हाल में इलाहाबाद कोर्ट की एक टिप्पणी पर मीडिया में जमकर खबरें चल रही हैं। हेडलाइन दी जा रही है कि कोर्ट ने कहा है कि वॉट्सऐप पर भेजे गए ‘अनकहे शब्द’ भी नफरत फैला सकते हैं। कई जगह इस हेडलाइन को ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे अदालत किसी के चुप रहने को भी दोषी बता रहा है, जबकि हकीकत यह है कि यह पूरा मामला लव जिहाद से जुड़ा है।
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी बिजनौर से जुड़े एक केस में की है जहाँ एक मुस्लिम युवक अफाक अहमद ने अपने खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की याचिका दाखिल की थी। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए ये जरूर कहा है,
“वॉट्सऐप पर भेजा गया कोई संदेश भले ही सीधे तौर पर धर्म का जिक्र न करे, लेकिन अगर उसमें अनकहे शब्दों और संकेतों के जरिए किसी समुदाय के खिलाफ नफरत, वैमनस्य या दुर्भावना फैलाने का भाव है, तो वह भी अपराध की श्रेणी में आएगा।”
लेकिन कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा? इसे जानिए।
पूरा मामला दरअसल लव जिहाद और जबरन धर्म परिवर्तन से जुड़ा है। अफाक अहमद का भाई आरिफ अहमद फिलहाल जेल में है। उस पर आरोप है कि उसने एक हिंदू युवती से संबंध बनाकर उसे धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने की कोशिश की और उसे दुबई ले जाने की योजना थी।
यह शिकायत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कार्यकर्ता संदीप कौशिक ने दर्ज कराई थी। शुरुआती तौर पर मामूली धाराओं में दर्ज FIR बाद में गंभीर धाराओं में तब्दील कर दी गई, जिसमें बलात्कार, धोखाधड़ी, जहर देना, फर्जीवाड़ा, और धर्म परिवर्तन अधिनियम, 2021 के तहत अपराध शामिल हैं।
इसी गिरफ्तारी के बाद अफाक अहमद ने अपने परिचितों को एक वॉट्सऐप मैसेज भेजा। उसने लिखा कि उसके भाई को राजनीतिक दबाव में झूठे मामले में फँसाया गया है और उसके परिवार के बहिष्कार की बाट कही जा रही है। उसने यह भी लिखा कि “उसे डर है कि कहीं भीड़ उसे मार न दे” लेकिन साथ ही उसने अदालत और न्याय व्यवस्था पर भरोसा जताया।
यह संदेश देखने में साधारण लगा पर अदालत ने इसे बहुत गंभीरता से लिया। जस्टिस जे जे मुनिर और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने कहा कि “संदेश के शब्द सीधे तौर पर धर्म का उल्लेख नहीं करते, लेकिन उसमें जो अनकहा संदेश है, वह साफ तौर पर यह धारणा देता है कि आरोपित का भाई मुसलमान होने की वजह से निशाना बनाया गया है।” अदालत ने कहा “यह वही ‘unsaid words’ हैं जो किसी खास समुदाय की धार्मिक भावनाएँ भड़का सकते हैं और दो समुदायों के बीच दुश्मनी, घृणा और अविश्वास का माहौल पैदा कर सकते हैं।”
कोर्ट ने साफ कहा कि भले ही यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353(3) (धार्मिक स्थल पर अपराध) के अंतर्गत न आता हो, लेकिन धारा 353(2) के तहत यह अपराध बनता है क्योंकि यह संदेश नफरत फैलाने की क्षमता रखता है। अदालत ने कहा कि “यह मामला केवल एक व्यक्ति की निजी पीड़ा का नहीं है, बल्कि यह समाज के साम्प्रदायिक ताने-बाने को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।”
इसलिए कोर्ट ने अफाक अहमद की याचिका को खारिज करते हुए कहा, “मामला जाँच के योग्य है और इसे शुरुआती चरण में रोका नहीं जा सकता।”
यह पहला मौका नहीं है जब किसी मुस्लिम परिवार पर लव जिहाद के आरोपों के बाद ऐसे विवाद खड़े हुए हों। अदालत ने इस बार यह स्पष्ट किया कि धार्मिक पहचान के नाम पर खुद को पीड़ित बताने वाले बयान भी अप्रत्यक्ष रूप से नफरत फैलाने का जरिया बन सकते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि अफाक के परिवार पर एक नहीं बल्कि तीन-तीन FIR दर्ज हो चुकी हैं, एक उसके भाई आरिफ पर, दूसरी खुद अफाक पर और तीसरी उनके चाचा सादिक पर, जिन्होंने स्थानीय चैनल पर बयान दिया था कि “उसके भतीजे को फँसाया गया है।”
RSS कार्यकर्ता संदीप कौशिक, जिन्होंने सबसे पहले शिकायत दर्ज कराई थी, उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस से कहा की “लड़की का परिवार डर के साये में था। मैंने एक जिम्मेदार नागरिक की तरह पुलिस में रिपोर्ट की। यह समाज की सुरक्षा का मामला था।”
बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव को महागठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा (CM Face) घोषित किया जाना केवल एक चुनावी घोषणा भर नहीं है, यह बिहार की सत्ता की पुरानी कहानियों को फिर से जिंदा करने जैसा है। सवाल यह है कि क्या तेजस्वी वाकई नए बिहार की तस्वीर हैं या फिर अपने पिता लालू प्रसाद यादव के दौर की ‘जंगल राज’ वाली छवि के वारिस बनकर ही रहेंगे?
लालू की विरासत और परिवारवाद का बोझ
तेजस्वी यादव ऐसे परिवार से आते हैं जिसने बिहार की राजनीति को दशकों तक अपने कब्जे में रखा। लालू प्रसाद यादव, जिनका नाम कभी ‘गरीबों का मसीहा’ तो कभी ‘घोटालों का बादशाह’ कहा गया, वही तेजस्वी के पिता हैं। लालू के राज में बिहार ने जैसा विकास देखा, उसकी गवाही आज भी टूटी सड़कें और बेरोजगारी देती हैं।
अब तेजस्वी उसी विरासत के साथ मैदान में हैं। पर सवाल यह है, क्या वे उस छवि को मिटाकर अपनी पहचान बना पाएँगे? या फिर वही परिवारवाद की राजनीति जारी रखेंगे, जहाँ कुर्सी का रास्ता सिर्फ खानदान से होकर जाता है?
लोग आज भी याद करते हैं कि लालू के दौर में भ्रष्टाचार, जातिवाद और गुंडागर्दी किस हद तक बढ़ी थी। ऐसे में तेजस्वी जब कहते हैं कि वे नया बिहार लाएँगे, तो जनता पूछती है, “भैया, पहले पुराना तो साफ कर लो।”
वादे बड़े- बड़े पर जमीन खाली
तेजस्वी यादव हर चुनाव में 10 लाख सरकारी नौकरियों का वादा करते हैं। पर जब उनसे पूछा जाता है कि ये नौकरियाँ कहाँ से आएँगी, तो जवाब मिलता है, हम दिखाएँगे।
दरअसल, बिहार के मतदाता अब भाषणों से ज्यादा हिसाब चाहते हैं। तेजस्वी ने जब उपमुख्यमंत्री रहते हुए कोई बड़ी नीति लागू नहीं की, तो लोग सोचने लगे कि अगर आधी कुर्सी पर ये हाल है, तो पूरी कुर्सी पर क्या होगा?
फिर भी, तेजस्वी खुद की तुलना स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग से कर डालते हैं, वो भी तब जब उन्होंने खुद 9वीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है! सोशल मीडिया पर लोग बोले- “जॉब्स ने आईफोन बनाया, आपने क्या बनाया – बस भाषण?” ऐसे इनोवेटिव दावों से बिहार में तो हंसी का माहौल बन गया, लेकिन राजनीति में यह ओवरकॉन्फिडेंस अक्सर नुकसानदायक साबित होता है।
महागठबंधन का फेस पर भरोसे की कमी
महागठबंधन ने तेजस्वी को CM उम्मीदवार बनाकर साफ कर दिया है कि अब यह चुनाव ‘लालू परिवार बनाम बाकी सब’ होने वाला है। पर अंदरखाने में सब ठीक नहीं है, कॉन्ग्रेस नाराज है, पप्पू यादव खुलेआम कह रहे हैं कि वोट तो राहुल गाँधी के चेहरे पर पड़ेगा, तेजस्वी पर नहीं।
जब गठबंधन के साथी ही भरोसा न करें, तो जनता क्या करेगी?
उधर, बीजेपी और एनडीए तेजस्वी को भ्रष्टाचार का चेहरा बताकर घेर रही है। चारा घोटाला, भूमि के बदले नौकरी घोटाला और अब ‘माई-बहन योजना’ में धोखाधड़ी, ये सारे पुराने आरोप फिर से गूँज रहे हैं। यानी तेजस्वी का नया बिहार वाला दावा, पुराने आरोपों के कीचड़ में बार-बार फँस जाता है।
तेजस्वी यादव अब महागठबंधन का चेहरा हैं और बिहार की जनता उन्हें गंभीरता से देख रही है। पर समस्या यह है कि तेजस्वी की राजनीति वादों और ट्वीट्स तक सीमित लगती है। जमीनी स्तर पर कोई बड़ा परिवर्तन नहीं दिखता।
अगर तेजस्वी को वाकई बिहार बदलना है, तो उन्हें यह साबित करना होगा कि वे केवल लालू के बेटे नहीं एक सक्षम प्रशासक हैं। फिर चाहे वह नौकरी देने का वादा हो, निवेश लाने का या अपराध पर नियंत्रण का। अब जनता को आंकड़े चाहिए भावनाएँ नहीं।
चेहरा नया, तरीका पुराना
तेजस्वी यादव का मुख्यमंत्री चेहरा बनना महागठबंधन के लिए एक राजनीतिक जुआ है। अगर उन्होंने वाकई अपने पिता की ‘जंगल राज’ वाली छवि को पीछे छोड़ दिया और सुशासन की नई परिभाषा दी, तो वे बिहार के इतिहास में अलग जगह बना सकते हैं।
पर अगर वही पुराने आरोप, वही परिवारवाद और वही वादों की राजनीति जारी रही तो जनता कहेगी, “नाम बदल गया, पर नजरिया वही रहा, लालू 2.0 बस नए पैकिंग में।”
अंत में मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा कि बिहार की जनता अब परिपक्व है। उसे ‘परिवार का चेहरा’ नहीं, ‘काम का चेहरा’ चाहिए। तेजस्वी यादव चाहे कितने भी पोस्टर लगवा लें, पर अगर नतीजे वही पुराने रहे, तो महागठबंधन का CM फेस चुनाव के बाद सिर्फ सेल्फी फेस बनकर रह जाएगा।
दिल्ली की प्रदूषित हवा से राहत दिलाने के लिए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। उनकी पहल पर राजधानी में पहली बार आर्टिफिशियल बारिश (Artificial Rain) कराने की तैयारी पूरी हो चुकी है। मौसम विभाग के मुताबिक, 28 से 30 अक्टूबर के बीच दिल्ली-एनसीआर में पर्याप्त बादल छाने की संभावना है और 29 अक्तूबर 2025 को दिल्ली वासी पहली आर्टिफिशियल बारिश का अनुभव करेंगे।
दिलचस्प बात यह है कि ऐसा प्रयास पहले आम आदमी पार्टी सरकार ने भी करने की घोषणा की थी, लेकिन तकनीकी और मंजूरी के कारण वह इसे पूरा नहीं कर सकी थी। अब रेखा गुप्ता सरकार ने उस अधूरे वादे को साकार करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इस प्रोजेक्ट की कुल लागत ₹3.21 करोड़ है, जिसे IIT कानपुर, आईएमडी (भारतीय मौसम विभाग) और दिल्ली सरकार मिलकर चला रहे हैं।
क्यों जरूरत पड़ी कृत्रिम बारिश की?
दिल्ली में हवा की गुणवत्ता हर साल गंभीर रूप से गिरती है और राजधानी में प्रदूषण बढ़ जाता है। इस बार भी सड़कों पर चल रही गाड़ियों के धुआँ, औद्योगिक फैक्ट्रियों और निर्माण कार्यों के कारण हालत और खराब हो गई है। इस वजह से साँस लेना मुश्किल हो गया है, खासकर बुजुर्गों, बच्चों और साँस से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए।
बारिश चाहे प्राकृतिक हो या आर्टिफिशियल, हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 जैसे प्रदूषक कणों को नीचे गिरा देती है। यही वजह है कि दिल्ली सरकार ने क्लाउड सीडिंग तकनीक से बारिश कराने का फैसला किया है ताकि लोगों को कुछ दिनों के लिए राहत मिल सके।
वैज्ञानिकों का कहना है कि आर्टिफिशियल बारिश के बाद प्रदूषण का स्तर लगभग 7 से 10 दिनों तक काफी हद तक कम हो जाता है। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा, “यह सिर्फ एक प्रयोग नहीं, बल्कि दिल्ली की साँसों को राहत देने का मिशन है।”
कैसे होती है कृत्रिम बारिश (क्लाउड सीडिंग प्रक्रिया)?
क्लाउड सीडिंग एक ऐसी वैज्ञानिक तकनीक है जिसमें बादलों के अंदर कुछ विशेष रासायनिक कण छोड़े जाते हैं ताकि उनमें मौजूद नमी एक-दूसरे से जुड़कर पानी की बूँदों में बदल जाए और बारिश हो सके। यह प्रक्रिया प्राकृतिक बारिश की तरह ही होती है, फर्क बस इतना है कि इसे तकनीकी रूप से तेज किया जाता है।
इसमें इस्तेमाल होने वाले मुख्य रसायन हैं-
सिल्वर आयोडाइड (AgI)
ड्राई आइस (ठोस कार्बन डाइऑक्साइड)
सोडियम क्लोराइड (नमक)
कैल्शियम क्लोराइड और मैग्नीशियम
इन रसायनों को हवाई जहाज, ड्रोन या रॉकेट की मदद से बादलों में छोड़ा जाता है। दिल्ली के इस प्रोजेक्ट में सेसना विमान का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो मेरठ, खेकड़ा, बुराड़ी, सादकपुर, भोजपुर और अलीगढ़ के ऊपर से उड़ान भरेगा।
प्रत्येक विमान में 8 से 10 केमिकल पैकेट होंगे जिन्हें बटन दबाकर छोड़ा जाएगा। एक उड़ान लगभग 90 मिनट की होगी। हालांकि यह तभी संभव है जब आसमान में पर्याप्त बादल मौजूद हों। बिना नमी के बारिश कराना संभव नहीं होता।
दुनिया में पहली बार कब और कहाँ हुई थी आर्टिफिशियल बारिश?
आर्टिफिशियल बारिश का इतिहास करीब 80 साल पुराना है। सबसे पहले 13 नवंबर 1946 को अमेरिका में वैज्ञानिक डॉ विंसेंट शेफर्ड ने यह कारनामा किया था। उन्होंने एक प्लेन से ड्राई आइस बादलों पर फेंकी, जिससे भारी बर्फबारी और बारिश शुरू हो गई। इसके बाद डॉ बेरहार्ड फॉनगुड ने सिल्वर आयोडाइड का उपयोग करके क्लाउड सीडिंग को और विकसित किया।
आज के समय में यह तकनीक कई देशों में सफलतापूर्वक अपनाई जा चुकी है। जहाँ चीन ने 2008 के बीजिंग ओलंपिक के दौरान मौसम को नियंत्रित करने के लिए क्लाउड सीडिंग तकनीक का इस्तेमाल किया था, ताकि खेलों के दौरान बारिश न हो और आयोजन सुचारू रूप से संपन्न हो सके।
वहीं, दुबई में हर साल गर्मी के मौसम में आर्टिफिशियल बारिश कराई जाती है, ताकि तापमान में कमी लाई जा सके और सूखे की स्थिति से राहत मिले। फ्रांस में भी इस तकनीक का उपयोग निजी स्तर पर किया जाता है।
वहाँ कई कंपनियाँ शादियों या बड़े आयोजनों के दौरान बारिश रोकने के लिए क्लाउड सीडिंग करवाती हैं। इसकी लागत करीब 1 करोड़ रुपए तक होती है, जो इस सेवा की बढ़ती लोकप्रियता और उपयोगिता को दर्शाता है।
भारत में कब और कहाँ हुई थी पहली कृत्रिम बारिश?
भारत में पहली बार क्लाउड सीडिंग का प्रयोग 1983 और 1987 में किया गया था। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने 1993–94 में सूखे से राहत पाने के लिए इसका इस्तेमाल किया। कर्नाटक सरकार ने 2003 में और महाराष्ट्र सरकार ने 2009 और 2015 में यह प्रयोग किया।
भारत में इस तकनीक पर सबसे ज्यादा शोध IIT कानपुर और CAIPEEX (Cloud Aerosol Interaction and Precipitation Enhancement Experiment) प्रोजेक्ट के तहत हुआ है। यही संस्थान अब दिल्ली की आर्टिफिशियल बारिश के प्रोजेक्ट में भी सहयोग कर रहा है।
कितना खर्च आता है आर्टिफिशियल बारिश पर?
क्लाउड सीडिंग कोई सस्ता प्रोजेक्ट नहीं है। एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बारिश कराने का औसत खर्च करीब 1 लाख रुपए होता है। अगर पूरी दिल्ली में बारिश कराई जाए तो खर्च 15 करोड़ रुपए से अधिक हो सकता है।
वर्तमान में दिल्ली सरकार के इस प्रोजेक्ट पर 3.21 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसमें 5 ट्रायल्स किए जाएँगे, हर ट्रायल की लागत 55 लाख रुपए से 1.5 करोड़ रुपए के बीच होगी। इसके अलावा 66 लाख रुपए शुरुआती सेटअप पर खर्च हुए हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि कृत्रिम बारिश के बाद हवा में मौजूद धूल, धुआँ और प्रदूषक नीचे बैठ जाते हैं। इससे PM2.5 और PM10 जैसे खतरनाक कणों की मात्रा घट जाती है। हवा साफ हो जाती है और साँस लेने में राहत मिलती है।
हालाँकि यह राहत अस्थाई होती है, क्योंकि प्रदूषण के स्रोत जैसे गाड़ियाँ, फैक्ट्रियाँ और निर्माण कार्य फिर से हवा को दूषित करने लगते हैं। फिर भी यह एक वैज्ञानिक और त्वरित समाधान है जो लोगों को कुछ समय के लिए राहत दे सकता है।
कॉन्ग्रेस नेता इमरान मसूद ने 23 अक्तूबर 2025 को पत्रकार सुशांत सिन्हा के पॉडकास्ट में हिस्सा लिया। मसूद वही नेता हैं जिन्होंने एक समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टुकड़े-टुकड़े करने की धमकी दी थी। पॉडकास्ट के दौरान, एक चर्चा में मसूद ने आतंकी संगठन हमास की तुलना शहीद भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानी से कर दी। यह तुलना तब की गई जब भारत द्वारा पाकिस्तान में की गई हालिया पहलगाम आतंकी हमले के बाद की गई सैन्य कार्रवाई पर बात हो रही थी।
इस बातचीत में, पत्रकार सुशांत सिन्हा ने मसूद से कॉन्ग्रेस के शासन के दौरान पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई न होने को लेकर सवाल किया। ऑपरेशन सिंदूर पर मसूद का विचार पूछा गया। सिन्हा ने बताया कि मसूद मानते हैं कि भारत को युद्धविराम पर सहमत नहीं होना चाहिए था। हालाँकि, मसूद ने यह भी स्वीकार किया है कि भारत की कार्रवाई से पाकिस्तान घुटनों पर आ गया था। सिन्हा ने सवाल किया कि इसका मतलब है कि मसूद मानते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर बेहद सफल रहा था।
ऑपरेशन सिंदूर पर बहस के दौरान, कॉन्ग्रेस नेता इमरान मसूद ने पत्रकार सुशांत सिन्हा पर पलटवार किया। मसूद ने दावा किया कि पाकिस्तान तो पिछले 15 सालों से ही दुनिया के मंच पर अलग-थलग पड़ा है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर का पाकिस्तान को घुटनों पर लाने में कोई हाथ नहीं था। इस पर सिन्हा ने कड़ा विरोध जताया। सिन्हा ने कहा कि मसूद का यह दावा सही नहीं है। सिन्हा ने याद दिलाया कि 26/11 मुंबई आतंकी हमले के बाद, जब कॉन्ग्रेस की सरकार थी, तब उन्होंने नाम मात्र की कार्रवाई की थी।
मसूद ने जवाब दिया कि 26/11 के बाद पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले ही आतंकी देश घोषित कर दिया गया था, इसलिए कॉन्ग्रेस को और कुछ करने की जरूरत नहीं थी। सिन्हा ने इस दावे को गलत साबित किया। सिन्हा ने पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम के एक बयान का हवाला दिया। चिदंबरम ने खुद माना था कि कॉन्ग्रेस सरकार सैन्य कार्रवाई करना चाहती थी, लेकिन अमेरिका ने उन्हें रोक दिया था। सिन्हा ने मसूद से कहा, “यही है असली सरेंडर।” जवाब में, मसूद ने चिदंबरम पर निशाना साधा। मसूद ने इशारा किया कि चिदंबरम बूढ़े हो गए हैं और शायद उम्र के कारण ही वह गलत दावे कर रहे हैं।
राहुल गाँधी: ‘जनरल’ और ‘हथियार लॉबी’ का सवाल
ऑपरेशन सिंदूर पर बहस के बाद, पत्रकार सुशांत सिन्हा ने कॉन्ग्रेस नेता इमरान मसूद से अगला सवाल पूछा। सिन्हा ने राहुल गाँधी के उस व्यवहार पर सवाल किया, जिसमें वह सैन्य कार्रवाई के बाद भारतीय सेना पर ही सवाल उठा रहे थे। सिन्हा ने आरोप लगाया कि राहुल गाँधी बार-बार यह सवाल पूछ रहे थे कि पाकिस्तान ने कितने राफेल विमान गिराए। सिन्हा ने कहा कि यह सवाल असल में हथियार लॉबी ने तैयार करवाया था।
इस विषय पर, इमरान मसूद ने चर्चा करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि ‘राष्ट्रीय हित’ में वह इस मुद्दे पर बात नहीं करना चाहेंगे। मसूद के इस संयम की तारीफ करते हुए, सिन्हा ने उनसे कहा कि उन्हें यही सिद्धांत राहुल गाँधी को भी सिखाने चाहिए। इस पर मसूद ने तुरंत जवाब दिया। मसूद ने राहुल गाँधी को अपना ‘जनरल’ (सेनापति) बताया और खुद को ‘फुट सोल्जर’ (सैनिक) कहा।
राहुल गाँधी के कहने पर हुआ फिलिस्तीन का समर्थन?
अपने ‘जनरल’ राहुल गाँधी की महानता साबित करने के लिए, कॉन्ग्रेस नेता इमरान मसूद ने एक अजीबोगरीब दावा किया। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी जो कुछ भी कहते हैं, मोदी सरकार अंत में वही करती है। इस बात को साबित करने के लिए मसूद ने इजरायल-हमास युद्ध का उदाहरण दिया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारत द्वारा फिलिस्तीन का समर्थन करने का श्रेय राहुल गाँधी को दे दिया।
मसूद ने कहा, “जब एक विचारधारा के लोग इजरायल का समर्थन कर रहे थे, तो भारत को UN जाकर फिलिस्तीन का समर्थन करना पड़ा। क्योंकि यह हमारी विदेशी नीति की माँग है।” मसूद ने तर्क दिया कि हमास ने हमला किया और जवाब में इजरायल ने नरसंहार शुरू कर दिया। उन्होंने दावा किया कि भारत ने तब फिलिस्तीन का साथ दिया, जब प्रधानमंत्री मोदी के ‘दोस्त’ कहे जाने वाले पीएम नेतन्याहू ने भी मोदी का विरोध किया।
इमरान मसूद का यह दावा तर्कहीन लग रहा था। इस पर पत्रकार सुशांत सिन्हा ने जोर दिया। सिन्हा ने कहा कि हमास एक आतंकी संगठन है और उसे किसी भी तरह का समर्थन नहीं मिलना चाहिए।
पत्रकार सुशांत सिन्हा के साथ बहस के दौरान, कॉन्ग्रेस नेता इमरान मसूद आतंकी संगठन हमास के बचाव में उतर आए। मसूद ने सवाल किया कि क्या शहीद भगत सिंह भी आतंकवादी थे? इस तरह उन्होंने हमास को ‘आजादी के लिए लड़ने वाला संगठन’ बताया। जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या हमास की तुलना भगत सिंह से की जा सकती है, तो मसूद ने हाँ में जवाब दिया। उन्होंने तर्क दिया, “वे अपनी जमीन के लिए लड़ रहे हैं। भगत सिंह भी अपनी जमीन के लिए लड़ रहे थे।”
मसूद ने आगे कहा कि भगत सिंह ने अपनी जमीन के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्होंने इजरायल को कब्जा करने वाला (Occupier) बताया। मसूद ने कहा, “आपके लिए हमास एक आतंकवादी संगठन है। मेरा मानना है कि हमास अपनी आजादी के लिए लड़ रहा है।” मसूद ने सिन्हा से कहा, “आप हमास द्वारा लिए गए 250 बंधकों को देख रहे हैं, लेकिन आप उन 1 लाख लोगों को नहीं देख रहे जिन्हें इजरायल ने मार डाला है।” जब पत्रकार सिन्हा ने हमास के आतंकी अत्याचारों की लिस्ट गिनाई, तब भी इमरान मसूद लगातार हमास का बचाव करते रहे।
UN रिपोर्ट: हमास के हमले में सामूहिक हत्या और यौन हिंसा
7 अक्टूबर 2023 की सुबह, आतंकी संगठन हमास ने इजरायल पर बड़ा हमला किया। पहले हमास ने रॉकेटों से हमला किया। इसी की आड़ में सशस्त्र आतंकवादी इजरायली क्षेत्र में घुस गए। हमास के साथ फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद जैसे कई दूसरे आतंकी संगठन भी थे। वे गाजा की सीमा बाड़ तोड़कर घुसे। उन्होंने सेना के ठिकानों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी निशाना बनाकर हमला किया।
इस सुनियोजित हमले में 1,300 से ज्यादा लोग मारे गए। मरने वालों में महिलाएँ, बुजुर्ग और बच्चे भी शामिल थे। हजारों लोग घायल हुए और सैकड़ों लोगों को हमास ने बंधक बना लिया। इन बंधकों को गाजा ले जाया गया। संयुक्त राष्ट्र (UN) के एक मिशन ने बाद में पाया कि हमले में भयंकर यौन हिंसा की गई थी। रिपोर्ट में बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और लाशों को क्षत-विक्षत करने जैसे क्रूर कृत्यों का पता चला। रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ितों ने कम से कम तीन अलग-अलग जगहों पर ऐसे भयानक कृत्यों को होते देखा था।
7 अक्टूबर 2023 को इजरायल में नोवा म्यूज़िक फेस्टिवल चल रहा था। इसमें इजरायल और अन्य देशों से करीब 3,500 लोग शामिल थे। यह फेस्टिवल गाजा सीमा बाड़ के पास था, इसलिए यह सामूहिक हत्या और यौन हिंसा का केंद्र बन गया।
संयुक्त राष्ट्र (UN) मिशन द्वारा जुटाए गए सबूतों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वहाँ बलात्कार और सामूहिक बलात्कार की कई घटनाएँ हुईं। कई मामलों में, पीड़ितों को मारने से पहले उनके साथ ये क्रूरता की गई। सबसे परेशान करने वाली रिपोर्टों में से एक यह थी कि आतंकवादियों ने महिलाओं के शवों के साथ भी बलात्कार किया। कई शव कमर से नग्न पाए गए। उन्हें बाँधकर सिर में गोली मारी गई थी। इससे साफ पता चलता है कि यौन हिंसा का यह एक व्यवस्थित तरीका था।
फेस्टिवल में आए लोग और आस-पास के निवासी जान बचाने के लिए रोड 232 की ओर भागे। लेकिन भागने के इस रास्ते पर भी उन्हें अकल्पनीय क्रूरता का सामना करना पड़ा। इस पूरे रास्ते पर ऐसे शव मिले जिन पर गंभीर चोटें थीं, जिनमें जननांगों को काटना और जलने के गहरे निशान शामिल थे। रास्ता 232 से भागने वालों के साथ भी बलात्कार की घटनाएँ हुईं। UN टीम ने देखा कि कई शव आंशिक या पूरी तरह से नग्न थे, जो यौन हिंसा की घटनाओं की ओर इशारा करते हैं।
नोवा फेस्टिवल जैसी ही भयानक क्रूरता रे’इम, बे’एरी और कफ़र आज़ा के किबुत्ज़ (सामुदायिक बस्तियों) में भी रिपोर्ट की गई। किबुत्ज़ रे’इम में खबर मिली कि एक महिला के साथ बम शेल्टर के बाहर बलात्कार किया गया। किबुत्ज़ बे’एरी और कफ़र आज़ा में एजेंसियों को महिलाओं के नग्न शव मिले। ये शव बंधे हुए थे और उन्हें गोली मारी गई थी। यह साफतौर पर यौन हिंसा की ओर इशारा करता है।
नहल ओज सैन्य बेस पर भी बहुत ज़्यादा नुकसान हुआ और कई सैनिक मारे गए या उनका अपहरण हुआ। इस बेस पर भी बलात्कार और जननांगों को काटने की खबरें थीं। हालाँकि कुछ रिपोर्टों की पुष्टि नहीं हो पाई, लेकिन चोटों के निशान यौन हिंसा की संभावना बताते हैं।
मिशन टीम को स्पष्ट और ठोस सबूत मिले हैं कि गाजा ले जाए गए बँधकों को बलात्कार, यौन प्रताड़ना और अन्य अमानवीय व्यवहार का शिकार बनाया गया। मिशन का यह भी मानना है कि जिन बँधकों को अभी तक आजाद नहीं किया गया है, उनके खिलाफ ऐसी क्रूरता अभी भी जारी हो सकती है।
संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट ने 7 अक्टूबर के हमले के दौरान हमास और उसके सहयोगी आतंकी संगठनों द्वारा की गई क्रूरता की भयानक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल और अन्य देशों की महिलाओं के साथ यौन हिंसा की कई घटनाएँ दर्ज हुईं।
शवों के साथ बलात्कार और मृत शरीरों का अपमान करने जैसी क्रूरता सामने आई है। ये दस्तावेज दिखाते हैं कि पीड़ितों को न्याय दिलाने और दोषियों की जवाबदेही तय करने की तत्काल जरूरत है।
रिपोर्ट में साफ है कि गाजा पर इजरायल का गुस्सा हमास की इन्हीं आतंकी हरकतों का नतीजा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि गाजा में इजरायल के हमलों में मारे गए लोग एक तरह से ‘संपार्श्विक क्षति’ (collateral damage) हैं। यह क्षति इजरायल के उस दृढ़ संकल्प के कारण हुई है, जिसके तहत वह हमास को धरती से मिटा देना चाहता है।
दुनिया भर में इस साल दिवाली, यानी रोशनी और अच्छाई की बुराई पर जीत का त्योहार, बड़े धूमधाम से मनाया गया। जहाँ एक ओर लोगों ने दीपों, खुशियों और सकारात्मकता से माहौल रोशन किया, वहीं अमेरिका में कुछ कट्टरपंथी ईसाई समूहों ने हिंदू त्योहार दिवाली को शैतानी बताते हुए इसकी आलोचना की और इसका मजाक उड़ाया।
इतना ही नहीं, भारतीयों पर अमेरिका और कनाडा में ‘वन्यजीवों को नष्ट करने’ का भी अजीब आरोप लगाया गया। FBI के निदेशक और हिंदू धर्म से ताल्लुक रखने वाले काश पटेल ने सोमवार (20 अक्तूबर 2025) को एक्स पर एक सरल-सा संदेश लिखकर सभी को दिवाली की शुभकामनाएँ दीं।
उन्होंने लिखा, “दीपावली की शुभकामनाएँ – दुनिया भर में रोशनी के इस त्योहार का जश्न, बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में। सभी को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ।”
लेकिन काश पटेल का यह प्यारा सा संदेश कुछ ईसाई अतिवादियों को पसंद नहीं आया। उन्हें यह नागवार गुजरा कि भारतीय मूल के एक हिंदू व्यक्ति ने न केवल अमेरिका की सर्वोच्च संस्था में शीर्ष पद हासिल किया है, बल्कि खुले तौर पर अपने धर्म और त्योहार का गर्व से उत्सव भी मनाया।
Happy Diwali ? – celebrating the Festival of Lights around the world, as good triumphs over evil. pic.twitter.com/Kj5cEl1Kzv
काश पटेल के दिवाली शुभकामना संदेश पर कई ईसाई कट्टरपंथियों ने आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कीं। एक यूजर ने लिखा – “सर, कृपया अमेरिका में विदेशी देवताओं के त्योहारों को बढ़ावा न दें।”
दूसरे ने लिखा, “नहीं, अमेरिका एक ईसाई देश है।”
एक व्यक्ति ने तो हद पार करते हुए सभी भारतीय-अमेरिकी हिंदुओं को देश से निकालने की बात तक कह डाली। उसने लिखा – “मैं अमेरिका में रहना चाहता हूँ, भारत में नहीं। हमें सभी हिंदुओं को देश से बाहर निकाल देना चाहिए।”
वहीं, खुद को कट्टर कैथोलिक बताने वाली एक महिला ने हिंदुओं को झूठे देवताओं के उपासक कहा और दिवाली को दुष्ट देवताओं का त्योहार बताने की कोशिश की। उसने लिखा – “मेरा उद्देश्य उन सभी लोगों को सत्ता से हटाना है जो झूठे देवताओं और पगान राक्षसों की पूजा करते हैं। दिवाली में झूठे देवताओं की पूजा होती है और ये रोशनी उन राक्षसी देवताओं को बुलाने के लिए जलाई जाती हैं।”
My politics is whatever gets pagan demon false god worshipers out of all leadership roles in our country.
Diwali involves the worship of false gods and invites the presence and blessing of these demon gods. Lights are ceremonially lit to invoke the goddess of wealth. https://t.co/4rIsHavL98
एक अन्य ने हिंदू देवी-देवताओं को ‘शैतान’ करार दिया और कहा कि “अमेरिका की स्थापना इस तरह की शैतानी पूजा को संरक्षित करने या बढ़ावा देने के लिए नहीं की गई थी और इसका यहां कोई स्थान नहीं है।”
These are the demon gods Hindus are worshipping today
America wasn’t founded to protect or promote demonic worship like this and it has no place here pic.twitter.com/XYl6GvDhPV
ब्रैडली पियर्स नामक व्यक्ति ने पटेल की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “झूठे देवताओं की पूजा का जश्न मनाना हमारी भूमि पर मसीह के न्याय को भड़काता है।”
Celebrating the worship of false gods provokes the righteous judgment of Christ upon our land. https://t.co/AYtiPYDkyw
अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गबार्ड की दिवाली शुभकामना पोस्ट पर भी ईसाई कट्टरपंथियों ने नफरत और नस्लभरी टिप्पणियाँ कीं। सोशल मीडिया पर हिंदुओं को देश से निकालो और क्राइस्ट ही ईश्वर है जैसे संदेशों की बाढ़ आ गई।
एक यूजर ने लिखा – “दिवाली अमेरिकी संस्कृति के खिलाफ है, भारत चले जाओ।” कई लोगों ने ‘Not My GOD!’ लिखकर बीच की उंगली वाला इमोजी भेजा। कुछ ने गबार्ड की पोस्ट को ‘घिनौना’ बताया, जबकि कुछ ने तो उनके देश से निर्वासन की माँग तक कर दी। यह दिखाता है कि अमेरिका में कुछ ईसाई श्रेष्ठतावादी (सुप्रीमिस्ट) हिंदू त्योहारों और मान्यताओं के खिलाफ नफरत फैलाने में लगे हुए हैं।
Sending my heartfelt wishes to everyone who is celebrating Diwali! May the light of God’s love guide our path, remove the shadows of doubt, and inspire us to reflect His love in all that we do. pic.twitter.com/2sdOZjj8nd
इसी बीच, रिफ्ट टीवी के सीईओ एलियाह शाफर ने हिंदू धर्म को ‘राक्षसी धर्म’ बता दिया। उसने लिखा, “हमारे सभी राजनेताओं का धन्यवाद, जो हमें दिवाली की शुभकामनाएँ दे रहे हैं। दिवाली एक राक्षसी धर्म का त्योहार है। हमारे चुने हुए और नियुक्त अधिकारी राक्षसी, ईसाई विरोधी संस्कृति का जश्न मना रहे हैं। यही हमारे संस्थापक पिता चाहते थे, इसी लिए उन्होंने हमारे लिए अपनी जान दी।” इससे साफ है कि कुछ कट्टरपंथी हिंदू धर्म और दिवाली को लेकर खुले तौर पर नफरत फैला रहे हैं।
Thank you to all our politicians wishing us a happy day to celebrate a demon religion
Diwali
Nothing is better than having our elected & appointed officials celebrate demonic anti-Christian culture
कनाडा और अमेरिका में भारतीयों द्वारा वन्यजीवों का अवैध शिकार: भारत विरोधी ऑनलाइन घृणा अभियान में एक नया बेतुका जोड़
दिवाली और हिंदुओं की नफरत फैलाने के अलावा, कुछ अमेरिकी ईसाई जातिवादी ने यह झूठा और हास्यास्पद दावा भी किया कि भारतीय अमेरिका और कनाडा आकर वन्यजीवों का शिकार करते हैं।
एक यूजर ने लिखा – “भारतीय अमेरिका और कनाडा आकर वन्यजीवों का शिकार करते हैं। भारत में अब सिर्फ चूहे और कॉकरोच ही बचे हैं। अगर वे यहाX लंबे समय तक रहेंगे, तो यही उत्तर अमेरिका में भी करेंगे।” यह दिखाता है कि कुछ लोग बिना किसी सबूत के हिंदुओं और भारतीयों के खिलाफ झूठ फैलाकर डर और घृणा पैदा कर रहे हैं।
Indians come to America and Canada and poach the wildlife.
The only wildlife left in India is rats and cockroaches.
They will do this to North America if they stay here long enough.
उसके अगले पोस्ट में उसने लिखा – “अगर भारतीय किसी जीव को हाथ से पकड़कर खा सकते हैं, तो वह खत्म हो जाएगा। माफ़ करना भारत, मेंढक और ‘जंगली बाघ’ नहीं गिने जाते।”
इस पूरी तरह गलत और घिनौने बयान को तुरंत कम्युनिटी नोट के जरिए सही किया गया। नोट में लिखा गया – “भारत दुनिया के शीर्ष देशों में से एक है जो वन्यजीवों में विविधता रखता है। यह 17 मेगाडाइवर्स देशों में शामिल है और यहाँ 7.6% स्तनधारी और 14.7% उभयचर प्रजातियाँ पाई जाती हैं। भारत में 70% से अधिक जंगली बाघ हैं और यहाँ 1,022 संरक्षित क्षेत्र वन्यजीव संरक्षण में उत्कृष्ट योगदान देते हैं।”
कई अन्य एक्स यूज़र्स ने इस नस्लवादी और झूठे बयान देने वाले व्यक्ति को यह भी बताया कि इतिहास में गोरे लोगों ने दुनिया के वन्यजीवों को कितनी भारी क्षति पहुँचाई है।
FYI: >White men wiped out Cheetahs in India. From 10,000 cheetahs in 1600's, they went extinct by 1950. >White men killed 80,000 tigers in 50 yrs in India which brought them on the verge of extinction. Duke of Windsor shot 17 tigers in one week in 1921. British civil servant… https://t.co/feNREx6iAepic.twitter.com/dTpow44663
— Stop Hindu Hate Advocacy Network (SHHAN) (@HinduHate) October 19, 2025
एक्स पर 1,80,000 से अधिक फॉलोअर्स वाली मेगन बैशम ने यह शिकायत की कि अमेरिका के संघीय कार्यालय हिंदू देवताओं का सम्मान कर रहे हैं, जबकि अमेरिका ईसाई संस्कृति पर आधारित है।
उसने लिखा-“अगर आप ईसाई हैं और आपको यह सोचकर कोई तकलीफ नहीं होती कि आपका देश, जो कभी ईसाई संस्कृति पर आधारित था, अब संघीय कार्यालयों में कृष्ण, काली और लक्ष्मी का सम्मान कर रहा है और आपको ह्यूस्टन में विशाल सुनहरे बंदर देवताओं का स्वागत करने को कहा जा रहा है, तो मुझे लगता है कि आपको अभी और बाइबिल पढ़ने की जरूरत है।” यह बयान दिखाता है कि कुछ ईसाई कट्टरपंथी अमेरिका में हिंदू धर्म और उसकी पूजा को लेकर विरोध कर रहे हैं।
If you as a Christian do not feel some pain at the thought of your nation, once firmly grounded in Christian culture, now witnessing federal government offices honoring Krishna, Kali, and Lakshmi, and telling you you must welcome giant golden monkey gods on the Houston horizon,…
‘पवित्रता’ की रक्षा के नाम पर हिंदू-विरोधी भावना और भारत-घृणा को सामान्य बनाना
दिलचस्प बात यह है कि कुछ ईसाई कट्टरपंथी दावा करते हैं कि अमेरिका एक ईसाई देश है। हालाँकि, अमेरिकी संविधान ऐसा कहीं नहीं कहता। अमेरिकी संविधान चर्च और राज्य को अलग करता है और स्पष्ट करता है कि अमेरिका एक धर्मनिरपेक्ष (सेकुलर) राष्ट्र है।
अमेरिकी राइट विंग, खासकर सफेद ईसाई श्रेष्ठतावादी समूहों द्वारा हिंदुओं और भारतीयों के खिलाफ खुली नफरत कोई नई बात नहीं है, यह सिर्फ हिंदूफोबिया को सामान्य करने का एक जारी रुझान है।
हाल ही में सामने आया कि रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े एक समूह, यंग रिपब्लिकन्स के नेताओं ने टेलीग्राम ग्रुप चैट में नस्लवादी, भारत-विरोधी, काले लोगों-विरोधी, नाजी समर्थक और समलैंगिक-विरोधी संदेश साझा किए। भारतीयों के खिलाफ स्वच्छता संबंधी नकारात्मक सोच फैलाना और यह कहना कि भारतीय भरोसेमंद नहीं हैं, इस बात को दिखाता है कि अमेरिका की राजनीतिक राजनीति में भारत-विरोधी सोच कितनी सामान्य हो चुकी है।
अमेरिका में एशियाई, भारतीय और खासकर हिंदुओं के खिलाफ नस्लवाद अब सामान्य होता जा रहा है। H1-B वीजा बहस से लेकर दिवाली के जश्न तक, सफेद नस्लवादी और ईसाई श्रेष्ठतावादी भारतीयों और हिंदुओं को अमेरिकी मूल्यों और देश की काल्पनिक ईसाई राष्ट्र की स्थिति के लिए खतरा बता रहे हैं।
पिछले साल, जे डी वेंस की पत्नी उषा चिलुकुरी वेंस, जो हिंदू हैं और भारतीय प्रवासियों की बेटी हैं, सफेद ईसाई श्रेष्ठतावादी समूहों द्वारा नस्लवादी और हिंदू-विरोधी हमलों का सामना कर चुकी हैं। उन्हें यह कहकर बदनाम किया गया कि उन्होंने एक भारतीय हिंदू अपराधी से शादी की।
अमेरिकी टिप्पणीकार और लेखक एन्न कौल्टर ने विवेक रामास्वामी को उनके पॉडकास्ट में बताया कि वह उन्हें वोट नहीं देंगी क्योंकि वह भारतीय हैं। रिपब्लिकन पार्टी से राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन के दौरान उन्हें कई बार हिंदू धर्म को लेकर सवालों का सामना करना पड़ा। देशभक्त तुलसी गबार्ड को भी उनके हिंदू धर्म और भारतीय जड़ों के कारण निशाना बनाया गया। इसी तरह, काश पटेल को FBI निदेशक के रूप में पद की शपथ भगवद गीता पर लेने के कारण आलोचना का सामना करना पड़ा।
फ्लोरिडा के गवर्नर और रिपब्लिकन नेता रॉन डीसांटिस ने भारतीय तकनीकी कर्मचारियों को लघु उद्योग स्कैम कहकर छोटा दिखाया। उनके इस बयान ने MAGA प्रचार को हवा दी, जिसमें भारतीयों को ‘नौकरी चुराने वाले हमलावर’ बताया गया। उनके एच1-बी वीजा विरोधी बयान ने अमेरिकी हिंदुओं और भारतीयों के ऑनलाइन नस्लवादी हमलों को बढ़ावा दिया। ऑपइंडिया ने पहले रिपोर्ट किया था कि कैसे एच1-बी वीजा बहस भारतीयों के खिलाफ पूरी तरह की भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी मुहिम में बदल गई।
हाल ही में, टेक्सास के GOP अधिकारी अलेक्जेंडर डंकन ने सार्वजनिक जगह से भगवान हनुमान की मूर्ति हटाने की माँग की और हिंदू देवता को झूठा भगवान कहा। 20 सितंबर को एक्स पर पोस्ट करते हुए उन्होंने 90 फीट ऊँची हनुमान मूर्ति का वीडियो साझा किया और लिखा, “हम टेक्सास में एक झूठे हिंदू देवता की मूर्ति क्यों अनुमति दे रहे हैं? हम एक ईसाई देश हैं!” डोनाल्ड ट्रंप के ट्रेड सलाहकार पीटर नवारो, जिन्होंने ट्रंप के आदेश पर भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए बदनाम किया, ने ब्राह्मण समुदाय की भी निंदा की और कहा कि भारत के ब्राह्मण “भारतीय जनता के खर्च पर लाभ उठा रहे हैं।”
नस्लवादी और हिंदू-विरोधी ताकतें, चाहे वे इस्लामो-बाएँ हों या सफेद ईसाई कट्टरपंथी, हिंदू धर्म और भारत के खिलाफ लगातार नफरत फैला रहे हैं। इसमें शामिल हैं, अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हिंदुओं को दोषी ठहराने के लिए नकली जातिवाद की कहानियाँ बनाना, SB-403 जैसी जाति बिल उठाना, 2019 CISCO जाति भेदभाव मामले जैसी झूठी कानूनी कार्रवाइयाँ, एंटी-ब्राह्मण DEI प्रोग्राम चलाना, हिंदू देवताओं और मंदिरों को निशाना बनाना और ट्रंप प्रशासन में हिंदू अधिकारियों पर हमले करना। यह नफरत इतनी व्यापक है कि अपने ही नेता डोनाल्ड ट्रंप को भी व्हाइट हाउस में दिवाली मनाने के लिए ऑनलाइन आलोचना का सामना करना पड़ा। इन सभी हमलों के बावजूद, अमेरिकी हिंदू समुदाय सबसे शांतिप्रिय, कानून का पालन करने वाला और आर्थिक रूप से योगदान देने वाला समुदाय बना हुआ है।
क्या हिंदू धर्म अमेरिका में ईसाई धर्म के लिए अस्तित्वगत खतरा है?
अमेरिकी ईसाई श्रेष्ठतावादी यह सहन नहीं कर पा रहे हैं कि एक मेहनती, शिक्षित और समृद्ध अल्पसंख्यक हिंदू भारतीय अमेरिकी पूरी मेहनत कर रहा है, अपने कर समय पर चुका रहा है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है, सिर्फ इसलिए कि वे हिंदू हैं। व्यंग्य यह है कि जबकि कुछ इस्लामवादी अमेरिकी शहर-शहर पर कब्जा कर रहे हैं और शरीयत-समर्थक गेट्टो चला रहे हैं, ईसाई श्रेष्ठतावादी स्वभाव से सहिष्णु हिंदुओं को किसी तरह का अस्तित्वगत खतरा मानते हैं।
धार्मिक और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण में ईसाई कट्टरपंथ एक विषैला मिश्रण है, धार्मिक-थियोसॉफ़िकल कट्टरता, नस्लीय और ऐतिहासिक श्रेष्ठता का भ्रम और सांस्कृतिक असुरक्षा। ईसाई कट्टरपंथी मानते हैं कि अन्य धर्म और संस्कृति प्राचीन, झूठे और अमेरिकी ईसाई मूल्यों के अनुकूल नहीं हैं। जैसे अन्य अब्राहमिक धर्मों में ईसाई धर्म एक एकेश्वरवादी ईश्वर को सर्वोच्च मानता है और उनके नजरिए में बहुदेववादी या एकेश्वरवाद-संबंधी धर्म जैसे हिंदू धर्म ‘राक्षसी’ या मूर्तिपूजक हैं।
ईसाई कट्टरपंथियों के लिए जो कोई ईसा मसीह और पवित्र त्रित्व में विश्वास नहीं करता, वह शैतान का उपासक माना जाता है। इसलिए उनके लिए हिंदू देवता शैतान या झूठे देवता हैं। वे अपने हिंदू-विरोधी दृष्टिकोण को सही ठहराने के लिए बाइबिल के श्लोक, जैसे Exodus 20:3-5 का हवाला देते हैं।
यह कोई नई बात नहीं है। पुर्तगाली इनक्विज़िशन से लेकर ब्रिटिश युग की धर्मांतरण गतिविधियों और आज के पेंटेकोस्टल और इवांजेलिकल मिशनरियों तक, हिंदू विश्वासों को हमेशा जंगली और क्रूर माना गया और दिवाली की दीपों को अपराधी आग कहा गया। आधुनिक ईसाई कट्टरपंथी भले ही इस्लामिक प्रभुत्व और शरीयत का विरोध करते हैं, वे उसी सिक्के का दूसरा पक्ष बन गए हैं।
हिंदू देवता कोई राक्षस नहीं हैं और हिंदू धर्म में 33 करोड़ देवता होने का दावा भी गलत है। हिंदू धर्म बहुदेववादी है, लेकिन इसकी आध्यात्मिकता वेदिक चेतना पर आधारित है, जो कहती है, ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ (सत्य एक है, लेकिन ज्ञानी उसे कई नामों से पुकारते हैं)।
इस्लाम और ईसाई धर्म की तरह, हिंदू धर्म किसी को धर्मांतरण करने की धमकी नहीं देता। भारत, हिंदुओं का प्राकृतिक घर, कभी किसी देश पर कब्जा करके वहाँ की धार्मिक जनसंख्या बदलने या गैर-हिंदुओं पर हिंदू धर्म थोपने का प्रयास नहीं किया। जबकि मुस्लिम और ईसाई इतिहास में ऐसे देशों पर कब्जा कर चुके हैं और सभ्यताओं को नष्ट करके धार्मिक प्रभुत्व स्थापित किया।
19वीं और 20वीं सदी के ओरिएंटलिस्ट चित्रणों से लेकर ‘पूर्वी/एशियाई रहस्यवाद’ के डर और ऑनलाइन नफरत तक, हिंदू और भारतीय सभी प्रकार की नफरत झेल चुके हैं और फिर भी अमेरिका को मजबूत बनाने में योगदान देते रहे हैं। अगर भारतीय हिंदू अमेरिकी ईसाई श्रेष्ठतावादियों की तरह सोचने लगें, तो भारत में ईसाई धर्म खत्म हो जाएगा। आज हिंदुओं को ‘भारत भेजने’ या उनके मंदिर और मूर्तियों को हटाने की माँग, धीरे-धीरे हिंसा तक पहुँच सकती है।
यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। इसके उदाहरण के रूप में बांग्लादेश देखा जा सकता है, जहाँ छात्र विरोध प्रदर्शनों से विरोध सरकार तक और फिर इस्लामवादी-प्रेरित हिंदू विरोधी दंगों में बदल गया।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)
तृणमूल कॉन्ग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने एक विदेशी व्यक्ति के उस पोस्ट पर ‘मैं सहमत हूँ’ (I Agree) लिखा, जिसमें दिवाली मनाने वाले भारतीयों को ब्रेन डेड (brain dead), गंदगी (shithole) और दिवाली की तुलना ‘मंदबुद्धि’ (retarded) और ‘कचरे’ (garbage) से की गई थी।।
माहुआ मोइत्रा के इस ट्वीट ने सोशल मीडिया पर भारी बवाल मचा दिया, जिस पर लोगों ने कड़ी आपत्ति जताई और इसे भारत विरोधी और हिंदू विरोधी नफरत को बढ़ावा देने वाला बताया। चौतरफा आलोचना के बाद, सांसद ने अंततः अपने इस विवादित पोस्ट को हटा लिया। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब पश्चिमी सोशल मीडिया पर हिंदुओं और दिवाली के ख़िलाफ नस्लीय और धार्मिक असहिष्णुता का एक भयानक चलन दिख रहा है।
दिवाली पर नस्लीय टिप्पणी और महुआ मोइत्रा का ‘सहमत’ होना
गुरुवार (23 अक्टूबर 2025) को तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने एक ईसाई चरमपंथी के दिवाली त्योहार के खिलाफ किए गए अपमानजनक पोस्ट का खुलेआम समर्थन किया। उस विदेशी अकाउंट ने हिंदुओं के प्रति नस्लीय नफरत को बढ़ावा देते हुए भारतीयों को ‘दिमाग से मरे हुए भो#$के’ कहा और पश्चिमी देशों को ‘उनकी मंदबुद्धि दिवाली गंदगी’ से ‘पूरी तरह से गंदगी’ में बदलने का आरोप लगाया।
इस पोस्ट पर मोइत्रा ने सीधा और संक्षिप्त जवाब दिया ‘मैं सहमत हूँ’ (I agree)। उनका यह बयान पश्चिमी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर दिवाली के ख़िलाफ़ फैल रही नस्लीय नफ़रत और हिंदू विरोधी कट्टरता को समर्थन देता हुआ प्रतीत हुआ, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएँ आनी शुरू हो गईं।
अब पोस्ट डिलीट कर सांसद दे रही सफाई
तृणमूल कॉन्ग्रेस सांसद माहुआ मोइत्रा अपने विवादित ‘I agree’ ट्वीट को लेकर सफाई देती नजर आ रही हैं। उन्होंने कहा कि उनका इरादा उस विदेशी के हिंदू-विरोधी पोस्ट का समर्थन करने का नहीं था, बल्कि उन्होंने गलती से ‘मैं सहमत हूँ’ उस ट्वीट पर लिख दिया जो उसके नीचे था।
माहुआ के मुताबिक, यह एक गलत क्लिक और भ्रम का मामला था, न कि किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ उनकी राय का संकेत। उन्होंने कहा कि वह यात्रा पर थीं और समय पर ट्वीट की जाँच नहीं कर सकीं। हालाँकि, उनके इस बयान के बाद भी सोशल मीडिया पर बहस थमी नहीं है। कई लोग इसे ‘बचाव की कोशिश’ बता रहे हैं, जबकि कुछ ने उनकी सफाई को स्वीकार करते हुए कहा कि उन्हें ट्वीट करने से पहले और सावधानी बरतनी चाहिए थी।
महुआ बांग्लादेश को भारत से बेहतर मानती- बीजेपी
यह पहला मौक़ा नहीं है जब महुआ मोइत्रा ने हिंदू धर्म या भारत के खिलाफ विवादित टिप्पणी की हो। बीजेपी के पोस्ट के अनुसार, यह वही महुआ मोइत्रा हैं जो मानती हैं कि बांग्लादेश भारत से बेहतर है और जिन्होंने कथित तौर पर लक्जरी हैंडबैग के बदले राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला है। बीजेपी ने यह भी आरोप लगाया कि टीएमसी सांसद पहले देवी काली का वर्णन ‘मांस और शराब की देवी’ के रूप में कर चुकी हैं।
A foreign hate-monger, while criticizing the celebration of Hindu festival Diwali abroad, called Indians "brain dead", "shithole", and compared Diwali to retard and garbage.
Trinamool Congress MP Mahua Moitra expressed her complete agreement with this statement in a tweet. This… pic.twitter.com/LL2Upb2qxk
इसी साल अगस्त में, उन्होंने एक वायरल वीडियो में कथित तौर पर नमासूद्र और मटुआ जैसे अनुसूचित जाति समुदायों के हिंदुओं का मज़ाक उड़ाया था और उनके धार्मिक प्रतीकों को ‘लकड़ी की माला’ कहकर अपमानित किया था। इसके अलावा, बीजेपी ने टीएमसी शासित पश्चिम बंगाल में दिवाली के दौरान आतिशबाजी करने पर महिलाओं और बच्चों पर कथित अत्याचार और काली मंदिरों पर हमले की घटनाओं का भी उल्लेख किया।
हर कुछ महीनों में BBC इंडिया कोई ऐसा लेख छापता है, जो पत्रकारिता और मनोवैज्ञानिक जंग के बीच की लकीर को धुंधला कर देता है। हाल ही में उसने एक लेख छापा, जिसका शीर्षक था “Gen Z उठ रहा है? भारत के नौजवान सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहे?” ये लेख उसी पुरानी चाल का नया नमूना है, जिसमें छिपे-छिपे भारत को अस्थिर करने की कोशिश की जाती है।
पहली नजर में ये लेख एक साधारण सवाल उठाता है: भारत का Gen Z, जो इतना बड़ा, बेचैन और इंटरनेट से जुड़ा है, वो नेपाल या बांग्लादेश के नौजवानों की तरह क्रांति क्यों नहीं कर रहा? लेकिन जरा गौर से देखो, तो ये लेख विश्लेषण कम और उकसावा ज्यादा लगता है। ये भारतीय नौजवानों को खुलेआम बगावत करने और पड़ोस के देशों में हो रही अराजकता की नकल करने का न्योता देता है।
BBC की निष्पक्षता का दावा और दंगों की चाहत
खुद को निष्पक्ष बताने वाले BBC का हिंसक विद्रोहों को महिमामंडन करना हैरान करता है। लेख का लहजा ऐसा है, जैसे उसे दुख हो कि भारतीय छात्रों ने अभी तक आगजनी, तोड़फोड़ और सरकार बदलने की कोशिश नहीं की। ये सिर्फ औपनिवेशिक सोच का नतीजा नहीं, जो अपने पुराने गुलाम देश को बिखरते देखना चाहता है ताकि दूर बैठकर नैतिक उपदेश दे सके। ये कुछ ज्यादा सोचा-समझा, वैचारिक और गहरे राजनीतिक है।
उकसावे की कला में माहिर है बीबीसी
BBC का ये लेख प्रोपेगेंडा का उस्ताद है। ये शुरू होता है एशिया के ‘बेचैन’ Gen Z की तारीफ से, जो ’48 घंटों में सरकारें गिरा देते हैं’, जैसे कि संस्थानों का ढहना प्रगति का मेडल हो। फिर आता है भारत से तुलना – भारत के नौजवान ‘बिखरे हुए’, ‘डरे हुए’ और ‘अलग-थलग’ हैं। मतलब साफ है: वे अपने जेनरेशन के फर्ज को निभाने में नाकाम हैं, क्योंकि वे दंगे नहीं कर रहे।
बीबीसी के लेख का स्क्रीनशॉट
लहजा मनोवैज्ञानिक है, विश्लेषणात्मक नहीं। ‘राष्ट्र-विरोधी करार दिए जाने का डर’ और ‘सरकार का विरोध को बदनाम करना’ जैसे शब्द गहरे सोचने के लिए नहीं, बल्कि गिल्ट फील कराने के लिए डाले गए हैं। ये पत्रकारिता नहीं, जो भारतीय नौजवानों के शांत रहने की वजह समझना चाहे। ये विश्लेषण के भेष में उकसावा है, जो शांति को कायरता और संयम को दमन बताता है।
नेपाल का उदाहरण बना BBC का नया जुनून
लेख को प्रेरणा नेपाल से मिली है, जहाँ सितंबर 2025 में तथाकथित ‘Gen Z क्रांति’ ने केपी ओली की सरकार गिरा दी। BBC इसे फिल्मी अंदाज में बयान करता है, जैसे कोई ऐतिहासिक नौजवानी वीरता का पल हो।
लेकिन इस चमक के पीछे भयानक सच है। नेपाल के विद्रोह में करीब 20 लोग मरे, पूर्व प्रधानमंत्रियों के घर जला दिए गए, मंत्रियों पर हमले हुए और सिंह दरबार जैसे ऐतिहासिक स्थलों में तोड़फोड़ हुई। सेना को कर्फ्यू लगाना पड़ा और देश अब सैन्य शासन की कगार पर है।
लेकिन BBC इस अराजकता को ‘सफलता’ बताता है, एक ऐसा ‘उदाहरण’ जिसे भारत के नौजवानों को नकल करना चाहिए। लेख ये नहीं बताता कि नेपाल के प्रदर्शनकारी खुद हिंसा से अलग हो गए थे, कहते हुए कि उनके आंदोलन को बाहरी तत्वों ने हाईजैक कर लिया। लेकिन BBC ये क्यों बताएगा? क्योंकि उसका मकसद जानकारी देना नहीं, बल्कि ये विचार बोना है कि भारत का ‘बेचैन’ Gen Z नेपाल के दंगाइयों के ‘वीरतापूर्ण’ नक्शेकदम पर चले।
सेलेक्टिव तरीके से पुरानी बातों को नजरअंदाज करता है बीबीसी
BBC भारत के पुराने सड़क आंदोलनों को जैसे अन्ना हजारे आंदोलन से लेकर CAA विरोध तक, बड़े प्यार से याद करता है, जैसे कि वो असहमति का स्वर्ण युग हो। लेकिन इन विरोधों से हुई खून-खराबा, तबाही और सामुदायिक टकराव पर BBC चुप्पी साध लेता है।
CAA विरोध में भीड़ ने सार्वजनिक संपत्ति जलाई, सड़कें रोकीं, और दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़की, जिसमें 50 से ज्यादा लोग मरे। BBC जिन ‘छात्र नेताओं’ को अब रोमांटिक बनाता है, वे गाँधीवादी सत्याग्रही नहीं, बल्कि दंगे भड़काने के आरोपित कट्टरपंथी थे।
ऐसे आंदोलनों को ‘नोबल’ बताकर और आज के समय में ऐसे विद्रोहों की कमी पर अफसोस जताकर, BBC असल में अराजकता की कमी को मिस कर रहा है। उसे वो दौर याद आता है, जब भारत को ‘अस्थिर’ और ‘दमनकारी’ दिखाया जा सकता था- ऐसी हेडलाइंस जो लंदन के न्यूज़रूम में ज्यादा बिकती हैं, बनिस्पत ‘भारत 8% की दर से बढ़ रहा है।’
‘राष्ट्र-विरोधी’ का झाँसा
लेख में ‘राष्ट्र-विरोधी’ शब्द एक चालाक हथियार है। BBC के फ्रेम में, इस डर ने भारतीय नौजवानों को सड़कों पर उतरने से रोक रखा है। ये चतुराई है, जो राष्ट्रवाद को तानाशाही और असहमति को वीरता से जोड़ देती है।
लेकिन सच ये है कि भारतीय नौजवान समझदार हो गए हैं। उन्होंने देखा है कि ‘एक्टिविज्म’ को कैसे स्वार्थी ताकतें हथियार बना लेती हैं। शाहीन बाग की सुनियोजित नाकेबंदी से लेकर विदेशी फंडिंग वाले NGOs, जो छात्र आंदोलनों के भेष में काम करते हैं, Gen Z खामोश नहीं है क्योंकि वो डर गया है। वो खामोश है क्योंकि वो समझदार हो गया है।
उन्हें पता है कि बसें जलाने से नौकरियाँ नहीं मिलतीं, पत्थर फेंकने से भ्रष्टाचार नहीं रुकता, और सरकार गिराने से बेहतर कल की गारंटी नहीं मिलती। भारत का Gen Z स्टार्टअप बना रहा है, कोड लिख रहा है, फिल्में बना रहा है, दुनिया घूम रहा है, न कि बाहरी कठपुतलियों के इशारे पर सियासी ड्रामे में अपनी ताकत बर्बाद कर रहा है।
लोगों का सड़कों पर उतरना बीबीसी को पसंद
जब BBC उमर खालिद की जेल या जामिया टकराव का जिक्र करता है, तो ये कोई शैक्षिक संदर्भ नहीं, बल्कि भावनात्मक ट्रिगर है। वो ‘क्रूर सरकारी दमन’ की याद को फिर से जगाना चाहता है और 2019 को अधूरी कहानी के रूप में पेश करना चाहता है।
लेख का छिपा संदेश साफ है: “तुमने अपने सीनियर्स के साथ क्या हुआ देखा। क्या तुम वापस नहीं लड़ना चाहते?” ये पत्रकारिता नहीं, भावनात्मक छेड़छाड़ है।
BBC यूनिवर्सिटी प्रोटेस्ट कल्चर के ‘खोने’ का मातम मनाता है, लेकिन असल में वो इस बात का दुख मना रहा है कि मोदी सरकार ने कैंपस अनुशासन बहाल कर दिया और शिक्षण संस्थानों को सियासी संगठनों के हवाले होने से रोक दिया।
भारत के कैंपस वैचारिक भटकाव के मैदान से बदलकर इनोवेशन के हब बन गए हैं। ये बदलाव, जाहिर है, BBC को बर्दाश्त नहीं, जो अपने भारतीय नौजवानों को गुस्सैल, बेकार और सिस्टम-विरोधी देखना पसंद करता है।
Gen Z बिखरा हुआ या आजाद? BBC का दोहरा रवैया
लेख में BBC भारत की विविधता को कमजोरी बताता है, कहता है कि नौजवान जाति, भाषा और क्षेत्र में बंटे होने की वजह से एकजुट नहीं हो पाते। लेकिन यही विविधता जब काम आए, तो इसे ‘जीवंत बहुसंस्कृतिवाद’ कहा जाता है।
नेपाल या बांग्लादेश में एकरूपता की वजह से बड़े पैमाने पर मूवमेंट आसान है। लेकिन भारत में विकेंद्रीकरण लोकतंत्र की आत्मा है। BBC इसे ‘बिखराव’ कहता है। भारतीय इसे संघवाद कहते हैं।
BBC का ‘राष्ट्रीय युवा विद्रोह’ की चाहत उसकी औपनिवेशिक सोच को दर्शाती है, जो एकरूपता, एकजुटता और अराजकता को संकट के रूप में दिखाना चाहती है।
भारत की स्थिरता है पश्चिम की समस्या
BBC का असली दुख भारत के नौजवानों से नहीं, भारत की स्थिरता से है। नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका पश्चिमी मीडिया के लिए इसलिए काम के हैं, क्योंकि वे अस्थिर हैं और ‘विदेशी लोकतंत्रों’ के रूप में पढ़े जा सकते हैं। लेकिन 37 करोड़ Gen Z वालों वाला भारत, जो बिना टूटे संवैधानिक व्यवस्था के साथ चल रहा है, उनकी कहानी को बिगाड़ देता है।
2024 समेत हर चुनाव दिखाता है कि भारतीय नौजवान निराश नहीं, बल्कि समझदार हैं। बीजेपी को युवाओं का मजबूत समर्थन मिलता है, न कि डर की वजह से, बल्कि कामकाज, इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याण, राष्ट्रवाद और डिजिटल सशक्तिकरण की वजह से। इसलिए BBC का ये दावा कि नौजवान ‘राजनीति से बचते हैं’ ये खोखला लगता है।
भारतीय नौजवान सड़क के आंदोलनों से डिजिटल और चुनावी एक्टिविज्म की ओर बढ़ गए हैं, जहाँ उनकी आवाज ज्यादा मायने रखती है और उनके विरोध को पेशेवर अराजकतावादी हाईजैक नहीं कर सकते।
मोदी फैक्टर है BBC के असली दुख की वजह
BBC के मातम का असली केंद्र समाजशास्त्र नहीं, बल्कि राजनीति है। BBC, The Guardian और The New York Times जैसे पश्चिमी संस्थान नरेंद्र मोदी को दो चीजों के लिए कभी माफ नहीं कर पाए: पहला, भारत की हिंदू सभ्यता की पहचान को बिना शर्मिंदगी के सामने लाने के लिए… और दूसरा- इसे लोकतांत्रिक तरीके से, वोट के जरिए करने के लिए।
जब मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन किया, तो ये सिर्फ धार्मिक समारोह नहीं था; ये सभ्यता का सुधार था। इसने दुनिया को बताया कि भारत अब अपनी आस्था के लिए माफी नहीं माँगेगा, न ही धर्मनिरपेक्षता को हिंदू पहचान की अनुपस्थिति के रूप में परिभाषित करेगा। BBC की नजर में ये पाप था।
उनका वैश्विक दृष्टिकोण बाइनरी पर चलता है: बहुसंख्यक यानी दमनकारी, राष्ट्रवाद यानी फासीवाद, स्थिरता यानी तानाशाही। तो जब भारत के नौजवान इन बाइनरी को ठुकराकर प्रगति को चुनते हैं, तो BBC का वैचारिक तंत्र घबरा जाता है।
पश्चिमी मीडिया का बगावतों से मोह
पश्चिमी मीडिया का ग्लोबल साउथ के विद्रोहों को कवर करने का तरीका कुछ परेशान करने वाला है। वे दूर से क्रांतियों की तारीफ करते हैं और जब धूल जम जाती है तो गायब हो जाते हैं।
अरब स्प्रिंग से लेकर श्रीलंका के विरोधों तक, पश्चिमी मीडिया ने ‘युवा-नेतृत्व वाले विद्रोहों’ को शेर की तरह पेश किया और जब ये देश अस्थिरता, महँगाई या गृहयुद्ध में फंस गए, तो वे खुद खिसक गए।
अब वे नया खेल का मैदान ढूँढ रहे हैं और अपनी विशाल युवा आबादी के साथ भारत उनके लिए सबसे बड़ा ईनाम है।
इसलिए BBC का लेख पत्रकारिता कम और भर्ती का पोस्टर ज्यादा लगता है- “अपने पड़ोसियों को देखो। क्या तुम उनके जैसे नहीं बनना चाहते?”
लेकिन भारतीय अब आसानी से बेवकूफ नहीं बनते। उन्होंने देखा है कि ये ‘नेताविहीन’ आंदोलन लोकतंत्र में नहीं, बल्कि अव्यवस्था में खत्म होते हैं।
असली Gen Z क्रांति: खामोश, डिजिटल और निर्णायक
भारत का Gen Z सड़कों पर उतरकर इतिहास रचने की जरूरत नहीं समझता। उनकी क्रांति शांत लेकिन गहरी है- स्टार्टअप्स में, सिविक टेक में, डिजिटल गवर्नेंस में और अपनी पहचान पर नए गर्व में। वे दिल्ली की सड़कों पर नारे लगाने की बजाय अगला आधार कोड कर रहे हैं। वे हाईवे पर टायर जलाने की बजाय टियर-3 शहरों से डॉलर कमा रहे हैं।
ये भारतीय असहमति का नया चेहरा है-रचनात्मक, जो विनाशकारी नहीं है। और यही वो चीज है, जो BBC को परेशान करती है- एक ऐसी पीढ़ी, जिसे कट्टरपंथी बनाया नहीं जा सकता, सिर्फ प्रेरित किया जा सकता है।
BBC क्यों चाहता है कि भारत में खून बहे
जब BBC लिखता है कि भारत का Gen Z ‘सतर्क लेकिन बगावती नहीं’ है, तो ये तारीफ नहीं, बल्कि शिकायत है। वो चाहता है टूटे शीशों, आँसू गैस और तिरंगे से रंगे अशांति के फुटेज, जो भारत को फिर से अस्थिरता का देश दिखा सकें।
क्योंकि BBC के लिए मोदी के नेतृत्व में शांत, आत्मविश्वास से भरा और आत्मनिर्भर भारत सबसे बड़ा दुःस्वप्न है। वो एक हिंदू-बहुसंख्यक लोकतंत्र को समझ नहीं पाता, जो अपनी आस्था के लिए माफी माँगे बिना फलता-फूलता है, सड़कों के वीटो को तोड़ता है और पश्चिमी नैतिक उपदेशों के सामने झुकने से इनकार करता है।
वही BBC जो काठमांडू में आगजनी की तारीफ करता है, उसे दिल्ली में ‘लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति’ कहेगा, जब तक कि आग उनके अपने दूतावासों के करीब न पहुँच जाए।
राहुल गाँधी और BBC का कनेक्शन
दिलचस्प बात ये है कि BBC का उकसावा अकेले नहीं गूँजा। नेपाल में केपी ओली की सरकार गिरने के कुछ ही दिनों बाद, राहुल गाँधी ने अचानक भारत के Gen Z के लिए नया प्यार जाहिर किया, जिसे सिर्फ सियासी मौकापरस्ती ही कहा जा सकता है।
X पर गाँधी ने ऐलान किया कि ‘Gen Z संविधान बचाएगा और वोटर फ्रॉड रोकेगा,’ और फिर उनकी पार्टी ने एक अजीब ‘Gen Z गान’ लॉन्च किया– एक रैप सॉन्ग, जो गुस्से और बगावत को रोमांटिक बनाता है और इसे “युवा भारत की आवाज” बताता है।
BBC की शिकायत और कॉन्ग्रेस की इस नई चाल के बीच सटीक तालमेल देखना मुश्किल नहीं। BBC भारतीय नौजवानों को डरे हुए पीड़ितों के रूप में दिखाता है; राहुल गाँधी उन्हें नारों, गानों और बनावटी गुस्से से ‘जगाने’ की कोशिश करते हैं। एक वैचारिक जमीन तैयार करता है, दूसरा सियासी स्क्रिप्ट देता है।
ये तालमेल इत्तेफाक नहीं बल्कि एक इकोसिस्टम का हिस्सा है। दोनों का मकसद एक है: भारत के नौजवानों को सुधार की बजाय विद्रोह करने, बहस की बजाय तोड़ने के लिए उकसाना। BBC कहानी लिखता है; कॉन्ग्रेस उसे बढ़ावा देती है, इस उम्मीद में कि सोशल मीडिया की चिंगारी सड़कों पर आग बन जाए।
भारत की शांति, उसके मौजूदा नेतृत्व में भरोसा
लेकिन अब तक भारतीय नौजवानों ने लोकतंत्र और मौजूदा नेतृत्व में भरोसा दिखाया है। ये सिर्फ भरोसा नहीं, उससे कहीं ज्यादा है।
भारत के लोकतंत्र की खूबी उसकी आवाज में नहीं, बल्कि उसके संयम में है। एक अरब लोगों का एक साथ रहना, बहस करना और अपनी राजधानी को जलाए बिना वोट करना कमजोरी नहीं, सभ्यता है।
BBC को शाहीन बाग जैसा कुछ और चाहिए, लेकिन भारत आगे बढ़ चुका है। मोदी सरकार ने भागीदारी के विचार को सड़क विद्रोहों से डिजिटल सशक्तिकरण और नीतिगत जुड़ाव तक बदल दिया है। और भारत का नौजवान ‘दबाया’ हुआ नहीं है, बल्कि उस देश को बनाने में व्यस्त है, जिस पर BBC को शक करना पसंद है।
तो… बीबीसी जी, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि Gen Z अपनी नियति हासिल करने में ‘नाकाम’ हो रहा। बाल्कि वो अपने लक्ष्यों की ओर खामोशी से बढ़ रहा है। यही खामोशी बीबीसी को हजम नहीं हो रही।
यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में आज अगर आप शाम को सड़क पर घूमें, तो लगेगा जैसे कोई शांत गाँव हो। लेकिन दो-तीन दशक पहले ये इलाका ‘मिनी चंबल’ कहलाता था। डाकुओं का राज था, जहाँ शाम पाँच बजे के बाद घर से निकलना मौत को न्योता देना था। अपहरण, लूट, हत्या और नरसंहार रोज की बात थी। लालू यादव के जंगलराज में ये सब चरम पर था।
लेकिन एक साधारण फौजी बद्री नरायन पांडे ने हिम्मत दिखाई। उन्होंने ग्राम रक्षा दल बनाया, जो न सिर्फ चंपारण को डाकुओं से आजाद करा गया, बल्कि पूरे देश में स्वयंरक्षा की मिसाल बन गया। छत्तीसगढ़ के सलवा जुडूम से लेकर जम्मू-कश्मीर के गाँव रक्षा दलों तक पांडे की ये कहानी आज भी प्रेरित कर रही है।
बद्री नरायन पांडे ने ऑपइंडिया के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि ये सब कैसे शुरू हुआ। लेकिन पहले आइए, उस काले दौर को समझें- जब बिहार जंगलराज का शिकार था। 1990 से 2005 तक लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की सरकार में अपराध आसमान छू रहा था। आँकड़े झकझोर देने वाले हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौर में 32,000 से ज्यादा अपहरण हुए, 18,000 हत्याएँ हुईं और 59 बड़े नरसंहार हुए। पटना हाईकोर्ट ने 1997 में इसे आधिकारिक तौर पर ‘जंगलराज‘ करार दिया।
बिहार में जंगलराज का दौर और मिनी चंबल का खौफ
1990 का दशक बिहार के लिए अंधेरे का दौर था। उस समय लालू प्रसाद यादव की सरकार थी और बिहार में जंगलराज शब्द आम हो चुका था। पश्चिम चंपारण का बगहा क्षेत्र, जिसे लोग ‘मिनी चंबल’ कहते थे, डकैतों के आतंक का गढ़ बन चुका था। शाम 5 बजे के बाद लोग घरों से बाहर निकलने से डरते थे। अपहरण, लूट, हत्या और बलात्कार जैसी घटनाएँ रोजमर्रा की बात थीं। स्कूल-कॉलेज बंद हो गए थे, व्यापारी बाजार नहीं जाते थे और किसान अपने खेतों में जाने से कतराते थे। इस क्षेत्र में डकैतों का ऐसा खौफ था कि लोग अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं थे।
ऐसे ही जंगलराज का सबसे क्रूर चेहरा था 14 दिसंबर 1994 का नरकटिया नरसंहार। रामनगर प्रखंड के नरकटिया भुअरवा गाँव में डाकुओं ने 15 ग्रामीणों को बेरहमी से मार डाला। सशस्त्र डकैतों ने एक ही रात में गौरी शंकर महतो, जय राम महतो, रामविलास महतो, विश्राम महतो, धर्मराज महतो, भिखारी महतो, छेदी महतो, रौशन महतो, रोगाही महतो, नरसिंह महतो, भुवनेश्वर महतो, रुदल महतो, बलिराम महतो, सदाकत मियाँ और पांडू मुंडा समेत एक दर्जन से अधिक ग्रामीणों की निर्मम हत्या कर दी।
इस नरसंहार ने पूरे क्षेत्र में दहशत फैला दी। राधा यादव, रामचंद्र मल्लाह, अलाउद्दीन मियाँ, चुम्मन यादव, राजेंद्र चौधरी, किशोरी नुनियाँ, पत्थर चौहान और नेमा यादव जैसे कुख्यात डकैतों के गिरोह इस इलाके में आतंक का पर्याय बन चुके थे।
जंगलराज यानी लालू के शासन में अपराध का बोलबाला
लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के शासनकाल में बिहार में अपराध और राजनीति का गठजोड़ चरम पर था। पश्चिम चंपारण में डकैतों का ऐसा दबदबा था कि वे अपने दरबार लगाते थे, जहाँ राजनेता अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए माथा टेकने आते थे। डकैतों के सरगना जैसे भगड़ यादव, लच्छन यादव, बंसी यादव, हरिहर यादव, लालू यादव और सुरेश गोड न केवल अपराध करते थे, बल्कि स्थानीय राजनीति में भी दखल रखते थे। पुलिस और प्रशासन का इन पर कोई नियंत्रण नहीं था। सरकार की नाकामी के चलते आम लोग असहाय थे। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे और माता-पिता हर पल उनकी सलामती की दुआ माँगते थे।
इसी दौर में पश्चिम चंपारण के डीएम ने इस क्षेत्र को ‘मिनी चंबल’ घोषित कर दिया था। जज तक को गोली मार दी जाती थी। 1986 में पुलिस ने ‘ऑपरेशन ब्लैक पैंथर’ शुरू किया, लेकिन यह भी नाकाम रहा। डकैतों का आतंक कम होने का नाम नहीं ले रहा था। ऐसे में आम लोगों ने हिम्मत जुटाई और अपने स्तर पर इस आतंक से लड़ने का फैसला किया।
बद्री नारायण पांडे ने की ग्राम रक्षा दल की शुरुआत
इस भयावह माहौल में एक साधारण व्यक्ति बद्री नारायण पांडे ने समाज को डकैतों के आतंक से मुक्त करने की ठानी। सेना के मेडिकल कोर से रिटायर्ड क्लर्क पांडे अपने गाँव सिसवा-बसंतपुर में डकैतों के खौफ को देख चुके थे। लोग सुबह 8 बजे से पहले दरवाजे नहीं खोलते थे और सूरज ढलते ही घरों में कैद हो जाते थे। पांडे ने इस स्थिति को बदलने का बीड़ा उठाया।
27 जुलाई 1990 को उन्होंने ग्राम रक्षा दल की स्थापना की। यह एक ऐसा संगठन था, जिसमें गाँव के हर उम्र और जाति के लोग शामिल हुए। पांडे ने शुरुआत में कुछ ग्रामीणों को इकट्ठा कर एक ‘शहीदी जत्था’ बनाया और सभी लाइसेंसी हथियारों को एकत्र किया। उन्होंने शपथ दिलाई कि वे गाँव की सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा देंगे। इस दल ने गाँव में चौकसी शुरू की। हर गाँव में चौकियाँ बनाई गईं, जहाँ बिना पहचान और सत्यापन के किसी को प्रवेश नहीं मिलता था। दिन में लोग हथियार चलाने की ट्रेनिंग लेते थे और रात में जागकर ड्यूटी देते थे। महिलाएँ और बच्चे भी खोजी मिशन में शामिल होते थे।
अभयानंद और जी. कृष्णैया का मिला सहयोग
इस मुहिम में पांडे को तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अभयानंद और डीएम जी. कृष्णैया का साथ मिला। अभयानंद ने पांडे के प्रयासों को समझा और उन्हें नैतिक व लॉजिस्टिक समर्थन दिया। जी. कृष्णैया ने भी अपनी नौकरी की परवाह न करते हुए ग्रामीणों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। दोनों अधिकारियों ने ग्राम रक्षा दल की बैठकों में हिस्सा लिया और उनका हौसला बढ़ाया। हालाँकि साल 1994 में गोपालगंज में डीएम के पद पर तैनात जी. कृष्णैया की हत्या कर दी गई, जो उस समय लालू यादव के गृह जिले में थे। उनकी हत्या ने पूरे बिहार में हड़कंप मचा दिया, लेकिन ग्राम रक्षा दल के हौसले को नहीं तोड़ सकी।
ग्राम रक्षा दल ने अनुशासित सेना की तरह किया काम
ग्राम रक्षा दल ने डकैतों से निपटने के लिए सैन्य शैली में काम किया। उन्होंने डकैतों के मुखबिरों और सहयोगियों को चिह्नित किया। कुछ को सुधारने की कोशिश की, और जो नहीं माने, उन्हें गाँव से निकाल दिया या सजा दी। पांडे ने डकैतों के गिरोह में सेंध लगाई और उनके सहयोगियों को अपने पक्ष में कर लिया। उन्हें मुख्यधारा में लाने का लालच दिया और उनके परिवारों को सुरक्षा का भरोसा दिलाया। इस तरह डकैतों की जासूसी शुरू हुई। ग्राम रक्षा दल को डकैतों के हथियारों और गोलियों की पूरी जानकारी रहती थी। जब डकैत हमला करते और उनकी गोलियां खत्म हो जातीं, तब ग्राम रक्षा दल जवाबी कार्रवाई करता और उन्हें मार गिराता या पकड़ लेता।
साल 1990 से 2002 तक यह सशस्त्र संघर्ष चला। इस दौरान ग्राम रक्षा दल ने मशीन गन, स्टेन गन जैसे हथियार छीने और उन्हें सरकार को सौंपा। उनके पास एक समय में 16,000 हथियार थे, जिनमें 9,500 लाइसेंसी थे। इस संगठन ने 375 से अधिक गाँवों में अपनी इकाइयाँ स्थापित कीं, जो पश्चिम चंपारण के 60% से अधिक क्षेत्र को कवर करती थीं। डकैतों को सोमेश्वर पहाड़ियों के जंगलों में खदेड़ दिया गया। इस मुहिम ने डकैतों को आत्मसमर्पण करने या भागने के लिए मजबूर कर दिया।
नरकटिया नरसंहार और ग्राम रक्षा दल का जवाब
नरकटिया नरसंहार के बाद जब डकैतों ने गाँव वालों से चावल, बकरी और महिलाओं की माँग की और मना करने पर 15 लोगों की हत्या कर दी, ग्राम रक्षा दल ने और सख्ती दिखाई। उन्होंने एक किलोमीटर लंबी मानव श्रृंखला बनाई, जिसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। इस एकजुटता ने डकैतों के हौसले पस्त कर दिए। 16 बच्चों के एक साथ अपहरण की घटना में ग्राम रक्षा दल ने त्वरित कार्रवाई कर उन्हें छुड़ा लिया।
राजनीतिक विरोध भी हुआ, घबराई हुई थी आरजेडी
ग्राम रक्षा दल की बढ़ती ताकत से सत्ताधारी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) घबरा गया। उन्हें डर था कि बद्री नारायण पांडे अपनी राजनीतिक पार्टी बनाकर उनकी सत्ता को चुनौती देंगे। विधानसभा और लोकसभा में ग्राम रक्षा दल के खिलाफ आवाज उठी, लेकिन तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लिया और कहा कि जब सरकार लोगों की सुरक्षा में नाकाम है, तो आम लोग अपनी रक्षा के लिए कदम उठा रहे हैं। इस समर्थन ने ग्राम रक्षा दल को और मजबूती दी।
2002 तक पश्चिम चंपारण से डकैतों का लगभग सफाया हो चुका था। डकैतों ने आत्मसमर्पण किया और बगहा जैसे क्षेत्रों में शांति लौट आई। ग्राम रक्षा दल की इस सफलता ने छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम जैसे आंदोलन को प्रेरित किया। आज भी जम्मू-कश्मीर में ग्राम रक्षा दल जैसे संगठन आतंकवाद से लड़ने के लिए सरकार द्वारा तैनात किए गए हैं।
एसएन सुब्बाराव बने बद्री पांडे की प्रेरणा
बद्री पांडे की प्रेरणा का स्रोत यूथ प्रोजेक्ट बेंगलुरु में उनकी भागीदारी थी, जहाँ एस.एन. सुब्बाराव के नेतृत्व में युवाओं को सामाजिक कार्यों के लिए प्रेरित किया जाता था। पांडे ने इस प्रेरणा को अपने गाँव में लागू किया और समाज को एकजुट कर डकैतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनकी अगुवाई में ग्राम रक्षा दल ने न केवल डकैतों को हराया, बल्कि समाज में अनुशासन और एकता का नया माहौल बनाया।
अपराध मुक्ति की तरफ आज का पश्चिम चंपारण
साल 2005 में नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद बिहार में अपराध पर काफी हद तक लगाम लगी। कभी डकैतों का गढ़ रहे पश्चिम चंपारण के गोबरहिया थाना क्षेत्र आज अपराधमुक्त है। पिछले पाँच वर्षों में यहाँ हत्या, लूट, छीना-झपटी या महिला उत्पीड़न जैसे मामले न के बराबर हैं। गाँवों में ‘गुमस्ता’ नामक व्यक्ति विवादों का निपटारा करते हैं, जिससे मामले थाने तक नहीं पहुँचते।
1990 में ‘ग्राम रक्षा दल शहीदी जत्था’ की स्थापना कर चंपारण को डाकुओं के आतंक से मुक्त कराने वाले बद्री नारायण पांडे से सुनिए चंपारण के डकैती और लूट के अंधकार में डूबने की कहानी।
बद्री नारायण पांडे और उनके ग्राम रक्षा दल की कहानी बिहार के जंगलराज से जूझते हुए एक समाज की जीत की कहानी है। नरकटिया नरसंहार जैसे भयावह दौर से निकलकर पश्चिम चंपारण ने शांति और सुरक्षा की मिसाल कायम की। पांडे की हिम्मत, अभयानंद और जी. कृष्णैया जैसे अधिकारियों का सहयोग और ग्रामीणों की एकजुटता ने ‘मिनी चंबल’ को अपराधमुक्त क्षेत्र में बदल दिया। यह कहानी न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है कि अगर समाज एकजुट हो जाए, तो कोई भी चुनौती असंभव नहीं है।
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में 18 साल की हिंदू युवती को मोहम्मद रिहान खान अगवा कर ले गया। युवती को लापता हुए तीन दिन हो गए हैं। युवती के परिजन ने पुलिस थाने में शिकायत भी दर्ज कराई है। वहीं सोशल मीडिया पर युवती की माँ का रोते हुए वीडियो भी वायरल हो रहा है।
वाडियो में युवती की माँ रोते हुए आपबीती सुना रही हैं। लाचार माँ आँसू रोकते हुए कहती हैं कि मोहम्मद रिहान उनके बेटी को जबरन घर से उठा कर ले गया है। वे कहती हैं कि 24 घंटे से ऊपर हो गए हैं लेकिन बेटी का कुछ पता नहीं लगा है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से आरोपित के घर बुलडोजर चलाने की भी माँग की है।
युवती के पिता ने बताया कि पुलिस से अपहरण की शिकायत दर्ज कराई जा चुकी है, लेकिन पुलिस अभी तक उनकी बेटी की तलाश नहीं कर पाई है। पिता ने बताया कि उनकी बेटी संदिग्ध हालात में घर से गायब हो गई है। परिवार ने युवती को आसपास के इलाकों में काफी तलाशा लेकिन उसका कुछ पता नहीं लगा है।
पुलिस थाने में दर्ज FIR
बेटी के अपहरण मामले में परिजनों ने थाना कोतवाली रुदौली में शिकायत की है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। परिजनों ने पुलिस से शिकायत करते हुए बेटी को वापस लाने की माँग की है।
FIR के मुताबिक, सोहसा क्षेत्र के रहने वाली निर्मला पत्नी दुर्गा प्रसाद ने अपने बेटी राधा के अपहरण की शिकायत का आवेदन दिया है। परिजनों ने बताया कि 21 अक्टूबर 2025 की शाम करीब 7.30 बजे गाँव का ही रहने वाला मोहम्मद रिहान खान उनकी बेटी राधा को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया।
FIR कॉपी का स्क्रीनशॉट
परिजनों ने कहा कि अब तक बेटी घर नहीं लौटी है। परिजनों को डर है कि उनकी बेटी के साथ कुछ गलत न हो जाए। परिजनों ने गुहार लगाते हुए पुलिस से जल्द से जल्द बेटी को वापस लाने की माँग की है। साथ ही आरोपित के खिलाफ कार्रवाई की भी माँग की है।
पुलिस का बयान
परिजनों की तहरीर पर रुदौली पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत धारा 87 में अभियोग पंजीकृत कर लिया है। ये धारा अपहरण, जबरन भगा ले जाने और शादी के लिए जबरदस्ती आदि अपराध में दर्ज की जाती है।
रुदौली पुलिस ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा है कि जैसे ही शिकायत मिली हमने तुरंत केस दर्ज कर लिया है और आरोपित को पकड़ने की कोशिश की जा रही है। पुलिस का कहना है कि जल्द ही आरोपित को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
दुनिया में लोकतांत्रिक सरकारों के तख्तापलट में शामिल जॉर्ज सोरोस से फंडिंग पाने वाली संस्था ने धन्या राजेंद्रन को अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया है। आपको कर्नाटक के धर्मस्थल मामले में ‘द न्यूज मिनट’ (टीएनएम) की रिपोर्टिंग तो याद ही होगी, किस तरह धर्मस्थल को बदनाम करने के लिए एक के बाद एक कहानियों को ‘द न्यूज मिनट’ ने हवा दी थी। टीएनएम ने इस मामले में तथ्यों को देखने के बजाय धर्मस्थल के बारे में जहर उगला और अब उसे शायद उसका ईनाम भी मिल गया है।
टीएनएम की सह-संस्थापक और प्रधान संपादक धन्या राजेंद्रन को भारत की ओर से रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) इम्पैक्ट प्राइज ऑफ द ईयर 2025 के लिए नामित किया गया है। RSF ने नॉमिनेशन में लिखा है, ‘‘धन्या राजेंद्रन प्रेस की स्वतंत्रता के लिए एक व्यापक लड़ाई में शामिल हो गई हैं, जिस पर भारत सरकार प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर रही है।” RSF ने टीएनएम को ‘गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता का मानक’ बताया है।
वो कहते हैं ना कि ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’। वही, हाल RSF और धन्या का है। RSF के नॉमिनेशन को पढ़कर लगता है कि दुनिया में दमन की सबसे बड़ी शिकार धन्या ही है। RSF ने लिखा, “उन्हें और उनकी टीम को उनके काम के कारण बार-बार मुकदमों का सामना करना पड़ा है और ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है।” जिस संस्थान ने धन्या को अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया है, वो खुद ‘दूध की धुली’ नहीं है। वो खुद जॉर्ज सोरोस से पैसा लेती है, वही सोरोस जो लोकतांत्रिक देशों की सरकारों में हस्तक्षेप करने के लिए कुख्यात है।
कर्नाटक धर्मस्थल को लेकर टीएनएम का प्रोपेगेंडा
जुलाई 2025 में कर्नाटक के धर्मस्थल मंदिर के पूर्व सफाई कर्मचारी सी.एन. चिन्नैया ने इस क्षेत्र में ‘सैकड़ों शवों’ को दफनाने का दावा किया था। सफाई कर्मचारी चिन्नैया ने घटना का वक्त 1995 से 2014 के बीच का बताया। बगैर सबूत के सिर्फ चिन्नैय की गवाही के आधार पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने जाँच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया।
दो हफ्तों तक SIT के अधिकारी शवों की तलाश में जंगलों, नदी के किनारों और घाटों की खाक छानते रहे। लेकिन अंत में सब खाली हाथ रहे। कोर्ट में चिन्नैया ने माना कि उसने झूठ बोला था। चिन्नैया का ‘राज’ खुल गया और पता चला कि वो वास्तव में धर्मस्थल, उसके मंदिर ट्रस्ट और धर्माधिकारी वीरेंद्र हेगड़े को बदनाम करने की साजिश का एक मौहरा भर था।
टीएनएम जैसे प्रोपेगेंडा मीडिया ने इसे हाथों-हाथ लिया और इस विषय पर दर्जनों रिपोर्ट की गईं। टीएनएम ने बेबुनियाद आरोपों की खूब रिपोर्टिंग की और उनका विश्लेषण किया।
टीएनएम का हिंदू विरोधी प्रोपेगेंडा
धर्मस्थल मामले में तो टीएनएम की हिंदू विरोधी सोच उजागर हुई ही थी लेकिन यह कोई इकलौता या पहला मामला नहीं है। टीएनएम लंबे वक्त से हिंदुओं को निशाना बनाता रहा है। ये वही पोर्टल है जिसने सामूहिक दुष्कर्म के एक मामले में मुस्लिम आरोपित के नामों को हिंदू नामों से बदल दिया था। बाद में खुद टीएनएम को सच स्वीकार पड़ा तो उस पर खूब सवाल खड़े हुए। यह पोर्टल हमेशा उन खबरों को प्रमुखता से उठाता है जिनमें निशाना हिंदू संस्थान या समुदाय होते हैं।
टीएनएम की इस प्रवृत्ति की झलक ‘द केरल स्टोरी’ की कवरेज के दौरान भी देखने को मिली। फिल्म में उन महिलाओं की सच्ची गवाही दिखाई गई थी, जिन्हें प्रेम जाल में फँसाकर धर्मांतरण कराया गया और बाद में आईएसआईएस दुल्हनों के रूप में भेज दिया गया। लेकिन ‘द न्यूज मिनट’ ने इन दर्दनाक सच्चाइयों को नजरअंदाज कर फिल्म को ‘दुष्प्रचार’ बता दिया था। यानी जहाँ अपराधियों का संबंध इस्लाम से था वहाँ पीड़िताओं की आवाज को ही खारिज कर दिया गया।
देवभूमि उत्तराखंड में मस्जिदों और मदरसों द्वारा सरकारी जमीनों पर किए गए अवैध कब्जों के कई प्रमाण सामने आए। वन भूमि और यहाँ तक कि तीर्थ मार्गों पर भी मस्जिदें और मदरसे बन जाने के दस्तावेजी सबूत मिले तोड़फोड़ के दौरान राजनीतिक बहसें भी हुईं। लेकिन इन गंभीर खुलासों पर ‘द न्यूज मिनट’ पूरी तरह चुप रहा, न कोई खोजी रिपोर्ट, न कोई संपादकीय प्रतिक्रिया। वहीं, जब किसी हिंदू धार्मिक संस्था पर ऐसा आरोप लगता है, तो TNM तुरंत उसे ‘एक्सक्लूसिव रिपोर्ट’ बना देता है।
इसी तरह, लव जिहाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी TNM की चुप्पी साफ दिखाई देती है। जब यह पोर्टल कभी-कभार इन मामलों पर लिखता भी है, तो उसे ‘दक्षिणपंथी सोच’ या ‘कल्पित प्रचार’ बताकर खारिज कर देता है। यह रवैया उन हजारों महिलाओं के दर्द का अपमान है जो झूठे प्रेम के जाल में फँसकर धर्म परिवर्तन और शोषण की शिकार हुईं।
सोरोस के पैसे से होती हैं RSF की फंडिंग
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (रिपोर्टर्स सेंस फ्रंटियर्स या RSF) इससे पहले प्रोपेगैंडिस्ट यूट्यूबर रवीश कुमार को ‘इंडिपेनडेंस प्राइज’ दे चुका है और मोहम्मद जुबैर जैसे प्रोपगेंडा फैलाने वाले लोगों के समर्थन में खड़ा रहा है। RSF को जॉर्ज सोरोस, भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए कुख्यात Ford Foundation सहित पश्चिमी सरकारों और निजी संस्थाओं द्वारा भारी मात्रा में फंड दिया जाता है। RSF खुद भी भारत विरोध के लिए कुख्यात है और इसके प्रेस फ्रीडम इंडेक्स को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं।
SRF को फंड देने वालों में यूरोपीय आयोग MFA, AIDS, Front Line, Oak Foundation, NHRF TAPIEI, MOF Danida Taiwan, NED, Ford Foundation, OSF Core Support (जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन) प्रमुख हैं। NED एक अमेरिकी सरकारी संगठन है, जिसे अक्सर CIA की ‘सॉफ्ट ताकत’ या शांति से सत्ता बदलने वाले हथियार के रूप में जाना जाता है।
RSF (Reporters Without Borders) की भारत पर रिपोर्टिंग उसके राजनीतिक पक्षपात को उजागर करती है। इसके ‘इंडिया फैक्ट फाइल’ में मोदी समर्थकों को ‘भक्त’ कहा गया है, ‘गोदी मीडिया’ का मजाक उड़ाया गया है और प्रधानमंत्री पर ‘प्रेस स्वतंत्रता संकट’ का आरोप लगाया गया है।
RSF की रिपोर्ट्स में इसकी भारत से घृणा भी साफ नजर आती है। मई 2023 में RSF ने अपनी वार्षिक प्रेस स्वतंत्रता रिपोर्ट जारी की, जिसमें उसने भारत को 180 देशों में से 161वें स्थान पर रखा। RSF के अनुसार, 2022 से भारत 11 पायदान नीचे खिसक गया है। दिलचस्प बात यह है कि RSF के अनुसार, पाकिस्तान के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में सुधार हुआ है। 2022 में 157वें स्थान से पाकिस्तान ने सूची में 150वां स्थान प्राप्त किया है।
RSF का नजरिया समझने के लिए जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (OSF) को देखना होगा, जो Alt News, The Wire, The Quint और Scroll जैसे पोर्टलों को फंड करती है। इसका मकसद स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं बल्कि भारत पर वैचारिक नियंत्रण है। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि RSF, जो सोरोस की सोच को मानता है, अक्सर उन पत्रकारों को इनाम देता है जो ‘स्वतंत्रता की बोलने’ को देश-विरोधी काम और ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ को सरकार की आलोचना से जोड़ते हैं।
लोगों ने भी उठाए सवाल
धन्या के नामांकन पर सोशल मीडिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। व्यवसायी मोहनदास पई ने X पर एक पोस्ट कर सवाल उठाए हैं। पई ने X पर टीएनएम के एक पोस्ट पर लिखा, “बेहद शर्मनाक। (नामांकन) किसलिए? धर्मस्थल पर फर्जी कहानी गढ़ने के लिए? अति वामपंथी इकोसिस्टम काम कर रहा है!” उन्होंने लिखा, “पहले झूठी कहानी गढ़ो, फिर इकोसिस्टम ऐसे ‘पीत पत्रकारों’ को पुरस्कारों के लिए नामांकित करता है! अगर धन्या में जरा भी ईमानदारी और आत्मसम्मान है, तो धर्मस्थल से जुड़ी फर्जी कहानियों के लिए माफी माँगे।”
Very shameful. For what? Running a fake narrative on Dharmasthala? The extreme left eco system at work! Create fake narratives, the eco system then nominates such yellow journalists for awards! If @dhanyarajendran has any honesty and self respect, must apologise for the… https://t.co/y9A8rrudYd
धर्मस्थल कांड ने जब दिखाया कि पत्रकारिता के नाम पर झूठ कितनी आसानी से फैलाया जा सकता है। RSF द्वारा धन्या राजेंद्रन का नामांकन इसका उदाहरण है। यह पत्रकारिता की ईमानदारी के लिए नहीं बल्कि विचारधारा के लिए काम करने का इनाम है।