Wednesday, April 1, 2026
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अमेरिका ने अफगानिस्तान को बगराम एयरबेस के लिए धमकाया तो अटकी पाकिस्तान की साँसें, ट्रंप की दोस्ती और देश की दुर्दशा के बीच फँसा ‘आतंकिस्तान’

यह एयरबेस कभी अमेरिका के लिए मध्य पूर्व में सैन्य प्रभुत्व का प्रतीक था जो अब तालिबान शासन के अधीन है। ट्रंप के इस बयान पर तालिबान ने भी उन्हें आड़े हाथों लिया है।

जब से डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरी बार राष्ट्रपति का पद संभाला है वो बैचेन हैं। कभी टैरिफ को लेकर हाथ-पैर मार रहे हैं तो कभी पनामा नहर और ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात करते हैं। अब ट्रंप ने एक नई जिद पकड़ ली है। वो अफगानिस्तान का बगराम एयरबेस वापस लेना चाहते हैं।

इसके लिए वो धमकी तक पर उतर आए हैं। ट्रंप का कहना है कि अगर उन्हें यह एयरबेस वापस नहीं मिला तो इसका अंजाम बुरा होगा। ट्रंप ने इसके लिए सैन्य कार्रवाई के विकल्प को भी नहीं नकारा है।

ट्रंप ने बगराम पर फिर से नियंत्रण पाने की इच्छा के पीछे चीन को एक प्रमुख कारण बताया है। बगराम चीनी सीमा से लगभग 800 किमी दूर है और शिनजियांग में निकटतम चीनी मिसाइल कारखाने से लगभग 2,400 किमी दूर है। ट्रंप ने पिछले महीने कहा था कि यह अड्डा ‘उस जगह से एक घंटे की दूरी पर है जहाँ (चीन) अपने परमाणु हथियार बनाता है’।

यह एयरबेस कभी अमेरिका के लिए मध्य पूर्व में सैन्य प्रभुत्व का प्रतीक था जो अब तालिबान शासन के अधीन है। ट्रंप के इस बयान पर तालिबान ने भी उन्हें आड़े हाथों लिया है। तालिबान का कहना है कि वह इसे वापस नहीं लौटाएगा चाहे इसके लिए युद्ध ही क्यों ना लड़ना पड़े।

भारत भी इस मुद्दे पर तालिबान के साथ खड़ा नजर आ रहा है। मॉस्को में आयोजित ‘सातवें मॉस्को फॉर्मेट’ सम्मेलन में भारत ने तालिबानी विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी का औपचारिक स्वागत कर यह स्पष्ट कर दिया कि वह अमेरिका के इस रुख से सहमत नहीं है। हालाँकि, भारत ने सीधे तौर पर बगराम का नाम नहीं लिया है लेकिन उसका इशारा साफ है।

सिर्फ भारत ही नहीं ट्रंप की इस धमकी के बाद रूस से लेकर चीन और ईरान तक सबके कान खड़े हो गए हैं। ट्रंप का दोस्त पाकिस्तान भी उसकी इस चाल से भीतर ही भीतर घबराया हुआ है।

बगराम एयरबेस का इतिहास और अमेरिका की फिर कब्जे की कोशिश

अफगानिस्तान के राजा जहीर शाह के दौर में 1950 के दशक में इस एयरबेस का निर्माण हुआ था। इसका शुरुआती डिजाइन सोवियत इंजीनियरों ने बनाया था। 1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर आक्रमण के बाद यह उनका मुख्य सैन्य ठिकाना रहा था। 1989 में सोवियत सेना की वापसी के बाद यह खंडहर बन गया।

2001 में अमेरिका पर हमले के बाद जब उसने बदले की कार्रवाई शुरू की तो अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ सबसे बड़ा अमेरिकी ऑपरेशन यहीं से चला। इस एयरबेस को अमेरिका ने दुनिया का सबसे आधुनिक सैन्य ठिकाना बना दिया। यहाँ 10,000 से अधिक अमेरिकी सैनिक और भारी मात्रा में सैन्य साजो-सामान तैनात थे।

तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद अमेरिका भी यहाँ से निकल गया था। अब अफगानिस्तान में एक बार फिर आतंकियों की सक्रियता बढ़ने लगी है। अफगानिस्तान का सेंटर प्वाइंट कहा जाने वाले इस एयरबेस से अमेरिका आसानी से ईरान, पाकिस्तान, चीन, रूस के मध्य एशियाई इलाकों तक नजर रख सकता है।

ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान तक इसके दायरे में आते हैं। यही वजह है की अमेरिका इसे वापस लेना चाहता है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावे किए गए हैं कि अमेरिका ने इसे वापस किराए पर लेने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। वो किसी तीसरे देश के जरिए भी यहाँ की लॉजिस्टिक एक्सेस हासिल करने की कोशिश में है।

अमेरिका के आने से घबराहट में पाकिस्तान

बीते कुछ समय में अमेरिका और पाकिस्तान की दोस्ती गहरी हुई है। पाकिस्तान की फौज का मुखिया आसिम मुनीर से ट्रंप ने मुलाकात की है। ब्लूचिस्तान के रेयर अर्थ मिनरल देने के नाम पर पाकिस्तान अमेरिका को अपना मुल्क गिरवी रखने पर तुला है। अब अफगानिस्तान में अमेरिका की आने की खबर सुनकर उसके भी हाथ-पाँव फूलने लगे हैं। ‘मॉस्को फॉर्मेट कंसल्टेशंस’ की जिस बैठक में ट्रंप की योजना का विरोध किया गया है पाकिस्तान भी उसका हिस्सा था।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मौजूद आतंकवादी संगठन तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान (TTP) इन दिनों पाकिस्तान फौज के पीछे पड़ा है। बीते दिन (7 अक्टूबर 2025) भी TTP के 7 फौजी मार गिराए हैं। दरअसल, पाकिस्तान की अफगानिस्तान से सीमा को लेकर लंबी लड़ाई है। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद से दोनों देशों के बीच तनातनी है और दर्जनों हमले किए जा चुके हैं। दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की आड़ में एक अघोषित युद्ध लड़ रहे हैं।

इसके अलावा अमेरिका की अफगानिस्तान में वापसी के बाद पाकिस्तान पर इसका सीधा असर होने की संभावना है। दोनों के बीच करीब 2,600 किलोमीटर तक फैली हुई सीमा है और किसी भी सैन्य अभियान से सीमा पर दबाव तुरंत बढ़ जाएगा।

सीमावर्ती इलाकों में पहले भी बड़े युद्धों के दौरान लोग भागकर पाकिस्तान में आए थे या वहाँ हिंसा फैल गई थी। अगर फिर से अमेरिकी अपना अभियान शुरू करता है तो बड़े पैमाने पर विस्थापन, शरणार्थी संकट और प्रशासन पर दबाव पैदा हो सकता है। पाकिस्तान खुद भूखमरी की कगार पर है और ऐसे में लोगों के आने से अर्थव्यवस्था पर और बोझ आ पड़ेगा।

एक्सपर्ट मानते हैं कि अफगान युद्धों के ऐतिहासिक प्रभावों ने पाकिस्तान को आर्थिक और सामाजिक रूप से लंबा और गहरा नुकसान पहुँचाया है। सुरक्षा का बड़ा पहलू यह है कि जब बाहरी ताकतें किसी देश में सक्रिय हों तो आतंकी या चरमपंथी समूह अपने मौके की तलाश में रहते हैं। अफगानिस्तान अगर ऐसे समूहों की सक्रियता बढ़ी तो इसका असर भी पाकिस्तान पर दिखाई देगा।

पाकिस्तानी पत्रकार जाहिद हुसैन ने सितंबर 2025 में ‘डॉन’ में लिखे एक लेख में इसे लेकर अपनी चिंता भी जताई थी। जाहिद हुसैन ने लिखा, “अफगानिस्तान में किसी भी अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का पाकिस्तान पर सीधा असर पड़ेगा। अफगानिस्तान में महाशक्तियों के बीच हुए पिछले दो युद्धों में अग्रणी देश होने के नाते पाकिस्तान को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी और अब भी मुल्क इसके प्रभावों से जूझ रहा है।”

अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य अभियानों से पाकिस्तान पर आर्थिक असर पड़ने की भी संभावना है। विवाद के कारण अगर व्यापार रुकता है तो स्थानीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा इससे रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं और सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा।

पाकिस्तान के सामने अब ‘इधर कुआँ, उधर खाई’ वाली स्थिति है। पाकिस्तान अभी दबे-दबे ही अमेरिका का विरोध कर रहा है क्योंकि अगर वो खुलकर ट्रंप के खिलाफ जाता है तो उसकी US से पैसा कमाने की रणनीति फेल हो जाएगी। वहीं अगर वो अमेरिका का साथ देता है तो उसके घर में ही दिक्कतें खड़ी हो जाएगी।

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शिव
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