गुजरात पुलिस ने एक बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया है। इसमें चार सीरियाई नागरिकों पर आरोप है कि उन्होंने गाजा पीड़ितों के नाम पर चंदा इकट्ठा किया और उस पैसे को अपनी आलीशान जिंदगी पर खर्च किया। पुलिस ने इनमें से दमिश्क के रहने वाले एक आरोपित अली मेघत अल-अजहर को अहमदाबाद के एलिसब्रिज इलाके के एक होटल से गिरफ्तार किया है। उसके पास से 3,600 अमेरिकी डॉलर और 25,000 रुपए नकद बरामद हुए हैं।
बाकी तीन आरोपित जकारिया हैथम अलजार, अहमद अलहबाश और यूसुफ अल-जहर फिलहाल फरार हैं। ये सभी उसी होटल में ठहरे हुए थे। पुलिस ने उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर दिए हैं ताकि वे भारत से भाग न सकें। संयुक्त पुलिस आयुक्त (क्राइम ब्राँच) शरद सिंघल ने बताया कि जाँच जारी है और बाकी आरोपितों की तलाश की जा रही है।
कोलकाता के रास्ते प्रवेश और संदिग्ध गतिविधियाँ
जाँच में सामने आया है कि यह चारों टूरिस्ट वीजा पर भारत आए थे। वे 22 जुलाई को कोलकाता उतरे और 2 अगस्त को अहमदाबाद पहुँच गए। यहाँ आरोपित ने मस्जिदों में जाकर गाजा में भूखे परिवारों के वीडियो दिखाकर चंदा इकट्ठा किया।
पुलिस को अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है कि यह पैसा गाजा भेजा गया हो। पीटीआई से बातचीत में शरद सिंघल ने कहा कि यह जाँच का विषय है कि वे पहले कोलकाता क्यों गए और फिर अहमदाबाद आए।
यह भी पता लगाया जा रहा है कि वे वास्तव में चंदा इकट्ठा कर रहे थे या किसी और मकसद से भारत आए थे। उन्होंने बताया कि अमेरिकी डॉलर की बरामदगी और कुछ डिजिटल लेन-देन भी शक पैदा करते हैं। पुलिस अब उनकी गतिविधियों और संपर्कों को समझने के लिए सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है। शुरुआती जाँच में यह भी सामने आया है कि आरोपित कुछ संदिग्ध लोगों के संपर्क में थे।
आतंकवाद विरोधी एजेंसियाँ जाँच में शामिल
गुजरात एंटी-टेररिज़्म स्क्वॉड (ATS) और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने भी इस मामले की जाँच शुरू कर दी है, ताकि आरोपित के असली इरादों का पता लगाया जा सके और यह जाना जा सके कि इकट्ठा किया गया पैसा कहाँ भेजा गया।
पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है ताकि उनके नेटवर्क और संपर्कों का पता चल सके। पूछताछ में गिरफ्तार आरोपित ने माना है कि यह पैसा उन्होंने अपनी शानो-शौकत वाली जिंदगी पर खर्च किया। पुलिस के मुताबिक, दान इकट्ठा कर उन्होंने अपने वीजा नियमों का उल्लंघन किया है। सरकार ने अब उन्हें ब्लैकलिस्ट और डिपोर्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
गाजा में इजराइल-हमास युद्ध
आतंकवादी संगठन हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हमला किया, जिसमें लगभग 1,300 इजरायली और विदेशी नागरिक मारे गए और सैकड़ों लोग घायल हुए। कई इजरायली और विदेशी नागरिकों को हमास बंधक बनाकर ग़ाज़ा ले आया था।
इसके बाद इजराइल ने हमास को खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया। इस दौरान गाजा में हजारों लोगों की मौत हुई है। कहा जाता है कि हमास ने कई बार स्थानीय फिलिस्तीनियों को बाहर निकलने से रोका और दुनिया भर से भेजी गई खाद्य सामग्री और दवाओं जैसी मानवीय मदद को भी बाधित किया। इससे हालात और बिगड़ गए।
विशेषज्ञों के अनुसार, हमास का मकसद यह दिखाना है कि गाजा में अकाल और संकट के लिए इजरायल जिम्मेदार है। अगर हमास बंधकों को रिहा कर देता तो युद्ध खत्म हो सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और यही वजह है कि इजरायल-हमास युद्ध लगभग दो साल से जारी है।
कर्नाटक के धर्मस्थल से हैरान करने वाली खबर आई। धर्मस्थल मंदिर के पूर्व सफाई कर्मचारी ने ‘सैकड़ों शवों’ के मिलने का दावा किया। इसके बाद तो आरोपों की झड़ी लग गई। जुलाई 2025 में पूर्व सफाई कर्मचारी सी.एन. चिन्नैया ने दावा किया कि उन्होंने इस क्षेत्र में ‘सैकड़ों शवों’ को दफनाया। इसे कई मीडिया संस्थानों ने राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। लेकिन जैसे ही गवाह चिन्नैया की ‘सच्चाई’ सामने आई, किसी ने ‘गंभीर विश्लेषण’ के साथ रिपोर्टिंग नहीं की।
सफाई कर्मचारी चिन्नैया के मुताबिक, “कुछ सालों में लोगों की हत्या की गई थी और शवों को जमीन के नीचे गाड़ दिया गया। उसने घटना का वक्त 1995 से 2014 के बीच का बताया। बगैर सबूत के सिर्फ चिन्नैय की गवाही के आधार पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने जाँच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया। दो हफ्तों तक SIT के अधिकारी शवों की तलाश में जंगलों, नदी के किनारों और घाटों की खाक छानते रहे।”
लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीता, एसआईटी को मामले पर शक हुआ। पूर्व सफाई कर्मचारी सी.एन. चिन्नैया को SIT ने गिरफ्तार कर लिया और बेलथांगडी कोर्ट में पेश किया। कोर्ट में चिन्नैया ने माना कि उसने झूठ बोला था। पूछताछ के दौरान उसकी कहानी की सच्चाई सामने आ गई। इस दौरान उसने जो खुलासा किया, वह गंभीर साजिश की ओर इशारा कर रहा था, जिसका वह एक मोहरा मात्र था।
धर्मस्थल मामले का ‘गवाह’ चिन्नैया गिरफ्तार, साजिश की बात कबूली
रिपोर्टों के अनुसार, चिन्नैया ने एसआईटी की जाँच में खुलासा किया कि पिछले साल उससे किसी ने संपर्क किया और पैसे देने का वादा किया। उसे धर्मस्थल के पास लोगों को मारने और सैकड़ों शवों को गाड़ने का झूठ फैलाना था, ताकि मंदिर की छवि खराब हो सके। उससे संपर्क करने वाले लोगों ने कहा था, “उसकी मनगढ़ंत गवाही से जनता में आक्रोश फैलेगा, तब दूसरे लोग उसे समर्थन देने के लिए आगे आ जाएँगे। उसे परिणामों से डरने की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि एक बार यह झूठा प्रचार लोगों के दिमाग में घर बना लिया, तो मंदिर की छवि खराब हो जाएगी और चिन्नैया को बचा लिया जाएगा।”
उसने कथित तौर पर जाँचकर्ताओं को बताया, “मुझे बेंगलुरु में प्रशिक्षण दिया गया था। मुझे बताया गया था कि पुलिस द्वारा पूछताछ के दौरान कैसे जवाब देना है। मैं मास्टरमाइंड के निर्देशों के अनुसार काम करूँगा। मैं यहाँ सिर्फ एक किरदार हूँ, मास्टरमाइंड कोई और है।”
चिन्नैया ने अपने झूठ को और पुख्ता करने की कोशिश भी की थी। उसने अदालत में एक खोपड़ी पेश किया और दावा किया कि यह उन पीड़ितों में से एक की है, जिन्हें उसने दफनाया था। लेकिन कोर्ट में वह ये नहीं बता सका कि उसे यह खोपड़ी कहाँ से मिली थी? उसके बयानों में विरोधाभाष साफ नजर आ रही थी। एसआईटी अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि उसके द्वारा बताए गए 18 में से 17 स्थानों से कुछ भी नहीं मिला। एक जगह हड्डियाँ बरामद हुईं, लेकिन प्रारंभिक जाँच से पता चला कि वे हाल ही में हुए एक आत्महत्या के मामले की थीं। फोरेंसिक जाँच से इसकी पुष्टि हो जाएगी।
अब तक चिन्नैया का ‘राज’ खुल चुका था। जिसे गवाह के रूप में पेश किया गया था, वह वास्तव में धर्मस्थल, उसके मंदिर ट्रस्ट और धर्माधिकारी वीरेंद्र हेगड़े को बदनाम करने की साजिश का एक हिस्सा था।
‘पत्रकारिता’ की आड़ में हिंदू मंदिर के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोप
इस कहानी का अंदाज बदल चुका था। अपने मंदिर, धार्मिक परंपराओं और दान के लिए प्रसिद्ध धर्मस्थला को बदनाम करने के लिए मीडिया हफ़्तों तक लगा रहा। मीडिया ने इस खबर को एक गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे के रूप में पेश किया।
हालाँकि जाँच से कुछ भी हासिल नहीं हुआ। कोई सामूहिक कब्र नहीं मिली, कोई अपराध साबित नहीं हुआ। यहाँ तक कि गवाह को ही झूठी जानकारी देने के आरोप में कर्नाटक पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
धर्मस्थल मंदिर की प्रतिष्ठा धुमिल करना था मकसद
लेकिन जो भी हुआ उससे धर्मस्थल की प्रतिष्ठा दाँव पर लग गई। पूरे मामले का मकसद था- धर्मस्थल की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना, श्री धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर मंदिर ट्रस्ट और उसके धर्माधिकारी वीरेंद्र हेगड़े की छवि धूमिल करना।
हालाँकि ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इतना काल्पनिक, बिना किसी सबूत के, एक आरोप का प्रचार इतनी तेजी से कैसे हुआ कि देश की ‘बड़ी खबर’ बन गया। इसका जवाब है मीडिया में पनप रहा दुष्प्रचार का ‘झूठतंत्र’। एक ऐसा तंत्र जिसमें ‘द न्यूज़ मिनट’ और उसकी संपादक धन्या राजेंद्रन की भूमिका अहम रही।
हर साजिश जो ज़ोर पकड़ती है, उसके पहचाने जाने योग्य किरदार होते हैं। एक तो वह सूत्रधार होता है, जो दावा करता है। दूसरा, वह राजनीतिक ताकतें होती हैं, जो उसे हथियार बनाती हैं। तीसरा, वह कार्यकर्ता और प्रभावशाली लोग होते हैं जो उसे प्रसारित करते हैं। और चौथा सबसे महत्वपूर्ण, वह सम्मानित मीडिया संस्थान जो ‘संतुलित’ और ‘नपी-तुली’ पत्रकारिता की आड़ में आरोपों को सही बताने की साजिश करती है।
मीडिया ने लगाए बेबुनियाद आरोप
‘न्यूज मिनट’ को इसी कटेगरी में रखा जा सकता है। इसने कभी भी सीधे तौर पर धर्मस्थल पर आरोप नहीं लगाया, लेकिन हर आरोप की उसकी जबरदस्त कवरेज, एसआईटी के हर अपडेट को गंभीरता से संदर्भ के साथ रखना और दावों के जरिए राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश करना। यही वजह रही कि इस भ्रामक कहानी को सुर्खियाँ मिली, जबकि इसे काफी पहले खत्म हो जाना चाहिए था।
This is the most disgusting aspect of the Dharmasthala Case.@thenewsminute was trying to raise money through the Dharmasthala Fake News.
Even Newslaundry's Manisha Pandey says people should donate to 'Independent Media' citing this case! pic.twitter.com/cCfEx2dh8U
आरोपों की बार-बार रिपोर्टिंग करके, टीएनएम ने एक निराधार खबर को ‘विवाद’ में बदल दिया। तथ्यों को रिपोर्ट करने के बजाय मीडिया ने धर्मस्थल के बारे में जहर उगला।
टीएनएम ने बेबुनियाद आरोप नहीं लगाए, बल्कि बेबुनियाद आरोपों को जगह दी, उसका विश्लेषण किया। अब सवाल ये उठता है कि अगर आरोप मदरसों में सामूहिक बलात्कार या किसी मस्जिद द्वारा आपराधिक गतिविधियों को छुपाने के बारे में होता, तो क्या द न्यूज मिनट की रिपोर्टिंग इसी तरह होती? क्या उसने धार्मिक नेटवर्क के जरिए सैकड़ों हिंदू लड़कियों की तस्करी की संभावना पर लंबी-चौड़ी रिपोर्टिंग की होती? इसका उत्तर साफ है- नहीं।
खबरों का विश्लेषण, स्पेशल कवरेज केवल तभी दिखाई देता है जब निशाना हिंदू संस्थाएँ होती हैं। जब बात चर्चों में यौन अपराधों या मस्जिदों की होती है, तो ‘द न्यूज़ मिनट’ बड़ी आसानी से उन्हें रिपोर्ट करने से बचता है या ऐसी घटनाओं को कम करके आंकने की कोशिश करता है।
अजमेर कांड, केरल की कहानी और उत्तराखंड में धर्मस्थल के फर्जीवाड़े को कवर करने में पक्षपात
यह पक्षपात 20 अगस्त, 2024 के अजमेर सेक्स स्कैंडल के फैसले से तुलना करने पर और भी स्पष्ट हो जाता है। बत्तीस साल की कानूनी लड़ाई के बाद, एक जिला अदालत ने 1990 के दशक की शुरुआत में अजमेर में 100 से ज़्यादा स्कूली लड़कियों के सामूहिक बलात्कार और ब्लैकमेल के लिए छह लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। आरोपी कोई मामूली नहीं थे। इनमें अजमेर दरगाह के खादिमों के साथ-साथ फारूक चिश्ती, नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती जैसे अजमेर युवा कांग्रेस के नेता भी शामिल थे।
पीड़िता ज़्यादातर हिंदू लड़कियाँ थीं, जिनमें से कई को फँसाया गया, बलात्कार किया गया, उनकी तस्वीरें खींची गईं और फिर ब्लैकमेल कर सेक्स रैकेट में शामिल किया गया। कुछ को आत्महत्या के लिए मजबूर किया गया। यह भारतीय इतिहास के सबसे बड़े सेक्स स्कैंडल में से एक था। फिर भी, द न्यूज़ मिनट, ने अजमेर शरीफ पर कोई टिप्पणी नहीं की। इस मामले में कोई विशेष कवरेज नहीं, कोई विश्लेषण नहीं। भारत के सबसे कुख्यात अपराधों में से एक का फैसला खामोशी में दफना दिया गया।
टीएनएम ने ‘द केरल स्टोरी’ की कवरेज में भी यही किया। जब एक फिल्म में उन महिलाओं की गवाही दिखाई गई, जिन्हें रिश्तों में फँसाया गया।उनका धर्मांतरण कराया गया और आईएसआईएस दुल्हनों के रूप में तस्करी की गई, तो टीएनएम ने इसे एक दुष्प्रचार फिल्म बताकर खारिज कर दिया। पीड़ितों के अपने शब्दों, उनकी दर्दनाक आपबीती को इसलिए नजरअंदाज कर दिया गया, क्योंकि कहानी में अपराधी इस्लाम को मानने वाले थे।
यहाँ प्रशिक्षण, तस्करी और कट्टरपंथ के एक वास्तविक मामले को कम करके आँका गया और उसका मजाक उड़ाया गया। जबकि धर्मस्थल में सामूहिक हत्याओं के एक पूरी तरह से काल्पनिक दावे को राष्ट्रीय विवाद का विषय बना दिया गया।
ये एक खास पैटर्न को उजागर करता है। हिंदुओं के खिलाफ बगैर सबूत के निराधार आरोपों को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना, इस्लामिक भीड़ के अपराधों को भी खारिज करना। साथ ही उन कहानियों को मिटा देना, जहाँ हिंदू पीड़ित हैं।
यह पैटर्न अतिक्रमण के मामलों में भी देखा जा सकता है। देवभूमि उत्तराखंड में मस्जिदों और मदरसों द्वारा हथिया ली गई सरकारी जमीन का कई बार पर्दाफाश हुआ। मस्जिदों और मदरसों का निर्माण वन क्षेत्रों और यहाँ तक कि तीर्थयात्रा मार्गों पर अवैध रूप से कब्जा कर बनाए जाने का पता चला। इन अतिक्रमणों के कारण तोड़फोड़ और राजनीतिक बहस भी हुई। लेकिन गलत कामों के स्पष्ट दस्तावेजी सबूत भी सामने आए।
लेकिन यहाँ भी ‘द न्यूज़ मिनट’ गायब था। खोजी पत्रकारिता और ‘सच’ का पता लगाने वाली कोई रिपोर्टिंग नहीं थी। धार्मिक संस्थाओं द्वारा जमीन हड़पने पर कोई संपादकीय ‘आक्रोश’ नहीं था। वही ‘न्यूज़रूम’ को उत्तराखंड में इस्लामिक संस्थाओं द्वारा किए गए अतिक्रमणों को बताने में कोई रुचि नहीं थी। क्या कवर नहीं करना है- इसका खास ख्याल रखते हुए टीएनएम ने सिर्फ हिन्दू संस्थानों को ‘संदिग्ध’ के रूप में पेश किया, ताकि इस्लामी संस्थाएँ जाँच से बच जाएँ।
यही बात लव जिहाद के मामलों पर भी लागू होती है, जिसका जिक्र ‘द न्यूज़ मिनट’ की कवरेज में शायद ही कभी होता है। और जब होता भी है, तो ‘मीडिया’ संस्थान अक्सर इसे ‘दक्षिणपंथी सोच’ बताकर खारिज कर देता है। ये उन हज़ारों महिलाओं के दर्द का अपमान है, जो लव जिहाद के आतंक से गुज़री हैं। मुस्लिम पुरुषों द्वारा पीड़ित होती हैं, जो उन्हें झूठे प्रेम जाल में फँसाकर रिश्ते बनाते हैं और फिर धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करते हैं।
धर्मस्थल मंदिर को लेकर फैलाए गए झूठ से ये भी साबित होता है कि कैसे तंत्र का इस्तेमाल दुष्प्रचार के लिए किया जाता है। ऑल्ट न्यूज़ के मोहम्मद ज़ुबैर और प्रतीक सिन्हा जैसे लोग और न्यूज़लॉन्ड्री से जुड़े पत्रकार, अक्सर ट्वीट करके मंदिर के बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। इसका उद्देश्य सोशल मीडिया के माध्यम से हिंदू संस्थाओं को बदनाम करना होता है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस तरह की निराधार साजिशों का प्रचार करके, ऐसे लोग जनमत को बताने की कोशिश करते हैं कि हिंदू पूजा स्थलों को सरकारी नियंत्रण में क्यों रहना चाहिए?
ज़ुबैर ने धर्मस्थल की कहानी को लगातार कवर करने के लिए द न्यूज़ मिनट की भी सराहना की, और उनकी रिपोर्टों का इस्तेमाल हिंदू संस्थाओं के खिलाफ अपने एजेंडे को बढ़ाने के लिए किया। लेकिन जब एसआईटी को कुछ नहीं मिला, और गवाह खुद गिरफ्तार हो गया, तो ज़ुबैर ने चुपचाप अपना जश्न मनाने वाला ट्वीट डिलीट कर दिया। न माफी माँगी और न ही स्पष्टीकरण दिया।
ज़ुबैर ने धर्मस्थल की कहानी को लगातार कवर करने के लिए द न्यूज़ मिनट की भी सराहना की, और उनकी रिपोर्टों का इस्तेमाल हिंदू संस्थाओं के खिलाफ अपने एजेंडे को बढ़ाने के लिए किया। लेकिन जब एसआईटी को कुछ नहीं मिला, और गवाह खुद गिरफ्तार हो गया, तो ज़ुबैर ने चुपचाप अपना जश्न मनाने वाला ट्वीट डिलीट कर दिया। न माफी माँगी और न ही स्पष्टीकरण दिया
जुबैर चुपचाप अपने झूठ से पीछे हट गया। यही उनका तरीका है। हिंदुओं के ‘गलत कामों’ को आक्रामक तरीके से बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना। लेकिन जब कहानी उल्टी नजर आए, तो बेशर्मी से बच निकलना। पिछले कुछ समय से, ज़ुबैर और उनके जैसे लोग ऐसे हथकंडों का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। किसी और के कंधे पर बंदूक रखकर हिंदू मान्यताओं पर हमला करना और जब जवाबदेह ठहराया जाए तो भाग जाना।
ज़ुबैर पूर्व भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा के खिलाफ ‘सर तन से जुदा’ गैंग शुरू करने के लिए कुख्यात है। 2022 में पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ टिप्पणी करने का उसने नूपुर शर्मा पर आरोप लगाया था। तीन साल से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी, ज़ुबैर ने अभी तक नूपुर द्वारा कही गई बातों को झूठा साबित करने के लिए कोई ‘फ़ैक्ट-चेक’ नहीं किया है। वह नूपुर के दावों पर अपने ‘फ़ैक्ट-चेक’ से जुड़े सवालों का जवाब देने से बचते रहे हैं।
जब मुस्लिम मौलवियों को मस्जिदों के अंदर नाबालिगों के साथ बलात्कार का दोषी ठहराया जाता है, या जब अवैध अतिक्रमण के लिए मस्जिदों को तोड़ा जाता है, तो इस पूरे तंत्र को साँप सूँघ जाता है। निरंतर कवरेज का यह मॉडल केवल एक ही दिशा में लागू होता है। वही ज़ुबैर जो हिंदू धर्मगुरुओं के भाषणों पर कटाक्ष करते हैं, वे मुस्लिम मौलवियों द्वारा विवादास्पद सांप्रदायिक टिप्पणियों को उजागर करना भूल जाते हैं। वही टीएनएम जो धर्मस्थल की साजिशों पर व्याख्यात्मक लेख प्रकाशित करता है, उसे अजमेर, उत्तराखंड के अतिक्रमणों या इस्लामी कट्टरपंथ के शिकार लोगों के लिए जगह नहीं मिलती।
झूठी नैतिक समानता का जाल
हर बार जब कोई मुस्लिम घोटालों में फँसता है तो उन्हें ‘संतुलित’ करने का प्रयास किया जाता है। अजमेर, बिशप फ्रैंको, आईएसआईएस भर्ती जैसे मामले सामने आने पर हिंदुओं से जुड़ा कोई ‘कांड’ गढ़ने की कोशिश की जाती है। ‘लव जिहाद’ का मुकाबला करने के लिए ‘भगवा प्रेम जाल’ सामने आता है। ‘जय श्री राम’ को ‘अल्लाहु अकबर’ के बराबर बताया जाता है ताकि इस्लामी कट्टरपंथ को ‘संतुलित’ किया जा सके। उसे तर्कसंगत बनाने के लिए हमेशा एक हिंदू समकक्ष तैयार रहे, क्योंकि यह केवल इस्लाम तक सीमित नहीं है। तर्कवादी हत्याओं का इस्तेमाल हिंदू धर्म को असहिष्णु बताने के लिए किया जाता है। अजमेर या केरल की कहानी को संतुलित करने के लिए एक मनगढ़ंत हिंदू डरावनी कहानी गढ़ना, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ‘इस्लामिक कट्टरपंथ’ दोषी न लगे।
इंजीनियरिंग के नजरिए से देखा जाए, तो आरोप कच्चे माल की तरह होते हैं। ‘द न्यूज़ मिनट’ जैसे प्रवर्तक उन्हें ‘गंभीर मुद्दों’ में बदल देते हैं। जुबैर और सिन्हा जैसे दुष्प्रचार के सौदागर उन्हें व्यापक रूप से फैलाते हैं। फिर भुगतान के रूप में सोशल मीडिया ट्रोल किया जाता है। फिर ऐसे बढ़ा-चढ़ा कर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनाया जाता है। इस चर्चा में सबसे पहले छिप जाती है वह सच्चाई, जो वास्तव में होती है। चर्चा को सनसनीखेज बनाया जाता है और जब झूठा साबित होता है, तो प्रतिक्रिया के रूप में सामने आती है चुप्पी। कोई जिम्मेदारी नहीं लेने की बेशर्म कोशिश।
(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
भारत और पाकिस्तान के बीच के रिश्ते की कहानी कई दशकों की है। भारत और पाकिस्तान के रिश्ते उसी दिन से असामान्य रहे हैं, जब 1947 में देश का बँटवारा हुआ था। पाकिस्तान का जन्म ही लाखों लोगों की मौत और बर्बादी के साथ हुआ। लाखों लोग विस्थापित हुए, हजारों महिलाएँ दरिंदगी का शिकार बनीं। लेकिन इसके बावजूद जवाहरलाल नेहरू के दौर में भारत ने पाकिस्तान के प्रति अपनी नीति को भाईचारे और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर आधारित रखा।
लेकिन नरेंद्र मोदी के दौर में नीति ने ‘प्रतिशोध’ का रूप लिया। पाकिस्तान को सीधे तौर पर करारा जवाब देते हुए कहा कि ‘सुख चैन से जियो! रोटी खाओ..वरना मेरी गोली तो है ही।’ यह बदलाव भारत की बदलती सोच और वास्तविकता को दर्शाती है।
नेहरू का दौर: ‘दिल और बाहों का हिस्सा’
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पाकिस्तान के प्रति नजरिया भावनात्मक और सुलह-समझौते वाला रहा था। 1957 में लाल किले से अपने भाषण में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है और वह ‘भारत के दिल और बाहों का हिस्सा’ है, उससे लड़ना ‘खुद को नुकसान पहुँचाने जैसा’ होगा। भले ही विभाजन के दौरान लाखों लोगों का नरसंहार और हजारों महिलाओं-बेटियों के साथ बलात्कार ही क्यों ना हुआ हो, फिर भी नेहरू का नजरिया पाकिस्तान के प्रति शांतिपूर्ण समाधान पर आधारित था।
1947 में भारत के विभाजन के बाद एक नया देश पाकिस्तान बना, जो मुस्लिम बहुल था। लेकिन पाकिस्तान में बड़ी संख्या में हिंदू और सिख भी रहते थे, खासकर पंजाब, सिंध और पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में। विभाजन के समय और उसके बाद पाकिस्तान के पश्चिमी हिस्सों (वर्तमान पाकिस्तान) में हजारों हिंदू और सिखों को हत्या, लूटपाट और दंगे का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा जबरन धर्म परिवर्तन कराए गए, मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले हुए, अपहरण और महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएँ सामने आईं। इन हालातों के चलते लाखों हिंदू और सिख परिवारों को भारत पलायन करना पड़ा।
हालाँकि, भारत में इन घटनाओं को लेकर जनता और विपक्षी नेताओं में आक्रोश था, फिर भी नेहरू सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ कोई सैन्य कदम नहीं उठाया। पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दिया। नेहरू का मानना था कि भारत को एक ज़िम्मेदार और शांतिप्रिय राष्ट्र की तरह पेश आना चाहिए और पाकिस्तान को भी अपनी जिम्मेदारी खुद निभाने का मौका दिया जाना चाहिए। इसी शांतिप्रिय राष्ट्र का फायदा उठाते हुए पाकिस्तान ने 1947 और 1965 में दो बार कश्मीर पर हमला किया।
फिर 1960 में, भारत और पाकिस्तान के बीच एक सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुआ, जिसकी भीख पाकिस्तान ने खुद माँगी थी। जल संधि पर हस्ताक्षर के तहत भारत से बहने वाली छह नदियों में से तीन का पानी पाकिस्तान को दिया गया। नेहरू ने इस समझौते को दोनों देशों के बीच सद्भावना बनाए रखने का एक नाम दिया। हालाँकि, कुछ लोगों का मानना है कि यह समझौता भारत के किसानों के साथ अन्याय था, क्योंकि देश के हक का पानी दुश्मन देश को दिया जा रहा था।
पाकिस्तान में लगातार हिंदुओं की स्थिति बदतर देखते हुए नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने एक समझौता किया। इसका उद्देश्य था कि दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। जबरन धर्म परिवर्तन और हिंसा को रोका जाए। जबरन धर्म परिवर्तन और हिंसा को रोका जाए।
जब हो सकता था कश्मीर पर समझौता
इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में 1971 का भारत-पाक युद्ध हुआ, जिसके बाद बांग्लादेश का निर्माण हुआ। भारत ने पाकिस्तान की सेना को निर्णायक रूप से हराया और 93,000 पाकिस्तानी फौजियों को युद्धबंदी बनाया। लेकिन इस जीत के बाद भी भारत ने कश्मीर मुद्दे पर कोई लाभ नहीं उठाया।
पाकिस्तान के फौजियों को बिना शर्त छोड़ देना इस बात का प्रतीक था कि भारत अब भी पाकिस्तान को ‘भाई’ मानता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक ऐतिहासिक मौका था, जिसके चलते भारत कश्मीर मुद्दे पर एक फैसला कर सकता थै, जिसे शांति की नीति के चलते छोड़ दिया।
राजीव गाँधी के कार्यकाल में पाकिस्तान को लेकर भारत की नीति अधिक मौन थी। स्वतंत्रता दिवस के भाषणों में पाकिस्तान का नाम भी मुश्किल से लिया जाता था। इसी दौरान पाकिस्तान ने कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देना शुरू कर दिया।
1980-1990 के दशक के दौरान जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद तेजी से बढ़ने लगा। हजारों कश्मीरी पंडितों को घाटी से अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। हजारों कश्मीरी हिंदुओं को उनके घरों से बेदखल कर दिया गया और तब आतंक का दौर जम्मू-कश्मीर से शुरू हुआ। पाकिस्तान की भूमिका आतंकवाद पर स्पष्ट थी, लेकिन भारत की प्रतिक्रिया अभी भी संयमित थी।
2008 में जब मुंबई में 26/11 का आतंकी हमला हुआ और पाकिस्तान से आए आतंकियों ने 166 लोगों की हत्या कर दी, तब भी भारत ने किसी प्रकार की सीधी जवाबी कार्रवाई नहीं की। 2009 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 15 अगस्त के भाषण में सिर्फ कश्मीर को दी गई रियायतों का ज़िक्र किया, लेकिन इस भाषण में कहीं भी पाकिस्तान का नाम तक नहीं लिया। यह सब दर्शाता है कि उस समय भारत की नीति में अब भी ‘संयम’, ‘राजनीतिक शिष्टाचार’ और ‘शांति प्रक्रिया’ का ही वर्चस्व था।
नरेंद्र मोदी का दौर: कठोर यथार्थवाद और निर्णायक कार्रवाई
जब 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान को लेकर भारत की नीति ने पूरी तरह से नया मोड़ लिया। मोदी सरकार ने पाकिस्तान के प्रति एक कठोर और आक्रामक रुख अपनाया और ‘भाईचारे’ की पुरानी नीति को पूरी तरह से त्याग दिया। उनका मानना है कि भारत अब ‘परमाणु ब्लैकमेल’ को बर्दाश्त नहीं करेगा और आतंकवाद को संरक्षण देने वालों पर कोई तरस नहीं दिखाया जाएगा। पीएम मोदी ने अपने भाषणों में पाकिस्तान को सीधे तौर पर आतंकवाद का आश्रयदाता करार दिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को बेनकाब करना शुरू कर दिया।
2016 में पाकिस्तान ने उरी में भारतीय सैनिकों पर हमला किया, जिसमें 19 जवान शहीद हुए। इस हमले के बाद भारत ने पहली बार ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकियों के ठिकानों को नष्ट किया। यह भारत की सैन्य नीति में ऐतिहासिक बदलाव था।
फिर 2019 में पुलवामा हमले में 40 जवानों की शहादत के बाद भारत ने ‘बालाकोट एयरस्ट्राइक’ कर पाकिस्तान के अंदर घुसकर आतंकी ठिकानों पर बमबारी की। ये दोनों घटनाएँ इस बात का संकेत थीं कि भारत अब ‘हमला होने के बाद चुप नहीं बैठेगा’, बल्कि करारा जवाब देगा।
2019 में, मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर एक बड़ा कदम उठाया, जिससे राज्य को विशेष दर्जा देने वाला प्रावधान खत्म हो गया। यह भी पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका था, क्योंकि वह इस मुद्दे पर लगातार अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की माँग करता रहा था।
मोदी सरकार ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग करने की भी रणनीति अपनाई। संयुक्त राष्ट्र, G20, BRICS जैसे मंचों पर भारत ने बार-बार पाकिस्तान को आतंकवाद का समर्थन करने वाला देश बताया। साथ ही, बलूचिस्तान, गिलगित और पीओके जैसे मुद्दों को भी वैश्विक चर्चा में लाने का काम किया, जो पहले के प्रधानमंत्री कभी नहीं करते थे।
मोदी सरकार ने सिंधु जल संधि को भी नए सिरे से देखने की बात कही। मोदी ने सार्वजनिक मंच से कहा कि यह संधि भारत के किसानों के साथ अन्याय है, क्योंकि भारत की नदियों का पानी दुश्मन देश की जमीन सींच रहा है और भारतीय खेत सूख रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब ‘खून और पानी एक साथ नहीं बहेंगे।’ इसका मतलब था कि अगर पाकिस्तान भारत में आतंक फैलाएगा, तो भारत उसे पानी भी नहीं देगा। सिंधु जल समझौते पर यह अब तक की सबसे कठोर टिप्पणी थी, जो यह दर्शाती है कि भारत अब रियायत देने के मूड में नहीं है।
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भारत अब परमाणु धमकियों के सामने नहीं झुकेगा। पाकिस्तान लंबे समय से ‘न्यूक्लियर ब्लैकमेल’ की रणनीति अपनाता रहा है– जैसे ही भारत कुछ सख्त रुख दिखाता है, पाकिस्तान परमाणु हथियारों की धमकी देने लगता है। लेकिन मोदी ने यह साफ कह दिया कि अब भारत की सेना जवाब अपने समय, अपने तरीके और अपनी शर्तों पर देगी। यही बात उन्होंने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भी कही, जिसमें भारतीय सेना ने पाकिस्तान के घर में घुसकर आतंकियों के ठिकानों का चकनाचूर किया था।
पीएम मोदी ने पाकिस्तान को करारा जवाब देते हुए ये भी कहा था, कि सुख चैन से जियो! रोटी खाओ..वरना मेरी गोली तो है ही”… जो दर्शाता है कि मौन रहने वाला दौर अब कॉन्ग्रेसी काल के दौरान ही चला गया है।
इस प्रकार देखा जाए तो जहाँ नेहरू और उनके बाद के प्रधानमंत्रियों ने पाकिस्तान के प्रति सुलह, समझौता और भाईचारे की नीति अपनाई, वहीं मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान को अब आतंकवाद के हर कदम का जवाब मिलेगा। नेहरू के जमाने में पाकिस्तान को ‘दिल और बाहों का हिस्सा’ कहा जाता था, जबकि मोदी के नेतृत्व में भारत ने उसे ‘आतंकवाद का अड्डा’ बताया और उससे बिना किसी भावनात्मक मोह के सख्ती से निपटने का संकल्प लिया।
आज भारत की नीति यह है कि आतंक और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। भारत अब ‘हमला सहने वाला देश’ नहीं रहा, बल्कि ‘जवाब देने वाला राष्ट्र’ बन गया है। मोदी सरकार के नेतृत्व में पाकिस्तान को लेकर भारत की नीति भावनात्मक नहीं, बल्कि यथार्थवादी और निर्णायक बन चुकी है।
पाकिस्तान एक बार फिर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की ग्रे लिस्ट में लौट सकता है। इसकी आशंका खुद पाकिस्तान ने जताई है। पाकिस्तानी वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब ने मुल्क पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी का डर जाहिर किया है।
वित्त मंत्री ने कहा कि अगर पाकिस्तान अवैध डिजिटल ट्रांजेक्शन की सही ढंग से व्यवस्थित नहीं करता है तो मुल्क पर FATF की ग्रे सूची में जाने का खतरा बढ़ सकता है। फिलहाल पाकिस्तान में 15 प्रतिशत तक आबादी अवैध डिजिटल ट्रांजेक्शन कर रही है।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि बड़ी मुश्किल से पाकिस्तान 4 साल में FATF की ग्रे लिस्ट से साल 2022 में बाहर हुआ है। इससे पता लगता है कि पाकिस्तान की वित्तीय स्थिति कितनी कमजोर है और वो अंतर्राष्ट्रीय नियमों का पालन करने में बार-बार फेल हो जाता है।
वित्त मंत्री ने यह भी कबूल किया कि पाकिस्तान को फिर से अंतर्राष्ट्रीय निगरानी में लाने का खतरा है। इसका मुख्य कारण जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों के साथ पाकिस्तान के संबंध हैं।
आतंकियों को डिजिटल वॉलेट से फंडिंग कर रहा पाकिस्तान
पाकिस्तानी वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब ने FATF के ग्रे लिस्ट में जाने के खतरे को देश की इकोनॉमी से जोड़ने की कोशिश की है लेकिन हकीकत पाकिस्तान द्वारा लगातार की जा रही आतंकियों को फंडिंग है। पाकिस्तान पर कई बार आतंकवादियों को फंडिंग के आरोप लगे हैं, जिससे मुल्क अंतरराष्ट्रीय निगरानी में भी फँस चुका है।
अब इसी FATF की अंतरराष्ट्रीय निगरानी से बचने के लिए पाकिस्तान ने आतंकियों को फंडिंग का नया तरीका अपनाया। अब फंडिंग डिजिटल वॉलेट से शुरू की गई है। अब बैंक खातों से पैसा ट्रांसफर करने से बचा जा रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की निगरानी से बचा जा सके।
कुछ समय पहले खबर आई थी कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में जैश-ए-मोहम्मद के जिस ठिकाने को तबाह किया था, अब उसे दोबारा खड़ा करने की तैयारी चल रही है।इसके लिए आतंकवादी EasyPaisa और SadaPay जैसे पाकिस्तानी डिजिटल वॉलेट्स में 390 करोड़ रुपए जुटाए जा रहे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 5 ऐसे वॉलेट मिले थे, जिनका जैश से सीधा संबंध है। एक SadaPay खाता मसूद अजहर के भाई तल्हा अल सैफ (तल्हा गुलजार) के नाम पर था।
भारत लंबे समय से कर रहा माँग
भारत लगातार पाकिस्तान को FATF की ग्रे लिस्ट में वापस डालने की माँग कर रहा है। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद से यह माँग तेज हो गई। भारत ने पाकिस्तान की पोल खोलते हुए बताया था कि उसने वर्ल्ड बैंक और IMF से लिए गए लोन को आतंकवादी गतिविधियों में इस्तेमाल किया है।
जून 2025 में FATF प्लेनरी से पहले भारत ने एक डोसियर भी तैयार किया और दुनियाभर के FATF सदस्यों से पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में शामिल करने के लिए समर्थन जुटाया। लेकिन पाकिस्तान के करीबी दोस्त चीन समेत तुर्की और जापान ने इसका समर्थन नहीं किया था।
संसद का मॉनसून सत्र 21 जुलाई 2025 को शुरू हुआ था और 21 अगस्त को समाप्त हो गया। सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी सांसदों से देशहित में एकजुट होकर सार्थक चर्चा की अपील की थी। उन्हें उम्मीद थी कि यह सत्र देश को प्रगति देने वाले फैसलों से भरा होगा लेकिन यह पूरा सत्र विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ गया।
हालाँकि प्रधानमंत्री की अपील भी बेअसर ही रही। जिन जिम्मे इस देश को विकास के पथ पर ले जाने के लिए कानूनों का निर्माण करना है, वो सांसद SIR जैसे मुद्दों के नाम पर संसद में भी हंगामा कर अपना वोट बैंक साधने में लगे हैं। इस मॉनसून सत्र में राज्यसभा केवल 39% और लोकसभा केवल 31% काम कर पाई। इस पूरे सत्र में 200 करोड़ रुपए से अधिक बर्बाद हो गए। जाहिर है ये पैसे हमारे, आपके टैक्स के ही पैसे हैं।
संसद में कामकाज का हाल
जानकारी के मुताबिक, राज्यसभा में 41 घंटे 15 मिनट की कार्यवाही हुई यानी निर्धारित समय के मुकाबले सिर्फ 38.88% काम हो सका। वहीं, लोकसभा में 120 घंटे निर्धारित थे लेकिन काम सिर्फ 37 घंटे ही हो पाया।
इसके अलावा राज्यसभा में 285 प्रश्नों में से सिर्फ 14 लिए गए, जीरो ऑवर सबमिशन (शून्यकाल) के 7 नोटिस और 61 विशेष उल्लेख ही हो सके। वहीं, लोकसभा में 419 तारांकित प्रश्नों में सिर्फ 55 के उत्तर दिए जा सके।
विधेयकों का हाल
इस सत्र में राज्यसभा में 15 और लोकसभा में 12 विधेयक पारित हुए, जिनमें से हंगामे के चलते अधिकतर बिना चर्चा या बहुत ही सीमित चर्चा के पारित किए गए। इनमें आयकर विधेयक 2025, कराधान कानून (संशोधन) विधेयक, राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक, राष्ट्रीय एंटी-डोपिंग संशोधन विधेयक, ऑनलाइन गेमिंग विनियमन विधेयक, समुद्र द्वारा वस्तुओं की ढुलाई विधेयक, तटीय जहाजरानी विधेयक, भारतीय बंदरगाह विधेयक, खनिज एवं खनन (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक शामिल है। इसके अलावा संविधान का 130वाँ संशोधन विधेयक फिलहाल संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया।
सबसे अहम चर्चा: ऑपरेशन सिंदूर
पूरे सत्र में एकमात्र गंभीर चर्चा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर हुई। इसमें लोकसभा में खुद प्रधानमंत्री मोदी और राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने जवाब दिया। यह भारत की सैन्य सफलता और सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा था, जिस पर सदन में विस्तार से चर्चा हुई। हालाँकि, इस पर चर्चा के दौरान भी विपक्षी सांसद हंगामा करते रहे।
विवाद और हंगामा
इस पूरे सत्र में विपक्ष के हंगामे का सबसे बड़ा कारण था- बिहार में SIR प्रक्रिया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि इसके जरिए राज्य के लोगों के वोट काटे जा रहे हैं। चूँकि बिहार में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं, विपक्ष इस मुद्दे को लेकर लगातार हंगामा करता रहा। सदन में नारेबाजी, तख्तियाँ लहराना, बिल फाड़ना जैसे दृश्य भी देखने को मिले।
लगातार 20 दिनों तक इंडिया ब्लॉक से जुड़े विपक्षी दलों ने SIR के मुद्दे पर लोकसभा और राज्यसभा के अंदर और बाहर जमकर हंगामा किया। यही वजह है कि दोनों सदनों की कार्यवाही लगातार बाधित होती रही।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने सांसदों के व्यवहार पर लगातार नाराजगी जताई। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने विपक्ष की आलोचना करते हुए कहा कि असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है लेकिन संसद को बाधित करना अलोकतांत्रिक है। एक और हैरानी की बात ये भी है कि कैप्टन शुभांशु शुक्ला तक पर भी चर्चा तक नहीं हो सकी।
कितना हुआ आर्थिक नुकसान?
रिपोर्ट्स के अनुसार, लोकसभा में 83 घंटे काम नहीं हुआ, इससे कुल 124 करोड़़ 50 लाख रुपए बर्बाद हुए। वहीं, राज्यसभा में 73 घंटे की बर्बादी से 80 करोड़़ रुपयों की बर्बादी हुई। यानी दोनों सदनों को मिलाकर 204 करोड़ 50 लाख रुपए पूरी तरह से बर्बाद हो गए। आँकडों की बात करें तो संसद की प्रति मिनट कार्यवाही पर करीब 2.50 लाख रुपए खर्च होते हैं, मतलब 1 दिन की संसद की कार्यवाही पर करीब 9 करोड़ का खर्च होता है। बर्बाद हुआ यह पैसा किसी पार्टी का नहीं बल्कि देश की आम जनता की मेहनत की कमाई थी।
राज्य सभा के डिप्टी चेयरमैन हरिवंश ने कहा, “कोशिशों के बावजूद ये सत्र व्यवधानों के की वजह से प्रभावित हुआ, इससे बार-बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। इससे न केवल संसद का बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ, बल्कि सार्वजनिक महत्व के कई मामलों पर चर्चा और विचार-विमर्श संभव नहीं हो सका।”
लोक सभा स्पीकर ओम बिरला ने अपने समापन भाषण में कहा, “जनप्रतिनिधि के रूप में हमारे आचरण और कार्यप्रणाली को पूरा देश देखता है। जनता बहुत उम्मीदों के साथ चुनकर सदन में भेजती है। सहमति और असहमति होना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, किंतु हमारा सामूहिक प्रयास होना चाहिए कि सदन गरिमा, मर्यादा और शालीनता के साथ चले।”
उन्होंने कहा, “सदन में नियोजित गतिरोध कभी हमारी परंपरा नहीं रही है। हमें विचार करना होगा कि हम देश के नागरिकों को देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था के माध्यम से क्या संदेश दे रहे हैं। मुझे विश्वास है कि इस विषय पर सभी राजनीतिक दल और माननीय सदस्य गंभीर विचार और आत्म-मंथन करेंगे।”
विचार-विमर्श और गंभीर मुद्दों पर चर्चा तो दूर की बात है, अंतिम दिन लोकसभा स्पीकर की चाय पार्टी में भी विपक्ष के नेता नहीं पहुँचे। जिन्होंने सामान्य शिष्टाचार तक नहीं निभाया वो देश की जनता से कोई रिश्ता क्या ही निभा सकते थे।
कर्नाटक के धर्मस्थल में कथित रूप से सैकड़ों शवों को दफनाने का दावा करने वाले गुमनाम मास्कमैन का चेहरा अब सामने आ चुका है। यह व्यक्ति मंड्या निवासी चिन्नैया निकला जिसे स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने गिरफ्तार कर बेल्थंगडी कोर्ट में पेश किया। SIT की पूछताछ में चिन्नैया ने खुद स्वीकार किया कि उसने झूठ बोला था और असल में वह मोहरा मात्र था और साजिश रचने वाले असली लोग अब भी परदे के पीछे हैं।
SIT की जाँच में खुलासा
चिन्नैया ने पूछताछ में बताया कि उसे पिछले साल दिसंबर के आखिरी हफ्ते में तमिलनाडु में कुछ लोगों से मिलवाया गया था। वहीं से उसे इस साजिश में शामिल किया गया। इन लोगों ने उसे भरोसा दिलाया कि अगर वह धर्मस्थल के खिलाफ माहौल खड़ा करता है तो और शिकायतकर्ता सामने आएँगे और मामला बड़ा बनेगा। साथ ही बदले में उसे पैसे का लालच भी दिया गया।
चिन्नैया ने कहा, “मुझे बेंगलुरु में ट्रेनिंग दी गई थी कि पुलिस पूछे तो कैसे जवाब देना है। मैं वही बोलता जो मास्टरमाइंड कहता था। असली खिलाड़ी कोई और है, मैं तो बस किरदार हूँ।”
शुक्रवार (22 अगस्त 2025) देर रात तक SIT ने चिन्नैया से पूछताछ की, जहाँ उसने अपने झूठ को कबूल लिया। शनिवार (23 अगस्त 2025) की सुबह उसे मेडिकल जाँच के लिए ले जाया गया और फिर कोर्ट में पेश किया गया। SIT पहले ही धर्मस्थल में गवाह की बताई गई 18 जगहों में से 17 स्थानों पर खुदाई कर चुकी है। इनमें से दो जगह कुछ अवशेष मिले हैं जिन्हें फॉरेंसिक जाँच के लिए भेजा गया है।
क्या बोली चिन्नैया की पहली पत्नी?
गिरफ्तारी के बाद चिन्नैया की पहली पत्नी ने भी उसकी पोल खोली। उन्होंने ‘कन्नड़ प्रभा’ अखबार से कहा कि चिन्नैया हमेशा से झूठा रहा है और उसने शादी के दौरान उन पर अत्याचार किया। महिला ने आरोप लगाया कि चिन्नैया पैसों के लिए किसी और के इशारे पर यह सब कर रहा है।
पत्नी ने बताया कि वे नागमंगला की रहने वाली हैं और 25 साल पहले चिन्नैया से उनकी शादी हुई थी। उनके दो बच्चे हैं। शादी के बाद जब वे धर्मस्थल पहुँचे तो धर्माधिकारी वीरेंद्र हेग्गड़े ने उन्हें घर और नौकरी दिलवाई थी। महिला ने कहा, “मुझे स्नान घाट पर सफाई कर्मचारी की नौकरी मिली थी, 3000 रुपए वेतन के साथ, लेकिन चिन्नैया कभी मेहनत करने वाला इंसान नहीं था। वह हमेशा आसान पैसे के चक्कर में रहता था।”
आरोपित की पत्नी ने यह भी खुलासा किया कि तलाक के बाद उन्हें पता चला कि चिन्नैया ने दो और शादियाँ कर ली थीं, जिनमें से एक पत्नी तमिलनाडु की है। चिन्नैया की गिरफ्तारी के बाद धर्मस्थल में माहौल गरम हो गया है। वहीं, श्रद्धालु जुलूस निकालकर SIT की कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं और माँग कर रहे हैं कि इस साजिश के पीछे के मास्टरमाइंड को भी बेनकाब किया जाए।
ग्रेटर नोएडा के सिरसा गाँव में दहेज की माँग को लेकर 26 वर्षीय निक्की की उसके पति और ससुराल वालों ने मिलकर हत्या कर दी। पुलिस ने निक्की के पति विपिन भाटी को पैर में गोली मारकर पकड़ा है और बाकी का परिवार अभी फरार है, जिसकी तलाश जारी है।
निक्की से ससुराल वाले लगातार पैसों की माँग कर रहे थे। स्कॉर्पियो और बुलेट बाइक देने के बावजूद ₹36 लाख माँग रहे थे। आखिर में 21 अगस्त 2025 को निक्की को उसके ही बेटे और बहन के सामने आग लगाकर मार डाला, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। झुलसी निक्की की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई।
घटना का विवरण
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, निक्की रूपवास गाँव की रहने वाली थी। निक्की एक मेकओवर आर्टिस्ट थी और इंस्टाग्राम पर उसके 45 हजार से ज्यादा फॉलोवर्स थे। निक्की की शादी 9 दिसंबर 2016 को विपिन भाटी से हुई थी। दहेज में स्कॉर्पियो, एक बुलेट बाइक और अन्य सामान देने के बावजूद, उसके पति और ससुराल वालों की लालच खत्म नहीं हुई। वे लगातार पैसों और अन्य कीमती सामान की माँग कर रहे थे। निक्की का पति विपिन बेरोजगार था और शराब का आदी था।
निक्की की बड़ी बहन कंचन की भी शादी उसी घर में विपिन के बड़े भाई रोहित भाटी से हुई थी। कंचन ने बताया कि वे दोनों बहनों को दहेज के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते रहे। स्थानीय पंचायतों में कई बार मामला उठाया गया, लेकिन उत्पीड़न जारी रहा। 21 अगस्त 2025 की शाम 5:30 बजे निक्की को बुरी तरह पीटा गया और फिर उस पर ज्वलनशील पदार्थ डालकर आग लगा दी गई। कंचन ने बताया कि पहले गर्दन पर हमला किया गया, फिर आग लगाई गई।
बुरी तरह झुलसी निक्की को पहले एक प्राइवेट अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल रेफर किया गया। हालाँकि, अस्पताल पहुँचने से पहले ही रास्ते में उसकी मौत हो गई। निक्की की मौत के बाद उसके परिजनों ने, खासकर उसके पिता ने आरोपितों के लिए सख्त से सख्त सजा की माँग की है। उनका कहना है कि यह एक सोची-समझी साजिश थी। परिजनों ने आरोपितों का एनकाउंटर करने और उनके घर पर बुलडोजर चलाने की माँग की है।
बर्बरता का सबूत: बेटे का बयान और वायरल वीडियो
इस मामले में सबसे दर्दनाक और चौंकाने वाला सबूत निक्की के 6 साल के बेटे का बयान है। एक वीडियो में वह मासूम अपनी मौसी कंचन के साथ खड़ा होकर कह रहा है, “पापा ने मम्मी पर कुछ छिड़का, चांटे मारे और फिर लाइटर से जला दिया।” यह बयान घटना की क्रूरता को साफ-साफ उजागर करता है। इसके अलावा, घटना से जुड़े कुछ वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं।
ग्रेटर नोएडा में दहेज लोभियों ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। एक विवाहिता को उसके ही मासूम बच्चे के सामने पेट्रोल डालकर आग के हवाले कर दिया गया। महिला का आरोपित पति और ससुरालवाले इस अमानवीय घटना के पीछे बताए जा रहे हैं।
— Pradeepp Tiwarii || Tv Journalist | (@Pradeepp_Tiwari) August 24, 2025
एक वीडियो में निक्की और उसकी सास व पति उसे बालों से खींचते हुए नजर आ रहे हैं, जबकि एक अन्य वीडियो में निक्की आग लगने के बाद सीढ़ियों से उतरती दिख रही है।
कानूनी कार्रवाई और पति गिरफ्तार
पुलिस ने निक्की की बहन कंचन की शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की है। इस एफआईआर में निक्की के पति विपिन भाटी, सास दया, ससुर सतवीर और जीजा रोहित भाटी का नाम शामिल है। पुलिस ने हत्या, दहेज उत्पीड़न और आपराधिक साजिश की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।
थाना कासना पर निजी अस्पताल से एक महिला के जलने से भर्ती होने के संबध में मीमो प्राप्त हुआ। जिस संबंध में अभियोग पंजीकृत है। मृतका के पति को हिरासत में लिया गया है। अन्य अभियुक्तों की गिरफ्तारी शीघ्र की जायेगी। बाइट ~ ADCP ग्रेटर नोएडा pic.twitter.com/cB2So6oYDI
— POLICE COMMISSIONERATE GAUTAM BUDDH NAGAR (@noidapolice) August 23, 2025
मामले का मुख्य आरोपित विपिन भाटी को हिरासत में ले लिया गया है, जबकि अन्य आरोपित फरार हैं और उनकी तलाश जारी है। पुलिस की बंदूक छिनकर आरोपित विपिन भाटी हिरासत से भागने का प्रयास कर रहा था जिसके बाद पैर मे गोली मारकर उसे पकड़ा गया। इस घटना के बाद स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं, जिसमें निक्की के लिए न्याय की माँग की जा रही है।
बिहार में एसआईआर के तहत 1 सितंबर 2025 से 8 दिन पहले तक 98.2 फीसदी लोगों के दस्तावेज जमा हो चुके हैं। चुनाव आयोग ने इसकी जानकारी देते हुए कहा है कि तीन लाख से अधिक नए वोटर्स ने फॉर्म भरा है। दस्तावेजों को जमा कराने के काम के साथ दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया भी चल रही है। आयोग का मानना है कि तय समय सीमा के पहले इसे पूरा कर लिया जाएगा और 30 सितंबर को वोटर लिस्ट जारी कर दी जाएगी।
वक्त से पहले पूरा हो जाएगा SIR- आयोग
बिहार में 24 जून 2025 से 25 जुलाई 2025 तक चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत वोटरों की गणना का काम पूरा किया गया। इसके बाद 1 अगस्त 2025 को मतदाता सूची के प्रारूप सामने आया। इसके आधार पर दावा, आपत्तियाँ और दस्तावेज जमा करने के लिए 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक यानी पूरे एक महीने का वक्त दिया गया।
1 सितंबर में अभी भी 8 दिन बाकी हैं और केवल 1.8% मतदाताओं के ही दस्तावेज जमा करना शेष रह गया है। बीएलओ और स्वयंसेवकों की मदद से उनके दस्तावेज जमा करने का काम जारी है। ऐसे में माना जा रहा है कि वोटरों के गणना के काम की तरह, दस्तावेजों के जमा करने से जुड़ा काम समय से पहले पूरा हो जाएगा।
आयोग ने बीएलए से लेकर पार्टियों तक की तारीफ की
चुनाव आयोग ने इसके लिए बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी, सभी 38 जिलों के जिला निर्वाचन अधिकारियों, 243 ईआरओ, 2,976 एईआरओ, 90,712 बीएलओ, लाखों स्वयंसेवकों और सभी 12 प्रमुख राजनीतिक दलों के क्षेत्रीय प्रतिनिधियों, उनके जिला अध्यक्षों और 1.60 लाख बीएलए के काम की तारीफ की है।
दावा और आपत्तियों के एक महीने का वक्त मतदाताओं को वोटर लिस्ट में किसी तरह की गड़बड़ी होने पर उसकी शिकायत करने और दस्तावेज जमा करने के लिए है। ये दस्तावेज वे लोग जमा करा रहे हैं, जो गणना के वक्त नहीं दे पाए थे। आयोग के मुताबिक, 24 जून 2025 से 24 अगस्त 2025 तक यानी 60 दिनों में 98.2% व्यक्तियों ने दस्तावेज जमा कर दिए हैं यानी औसतन प्रतिदिन लगभग 1.64% लोगों ने दस्तावेज दिए। 24 जून 2025 से 243 ईआरओ और 2,976 एईआरओ इन जमा किए गए दस्तावेजों का सत्यापन भी कर रहे हैं।
सिर्फ 0.16% दावे और आपत्तियाँ प्राप्त हुई- आयोग
आयोग के मुताबिक राज्य की 7.24 करोड़ मतदाताओं में से, अब तक 0.16% दावे और आपत्तियाँ प्राप्त हुई हैं। बिहार में 12 मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के बीएलए से 10 दावे और आपत्तियाँ मिली हैं। राज्य के 3,28,847 नए मतदाता, जिन्होंने 18 साल पूरी कर ली है या 1 अक्टूबर तक 18 साल के हो जाएँगे, उन्होंने भी अपना फॉर्म 6 और घोषणा पत्र जमा कर दिया है।
आयोग के मुताबिक, सभी दावों और आपत्तियों पर फैसला और दस्तावेजों का सत्यापन 25 सितंबर 2025 तक संबंधित ईआरओ/एईआरओ कर लेंगे इसके बाद अंतिम जाँच किया जाएगा। आयोग के मुताबिक, मतदाता सूची 30 सितंबर 2025 को प्रकाशित कर दिया जाएगा।
विपक्ष लगातार विरोध में खड़ा रहा
बिहार में वोटर वेरिफिकेशन के खिलाफ विपक्ष लगातार हंगामा कर रहा है। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव वोटर अधिकार यात्रा निकाल रहे हैं और सरकार पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाते हुए आयोग के काम पर सवाल खड़े कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर बिहार की जनता आयोग की पूरी कवायद में साथ दे रही है। यही वजह है कि वोटरों की गणना भी वक्त से पहले हो पाया और अब दस्तावेजों को जमा करने का काम भी अपने अंतिम दौर में है।
उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिला स्थित चिनघटपुर गाँव में बाढ़ राहत के नाम पर ग्राम प्रधान शमी मोहम्मद ने जन्माष्टमी पर चिकन बिरयानी बँटवा दीं। उस दिन हिंदू लोग व्रत में थे। खाने में मांस देखकर लोग गुस्सा गए। सोशल मीडिया पर गाँव के सुनील ने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी दी।
'बाढ़' और 'धर्म'…
राईपुर चिनघटपुर गांव… जन्माष्टमी के बाद से ही इस बाढ़ग्रस्त गांव में तनाव की स्थिति है। आरोप है कि यहां भगवान के जन्मदिन पर लोगों को राहत सामग्री में मीट और चिकन दिया गया। आरोपी जेल में हैं।
वीडियो में सुनील कहता है, “इसमें देखो, मुर्गा है ये। शमी प्रधान ने बाँटा है। बच्चे लेकर आए हैं, उन्होंने खाया। देखो, इसमें ये निकला है।”
क्या है पूरा मामला ?
फर्रुखाबाद से 40 किमी की दूरी पर कायमगंज तहसील में कंपिल कस्बा स्थित है। यहाँ गंगा खतरे के निशान से 20 सेमी ऊपर बह रही है, जिसकी वजह से आस-पास के 50 से ज्यादा गाँव डूब चुके हैं। ऐसी ही हालत राईपुर चिनघटपुर गाँव की भी है।
चिनघटपुर गाँव में बाढ़ राहत के लिए ग्राम प्रधान शमी मोहम्मद ने खाना बाँटा। खाने का वीडियो बनाने वाले गाँव के सुनील ने दैनिक भास्कर को पूरे घटनाक्रम की जानकारी देते हुए बताया, “मेरे बड़े भाई पिंटू बाढ़ राहत के लिए बाँटा गया खाना खा रहा था। अचानक वह चिल्लाया, खाने में मीट है। उसने पैकेट फेंक दिया, मुझे लगा कि वो बिरयानी में डाली सोयाबीन बरी को मीट समझ रहा है। फिर भी मैंने पैकेट उठाकर देखा। बिरयानी में सच में चिकन और हड्डियाँ थीं।”
सुनील ने गाँव के प्रधान को फोन लगाया लेकिन कोई जवाब नहीं आया। इसके बाद सुनील ने चिकन बिरयानी के डब्बे का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया। वीडियो को देखकर हिंदू संगठन ने सपोर्ट किया।
इसके बाद हिंदू महासभा, बजरंग दल और VHP के कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे। 17 अगस्त 2025 को विरोध प्रदर्शन कर कंपिल थाने को घेर लिया और शिकायत दर्ज कराई।
थाना कम्पिल क्षेत्रांतर्गत बाढ पीड़ितों को ग्राम प्रधान द्वारा नॉनवेज बिरयानी वितरित करने व पीड़ित लोगों द्वारा की गई शिकायत पर कार्यवाही के सम्बन्ध में अपर पुलिस अधीक्षक फतेहगढ़ द्वारा दी गई बाइट।#fatehgarhpolicepic.twitter.com/b41a9KBU2l
इसके बाद फर्रुखाबाद पुलिस ने ग्राम प्रधान शमी मोहम्मद, उसके बेटे सैफ और तालिब के साथ मोहम्मद सामी उर्फ मुस्तफा के खिलाफ BNS की धारा 196 (धर्म, जाति या समुदाय के बीच नफरत को बढ़ावा देना), 352 (शांति भंग) और 351 (आपराधिक धमकी देने) की धाराओं के तहत केस दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
गाँववालों ने क्या कहा?
मामले पर दैनिक भास्कर से बातचीत में गाँव के लोगों ने अपनी आबपीती सुनाई। उन्होंने बताया कि कैसे ग्राम प्रधान ने गलत मंशा से हिंदू त्योहार पर मांस भेजा। इससे लोगों का धर्म भ्रष्ट हुआ है।
गाँव की सुनीता देवी बताती हैं, “दोपहर के लगभग 3 बज रहे होंगे। स्टीमर की आवाज सुनाई दी। हमें समझ आ गया कि गाँववालों के लिए खाना आया है। बच्चे दौड़कर स्टीमर की तरफ पहुँच गए।”
सुनीता बताती हैं, “हमने पैकेट खोला तो उसमें चावल के साथ चिकन और हड्डी निकली। ये देखकर मन खराब हो गया। हमने तुरंत सारे पैकेट फेंक दिए। तब तक घर के कुछ लोगों और बच्चों ने वही खाना खा लिया था। इससे मेरा जन्माष्टमी का व्रत खंडित हो गया।”
दो गुटों में बँटा गाँव
जहाँ एक तरफ कुछ गाँववाले प्रधान को दोषी मान रहे हैं, वहीं कुछ लोग उसके समर्थन में खड़े हैं। प्रधान के समर्थकों का कहना है कि मामले को जानबूझ कर हाइलाईट किया जा रहा है ताकि प्रधान की बदनामी हो। दूसरी तरफ अन्य गाँववालों का आरोप है कि प्रधान और उसके बेटे की गिरफ्तारी के बाद उन्हें केस वापस लेने के लिए धमकियाँ मिल रही हैं।
सबसे पहले हिंदू संगठनों को मामले की जानकारी देने वाले देवेंद्र यादव का कहना है, “16 अगस्त को प्रधान शमी अपने बेटों सैफ अली और तालिब अली के अलावा 3 लोगों के साथ बिरयानी के पैकेट बाँट रहे थे। जन्माष्टमी होने की वजह से ज्यादातर गाँववालों का व्रत था। कुछ लोगों ने बिरयानी खाना शुरू किया तो उसमें मांस के टुकड़े मिले। गाँव में 10 से 12 परिवार ऐसे हैं, जिन्हें उस दिन नॉनवेज खाना मिला।”
दूसरी तरफ प्रधान शमी मोहम्मद की बीवी हुसनुमा बेगम का कहना है, “वे तो लोगों की मदद करने गए थे। उन्हें नहीं पता था कि इस काम के लिए भी उन्हें फँसा दिया जाएगा। पूरा केस प्रधान को बदनाम करने के इरादे से बनाया गया।”
वहीं, हिंदू महासभा के प्रदेश अध्यक्ष विमलेश मिश्रा कहते हैं, “जिस गाँव में ये दुखद घटना हुई, वहाँ हमारे यादव समाज के भाई रहते हैं। वे धूमधाम से कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। सवाल ये है कि एक गैर हिंदू प्रधान ने चिकन बिरयानी बँटवाने के लिए वही दिन क्यों चुना। हिंदुओं का मांस वाला खाना खिलाया गया, ये एक सोची समझी साजिश है।”
उन्होंने बताया, “16 अगस्त को रात तक मुकदमा नहीं लिखा गया, तो हिंदू संगठनों के लोगों ने दुर्वासा ऋषि आश्रम के महंत ईश्वरदास महाराज की मदद से जिले की SP आरती सिंह और DM आशुतोष कुमार द्विवेदी तक इस मामले को पहुँचाया। इसके बाद आरोपितों पर FIR दर्ज की गई।”
पुलिस जाँच में पता चला है कि प्रधान ने मुस्लिम बहुल गाँव एकलहरा के लिए नॉनवेज बिरयानी और हिंदू बहुल राईपुर चिनघटपुर के लिए सोयाबीन बिरयानी तैयार करवाई थी। SI प्रेमपाल सिंह के अनुसार, गलती से नॉनवेज पैकेट राईपुर गाँव में पहुँचा दिए गए।
हालाँकि, मामले को लेकर अब भी गाँव में तनाव बरकरार है। गाँव में माहौल न बिगड़े इसीलिए पुलिस की तैनाती की गई है।
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी इन दिनों कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर लगातार हंगामा खड़ा कर रहे हैं। वे लगातार चुनाव आयोग (ECI) और BJP सरकार पर बिहार में वोटर लिस्ट रिवीजन (SIR) प्रक्रिया से वोट काटने का आरोप लगा रहे हैं। उनके इन आरोपों पर अब विपक्ष से ज्यादा विदेशी मीडिया सुर में सुर मिला रही है।
अल जजीरा, BBC, वॉशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स और अमेरिकन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी (ABC) जैसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने भारत की चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए रिपोर्ट्स छापी हैं। इन रिपोर्ट्स में तीन एजेंडे साफ नजर आते हैं-
भारत सरकार अल्पसंख्यकों और गरीब तबकों को पहचान के नाम पर परेशान कर रही है।
मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी कर विपक्षी वोट बैंक काटा जा रहा है।
मोदी सरकार लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए संस्थाओं का दुरुपयोग कर रही है।
विदेशी मीडिया की इन कहानियों में भारत की वास्तविक स्थिति और चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर आधी-अधूरी जानकारी देकर एकतरफा तस्वीर पेश की जा रही है। इससे पता लगता है कि राहुल गाँधी जिस कथित ‘वोट चोरी’ के नारे के सहारे अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे हैं, उसी प्रोपेगेंडा को अब विदेशी मीडिया ने उठाकर भारत की छवि पर सवाल खड़े करने का जरिया बना लिया है।
अल जज़ीरा ने अपनी इस रिपोर्ट में लिखा कि भारत में लगभग 8 करोड़ लोगों को अपने वोटिंग अधिकार साबित करने के लिए दस्तावेज जमा करने पड़ रहे हैं। इसे उन्होंने NRC जैसी प्रक्रिया बताया है, जिसमें खासतौर पर मुस्लिम और प्रवासी मजदूरों पर असर पड़ने का दावा किया गया।
अल जजीरा की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
जबकि हकीकत यह है कि भारत में चुनाव आयोग हर 5 साल पर ‘वोटर लिस्ट रिवीजन’ कराता है। इसका मकसद फर्जी वोटरों को हटाना और नए पात्र मतदाताओं को जोड़ना है। यह कोई ‘नागरिकता साबित करने’ का अभियान नहीं है बल्कि केवल वोटर लिस्ट की सफाई है।
अल जज़ीरा ने इसे NRC जैसी प्रक्रिया बताकर अतिशयोक्ति की है, जबकि भारत सरकार और आयोग दोनों साफ कह चुके हैं कि किसी भी नागरिक का वोट बिना ठोस कारण हटाया नहीं जा सकता।
वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी इन रिपोर्ट में यह दावा किया कि बिहार में मतदाता सूची में संशोधन के लिए जल्दबाजी की गई, जिससे तकनीकी गडबड़ियाँ, दस्तावेजों में कमी और व्यापक भ्रम की स्थिति बनी।
The Washington Post की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
जबकि असल में वोटर लिस्ट रिवीजन (SIR) प्रक्रिया नई नहीं है। हर 5 साल में चुनाव आयोग इसे करवाता है। चुनाव आयोग ने यह भी साफ किया कि यह प्रक्रिया सभी जिलों में समान रूप से लागू है न कि किसी खास समुदाय पर। इसके तहत सिर्फ उन लोगों के नाम हटते हैं जो या तो दूसरी जगह शिफ्ट हो गए, डुप्लीकेट एंट्री हैं या फिर जिनका निधन हो चुका है।
न्यूयॉर्क टाइम्स औरअमेरिकन ब्रॉडकास्टिंग कम्पनी (ABC) की इन रिपोर्ट्स में वोटर लिस्ट रिवीजन (SIR) को विवादित बताकर विपक्षी दलों के विरोध प्रदर्शन को सपोर्ट किया गया, जिसमें राहुल गाँधी समेत विपक्षी नेता को दिल्ली पुलिस ने रोका। विदेशी मीडिया ने इसे ‘लोकतंत्र बचाने की लड़ाई’ की तरह पेश किया।
Newyork Times की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट American Broadcasting Company (ABC) की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
लोकतंत्र में विपक्ष को बोलने का पूरा अधिकार है लेकिन सिर्फ आरोप लगा देना ही सबूत नहीं होता। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और भारत की न्यायपालिका कई बार यह साफ कर चुकी है कि वोटर लिस्ट रिवीजन (SIR) पारदर्शी प्रक्रिया है।
विपक्ष ने अभी तक अदालत या आयोग को कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया कि बीजेपी या सरकार ने ‘वोट चोरी’ की हो विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स केवल राजनीतिक बयानों पर आधारित हैं, जिनमें तथ्यात्मक आधार कमजोर है।
विदेशी मीडिया अक्सर भारत से जुड़ी खबरों को अपने नजरिए से पेश करता है। अल जज़ीरा, BBC, वॉशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसी संस्थाएँ पहले भी CAA, NRC और कृषि कानूनों पर एकतरफा रिपोर्टिंग को लेकर विवादों में रही हैं।
इस बार भी उन्होंने राहुल गाँधी के बयानों को आधार बनाकर यह नैरेटिव गढ़ा कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है। जबकि वास्तविकता यह है कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया हर साल होती है। इसमें लाखों नए वोटर जुड़ते हैं, जिससे चुनाव पारदर्शी तरीके से होते हैं।
राहुल गाँधी का ‘वोट चोरी’ मुद्दा राजनीतिक प्रोपेगेंडा
उधर, राहुल गाँधी ‘वोट चोरी’ का मुद्दा उठाकर राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। उनके बयानों को विदेशी मीडिया ने और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है ताकि यह दिखाया जा सके कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है और अल्पसंख्यकों को वोट से वंचित किया जा रहा है।
लेकिन तथ्य यही बताते हैं कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया नियमित है, सभी पर समान रूप से लागू होती है और किसी भी नागरिक का वोट मनमाने ढंग से नहीं हटाया जा सकता।
यानि राहुल गाँधी और विदेशी मीडिया के दावे एक राजनीतिक नैरेटिव से ज्यादा कुछ नहीं लगते। भारत का लोकतंत्र मजबूत है और वोट की ताकत हर नागरिक को बराबरी से हासिल है।