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तालिबान का मंत्री, अफगानिस्तान की एंबेसी और चुनिंदा पत्रकार: PC में महिलाओं के एंट्री बैन पर भारत सरकार क्यों दे जवाब? क्या कॉन्ग्रेसी भूल गए वियना कन्वेंशन और शाहबानो केस

तालिबान के प्रेस कॉन्ग्रेस पर कॉन्ग्रेस का ये ड्रामा सिर्फ शोर है, कोई ठोस मुद्दा नहीं। जनता को सच्चाई पता होनी चाहिए – ये राजनीति है, और सारा हल्ला विशुद्ध पॉलिटिकल स्टंटबाजी के सिवाय और कुछ नहीं।

भारत दौरे पर आए तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने नई दिल्ली में अफगानिस्तान के दूतावास में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, जिसमें करीब 20 पत्रकारों को बुलाया गया। लेकिन इसमें एक भी महिला पत्रकार नहीं थी।

ये फैसला अफगानी अधिकारियों का था और भारत सरकार का इसमें कोई रोल नहीं था। फिर भी कॉन्ग्रेस पार्टी ने इसे भारत सरकार के खिलाफ मोड़ दिया और महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिश की।

दरअसल, अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी इन दिनों भारत दौरे पर हैं। उनका ये दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत ने अभी तक तालिबान शासन को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है। फिर भी दोनों देशों के बीच बातचीत हो रही है, खासकर पाकिस्तान को काउंटर करने के लिए।

मुत्ताकी ने यहाँ से पाकिस्तान को ललकारा और भारत के साथ दोस्ती बढ़ाने की बात की। लेकिन इसी दौरे के दौरान एक विवाद खड़ा हो गया, जिसे भारत के अंदर सियासी तूफान बनाने की कोशिश हो रही है।

ये घटना शुक्रवार (10 अक्टूबर 2025) को हुई, जब मुत्ताकी ने भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की। बैठक के कुछ घंटों बाद दूतावास में प्रेस मीट हुई। तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि वहाँ सिर्फ पुरुष पत्रकार ही थे। मुत्ताकी से जब महिलाओं की स्थिति पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने सीधा जवाब देने से बचते हुए कहा कि हर देश के अपने रीति-रिवाज होते हैं।

ये बात सही है कि तालिबान अफगानिस्तान में महिलाओं पर कई पाबंदियाँ लगाता है – जैसे शिक्षा, नौकरी और सार्वजनिक जगहों पर। लेकिन ये प्रेस कॉन्फ्रेंस अफगान दूतावास में हुई, जो तकनीकी रूप से अफगानिस्तान की सोवरेन टेरिटरी मानी जाती है। वहाँ अफगान नियम लागू होते हैं और भारत सरकार अंदर की गतिविधियों में दखल नहीं दे सकती। सिर्फ बाहर की सुरक्षा का जिम्मा भारत का है। अगर कोई गलत काम हो, तो ज्यादा से ज्यादा भारत उस दूतावास के लोगों को ‘परसोना नॉन ग्राटा’ घोषित कर देश से बाहर कर सकता है। अंतर्राष्ट्रीय कानून यही कहते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय कानून (वियना कन्वेशन 1961) के मुताबिक एंबेसीज यानी दूतावासों के पास कई अहम अधिकार होते हैं, जैसे-

  • संप्रभुता: स्थानीय पुलिस या अधिकारी बिना अनुमित के दूतावास के अंदर भी नहीं जा सकते।
  • सुरक्षा: इसकी जिम्मेदारी मेजबान देश की होती है। अधिकारियों और उनके परिवार को विशेष सुरक्षा (डिप्लोमेटिक इम्यूनिटी) हासिल होती है, इसके तहत उन पर स्थानीय कानूनों के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती।
  • तलाशी या जब्ती: दूतावास की इमारत, उसमें रखे दस्तावेज या सपंत्ति की तलाशी-जब्ती नहीं की जा सकती।
  • संबंध खराब होने पर भी सुरक्षा: दूतावास के अंदर की संपत्ति और दस्तावेजों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी मेजबान देश की होती है।

अंतर्राष्ट्रीय नियमों को नजरअंदाज कर कॉन्ग्रेस ने की सियासी लाभ लेने की कोशिश

ये बात जानना अहम है कि वियना कन्वेशन 1961 एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जो डिप्लोमेटिक मिशनों और कर्मचारियों के अधिकार और कर्तव्यों को तय करता है। फिर भी कॉन्ग्रेस ने इस पर हंगामा मचा दिया। प्रियंका गाँधी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, कृपया साफ करें कि तालिबान प्रतिनिधि की प्रेस कॉन्फ्रेंस से महिला पत्रकारों को क्यों हटाया गया। अगर महिलाओं के अधिकारों पर आपकी बातें सिर्फ चुनावी दिखावा नहीं हैं, तो देश की काबिल महिलाओं का अपमान हमारे देश में कैसे होने दिया?”

राहुल गाँधी ने इसे शेयर करते हुए लिखा, “मोदी जी, जब आप महिला पत्रकारों को बाहर करने की अनुमति देते हैं, तो आप भारत की हर महिला को बता रहे हैं कि आप उनके लिए खड़े होने में कमजोर हैं। महिलाओं को हर क्षेत्र में समान अधिकार है, और आपकी चुप्पी ‘नारी शक्ति’ के नारों के खोखलेपन को दिखाती है।”

इन दोनों भाई-बहन ने इसे सीधे मोदी सरकार से जोड़ दिया, जैसे कि ये भारत की मिट्टी पर हुआ कोई अपमान हो। पूर्व मंत्री पी चिदंबरम ने तो यहाँ तक कह दिया कि पुरुष पत्रकारों को बहिष्कार करना चाहिए था। उन्होंने लिखा, “मैं हैरान हूँ कि अफगानिस्तान के अमीर खान मुत्ताकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस से महिलाओं को बाहर किया गया। पुरुष पत्रकारों को बाहर निकल जाना चाहिए था।”

हालाँकि सच्चाई ये है कि सरकार के सूत्रों ने साफ कहा है कि “विदेश मंत्रालय का इस प्रेस वार्ता में कोई रोल नहीं था।” भारतीय पक्ष ने तो महिला पत्रकारों को शामिल करने का सुझाव भी दिया था, लेकिन तालिबान ने माना नहीं।

कॉन्ग्रेस को याद करना चाहिए शाहबानो केस

अब सवाल ये उठता है कि कॉन्ग्रेस ये हंगामा क्यों मचा रही है? क्या ये वाकई महिलाओं के अधिकारों की चिंता है या सिर्फ राजनीतिक मौका तलाशना?

सबसे पहले तो ये समझना जरूरी है कि कॉन्ग्रेस का इतिहास महिलाओं के अधिकारों पर कैसा रहा है। याद कीजिए शाहबानो केस को। 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो नाम की एक मुस्लिम महिला को तलाक के बाद गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया। ये फैसला मुस्लिम महिलाओं के हक में था। लेकिन राजीव गाँधी के नेतृत्व में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने इस फैसले को पलटने के लिए मुस्लिम वुमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स) एक्ट पास कर दिया।

क्यों? क्योंकि कुछ कट्टर मुस्लिम नेताओं ने शरिया कानून का हवाला देकर विरोध किया। कॉन्ग्रेस ने महिलाओं के अधिकारों को ‘इस्लामिक वैल्यूज’ के आगे झुका दिया। आज वही कॉन्ग्रेस तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर चीख रही है, जहाँ महिलाओं को नहीं बुलाया गया- जो कि शरिया की ही माँग है। ये दोहरापन नहीं तो क्या है?

शरिया वालों के साथ उठना-बैठना, लेकिन तालिबान…

और सिर्फ इतना ही नहीं। कॉन्ग्रेस अक्सर उन तत्वों के साथ गठबंधन करती है जो शरिया की वकालत करते हैं। जैसे कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के साथ केरल में उनका गठजोड़। IUML शरिया को बढ़ावा देने वाले विचार रखती है। कॉन्ग्रेस के नेता दिन भर ऐसे लोगों के साथ उठते-बैठते हैं, हज सब्सिडी देते हैं, लेकिन जब तालिबान जो शरिया लागू करता है अपनी एंबेसी में महिलाओं को नहीं बुलाता, तो इसे पूरे भारत से जोड़ देते हैं। ये दोगलापन साफ दिखता है।

अगर कॉन्ग्रेस को महिलाओं के हक की इतनी फिक्र है, तो क्यों नहीं वे अपने सहयोगियों से पूछते कि शरिया में महिलाओं की क्या स्थिति है? तालिबान तो शरिया का चरम रूप है, लेकिन भारत में भी कई जगहों पर ऐसी सोच फैली है और कॉन्ग्रेस चुप रहती है।

केरल को तालिबानी राज में बदलने की कोशिशों पर कॉन्ग्रेस की चुप्पी

अब असली सवाल ये है कि कॉन्ग्रेस वाले खुद कब तालिबान जैसे नियमों का समर्थन करते हैं? या शरिया कानून के कट्टर समर्थकों के साथ गठजोड़ करते हैं? देखिए, केरल का हाल। वहाँ वामपंथी और कॉन्ग्रेस बारी-बारी सत्ता संभालते हैं। हाल ही में कासरगोड के एक कॉलेज में गाजा पर डिबेट हुई। विषय था- “गाजा से विज्ञान और मजहब तक।” लेकिन नजारा अफगानिस्तान जैसा। वहाँ छात्र और छात्राओं के बीच पर्दा लगा दिया गया। हिजाब पहनी मुस्लिम छात्राओं को पर्दे के पीछे बिठा दिया गया। मंच पर चढ़ा इस्लामी कट्टरपंथी डॉ. अब्दुल्ला बेसिल सीपी। ये वही बेसिल है, जो हिजाब का प्रचार करता है।

एक वीडियो में एक छात्रा ने हिजाब के खिलाफ तर्क दिया कि लड़कियाँ अच्छे कपड़े और मेकअप से आत्मविश्वास पाती हैं, न कि किसी को रिझाने के लिए। लेकिन बेसिल ने बेतुके तर्क देकर उसे चुप करा दिया – कहा कि सादगी ही असली आत्मविश्वास है। Umasking Anomalies जैसे संगठन ने इसकी तारीफ की और इसे प्रोपेगैंडा बनाया।

ये संगठन केरल के युवाओं को हिजाब और इस्लामी कट्टरता सिखाने में लगा है। कॉलेज में ऐसे कार्यक्रम चल रहे हैं, जहाँ लड़कियों को पर्दे के पीछे छिपा दिया जाता है।

भारत विश्व गुरु बनने का सपना देख रहा है, लेकिन केरल में अफगानिस्तान जैसी प्रथा? और कॉन्ग्रेस चुप। न राहुल बोले, न प्रियंका। क्यों? क्योंकि वहाँ उनके साथी वामपंथी शासन कर रहे हैं, जो कट्टर तत्वों को बढ़ावा देते हैं। लेकिन तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर हल्ला मचाना आसान है, क्योंकि वो मोदी को घेरने का बहाना देता है।

भारत की डिप्लोमेसी को चोट पहुँचा रही कॉन्ग्रेस

ये घटना सिर्फ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की नहीं है, बल्कि ब्रॉडर डिप्लोमेसी और राजनीति की है। भारत-अफगानिस्तान संबंध पाकिस्तान को ध्यान में रखकर बहुत जरूरी हैं। तालिबान ने पाकिस्तान को ललकारा, जो भारत के लिए अच्छा है। भारत ने तालिबान को मान्यता नहीं दी, लेकिन बातचीत जारी है। झंडे का मुद्दा भी उठा – बैठक में किसका झंडा लगेगा? लेकिन ये सब डिप्लोमेटिक प्रोटोकॉल हैं।

कॉन्ग्रेस इसे महिलाओं के अपमान से जोड़कर जनता को बरगलाने की कोशिश कर रही है। अगर वे इतने ही महिलावादी हैं, तो क्यों नहीं अफगान महिलाओं के लिए कुछ करते? भारत ने तो अफगानिस्तान में महिलाओं की मदद के लिए कई प्रोजेक्ट चलाए हैं, जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य। लेकिन कॉन्ग्रेस का फोकस सिर्फ मोदी को बदनाम करने पर है।

अब अपनी तरफ से सोचें तो ये साफ लगता है कि कॉन्ग्रेस का ये स्टैंड पॉलिटिकल ऑपर्च्युनिज्म है। चुनाव नजदीक हैं, तो महिलाओं का मुद्दा उठाकर वोट बटोरना चाहते हैं। लेकिन जनता अब समझदार हो गई है। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं – “राहुल जी, केरल में पर्दा क्यों नहीं दिखता आपको?” या “शाहबानो को क्यों भूल गए?”

कॉन्ग्रेस की कथनी और करनी में फर्क साफ है। एक तरफ वे सेकुलरिज्म का ढोल पीटते हैं, दूसरी तरफ कट्टर तत्वों से हाथ मिलाते हैं। तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं को न बुलाना गलत है, लेकिन इसे भारत सरकार से जोड़ना और भी गलत। ये डिप्लोमेसी को कमजोर करता है। अगर भारत हर एंबेसी में दखल देने लगे, तो क्या होगा? रूस, चीन या अमेरिका की एंबेसी में भी वही नियम लागू होंगे।

गहराई में जाएँ तो ये मुद्दा भारत की विदेश नीति को भी छूता है। तालिबान के साथ डीलिंग जरूरी है, क्योंकि अफगानिस्तान में भारत के हित हैं – जैसे चाबहार पोर्ट, व्यापार और आतंकवाद रोकना। पाकिस्तान तालिबान को इस्तेमाल करता है, लेकिन मुत्ताकी ने पाक को ललकारा, जो भारत के लिए पॉजिटिव है। महिलाओं के अधिकारों पर भारत चुप नहीं है – हमने UN में तालिबान की आलोचना की है। लेकिन डिप्लोमेसी में बैलेंस रखना पड़ता है।

कॉन्ग्रेस इसे समझती है, लेकिन राजनीति के लिए नजरअंदाज कर रही है। केरल जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि भारत में भी इस्लामी कट्टरता फैल रही है और कॉन्ग्रेस चुप है क्योंकि वो उनके सहयोगी हैं। डॉ. बेसिल जैसे लोग युवाओं को प्रभावित कर रहे हैं, हिजाब और पर्दे को बढ़ावा दे रहे हैं। ये अफगानिस्तान जैसा नजारा है, लेकिन घरेलू। कॉन्ग्रेस को पहले अपने backyard साफ करना चाहिए।

कॉन्ग्रेस का दोहरापन समझने की जरूरत

कुल मिलाकर ये विवाद कॉन्ग्रेस की हिप्पोक्रेसी को उजागर करता है। वे महिलाओं के हक की बात करते हैं, लेकिन जब सरकार इस्लामिक वैल्यूज पर महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता देती है जैसे UCC या ट्रिपल तलाक पर, तो विरोध करते हैं। ट्रिपल तलाक बैन पर कॉन्ग्रेस ने कहा था कि ये मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल है। लेकिन अब तालिबान पर चीख रहे हैं। ये दोहरा मापदंड जनता देख रही है।

कॉन्ग्रेस का ये ड्रामा सिर्फ शोर है, कोई ठोस मुद्दा नहीं। जनता को सच्चाई पता होनी चाहिए – ये राजनीति है, इसमें कॉन्ग्रेस की तरफ से महिलाओं की कोई खास चिंता नहीं है। ये विशुद्ध पॉलिटिकल स्टंटबाजी के सिवाय और कुछ नहीं है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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