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‘मृतकों को जिंदा करने’ का दावा करने वाला स्टीवन सोशल मीडिया से भी चला रहा था धर्मांतरण का रैकेट, गुजरात के कई शहरों में सेमिनार में कहा- मूर्ति पूजा केवल ‘पत्थरों की पूजा’

गुजरात के नाडियाड शहर में बड़े धर्मांतरण रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है। रैकेट के मास्टरमाइंड स्टीवन मैकवान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। फिलहाल स्टीवन न्यायिक हिरासत में है। उधर खेड़ा पुलिस धर्मांतरण रैकेट की गहराई से जाँच में जुटी हुई है।

पुलिस की जाँच में सामने आया कि मैकवान ‘रेस्टोरेशन रिवाइवल’ नाम का एक ट्रस्ट चला रहा था और इसके जरिए वह दूसरे राज्यों से लोगों को लाकर उनका ब्रेनवॉश करके धर्मांतरण करवा रहा था। पुलिस ने बताया कि ये गैरकानूनी है क्योंकि इसके लिए कोई कागजी कार्रवाई नहीं की जाती थी। इस धर्मांतरण रैकेट का केंद्र नाडियाड में बनाया गया था। लेकिन पुलिस को शक है कि इसके तार बाकी राज्यों से भी जुड़े हो सकते हैं।

पुलिस की जाँच में यह भी सामने आया कि स्टीवन को धर्मांतरण के लिए विदेश से फंडिंग की जा रही थी। पुलिस विदेश से जुड़े ₹1.33 करोड़ के लेन-देन की जाँच भी कर रही है। शुरुआती जाँच के मुताबिक, मैकवान इसी पैसे से यह रैकेट चलाता था।

पुलिस ने धर्मांतरण के मास्टरमाइंड मैकवान को पाँच दिन की रिमांड पर लेकर पूछताछ की, जिसके बाद दोबारा कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट ने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।

मास्टरमाइंड स्टीवन मैकवान सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय था। मैकवान ने अपने ट्रस्ट के नाम से एक फेसबुक पेज भी बनाया था और यूट्यूब चैनल भी चलाता था। दोनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म साल 2020 के आसपास शुरू किए गए थे, जिनमें लगभग तीन महीने पहले आखिरी पोस्ट डाली गई थी।

सोशल मीडिया पर चमत्कार से बीमारी ठीक करने की वीडियो

स्टीवन मैकवान के यूट्यूब चैनल पर ऐसे कई वीडियो हैं, जिनमे वह ईश्वर के चमत्कारों के जरिए किसी की बीमारी ठीक करने या किसी को दूसरी समस्याओं से बाहर निकालने का दावा करता है।

इतना ही नहीं, स्टीवन ने ईश्वर के कथित चमत्कारों के जरिए मरे हुए लोगों को जिंदा करने का भी दावा किया है और इसके वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किए हैं। बाद में इन वीडियो का इस्तेमाल लोगों का ब्रेनवॉश करने और उनका धर्मांतरण करने के लिए किया गया।

स्टीवम माइकैवन ने यूट्यूब पर डाले वीडियो का स्क्रीनशॉट

यूट्यूब पर अपलोड किए गए वीडियो में किसी को कोरोना से ठीक करने, किसी को कैंसर से ठीक करने और यहाँ तक कि किसी को ‘मृत्यु जैसी स्थिति’ से भी ठीक करने का दावा करते हैं।

इन सभी वीडियो में स्टीवन या उसका कोई साथी दिखाई देता है। सभी वीडियो की स्क्रिप्ट भी एक जैसी है, जिसमें बीमारी और समस्या से मुक्ति दिलाने के लिए ईसा मसीह का आभार व्यक्ति किया जा रहा है।

ऐसे ही मैकवान्स ट्रस्ट नाम से फेसबुक पेज पर 24 अग्सत 2018 को एक पोस्ट डाली गई, जिसमें दावा किया गया कि एक हिंदू परिवार की बेटी की बीमारी यीशु की प्रार्थना से ठीक हो गई।

स्टीवन मैकवान ने फेसबुक पर की पोस्ट का स्क्रीनशॉट (गोपनीयता बनाए रखने के लिए कुछ विवरण हटाए गए हैं)

पोस्ट में लड़की का नाम और उम्र बताते हुए कहा गया है कि वह एक हिंदू परिवार से है और जन्म से ही बोल-सुन नहीं सकती। उसके पिता ने कई जगह इलाज कराया लेकिन अस्पताल ने कहा कि उसका ऑपरेशन करवाना होगा, जिसमें लाखों खर्च होंगे।

पोस्ट में आगे दावा किया गया है कि लड़की के पिता ने उसे रिस्टोरेशन मूवमेंट में शामिल करना शुरू किया और जब ईसा मसीह की प्रार्थना शुरू की तो लड़की बिना किसी ऑपरेशन के बोलने और सुनने लग गई।

सेमिनार में लोगों का करता था ब्रेनवॉश

इसके अलावा मैकवान के यूट्यूब चैनल पर उसके सेमिनारों में भाषण की कई वीडियो भी अपलोड की गई हैं। वह अक्सर लोगों के सामने ईसाई का इतिहास बताते हुए भाषण देता था। लोगों को ईसाई धर्म से जुड़ी एक किताब से समझाता और फिर वही किताब लोगों को पढ़ने के लिए दे देता था।

इन भाषणों में मैकवान ने यीशु में विश्वास, आत्मा की कथित शुद्धि और कई अन्य बातों पर बात की है। उनका कहना है कि सभी समस्याओं का समाधान यही है कि लोग यीशु में विश्वास करें, ईश्वर पर भरोसा करें। अगर ईश्वर या यीशु उनके साथ है तो जीवन में कभी कोई समस्या नहीं आएगी। शैतान उनके पीछे नहीं आएगा।

वह अपने कुछ वीडियो में बच्चों का इस्तेमाल भी करते नजर आता है। इसके अलावा उसके कई सेमिनारों में भी बच्चे और युवा हिस्सा लेते नजर आए हैं।

कई वीडियो ऐसे भी हैं, जिनमें मैकवान ने बाहर से कुछ पादरियों को बुलाकर भाषण दिलवाए थे। इन पादरियों के भाषणों में वही सब बातें कही गईं, जो मैकवान अपने सेमिनारों में कहा करता थे। कुछ घटनाओं का जिक्र करके ईसाई धर्मग्रंथों में लिखी बातों का हवाला देकर वह लोगों को यह यकीन दिलाता था कि अगर वे ईसा मसीह पर विश्वास करने लगें तो उनके जीवन की परेशानियाँ अपने आप कम हो जाएँगी।

उसके ट्रस्ट के यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज पर कई पोस्ट औऱ वीडियो देखे गए हैं, जिनमें ऐसे दावे किए गए हैं।

मूर्ति पूजा के बारे में प्रचार

स्टीवन मैकवान अपने एक भाषण में मूर्ति पूजा के बारे में भी बात करता सुना गया है। अपने भाषण में वह मूर्ति पूजा को पूरी तरह से नकारता है और इसे अनावश्यक बताता हैं। वह ‘पत्थर’ शब्द का इस्तेमाल कर कहता है कि मूर्ति पूजा सिर्फ पत्थरों की पूजा करना है।

वह कहता है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को ईसा मसीह से ज्यादा महत्वपूर्ण समझता है या अपने बच्चों या माता-पिता को ज्यादा महत्वपूर्ण समझता है तो यह भी अनुचित है। वह कहता है कि ईसा मसीह सबसे पहले है फिर बाकी सब।

यहाँ साफतौर से मूर्ति पूजा का संबंध हिंदू देवी-देवताओं से है। मैकवान ने सेमिनार में आए हिंदुओं को ब्रेनवॉश करने के लिए मूर्ति पूजा पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ भी की। यह बात वीडियो में 27 मिनटट के बाद सुनी जा सकती है।

बाकी शहरों में भी धर्मांतरण की गतिविधियाँ सक्रिय

स्टीवन मैकवान ने नाडियाड के अलावा अहमदाबाद और बाकी शहरों में भी धर्मांतरण गतिविधियाँ फैलाई थीं। कई कार्यक्रमों में वह बीमारों और जरूरतमंदों को बुलाकर उन्हें पवित्र आत्मा की उपस्थिति का एहसास दिलाने के नाम पर भाषण देता था। इसके बाद वह लोगों पर हाथ रखने और प्रार्थना करने की भी बात करता था।

मैकवान ने वडोदरा में भी ऐसे कई कार्यक्रम आयोजित किए थे, जिनकी जानकारी उसके सोशल मीडिया पर उपलब्ध है।

ट्रस्ट के पेज पर कई तस्वीरें हैं, जिनमें लोगों को अनाज और राशन से मदद करते हुए और भूखों को भोजन देने के लिए अभियान चलाते हुए दिखाया गया है। हालाँकि, सामाजिक ट्रस्टों द्ववारा ऐसे काम करना कोई आश्चर्य की बात नहीं है लेकिन मैकवान का काम लोगों का धर्मांतरण कराना था।

कई जगहों और मामलों में गरीबों को मदद का लालच देकर और उन्हें बरगलाकर धर्मांतरण करने की खबरें आई हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि ऐसी पोस्टों को भी संदेह की नजर से देखा जाए।

स्टीवन मैकवान फिलहाल न्यायिक हिरासत में है। पुलिस ने उसके मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों से बड़ी संख्या में वीडियो, फोटो और अन्य सामग्री बरामद की है, जिनकी फोरेंसिक जाँच की जा रही है। आगे की जाँच के दौरान और भी खुलाने होने की संभावना है।

(मूलरूप से ये खबर गुजराती भाषा में मेघल सिंह परमान ने लिखी है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

अमेरिका ने अफगानिस्तान को बगराम एयरबेस के लिए धमकाया तो अटकी पाकिस्तान की साँसें, ट्रंप की दोस्ती और देश की दुर्दशा के बीच फँसा ‘आतंकिस्तान’

जब से डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरी बार राष्ट्रपति का पद संभाला है वो बैचेन हैं। कभी टैरिफ को लेकर हाथ-पैर मार रहे हैं तो कभी पनामा नहर और ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात करते हैं। अब ट्रंप ने एक नई जिद पकड़ ली है। वो अफगानिस्तान का बगराम एयरबेस वापस लेना चाहते हैं।

इसके लिए वो धमकी तक पर उतर आए हैं। ट्रंप का कहना है कि अगर उन्हें यह एयरबेस वापस नहीं मिला तो इसका अंजाम बुरा होगा। ट्रंप ने इसके लिए सैन्य कार्रवाई के विकल्प को भी नहीं नकारा है।

ट्रंप ने बगराम पर फिर से नियंत्रण पाने की इच्छा के पीछे चीन को एक प्रमुख कारण बताया है। बगराम चीनी सीमा से लगभग 800 किमी दूर है और शिनजियांग में निकटतम चीनी मिसाइल कारखाने से लगभग 2,400 किमी दूर है। ट्रंप ने पिछले महीने कहा था कि यह अड्डा ‘उस जगह से एक घंटे की दूरी पर है जहाँ (चीन) अपने परमाणु हथियार बनाता है’।

यह एयरबेस कभी अमेरिका के लिए मध्य पूर्व में सैन्य प्रभुत्व का प्रतीक था जो अब तालिबान शासन के अधीन है। ट्रंप के इस बयान पर तालिबान ने भी उन्हें आड़े हाथों लिया है। तालिबान का कहना है कि वह इसे वापस नहीं लौटाएगा चाहे इसके लिए युद्ध ही क्यों ना लड़ना पड़े।

भारत भी इस मुद्दे पर तालिबान के साथ खड़ा नजर आ रहा है। मॉस्को में आयोजित ‘सातवें मॉस्को फॉर्मेट’ सम्मेलन में भारत ने तालिबानी विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी का औपचारिक स्वागत कर यह स्पष्ट कर दिया कि वह अमेरिका के इस रुख से सहमत नहीं है। हालाँकि, भारत ने सीधे तौर पर बगराम का नाम नहीं लिया है लेकिन उसका इशारा साफ है।

सिर्फ भारत ही नहीं ट्रंप की इस धमकी के बाद रूस से लेकर चीन और ईरान तक सबके कान खड़े हो गए हैं। ट्रंप का दोस्त पाकिस्तान भी उसकी इस चाल से भीतर ही भीतर घबराया हुआ है।

बगराम एयरबेस का इतिहास और अमेरिका की फिर कब्जे की कोशिश

अफगानिस्तान के राजा जहीर शाह के दौर में 1950 के दशक में इस एयरबेस का निर्माण हुआ था। इसका शुरुआती डिजाइन सोवियत इंजीनियरों ने बनाया था। 1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर आक्रमण के बाद यह उनका मुख्य सैन्य ठिकाना रहा था। 1989 में सोवियत सेना की वापसी के बाद यह खंडहर बन गया।

2001 में अमेरिका पर हमले के बाद जब उसने बदले की कार्रवाई शुरू की तो अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ सबसे बड़ा अमेरिकी ऑपरेशन यहीं से चला। इस एयरबेस को अमेरिका ने दुनिया का सबसे आधुनिक सैन्य ठिकाना बना दिया। यहाँ 10,000 से अधिक अमेरिकी सैनिक और भारी मात्रा में सैन्य साजो-सामान तैनात थे।

तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद अमेरिका भी यहाँ से निकल गया था। अब अफगानिस्तान में एक बार फिर आतंकियों की सक्रियता बढ़ने लगी है। अफगानिस्तान का सेंटर प्वाइंट कहा जाने वाले इस एयरबेस से अमेरिका आसानी से ईरान, पाकिस्तान, चीन, रूस के मध्य एशियाई इलाकों तक नजर रख सकता है।

ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान तक इसके दायरे में आते हैं। यही वजह है की अमेरिका इसे वापस लेना चाहता है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावे किए गए हैं कि अमेरिका ने इसे वापस किराए पर लेने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। वो किसी तीसरे देश के जरिए भी यहाँ की लॉजिस्टिक एक्सेस हासिल करने की कोशिश में है।

अमेरिका के आने से घबराहट में पाकिस्तान

बीते कुछ समय में अमेरिका और पाकिस्तान की दोस्ती गहरी हुई है। पाकिस्तान की फौज का मुखिया आसिम मुनीर से ट्रंप ने मुलाकात की है। ब्लूचिस्तान के रेयर अर्थ मिनरल देने के नाम पर पाकिस्तान अमेरिका को अपना मुल्क गिरवी रखने पर तुला है। अब अफगानिस्तान में अमेरिका की आने की खबर सुनकर उसके भी हाथ-पाँव फूलने लगे हैं। ‘मॉस्को फॉर्मेट कंसल्टेशंस’ की जिस बैठक में ट्रंप की योजना का विरोध किया गया है पाकिस्तान भी उसका हिस्सा था।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मौजूद आतंकवादी संगठन तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान (TTP) इन दिनों पाकिस्तान फौज के पीछे पड़ा है। बीते दिन (7 अक्टूबर 2025) भी TTP के 7 फौजी मार गिराए हैं। दरअसल, पाकिस्तान की अफगानिस्तान से सीमा को लेकर लंबी लड़ाई है। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद से दोनों देशों के बीच तनातनी है और दर्जनों हमले किए जा चुके हैं। दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की आड़ में एक अघोषित युद्ध लड़ रहे हैं।

इसके अलावा अमेरिका की अफगानिस्तान में वापसी के बाद पाकिस्तान पर इसका सीधा असर होने की संभावना है। दोनों के बीच करीब 2,600 किलोमीटर तक फैली हुई सीमा है और किसी भी सैन्य अभियान से सीमा पर दबाव तुरंत बढ़ जाएगा।

सीमावर्ती इलाकों में पहले भी बड़े युद्धों के दौरान लोग भागकर पाकिस्तान में आए थे या वहाँ हिंसा फैल गई थी। अगर फिर से अमेरिकी अपना अभियान शुरू करता है तो बड़े पैमाने पर विस्थापन, शरणार्थी संकट और प्रशासन पर दबाव पैदा हो सकता है। पाकिस्तान खुद भूखमरी की कगार पर है और ऐसे में लोगों के आने से अर्थव्यवस्था पर और बोझ आ पड़ेगा।

एक्सपर्ट मानते हैं कि अफगान युद्धों के ऐतिहासिक प्रभावों ने पाकिस्तान को आर्थिक और सामाजिक रूप से लंबा और गहरा नुकसान पहुँचाया है। सुरक्षा का बड़ा पहलू यह है कि जब बाहरी ताकतें किसी देश में सक्रिय हों तो आतंकी या चरमपंथी समूह अपने मौके की तलाश में रहते हैं। अफगानिस्तान अगर ऐसे समूहों की सक्रियता बढ़ी तो इसका असर भी पाकिस्तान पर दिखाई देगा।

पाकिस्तानी पत्रकार जाहिद हुसैन ने सितंबर 2025 में ‘डॉन’ में लिखे एक लेख में इसे लेकर अपनी चिंता भी जताई थी। जाहिद हुसैन ने लिखा, “अफगानिस्तान में किसी भी अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का पाकिस्तान पर सीधा असर पड़ेगा। अफगानिस्तान में महाशक्तियों के बीच हुए पिछले दो युद्धों में अग्रणी देश होने के नाते पाकिस्तान को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी और अब भी मुल्क इसके प्रभावों से जूझ रहा है।”

अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य अभियानों से पाकिस्तान पर आर्थिक असर पड़ने की भी संभावना है। विवाद के कारण अगर व्यापार रुकता है तो स्थानीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा इससे रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं और सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा।

पाकिस्तान के सामने अब ‘इधर कुआँ, उधर खाई’ वाली स्थिति है। पाकिस्तान अभी दबे-दबे ही अमेरिका का विरोध कर रहा है क्योंकि अगर वो खुलकर ट्रंप के खिलाफ जाता है तो उसकी US से पैसा कमाने की रणनीति फेल हो जाएगी। वहीं अगर वो अमेरिका का साथ देता है तो उसके घर में ही दिक्कतें खड़ी हो जाएगी।

मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश से इनकार पर ईसाई अधिकारी को हटाया, सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा मामला: धर्म देखकर नहीं, कमांड से चलती है भारतीय सेना

भारत में अक्सर कहा जाता है कि लोगों का गुस्सा जल्दी शांत हो जाता है और उनकी ध्यान देने की क्षमता बहुत कम होती है। लेकिन जब मुख्य न्यायाधीश बी आर गवाई पर किसी ने जूता फेंका, संभवतः उनके उस बयान को लेकर जो उन्होंने भगवान विष्णु की मूर्ति की बहाली के मामले में दिया था, तब सोशल मीडिया और मीडिया हंगामा मच गया। विपक्षी पार्टियाँ और भारत के ‘सिक्युलर’ दलों के समर्थक इसे ‘जातिवाद’ से जोड़ने लगे, जबकि कुछ पत्रकार ‘संस्थाओं का सम्मान’ जैसी बातें करने लगे।

कुछ दिन बाद, जब यह मामला खुद ही शांत हो जाना चाहिए था, तब भी कुछ लोग जैसे अरफा ख़ानुम शेरवानी और अन्य वामपंथी इसे जातिवादी नजरिए से दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वे हिंदू समाज में दरार डाल सकें, जो मोदी को लगातार तीसरी बार सत्ता में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

लेकिन जब देश इस मामले में उलझा हुआ था, उसी समय एक और महत्वपूर्ण न्यायिक मामला चुपचाप सामने आया। यह मामला न्यायपालिका की प्रतिष्ठा की नहीं बल्कि भारतीय सेना के अनुशासन, पदानुक्रम और कर्तव्य की सच्चाई को सामने लाता है।

यह मामला एक ईसाई सेना अधिकारी, लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसान का है। उन्होंने अपनी रेजिमेंट के मंदिर में एक छोटा धार्मिक अनुष्ठान करने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि यह उनके ईसाई धर्म के खिलाफ है। इस कारण उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी और 5 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में यह मामला सुना गया। सवाल यह था कि क्या किसी व्यक्ति का धार्मिक अधिकार (अनुच्छेद 25) सेना के कठोर अनुशासन और यूनिट की एकता से ऊपर हो सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले ही उनके बर्खास्तगी के फैसले को सही ठहराया था और कहा था कि किसी के कारण कानून द्वारा दिए गए आदेश का पालन न करना अनुशासनहीनता है। कोर्ट का तर्क साफ था: सेना में धर्म व्यक्तिगत होता है लेकिन अनुशासन संस्थागत।

यह मामला किसी व्यक्ति के धर्म का उल्लंघन नहीं है। यह समझने का मामला है कि सेना कोई मंदिर, मस्जिद या चर्च नहीं है बल्कि सेवा का पवित्र स्थान है। यहाँ हर सैनिक केवल तिरंगे के सामने झुकता है।

मामला: जहाँ एक ईसाई सैनिक ने मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने से इनकार कर दिया

लेफ्टिनेंट कमलेसान का सेवा रिकॉर्ड बताता है कि वह 3rd Cavalry Regiment से जुड़े थे, जिसमें सिख, जाट और राजपूत सैनिक थे। इस रेजिमेंट में एक मंदिर और एक गुरुद्वारा था, कोई ‘सर्व धर्म स्थल’ नहीं। वह अपने सैनिकों के साथ दीवाली, गुरुपरब और होली जैसे त्योहारों में हिस्सा लेते थे। सभी के अनुसार वह एक ईमानदार और सम्मानजनक अधिकारी थे।

लेकिन जब उन्हें रेजिमेंटल अनुष्ठान के तहत मंदिर के भीतर जाकर आरती करने का आदेश मिला, तो उन्होंने इससे विनम्रता से मना कर दिया। उनका कहना था कि यह उनके ईसाई धर्म के एक ईश्वर में विश्वास के खिलाफ होगा।

यहाँ पर नागरिक दृष्टिकोण असफल होता है। सेना व्यक्तिगत पसंद पर नहीं चलती। जब कोई वरिष्ठ अधिकारी आदेश देता है, तो इसमें ‘अगर’ या ‘लेकिन’ नहीं होता। कोई संकोच, इंकार या अपवाद कमांड की दीवार में दरार डालता है और युद्ध के मैदान में ये दरारें घातक हो सकती हैं।

सेना ने हाईकोर्ट को स्पष्ट रूप से बताया कि किसी देवता के प्रति अनुष्ठान रेजिमेंट की पहचान, एकता और मनोबल का हिस्सा हैं। जब कोई अधिकारी इस प्रथा से दूरी बनाता है, तो वह अपने सैनिकों से अलग हो जाता है, जिनकी आस्था अक्सर उनके युद्ध के नारे और साहस से जुड़ी होती है।

यह मामला हिंदू बनाम ईसाई का नहीं है। रेजिमेंट के धार्मिक अनुष्ठान पूजा के लिए नहीं, बल्कि सैनिकों के बीच एकता और तालमेल बनाए रखने के लिए होते हैं। यह वैसा ही है जैसे युद्ध से पहले की अरदास या ‘बजरंग बली की जय’ का युद्ध नारा, जो धार्मिक बयान नहीं बल्कि सैनिकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने का साधन है।

क्यों सेना लोकतंत्र दिखाने की जगह नहीं होती?

नागरिक अक्सर यह समझते हैं कि सेना भी व्यक्तिगत पसंद या लोकतांत्रिक बहस पर चलती है, लेकिन यह गलत है। सेना कोई लोकतंत्र नहीं है। यह आदेश और आज्ञाकारिता पर चलती है।

हर आदेश, चाहे वह कितना भी छोटा हो, जूते चमकाने, राइफलें साफ करने या कोई प्रतीकात्मक अनुष्ठान करने का पवित्र माना जाता है। यदि कोई सैनिक अपने धर्म या व्यक्तिगत आस्था के आधार पर तय करे कि किस आदेश का पालन करना है और किसे अनदेखा करना है, तो सेना का ढाँचा ही कमजोर पड़ जाता है।

सोचिए अगर कोई सैनिक कहे कि वह दुश्मन पर गोली नहीं चलाएगा क्योंकि उसका धर्म हत्या की मनाही करता है, या कोई झंडा फहराने से मना कर दे क्योंकि उसका धर्म राष्ट्रीय प्रतीकों को मान्यता नहीं देता। ऐसे निर्णय सेना की एकता और युद्ध क्षमता के लिए खतरा हैं।

सेना की शपथ किसी ईश्वर के प्रति नहीं होती बल्कि भारत के संविधान, गणतंत्र और सेनापति के प्रति होती है, जो जनता की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वर्दी पहनते ही धर्म, जाति और पंथ पीछे छोड़ दिए जाते हैं। इसलिए सेना गर्व से कहती है: ‘सैनिकों का धर्म उनकी यूनिट है।’

व्यक्तिगत अपवादों का खतरा

लेफ्टिनेंट कमलेसान के समर्थक कहते हैं कि उन्होंने सम्मान दिखाया। उन्होंने मंदिर के बाहर सम्मानपूर्वक खड़े होकर जूते उतारे, अनुष्ठान का पालन देखा और भाईचारे को बनाए रखा। यह सही है। लेकिन अनुशासन का सवाल इरादे का नहीं बल्कि पालन का होता है। उन्हें असम्मान के लिए नहीं बल्कि आज्ञा न मानने के लिए दंडित किया गया।

जिस पल कोई सैनिक किसी आदेश की सीमाओं पर सवाल उठाने या बातचीत करने लगता है, चाहे वह बहुत विनम्रता से ही क्यों न करे तो वह उस व्यवस्था में ‘व्यक्तिगत सोच’ (subjectivity) को शामिल कर देता है, जिसे बिल्कुल स्पष्ट और पूर्ण (absolute) रहना चाहिए। और आदेशों में यह पूर्ण अनुशासन तानाशाही नहीं है।

कश्मीर में नक्सल-उन्मूलन अभियान या मणिपुर में घात लगने जैसी स्थितियों में कोई कमांडिंग ऑफिसर यह समझाने का समय नहीं पा सकता कि आदेश क्यों पालन करना चाहिए। सैनिकों को सहमति देने का विकल्प नहीं होता, उन्हें आदेश का पालन करना पड़ता है।

इसी वजह से एक प्रतीकात्मक आदेश को भी सिद्धांत का मामला माना जाता है। इसलिए आज्ञा का पालन ना करने पर सख्त दंड जरूरी होता है, ताकि अन्य सैनिकों के लिए उदाहरण बने। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इसी बात को सही ठहराया। शांति के समय में किसी सैनिक की इनकार की कार्रवाई, युद्ध में किसी अन्य सैनिक की हिचकिचाहट बन सकती है। सेना ऐसे कदमों को अहंकार से नहीं बल्कि समझदारी और अनुशासन बनाए रखने के लिए दंडित करती है।

फॉक्सहॉल के बिल में विश्वास

कोई यह नहीं कह सकता कि सैनिक धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं। वास्तव में, धर्म अक्सर उन्हें लड़ने, सहने और बलिदान देने की ताकत देता है। गोरखा सैनिक खुकुरी लेकर देवी काली का स्मरण करते हैं, सिख सैनिक ‘बोले सो निहाल’ का नारा लगाते हैं और राजपूताना राइफल्स ‘राजा रामचंद्र की जय’ कहते हैं। धर्म सेना की सांस्कृतिक पहचान में गहराई से बुना हुआ है।

लेकिन एक सीमा है। सेना धर्म को ताकत के स्रोत के रूप में मानती है, विभाजन के कारण नहीं। हर रेजिमेंट अपने दूसरे धर्म के त्योहारों को भी मनाता है, हिंदू ईद मनाते हैं, मुस्लिम दिवाली मनाते हैं और ईसाई होली का आनंद लेते हैं। फिर भी कोई भी व्यक्तिगत धर्मिक विश्वास सामूहिक पहचान से ऊपर नहीं होता।

सैनिक निजी जीवन में धार्मिक हो सकता है, लेकिन वर्दी में वह एक अरब भारतीयों की आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय सेना में सेवा करना स्वयं एक पवित्र कार्य है, एक प्रकार की पूजा, जहाँ देवता राष्ट्र है और प्रार्थना सेवा है।

सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका

सुप्रीम कोर्ट, जस्टिस सूर्य कांत की अगुवाई में, सही तरीके से यह सवाल उठा रही है: क्या धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सेना के अनुशासन के अधीन होता है? यदि भारत को सुरक्षित रहना है, तो इसका उत्तर केवल ‘हाँ’ हो सकता है।

सेना व्यक्तिगत आस्था के लिए नहीं बनी है। यह सामूहिक विश्वास की रक्षा के लिए है, 1.4 अरब भारतीयों के देश की सुरक्षा में भरोसे के लिए। कोर्ट का काम किसी एक व्यक्ति के धर्म को तौलना नहीं है, बल्कि उस शक्ति की नैतिक और संचालन क्षमता को बनाए रखना है, जो व्यवस्था और अराजकता के बीच अंतिम रक्षा की रेखा है।

जब हाईकोर्ट ने कहा कि सेना में चीजें नागरिक दुनिया से अलग होती हैं, इसका मतलब धर्म की अवहेलना नहीं बल्कि सेवा की पवित्रता की रक्षा से था। उसी तरह जैसे डॉक्टर को सर्जरी करते समय भावना को अलग रखना पड़ता है  या न्यायाधीश को फैसला देते समय पूर्वाग्रह को अलग रखना पड़ता है, सैनिक को आदेश का पालन करते समय व्यक्तिगत विश्वास को अलग रखना पड़ता है।

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय अनुशासन

एक उदार लोकतंत्र में धार्मिक स्वतंत्रता बहुत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन सेना में अनुशासन सबसे पवित्र होता है। संविधान खुद इस अंतर को मान्यता देता है। अनुच्छेद 33 संसद को यह अधिकार देता है कि वह सशस्त्र बलों के कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों को सीमित कर सके, ताकि वे अपने कर्तव्यों का सही तरीके से पालन कर सकें और अनुशासन बनाए रख सकें।

क्योंकि वर्दी में मिली स्वतंत्रता पूर्ण नहीं होती, वह देश की सुरक्षा पर निर्भर करती है। लेफ्टिनेंट कमलेसान की धार्मिक चिंता सच्ची हो सकती है, लेकिन उनका इनकार उस व्यवस्था को चुनौती देता है जो व्यक्तिगत इच्छा से ऊपर संस्थागत अनुशासन पर टिकी है और यही वर्दी का सबसे बड़ा विरोधाभास है। स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए, सैनिक को अपनी कुछ स्वतंत्रता त्यागनी पड़ती है।

बड़ा संदेश

यह मामला किसी ईसाई अधिकारी को सजा देने का नहीं है। यह भारत को यह याद दिलाने का है कि जब कोई सैनिक सैन्य वर्दी पहनता है, तब उसका एकमात्र धर्म कर्तव्य होता है।

रेजिमेंट का मंदिर कोई धार्मिक स्थल नहीं बल्कि परंपरा और निरंतरता का प्रतीक है, वह स्थान जहाँ पीढ़ियों से सैनिक युद्ध पर जाने से पहले प्रार्थना करते हैं, जहाँ शहीदों के नाम दर्ज हैं और जहाँ भाईचारे की भावना जीवित रहती है।

जब कोई युवा अधिकारी उस अनुष्ठान को करने से मना करता है जो उसके साथियों को इस विरासत से जोड़ता है, तो वह अनजाने में ही उस पवित्र भावना को तोड़ देता है, यह किसी देवता की नहीं, बल्कि रेजिमेंट की आत्मा की अवमानना होती है। क्योंकि रेजिमेंट केवल सैन्य इकाई नहीं होती, वह भाईचारे और बलिदान की जीवंत परंपरा होती है।

एक सैनिक का एकमात्र धर्म: राष्ट्र सर्वोपरि

सुप्रीम कोर्ट को यह याद रखना होगा कि जहाँ पुजारी, मौलवी और पादरी अपनी आस्था में अपना सर्वोच्च धर्म पाते हैं, वहीं एक सैनिक का मंदिर उसका रणक्षेत्र होता है और उसका ईश्वर भारत माता।

पुजारी का धर्म उसे ईश्वर की पूजा सिखाता है, जबकि सैनिक का धर्म उसे उन लोगों की रक्षा करना सिखाता है जो स्वतंत्र रूप से पूजा करते हैं। अगर धर्म आज्ञा पालन में बाधा बनने लगे, तो कल वर्दी सिर्फ कपड़ा बनकर रह जाएगी।

भारत की सेनाएँ न हिंदू हैं, न मुस्लिम, न सिख, न ईसाई, वे उस सभ्यतागत राष्ट्र की फौलादी रीढ़ हैं जिसने कई युद्ध लड़े और जीते हैं। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर में मिली शानदार जीत इसका उदाहरण है, क्योंकि उन सैनिकों ने कभी यह नहीं पूछा कि युद्ध से पहले किस ईश्वर का नाम लिया जा रहा है।

लेफ्टिनेंट कमलेसान की आस्था का सम्मान है लेकिन उनके इनकार का नहीं। क्योंकि जब धर्म और कर्तव्य आमने-सामने आते हैं, तो भारतीय सैनिक के लिए हमेशा कर्तव्य ही सर्वोपरि होता है।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

टेक से टेक्नोलॉजी और रोजगार से शिक्षा तक, भारत-ब्रिटेन अगले 10 वर्षों में बनेंगे एक-दूसरे की तरक्की के साथी: जानें क्या है ‘विजन 2035’

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर बुधवार (8 अक्टूबर 2025) को 2 दिवसीय भारत दौरे पर मुंबई पहुँचे। उनके साथ मंत्रियों, उद्योगपतियों समेत 125 लोगों का बड़ा समूह भी आया है। भारत- यूके के बीच रणनीतिक साझेदारी और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए विजन 2025 को मजबूत किया जा रहा है। दरअसल भारत और यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्रियों ने 24 जुलाई 2025 को लंदन में ‘भारत-यूके विजन 2035’ की शुरुआत की थी।

ऐतिहासिक व्यापार समझौते ने स्टारमर की यात्रा को दिशा दी

इस वर्ष जुलाई में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्टारमर की उपस्थिति में लंदन में ऐतिहासिक भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर हस्ताक्षर किए गए। ब्रिटिश सरकार के अनुसार, यह समझौता ‘भारत के साथ अब तक का सबसे अच्छा समझौता’ है, और यह ब्रिटिश उत्पादों पर भारत के औसत टैरिफ को 15 प्रतिशत से घटाकर 3 प्रतिशत कर देता है।

भारत को ब्रिटिश निर्यात में लगभग 60% की वृद्धि का अनुमान है, और द्विपक्षीय व्यापार में सालाना 25.5 अरब पाउंड यानी ₹3,041.69 करोड़ की वृद्धि होने की उम्मीद है। इस समझौते से ब्रिटेन के सकल घरेलू उत्पाद में प्रति वर्ष 4.8 अरब पाउंड यानी 5,950 करोड़ रुपये की वृद्धि, मजदूरी में 2.2 अरब पाउंड यानी 22,000 करोड़ रुपए से अधिक की वृद्धि होगी और पूरे ब्रिटेन में रोजगार सृजन होगा।

इस समझौते के सबसे बड़े लाभार्थियों में व्हिस्की उत्पादक शामिल हैं। टैरिफ को तुरंत 150% से घटाकर 75% कर दिया गया है। इसके अलावा, अगले दशक में यह घटकर 40% रह जाएगा, जिससे ब्रिटेन को भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धियों पर महत्वपूर्ण बढ़त मिलेगी।

क्या है भारत-यूके विजन 2035

विजन 2035 का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ाना और रोजगार के नए अवसर तलाशना है। दोनों देशों ने मिलकर संयुक्त आर्थिक और व्यापार समिति का गठन किया है, जो इस पर नजर रखेगी और द्विपक्षीय निवेश संधि को आगे बढ़ाएगी। भारत और ब्रिटेन के बीच जुलाई 2025 में हुए समझौते के तहत ब्रिटेन और भारत के करीब 99 फीसदी सामानों को आयात शुक्ल फ्री कर दिया है। जिसका असर भारत के 45 फीसदी निर्यात पर पड़ेगा। इसमें टेक्सटाइल, जूते, समुद्री खाद्य पदार्थ और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

दूसरी ओर भारत ब्रिटेन के 92 फीसदी वस्तुओं पर टैरिफ या तो खत्म कर देगा या न्यूनतम करेगा। इसका सबसे ज्यादा असर ब्रिटिश कार, शराब उद्योग और तकनीक पर पड़ेगा। भारत में स्कॉच व्हिस्की पर शुल्क 150 फीसदी से घटाकर 75 फीसदी कर दिया गया है और अगले दस वर्षों में इसे 40 फीसदी तक कम किया जाएगा। ब्रिटिश इलेक्ट्रिक वाहनों पर भारत टैरिफ खत्म कर देगा।

दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2023–24 में 21.34 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 1894.59 करोड़ रुपए तक पहुँच गया। वहीं वर्ष 2024–25 में भारत का ब्रिटेन के बीच निर्यात 12.6% बढ़कर 14.5 बिलियन डॉलर यानी 1,287.41 करोड़ रुपए हो गया। वहीं ब्रिटेन से आयात 2.3% बढ़कर 8.6 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया है।

तकनीक और इनोवेशन के क्षेत्र में दोनों देश आपस में साझेदारी करेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग, दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम करेंगे। भारतीय आईटी कंपनियों को इससे काफी फायदा होगा। उन्हें नया बाजार मिलेगा। इंजीनियरिंग, वास्तुकला और हॉस्पिटैलिटी जैसे क्षेत्रों में वीजा प्रक्रिया सरल बनाया जाएगा।

भारत-ब्रिटेन टेक्नोलॉजी सिक्योरिटी इनिशिएटिव यानी टीएसआई की शुरुआत 2024 में कर दी गई है। एआई, सेमीकंडक्टर्स और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग भी शुरू हो गया है।

डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन के तहत भारतीय प्रोफेशनल्स और निवेशकों को ब्रिटेन में सामाजिक योगदान को देखते हुए 3 साल की छूट दी जाएगी।इससे भारतीयों को काफी फायदा होगा।

रक्षा क्षेत्र में सहयोग– भारत और ब्रिटेन 2035 तक रक्षा औद्योगिक रोडमैप तैयार कर लेंगे। इनमें जेट इंजन तकनीक, ऊर्जा और समुद्र में सुरक्षा के लिए आधुनिकतम हथियारों के निर्माण में साझेदारी और शोध अहम है।
हिन्द महासागर में ब्रिटेन के जहाज रसद के लिए भी भारत पर निर्भर रहेगा। समुद्री सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा उत्कृष्टता केन्द्र बनाया जाएगा।

जलवायु परिवर्तन पर मिलकर करेंगे काम– जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत-ब्रिटेन मिल कर काम करेंगे। जलवायु साझेदारी जो स्वच्छ ऊर्जा में तेजी लाने, बड़े पैमाने पर जलवायु वित्त जुटाने और लचीलेपन को मजबूत करने पर केंद्रित है। आपदा रोकने के लिए सिस्टम तैयार करेंगे। सौर ऊर्जा के अधिकतम इस्तेमाल पर काम करेंगे। पर्यावरण को बचाने के लिए विश्वस्तर पर काम करेंगे।

शिक्षा के क्षेत्र में काम– ब्रिटेन के नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों के कैंपस भारत में खुलेंगे ताकि भारतीय छात्रों को विश्वस्तरीय शिक्षा मिल सके। योग्यता को मान्यता देंगे

लोगों को रोजगार मिलेगा

भारत- ब्रिटेन के बीच व्यापारिक समझौते का फायदा एमएसएमई और कृषि क्षेत्र का भी मिलेगा। इससे भारत में रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा। खासकर महिलाओं, नौजवानों को इससे फायदा होगा। कृषि उत्पादों जैसे अन्न,खाद्य तेल, समुद्री खाद्य पदार्थ के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।

भारत- ब्रिटेन के बीच सीईटीए समझौते का लक्ष्य 2030 तक भारत-ब्रिटेन द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करना है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार करीब 112 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है। इस समझौते के तहत साल 2040 तक ब्रिटेन में भारत का निर्यात 60 फीसदी तक बढ़ सकता है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने मिलकर काम किया है। खासकर कोविड-19 महामारी के दौरान एस्ट्राज़ेनेका–सीरम इंस्टीट्यूट के वैक्सीन के निर्माण में दोनों देश सामने आए। ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) में 60,000 से अधिक भारतीय अभी भी काम कर रहे हैं। ब्रिटेन में 1.86 मिलियन भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जो विज्ञान, कला, व्यापार और राजनीति में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, आईएफएफ और विश्व बैंक जैसे संस्थानों में सुधार का समर्थन करेंगे। ताकि दुनिया में इनकी विश्वसनीयता को बढ़ावा मिले।

सुनो कंचना यादव! जंगलराज सिर्फ एक शब्द नहीं, इसलिए आज भी डरता है बिहार: TV पर गों-गों मत करो, हाई कोर्ट ने लालू-राबड़ी राज को ‘नरक’ भी कहा था

बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है। एक बार फिर बिहार में नीतीश राज के विकास और लालू राज के ‘जंगलराज’ को लेकर जमीनी स्तर पर चर्चा होने लगी है। RJD के नेता और प्रवक्ता किसी भी तरह खुद को अपनी ‘जंगलराज’ की छवि से बचाने में लगे हैं। इसी बीच, RJD प्रवक्ता कंचन यादव ‘जंगलराज’ शब्द कहाँ से जन्मा है इसका सबूत आजतक की एंकर अंजना ओम कश्यप से लाइव डिबेट में माँगा।

कहाँ से आया जंगलराज शब्द?- RJD प्रवक्ता

हाल ही में एक टीवी डिबेट में RJD प्रवक्ता कंचन यादव ने जब आजतक की एंकर अंजना ओम कश्यप से यह सवाल किया गया कि ‘जंगलराज’ शब्द का जन्म कहाँ से हुआ?, तो अंजना ओम कश्यप ने जवाब दिया, “पटना हाई कोर्ट ने यह शब्द मौखिक रूप से इस्तेमाल किया था।”

आरजेडी प्रवक्ता कंचन यादव ने इस पर आपत्ति जताते हुए ट्वीट किया और चुनौती दी कि अगर कोर्ट ने ऐसा कहा हो तो आदेश निकालकर दिखाएँ। आरजेडी की प्रवक्ता ने यह भी कहा कि यह शब्द बीजेपी और मीडिया ने मिलकर फैलाया है, कोर्ट ने कभी ‘जंगलराज’ जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं किया।

जब हाईकोर्ट ने कहा था ‘बिहार में कोई सरकार नहीं, जंगलराज है’

सच्चाई यह है कि 1997 में पटना हाई कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी में कहा था कि ‘बिहार में नाम के लायक कोई सरकार नहीं है, और यहाँ जंगलराज चल रहा है’। यह टिप्पणी जस्टिस बीपी सिंह और जस्टिस धर्मपाल सिन्हा की बेंच ने की थी। टिप्पणी किसी राजनीतिक केस में नहीं, बल्कि पटना की बदहाल नगर व्यवस्था और जलजमाव को लेकर थी। जजों ने पटना को ‘Veritable Hell’ यानी ‘वास्तविक नरक’ कहा था।

यह टिप्पणी सीधे तौर पर प्रशासनिक उदासीनता और शहर की गंदगी पर थी, न कि किसी आपराधिक मामले पर। कोर्ट ने यहाँ तक कह दिया था कि पटना भारत की सबसे गंदी राजधानी होने का दावा कर सकता है। कोर्ट ने भ्रष्ट नौकरशाहों को प्रशासन चलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया था।

जंगलराज 2.0: अब भी डर कायम है?

आज तेजस्वी यादव खुद को ‘नई सोच का नेता’ कहकर पेश करते हैं। लेकिन सच यही है कि लालू यादव की RJD का नाम आते ही अब भी बिहार के कई हिस्सों में लोग डरने लगते हैं। पटना से गया तक कई जगहों पर युवाओं, व्यापारियों, महिलाओं में अब भी यह चिंता बनी रहती है कि अगर राजद सत्ता में लौटी तो क्या फिर वही 90 के दशक जैसा डर लौट आएगा?

जंगलराज कोई अखबार की हेडलाइन नहीं, वह बच्चा है जो स्कूल जाने से पहले माँ की आँखों में डर देखता है। वह व्यापारी है जो दुकान की गल्ले पर बैठा हर आहट पर चौंकता है। वह बेटी है जो कॉलेज जाते वक्त हर मोड़ पर डरती है कि कहीं पीछे कोई बाइक न आ जाए।

और इसीलिए, जंगलराज सिर्फ एक शब्द नहीं, बिहार के उस दौर की बदनसीबी का नाम है… एक ऐसा नाम, जिसे आज भी सुनते ही लोग सिहर उठते हैं।

‘मैं खुद दलित, उन्हें पता नहीं है तो मैं क्या करूँ’: ऑपइंडिया से बोले ‘जूता कांड’ वाले वकील राकेश किशोर, कहा- CJI गवई के दिल में है हिंदुओं के लिए नफरत

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश बीआर गवई पर सोमवार (6 अक्टूबर 2025) को कोर्ट की कार्यवाही के बीच वकील राकेश किशोर ने जूता फेंकने की कोशिश की। इस घटना के बाद से ही वामपंथियों का गैंग लगातार राकेश किशोर को दलित विरोधी साबित करने पर लगा हुआ है।

यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर कुछ लोग आरोपित वकील को ब्राह्मणवादी सोच से ग्रसित भी बता रहें हैं लेकिन अब ऑपइंडिया से विशेष बातचीत में वकील राकेश ने खुद के दलित होने का दावा किया है। राकेश का कहना है कि वह भगवान बुद्ध के विचारों से भी प्रभावित है।

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बरेली के रहने वाले राकेश इन दिनों दिल्ली के मयूर विहार एक्सटेंशन में रहते हैं। उन्होंने ऑपइंडिया से खास बातचीत में कहा, “लोग मुझे नहीं जानते हैं लेकिन मैं स्वयं एक दलित हूँ। मेरा नाम राकेश किशोर है, न पांडेय है, न तिवारी है, न गुप्ता है और न जायसवाल है। इसे साबित करने के लिए मैं अपने जाति प्रमाण पत्र के साथ अन्य कागजात भी दिखाने के लिए तैयार हूँ।”

राकेश किशोर ने कहा, “मुझे दु:ख होता है कि एक वर्ग है जो हिंदुओं से कटकर अलग तैयार हो रहा है। उन्होंने कल मेरे घर का घेराव किया वो भी आताताई लोग हैं। बौद्ध धर्म का जितना मुझे ज्ञान है उतना ज्ञान मिलना किसी और को मुश्किल है।” आगे राकेश भगवान बुद्ध के बारे में बताते हुए कहते हैं कि गौतम बुद्ध ने कभी हिंदू धर्म को गाली नहीं दी, उन्हें कभी भी बुरा-भला नहीं कहा।

उन्होंने कहा, “बौद्ध धर्म हमारा ही है हमसे ही निकला है। हमारे एक बड़े पेड़ के ही तने जैसा निकला हुआ है। मैं भगवान बुद्ध की बहुत इज्जत करता हूँ मैं उन्हें बहुत पढ़ता हूँ। मैं उनकी बातों पर चलता भी हूँ।”

CJI गवई द्वारा भगवान विष्णु पर की गई टिप्पणी पर वकील राकेश किशोर कहते हैं कि उन्होंने जानबूझकर सनातन का अपमान किया है। उन्होंने कहा, “जो उनके दिल की जो भावनाएँ थीं वो सामने निकलकर आईं। उनके दिल में हिंदुओं के लिए, सनातन के लिए जो क्षोभ है, जो क्रोध है वो अपने आप से निकलकर सामने आया है।”

राकेश किशोर CJI गवाई द्वारा खुद को माफ करने किए जाने पर कहते हैं, “CJI को पता है कि ये आदमी सत्य बोलेगा और हमारी (CJI) छीछालेदर हो जाएगी।”

इस घटना के बाद बार काउंसिल ने उनका वकालत का लाइसेंस रद्द कर दिया है। ‘करियर को दाँव पर’ लगाने के सवाल पर राकेश कहते हैं कि उन्होंने अपना कोई जीवन दाँव पर नहीं लगाया जो भगवान का आदेश हुआ वही मैंने किया। उन्होंने, “मैंने खुद से कुछ नहीं किया। मुझे इस पर कोई पछतावा नहीं है। मैं उस समय कोई नशे में नहीं था पूरे होश में ही था। मैंने हिंदुओं को जगाने की कोशिश की है भगवान की कृपा होगी तो ऐसा हो जाएगा।”

कोर्ट परिसर में वकीलों के समर्थन को लेकर राकेश किशोर ने कहा कि उनके विरोध में कोर्ट परिसर में प्रदर्शन में शामिल होने के लिए केवल 5-6 ही वकील आए थे। उन्होंने कहा, “इससे पता चलता है कि हमारे साथ कितने लोग हैं।”

वहीं, सोशल मीडिया पर मिल रहे लाखों लोगों के समर्थन पर वकील राकेश किशोर कहते हैं, “सनातन के लिए चुप न बैठें अपने बच्चों को बताएँ कि देश में जितनी खंडित मूर्तियाँ हैं उनके लिए मुहिम चलाएँ और उनका जीर्णोद्धार कराएँ। इसके लिए सरकार से पैसा न ले और अपना (सनातनियों) पैसा लगाएँ। हो सके तो आंदोलन छेड़ें, एएसआई से अनुमति लें।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं हिंसा करने के लिए नहीं कहूंगा, रोड़ जाम, तोड़फोड़, आगजनी, प्रदर्शन आदि करने के लिए नहीं कहता। अपना काम शांति से करें कानून के दायरे में रहकर करें। 70 वर्षों से आज तक नहीं किया इसके लिए हम सबको शर्मिंदा होना चाहिए। मैंने तय कर लिया है कि अब मुझे मरने से पहले हिंदू धर्म अपने सनातन के लिए कुछ करना है।”

‘अंबेडकर अंग्रेजों के एजेंट थे’: MP हाई कोर्ट के वकील अनिल मिश्रा की टिप्पणी पर बवाल, राष्ट्रद्रोह समेत कई धाराओं में FIR; खुद गिरफ्तारी देने पहुँचे SP ऑफिस

मध्य प्रदेश के ग्वालियर के अशोकनगर में डॉ भीमराव अंबेडकर के खिलाफ कथित अभद्र टिप्पणी को लेकर विरोध बढ़ गया है। मंगलवार (7 अक्टूबर 2025) को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और अहिरवार समाज संगठन ने अलग-अलग समय पर कलेक्ट्रेट पहुँचकर अपना विरोध दर्ज कराया और ज्ञापन सौंपे हैं।

दोनों संगठनों ने एडवोकेट अनिल मिश्रा के खिलाफ गंभीर धाराओं में FIR दर्ज कर कठोर कार्रवाई की माँग की। बसपा के ज्ञापन में कहा गया कि अनिल मिश्रा ने ‘आचरण ग्वालियर पर लाइव’ नामक सोशल मीडिया कार्यक्रम में डॉ अंबेडकर के बारे में निंदनीय, अमर्यादित और भड़काऊ टिप्पणी की। बसपा ने इसे संविधान प्रेमियों की आस्था पर आघात और राष्ट्र के खिलाफ साजिश बताया।

पार्टी ने कहा कि डॉ अंबेडकर न केवल भारत रत्न और संविधान निर्माता हैं, बल्कि करोड़ों वंचितों के मसीहा भी हैं। इसलिए उनके खिलाफ की गई टिप्पणी संविधान और लोकतंत्र दोनों का अपमान है। बसपा ने माँग की कि अनिल मिश्रा पर राष्ट्रद्रोह और धार्मिक वैमनस्य फैलाने जैसी धाराओं में मामला दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाए।

वहीं, अहिरवार समाज संघ ने भी राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा। संगठन ने कहा कि डॉ अंबेडकर ने अपना जीवन समता, न्याय और सामाजिक समरसता के लिए समर्पित किया था  और अनिल मिश्रा की टिप्पणी अपमानजनक होने के साथ-साथ समाज में वैमनस्य फैलाने का प्रयास है।

दोनों संगठनों ने प्रशासन से अपील की कि वह संविधान और डॉ अंबेडकर के सम्मान की रक्षा सुनिश्चित करे और ऐसी टिप्पणी करने वालों के खिलाफ तुरंत और सख्त कार्रवाई करे।

क्या है पूरा मामला?

ग्वालियर हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अनिल मिश्रा पर डॉ भीमराव अंबेडकर के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी और फोटो शेयर करने का आरोप है। दरअसल रविवार (5 अक्टूबर 2025) की सुबह क्राइम ब्रांच की सोशल मीडिया मॉनिटरिंग टीम को एक व्हाट्सएप ग्रुप में डॉ अंबेडकर से जुड़ी विवादित वीडियो और फोटो मिली।

जाँच में पता चला कि यह पोस्ट अनिल मिश्रा के मोबाइल नंबर से अपलोड की गई थी। वीडियो में अंबेडकर के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया था और उनके फोटो में छेड़छाड़ की गई थी। पोस्ट में उन्होंने डॉ भीमराव अंबेडकर पर तीखा हमला किया और लिखा, “अंबेडकर अंग्रेजों के एजेंट थे उनका बनाया संविधान देश के लिए घातक है, इसे जलाना चाहिए।” यह पोस्ट कुछ ही घंटों में वायरल हो गई।

पहले भी मिश्रा कई बार विवादित बयान दे चुके हैं, लेकिन इस बार मामला संविधान निर्माता पर था, इसलिए मामला गंभीर हो गया। भीम आर्मी और अन्य दलित संगठनों ने चेतावनी दी कि अगर पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, तो वे सड़कों पर उतरेंगे। BSP और अहिरवार समाज संगठन ने कलेक्टर को ज्ञापन देकर मिश्रा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की।

दर्ज हुई FIR और एडवोकेट मिश्रा ने दी सफाई

6 अक्टूबर 2025 की शाम ग्वालियर क्राइम ब्रांच ने कई शिकायतों के आधार पर मिश्रा के खिलाफ FIR दर्ज की। उन पर IPC की धारा 153A (समुदायों में नफरत फैलाना), 295A (धार्मिक भावनाएँ आहत करना), 505(2) (शांति भंग करने वाले बयान) और IT एक्ट की धारा 66A के तहत केस दर्ज किया गया।

FIR में कहा गया कि मिश्रा की पोस्ट अंबेडकर की छवि खराब करने और समाज में तनाव फैलाने वाली है। पुलिस ने उन्हें नोटिस जारी कर अपना पक्ष बताने को कहा। लेकिन मिश्रा ने खुद ही सामने आकर बयान दिया कि वे बेगुनाह हैं। उन्होंने कहा, “मैंने कोई गलत बात नहीं कही, मैं सिर्फ इतिहास की सच्चाई बता रहा था।” उन्होंने सवाल उठाया, “हिंदू देवी-देवताओं पर टिप्पणियाँ करने वालों पर पुलिस चुप क्यों है?”

7 अक्टूबर 2025 की सुबह असली ड्रामा शुरू हुआ। अनिल मिश्रा अपने समर्थक वकीलों और ‘रक्षक मोर्चा’ के सदस्यों के साथ ग्वालियर SP ऑफिस पहुँचे। हाथों में तख्तियाँ लेकर नारे लगाए, “मुझे गिरफ्तार करो, मैं खुद आ गया हूँ।” मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मैं अंबेडकर के विरोध में रहूँगा, ये विदेशी जातंकवादी नहीं सुधरेंगे।”

SP ऑफिस में हंगामा मच गया। समर्थक नारे लगाने लगे ‘अनिल भाई को छोड़ो, नहीं तो हाईकोर्ट बंद’ लेकिन SP प्रतीक ठाकुर ने साफ कहा कि अभी जाँच चल रही है और गिरफ्तारी का समय नहीं आया। उन्होंने मिश्रा को फिर से नोटिस थमाया और पूछताछ के लिए थाने बुलाया। मिश्रा अपने समर्थकों के साथ नारे लगाते हुए लौटे, “अगर जेल जाना है तो जेल जाएँगे।”

परशुराम सेना ने दी विरोधियों को चुनौती

एक तरफ जहाँ भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी और कई एससी, एसटी, ओबीसी संगठनों ने मिश्रा के बयान का विरोध किया है। वहीं इसी बीच, भिंड जिले की परशुराम सेना ने अनिल मिश्रा के समर्थन में खुलकर मैदान में उतरने की घोषणा की है।

सेना के जिला अध्यक्ष देवेश शर्मा ने कहा, “जो लोग जूते की माला पहनाने जैसी बातें कर रहे हैं, उनमें दम है तो 15 अक्टूबर 2025 को ग्वालियर आकर दिखाएँ।” उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि परशुराम सेना वहाँ बड़ी संख्या में मौजूद रहेगी और किसी भी तरह की बदसलूकी का जवाब दिया जाएगा।

शर्मा ने कहा कि सवर्ण समाज शांत है, लेकिन अगर मर्यादा लांघी गई तो जवाब देना भी जानता है। विवाद बढ़ने के बाद प्रशासन सतर्क हो गया है। पुलिस ने सोशल मीडिया पर निगरानी बढ़ा दी है और दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की है।

पूरी तरह भूमिगत, ₹9785 करोड़ की लागत: मुंबई मेट्रो की जिस लाइन को डिरेल करना चाहती थी महाराष्ट्र की MVA सरकार, जानिए उससे कैसे जीवन होगा सुगम

दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश और देश के सबसे अधिक आबादी वाले शहरों में एक मुंबई, इनदिनों पर्यावरण और यातायात की गंभीर समस्याओं से जुझ हो रहा है। इसको देखते हुए मुंबई मेट्रो लाइन 3 की शुरुआत हो रही है। इस लाइन को एक्वा लाइन भी कहा जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 अक्टूबर को इसका उद्घाटन करने वाले हैं। यह परिवहन सिस्टम को दुरुस्त करने में अहम भूमिका अदा कर सकता है।

आरे और बीकेसी को जोड़ने वाली एक्वा लाइन के प्रारंभिक चरण का उद्घाटन अक्टूबर 2024 में किया गया था। इसके बाद, मई 2025 में इसे आचार्य अत्रे चौक तक विस्तारित किया गया। अब साइंस म्यूजियम स्टेशन से कफ परेड स्टेशन तक ये चलेगा। इसमें 11 प्रमुख भूमिगत स्टेशन शामिल हैं। यात्रियों को कम से कम आधी दूरी तय करने की सुविधा देने के लिए पिछले कुछ वर्षों में इस लाइन को धीरे-धीरे विस्तारित किया गया है।

मुंबई सेंट्रल, ग्रांट रोड, गिरगाँव, कालबादेवी, सीएसएमटी, हुतात्मा चौक, चर्चगेट, विधान भवन, कफ परेड और साइंस सेंटर, मुंबई मेट्रो-3 के तीसरे और अंतिम खंड में आते हैं। यह मेट्रो कॉरिडोर उत्तर में आरे से दक्षिण में कफ परेड तक 33.5 किलोमीटर लंबा है और इसमें 27 स्टेशन हैं। इसका निर्माण मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एमएमआरसीएल) ने किया है। आरे डिपो इस लाइन का एकमात्र हिस्सा है जो भूमिगत नहीं है।

9,785 करोड़ रुपये की लागत वाले इस चरण के साथ मेट्रो 3 कॉरिडोर का निर्माण पूरा हो गया। 2011 में इसकी योजना बनाई गई थी। इस पर काम जनवरी 2017 में देवेंद्र फडणवीस सरकार ने शुरू किया। सरकार ने इस दौरान 23,136 करोड़ रुपए का प्रारंभिक अनुमान बढ़कर 37,276 करोड़ रुपए हो गया। जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) ने 60% खर्च का वहन किया है, जबकि बाकि 40 फीसदी राशि केंद्र और राज्य सरकारों ने 50:50 के अनुपात में दिया है।

एक्वा लाइन के निर्माण के दौरान इंजीनियरों को दक्षिण मुंबई में ऐतिहासिक इमारतों और मुश्किल जमीन से निपटना पड़ा। उन्होंने कालबा देवी, गिरगाँव और फोर्ट जैसी जगहों पर 100 साल पुरानी इमारतों को बचाने के लिए नियंत्रित माइक्रोब्लास्टिंग और कीहोल टनलिंग जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया। इस दौरान किसी भी निवासी को स्थायी रूप से बेदखल नहीं किया गया, बल्कि 730 से अधिक परिवारों को MMRCL द्वारा यथास्थान पुनर्वास प्रदान किया गया।

परिवहन में क्रांति है एक्वा लाइन

माना जा रहा है कि एक्वा लाइन हर दिन 17 लाख यात्रियों को ले जाएगी, जिससे मुंबई की परिवहन व्यवस्था पर दबाव काफी कम होगा। पूरी तरह भूमिगत मार्ग होने की वजह से सड़कों और दूसरे विकल्पों पर असर भी नहीं पड़ेगा।

मेट्रो लाइन 3 मुंबई के सबसे महत्वपूर्ण व्यावसायिक, आवासीय और वाणिज्यिक क्षेत्रों से होकर गुजरती है। इसके अलावा यह छत्रपति शिवाजी महाराज अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय टर्मिनलों के साथ-साथ कफ परेड, नरीमन पॉइंट, फोर्ट और बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) जैसे वाणिज्यिक और कॉर्पोरेट केंद्रों के साथ-साथ मुंबई सेंट्रल, छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी) और चर्चगेट जैसे क्षेत्रों को जोड़ता है।

(फोटो साभार- टाइम्स ऑफ इंडिया)

एक्वा लाइन के माध्यम से शहर के मध्य क्षेत्रों, जैसे आरे और सीप्ज़ ​​(सांताक्रूज इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र) जैसे आवासीय और औद्योगिक क्षेत्रों तक पहुँचना आसान होगा। धारावी और शीतलदेवी जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों को भी बेहतर सार्वजनिक विकल्प मिलेगा। यानी मुंबई के भीड़भाड़ वाले बसों और लोकल ट्रेनों का बोझ थोड़ा कम हो जाएगा।

इस मेट्रो लाइन से आने-जाने का समय काफी कम होने की उम्मीद है। दरअसल बिजी टाइम के दौरान कफ परेड से आरे (जेवीएलआर) तक की यात्रा में केवल 54 मिनट लगेंगे। इससे सड़क पर कारों की संख्या कम होने से यातायात में 35% और ईंधन की खपत में प्रतिदिन करीब 3.54 लाख गैलन की कमी आएगी।

यह मेट्रो लाइन फिलहाल चल रहे मेट्रो लाइनों के साथ मिल कर पूरे शहर में कनेक्टिविटी में सुधार करेगी, जिससे सार्वजनिक परिवहन का एक व्यापक और प्रभावी नेटवर्क तैयार होगा।

यह मरोल नाका पर लाइन 1 (नीली लाइन), आरे जेवीएलआर (जोगेश्वरी-विक्रोली लिंक रोड) पर लाइन 6 (गुलाबी लाइन), सीएसएमटी पर लाइन 7ए (लाल लाइन) और लाइन 8 (गोल्ड लाइन), बीकेसी पर लाइन 2बी (पीली लाइन) के साथ-साथ दादर, महालक्ष्मी, मुंबई सेंट्रल, ग्रांट रोड और चर्चगेट पर पश्चिमी लाइन से जुड़ेगी।

द फ्री प्रेस जर्नल के अनुसार, एमएमआरसीएल के एक अधिकारी ने बताया है कि एक्वा लाइन गति के बारे में नहीं है, बल्कि आवागमन में सुगमता, सुरक्षा और सम्मान के बारे में भी है। एक बार पूरी तरह से चालू हो जाने पर, एक्वा लाइन मुंबई के सार्वजनिक परिवहन को बदल देगी। सड़कों पर भीड़भाड़ कम होगी और मुंबईवासियों के लिए एक सस्ता, सुगम परिवहन का साधन बनकर उभरेगी।

किफायती किराया, आराम पूरा

मुंबई मेट्रो लाइन 3 का किराया भी ज्यादा नहीं है। इसकी दरें 10 रुपए से 60 रुपए तक का है। टैरिफ चार्ट में बताया गया है कि 3 किलोमीटर तक यात्रा करने में 10 रुपए लगेंगे, जबकि 3 से 12 किलोमीटर के बीच की दूरी तय करने के लिए 20 रुपए लगेंगे।

टैक्सियों की तुलना में ये कम खर्चीला है, क्योंकि इतनी दूरी की यात्रा के लिए टैक्सियाँ 700 रुपए वसूलती हैं। नई प्रणाली भीड़भाड से बचाने के साथ-साथ वक्त पर चलने और गंतव्य तक पहुँचने की गारंटी देती है। साथ में एयरकंडीशन फ्री।

मेट्रो लाइन-3 के निर्माण में सामने आई चुनौतियाँ

एमएमआरसी ने मेट्रो लाइन के आसपास के इलाकों के आर्थिक विकास का बीड़ा भी उठाया है। एमएमआरसी ने नई रणनीति तैयार की है। इसके तहत मेट्रो लाइन के पास नरीमन पॉइंट पर 4.16 एकड़ भूमि के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को पहले ही 3,472 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुका है।

पिछले साल 7 अक्टूबर 2024 को आरे कॉलोनी और बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) के बीच 12.69 किलोमीटर लंबे खंड को जनता के लिए खोल दिया गया था। 9 मई को, बीकेसी से वर्ली तक 9.8 किलोमीटर लंबे खंड का उद्घाटन किया गया। वर्ली (आचार्य अत्रे चौक) और कफ परेड के बीच 10 किलोमीटर का खंड अब 8 अक्टूबर 2025 से उपलब्ध है।

इसलिए, 33.5 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर को पूरा होने में 8 साल और 9 महीने लगे। इस बीच, 15,000 से ज़्यादा मज़दूरों, इंजीनियरों, वास्तुकारों और सुरंग निर्माण विशेषज्ञों ने इसमें योगदान दिया है।

मुंबई की घनी आबादी के चलते यहाँ भूमि अधिग्रहण बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। पूरी तरह से भूमिगत डिज़ाइन के कारण, मेट्रो-3 के लिए खुदाई, सुरंग बनाना और दूसरे जमीनी कारणों की वजह से पूरी प्रक्रिया में काफ़ी समय लग गया।

मुंबई में सुरंग निर्माण के दौरान जल-जमाव वाली मिट्टी, बेसाल्ट चट्टानों सहित अलग-अलग तरह की दिक्कतें बड़ी चुनौती बनी।

मुंबई जैसे महानगर के लिए मानसून एक बड़ी समस्या है। क्योंकि बारिश होते ही पूरा शहर पानी में डूब जाता है। इसके अलावा, मुंबई मेट्रो 3 के लिए मार्ग झुग्गी-झोपड़ियों, व्यस्त बाज़ारों और ऐतिहासिक ढाँचों के नीचे से गुजर रहे थे। इसके लिए अधिक ध्यान और समय की आवश्यकता थी। ऐतिहासिक ढाँचों के पास किसी भी भूमिगत निर्माण से ढाँचे को नुकसान पहुँच सकता था। इसलिए अति सतर्कता की जरूरत थी।

मेट्रो लाइन में देरी की वजह राजनीति भी रही

मेट्रो लाइन में देरी की एक वजह राजनीति भी रही। इस महत्वपूर्ण परियोजना के विस्तार को प्रभावित किया और इसकी लागत भी बढ़ा दी। पिछले साल अक्टूबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस ओर ध्यान दिलाया था।

ठाणे में एक रैली में उन्होंने आरोप लगाया, “मेट्रो लाइन 3 का काम देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री रहते शुरू हुआ था और 60% काम उनके कार्यकाल में पूरा हुआ था। हालाँकि, जब महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सत्ता में आई, तो उन्होंने अहंकार के कारण परियोजना को रोक दिया, जिससे लागत में 14,000 करोड़ रुपये की वृद्धि हो गई। यह पैसा किसका है? क्या यह उनका पैसा है? नहीं, यह महाराष्ट्र के करदाताओं की गाढ़ी कमाई है।”

अलग-अलग चैनलों, सोशल मीडिया, एक्टिविटों, अभिनेताओं और गैर-सरकारी संगठनों एनजीओ के माध्यम से पेड़ों के कटने और पर्यावरण को बचाने के नाम पर आरे में मेट्रो शेड के निर्माण को रोकने के लिए ‘आरे बचाओ’ अभियान शुरू किया गया। हालाँकि आम लोग अपने आनेजाने के लिए हर दिन भयानक दिक्कतों का सामना कर रहे थे। शिवसेना उद्धव गुट के नेता आदित्य ठाकरे ने ‘मेट्रो विरोध’ को अपना पसंदीदा अभियान बना लिया और पर्यावरण के नाम पर मेट्रो शेड परियोजना को रोकने की कोशिश की।

महा विकास अघाड़ी ने 2019 में मेट्रो कार शेड को आरे से कांजुरमार्ग ले जाने का फैसला लिया। ठाकरे ने पदभार संभालने के तुरंत बाद घोषणा की, “मैंने आज आरे मेट्रो कार शेड परियोजना का काम रोकने का आदेश दिया है। मेट्रो का काम नहीं रुकेगा, लेकिन अगले फैसले तक आरे का एक पत्ता भी नहीं काटा जाएगा। मैं पहला मुख्यमंत्री हूँ जिसका जन्म मुंबई में हुआ है। मेरे दिमाग में यह चल रहा है कि मैं शहर के लिए क्या कर सकता हूँ।”

हालाँकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई थी क्योंकि कांजुरमार्ग की भूमि विवादित था। यहाँ जमीन के मालिकाना हक का मामला लंबित था और मामले के सुलझने तक इसका इस्तेमाल कोई नहीं कर सकता था। तब यह खुलासा हुआ था कि सरकार को पता था कि कांजुरमार्ग की संपत्ति पर मुकदमा चल रहा है।

बाद में, महाराष्ट्र के महाधिवक्ता को बॉम्बे उच्च न्यायालय में एक आवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया जिसमें कहा गया कि सरकार 2022 में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पहली कैबिनेट बैठक के दौरान शेड को कांजुरमार्ग से वापस आरे में स्थानांतरित कर देगी।

भारत में जापानी राजदूत सुजुकी सातोशी ने भी 17 फ़रवरी 2021 को मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को लिखे एक पत्र में अनुमानित खर्च और परियोजना में हो रही देरी को लेकर चिंता जताई थी।

जापानी राजदूत ने जोर देकर कहा, “इस परियोजना के वित्तपोषक होने के नाते, जापान सरकार और जेआईसीए इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि अगर समय पर ऋण नहीं दिया गया, तो परियोजना में देरी या गतिरोध जैसी गंभीर चुनौतियाँ आ सकती हैं।”

एमवीए के सत्ता से बेदखल होने के बाद भी यह दुष्प्रचार जारी रहा। आदित्य ठाकरे कई विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुए और यहाँ तक कि झूठ भी बोला कि मेट्रो नेटवर्क कार शेड के बिना भी चल सकता है। पूर्व मंत्री के अनुसार, कारों को हर तीन से चार महीने में केवल रखरखाव की आवश्यकता होती है, इसलिए यह मुंबई मेट्रो का अनिवार्य हिस्सा नहीं है।

दूष्प्रचार के लिए आदित्य ठाकरे ने बच्चों का इस्तेमाल किया। इसके बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) को हस्तक्षेप करना पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इन दावों को खारिज कर दिया था, फिर भी दुष्प्रचार बेरोकटोक जारी रहा।

राजनीतिक और अन्य, कई चुनौतियों और देरी का सामना करने के बावजूद, यह इंजीनियरिंग चमत्कार आखिरकार साकार हो गया है, जिससे न केवल मुंबई के निवासियों को लाभ हुआ है, बल्कि देश की तकनीकी क्षमताओं का लोहा दुनिया ने माना है।

(ये लेख अंग्रेजी में मूल रूप से लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

कफ सिरप में डायथिलीन ग्लाइकॉल 500% अधिक, बच्चों के लिए दवा ही बन गई जहर: तमिलनाडु में तैयार कर MP में की सप्लाई, जानिए सब कुछ

मध्यप्रदेश में कफ सिरप कोल्ड्रिफ पीकर मरने वाले बच्चों की संख्या 19 हो गई है। इस सिरप की जाँच से पता चला है कि ये तमिलनाडु के श्रीसन फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरर के यहाँ तैयार किया गया है। चेन्नई के बाहरी इलाके में बैंगलुरु हाईवे पर ये फैक्ट्री मौजूद है।

जाँच के दौरान पूछताछ में फार्मास्युटिकल फैक्ट्री के मालिक रंगनाथ ने भी माना है कि उसने नॉन फार्मास्युटिकल ग्रेड के प्रोपलीन ग्लाइकॉल की 50-50 किलो के दो बैग मँगवाए थे। यानी 100 किलो जहरीला केमिकल मँगवाया गया था। हालाँकि दवाओं की एंट्री फैक्ट्री में दर्ज नहीं है। इसका भुगतान कैश के साथ-साथ ऑनलाइन जी-पे से किया गया था। दरअसल कंपनी ने सनराइज बायोटेक कंपनी से घटिया क्वालिटी का प्रोपलीन ग्लाइकॉल खरीदा था। इसका टेस्ट भी नहीं किया गया।

जाँच में ये भी सामने आया है कि सिरप में डाईएथिलीन ग्लाइकॉल और एथिलीन ग्लाइकॉल की मात्रा तय सीमा से 486 गुणा ज्यादा थी। यानी ये सिरप न सिर्फ बच्चे के लिए जानलेवा था, बल्कि बड़े से बड़ा जानवर, जैसे हाथी की भी किडनी खराब कर सकता था।

मार्च 2025 में खरीदा था केमिकल

जाँच में सामने आया कि मार्च 2025 में ये केमिकल कंपनी ने चेन्नई की सनराइज बायोटेक से खरीदा था। लेकिन ये नॉन फार्मास्युटिकल ग्रेड का था। यानी ये कारों के कूलेंट या एंटीफ्रीज में इस्तेमाल किया जाने वाला केमिकल था। इसकी शुद्धता की जाँच नहीं की गई थी। फार्मास्युटिकल ग्रेड केमिकल का उपयोग दवाओं में किया जाता है न की नॉन फार्मास्युटिकल ग्रेड का।

कंपनी ने सबूत छिपाने की कोशिश की

तमिलनाडु ड्रग्स कंट्रोल विभाग ने पाया कि इस घटिया केमिकल से कई दवाएँ तैयार की गई थी। जाँच टीम ने ये भी पाया कि अब प्रोपलीन ग्लाइकॉल का स्टॉक वहाँ मौजूद नहीं था। यानी कंपनी ने इसे छिपाने की कोशिश की। विभाग ने मंगलवार (7 अक्टूबर 2025) को फैक्ट्री के मालिक डॉ. जी रंगनाथन और कंपनी के मुख्य कैमिस्ट अधिकारी के. माहेश्वरी को कारण बताओ नोटिस जारी किया। साथ ही कंपनी की बाहर की दीवार पर दो अलग-अलग कारण बताओ नोटिस चिपकाए गए।

कंपनी पर औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के गंभीर उल्लंघन का आरोप है। नोटिस में कहा गया है कि दवाओं पर गुणवत्ता नहीं बताया गया है। इसमें मिलावट है। इसमें डायथिलीन ग्लाइकॉल (48.6% w/v) है, जो एक जहरीला पदार्थ है और सेहत के लिए नुकसानदेह है। रंगनाथन और माहेश्वरी दोनों को जवाब देने के लिए पाँच दिन का समय दिया गया है।

नोटिस में फर्म को यह बताने के लिए कहा गया है कि उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए। फर्म को सारा स्टॉक वापस लेने, वितरण के पूरे रिकॉर्ड जमा करने और मास्टर फॉर्मूला रिकॉर्ड से लेकर प्रोपिलीन ग्लाइकॉल जैसे कच्चे माल के खरीद से उसके इस्तेमाल तक, सभी तरह के दस्तावेज जाँच दल के सामने रखने को कहा गया है।

दवा बनाने वाली फैक्ट्री मानकों के अनुरूप नहीं थी

दवा बनाने वाली कंपनी श्रीसन फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरर का गेट बंद है। कंपनी के अंदर जाँच में पाया गया है कि फिल्टर्ड हवा की यहाँ व्यवस्था नहीं थी। दवाओं को गंदगी में ही रख दिया जाता था, जिससे इसके खराब होने की आशंका रहती थी। उपकरण टूटे हुए, जंग लगे मिले। बाहर के बगैर ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल किया जाता था।

कमरे मे तापमान और नमी की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं, जो दवाओं के निर्माण के लिए अति आवश्यक है। लिक्विड पदार्थ प्लास्टिक के बोतल में रखे गए थे। निर्माण प्रक्रिया खुले में होती थी, जिससे प्रोडक्ट के प्रदूषित होने का खतरा बना रहता था। कंपनी ने नॉन फॉर्मा ग्रेड केमिकल का इस्तेमाल किया था।

फैक्ट्री के दवा बनाने वाली जगह पर क्या-क्या मिला

जाँच टीम ने पाया कि कमरे जल्दी बाजी में खाली किए गए थे। यहाँ से गंध आ रही थी। प्लास्टिक के जार के ढेर थे। कमरे का फर्श काफी दागदार था। खिड़कियाँ कसकर बंद की गई थी। ये खिड़की काफी छोटी थी। सफेद और नीले प्लास्टिक के कंटेनरों के ढेर दीवार से सटे हुए थे।

जमीन पर काली बाल्टियाँ, धातु के फ्रेम और विशाल ड्रमों के बिखरे ढक्कन पड़े थे। राख और मलबे के बीच में प्रोनिक आयरन सिरप के अधजले लेबल और साइप्रोहेप्टाडाइन हाइड्रोक्लोराइड सिरप आईपी की 200 मिलीलीटर की बेकार बोतलें खुले में पड़ी थीं।

नीले रंग के बैरल के लेबल पर लिखा था ‘लिक्विड ग्लूकोज, 300.80 किलोग्राम’। साथ ही लिखा था ‘खुदरा बिक्री के लिए नहीं’, इस पर जून 2025 में निर्मित और जून 2027 में एक्सपायर डेट लिखा था।

आस-पास के लोगों ने क्या कहा

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, कंपनी के नजदीक रहने वाले सरवन ने बताया कि वह अक्सर हरी वर्दी पहने करीब 10 महिलाओं को सुबह 9:30 बजे के आसपास आते देखता था, ये महिलाएँ शाम 5 बजे जाती थी।” महिलाओं ने उसे बताया था कि ये फैक्ट्री दिसंबर में बंद हो जाएगा, क्योंकि इसका लाइसेंस खत्म हो रहा है।” ये फैक्ट्री पिछले 13 सालों से चल रहा था। लेकिन किसी भी आसपास रहने वाले व्यक्ति को आज तक अंदर जाने का मौका नहीं मिला। पास के एक ऑटोमोबाइल शोरूम में काम करने वाले वेंकटेश ने कहा, “सभी कर्मचारी बस से आते थे – इस मोहल्ले से कोई नहीं था।”

इंडियन एक्सप्रेस ने पाया है कि जब तमिलनाडु के औषधि नियंत्रण विभाग के निरीक्षकों की टीम ने भवन संख्या 787, जो इकाई के लिए खाली थी, का दरवाज़ा खटखटाया, तो उन्हें 364 उल्लंघनों की एक सूची मिली।

2009 में बंद कंपनी से जुड़ा था श्रीसन फार्मास्युटिकल लिमिटेड

कंपनी के मालिक रंगनाथन ने 27 अक्टूबर, 2011 को विनिर्माण लाइसेंस प्राप्त किया था। यह 2026 तक वैध था। ये रंगनाथ की पहली फैक्ट्री नहीं थी। रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (IOC) के दस्तावेजों से पता चलता है कि रंगनाथन श्रीसन फार्मास्युटिकल लिमिटेड के निदेशक थे। इसका गठन 25 दिसंबर 1990 को हुआ था। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (एमसीए) के रिकॉर्ड के अनुसार, कंपनी का दर्जा 2009 में रद्द कर दिया गया था, जिसका अर्थ है कि इसने उसी वर्ष किसी समय परिचालन बंद कर दिया था।

आरओसी दस्तावेजों के अनुसार, उस वर्ष फर्म का कारोबार और कुल व्यय दोनों शून्य थे। छिंदवाड़ा के पुलिस अधीक्षक अजय पांडे ने कहा, “जब हमने (श्रीसन फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरर के) निदेशकों के बारे में पता लगाने की कोशिश की, तो हमने पाया कि वे एक ऐसी कंपनी का भी हिस्सा थे जो 2009 से बंद है। उनसे पूछताछ के बाद हमें और जानकारी मिलेगी।”

जाँच दल को श्रीसन फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरर में कोल्ड्रिफ सिरप 60 एमएल के 570 बॉटल मिले हैं जो छिंदवाड़ा भेजने के लिए तैयार की गई थी। इसी बैच नंबर के सिरप पीने से मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा, बैतूल, नागपुर और पांढुणों में 19 बच्चों की मौत हुई है।

CJI गवई पर जूता फेंके जाने को लेकर वामपंथी और कॉन्ग्रेसी बहा रहे ‘घड़ियाली आँसू’, जज लोया केस में उन पर नहीं था भरोसा: जानें क्या है पूरा मामला

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई पर सोमवार (6 अक्टूबर 2025) को एक मामले की सुनवाई के दौरान जूता फेंकने की कोशिश की गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना उस समय हुई जब CJI गवई की अध्यक्षता वाली बेंच में कुछ मामलों की सुनवाई चल रही थी।

इस दौरान 71 वर्षीय अधिवक्ता राकेश किशोर अचानक न्यायाधीशों के मंच के पास पहुँचे, अपना जूता उतारा और उसे CJI की ओर फेंकने का प्रयास किया। हालाँकि, मौके पर मौजूद सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें तुरंत रोक लिया और अदालत से बाहर ले गए।

बताया जा रहा है कि इस दौरान अधिवक्ता ने चिल्लाकर कहा, “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे।” इसके बाद उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने उन पर कोई मामला दर्ज कराने से इनकार कर दिया जिसके बाद पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया।

बाद में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अधिवक्ता राकेश किशोर का वकालत लाइसेंस निलंबित कर दिया। घटना के बावजूद सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही प्रभावित नहीं हुई। CJI ने अदालत में मौजूद वकीलों से कहा कि वे सुनवाई जारी रखें।

CJI गवई की ‘हिंदू विरोधी टिप्पणी’ से परेशान था वकील

जूता फेंकने की कोशिश करने वाले वकील राकेश किशोर ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वे CJI गवई की ‘हिंदू विरोधी टिप्पणी’ से बेहद परेशान थे। उनका कहना था कि चीफ जस्टिस ने पिछले महीने एक मामले की सुनवाई के दौरान भगवान विष्णु के एक भक्त की आस्था का मजाक उड़ाया था। इसी बात ने उन्हें अंदर तक चोट पहुँचाई।

यह मामला मध्य प्रदेश के खजुराहो स्थित जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति की पुनरुद्धार से जुड़ा था। उस याचिका की सुनवाई के दौरान CJI गवई ने याचिकाकर्ता से तंज भरे लहजे में कहा था, “यह तो पब्लिसिटी के लिए दायर याचिका लगती है। आप खुद भगवान से जाकर कहिए कि वे कुछ करें। आप कहते हैं कि आप भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हैं, तो जाकर प्रार्थना कीजिए।”

कानूनी तौर पर यह याचिका तकनीकी कारणों से खारिज की जा सकती थी लेकिन CJI गवई की इस व्यंग्यात्मक टिप्पणी को लेकर काफी आलोचना हुई। इसमें आस्था का मजाक उड़ा गया और कई लोगों ने इसे पूरी तरह अनावश्यक और असंवेदनशील बताया।

कॉन्ग्रेस और वामपंथी-लिबरल गैंग ने CJI की जाति को बनाया मुद्दा

हालाँकि, CJI पर हिंदू विरोधी टिप्पणी को लेकर जूता फेंकने का प्रयास किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता लेकिन कॉन्ग्रेस और वामपंथी-लिबरल समूह ने इस मौके का इस्तेमाल अपने राजनीतिक नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए किया। उन्होंने पूरे मामले को CJI गवई की जाति से जोड़ दिया।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने घटना की निंदा करते हुए कहा कि यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि जातिगत पूर्वाग्रह और मनुवादी सोच अब भी समाज में बनी हुई है। वहीं, ब्राह्मण विरोधी रुख के लिए जानी जाने वाली वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह भी इस बहस में शामिल हो गईं और उन्होंने भी इस घटना को CJI गवई की जाति से जोड़ने की कोशिश की। जयसिंह के अनुसार, यह घटना मुख्य न्यायाधीश की जाति के चलते की गई है और संस्थान के भीतर से उन्हें अलग-थलग करने की कोशिश है।

कई लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि CJI की जाति का उस व्यक्ति की हरकत से क्या संबंध है, जिसने हिंदू विरोधी टिप्पणी से आहत होकर जूता फेंकने की कोशिश की थी। लेकिन कॉन्ग्रेस और वामपंथी नैरेटिव में यह पूरी तरह फिट बैठता है। उनके लिए न तो यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया है और न ही कोई वास्तविक जातिगत भेदभाव। उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण हमेशा उनका नैरेटिव ही होता है बाकी सब कुछ उसके बाद आता है।

जज लोया केस में वामपंथी-लिबरल गैंग ने CJI गवई के बयानों को किया खारिज

जब 2014 में सीबीआई जज बीएच लोया की मौत हुई थी तब CJI गवई या उनके बयान का वामपंथी-लिबरल समूह पर कोई असर नहीं पड़ा था। CJI गवई ने 2017 में NDTV से बातचीत के दौरान जज लोया की मौत को लेकर फैलाई जा रही सभी साजिशी बातों को सिरे से खारिज किया था।

उस समय वह बॉम्बे हाईकोर्ट में कार्यरत रहे थे। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जज लोया की मौत में कोई गड़बड़ी नहीं थी। गवई खुद उस अस्पताल में मौजूद थे जहाँ जज लोया को दिल का दौरा पड़ने के बाद भर्ती कराया गया था।

CJI गवई ने कहा था कि उन्होंने ICU में जज लोया का शव देखा जहाँ डॉक्टर उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की थी। उन्होंने यह भी बताया था कि जज लोया के कपड़ों पर कोई खून के निशान नहीं थे और उन्हें किसी तरह की संदिग्ध स्थिति नहीं दिखी।

इसके बावजूद कॉन्ग्रेस और वामपंथी-लिबरल समूहों ने उस समय CJI गवई के बयान को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने जज लोया की मौत को लेकर झूठी कहानियाँ फैलाते हुए बीजेपी को निशाना बनाना जारी रखा। इन अफवाहों और आरोपों के पीछे उनका मकसद सिर्फ यह था कि जज लोया उस समय सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें उस वक्त बीजेपी अध्यक्ष और वर्तमान में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य आरोपी थे।

इंदिरा जयसिंह और उनके गैंग ने जब न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश की

इंदिरा जयसिंह और उनके गैंग ने पहले भी न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश की थी। उस समय जस्टिस गवई बॉम्बे हाई कोर्ट में थे और अब वही भारत के चीफ जस्टिस हैं। जयसिंह का सर्वोच्च न्यायालय के प्रति सम्मान का इतिहास अच्छा नहीं रहा ह और अब जूता फेंकने की घटना को न्यायपालिका पर हमला बता रही हैं। लेकिन पहले वे खुद न्यायपालिका को बदनाम करने वाले गिरोह का हिस्सा थीं।

कॉन्ग्रेस से जुड़ी मानी जाने वाली इंदिरा जयसिंह उस लॉबी का हिस्सा थीं जिसने जज लोया की मौत को लेकर झूठ फैलाया। उस लॉबी ने यह आरोप लगाने की कोशिश की थी कि अमित शाह और बीजेपी का इसमें हाथ था। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में कहा था कि जज लोया की मौत प्राकृतिक थी और इसमें किसी तरह की साजिश नहीं थी।

इंदिरा जयसिंह के साथ वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे और प्रशांत भूषण भी इस अभियान में शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों को अदालत की गरिमा को ठेस पहुँचाने और न्याय की प्रक्रिया में रुकावट डालने की कोशिश के लिए फटकार लगाई थी।

उस समय चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.एम. खानविलकर और जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा था कि इन वरिष्ठ वकीलों की याचिकाएँ न्यायाधीशों की छवि को नुकसान पहुँचाने और पूर्वाग्रह फैलाने की कोशिश हैं, खासकर बॉम्बे हाई कोर्ट के जज बी.आर. गवई के खिलाफ।

विडंबना यह है कि वही इंदिरा जयसिंह जिन्होंने पहले जस्टिस गवई की प्रतिष्ठा पर हमला किया था। वो अब उनकी जाति और न्यायपालिका पर हमले की बात कर रही हैं। जब वे बॉम्बे हाई कोर्ट में थे तब उन पर सवाल उठाना उन्हें सही लगा लेकिन अब जब वे चीफ जस्टिस हैं तो वही बात जातिगत भेदभाव बताई जा रही है।

आज तक भी कुछ लोग जज लोया की मौत को लेकर झूठी कहानियाँ फैलाते रहते हैं। वे लगातार यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि इस मामले में केंद्र सरकार की कोई भूमिका थी और यह साबित करना चाहते हैं कि न्यायपालिका जैसी संस्था भी सरकार के प्रभाव में है। इन साजिशी दावों के लिए कभी कोई सबूत नहीं दिया जाता है। जज लोया से जुड़े वे सभी तथ्य और बयान जो वामपंथी नैरेटिव के खिलाफ जाते हैं। उन्हें जानबूझकर अनदेखा कर दिया जाता है।

उस समय वामपंथी सोच रखने वाले कई विचारकों ने यहाँ तक कहा था कि जज गवई वरिष्ठ न्यायाधीशों को दरकिनार कर चीफ जस्टिस बनेंगे क्योंकि उन्होंने जज लोया की मौत को लेकर किसी गड़बड़ी से इनकार किया था।

विडंबना यह है कि वही जज गवई, जिन्हें पहले ‘सरकारी आदमी’ या ‘सरकार के इशारों पर चलने वाला’ बताया गया था, अब वामपंथी-लिबरल वर्ग के ‘प्रिय’ बन गए हैं। ऐसा लगता है कि भगवान विष्णु से जुड़े मजाक के बाद ये समूह उन्हें अपने नए नैरेटिव में फिट मानने लगे हैं।

जूता फेंकने की घटना पर कॉन्ग्रेसी और वामपंथी-लिबरल समूह की प्रतिक्रिया ने उनकी दोहरी सोच और पाखंड को उजागर कर दिया है। ये लोग किसी सिद्धांत या सच्चाई के लिए नहीं बल्कि सिर्फ अपनी जहरीली और स्वार्थी विचारधारा के लिए खड़े रहते हैं। उनकी राजनीति देश में विभाजन फैलाने पर टिकी हुई है।

इनके लिए न CJI गवई में और न ही पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ में कोई अंतर है। चंद्रचूड़ जो कभी वामपंथी वर्ग के प्रिय थे राम मंदिर पर फैसला सुनाने के बाद उनके निशाने पर आ गए। इस समूह के लिए हर व्यक्ति तब तक उपयोगी है जब तक वह उनके राजनीतिक हितों की सेवा करता है। जैसे ही कोई उनके एजेंडे से बाहर चला जाता है, वह उनके लिए बेकार हो जाता है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़े सकते हैं।)