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PETA का बॉम्बे HC के फैसले के खिलाफ अभियान, ‘मुंबईकर’ को पहनाया कबूतर का मुखौटा: सोशल मीडिया पर जमकर विरोध, जाने सेहत के लिए कितने खतरनाक हैं कबूतर

कबूतरों को दाना देने की परंपरा को बचाने के लिए पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) ने हाल ही में एक अभियान शुरू किया। खासतौर पर यह अभियान मुंबई में कबूतरों को दाना देने पर लगाए गए बैन को देखते हुए लॉन्च किया गया। अब इस अभियान के खिलाफ सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है।

दरअसल, पेटा इंडिया ने अभियान से जुड़ा एक वीडियो जारी किया, जिसमें मुंबई के लोग कबूतरों के मुखौटे पहनकर संदेश दे रहे हैं कि कबूतरों को भी प्यार और देखभाल की जरूरत है। इस वीडियो में यह भी दिखाया गया है कि कबूतरों को खाना देने पर बैन लगाने से ये पक्षी भूख से मर सकते हैं।

पेटा इंडिया ने वीडियो जारी कर लिखा, कबूतरों के बिना मुंबई का आसमान पहले जैसा नहीं रहा। फीडिंग पर लगे बैन के बाद ये कोमल पक्षी भुखमरी का सामना कर रहे हैं। सभी मुंबईवासियों ने ‘कबूतर’ बनकर सबको याद दिलाया कि कबूतर भी यहीं के हैं।

सोशल मीडिया पर पेटा के कबूतर अभियान का विरोध

सोशल मीडिया पर पेटा के इस अभियान की आलोचना शुरू हो गई। लोगों ने कबूतरों को इंसान के लिए खतरा बताया और कहा कि इससे कई बीमारियाँ होती है। इसके साथ पेटा को भारत-विरोधी भी बताया गया क्योंकि ये दिखावे का एक्टिविजम करता है। पेटा पर आर्टिकल 21 के तहत केस करने की भी माँग उठी।

ओपन लेटर नाम के एक्स हैंडल ने लिखा, “एक 400 ग्राम का कबूतर अपने जीवनकाल में लगभग 11 किलोग्राम बीट छोड़ता है। ये बीट सूखकर धूल में बदल जाती है और हवा में मिल जाती है। जब हम उस हवा में साँस लेते हैं तो धूल हमारे फेफड़ों तक पहुँच सकती है और निमोनिया, ब्रोंकाइटिस और अस्थमा जैसे संक्रमण पैदा कर सकती है।”

उन्होंने आगे बताया, “सिंगापुर में कबूतरों को खाना खिलाने पर आपको 500 डॉलर का जुर्माना लग सकता है। उनकी बीट अम्लीय भी होती है, जिसका मतलब है कि वे कारों, एयर कंडीशनर, इमारतों और स्मारकों को नुकसान पहुँचा सकती हैं। लेकिन जब मुंबई के दादर में कबूतरखाने बंद कर दिए गए तब भी कुछ लोग विरोध करने के लिए सामने आए और अब पेटा ऐसे ही बेतुके अभियान चला रहा है।”

एक्स पर राहुल देवधर लिखते हैं, “कबूतर अक्सर लोगों के लिए परेशानी का कारण बनते हैं क्योंकि ये कई तरह की बीमारियाँ फैलाते हैं। इन्हें आमतौर पर ‘आसमान के चूहे’ कहा जाता है। कई शहरों में कबूतरों को सक्रिय रूप से मारा जा रहा है। पेटा सचमुच भारत विरोधी है।”

डिमेंटर नाम के एक्स यूजर लिखते हैं, “किसी को @PetaIndia के खिलाफ केस दर्ज करना चाहिए क्योंकि वे अनुच्छेद 21 के तहत स्वस्थ जीवन के अधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं। कबूतरों को खाना देना फेफड़ों की बीमारियों का कारण बनता है। पेटा वाले केवल दिखावे के लिए एक्टिविज्म कर रहे हैं।”

क्या है कबूतरों को दाना डालने पर रोक लगाने वाला फैसला ?

पेटा ने कबूतरों के समर्थन में ये अभियान मुबंई में कबूतरों को दाना डालने पर रोक के बाद शुरू किया। दरअसल, जुलाई 2025 में BMC ने शहरभर के कबूतरखानों में दाना डालने पर रोक लगा दी। यह कदम सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताओं के मद्देनजर उठाया गया था क्योंकि कबूतरों के मल से फेफड़ों की बीमारियाँ फैलने का खतरा था। मामले में 31 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने BMC को निर्देश दिया कि वह कबूतरों को खाना देने वालों के खिलाफ FIR दर्ज करें।

क्या सचमुच कबूतर इंसान के लिए हानिकारक?

अब सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच कबूतर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं? तो स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कबूतरों के कारण स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएँ पैदा होती हैं। खासकर, कबूतरों के मल में कई तरह के फंगल और बैक्टीरियल संक्रमण मौजूद होते हैं, जो मनुष्यों के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं।

इनमें प्रमुख रूप से हिस्टोप्लास्मोसिस (Histoplasmosis) इंफेक्शन है, जो Histoplasma capsulatum नाम के फंगस से फैलता है और बुखार, खाँसी, थकान और छाती में दर्द जैसे लक्षण पैदा करता है।

इसके अलावा क्रिप्टोकोकोसिस, जो Cryptococcus neoformans नाम का फंगस है, गंभीर स्थिति में दिमाग की सूजन यानी मेंनिंजाइटिस का कारण बनता है। साथ ही सिटिकोसिस नाम के बैक्टीरियल संक्रमण भी कबूतरों के मल से ही फैलता है, जो फ्लू जैसे लक्षण पैदा करता है।

बच्चों, बुजुर्गों और प्रेग्ननेंट महिलाओं में कबूतरों के मल और पंखों से एलर्जी और अस्थमा जैसे समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं। इसके अलावा कबूतरों के मल में Salmonella और E. coli बैक्टीरिया पाया जाता है, जो पाचन तंत्र में संक्रमण का खतरा बढ़ाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन स्वास्थ्य जोखिमों से बचने के लिए कबूतरों के मल के सीधे संपर्क से बचना चाहिए। खासकर जब यह सूखा हो और हवा में उड़ने लगे। अगर मल को साफ करना जरूरी हो तो मास्क और दस्ताने का उपयोग करना चाहिए।

PM मोदी ने INS विक्रांत पर नौसेनिकों के साथ मनाई दीपावली, बोले- ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान को घुटनों पर लाई सेना: प्रधानमंत्री बनने के बाद सैनिकों के साथ मनाते रहे हैं दीपोत्सव

देश के बहादुर सशस्त्र बलों के साथ दिवाली मनाने की परंपरा को जारी रखते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोवा और कारवार के तट पर आईएनएस विक्रांत पर तैनात जवानों के साथ दिवाली मनाई। इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा, “ये हमारी अलौकिक दीपमालाएँ हैं, मेरा सौभाग्य है कि मैं नौसेना के जवानों के बीच दिवाली का पावन पर्व मना रहा हूँ।”

उन्होंने कहा कि आईएनएस विक्रांत सैन्य आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। आज एक तरफ अनंत क्षितिज, अनंत आकाश है, और दूसरी तरफ अनंत शक्तियों का प्रतीक यह विशालकाय आईएनएस विक्रांत है। समुद्र के पानी पर किरणों की चमक और बहादुर जवानों द्वारा जलाए गए दीपमालाएँ हैं।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि युद्ध के मैदान में जो जवान महसूस करता है, उसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता।” उन्होंने कहा कि कुछ महीने पहले ही हमने देखा कि कैसे विक्रांत नाम ने ही पूरे पाकिस्तान में खौफ़ की लहर दौड़ा दी थी। इसकी ताकत ऐसी है – एक ऐसा नाम जो युद्ध शुरू होने से पहले ही दुश्मन के हौसले पस्त कर देता है। यही है INS विक्रांत की ताकत।

उन्होंने याद करते हुए कहा कि विक्रांत के कमीशनिंग का दिन वह था जब भारतीय नौसेना ने पुराने ध्वज को हटाकर शिवाजी महाराज की मुहर के साथ नया ध्वज अपनाया था। इसका मकसद भारत के औपनिवेशिक अतीत मुक्ति था, क्योंकि उस वक्त तक तिरंगे में सेंट जॉर्ज क्रॉस भी था, जो ब्रिटिश काल से चला आ रहा था।

देश में नक्सलवाद के खात्मे के लिए अर्धसैनिक बलों की उन्होंने सराहना की। ‘आत्मनिर्भर भारत’ का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “जब दुश्मन सामने हो, युद्ध की आशंका हो तब जिसके पास अपने दम पर लड़ाई लड़ने की ताकत हो उसका पलड़ा हमेशा भारी रहता है। सेनाओं के सशक्त होने के लिए उनका आत्मनिर्भर होना बहुत आवश्यक है। जैसे-जैसे हमारा हर औजार, शस्त्र, हर पुर्जा जैसे-जैसे भारतीय होते जाएगा, हमारी ताकत को चार-चाँद लग जाएंगे।”

हर दिवाली, जवानों वाली

प्रधानमंत्री मोदी पिछले 10 सालों से हर साल दिवाली देश के वीर जवानों के साथ मनाते रहे हैं। 2025 में भी उन्होंने अपनी परंपरा को निभाते हुए गोवा और कारवार के तट पर आईएनएस विक्रांत का दौरा किया और जवानों के साथ दिवाली मनाई।प्रधानमंत्री सियाचिन बॉर्डर से कच्छ के रण तक तैनात जवानों के बीच दीपावली मनाते रहे हैं

साल 2024 में पीएम मोदी कच्छ के रण गए थे। इस दौरान बीएसएफ, नौसेना, वायु सेना और थल सेना के साथ अपना वक्त बिताया था। उन्होंने जवानों को मिठाइयाँ खिलाई और त्यौहार पर भी परिजनों से दूर रहने वाले जवानों के दिन-रात मातृभूमि की सेवा में लगे रहने पर हौसला बढ़ाया।

कच्छ के क्षेत्र में दिन का तापमान काफी ज्यादा होता है और रात बेहद ठंढा हो जाता है। यहाँ की चुनौतियाँ जवानों के लिए अलग तरह की हैं।

2021 में लेपचा तो 2022 में लद्दाख पहुँचे थे पीएम

हिमाचल प्रदेश के लेपचा में पीएम मोदी ने 2023 में जवानों के साथ दीप जलाकर और मिठाईयाँ खिला कर दिवाली मनाई थी।

पीएम मोदी ने 2022 में दीपावली लद्दाख की बर्फीली चोटियों वाले कारगिल में मनाया था। इस मौके पर एक्स पर पोस्ट कर उन्होंने देशवासियों को दिवाली की शुभकामनाएँ दी। उन्होंने लिखा, कारगिल में दिवाली समारोह की कुछ और झलकियाँ साझा कर रहा हूँ। पूरे भारत से आए सैनिकों से मुलाकात हुई। उनका साहस और दृढ़ संकल्प हमारे सभी नागरिकों को प्रेरित करता है।”

पीएम मोदी ने कारगिल युद्ध में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले जवानों को श्रद्धांजलि दी। साथ ही जवानों के जज्बे को सराहा, जो विषम परिस्थियों में दिन रात सरहद पर डटे हुए हैं।

2021 में नौशेरा का किया दौरा

पीएम मोदी ने जम्मू में एलओसी के नजदीक नौशेरा सेक्टर में तैनात जवानों के साथ दिवाली 2021 मनाई थी। इस मौके पर उन्होंने कहा था, “हमारे जवान ‘माँ भारती’ के सुरक्षा कवच हैं। जवानों की बदौलत ही हमारे देश के लोग रात को चैन से सो पाते हैं और त्योहारों पर खुशी मना पाते हैं।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरी बार रजौरी में जवानों के साथ दिवाली मनाने पहुँचे थे। इससे पहले 2019 में भी वह राजौरी के एक आर्मी डिविजन में जवानों के साथ उन्होंने दिवाली मनाई थी।

2020 में जैसलमेर जाकर जवानों का हौसला बढ़ाया

2020 में पीएम मोदी दिवाली के मौके पर राजस्थान के जैसलमेर पहुँचे और जवानों के साथ मिठाइयाँ खाकर दिवाली मनाई। इस दौरान लोंगेवाला पोस्ट पर तैनात सभी जवान मौजूद रहे। पीएम मोदी ने एक्स पर इसकी तस्वीरें साझा की।

एलओसी पर 2019 में पीएम ने मनाई दिवाली

पीएम मोदी ने जम्मू कश्मीर के राजौरी में एलओसी पर तैनात जवानों के साथ दिवाली मनाई थी। उस वक्त भी पाकिस्तान के साथ तनातनी चल रही थी। पीएम मोदी ने जवानों के बीच जाकर उनका हौसला बढ़ाया।

2018 में पीएम मोदी उत्तराखंड के हर्षिल पहुँचे और सुरक्षाबलों के साथ-साथ आईटीबीपी के जवानों के साथ भी दिवाली मनाई। इस मौके पर सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करते हुए उन्होंने कहा कि सरहद की रक्षा करने वाले वीर जवानों को सलाम किया। जम्मू कश्मीर के गुरेज सेक्टर में दिवाली सेलिब्रेशन के लिए पीएम मोदी 2017 में पहुँचे। यहाँ से पाकिस्तान को उन्होंने ललकारा।

लाहौल स्फीति में पीएम मोदी ने 2016 में मनाई दिवाली

हिमाचल प्रदेश से लगे चीन बॉर्डर पर दिवाली मनाने के लिए 2016 में पीएम मोदी पहुँचे। इस दौरान लाहौल स्फीति में आईटीबीपी जवानों के काम की सराहना की। उन्होंने कहा कि घर परिवार से दूर जवानों के साथ पूरा देश है। जवानों को मिठाइयाँ खिलाई और उनके साथ संवाद किया।

2014 में सियाचिन तो 2015 में पंजाब पहुँचे पीएम

पीएम मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पहली दिवाली सियाचिन के जवानों के साथ मनाई थी। सियाचिन के बर्फीले वादियों में जवानों का हौसला बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि देश उनकी सेवा से सामने नतमस्तक है। सियाचिन देश का सबसे ऊँचा बॉर्डर है, जहाँ तापमान -30 से -40 डिग्री तक पहुँच जाता है। ये दुनिया का सबसे ऊँचा युद्ध क्षेत्र भी है।

2015 में प्रधानमंत्री मोदी दीपावली के दिन पंजाब पहुँचे। उन्होंने अमृतसर के नजदीक पाकिस्तान से सटे अटारी बॉर्डर पर तैनात जवानों के बीच त्योहार मनाया।

दिल्ली-NCR में 400 पार पहुँचा AQI, GRAP-2 प्लान लागू: दीपावली पर ‘पटाखे मत फोड़ो’ का ज्ञान देने वाले बताएँगे बिना आतिशबाजी ही क्यों बिगड़ी राजधानी की हवा?

दिल्ली की हवा फिर से जहर बन चुकी है। अक्टूबर के तीसरे हफ्ते में आते-आते दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) औसत ‘बहुत खराब’ की श्रेणी में पहुँच गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के ताजा आँकड़ों के मुताबिक दिल्ली के कई इलाकों में AQI सोमवार (20 अक्टूबर 2025) दिवाली की सुबह 400 पार पहुँच गया। यानी दीवाली से पहले ही दिल्ली गैस चेंबर में तब्दील होती जा रही है।

ऐसा नहीं हैं कि सरकार और अदालतें स्थिति को लेकर निष्क्रिय हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध के बजाए ‘ग्रीन फायरक्रैकर्स’ के उपयोग की अनुमति दी थी। इन पटाखों को वैज्ञानिक रूप से इस तरह बनाया गया है कि इनमें 30 प्रतिशत तक कम प्रदूषक तत्व उत्सर्जित हों।

साल 2025 में अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में केवल वही ग्रीन फायरक्रैकर्स जलाए जा सकते हैं जो वैज्ञानिक संस्था CSIR-NEERI द्वारा प्रमाणित हों और जिनकी बिक्री और उपयोग केवल तय समय के भीतर ही किए जाएँ।

बढ़ते प्रदूषण का कारण

फिर भी सवाल यह है कि जब दिवाली ‘ग्रीन’ बताई जा रही है तो हवा इतनी जहरीली क्यों है? असल में प्रदूषण के कई स्रोत हैं जो एक साथ मिलकर हवा को जहरीली बना देते हैं। सबसे बड़ा कारण मौसम में बदलाव है। अक्टूबर के दूसरे हफ्ते में दिल्ली और NCR में तापमान गिरने लगता है, हवा की रफ्तार बहुत धीमी हो जाती है और नमी बढ़ जाती है। ऐसे में प्रदूषक कण ऊपर नहीं उठ पाते और जमीन के पास ही फँस जाते हैं। मौसम विभाग के अनुसार, इस हफ्ते हवा की गति केवल 4 से 6 किलोमीटर प्रति घंटा रही, जिससे प्रदूषण का फैलाव रुक गया।

पराली जलाने से बढ़ा प्रदूषण?

बढ़ते प्रदूषण का दूसरा कारण हर साल की तरह पराली जलाने की घटनाएँ हैं। पंजाब और हरियाणा में किसान धान की फसल के बाद खेतों को साफ करने के लिए पराली जलाते हैं। सैटेलाइन डेटा के अनुसार, पिछले हफ्ते पंजाब में 1200 से ज्यादा आग के मामले दर्ज किए गए जबकि हरियाणा में 400 से अधिक। हवा का रुख अगर उत्तर-पश्चिम दिशा में होता है तो इन इलाकों का धुआँ सीधे दिल्ली की ओर आता है।

दिल्ली में लागू GRAP-2

इसके अलावा दिल्ली के भीतर भी प्रदूषण के कई स्थायी स्रोत हैं। सड़क की धूल, लगातार चल रहे निर्माण कार्य, बढ़ते डीजल जनरेटर और भारी ट्रैफिक- ये सब मिलकर हवा को और गंदा बना रहे हैं। ग्रेडेड रिस्पॉन्सस एक्शन प्लान (GRAP) का स्टेज-2 लागू किया गया है, जिसमें निर्माण स्थलों पर सख्ती, पानी का छिड़काव और कचरा जलाने पर रोक जैसी शर्तें शामिल हैं। लेकिन जमीन पर इन उपायों का असर सीमित ही दिखता है क्योंकि निगरानी और पालन कमजोर है।

पटाखों से बढ़ा दिल्ली का AQI?

अब बात आती है ग्रीन पटाखों की। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद बाजार में पारंपरिक पटाखे भी अवैध रूप से बिक रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर 30 प्रतिशत कम प्रदूषण देने वाले पटाखे भी बड़ी मात्रा में जलाए जाएँ तो उनका असर भी बहुत नहीं पड़ता।

नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) की रिपोर्ट के अनुसार, ग्रीन क्रैकर्स तभी प्रभावी हैं जब इनका उपयोग सीमित समय और कम मात्रा में हो। लेकिन दिवाली की रात यह सीमा अक्सर क्रॉस कर जाती है, जिससे हवा में मौजूद कण और गैसें और खतरनाक स्तर पर पहुँच जाती हैं।

क्या दिवाली पर ही प्रदूषण हो सकता है नियंत्रित?

इन सबके बीच सबसे चिंताजनक बात यह है कि हालात हर साल दोहराए जाते हैं। प्रदूषण से निपटने के लिए अस्थायी उपाय जैसे पानी का छिड़काव, ट्रक एंट्री पर रोक और स्कूल करने की बात तो होती हैं लेकिन लंबे समय तक के समाधान पर प्रगति बहुत धीमी है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर दिल्ली-NCR को प्रदूषण से राहत चाहिए तो सिर्फ दिवाली पर ही नहीं बल्कि पूरे साल प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण और हरित नीतियों का पालन करना जरूरी है।

दिवाली के बाद नहीं रहेगा प्रदूषण?

इस समय दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानक से करीब 20 गुना अधिक है। इसका असर बच्चों, बुजुर्गों और सांस की बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है। दिवाली के बाद अगर मौसम में ठंड और बढ़ी और हवा की गति कम रही तो स्थित और खराब हो सकती है।

यानि केवल दिवाली पर ही प्रदूषण पर लगाम लगाने की जरूरत नहीं है बल्कि उसके बाद भी है और पूरे साल भी है। तो वे वामपंथी, लिबरल और फेमिनिस्ट, जो भी दिवाली पर प्रदूषण का ठीकरा फोड़ने के लिए सामने आ रही हैं। वे समझ लें कि प्रदूषण को पूरे साल नियंत्रित करने की जरूरत है तो केवल दिवाली पर प्रदूषण रोकने का ज्ञान न दें।

मोहम्मद जुबैर ने कर्मभूमि एक्सप्रेस से यात्रियों के गिरने की फैलाई ‘फेक न्यूज’, रेलवे ने फैक्ट चेक कर पकड़ा झूठ

कर्मभूमि एक्सप्रेस से 3 यात्रियों के गिरने और दो यात्रियों के मरने की खबर से सोशल मीडिया पर हड़कंप मच गया है। इस बीच पूरी खबर पर सेंट्रल रेलवे ने सफाई देते हुए घटना को सिरे से खारिज कर दिया है।

रेलवे के मुताबिक, एक घटना यह ट्रेन हादसा नहीं, बल्कि ट्रेसपासिंग का मामला है। ट्रेसपासिंग की घटना नासिक और ओढा स्टेशन के बीच हुई थी। हादसे में तीन लोग घायल हुए हैं, जिन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया। आरपीएफ इस मामले की जाँच कर रही है।

रेलवे ने बताया कि रविवार (19 अक्टूबर 2025) शाम कुछ लोग ट्रैक पार करने की कोशिश कर रहे थे। इस दौरान कर्मभूमि एक्सप्रेस आ गई और ये लोग उसकी चपेट में आ गए। रेलवे ने साफ किया है कि तीनों घायल व्यक्ति ट्रेन में सफर नहीं कर रहे थे, बल्कि रेलवे लाइन पार कर रहे थे। ट्रेन आने के सिग्नल दिए जा चुके थे, फिर भी ये ट्रैक पार करने की कोशिश कर रहे थे। ये रेलवे के नियमों का उल्लंघन है।

दरअसल छठ पूजा को देखते हुए रेलवे ने 12000 स्पेशल ट्रेन बिहार के लिए अलग-अलग जगहों से चलाई है। इनमें मुंबई, दिल्ली जैसी जगहों से खास कर ट्रेनें चलाई गई हैं। इसका मकसद लोगों को गंतव्य तक सुरक्षित और आसान सफर कराना है।

स्टेशनों पर काफी भीड़ जमा हो रही हैं। ऐसे में ट्रेन हादसे का झूठ फैलाने का प्रोपेगेंडा सोशल मीडिया पर चलाया गया। मोहम्मद जुबेर ने एक्स पर लिखा, दिवाली और छठ पूजा अपने प्रियजनों के साथ मनाने बिहार जा रहे तीन यात्री मुंबई से बिहार जा रही ट्रेन से गिर गए। दो यात्रियों की मौत हो गई और एक गंभीर रूप से घायल हो गया।

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को टैग करके जुबेर ने पूछा है कि भारतीय रेलवे ने 12000 स्पेशल ट्रेन चलाई थी, उसका क्या हुआ?

यहाँ तक कि कई वेबसाइट ने इस झूठ को सच मानते हुए बगैर रेलवे से घटना की जानकारी लिए हुए खबरें चला दी। इस पर रेलवे ने साफ लिखा है कि जानकारी साझा करने से पहले तथ्यों को जाँच लें।

आजतक ने लिखा है कि मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनस से बिहार जा रही कर्मभूमि एक्सप्रेस से नासिर रोड रेलवे स्टेशन से कुछ दूरी पर 3 यात्री ट्रेन से गिर गए, जिससे दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। जबकि एक की हालत गंभीर है, जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है। आजतक ने ये भी लिखा है कि ये साफ नहीं हो पाया है कि ये लोग त्यौहार मनाने जा रहे थे या आने वाले चुनाव में मतदान करने। आजतक का शीर्षक है, ‘ट्रेनों में भारी भीड़ के बीच मुंबई से बिहार जा रही कर्मभूमि एक्सप्रेस से गिरे 3 यात्री, 2 की मौत’

वहीं दैनिक भास्कर का शीर्षक है, ‘मुंबई से बिहार जा रही कर्मभूमि एक्सप्रेस से गिरे तीन यात्री, दो की मौत, एक की हालत गंभीर’

दैनिक भास्कर ने अपनी खबर में लिखा, ‘मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनस से रक्सौल (बिहार) जा रही कर्मभूमि एक्सप्रेस में शनिवार देर रात एक दुखद हादसा हुआ। नासिक रोड रेलवे स्टेशन के पास तीन युवक ट्रेन से गिर गए, जिसमें दो की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक युवक गंभीर रूप से घायल हो गया। घायल युवक का इलाज जिला अस्पताल में चल रहा है।’

बगैर हकीकत जाने माने वेबसाइटों का इस तरह से गैरजिम्मेदाराना रवैया बेहद खतरनाक है। छठ पूजा के लिए बिहार जाने वाले लोग पूरे देश से जाते हैं। इस दौरान जमकर स्टेशनों में भीड़ भी होती है। ऐसे में गलत हादसों की खबर से लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। भारत की लाइफ लाइन कहलाने वाली रेलवे को इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभाने में दिक्कतें आ सकती हैं। यही वजह है कि रेलवे ने लोगों को अफवाहों पर ध्यान नहीं देने की अपील की है। साथ ही लिखा है, “कृपया साझा करने से पहले तथ्यों की पुष्टि कर लें। आइए जानकारी के साथ ज़िम्मेदारी बरतें।”

पैसे-नौकरी का लालच देकर हिंदुओं को बना रहे थे ईसाई, फूलपुर पुलिस ने बजरंग दल की शिकायत पर किया धर्म परिवर्तन गिरोह का भंडाफोड़: जानें FIR में क्या हैं आरोप?

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में फूलपुर पुलिस ने शनिवार (18 अक्टूबर 2025) को एक गाँव में धर्म परिवर्तन रैकेट के मामले में 3 आरोपितों को गिरफ्तार किया है। चौथा आरोपित फिलहाल फरार है और उसकी तलाश के लिए पुलिस की टीम छापेमारी कर रही है। यह कार्रवाई विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के जिला सह-संयोजक शांतनु तिवारी की शिकायत पर की गई।

शिकायत के मुताबिक, शांतनु ने पुलिस को बताया कि ‘प्रार्थना सभा’ के नाम पर गाँव में धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया और मामले में कानूनी कार्रवाई शुरू की। OpIndia को इस केस की FIR कॉपी भी मिली है।

शिकायतकर्ता ने क्या कहा?

शांतनु ने फूलपुर थाने में लिखित शिकायत दी कि उन्हें कई दिनों से रघुनाथपुर गाँव में ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन कराने की जानकारी मिल रही थी। 18 अक्टूबर को सुबह करीब 10:40 बजे उन्हें ऐसी ही एक सभा की जानकारी मिली है। उन्होंने कहा, “मुझे सूचना मिली कि ‘सामुदायिक चर्चा बैठक’ के नाम पर एक धार्मिक सभा आयोजित की जा रही है, जहाँ हिंदू ग्रामीणों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए लालच दिया जा रहा है।”

फोटो: शांतनु तिवारी

शांतनु अपने बजरंग दल के साथियों के साथ मौके पर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि कुछ मिशनरी लोग ग्रामीणों को हिंदू धर्म छोड़ने के लिए उकसा रहे थे। उन्होंने कहा कि मिशनरी लोगों से कह रहे थे कि जो लोग ईसाई धर्म अपनाएँगे उन्हें पैसे, कपड़े और अन्य सुविधाएँ दी जाएँगी। शांतनु ने कहा, “ये गतिविधियाँ हिंदू समाज के खिलाफ हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि मिशनरी लोग झूठ फैलाकर और गरीब लोगों को लालच देकर धर्म परिवर्तन करा रहे हैं।

FIR में क्या कहा गया है?

OpIndia के पास मौजूद एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, यह मुकदमा शांतनु तिवारी की शिकायत पर दर्ज किया गया है। इसमें चार लोगों रामकुमार पाल, रामशरण गौतम, त्रिभुवन गौतम और सरिता गौतम को आरोपित बनाया गया है। इनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 352, 196(1), 299 और उत्तर प्रदेश अवैध धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत केस दर्ज हुआ है।

FIR में लिखा गया है कि बैठक को ‘सामुदायिक चर्चा’ बताया गया था। इसे ईसाई मिशनरियों द्वारा रघुनाथपुर गाँव (थाना फूलपुर क्षेत्र) में हिंदू समुदाय के लोगों के बीच धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। घटना वाले दिन जब शांतनु को यह जानकारी मिली कि मिशनरियों द्वारा ‘सामुदायिक चर्चा बैठक’ के नाम पर एक सभा आयोजित की गई है, जिसमें बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय के लोग शामिल हो रहे हैं, तो वह तुरंत मौके पर पहुँच गए।

मौके पर पहुँचकर उन्होंने देखा कि ईसाई मिशनरी हिंदुओं को अपना धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने के लिए उकसा रहे थे। वे हिंदुओं से कह रहे थे कि वे अपने देवी-देवताओं को त्याग दें और उसके बदले अपने घरों में यीशु मसीह की तस्वीरें लगाएँ। इसके बदले उन्हें पैसे और मिशनरी स्कूलों में नौकरियाँ दी जाएँगी।

FIR के अंश, फोटो: शांतनु तिवारी

शिकायतकर्ता ने पुलिस को यह भी बताया कि प्रार्थना सभा में मौजूद कुछ लोग कह रहे थे कि उन्हें ईसाई धर्म में लोगों को शामिल कराने के बदले मोटी रकम दी जाती है जबकि हिंदू धर्म में ऐसा कोई इनाम नहीं मिलता।

जब शांतनु ने इस कृत्य का विरोध किया, तो आरोपियों ने उन पर लोहे की रॉड से हमला कर दिया और उन्हें जान से मारने की कोशिश की। किसी तरह शिकायतकर्ता वहाँ से भागकर अपनी जान बचाने में सफल रहे।

पहले भी कई धर्म परिवर्तन रैकेट का हो चुका है भंडाफोड़

OpIndia से बातचीत में शांतनु ने बताया कि बजरंग दल ने इससे पहले भी ऐसे कई धर्म परिवर्तन रैकेट का भंडाफोड़ किया है। इनमें से एक मामले में 13 आरोपितों को जेल भेजा गया था। हालाँकि, उन आरोपियों ने बार-बार अग्रिम जमानत के लिए आवेदन देकर केस की सुनवाई में देरी कराई।

शांतनु के वकील, जो इस मामले में उनकी ओर से पैरवी कर रहे हैं, ने हाल ही में उन सभी जमानत याचिकाओं को निरस्त करवाया है। इस मामले में भी शांतनु ने कहा कि वह इसे पूरी गंभीरता से आगे बढ़ाएँगे ताकि इस तरह की गतिविधियाँ क्षेत्र में पूरी तरह बंद हो सकें।

आगे की कार्रवाई जारी

पुलिस ने बताया कि जाँच में यह पुष्टि हुई है कि आरोपी ग्रामीणों को अपना धर्म छोड़ने के लिए उकसा रहे थे। उन्होंने ईसाई धर्म अपनाने के बदले पैसे और रोजगार देने का वादा किया था। अधिकारियों ने कहा कि यह मामला हमला, उकसावे और अवैध धर्म परिवर्तन से जुड़ा हुआ है, और इसमें कानून के तहत आगे की कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।

अमेरिका के 50+ शहरों में सड़कों पर उतरे हजारों लोग, राष्ट्रपति के एकतरफा फैसलों से नाराज: जानें No King प्रदर्शन की कहानी, ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों पर गंदगी फेंकते AI वीडियो किया शेयर

अमेरिका इन दिनों एक बड़े जनआंदोलन का गवाह बन रहा है। नो किंग (No King) नाम से चल रहे प्रदर्शन डोनाल्ड ट्रंप के विरोध में है। इन प्रदर्शनों में लाखों लोग सड़कों पर उतरे हैं और नारा लगा रहे हैं, “यह देश किसी राजा का नहीं है।” ये प्रदर्शन सिर्फ किसी एक मुद्दे पर नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, सत्ता के केंद्रीकरण और नागरिक अधिकारों के सवाल पर हैं। लोगों की यह माँग है कि देश को ऐसे रास्ते पर न ले जाया जाए, जहाँ राष्ट्रपति किसी राजा की तरह खुद को कानून और संस्थाओं से ऊपर समझे।

क्या है ‘नो किंग’ प्रदर्शन?

‘नो किंग’ यानी ‘कोई राजा नहीं’ नाम का ये जनआंदोलन अमेरिका के 50 से अधिक शहरों में फैल गया है। आंदोलन का नारा उस विचार के खिलाफ है, जिसमें राष्ट्रपति खुद को लोकतांत्रिक नियंत्रण से ऊपर समझने लगे। यहा आंदोलन डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों और उनके शासन-शैली के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप की नीतियाँ और उनका व्यवहार ‘राजशाही’ जैसी प्रवृत्ति दिखा रहा है। जहाँ वे न्यायपालिका, जनता और मीडिया को दरकिनार करते हुए एकतरफा फैसले ले रहे हैं।

जून 2025 में इस आंदोलन की पहली लहर आई थी, जब देशभर के 2 हजार से ज्यादा जगहों पर एक साथ प्रदर्शन हुए। तब लाखों लोग पार्कों, प्लाजा और सड़कों पर उतर आए थे। अक्टूबर 2025 तक आते-आते इस आंदोलन ने भयानक रूप ले लिया। अब यह करीब 2,700 शहरों में फैल चुका है। न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन डीसी, शिकागो, लॉस एंजेलिस जैसे बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक ‘No Kings, No Crowns’ (कोई राजा नहीं, कोई ताज नहीं) जैसे नारे गूँज रहे हैं।

इन प्रदर्शनों के तहत अमेरिका की जनता संदेश देना चाहती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था किसी व्यक्ति की मर्जी पर नहीं चल सकती। लोग यह याद दिला रहे हैं कि देश की स्थापना ही इस विचार पर हुई थी कि ‘यहाँ कोई राजा नहीं होगा।’ यही कारण है कि यह आंदोलन ट्रंप विरोधी तो है लेकिन उससे भी ज्यादा लोकतंत्र समर्थक हैं।

क्यों हो रहे ‘नो किंग’ प्रदर्शन?

इन ‘नो किंग’ प्रदर्शनों के पीछे गहरी राजनीतिक और सामाजिक वजहे हैं। सबसे बड़ा कारण ‘सत्ता का केंद्रीकरण’ है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन ने कई बार संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं की अनदेखी की है। उनके हालिया फैसलों और भाषणों से यह संकेत मिला है कि वे राष्ट्रपति पद को ‘असीमित अधिकारों’ की कुर्सी की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं।

दूसरा बड़ा कारण ट्रंप की नीतियाँ हैं। खासकर प्रवासियों के खिलाफ कड़े कदम और संघीय एजेंसियों का राजनीतिक उपयोग। हाल के महीनों में अमेरिकी प्रशासन ने कई जगहों पर अप्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। लोगों का मानना है कि यह केवल कानून का पालन नहीं बल्कि शक्ति का प्रदर्शन है।

तीसरा पहलू है संस्थाओं पर दबाव। हाल के महीनों में संघीय एजेंसियों और न्यायपालिका के बीच खींचतान बढ़ी है। ट्रंप के आलोचको का कहना है कि राष्ट्रपति अपने विरोधियों पर नकेल कसने और मीडिया पर दबाव बनाने में लगे हैं। कई लोग इसे ‘लोकतंत्र के लिए खतरे’ के रूप में देख रहे हैं। यही वजह है कि सड़कों पर उतरे लोग यह कहते नजर आ रहे हैं, ‘हम किसी राजा के अधीन नहीं, संविधान के अधीन है।’

डोनाल्ड ट्रंप का AI वीडियो

अमेरिका में जारी ‘नो किंग’ प्रदर्शन के बीच एक नया वीडियो सामने आया, जिसने देशभर में माहौल को और भड़का दिया। यह वीडियो डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया एक्स प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर शेयर किया। इस वीडियो ने ‘नो किंग’ प्रदर्शन में शामिल लोगों का गुस्सा दोगुना कर दिया।

इस AI-जेनरेटेड वीडियो ट्रंप को ‘राजा’ के रूप में दिखाया गया। वे एक लड़ाकू विमान के पायलट की तरह नजर आ रहे हैं, विमान पर बडे अक्षरों में लिखा है- ‘KING TRUMP।’ इसके बाद उन्हें विरोध कर रही भीड़ पर कीचड़ गिराते हुए दिखाया गया। वीडियो में ट्रंप ने ताज पहन रखा है और चेहरे पर विजयी मुस्कान है। यह AI वीडियो देखने में किसी फिल्मी सीन जैसा लगता है लेकिन इसका संदेश राजनीतिक था।

वीडियो पोस्ट करने के कुछ ही घंटो बाद वायरल हो गया। इस वीडियो ने न केवल प्रदर्शनकारियों को नाराज किया बल्कि यह सवाल भी उठाया कि क्या किसी सत्तारूढ़ नेता को AI तकनीक का इस तरह से इस्तेमाल करना चाहिए। इस वीडियो के बाद प्रदर्शन और तेज हो गए। भीड में We will not bow down (हम झुकेंगे नहीं) और You are not our King (तुम हमारे राजा नहीं हो) जैसे नारे और जोर से गूँजने लगे।

ऑपइंडिया के वायरल वीडियो के बाद पिटी शहाबुद्दीन के बेटे की भद्द, ओसामा के समर्थन में कूदी राजद की फौज: अपराध के सरताज को ‘विकास पुरुष’ बताने लगी RJD

बिहार के सिवान के कुख्यात बाहुबली और पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब से जुड़ा ‘ऑपइंडिया’ का वीडियो वायरल होने के बाद राजद बैकफुट पर आ गई है। राजद के नेता अब ओसामा शहाब को किसी भी तरह से नायक बनाने पर तुले हुए हैं। हो भी क्यों ना, ओसामा को विधानसभा चुनाव का टिकट देकर राजद ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाह में वह अपराध की विरासत को भी गले लगाने से पीछे नहीं हटेगी।

‘ओसामा पोस्टर फाड़ने वाले को जिंदा जला देंगे’

ओसामा से जुड़े जिस वीडियो को लेकर बवाल हुआ है वो उसके एक समर्थक द्वारा ‘आपइंडिया’ के कैमरे पर किया गया दावा है। चुनाव कवरेज के दौरान एक शख्स ने ‘ऑपइंडिया’ के कैमरे पर यह दावा किया है कि वो ‘I Love Muhammad’ का पोस्टर फाड़ने वाले एक युवक को ढूँढ रहे हैं और मिल गया तो ओसामा शहाब उसे जिंदा जला दंगे।

जाहिर है कि जिसके अब्बू का इतिहास तेजाब से लोगों को जिंदा जलाने का रहा हो वो अगर ऐसी धमकी भी दे रहा है तो इसमें आश्चर्यचकित होने वाली बात भी नहीं है। खैर, ओसामा के समर्थक ने यह दावा किया था कि अगर पोस्टर को जलाना वाला लड़का मिल जाएगा तो वो उसे बाँधकर ओसामा के घर ले जाएगा। ऑपइंडिया का यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ।

बिहार के सत्ताधारी दल बीजेपी ने भी अपने सोशल मीडिया हैंडल पर यह वीडियो शेयर कर लिखा, “RJD का टिकट मतलब बिहार में जंगलराज का आमंत्रण! अपराधियों के घराने को RJD का खुलेआम समर्थन — जनता देख रही है।” बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ग्राउंड रिपोर्ट का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “यदि राजद प्रत्याशी शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा चुनाव हार जाते हैं, तो इस्लामी कट्टरपंथी सीवान को जला देने की धमकी दे रहे हैं।”

जब यह वीडियो वायरल हुआ तो ओसामा की गुंडई की कलई खुलने लगी जिससे राजद और उसके समर्थक बौखला गए। कुछ लोगों ने ओसामा को लेकर दावा करने वाले उस लड़के को ढूँढ लाए और दावा करवाया गया कि उसे ‘ऑपइंडिया’ की तरफ से ये सब बाते कहने के लिए 5000 रुपए दिए गए थे। उसने खुद को नशे में भी बताया।

‘ऑपइंडिया’ के रिपोर्टर अनुराग मिश्रा ने वायरल वीडियो और पैसे देने के दावों की सत्यता का खुलासा करते हुए एक विस्तृत वीडियो बनाया है। अनुराग ने इसमें बताया है कि किस तरह उस लड़के को एक अन्य लड़का बातचीत के लिए बुलाकर लाया था ना कि ‘ऑपइंडिया’ ने उससे बातचीत करनी शुरू की थी।

ओसामा के डिफेंस में बैकफुट पर राजद

अब जब इन वीडियो से छीछालेदर होनी शुरू हुई तो राजद के सिपाही मैदान में ओसामा को डिफेंड करने के लिए कूद गए हैं। बिहार सरकार के पूर्व मंत्री और सिवान सदर विधानसभा सीट से पार्टी के उम्मीदवार अवध बिहारी चौधरी तो उन्हें बस जननायक साबित करने पर तुल गए हैं।

अवध बिहारी ने फेसबुक पर एक पोस्ट में लिखा, “पिछले कुछ दिनों से कुछ तथाकथित मीडिया और विरोधी दल, पैसे और प्रोपेगेंडा के सहारे मरहूम मोहम्मद शाहाबुद्दीन साहब के बेटे और राजद प्रत्याशी ओसामा साहब के खिलाफ गलत और भ्रामक बयान फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।”

उन्होंने आगे लिखा, “इनका मकसद साफ़ है — सीवान की जनता के बीच आपसी भाईचारे को तोड़ना और लोगों को गुमराह करना। ओसामा बाबू एक ईमानदार, मिलनसार और क्षेत्र-सेवी नेता हैं। वो कभी धर्म की राजनीति नहीं करते, उनका लक्ष्य है सीवान का विकास, युवाओं का रोजगार और जनता का सम्मान।”

अपराध का सरताज, राजद का विकास पुरुष

अपने अब्बा की तरह ही ओसामा भी अपराध की दुनिया में एंट्री मार चुका है। वह कई आपराधिक मामलों में जेल की हवा खा चुका है। ओसामा पर सबसे पहला मामला हुसैनगंज थाना क्षेत्र के छपिया बुजुर्ग स्थित 42 कट्ठा जमीन में दर्ज हुआ था। उसके बाद मोतिहारी में उसके बहनोई से आपसी जमीन विवाद में फायरिंग करने पर भी ओसामा पर प्राथमिकी दर्ज हुई थी।

लेकिन यही ओसामा RJD के लिए विकास पुरुष है और ऐसे हम नहीं कह रहे हैं, खुद राजद का यही दावा है। राजद ने अपने उम्मदीवारों को टिकट दिए जाने से जुड़ा फॉर्म C7 जारी किया है। इसमें प्रत्याशी की जानकारी होता है और मोटे तौर पर यह बताया जाता है कि उम्मदीवार पर क्या केस चल रहे हैं और उसका चयन क्यों किया गया है।

इसमें प्रत्याशी के चयन के कारण को लेकर राजद ने लिखा है, “वह अपने इलाके में बहुत लोकप्रिय हैं और इलाके के विकास और भलाई के कामों में हमेशा सक्रिय रहते हैं। उनकी शैक्षणिक योग्यता मैट्रिक है। पार्टी में उनके जैसा कोई और उम्मीदवार नहीं है।”

राजद ने जिस तरह से मोहम्मद शहाबुद्दीन की डर-खौफ की विरासत को ‘विकास’ का चेहरा बताने की कोशिश की है, वह बिहार की राजनीति के लिए सबसे शर्मनाक पल है। राजद के लिए सत्ता की चाभी डर और दहशत के चेहरे बेशक रहे हों लेकिन जिस तरह अब लोगों ने सवाल उठाने की हिम्मत दिखाई तो उसे सियासी जमीन खिसके का डर सता रहा है। इसके बाद अब राजद किसी भी सूरत में ओसामा को डिफेंड करने में लग गई है।

‘अखिलेशुद्दीन’ से क्या उम्मीद करें: दीपावली पर दीप ना जलाने का ज्ञान दे रहे सपा प्रमुख की लगी क्लास, क्रिसमस को बता रहे थे आदर्श; संस्कृति से रोजगार तक है दीपोत्सव का महत्व

जहाँ देशभर में दीपावली पर खुशी का माहौल है, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव को इससे चिढ़ हो रही है। उनकी ये चिढ़ इस बार दीपावली पर जलने वाले दीयों को लेकर है। इतना ही नहीं उनके बयान से यह भी साफ है कि ईसाइयों का त्योहार क्रिसमस उन्हें ज्यादा पसंद है लेकिन हिंदू त्योहार दीपावली पर दीया जलाना उनके लिए पैसों की बर्बादी है।

यह अखिलेश यादव ने खुद कहा है। लखनऊ में धनतेरस (18 अक्टूबर 2025) पर आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने कहा, “मैं प्रभु राम के नाम पर एक सुझाव देना चाहता हूँ। क्रिसमस के समय कई महीनों तक शहर जगमगा जाते हैं। उन्हीं से सीख लो बस क्यों खर्चा करना बार-बार दीयों और मोमबत्ती का। इस सरकार से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं? इसे तो हटा देना चाहिए। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि यहाँ और भी खूबसूरत रोशनियाँ हों…”

सोशल मीडिया पर अखिलेश के बयान का विरोध

दीपावली पर अखिलेश यादव का यह सुझाव हिंदू त्योहारों के प्रति घृणा को दर्शाता है। यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर भी दीपावली मनाने वाले हिंदू लोगों ने अखिलेश के बयान का विरोध किया। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने कहा कि लगता है अखिलेश यादव हिंदू भी नहीं है।

वहीं कई लोगों ने अखिलेश यादव को ‘अखिलेशुद्दीन’ नाम दे दिया और कहा कि ‘अखिलेशुद्दीन’ से क्या ही आशा की जा सकती है।?

एक्स/ट्विटर पर एक यूजर ने लिखा, “अब अखिलेश यादव को दीयों और मोमबत्तियों से दिक्कत हो गई है। आज उत्तरप्रदेश वालों को सोचना है ये ईसाई है या मुस्लिम?”

अन्य यूजर ने लिखा, “एक से बढ़कर एक नेता देखे पर इन के जैसा कोई नहीं जो खुद ही अपना स्टैंड क्लियर नहीं कर पाए। आखिर PDA के नाम पर लोगों को गुमराह कर झूठी तसल्ली दे अपना राजनीतिक करियर बनाने में माहिर नेता जी ब्राह्मणों, क्षत्रियों और सर्वणों का विरोध करते करते हिन्दुओं का अभी अपमान करने लगे। एक तरफ कुम्हार जाति के हमारे भाई बहन सालभर मेहनत कर दिवाली के उत्सव के लिए दीपक बनाते हैं तो दूसरी ओर यह महोदय क्रिसमस का उदाहरण देकर झालर लटकाने को बोलते हैं। अब सनातन धर्म के लोग क्रिसमस से सलाह लें… ?”

एक एक्स यूजर ने तर्क दिया, “उसी तरह हर साल ईद पर जानवरों की कुर्बानी क्यों दी जाती है? अगर आपने एक बार कर लिया तो क्या ये काफी नहीं है? पैसे बचाएँ और शायद एक मासूम जानवर भी। हर साल क्रिसमस पर पेड़ क्यों काटे जाते हैं?”

जाहिर है कि अखिलेश यादव के दीया जलाने पर पैसा बर्बाद करने वाले बयान से हिंदू धर्म के लोग नाखुश हैं। क्योंकि उन्हें दीपावली पर दीया जलाने का महत्व मालूम है। जो शायद सपा सुप्रीमो हिंदू होने के बावजूद नहीं जानते। तो अखिलेश यादव को जान लेना चाहिए कि दीपोत्सव का महत्व सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि आध्यात्मिक और सामाजिक स्तर पर भी जुड़ा है।

दीया जलाने का महत्व

दीपोत्सव की परंपरा सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, आत्म-चेतना और सामाजिक आर्थिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी हुई है।

बतौर प्रतीय यह दर्शाती है कि अंधकार पर प्रकाश, ज्ञान पर अज्ञान, असत्य परसत्य की विजय संभव है। धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो हिंदू परंपरा में दीपक को ‘आत्मा की ज्योति’ और ‘ईश्वर के दर्शन’ का माध्यम माना गया है। दीपक का उजाला न सिर्फ बाहरी बनाए हुए अंधकार को मिटाता है बल्कि भीतरी विचारों, भाव- निराशा और नकारात्मकता के अंधेरे को भी रोशन करता है।

इसके साथ ही सामाजिक और आर्थिक स्तर पर दीया उन हजारों परिवारों की आजीविका का आधार भी बन गया है जो दीपावली जैसे त्योहारों के समय इस काम में जुटते हैं। इसका उदाहरण अयोध्या में हर साल होने वाले दीपत्सव से भी समझा जा सकता है। दीपावली के लिए स्थानीय कुम्हार परिवारों को दीये बनाने के बड़े ऑर्डर्स मिलते हैं।

दीया बनाने से रोजगार

वहीं दीपावली पर अयोध्या दीपोत्सव में हर साल बनने वाला विश्व रिकॉर्ड इस साल 2025 में भी बरकरार रहेगा। पिछले साल 26 लाख से अधिक दीयों का रिकॉर्ड अब 29 लाख दीये जलकर टूटेगा। यह केवल दीपावली पर लोगों की आस्था नहीं बल्कि इससे रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्थानीय कुम्हारों का कहना है कि साल 2017 से दीपोत्सव के बाद से उनका जीवन बदल गया। जहाँ पहले कु्म्हार परिवार दीपावली पर केवल 20 हजार कमाते थे, उनकी आय अब लाखों में पहुँच गई है। देशभर में भी छोटे-छोटे गाँवों में सैंकड़ों परिवार दीया बनाने के कारण ही सहज आजीविका जुटा रहे हैं।

यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वदेशी उत्पाद पर जोर दे रहे हैं। दीपावली पर भी पीएम मोदी ने अपील की, “स्वदेशी अपनाएँ और इसे हर घर और बाजार का मंत्र बनाएँ।” पीएम मोदी की अपील से दीपावली के बाजार पर भी खासा असर देखने को मिला है। रंग-बिरंगे सजे बाजारों में दीपावली पर सारा सामान स्वदेशी है, जिसे खरीदने के लिए लोग भी उत्साहित नजर आ रहे हैं।

क्रिसमस पर पेड़ों का कटान

वहीं अखिलेश यादव के पसंदीदा त्योहार क्रिसमस पर लाखों पेड़ों को काटा जाता है, जो पर्यावरण और समाज पर कई नकारात्मक प्रभाव डालती है। हर साल क्रिसमस पर पेड़ों को सजाने का चलन है और ये पेड़ या तो असली होते हैं या फिर प्लास्टिक के। प्राकृतिक क्रिसमस ट्री उगाने के लिए बड़े पैमाने पर कैमिकल फर्टिलाइजर्स और कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है, जिससे इकोसिस्टम पर गहरा असर पड़ता है।

इसके अलावा, इन पेड़ों की कटाई से वन्यजीवों के घर नष्ट होते हैं, जिससे बायोडायवर्सिटी को नुकसान होता है। कटे हुए पेड़ जब लैंडफिल में जाते हैं तो वे कार्बड डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन प्रभावित होता है। वहीं आर्टिफिशियल क्रिसमस ट्री भी पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं क्योंकि ये प्लास्टिक से बने होते हैं, जो नॉन-बायोडिग्रेडेबल होते हैं और लैंडफिल में वर्षों तक बने रहते हैं।

इसके साथ ही क्रिसमस पर आर्टिफिशयल लाइटों को दीपोत्सव से तुलना करने वाले अखिलेश यादव जान लें कि ये लाइट बिजली की खपत बढ़ाते हैं वहीं दीप जलाने से बिना बिजली का उपयोग करे संसार जगमग हो जाता है।

अखिलेश यादव का दोगलापन

शायद अब अखिलेश यादव को दीपावली पर दीपोत्सव का महत्व समझ आ जाए। या शायद वे यहाँ भी आँख मींच लें। क्योंकि अखिलेश यादव साल 2024 में दीपावली पर दी गई शुभकामनाओं से तो लगता है कि उन्हें दीपोत्सव को थोड़ा बहुत ज्ञान तो जरूर है।

या फिर पिछली बार जो ट्वीट किया थो वो सिर्फ दिखावा था अखिलेश यादव? और इस बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में मन की बात निकाल दी। दीपावली पर अखिलेश यादव ने आसानी से दीपोत्सव न करने का सुझाव दे डाला। लेकिन ये सुझाव अखिलेश यादव को ईद, क्रिसमस या किसी अन्य धर्म के त्योहारों पर याद नहीं आते है क्या?

असल में उनका टारगेट अयोध्या में विश्व रिकॉर्ड दीपोत्सव है। उन्हें चिड़ है कि अयोध्या में बड़े संख्या में दीप जलाए जा रहे हैं, जिससे देश के नहीं बल्कि विदेशों के लोग भी जुड़ रहे हैं। अखिलेश यादव ने दीपावली पर जहरीला बयान देकर साफ कर दिया है कि अगर उनकी सरकार आती है तो उनके लिए दीपोत्सव का कोई महत्व नहीं है। हिंदू त्योहार दीपावली को पश्चिमी देशों में मनाए जाने वाले क्रिसमस से तुलना करना अखिलेश यादव की एक भद्दी हिंदू-विरोधी राजनीति के अलावा कुछ और नहीं है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान का साथ देकर अपने पैरों पर मारी कुल्हाड़ी, तुर्की-अजरबैजान जाने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या में आई 56% तक की कमी

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान का खुलकर समर्थन करने वाले तुर्की और अजरबैजान को अब भारतीय सैलानियों की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मई से अगस्त 2025 के बीच इन दोनों देशों में भारत से आने वाले पर्यटकों की संख्या में जबरदस्त गिरावट देखी गई। अजरबैजान में भारतीय सैलानियों की संख्या में 56% की गिरावट हुई, जबकि तुर्की में यह गिरावट 33.3% तक पहुँच गई।

यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तानी आतंकियों के ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर किया था। इसके बाद पाकिस्तान ने सीमावर्ती इलाकों में हमले की कोशिश की, जिसे भारत ने नाकाम कर दिया। इस दरम्यान तुर्की और अजरबैजान ने पाकिस्तान का खुल कर साथ दिया।

इन देशों के रुख ने भारतीय जनता के बीच असंतोष पैदा किया, जिसका सीधा असर इनकी पर्यटन आय पर पड़ा। भारत जैसे बड़े बाजार से आने वाले पर्यटकों की कमी ने दोनों देशों की अर्थव्यवस्था और उनकी पर्यटन रणनीति को हिला कर रख दिया है।

बयानबाजी का तुर्की और अजरबैजान पर असर

कश्मीर के पहलगाम में मई 2025 में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया। भारत ने जवाबी कार्रवाई के तहत ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, जो चार दिनों तक चला। इस दौरान, तुर्की और अजरबैजान ने पाकिस्तान के समर्थन में बयान दिए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्लामाबाद के पक्ष में खड़े दिखाई दिए।
यहीं से भारतीय नागरिकों में नाराजगी बढ़ने लगी। सोशल मीडिया पर #BoycottTurkey और #BoycottAzerbaijan जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। बड़ी संख्या में लोगों ने इन देशों की यात्रा रद्द करने की अपील की और पर्यटन एजेंसियों पर भी दबाव पड़ा कि वे अपनी सेवाएँ रोक दें।

जिसके बाद, भारतीय ट्रैवल प्लेटफॉर्म्स ने भी राष्ट्रीय भावना का सम्मान करते हुए इन देशों के लिए बुकिंग्स बंद करनी शुरू कर दीं। MakeMyTrip और EaseMyTrip जैसी कंपनियों ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि वे गैर-जरूरी यात्रा से बचने की सलाह दे रही हैं। MakeMyTrip ने तो यहाँ तक कहा कि “हम अपने देश और सशस्त्र बलों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए अज़रबैजान और तुर्की के लिए प्रमोशनल ऑफर बंद कर रहे हैं।”

अजरबैजान पर बयान का असर

ऑपरेशन सिंदूर से पहले अजरबैजान भारतीय यात्रियों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा था। जनवरी से अप्रैल 2025 तक भारत से अजरबैजान जाने वाले सैलानियों की संख्या में 33% की वृद्धि हुई थी। लेकिन मई आते-आते तस्वीर पूरी तरह बदल गई।

मई से अगस्त के बीच भारत से अजरबैजान जाने वाले पर्यटकों की संख्या 1 लाख से घटकर सिर्फ 44,000 रह गई। यह 56 प्रतिशत की भारी गिरावट थी, जो किसी भी देश के लिए एक बड़ा झटका मानी जाती है।

अजरबैजान पर्यटन बोर्ड के अनुसार, 2025 के पहले आठ महीनों में भारत से वहाँ आने वाले कुल यात्रियों की संख्या 1.25 लाख रही, जो पिछले साल की तुलना में 22% कम है। यह वही अजरबैजान था जिसने कुछ महीने पहले तक भारत को अपने टॉप-5 प्राथमिक पर्यटन बाजारों में शामिल किया था।

लेकिन अगस्त 2025 तक भारत की रैंक फिसलकर 11वें स्थान पर पहुँच गई। यह गिरावट केवल संख्याओं की नहीं बल्कि एक चेतावनी है कि किसी देश की विदेश नीति उसके पर्यटन पर कितना गहरा असर डाल सकती है।

तुर्की: इस्तांबुल और कप्पाडोसिया में घटती भारतीय रौनक

तुर्की लंबे समय से भारतीयों के बीच पसंदीदा पर्यटन स्थल रहा है। इस्तांबुल, कप्पाडोसिया, अंताल्या जैसे स्थान भारतीय कपल्स, फिल्म शूटरों और हनीमून ट्रैवलर्स के लिए आकर्षण का केंद्र रहे हैं। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद तुर्की की पाकिस्तान समर्थक स्थिति ने इस छवि को गहरा नुकसान पहुँचाया।

मई से अगस्त 2025 के बीच तुर्की जाने वाले भारतीय यात्रियों की संख्या 1.36 लाख से घटकर 90,400 रह गई, यानी 33.3% की गिरावट। इस साल के पहले चार महीनों (जनवरी से अप्रैल) में यह संख्या लगभग स्थिर थी (83,300 बनाम 84,500), लेकिन मई के बाद गिरावट तेज हो गई।

जनवरी से अगस्त 2025 में भारत से तुर्की जाने वाले कुल पर्यटकों की संख्या 21% घटकर 1.74 लाख रह गई। पिछले साल यानी 2024 में इसी वक्त के दौरान तुर्की में भारतीय पर्यटकों की संख्या में 28.5% की वृद्धि दर्ज की गई थी। यानी एक साल के भीतर पूरा ट्रेंड पलट गया।

यह गिरावट तुर्की की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर है, क्योंकि वहाँ का पर्यटन क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 12% तक योगदान देता है। भारतीय सैलानियों की कमी से न केवल होटल और एयरलाइन कंपनियाँ प्रभावित हुईं, बल्कि स्थानीय व्यापारियों और टूर ऑपरेटर्स को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा।

आर्थिक और कूटनीतिक असर: पर्यटन से परे की कहानी

यह घटना यह दर्शाती है कि आज के समय में कूटनीति और पर्यटन एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। भारत जैसे विशाल बाजार के सैलानियों की नाराजगी का असर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा पड़ सकता है।

पहला असर आर्थिक है, होटल बुकिंग्स, एयरलाइंस की टिकट सेल, ट्रैवल गाइड, टैक्सी सर्विस और स्मारिका बाजारों में गिरावट। जब लाखों पर्यटक एक साथ किसी देश की यात्रा रद्द करते हैं, तो स्थानीय रोजगार पर इसका सीधा असर होता है।

दूसरा सामाजिक और मानसिक असर है, अब भारतीय यात्रियों की सोच बदल रही है। वे किसी देश की यात्रा करने से पहले सिर्फ सुंदर जगह या सस्ता पैकेज नहीं देखते, बल्कि यह भी ध्यान रखते हैं कि उस देश का भारत के प्रति रवैया कैसा है। सोशल मीडिया पर ऐसे ट्रेंड बनना अब सामान्य बात हो गई है, जो ट्रैवल ट्रेंड्स को प्रभावित करते हैं।

तीसरा असर कूटनीतिक है, तुर्की और अजरबैजान जैसे देशों को यह समझना होगा कि भारत का जनसमर्थन अब किसी भी राजनीतिक रुख से प्रभावित हो सकता है। यदि कोई देश पाकिस्तान जैसे भारत-विरोधी देश का खुलकर साथ देता है, तो उसकी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद की यह पूरी कहानी इस बात की मिसाल है कि आज की वैश्विक दुनिया में राष्ट्रीय भावना एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभर चुकी है। अजरबैजान में 56% और तुर्की में 33% की गिरावट केवल संख्याएँ नहीं, बल्कि यह दिखाती हैं कि भारतीय यात्रियों की सोच अब पहले से कहीं अधिक संवेदनशील और जागरूक हो चुकी है। भारत जैसे बड़े टूरिस्ट मार्केट को खोना किसी भी देश के लिए बड़ा झटका है।

न आतिशबाजी होगी, न होंगे कोई स्टेज शो: ब्रिटेन के लीसेस्टर में ‘पब्लिक सेफ्टी’ के नाम पर लगा दीवाली पर बैन, हिंदू बोले- अब हमारे पर्व भी खतरे में

भारत के बाहर दुनिया के सबसे बड़े दिवाली उत्सव में एक ब्रिटेन के लीसेस्टर में होने वाले उत्सव पर रोक लगा दिया गया है। दिवाली पर यहाँ आतिशबाजी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों इस साल नहीं हो रहा है। सिटी काउंसिल की इस घोषणा को हिन्दू समुदाय ने पक्षपातपूर्ण करार दिया है।

हर साल यहाँ बड़े पैमाने पर पारंपरिक उत्सव आयोजित होते थे। आतिशबाजी और स्टेज शो जैसे कार्यक्रम होते थे। इस साल बेलग्रेव रोड पर यातायात बंद रहेगा। हालाँकि लैंपपोस्ट पर सजावट किए जाएँगे। इसके पीछे पब्लिक सेफ्टी का हवाला दिया गया है।

आवाजाही बंद, लेकिन ‘गोल्डन माइल’की होगी सजावट

लीसेस्टर सिटी काउंसिल के मुताबिक, हर साल की तरह इस साल भी बेलग्रेव रोड पर मशहूर ‘गोल्डन माइल’ लाइटों से जगमगाएगा और 20 अक्टूबर 2025 को सड़कों पर ट्रैफिक भी बंद रहेगा। लेकिन इस बार आतिशबाजी नहीं होगी, ना ही मंच पर कोई कार्यक्रम होगा। पिछले सालों की तरह दीवाली का मेला भी नहीं लगेगा।

यह कदम शहर के सुरक्षा सलाहकार समूह (SAG) के निर्देश के बाद उठाया गया है, जिसमें काउंसिल, पुलिस और आपातकालीन सेवाओं के प्रतिनिधि शामिल थे। SAG ने कहा कि पिछले साल दीपावली पर करीब 50 हजार लोग इकट्ठा हुए थे, जो कि सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।

भारतीय मूल की लीसेस्टर सांसद शिवानी राजा ने इस फैसले की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि दीपावली का जश्न खतरे में है। शिवानी राजा ने एक्स पर पोस्ट में लिखा, “हमारी दीवाली का जश्न अब भी खतरे में, हमारे जश्न पर संकट मंडरा रहा है।”

पिछली दीवाली में परोसा गया नॉन वेज- शराब

यह पहली बार नहीं है जब ब्रिटेन में दीवाली के जश्न पर विवाद खड़ा हुआ है। पिछले साल 2024 में भी पीएम कीर स्टार्मर की सरकार के दौरान 10 डाउनिंग स्ट्रीट पर दीवाली रिसेप्शन कार्यक्रम में मीट और शराब परोसी गई थी।

उस वक्त भी हिंदू, सिख और जैन समाज के लोगों ने इसका विरोध किया था और इसे धार्मिक भावनाओं के खिलाफ बताया था। लीसेस्टर सांसद शिवानी राजा ने तब भी स्टार्मर को पत्र लिखकर कहा था कि खाने का मेन्यू धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार नहीं था। उन्होंने आगे से गाइडेंस देने की पेशकश भी की थी।

लीसेस्टर में हिंदू-विरोधी माहौल खड़ा करने की हुई कोशिश

ब्रिटेन के लीसेस्टर में 18 प्रतिशत हिंदू समाज के लोग रहते हैं। यही कारण है कि लीसेस्टर की दीवाली दुनियाभर में मशहूर है। इसके अलावा बाकी हिंदू त्योहार भी धूमधाम से मनाए जाते हैं। हालाँकि, शहर में कई बार हिंदू-विरोधी माहौल खड़ा करने की कोशिश की गई है।

गणेश चतुर्थी की शोभायात्रा में भगवा झंडे लगाने को लेकर विवाद शुरू हुआ था। जब मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन (MCB) ने इसे ‘हिंदू कट्टरवाद’ बताकर कार्रवाई की माँग की थी।

वहीं साल 2022 में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के बाद हिंसा के जख्म अब तक नहीं भरे हैं। सोशल मीडिया पर हिंदुओं के खिलाफ झूठी अफवाहें फैलाई गई थीं। इन अफवाहों के बाद हिंदू घरों और मंदिरों पर हमले हुए, भगवा झंडो का अपमान किया गया और सरेआम लोगों पर चाकू से वार किए गए थे।

कुछ समय बाद नवंबर 2022 में आई घटना की जाँच रिपोर्ट में साफ हो गया था कि हिंसा ‘हिंदुत्व कट्टरवाद’ से नहीं, बल्कि इस्लामी दुष्प्रचार से भड़की थी।