासत के साथ देवबंद के ‘गहरे रिश्तों’ की तारीफ की। उन्होंने तालिबान की विचारधारा को आकार देने में सेमिनरी की भूमिका पर जोर दिया, जिसकी शुरुआत 1866 में औपनिवेशिक विरोध से हुई थी।

मुत्ताकी से मुलाकात के बाद जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा, “मैंने उनसे कहा कि हमारा रिश्ता सिर्फ शैक्षिक नहीं है। आपने भारत की आजादी में योगदान दिया। हमारे पूर्वजों ने अफगानिस्तान की जमीन को भारत की आजादी के लिए चुना… आपने अपनी आजादी के लिए अमेरिका और रूस जैसे देशों को हराया। हमने आपको सिखाया कि ब्रिटेन को कैसे हराया जाता है।”

मदनी ने आगे कहा, “मैंने उनसे (मुत्ताकी) कहा कि यह मुलाकात दिखाती है कि भारत के मुस्लिम और दारुल उलूम देवबंद का आपके साथ गहरा रिश्ता है। दुनिया के देशों में, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, आपसी तालमेल होना चाहिए। हमने कोई राजनीतिक बात नहीं की। दोनों देशों के रिश्ते बेहतर होंगे। भारत का शिकायत थी कि अफगानिस्तान से आतंकवादी आते हैं। अब इस मुलाकात से साफ है कि अफगानिस्तान से भारत में कोई आतंकवादी नहीं आएगा।”

दारुल उलूम देवबंद तालिबान का वैचारिक केंद्र है। तालिबान की स्थापना देवबंदी सुन्नी इस्लाम के आधार पर हुई, जो सहारनपुर के इस सेमिनरी से शुरू हुआ, जिसकी स्थापना 1866 में हुई थी।

1857 के भारतीय विद्रोह के बाद स्थापित इस सेमिनरी का मकसद औपनिवेशिक दौर में हनफी आदर्शों, धर्मशास्त्र और पारंपरिक इस्लामी शिक्षाओं को संरक्षित करना था।

देवबंद के संस्थापक मुहम्मद कासिम नानौटवी और राशिद अहमद गंगोही ने विदेशी प्रभाव के खिलाफ इस्लामी सिद्धांतों पर लौटने पर जोर दिया, जिसने बाद में आंदोलन की औपनिवेशिक विरोधी और जिहादी धाराओं को प्रभावित किया।

देवबंदी विद्वानों ने 1913 से 1920 के बीच अफगानिस्तान, ऑटोमन साम्राज्य और जर्मन साम्राज्य के साथ वैचारिक कूटनीति शुरू की, ताकि भारत में ब्रिटिशों को चुनौती दी जा सके। बीसवीं सदी की शुरुआत से ही अफगान छात्र उत्तर प्रदेश आए, यहाँ इस्लामी डिग्री हासिल की और अफगानिस्तान में मदरसे व संस्थान स्थापित किए।

भारत के बँटवारे से पहले और बाद में, देवबंदी विचारधारा दक्षिण एशिया, खासकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में फैली। देवबंदी मौलवी इन देशों में मदरसे स्थापित करने गए, जहाँ सुन्नी मुस्लिम बच्चों को उनकी विचारधारा सिखाई गई।

1980 के दशक में पाकिस्तान में मुहम्मद जिया-उल-हक की इस्लामीकरण नीतियों से अफगान सीमा पर देवबंदी संस्थान बढ़े, जो सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान सऊदी फंडिंग से वहाबी प्रभाव के साथ मिल गए।

इसी दौर में देवबंदी विचारधारा और सऊदी वाहबी प्रभाव के मिश्रण से तालिबान का जन्म हुआ।

तालिबान की शरिया की सख्त व्याख्या देवबंदी कट्टरपंथ और पश्तून जनजातीय नियमों का मिश्रण है। उसमें मौलवियों के पूर्ण अधिकार, सख्त लैंगिक अलगाव और इस्लाम से भटकने वालों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई पर जोर है।

कई तालिबान नेता देवबंदी मदरसों के छात्र रहे हैं। तालिबान का दारुल उलूम देवबंद से सीधा रिश्ता पाकिस्तान के संबद्ध मदरसों के जरिए है, न कि भारत के सेमिनरी से। तालिबान के संस्थापक मुल्ला मोहम्मद उमर सहित कई नेता पाकिस्तान के अकोरा खट्टक में दारुल उलूम हक्कानिया जैसे संस्थानों में पढ़े।

पाकिस्तान का दारुल उलूम हक्कानिया ‘जिहाद का विश्वविद्यालय’ कहलाता है। इसे मौलाना अब्दुल हक ने बनाया, जो बँटवारे से पहले दारुल उलूम देवबंद के छात्र और शिक्षक थे। उनके बेटे समी-उल-हक ने तालिबान का समर्थन किया और अफगान ‘जिहाद’ के लिए छात्रों को तैयार किया।

पाकिस्तान-अफगान सीमा पर फैले मदरसों को पाकिस्तान की ISI ने बढ़ावा दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ISI ने ऑपरेशन साइक्लोन के तहत अमेरिकी CIA के फंड से करीब 90,000 अफगानों, जिसमें तालिबान के शुरुआती नेता शामिल थे, को इन मदरसों में प्रशिक्षित किया, जिससे तालिबान का जन्म एक छात्र मिलिशिया के रूप में हुआ।

‘तालिबान’ शब्द का पश्तो में मतलब ‘छात्र’

साल 1994 तक देवबंदी मदरसों में पढ़े तालिबान लड़ाकों ने कंधार पर कब्जा किया और 2000 तक अफगानिस्तान का 90% हिस्सा नियंत्रित कर इस्लामी अमीरात बनाया।

दशकों से अफगान सुन्नी मुस्लिम दारुल उलूम देवबंद में इस्लामी धर्मशास्त्र पढ़ने आते रहे हैं। आज भी तालिबान के आधिकारिक दस्तावेज और सलाह में देवबंदी ग्रंथों का हवाला दिया जाता है। ग्रैंड मुफ्ती राशिद लुधियानवी, तालिबान के बड़े समर्थक, भी देवबंदी विद्वान थे।

1990 के दशक में तालिबान शासित अफगानिस्तान का दौरा करने के बाद, उन्होंने कई किताबें लिखीं, जिन्हें फतवों के रूप में प्रकाशित किया गया, जो मुल्ला उमर के शासन को वैध ठहराती थीं। उनके फतवे और ग्रंथ, जो मुस्लिमों को अमीर (तालिबान सुप्रीम लीडर) के प्रति पूर्ण वफादारी सिखाते थे, उमर के आदेश पर दारी और पश्तो में अनुवादित हुए और तालिबान के शरिया शासन का ढाँचा बने।

साल 2001 में जब तालिबान ने बामियान बुद्ध मूर्तियों को नष्ट किया, तब देवबंद ने इस कदम का समर्थन किया था।

देवबंद तालिबान को विदेशी ताकतों को अपनी जमीन से निकालने वाले वीर लड़ाकों के रूप में तारीफ करता है, इसे अक्सर भारत के ब्रिटिश औपनिवेशिक विरोध से जोड़ता है।

हालाँकि, देवबंद तालिबान के चरमपंथ और नागरिकों के खिलाफ क्रूरता से दूरी बनाए रखता है, भारत में शांतिपूर्ण देवबंदी विचारधारा पर जोर देता है। 2021 में महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध जैसे विवादास्पद नीतियों पर भी यह चुप रहा।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में संघमित्रा ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

इस अनोखे मंदिर में डॉक्टर के रूप में हैं महावीर हनुमान, पवन पुत्र करते हैं रोगों का इलाज: MP के दंदरौआ धाम में मंगलवार-शनिवार को उमड़ती है भक्तों की भारी भीड़

मध्यप्रदेश के भिंड जिले में स्थित दंदरौआ धाम एक अद्भुत और चमत्कारी मंदिर है, जहाँ भगवान हनुमान को डॉक्टर के रूप में पूजा जाता है। लोग उन्हें ‘डॉक्टर हनुमान’ के नाम से जानते हैं क्योंकि यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भगवान उनके सभी रोग और कष्ट दूर कर देते हैं।

मंदिर की विशेषता और मान्यताएँ

इस मंदिर की विशेषता यह है कि भक्त यहाँ इलाज के लिए नहीं, बल्कि आस्था के साथ भगवान के चरणों में झुकने आते हैं और मानते हैं कि हनुमान जी स्वयं उनके रोगों का निदान करते हैं। हर मंगलवार और शनिवार को इस मंदिर में भारी संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते हैं और अपने कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।

इस मंदिर से जुड़ी कई रोचक और चमत्कारी कथाएँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि बहुत समय पहले इस स्थान पर खुदाई का काम चल रहा था, तभी अचानक आकाशवाणी हुई कि जहाँ खुदाई हो रही है, वहाँ भगवान की मूर्ति है। लोगों ने जब वहाँ खुदाई की तो जमीन के भीतर से हनुमान जी की एक अनोखी मूर्ति निकली, जिसमें वे सखी यानी गोपी वेश में थे।

खुदाई के बाद ग्रामीणों ने मूर्ति स्थापित कर उसकी प्राण- प्रतिष्ठा करवाई। उस दिन भव्य भंडारे के आयोजन के दौरान एक व्यक्ति को असहनीय दर्द होने लगा। तभी फिर से आकाशवाणी हुई और कहा गया कि पीड़ित व्यक्ति अगर हनुमान जी को बंधन बाँधे और भभूति लगाए तो वह ठीक हो जाएगा। 

ऐसा ही किया गया और वह कुछ ही क्षणों में पूरी तरह स्वस्थ हो गया। यह देखकर लोग दंग रह गए और इस स्थान को ‘दर्दहरउआ’ कहने लगे, जिसका अर्थ है दर्द हरने वाला स्थान। समय के साथ यही नाम परिवर्तित होकर ‘दंदरौआ धाम’ बन गया।

कैंसर पीड़ित व्यक्ति के अचानक स्वस्थ होने की कथा भी है प्रचलित

एक अन्य मान्यता के अनुसार, करीब तीन सौ साल पहले यहाँ एक नीम के पेड़ के नीचे से हनुमान जी की यह मूर्ति प्राप्त हुई थी। यह मूर्ति नृत्य करती मुद्रा में है और देखने में अत्यंत आकर्षक है। लोगों का विश्वास है कि यह मूर्ति जीवंत है और कुछ लोग दावा करते हैं कि मूर्ति सचमुच नृत्य करती है, हालाँकि इस रहस्य का आज तक कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिल पाया है।

वहीं एक कथा के अनुसार, यहाँ शिवकुमार दास नाम के एक साधु रहते थे जो कैंसर से पीड़ित थे। वे हनुमान जी के परम भक्त थे और रोज मंदिर में पूजा करते थे। एक दिन हनुमान जी डॉक्टर के रूप में उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें रोगमुक्त कर दिया। उसी घटना के बाद से भक्त उन्हें डॉक्टर हनुमान के नाम से पुकारने लगे।

हर साल बड़े मंगल के अवसर पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है। हजारों श्रद्धालु दंदरौआ धाम पहुँचकर भगवान से अपनी मनोकामनाएँ माँगते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस मंदिर की लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है क्योंकि यहाँ लोगों को अपने विश्वास की सच्चाई का अनुभव होता है।

दंदरौआ धाम आज श्रद्धा, भक्ति और चमत्कार का ऐसा संगम बन चुका है, जहाँ हर आगंतुक को यह एहसास होता है कि अगर आस्था सच्ची हो, तो भगवान हर दर्द मिटा सकते हैं।

जामनगर के ईद जुलूस में लगे ‘सर तन से जुदा’ के नारे, इस्लामी कट्टरपंथियों ने लहराए तलवार वाले झंडे: वीडियो वायरल होने के बाद मोहसिन-बिलाल समेत 7 गिरफ्तार

गुजरात के जामनगर में ईद के जुलूस के दौरान भड़काऊ नारे लगाने का मामला सामने आया। जिसके बाद जामनगर के ए-डिवीजन पुलिस स्टेशन में थाने के सामने मजहबी और भड़काऊ नारे लगाने के मामले में FIR दर्ज की गई है।

पुलिस ने खुद शिकायतकर्ता बनकर कई मुस्लिमों को आरोपित बनाया है। यह घटना ईद के जुलूस के दौरान हुई। घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें ‘सर तन से जुदा’ के नारे सुनाई दे रहे थे।

वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज कर सात आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। ऑपइंडिया के पास FIR की एक प्रति भी है। शिकायत के अनुसार, घटना 4 सितंबर 2025 को ईद के दिन हुई थी। शाम करीब 7 बजे दरबार गढ़ इलाके से मुस्लिमों ने ईद के मौके पर जुलूस निकला था।

इसके कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे। FIR में कहा गया है कि वीडियो में कुछ मुस्लिम लोग दरबार गढ़ सर्किल बर्धन चौक पर ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाते नजर आ रहे थे। यह भी उल्लेख किया गया है कि जुलूस में शामिल मुस्लिम लोग अलग-अलग इस्लामी झंडे लेकर आए थे।

कुछ झंडों पर अरबी वाक्य और तलवार के चिह्न अंकित थे, जबकि कुछ झंडे सफेद और हरे रंग से रंगे हुए थे जिन पर तलवारें अंकित थीं। इन झंडों को फहराते हुए कट्टरपंथी ‘अल्लाहु अकबर’, ‘लब्बैक या रसूलल्लाह’ और ‘सर तन से जुदा, सर तन से जुदा’ जैसे नारे लगा रहे थे।

सांप्रदायिक नफरत फैलाने के इरादे से किया गया कृत्य

पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। जिसके बाद ए-डिवीजन थाने के पीएसआई वीआर गमेती खुद शिकायतकर्ता बने और FIR दर्ज कराई। पुलिस ने शिकायत में कहा है कि कट्टरपंथियों ने सांप्रदायिक नफरत फैलाने के इरादे से यह कृत्य किया था।

साथ ही यह भी कहा गया है कि इस तरह के कृत्य से सार्वजनिक अशांति फैलने और दो समुदायों के बीच नफरत और दुश्मनी पैदा होने की संभावना थी। शिकायत में मुस्लिम कट्टरपंथियों पर इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों से धर्म, जाति, भाषा, वर्ण और समुदाय के बीच दुश्मनी और नफरत फैलाने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया है।

शिकायत के अनुसार, आरोपितों ने जनता में भय पैदा करने के इरादे से सार्वजनिक अशांति फैलाने वाले भाषण देकर, ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाकर और लोगों को जान से मारने की धमकी देकर अपराध को अंजाम दिया। 

इस मामले में पुलिस ने 7 नामजद आरोपितों और जाँच के दौरान सामने आने वाले बाकी सभी आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 196(1)(ए), 196(1)(बी), 353(1)(बी) और 351(3) के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस ने वीडियो के आधार पर 7 आरोपितों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया है।

गिरफ्तार आरोपितों की पहचान मोहसिन खान सलीम खान पठान, बिलाल हसंभाई नोएडा, इमरान सिद्दीकभाई कुरैशी, यूनुस हारुन कुरैशी, साहिल नोएडा, अल्ताफ शेख और साहिल बौदीन बेलिम ​​के रूप में हुई है।

ऑपइंडिया ने शिकायतकर्ता पीएसआई वीआर गमेती से अधिक जानकारी के लिए संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन संपर्क नहीं हो सका। फिलहाल पुलिस ने आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है और उनकी रिमांड की तैयारी कर रही है। पुलिस ने बताया कि इस दिशा में आगे की कार्रवाई जारी है।

PM धन-धान्य कृषि योजना से ग्रामीण महिलाएँ होंगी सशक्त, ट्रेनिंग से लेकर तकनीक और बाजार तक सीधी पहुँच: आत्मनिर्भर भारत की दिशा में मोदी सरकार का बड़ा कदम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार (11 अक्तूबर 2025) नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) में विशेष कृषि कार्यक्रम में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने देशभर के किसानों से संवाद किया और कई नई योजनाओं की शुरुआत की ।

पीएम मोदी ने 35,440 करोड़ रुपए की दो प्रमुख योजनाओं का शुभारंभ किया।  24,000 करोड़ रुपए की प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना और 11,440 करोड़ रुपए के दलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता मिशन।

इन योजनाओं का उद्देश्य फसल विविधीकरण, भंडारण क्षमता बढ़ाना, सिंचाई सुविधाओं में सुधार और दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना है। इसके अलावा प्रधानमंत्री कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन और खाद्य प्रसंस्करण से जुड़ी 5,450 करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाओं का उद्घाटन और 815 करोड़ रुपए की नई परियोजनाओं की आधारशिला रखेंगे।

इनमें देशभर में कोल्ड चेन, आईवीएफ लैब, मछली चारा संयंत्र और डेयरी से जुड़ी परियोजनाएँ शामिल हैं। कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी किसानों को प्रमाण पत्र भी वितरित किया और विभिन्न योजनाओं से लाभान्वित दलहन किसानों से सीधा संवाद किया।

क्या है प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PMDDKY)

भारत सरकार ने किसानों की आमदनी बढ़ाने और खेती को आधुनिक, टिकाऊ और लाभदायक बनाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PMDDKY) की शुरुआत की है। यह योजना 1 फरवरी 2025 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा केंद्रीय बजट 2025-26 में घोषित की गई थी और 16 जुलाई 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसे मंजूरी दी।

इस योजना का मुख्य उद्देश्य भारत के उन 100 पिछड़े जिलों में कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाना है, जहाँ खेती से जुड़ी समस्याएँ जैसे कम उत्पादन, पानी की कमी, संसाधनों की कमी और किसानों की आर्थिक तंगी सबसे ज्यादा हैं।

इस योजना के तहत सरकार ने 2025-26 से 2030-31 तक कुल छह साल के लिए 1.44 लाख करोड़ रुपए  का बजट निर्धारित किया है। हर साल 24,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँगे ताकि देशभर के लगभग 1.7 करोड़ किसानों को इसका लाभ मिल सके। इनमें से अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है। यह वर्ग भारत के कुल किसानों का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा है।

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना की खासियत यह है कि यह 36 अलग-अलग कृषि योजनाओं को एक साथ जोड़ती है, ताकि किसानों को एक ही मंच पर सभी सुविधाएँ मिल सकें। इन योजनाओं में प्रमुख रूप से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN), प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) शामिल हैं। अब किसानों को बीमा, सिंचाई, ऋण, प्रशिक्षण और बाजार तक पहुँच जैसी सभी सुविधाएँ एक ही जगह मिलेंगी, जिससे योजना का असर ज्यादा व्यापक और प्रभावी होगा।

यह योजना नीति आयोग के आकांक्षी जिलों के कार्यक्रम से प्रेरित है, जिसने देश के पिछड़े जिलों को शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत ढाँचे में सुधार करके आगे बढ़ाया। उसी तर्ज पर PMDDKY उन जिलों पर ध्यान केंद्रित करेगा जहाँ फसल उत्पादन राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। जैसे कि जिन जिलों में गेहूँ की पैदावार 3.5 टन प्रति हेक्टेयर से कम है या जहाँ खेती का तीव्रता अनुपात 155 प्रतिशत से कम है, वहाँ यह योजना विशेष रूप से काम करेगी।

भारत में लगभग 46 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है, लेकिन अब भी किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई जिलों में मिट्टी की गुणवत्ता खराब है, सिंचाई की व्यवस्था सीमित है और किसान पारंपरिक खेती पद्धति अपनाते हैं जिससे पैदावार कम होती

भारत में करीब 52 प्रतिशत खेती अब भी मानसून पर निर्भर है। बारिश कम या ज्यादा होने पर किसानों की फसलें बर्बाद हो जाती हैं। किसानों के पास आधुनिक खेती के साधन और संसाधन भी नहीं हैं।

बहुत से किसान उच्च गुणवत्ता वाले बीज, जैविक खाद या ट्रैक्टर-हार्वेस्टर जैसी मशीनें नहीं खरीद पाते। इसके अलावा, भंडारण की कमी के कारण लगभग 20 प्रतिशत फसलें खराब हो जाती हैं, जिससे हर साल लगभग 50,000 करोड़ रुपए का नुकसान होता है। मंडियों में बिचौलियों के कारण किसानों को फसल का उचित दाम भी नहीं मिल पाता।

इन सभी समस्याओं को देखते हुए सरकार ने PMDDKY के तहत किसानों को सीधी आर्थिक सहायता, फसल बीमा, सिंचाई और भंडारण सुविधाएँ, कृषि ऋण, प्रशिक्षण, और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है।

इस योजना के तहत एक राष्ट्रीय संचालन समिति, राज्य स्तरीय निगरानी समिति, और जिला धन-धान्य समितियाँ बनाई गई हैं, जो स्थानीय जरूरतों के हिसाब से योजना को लागू करेंगी। सभी गतिविधियों की निगरानी एक डिजिटल डैशबोर्ड के माध्यम से की जाएगी जिसमें 117 प्रमुख इंडेक्स होंगे, जैसे फसल उत्पादन, ऋण वितरण और भंडारण उपयोग।

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना की शुरुआत अक्टूबर 2025 में रबी सीजन से की जाएगी, जबकि इसके लिए आवेदन प्रक्रिया सितंबर 2025 में शुरू किया जा चुका है। इसके लिए किसानों को ऑनलाइन आवेदन करने की सुविधा भी मिलेगी।

महिला किसानों को मिलेगा फायदा

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PMDDKY) में महिलाओं को सशक्त बनाने पर विशेष जोर दिया गया है। इसके तहत 10,000 महिला उत्पादक समूह बनाए जा रहे हैं, जो डेयरी, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन और जैविक खेती जैसे कार्यों में जुड़ी महिलाओं को प्रशिक्षण, ऋण और बाजार की सुविधा देंगे। जुलाई 2025 तक 5,000 समूह बन चुके हैं और दिसंबर तक बाकी 5,000 पूरे होंगे, जिससे लगभग 5 लाख महिलाओं को सीधा लाभ मिलेगा।

महिलाओं को आधुनिक खेती, खाद्य प्रसंस्करण (जैसे पनीर या जैम बनाना) और व्यवसाय चलाने की मुफ्त ट्रेनिंग दी जा रही है। साथ ही, 10,000 से 1 लाख तक के माइक्रो लोन आसान ब्याज दर पर दिए जा रहे हैं, ताकि वे छोटे व्यवसाय शुरू कर सकें।

ऐप और सहकारी समितियों के जरिए महिलाएँ अपने उत्पाद सीधे बाजार में बेच पाती हैं, जिससे उन्हें 20–50% ज्यादा दाम मिलते हैं। जिलास्तरीय समितियों में भी महिलाओं को नेतृत्व का मौका दिया गया है, जिससे वे नीतियों में भागीदारी कर सकें।

योजना में बड़े किसानों और निजी कंपनियों को भी जोड़ा गया है। आईटीसी, महिंद्रा और गोदरेज जैसी कंपनियाँ बीज, मशीनें और बाजार उपलब्ध कराने में साझेदारी कर रही हैं। बड़े किसानों को 1-10 लाख रुपए  तक के ऋण, भंडारण सुविधा, और आधुनिक तकनीक जैसे ड्रोन व सेंसर दिए जा रहे हैं।

सिंचाई सुधार के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम से 30-50% पानी की बचत और 20% तक पैदावार बढ़ाने का लक्ष्य है। 50-80% सब्सिडी के साथ यह तकनीक बुंदेलखंड और सीमांचल जैसे सूखे इलाकों में लागू होगी। स्मार्ट सिंचाई सिस्टम मिट्टी की नमी मापकर पानी की सही मात्रा तय करेगा, जिससे खेती अधिक उत्पादक और टिकाऊ बनेगी।

तालिबान का मंत्री, अफगानिस्तान की एंबेसी और चुनिंदा पत्रकार: PC में महिलाओं के एंट्री बैन पर भारत सरकार क्यों दे जवाब? क्या कॉन्ग्रेसी भूल गए वियना कन्वेंशन और शाहबानो केस

भारत दौरे पर आए तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने नई दिल्ली में अफगानिस्तान के दूतावास में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, जिसमें करीब 20 पत्रकारों को बुलाया गया। लेकिन इसमें एक भी महिला पत्रकार नहीं थी।

ये फैसला अफगानी अधिकारियों का था और भारत सरकार का इसमें कोई रोल नहीं था। फिर भी कॉन्ग्रेस पार्टी ने इसे भारत सरकार के खिलाफ मोड़ दिया और महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिश की।

दरअसल, अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी इन दिनों भारत दौरे पर हैं। उनका ये दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत ने अभी तक तालिबान शासन को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है। फिर भी दोनों देशों के बीच बातचीत हो रही है, खासकर पाकिस्तान को काउंटर करने के लिए।

मुत्ताकी ने यहाँ से पाकिस्तान को ललकारा और भारत के साथ दोस्ती बढ़ाने की बात की। लेकिन इसी दौरे के दौरान एक विवाद खड़ा हो गया, जिसे भारत के अंदर सियासी तूफान बनाने की कोशिश हो रही है।

ये घटना शुक्रवार (10 अक्टूबर 2025) को हुई, जब मुत्ताकी ने भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की। बैठक के कुछ घंटों बाद दूतावास में प्रेस मीट हुई। तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि वहाँ सिर्फ पुरुष पत्रकार ही थे। मुत्ताकी से जब महिलाओं की स्थिति पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने सीधा जवाब देने से बचते हुए कहा कि हर देश के अपने रीति-रिवाज होते हैं।

ये बात सही है कि तालिबान अफगानिस्तान में महिलाओं पर कई पाबंदियाँ लगाता है – जैसे शिक्षा, नौकरी और सार्वजनिक जगहों पर। लेकिन ये प्रेस कॉन्फ्रेंस अफगान दूतावास में हुई, जो तकनीकी रूप से अफगानिस्तान की सोवरेन टेरिटरी मानी जाती है। वहाँ अफगान नियम लागू होते हैं और भारत सरकार अंदर की गतिविधियों में दखल नहीं दे सकती। सिर्फ बाहर की सुरक्षा का जिम्मा भारत का है। अगर कोई गलत काम हो, तो ज्यादा से ज्यादा भारत उस दूतावास के लोगों को ‘परसोना नॉन ग्राटा’ घोषित कर देश से बाहर कर सकता है। अंतर्राष्ट्रीय कानून यही कहते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय कानून (वियना कन्वेशन 1961) के मुताबिक एंबेसीज यानी दूतावासों के पास कई अहम अधिकार होते हैं, जैसे-

  • संप्रभुता: स्थानीय पुलिस या अधिकारी बिना अनुमित के दूतावास के अंदर भी नहीं जा सकते।
  • सुरक्षा: इसकी जिम्मेदारी मेजबान देश की होती है। अधिकारियों और उनके परिवार को विशेष सुरक्षा (डिप्लोमेटिक इम्यूनिटी) हासिल होती है, इसके तहत उन पर स्थानीय कानूनों के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती।
  • तलाशी या जब्ती: दूतावास की इमारत, उसमें रखे दस्तावेज या सपंत्ति की तलाशी-जब्ती नहीं की जा सकती।
  • संबंध खराब होने पर भी सुरक्षा: दूतावास के अंदर की संपत्ति और दस्तावेजों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी मेजबान देश की होती है।

अंतर्राष्ट्रीय नियमों को नजरअंदाज कर कॉन्ग्रेस ने की सियासी लाभ लेने की कोशिश

ये बात जानना अहम है कि वियना कन्वेशन 1961 एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जो डिप्लोमेटिक मिशनों और कर्मचारियों के अधिकार और कर्तव्यों को तय करता है। फिर भी कॉन्ग्रेस ने इस पर हंगामा मचा दिया। प्रियंका गाँधी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, कृपया साफ करें कि तालिबान प्रतिनिधि की प्रेस कॉन्फ्रेंस से महिला पत्रकारों को क्यों हटाया गया। अगर महिलाओं के अधिकारों पर आपकी बातें सिर्फ चुनावी दिखावा नहीं हैं, तो देश की काबिल महिलाओं का अपमान हमारे देश में कैसे होने दिया?”

राहुल गाँधी ने इसे शेयर करते हुए लिखा, “मोदी जी, जब आप महिला पत्रकारों को बाहर करने की अनुमति देते हैं, तो आप भारत की हर महिला को बता रहे हैं कि आप उनके लिए खड़े होने में कमजोर हैं। महिलाओं को हर क्षेत्र में समान अधिकार है, और आपकी चुप्पी ‘नारी शक्ति’ के नारों के खोखलेपन को दिखाती है।”

इन दोनों भाई-बहन ने इसे सीधे मोदी सरकार से जोड़ दिया, जैसे कि ये भारत की मिट्टी पर हुआ कोई अपमान हो। पूर्व मंत्री पी चिदंबरम ने तो यहाँ तक कह दिया कि पुरुष पत्रकारों को बहिष्कार करना चाहिए था। उन्होंने लिखा, “मैं हैरान हूँ कि अफगानिस्तान के अमीर खान मुत्ताकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस से महिलाओं को बाहर किया गया। पुरुष पत्रकारों को बाहर निकल जाना चाहिए था।”

हालाँकि सच्चाई ये है कि सरकार के सूत्रों ने साफ कहा है कि “विदेश मंत्रालय का इस प्रेस वार्ता में कोई रोल नहीं था।” भारतीय पक्ष ने तो महिला पत्रकारों को शामिल करने का सुझाव भी दिया था, लेकिन तालिबान ने माना नहीं।

कॉन्ग्रेस को याद करना चाहिए शाहबानो केस

अब सवाल ये उठता है कि कॉन्ग्रेस ये हंगामा क्यों मचा रही है? क्या ये वाकई महिलाओं के अधिकारों की चिंता है या सिर्फ राजनीतिक मौका तलाशना?

सबसे पहले तो ये समझना जरूरी है कि कॉन्ग्रेस का इतिहास महिलाओं के अधिकारों पर कैसा रहा है। याद कीजिए शाहबानो केस को। 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो नाम की एक मुस्लिम महिला को तलाक के बाद गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया। ये फैसला मुस्लिम महिलाओं के हक में था। लेकिन राजीव गाँधी के नेतृत्व में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने इस फैसले को पलटने के लिए मुस्लिम वुमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स) एक्ट पास कर दिया।

क्यों? क्योंकि कुछ कट्टर मुस्लिम नेताओं ने शरिया कानून का हवाला देकर विरोध किया। कॉन्ग्रेस ने महिलाओं के अधिकारों को ‘इस्लामिक वैल्यूज’ के आगे झुका दिया। आज वही कॉन्ग्रेस तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर चीख रही है, जहाँ महिलाओं को नहीं बुलाया गया- जो कि शरिया की ही माँग है। ये दोहरापन नहीं तो क्या है?

शरिया वालों के साथ उठना-बैठना, लेकिन तालिबान…

और सिर्फ इतना ही नहीं। कॉन्ग्रेस अक्सर उन तत्वों के साथ गठबंधन करती है जो शरिया की वकालत करते हैं। जैसे कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के साथ केरल में उनका गठजोड़। IUML शरिया को बढ़ावा देने वाले विचार रखती है। कॉन्ग्रेस के नेता दिन भर ऐसे लोगों के साथ उठते-बैठते हैं, हज सब्सिडी देते हैं, लेकिन जब तालिबान जो शरिया लागू करता है अपनी एंबेसी में महिलाओं को नहीं बुलाता, तो इसे पूरे भारत से जोड़ देते हैं। ये दोगलापन साफ दिखता है।

अगर कॉन्ग्रेस को महिलाओं के हक की इतनी फिक्र है, तो क्यों नहीं वे अपने सहयोगियों से पूछते कि शरिया में महिलाओं की क्या स्थिति है? तालिबान तो शरिया का चरम रूप है, लेकिन भारत में भी कई जगहों पर ऐसी सोच फैली है और कॉन्ग्रेस चुप रहती है।

केरल को तालिबानी राज में बदलने की कोशिशों पर कॉन्ग्रेस की चुप्पी

अब असली सवाल ये है कि कॉन्ग्रेस वाले खुद कब तालिबान जैसे नियमों का समर्थन करते हैं? या शरिया कानून के कट्टर समर्थकों के साथ गठजोड़ करते हैं? देखिए, केरल का हाल। वहाँ वामपंथी और कॉन्ग्रेस बारी-बारी सत्ता संभालते हैं। हाल ही में कासरगोड के एक कॉलेज में गाजा पर डिबेट हुई। विषय था- “गाजा से विज्ञान और मजहब तक।” लेकिन नजारा अफगानिस्तान जैसा। वहाँ छात्र और छात्राओं के बीच पर्दा लगा दिया गया। हिजाब पहनी मुस्लिम छात्राओं को पर्दे के पीछे बिठा दिया गया। मंच पर चढ़ा इस्लामी कट्टरपंथी डॉ. अब्दुल्ला बेसिल सीपी। ये वही बेसिल है, जो हिजाब का प्रचार करता है।

एक वीडियो में एक छात्रा ने हिजाब के खिलाफ तर्क दिया कि लड़कियाँ अच्छे कपड़े और मेकअप से आत्मविश्वास पाती हैं, न कि किसी को रिझाने के लिए। लेकिन बेसिल ने बेतुके तर्क देकर उसे चुप करा दिया – कहा कि सादगी ही असली आत्मविश्वास है। Umasking Anomalies जैसे संगठन ने इसकी तारीफ की और इसे प्रोपेगैंडा बनाया।

ये संगठन केरल के युवाओं को हिजाब और इस्लामी कट्टरता सिखाने में लगा है। कॉलेज में ऐसे कार्यक्रम चल रहे हैं, जहाँ लड़कियों को पर्दे के पीछे छिपा दिया जाता है।

भारत विश्व गुरु बनने का सपना देख रहा है, लेकिन केरल में अफगानिस्तान जैसी प्रथा? और कॉन्ग्रेस चुप। न राहुल बोले, न प्रियंका। क्यों? क्योंकि वहाँ उनके साथी वामपंथी शासन कर रहे हैं, जो कट्टर तत्वों को बढ़ावा देते हैं। लेकिन तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर हल्ला मचाना आसान है, क्योंकि वो मोदी को घेरने का बहाना देता है।

भारत की डिप्लोमेसी को चोट पहुँचा रही कॉन्ग्रेस

ये घटना सिर्फ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की नहीं है, बल्कि ब्रॉडर डिप्लोमेसी और राजनीति की है। भारत-अफगानिस्तान संबंध पाकिस्तान को ध्यान में रखकर बहुत जरूरी हैं। तालिबान ने पाकिस्तान को ललकारा, जो भारत के लिए अच्छा है। भारत ने तालिबान को मान्यता नहीं दी, लेकिन बातचीत जारी है। झंडे का मुद्दा भी उठा – बैठक में किसका झंडा लगेगा? लेकिन ये सब डिप्लोमेटिक प्रोटोकॉल हैं।

कॉन्ग्रेस इसे महिलाओं के अपमान से जोड़कर जनता को बरगलाने की कोशिश कर रही है। अगर वे इतने ही महिलावादी हैं, तो क्यों नहीं अफगान महिलाओं के लिए कुछ करते? भारत ने तो अफगानिस्तान में महिलाओं की मदद के लिए कई प्रोजेक्ट चलाए हैं, जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य। लेकिन कॉन्ग्रेस का फोकस सिर्फ मोदी को बदनाम करने पर है।

अब अपनी तरफ से सोचें तो ये साफ लगता है कि कॉन्ग्रेस का ये स्टैंड पॉलिटिकल ऑपर्च्युनिज्म है। चुनाव नजदीक हैं, तो महिलाओं का मुद्दा उठाकर वोट बटोरना चाहते हैं। लेकिन जनता अब समझदार हो गई है। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं – “राहुल जी, केरल में पर्दा क्यों नहीं दिखता आपको?” या “शाहबानो को क्यों भूल गए?”

कॉन्ग्रेस की कथनी और करनी में फर्क साफ है। एक तरफ वे सेकुलरिज्म का ढोल पीटते हैं, दूसरी तरफ कट्टर तत्वों से हाथ मिलाते हैं। तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं को न बुलाना गलत है, लेकिन इसे भारत सरकार से जोड़ना और भी गलत। ये डिप्लोमेसी को कमजोर करता है। अगर भारत हर एंबेसी में दखल देने लगे, तो क्या होगा? रूस, चीन या अमेरिका की एंबेसी में भी वही नियम लागू होंगे।

गहराई में जाएँ तो ये मुद्दा भारत की विदेश नीति को भी छूता है। तालिबान के साथ डीलिंग जरूरी है, क्योंकि अफगानिस्तान में भारत के हित हैं – जैसे चाबहार पोर्ट, व्यापार और आतंकवाद रोकना। पाकिस्तान तालिबान को इस्तेमाल करता है, लेकिन मुत्ताकी ने पाक को ललकारा, जो भारत के लिए पॉजिटिव है। महिलाओं के अधिकारों पर भारत चुप नहीं है – हमने UN में तालिबान की आलोचना की है। लेकिन डिप्लोमेसी में बैलेंस रखना पड़ता है।

कॉन्ग्रेस इसे समझती है, लेकिन राजनीति के लिए नजरअंदाज कर रही है। केरल जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि भारत में भी इस्लामी कट्टरता फैल रही है और कॉन्ग्रेस चुप है क्योंकि वो उनके सहयोगी हैं। डॉ. बेसिल जैसे लोग युवाओं को प्रभावित कर रहे हैं, हिजाब और पर्दे को बढ़ावा दे रहे हैं। ये अफगानिस्तान जैसा नजारा है, लेकिन घरेलू। कॉन्ग्रेस को पहले अपने backyard साफ करना चाहिए।

कॉन्ग्रेस का दोहरापन समझने की जरूरत

कुल मिलाकर ये विवाद कॉन्ग्रेस की हिप्पोक्रेसी को उजागर करता है। वे महिलाओं के हक की बात करते हैं, लेकिन जब सरकार इस्लामिक वैल्यूज पर महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता देती है जैसे UCC या ट्रिपल तलाक पर, तो विरोध करते हैं। ट्रिपल तलाक बैन पर कॉन्ग्रेस ने कहा था कि ये मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल है। लेकिन अब तालिबान पर चीख रहे हैं। ये दोहरा मापदंड जनता देख रही है।

कॉन्ग्रेस का ये ड्रामा सिर्फ शोर है, कोई ठोस मुद्दा नहीं। जनता को सच्चाई पता होनी चाहिए – ये राजनीति है, इसमें कॉन्ग्रेस की तरफ से महिलाओं की कोई खास चिंता नहीं है। ये विशुद्ध पॉलिटिकल स्टंटबाजी के सिवाय और कुछ नहीं है।

अमेरिका ने खारिज की AMRAAM मिसाइल देने की खबर, पाकिस्तान को सिर्फ F-16 रखरखाव की ‘भीख’: भारत के एयर डिफेंस सिस्टम के आगे पंगु ही रहेगा दुश्मन मुल्क

अमेरिका ने शुक्रवार (10 अक्टूबर 2025) को साफ कर दिया कि पाकिस्तान को नई AMRAAM मिसाइलें देने की कोई बात नहीं है। कुछ न्यूज़ चैनल और वेबसाइट्स ने दावा किया था कि अमेरिका पाकिस्तान को एडवांस्ड मीडियम-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (AMRAAM) दे रहा है, जो उसके पुराने F-16 जेट्स को और ताकतवर बना सकती हैं। लेकिन अमेरिकी दूतावास ने इसे ‘झूठी खबर‘ बताया।

दरअसल, सितंबर 30 को हुए एक कॉन्ट्रैक्ट में सिर्फ पुराने सिस्टम्स के रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स की बात है, न कि नई मिसाइलों की। मतलब पाकिस्तान को ‘भीख’ तो मिली, लेकिन सिर्फ अपने पुराने हथियारों को ठीक करने के लिए। कोई नया हथियार नहीं।

ये खबर भारत के लिए क्यों अहम है? क्योंकि AMRAAM वही मिसाइल है, जिसने 2019 में बालाकोट स्ट्राइक के बाद विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान के मिग-21 को मार गिराया था। अगर इसका एडवांस्ड वर्जन पाकिस्तान के पास पहुँचता, तो थोड़ा टेंशन हो सकता था। लेकिन अमेरिका ने साफ कर दिया कोई अपग्रेड नहीं। फिर भी कुछ मीडिया हाउस और कॉन्ग्रेस ने इस खबर को उछालकर मोदी सरकार को नीचा दिखाने की कोशिश की।

चलिए इस पूरी कहानी को आसान तरीके से समझते हैं कि कैसे पाकिस्तान को कुछ मिले या न मिले, भारत का एयर डिफेंस और हथियार इतने तगड़े हैं कि वो कुछ बिगाड़ नहीं सकता। साथ ही जानेंगे कि कैसे भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को धूल चटाई और क्यों उसकी F-16 और AMRAAM मिसाइलें बेकार साबित होंगी।

AMRAAM मिसाइल और उसका इतिहास

AMRAAM यानी AIM-120 मिसाइल एक बियोंड विजुअल रेंज (BVR) मिसाइल है। आसान भाषा में, ये ऐसी मिसाइल है जो पायलट को दुश्मन का विमान देखे बिना, 100 किलोमीटर तक दूर से टारगेट को मार सकती है। इसका रडार खुद दुश्मन को ढूँढ लेता है। पाकिस्तान ने 2007 में अमेरिका से करीब 700 ऐसी मिसाइलें खरीदी थीं, जो सिर्फ उसके F-16 जेट्स पर काम करती हैं।

साल 2019 में बालाकोट स्ट्राइक के बाद, जब भारतीय वायुसेना ने PoK में जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर हमला किया, तो पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई में F-16 से AMRAAM दागी थी। उसने अभिनंदन का मिग-21 मार गिराया, लेकिन भारत ने भी एक F-16 को ढेर कर दिया था।

तब से भारत ने अपनी ताकत कई गुना बढ़ा ली है। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर इसका सबूत है। लेकिन उससे पहले ये समझें कि हाल की खबरों ने क्यों हंगामा मचाया।

मीडिया और कॉन्ग्रेस ने मचाया फर्जी का हल्ला

कुछ न्यूज़ चैनल्स और वेबसाइट्स ने दावा किया कि अमेरिका पाकिस्तान को नई AMRAAM मिसाइलें दे रहा है। कहा गया कि ये ‘मिग-21 किलर’ मिसाइलें पाकिस्तान के F-16 को और खतरनाक बनाएँगी। ये खबरें तब और हवा पकड़ीं, जब पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ असीम मुनीर ने पिछले महीने वॉशिंगटन में डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की। कुछ ने लिखा कि ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान को ताकत दे रहा है, क्योंकि रिश्ते सुधर रहे हैं।

कॉन्ग्रेस ने इस मौके को लपक लिया। 8 अक्टूबर को जयराम रमेश ने एक्स पर पोस्ट किया, जिसमें अमेरिकी वॉर डिपार्टमेंट (पहले डिफेंस डिपार्टमेंट) के दो नोटिफिकेशन्स शेयर किए। पहला मई 7 2025 का, जिसमें कनाडा, ताइवान, जापान जैसे देशों को AMRAAM देने की बात थी। दूसरा सितंबर 30 का, जिसमें पाकिस्तान का नाम भी था।

रमेश ने लिखा, “कूटनीति कितनी जल्दी बदलती है और असफलताएँ कितनी जल्दी जमा हो जाती हैं!” उनका कहना था कि मोदी सरकार की विदेश नीति फेल हो रही है और अमेरिका अब पाकिस्तान को तरजीह दे रहा है।

लेकिन 10 अक्टूबर को अमेरिकी दूतावास ने सारी हवा निकाल दी। उसने कहा, “ये खबरें झूठी हैं। कोई नई AMRAAM मिसाइल नहीं मिल रही। सिर्फ पुराने सिस्टम्स के लिए स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस की बात है।” ये $41.7 मिलियन का कॉन्ट्रैक्ट रेथियॉन को मिला है, जो $2.5 बिलियन के फॉरेन मिलिट्री सेल्स (FMS) प्रोग्राम का हिस्सा है। इसमें 30 से ज्यादा देश हैं और पाकिस्तान को सिर्फ अपने पुराने F-16 और मिसाइलों को चलाने के लिए पार्ट्स मिल रहे हैं। कोई नया हथियार नहीं।

कॉन्ग्रेस और कुछ मीडिया हाउस बिना तथ्य चेक किए उछल पड़े। ये वही लोग हैं, जो ऑपरेशन सिंदूर की कामयाबी पर चुप रहे। अब जरा देखते हैं कि भारत ने कैसे पाकिस्तान को हवाई जंग में मात दी और क्यों AMRAAM हो या कोई और हथियार, भारत का कुछ नहीं बिगड़ेगा।

ऑपरेशन सिंदूर में टूट चुका है पाकिस्तान का हौसला

मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर ने दुनिया को दिखा दिया कि भारतीय वायुसेना (IAF) अब पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर है। 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले (26 नागरिकों की मौत) के जवाब में भारत ने 7 मई को PoK और पाकिस्तान में 9 आतंकी ठिकानों पर मिसाइल स्ट्राइक्स कीं।

पाकिस्तान ने जवाब में ड्रोन और मिसाइलें दागीं, लेकिन भारत के S-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने अमृतसर, जम्मू, और जैसलमेर में सभी 8 मिसाइलें मार गिराईं। IAF ने राफेल, सुखोई-30 MKI और ब्रह्मोस मिसाइलों से 11 पाकिस्तानी एयरबेस नूर खान, रफीकी, मुरीद, सुक्कुर, सियालकोट आदि—पर सटीक हमले किए। चार दिन बाद पाकिस्तान ने सीजफायर माँग लिया।

इस जंग में पाकिस्तान ने अपने F-16 से AMRAAM मिसाइलें दागीं, लेकिन वो ऊँचाई ही नहीं ले पाए, जहाँ से मिसाइलें असरदार हों। हिसार में एक चीनी PL-15 मिसाइल का मलबा मिला, जो पाकिस्तान के JF-17 जेट से दागी गई थी। इसकी रेंज 145 किमी थी, लेकिन इतनी दूर से लॉन्च होने की वजह से कोई नुकसान नहीं हुआ।

भारत के S-400 और आकाश सिस्टम ने इसे आसानी से इंटरसेप्ट कर लिया। और सबसे बड़ा झटका? भारत ने 314 किमी दूर पाकिस्तान के AWACS (Saab 2000 Erieye) को S-400 से मार गिराया। ये AWACS हवा में ‘आँख’ की तरह काम करता है यानी रडार, सर्विलांस, कमांड-कंट्रोल का सेंटर। पाकिस्तान के 9 AWACS में से एक खत्म। पूर्व पाकिस्तानी एयर मार्शल मसूद अख्तर ने माना कि भोलारी एयरबेस पर ब्रह्मोस स्ट्राइक ने AWACS को हेलंगर में तबाह कर दिया।

ये ऑपरेशन दिखाता है कि भारत का एयर डिफेंस और अटैक सिस्टम इतना मज़बूत है कि पाकिस्तान की कोई भी मिसाइल AMRAAM हो या PL-15 कामयाब नहीं हो सकती।

भारत के हथियारों के सामने बेबस है पाकिस्तान बेबस

पाकिस्तान के पास 76 F-16 जेट्स हैं, जो AMRAAM (100 किमी रेंज) दाग सकते हैं। लेकिन भारत के पास इनका जवाब देने के लिए कई गुना बेहतर सिस्टम हैं। चलिए एक-एक करके देखते हैं:

राफेल और मेटियोर मिसाइल: भारत के 36 राफेल जेट्स मेटियोर BVR मिसाइल (रेंज 150+ किमी) से लैस हैं। इसका ‘नो-एस्केप जोन’ 60 किमी है, यानी दुश्मन का जेट भाग भी नहीं सकता। ऑपरेशन सिंदूर में राफेल ने SCALP क्रूज मिसाइल से 11 पाकिस्तानी बेस तबाह किए। राफेल का SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम दुश्मन के रडार को जाम कर देता है। F-16 के पुराने ALQ पॉड्स इसके सामने बेकार हैं।

सुखोई-30 MKI और अस्त्र मिसाइल: भारत के पास 272 सुखोई-30 MKI जेट्स हैं, जो स्वदेशी अस्त्र Mk-1 मिसाइल (रेंज 110 किमी) से लैस हैं। 2019 के बाद IAF ने 550+ अस्त्र इंडक्ट कीं, जो रूसी R-77 को रिप्लेस कर रही हैं। आस्त्रा Mk-2 (160 किमी रेंज) का टेस्ट भी हो चुका है, जो PL-15 का जवाब है।

S-400 ट्रायम्फ: ये रूसी एयर डिफेंस सिस्टम 400 किमी तक के टारगेट को मार सकता है। एक साथ 80 टारगेट ट्रैक करता है। ऑपरेशन सिंदूर में इसने PL-15, ड्रोन्स, और क्रूज मिसाइलें रोकीं। इसकी 40N6 मिसाइल हाइपरसोनिक टारगेट भी ढेर कर सकती है। इसे भारत में सुदर्शन नाम दिया गया है।

आकाश-NG और SPYDER: आकाश मिसाइल (70 किमी रेंज) ने ड्रोन्स को खत्म किया। SPYDER लो-लेवल SAM है, जो UAVs और क्रूज मिसाइलों के लिए खास है।

ब्रह्मोस और NIRBHAY: ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल (350 किमी रेंज) ने AWACS को हिट किया। NIRBHAY स्टेल्थ क्रूज मिसाइल है, जो लैंड, समुद्र, या हवा से लॉन्च हो सकती है।

पाकिस्तान के पास चीनी HQ-9B और HQ-16 SAM सिस्टम्स हैं, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर में ये बेकार साबित हुए। JF-17 जेट्स (PL-15E) की रेंज F-16 से कम है। अगर AMRAAM का नया वर्जन भी मिल जाए, तो F-16 को ऊँचाई चाहिए, जो भारत का नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर (AWACS, रडार, डेटालिंक) कभी नहीं देगा।

पाकिस्तान की हकीकत ‘भीख’ पर चलने वाले मुल्क की

पाकिस्तान का F-16 बेड़ा पुराना है। अमेरिका इसे सिर्फ काउंटर-टेरर ऑपरेशन्स के लिए सपोर्ट करता है। शहबाज शरीफ और असीम मुनीर की ट्रंप से मुलाकातों का बस इतना मतलब है कि ‘स्पेयर पार्ट्स की भीख’ मिलती रहे। लेकिन नई ताकत? वो सपना ही रहेगा। ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने दिखाया कि पाकिस्तान का AWACS, एयरबेस या मिसाइल लॉन्चर कुछ भी सुरक्षित नहीं। भारत का इंटीग्रेटेड बैटल मैनेजमेंट सिस्टम (IBMS) और डीआरडीओ की रिवर्स इंजीनियरिंग (PL-15 मलबे से) ने हमें और मजबूत किया।

राजनीतिक शोर तो उठा, लेकिन जनता समझदार है

कॉन्ग्रेस और कुछ मीडिया ने AMRAAM खबर को उछालकर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की। लेकिन अमेरिकी खंडन ने सबकी बोलती बंद कर दी। भारत-अमेरिका रिश्ते मजबूत हैं – 2024 में 31 MQ-9B ड्रोन डील इसका सबूत है। मोदी सरकार की नीति ‘सर्जिकल स्ट्राइक्स’ से लेकर इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स ने भारत को अजेय बनाया। DRDO की अस्त्र Mk-2, राफेल, S-400 जैसे सिस्टम्स सुनिश्चित करते हैं कि पाकिस्तान की कोई मिसाइल, चाहे AMRAAM हो या PL-15, भारत का बाल बाँका न कर सके।

भारत का आसमान अजेय

पाकिस्तान को AMRAAM मिले या न मिले, भारत का एयर डिफेंस और अटैक सिस्टम इतना तगड़ा है कि दुश्मन की हिम्मत टूट जाएगी। ऑपरेशन सिंदूर में 350 किमी दूर AWACS मारना, PL-15 का मलबा इकट्ठा करना ये भारत की ताकत है। पाकिस्तान की ‘भीख’ से कुछ नहीं होगा। भारत का स्काई क्लियर रहेगा और हम हर लॉन्चिंग पैड को ध्वस्त कर देंगे।