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‘ऑपरेशन सिंदूर’ में 100+ फौजियों की मौत, 12 एयरक्राफ्ट तबाह और आतंकी ठिकानों पर बमबारी: DGMO राजीव घई बोले- 88 घंटों में युद्धविराम की गुहार लगाने लगा था पाकिस्तान

भारत के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस यानी डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने मंगलवार (14 अक्टूबर 2025) को खुलासा किया कि पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू होने के मात्र 88 घंटों के भीतर ही युद्धविराम की गुहार लगाई थी। पाकिस्तान के 100 से ज्यादा फौजी इस दौरान मारे गए। ये जानकारी उन्होंने मरणोपरांत दिये गए पाकिस्तानी पुरस्कारों की सूची का हवाला देते हुए कही।

डीजीएमओ घई ने कहा, “संभवतः उन्होंने 14 अगस्त को अपने पुरस्कारों की सूची जारी की। उनके द्वारा मरणोपरांत दिए गए पुरस्कारों की संख्या से असली तस्वीर सामने आई, नियंत्रण रेखा पर उनके हताहतों की संख्या 100 से ज़्यादा थी।”

पाकिस्तान ने मई महीने में 12 से ज्यादा एयरक्राफ्ट खो दिए। 7 मई को भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसके बाद पाकिस्तान ने सीमा पार से गोलीबारी शुरू कर दी थी।

संयुक्त राष्ट्र में सैन्य योगदान देने वाले देशों (यूएनटीसीसी) के प्रमुखों के सम्मेलन में उन्होंने ये खुलासे किए। डीजीएमओ ने कहा कि भारत का इरादा आतंकियों पर कार्रवाई के बाद मामले को आगे बढ़ाना नहीं था, जब तक कि ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं किया जाता।

लेफ्टिनेंट जनरल घई ने कहा कि पाकिस्तान के जल्दबाजी में किए गए आत्मसमर्पण ने भारत के राजनीतिक और सैन्य उद्देश्यों को पुष्ट किया। उन्होंने चेतावनी दी, “आगे का संघर्ष उनके लिए विनाशकारी होता।” उन्होंने बताया कि कैसे भारत की सोची-समझी प्रतिक्रिया ने इस्लामाबाद के पास कोई रणनीतिक विकल्प नहीं छोड़ा।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान रणनीतिक परिवर्तन

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सैद्धांतिक बदलाव आया कि आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों में कोई अंतर नहीं है। इससे रणनीतिक बदलाव देखा गया। डीजीएमओ ने ज़ोर देकर कहा कि ऑपरेशन सिंदूर न केवल एक सैन्य हमला था, बल्कि भारत के आतंकवाद-रोधी सिद्धांत में एक रणनीतिक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता था, जिसे खुद प्रधानमंत्री मोदी ने बताया था।

लेफ्टिनेंट जनरल घई ने कहा, “आतंकवाद के विरुद्ध हमारी रणनीति में सैद्धांतिक बदलाव आया है। हमारे प्रधानमंत्री ने इस बारे में बात की है। उन्होंने तीन बातें स्पष्ट रूप से कही हैं। पहला, आतंकवादी हमला युद्ध जैसा ही हैं। दूसरा, भारत निर्णायक जवाबी कार्रवाई करेगा और तीसरा, हम परमाणु ब्लैकमेल के आगे नहीं झुकेंगे। आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों में कोई अंतर नहीं है।”

यह अभियान 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में शुरू किया गया था, जिसमें पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार करके 26 पर्यटकों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। उन्हें धर्म पूछ- पूछकर मारा गया था। हालाँकि शुरुआत में एक आतंकी संगठन ने इसकी ज़िम्मेदारी ली थी। लेकिन उन्हें जल्द ही एहसास हो गया कि स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर हो गई है और वे तुरंत पीछे हट गए।

डीजीएमओ ने कहा कि हालाँकि भारत की प्रतिक्रिया अपेक्षित थी, लेकिन यह सोची-समझी कार्रवाई थी, जिसके बाद तनाव को रोकने और नागरिकों की सुरक्षा के लिए सीमा पर अहम तैनाती की गई।

थलसेना, वायुसेना और नौसेना की समन्वित कार्रवाई

डीजीएमओ घई के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर भारतीय थलसेना, वायुसेना और नौसेना की भागीदारी वाली ‘सैन्य क्षमता और सफल रणनीति’ की जीत थी।

घई ने विस्तार से बताया, “हमने उनके 11 हवाई ठिकानों पर हमला किया, आठ प्रमुख ठिकानों, तीन हैंगरों और चार रडारों को क्षतिग्रस्त कर दिया। जमीन पर पाकिस्तानी हवाई संपत्तियाँ नष्ट कर दी गईं, जिनमें एक C-130 विमान, एक AEW प्रणाली और कई लड़ाकू विमान शामिल थे।”

नौसेना ने भी निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, “भारतीय नौसेना पहले ही अरब सागर में आगे बढ़ चुकी थी। अगर पाकिस्तान इसे और आगे बढ़ाता, तो समुद्र और उसके पार, उसके लिए परिणाम विनाशकारी होते।”

पहलगाम हमलावरों को मार गिराया- DGMO घई

डीजीएमओ ने खुलासा किया कि भारतीय सेना ने पहलगाम हमले के तीन मुख्य साजिशकर्ताओं का लगभग 96 दिनों तक पीछा किया और खत्म किया।

घई ने कहा, “हमने उन्हें आराम नहीं करने दिया। जब हमने आखिरकार उन्हें ढूंढा, तो वे थके हुए और कुपोषित लग रहे थे, दौड़ने से थके हुए थे।” हमने सभी को मार गिराया गया था।

उन्होंने 7 मई की तड़के लश्कर-ए-तैयबा के मुरीदके मुख्यालय और बहावलपुर के शिविरों सहित, आतंकवादी ठिकानों पर किए गए सटीक हमलों की तस्वीरें भी साझा किए। इन हमलों में 100 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए।

सिंधु जल संधि स्थगित कर दी गई

लेफ्टिनेंट जनरल घई ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की प्रतिक्रिया युद्ध के मैदान से कहीं आगे तक फैली हुई थी। उन्होंने कहा, “पहलगाम हमले के तुरंत बाद 1960 की सिंधु जल संधि को स्थगित करना उसी रणनीति का हिस्सा था जो यह संकेत देती थी कि आतंक और बातचीत की पुरानी रणनीति एक साथ नहीं चल सकती।”

उन्होंने कहा कि इससे भारत की सैन्य शक्ति को कूटनीतिक और आर्थिक साधनों के साथ जोड़ने की क्षमता का पता चलता है।

पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद वर्षों से जारी

सीमा पार से दशकों से जारी आतंकवाद पर बात करते हुए, लेफ्टिनेंट जनरल घई ने वैश्विक समुदाय को बताया कि भारत में इससे कितने लोग मारे गए और कितना नुकसान हुआ। उन्होंने कहा, “1980 के दशक में अकेले जम्मू और कश्मीर में 28,000 से ज्यादा आतंकवादी घटनाएँ हुई। 60,000 से ज्यादा परिवार यानी एक लाख से ज्यादा लोग, अपने घरों से भागने को मजबूर हुए। 15,000 नागरिक और 3,000 सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं।”

कोई सवाल नहीं, केवल सरेंडर… यही चाहते हैं इस्लामी कट्टरपंथी: AltNews वाले प्रतीक सिन्हा ने तालिबान और ‘तहजीब’ पर खोला मुँह तो ‘डिजिटल पत्थरों’ से कूच दिया

‘हमने रणनीति बदली है, विचारधारा नहीं।’ भारत के इस्लामी कट्टरपंथियों को अपनी वैचारिक और मजहबी सीमाओं की जितनी साफ समझ है, शायद ही किसी और को हो। उन्होंने दिखावे के तौर पर लिबरल्स और वामपंथियों को गले लगाया ताकि उन्हें अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए ‘यूजफुल इडियट्स’ की तरह इस्तेमाल किया जा सके। लेकिन जैसे ही कोई इनके बिना सवाल किए सरेंडर वाले अनकहे नियमों से जरा भी हटता है, तभी ये लोग तुरंत उन्हें किनारे कर देते हैं, नकार देते हैं और उनकी बेइज्जती करने लगते हैं।

इसी सिलसिले में एक नया मामला ‘लिबरल्स भी संघियों से अलग नहीं है’ सामने आया है। इस्लामी कट्टरपंथी Alt News जैसे वामपंथी झुकाव वाले पोर्टल को फंड न देने की माँग कर रहे हैं क्योंकि इसके फाउंडर प्रतीक सिन्हा ने भारत के इस्लामी कट्टरपंथियों की आलोचना कर दी। उन्होंने तालिबान को गले लगाने और अफगानिस्तान वाले ‘इस्लामी मॉडल’ को सही ठहराने पर सवाल उठाया था।

ये सब शुरू हुआ 12 अक्टूबर 2025 को, जब ‘प्रोफेसर नूरुल’ नाम के एक चर्चित इस्लामी कट्टरपंथी ने X (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट की। पोस्ट में एक शेर था, “तेरी तहजीब ने उतारा है तेरे सर से हिजाब, मेरी तहजीब ने मेरी नजरों को झुका कर रखा है।”

इसमें एक तस्वीर शामिल थी, जिसमें तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी पांरपरिक पोशाक और तालिबानी हेडगियर में नजर आ रहे थे। उनके सामने एक महिला पत्रकार गुलाबी ब्लेजर और पैंट्स में खुले बालों के साथ (यानी बिना हिजाब के) उनसे सवाल पूछ रही थी। यह तस्वीर साल 2022 में एंटाल्या डिप्लोमेसी फोरम के दौरान ली गई थी।

यह पोस्ट उस समय सामने आई जब मुत्ताकी भारत के दौरे पर थे। इस दौरान मुत्ताकी उत्तर प्रदेश के देवबंद भी पहुँचे थे, जो तालिबान की विचारधारा का स्थान है।

इस पोस्ट पर Alt News के को-फाउंडर प्रतीक सिन्हा ने इस्लाम के इस प्रतिगामी संस के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने इस कट्टरपंथी इस्लामी सोच की तुलना हिंदुत्व से की और लिखा, “जो लोग इस इस्लाम के संस्करण को मानते हैं और तालिबानी को गले लगाने में खुश हैं। वे उतने ही खतरनाक है, जितना हिंदुत्व ब्रिगेड।”

प्रोफेसर नूरुल/इलाहाबादी ने दो टूक जवाब देते हुए कहा कि प्रतीक सिन्हा जैसे नास्तिकों को किसी की मजहबी भावनाओं पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने अपने हममजहब लोगों से अपील की कि Alt News को फंड देना बंद करें क्योंकि उनके मुताबिक सिन्हा जैसे लोग ‘संघियों से भी ज्यादा जहरीले’ हैं।

उन्होंने लिखा, “तुम जैसे नास्तिक जो ना हिंदू धर्म में विश्वास करते हैं और ना इस्लाम में। ऐसे लोगों की किसी भी धार्मिक भावनाओं पर लिखने का कोई अधिकार नहीं है। मुस्लिमों आप लोग फैक्ट चेक के नाम पर इसको 13 लाख देते हो और अंदर से संघियों से भी ज्यादा जहरीला है। आप लोग जुबैर को टैग कर दें।”

इस बहस में को आगे बढ़ाते हुए प्रतीक सिन्हा ने एक बार फिर हिंदुत्ववादियों की तुलना इस्लामी कट्टरपंथियों से की और कहा, तुम लोग हिंदुत्व ब्रिगेड से अलग नहीं हो, उनकी रणनीति भी बिल्कुल यही होती है और वे भी पूछते हैं कि हिंदू Alt News को डोनेट क्यों कर रहे हैं। तुम उसी सिक्के के दूसरे पहलू हो। अगर तुम सोचते हो कि सिर्फ मुस्लिम ही Alt News को डोनेट करते हैं तो तुम भी उतने ही गलतफहमी मे हो। Alt News को हर तबके के लोग डोनेट करते हैं।”

इसके जवाब में नूरुल ने आरोप लगाया कि सिन्हा लगातार मुस्लिमों को इस्लाम से दूर करने की कोशिश करते हैं और बीच-बीच में कुछ हिंदू कट्टरपंथियों को उजागर करना उनका एक ‘बैलेंसिंग एक्ट’ है।

वहीं एक और इस्लामी कट्टरपंथी आसिफ खान भी इस बहस में कूद पड़े और इशारा किया कि सिन्हा इस्लामी कट्टरपंथियों की पिछड़ी ‘तहजीब’ को महिमामंडित करने वालों की आलोचना करके लगभग पूरे ‘मुस्लिम-विरोधी’ हो गए हैं।

आसिफ खान ने लिखा, “ऐ पैगंबर! ईमान वाले मर्दों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी पवित्रता की रक्षा करें। यही उनके लिए ज्यादा पवित्र है, निस्संदेह अल्लाह उनसे वाकिफ है, जो वे करते हैं। और ईमान वाली औरतों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी पवित्रता की रक्षा करें और अपने शृंगार को केवल वही दिखाएँ जो सामान्य रूप से दिखाई देते हैं।”

उन्होंने आगे लिखा, “~ क़ुरान (24:30-31) यह क़ुरान की एक आयत है… एक ऐसी किताब जिस पर एक अरब से ज़्यादा लोग विश्वास करते हैं। और प्रतीक सिन्हा ने इन अरबों मुस्लिमों की तुलना मुस्लिमों की लिंचिंग और उन पर अत्याचार करने वाली हिंदुत्व ब्रिगेड से की है। मुस्लिमों के प्रति पूर्वाग्रह का स्तर इतना ज्यादा है कि आप उन्हें सिर्फ इसलिए ‘खतरनाक’ कहते हैं क्योंकि वे आस्था रखते हैं।”

जवाब में प्रतीक सिन्हा ने शर्मनाक तरीके से तालिबान और मुस्लिम कट्टरपंथियों की तुलना हिंदुत्व ब्रिगेड से कर दी जबकि दोनों में दूर-दूर तक कोई समानता नहीं है। जहाँ तालिबान ने महिलाओं की शिक्षा और अफगान महिलाओं की नौकरी करने, महरम या परिवार के पुरुषों के बिना सार्वजनिक स्थानों पर घूमने की आजादी पर प्रतिबंध लगा दिया है। वहीं तथाकथित हिंदुत्व ब्रिगेड महिलाओं पर ऐसी कोई प्रतिगामी प्रथा लागू नहीं करती और महिला सशक्तिकरण का जश्न मनाती है।

इसके अलावा, तालिबान ने भूकंप के मलबे से महिलाओं को बचाने तक की कोशिश नहीं की क्योंकि उनकी शरीयत मान्यताओं के अनुसार पुरुषों को अपनी बीवी के अलावा किसी भी महिला को छूना मना है। इसके उलट, RSS और ‘हिंदुत्व ब्रिगेड’ हमेशा संकट के समय सबसे पहले आगे आकर पुरुषों, महिलाओं, बच्चों और बुज़ुर्गों की मदद करते रहे हैं।

प्रतीक सिन्हा ने लिखा, “असल जिंदगी में जितने भी मुस्लिम पुरुषों को मैं जानता हूँ, वे महिलाओं से बात करते समय अपनी नजरें नहीं झुकाते। साफ है कि वे कुरान को शब्द दर शब्द नहीं मानते। धर्मों का गठन मध्यकाल में हुआ था और उनमें से बहुत कुछ अब अप्रासंगिक हो चुका है, जिसे छोड़ देना चाहिए। आधुनिक देश धर्म के नियमों से नहीं, कानून के शासन से चलते हैं। और यही वजह है कि वर्तमान सरकार में जिस तरह कानून का शासन कमजोर किया जा रहा है, उसके खिलाफ लड़ाई जरूरी है। हाँ, कुछ मुस्लिम पुरुष मजहब कट्टरपंथी होते हैं और मैं उनकी तुलना हिंदुत्व ब्रिगेड से कर रहा हूँ। शायद समझने के लिए कुछ क्लासेस जरूरी हैं, आसिफ।”

इसी बीच ‘मुस्लिम पीड़ित’ नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए फेक न्यूज फैलाने वाले मोहम्मद शादाब खान नाम का एक शख्स ने प्रतीक सिन्हा की तुलना बीजेपी के पूर्व फायरब्रांड नेता टाइगर राजा सिंह से कर दी। शादाब खान ने लिखा, “इनको मुस्लिमों से नफरत है, इस्लाम से नफरत है। बस 19-20 का ही फर्क है।”

यहाँ एक और चर्चित इस्लामी कट्टरपंथी वसीम अकरम त्यागी ने भी प्रतीक सिन्हा पर निशाना साधा और लिखा, “बहुत सारे ‘फ्री थिंकर’ इस तस्वीर की आलोचना कर रहे हैं। आलोचना की वजह बस यह है कि महिला पत्रकार के सामने तालिबान सरकार के विदेश मंत्री नजर नीचा करके बात कर रहे हैं, वो उस महिला पत्रकार की आँखों में आँखें डालकर बात क्यों नहीं कर रहे हैं। कमाल है! वो आँखों में आँखें डालकर बात करें तो भी बवाल, और ना करें तब भी बवाल। अगर वो आँखों में आँखें डालकर बात करेंगे तब यही ‘फ्री थिंकर’ उस पर चटखारे लेकर फब्तियाँ कसेंगे! लेकिन अब इसे ‘खतरनाक’ बता रहे हैं।”

दिलचस्प बात यह है कि Alt News और उसके सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा और मोहम्मद ज़ुबैर को इस्लामी कट्टरपंथियों की नाराजगी का सामना करना पड़ा, जब उन्होंने इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा गढ़ी गई ‘भगवा लव ट्रैप’ साजिश थ्योरी पर रिपोर्टिंग की। वही इस्लामी कट्टरपंथी जो असली और दर्ज लव जिहाद और ग्रूमिंग जिहाद के मामलों को ‘झूठा’ बताकर खारिज कर देते हैं या कभी-कभी उनका जश्न भी मनाते हैं। उन्होंने Alt News की उस रिपोर्टिंग की आलोचना की, जिसमें मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदू लड़कों और उनकी मुस्लिम महिला दोस्तों या पार्टनर्स पर हमले की घटनाओं को कवर किया गया था और इन हमलों को ‘भगवा लव ट्रैप’ कहकर जायज ठहराया गया।

प्रतीक सिन्हा की बार-बार तालिबान की आलोचना को ‘संतुलित’ दिखाने के लिए जबरन हिंदुत्व को घसीटने की कोशिशें किसी काम नहीं आईं।

मजे की बात यह है कि मजबी कट्टरता और महिला विरोधी सोच का बचाव करते हुए पुरुष इस्लामी कट्टरपंथी मुस्लिम महिलाओं को भी नहीं बख्शते। इसी संदर्भ में जब RJ सायमा, जो अक्सर मुस्लिम विक्टिम कार्ड खेलने और अपने हिंदू-विरोधी सोशल मीडिया बयानों को लेकर आलोचना झेलती हैं, उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी महिला से नजरें झुकाकर बात करना तालिबान मंत्री के महिलाओं पर किए गए अत्याचारों को माफ कर देता है?

उन्होंने लिखा, “जो लोग औरतों पर ज़ुल्म की सारी हदें पार कर चुके हैं, क्या उन्हें लगता है कि किसी से नजरें झुकाकर बात करने से उनके गुनाह माफ हो जाएँगे? क्या वे अब अच्छे किरदार वाले लोग बन गए हैं? वाकई, वसीम?”

इसके जवाब में वसीम अकरम त्यागी ने न सिर्फ तालिबान द्वारा अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों पर लगाए गए कट्टरपंथी प्रतिबंधों और उनके शासन में महिलाओं को झेलनी पड़ी तमाम ज़्यादतियों को हल्के में लिया बल्कि तालिबान की महिला-विरोधी नीतियों की तुलना उन देशों से कर दी जो ‘आधुनिक’ संस्कृति के दावे करते हैं।

इस्लामी कट्टरपंथी पूरी तरीके से समर्पण चाहते हैं, आलोचना नहीं

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब सेक्युलर लिबरल्स को इस्लामो-लेफ्टिस्ट ‘प्रोग्रेसिव’ इकोसिस्टम से बाहर कर दिया गया हो, उन्हें ‘संघी’ कहकर बदनाम किया गया हो या पूरी तरह से किनारे कर दिया गया हो। इसी साल सितंबर में केरल की एक यूनिवर्सिटी में हुए एक कार्यक्रम को लेकर बवाल मच गया था, जहाँ हिजाब पहनी मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों से अलग बैठाया गया, वो भी बिल्कुल तालिबानी अंदाज में।

इस Profcon नाम के इवेंट की जो तस्वीरें और वीडियो ऑनलाइन सामने आए, उन पर प्रतिक्रिया देते हुए रुचिका शर्मा, जो खुद को ‘इतिहासकार’ बताती हैं और जिनका मानना है कि इस्लामी आक्रांताओं के हिंदू-विरोधी अपराधों को सफेदपोश बनाना उनका मिशन है, उन्होंने लिखा, “सिर्फ हिजाब काफी नहीं है, महिलाओं को अलग बैठाओ, पीछे बैठाओ, पर्दे के पीछे रखो। यानी उन्हें सिर्फ औरत होने की सजा दो और इसे ‘उनकी पसंद’ कहकर पेश करो।”

मुस्लिम महिलाओं को जानबूझकर अदृश्य करने की इस आलोचना पर वही इस्लामी कट्टरपंथी, जो रुचिका शर्मा की तारीफ करते नहीं थकते थे, उन्हें ‘ईमानदार’ और ‘बहादुर’ इतिहासकार कहते थे क्योंकि उन्होंने औरंगजेब जैसे मध्यकालीन इस्लामी शासकों के अत्याचारों को हल्का करके पेश किया। अब वही लोग उन्हें ‘इस्लामोफोब’ कहने लगे।

यहाँ तक कि शर्मा को इस्लामोफोब कहने वाले भूल गए कि उन्होंने खुद एक बार यह स्वीकार किया था कि उन्होंने अपने मुस्लिम अब्यूजर का नाम सिर्फ इसलिए नहीं लिया था ताकि ‘संघी’ लोग उस घटना का इस्तेमाल अपने ‘इस्लामोफोबिक सांप्रदायिक एजेंडे’ के लिए न कर सकें।

ठीक इसी तरह, जब इस्लामो-लेफ्टिस्ट प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ से जुड़ी अर्फा खानम शेरवानी ने रुचिका शर्मा की राय का समर्थन किया तो वे भी इस्लामी कट्टरपंथियों के गुस्से से नहीं बच सकीं। उन्हें यह समझाया गया कि इस्लाम में पुरुषों और महिलाओं का आपस में खुलकर मेल-जोल रखना जायज नहीं है।

दरअसल, इस्लामी कट्टरता और मजहब आधारित महिला-विरोधी सोच से कोई भी सुरक्षित नहीं है। इसका असर ऑनलाइन नाराजगी, ‘संघी’ कहकर लेबलिंग, तालिबानी महिला-विरोधी नीतियों और बड़े मामलों में ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारों तक में देखा जा सकता है। इस्लामी कट्टरपंथी न सिर्फ अपने लिबरल सहयोगियों को जरा सी असहमति पर खारिज कर देते हैं बल्कि अपने ही हममजहब लोगों को भी इसलिए निशाना बनाते हैं क्योंकि वे उनके तय किए गए ‘मुस्लिम होने के मानकों’ पर खरे नहीं उतरते।

(मूलरूप से यह खबर अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

जम्मू-कश्मीर में बाहरी लोगों को दिए गए हथियारों के लाइसेंस, राजस्थान में खुला J&K का ₹100 करोड़ का ‘गन लाइसेंस घोटाला’: निशाने पर 8 IAS अधिकारी, जानें क्या है पूरा मामला?

जम्मू कश्मीर में करीब 100 करोड़ के गन लाइसेंस घोटाले में एमएचए ने अहम कदम उठाया है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से तीन अधिकारियों, यशा मुद्गल, शाहिद इकबाल चौधरी और नीरज कुमार को लेकर जानकारी माँगी है। ये कार्रवाई राजस्व सचिव कुमार राजीव रंजन पर राज्य में हथियार लाइसेंस में कथित अनियमितताओं के लिए मुकदमा चलाने की अनुमति देने के दो महीने बाद माँगी गई है।

गन लाइसेंस स्कैम में 8 वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संदेह के घेरे में हैं। अब गृह मंत्रालय ने सीबीआई से पूछा है कि यशा मुर्दल, शाहिद इकबाल और नीरज कुमार समेत तमाम अधिकारियों के खिलाफ हथियार डीलरों से जुड़ने के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं या नहीं। ये घोटाला 2012 से 2016 के बीच 2.74 लाख हथियारों के लाइसेंस को अवैध तरीके से जारी किए जाने को लेकर है।

जम्मू कश्मीर के मुख्य सचिव से पूछा गृह मंत्रालय ने

गृह मंत्रालय में अवर सचिव सीपी विनोद कुमार ने 21 फरवरी 2025 को एक खत जम्मू -कश्मीर के मुख्य सचिव को लिखा है। इसमें बताया गया है कि तीन वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति देने की सिफारिश करने वाले पत्रों के साथ न तो केंद्रीय जाँच ब्यूरो के पत्र/प्रस्ताव और डीवीडी थे और न ही जम्मू-कश्मीर के कानून विभाग की कोई कानूनी राय।

इस घोटाले में 16 पूर्व जिलाधिकारी (13 आईएएस अधिकारी और तीन केएएस अधिकारी) शामिल हैं। इनमें ये तीनों अधिकारी भी शामिल हैं, जिनको लेकर सवाल पूछे गए हैं। सभी पूर्व जिलाधिकारियों पर तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य के अलग-अलग जिलों में तैनाती के दौरान लाखों अवैध हथियारों के लाइसेंस जारी करने के आरोप हैं।

गृह मंत्रालय ने सीबीआई से क्या पूछा

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सीबीआई को गृहमंत्रालय ने 1 सिंतबर 2025 को पत्र लिखा है।

पत्र में ये साफ करने को कहा है कि क्या इन अधिकारियों को अवैध हथियार लाइसेंस जारी करने के बदले आर्थिक फायदा हुआ था। क्या जाँच में किसी आईएएस अधिकारी के आर्म्स डीलरों के साथ साँठ-गाँठ के सबूत मिले हैं। क्या संपत्ति के सौदे या पैसों के लेन-देन के सबूत मिले हैं।

सीबीआई की जाँच में क्या सामने आया

सीबीआई ने अपनी जाँच कर आरोप लगाया कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर ज्यादातर हथियारों के लाइसेंस जारी किए गए। लाइसेंस जारी करने में कई डीलर, बिचौलिए और प्रशासनिक अधिकारियों की संलिप्तता थी।
जम्मू कश्मीर प्रशासन ने 2021 में KAS अधिकारियों और क्लर्कों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दे दी थी। इसके बाद सीबीआई ने चार्जशीट दायर की थी। लेकिन आईएएस अधिकारियों का मामला अब तक लंबित है, क्योंकि इसके लिए गृहमंत्रालय से अनुमति की जरूरत है। गृहमंत्रालय इस मामले में काफी फूँक-फूँक कर कदम रख रहा है। कोर्ट के आदेश के बाद गृहमंत्रालय पर फैसला लेने का दबाव भी आ गया है।

जम्मू-कश्मीर गन घोटाला क्या है

2017 में राजस्थान की एंटी टेररिज्म स्क्वाड की एक जाँच में जम्मू कश्मीर में बड़ी संख्या में फर्जी दस्तावेज के आधार पर लाइसेंस जारी करने का पता चला था। इस मामले को सीबीआई को जाँच के लिए सौंपा गया। सीबीआई को पता चला कि 2012 से 2016 तक के बीच 2.74 लाख हथियारों के लाइसेंस जारी किए गए थे। इनमें से 95 फीसदी वे लोग थे, जो जम्मू-कश्मीर के निवासी नहीं थे। यहाँ तक कि उनका राज्य से कोई लेना-देना नहीं था।

सीबीआई के मुताबिक, ये लाइसेंस सेना, अर्धसैनिक बलों और दूसरे बाहरी लोगों को पैसों की लेन-देन के बाद जारी किए गए।

इस मामले में 9 आईएएस अधिकारियों के खिलाफ जाँच की गई। इनमें से 8 वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों पर अभियोजन की अनुमति गृहमंत्रालय ने दी। ये सभी अधिकारी 2012 से 2016 के बीच जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में पदस्थापित थे।

जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस अरुण पाली और जस्टिस राजनेश ओसवाल की खंडपीठ ने इस मामले में गृहमंत्रालय से 6 हफ्तों में फैसला लेने को कहा था कि इन आईएएस अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दी जाएगी या नहीं। इसको देखते हुए गृहमंत्रालय ने जम्मू कश्मीर के उच्चाधिकारी को पत्र लिखा है।

हाईकोर्ट में इससे संबंधित एक जनहित याचिका शेख मोहम्मद शफी और अन्य ने दायर की थी। याचिका में कहा गया है कि आरोपित अधिकारी अभी भी राज्य के उच्च पदों पर पदस्थापित हैं और अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए कोर्ट उन पर निगरानी रखे।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर ये मामला काफी अहम है। ये कोई प्रशासनिक गलती भी नहीं है, बल्कि जम्मू कश्मीर प्रशासन की छवि से जुड़ा मामला है। गृहमंत्रालय अब इस पर जल्दी निर्णय लेने के मोड में आ गई है।

बंगाल में महिलाओं पर सबसे ज्यादा फेंके गए तेजाब, ‘घुसपैठियों’ ने किए सबसे ज्यादा अपराध: NCRB की रिपोर्ट में खुलासा, क्यों महिला सुरक्षा पर ‘गंभीर’ नहीं है ममता सरकार

महिलाओं की सुरक्षा और अधिकार के क्षेत्र में महिला मुख्यमंत्री का राज्य आदर्श होना चाहिए। लेकिन ममता बनर्जी की अगुवाई वाली पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं है। लगातार हो रहे यौन अपराध की घटनाएँ और हाल ही में प्रकाशित नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की रिपोर्ट दर्शाती है कि राज्य सरकार महिलाओं की सुरक्षा को कमतर आँकती है।

दुर्गापुर में हुए एमबीबीएस की दूसरी वर्ष की छात्रा के साथ गैंगरेप के मामले में अब तक अपू बाउरी, फिरदौस शेख और शेख रिजाउद्दीन समेत 5 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है।
पीड़िता के पिता ने कहा है कि पश्चिम बंगाल में उनकी बेटी सुरक्षित नहीं है। उनका विश्वास टूट गया है और हम यहाँ नहीं रहना चाहते। उनका कहना है कि उनकी बेटी अपनी आगे की शिक्षा ओडिशा में पूरा करेगी। उन्होंने कहा है कि बंगाल में ‘औरंगजेब का शासन’ है।

विश्वास का टूटना कोई आश्चर्य में डालने वाली बात नहीं है। कुछ महीने पहले ही कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में एमबीबीएस की छात्रा के साथ दर्दनाक तरीके से रेप और हत्या की खबर सामने आई थी। वर्तमान स्थिति में सबसे खराब बात ये है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस मामले पर तुरंत कार्रवाई करना तो दूर, पीड़िता को ही दोषी ठहराने और राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को कम करके आँकने की कोशिश की।

जिम्मेदारी से बचने के लिए पीड़िता को दोषी ठहराना? पश्चिम बंगाल की महिला मुख्यमंत्री की असंवेदनशीलता को दर्शाता है। हालाँकि मुख्यमंत्री बनर्जी ने हमले पर दुख व्यक्त किया और अपराधियों के खिलाफ ‘कड़ी कार्रवाई’ का वादा भी किया, लेकिन अंत में उन्होंने पीड़िता को ही अपने साथ हुई क्रूरता के लिए दोषी ठहरा दिया। उन्होंने कहा, “पीड़िता को रात के 12.30 बजे परिसर से बाहर कैसे जाने दिया गया? निजी संस्थान को इसकी अनुमति नहीं देनी चाहिए… लड़कियों को रात में बाहर (कॉलेज) जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उन्हें अपनी सुरक्षा भी करनी होगी।”

हालाँकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का यौन उत्पीड़न के मामलों को कम करके आँकने वाली टिप्पणियाँ करने का शर्मनाक रिकॉर्ड रहा है। पिछले कुछ वर्षों में, बनर्जी और उनकी तृणमूल कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ सदस्यों को बलात्कार की घटनाओं पर अपनी असंवेदनशील प्रतिक्रियाओं के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है।

साल 2012 का पार्क स्ट्रीट सामूहिक बलात्कार सबसे चर्चित रहा। 6 फरवरी, 2012 को कोलकाता के पार्क स्ट्रीट से घर लौट रही एक एंग्लो-इंडियन महिला सुज़ेट जॉर्डन के साथ चलती कार में 5 लोगों ने बलात्कार किया था। खबर सामने आने के तुरंत बाद, टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने आरोपितों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। उन्होंने इस घटना को ‘शजानो घोटोना’ (मनगढ़ंत घटना) करार दिया था, जो कथित तौर पर ‘सरकार को बदनाम करने के लिए रची गई’ थी।

टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार सहित उनकी पार्टी के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाया और इस घटना को ‘एक महिला और उसके मुवक्किल के बीच गलतफहमी’ बताया। 2015 में कोलकाता की एक अदालत ने इस मामले के तीन आरोपितों को दोषी ठहराया, जिससे यह साबित हुआ कि हमला वास्तव में हुआ था।

पश्चिम बंगाल विधानसभा में राज्य में बलात्कार के बढ़ते मामलों पर एक बहस के दौरान, 2013 में मुख्यमंत्री ने यह आरोप लगाया था कि यह राज्य की जनसंख्या में वृद्धि के कारण है। उन्होंने बलात्कार के बढ़ते मामलों के लिए आधुनिकीकरण, शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स की बढ़ती संख्या को भी जिम्मेदार ठहराया था।

2024 के संदेशखली दंगों के दौरान भी, ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के गुंडों द्वारा महिलाओं के उत्पीड़न और यौन शोषण को ‘मामूली घटना’ बताकर कमतर आँकने की कोशिश की थी। ममता बनर्जी ने कहा, “इसके बाद, कुछ मीडिया संस्थानों ने इस घटना का फ़ायदा उठाया। एक मामूली घटना को लेकर शोर मचाया।”

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों को ‘मामूली घटना’ बताया। एनसीआरबी के आँकड़े राज्य की स्थिति को उजागर करते हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने हाल ही में वर्ष 2023 के लिए अपनी ‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में बताया गया है कि पश्चिम बंगाल में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और विशेष एवं स्थानीय कानूनों (एसएलएल) के तहत महिलाओं के खिलाफ अपराधों के 34,691 मामले दर्ज किए गए। यह देश में किसी भी राज्य में हुए महिलाओं के प्रति अपराध की सबसे ज्यादा मामलों में एक है। हालाँकि यह 2022 के 34,738 मामलों से थोड़ा कम है।

राज्य में क्राइम रेट हर एक लाख महिलाओं में 71.3 है। राज्य की जनसंख्या 48.64 मिलियन यानी 4.864 करोड़ है।

कुल मिलाकर ममता बनर्जी की टीएमसी सरकार कुछ खास तरह की हिंसा में देश में सबसे आगे है। राज्य में 2023 में विदेशियों द्वारा किए गए अपराधों की सबसे अधिक दर्ज की गई। विदेशी अधिनियम, 1946 और विदेशियों के पंजीकरण अधिनियम, 1939 के तहत ये मामले दर्ज किए गए।

वर्ष 2023 में, पश्चिम बंगाल में विदेशियों ने 1,021 आपराधिक मामले दर्ज किए गए। इन दोनों अधिनियमों के तहत 989 मामले दर्ज किए गए, जबकि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट 1985 के तहत 7 मामले, आर्म्स एक्ट 1959 के तहत दो मामले दर्ज किए गए। विदेशियों से जुड़े कुछ मामले धोखाधड़ी, मानव तस्करी जैसे अपराधों के तहत दर्ज किए गए।

2023 में, भारत में एसिड हमलों के 207 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से अकेले पश्चिम बंगाल में 57 मामले सामने आए। एनसीआरबी के आँकड़ों से पता चला है कि एसिड हमलों के 57 मामलों में पश्चिम बंगाल में 60 पीड़ित थे, जबकि देश भर में 207 मामलों में 220 पीड़ित थे।

एनसीआरबी के आँकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2023 में देश भर में हुए सभी एसिड हमलों में से 27.5% अकेले पश्चिम बंगाल में दर्ज किए गए। 2022 में, देश भर में हुए 202 मामलों में से, पश्चिम बंगाल में 48 एसिड हमले दर्ज किए गए, जिनमें 52 पीड़िता थी। इसमें बंगाल 2018 से देश में सबसे आगे है। एनसीआरबी के आँकड़ों के अनुसार, देश भर में एसिड हमलों के सभी मामलों में 267 गिरफ्तारियाँ हुईं और गिरफ्तार लोगों में 246 पुरुष और 21 महिलाएँ थीं।

पश्चिम बंगाल में 2023 में बलात्कार/सामूहिक बलात्कार के साथ हत्या के 7 मामले, दहेज हत्या के 350 मामले और महिलाओं को आत्महत्या के लिए उकसाने की 419 घटनाएँ दर्ज की गईं।

पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा किए गए क्रूरता से जुड़े आईपीसी की धारा 498 ए के तहत दर्ज मामलों में पश्चिम बंगाल दूसरे स्थान पर है। यहाँ 19698 मामले दर्ज किए गए और 20462 पीड़ित हैं। देश भर में पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता से संबंधित कुल 128814 मामले दर्ज किए गए। इनमें उत्तर प्रदेश 19889 मामलों के साथ सबसे आगे रहा।

कुल मिलाकर, ‘पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता’ के मामलों में सबसे ज़्यादा 29.8% (1.33 लाख मामले) मामले दर्ज किए गए, जिनमें 1.35 लाख पीड़ित शामिल थे। इस श्रेणी में वर्ष 2022 में ऐसे अपराधों का हिस्सा 31.4% था।

इस बीच, पश्चिम बंगाल में वर्ष 2023 में धारा 364ए के तहत फिरौती के लिए अपहरण के 17 मामले और 18 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को शादी के लिए मजबूर करने (आईपीसी की धारा 366) के तहत अपहरण के 515 मामले दर्ज किए गए। नाबालिगों के मामले में पश्चिम बंगाल में यह संख्या 390 थी। जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में सबसे ज़्यादा नाबालिगों के साथ अपराध दर्ज की गईं।

महिलाओं के अपहरण और अपराध की (आईपीसी की धारा 363ए, 365, 367, 368, 369) के तहत, देश भर में 7964 मामले दर्ज किए गए। इनमें पश्चिम बंगाल में सबसे ज़्यादा 2054 घटनाएँ दर्ज की गईं। इस बीच, पश्चिम बंगाल में महिलाओं के अपहरण कुल संख्या 6544 रही, जो देश में सबसे ज़्यादा है।

एनसीआरबी रिपोर्ट के राज्यों के आँकड़ों से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में बलात्कार की 1110 घटनाएँ दर्ज की गईं। इनमें 1112 पीड़िताएँ थीं। इनमें से 917 मामलों में अपराधी पीड़िता के परिचित थे, 27 मामलों में अपराधी परिवार के सदस्य, 11 दोस्त/ऑनलाइन दोस्त/लाइव पार्टनर थे, और 193 मामलों में अपराधी पीड़िताओं के लिए अजनबी या अज्ञात थे।

‘बलात्कार के प्रयास’ अपराध श्रेणी में, पश्चिम बंगाल दूसरे स्थान पर था, जहाँ 825 मामले दर्ज किए गए, जिनमें सभी पीड़िताएँ 18 वर्ष से अधिक आयु की थीं। इस श्रेणी में राजस्थान सबसे आगे रहा, जहाँ 845 मामले दर्ज किए गए।

‘महिलाओं की गरिमा भंग करने के इरादे से उन पर हमला’ श्रेणी में, पश्चिम बंगाल में 2023 में 2487 पीड़िताओं से जुड़े 2479 मामले दर्ज किए गए। वहीं, ‘महिलाओं की गरिमा का अपमान’ श्रेणी में पश्चिम बंगाल के आंकड़े 412 थे। महिलाओं के खिलाफ आईपीसी के तहत कुल अपराध 31928 थे, जो देश में सबसे अधिक हैं।

पश्चिम बंगाल में वर्ष 2023 में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) के तहत 2721 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 1798 मामले बच्चों के साथ बलात्कार (POCSO अधिनियम की धारा 4 और 6/आईपीसी की धारा 376) से संबंधित थे, 644 घटनाएँ बच्चों के यौन उत्पीड़न (POCSO अधिनियम की धारा 8 और 10/आईपीसी की धारा 354) से संबंधित थीं और 244 घटनाएँ यौन उत्पीड़न (POCSO अधिनियम की धारा 12/आईपीसी की धारा 509) के थे।

पश्चिम बंगाल में पोर्नोग्राफी के लिए बच्चों का इस्तेमाल/बाल पोर्नोग्राफी सामग्री रखने (POCSO अधिनियम की धारा 14 और 14) के 29 मामले दर्ज किए गए।

महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के मामलों में 125 घटनाएँ ऐसी मिलीं जो झूठी पाई गई। 1165 मामले ऐसे थे जिनमें मामले कानून या दीवानी विवाद के रूप में समाप्त हुए। पश्चिम बंगाल पुलिस ने 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 34344 मामलों का निपटारा किया, जिनमें लंबित मामलों की दर 23.2% रही।

एनसीआरबी की रिपोर्ट में दिए गए तथ्य और आँकड़े बताते हैं कि घरेलू हिंसा और अपहरण की घटनाएँ अभी भी प्रमुख हैं, जो 2023 में दर्ज घटनाओं में 75% से अधिक हैं। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि वास्तविक संख्या न केवल पश्चिम बंगाल में, बल्कि दूसरे राज्यों में भी कहीं अधिक हो सकती है। आँकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में सजायाफ्ता दर केवल 3.7% है, जो राष्ट्रीय दर 21.3% से काफी कम है। 3,68,000 से अधिक लंबित मामलों की संख्या स्थिति को और भी बदतर बना देती है, हालाँकि पश्चिम बंगाल में आरोप-पत्र दाखिल करने की दर अच्छी है।

एनसीआरबी की भारत में अपराध 2023 रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर प्रति लाख महिला जनसंख्या पर 71.3 है, जो राष्ट्रीय औसत 65.3 मामलों के काफी अधिक है।

इन आँकड़ों के बावजूद, पश्चिम बंगाल सरकार ने अपनी पीठ थपथपाने और कोलकाता को महिलाओं के लिए ‘सबसे सुरक्षित शहर’ बता रही है। हालाँकि, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष अर्चना मजूमदार ने तृणमूल कॉन्ग्रेस पर एनसीआरबी के आँकड़ों को ‘गलत तरीके से पेश करने’ का आरोप लगाया और कहा कि पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराधों से संबंधित लगभग 4 लाख मामले लंबित हैं, जो भारत में सबसे ज़्यादा हैं, और जिनमें न तो कोई कार्रवाई हुई है और न ही कोई दोषी साबित हुआ है।

उन्होंने कहा, “यह एनसीआरबी के आँकड़ों की आधी-अधूरी व्याख्या और गलत व्याख्या है… 2023 में, राज्य सरकार ने महिलाओं के खिलाफ अपराध पर अपनी रिपोर्ट पेश की। इसमें पश्चिम बंगाल में चार लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं, जिनमें किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया है या कोई कार्रवाई नहीं की गई है। यह देश में सबसे ज़्यादा है… पुलिस प्रशासन इन पर काम नहीं कर रहा है। प्रशासन और पुलिस के असहयोग के कारण न्यायपालिका भी विफल हो रही है। वे समय पर आरोप-पत्र दाखिल नहीं कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में यह सब चल रहा है, और वे तथ्य छिपा रहे हैं… यह तो बस एक छोटी सी बात है… ये कुछ मामले हैं।”

आरजी कर मामले के जख्म अभी भरे भी नहीं हैं उससे पहले दुर्गापुर में मेडिकल कॉलेज की छात्रा से गैंगरेप की खबर आ गई। बीरभूम में भी ऐसी ही घटनाएँ सामने आईं और स्थानीय पुलिस की निष्क्रियता की दिखी, फिर भी टीएमसी खुद की पीठ थपथपा रही है। जाहिर है, टीएमसी पर राजनीतिक हमले के लिए महिला सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। इसलिए ममता सरकार जवाबदेही से बचने की कोशिश में इसे ‘मामूली मुद्दा’ बता देती है।

(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में बनी है। इसे देखने के लिए यहाँ क्लिक करें)

असद ने चाकू से काटा करन का गला फिर शरीर पर किए 15 वार, थाने के नल पर धोए खून से सने हाथ-पैर: अलीगढ़ में मंदिर बनाने के बाद से रंजिश रखते थे मुस्लिम परिवार

उत्तर प्रदेश के जिला अलीगढ़ के जवाँ कस्बे में रहने वाले 20 वर्षीय करन की फेसबुक पोस्ट से नाराज मोहम्मद असद ने बेरहमी से हत्या कर दी। पहले से नाराज असद ने करन को बात करने के बहाने घर के बाहर बुलाया और फिर उसे मामूली कहासुनी के बाद पास के ही खंडहर पड़े अपने मकान में खींचकर ले गया। इसके बाद असद ने दोस्तों के साथ मिलकर करन का पहले तो सिर दीवार में मारा, फिर चाकू से गले को काटा और फिर शरीर पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर उसे मौत के घाट उतार दिया।

बड़े भाई की चीखपुकार सुन घर से बाहर आए 12 वर्षीय छोटे भाई के शोर मचाने पर सभी आरोपित मौके से भाग गए। हैरानी की बात ये कि करन की हत्या करने के बाद असद सीधे पास के पुलिस स्टेशन पहुँचा और फिर उसने थाने के नल पर अपने खून से सने हाथ-पैर धोए और अंदर पुलिस को जाकर बोला कि मैं हत्या करके आया हूँ।

आरोपित के कबूलनामे को सुन पुलिस ने असद को हिरासत में लिया और घटनास्थल की ओर दौड़ी। पीड़ित माँ महारानी ने लिखित शिकायत में बताया कि शनिवार(11 अक्टूबर) रात करीब साढ़े 9 बजे मेरे बेटे करन को मौहल्ले का ही निवासी इदरीश पुत्र अब्दुल कलाम बहाने से अपने घर ले गया। इसके बाद करीब साढ़े 11 बजे इदरीश, नफीश खाँ, असद, अयान, अनश, अरमान, अल्तमश और चाँद ने मिलकर मेरे बेटे की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी।

वहीं रविवार सुबह होते ही करन की हत्या को लेकर हिंदुओं में आक्रोश फैल गया। पोस्टमार्टम के बाद जवां पहुँचे शव का परिजनों ने दाह संस्कार करने से इंकार कर दिया और देखते ही देखते हजारों की सँख्या में भीड़ इकट्ठा हो गई। महिलाओं ने मुरादाबाद हाईवे बाईपास को जाम कर दिया। जब पुलिस ने उन्हें हटाने का प्रयास किया तो गुस्साई भीड़ ने पुलिस की गाड़ियों पर पथराव कर दिया।

लोगों के गुस्से को देख पुलिस के हाथ पैर फूल गए। गुस्साए लोग पीड़ित परिवार को आर्थिक मदद और आरोपितों के घर पर बुलडोजर चलाने की माँग पर अड़े रहे। पुलिस से मिली लिखित आश्वासन के बाद ही शाम को गुस्साई भीड़ सड़क से हटी और फिर परिजन शव को दाह सँस्कार के लिए ले गए।

अहेरिया समाज से आने वाले करन तीन भाईयों में दूसरे नंबर का था। सबसे बड़े भाई अपनी पत्नी के साथ पंजाब में रहते हैं। करन नोएडा में मजदूरी करता था और माँ गाँव में 12 वर्षीय छोटे बेटे सनी संग रहती थी। पिता मेघ सिंह की करीब 10 वर्ष पूर्व सीढ़ियों से गिरकर मौत हो गई थी। करन की माँ महारानी ने बिलखते हुए बताया कि जब से गली में मँदिर बना है, तब से यह(असद का परिवार) लोग हमारे परिवार से खुन्नस मानते आ रहे हैं। इसी खुन्नस में खुद असद ने उनके बेटे को नोएडा से बहाने से बुलाकर हत्या की।

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक, मौहल्ले में अहेरिया समाज की आबादी अधिक है। जबकि मुस्लिम परिवार कुछ ही सँख्या में हैं। कुछ वर्ष पहले अहेरिया समाज ने मिलकर एक मँदिर का निर्माण कराया था। तब आरोपित असद के परिवार और अन्य मुसलमानों ने मंदिर निर्माण का विरोध किया था। तभी से असद का परिवार करन के परिवार से खुन्नस मानता है।

अलीगढ़ पुलिस ने बताया कि पुलिस तो करन की हत्या की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची। मामले में मिली तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर मुख्य आरोपित सहित सभी आठ आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है। शांति व्यवस्था के लिए बड़ी संख्या में कस्बे में पुलिस बल तैनात किया गया है। फिलहाल मौके पर शांति है। हालाँकि अलीगढ़ पुलिस ने अभी तक इस बात का खुलासा नहीं किया है कि आखिर करन की हत्या किस बात पर हुई।

RSS से ‘हारा’ कॉन्ग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम अब कर रहा बैन की बात, छटपटाहट में चला रहा अभियान: जानें- हर बार ‘फीनिक्स’ की तरह उठ खड़ा हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 साल पूरे होने का जश्न अभी थमा भी नहीं था कि कर्नाटक की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे और राज्य के मंत्री प्रियाँक खरगे ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को एक पत्र लिखकर सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, पार्कों और मंदिरों में आरएसएस की शाखाओं और कार्यक्रमों पर पूरी तरह बैन लगाने की माँग की है।

खरगे का कहना है कि संघ की ये गतिविधियाँ बच्चों और युवाओं के दिमाग में नकारात्मक और विभाजनकारी विचार भर रही हैं, जो देश की एकता और संविधान के खिलाफ है। ये पत्र 4 अक्टूबर को लिखा गया था, लेकिन 12 अक्टूबर को सीएम ऑफिस ने इसे मीडिया के साथ साझा किया।

सिद्धारमैया ने तुरंत राज्य की मुख्य सचिव शालिनी राजनिश को निर्देश दिए कि इस मामले की पूरी जाँच करें और जरूरी कदम उठाएँ। इससे साफ लग रहा है कि कर्नाटक सरकार में आरएसएस के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की तैयारी चल रही है।

लेकिन ये सिर्फ एक पत्र की बात नहीं है। सोशल मीडिया पर वामपंथी, सेकुलर पार्टियाँ और कुछ इस्लामी कट्टरपंथी धड़े मिलकर आरएसएस को बैन कराने की मुहिम चला रहे हैं। एक तरफ जहाँ संघ समाज को एकजुट करने का काम कर रहा है, वहीं विपक्षी ताकतें इसे खत्म करने पर तुली हुई हैं। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।

प्रियाँक खरगे ने पत्र में क्या लिखा है और क्यों?

प्रियाँक खरगे कर्नाटक सरकार में आईटी, ग्रामीण विकास और पंचायत राज मंत्री हैं। वो चित्तापुर से विधायक भी हैं। उनके पिता मल्लिकार्जुन खरगे कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, जो खुद दलित समुदाय से आते हैं और संघ की विचारधारा के पुराने आलोचक रहे हैं। प्रियाँक ने पत्र में साफ-साफ आरोप लगाया है कि आरएसएस सरकारी स्कूलों, सहायता प्राप्त संस्थानों, खेल के मैदानों, सार्वजनिक पार्कों, धार्मिक ट्रस्टों के मंदिरों और पुरातत्व विभाग के स्थलों पर बिना अनुमति के शाखाएँ चला रही है।

खरगे ने लिखा, “आरएसएस की शाखाओं में लाठी लेकर नारे लगाए जाते हैं, जो बच्चों और युवाओं के मन में नफरत का बीज बोते हैं। ये गतिविधियाँ संविधान की मूल भावना एकता, समानता और अखंडता के खिलाफ हैं। जब समाज में नफरत फैलाने वाली ताकतें सिर उठाती हैं, तो हमें उन्हें रोकने का अधिकार है।” प्रियाँक ने आगे कहा कि देश के बच्चों, युवाओं और समाज के मानसिक स्वास्थ्य के हित में इन सभी गतिविधियों चाहे शाखा हो, संघिक हो या बैठक, इन पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।

ये माँग सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं लग रही। जुलाई 2025 में प्रियाँक ने ही एक बयान दिया था कि अगर कॉन्ग्रेस केंद्र में सत्ता में आती है, तो पूरे देश में आरएसएस पर बैन लगा देंगे। वो बोले थे, “कानूनी प्रक्रिया के तहत हम ऐसा करेंगे।” ये बयान वायरल हो गया था और बीजेपी ने इसे ‘हिंदू-विरोधी’ बताकर हमला बोला था। अब ये पत्र उसी दिशा में एक कदम लग रहा है।

आरएसएस का इतिहास: तीन बार बैन, लेकिन हर बार लौटा और मजबूत हुआ

आरएसएस की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। इसका मकसद था समाज को संगठित करना, अनुशासन सिखाना और राष्ट्रभक्ति जगाना। लेकिन स्वतंत्र भारत में इसे तीन बार बैन का सामना करना पड़ा – तीनों बार कॉन्ग्रेस की सरकारों ने ऐसा किया।

पहला बैन: 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या के बाद। नाथूराम गोडसे के आरएसएस से जुड़े होने की बात कही गई (हालाँकि बाद में जाँच में साफ हो गया कि संगठन का इससे कोई लेना-देना नहीं था)। सरदार पटेल ने 4 फरवरी 1948 को बैन लगाया। पटेल ने लिखा था कि आरएसएस की गतिविधियाँ ‘विभाजनकारी’ हैं और देश की सुरक्षा के लिए खतरा। लेकिन 18 महीने बाद 12 जुलाई 1949 को बैन हट गया।

दूसरा बैन: 1975 में इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी के दौरान। आरएसएस को ‘अवैध संगठन’ घोषित कर दिया गया। लाखों स्वयंसेवकों को जेल हुई। लेकिन इमरजेंसी खत्म होते ही 1977 में बैन हटा। इसी दौर में संघ ने भूमिगत आंदोलन चलाया, जो आजादी की लड़ाई जैसा था।

तीसरा बैन: 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद। तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल पर बैन लगाया। लेकिन ट्रिब्यूनल में कोई सबूत न मिलने पर 1993 में बैन हट गया।

इन बैनों के बावजूद आरएसएस ने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया। इसके उलट उसने देश के संकटों में हमेशा मदद की। 1962 के भारत-चीन युद्ध में स्वयंसेवकों ने बॉर्डर पर तैनाती की। 1971 के बांग्लादेश युद्ध में शरणार्थियों की मदद की। कोविड-19 में लाखों लोगों को भोजन, दवा पहुँचाई। 2024 में मोदी सरकार ने सरकारी कर्मचारियों पर 1966 से चले आ रहे आरएसएस गतिविधियों के बैन को हटा दिया। आज संघ के 1 लाख से ज्यादा शाखाएँ हैं, जो 50 हजार से ज्यादा जगहों पर चल रही हैं।

क्यों हो रही है ये मुहिम? चिढ़ की राजनीति या कुछ और?

अब सवाल ये कि आखिर ये सब क्यों हो रहा है? प्रियाँक का पत्र तो बस एक ट्रिगर है। असल में वामपंथी, कथित सेकुलर पार्टियाँ और कुछ इस्लामी कट्टरपंथी धड़े आरएसएस से चिढ़ते हैं। वजह? संघ आज उनसे कहीं बड़ा हो चुका है। 100 साल बाद भी ये संगठन समाज से कटने की बजाय और गहरा रहा है। हिंदू समाज को एकजुट कर रहा है, बिना किसी भेदभाव के। दलित, आदिवासी, पिछड़े सबको साथ लेकर चलता है।

सोशल मीडिया पर देखिए। #BanRSS जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। वामपंथी हैंडल्स जैसे CPI(M) के समर्थक लिख रहे हैं कि “आरएसएस फासीवादी है, इसे कुचलो।”

कुछ सेकुलर पेज बाबरी और गाँधी हत्या के पुराने मुद्दे गढ़ रहे हैं। PFI जैसे बैन संगठनों से जुड़े इस्लामी कट्टरपंथी ग्रुप्स चुपके से इसे बढ़ावा दे रहे हैं।

एक कथित एक्टिविस्ट संदीप ट्विटर पर लिख रहा है, “आरएसएस को बैन कराने के लिए संगठित अभियान चलाओ। सबूत जमा करो।” उसके पोस्ट्स में हजारों रीट्वीट्स हैं। ये मुहिम बिना किसी ठोस सामाजिक, राजनीतिक या कानूनी आधार के चल रही है।

कॉन्ग्रेस को खास समस्या ये है कि आरएसएस ने हमेशा सकारात्मक भूमिका निभाई। विभाजन के दौरान हिंदू शरणार्थियों की रक्षा की। प्राकृतिक आपदाओं में सबसे आगे रहता है। लेकिन विपक्षी ताकतें इसे ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का नाम देकर बदनाम करना चाहती हैं। प्रियाँक का पत्र हास्यास्पद लगता है क्योंकि अगर सरकारी जगहों पर बैन लगेगा, तो कॉन्ग्रेस की रैलियाँ, वामपंथियों की मीटिंग्स, सब पर क्या असर पड़ेगा? ये तो समाज की मूल कार्यप्रणाली के खिलाफ है।

बीजेपी ने इस पर तीखा पलटवार किया है। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा, “नेहरू, इंदिरा, सोनिया – सबने बैन लगाने की कोशिश की, सब फेल हो गए। प्रियाँक कौन होते हैं?”

कर्नाटक बीजेपी चीफ बीवाई विजयेंद्र बोले, “कॉन्ग्रेस अपनी नाकामियों से ध्यान भटकाने के लिए ये कर रही है। आरएसएस की लोकप्रियता उन्हें चुभ रही है।”

एक लड़के का सुसाइड: शोषण के आरोप और हकीकत

इस मुहिम को हवा देने के लिए एक और घटना का सहारा लिया जा रहा है। एक लड़के ने सुसाइड कर लिया और उसके सुसाइड नोट में लिखा कि आरएसएस के शिविर में शोषण हुआ था। ये खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। वामपंथी और कॉन्ग्रेस समर्थक इसे भुनाने में जुटे हैं। लेकिन जाँच में साफ हो गया कि लड़के का संघ से कोई सीधा संबंध नहीं था। ये अफवाहें फैलाई जा रही हैं ताकि संघ की छवि खराब हो। संघ के शिविर तो लाखों युवाओं को अनुशासन और सेवा का पाठ पढ़ाते हैं। ऐसे आरोप बिना सबूत के लगाना अन्याय है।

समाज से कटते विपक्षी, बढ़ता संघ का विस्तार

दरअसल, असली चिढ़ की वजह ये है कि कॉन्ग्रेस और वामपंथी समाज से कटते जा रहे हैं। उनकी रैलियाँ तो सार्वजनिक जगहों पर होती हैं, लेकिन वो समाज की जड़ों तक नहीं पहुंच पाते। जबकि आरएसएस 100 साल बाद भी बढ़ रहा है। गाँव-गाँव में शाखाएँ, सेवा कार्य, आपदा राहत, ये सब समाज को घोल-मिल रहा है। दलित एकता के कार्यक्रम जैसे समरसता संनाद चलाता है। महिलाओं के लिए संघिका शाखाएं हैं। ये सब देखकर विपक्ष जलता है।

कर्नाटक में ये मुहिम राज्य की आंतरिक कलह से भी जुड़ी लग रही। डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया के बीच सीएम पद की जंग चल रही है। महिलाओं पर अपराध बढ़ने, मातृ मृत्यु दर ऊँची होने जैसे मुद्दों पर सरकार घिरी हुई है। ऐसे में आरएसएस बैन का मुद्दा ध्यान भटकाने का हथियार बन गया। लेकिन जनता समझदार है।

बैन की धमकी, लेकिन संघ अटल

ये सब देखकर लगता है कि आरएसएस पर बैन की माँग राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है। कोई कानूनी आधार नहीं, बस चिढ़। संघ ने कभी सत्ता की भूख नहीं की, लेकिन सेवा से सबका दिल जीता। अगर कर्नाटक में बैन लगा भी, तो इतिहास गवाह है कि संघ और मजबूत लौटेगा। समाज को एकजुट करने वाला संगठन कभी खत्म नहीं हो सकता। ये मुहिम असफल होगी, जैसे पहले हुईं। जनता तय करेगी कि कौन सही है- नफरत फैलाने वाले या पूरे समाज को एकता के सूत्र में पिरोने वाले।

सपा कार्यकर्ता फरहान हुसैन के ब्रेनवॉश से कुरान और रोजा की बात करने लगी नाबालिग हिंदू, परिवार बोला- संख्या भारी होने की दी जाती धमकी: लव जिहाद-धर्मांतरण केस में FIR दर्ज

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में समाजवादी पार्टी (सपा) कार्यकर्ता मोहम्मद फरहान हुसैन ने नाबालिग हिंदू लड़की को ‘ग्रूमिंग जिहाद’ में फँसाया। फरहान ने नाबालिग को इस्लाम के प्रति इस तरह से ब्रेनवॉश किया कि वह रोजा और कुरान को मानने लग गई। यहाँ तक कि फरहान ने नाबालिग को घर से भगाने की भी पूरी साजिश रची।

नाबालिग के भाई ने लखनऊ के सादत गंज में आरोपित फरहान हुसैन और उसके अब्बा इसरार हुसैन के खिलाफ छल, शोषण, धर्मांतरण और लव जिहाद मामले में 12 अक्टूबर 2025 को शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत पर संज्ञान लेते हुए पुलिस ने संबंधित धाराओं में FIR दर्ज की है। इस FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास भी उपलब्ध है।

नाबालिग रोजे और कुरान की बातें करने लगी, फरहान ने घर में चोरी भी करवाई

पीड़िता के भाई के बयान पर दर्ज FIR में बताया गया कि साल 2023 में फरहान हुसैन ने उनकी नाबालिग बहन की मासूमियत का फायदा उठाकर झूठे प्रेम जाल में फँसाया। हुसैन ने पीड़िता का इस हद तक ब्रेनवॉश किया कि वह घर में केवल कुरान और रोजे रखने की बातें करने लगी।

शिकायत में भाई ने बताया कि उनकी नाबालिग बहन ने फरहान हुसैन के कहने पर घर से नगदी और जेवर चुराए। इसकी शिकायत जब घर के नजदीकी थाने में की तो सामने आया कि इसके पीछे फरहान का हाथ है। फरहान ने ही उनकी बहन को भगाने की साजिश के तहत उसे इस चोरी के लिए उकसाया।

इतना ही नहीं पीड़िता के भाई ने बताया कि कई बार बहन के पास से ताबीज, अँगूठी जैसी असामान्य वस्तुएँ भी मिली हैं। भाई ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि फरहान ने उसका पूरी तरीके से ब्रेनवॉश कर लिया है। अब उनकी बहन का परिवार के प्रति आक्रामक व्यवहार हो गया है और उसने दूरी बना ली है।

फरहान हुसैन ने पीड़ित परिवार को दी धमकी

मामले में दर्ज FIR के अनुसार, नाबालिग लड़की के परिवार ने पहले भी कई बार पुलिस से फरहान की शिकायत की है। इस पर फरहान ने परिवार को धमकी दी कि उसके मजहब के लोगों कि संख्या ज्यादा है इसीलिए उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा।

पीड़िता के भाई ने कहा कि फरहान हुसैन का पहले भी कई हिंदू लड़कियों से संबंध रहा है। वह उन लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाकर पैसे ऐंठ चुका है। भाई ने आरोप लगाया कि ऐसे ही फरहान उनकी बहन को भी लव जिहाद में फँसा रहा है। उन्होंने शक जताया है कि फरहान ने शारीरिक और मानसिक शोषण भी किया है।

FIR के मुताबिक, पीड़ित परिवार ने माँग की है कि फरहान हुसैन और उसके अब्बा इसरार हुसैन के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए। साथ ही नाबालिग बहन की सुरक्षा के लिए कदम उठाए जाएँ। पीड़ित परिवार ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लव जिहाद की सख्त नीति के अनुसार कार्रवाई की जाए।

पुलिस की कार्रवाई

FIR के मुताबिक, पुलिस ने फरहान हुसैन के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 49, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 351(2), उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 5(1) की धाराओं के तहत आरोपित बनाया है।

पुलिस ने मामले में आरोपित फरहान को गिरफ्तार कर लिया है।

सपा के बड़े नेताओं के साथ तस्वीरें वायरल

आरोपित फरहान हुसैन समाजवादी पार्टी (सपा) का सक्रिय कार्यकर्ता है। सपा के बड़े नेताओं के साथ उसकी तस्वीरें भी सामने आई हैं। इनमें सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी शामिल हैं।

ये तस्वीरें फरहान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर भी पोस्ट की हैं। इंस्टाग्राम पर उसकी कुछ हुक्का पीते हुए तस्वीरें भी हैं।

‘गॉड्स ऑन कंट्री’ से ‘गांजा के नए हब’ तक: केरल में 2024 में NDPS के 27700+ केस, जानें कैसे वामपंथ के गढ़ में फल-फूल रहा ड्रग्स का धंधा

जब भी ‘केरल’ का नाम सुनाई देता है तो जेहन में सबसे पहले शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र आते हैं क्योंकि वामपंथी मीडिया ने इन दोनों को हमेशा आदर्श की तरह पेश किया है। लेकिन क्या केरल वाकई एक आदर्श राज्य है? असल में सिर्फ पर्दे के पीछे ही नहीं खुले तौर पर भी केरल ड्रग्स के संकट से जूझ रहा है। शहरों से लेकर गाँवों तक राज्य का कोई कोना इस समस्या से अछूता नहीं है। ड्रग्स के कारण सैकड़ों जिंदगियाँ तबाह हो चुकी हैं और अनगिनत परिवार टूट गए हैं।

अब तक पंजाब को भारत का ‘ड्रग्स का गढ़’ माना जाता था लेकिन ताजा रिपोर्ट्स केरल की एक भयावह तस्वीर पेश करती हैं। सिर्फ साल 2024 में ही राज्य में 27,700 मादक पदार्थों से जुड़े मामले दर्ज किए गए, जो पंजाब से तीन गुना ज्यादा हैं। पंजाब में इसी अवधि में सिर्फ 9,000 के करीब केस दर्ज हुए।

आबादी के लिहाज से देखें तो केरल में हर एक लाख लोगों पर मादक पदार्थों से जुड़े 78 केस सामने आए हैं और यह दर पूरे देश में सबसे अधिक है। राज्य के सभी 14 जिले इस संकट से प्रभावित हैं। 2025 के शुरुआती दो महीनों में ही केरल में 30 हत्याएँ हुईं, जिनमें से आधी ड्रग्स से जुड़ी थीं।

राज्यसभा में 12 मार्च 2025 को पेश किए गए आँकड़े बताते हैं कि पिछले तीन सालों से एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के तहत सबसे अधिक मामले केरल में ही दर्ज हो रहे हैं। साल 2022 में 26,918 केस, 2023 में 30,715 केस और 2024 में 27,701 केस दर्ज हुए। इसकी तुलना में पंजाब में यही आँकड़े 12,423, 11,564 और 9,025 रहे। महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भी मामले इतने नहीं हैं। यह साफ इशारा करता है कि नशे से जुड़े अपराधों के मामले में केरल अब ‘हॉटस्पॉट’ पंजाब से कहीं आगे निकल चुका है।

स्रोत: गृह मंत्रालय, राज्यसभा

‘गॉड्स ओन कंट्री’ (भगवान का देश) कहे जाने वाला यह खूबसूरत राज्य आज ड्रग्स के जाल में जकड़ चुका है। पुलिस और अन्य एजेंसियाँ भले इस समस्या पर काबू पाने की कोशिश में जुटी हैं लेकिन आगे का रास्ता अंधकारमय और बेहद चुनौतीपूर्ण दिख रहा है।

‘420 कल्चर’ की चपेट में युवा पीढ़ी

सन 1971 में अमेरिका के हाई स्कूल में पढ़ने वाले 5 दोस्तों ने 4 बजकर 20 मिनट (4:20 PM) का समय अपने ‘गांजा सेशन’ के कोड के तौर पर तय किया था। आधी सदी से भी ज्यादा वक्त गुजरने के बाद यही ‘420 कल्चर’ अब दुनिया भर के युवाओं में फैल चुका है और केरल की नई पीढ़ी भी इससे अछूती नहीं रही। यहाँ के युवाओं के बीच यह ‘420 कल्चर’ अब एक तरह के ‘बगावत के प्रतीक’ के रूप में देखा जा रहा है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, केरल के युवाओं के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर ‘420‘ शब्द वाले हैशटैग और स्लैंग खुलेआम देखे जा सकते हैं। इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और फेसबुक पर ‘420’ से जुड़ी मीम्स और वीडियो यह दर्शाते हैं कि किस तरह नशे की संस्कृति को अब कूल बना दिया गया है और यह युवाओं के बीच लोकप्रिय होता जा रहा है।

फोटो क्रेडिट: इंस्टाग्राम

गांजा को अक्सर एक ‘हल्का नशा’ मान लिया जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत देखने पर समझ आता है कि यह नशे की लत को बढ़ाता ही जाता है। कई किशोर नशेड़ियों ने अधिकारियों को दिए बयानों में बताया कि उनका नशे की लत का सफर स्कूल के दिनों में दोस्तों के साथ गांजा पीने से शुरू हुआ और फिर धीरे-धीरे यह एमडीएमए (MDMA), कोकीन और मेथ जैसे खतरनाक ड्रग्स तक पहुँच गया।

प्रशासन का कहना है कि यह 420 कल्चर बच्चों का बचपन और भविष्य दोनों छीन रहा है। माता-पिता जहाँ अपने बच्चों को स्कूल और कॉलेज में सुरक्षित समझते हैं, वहीं अब यही कैंपस नशे के फैलाव के सबसे बड़े अड्डे बन चुके हैं। इडुक्की जिले में तो एक हैरान करने वाला मामला सामने आया, जब एक स्कूल टूर पर गए कुछ छात्रों ने एक्साइज विभाग के दफ्तर में जाकर ‘गांजा वाली बीड़ी’ जलाने के लिए माचिस माँगी।

कई सर्वे बताते हैं कि स्कूल के बच्चों में नशे के प्रयोग का स्तर चौंकाने वाला है। एक सरकारी अध्ययन में पाया गया कि केरल के 10वीं कक्षा के 37% और 8वीं कक्षा के करीब 23% छात्रों ने कभी न कभी कोई अवैध नशा या इनहेलेंट आजमाया है। इनमें सबसे अधिक प्रचलित गांजा ही है। स्थानीय मीडिया ने इस संकट को ‘उड़ता केरल’ नाम दिया है, ठीक उसी तरह जैसे ‘उड़ता पंजाब’ फिल्म ने पंजाब के नशे की हकीकत उजागर की थी।

अधिकतर मामलों में केरल के युवाओं की नशे की शुरुआत गांजा से होती है लेकिन अब यह आसानी से उपलब्ध भी है। राज्य की पुलिस और एक्साइज विभाग के मुताबिक, आज केरल के बाजार में ‘हाइड्रोपोनिक गांजा’ नाम की एक बेहद शक्तिशाली किस्म फैली हुई है जिसमें टीएचसी (THC) का स्तर 40% से भी अधिक होता है।

यह गांजा खेतों में नहीं बल्कि लैब में तैयार किया जाता है और अधिकतर दक्षिण-पश्चिम एशिया से तस्करी करके लाया जाता है। 2022 में ऐसे गांजे की तस्करी लगभग ना के बराबर थी, लेकिन 2024–25 में ही अधिकारियों ने 89 किलो से अधिक गांजा एयरपोर्ट्स पर पकड़ा। 2025 के शुरुआती 7 महीनों में यह जब्ती 129.7 किलो तक पहुँच गई है।

यह ‘थाई-ग्रोन’ यानी थाईलैंड में उगाया गया गांजा बेहद ताकतवर होता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत एक किलो पर एक करोड़ रुपए तक पहुँच सकती है। दिलचस्प बात यह है कि जब भारत में गांजे की एंट्री पर निगरानी बढ़ी तो तस्करों ने अपना रास्ता बदलकर मध्य-पूर्व (Middle East) के जरिए इसे भारत लाना शुरू कर दिया। ‘420 कल्चर’ भले ही गांजे को ‘कूल’ की निशानी की तरह पेश करता हो लेकिन सच्चाई यह है कि इसने केरल के युवाओं को नशे की गहरी दलदल में धकेल दिया है।

केरल ही क्यों? कहाँ हैं ड्रग्स की इस महामारी की जड़ें

केरल में नशे की समस्या कोई रातों-रात नहीं आई। इसके पीछे कई गहरे और आपस में जुड़े कारण हैं, जिन्होंने इस राज्य को नशे की लत के प्रति बेहद संवेदनशील बना दिया है। भौगोलिक स्थिति यहाँ वरदान भी है और अभिशाप भी। केरल का 590 किलोमीटर लंबा समुद्र तट अरब सागर से जुड़ा है। यह जहाँ अंतरराष्ट्रीय व्यापार को आसान बनाता है, वहीं दूसरी ओर मादक पदार्थों की तस्करी के लिए एक खुला दरवाजा भी बन गया है।

पिछले कुछ वर्षों में तस्करों ने केरल के तटवर्ती अंतरराष्ट्रीय जहाज मार्गों का खुलकर फायदा उठाया है। इसके अलावा, राज्य की नजदीकी बड़े ट्रांजिट हब्स जैसे बेंगलुरु और चेन्नई से होने के कारण यहाँ जमीन के रास्ते बनी नशे की सप्लाई चेन और भी मजबूत हो गई है।

कुछ उदाहरण देखें तो बेंगलुरु से MDMA (जिसे एक्स्टेसी या पार्टी ड्रग भी कहा जाता है) और मेथामफेटामाइन जैसे घातक ड्रग्स केरल पहुँचते हैं। वहीं, गांजा आंध्र प्रदेश और ओडिशा के पहाड़ी इलाकों से तमिलनाडु के रास्ते आता है। यह समस्या इतनी गहराई तक फैली है कि पुलिस ने पूरे राज्य में करीब 1,300 ‘ब्लैक स्पॉट्स’ चिन्हित किए हैं यानी ऐसे इलाके जहाँ से नशे की खरीद-फरोख्त होती है, इसमें शहर और गाँव दोनों इलाके शामिल हैं।

इंटरनेट का इस्तेमाल भी केरल में इस संकट को और गहराता है। नशा तस्कर अब एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और डार्क वेब के जरिए कारोबार करते हैं और भुगतान क्रिप्टोकरेंसी में लेते हैं। इससे पुलिस के लिए इन नेटवर्क्स को ट्रैक करना और भी मुश्किल हो गया है।

कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, केरल में अब नशे की होम डिलीवरी उसी तरह हो रही है जैसे पिज्जा ऑर्डर किया जाता है। बाइक पर घूमने वाले डिलीवरी एजेंट्स ग्राहकों के दरवाजे तक नशा पहुँचा रहे हैं। कई पेडलर (तस्कर) सुपरबाइक्स पर नकली नंबर प्लेट लगाकर घूमते हैं और शक से बचने के लिए खुद को ‘युवा जोड़ों’ के रूप में पेश करते हैं।

इस ‘ई-कॉमर्स स्टाइल’ नशे के धंधे ने पुलिस की नींद उड़ा दी है क्योंकि उन्हें लगातार अपनी जाँच और ट्रैकिंग तकनीक को अपडेट करना पड़ रहा है ताकि इन स्मार्ट तस्करों से निपटा जा सके।

सप्लाई चेन के अलावा, केरल के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं ने भी नशे के लिए उपजाऊ जमीन तैयार की है। फिल्मों और सोशल मीडिया पर ‘गैंगस्टर कल्चर’ और तथाकथित ‘माचो कूलनेस’ को ग्लैमरस तरीके से दिखाया जाता है। इससे कई युवा अपराधी जीवनशैली की नकल करने लगे हैं। नशे के गिरोह इस मनोविज्ञान को भाँप चुके हैं और स्थानीय गुंडे और संगठित गिरोह अब छात्रों को अपने ‘चेले’ की तरह फँसाते हैं, उन्हें छोटा पेडलर बना देते हैं। इस तरह, नेटवर्क फैलता जाता है और बड़े तस्कर खुद को सुरक्षित रखते हैं।

एक्साइज विभाग के अधिकारियों का कहना है कि तस्कर जानबूझकर स्कूल और कॉलेज के छात्रों को ही डीलर बनाते हैं, क्योंकि नाबालिगों पर पुलिस का शक कम जाता है। कोच्चि के एक पॉलीटेक्निक कॉलेज में हाल ही में पुलिस ने छापा मारा तो पाया कि कई छात्र कैंपस में गांजा बेच रहे थे। पहली बार पकड़े गए छात्रों पर मुकदमा नहीं चला लेकिन इस घटना ने यह साफ कर दिया कि नशे का नेटवर्क अब स्कूल-कॉलेजों तक पहुँच चुका है।

केरल में बेरोजगारी भी इस समस्या को बढ़ाने वाला बड़ा कारण है। राज्य में हर साल हजारों ग्रेजुएट निकलते हैं लेकिन उनके सपनों के मुकाबले अवसर बहुत कम हैं। कई युवा बिना नौकरी के खाली बैठे रहते हैं और इसी खालीपन को नशा भर देता है। धीरे-धीरे कई लोग खुद नशा बेचने लगते हैं ताकि कुछ कमाई कर सकें।

इसके अलावा, केरल से बड़ी संख्या में लोग विदेशों खासकर खाड़ी देशों में काम करने जाते हैं। उनके बच्चे यहाँ अकेले रह जाते हैं। माँ-बाप की गैरमौजूदगी में बच्चों को वही भावनात्मक सहारा और मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। ऐसे किशोर अक्सर भावनात्मक खालीपन या विद्रोह के चलते नशे की तरफ मुड़ जाते हैं।

नशे की यह समस्या केवल केरल में रहने वालों तक सीमित नहीं है बल्कि उन लोगों में भी फैल रही है जो विदेश से लौटकर आते हैं। उत्तर केरल के एक नशामुक्ति केंद्र में 28 वर्षीय युवक ने बताया कि अबू धाबी में काम करते वक्त उसके साथी मलयाली साथियों ने ही उसे ‘कल्लू’ यानी क्रिस्टल मेथ से परिचित कराया। उसकी कहानी इस नए चलन की झलक देती है, जहाँ प्रवासी जीवन, विदेशी माहौल और डिजिटल पहुँच मिलकर नशे के नए अंतरराष्ट्रीय जाल बना रहे हैं।

फैलते तस्करी मार्ग और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क

खुफिया एजेंसियों के अनुसार, भारत के कुल नशीले पदार्थों के व्यापार का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान से जुड़ी डी-कंपनी (दाऊद इब्राहिम सिंडिकेट) के नियंत्रण में है, जो परंपरागत रूप से उत्तर भारत के रास्ते ड्रग्स की सप्लाई करती थी। लेकिन अब केरल इस नेटवर्क का नया ठिकाना बन चुका है।

2024 से राज्य सरकार ने नशे के खिलाफ अपने अभियानों को तेज किया है। ‘ऑपरेशन डी-हंट’ के तहत विशेष दस्तों ने अचानक छापेमारी अभियान चलाए। बताया जाता है कि 22 फरवरी से 1 मार्च 2025 के बीच पुलिस ने 17,256 संदिग्धों की जाँच की, 2,762 एनडीपीएस (NDPS) मामले दर्ज किए और 2,854 लोगों को गिरफ्तार किया।

उसी हफ्ते के दौरान, एजेंसियों ने 1.3 किलो MDMA, 153.5 किलो गांजा, और थोड़ी मात्रा में हेरोइन व हैश ऑयल जब्त किया। इसके बाद 11 सितंबर 2025 को पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर छापेमारी की गई, जिसमें 146 गिरफ्तारियाँ और 140 नए केस दर्ज हुए। MDMA और गांजा दोनों बरामद हुए। प्रमुख कार्रवाइयों में अगस्त 2024 में हैदराबाद में एक फार्मा यूनिट के नाम पर चल रही MDMA लैब का भंडाफोड़ और सितंबर 2024 में ओडिशा में गांजा की खेती चला रहे एक केरल निवासी की गिरफ्तारी शामिल थी।

हालाँकि, गिरफ्तारियों का पैटर्न अभी भी ठीक नहीं नजर आता है है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ों के मुताबिक, 2022 में केरल में NDPS कानून के तहत हुई कुल गिरफ्तारियों में से करीब 93.7% मामले ‘निजी इस्तेमाल’ के थे। लगभग 26,600 गिरफ्तारियों में से केवल 1,660 तस्कर थे जबकि 24,959 लोग ‘कम मात्रा’ में ड्रग्स रखने वाले उपभोक्ता थे।

नशे के नेटवर्क इस कानून का फायदा उठाते हैं और वे माल को ‘व्यावसायिक मात्रा’ की सीमा से कम-कम बाँट देते हैं (जैसे 0.5 ग्राम MDMA से कम या 1 किलो गांजा से कम) ताकि गिरफ्तारी होने पर जमानत मिल सके और सजा से बचा जा सके। पुलिस अब फॉलो-अप छापों के जरिए इन छोटी मात्राओं को जोड़कर बड़े केस तैयार कर रही है और सरकार से ‘कम मात्रा’ की परिभाषा पर पुनर्विचार की माँग कर रही है।

नाबालिगों और पहली बार पकड़े गए लोगों के मामलों में अधिकारियों के पास कुछ विवेकाधिकार भी होता है। उदाहरण के लिए, 2023 में कोच्चि के एक हॉस्टल में कुछ छात्रों को थोड़ी मात्रा में ड्रग्स के साथ पकड़ा गया था। पुलिस ने उन पर केस दर्ज नहीं किया बल्कि निगरानी में रखा। रिपोर्टों के अनुसार, राज्य में हर साल हजारों लोगों को NDPS के तहत सजाएँ दी जाती हैं लेकिन इनमें अधिकतर छोटे विक्रेता और उपभोक्ता ही होते हैं।

सकारात्मक बात यह है कि समाज और धार्मिक संगठन भी अब इस संकट से निपटने के लिए आगे आ रहे हैं। नशामुक्ति केंद्रों में अब तक एक लाख से अधिक बाह्य रोगी (OPD) और हजारों भर्ती मरीजों का इलाज किया जा चुका है। यह एक अच्छी शुरुआत है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि राज्य में नशे की समस्या नियंत्रण में आ रही है।

संकट से समाधान की ओर: क्या है आगे का रास्ता?

इसमें कोई संदेह नहीं कि केरल की नशे की समस्या से निपटने के लिए केवल पुलिसिया कार्रवाई काफी नहीं है। विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं की राय भी यही है कि अब एक सामूहिक प्रयास की जरूरत है। इसका मुख्य उद्देश्य रोकथाम और जागरूकता पर होना चाहिए।

क्योंकि अब स्कूल और कॉलेज नशा तस्करों के निशाने पर हैं, इसलिए शैक्षणिक संस्थानों में संगठित नशा-रोधी शिक्षा कार्यक्रम और छात्रों द्वारा संचालित ‘पीयर-एजुकेशन’ मॉडल जरूरी हैं ताकि बच्चे खुद जागरूक होकर साथियों को बचा सकें।

सोशल मीडिया भी युवाओं को नशे से दूर रखने में एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। राज्य में अब शिक्षकों और अभिभावकों को प्रशिक्षित किया जा रहा है ताकि वे नशे की लत के शुरुआती संकेत पहचान सकें। यह शुरुआती रोकथाम किसी भी तरह की लत को बढ़ने से रोकने में मदद करती है।

राज्य सरकार ने स्कूलों में ‘रैंडम ड्रग टेस्टिंग’ का प्रस्ताव भी रखा है। यह भले विवादित हो लेकिन यह दिखाता है कि अब खुद सरकार भी मानती है कि नशा शिक्षा संस्थानों के भीतर तक घुस चुका है।

प्रवर्तन एजेंसियाँ अब खासकर MDMA और मेथामफेटामाइन जैसे सिंथेटिक ड्रग्स और बड़े सप्लाई नेटवर्क पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। हालाँकि, हैरानी की बात यह है कि 590 किलोमीटर लंबे तट की निगरानी के लिए फिलहाल सिर्फ एक कोस्ट गार्ड पोत ही उपलब्ध है। राज्य अब स्कैनर, ड्रोन और साइबर मॉनिटरिंग सिस्टम में निवेश कर रहा है ताकि तस्करी और डार्कनेट पर हो रही डील्स पर नजर रखी जा सके।

चिंता की बात यह है कि राज्य में नशामुक्ति की क्षमता माँग के अनुपात में बहुत कम है। सरकारी और निजी साझेदारी के तहत अब तक करीब 1.47 लाख लोगों का इलाज हुआ है लेकिन मानसिक स्वास्थ्य सहायता और पुनर्वास की व्यवस्था अभी भी कमजोर है।

जब तक रोकथाम, शिक्षा और सामाजिक हस्तक्षेप की गति गिरफ्तारियों से तेज नहीं होती, तब तक ‘नशामुक्त केरल’ का सपना सिर्फ एक नारा बनकर रह जाएगा कहीं कोई हकीकत नहीं होगी।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़े सकते हैं।)

क्या है महर्षि वाल्मीकि को ‘डाकू’ बताने वाली लोककथा, जिसके कारण अंजना ओम कश्यप पर हुई FIR: जानिए कैसे अलग-अलग थे ‘रत्नाकर’ और ‘अग्निशर्मा’

पंजाब के लुधियाना में इन दिनों एक टीवी डिबेट को लेकर खासी हलचल मची हुई है। मशहूर न्यूज चैनल आज तक की एंकर अंजना ओम कश्यप पर महर्षि वाल्मीकि को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगा है। वाल्मीकि समाज के एक संगठन ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने एफआईआर ठोक दी।

यह मामला न सिर्फ मीडिया की जिम्मेदारी पर सवाल खड़े कर रहा है, बल्कि सदियों पुरानी एक लोककथा को भी फिर से उछाल रहा है। क्या वाकई महर्षि वाल्मीकि पहले डाकू थे? या यह सिर्फ एक काल्पनिक कहानी है? आइए पहले इस ताजा विवाद को समझते हैं, फिर उस लोककथा की गहराई में उतरते हैं जो आज भी बहस का विषय बनी हुई है।

कैसे शुरू हुआ महर्षि वाल्मीकि को लेकर विवाद

यह मामला 7 अक्टूबर 2025 को शुरू हुआ। अंजना ओम कश्यप अपने पॉपुलर शो ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में एक डिबेट कर रही थीं। बहस का मुद्दा था पवित्रता और परिवर्तन। एंकर ने उदाहरण के तौर पर महर्षि वाल्मीकि की प्रचलित कहानी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वाल्मीकि जी का पुराना नाम रत्नाकर था, जो एक डाकू हुआ करते थे। वे लोगों को लूटते थे, लेकिन नारद मुनि से मिलने के बाद उनका जीवन बदल गया।

एक पल की चेतना ने उन्हें राम भक्त बना दिया और वे रामायण के रचयिता बने। अंजना ने इसे सकारात्मक बताया कि कोई भी इंसान बदल सकता है, चाहे वह कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो। लेकिन यह बात वाल्मीकि समाज को चुभ गई। संगठन का कहना है कि महर्षि वाल्मीकि को डाकू बताना उनका अपमान है। वे तो आदिकवि हैं, ब्रह्मा के पौत्र, जिन्होंने रामायण लिखी। इस तरह की बातें समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाती हैं।

यशपाल ने एफआईआर की माँग की, वरना यह राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन बन सकता है। संगठन के प्रमुख संयोजक विजय दानव आम आदमी पार्टी के नेता और पंजाब सरकार के दलित विकास बोर्ड के चेयरमैन भी हैं। उन्होंने कहा, “वाल्मीकि जी हमारे भगवान हैं। उनकी कहानी को तोड़-मरोड़कर पेश करना बर्दाश्त नहीं। अंजना ओम कश्यप की तत्काल गिरफ्तारी हो और वे सार्वजनिक माफी माँगें।”

लुधियाना में तो समाज के लोगों ने सड़कों पर उतरकर विरोध जताया। अंजना की फोटो पर जूते-चप्पल फेंके गए, जूतों की माला पहनाई गई। कम से कम 13 दलित और एससी संगठनों ने भी शिकायत की। पुलिस ने कानूनी सलाह के बाद एफआईआर दर्ज की। इसमें भारतीय न्याय संहिता की धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का इरादा) और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(v) (समुदाय के सम्मानित व्यक्ति का अपमान) लगाई गई।

जाँच डीएसपी रैंक के अधिकारी को सौंपी गई है और फाइल पुलिस कमिश्नर के पास भेज दी गई। कमिश्नर स्वापन शर्मा ने कहा, “हमने लीगल ओपिनियन लिया। जाँच चल रही है।”

एफआईआर में अंजना के अलावा ग्रुप चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरून पुरी और कंपनी लिविंग मीडिया इंडिया लिमिटेड का नाम भी जोड़ा गया है।

यह विवाद मीडिया फ्रीडम और कम्युनिटी सेंसिटिविटी के बीच की लाइन को धुँधला कर रहा है। एक तरफ अभिव्यक्ति की आजादी, दूसरी तरफ धार्मिक आस्था। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने 2022 में एक इसी तरह के केस में एफआईआर रद्द कर दी थी, जहाँ किसी ने वाल्मीकि को डाकू कहा था। कोर्ट ने कहा था कि महापुरुष इंसान से देवता बने, यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन यहाँ मामला एससी/एसटी एक्ट का है, तो केस आगे बढ़ रहा है।

कहाँ से आई वो कहानी, जो अंजना ने सुनाई

अब सवाल यह है कि अंजना ने जो कहानी सुनाई, वह कहाँ से आई? यह कोई नई बात नहीं। यह सदियों पुरानी लोककथा है, जो वाल्मीकि जयंती पर हर साल सुनाई जाती है। लेकिन विद्वान कहते हैं कि यह कथा रामायण के मूल ग्रंथ से मेल नहीं खाती। महर्षि वाल्मीकि को डाकू बताने वाली यह कहानी आठवीं शताब्दी के बाद प्रचलित हुई। और इसमें रत्नाकर और अग्निशर्मा जैसे नाम अलग-अलग हैं।

आइए इस लोककथा को विस्तार से समझें, उसके प्रमाण देखें और जानें कि यह कैसे बनी, कैसे फैली। यह कथा न सिर्फ मनोरंजक है, बल्कि हमें हमारी सांस्कृतिक विरासत की गहराई दिखाती है।

लोककथाओं की दुनिया में वाल्मीकि जी की कहानी सबसे प्रेरणादायक मानी जाती है। रामायण तो हर घर में है – राम-सीता की कथा, रावण वध, लंका दहन। लेकिन इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि के बारे में जो प्रचलित कथा है, वह कहती है कि वे पहले एक क्रूर डाकू थे। उनका नाम रत्नाकर था। जंगल में रहते थे, राहगीरों को लूटते, मारते-काटते। परिवार के लिए यह सब करते। लेकिन एक दिन भगवान की कृपा हुई और वे ऋषि बने।

यह कहानी स्कूलों में पढ़ाई जाती है, टीवी पर दिखाई जाती है, रामलीला में गाई जाती है। लेकिन क्या यह सच्ची है? विद्वान कहते हैं- नहीं, ये सही बात नहीं है। बल्कि यह एक लोकप्रिय कथा है, जो पुराणों में बाद में जोड़ी गई। असली वाल्मीकि तो ब्राह्मण कुल में जन्मे, ब्रह्मा के पौत्र थे। उन्होंने कभी पाप नहीं किया।

रामायण से समझें महर्षि वाल्मीकि के बारे में

सबसे पहले समझिए कि रामायण क्या है। वाल्मीकि रामायण संस्कृत का पहला महाकाव्य है, आदिकाव्य। इसमें सात कांड हैं – बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा, सुंदर, युद्ध और उत्तर। वाल्मीकि ने खुद लिखा कि वे प्रचेता मुनि के दसवें पुत्र हैं। उत्तरकांड में राम दरबार में वे कहते हैं – “हे राम! मैं प्रचेता का पुत्र हूँ। मनसा, कर्मणा, वाचा – कभी पाप नहीं किया। भूतपूर्वं न किल्विषम्।” मतलब, पहले कभी कोई दोष नहीं।

प्रचेता ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। तो वाल्मीकि ब्रह्मा के पौत्र। वे जन्म से ही ज्ञानी, ब्राह्मण। तमसा नदी के तट पर उन्होंने रामायण रची। एक क्रौंच पक्षी को शिकारी मारते देख दुख से ‘मरा’ शब्द निकला, जो संस्कृत में शोक है। ब्रह्मा ने कहा – इसी से काव्य रचो। लेकिन डाकू वाली कथा? रामायण में इसका जिक्र ही नहीं।

कहाँ से आई महर्षि वाल्मीकि के डाकू होने वाली बात?

अब आती है डाकू वाली कथा। यह सबसे ज्यादा ‘स्कंद पुराण’ में मिलती है, जो आठवीं शताब्दी के आसपास लिखा गया। पुराणों में समय-समय पर जोड़तोड़ होती रही। दलित साहित्य के विद्वान ओमप्रकाश वाल्मीकि अपनी किताब ‘सफाई देवता‘ में कहते हैं – यह कथा तार्किक नहीं है। छठी शताब्दी से पहले के किसी ग्रंथ में वाल्मीकि को डाकू नहीं कहा। वे एक क्रांतिकारी ऋषि थे।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी माना – वाल्मीकि डाकू नहीं थे। डॉ. मंजुला सहदेव के शोध में भी यही मिला। लीलाधर शर्मा ‘पर्वतीय’ की ‘भारतीय संस्कृति कोष‘ में लिखा – वाल्मीकि के भाई ऋषि भृगु थे। दोनों ज्ञानी। डाकू वाला वाल्मीकि अलग था। कुछ कथाओं में तो अंगुलिमाल (बुद्ध काल का डाकू) को भी वाल्मीकि बता दिया जाता है। कुल मिलाकर देखें तो महर्षि वाल्मीकि से जुड़ी लोक कहानियों में हेरफेर बहुत हुआ है।

महर्षि वाल्मीकि के अग्निशर्मा डाकू होने वाली प्रचलित कहानी कौन सी है?

प्रचलित कथा क्या कहती है? एक वर्जन में वाल्मीकि का नाम अग्निशर्मा था। वे ब्राह्मण थे, लेकिन परिवार का पेट पालने कोशिश में जंगल चले गए। अकाल पड़ा, परिवार भूखा। वहाँ डाकुओं की संगत लगी। अग्निशर्मा लूटने लगे। एक दिन सप्तर्षि गुजरे। उन्होंने रोका। अत्रि मुनि ने पूछा – परिवार के लिए लूटते हो, क्या वे तुम्हारे पाप में साथ देंगे? अग्निशर्मा घर गए। सबने मना कर दिया। अग्निशर्मा टूट गए। वापस ऋषियों के पास पहुँते।

ऋषियों ने उन्हें ‘राम’ मंत्र दिया। लेकिन अग्निशर्मा उल्टा बोलते थे, तो ‘मरा-मरा’ जपने को कहा। उन्होंने भीषण तपस्या की। इस दौरान दीमकों ने उनका शरीर ढक लिया। इसे संस्कृत में वल्मीक कहते हैं। ऐसे में ऋषियों ने उनका नाम रखा- वाल्मीकि। उन्होंने शिव की भक्ति की और फिर रामायण रची। यह कथा ‘भक्तमाल’ में है, जो 1585 में नाभादास ने लिखी थी। इसमें 200 भक्तों की कहानियाँ हैं।

रत्नाकर डाकू से जुड़ी कहानी भी जाननी जरूरी

दूसरा वर्जन है उनके रत्नाकर नाम को लेकर। जिसमें एक भीलनी ने बचपन में उनका अपहरण कर लिया। वो भील परिवार में पले-बढ़े। यहाँ वो डाकू बने, जिनके नारद मुनि मिले। उन्होंने नारद मुनि को लूटना चाहा। हालाँकि नारद मुनि ने उन्हें राम जप के लिए तैयार किया। लेकिन रत्नाकर अनपढ़ थे। वो राम नहीं बोल पाए। ऐसे में उन्होंने मरा-मरा का जाप किया, जो राम में बदल गया।

आगे की कहानी में फिर से दीमकों का घेरा है। ब्रह्मा जी के प्रसन्न होने की कहानी है और वाल्मीकि नाम पड़ने की। यह कथा रामचरितमानस में तुलसीदास ने छुआ – “उल्टा नाम जपत जग जाना, बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।” लेकिन तुलसी 16वीं शताब्दी के हैं। मूल रामायण से बहुत बाद। अध्यात्म रामायण, कृतिवास रामायण में भी ऐसी कहानियां हैं। लेकिन ये बाद की हैं। वैशाख नाम के ब्राह्मण की कथा भी मिलती – जिसमें वो पापी बने और फिर तप से वाल्मीकि। श्रीभागवतानंद गुरु की किताब ‘उत्तरकाण्ड प्रसंग एवं संन्यासाधिकार विमर्श‘ में इसकी चर्चा विस्तार से है।

यह कथा कबसे प्रचलित कही जाती है। करीब आठवीं शताब्दी से, जो स्कंद पुराण में विकसित रूप में है। तैत्तिरीय संहिता में वाल्मीकि का जिक्र तीन बार हुआ है, लेकिन कवि के रूप में। महाभारत में भी कवि का ही उल्लेख है। ओमप्रकाश कहते है कि वाल्मीकि नाम तो प्रचलित है, रत्नाकर की कहानी भी, लेकिन डाकू अलग थे।

ये कथा 8वीं सदी के बाद फैली क्योंकि पुराणों में जोड़े गए। रत्नाकर शायद कोई लोक नायक था, जो बाद में वाल्मीकि से जोड़ दिया गया। अग्निशर्मा ब्राह्मण कुल का था, डाकू संगत में फँस गया। दोनों अलग लेकिन कथाएँ मिला दी गईं। आज टीवी पर ये दिखाना आसान है, जो भावनाओं को ठेस पहुँचा सकता है। अंजना का शो इसी कथा पर था, जो एडिट होकर वायरल हुई।

महर्षि वाल्मीकि की पूजा मंदिरों में होती है। देश ही नहीं, विदेशों में भी। पंजाब समेत उत्तर भारत में महर्षि के अनगिनत मंदिर हैं, जहाँ उन्हें पूजा जाता है। बहरहाल, वाल्मीकि जयंती पर ये विवाद और गहरा गया। समाज आंदोलन की तैयारी में है। ये बहस लंबी चलेगी। फिलहाल जाँच चल रही है। अब देखना ये है कि इस पूरे विवाद पर कोर्ट क्या कहता है।

क्या है IRCTC घोटाला, जिसमें लालू यादव-राबड़ी देवी-तेजस्वी यादव को कोर्ट ने बनाया ‘आरोपित’: किन धाराओं में चलेगा ट्रायल, जानिए सब कुछ

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने IRCTC घोटाले में लालू यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव को आरोपित माना है। अब कोर्ट में मामले का ट्रायल चलेगा। आरोपित मानते हुए कोर्ट ने कहा कि घोटाले की साजिश लालू यादव के नेतृत्व में रची गई है। कोर्ट ने यह भी माना कि घोटाले से लालू परिवार को काफी फायदा पहुँचा है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने लालू यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार, आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के आरोप तय किए हैं। इसके अलावा लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी पर साजिश और धोखाधड़ी समेत कई आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों के तहत ही अब कोर्ट में तीनों पर ट्रायल चलेगा।

कोर्ट ने लालू यादव पर IPC 420, IPC 120B, प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 13(2) और 13 (1)(d) की धाराओं के तहत आरोप तय किए हैं। वहीं राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव को धारा 120 बी और IPC 420 में आरोपित माना है। अगर तीनों के खिलाफ इन धाराओं में आरोप कोर्ट में सिद्ध हो जाते हैं तो 7 साल तक की सजा होगी।

सोमवार (13 अक्टूबर 2025) को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में हुई सुनवाई में लालू यादव व्हील चेयर से पहुँचे। उनके साथ तेजस्वी यादव और राबड़ी देवी भी कोर्ट पहुँचे थे। उन्होंने इन आरोपों को निराधार बताया। वहीं कोर्ट ने लालू परिवार से जुड़े लैंड फॉर जॉब्स मामले में फैसले को टालकर अगली सुनवाई की तारीख 10 नवंबर 2025 तय की है।

क्या है IRCTC घोटाला?

IRCTC घोटाला तब का है, जब लालू यादव साल 2004 से 2009 के बीच भारत के रेल मंत्री थे। रेल मंत्री रहते हुए लालू यादव ने रेल मंत्रालय के अधीन IRCTC के दो होटल- राँची का BNR होटल और ओडिशा के पुरी होटल के रखरखाव और सुधार के ठेकों के आवंटन में भ्रष्टाचार किया।

लालू यादव ने इन ठेकों को अपनी पत्नी राबड़ी देवी के स्वामित्व वाली कंपनी सुजाता होटल्स प्राइवेट लिमिटेड को अनुचित रूप से दिलवाया। इसके बदले में कंपनी ने लालू यादव के परिवार को फायदा पहुँचाया। ठेकों में IRCTC के पूर्व ग्रुप जनरल मैनेजर वीके अस्थाना, आरके गोयल और सुजाता होटल्स के निदेशक रहे विजय कोचर और विनय कोचर भी आरोपित हैं। CBI ने मामले में कुल 14 लोगों को आरोपित बनाया।

CBI का आरोपपत्र

IRCTC घोटाले की जाँच CBI के हाथों में है। CBI ने 14 लोगों को मामले में आरोपित बनाया है, जिन्हें अब कोर्ट ने भी आरोपित मान लिया है। मामले में CBI ने कोर्ट में जो आरोपपत्र दाखिल किया है। उसमें कहा गया कि ठेके पर जिस कंपनी को जमीन दी गई है, उसने निविदा प्रक्रिया में धाँधली और हेराफेरी के आरोप लगाए हैं और निजी संस्था सुजाता होटल्स की मदद के लिए शर्तों में फेरबदल किया गया है।