Home Blog Page 189

मुनंबम जमीन विवाद में केरल HC ने वक्फ बोर्ड को दिया झटका, कहा- साधारण डीड से नहीं कर सकते कब्जा: जानें- कैसे 600 परिवारों की रिहाइश पर किया था दावा

केरल हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि केरल वक्फ बोर्ड का 2019 में मुनंबम की विवादित जमीन को वक्फ संपत्ति घोषित करने का फैसला गलत था। जस्टिस एसए धर्माधिकारी और जस्टिस श्याम कुमार वीएम की डिवीजन बेंच ने यह बात तब कही, जब उन्होंने एकल जज के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें राज्य सरकार द्वारा 600 परिवारों के अधिकारों की जाँच के लिए बनाए गए आयोग को खारिज किया गया था। ये परिवार मुनंबम में जमीन को वक्फ घोषित करने के बाद बेदखली का सामना कर रहे थे।

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि मोहम्मद सिद्दीक सैट द्वारा 1950 में फारूक कॉलेज मैनेजमेंट कमिटी के पक्ष में बनाया गया एंडोमेंट डीड वक्फ डीड नहीं था, बल्कि एक साधारण गिफ्ट डीड था। कोर्ट ने कहा कि इस दस्तावेज में कहीं भी यह नहीं दिखाया गया कि संपत्ति को हमेशा के लिए अल्लाह के नाम पर समर्पित किया गया था। इसलिए इसे वक्फ संपत्ति नहीं कहा जा सकता।

जस्टिस सुष्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस श्याम कुमार वी एम ने की खंडपीठ यह फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की दो याचिकाओं को स्वीकार कर लिया और सिंगल बेंच के पुराने आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सरकार द्वारा गठित जाँच आयोग को अवैध बताया गया था।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वक्फ की परिभाषा में ‘स्थायी समर्पण’ (Permanent Dedication) का होना आवश्यक है। इसका मतलब यह होता है कि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति का स्वामित्व पूरी तरह से और हमेशा के लिए अल्लाह के नाम कर दे, ताकि उस संपत्ति का उपयोग केवल मजहबी, पाक या परोपकारी उद्देश्यों के लिए ही हो।

कोर्ट ने पाया कि सिद्दीक सैट द्वारा फारूक कॉलेज को दी गई संपत्ति में कॉलेज को यह अधिकार दिया गया था कि वह जमीन को बेच सकता है, लीज पर दे सकता है या अन्य किसी तरह उपयोग में ला सकता है। जब किसी संपत्ति को बेचने या ट्रांसफर करने की अनुमति दी जाती है, तो वह संपत्ति वक्फ नहीं रह जाती, बल्कि वह सार्वजनिक चैरिटेबल संपत्ति के रूप में मानी जाती है।

कोर्ट ने कहा कि 1950 का यह दस्तावेज स्थाई समर्पण की भावना को प्रदर्शित नहीं करता, बल्कि इसमें संपत्ति के पुनः वापसी (Reversion) का प्रावधान था। इसमें लिखा था कि अगर संपत्ति का कोई हिस्सा बचा रह जाता है तो वह वापस दाता या उसके वारिसों को लौटाया जा सकता है। कोर्ट ने इसे वक्फ की मूल भावना के विपरीत बताया और कहा कि यह सिर्फ एक साधारण उपहार था, जिसे फारूक कॉलेज के प्रबंधन के लिए दिया गया था।

इस फैसले में कोर्ट ने केरल वक्फ बोर्ड की 2019 की कार्रवाई को भी कठोर शब्दों में फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि लगभग 69 साल तक न तो सिद्दीक सैट के वारिसों ने और न ही फारूक कॉलेज ने इस संपत्ति को वक्फ माना था।

इसके बावजूद वक्फ बोर्ड ने 2019 में एकतरफा तरीके से इसे वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया, जो पूरी तरह मनमानी और अवैध कार्रवाई थी। कोर्ट ने इसे ‘भूमि हड़पने की कोशिश’ यानी ‘Land Grabbing Tactic’ बताया। जजों ने टिप्पणी की कि वक्फ बोर्ड ने बिना किसी विधिक जाँच या सभी हितधारकों को शामिल किए बिना यह कदम उठाया, जो न केवल अव्यवहारिक बल्कि असंवैधानिक भी है।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि राज्य सरकार को मुनम्बम भूमि विवाद की जाँच के लिए आयोग गठित करने का पूरा अधिकार है। यह आयोग एक तथ्य खोजने वाली संस्था (Fact-Finding Commission) होगी, जिसका मकसद विवाद का समाधान निकालना है, न कि स्वामित्व या टाइटल पर फैसला देना। राज्य सरकार ने 27 नवंबर 2024 को रिटायर्ड जस्टिस सी एन रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में यह आयोग गठित किया था, ताकि इस लंबे समय से चल रहे विवाद का स्थायी समाधान निकाला जा सके।

मामला क्या है?

मुनंबम भूमि विवाद केरल के एर्नाकुलम जिले में करीब 404 एकड़ जमीन से जुड़ा है। इस इलाके में लगभग 600 हिंदू और ईसाई परिवार दशकों से रह रहे हैं। वक्फ बोर्ड का दावा है कि यह जमीन 1950 में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज की गई थी, जबकि स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने यह जमीन फारूक कॉलेज से कानूनी रूप से खरीदी थी।

यह विवाद अब एक राजनीतिक मुद्दे में बदल गया है। भाजपा नेताओं ने वक्फ बोर्ड पर सार्वजनिक और निजी जमीनों पर कब्जा करने का आरोप लगाया है। केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने इसे ‘बर्बरता’ कहा और कहा कि संसद में ऐसे कदमों को रोकने के लिए नया कानून लाया जाएगा। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी सरकार मुनम्बम के लंबे समय से रह रहे लोगों के साथ है और उनकी संपत्ति की सुरक्षा के लिए काम कर रही है।

दरअसल, वक्फ विवाद कोई नया विषय नहीं है। देशभर में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ वक्फ बोर्ड ने निजी या सरकारी संपत्तियों पर दावा ठोका है। इसमें तमिलनाडु के कुछ गाँव, सूरत की सरकारी इमारतें, बेंगलुरु का ईदगाह मैदान, हरियाणा का जठलाना गाँव और हैदराबाद का एक पाँच सितारा होटल तक शामिल हैं।

वक्फ द्वारा जमीनों पर कब्जा करने के तीन सामान्य तरीके हैं। किसी जमीन को कब्रिस्तान बताना, उस पर मजार या दरगाह बनाना और सार्वजनिक भूमि पर नमाज पढ़ना शुरू करना। जब किसी स्थान पर लगातार मजहबी गतिविधियाँ होने लगती हैं, तो वक्फ बोर्ड उस जगह को ‘वक्फ संपत्ति’ के रूप में पंजीकृत करने की माँग कर देता है।

क्या कहता है वक्फ कानून

वक्फ कानून के अनुसार, एक बार अगर कोई संपत्ति वक्फ घोषित हो जाती है, तो वह हमेशा वक्फ रहती है। इसका अर्थ यह है कि उस पर फिर से दावा करना या उसे बेच पाना लगभग असंभव हो जाता है। कई मामलों में वक्फ बोर्ड बिना किसी ठोस दस्तावेज के भी संपत्तियों पर दावा कर देता है। यह न केवल संपत्ति अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि इससे सांप्रदायिक तनाव भी पैदा होता है।

केंद्र सरकार अब वक्फ कानून में सुधार लाने की तैयारी में है। नए प्रावधानों के तहत किसी भी निजी या सरकारी संपत्ति को वक्फ घोषित करने से पहले संपत्ति मालिक की सहमति और राजस्व विभाग की विस्तृत जाँच आवश्यक होगी। साथ ही वक्फ बोर्ड को अपने दावे का पूरा दस्तावेज़ी प्रमाण देना होगा। इन कदमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय की भूमि पर अनुचित या झूठा दावा न किया जा सके।

केरल हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक जमीन विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक बड़ी कानूनी मिसाल है। कोर्ट  ने साफ कहा कि वक्फ तभी बनता है जब संपत्ति स्थाई रूप से और बिना वापसी की शर्त के अल्लाह के नाम समर्पित की जाए। अगर संपत्ति के ट्रांसफर, बिक्री या रिवर्शन का प्रावधान है, तो वह वक्फ नहीं बल्कि एक साधारण चैरिटेबल गिफ्ट है। इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारें वक्फ बोर्ड के एकतरफा निर्णयों के खिलाफ जाँच कर सकती हैं और नागरिकों के संपत्ति अधिकारों की रक्षा करना उनका वैधानिक दायित्व है।

यह निर्णय न केवल मुनंबम के हजारों परिवारों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि उन तमाम नागरिकों के लिए भी एक उम्मीद की किरण है, जिनकी संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड ने वर्षों बाद दावा ठोका है। कोर्ट ने अपने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कानून की आड़ में भूमि हड़पने की कोई भी कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह फैसला इस दिशा में एक मजबूत कदम है कि भारत में हर नागरिक की संपत्ति सुरक्षित रहे, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से जुड़ा हो।

₹36.04 लाख कैश, 2.6 किलो सोना, 5.5 किलो चाँदी… PWD के रिटायर्ड अधिकारी के ठिकानों से मिला 17 टन शहद: जानें- छापेमारी में मिली इस अकूत दौलत का क्या करेगी सरकार

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। लोकायुक्त पुलिस ने लोक निर्माण विभाग (PWD) के रिटायर्ड चीफ इंजीनियर जीपी मेहरा के ठिकानों पर छापा मारा। यह छापा आय से अधिक संपत्ति के मामले में मारा गया।

भोपाल और नर्मदापुरम जिले के चार ठिकानों पर एक साथ यह कार्रवाई हुई। छापे में करोड़ों रुपए की नकदी, सोना, लग्जरी गाड़ियाँ मिली हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि उनके फार्महाउस से 17 टन शहद का विशाल भंडार मिला।

क्या-क्या मिला?

छापेमारी के दौरान मेहरा के ठिकानों से करोड़ों का खजाना जब्त किया गया। इसमें कुल ₹36.04 लाख कैश, लगभग ₹3.05 करोड़ का 2.6 किलो सोना, और 5.5 किलो चाँदी शामिल है। मेहरा के परिवार के नाम पर फोर्ड एंडेवर, स्कोडा स्लाविया समेत चार लग्जरी कारें भी मिली हैं। इसके अलावा, ₹56 लाख की एफडी, शेयर और इंश्योरेंस पॉलिसी के महत्वपूर्ण दस्तावेज भी जब्त किए गए।

मेहरा की सबसे बड़ी संपत्ति नर्मदापुरम में स्थित उनका विशाल फार्महाउस है, जहाँ 17 टन शहद का भंडार, 6 ट्रैक्टर, और 39 कॉटेज (7 तैयार और 32 निर्माणाधीन) मिले हैं। गोविंदपुरा स्थित एक फैक्ट्री को उनका बिजनेस फ्रंट माना जा रहा है। जाँच एजेंसियों का अनुमान है कि अंतिम मूल्यांकन के बाद अवैध संपत्ति की कुल कीमत कई

जब्त की गई संपत्ति का क्या होता है?

भ्रष्टाचार से जुड़ी करोड़ों की संपत्ति जब्त होने के बाद यह सवाल उठता है कि कानून के तहत इन संपत्तियों का आखिर क्या होता है। देश में ऐसी कार्रवाई मुख्य रूप से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 और धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत की जाती है।

जाँच के दौरान, संदेह होने पर संपत्ति को CRPC की धारा 102 या PMLA की धारा 5 के तहत जब्त किया जाता है। जब्त किया गया कैश, सोना और जेवर को बैंकों या सरकारी एजेंसियों के गोदाम में सुरक्षित रखा जाता है। जब तक यह मामला कोर्ट में चल रहा होता है, तब तक इन संपत्तियों को बेचा या निपटाया नहीं जाता है।

कोर्ट का फैसला आने के बाद

अगर कोर्ट में आरोपित पर भ्रष्टाचार के आरोप साबित हो जाते हैं, तो जब्त की गई संपत्ति पूरी तरह सरकार की हो जाती है। इसके बाद सरकार कानूनी प्रक्रिया के तहत इन संपत्तियों को नीलामी के जरिए बेच सकती है। नीलामी से जो पैसा मिलता है, वह सीधे सरकारी खजाने में जमा होता है। इस राशि का उपयोग सरकारी योजनाओं और जनकल्याण के कामों में किया जाता है। कई बार जब्त किए गए वाहन या अन्य सामानों को सरकारी उपयोग में भी लिया जा सकता है।

लेकिन अगर अदालत में आरोप साबित नहीं होते, तो जब्त की गई संपत्ति आरोपित को वापस कर दी जाती है। हालाँकि, इसके लिए आरोपित को यह साफ करना होता है कि उसने वह संपत्ति कैसे और किस स्रोत से कमाई थी।

कुल मिलाकर, जब्त की गई संपत्ति कोर्ट की निगरानी में रहती है। फैसला आने तक न तो उसे बेचा जा सकता है और न ही उसका इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार की यह भी जिम्मेदारी होती है कि वह जब्त किए गए हर सामान का पूरा लेखा-जोखा अदालत के सामने पेश करे। आरोप सिद्ध होने पर ही वह संपत्ति हमेशा के लिए सरकारी हो पाती है।

बिहार 2025: जनादेश की उलझन या राजनीतिक धैर्य की परीक्षा?

जब नीतीश कुमार फिर से नई भूमिका में लौटे हैं, भाजपा निर्णायक वापसी की तैयारी में है और राजद अब भी अतीत की विरासत और वंशवाद से बाहर नहीं निकल पा रही है। बिहार की राजनीति इस बार फिर से किसी महाकाव्य जैसी लग रही है जिसमें कथानक पुराना है, पात्र वही हैं, पर गठबंधन और नारों के नाम पर मंच नए बना दिए गए हैं। 

अक्तूबर-नवंबर 2025 में होने वाले विधानसभा चुनाव एक बार फिर यह तय करेंगे कि बिहार नई दिशा में बढ़ेगा या फिर पुराने राजनीतिक समीकरणों के दलदल में ही फँसा रहेगा। 

2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को 125 सीटों के साथ मामूली बहुमत मिला था, लेकिन तब से बिहार की राजनीति इतनी बार पलटी खा चुकी है कि जनता अब गिनती भूल चुकी है। अगस्त 2022 में नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़कर राजद-कॉन्ग्रेस गठबंधन का दामन थामा था। 

लेकिन जनवरी 2024 में उन्होंने एक बार फिर पलटी मारते हुए एनडीए में वापसी कर ली। यह उनका शायद चौथा बड़ा ‘यूटर्न’ था जिसने उन्हें भारतीय राजनीति का सबसे ‘लचीला’ नेता बना दिया है। उनका तर्क वही पुराना है ‘बिहार के विकास के लिए।’

लेकिन जनता अब इस जुमले को सुनसुनकर थक चुकी है। वास्तविक विकास के आँकड़े ठहरे हुए हैं, पर राजनीतिक बयानबाजी अब भी वही है। 

भाजपा की चुनौती धैर्य की भी परीक्षा 

भाजपा के लिए यह चुनाव सिर्फ बिहार की सरकार पाने का अवसर नहीं है, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक लड़ाई भी है। सवाल यह है कि क्या भाजपा बिहार में स्थायी रूप से वैकल्पिक नेतृत्व स्थापित कर सकती है, या फिर हमेशा किसी गठबंधन की ‘मजबूरी’ बनकर रह जाएगी? 

नीतीश कुमार की वापसी भाजपा के लिए रणनीतिक मजबूरी थी। पार्टी जानती है कि कुर्मी-कोयरी और कुछ अन्य ओबीसी समूह अब भी जेडीयू के साथ हैं। लेकिन भाजपा का कार्यकर्ता वर्ग, जो वर्षों से नीतीश के ‘पलटी मॉडल’ से आहत रहा है, अब उत्साह खो चुका है।

इसलिए 2025 में भाजपा की रणनीति साफ है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और केंद्र की योजनाओं पर जोर, जबकि स्थानीय स्तर पर नीतीश की मशीनरी से जातीय समीकरण संभलेंगे। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की तरह बिहार भाजपा के लिए वह राज्य है जहाँ अब तक पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिला। बिहार का जनादेश हमेशा गठबंधन की आदत से बंधा रहा है  जनता स्थिरता चाहती है,पर स्थिर नेतृत्व को पूरा भरोसा देने में अब भी हिचकती है। 

राजद की उलझन – विरासत और नेतृत्व के बीच 

राजद के लिए 2025 अस्तित्व का चुनाव है। तेजस्वी यादव, जिन्हें कभी ‘युवा विकल्प’ के रूप में प्रस्तुत किया गया था, अब वैचारिक अस्पष्टता और संगठनात्मक कमजोरी के शिकार दिखते हैं। उनका ‘माई’ (मुस्लिम–यादव) समीकरण अब 1990 के दशक जितना प्रभावी नहीं रहा। नई पीढ़ी के वोटर, जो विकास और रोजगार की भाषा समझते हैं, अब ‘सामाजिक न्याय’ की पुरानी कहानी से प्रभावित नहीं होते। 

तेजस्वी ने खुद को प्रशासनिक रूप से सक्षम और आधुनिक नेता दिखाने की कोशिश की, लेकिन लालू यादव की 

‘जंगलराज’ वाली छवि अब भी उनके सिर पर साया बनकर मौजूद है। 2005 के बाद जन्मे लाखों युवा मतदाता उस दौर को याद नहीं करते वे सिर्फ सुनते हैं कि तब बिहार में अराजकता और भय का वातावरण था। 

राजद की कॉन्ग्रेस और वामदलों के साथ गठबंधन भी किसी वैचारिक सामंजस्य का नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा का परिणाम है। उनका एकमात्र एजेंडा ‘भाजपा हटाओ’ है, पर ‘क्या लाओ’ इसका कोई उत्तर नहीं। 

जाति समीकरण अब भी निर्णायक 

बिहार की राजनीति चाहे कितनी भी बदलती दिखे, पर जाति समीकरण अब भी चुनाव परिणामों की रीढ़ है। भाजपा लगातार अति पिछड़े वर्गों (EBC) और दलितों को केंद्र की योजनाओं के माध्यम से जोड़ने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला, हर घर जल, पीएम किसान इन योजनाओं ने बिहार के ग्रामीण मतदाता को भाजपा से सीधे जोड़ा है।

वहीं जेडीयू अब भी अपने पारंपरिक कुर्मी–कोयरी आधार पर निर्भर है, और राजद यादव मुस्लिम वर्ग में प्रभाव बनाए हुए है। कॉन्ग्रेस ऊपरी जातियों और मुसलमानों के सहारे जीवित है, पर प्रभाव सीमित। 

चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और उपेंद्र कुशवाहा के आरएलएसपी गुट जैसे छोटे दल कुछ सीटों पर असर डाल सकते हैं। चिराग की ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ लाइन युवाओं को आकर्षित करती है, और भाजपा इसे एक ‘साइलेंट सैटेलाइट’ सहयोगी के रूप में इस्तेमाल कर सकती है जहाँ जेडीयू एंटी-इनकम्बेंसी झेल रही हो। 

भाजपा की बड़ी बाजी – मोदी का चेहरा और वेलफेयर पॉलिटिक्स 

भाजपा की 2025 रणनीति दो स्तंभों पर आधारित है मोदी का नेतृत्व और कल्याण योजनाओं की विश्वसनीयता। भाजपा इस चुनाव को ‘विकसित भारत, विकसित बिहार’ के नारे के साथ लड़ना चाहती है। 

मोदी की रैलियों में संदेश साफ होगा ‘बिहार ने भारत को ताकत दी, लेकिन भारत ने बिहार को उसका हक कब दिया?’ इस भावनात्मक प्रश्न के साथ भाजपा बिहार को सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दों से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आकांक्षा से जोड़ना चाहती है। 

भाजपा का अभियान राष्ट्रवाद, विकास और आत्मसम्मान का मिश्रण है एक तरफ ‘लालू–नीतीश मॉडल’ की अस्थिरता, दूसरी तरफ मोदी युग की स्थिरता और डिलीवरी। यही विरोधाभास 2025 के चुनाव को रोचक बनाएगा। 

जनादेश की थकान या निर्णायक मोड़? 

बिहार की जनता इस बार जिस मनोस्थिति में है, उसे ‘जनादेश की थकान’ कहा जा सकता है। हर कुछ साल पर गठबंधन बदलने, नारे बदलने और “विकास” के अधूरे वादों ने मतदाताओं को संदेहग्रस्त बना दिया है। 

क्या जनता एक बार फिर नीतीश कुमार की राजनीतिक कलाबाज़ियों को माफ करेगी?​क्या भाजपा अब सचमुच बिहार में अकेली पहचान बनाना चाहेगी, या फिर समझौते के रास्ते पर चलेगी?​

क्या राजद अपने सामाजिक आधार से आगे बढ़ पाएगा? 

प्रारंभिक सर्वेक्षणों के मुताबिक़, एनडीए थोड़ा आगे है मुख्यतः मोदी फैक्टर के कारण। पर बिहार की राजनीति में आखिरी क्षणों का समीकरण हमेशा अप्रत्याशित रहा है। एक छोटा जातीय ध्रुवीकरण या स्थानीय असंतोष पूरा खेल पलट सकता है। 

संभावना है कि नतीजे फिर से अधूरे बहुमत की ओर झुकें, जिससे ‘मजबूरी का गठबंधन’ एक बार फिर बने। और यही बिहार की सबसे बड़ी त्रासदी है जनता बदलाव चाहती है, पर परिवर्तन के जोखिम से अब भी डरती है। 

अंत में 

बिहार 2025 का चुनाव सिर्फ एक राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि धैर्य की परीक्षा है जनता के धैर्य की, भाजपा के धैर्य की और शायद नीतीश कुमार की भी। यह चुनाव यह तय करेगा कि क्या बिहार अब भी गठबंधन की अनिश्चितता में विश्वास रखता है, 

या वह अब स्थायित्व और साफ़ नेतृत्व की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाने को तैयार है। राजनीति में धैर्य एक गुण होता है, पर बिहार की जनता अब शायद धैर्य खोने लगी है। 

‘न झुकूँगा-न डरूँगा, खजुराहो जाकर अनशन करूँगा’: CJI पर जूता फेंकने वाले वकील बोले- भगवान ने 100 करोड़ लोगों में से मुझे चुना, Video

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार (6 अक्टूबर 2025) को कार्यवाही के दौरान CJI पर जूता फेंकने के आरोपित वरिष्ठ वकील राकेश किशोर ने अब कहा, ”मैं बेहद गौरवान्विंत हूँ कि भगवान ने इसके काम के लिए 100 करोड़ हिंदुओं में से सिर्फ मुझे चुना, मैं न झुकूँगा न डरूँगा, भगवान विष्णु के लिए खजुराहो जाकर अनशन करूँगा। मेरी तैयारी पूरी है इसके लिए मुझे भगवान से आदेश प्राप्त हो गया है।“

घटना से बाद से ही हम आरोपित वकील का इंटरव्यू करने के प्रयास में थे लेकिन तीसरे दिन (गुरुवार 9 अक्टूबर) आरोपित वकील डॉ. राकेश किशोर से उनके मयूर विहार स्थित आवास पर मुलाकात हुई इससे पहले सोसायटी के गेट पर सुरक्षाकर्मी ने पूरी जाँच पड़ताल और वकील से बात कराने के बाद ही हमें अंदर जाने दिया।

दरवाजे पर घँटी बजाने पर बाहर आए वकील डॉ. राकेश किशोर ने जालीदार गेट के अंदर से पूरा परिचय और उद्देश्य जानने के बाद ही हमें अंदर बुलाया। इसके बाद उनकी पत्नी और वहाँ पहले से मौजूद एक उनके दोस्त ने हमारी पूरी पड़ताल के बाद ही कैमरे पर हमसे बात करने के लिए तैयार हुए।

हाल चाल पूछने पर वकील डॉ. राकेश किशोर अपनी जान पर खतरा बताते हुए कहते हैं कि कुछ लोग हमेशा सर तन से जुदा करने में दिलचस्पी रखते हैं। मुझ पर कभी भी अटैक हो सकता है मुझे लगातार धमकियाँ मिल रही हैं हो भी सकता है कि सनातन की आवाज हमेशा के लिए बंद हो जाए। मैंने डर के कारण बाहर जाना यहां तक कि बाहर टहलना भी बंद कर दिया है, लेकिन भगवान पर भरोसा रखते हुए एक शेर सुनाते हैं…

फानूस बनकर जिसकी हिफाजत हवा करे,

वो चिराग क्या बुझे जिसकी हिफाजत खुदा करे।।

आगे डॉ. किशोर कहते हैं कि भगवान के आदेश से मैं खजुराहो अनशन के लिए जा रहा हूँ तैयारी पूरी कर ली है। अपने भगवान विष्णु की प्रतिमा को फिर से स्थापित कराने के लिए मैं जान भी देने के लिए तैयार हूँ। इस जन्म में यह काम नहीं हुआ तो एक-दो जन्म लेकर करूँगा।

डॉ. राकेश किशोर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की कथन-करनी में अंतर आ गया है। नुपूर शर्मा की जिंदगी आज तबाह हो गई है। वो अंडर ग्राउंड है। वो कहाँ है उसका परिवार कहाँ है किसी को नहीं पता ऐसी जिंदगी कौन जीना चाहेगा? ये सब एक सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के कारण हुआ। कोर्ट ने नुपूर शर्मा को तो फटकार लगा दी, लेकिन जिन लोगों ने सर तन से जुदा की धमकी दी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। वो(नुपूर शर्मा) बेचारी मर-मर के जी रही है। उधर कन्हैयालाल की हत्या करके हत्यारों ने वीडियो बनाया, लेकिन उसके हत्यारे आज भी आजाद घूम रहे हैं।

इससे साफ है कि बात सनातन की कोर्ट में आती है तो जज साहब टिप्पणी करते हैं और बात जब सर तन से जुदा वालों की आती है तो चुप्पी साध लेते हैं। हिम्मत है तो दूसरे लोगों के लिए टिप्पणी करके देखिए, लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा।

डॉ. राकेश किशोर ने कहा कि इस देश में सनातन की आज ये जो हालत है वह इसलिए कि हम सनातन के अपमान पर आज तक चुप रहे और सिर्फ लेख लिखते रहे कभी कोई कदम नहीं उठाया।

डॉ. राकेश किशोर ने कहा, “वो(मुस्लिम) गजवा ए हिंद की तैयारी कर रहे हैं। वह भारत को ईरान की तरह बनाना चाहते हैं। इसकी एक झलक मैंने अपनी आँखों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और झारखंड में देखी है। 1947 में मुस्लिम देशों की संख्या 10-12 थी लेकिन आज उनकी संख्या 57 हो गई है। ये अब देश के युवाओं की चिंता है कि अगर कल को भागना पड़े तो वह भारत से कहाँ जाएँगे?”

माफ करने पर CJI को नहीं कहूँगा शुक्रिया

‘जूता कांड’ के बाद CJI बीआर गवई द्वारा खुद को माफ करने पर डॉ. किशोर कहते हैं, “मैं उन्हें शुक्रिया अदा नहीं करूँगा क्योंकि उन्होंने मुझे इसलिए माफ किया है कि वह नवंबर माह में सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसके बाद वह मेरी तरह सामान्य वकील हो जाएँगे। जब मैं अपना केस लड़ते हुए इनसे कोर्ट में सवाल करूँगा तो वह मेरे सवालों का सामना नहीं कर पाएँगे। उन्हें पता है कि मैं एक ईमानदार हूँ और मैं इनकी(CJI) की कलई खोल सकता हूँ। हालाँकि मुझे फँसाने और गिरफ्तार किए जाने के लिए नए तरीके से प्रयास हो रहे हैं। मेरे खिलाफ कर्नाटक में भी मुकदमा लिखवाया गया है, लेकिन मैं इनसे डरने वाला नहीं हूँ। मैं गिरफ्तारी देने के लिए तैयार हूँ।”

भरूच धर्मांतरण केस में गुजरात HC ने FIR रद्द करने से किया इनकार, कहा- इस्लाम अपनाने वाले दूसरों को मजबूर करने के आरोप से नहीं हो सकते बरी: विदेशी फंडिंग का भी खेल

गुजरात हाईकोर्ट ने 1 अक्टूबर 2025 को हिंदुओं के इस्लाम में धर्म परिवर्तन से जुड़े एक मामले में आरोपितों द्वारा FIR रद्द करने के लिए दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोपितों के खिलाफ पहली नजर में (Prima Facie) अपराध बनते हैं।

जस्टिस निर्जर एस देसाई की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। आरोपितों ने 2021 में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की माँग की थी। यह एफआईआर आईपीसी की धारा 120(बी), 153(ए)(1), 153(बी)(1)(सी), 295(ए), 506(2), 466, 467, 468, 471, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(5-ए), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 84(सी) और गुजरात धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2003 की धाराओं के तहत दर्ज की गई थी।

अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि चूँकि आरोपित खुद किसी और धर्म से इस्लाम में आए हैं, इसलिए उन्हें इस मामले में आरोपित नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वे पीड़ित नहीं बल्कि दूसरों पर धर्म परिवर्तन का दबाव डालने वाले लोग हैं।

मामले में तीन आरोपित ऐसे हैं जो पहले हिंदू थे और बाद में इस्लाम अपनाया। आरोप है कि इन लोगों ने भरूच जिले के आमोद क्षेत्र के हिंदू ग्रामीणों को धर्म बदलने के लिए नए मकान, अनाज, नकद और नौकरी का लालच दिया।

भरूच धर्मांतरण का क्या है पूरा मामला

भरूच जिले के आमोद पुलिस स्टेशन में 14 नवंबर 2021 को प्रवीन भाई वसंत भाई वसावा नामक व्यक्ति की शिकायत पर धर्म परिवर्तन का मामला दर्ज किया गया। शुरू में एफआईआर में 9 लोगों को आरोपित बनाया गया था, लेकिन जाँच के बाद आरोपितों की संख्या बढ़कर 16 हो गई।

प्रवीन भाई वसावा ने शिकायत में बताया कि साल 2018 में उन्हें लालच देकर इस्लाम धर्म में बदलवाया गया और उनका नाम बदलकर सलमान वसंत पटेल कर दिया गया। उन्होंने कहा कि अब्दुल अजीज पटेल नाम का व्यक्ति उन्हें एक सरकारी परिसर में बने इबादतगाह में ले जाकर कलमा पढ़ना सिखाता था। एक दिन उसे सूरत ले जाया गया, जहाँ झूठे बहाने से एक कागज पर उसका अँगूठा लगवाया गया और बाद में उसके आधार कार्ड पर नाम बदल दिया गया।

शिकायत के अनुसार, शब्बीर भाई बेकरीवाला और समद भाई बेकरीवाला ने अजितभाई छगनभाई वसावा (जिसका नाम बदलकर अब्दुल अजीज पटेल कर दिया गया) को आर्थिक मदद और मकान बनवाने का लालच देकर इस्लाम में धर्म परिवर्तन कराया। इसके बाद अजितभाई ने दो अन्य हिंदू पुरुषों, महेंद्र जीवनभाई वसावा (नाम बदला गया यूसुफ जीवन पटेल) और रमन बरकत वसावा (नाम बदला गया अय्यूब बरकत पटेल) को भी धर्म परिवर्तन के लिए राजी किया।

इसके बाद ये तीनों, शब्बीर और समदभाई के साथ मिलकर गाँव के अन्य हिंदू लोगों को भी नए घर, राशन और नकद पैसे का लालच देकर इस्लाम में धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करने लगे।

शिकायतकर्ता ने बताया कि अब्दुल अजीज पटेल को धर्म परिवर्तन के लिए हसन तिसली नाम के व्यक्ति से आर्थिक सहायता मिलती थी। हसन तिसली, अब्दुल अजीज पटेल और एक विदेशी नागरिक फेफड़ावाला हाजी अब्दुल्ला ने मिलकर करीब 37 हिंदू परिवारों के लगभग 100 लोगों का इस्लाम में धर्म परिवर्तन कराया।

प्रवीनभाई ने यह भी बताया कि अब्दुल अजीज पटेल ने सरकारी सहायता से बने अपने घर को तोड़कर उसकी जगह इबादतगाह बनाई थी, जहाँ वह लोगों को कलमा सिखाता था। उनका आरोप है कि आरोपित  देशभर में हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने की साजिश का हिस्सा हैं और उन्हें इसके लिए विदेशों से भारी आर्थिक मदद मिलती है। जब प्रवीनभाई ने इसका विरोध किया, तो आरोपितों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी, जिसके बाद उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

उच्च न्यायालय ने आरोपितों को धर्म परिवर्तन का ‘पीड़ित’ मानने से इनकार कर दिया

आरोपितों ने एफआईआर को चुनौती देते हुए कहा कि वे खुद धर्म परिवर्तन के शिकार हैं, अपराधी नहीं। उनका दावा था कि शिकायतकर्ता और अन्य लोगों ने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था, किसी दबाव या लालच में नहीं। इसलिए उन पर कोई अपराध नहीं बनता।

लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजों और गवाहों के बयानों से यह साफ दिखता है कि धर्म परिवर्तन के बाद उन्हीं लोगों ने दूसरों पर भी धर्म बदलने का दबाव डाला और उन्हें लालच दिया। आरोप है कि उन्होंने लगभग 37 हिंदू परिवारों के करीब 100 लोगों का इस्लाम में धर्म परिवर्तन कराया।

कोर्ट ने कहा कि यह आरोप पहली नजर में सही लगते हैं (prima facie offence बनता है)। इसलिए यह मानना गलत होगा कि जो लोग पहले हिंदू थे और बाद में इस्लाम में गए, वे इस मामले में पीड़ित हैं।

कोर्ट ने कहा कि “एफआईआर और गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट है कि आरोपितों ने अन्य लोगों को इस्लाम अपनाने के लिए प्रभावित किया, दबाव डाला और लालच दिया। जाँच में मिले सबूत और चार्जशीट से यह साबित होता है कि उनके खिलाफ Prima Facie मामला बनता है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि वे खुद धर्म परिवर्तन के शिकार हैं।”

इस आधार पर अदालत ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया और कहा कि ट्रायल जारी रहेगा।

जाँच में सहयोग न करने के आधार पर एक आरोपी का आवेदन खारिज कर दिया गया

गुजरात हाईकोर्ट ने आरोपित फेफड़ावाला की याचिका खारिज कर दी, जो यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) में रहता है। अदालत ने कहा कि फेफड़ावाला ने जाँच में सहयोग नहीं किया, इसलिए उसकी याचिका केवल उसके व्यवहार के आधार पर ही खारिज की जाती है, मामले के मेरिट पर नहीं।

कोर्ट ने बताया कि फेफड़ावाला इस मामले के दर्ज होने से पहले भारत में 25 बार आया था, लेकिन एफआईआर के बाद उसने एक बार भी भारत की यात्रा नहीं की। पुलिस ने उसे जाँच में शामिल होने और सहयोग करने के लिए बुलाया, लेकिन उसने आने से इनकार कर दिया।

अदालत ने कहा कि आरोपित ने न तो अग्रिम जमानत (anticipatory bail) की कोई अर्जी लगाई, न ही किसी भी समय जाँच में शामिल होने की इच्छा दिखाई। उसे सीआरपीसी की धारा 41-ए के तहत समन भी भेजा गया था, जिसका उसने जवाब तो दिया, लेकिन जाँच में उपस्थित नहीं हुआ।

कोर्ट ने कहा कि उसके इस रवैये को देखते हुए याचिका को खारिज किया जाता है, क्योंकि उसने जाँच में कोई सहयोग नहीं किया और खुद को जाँच से दूर रखा।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

‘जजों को कम बोलना चाहिए’: जिस ‘ओरल ऑब्जर्वेशन’ से बचने की पूर्व CJI काटजू दे रहे नसीहत, जानिए उसके नाम पर कैसे हिंदुओं और PM मोदी को बनाया गया ‘निशाना’

भारत की न्यायपालिका को लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ माना जाता है, लेकिन हाल के सालों में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की कोर्ट रूम में की गई मौखिक टिप्पणियाँ (ओरल ऑब्जर्वेशंस) विवादों का केंद्र बन गई हैं। ये टिप्पणियाँ अक्सर फैसले का हिस्सा नहीं होतीं, लेकिन इनके कारण पूरे देश में हंगामा मच जाता है। ताजा उदाहरण है मौजूदा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बी.आर. गवई की एक टिप्पणी, जिसने हिंदू समाज को आहत किया और एक वकील को इतना गुस्सा दिलाया कि उसने कोर्ट में ही जूता फेंक दिया।

पूर्व सीजेआई मार्कंडेय काटजू ने इस पर अपनी राय देते हुए कहा है कि जजों को कोर्ट में कम बोलना चाहिए और सिर्फ कानूनी पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि अनावश्यक बयानबाजी करनी चाहिए।

पूर्व सीजेआई मार्कंडेय काटजू ने अपने एक लेख में लिखा है कि जजों का काम सुनना है, फैसला देना है, न कि लेक्चर देना। वे कहते हैं, “एक ज्यादा बोलने वाला जज एक बेसुरे बाजे की तरह होता है।” यह बात उन्होंने इंग्लैंड के पूर्व लॉर्ड चांसलर सर फ्रांसिस बेकन के हवाले से कही।

काटजू ने गवई की टिप्पणी को अनुचित बताया और कहा कि अगर कोई जज मस्जिद के मामले में पैगंबर मोहम्मद से जाकर प्रार्थना करने की बात कहे, तो क्या होगा? शायद ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे लगने लगें। यह बात सोचने वाली है कि क्या जजों की ऐसी टिप्पणियाँ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती हैं और समाज में अशांति फैलाती हैं?

आइए, पहले इस ताजा मामले को विस्तार से समझते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में कुछ समय पहले एक याचिका आई थी, जिसमें मध्य प्रदेश के खजुराहो में भगवान विष्णु की क्षतिग्रस्त मूर्ति को बहाल करने की माँग की गई थी। याचिकाकर्ता ने खुद को विष्णु भक्त बताया। सुनवाई के दौरान सीजेआई गवई ने कहा, “तुम कहते हो कि तुम विष्णु के कट्टर भक्त हो। जाओ और खुद देवता से कहो कि कुछ करे। जाओ और प्रार्थना करो।”

यह टिप्पणी केस के कानूनी मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं रखती थी, लेकिन इसने हिंदू समाज में गुस्सा भड़का दिया। कई लोगों ने इसे सनातन धर्म पर हमला माना। नतीजा? एक गुस्साए वकील ने कोर्ट में ही गवई पर जूता फेंक दिया। काटजू ने जूता फेंकने की निंदा की, लेकिन कहा कि जज की अनावश्यक बातों ने यह न्योता खुद दिया।

यह पहली बार नहीं है जब जजों की मौखिक टिप्पणियों ने देश में अव्यवस्था पैदा की हो। पिछले कुछ सालों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ जजों ने हिंदू धर्म से जुड़े मुद्दों पर ऐसी टिप्पणियाँ कीं, जो फैसले में शामिल नहीं हुईं, लेकिन समाज में तूफान ला दिया। आइए, इनमें से कुछ प्रमुख मामलों पर नजर डालते हैं।

इसी साल 2025 में पूर्व जस्टिस रोहिंटन नरीमन की ‘डिवाइन ऑर बोवाइन इंटरवेंशन‘ वाली टिप्पणी को ही रख लीजिए। नरीमन ने एक कार्यक्रम में पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा या चंद्रचूड़ के राम मंदिर फैसले पर प्रार्थना करने के संदर्भ में कहा कि अगर कोई जज फैसला ‘डिवाइन इंटरवेंशन’ (दैवीय हस्तक्षेप) से देता है, तो वह अपनी शपथ का उल्लंघन करता है। उन्होंने मजाक में कहा, ‘चाहे डिवाइन हो या बोवाइन (गाय जैसा) इंटरवेंशन।’

लोगों ने इसे हिंदू धर्म का मजाक उड़ाना माना, क्योंकि ‘बोवाइन’ गाय से जुड़ा है, जो हिंदुओं के लिए पवित्र है। इस टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी और कई ने इसे एंटी-हिंदू बताया। नरीमन की बात का मकसद शायद न्यायपालिका की निष्पक्षता पर जोर देना था, लेकिन शब्दों का चुनाव गलत साबित हुआ।

दूसरा मामला 2022 का है, जब सुप्रीम कोर्ट ने नूपुर शर्मा पर टिप्पणी की। उस समय बीजेपी की प्रवक्ता रही नूपुर शर्मा ने एक टीवी डिबेट में पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी की थी। इसके बाद देश में हिंसा भड़क गई, जिसमें उदयपुर में एक हिंदू दर्जी कन्हैयालाल की सरेआम हत्या कर दी गई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में नूपुर की याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्या कांत और जेबी पारदीवाला ने कहा कि नूपुर की ‘लूज टंग’ ने पूरे देश को आग लगा दी। उन्होंने कहा, “वह उदयपुर हत्याकांड के लिए जिम्मेदार हैं” और “उन्हें पूरे देश से माफी माँगनी चाहिए।”

ये टिप्पणियाँ फैसले का हिस्सा नहीं थीं, लेकिन इन्होंने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया। बीजेपी समर्थकों ने जजों की आलोचना की, जबकि विपक्ष ने इसे सही ठहराया। नूपुर को पार्टी से सस्पेंड कर दिया गया, और समाज में धार्मिक तनाव बढ़ गया। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी टिप्पणियाँ ट्रायल से पहले किसी को दोषी ठहराने जैसी हैं, जो न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।

तीसरा मामला साल 2008 का है। इसमें दिल्ली हाई कोर्ट में एम.एफ. हुसैन पर मामला चल रहा था। मशहूर पेंटर एम.एफ. हुसैन पर हिंदू देवी-देवताओं की नग्न पेंटिंग्स बनाने के आरोप थे। कई जगहों पर उनके खिलाफ केस दर्ज हुए। दिल्ली हाई कोर्ट ने इन केसों को खारिज करते हुए कहा कि शिकायतकर्ताओं की सोच “प्यूरिटनिज्म” (कट्टर नैतिकता) वाली है।

जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा, “हमें उन विचारों की आजादी देनी चाहिए जिनसे हम नफरत करते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब तब तक नहीं अगर अपमान करने की आजादी न हो।” इस टिप्पणी को कई हिंदुओं ने अपनी धार्मिक भावनाओं का अपमान माना। हुसैन को देश छोड़ना पड़ा और हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन किए। हालाँकि कोर्ट का फैसला कला की आजादी के पक्ष में था, लेकिन मौखिक टिप्पणी ने विवाद बढ़ाया।

ये चार मामले (दो 2025 के, एक 2022 का, एक 2008 का) दिखाते हैं कि जजों की टिप्पणियाँ कैसे हिंदू भावनाओं को ठेस पहुँचाती हैं और देश में अशांति फैलाती हैं। लेकिन बात सिर्फ हिंदू-विरोधी टिप्पणियों तक सीमित नहीं। अब देखते हैं गुजरात दंगों से जुड़े चार मामलों को, जहाँ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर कड़ी टिप्पणियाँ कीं। ये टिप्पणियाँ भी मौखिक थीं और फैसलों में शामिल नहीं हुईं, लेकिन इन्होंने राजनीतिक माहौल गरमा दिया।

पहला साल 2004 का सुप्रीम कोर्ट का ‘मॉडर्न-डे नीरोज‘ वाला बयान। 2002 के गुजरात दंगों में बेस्ट बेकरी केस में सभी आरोपित बरी हो गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए गुजरात सरकार को ‘मॉडर्न-डे नीरोज’ कहा। नीरो रोमन सम्राट थे, जो शहर जलते देखते रहे। कोर्ट ने कहा, “जब निर्दोष बच्चे और असहाय महिलाएँ जल रही थीं, तो सरकार ने आँखें फेर लीं।” इस टिप्पणी ने मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। कॉन्ग्रेस और विपक्ष ने इसे मोदी के खिलाफ हथियार बनाया। हालाँकि बाद में 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को क्लीन चिट दी, लेकिन 2004 की टिप्पणी का असर सालों तक रहा।

दूसरा मामला 2003 का है, जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजरात सरकार में कोई विश्वास नहीं है। दंगों की जाँच पर सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार निष्पक्ष जाँच नहीं कर रही। अभियोजन और राज्य के बीच नेक्सस (साँठगाँठ) की बात कही गई। इसने दंगों की जाँच को सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में डाल दिया। विपक्ष ने इसे मोदी की विफलता बताया और देश में बहस छिड़ गई कि क्या राज्य सरकार दंगों में शामिल थी?

तीसरा मामला सितंबर 2003 का है, जहाँ एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार पर टिप्पणी की थी कि उसमें कोई भरोसा नहीं। यह दंगों के कई केसों की जाँच से जुड़ा था। कोर्ट ने एसआईटी गठित की, क्योंकि राज्य की जाँच पर शक था। इस टिप्पणी ने राजनीतिक पार्टियों को हमले का मौका दिया और मोदी की छवि पर विपरीत असर पड़ा।

चौथा मामला फरवरी 2012 का है, जब गुजरात हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार की अपर्याप्त प्रतिक्रिया और निष्क्रियता के कारण दंगे दिनों तक चले। यह ‘अराजक स्थिति’ वाली टिप्पणी थी। हाई कोर्ट ने सरकार की आलोचना की कि उसने दंगों को रोकने में ढिलाई बरती। यह टिप्पणी भी फैसले का हिस्सा नहीं थी, लेकिन मीडिया में सुर्खियाँ बनी और विपक्ष ने मोदी को घेरा।

ऐसा ही एक मामला किसान आंदोलन के समय का है, जब सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में कहा कि सरकार ने कानून बनाते समय सही तरीके से राय तक नहीं ली। जबकि सरकार इस मामले में अपना पक्ष विस्तार से रख चुकी थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का देश में गलत मतलब से इस्तेमाल किया गया।

ये मामले दिखाते हैं कि मौखिक टिप्पणियाँ कैसे समाज को बाँटती हैं। कानूनी रूप से इनका कोई महत्व नहीं होता, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में कहा है कि हाई कोर्ट मौखिक निर्देश नहीं दे सकते, सिर्फ लिखित आदेश बाध्यकारी होते हैं। एक केस में कोर्ट ने कहा, “जजों को अपने फैसलों से बोलना चाहिए, मौखिक बातें रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं।” लेकिन व्यावहारिक रूप से ये टिप्पणियाँ मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए फैलती हैं और जनता की राय बनाती हैं।

जैसे गुजरात मामलों में मोदी को सालों तक ‘दंगाई’ कहा गया, जबकि बाद में क्लीन चिट मिली। इसी तरह नूपुर शर्मा को ट्रायल से पहले दोषी ठहराया गया।

अब बात करते हैं सोशल मीडिया की भूमिका की। आज के दौर में सोशल मीडिया ने सबकी जवाबदेही तय कर दी है। चाहे सीजेआई हो या कोई नेता, अगर कोई गलत बोलता है, तो जनता तुरंत प्रतिक्रिया देती है। गवई की टिप्पणी का मामला देखिए। जैसे ही यह बात बाहर आई, एक्स (पूर्व ट्विटर) पर #ImpeachTheCJI और #GavaiMustResign जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।

हजारों यूजर्स ने गुस्सा जाहिर किया। एक यूजर ने लिखा, “यह हिंदू आस्था का अपमान है, क्या मुस्लिम पिटीशनर से ऐसा कहते?” दूसरा बोला, “मोदी सरकार क्यों चुप है? सॉलिसिटर जनरल ने तो बचाव किया!” कई ने इसे ‘टू-टियर ज्यूडिशियरी’ कहा, मतलब हिंदुओं के लिए अलग न्याय।

सोशल मीडिया ने गुस्से को पनपाया। लोग वीडियो शेयर करने लगे मीम्स बने, और बहस छिड़ गई। पूर्व आईपीएस अधिकारी भास्कर राव ने जूता फेंकने वाले वकील की हिम्मत की तारीफ की, हालाँकि गलत बताया। काटजू का ट्वीट वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने जजों को कम बोलने की सलाह दी।

सोशल मीडिया की वजह से सीजेआई जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को भी सोच-समझकर बोलना पड़ता है। पहले ऐसी टिप्पणियां कोर्ट रूम तक सीमित रहती थीं, लेकिन अब लाइव स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया से तुरंत फैल जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने खुद सोशल मीडिया को ‘बेलगाम’ कहा है।

जस्टिस पारदीवाला ने एक कार्यक्रम में कहा कि सोशल मीडिया पर जजों पर व्यक्तिगत हमले खतरनाक हैं, इससे जज कानून की बजाय मीडिया की सोचते हैं। लेकिन सवाल यह है कि अगर जज अनावश्यक टिप्पणियाँ करेंगे, तो जनता चुप क्यों रहे? गवई मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सोशल मीडिया अतिरंजित प्रतिक्रिया दे रहा है, लेकिन क्या यह सही है?

हिंदू समाज ने महसूस किया कि उनकी आस्था का मजाक उड़ाया गया। सोशल मीडिया ने इसे आवाज दी और अब सरकार से इम्पीचमेंट की माँग हो रही है।

कुल मिलाकर जजों की मौखिक टिप्पणियाँ न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं। ये समाज में अव्यवस्था पैदा करती हैं, क्योंकि ये राजनीतिक और धार्मिक भावनाओं को भड़काती हैं। कानून कहता है कि सिर्फ लिखित फैसले मायने रखते हैं, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में मौखिक बातें भी महत्वपूर्ण हो गई हैं। जरूरत है कि जज संयम बरतें, जैसा काटजू साहब कहते हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ऐसी घटनाएँ बढ़ेंगी और न्यायपालिका पर जनता का भरोसा कम होगा। क्या समय आ गया है कि कोर्ट रूम में बोलने के लिए गाइडलाइंस बनें? यह विचार करने का समय है।

मैथिली ठाकुर, पवन सिंह, रितेश पांडेय, खेसारी लाल यादव… सब बनेंगे ‘माननीय’ तो क्या कार्यकर्ता घास छीलेंगे?

पवन सिंह, रितेश पांडे, अक्षरा सिंह, मैथिली ठाकुर, खेसारी लाल यादव, छैला बिहारी, भरत शर्मा व्यास, रचना झा…ऐसा लगता है कि बिहार के इस विधानसभा चुनाव में बिहार से जुड़े सभी कलाकारों में खुद को माननीय बनाने की होड़ लगी हुई है। इसे लेकर जनता के बीच भी भारी विरोध देखा जा रहा है।

खासकर जब से मैथिली ठाकुर ने चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। 25 साल की लोक गायिका मैथिली ठाकुर ने खुद बेनीपट्टी से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। बिहार बीजेपी के बड़े नेताओं से उनकी मुलाकात, पार्टी में शामिल होने की संभावनाओं ने चुनावी माहौल को गर्म कर दिया है।

विरोध करने वालों का पहला और सबसे बड़ा तर्क यह है कि मैथिली ठाकुर अब बिहार की जमीन से कट चुकी हैं। उनका परिवार लंबे समय से दिल्ली में रहता है, वहीं से उन्होंने अपनी शिक्षा और करियर दोनों बनाए हैं। उनका मधुबनी या दरभंगा से सीधा जुड़ाव अब सिर्फ सरकारी या सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित रह गया है।

कई लोगों का तर्क है कि लोकप्रियता को संस्कृति के लिए योगदान से ऊपर नहीं रखा जा सकता है। उनकी पहचान मैथिली गायिका के रूप में जरूर है, पर उन्होंने स्थानीय स्तर पर कलाकारों के लिए कोई संस्थागत काम नहीं किया है। लोगों का कहना है कि अगर अगर बात मैथिली संस्कृति को सम्मान देने की है, तो ऐसे कलाकारों को मौका देना चाहिए जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी मैथिली के लिए समर्पित की है।

मैथिली क्षेत्र में ऐसे कई कलाकार हैं जिन्होंने अपना जीवन मैथिली संस्कृति को बचाने में लगा दिया। पूनम मिश्रा, माधव राय, विजय विकास, रचना झा जैसे लोग गाँव-गाँव घूमकर कार्यक्रम करते हैं। इन कलाकारों की पहचान भले ही राष्ट्रीय स्तर पर न हो लेकिन वे आज भी अपने लोगों के बीच रहते हैं, उन्हीं के दुख-दर्द में शामिल होते हैं।

मैथिली ठाकुर के नाम के साथ जो विरोध जुड़ा है, उसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि लोग इसे लोकप्रियता की राजनीति मान रहे हैं। कई लोगों को लगता है कि राजनीतिक दल उनके नाम को सिर्फ वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।

मैथिली ठाकुर कोई अकेला नाम नहीं है। भोजपुरी स्टार रितेश पांडेय को करगहर से अपना उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा भोजपुरी सिनेमा के चमकते सितारे पवन सिंह, अक्षरा सिंह, रचना झा और खेसारी लाल यादव के भी इस सियासी जंग में उतरने की पूरी संभावनाएँ नजर आ रही हैं।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इन कलाकारों ने अपने क्षेत्र की भाषा और कला को पहचान दिलाई है। भोजपुरी सिनेमा में पवन सिंह, खेसारी लाल यादव जैसे कलाकारों का योगदान भी कम नहीं रहा उनकी लोकप्रियता अपार है, उनका फैनबेस जबरदस्त है। पर चुनाव जीतने के लिए फैनबेस से ज्यादा जमीनी कार्यकर्ताओं की जरूरत होती है।

पवन सिंह पहले बीजेपी से आसनसोल से उम्मीदवार बने लेकिन वहाँ से उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। इसके बाद वह बिहार के काराकाट से चुनाव लड़े, पवन सिंह खूब फेमस होने के बाद भी काराकाट से चुनाव नहीं जीत सके बल्कि उन्होंने NDA के उम्मीदवार को हराने का काम ही किया। यानी जिस राजनीतिक विचार से आज वह जुड़ना चाहते हैं उसके प्रति उनकी निष्ठा कितनी रही है या है यह भी एक सवाल है।

याद कीजिए जब मनोज तिवारी ने राजनीति में कदम रखा था, ‘ससुरा बड़ा पइसावाला’ के हिट होने के बाद वह भोजपुरी सिनेमा के बड़े सुपरस्टार बन गए थे। उनकी कैसेट ब्लैक में बिकने लगी थी। इस बीच जब 2009 में मनोज तिवारी सपा के टिकट पर गोरखपुर से चुनाव लड़े तो उनकी हार हुई

भोजपुरी सिनेमा के ही एक और बड़े सुपर स्टार हैं रवि किशन, उनकी गिनती उन अभिनेताओं में होती है जिन्होंने भोजपुरी सिनेमा को फिर से खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई है। अपनी लोकप्रियता के वाबजूद जव वह चुनावी मैदान में उतरे तो हालता खस्ता हो गई। 2014 में उन्होंने जौनपुर से कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें केवल 4.25% वोट ही मिल सके। रवि किशन फिलहाल गोरखपुर से बीजेपी के सांसद है।

ऐसे स्टार्स से लिस्ट लंबी है जो राजनीति में आए लेकिन फ्लॉप हो गए। कुछ ऐसे भी हैं जो आए चुनाव जीते और फिर क्षेत्र से गायब हो गए। हर दल में ऐसे स्टार्स आपको दिख जाएँगे। अमिताभ बच्चन से लेकर जया प्रदा और धर्मेंद्र तक राजनीति में कदम रखने वाले स्टार्स की लंबी फेहरिस्त है।

राजनीति हमेशा से जनसेवा का मंच कही जाती रही है और मंच के सितारों का राजनीति में आना कोई नई घटना भी नहीं है। इसके साथ-साथ एक सवाल जो उठता है वो ये कि क्या ऐसे समय में जो कार्यकर्ता वर्षों से दशकों से पार्टी का झंडा ढो रहा है, दरी-चादर बिछा रहा है, जो हर चुनाव में पोस्टर चिपकाता, भीड़ जुटाता और गलियों में नारे लगाता है, क्या उसका कोई हक नहीं बचा है?

राजनीति में विचार और वैचारिक प्रतिबद्धता हमेशा से एक ताकत रही है। जब कलाकारों और सेलेब्रिटीज को सिर्फ उनकी लोकप्रियता के दम पर टिकट दिए जाते हैं, तो वो विचारधारा के प्रति समर्पित नहीं होते हैं। कई बार वे खुद नहीं जानते कि जिस दल से लड़ रहे हैं, उसकी विचारधारा क्या है, उसकी नीतियाँ क्या हैं या उस क्षेत्र की वास्तविक समस्याएँ क्या हैं।

अब जब ये स्टार्स चुनाव में उतरते हैं तो इन चेहरों के आने का सीधा असर पड़ता है जमीनी कार्यकर्ता पर, खासतौर पर यूपी या बिहार जैसे राज्यों में। जिन्हें राजनीतिक तौर पर ज्यादा एक्टिव माना जाता है। ऐसी जगहों पर जब कार्यकर्ता अपने खून-पसीने से पार्टी की पहचान बनाते हैं, वहाँ जब कोई स्टार अचानक टिकट लेकर आ जाता है, तो कार्यकर्ता का मन टूट जाता है।

उसे लगता है कि उसका संघर्ष, उसकी मेहनत सब बेकार गई। वह जो बरसों तक अपने इलाके में पार्टी का चेहरा रहा, जनता के सुख-दुख में साथ रहा, अब उसे कोई पूछने वाला नहीं। राजनीति की ताकत हमेशा कार्यकर्ता से आती है, सितारों से नहीं। पार्टी का ढांचा उसी नींव पर टिका होता है जो गाँव-गाँव जाकर जनसंपर्क करते हैं, पोस्टर लगाते हैं, बूथ संभालते हैं। अगर उस नींव को ही कमजोर कर दिया गया, तो उसके ऊपर बना महल भर-भराकर गिर ही जाएगा।

राजनेताओं और राजनीतिक दलों को यह सच्चाई भी समझनी चाहिए, भले ही ऐसे उम्मीदवारों की संख्या 1-2 हो लेकिन यही लोकप्रियता इनके लिए इस मामले में मुसीबत बन जाती है। यह चर्चा लोगों तक पहुँचने लगती है कि पार्टी में हवा-हवाई उम्मीदवारों को टिकट दिया जा रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों को कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को समझ, जमीनी लोगों को आगे बढ़ाने की जरूरत हैं।

राजनीति का उद्देश्य हमेशा सेवा और जनहित रहा है, न कि लोकप्रियता और चमक। लेकिन जब कलाकारों और गायकों को सिर्फ इसलिए उतारा जाता है क्योंकि उनके लाखों फॉलोअर्स हैं या वे वोटों को influence कर सकते हैं, तो राजनीति विचार और मूल्यों से खाली हो जाती है।

धीरे-धीरे जनता को यह महसूस होने लगा है कि राजनीति अब जनता की आवाज नहीं बल्कि चुनावी ब्रांडिंग की मशीन बन चुकी है। जो लोग राजनीति के लिए पूरी तरह समर्पित होकर इस क्षेत्र में काम करना भी चाहते होंगे उन्हें भी लगने लगेगा कि स्टार बन जाया तो राजनेता बनने का रास्ता साफ हो जाएगा।

इन्हीं, कारणों के चलते राजनीति से वही सुचिता कम हो रही है और लोगों के प्रति जवाबदेही में भी कमी आ रही है। राजनीति की सुचिता को बचाने के लिए जरूरी है कि पूर्ण कालिक लोग राजनीति में आएँ जो इसे साइड बिजनेस ना मानकर पूर्ण कालिक काम मानें।

चारों तरफ से पिट रही पाकिस्तान की फौज, TTP से BLA तक सब माँग रहे आजादी: POK भी भारत में मिलने को बेकरार, क्या जल्द बदल जाएगा PAK का भूगोल?

पाकिस्तान जहाँ अमेरिका की आड़ में अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत दिखने की कोशिश कर रहा है, वहीं मुल्क में अंतर्कलह चरम पर है। एकतरफ तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) रोज पाकिस्तानी फौजियों को मार रही है तो दूसरी तरफ POK में जनता सरकार के खिलाफ सड़कों पर है। उधर बलूचिस्तान तो कब से पाकिस्तान के झूठे ‘एकता’ के दावे का मजाक उड़ाता आ रहा है, जहाँ लोग खुलेआम कहते हैं कि उन्हें इस फौजी हुकूमत से आजादी चाहिए।

TTP का पाकिस्तानी सरकार को उखाड़ फेंकने का मकसद

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) ने विस्फोटक हमला किया। हमलावरों ने पहले सड़क किनारे बम (IED) विस्फोट किया और फिर गोलीबारी शुरू कर दी, जिसमें 11 पाकिस्तानी सुरक्षाबलों की मौत हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि TTP का ये हमला खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तानी एयरफोर्स द्वारा गिराए गए बम की प्रतिक्रिया है। इस हमले में 30 आम लोगों की मौत हुई थी, जिसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे।

TTP लगातार पाकिस्तान की फौज को निशाना बनाकर हमले कर रहा है। इस संगठन का मकसद मौजूदा सरकार को उखाड़ फेंककर कट्टर इस्लामी शासन लागू करना है।पाकिस्तान सुरक्षा एजेंसियों के लिए TTP अब एक बड़ा खतरा बन चुका है। संगठन अफगानिस्तान की सीमा के बनाए ठिकानों से हमले करता है। हालाँकि, काबुल ने इसे खारिज करते हुए कहा है कि अफगान अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी दूसरे देश के खिलाफ नहीं होने देता है।

बावजूद पाकिस्तान लगातार आतंकी हमले के पीछे अफगानिस्तान की करास्तानी और TTP को संरक्षण देने के आरोप रहा है। यह आरोप अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद से चल रही तनातनी से जन्मा हैं। दरअसल, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच 2,600 किलोमीटर तक सीमा फैली हुई है।

इस सीमा विवाद का मुख्य कारण डूरंड रेखा है, जिसे पाकिस्तान एक अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है जबकि तालिबान इसे एक थोपी हुई और अवैध रेखा मानता है। पाकिस्तान लगातार सीमा पर बाड़ लगाने की कोशिश करता है लेकिन तालिबान लड़ाके इका कड़ा विरोध करते हैं, जिससे तनाव पैदा होता है।

बलोच आर्मी ने जाफर एक्सप्रेस को लगातार बनाया निशाना

हाल ही के कुछ महीनों में जाफर एक्सप्रेस को कई बार निशाना बनाया गया। दो दिन पहले ही मंगलवार (07 अक्टूबर 2025) को बलूचिस्तान में जाफर एक्सप्रेस पर बलोच लिबरेशन आर्मी ( BLA) ने हमला किया। सिंध-बलूचिस्तान सीमा पर हुए इस हमले में पटरियों पर विस्फोटक (IED) लगाया गया था, जिसमें कई लोग घायल हुए।

इससे पहले सितंबर 2025 में जाफर एक्सप्रेस का एक कोच उड़ा दिया गया, जिसमें 12 यात्री घायल हुए थे। अगस्त 2025 में भी मस्तुंग जिले में विस्फोटक के चलते ट्रेन के छह डिब्बे पटरी से उतर गए थे, जिसमें 4 लोग घायल हुए थे। उसी महीने कोलपुर के पास निकासी के लिए भेजे गए पायलट इंजन पर गोलीबारी हुई। अलगाववादी BLA ने हमले की जिम्मेदारी ली।

जून 2025 में भी सिंध प्रांत के जकोबाबाद में बम से ट्रेन के 6 कोच पटरी से उतर गए मार्च 2025 में भी BLA ने 400 यात्रियों से भरी ट्रेन को हाइजैक किया। इसमें पाकिस्तानी फौजियों ने 16 बलोच आर्मी के सदस्यों को मार गिराया था।

बलूचिस्तान वो इलाका है जो पाकिस्तान को ईरान और अफगानिस्तान से जोड़ता है। बलूचिस्तान को अलग देश बनाने की माँग होती है। ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा हिस्सा है। जहाँ पाकिस्तानी सरकार लगातार अमानवीय व्यवहार कर रही है। पाकिस्तानी फौज की दमनकारी नीति, आर्थिक और सामाजिक शोषण की वजह से बलूचिस्तानी की आजादी की माँग को लेकर बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) का गठन किया गया। 

1948 में पाकिस्तान ने इस प्रांत को अपने में मिला लिया था। तभी से बलोच आजादी की माँग करते आ रहे हैं। बलोच लोगों का कहना है कि पाकिस्तानी सरकार ने अब तक सिर्फ इस प्रांत को लूटा है और लोगों की उपेक्षा की है। मिनरल्स से भरपूर इस प्रांत में कोयला, सोना, तांबा, गैस की बहुतायत है। फिर भी पाकिस्तान जैसे भिखारी देश का ये सबसे गरीब इलाका है।

POK में प्रदर्शन पर पाकिस्तानी सरकार का ‘दमनकारी रवैया’

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) भी इन दिनों बड़े उथल-पुथल से गुजर रहा है। यहाँ सितंबर 2025 के अंत से आम नागरिक पाकिस्तानी सरकार की ‘दमनकारी नीतियों’ के खिलाफ ‘शटर डाउन’ और ‘होल्डिंग हड़ताल’ के तहत सड़क पर उतर आए हैं, जिससे क्षेत्र में इस्लामाबाद की पकड़ हिल गई है।

यहाँ प्रदर्शनकारियों की माँग सिर्फ सुविधाएँ नहीं थीं बल्कि राजनीतिक आत्म-सम्मान और न्याय की भी थी। मगर पाकिस्तानी सरकार का जवाब था बल प्रयोग। हालात इतने बिगड़े कि पुलिस और सुरक्षाबल प्रदर्शनकारियों के साथ झड़प पर उतर आए, जिसका नतीजा 12 आम नागरिकों की मौत से चुकाना पड़ा। पूरे इलाके में शट डाउट लगा दिया गया।

व्यापारियों, नागरिक समाज समूहों और कार्यकर्ताओं के गठबंधन के नेतृत्व में हुए इस विरोध प्रदर्शनों ने क्षेत्रीय राजधानी मुजफ्फराबाद, रावलकोट, कोटली, ददयाल और नीलम घाटी जैसे प्रमुख शहरों को ठप कर दिया। 4 अक्टूबर 2025 तक, पाकिस्तान सरकार ने प्रदर्शनकारियों के नेताओं के साथ प्रदर्शनों को समाप्त करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए लेकिन तनाव अभी भी बना हुआ है। अक्टूबर 2025 की शुरुआत तक आधी रात को विरोध प्रदर्शन और कर्फ्यू की खबरें जारी रहीं।

ये विरोध-प्रदर्शन पिछले चार दशक में POK में हुए सबसे बड़े विद्रोहों में से एक है। ‘कश्मीर हमारा, इसका फैसला हम करेंगे’ और ‘हुक्मरान सुन लो, हम तुम्हारे विनाश हैं’ जैसे नारों ने सीधे तौर पर इस्लामाबाद की नीतियों को निशाना बनाया है।

POK में गाँव-गाँव में महिलाएँ और बच्चे आवाज उठा रहे हैं। यहाँ प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तानी फौज की गाड़ियों को आग लगा दी और फौजियों को कुछ समय के लिए बंधक बना लिया। यह दिखाता है कि POK में पाकिस्तानी फौज की पकड़ ढीली हो चुकी है।

पाकिस्तान में गृहयुद्ध का माहौल

पाकिस्तान में TTP की हिंसा, बलोच की आजादी की माँग और POK में प्रदर्शन को साथ रखकर देखा जाए तो मुल्क भीतर से सड़ चुका है। पाकिस्तान के पास ना स्थिर सरकार, ना एकजुट फौज और ना ही जनता का भरोसा है। ये पाकिस्तानी सरकार की ‘दमनकारी नीतियों’ का ही नतीजा है। इससे साफ कहा जा सकता है कि पाकिस्तान में गृहयुद्ध के माहौल हैं।

बावजूद पाकिस्तान विदेशों में जाकर हवाबाजी से बाज नहीं आ रहा है। कभी डोनाल्ड ट्रंप से दोस्ती बढ़ाकर दुनिया में दिखावा कर रहा है। तो कभी संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारत पर झूठी रिपोर्टें पेश कर रहा है। लेकिन असलियत अब सबके सामने है। अंदर से पाकिस्तान की हवा निकल चुकी है।

पाकिस्तान की हालत उस सर्कस के जोकर जैसी हो गई है, जो दूसरों को हँसाने के चक्कर में खुद पर ही गिर जाता है। आज पाकिस्तान खुद अपनी ही चालों में फँस चुका है। दुनिया अब समझने लगी है कि यह देश सिर्फ दिखावे की दोस्ती और धमकी की राजनीति जानता है। पाकिस्तान को अब बाहरी दुश्मन की जरूरत नहीं है, उसका असली दुशमन अब वो खुद है।

‘अचानक बेड से उठा, मेरी ब्रेस्ट छूने लगा’: इंदिरा जयसिंह के सहयोगी पर ट्रांसजेंडर महिला वकील ने लगाए यौन शोषण के आरोप, जानें कौन है ‘समलैंगिक’ रोहिन भट्ट

आतंकियों और देशद्रोहियों के मानवाधिकारों की बात करने वाली सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह अपने सहयोगी वकील रोहिन भट्ट पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप पर खामोश हैं। ये आरोप एक ट्रांसजेंडर महिला वकील राघवी ने लगाए हैं।

रोहिन भट्ट पर यौन उत्पीड़न का आरोप

सोशल मीडिया पर राघवी ने एक के बाद एक कई पोस्ट डाले हैं। इसमें कहा गया है कि समलैंगिक मामलों के अधिकारों की माँग करने वाले एक्टिविस्ट रोहिन भट्ट ने राघवी का यौन शोषण किया।

राघवी ने लिखा है कि दो साल पहले उनके साथ शर्मनाक हरकत की गई थी। उस वक्त वह कानून की पढ़ाई कर रही थी और हार्मोन थरेपी ले रही थी। दिल्ली में रोहिन भट्ट का कोई स्थायी घर नहीं था। इसलिए भट्ट दोस्तों के घर लाजपत नगर में रह रहा था। दरअसल ये दोस्त राघवी के भी दोस्त थे। उन्होंने राघवी को मिलने के लिए बुलाया था। वह जब मिलने पहुँची, तो उसने अपने दोस्तों से हार्मोन थरेपी से होने वाले शारीरिक बदलाव के बारे में बतलाया। उसने बताया कि उसके ब्रेस्ट अब बड़े होने लगे हैं। बेड पर लेटा भट्ट अचानक उठ गया और उसके ब्रेस्ट को छूने लगे। उसने पूरे शरीर को गलत तरीके से छूआ।

राघवी के मुताबिक, “वह काफी सकते में आ गई। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसके साथ क्या हुआ। मेरे दोनों दोस्त भी काफी शॉक्ड थे। उन दोनों ने कुछ देर चुप रहने के बाद मुझे नॉर्मल किया और भट्ट से कहा कि आज के बाद कभी ऐसी हरकत किसी महिला के साथ नहीं करना। भट्ट खुद को सही साबित करने के लिए कहता रहा कि वह मजाक कर रहा है।”

राघवी के मुताबिक, उस वक्त समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। इस तरह की हरकत के लिए कानून में क्या सजा है, ये समझ नहीं आ रहा था। उसने दोस्तों से बात की, लेकिन इसका कोई हल नहीं निकला।

इसी तरह समय बीता। लेकिन पीड़िता के अंदर दहशत बैठ गया। कुछ दूसरे दोस्तों से बात हुई, जो भट्ट के भी दोस्त थे। दोस्तों ने भट्ट को लोगों को न छूने की सलाह दी। भट्ट ने इसे नजरअंदाज किया। पीड़िता के मुताबिक, “उसके पास माफी माँगने का मौका था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। मैंने उसे हर जगह नजरअंदाज करने की कोशिश की। वर्क प्लेस से लेकर दोस्तों के बीच भी। काफी वक्त तक मैं खुद से लड़ती रही। एक दिन मैंने उसका इंटरव्यू देखा। मुझे उसका अमानवीय चेहरा याद आ गया। वह उस वक्त रेप और उत्पीड़न पर बात कर रहा था।”

हाल ही में जब राघवी का रोहिन भट्ट से आमना-सामना हुआ, तो पुराने घाव याद आ गए। राघवी के मुताबिक, “उसने सोचा कि अब वह आवाज बुलंद करेगी। कुछ दिन इसमें बीत गया कि कैसे एक पुरुष ‘क्लास प्रिविलेज’ मिलने के बाद दूसरों को कुछ नहीं समझता है। उसे ट्रांसजेंडर और महिलाओं के अधिकारों का कोई ख्याल नहीं रहता है।”

राघवी का कहना है कि भट्ट ने एक महिला के इमोशन की परवाह नहीं की। न ही कभी माफी माँगी।

कौन है रोहिन भट्ट

रोहिन भट्ट समलैंगिकों के अधिकारों को सुप्रीम कोर्ट में लड़ने वाला वकील और एक्टविस्ट है। वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह और आनंद ग्रोवर का सहयोगी रहा रोहिन भट्ट की पहचान LGBTQIA+ समुदाय के लोगों के रिश्ते और शादी को कानूनी मान्यता देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ने से बनी। रोहिन भट्ट जुलाई 2022 से वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह और आनंद ग्रोवर के चैंबर में काम करता है। वह कानूनी और रिसर्च सहायता देता है।

उसने दो मामले, समीर समुद्र द्वारा दायर याचिका और नितिन करणी द्वारा दायर याचिका का मसौदा तैयार किया था। वह सेम सेक्स मैरिज केस में वादियों का पक्ष सुप्रीम कोर्ट में रखता रहा है। बोस्टन के हार्वर्ड लॉ स्कूल में बायोएथिक्स में मास्टर्स करने वाले भट्ट को इंदिरा जयसिंह ने भारत में पहली नौकरी दी।

रोहिन खुद भी समलैंगिक है। रोहिन का जन्म गुजरात के भावनगर में हुआ। उसके पिता एक सिविल सेवक थे और माँ एक कॉलेज लेक्चरर थीं। रोहिन ने अपनी स्कूली शिक्षा सेंट जेवियर्स गांधीनगर और उदगाम स्कूल अहमदाबाद से पूरी की।

उसका कहना है कि स्कूल में उसे धमकाया गया था। उसके समलैंगिक दोस्त थे, जो उसे डेटिंग ऐप्स के माध्यम से मिले थे। हालाँकि वह समलैंगिकों के आयोजनों से दूर रहता था। 2021 में हार्वर्ड में प्रवेश मिलने के बाद वह दहशत से बाहर आ पाया।

समलैंगिकों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले समलैंगिक रोहिन भट्ट पर एक समलैंगिक महिला ने ही यौन उत्पीड़न का आरोप लगा कर बताया है कि कैसे ‘उच्चवर्ग वाले’ वकील महिलाओं और ट्रांसजेंडर को अपने पैर की जूती समझते हैं।

तालिबान को मान्यता से लेकर चाबहार पोर्ट तक: भारत-अफगानिस्तान के रिश्तों के लिए कितना अहम है विदेश मंत्री मुत्ताकी का 7 दिवसीय दौरा?

अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी आज दिल्ली पहुँचे हैं। अमीर खान मुत्ताकी विदेश मंत्री एस जयशंकर और अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात करेंगे। यह 7 दिवसीय दौरा भारत और तालिबान-प्रशासित अफगान सरकार के बीच रिश्ते सुधारने की एक बड़ी पहल मानी जा रही है। मुत्ताकी तालिबान के पहले वरिष्ठ अधिकारी हैं जो भारत आए हैं। हालाँकि, भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन 2021 से ही मानवीय सहायता और व्यापार के जरिए व्यावहारिक संबंध बनाए हुए है।

मुत्ताकी पर संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रतिबंध लागू हैं, इसलिए उन्हें इस दौरे के लिए UN सुरक्षा परिषद (UNSC) से विशेष यात्रा छूट मिली है। इस यात्रा से पहले दोनों देशों के बीच कई बैठकें हो चुकी हैं। जनवरी 2025 में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने मुत्ताकी से दुबई में मुलाकात की थी। इसके बाद मई 2025 में विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने भी मुत्ताकी से बात की थी। पहलगाम आतंकी हमले के बाद हुई इस बातचीत में काबुल ने हमले की कड़ी निंदा की थी। तालिबान सरकार भारत को ‘महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और आर्थिक साझेदार’ बता चुकी है।

दौरा: देवबंद, ताज महल और व्यापार पर फोकस

अमीर खान मुत्ताकी तालिबान के पहले ऐसे वरिष्ठ अधिकारी हैं जो भारत की यात्रा कर रहे हैं। अपनी इस यात्रा के दौरान वह राजनीतिक मुलाकातों के अलावा कई महत्वपूर्ण जगहों का दौरा करेंगे। शनिवार (11 अक्टूबर 2025) को मुत्ताकी देवबंद के प्रसिद्ध दारुल उलूम मदरसे का दौरा करेंगे। यह मदरसा तालिबान के कई नेताओं के लिए सम्मान का केंद्र रहा है। यहाँ कुछ अफगान छात्र भी पढ़ाई कर रहे हैं।

इसके बाद, रविवार (12 अक्टूबर 2025) को वह आगरा जाकर ताजमहल देखेंगे। फिर सोमवार (13 अक्टूबर 2025) को मुत्ताकी नई दिल्ली में एक प्रमुख उद्योग मंडल के कार्यक्रम में शामिल होंगे। वह भारतीय व्यापार और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे। तालिबान सरकार भारत के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करना चाहती है। इसी दिन (13 अक्टूबर) को मुत्ताकी नई दिल्ली में अफगान समुदाय के लोगों से भी मिलेंगे। बुधवार (15 अक्टूबर 2025) को मुत्ताकी भारत का दौरा खत्म कर काबुल लौट जाएँगे।

राजदूत शाहीन ने क्या कहा?

मुत्ताकी की भारत यात्रा से पहले कतर में अफगानिस्तान के राजदूत मुहम्मद सुहैल शाहीन ने इस दौरे को बहुत अहम बताया। उन्होंने कहा कि भारत और अफगानिस्तान के लोगों के बीच ऐतिहासिक और गहरे संबंध हमेशा रहे हैं, चाहे सरकार कोई भी रही हो। यह दौरा आपसी विश्वास को बढ़ाने और पुराने मतभेदों को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।

सुहैल शाहीन ने अंतर्राष्ट्रीय मान्यता न मिलने को राजनीतिक कारण बताया। सुहैल शाहीन ने तर्क दिया, “हमने विदेशी कब्जे से आजादी अपनी जनता के समर्थन से हासिल की है। ठीक वैसे ही, जैसे भारत ने ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता पाई थी।” सुहैल शाहीन ने ज़ोर दिया कि तालिबान का पूरे अफगानिस्तान पर नियंत्रण है और वे उसकी सुरक्षा करने में सक्षम हैं, इसलिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिलनी चाहिए।

व्यापार और कनेक्टिविटी के विकल्प

राजदूत शाहीन ने द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति बनाने का प्रस्ताव दिया। यह समिति शिक्षा, व्यापार और बुनियादी ढाँचे जैसे क्षेत्रों में नियमित बैठकें कर सकती है। जब भारत-अफगानिस्तान व्यापार के लिए पाकिस्तान द्वारा रास्ता न दिए जाने की बात आई, तो उन्होंने दो विकल्प बताए।

पहला, चूंकि पाकिस्तान मध्य एशिया के रास्ते अपने व्यापार के लिए अफगानिस्तान से गुजरता है, इसलिए उसे भारत के साथ व्यापार के लिए भी अफगानिस्तान को रास्ता देना चाहिए। राजदूत शाहीन ने चाबहार पोर्ट को एक अच्छा विकल्प बताया। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि दोनों देशों को व्यापारिक सुविधाएँ बेहतर बनाने और व्यापार बढ़ाने के लिए चाबहार पोर्ट पर मिलकर काम करना चाहिए।

संकट में भारत की सहायता

भारत ने अफगान जनता को मानवीय मदद देने में हमेशा तत्परता दिखाई है। सितंबर 2025 में आए भूकंप के बाद, भारत सबसे पहले राहत सामग्री भेजने वाले देशों में था। उस समय 1,000 परिवारों के लिए टेंट और 15 टन खाद्य सामग्री भेजी गई थी। इसके अलावा, दवाइयाँ, हाइजीन किट, कंबल और जनरेटर सहित 21 टन अतिरिक्त राहत सामग्री भी अफगानिस्तान पहुँची।

भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री और अमीर खान मुत्ताकी (फोटो साभार: इंडिया टूडे)

अगस्त 2021 से अब तक भारत 50,000 टन गेहूँ, 330 टन से अधिक दवाइयाँ और टीके, और 40,000 लीटर कीटनाशक जैसी जरूरी राहत सामग्री दे चुका है। इन प्रयासों से भारत ने यह साबित किया है कि वह अफगान जनता के साथ एक मानवीय और विकास साझेदार के रूप में खड़ा है, भले ही उसने तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता न दी हो।

भारत के करीब आने का मौका

मुत्ताकी का यह दौरा तब हो रहा है जब अफगानिस्तान-पाकिस्तान के रिश्ते तनावपूर्ण हैं। पाकिस्तान पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को समर्थन देने के आरोप लग रहे हैं। ऐसे में, मुत्ताकी के पास भारत के करीब आकर क्षेत्रीय मंच पर अपनी स्थिति मजबूत करने का यह सही मौका है। अफगान राजदूत मुहम्मद सुहैल शाहीन ने भी कहा है कि यह दौरा ‘आपसी विश्वास बढ़ाने’ की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे साफ है कि काबुल, नई दिल्ली को एक मजबूत विकल्प के तौर पर देख रहा है।