लोगों के मन में सवाल उठ रहे होंगे कि जब अमेरिका की पिछली सरकारें भारत के साथ संबंधों को बेहतर बनाने के लिए बड़ी से बड़ी छूट भारत को दे रहे थे, तब उसी अमेरिका को ऐसी क्या चिढ़ हो गई कि वो भारत में टैरिफ पर टैरिफ लगाने लगा। हालाँकि अब शायद इसका जवाब सामने आ चुका है, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिका ने भारत पर 50% का भारी-भरकम टैरिफ (आयात शुल्क) क्यों लगाया?
एक अमेरिकी निवेश बैंक जेफरीज की रिपोर्ट के मुताबिक, इसका कारण है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भारत-पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव को सुलझाने में मध्यस्थता करने का मौका नहीं मिला। यानी ट्रंप को इस बात का गुस्सा है कि भारत ने उन्हें इस मसले में दखल देने से मना कर दिया।
रिपोर्ट कहती है कि ये टैरिफ ट्रंप के निजी नाराजगी का नतीजा हैं। ट्रंप को लगता था कि वे मई में भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु ताकत वाले देशों के बीच हुए तनाव को खत्म करने में मदद कर सकते थे। लेकिन भारत ने साफ कह दिया कि वह इस मामले में किसी तीसरे देश की दखलअंदाजी नहीं चाहता। भारत का ये रुख हमेशा से रहा है कि वह पाकिस्तान के साथ अपने मसलों को खुद सुलझाएगा।
ट्रंप ने कई बार दावा किया है कि उन्होंने दुनिया भर के कई झगड़ों को खत्म किया, जिसमें भारत-पाकिस्तान का मुद्दा भी शामिल है। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने जुलाई में कहा था कि ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए।
ट्रंप ने अपनी सोशल मीडिया साइट ट्रुथ सोशल पर लिखा था, “मैं दोनों देशों के साथ मिलकर कश्मीर जैसे हजार साल पुराने मसले का हल निकाल सकता हूँ।” लेकिन भारत ने उनकी इस पेशकश को ठुकरा दिया, क्योंकि भारत किसी बाहरी देश को अपने मामलों में दखल देने की इजाजत नहीं देता।
इसके अलावा टैरिफ लगाने की एक और वजह भारत का कृषि क्षेत्र है। जेफरीज की रिपोर्ट कहती है कि भारत ने अपनी खेती को बचाने के लिए विदेशी आयात को अपने कृषि बाजार में आने से रोका है। भारत में करीब 25 करोड़ किसान और मजदूर खेती पर निर्भर हैं। देश की 40% आबादी खेती से अपनी रोजी-रोटी चलाती है। इसलिए भारत सरकार ने हमेशा अपने किसानों को प्राथमिकता दी है और विदेशी कृषि उत्पादों को बाजार में लाने से बचती रही है।
अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेन्ट ने हाल ही में कहा था कि भारत व्यापार समझौतों में थोड़ा जिद्दी रवैया अपनाता है। भारत ने इन टैरिफ को “अनुचित और गलत” बताया है। भारत का कहना है कि उसे इस तरह निशाना बनाना ठीक नहीं है।
जेफरीज की रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका भारत पर दबाव डालता रहा, तो भारत और चीन के बीच नजदीकियाँ बढ़ सकती हैं। दोनों देश सितंबर से पाँच साल बाद फिर से सीधी उड़ानें शुरू करने वाले हैं।
भारत ने भारी आर्थिक नुकसान के बावजूद अपनी नीति पर कायम रहते हुए किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को सिरे से नकार दिया। ये टैरिफ भारत के लिए चुनौती तो हैं, लेकिन भारत अपने स्टैंड पर अडिग है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड को लेकर बड़ा धमाका हुआ है। डेनमार्क ने अमेरिका पर सीधा आरोप लगाया है कि ट्रंप से जुड़े तीन अमेरिकियों ने ग्रीनलैंड में ‘रेजिम चेंज ऑपरेशन’ यानी सत्ता पलट की गुप्त साजिश रची।
डेनमार्क के पब्लिक ब्रॉडकास्टर DR की जानकरी के मुताबिक, इन तीन अमेरिकियों के CIA और ट्रंप प्रशासन से कनेक्शन हैं और इन्हें ग्रीनलैंड को डेनमार्क से अलग करवाने की योजना बनाते पकड़ा गया।
यही नहीं, इनमें से एक ने तो ‘ट्रंप समर्थक ग्रीनलैंडर्स’ की लिस्ट तक बना डाली और ट्रंप विरोधियों के नाम इकट्ठा किए, जबकि बाकी दो ने वहाँ के नेताओं, बिजनेसमैन और आम लोगों से नेटवर्क बनाने की कोशिश की।
डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोक्के रासमुसेन ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कोपेनहेगन में तैनात अमेरिका के शीर्ष राजनयिक को तलब किया और साफ कहा कि ‘ग्रीनलैंड के भविष्य में बाहरी दखल बर्दाश्त नहीं होगा।’ याद रहे, ट्रंप खुद कई बार ग्रीनलैंड को खरीदने या अपने कब्जे में लेने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अभी यह साफ नहीं है कि ये तीनों अमेरिकी अपने दम पर काम कर रहे थे या ट्रंप प्रशासन की सीधी मंज़ूरी से, लेकिन व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने तो बस इतना कहकर डेनमार्क को हल्का लेने की कोशिश की ‘डेनिश लोगों को शांत होना चाहिए।’
खुलासा यहीं खत्म नहीं होता। इसी साल वॉल स्ट्रीट जर्नल ने बताया था कि खुफिया एजेंसियों को ग्रीनलैंड की आजादी की चाह और वहाँ अमेरिकी संसाधनों पर कब्जे के रवैये की निगरानी का आदेश दिया गया था। यह निर्देश किसी और ने नहीं बल्कि अमेरिका की खुफिया प्रमुख टुलसी गैबार्ड के दफ्तर से जारी हुआ था। इसमें CIA, DIA और NSA सभी को शामिल किया गया था।
खनिज-समृद्ध और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ग्रीनलैंड
मार्च 2025 से लेकर अब तक ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप की दिलचस्पी लगातार सुर्खियों में है। इस साल मार्च में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे डी वेंस ग्रीनलैंड गए थे। उन्होंने वहाँ आर्कटिक सुरक्षा मुद्दों पर जानकारी ली और अमेरिकी सैनिकों से मुलाकात की। डेनमार्क सरकार और ग्रीनलैंडवासियों की नाराज़गी के बावजूद वेंस ने अमेरिकी संचालित पिटुफ़िक स्पेस बेस का दौरा किया।
ट्रंप का ग्रीनलैंड प्रेम नया नहीं है। पहले राष्ट्रपति कार्यकाल से ही वह ग्रीनलैंड पर कब्जा चाहते रहे हैं। दिसंबर 2024 में उन्होंने ट्रुथ सोशल पर साफ कहा था कि ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाना ‘एकदम जरूरी’ है। मार्च 2025 में उन्होंने कॉन्ग्रेस में भाषण देते हुए दोबारा यही दावा किया और इस हफ्ते मीडिया से भी कहा – ‘ग्रीनलैंड शायद हमारा भविष्य है।’
दरअसल, ग्रीनलैंड दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा द्वीप है और इसकी अहमियत आर्थिक, सामरिक और भू-राजनीतिक तीनों ही स्तर पर है। यह अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच स्थित है और यूरोप व उत्तरी अमेरिका को जोड़ने वाले अहम समुद्री और हवाई रास्तों पर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन से पिघलती बर्फ ने यहाँ विशाल खनिज संपदा, गैस और तेल तक पहुँच आसान कर दी है।
खासतौर पर दुर्लभ खनिज जैसे नियोडिमियम, डिसप्रोसियम और यूरेनियम जो हरित तकनीक और रक्षा उद्योग के लिए बेहद जरूरी हैं। इसके अलावा ग्रीनलैंड की लोकेशन अमेरिका के लिए मिसाइल डिफेंस, स्पेस सर्विलांस और आर्कटिक-नॉर्थ अटलांटिक में नेवल गतिविधियों की निगरानी के लिहाज से भी रणनीतिक महत्व रखती है। यह क्षेत्र GIUK Gap (ग्रीनलैंड-आइसलैंड-यूके) का हिस्सा है, जो ट्रांस-अटलांटिक रूट्स के लिए अहम है।
ट्रंप का मकसद साफ है, ग्रीनलैंड पर नियंत्रण से अमेरिका को आर्कटिक शिपिंग रूट्स पर दबदबा मिलेगा, रूस-चीन-उत्तर कोरिया की गतिविधियों पर नजर रख सकेगा और साथ ही चीन पर दुर्लभ खनिजों की सप्लाई को लेकर निर्भरता कम होगी।
प्राकृतिक संसाधनों की लालच में लार टपकाते पहुँच जाता है CIA
अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA पर दशकों से दुनिया भर में सत्ता परिवर्तन (Regime Change) की साजिश रचने और सरकारें गिराने के आरोप लगते रहे हैं। इसकी रणनीति हमेशा यही रही है कि जिस सरकार से अमेरिकी हितों को खतरा हो, उसके खिलाफ माहौल बनाया जाए, चाहे विरोधी आंदोलनों को हवा देना हो, अलगाववाद और हिंसा भड़कानी हो, चुनाव में हस्तक्षेप करना हो, या फिर सीधे तख्तापलट और गुप्त सैन्य कार्रवाई करनी हो।
Cold War के दौर से ही यह CIA की विदेश नीति का अहम हिस्सा रहा है। 1953 में ईरान में ऑपरेशन AJAX के तहत प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को हटाया गया, क्योंकि उन्होंने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया था।
1954 में ग्वाटेमाला में ऑपरेशन PBSuccess के जरिए राष्ट्रपति जाकोबो आर्बेन्ज को गिरा दिया गया, क्योंकि उनकी जमीन सुधार नीतियों से अमेरिकी कंपनियाँ परेशान थीं। 1957-58 में इंडोनेशिया में राष्ट्रपति सुकर्णो की सरकार को अस्थिर करने के लिए CIA ने विद्रोहियों को समर्थन दिया, लेकिन ऑपरेशन फेल हुआ और अमेरिका की पोल खुल गई।
1961 में क्यूबा में फिदेल कास्त्रो को हटाने के लिए Bay of Pigs आक्रमण कराया गया, लेकिन यह भी नाकाम रहा। 1963 में वियतनाम में अमेरिकी समर्थन से राष्ट्रपति Ngô Đình Diệm के खिलाफ तख्तापलट हुआ और उनकी हत्या कर दी गई।
1973 में चिली के राष्ट्रपति साल्वाडोर अयेन्दे को हटाने के लिए CIA ने विपक्ष और सेना को समर्थन दिया, जिससे तानाशाह पिनोशे सत्ता में आया। 1979-1989 के बीच CIA ने ऑपरेशन Cyclone चलाकर अफगानिस्तान में सोवियत समर्थित सरकार के खिलाफ अरबों डॉलर से मुजाहिदीन आतंकियों को फंड किया, जिसके नतीजे में तालिबान पैदा हुआ।
समय के साथ CIA ने अपनी रणनीति बदली और खुली बगावत या सीधा तख्तापलट करने के बजाय ‘सॉफ्ट पावर’ के जरिए सरकारें गिराने का खेल शुरू किया। बिल क्लिंटन के दौर में NGO और मीडिया नेटवर्क को हथियार बनाया गया।
जॉर्ज सोरोस और उनकी संस्थाओं फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी, USAID, ओमिद्यार नेटवर्क आदि के जरिए देशों में अस्थिरता फैलाई गई। भारत में भी ऐसी कोशिशें हुईं लेकिन मोदी सरकार ने इन्हें नाकाम कर दिया।
तकनीकी मोर्चे पर भी CIA सक्रिय रही 2010 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को Stuxnet वायरस से निशाना बनाया गया। सीरिया गृहयुद्ध में बशर अल-असद के खिलाफ विद्रोहियों को फंड और ट्रेनिंग दी गई और ट्रंप ने भी CIA को असद को हटाने का आदेश दिया।
2024 में असद की सरकार गिरी और अब वहाँ pro-US शराअ सत्ता में है। वेनेजुएला में भी 2020 में अमेरिकी प्राइवेट मिलिट्री और विपक्षी नेताओं की मदद से राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हटाने की कोशिश हुई, लेकिन वह पकड़ी गई।
लैटिन अमेरिका CIA का पसंदीदा निशाना रहा है। 1964 में ब्राजील के राष्ट्रपति जोआओ गौलार्ट को हटाया गया, क्योंकि उन्हें अमेरिकी हितों के खिलाफ माना जा रहा था। 2023 में फिर से ब्राजील में राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा को हटाने के लिए ‘Maidan-style uprising’ की कोशिश की गई, जिसमें बोल्सोनारो समर्थकों ने संसद और सुप्रीम कोर्ट पर हमला किया, लेकिन CIA का दांव उल्टा पड़ गया।
लूला अब BRICS देशों का खुला समर्थन कर रहे हैं और ट्रंप प्रशासन की नीतियों को चुनौती दे रहे हैं। 2024 में बांग्लादेश में छात्र आंदोलनों को भड़का कर प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया।
हसीना ने खुद अमेरिका पर आरोप लगाया था कि उसने उन्हें इसलिए हटवाया क्योंकि उन्होंने सेंट मार्टिन द्वीप पर अमेरिकी सैन्य अड्डा बनाने से इनकार कर दिया और बांग्लादेश की संप्रभुता पर समझौता नहीं किया।
अब बारी ग्रीनलैंड की है। प्राकृतिक संसाधनों, आर्कटिक समुद्री मार्गों और सामरिक महत्व की वजह से ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए बेहद अहम है। लेकिन यहाँ अभी तक कोई मज़बूत pro-US भावनाएँ नहीं हैं।
ट्रंप कई बार ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की इच्छा जता चुके हैं और रूस-चीन की आर्कटिक में बढ़ती मौजूदगी को देखते हुए यह आशंका गहरी हो गई है कि CIA ग्रीनलैंड में भी सत्ता परिवर्तन की साजिश रच रही है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)
असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा को लेकर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के चीफ मौलाना अरशद मदनी ने विवादित टिप्पणी की। मौलाना मदनी ने दावा किया कि उन्होंने कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी को पत्र लिखकर हिमंता बिस्वा सरमा को कॉन्ग्रेस से चुनाव टिकट ना देने की माँग की थी। मदनी ने कहा कि सरमा RSS की मानसिकता से प्रभावित हैं और अब असम में आग लगा रहे हैं।
अरशद मदानी ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, “मैंने सोनिया गाँधी को पत्र लिखा था कि कॉन्ग्रेस से हिमंता बिस्वा सरमा को टिकट न दें क्योंकि उनमें RSS की मानसिकता है। अब वही हिमंता बिस्वा सरमा पूरे असम को आग में झोंक रहे हैं।”
मदनी के बयान पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और भाजपा नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने मदनी के दावों पर करारा जवाब देते हुए कहा, “मौलाना मदनी ने खुद माना है कि असम में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार के चयन में उनकी भूमिका थी। जब मैं कॉन्ग्रेस में था तब यही मौलाना शिक्षक भर्ती में मुझ पर दबाव बनाने की कोशिश करते थे। बीजेपी सरकार ने आते ही उनकी यह ‘दुकान’ ताला लगाकर बंद कर दी।।”
मौलाना मदानी ने स्वयं स्वीकार किया है कि असम में कांग्रेस प्रत्याशी के चयन में उनकी भूमिका रही है। जब मैं कांग्रेस में था, तब यही मौलाना शिक्षक भर्ती में मुझ पर दबाव डालने की कोशिश करते थे। भाजपा सरकार ने आते ही उनकी यह 'दुकान' ताला लगाकर बंद कर दी।। pic.twitter.com/owbZDh5T4N
मुख्यमंत्री हिमंता ने कहा, “मौलाना मदनी, सैयदा हमीद और हर्ष मंदर जैसे लोगों का एक ही उद्देश्य है। असम को एक कट्टर इस्लामवादी प्रदेश में बदलना। लेकिन भाजपा के रहते यह कभी संभव नहीं होगा।” सीएम ने आगे कहा, “बीजेपी लगातार असम की सत्ता पर काबिज है। असम में बीजेपी काफी मजबूत है। वो हमारे खिलाफ अब कुछ नहीं कर पाएँगे। भले ही वो लगातार कुछ न कुछ करने की कोशिश जरूर करते रहेंगे।
सीएम ने कहा, “हमारा अगला चरण NRC है। घुसपैठियों की बेदखली जारी रहेगी, इसके अलावा हमारे एजेंडे में और भी बहुत कुछ है। हम अपना काम जारी रखेंगे। हमारे पास मौलाना अरशद मदनी के जैसे विचारों वाले नेताओं के खिलाफ एक लंबा एजेंडा है। असम को कट्टरपंथी इस्लामी राज्य बनाने के विचार के खिलाफ काम करेंगे।”
मौलाना मदनी के बयान पर बीजेपी नेता अमित मालवीय ने भी गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने मदनी की टिप्पणी का वीडियो एक्स पर शेयर करते हुए कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा और कहा, “क्या अब मौलवी तय करेंगे कि कॉन्ग्रेस का टिकट किसे मिलेगा?”
“I wrote to Sonia Gandhi asking her not to give a ticket to Himanta Biswa Sarma from Congress, as he had an RSS mentality. Now he is setting Assam on fire…” — Arshad Madani, President of the Jamiat Ulama-e-Hind (A).
अमेरिका के मिनियापोलिस में चर्च और स्कूल में गोलीबारी कर एक 23 साल के ट्रांसजेंडर रॉबिन वेस्टमैन ने 2 बच्चों की जान ले ली। जाहिर है इसके खिलाफ अमेरिका और पूरी दुनिया को एकजुट हो जाना था। दुनिया हुई भी, इस घटना की सबने निंदा की, हमलावर पर सवाल उठाए। हमने खुद इसके खिलाफ वीडियो बनाई और उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर शेयर भी किया।
लेकिन, अमेरिका के ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक को एक ट्रांसजेंडर आतंकी की निंदा रास नहीं आई। फेसबुक ने ‘ऑपइंडिया’ के वीडियो को अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया। फेसबुक पर एक खास वोक विचारधारा से जुड़े होने के आरोप तो अक्सर लगते रहे हैं लेकिन बच्चे के हत्यारे के समर्थन में वीडियो को हटाना? यह वाकई हैरान करने वाली बात है।
फेसबुक ने इसे हटाने को लेकर तर्क दिया कि इसमें खतरनाक लोगों का महिमामंडन हो सकता है। फेसबुक ने हमें लिखा, “हमने आपके वीडियो को हटा दिया, इस वीडियो में, ऐसे लोगों और संगठनों से जुड़े प्रतीक चिह्न, उनका महिमामंडन या उनके लिए समर्थन से जुड़ी बातें मौजूद हो सकती हैं, जिन्हें हम खतरनाक मानते हैं।” इसे फेसबुक ने खतरनाक संगठन और लोगों से जुड़े कम्युनिटी स्टैंडर्ड के खिलाफ माना।
हमारा पूरा वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं। जाहिर है कि इस वीडियो में किसी खतरनाक संगठन या शख्स के महिमामंडन का कोई सवाल ही नहीं था। हमने सिर्फ वही बताया जो तथ्य थे। हमने बताया कि कैसे आंतकी ने अपनी रायफल पर भारत पर न्यूक्लियर हमले की बात लिखी थी। रॉबिन वेस्टमैन ने अपने हथियारों पर ‘माशाल्लाह’ और ‘न्यूक इंडिया’ लिखा था।
वेस्टमैन ने ‘इजरायल को खत्म करने’ और ‘द्वितीय विश्व युद्ध में 60 लाख यहूदियों के मारे जाने को कम बताने’ जैसी बातें लिखी थीं। इस आतंकी की बंदूक पर उस मोहम्मद अत्ता का नाम था जिसने अमेरिका में ही 9/11 का हमला किया था। हमने अपने वीडियो में इन सब बातों का जिक्र किया और उस कट्टरपंथी आतंकी की विचारधारा पर सवाल उठाए।
फेसबुक के दावे के मुताबिक, इसमें ना कहीं खतरनाक संगठनों का महिमामंडन था और ना किसी प्रतीक चिह्न का, उल्टा हमने तो हमलावर और उसकी विचारधारा पर सवाल ही उठाए थे। इसलिए हमें लगा कि शायद गलती से फेसबुक ने इसे हटा दिया हो, तो हमने इसे फेसबुक से रिव्यू करने का कहा।
फेसबुक ने इसका रिव्यू किया और हमारे इस वीडियो को रीस्टोर करने से इनकार कर दिया। फेसबुक ने हमें लिखा, “हमने आपके वीडियो का फिर से रिव्यू किया है। हमने कन्फर्म किया है कि यह खतरनाक संगठनों और लोगों से जुड़े हमारी कम्युनिटी स्टैंडर्ड के खिलाफ है। हम जानते हैं कि यह निराशजनक है लेकिन हम Facebook को सभी के लिए सुरक्षित और सुखद बनाए रखना चाहते हैं।”
फेसबुक पर सेसरशिप के आरोप तो वर्षों से लगते ही रहे हैं। खास विचारधारा को बढ़ावा देने के अनेक उदाहरणों सामने आए हैं, लोगों ने सवाल खड़े किए हैं। लेकिन, जो अमेरिकी बच्चों को मारे, जो अमेरिका के सबसे वीभत्स आतंकी हमले का समर्थक हो, उसके लिए वीडियो को हटा देना क्या संदेश देने की कोशिश है।
क्या खुद को ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का झंडाबरदार बताने वाले फेसबुक के लिए आतंकवादी और उसकी विचारधारा की आलोचना भी सहन करना नामुमकिन हो गया है। अगर फेसबुक आतंकियों की आलोचना करने वाले शब्दों को सहन नहीं कर सकता तो उसकी आजादी की बातें बस पाखंड नहीं तो क्या हैं?
ऑपइंडिया के साथ यह पहली बार हुआ है, ऐसा भी नहीं है। राष्ट्रवाद, हिंदू हित और इस्लामिक कट्टरपंथ की बात करने को लेकर कई बार हमें फेसबुक का निशाना बनना पड़ा है। सितंबर 2024 में हमने Wikipedia के वामपंथी पूर्वाग्रह को लेकर रिपोर्ट बनाई तो फेसबुक ने उसे ब्लॉक कर दिया। जब हमने अपने फेसबुक पेज पर लिंक साझा करने की कोशिश की, तो लिंक हटा दिया गया और हमें एक चेतावनी दी गई।
फेसबुक अगर चाहता है कि दुनिया वामपंथी विचारधारा की भोंपू बन जाए, हर कोई उसके विचार से ही चल तो ऐसा होने से रहा। वर्षों से फेसबुक को हिंदू विरोधी और राष्ट्रवादी विचारों को कुचलने का औजार बना दिया गया है। कभी पोस्ट हटा दिए जाते हैं, कभी अकाउंट सस्पेंड किए जाते हैं तो कभी रीच घटा दी जाती है।
इन सबसे आगे बढ़कर अब जब फेसबुक जैसे मंच आतंकवादियों की आलोचना तक नहीं सह पा रहे हैं, तो यह सवाल उठना चाहिए कि हमें असली खतरा किससे है? क्या फेसबुक और मेटा सिर्फ वोकिज्म के ही भोंपू बनकर रह जाएँगे?
AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने RSS प्रमुख मोहन भागवत की भारतीय परिवारों से तीन बच्चे पैदा करने के आह्वान पर उनकी नकारात्मक छवि पेश करने की कोशिश की। ओवैसी ने तुरंत ‘फेमिनिस्ट कार्ड’ निकाला और RSS प्रमुख के बयान को भारतीय महिलाओं पर इसे ‘बोझ’ करार दिया।
औवैसी ने कहा, “तुम कौन होते हो लोगों के पारिवारिक जीवन में दखल देने वाले? तुम भारतीय महिलाओं पर बोझ क्यों डाल रहे हो, जिनकी अपनी ज़िंदगी के हिसाब से अपनी अलग प्राथमिकताएँ हो सकती हैं?”
VIDEO | AIMIM Chief Asaduddin Owaisi (@asadowaisi) said, “Since its inception, the RSS has continuously spread the false notion that the growing Muslim population will overtake the Hindu population. The Total Fertility Rate (TFR) of Muslims has declined, and the rate of decline… pic.twitter.com/FzypjxovV6
दिलचस्प बात यह है कि ये वही असदुद्दीन ओवैसी हैं, जिन्होंने अपने पार्टी के सांसद इम्तियाज जलील के साथ साल 2023 में महिला आरक्षण विधेयक के खिलाफ वोट किया था। विधेयक के खिलाफ वोट करने वाले सिर्फ AIMIM के ये दो सांसद ही थे। इस बिल के तहत लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को एक तिहाई सीट आरक्षित की जाती है।
लेकिन असल में असदुद्दीन ओवैसी इस बात से हैरान थे कि मोहन भागवत ने भारतीय परिवारों को तीन बच्चे पैदा करने की सलाह दी है। उन्होंने आरोप लगाया, “BJP और RSS, दोनों ही इस देश के युवाओं को रोजगार देने में नाकाम रहे हैं। आप इस बारे में बात नहीं कर रहे हैं। और अब आप कह रहे हैं, ठीक है, तीन बच्चे पैदा करो।”
For Mohan, it is Annual Day of Dog Whistles & Hate Speech. Fear-mongering over “population imbalance” has resulted in genocide, ethnic cleansing & hate crimes across the world. Kosovo was created after a genocide of Albanian Muslims by Serbian nationalists. 1/2 https://t.co/XGrAr4jkph
यही असदुद्दीन ओवैसी अक्टूबर 2022 में लोगों को ज़्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। उन्होंने ‘जनसंख्या नियंत्रण’ के विचार को खारिज करते हुए दावा किया था कि हमने प्रतिस्थापन दर हासिल कर ली है।
उन्होंने दावा किया था, “जनसंख्या नियंत्रण की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि हम पहले ही प्रतिस्थापन दर हासिल कर चुके हैं। चिंता की बात है, बढ़ती उम्रदराज आबादी और बेरोजगार युवा, जो बुज़ुर्गों का भरण-पोषण नहीं कर सकते।”
यह देखते हुए कि जैविक रूप से केवल महिलाएँ ही बच्चे पैदा कर सकती हैं, उसी ‘नारीवादी’ ओवैसी ने अपने ट्वीट के माध्यम से यह संकेत दिया कि महिलाओं को अधिक बच्चे पैदा करने चाहिए, क्योंकि जनसंख्या नियंत्रण की कोई आवश्यकता नहीं है।
We should not repeat the mistakes of China. I will not support any law that mandates 2 children only policy as it would not benefit the country. India's Total Fertility Rate is declining, by 2030 it will stabilize: AIMIM chief, Asaduddin Owaisi on population issue pic.twitter.com/b9EJ1V26zX
औवैसी ने जनसंख्या नियंत्रण विधेयक का पुरजोर तरीके से विरोध किया था। जून 2022 में AIMIM नेता ने घोषणा की थी, “मैं ऐसे किसी भी कानून का समर्थन नहीं करूँगा जो केवल दो बच्चों की नीति को अनिवार्य बनाता हो क्योंकि इससे देश को कोई फायदा नहीं होगा।”
AIDUF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल जैसे बाकी मुस्लिम नेताओं ने तो साल 2019 में यह भी घोषणा कर दी थी कि ‘मुसलमान बच्चे पैदा करते रहेंगे और किसी की नहीं सुनेंगे।’
लेकिन संयोगवश, असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी ने इस बयान को ‘महिला-विरोधी’ कहकर आपत्ति नहीं जताई। उनकी चुनिंदा टिप्पणियों और गुस्सा अब एक ऐसे हिंदू नेता पर केंद्रित है जिसने ‘सभी’ को तीन बच्चे पैदा करने की सलाह दी थी।
क्या था RSS प्रमुख मोहन भागवत का ‘तीन बच्चों’ वाला बयान?
गुरुवार (28 अगस्त 2025) को RSS के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को मोहन भागवत ने संबोधित किया। इस दौरान RSS प्रमुख ने जनसंख्या नियंत्रण की समस्या पर भी चर्चा की। RSS प्रमुख ने कहा कि भारत की जनसंख्या नीति के अनुसार हर परिवार में तीन बच्चे होने चाहिए।
#WATCH | RSS chief Mohan Bhagwat says, "India's policy on population suggests 2.1 children, which means three children in a family. Every citizen should see that there should be three children in his/her family…" pic.twitter.com/1GR2Gv3oWl
मोहन भागवत ने जोर देकर कहा, “मैं यह बात राष्ट्र के दृष्टिकोण से कह रहा हूँ। जनसंख्या एक परिसंपत्ति होने के साथ-साथ एक चिंता का विषय भी हो सकती है क्योंकि हमें इन बच्चों का पेट भी भरना है। इसीलिए जनसंख्या नीति लागू है। इसका उद्देश्य जनसंख्या को नियंत्रण में रखने के साथ-साथ पर्याप्त भी रखना है।”
उन्होंने यह भी कहा, “हमें तीन बच्चों से आगे नहीं बढ़ना चाहिए। क्योंकि फिर उन्हें ठीक से पालना मुश्किल हो सकता है। यह बात सभी को स्वीकार करनी चाहिए। हाँ, यह सच है कि प्रजनन दर घट रही है। हिंदुओं में प्रजनन दर कम थी जो अब और कम हो गई है। अन्य समूहों में प्रजनन दर ज़्यादा थी इसलिए उनकी गिरावट बहुत ज़्यादा दिख रही है।”
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 2 दिवसीय जापान यात्रा ने दोनों देशों के बीच आर्थिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है। यह यात्रा न केवल द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण रही, बल्कि अगले दशक के लिए भारत-जापान संबंधों की रूपरेखा तैयार करने में भी अहम साबित हुई। दोनों देशों के नेताओं ने आर्थिक सहयोग, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, स्वच्छ ऊर्जा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए।
यात्रा से जुड़ी अहम बातें
प्रधानमंत्री मोदी का जापान में भव्य स्वागत हुआ। जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा ने उन्हें औपचारिक रूप से स्वागत किया और प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के बाद उनके सम्मान में रात्रिभोज का आयोजन किया।
अगले दिन (30 अगस्त 2025) दोनों नेता टोक्यो से सेंडाई तक विश्व प्रसिद्ध शिंकनसन बुलेट ट्रेन में एक साथ यात्रा की। इस दौरान उन्होंने एक साथ भोजन किया और टोक्यो इलेक्ट्रॉनिक्स फैक्ट्री का दौरा किया। जापानी प्रधानमंत्री ने दो दिनों तक प्रधानमंत्री मोदी के साथ समय बिताया, जो दोनों देशों के बीच गहरे रिश्तों का प्रतीक है।
आर्थिक सहयोग और निवेश
यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण जापान का अगले दस वर्षों में भारत में 10 ट्रिलियन येन (लगभग 6.5 लाख करोड़ रुपये) के निजी निवेश का वादा रहा। यह निवेश भारत की आर्थिक वृद्धि को गति देगा और सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा, दूरसंचार, फार्मास्यूटिकल्स और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करेगा।
इसके अलावा दोनों देशों ने ‘भारत-जापान संयुक्त दृष्टिकोण’ नामक एक रोडमैप तैयार किया, जो आर्थिक विकास, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, पर्यावरण और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा देगा।
यात्रा के दौरान कई समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें शामिल हैं-
सुरक्षा सहयोग: समकालीन सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए रक्षा और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की योजना।
मानव संसाधन आदान-प्रदान: अगले पाँच वर्षों में 5 लाख लोगों, खासकर 50,000 भारतीय कुशल और अर्ध-कुशल कर्मियों को जापान भेजने की कार्य योजना।
डिजिटल साझेदारी 2.0: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में सहयोग।
स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण: कार्बन-मुक्त प्रौद्योगिकियों, हाइड्रोजन, अमोनिया और अपशिष्ट जल प्रबंधन पर सहयोग।
अंतरिक्ष में सहयोग: चंद्रयान-5 मिशन के लिए इसरो और जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी के बीच सहयोग।
सांस्कृतिक आदान-प्रदान: कला, संस्कृति और संग्रहालय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए समझौता।
द्विपक्षीय समर्थन और राज्य-स्तरीय सहयोग
इस यात्रा की एक खास बात भारत-जापान संबंधों में द्विपक्षीय समर्थन रही। प्रधानमंत्री मोदी ने जापान के दो पूर्व प्रधानमंत्रियों, योशिहिदे सुगा और फुमियो किशिदा से मुलाकात की। इसके अलावा, उन्होंने जापानी संसद के स्पीकर और कई सांसदों से भी बातचीत की। जापान के 16 प्रांतों के गवर्नरों ने टोक्यो में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की, जो भारत के मुख्यमंत्रियों के समकक्ष हैं। यह राज्य-स्तरीय सहयोग दोनों देशों के बीच संबंधों को और गहरा करने का एक अनूठा उदाहरण है।
अन्य उल्लेखनीय परिणाम
भारत-जापान AI पहल: विश्वसनीय AI इकोसिस्टम के लिए सहयोग।
नेक्स्ट-जनरल मोबिलिटी पार्टनरशिप: रेलवे, विमानन और शिपिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग।
लघु और मध्यम उद्यम मंच: भारतीय और जापानी SMEs के बीच सहयोग को बढ़ावा।
टिकाऊ ईंधन पहल: बायोगैस और जैव ईंधन पर अनुसंधान।
प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा ने दोनों देशों के बीच विशेष रणनीतिक साझेदारी को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। यह यात्रा न केवल आर्थिक और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देगी, बल्कि सांस्कृतिक और लोगों के बीच संपर्क को भी मजबूत करेगी। यह भारत और जापान के साझा दृष्टिकोण का प्रतीक है, जो एक समृद्ध, सुरक्षित और टिकाऊ भविष्य की ओर बढ़ रहा है।
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल शकील अहमद ने 11 वर्ष की हिंदू लड़की के साथ नीच हरकतें की हैं। शकील अपने स्कूल की 7वीं कक्षा में पढ़ने वाली इस बच्ची पर निकाह करने का दबाव बनाने लगा था। उसके प्राइवेट पार्ट्स से छेड़छाड़ करता था और बच्ची विरोध करती, तो उसे फेल करने की धमकी देता था।
यह मामला अलीगढ के जवां ब्लाक के तालिबनगर स्थित प्राथमिक जूनियर हाईस्कूल का है। इसी स्कूल का प्रधानाचार्य शकील अहमद अपनी छात्राओं पर हैवानियत भरी नजरें रखता है, जिसे अब पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।
क्या है पूरा मामला?
बीते 23 अगस्त की शाम बच्ची स्कूल से उदास और परेशान हालत में अपने घर लौटी। माँ ने सहमी हुई बच्ची के पास जाकर उससे हालचाल पूछा तो वह टूट गई और रोते हुए अपनी आपबीती सुनाने लगी। उसने जो बताया उसे सुनकर माँ के पैरों तले जमीन खिसक गई।
ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR की कॉपी के अनुसार, बच्ची ने अपनी माँ से कहा, “स्कूल का प्रधानाचार्य शकील अहमद मुझे बुरी नीयत से पकड़ता है और मेरे प्राइवेट पार्ट्स को छूता है। वह मेरे प्राइवेट पार्ट्स में उंगली भी करता है। जब मैं उसका विरोध करती हूँ, तो वह मुझे डराता है और कहता है कि अगर मैंने किसी को कुछ बताया तो वह मुझे परीक्षा में फेल कर देगा।”
बच्ची ने आगे बताया कि अधेड़ उम्र का शकील अहमद उसे अपने जाल में फँसाने के लिए मीठी-मीठी बातें करता था। FIR में दर्ज है कि बच्ची ने रोते-रोते अपनी माँ से कहा, “प्रधानाचार्य कहता है कि वह मुझसे बहुत प्यार करता है और मुझसे निकाह करना चाहता है।” बच्ची की माँ ने स्थानीय पुलिस स्टेशन में जाकर शकील अहमद के खिलाफ FIR दर्ज कराई है।
पीड़िता की माँ ने इस मामले में जिलाधिकारी और एसएसपी के पास भी शिकायत दी है। साथ ही, इस घटना से गुस्साए ग्रामीणों ने भी थाने पर जाकर हंगामा किया है।
पीड़िता की माँ द्वारा दर्ज कराई गई FIR का हिस्सा
पुलिस ने आरोपित को किया गिरफ्तार
पुलिस ने FIR दर्ज करने के बाद आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस का कहना है कि आरोपित के खिलाफ पॉक्सो ऐक्ट की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। एसपी अमृत जैन का कहना है कि आरोपी शकील को देर रात गिरफ्तार किया गया है।
आरोपित शकील को किया गया सस्पेंड
बच्ची की माँ ने पुलिस के अलावा बीएसए से भी इस मामले की शिकायत की थी। जिसके बाद जवां के ब्लाक शिक्षा अधिकारी ने इस मामले की जाँच की।
बीएसए डॉ. राकेश कुमार सिंह ने जाँच में दोषी मिलने के बाद शकील को निलंबित कर दिया है। राकेश कुमार ने कहा कि सस्पेंड करने के बाद आरोपित के खिलाफ विस्तृत जाँच की जा रही है और आरोपित को बर्खास्त करने की कार्रवाई भी शुरू की जाएगी।
अधेड़ उम्र के हवस से भरे शकील जैसे दरिंदगों की यह सोच समाज के सामने सबसे बड़ा कलंक है। इंसानी शक्ल में छिपे शकील जैसे भेड़िए को सबसे क्रूर दंड दिए जाने की जरूरत है। ऐसे लोगों की यह सोच कहाँ से आती है, इसको भी देखने की आवश्यकता है और इसे जड़े से नष्ट किए जाने की जरूरत है।
संभल हिंसा की जाँच के लिए बनाई गई न्यायिक समिति की रिपोर्ट में चौंकाने वाले मामले सामने आए हैं। रिपोर्ट में संभल के हिंदू परिवारों का बड़े स्तर पर पलायन का जिक्र है। रिपोर्ट में लव जिहाद की बात भी सामने आई हैं। बताया गया कि मुस्लिम युवकों ने हिंदू लड़कियों ने इस्लाम कबूलने के लिए ब्रेनवॉश किया।
450 पन्नों की रिपोर्ट में गजवा-ए-हिंद, आतंकी मॉड्यूल और हिंदूओं की घटती आबादी के बारे में चिंता जताई गई है। संभल हिंसा की जाँच पर बनी इस रिपोर्ट को उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने बनाने के आदेश दिए थे, जिसमें संभल में हिंदू पर अत्याचार को लेकर अहम खुलासे हुए हैं।
मुस्लिम युवक से निकाह के बाद छोड़ा हिंदू धर्म
न्यायिक जाँच समिति की इस रिपोर्ट में संभल के उस परिवार के भी बयान हैं, जिन्होंने अपनी बेटी को लव जिहाद का शिकार होने के बाद खो दिया था। पीड़ित पिता ने समिति को बताया कि साल 2013 में संभल के दीपा सराय निवासी मोहम्मद हम्माद (तुर्क) से निकाह के बाद छोटी बेटी में बदलाव देखा।
पिता ने कहा कि निकाह के एक साल बाद उनकी बेटी ने फोन कर रोते हुए कहा था, “मुझे बचा लो।” लेकिन डर और धमकियों के चलते परिवार उसकी कोई सहायता नहीं कर सका। निकाह के बाद बेटी का नाम बदलकर सिदरा रखा दिया गया।
उन्होंने कहा कि निकाह से पहले उनकी बेटी पहले सनातन धर्म के प्रति खास जुड़ाव रखती थी। वह मंदिर में भगवान की प्रतिमाओं के लिए पोशाक बनाती, व्रत-उपवाह रखती और काफी धार्मिक गतिविधियों में लीन थी। लेकिन निकाह के बाद सब कुछ बदल गया।
पिता ने बताया कि आज सिदरा पूरी तरह मुस्लिम बन चुकी है। वह मदरसों में मजहबी भाषण देती है और उसकी तकरीरें अब मौलवियों से भी प्रभावशाली मानी जाती है।
गाजियाबाद की छात्रा के कमरे में मिली उर्दू किताबें
रिपोर्ट में यह कोई एकलौता मामला सामने नहीं आया है। गाजियाबाद में रहकर MBA की पढ़ाई कर रही एक युवती के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। कॉलेज में उसका संपर्क मोहम्मद हम्माद (तुर्क) से हुआ। मुस्लिम युवक से मिलने के बाद से युवती का इस्लामी गतिविधियों में जुड़ाव बढ़ने लगा। युवती के कमरे से उर्दू की किताबें मिली।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट तक पहुँचा। फैसला मुस्लिम युवक के पक्ष में सुनाया गया। पक्ष में फैसला सुनाए जाने के बाद संभल में दावत-ए-वलीमा का आयोजन किया गया। युवती के परिजन ने बताया कि इसका उद्देश्य हिंदू परिवार को अपमानित करना था।
परिवार ने बताया कि जब भी हिंदू लड़की किसी मुस्लिम युवक से निकाह करती थी तो दावत-ए-वलीमा आयोजित किया जाता था। इससे हिंदू परिवारों को पलायन के लिए मजबूर किया जाता था।
संभल के युवकों को ब्रेनवॉश कर आतंकी संगठनों से जोड़ा
न्यायिक जाँच समिति की रिपोर्ट में कई खुलासे हुए हैं। यह भी सामने आया कि संभल में आतंकी संगठनों के मॉड्यूल पनपते गए। संभल के कुछ युवाओं को ब्रेनवॉश कर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के आतंकी संगठनों में भर्ती किया गया। इन युवाओं के नाम अमेरिका की शीर्ष आतंकियों की सूची में भी हैं।
उस वक्त पाकिस्तान खुफिया एजेंसी ISIS ने भी संभल में अपना नेटवर्क खड़ा करने में सफलता पाई। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन, तहरीक-ए-तालिबान, अल-कायदा, हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी उस वक्त संभल में काफी सक्रिय थे।
संभल में आजादी के बाद 15 दंगे, हिंदुओं का पलायन
गजवा-ए-हिंद के मंसूबे भी संभल में धड़ल्ले से आगे बढ़ते गए। इसके लिए सांप्रदायिक दंगे करवाए गए और हिंदू के धर्मस्थलों को निशाना बनाया गया। इस अपराध में प्रदेश की पूर्व सरकार के नेताओं का भी हाथ सामने आया, जिसपर सरकार ने चुप्पी साधी थी।
रिपोर्ट में आजादी के बाद संभल में 15 बड़े दंगों का जिक्र किया गया है, जिसमें इस्लामी कट्टरपंथियों को संरक्षण दी गई थी और हिंदुओं की ओर से मुकदमे तक दर्ज नहीं किए गए। इसमें CAA के विरोध में जबरन 6 दिन तक बाजार बंद करने का भी जिक्र किया गया है।
इन दंगों का उद्देश्य संभल में हिंदुओं को भगाना था और ऐसा हुआ भी। रिपोर्ट में संभल में हिंदुओ की घटती आबादी पर भी चिंता जताई गई। जब दंगाइयों के डर से मजबूरन हिंदुओं को पलायन करना पड़ा और हिंदू धर्मस्थलों पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने कब्जा कर लिया।
संभल हिंसा के बारे में
न्यायिक जाँच समिति की यह रिपोर्ट नवंबर 2024 में उत्तर प्रदेश के संभल में हुई हिंसा की है। जब कोर्ट ने इस मस्जिद के सर्वेक्षण का आदेश दिया तो इस्लामी कट्टरपंथ ने पूरे शहर में दंगे किए। दंगे में आगजनी की गई और लाठी-डंडे लेकर इस्लामी कट्टरपंथी हिंदुओं में दहशत फैलाने लगे। इस दौरान कई हिंदुओं के घर तोड़ दिए गए।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह को लेकर एक अहम फैसला देते हुए कहा कि रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के ना होने से कोई विवाह अमान्य नहीं हो जाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट ही शादी को साबित करने का इकलौता साक्ष्य नहीं है। हाई कोर्ट ने विवाह के पंजीकरण का सर्टिफिकेट माँगने वाले निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया है।
क्या है पूरा मामला?
सुनील दुबे और उनकी पत्नी मीनाक्षी ने अक्टूबर 2024 में हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13(बी) के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए आजमगढ़ की फैमिली कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी। इस कार्रवाई के दौरान फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों को आदेश दिया कि वे अपनी शादी का प्रमाणपत्र जमा करें।
इस पर पति ने एक आवेदन दिया कि उनके पास विवाह प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं है क्योंकि उनकी शादी रजिस्टर्ड नहीं है। उन्होंने दलील दी कि हिंदू विवाह अधिनियम में विवाह का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है और इसलिए उन्हें इस नियम से छूट दी जाए।
फैमिली कोर्ट ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह और तलाक नियमावली, 1956 के नियम 3(क) के अनुसार विवाह प्रमाणपत्र जरूरी है और इस फैसले के खिलाफ दुबे ने हाई कोर्ट का रुख किया था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा है कि रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के ना होने से कोई विवाह अमान्य नहीं हो जाता है। जस्टिस मनीष कुमार निगम की पीठ ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट्स के फैसलों से यह स्पष्ट है कि विवाह का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट केवल विवाह को साबित करने का एक सबूत है। अगर विवाह रजिस्टर्ड नहीं भी है, तो भी हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 8(5) के तहत वह विवाह अमान्य नहीं हो जाएगा।”
हालाँकि, हाई कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारों को विवाह पंजीकरण के लिए नियम बनाने का अधिकार है, इसमें हिंदू विवाह रजिस्टर बनाए रखने का प्रावधान भी शामिल है जिसमें विवाह से जुड़ी जानकारी दर्ज की जा सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह का पंजीकरण केवल विवाह का सुविधाजनक सबूत उपलब्ध कराने के लिए होता है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और 1956 के नियमों के नियम 3(क) को देखते हुए मेरा मानना है कि फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश द्वारा विवाह प्रमाणपत्र दाखिल करने पर जोर देना पूरी तरह अनावश्यक था…निचली अदालत का आदेश रद्द किया जाता है।”
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आजमगढ़ फैमिली कोर्ट को जल्द से जल्द इस मामले पर सुनवाई करने को कहा है। हाई कोर्ट ने कहा, “तलाक की याचिका 2024 से लंबित है इसलिए आजमगढ़ फैमिली कोर्ट के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश को निर्देश दिया जाता है कि वे इस मामले पर जल्द से जल्द सुनवाई और निर्णय करें। दोनों पक्षों को अपना पक्ष और सबूत पेश करने का पूरा मौका दिया जाए लेकिन अनावश्यक तारीखें किसी भी पक्ष को न दी जाए।”
हाई कोर्ट ने कहा, “हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 8(1) से 8(4) के तहत बनाए गए किसी भी नियम के बावजूद अगर विवाह का पंजीकरण रजिस्टर में दर्ज नहीं हुआ है तो भी विवाह की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ता। विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र दाखिल करने की आवश्यकता केवल उसी स्थिति में होती है जब विवाह धारा 8 के तहत रजिस्टर्ड हो।”
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने कॉन्ग्रेस के कथित ‘वोट चोरी’ आरोपों की पोल खोल दी है। सीएम ने कहा कि 1991 में ‘वोट फ्रॉड’ के चलते हार मिली थी। इसके साथ ही जो कॉन्ग्रेस बीजेपी और चुनाव आयोग पर फर्जी आरोप लगा रही है, सिद्दारमैया का यह बयान अब कॉन्ग्रेस पर सवाल खड़े कर रहा है।
बीजेपी ने भी सिद्दारमैया के बयान पर कॉन्ग्रेस को जमकर घेरा। बीजेपी के अमित मालवीय ने तंज कसते हुए लिखा, “जो सिद्दारमैया एक समय पर कॉन्ग्रेस की ‘वोट चोरी’ के खिलाफ लड़े थे, आज उसी पार्टी के मुख्यमंत्री हैं। साथ ही बिहार में कॉन्ग्रेस की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ रैली का समर्थन कर रहे हैं। ये कैसी विडंबना है।”
Watch: Karnataka CM Siddaramaiah himself admits he was a victim of “electoral fraud” by the Congress party in the 1991 Koppal Lok Sabha polls. He clearly says he was defeated “ಮೋಸದಿಂದ / Mōsadinda” (by cheating).
सिद्दारमैया का यह बयान कर्नाटक में एक कार्यक्रम में बोलते हुए सामने आया, जिसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस की पोल खोलते हुए खुद पर बीती ‘वोट चोरी’ का रोना रोया। उन्होंने कहा, “मैं 1991 में धोखे से हारा। मेरे वकील रविवर्मा कुमार ने मेरी मदद की थी।” उन्होंने खुद को कॉन्ग्रेस की ‘वोट चोरी’ का पीड़ित बताया। सीएम के इस बयान से कॉन्ग्रेस के ‘वोट चोरी’ हंगामे का फैक्टचेक हो गया है।
साल 1991 में सिद्दारमैया के साथ क्या धोखा हुआ?
कर्नाटक के सीएम सिद्दारमैया ने साल 1991 में हुए लोकसभा चुनाव का जिक्र किया। जब 34 साल पहले सिद्दारमैया ने जनता दल सेक्युलर (JDS) के टिकट पर कर्नाटक के कोप्पल से लोकसभा चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में सिद्दारमैया को कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार बसवराज पाटिल अनवारी के सामने हार मिली। चुनाव में अनवारी को 2.41 लाख वोट मिले और जीत का अंतर सिर्फ 11,200 वोटों का था।
सिद्दारमैया ने इसके खिलाफ कर्नाटक हाई कोर्ट में भी लड़ाई लड़ी। सिद्दारमैया ने हाई कोर्ट में वोटों की गिनती में धाँधली का दावा किया। उन्होंने आरोप लगाया था कि 22,423 वोटों को गलत तरीके से खारिज किया गया, जिनमें से ज्यादात उनके पक्ष में थे।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने यह भी आरोप लगाए कि अनवारी गैर-कानूनी ढंग से उम्मीदवार बना है क्योंकि लोकसभा स्पीकर ने अनवारी को पहले ही अयोग्य घोषित कर दिया था। आखिर में हाई कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था।
कर्नाटक मंत्री ने भी कॉन्ग्रेस के ‘वोट चोरी’ प्रोपेगेंडा के खिलाफ दिया था बयान
सीएम सिद्दारमैया से पहले कर्नाटक के मंत्री केएन राजन्ना भी कॉन्ग्रेस के ‘वोट चोरी’ वाले फर्जी दावे की पोल खोल चुके हैं। इसका फल उन्हें सरकार में अपना मंत्री पद गवाकर चुकाना पड़ा था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कॉन्ग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक सीएम सिद्दारमैया को कैबिनेट से बर्खास्त करने के आदेश दिए थे।
दरअसल, केएन राजन्ना ने राहुल गाँधी के फैलाए गए कर्नाटक में ‘वोट चोरी’ प्रोपेगेंडा के खिलाफ अपनी ही पार्टी को घेरा था। उन्होंने कहा था, “मतदाता सूची तब बनाई गई थी, जब कर्नाटक में हमारी पार्टी सत्ता में थी।”
क्या कर्नाटक सीएम को भी देना पड़ेगा इस्तीफा?
ऐसे में बीजेपी ने अब कॉन्ग्रेस से सवाल किया है कि क्या कर्नाटक सीएम सिद्दारमैया के बयान पर भी उनका हश्र केएन राजन्ना जैसे ही किया जाएगा। यानि क्या सीएम राजन्ना को भी उनके पद से इस्तीफा देना पड़ेगा। यह सवाल बीजेपी के अमित मालवीय ने एक्स पर की गई एक पोस्ट में किया।
“Defeated by fraud in 1991” — Karnataka CM Siddaramaiah himself fact-checks Rahul Gandhi’s so-called Vote Chori campaign.
Will he meet the same fate as senior minister KN Rajanna, who was sacked for speaking the truth?
अमित मालवीय ने लिखा, “कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने खुद राहुल गाँधी के तथाकथित ‘वोट चोरी’ अभियान की पोल खोल दी। क्या उनका भी वही हश्र होगा जो वरिष्ठ मंत्री केएन राजन्ना का हुआ था, जिन्हें सच बोलने के कारण बर्खास्त कर दिया गया था? एक बात तो साफ है: कांग्रेस के भीतर भी, राहुल गाँधी की अंतहीन हरकतों को कोई गंभीरता से नहीं लेता।”