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UP CM योगी आदित्यनाथ करेंगे 5 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रोजेक्ट लॉन्च, किसानों-युवाओं को होगा फायदा: खाली पड़ी औद्योगिक जमीनों पर होंगे निर्माण

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस साल नवंबर में 5वें ग्राउंड-ब्रेकिंग सेरेमनी (GBC) के अवसर पर 5 लाख करोड़ रुपए के निजी निवेश प्रोजेक्ट्स की शुरुआत करेंगे। पिछले 8.5 सालों में 4 GBCs के दौरान पहले ही 15 लाख करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट पूरे किए जा चुके हैं, जिनसे करीब 60 लाख लोगों को रोजगार मिला है।

औद्योगिक विकास विभाग की बैठक की अध्यक्षता करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने निर्देश दिया कि हर निवेश प्रस्ताव की नियमित निगरानी हो और उस पर समय से कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि निजी औद्योगिक इकाइयों के लिए जमीन अधिग्रहण स्थानीय लोगों की सहमति से होना चाहिए।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट किया “जमीन हर व्यक्ति की भावनाओं और जीवनभर की पूँजी से जुड़ी होती है। अगर राज्यहित में जमीन लेनी हो तो किसानों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए और शोषण की कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। संवाद और तालमेल से यह कार्य आसानी से किया जा सकता है।”

मुख्यमंत्री ने सभी औद्योगिक विकास प्राधिकरणों से कहा कि वे अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार जमीन अधिग्रहण के मुआवजे की दरें बढ़ाने पर विचार करें। उन्होंने इसे किसानों के हित में और समय की माँग बताया। साथ ही, उन्होंने चेतावनी दी कि यदि किसी उद्योग को दी गई जमीन 3 साल तक उपयोग नहीं होती, तो उसका आवंटन रद्द कर दिया जाएगा और वह जमीन दूसरे निवेशकों को दी जाएगी।

बैठक में बताया गया कि वर्ष 2025–26 के लिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 5 लाख करोड़ रुपए GVA का लक्ष्य तय किया गया है। इसके लिए 8,000 नई और पुरानी इकाइयों को फ़ैक्ट्रीज़ एक्ट के तहत रजिस्टर करना होगा, जिनमें से अभी तक 1354 इकाइयाँ रजिस्टर हुई हैं। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि श्रम सुधार की प्रक्रिया तेज की जाए और खाली पड़ी औद्योगिक जमीन को सक्रिय किया जाए।

विदेशी कर्ज पर TMC MP साकेत गोखले ने किया गुमराह, दावा- 7 साल में मोदी सरकार ने किया ₹8 लाख करोड़ का लोन: जानिए- क्या है सच्चाई

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के सांसद और मनी लॉन्ड्रिंग घोटाले के आरोपित साकेत गोखले ने एक बाद फिर से अधूरी जानकारी देकर आम लोगों को भ्रमित करने का काम किया है। इस बार गोखले ने मोदी सरकार पर भारी-भरकम विदेशी कर्ज लेने का आरोप लगाया है।

बुधवार (17 सितम्बर 2025) को गोखले ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लंबी पोस्ट लिखी। इसमे उसने दावा किया कि पिछले 7-8 सालों में मोदी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बैंकों से भारी भरकम कर्ज लिया है।

गोखले ने कहा कि वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग ने दिसंबर 2023 में राज्यसभा में उनके सवाल का जवाब देते हुए ये जानकारी दी थी। जिसके मुताबिक, मोदी सरकार ने इन सालों में विदेशी बैंकों से कुल 91 अरब डॉलर (करीब 8,03,530 करोड़ रुपए) का कर्ज लिया।

यानी हर साल औसतन 1.2 लाख करोड़ रुपए का विदेशी कर्ज। गोखले का दावा है कि इस कर्ज पर भारत हर साल लगभग 45,000 करोड़ रुपए सिर्फ ब्याज के तौर पर चुका रहा है। इसके अलावा असली कर्ज (प्रिंसिपल अमाउंट) की अदायगी अलग से करनी होगी।

साकेत गोखले ने विदेशी कर्ज और उस पर लगने वाले ब्याज को लेकर लोगों को इसका बोझ समझाने की कोशिश की। गोखले के अनुसार 2018 से अब तक इस विदेशी कर्ज पर हर साल सिर्फ ब्याज ही 45,000 करोड़ रुपए का चुकाना पड़ता है।

यह रकम उतनी ही है जितना भारत का पूरा सालाना बजट उच्च शिक्षा पर खर्च होता है। गोखले ने आरोप लगाया कि मोदी के जन्मदिन पर सरकार जनता को तौहफ़े के नाम पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स की घोषणा करती है। इसके अलावा, हर राज्य चुनाव से पहले मोदी नियमित रूप से प्रचार यात्राएँ करते हैं और लाखों-करोड़ों के प्रोजेक्ट्स घोषित करते हैं।

उन्होंने कहा कि पिछले 11 सालों से मोदी सरकार ने लोगों पर टैक्स का बोझ डाला है। इसके बावजूद, विदेशी संस्थाओं से भारी कर्ज लिया गया है। अब सवाल है कि इस बड़े विदेशी कर्ज का बोझ आखिर कौन उठाएगा? गोखले के अनुसार, इसका बोझ सीधे आम जनता पर ही पड़ेगा।

विवादित टीएमसी सांसद साकेत गोखले ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव से पहले विदेशी बैंकों से कर्ज लेकर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स की घोषणा करते हैं और चुनाव खत्म होते ही वादे भूल जाते हैं। इसका असली बोझ आम जनता को उठाना पड़ता है।

गोखले ने कहा, “मोदी हर चुनाव से पहले जुमलेबाज़ी करते हैं। वे करोड़ों-लाखों के प्रोजेक्ट्स ‘जनता को तोहफे’ के नाम पर ऐसे घोषित करते हैं जैसे अपनी जेब से खर्च कर रहे हों। लेकिन सच्चाई यह है कि इन चुनावी वादों की असली कीमत भारत की जनता को चुकानी पड़ रही है। चुनाव के बाद मोदी अपने वादे भूल जाते हैं। भारत अरबों डॉलर का कर्ज सिर्फ मोदी के झूठे चुनावी वादों को पूरा करने के लिए ले रहा है। इस विदेशी कर्ज की अदायगी जनता को दशकों तक करनी पड़ेगी।”

गोखले ने इसके साथ वित्त मंत्रालय की उस जवाब की कुछ चुनी हुई कॉपियाँ भी साझा कीं जो उन्होंने राज्यसभा में पूछे गए सवाल पर मिली थीं। लेकिन यह भी साफ दिखा कि या तो उन्होंने जानबूझकर सरकार के जवाब की पूरी सच्चाई छिपाई या फिर उनकी समझ ही हकीकत से कटी हुई है।

क्या मोदी सरकार ने 8 लाख करोड़ रुपए का विदेशी कर्ज लिया है?

सरकार के जवाब में बताया गया कि जनवरी 2018 से अब तक विदेशी बहुपक्षीय वित्तीय संस्थाओं और बैंकों से लिए गए कर्ज का पूरा ब्यौरा मौजूद है, जिसमें कुल राशि और हर कर्ज पर लगने वाली ब्याज दर का विवरण शामिल है।

साकेत गोखले की पोस्ट में जो दूसरी इमेज लगाई गई थी, उसमें कर्ज की मुद्रा, बकाया राशि (LC, INR और USD) के सही आँकड़े दिए गए थे। लेकिन गोखले ने इन्हें ऐसे पेश किया मानो यह पूरा कर्ज सिर्फ केंद्र सरकार ने लिया हो।

असल में, यह कर्ज सिर्फ केंद्र सरकार ने नहीं बल्कि कई राज्य सरकारों ने भी लिया है। राज्यसभा में 2023 में गोखले के सवाल पर दिए गए जवाब के मुताबिक, केंद्र सरकार ने 15.23 अरब डॉलर का कर्ज लिया है।

इसके अलावा महाराष्ट्र सरकार ने 2.90 अरब डॉलर, तमिलनाडु 1.80 अरब डॉलर, राजस्थान 1.36 अरब डॉलर, मध्य प्रदेश 1.10 अरब डॉलर, आंध्र प्रदेश 1.09 अरब डॉलर, छत्तीसगढ़ 0.46 अरब डॉलर, उत्तर प्रदेश 0.42 अरब डॉलर, कर्नाटक 0.40 अरब डॉलर, पश्चिम बंगाल 0.38 अरब डॉलर, असम 0.36 अरब डॉलर, हिमाचल प्रदेश 0.35 अरब डॉलर, बिहार 0.31 अरब डॉलर, केरल 0.22 अरब डॉलर, पंजाब 0.24 अरब डॉलर, त्रिपुरा 0.28 अरब डॉलर, ओडिशा 0.22 अरब डॉलर और उत्तराखंड सरकार ने 0.23 अरब डॉलर विदेशी स्रोतों से कर्ज लिया है।

मोदी सरकार पर हमला करने की जल्दबाज़ी में साकेत गोखले ने अधूरी और चुनिंदा जानकारी ही पेश की, लेकिन अपनी ही पार्टी द्वारा शासित राज्य की खराब आर्थिक स्थिति पर ध्यान नहीं दिया।

मार्च 2024 तक पश्चिम बंगाल का बकाया कर्ज राज्य की सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) का 38% है। यह बड़े राज्यों में कर्ज से GSDP अनुपात के मामले में सबसे ऊँचे स्तरों में से एक है।

फरवरी 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला पश्चिम बंगाल वित्तीय वर्ष 2025-26 के अंत तक लगभग 7.72 लाख करोड़ रुपए के कुल कर्ज के साथ बंद होगा। यह आंकड़ा 31 मार्च 2025 को दर्ज 6,30,783.50 करोड़ रुपए की तुलना में 9.21% ज्यादा है। यह अनुमान 2024-25 के संशोधित आकलन पर आधारित है।

साल 2022 में टीएमसी सरकार ने मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) की निधि को बोटुई हिंसा पीड़ितों को मुआवजा देने में इस्तेमाल किया था। केंद्र सरकार की रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि अप्रैल से सितंबर 2022 के बीच पश्चिम बंगाल प्रशासन ने 16 करोड़ से ज्यादा मध्याह्न भोजन की गिनती अतिरंजित दिखा दी, जिसकी कीमत 100 करोड़ रुपए से अधिक थी।

इसके अलावा पश्चिम बंगाल पहले से ही एसएससी घोटाला, पीडीएस घोटाला और मवेशी तस्करी जैसे कई भ्रष्टाचार मामलों से जूझ रहा है। राज्य की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ रही है। इसके बावजूद, राज्य के टीएमसी सांसद केंद्र सरकार को बदनाम करने के लिए भ्रामक जानकारी फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।

साकेत गोखले के बेतुके षड्यंत्र सिद्धांत और झूठे दावे

जनवरी 2020 में सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान साकेत गोखले ने दावा किया था कि दिल्ली पुलिस ने उन्हें रैली करने और नारा लगाने की अनुमति दी थी, “देश के गद्दारों को, गोली मारो …”। लेकिन उन्होंने कभी कोई सबूत या दिल्ली पुलिस की मंजूरी का पत्र नहीं दिखाया, जिससे उनका दावा साबित हो सके।

बाद में गोखले ने अपने बयान को बदलते हुए कहा कि पुलिस ने उन्हें 8 फरवरी के बाद प्रदर्शन करने के लिए कहा था, क्योंकि उस समय आचार संहिता लागू थी।

इस मामले की सही जाँच किए बिना ही वामपंथी वेबसाइट द वायर और कॉन्ग्रेस समर्थित नेशनल हेराल्ड ने गोखले के दावों को प्रकाशित कर दिया। इन रिपोर्टों से ऐसा दिखाने की कोशिश हुई मानो दिल्ली पुलिस को उस नारे में कोई आपत्ति नहीं थी।

दिल्ली पुलिस को साकेत गोखले के झूठे दावों का पर्दाफाश करने के लिए ट्विटर का सहारा लेना पड़ा। पुलिस ने साफ कहा कि 2 फरवरी 2020 को गोखले को किसी भी तरह की रैली या प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई थी। पुलिस ने यह भी बताया कि सोशल मीडिया पर जो पत्र अनुमति-पत्र बताकर फैलाया जा रहा है, वह असल में केवल गोखले का अनुरोध पत्र था।

जून 2020 में गोखले ने पीएम केयर्स फंड से खरीदे गए वेंटिलेटरों को लेकर एक ‘वेंटिलेटर घोटाले’ की साजिश थ्योरी फैलाई। उन्होंने ट्विटर पर सात हिस्सों में लिखी पोस्ट में दावा किया कि वेंटिलेटर खरीद के लिए दिए गए 750 करोड़ रुपए गायब हो गए हैं। इसके बाद कॉन्ग्रेस से जुड़े कई लोग इस झूठ को सच मानकर फैलाने लगे। लेकिन भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के चेयरमैन ने इन दावों को खारिज कर दिया। फरवरी 2021 में BEL ने झूठ फैलाने के आरोप में गोखले पर 1 करोड़ कॉन्ग्रेस का मानहानि मुकदमा भी दायर किया।

14 अगस्त 2020 को वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि फेसबुक की एक वरिष्ठ अधिकारी भाजपा सरकार का पक्ष ले रही हैं। इसके बाद फेसबुक की पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर अंकही दास पर कॉन्ग्रेस और उसके समर्थकों ने निशाना साधा।

साकेत गोखले ने भी आरोप लगाया कि अंकही दास आरएसएस से जुड़े संगठनों के कार्यक्रमों में शामिल हुईं। उन्होंने दावा किया कि अंकही दास World Organization of Students & Youth (WOSY) के एक सत्र में शामिल हुई थीं, जबकि सच यह था कि उस कार्यक्रम में उनकी जुड़वाँ बहन डॉ रश्मि दास मौजूद थीं। WOSY ने इस पर नाराजगी जताई और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी। संगठन ने कहा कि डॉ रश्मि दास का जुड़ाव WOSY से स्वेच्छा से था, जिसका मकसद भारत में पढ़ रहे अंतरराष्ट्रीय छात्रों के बीच वसुधैव कुटुंबकम का संदेश फैलाना है।

अप्रैल 2021 में गोखले महाराष्ट्र सरकार द्वारा ब्रुक फार्मा के डायरेक्टर को रेमडेसिविर दवा सप्लाई मामले में परेशान किए जाने को सही ठहराने के लिए झूठ फैलाते पकड़े गए। उन्होंने महाराष्ट्र के गृहमंत्री से शिकायत की थी कि बीजेपी और विपक्षी नेता देवेंद्र फडणवीस जैसे निजी लोग यह दवा कैसे हासिल कर पाए, जबकि इसका वितरण केवल राज्य सरकार को ही किया जाना था।

सितंबर 2024 में गोखले ने दावा किया कि मोदी सरकार ने ट्रेनों के निर्माण की लागत में 50% तक बढ़ोतरी की है। उन्होंने आरोप लगाया कि नए कॉन्ट्रैक्ट में ट्रेनों की संख्या घटाकर 133 कर दी गई और प्रति ट्रेन की लागत 290 करोड़ से बढ़ाकर 436 करोड़ कर दी गई। लेकिन जल्द ही रेलवे मंत्रालय ने उनके इन दावों को झूठा बताया और साफ किया कि गोखले ने जानबूझकर अहम तथ्यों को छुपाकर भ्रामक जानकारी दी।


(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

पहले शाहिद अफरीदी को राहुल गाँधी लगे ‘सकारात्मक’, अब सैम पित्रोदा ने पाकिस्तान को बताया ‘घर जैसा’: ‘मोहब्बत की दुकान’ से आतंकिस्तान की ब्रांडिंग कर रहे कॉन्ग्रेसी

राहुल गाँधी के करीबी सैम पित्रोदा ने एक बार फिर भारत के दुश्मनों के लिए प्रेम दिखाया है। सैम पित्रोदा ने कहा है कि भारत को अपनी विदेश नीति में सबसे पहले अपने पड़ोसियों पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि उन्हें पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में ‘घर जैसा महसूस’ होता है।

पित्रोदा का यह बयान उस वक्त आया है जब कुछ समय पहले ही पाकिस्तानी आतंकियों ने पहलगाम में हिंदुओं की निर्मम हत्या की थी। जब भारत में खून बहाया जा रहा है, तब राहुल गाँधी के खास आदमी को पाकिस्तान में अपनापन महसूस हो रहा है।

बीजेपी नेता प्रदीप भंडारी ने सैम पित्रोदा के बयान पर तीखा हमला बोला है। प्रदीप भंडारी ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “राहुल गाँधी के चहेते और कॉन्ग्रेस के विदेश प्रमुख सैम पित्रोदा कहते हैं कि उन्हें पाकिस्तान में ‘घर जैसा’ महसूस हुआ।”

प्रदीप भंडारी ने आगे कहा, “कोई आश्चर्य नहीं कि UPA सरकार ने 26/11 हमले के बाद भी पाकिस्तान के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की।” प्रदीप भंडारी ने आखिरी में लिखा, “पाकिस्तान का चहेता, कॉन्ग्रेस का चुना हुआ”

सैम पित्रोदा का विवादित बयान

इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस के प्रमुख सैम पित्रोदा ने कहा कि भारत को अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध बनाने चाहिए और हमारे पड़ोसी देश मुश्किल समय से गुजर रहे हैं, इसलिए उनसे लड़ना सही नहीं है। सैम पित्रोदा ने माना कि इन देशों में हिंसा और आतंकवाद जैसी समस्याएँ हैं, लेकिन फिर भी हमें उनके साथ शांति और सद्भाव से रहना सीखना चाहिए।

सैम पित्रोदा ने अपने बयान को सही साबित करने के लिए पाकिस्तान का उदाहरण दिया। सैम पित्रोदा ने कहा, “मैं पाकिस्तान गया हूँ, और मुझे कहना पड़ेगा कि मुझे वहाँ घर जैसा महसूस हुआ। मैं बांग्लादेश और नेपाल भी गया हूँ, और वहाँ भी मुझे घर जैसा महसूस हुआ।” सैम पित्रोदा ने आगे कहा कि ये देश उन्हें विदेशी नहीं लगते, क्योंकि यहाँ के लोग उन्हीं की तरह दिखते हैं, उन्हीं की तरह बात करते हैं, उन्हीं के गाने पसंद करते हैं और उन्हीं जैसा खाना खाते हैं।

सैम पित्रोदा ने यह भी कहा कि मैं देश के युवाओं से अनुरोध करना चाहता हूँ कि वे राहुल गाँधी के साथ खड़े हों। उनकी आवाज के साथ अपनी आवाज मिलाएँ। राहुल गाँधी ने GenZ से अपील की थी कि वे आगे आएँ और देश के लोकतंत्र की रक्षा करें।

शाहिद अफरीदी का राहुल गाँधी पर बयान

इसी बीच, पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शाहिद अफरीदी ने भी भारत में राजनीतिक विवादों को हवा दी है। शाहिद अफरीदी ने कहीं ना कहीं मौजूदा सरकार पर हमला करते हुए कहा, “ये सरकार अपने आपको पावर में लाने के लिए हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलती है और यह बहुत गंदा किस्म का माइंडसेट है।”

इसके तुरंत बाद शाहिद अफरीदी राहुल गाँधी की तारीफ करते हुए दिखे। शाहिद अफरीदी ने कहा, “राहुल गाँधी की बात करू तो, राहुल बहुत पॉजिटिव माइंडसेट के हैं। वो (राहुल) दुनिया के साथ चलना चाहता है।” इसके बाद शाहिद अफरीदी बोलते हैं कि एक इजरायल कम था, जो दूसरा इजरायल बनने की कोशिश की जा रही है।

यह वही शाहिद अफरीदी हैं, जिसने यासीन मलिक जैसे आतंकियों का समर्थन किया था और कश्मीर के अलगाव की माँग की थी। शाहिद अफरीदी के बयान और सैम पित्रोदा के विचार एक ही धारा में दिखते हैं, जिसमें भारत की सत्ता को अस्थिर करने और पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की कोशिशें साफ नजर आती हैं।

यह हैरान करने वाली बात है कि एक तरफ पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शाहिद अफरीदी राहुल गाँधी की तारीफ कर रहे है और दूसरी तरफ राहुल गाँधी के करीबी सैम पित्रोदा पाकिस्तान की तारीफ कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि यह कोई संयोग नहीं है। यह दिखाता है कि एक तरफ कुछ लोग भारत के खिलाफ काम कर रहे हैं और दूसरी तरफ राहुल गाँधी के खास आदमी उन देशों से अच्छे संबंध बनाने की बात कर रहे हैं, जहाँ से आतंकवाद को बढ़ावा मिलता है।

70 वर्षों में पंजाब की सबसे भीषण बाढ़: प्रकृति के कहर ने उजागर किया AAP सरकार का असफल शासन

भगवंत मान की लापरवाही ने प्राकृतिक आपदा को मानव निर्मित त्रासदी में बदल दिया, लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया जबकि केंद्र सरकार ने तुरंत मदद पहुँचाई।

पंजाब इस समय पिछले सत्तर वर्षों की सबसे भीषण बाढ़ का सामना कर रहा है। पूरे 23 जिले और 2,000 से अधिक गाँव पानी में डूब चुके हैं। लाखों लोग बेघर हो गए हैं और 1.75 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि जलमग्न हो गई है। पूरी फसलें बर्बाद हो चुकी हैं और आने वाला बुवाई का मौसम भी खतरे में है। ये सिर्फ आँकड़े नहीं हैं, बल्कि उन किसानों की पीड़ा है जिनकी सालभर की मेहनत कुछ ही दिनों में बह गई। यह उन परिवारों का दर्द है जिनके घर उजड़ गए, और उन बच्चों की असहायता है जिनके पास अब स्कूल लौटने की जगह नहीं बची।

हालाँकि प्रकृति का कहर टालना संभव नहीं था, लेकिन इतनी बड़ी तबाही को रोका जा सकता था। इस संकट को बढ़ाने का असली कारण भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार की लापरवाही और असंवेदनशीलता है। यह आपदा केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि शासन की विफलता का प्रमाण बन गई है।

इस आपदा की मानवीय कीमत बहुत भयावह है। गुरदासपुर, अजनाला और ससराली जैसे जिलों में परिवारों को अपने घरों की छतों पर फँसा हुआ देखा गया, जो राहत कार्य के इंतजार में थे। माताएँ पूरी रात अपने बुखार से तपते बच्चों को गोद में उठाए पानी के बढ़ते स्तर से बचाने की कोशिश कर रही थीं। किसानों की आँखों में आंसू थे जब उन्होंने अपने खेतों की ओर इशारा किया, जहाँ कभी गेहूँ की लहलहाती फसल होती थी, अब सिर्फ रेत के ढेर थे।

लोगों में एक ही भावना थी त्याग दिए जाने की पीड़ा। गाँववालों ने कहा, “हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया गया है।” कई दिनों तक कोई डॉक्टर, कोई दवाई और प्रशासन का कोई कर्मचारी नहीं दिखा। विडंबना यह है कि AAP सरकार द्वारा प्रचारित मोहल्ला क्लीनिक इस आपदा के समय कहीं नजर नहीं आए। राहत कार्य का भार स्वयंसेवकों, सेना, NDRF जवानों, गुरुद्वारों और आम ग्रामीणों पर आ गया। राज्य की प्रशासनिक मशीनरी पूरी तरह नदारद रही।

इस संकट के दौरान सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि मुख्यमंत्री भगवंत मान खुद राज्य में मौजूद नहीं थे। जब गांव पानी में डूब रहे थे, तब मुख्यमंत्री तमिलनाडु में छुट्टियां मना रहे थे। जब हालात बेकाबू हो गए और लोगों का आक्रोश बढ़ा, तभी वे पंजाब लौटे। संकट के समय नेतृत्व की असली परीक्षा होती है, और इस परीक्षा में मान पूरी तरह असफल साबित हुए।

इससे भी बड़ी समस्या यह रही कि अरविंद केजरीवाल इस आपदा को भी राजनीतिक अवसर के रूप में इस्तेमाल करने आ पहुँचे। पंजाब में कोई संवैधानिक पद न होने के बावजूद, केजरीवाल ने मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर, सुरक्षा और संसाधनों का उपयोग ऐसे किया जैसे यह उनका निजी राज्य हो। जब मौसम साफ होता है, तो वे फोटो खिंचवाने आते हैं, और जैसे ही हालात बिगड़ते हैं, तुरंत दिल्ली लौट जाते हैं। यह पंजाब की जनता के जनादेश का खुला मजाक है।

इस बीच, दिल्ली के शराब घोटाले में आरोपित मनीष सिसोदिया को पंजाब में तैनात कर दिया गया है। पंजाब को एक ऐसे परीक्षण मैदान में बदल दिया गया है, जहाँ असफल मॉडलों और भ्रष्ट नेताओं को बसाया जा रहा है। AAP के भीतर जो नेता इसका विरोध करते हैं, उन्हें चुप करा दिया जाता है। पठानमाजरा मामले में देखा गया कि जिसने भी आवाज उठाई, उसे धमकियों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

इस आपदा के बीच AAP मंत्रियों का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे राहत नौका पर बैठकर स्वीडन और गोवा की छुट्टियों की चर्चा कर रहे थे। जबकि लाखों पंजाबी बाढ़ में फँसे थे, उनके नेता मौज-मस्ती में लगे थे। यह असंवेदनशीलता और घमंड की पराकाष्ठा है, जिसे जनता कभी नहीं भूलेगी।

इसके बिल्कुल विपरीत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद पंजाब का दौरा किया। उन्होंने हवाई सर्वेक्षण किया, गुरदासपुर में समीक्षा बैठक की, प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और तुरंत ₹1,600 करोड़ की राहत राशि की घोषणा की। इसके अलावा, पहले से ही पंजाब के राज्य राहत कोष में मौजूद ₹12,000 करोड़ को जोड़कर कुल ₹13,600 करोड़ अब बाढ़ राहत और पुनर्वास के लिए उपलब्ध हैं।

प्रधानमंत्री ने यह भी घोषणा की कि मृतकों के परिजनों को ₹2 लाख, घायलों को ₹50,000, और अनाथ बच्चों की देखभाल PM CARES के तहत की जाएगी। उनका दीर्घकालिक दृष्टिकोण सिर्फ राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें घर और स्कूलों का पुनर्निर्माण, खेती को दोबारा खड़ा करना, पशुपालन को समर्थन, और जल संरक्षण प्रणालियों में निवेश शामिल है ताकि भविष्य में ऐसी तबाही दोबारा न हो।

यह तुलना बेहद स्पष्ट है।​ एक ओर गायब मुख्यमंत्री और विफल राज्य सरकार, जो सिर्फ प्रचार में लगी है।​ दूसरी ओर प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार, जो संवेदनशीलता और तत्परता के साथ कार्य कर रही है। हालाँकि, राहत राशि तभी प्रभावी होगी जब उसका सही उपयोग और निगरानी की जाए।

यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि हर एक रुपया पीड़ितों तक पहुँचे और केजरीवाल व उनकी टीम की जेब में न जाए। यह भी चिंताजनक है कि पहले बाढ़ प्रबंधन के नाम पर खर्च किए गए ₹230 करोड़ का अब तक कोई हिसाब नहीं दिया गया। अवैध बालू खनन के नेटवर्क और राहत राशि के दुरुपयोग की स्वतंत्र जाँच जरूरी है। किसानों को उनकी नष्ट हुई फसलों का उचित मुआवजा मिलना चाहिए और प्रभावित गाँवों में वास्तविक पुनर्वास कार्य दिखना चाहिए, न कि केवल सरकारी विज्ञापनों में।

इस आपदा से कई सबक लेने होंगे। तैयारी को विकल्प नहीं, अनिवार्यता बनाना होगा। मौसम विभाग और विशेषज्ञों की चेतावनियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जवाबदेही तय करनी होगी, और जो लोग जनता की रक्षा करने में विफल रहे हैं उन्हें जिम्मेदार ठहराना होगा। राहत निधियों का पारदर्शी और ऑडिटेड खर्च सुनिश्चित करना होगा। पंजाब का शासन दिल्ली के राजनीतिक बॉसों के हाथों में नहीं, बल्कि पंजाब में रहकर करना होगा। और सबसे जरूरी, नेताओं को पंजाब को राजनीतिक प्रयोगशाला नहीं, बल्कि गर्वित नागरिकों का राज्य मानना होगा।

पंजाब के लोग साहसी और दृढ़निश्चयी हैं। वे अपने घर, खेत और स्कूल दोबारा बनाएँगे। लेकिन वे टूटे हुए विश्वास को भी पुनर्निर्मित करेंगे। बाढ़ का पानी उतर जाएगा, लेकिन यह याद हमेशा रहेगी कि कौन उनके साथ खड़ा था और कौन उन्हें छोड़कर भाग गया।

यह त्रासदी एक मोड़ है। इसने AAP सरकार की खोखली राजनीति को उजागर किया और यह दिखाया कि पंजाब को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो भागे नहीं, सेवा करे। पंजाब को ऐसी सरकार चाहिए जो सेवा को राजनीति पर, जवाबदेही को अहंकार पर, और करुणा को असंवेदनशीलता पर प्राथमिकता दे।

इतिहास जब इस बाढ़ को याद करेगा, तो वह सिर्फ प्रकृति के प्रकोप को नहीं, बल्कि उन नेताओं की विफलता को भी याद करेगा जिन्हें पंजाब की रक्षा करनी थी। अब समय आ गया है कि ऐसी विश्वासघातपूर्ण राजनीति को दोहराया न जाने दिया जाए।

राहुल गाँधी का खतरनाक खेल

(लेफ्ट, राइट और सेंटर: शुक्रवार, 19 सितंबर, 2025)

इस लेखक ने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले दो भविष्यवाणियाँ की थीं। उस समय मीडिया और यहाँ तक कि जो लोग मीडिया की हर बात को पत्थर की लकीर मानते थे, वे भी कह रहे थे कि मोदी 2014 में जैसे तैसे प्रधानमंत्री तो बन गए हैं, लेकिन उन्हें दूसरा कार्यकाल नहीं मिलेगा। भाजपा हार जाएगी।

ऐसे माहौल में पहली भविष्यवाणी यही थी कि मोदी को 300 से ज्यादा सीटें मिलेंगी।

मेरी दूसरी भविष्यवाणी यह ​​थी कि सवाल यह नहीं है कि मोदी जीतेंगे या नहीं। सवाल यह है कि मोदी को दूसरा कार्यकाल मिलने से बौखलाया विपक्ष क्या करेगा? वे अराजकता फैलाएँगे। देश में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा करेंगे।

सौभाग्य से पहली भविष्यवाणी सच साबित हुई। 303 सीटें प्राप्त हुईं। और दुर्भाग्य से, दूसरी भविष्यवाणी भी सच साबित हुई। अराजकतावादियों ने सरकार के खिलाफ किसान आंदोलन और शाहीन बाग का प्रदर्शन किया।

राहुल गाँधी को ऐसा लगता है कि 1978 में, जब जनता पार्टी सत्ता में थी, तब दो युवा कॉन्ग्रेसी गुंडों ने खिलौना पिस्तौल और क्रिकेट बॉल दिखाकर इंडियन एयरलाइंस के विमान IC-410 का अपहरण कर लिया था और मोरारजी सरकार से दादी इंदिरा और चाचा संजय पर लगे आरोप वापस लेने और इस्तीफा देने की माँग की थी। वैसे ही यह भी कह रहा है कि वह ‘हाइड्रोजन बम’ दिखाकर मोदी सरकार को उखाड़ फेंकेंगे। उस समय कॉन्ग्रेस ने कहा था कि भोलानाथ पांडे और देवेंद्र पांडे का कॉन्ग्रेस के साथ कोई सम्बन्ध नहीं था। कॉन्ग्रेस ने सरासर झूठ बोला था। 1980 में जब इंदिरा गाँधी दोबारा प्रधानमंत्री बनीं, तब दोनों पांडे बंधु कॉन्ग्रेस के टिकट पर उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए थे।

कर्नाटक की आलंद विधानसभा सीट पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाने के लिए राहुल गाँधी द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के बाद, उनके ‘हाइड्रोजन बम’ की क्षमता सबको पता चल गई है। इस आदमी के पास फटी हुई एक पिस्तौल भी नहीं है। पिछले कर्नाटक चुनाव में, यानी 2023 में अगर भाजपा ने ‘वोट चोरी’ की थी, तो कॉन्ग्रेस कैसे जीत गई? इस सवाल का जवाब राहुल गाँधी के पास नहीं है। जब एक रिपोर्टर ने पूछा कि ‘वोट चोरी’ के सबूत लेकर कोर्ट जाओगे? तब इस सवाल का जवाब देते हुए राहुल गाँधी ने गैर-जिम्मेदाराना अंदाज में कहा कि ‘यह मेरा काम नहीं’ है।

तो भई, तुम्हारा काम क्या है? लोगों को भड़काना? यह आदमी ‘वोट चोरी’ का बेबुनियाद मुद्दा इस इरादे से उठा रहा है कि तुम्हारी बकवास से नाराज भारत की जनता सड़कों पर उतर आए, संसद में घुस जाए, प्रधानमंत्री आवास में घुस जाए और बांग्लादेश और नेपाल जैसे हालात पैदा कर दे।

राहुल गाँधी की दाल किसी मुद्दे पर नहीं गलती। उन्होंने जाति जनगणना की माँग करके पिछड़े वर्गों को ऊपर उठाने की कोशिश की। सरकार ने मुसलमानों की दर्जनों जातियों की भी गिनती करने की घोषणा करके हिंदुओं में फूट डालने की चाल को नाकाम किया। इतना ही नहीं, सरकार ने बिहार के अलावा पूरे देश की मतदाता सूची का सत्यापन करने की भी घोषणा की। जब विपक्ष ने विशेष जाँच भूमिका (SIR) का विरोध किया, तो प्रधानमंत्री ने बेहद सख्त और तीखे स्वर में कहा कि मतदाता सूची से घुसपैठियों के नाम हटाने के सरकार के संकल्प को कोई नहीं तोड़ सकता।

राहुल ने अंबानी-अडानी पर निशाना साधा और सूट-बूट वाली सरकार का दिण्डक चलाया। सभी न्यायिक व्यवस्थाओं ने राहुल द्वारा दोनों औद्योगिक घरानों पर लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया है। बस, बची-कुची कसर सेबी ने पूरी कर दी, जिसने हिंडनबर्ग मामले में पलटी मारते हुए गौतम अडानी को क्लीन चिट दे दी है।

ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराने का आइडिया भी बहुत चला। 2004 और 2009 में EVM से चुनाव हुए और कॉन्ग्रेस की सरकार बनी। उस समय ईवीएम हैक नहीं हुई थीं, लेकिन मोदी के सत्ता में आने के बाद ईवीएम में घोटाले होने लगे?

क्या चुनाव आयोग मोदी का खिलौना है? 2014 के चुनाव में कॉन्ग्रेस सत्ता में थी। केंद्रीय चुनाव आयोग के आयुक्त कॉन्ग्रेस द्वारा चुने गए थे। इसके बावजूद, भारतीय जनता पार्टी को 303 सीटें मिलीं। अगर चुनाव आयोग और ईवीएम हैक करना संभव है, तो भाजपा को 2024 में 400 पार करने का मौका क्यों नहीं मिला? उसे 240 सीटों पर क्यों सिमटना पड़ा?

यहाँ तक ​​कि शातीत सोनिया के बेटे राहुल को भी पता है कि वह झूठे आरोप लगा रहे हैं। और कॉन्ग्रेस के कदम चूमने की आदी हो चुकी दरबारी मीडिया, राहुल के इन झूठों को अपने तंत्र के जरिए फैला रही है।

कुछ सड़कों के उबड़-खाबड़ होने की छोटी-मोटी शिकायतों के अलावा, भारत के मतदाताओं को मोदी सरकार से और कोई शिकायत नहीं है। लेकिन मैंने दुनिया के किसी भी देश में ट्रैफिक जाम के कारण दंगे होने और सरकार गिरने की बात नहीं सुनी।

मोदी सरकार का 11 साल का रिकॉर्ड उज्ज्वल है। लोग खुश हैं। राजनीतिक स्थिरता है। असामाजिक तत्वों द्वारा फैलाए गए दंगे नियंत्रण में हैं। कुछ इलाकों में सरकार की तमाम सुविधाओं का लाभ उठाने के बावजूद, कुछ मुस्लिम मतदाता मोदी को वोट नहीं देते, फिर भी मोदी सबका साथ सबका विकास पर अड़े हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप देश के कई समझदार मुस्लिम शांति से रहने के लिए मोदी समर्थक बन गए हैं।

कुल मिलाकर, देश ठीक चल रहा है। जो भी छोटी-मोटी शिकायतें हैं, वे नगण्य हैं। ऐसी छोटी-मोटी शिकायतें आपके परिवार में, दोस्तों के बीच, सोसायटी की इमारतों में भी बनी रहेंगी। सरकारें बदलती रहेंगी, लेकिन ऐसी शिकायतें किसी न किसी रूप में जारी रहेंगी। पूरी दुनिया में ऐसी कमियाँ होना स्वाभाविक है।

राहुल गाँधी ये सब समझते हैं। उन्हें ये भी पता है कि अगर मोदी 2029 में फिर से प्रधानमंत्री बन गए, तो उनके जीते जी कॉन्ग्रेस कभी सत्ता में नहीं आएगी (मैं दुआ करता हूँ कि राहुल 125 साल जिएँ)।

2029 के चुनाव सिर्फ राहुल के लिए नहीं, सिर्फ कॉन्ग्रेस के लिए नहीं, बल्कि पूरे विपक्ष के लिए आखरी मौका हैं। बंगाल चुनाव ममता बनर्जी के लिए भी आखिरी मौका है। एक ज्योतिषी ने तो यहाँ तक कह दिया है कि वह दोबारा नहीं चुनी जाएँगी। (ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों पर भरोसा नहीं होता, फिर भी इस ज्योतिषी के मुँह में घी-शक्कर डालने के लिए पैसे अलग रखे हैं मैंने।)

राहुल गाँधी के पास 1000 से ज्यादा दिन हैं- इस देश में अराजकता फैलाने के लिए, युवाओं को भड़काने के लिए, दलितों वगैरह को भड़काने के लिए और इन सबको सड़कों पर लाकर हालात बेकाबू करने की कोशिशें करने के लिए।

न तो कॉन्ग्रेस और न ही राहुल गाँधी के पास कोई तय दिशा, तय नक्शा या ठोस कार्यक्रम है, जिसके आधार पर वे यह दावा कर सकें कि देश बेहतर तरक्की कर सकता है। न ही उनके पास मोदी सरकार के खिलाफ एक भी सबूत है कि मौजूदा सरकार देश चलाने में सक्षम नहीं है।

राहुल नाम का नकली गाँधी अगले साढ़े तीन सालों में और जोर पकड़ने वाला है। कॉन्ग्रेस पार्टी प्लेट का बचा-खुचा खाना खाने की आदत वाले दरबारी मीडिया के जरिए वो ऐसी अफवाहें फैलाने जा रहे हैं कि अच्छे-अच्छे मोदी समर्थक भी डगमगा जाएँगे। राहुल गाँधी चाहते हैं कि मोदी सरकार उन्हें गिरफ्तार करे, वो चाहते हैं कि कोई विरोधी उन पर हमला करे। इसीलिए वो अभद्र बातें बोलते हैं। इसीलिए वो सरकार द्वारा दी गई जेड प्लस सुरक्षा को नजरअंदाज करते हुए घूमते रहते हैं।

मोदी सरकार यह सब समझती है। अगर मोरारजीभाई के शासनकाल में गृह मंत्री चरण सिंह की जिद पर इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी गिरफ्तार न हुए होते, तो इस प्रतिशोधी माँ-बेटे की जोड़ी को ‘शहीद’ का दर्जा न मिलता, जनता की सहानुभूति न मिलती। लेकिन कॉन्ग्रेस- एक विधवा की गिरफ्तारी, एक होनहार नौजवान की गिरफ्तारी पर प्रचार करके सत्ता में वापस आ गई।

मोदी अतीत को दोहराना नहीं चाहते। मोदी यह भी समझते हैं कि भगवान ना करे और अगर 2029 में भारतीय जनता पार्टी हार जाती है, तो कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दल सत्ता में आ जाएँगे और न सिर्फ भाजपा, बल्कि RSS भी आग में झोंक दिया जाएगा। वे मोदी समेत सभी हिंदुओं को जेल में डाल देंगे, चुनाव आयोग को अपने अधीन कर लेंगे और भारत के सभी राज्यों में गैर-भाजपा सरकारें बना लेंगे।

वे ऐसी स्थिति पैदा कर देंगे कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 को बहाल करना पड़ेगा। देश और दुनिया भर में मोदी समर्थक ऐसा माहौल फैलाएँगे कि मोदी-काल भ्रष्ट था, खोखला था, जनता की आँखों में धूल झोंककर अपनी कमजोरियों को छुपा रहा था। इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की तरह राहुल गाँधी भी न्यायपालिका की खुलेआम अनदेखी करेंगे और देश का खजाना अपने भ्रष्ट साथियों के लिए खोल देंगे।

2029 के चुनावों से पहले, राहुल गाँधी विपक्षी नेताओं के साथ मिलकर ऐसा निराशाजनक माहौल बनाएँगे कि यह देश नरक में चला गया है, मोदी सरकार विफल हो गई है, तीन कार्यकाल मिलने के बावजूद, मोदी ने देश को 50 साल पीछे धकेल दिया है, युवाओं की उम्मीदें टूट गई हैं, गरीब और भी गरीब हो गए हैं, मोदी ने हिंदू-मुस्लिमों को बाँटकर राज किया है, देश का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना तार-तार हो गया है, देश में लोकतंत्र की बहाली जरूरी है। और इन सभी आरोपों को साबित करने वाला ‘हाइड्रोजन बम’ राहुल गाँधी की जेब में होगा।

राहुल गाँधी देश की सभी संवैधानिक शक्तियों का अनादर करके- संसद, न्यायपालिका और सरकारी तंत्र चलाने वाले सभी लोगों को झूठा बताकर, भारत के नागरिकों में मोदी के प्रति अविश्वास पैदा करने की एक वैश्विक साजिश का अहम हिस्सा हैं। ये सभी नोटबंदी से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक, मोदी की तमाम उपलब्धियों पर संदेह जताकर देश की जनता को मूर्ख बनाने की बेकाबू कोशिश कर रहे हैं।

खतरनाक खेल एक जोखिम भरा, लापरवाह और लापरवाह काम है जिसके हमेशा नकारात्मक परिणाम होते हैं और इससे बहुत नुकसान हो सकता है- भयानक आपदाएँ, विपत्तियाँ और विपत्तियाँ। केवल वही व्यक्ति जिसका दिमाग खाली हो, जिसके मन में शैतान ने घर कर लिया हो, ऐसे खतरनाक खेल को खेलने में रुचि ले सकता है।

लास्ट बोल

‘मेरे दिल और आत्मा से आँसू बह निकले, ज़िंदगी एक प्यास बन कर रह गई’

(हसन कमाल की ये पंक्तियाँ राहुल गाँधी 2029 के नतीजों के बाद गाएँगे या आप- यह फैसला आपको ही करना है।)

पाकिस्तान खिलाड़ियों से टीम इंडिया ने नहीं मिलाया हाथ तो राजदीप सरदेसाई को लगा बुरा: खेल भावना की आड़ में चलाया पाक का प्रोपेगेंडा, कहा- ये प्रॉक्सी वॉर

इंडिया टुडे चैनल पर गुरुवार (18 सितंबर 2025) को चल रहे शो ‘Democratic Newsroom’ में ‘पत्रकार’ राजदीप सरदेसाई ने इस बात पर नाराजगी जताई है कि भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव ने पाकिस्तान के खिलाफ जीत को पहलगाम आतंकी हमले में जान गँवाने वाले लोगों और भारतीय सेना को समर्पित किया।

दरअसल रविवार (14 सितंबर 2025) को UAE में खेले गए एशिया कप के मुकाबले में भारत ने पाकिस्तान को 7 विकेट से हराया था। मैच के बाद भारतीय टीम ने पाकिस्तानी टीम से हाथ मिलाने से इनकार कर दिया और जीत को पहलगाम आतंकी हमले के पीड़ितों और भारतीय सेना को समर्पित किया।

राजदीप सरदेसाई ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि खेल और राजनीति को मिलाना गलत है और सूर्यकुमार यादव का बयान ICC के नियमों के खिलाफ है। उन्होंने इसकी तुलना मोईन अली और उस्मान ख्वाजा से की, जिन्होंने फिलिस्तीन के समर्थन में ब्लैक आर्मबैंड पहना था।

राजदीप ने कहा कि जब धोनी ने एक मैच में सेना के निशान वाला ग्लव्स पहना था, तब ICC ने कार्रवाई की थी, तो अब क्यों नहीं? इस पर पत्रकार विक्रांत गुप्ता ने राजदीप की बातों का खंडन किया और कहा, “हाथ मिलाना नियम नहीं, परंपरा है, जिसे निभाना जरूरी नहीं।”

विक्रांत ने राजदीप को समझाते हुए आगे कहा, “आप जानते हैं, क्रिकेट दो चीजों पर चलता है। एक तो खेल के नियम। दूसरा खेल भावना। ये एमसीसी की खेल शर्तें हैं। तो यही खेल भावना है। आप हाथ मिला सकते हैं। और नहीं भी मिला सकते हैं।” विक्रांत गुप्ता ने कहा कि सूर्यकुमार यादव ने सिर्फ इतना कहा कि ये जीत पहलगाम के शहीदों और सेना को समर्पित है। इसमें कोई राजनीति नहीं है।”

राजदीप सरदेसाई ने भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच को लेकर पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा खूब चलाया। सरदेसाई ने तो इसे बाकायदा ‘प्रॉक्सी वॉर’ तक बता दिया और आरोप लगाया कि कप्तान सूर्यकुमार यादव ने मैच जीतने के बाद पहलगाम आतंकी हमले के शहीदों को श्रद्धांजलि देकर सिर्फ घरेलू राजनीति के लिए सुर्खियाँ बटोरने की कोशिश की।

इसके बाद वरिष्ठ खेल पत्रकार विक्रांत गुप्ता ने राजदीप के इस बयान की कड़ी आलोचना की और कहा कि इसमें कुछ भी राजनीतिक नहीं था। विक्रांत ने कहा, “सूर्या ने कहा कि मैं ये जीत पहलगाम में शहीद हुए लोगों के परिवारों को समर्पित करता हूँ। पहलगाम भारत में है। भारत में आतंकी हमला हुआ था। एक भारतीय नागरिक के तौर पर वो ऐसा कह सकते हैं, इसमें गलत क्या है?”

विक्रांत गुप्ता ने ये भी याद दिलाते हुए कहा “जब 26/11 मुंबई आतंकी हमला हुआ था, उसके सिर्फ 15 दिन बाद चेन्नई टेस्ट मैच में जीत के बाद सचिन तेंदुलकर ने भी कहा था कि यह जीत हम 26/11 के पीड़ितों के परिवारों को समर्पित करते हैं। तब किसी ने इसे राजनीति नहीं कहा था।”

इस पूरे विवाद में राजदीप सरदेसाई ने सूर्यकुमार यादव के बयान को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की, जबकि विक्रांत गुप्ता और कई अन्य लोगों ने स्पष्ट किया कि ये बयान एक देशभक्त भारतीय खिलाड़ी की संवेदनशील प्रतिक्रिया थी, ना कि कोई राजनीतिक स्टंट।

‘हाइड्रोजन बम’ फोड़ने के लिए जिस बबीता को लेकर आए राहुल गाँधी, ऑपइंडिया की पड़ताल में उससे जुड़े दावे निकले झूठे: 2 जगह वोटर, काटने के लिए खुद दिया आवेदन

राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग के खिलाफ ‘हाइड्रोजन बम’ फोड़ने की बात कही थी। राहुल ने कर्नाटक के आलंद विधानसभा क्षेत्र में वोटर लिस्ट से लोगों नाम कटने के गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने एक महिला वोटर बबीता का नाम लिया और दावा किया कि उसका नाम गलत तरीके से हटा दिया गया। लेकिन चुनाव आयोग ने इन आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताते हुए खंडन किया है। ऑपइंडिया ने इस मामले की तहकीकात की, जिसमें राहुल गाँधी के दावों की हवा निकलती दिख रही है।

राहुल गाँधी ने बबीता का नाम वोटर लिस्ट से हटाने का दावा किया था लेकिन उस बबीता का नाम वोटर लिस्ट में अभी भी मौजूद है। आलंद विधानसभा सीट के सरसंबा बूथ पर बबीता चौधरी का नाम हमें वोटर लिस्ट में मिला।

BLO यानी बूथ लेवल ऑफिसर ने OpIndia को फोन पर बताया कि बबीता का नाम दो जगह दर्ज है – एक कर्नाटक के गुलबर्ग में और दूसरी आलंद में। गुलबर्ग वाले पते पर जाँच की गई तो पता चला कि बबीता ने खुद ही नाम कटवाने का फॉर्म भरा था।

चुनाव आयोग ने साफ कहा कि ऑनलाइन किसी का वोट हटाना नामुमकिन है। हर वोटर को नाम हटाने से पहले सुनवाई का मौका दिया जाता है। 2023 में आलंद में वोट कटाने की कुछ कोशिशें हुईं थीं, लेकिन वो असफल रहीं। आयोग ने खुद ही इस पर FIR दर्ज कराई और जाँच चल रही है।

आयोग ने करीब 5700 नंबर्स का डेटा कर्नाटक CID को दे दिया था। इनमें से 9 नंबर्स ट्रेस हो चुके हैं, जो महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश से जुड़े हैं।

राहुल गाँधी ने 2022 में 6000 वोट कटने का दावा किया, लेकिन हकीकत ये है कि 2018 में उसी सीट पर BJP सिर्फ 700 वोटों से जीती थी। 2023 में कॉन्ग्रेस 9000 वोटों से धमाकेदार जीत हासिल की। अगर राहुल का दावा सही होता तो कॉन्ग्रेस को 6700 वोटों से हारना पड़ता, लेकिन 30 साल बाद वो सीट जीत ली। ये आँकड़े ही राहुल के दावों की हवा निकाल देते हैं।

वोट लिस्ट से कैसे कटता है नाम?

फॉर्म 7 के माध्यम से किसी का नाम हटाने की अपील की जाती है। बाकायदा फॉर्म में जानकारी भरी होती है। उसकी जाँच आखिर में बीएलओ के पास जाती है। जिसमें बीएलओ इसकी जाँच करता है। इसके बाद एसडीओ के पास मामला जाएगा। इसकी सुनवाई होगी। दस्तावेज जमा किए जाएँगे, इसकी जाँच की जाएगी। व्यक्ति से कारण पूछा जाएगा, इसके बाद नाम काटा जाएगा।

राहुल गाँधी ने जो फॉर्म दिखाए, उसमें बीएलओ का हिस्सा ही नहीं है। बीएलओ की जाँच के बाद ही मामला एसडीओ के पास जाता है, ऐसे में राहुल गाँधी ने सिर्फ फॉर्म भरे हुए ही दिखाए, एक्शन क्या हुआ, ये बताया ही नहीं।

चूँकि चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि 2023 में आलंद में 6,018 फॉर्म-7 आवेदनों में से सिर्फ 24 वैध थे, बाकी 5,994 फर्जी थे। इनकी जाँच के बाद फरवरी 2023 में ही FIR दर्ज हुई और 6 सितंबर 2023 को कलबुर्गी पुलिस को ऑब्जेक्टर का नाम, मोबाइल नंबर, आईपी एड्रेस और फॉर्म डिटेल्स सौंप दी गईं।

इस मामले को वीडियो के इस जरिए समझ सकते हैं।

आयोग ने ये भी कहा कि चुनाव नतीजों पर आपत्ति हो तो 45 दिनों में हाईकोर्ट में याचिका डाल सकते हैं, लेकिन किसी विपक्षी नेता ने ऐसा नहीं किया। कॉन्ग्रेस ने ज्यादातर मामलों में औपचारिक शिकायत तक नहीं की। ये सब राजनीतिक रणनीति लगती है, जिसका मकसद लोगों को भड़काना और आयोग पर दबाव डालना है।

राहुल ऐसे लोगों को आगे ला रहे हैं जिनके नाम कटाने की कोशिश हुई, लेकिन नाम नहीं कटा। इससे साफ है कि ये अर्धसत्य हैं, पूरी सच्चाई नहीं। आयोग हर बार तथ्यों और रिकॉर्ड के साथ जवाब दे रहा है। 18 पत्र लिखे गए, 18 महीने बीत चुके, लेकिन कॉन्ग्रेस चुप। कुल मिलाकर राहुल का ‘हाइड्रोजन बॉम्ब’ दावा फुस्स साबित हो गया।

क्या राहुल गाँधी के हडसन सेमिनार के पीछे था कतर राजदूत का हाथ: जानें 2023 के दौरे पर 2 साल बाद क्यों उठे सवाल, हिंदू विरोधी सुनीता विश्वनाथ भी हुई थी शामिल

हाल ही में एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई है। यह बातचीत प्रोफेसर मुक्तेदार खान और डॉ कमर चीमा के बीच हुई थी। मुक्तेदार खान एक भारतीय-अमेरिकी प्रोफेसर हैं। वह इस्लाम और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर अपनी समझ के लिए जाने जाते हैं। वहीं, कमर चीमा पाकिस्तान के एक रणनीतिक विश्लेषक हैं। इस बातचीत में राहुल गाँधी की 2023 की अमेरिका यात्रा का जिक्र हुआ। इसमें कुछ ऐसी बातें सामने आईं जो अब तक कम ही लोगों को पता थीं। इस क्लिप ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और राजनयिक संबंधों पर नई बहस छेड़ दी है।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो बहुत वायरल हो रहा है। इसमें दो लोग आपस में बात कर रहे हैं। यह वीडियो भारतीय अधिकारियों के लिए चिंता का विषय है। इसमें प्रोफेसर मुक़्तदर खान ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। मुक़्तदर खान ने बताया कि राहुल गाँधी की 2023 की अमेरिका यात्रा के दौरान एक खास कार्यक्रम हुआ था। यह कार्यक्रम वाशिंगटन डीसी के हडसन इंस्टीट्यूट में हुआ। इसे कतर के राजदूत ने आयोजित किया था। उनका नाम शेख मेशाल बिन हमद अल-थानी है।

मुक़्तदर खान ने यह बात पाकिस्तानी कमेंटेटर कमर चीमा से कही। खान ने याद किया कि जब वे उस जगह पहुँचे तो गेट बंद मिले। इसकी वजह यह थी कि वहाँ राहुल गाँधी का एक सेमिनार चल रहा था। जब मुक़्तदर खान बाहर इंतजार कर रहे थे, तभी एक बड़ी गाड़ी आई। एक आदमी उसमें से उतरा। उसने भी अंदर जाने की कोशिश की। फिर दोनों को एक साथ अंदर जाने दिया गया।

अंदर जाकर उस आदमी ने खुद के बारे में बताया। वह अमेरिका में कतर का राजदूत था। उसका नाम शेख मेशाल बिन हमद अल-थानी था। उसने मुक़्तदर खान को एक हैरान करने वाली बात बताई। उसने कहा कि राहुल गाँधी का सेमिनार उसी ने आयोजित किया था।

जून 2023 में राहुल गाँधी 10 दिन के लिए अमेरिका गए थे। यह यात्रा प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा से ठीक पहले हुई थी। गाँधी की इस यात्रा ने कई लोगों को हैरान कर दिया था। अब इस घटना के बारे में जो बातें सामने आई हैं, वे बहुत चौंकाने वाली हैं।

राहुल गाँधी और भारत-विरोधी सुनीता विश्वनाथ की एकसाथ तस्वीर

राहुल गाँधी की हडसन इंस्टीट्यूट में सुनीता विश्वनाथ के साथ एक तस्वीर सामने आई है। इस तस्वीर को X (पहले ट्विटर) पर शेयर किया गया था। इस तस्वीर ने कई लोगों को चौंका दिया है। सुनीता विश्वनाथ ‘हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HFHR) की सह-संस्थापक हैं। यह संस्था भारत-विरोधी विचारों से जुड़ी है।

सुनीता विश्वनाथ का संगठन जॉर्ज सोरोस के ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ से पैसे लेता है। यह संगठन ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) जैसे समूहों से भी जुड़ा है। IAMC के संबंध जमात-ए-इस्लामी जैसे आतंकवादी संगठनों से बताए जाते हैं। इससे यह लगता है कि यह मंच भारत की राष्ट्रवादी सोच के खिलाफ है।

सुनीता विश्वनाथ पर लगे हिंदूफोबिया के आरोप

राहुल गाँधी का सुनीता विश्वनाथ के साथ होना एक संयोग नहीं था। सुनीता हिंदू विरोधी विचारों के लिए जानी जाती हैं। वह मुस्लिम समर्थक भी मानी जाती हैं। पिछले साल, उन्होंने जन्माष्टमी पर एक लेख लिखा था। इसमें उन्होंने गाजा में फिलिस्तीनियों के दुख की तुलना महाभारत से की थी। सुनीता विश्वनाथ ने इजराइल को कंस कहा था और हमास के प्रति सहानुभूति दिखाने की कोशिश की। हमास एक आतंकवादी संगठन है। इस तरह सुनीता विश्वनाथ ने हिंदू धर्म का अपमान किया। उन्होंने अपनी बात सही साबित करने के लिए हिंदू धर्म ग्रंथों का गलत इस्तेमाल किया।

सुनीता का संगठन ‘हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) है। यह संगठन बार-बार हिंदुओं की छवि खराब करता है। फरवरी 2024 में, इस संगठन ने एक कार्यक्रम किया। इसका नाम ‘जायोनिज्म एंड हिंदू सुप्रीमेसी: पार्टनर्स अगेंस्ट प्लुरलिज्म’ था। इस कार्यक्रम में सुनीता ने हिंदू पहचान को ‘वर्चस्व’ कहा। सुनीता ने हिंदू धर्म को जायोनिज्म से जोड़ा। इस कार्यक्रम में ‘यहूदी वॉयस फॉर पीस’ के लोग भी थे। यह संगठन इजरायल के खिलाफ है।

यह सिर्फ एक घटना नहीं है। HfHR ने पहले भी कई ऐसे काम किए हैं। सुनीता ने ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ नाम के कार्यक्रम का समर्थन किया। सुनीता ने CAA और NRC के बारे में गलत जानकारी फैलाकर 2020 के दिल्ली दंगे भड़काए थे। सुनीता ने प्रधानमंत्री मोदी की 2023 की अमेरिका यात्रा के दौरान एक ‘टूलकिट’ भी जारी की थी। इसका मकसद भारत को बदनाम करना था।

एक संगठन जिसका नाम डिसइन्फोलैब है। यह संगठन ऑनलाइन जानकारी पर रिसर्च करता है। डिसइन्फोलैब के मुताबिक, ‘हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) नाम का एक संगठन है। इसे 2019 में IAMC और OFMI नाम के समूहों ने बनाया था। ये समूह जमात-ए-इस्लामी नाम के आतंकवादी संगठन से जुड़े हैं। सुनीता विश्वनाथ ने एक और संगठन बनाया था। इसका नाम ‘वुमन फॉर अफगान वुमेन’ है। इसे जॉर्ज सोरोस के ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ से पैसा मिलता है। भारत में, HfHR के X अकाउंट को बंद कर दिया गया है। उस पर हिंदू-विरोधी बातें फैलाने का आरोप था।

साफ शब्दों में कहें तो सुनीता विश्वनाथ ने ना सिर्फ हिंदुओं पर हमले किए, बल्कि भारत को बदनाम किया और इस्लामी समूहों, जॉर्ज सोरोस के साथ मिलकर काम किया। हडसन इंस्टीट्यूट में राहुल गाँधी का उनके साथ बैठना एक संयोग नहीं था। यह मिलीभगत थी।

क्या राहुल गाँधी के पीछे कतर और भारत-विरोधी लॉबी का हाथ है?

इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) ने भारत के खिलाफ बहुत प्रचार किया है। उन्होंने अमेरिका में भारत के खिलाफ बातें फैलाईं। उन्होंने कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है। ये बातें नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) पर राहुल गाँधी के बयानों से मिलती हैं।

इस मामले में कतर के राजदूत की भागीदारी हैरान करने वाली है। कतर एक छोटा खाड़ी देश है, लेकिन इसका प्रभाव बहुत ज्यादा है। कतर पर दुनियाभर में इस्लामी समूहों को पैसा देने का आरोप है। हमास का राजनीतिक कार्यालय भी यहीं है। हमास को कई देश आतंकवादी समूह मानते हैं।

राजदूत अल-थानी एक अनुभवी राजनयिक हैं। उन्होंने 2016 में वाशिंगटन में काम शुरू किया था। उस समय सऊदी अरब ने कतर का बहिष्कार किया था। इसका कारण चरमपंथ को कतर का कथित समर्थन था। फिर भी, उन्होंने भारत के एक विपक्षी नेता के लिए कार्यक्रम आयोजित किया। यह समझ से परे है कि ऐसा क्यों हुआ। पर्दे के पीछे क्या चल रहा था, यह एक बड़ा सवाल है।

राहुल गाँधी की 2023 अमेरिका यात्रा: विवादों और एजेंडे की गहरी साजिश

राहुल गाँधी की 2023 की अमेरिका यात्रा पर कई सवाल उठे थे। अब ये बातें उन सवालों को और गहरा कर रही हैं। यह यात्रा प्रवासी भारतीयों और थिंक टैंकों के बीच भाषण देने के रूप में थी, लेकिन इसके दौरान कुछ ऐसे मुद्दे उठे जिनसे विवाद की खुशबू आने लगी। राहुल गाँधी ने कई जगहों पर भाषण दिए, जिनमें नेशनल प्रेस क्लब और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी भी शामिल हैं।

राहुल गाँधी के भाषणों में वही पुराने शब्द दोहराए गए थे, जैसे हिंदुत्व को शैतान कहना, जिन्ना की मुस्लिम लीग को ‘धर्मनिरपेक्ष’ बताकर उसे सही ठहराना और भाजपा को सांप्रदायिक बता कर कॉन्ग्रेस को शांति का प्रतीक बताना। ये बस गलती नहीं थीं, बल्कि राहुल गाँधी के मेजबानों के एजेंडे से मेल खा रही थीं। हडसन इंस्टीट्यूट में सुनीता विश्वनाथ के साथ राहुल गाँधी ने वही बातें दोहराईं, जिन्हें HfHR और IAMC कई सालों से फैला रहे थे। राहुल गाँधी ने हिंदुत्व को बदनाम किया, CAA और NRC को लेकर डर फैलाया और अडानी समूह के खिलाफ सोरोस द्वारा वित्त पोषित अभियानों से जुड़ गए।

व्हाइट हाउस की गुप्त यात्रा

द इकोनॉमिक टाइम्स में सीमा सिरोही ने एक लेख लिखा था। इस लेख से एक और राज सामने आया। इसमें बताया गया कि राहुल गाँधी ने व्हाइट हाउस की एक गुप्त यात्रा की थी। इस यात्रा के बारे में भारत के विदेश मंत्रालय और सरकारी नियमों को जानकारी नहीं दी गई थी। यह घटना चिंताजनक है क्योंकि किसी विपक्षी नेता का बिना किसी प्रचार के बाइडन प्रशासन के पास जाना सवाल खड़े करता है। इससे कई सवाल उठते हैं कि राहुल गाँधी ने वहाँ किससे मुलाकात की और क्या कोई वादा या एजेंडा तय किया गया था?

कई लोगों ने इस यात्रा पर सवाल उठाए। ‘हिंदू एक्शन’ जैसे लोगों का कहना है कि इस यात्रा में खालिस्तानी और पाकिस्तानी एजेंट भी शामिल थे। पत्रकार सुनंदा वशिष्ठ ने भी इस पर नाराजगी जताई है। सुनंदा वशिष्ठ ने कहा कि व्हाइट हाउस में राहुल गाँधी किनसे मिले, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई। कुछ अप्रवासी भारतीयों ने यह भी कहा कि यह सब 2024 के भारतीय चुनावों में दखल देने की कोशिश हो सकती है।

घरेलू राजनीति के लिए विदेशी दखलंदाजी: राहुल गाँधी का पुराना रिकॉर्ड

राहुल गाँधी का पुराना इतिहास भी इस मामले को और गंभीर बनाता है। पश्चिमी देशों से मदद माँगने की उनकी आदत नई नहीं है। 2023 में कैम्ब्रिज में दिए एक भाषण में, राहुल गाँधी ने यूरोप और अमेरिका से भारत में ‘लोकतंत्र बहाल’ करने की अपील में गलत जानकारी फैलाई थी। राहुल गाँधी ने भारत की मजबूत चुनाव प्रणाली को नजरअंदाज कर दिया था। 2021 में, राहुल गाँधी ने हार्वर्ड में अमेरिकी राजदूत निकोलस बर्न्स से भारत के ‘आंतरिक मामलों’ पर टिप्पणी करने को कहा था। यह सुनकर खुद राजदूत भी हैरान रह गए थे।

यह कोई अकेली घटना नहीं है। 2018 में कैलाश मानसरोवर की यात्रा के बाद राहुल गाँधी ने चीन के मंत्रियों से मुलाकात की थी। यह डोकलाम विवाद के बाद हुआ था। राहुल गाँधी ने चीनी राजदूतों से भी बात की थी। ये सब दिखाता है कि वह घरेलू राजनीति के फायदे के लिए विदेशी ताकतों की मदद लेने को तैयार रहते हैं।

कतर-सोरोस-कॉन्ग्रेस का गठजोड़: क्या यह भारत के खिलाफ एक साजिश है?

कतर एक महत्वपूर्ण अमेरिकी सहयोगी है। वहाँ अल उदीद एयर बेस है। कतर ने अफगानिस्तान में शांति वार्ता में मदद की थी। यह देश अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ का उपयोग करता है। यह ऊर्जा और अल जजीरा जैसे मीडिया के जरिए ऐसा करता है। लेकिन कतर पर इस्लामी समूहों को पैसा देने का भी आरोप है। इनमें मुस्लिम ब्रदरहुड और हमास शामिल हैं। इसलिए, वह भारत के खाड़ी देशों के साथ संबंधों के लिए एक चुनौती है।

सवाल यह है कि कतर का राजदूत राहुल गाँधी के कार्यक्रम को क्यों बढ़ावा देगा? खासकर तब जब यह कार्यक्रम जॉर्ज सोरोस और IAMC से जुड़े समूहों के साथ हो। न्यू यॉर्क में एक और कार्यक्रम हुआ। उसके लिए कट्टरपंथी मस्जिदों और ICNA से जुड़े संगठनों ने पंजीकरण किया था। इन संगठनों का आतंकवाद से जुड़ा इतिहास रहा है। यह सब एक खास विचारधारा की ओर इशारा करता है।

यह एक समन्वित प्रयास जैसा लगता है, जहाँ कतर कूटनीतिक लाभ दे रहा है, सोरोस वित्तीय मदद कर रहा है और अमेरिकी लॉबिंग इसे बढ़ावा दे रही है। बंद दरवाजों के पीछे, चर्चाएँ मोदी की विदेश नीति को कमजोर करने पर हो सकती हैं, जैसे कश्मीर या CAA पर। राहुल गाँधी का इन सब से जुड़ना कॉन्ग्रेस के व्यापक संबंधों को दिखाता है। जॉर्ज सोरोस के संगठन से जुड़े सलिल शेट्टी भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुए थे। कॉन्ग्रेस ने CAA विरोधी प्रदर्शनों का भी समर्थन किया था, जो बाद में हिंसा में बदल गए थे।

राहुल गाँधी की कूटनीति अमेरिका यात्रा

जिस तरह भारत एक मजबूत देश बन रहा है, ऐसे विदेशी संबंध संदिग्ध हैं। ये हमारी संप्रभुता के लिए खतरा हो सकते हैं। X पर वायरल हो रही खान और चीमा की बातचीत इस बात को फिर से उठाती है। इससे पता चलता है कि राहुल गाँधी की अमेरिका यात्रा कोई साधारण यात्रा नहीं थी। यह कई ताकतों का एक साथ आना था, जिसमें कतर के राजदूत भी शामिल थे।

जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक सवाल उठते रहेंगे। क्या यह सिर्फ कूटनीति थी या इसके पीछे कुछ और गहरी साजिश थी?

स्वामीनारायण संस्था पर खत्म हुई US की जाँच, सारे आरोप फर्जी निकले: BAPS ने कहा- हिंदू समुदाय को निशाना बनाकर किया गया बदनाम

अमेरिका के न्याय विभाग (DOJ) ने BAPS संस्था और उसके सहयोगी संगठनों के खिलाफ चल रही जाँच को आधिकारिक रूप से बंद कर दिया है। यह जानकारी स्वयं न्यूयॉर्क में स्थित BAPS स्वामीनारायण संस्था ने दी। संस्था ने बताया कि जाँच में BAPS या किसी भी संबंधित व्यक्ति पर कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ है। यह जाँच मई 2021 में न्यू जर्सी के रॉबिंसविल स्थित BAPS मंदिर में हुई छापेमारी के बाद शुरू हुई थी।

BAPS स्वामीनारायण संस्था पर लगाए गए थे कई आरोप

संस्था ने बताया, “संयुक्त राज्य अमेरिका के न्याय विभाग (Department of Justice) और न्यू जर्सी के यूनाइटेड स्टेट्स अटॉर्नी ऑफिस द्वारा BAPS और BAPS स्वामीनारायण अक्षरधाम के निर्माण को लेकर चल रही जाँच को बंद करने के फैसले का हम स्वागत करते हैं।”

संस्था ने आगे कहा, “यह फैसला हमारी बात को और भी मजबूती देता है जो हम शुरू से कहते आ रहे हैं कि BAPS स्वामीनारायण अक्षरधाम, जो शांति, सेवा और भक्ति का स्थान है, हजारों श्रद्धालुओं की निष्ठा, प्रेम और स्वेच्छा से की गई सेवा से बना है।”

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2021 में कुछ लोगों ने BAPS पर मुकदमा दायर किया था, जिसमें मानव तस्करी (Trafficking Victims Protection Act – TVPA), श्रम कानून (Fair Labor Standards Act – FLSA) और अन्य संबंधित आरोप लगाए गए थे। इसके चलते कोर्ट ने इस सिविल मुकदमे पर रोक (stay) लगा दी थी, क्योंकि DOJ की आपराधिक जाँच चल रही थी।

अब गुरुवार (18 सितम्बर 2025) को न्यू जर्सी की एक संघीय कोर्ट में दायर एक पत्र में, BAPS के वकीलों ने बताया कि 15 और 16 सितम्बर 2025 को DOJ ने आधिकारिक रूप से उन्हें सूचित किया कि जाँच समाप्त कर दी गई है और संस्था या उससे जुड़े लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।

संस्था ने फैसले को को कहा हिंदू समुदाय की जीत

BAPS के एक प्रवक्ता ने कहा, “यह पिछले चार वर्षों की अनिश्चितता का अंत है। हमने हमेशा कहा था कि हमारे ऊपर लगाए गए आरोप झूठे और बेबुनियाद थे। आज का निर्णय हमारे उस विश्वास को सही ठहराता है। हम अमेरिका और दुनिया भर में अपनी आध्यात्मिक और सेवा गतिविधियों को जारी रखेंगे।”

जाँच खत्म होने के साथ ही अब सिविल मुकदमे पर लगी कोर्ट की रोक भी हट गई है। BAPS के वकील अब वादियों के वकीलों और कोर्ट के साथ मिलकर अगले कदमों पर काम करेंगे।

CasteFiles के एक प्रवक्ता ने कहा, “यह मामला ‘झूठे जातिगत सिद्धांतों’ पर आधारित था और इसका मकसद सिर्फ BAPS ही नहीं, बल्कि पूरे हिंदू समुदाय को निशाना बनाना था। उन्होंने कहा, “इस केस का समाप्त होना हमारे समुदाय के लिए एक बड़ी जीत है, जिसने अमेरिका में जातिगत भेदभाव के झूठे आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।”

BAPS एक वैश्विक हिंदू संस्था है जो आध्यात्मिक विकास, सेवा और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए समर्पित है। अमेरिका भर में इसके अनेक मंदिर और केंद्र हैं, जहाँ यह आपदा राहत, स्वास्थ्य जागरूकता, और शिक्षा जैसी कई सामाजिक सेवाएँ प्रदान करती है।

‘PM मोदी मेरे बहुत करीब, रूसी तेल के कारण लगाना पड़ा भारत पर टैरिफ’ : राष्ट्रपति ट्रंप ने मीडिया में दोहराई फिर वही बात, टैरिफ विवाद के कारण रुकी है ट्रेड डील

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्होंने रूस से तेल खरीदने की वजह से भारत पर ‘प्रतिबंध’ लगाए हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वह भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत करीबी हैं। बता दें कि ट्रंप आए दिन अपने और पीएम मोदी की दोस्ती को लेकर बयान देते दिखाई दे रहे हैं। इसी बीच उनका यह नया बयान सामने आया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए उन देशों पर कार्रवाई की जाएगी जो अब भी रूसी तेल खरीद रहे हैं तो ट्रंप ने जवाब में कहा कि अगर तेल की कीमतें कम हो जाएँ तो रूस युद्ध बंद कर देगा।

ट्रंप ने कहा, “जब मुझे पता चला कि यूरोपीय देश अब भी रूस से तेल खरीद रहे हैं… और जैसा कि आप जानते हैं, मैं भारत के बहुत करीब हूँ, पीएम मोदी के भी करीब हूँ। मैंने उन्हें फोन कर जन्मदिन की शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने बहुत सुंदर जवाब दिया… लेकिन मैंने उन पर प्रतिबंध लगाए।”

ट्रंप ने आगे कहा, “रूस से तेल खरीदने के कारण मुझे यूरोपीय देशों और चीन पर भी बैन लगाना पड़ा। चीन इस समय अमेरिका पर बहुत बड़ा टैरिफ लगा रहा है। मैं और भी चीजें करने को तैयार हूँ, लेकिन तब नहीं जब मैं जिन लोगों के लिए लड़ रहा हूँ, वे रूस से तेल खरीद रहे हों।”

ट्रंप का कहना है कि अगर तेल की कीमतें नीचे जाएँगी तो रूस समझौता करने पर मजबूर होगा। गौरतलब है कि जुलाई में ट्रंप प्रशासन ने रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 50% ‘पेनल्टी’ टैरिफ लगाने की बात कही थी, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव देखा गया था।

हालाँकि हाल ही में भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत हुई और दोनों पक्षों ने इसे सकारात्मक बताया है। भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने भी कहा कि दोनों देश जल्द से जल्द समझौता करने की कोशिश कर रहे हैं।

इससे पहले ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा बताया था कि उन्होंने पीएम मोदी को फोन कर जन्मदिन की शुभकामनाएँ दीं और रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने में भारत के समर्थन के लिए धन्यवाद दिया।

उन्होंने लिखा, “मैंने अपने दोस्त पीएम मोदी को जन्मदिन की शुभकामनाएँ दीं। वह बेहतरीन काम कर रहे हैं। नरेंद्र, युद्ध को समाप्त करने के आपके समर्थन के लिए धन्यवाद!”

इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवाब देते हुए लिखा, “धन्यवाद मेरे मित्र राष्ट्रपति ट्रंप, आपके फोन कॉल और शुभकामनाओं के लिए। मैं भी भारत-अमेरिका साझेदारी को नई ऊँचाइयों तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। हम रूस-यूक्रेन युद्ध के शांतिपूर्ण समाधान के आपके प्रयासों का समर्थन करते हैं।”