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तालिबान का उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में दारुल उलूम देवबंद से रिश्ता क्या? तालिबान का मतलब ‘छात्र’ और देवबंद उसका ‘स्कूल’

देवबंद तालिबान को विदेशी ताकतों को अपनी जमीन से निकालने वाले वीर लड़ाकों के रूप में तारीफ करता है, इसे अक्सर भारत के ब्रिटिश औपनिवेशिक विरोध से जोड़ता है।

अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने शनिवार (11 अक्टूबर 2025) को तालिबान सरकार की ओर से दारुल उलूम देवबंद का दौरा किया। मुत्ताकी का भारत दौरा पहले से ही चर्चा में है, क्योंकि 2021 में अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद यह तालिबान सरकार का पहला ‘कूटनीतिक’ दौरा है।

मुत्ताकी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पाबंदियों से अस्थाई छूट मिली। वे 9 अक्टूबर को दिल्ली पहुँचे, जब UNSC ने उन्हें 9 से 16 अक्टूबर तक यात्रा प्रतिबंध से छूट दी।

मुत्ताकी ने भारतीय राजनयिकों, विदेश मंत्री जयशंकर से मुलाकात की और दिल्ली में अफगान दूतावास में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इससे पहले भारत ने काबुल मिशन को ‘दूतावास’ का दर्जा दिया था।

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर स्थित दारुल उलूम देवबंद में मुत्ताकी का सैकड़ों मुस्लिमों, मौलवियों, छात्रों और इस्लामी नेताओं ने स्वागत किया। पाँच घंटे के दौरे में उन्होंने सेमिनरी के रेक्टर मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी और जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी से मुलाकात की, अफगान छात्रों से बात की और लाइब्रेरी का दौरा किया।

मुत्ताकी ने सार्वजनिक सभा को संबोधित किया, कुरान की आयतें पढ़ीं और अफगानिस्तान के इस्लामी विरासत के साथ देवबंद के ‘गहरे रिश्तों’ की तारीफ की। उन्होंने तालिबान की विचारधारा को आकार देने में सेमिनरी की भूमिका पर जोर दिया, जिसकी शुरुआत 1866 में औपनिवेशिक विरोध से हुई थी।

मुत्ताकी से मुलाकात के बाद जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा, “मैंने उनसे कहा कि हमारा रिश्ता सिर्फ शैक्षिक नहीं है। आपने भारत की आजादी में योगदान दिया। हमारे पूर्वजों ने अफगानिस्तान की जमीन को भारत की आजादी के लिए चुना… आपने अपनी आजादी के लिए अमेरिका और रूस जैसे देशों को हराया। हमने आपको सिखाया कि ब्रिटेन को कैसे हराया जाता है।”

मदनी ने आगे कहा, “मैंने उनसे (मुत्ताकी) कहा कि यह मुलाकात दिखाती है कि भारत के मुस्लिम और दारुल उलूम देवबंद का आपके साथ गहरा रिश्ता है। दुनिया के देशों में, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, आपसी तालमेल होना चाहिए। हमने कोई राजनीतिक बात नहीं की। दोनों देशों के रिश्ते बेहतर होंगे। भारत का शिकायत थी कि अफगानिस्तान से आतंकवादी आते हैं। अब इस मुलाकात से साफ है कि अफगानिस्तान से भारत में कोई आतंकवादी नहीं आएगा।”

दारुल उलूम देवबंद तालिबान का वैचारिक केंद्र है। तालिबान की स्थापना देवबंदी सुन्नी इस्लाम के आधार पर हुई, जो सहारनपुर के इस सेमिनरी से शुरू हुआ, जिसकी स्थापना 1866 में हुई थी।

1857 के भारतीय विद्रोह के बाद स्थापित इस सेमिनरी का मकसद औपनिवेशिक दौर में हनफी आदर्शों, धर्मशास्त्र और पारंपरिक इस्लामी शिक्षाओं को संरक्षित करना था।

देवबंद के संस्थापक मुहम्मद कासिम नानौटवी और राशिद अहमद गंगोही ने विदेशी प्रभाव के खिलाफ इस्लामी सिद्धांतों पर लौटने पर जोर दिया, जिसने बाद में आंदोलन की औपनिवेशिक विरोधी और जिहादी धाराओं को प्रभावित किया।

देवबंदी विद्वानों ने 1913 से 1920 के बीच अफगानिस्तान, ऑटोमन साम्राज्य और जर्मन साम्राज्य के साथ वैचारिक कूटनीति शुरू की, ताकि भारत में ब्रिटिशों को चुनौती दी जा सके। बीसवीं सदी की शुरुआत से ही अफगान छात्र उत्तर प्रदेश आए, यहाँ इस्लामी डिग्री हासिल की और अफगानिस्तान में मदरसे व संस्थान स्थापित किए।

भारत के बँटवारे से पहले और बाद में, देवबंदी विचारधारा दक्षिण एशिया, खासकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में फैली। देवबंदी मौलवी इन देशों में मदरसे स्थापित करने गए, जहाँ सुन्नी मुस्लिम बच्चों को उनकी विचारधारा सिखाई गई।

1980 के दशक में पाकिस्तान में मुहम्मद जिया-उल-हक की इस्लामीकरण नीतियों से अफगान सीमा पर देवबंदी संस्थान बढ़े, जो सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान सऊदी फंडिंग से वहाबी प्रभाव के साथ मिल गए।

इसी दौर में देवबंदी विचारधारा और सऊदी वाहबी प्रभाव के मिश्रण से तालिबान का जन्म हुआ।

तालिबान की शरिया की सख्त व्याख्या देवबंदी कट्टरपंथ और पश्तून जनजातीय नियमों का मिश्रण है। उसमें मौलवियों के पूर्ण अधिकार, सख्त लैंगिक अलगाव और इस्लाम से भटकने वालों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई पर जोर है।

कई तालिबान नेता देवबंदी मदरसों के छात्र रहे हैं। तालिबान का दारुल उलूम देवबंद से सीधा रिश्ता पाकिस्तान के संबद्ध मदरसों के जरिए है, न कि भारत के सेमिनरी से। तालिबान के संस्थापक मुल्ला मोहम्मद उमर सहित कई नेता पाकिस्तान के अकोरा खट्टक में दारुल उलूम हक्कानिया जैसे संस्थानों में पढ़े।

पाकिस्तान का दारुल उलूम हक्कानिया ‘जिहाद का विश्वविद्यालय’ कहलाता है। इसे मौलाना अब्दुल हक ने बनाया, जो बँटवारे से पहले दारुल उलूम देवबंद के छात्र और शिक्षक थे। उनके बेटे समी-उल-हक ने तालिबान का समर्थन किया और अफगान ‘जिहाद’ के लिए छात्रों को तैयार किया।

पाकिस्तान-अफगान सीमा पर फैले मदरसों को पाकिस्तान की ISI ने बढ़ावा दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ISI ने ऑपरेशन साइक्लोन के तहत अमेरिकी CIA के फंड से करीब 90,000 अफगानों, जिसमें तालिबान के शुरुआती नेता शामिल थे, को इन मदरसों में प्रशिक्षित किया, जिससे तालिबान का जन्म एक छात्र मिलिशिया के रूप में हुआ।

‘तालिबान’ शब्द का पश्तो में मतलब ‘छात्र’

साल 1994 तक देवबंदी मदरसों में पढ़े तालिबान लड़ाकों ने कंधार पर कब्जा किया और 2000 तक अफगानिस्तान का 90% हिस्सा नियंत्रित कर इस्लामी अमीरात बनाया।

दशकों से अफगान सुन्नी मुस्लिम दारुल उलूम देवबंद में इस्लामी धर्मशास्त्र पढ़ने आते रहे हैं। आज भी तालिबान के आधिकारिक दस्तावेज और सलाह में देवबंदी ग्रंथों का हवाला दिया जाता है। ग्रैंड मुफ्ती राशिद लुधियानवी, तालिबान के बड़े समर्थक, भी देवबंदी विद्वान थे।

1990 के दशक में तालिबान शासित अफगानिस्तान का दौरा करने के बाद, उन्होंने कई किताबें लिखीं, जिन्हें फतवों के रूप में प्रकाशित किया गया, जो मुल्ला उमर के शासन को वैध ठहराती थीं। उनके फतवे और ग्रंथ, जो मुस्लिमों को अमीर (तालिबान सुप्रीम लीडर) के प्रति पूर्ण वफादारी सिखाते थे, उमर के आदेश पर दारी और पश्तो में अनुवादित हुए और तालिबान के शरिया शासन का ढाँचा बने।

साल 2001 में जब तालिबान ने बामियान बुद्ध मूर्तियों को नष्ट किया, तब देवबंद ने इस कदम का समर्थन किया था।

देवबंद तालिबान को विदेशी ताकतों को अपनी जमीन से निकालने वाले वीर लड़ाकों के रूप में तारीफ करता है, इसे अक्सर भारत के ब्रिटिश औपनिवेशिक विरोध से जोड़ता है।

हालाँकि, देवबंद तालिबान के चरमपंथ और नागरिकों के खिलाफ क्रूरता से दूरी बनाए रखता है, भारत में शांतिपूर्ण देवबंदी विचारधारा पर जोर देता है। 2021 में महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध जैसे विवादास्पद नीतियों पर भी यह चुप रहा।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में संघमित्रा ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

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