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छत्रपति शिवाजी ने की शुरुआत, महाभारत से कनेक्शन… जानें ‘अनंत चतुर्दशी’ पर ही क्यों होता है गणपति विसर्जन, क्या हैं मान्यताएँ

हर साल अनंत चतुर्दशी के अवसर पर गणेश विसर्जन के साथ भगवान गणेश के महापर्व गणेश चतुर्थी का समापन होता है। इस दिन गणपति बप्पा को विदाई दी जाती है और उनका विधिवत विसर्जन किया जाता है। उत्सव के इस अंतिम दिन गणपति की आखिरी पूजा भी होती है, जिसे उत्तर पूजा कहा जाता है। आईए जानते हैं गणेश चतुर्थी और प्रतिमा विसर्जन के इतिहास, महाभारत काल और छत्रपति शिवाजी से इस महापर्व के संबंध और मान्यताओं के बारे में जो भारत देश को विश्व में एक अलग पहचान देती हैं।

विघ्नहर्ता गणेश की स्थापना और विसर्जन के पीछे की धार्मिक और वैज्ञानिक मान्यता:

गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है, जो आमतौर पर अगस्त या सितंबर में आती है। यह त्योहार 10 दिनों तक चलता है और अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन के साथ समाप्त होता है। गणेश चतुर्थी  को विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है। यह हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है जो भगवान गणेश के जन्म की खुशी में मनाया जाता है।

इस त्योहार की शुरुआत पहले दिन भगवान गणेश की मूर्ति को घर, ऑफिस या पंडाल में स्थापित करके होती है। लोग मंत्रों, भजनों और आरती के साथ उनकी पूजा करते हैं। दस दिनों तक भगवान को तरह-तरह के भोग अर्पित किए जाते हैं और भक्ति भाव से पूजा की जाती है।

ऐसा माना जाता है कि इस त्योहार की परंपरा सातवाहन, राष्ट्रकूट और चालुक्य राजवंशों के समय से चलती आ रही है। वहीं ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, मराठा शासक छत्रपति शिवाजी महाराज ने महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी को सार्वजनिक रूप से मनाना शुरू किया था ताकि लोगों में एकता और देशभक्ति की भावना बढ़े।

त्योहार का अंतिम दिन ‘अनंत चतुर्दशी’ कहलाता है, जिसे ‘गणेश विसर्जन’ के रूप में जाना जाता है। इस दिन भक्त भगवान गणेश की मूर्तियों को श्रद्धा और धूमधाम के साथ नदी, समुद्र या किसी अन्य जल स्रोत में विसर्जित करते हैं। यह माना जाता है कि इस दिन भगवान गणेश अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती के पास कैलाश पर्वत लौट जाते हैं।

विसर्जन का एक विशेष महत्व है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि जब गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन होता है, तब वे अपने साथ हमारे जीवन की सारी परेशानियाँ और बाधाएँ भी ले जाते हैं और उन्हें नष्ट कर देते हैं।

महाभारत काल से विसर्जन का क्या है संबंध?

हिंदू धर्म में एक प्रसिद्ध कथा है कि महर्षि वेदव्यास ने महाभारत ग्रंथ की रचना की थी, लेकिन इसे लिखा भगवान गणेश ने था। ऐसा कहा जाता है कि वेदव्यास जी महाभारत लिखवाने के लिए किसी योग्य लेखक की तलाश में थे और इसके लिए ही उन्होंने भगवान गणेश से प्रार्थना की। गणेश जी मान गए, लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि वे बिना रुके लिखेंगे और वेदव्यास जी को बिना रुके कथा सुनानी होगी।

इसके बाद वेदव्यास जी ने भी एक शर्त रखी कि गणेश जी बिना अर्थ समझे कुछ नहीं लिखेंगे। इसके बाद वेदव्यास जी ने लगातार 10 दिनों तक कथा सुनाई और गणेश जी ने बिना रुके उसे लिखा। 10 दिन बाद जब वेदव्यास जी ने गणेश जी को स्पर्श किया, तो देखा कि उनका शरीर बहुत गर्म हो चुका था। फिर वे उन्हें पास के एक जलकुंड में ले गए और स्नान कराया जिससे उनका ताप शांत हुआ।

यहीं से गणेश स्थापना और फिर विसर्जन की परंपरा की शुरुआत मानी जाती है। मान्यता है कि गणेश जी को शीतलता प्रदान करने के लिए ही उन्हें जल में विसर्जित किया जाता है।

गणेश विसर्जन की परंपरा, समय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण:

गणेश विसर्जन के कई तरीके हैं। कुछ लोग गणेश चतुर्थी के दिन ही विसर्जन करते हैं, हालाँकि यह बहुत प्रचलित नहीं है। वहीं कुछ लोग डेढ़ दिन (अगले दिन दोपहर बाद), कुछ लोग तीन, पाँच या सात दिन तक पूजा करके विसर्जन करते हैं। सबसे अधिक प्रचलित परंपरा है अनंत चतुर्दशी को विसर्जन करना।

गणेश विसर्जन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि इसका वैज्ञानिक पक्ष भी है। यह हमें जीवन की नश्वरता का एहसास कराता है कि हर वस्तु एक दिन प्रकृति में समा जाती है।

विसर्जन के समय जल में जो चीजें डाली जाती हैं – जैसे हल्दी, कुमकुम, दूर्वा, चंदन, फूल आदि, ये सभी जल को शुद्ध करने वाले होते हैं। खासकर हल्दी में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं, जो पानी को साफ रखते हैं। बरसात के मौसम में यह पानी तालाबों, नदियों और पोखरों को शुद्ध करता है, जिससे जलजीवों को राहत मिलती है।

मुंबई गणेश विसर्जन के खास इंतजाम

आज देशभर में गणेश उत्सव का आखिरी दिन है। अनंत चतुर्दशी के मौके पर भगवान गणेश की मूर्तियों का विसर्जन किया जाएगा। मुंबई में इस मौके पर खास इंतजाम किए गए हैं। इस साल मुंबई में करीब 1.80 लाख मूर्तियों का विसर्जन होगा। इनमें 6,500 सार्वजनिक गणेश पंडाल और लगभग 1.75 लाख घरेलू मूर्तियाँ शामिल हैं। ये मूर्तियाँ शहर के अलग-अलग समुद्र तटों, तालाबों और 205 कृत्रिम झीलों में विसर्जित की जाएँगी।

इसके लिए यहाँ 21,000 पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे। वहीं पहली बार पुलिस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर रही है। गिरगांव चौपाटी पर एक AI कंट्रोल रूम बनाया गया है। बड़े गणपति पंडालों को QR कोड दिए गए हैं और जुलूस में शामिल वाहनों पर स्टिकर लगाए गए हैं। इससे पुलिस को ट्रैफिक और भीड़ को रियल टाइम में मैनेज करने में मदद मिलेगी।

‘मोदी एक महान प्रधानमंत्री, हम हमेशा दोस्त रहेंगे’: चीन से करीबियाँ देख भारत के लिए रातोंरात बदले ट्रंप के सुर, मीडिया से कहा- हम तो बस तेल खरीद के कारण हुए निराश

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने बयानों के उलझे हुए ताने-बाने में फँसते नजर आए। एक तरफ वो कहते हैं कि भारत और अमेरिका के बीच ‘बहुत खास रिश्ता’ है और प्रधानमंत्री मोदी को अपना ‘पुराना दोस्त’ बताते हैं। वहीं दूसरी तरफ, भारत के रूस से तेल खरीदने पर गहरी नाराज़गी जताते हैं और उसी नाराज़गी में भारत पर 50% का भारी टैरिफ भी लगा देते हैं।

अजीब बात ये है कि कुछ घंटे पहले ही ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में दावा किया था कि अमेरिका ने भारत और रूस दोनों को ‘चीन के अंधेरे में खो दिया है।’ और अब वही ट्रंप रिश्तों की मिठास की बात कर रहे हैं।

बयान पलटना कोई ट्रंप से सीखे- पहले भारत से नाराज, अब मोदी ‘महान’

टैरिफ और तनाव के बीच ट्रंप अपने बयानों से फिर पलटते दिखें। जब पत्रकारों ने उनसे भारत के साथ संबंधों को लेकर सवाल किया, तो ट्रंप का लहजा बिल्कुल बदल गया। ट्रंप ने कहा, “मैं हमेशा मोदी का दोस्त रहूँगा, वह एक महान प्रधानमंत्री हैं… मुझे सिर्फ यह पसंद नहीं है कि वह इस समय क्या कर रहे हैं, लेकिन भारत और अमेरिका के बीच एक विशेष संबंध है। चिंता की कोई बात नहीं है।”

यह बयान दिखाता है कि ट्रंप व्यापारिक मुद्दों पर सख्त होने के साथ-साथ अपने बयानों से बखूबी पलटना जानते है। जब भारत के साथ दोस्ती खत्म होते हुए दिखी और चीन-रूस के साथ नजदीकी बढ़ते हुए दिखी, तब ट्रंप को पुराना रिश्ता अपना याद आने लगा।

वहीं, अमेरिका के पूर्व NSA जॉन बोल्टन ने कहा था कि पहले ट्रंप अमेरिका-भारत के संबंधों को दशकों पीछे धकेल दिया है, जिसके बाद मोदी-रूस-चीन करीब आ पाए।

चीन को लेकर ट्रंप का बयान

ट्रंप ने अपनी एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था कि अमेरिका ने भारत और रूस को ‘अंधेरे चीन’ के हाथों ‘खो दिया‘ है। यह बयान तब आया जब प्रधानमंत्री मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के तिआनजिन शिखर सम्मेलन में एक साथ देखा गया था।

ट्रंप का यह मानना है कि तीनों देशों के बीच बढ़ती दोस्ती दुनिया में एक ‘नया विश्व व्यवस्था’ का संकेत है। हालाँकि, जब भारतीय विदेश मंत्रालय से इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया माँगी गई, तो प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने जवाब दिया, ‘इस वक्त इस पर कोई टिप्पणी नहीं है।’ भारत ने सीधे तौर पर ट्रंप के बयान का जवाब नहीं दिया, लेकिन यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है।

अमेरिका का भारत पर नया टैरिफ

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50% का भारी टैरिफ लगाया है। उन्होंने इस फैसले के पीछे की वजह भारत द्वारा रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीदना बताया। ट्रंप ने कहा कि वह इस बात से ‘बहुत निराश’ हैं और उन्होंने यह बात भारत को बताई भी है।

यह टैरिफ दो हिस्सों में लगाया गया है, 25% का बेस टैरिफ और 25% का अतिरिक्त लेवी। इस टैरिफ के बाद से भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंध पिछले कई सालों में सबसे निचले स्तर पर पहुँच गए हैं। इस वजह से दोनों देशों के बीच तनाव लगातार जारी है।

व्यापार वार्ता पर उम्मीद

टैरिफ के तनाव के बावजूद, ट्रंप ने भारत और अन्य देशों के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं पर आशा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि व्यापार वार्ता ‘बहुत बढ़िया’ चल रही है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका अन्य देशों के साथ भी अच्छा कर रहा है। यह बयान दिखाता है कि अमेरिका भारत के साथ संबंधों को सुधारने के लिए तैयार है, भले ही मौजूदा मतभेद हों।

हालाँकि, उनके वरिष्ठ सलाहकार पीटर नवारो ने भारत पर निशाना साधते हुए कहा था कि भारत रूस से तेल खरीदकर मुनाफा कमा रहा है और यह यूक्रेन युद्ध के लिए रूस को आर्थिक मदद देने जैसा है। इसके अलावा पीटर नवारो ने यह भी कहा कि भारत के तेल खरीदने से अमेरिका में लोगों की नौकरियाँ खतरे में पड़ रही है, जो बिल्कुल ही बेतुका बयान है।

काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों को राज्य कर्मचारियों का दर्जा, योगी सरकार ने बढ़ाया 3 गुना वेतन: छुट्टियाँ और प्रमोशन भी मिलेंगे

काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों और कर्मचारियों के लिए एक बड़ी खुशखबरी है। 40 साल के लंबे इंतजार के बाद, उन्हें अब राज्य कर्मचारी का दर्जा मिलेगा, जिससे उनका वेतन तीन गुना तक बढ़ जाएगा।

गुरुवार (4 सितंबर 2025) को काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद की 108वीं बैठक में यह ऐतिहासिक फैसला लिया गया। इस फैसले से पुजारियों और मंदिर के कर्मचारियों को वेतन वृद्धि के साथ-साथ प्रमोशन और छुट्टी जैसी कई अन्य सुविधाएँ भी मिलेंगी।

पुजारियों के वेतन और अन्य सुविधाओं में बढ़ोतरी

मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने बताया कि काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों को 30000 रुपए वेतन मिलता था। नई नियमावली के तहत अब उन्हें 80000 से 90000 रुपए तक वेतन मिलेगा। इसके अलावा, नियमावली लागू होने के बाद उन्हें प्रमोशन, अवकाश और अन्य सुविधाएँ भी मिलेंगी। मंदिर न्यास परिषद ने पुजारियों, कर्मचारियों और सेवादारों के लिए चार श्रेणियाँ तय की हैं और उन्हें राज्य कर्मचारियों की तरह ग्रेड और मैट्रिक्स दिए जाएँगे।

श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर का अधिग्रहण 1983 में किया गया था, लेकिन इसके बाद से अब तक कोई कर्मचारी सेवा नियमावली लागू नहीं हो पाई थी। लंबे समय से इस मुद्दे पर काम हो रहा था, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका था। अब जाकर यह सेवा नियमावली मंजूर हुई है।

मंदिर परिसर में और भी कई बड़े बदलाव

इस बैठक में सिर्फ पुजारियों के वेतन पर ही नहीं, बल्कि मंदिर के कई विकास कार्यों पर भी मुहर लगी। न्यास ने मिर्जापुर के ककरही में अपनी 46 बीघा जमीन पर एक वैदिक शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान बनाने का फैसला लिया है। भक्तों की सुविधा के लिए श्रीकाशी विश्वनाथ धाम से शक्ति पीठ विशालाक्षी माता मंदिर तक एक कॉरिडोर भी बनाया जाएगा।

इसके अलावा, एक डिजिटल संग्रहालय की स्थापना और मंदिर से जुड़े अन्य कार्य शामिल हैं। बेनीपुर-सारनाथ स्थित संकट हरण हनुमान मंदिर का विकास और गौशाला का आधुनिकीकरण भी किया जाएगा। धाम की सुरक्षा के लिए कंट्रोल रूम और कैमरों को आधुनिक बनाया जाएगा।

भक्तों को प्रसाद के रूप में लड्डू और रुद्राक्ष माला भी दी जाएगी और ‘संगम तीर्थ जल आदान-प्रदान योजना’ के तहत सभी ज्योतिर्लिंगों को इस योजना से जोड़ा जाएगा।

दंडी संन्यासियों को भी मिलेगा लाभ

बैठक में दंडी संन्यासियों के लिए भी एक अहम निर्णय लिया गया। उन्हें रोजाना प्रसाद, भोजन और 101 रुपए दक्षिणा दी जाएगी। इसके साथ ही, मंदिर में दैनिक दर्शनार्थियों के परिचय पत्रों का नवीनीकरण फिर से शुरू किया जाएगा। कुल मिलाकर, यह बैठक काशी विश्वनाथ मंदिर के कर्मचारियों और पुजारियों के लिए एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकती है।

मुंबई के कर्जत में बन रही थी ‘हलाल टाउनशिप’, सांप्रदायिक विवाद के बाद वीडियो हटाया-बैनर ढके: NHRC ने महाराष्ट्र सरकार को भेजा नोटिस

मुंबई के पास कर्जत में बन रही ‘हलाल लाइफस्टाइल टाउनशिप’ को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस टाउनशिप का प्रचार वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही भारी आलोचना का शिकार हुआ, क्योंकि इसमें इसे सिर्फ मुसलमानों के लिए बताकर पेश किया गया था।

यह टाउनशिप सुकून एम्पायर के नाम से विकसित की जा रही है। विज्ञापन वीडियो के साथ-साथ मुंबई में कई जगहों पर इसके बड़े-बड़े बैनर भी लगाए गए थे, जिन्हें अब काली चादरों से ढक दिया गया है। सोशल मीडिया पर जब वीडियो पर आपत्ति जताई गई और आरोप लगे कि इस प्रोजेक्ट के जरिए सांप्रदायिक आधार पर बंटवारा करने की कोशिश की जा रही है, तो डेवलपर्स ने माफी माँग ली।

करीब 100 किलोमीटर दूर कर्जत स्थित इस टाउनशिप के वीडियो में बुर्का पहने एक महिला दिखती है, जो इसे ‘समान विचारधारा वाले मूल्यों’ वाले परिवारों के लिए सुरक्षित जगह बताती है, जहाँ बच्चों को ‘सुरक्षित और हलाल’ वातावरण मिलेगा। यही प्रचार विवाद का कारण बना और इसे लेकर राजनीतिक व सामाजिक विरोध शुरू हो गया।

महाराष्ट्र के कर्जत में बन रही ‘हलाल लाइफस्टाइल टाउनशिप’ को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। अब इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है।

एनएचआरसी के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने 1 सितंबर 2025 को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर एक वीडियो साझा करते हुए इस टाउनशिप को ‘राष्ट्र के भीतर एक राष्ट्र’ करार दिया और कहा कि इस मामले में महाराष्ट्र सरकार से जवाब माँगा गया है।

राजनीतिक स्तर पर भी विरोध तेज हो गया है। शिवसेना (शिंदे गुट) के प्रवक्ता कृष्णा हेगड़े ने डेवलपर्स की नीयत पर सवाल उठाते हुए विज्ञापन हटाने और परियोजना की जाँच की माँग की।

वहीं, भाजपा प्रवक्ता अजीत चव्हाण ने इस टाउनशिप को ‘ग़ज़वा-ए-हिंद की ओर कदम’ बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह की परियोजनाओं का महाराष्ट्र या मुंबई में कोई स्थान नहीं है और यह संविधान का उल्लंघन है। उन्होंने डेवलपर्स के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की।

यह टाउनशिप ‘सुकून होम्स बिल्डर्स एंड डेवलपर्स’ द्वारा विकसित की जा रही है, जो छोटी कंपनी है। कंपनी ने ‘सुकून एम्पायर’ को अपनी प्रमुख परियोजना बताया है, जिसे अप्रैल 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

भारत की प्रजनन दर 1.9%, बुजुर्गों की आबादी 10% के पार: जनसंख्या गिरावट से जूझ रहे एशिया-यूरोप के कई देश, US में भी आबादी घटने का खतरा

आज दुनिया एक बेहद महत्वपूर्ण जनसंख्या मोड़ पर खड़ी है। एक ओर कुछ देशों में अब भी जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, तो दूसरी ओर कई देश गंभीर गिरावट का सामना कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की ‘विश्व जनसंख्या संभावना 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले दशकों में वैश्विक आबादी का विकास पहले के अनुमान से धीमा रहेगा।

2030 के बाद दुनिया की जनसंख्या लगभग 10.2 अरब तक पहुँचेगी, जो पिछले अनुमानों से करीब 70 करोड़ कम है। इसका मतलब है कि जन्म दर लगातार घट रही है और बहुत से देशों में लोग अब परिवार छोटा रखने लगे हैं।

इस बदलाव के असर गहरे हैं। जब किसी देश में जन्म दर गिरती है और बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ती है, तो सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, पेंशन और अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ता है।

ऐसे में सरकारों को अधिक वृद्ध लोगों की देखभाल करनी पड़ती है, लेकिन कार्यबल यानी काम करने वाले युवाओं की संख्या घटने लगती है। यही वजह है कि आज जनसंख्या का यह बदलाव केवल जनसंख्या विज्ञान का विषय नहीं, बल्कि एक गंभीर आर्थिक और सामाजिक चुनौती भी बन गया है।

युवा से वृद्धावस्था की ओर बढ़ता देश भारत

भारत लंबे समय तक ‘युवा राष्ट्र’ कहलाता रहा है। यह वह देश है जहाँ कामकाजी उम्र की आबादी सबसे ज्यादा मानी जाती थी। लेकिन अब आँकड़े बदलती तस्वीर दिखा रहे हैं। नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) 2023 की रिपोर्ट बताती है कि भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) 1971 में 5.2 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। यह 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) से भी कम है।

इसके साथ ही 0–14 साल की आयु वर्ग की हिस्सेदारी लगातार घट रही है। 1991 में यह 36% से ज्यादा थी, जो अब 24% पर आ गई है। यानी नए बच्चों की संख्या कम हो रही है। दूसरी तरफ कामकाजी उम्र (15–59 साल) वाले लोगों की हिस्सेदारी बढ़कर 66% हो चुकी है।

यह फिलहाल भारत की आर्थिक ताकत है, लेकिन आने वाले समय में यही समूह धीरे-धीरे वृद्ध होता जाएगा। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि 60 साल और उससे ऊपर की आबादी अब लगभग 10% हो चुकी है।

दक्षिण भारत के राज्यों जैसे केरल और तमिलनाडु में बुजुर्गों की हिस्सेदारी 14–15% तक पहुँच गई है। शिशु मृत्यु दर (IMR) और जन्म दर में गिरावट सकारात्मक है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि आने वाले वर्षों में भारत का युवा आधार सिकुड़ सकता है।

बीते दिनों RSS प्रमुख मोहन भागवत ने जनसंख्या और जनसांख्यिकीय बदलाव पर अपनी राय रखते हुए कहा कि हर भारतीय दंपत्ति को तीन बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्होंने बताया कि विशेषज्ञों के अनुसार जिन समुदायों की जन्म दर तीन से कम होती है, वे धीरे-धीरे विलुप्त हो जाते हैं। इसी वजह से उन्होंने सुझाव दिया कि परिवार में तीन बच्चों को शामिल करना जरूरी है।

भागवत ने कहा कि डॉक्टरों ने भी उन्हें बताया है कि सही उम्र में शादी करना और तीन बच्चे पैदा करना माता-पिता और बच्चों दोनों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। उनके अनुसार तीन भाई-बहनों वाले घरों में बच्चे आपस में सामंजस्य, अहंकार प्रबंधन और रिश्तों को संभालने की कला सीखते हैं, जिससे उनके भविष्य के पारिवारिक जीवन में संतुलन बना रहता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि देश की जनसंख्या नीति प्रतिस्थापन स्तर पर 2.1 बच्चों की सिफारिश करती है, लेकिन वास्तविक जीवन में 0.1 बच्चा होना संभव नहीं है। इसलिए गणना के हिसाब से दो बच्चों के बाद तीसरा बच्चा होना चाहिए।

भागवत का कहना था कि जनसंख्या को नियंत्रित और पर्याप्त बनाए रखने के लिए प्रत्येक परिवार को तीन बच्चों का लक्ष्य रखना चाहिए, लेकिन इससे ज्यादा नहीं। तभी बच्चों की परवरिश और शिक्षा सही ढंग से हो पाएगी।

जनसांख्यिकी पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि सभी समुदायों में जन्म दर घट रही है और यह बदलाव हिंदुओं में अधिक नजर आता है क्योंकि उनकी जन्म दर शुरू से ही कम रही है। भागवत ने धर्मांतरण और घुसपैठ को भी जनसंख्या असंतुलन का कारण बताया।

उन्होंने कहा कि धर्मांतरण भारतीय परंपराओं का हिस्सा नहीं है और न ही यह किसी धर्म द्वारा सही ठहराया जाता है। इसी तरह अवैध घुसपैठ भी देश की समस्या है, जिसे कानून और समाज दोनों को मिलकर रोकना होगा।

भागवत ने कहा कि सरकार घुसपैठ रोकने का प्रयास करती है, लेकिन नागरिकों की भी ज़िम्मेदारी है कि वे अवैध घुसपैठियों को रोज़गार न दें। उनका कहना था कि देश के नागरिकों को ही प्राथमिकता से काम और रोज़गार मिलना चाहिए।

अन्य देशों का अनुभव खराब

भारत अकेला नहीं है। एशिया, यूरोप और अमेरिका के कई देश इस चुनौती से जूझ रहे हैं। जापान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 2008 के बाद से वहाँ की जनसंख्या लगातार घट रही है। शादी और बच्चों के प्रति रुझान कम हो चुका है और अब वहाँ बुजुर्गों की संख्या युवाओं से कहीं अधिक हो गई है।

इसी तरह दक्षिण कोरिया में जन्म दर दुनिया की सबसे कम है, जिसके कारण सरकार को कई सामाजिक और आर्थिक संकट झेलने पड़ रहे हैं। यूरोप भी इस संकट का सामना कर रहा है। ग्रीस में जन्म दर इतनी घट गई है कि वहाँ 5% स्कूल बंद करने पड़े। बुल्गारिया, लिथुआनिया और लातविया जैसे देशों में 2050 तक जनसंख्या में 20% से अधिक गिरावट आने की आशंका है। इटली और जर्मनी जैसे देशों की स्थिति भी चिंताजनक है।

रूस में युद्ध, आर्थिक संकट और उच्च मृत्यु दर के कारण जनसंख्या लगातार घट रही है। वहीं अमेरिका में पहली बार 2025 में यह आशंका जताई गई है कि प्राकृतिक रूप से वहाँ की आबादी घट सकती है। यानी जन्म और मृत्यु के बीच का संतुलन टूटने की संभावना है।

एलन मस्क भी दे चुके हैं चेतावनी

टेस्ला और स्पेसएक्स के संस्थापक एलन मस्क इस विषय पर लगातार बोलते रहे हैं। उनका मानना है कि ‘कम जन्म दर मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा है।’ मस्क खुद 13 बच्चों के पिता हैं और  ‘अधिक बच्चे पैदा करने’ की सोच का समर्थन करते हैं। उनका कहना है कि अगर हर परिवार तीन बच्चे पैदा करे, तो जनसंख्या स्थिर रह सकती है।

वे बार-बार चेतावनी देते हैं कि अगर जन्म दर घटती रही, तो ‘पश्चिम का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।’ मस्क ‘जनसंख्या विस्फोट’ की चिंता को गलत मानते हैं। उनका कहना है कि यह एक ‘भ्रांत धारणा’ है और असली खतरा ‘जनसंख्या गिरावट’ है। उन्होंने यह भी कहा है कि वास्तव में प्रतिस्थापन दर 2.1 नहीं, बल्कि लगभग 2.7 होनी चाहिए, क्योंकि कुछ परिवार बच्चे नहीं पैदा करते।

विशेषज्ञों का मानना है कि मस्क की बातें कहीं-कहीं अतिशयोक्ति भी हैं। संयुक्त राष्ट्र और अन्य संस्थाओं की रिपोर्ट बताती हैं कि दुनिया की आबादी अभी भी बढ़ रही है और यह 2100 तक चरम पर पहुँचेगी।

गति धीमी हो रही है और कई देशों में गिरावट जरूर देखने को मिल रही है। कुछ अध्ययनों का तो कहना है कि आबादी घटने के बावजूद अगर शिक्षा, तकनीक और स्वास्थ्य में निवेश बढ़े तो समाज का प्रदर्शन बेहतर हो सकता है।

भारत के सामने चुनौतियाँ

भारत को आने वाले समय में कई मोर्चों पर सोचना होगा। जैसे-

  1. सतत विकास। अगर युवा घटेंगे और बुजुर्ग बढ़ेंगे, तो स्वास्थ्य, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा पर अधिक दबाव होगा।
  2. अर्थव्यवस्था पर असर। कामकाजी उम्र की आबादी कम होने से श्रमबल घट सकता है, जिससे आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
  3. महिलाओं की भूमिका। जन्म दर घटने का एक कारण महिलाओं की शिक्षा और रोजगार है, जिसे सकारात्मक माना जाना चाहिए। लेकिन साथ ही परिवार को सहयोगी नीतियाँ देना भी जरूरी है।
  4. जनसंख्या नीति। सरकार को बच्चों की देखभाल, मातृत्व-पितृत्व अवकाश और परिवार-अनुकूल योजनाओं को मजबूत करना होगा।

दुनिया के लिए चुनौती

घटती जनसंख्या और बढ़ती वृद्धावस्था आज दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती है। जापान, दक्षिण कोरिया, यूरोप और रूस में इसके प्रभाव पहले से दिख रहे हैं। अमेरिका और भारत जैसे देशों में भी इसका असर धीरे-धीरे महसूस किया जाने लगा है।

भारत को अपनी युवा आबादी के वर्तमान लाभ का पूरा उपयोग करना होगा और साथ ही भविष्य की तैयारी करनी होगी। यदि अभी से परिवार-अनुकूल नीतियाँ, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले दशकों में भारत भी वही स्थिति झेलेगा जो आज जापान या यूरोप झेल रहे हैं।

एयरबेस, एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन्स, फाइटर जेट्स… ऑपरेशन सिंदूर में सबकुछ खोने के बाद जागा पाकिस्तान, बढ़ाने लगा अपने परमाणु हथियार: 200+ करेगा न्यूक्लियर वॉरहेड्स, इंटरनेशनल रिपोर्ट में सामने आई बात

अमेरिका के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए रिसर्च से पता चला है कि पाकिस्तान तेजी से अपने परमाणु हथियारों के भंडार को बढ़ा रहा है। ‘बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स’ की रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान के पास फिलहाल 170 परमाणु बम हैं और 2030 तक यह संख्या 200 तक पहुँच सकती है।

इस रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पाकिस्तान ने यह फैसला भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से मिली करारी हार के बाद लिया है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि पाकिस्तान को यह समझ आ गया है कि पारंपरिक युद्ध में वह भारत का मुकाबला नहीं कर सकता, इसीलिए वह अपनी परमाणु ताकत बढ़ा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर की कहानी: क्यों घबराया पाकिस्तान?

मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए एक संघर्ष के दौरान, भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया। इस ऑपरेशन में भारतीय मिसाइलों ने पाकिस्तान के 11 एयरबेस तबाह किए और उन्हें भारी नुकसान पहुँचाया। हमले इतने सटीक थे कि पाकिस्तान की वायुसेना अपने F-16 और मिराज जैसे लड़ाकू विमानों को भी नहीं बचा पाई।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान एयरफोर्स और मिलिट्री इंजीनियर सर्विसेज को अपने तबाह हुए सैन्य ठिकानों की मरम्मत के लिए सरकारी ठेके जारी करने पड़े। इस संघर्ष के दौरान, किराना हिल्स पर भी एक धमाका हुआ था। यह जगह पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी हुई है। हालाँकि, भारत ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली और पाकिस्तान ने भी इस बात को दबाने की कोशिश की। इससे यह साफ हो गया कि दोनों देश किसी भी तरह से परमाणु ठिकानों पर हमले की बात नहीं करना चाहते थे।

भारत से मिली हार का नतीजा: परमाणु हथियारों की दौड़

ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान को यह साबित करा दिया कि पारंपरिक युद्ध में वह भारत के सामने कमजोर है। भारत की सैन्य क्षमता इतनी मजबूत है कि वह पाकिस्तान के आतंकी और महत्वपूर्ण ठिकानों को भी आसानी से निशाना बना सकती है। इसी डर से पाकिस्तान ने अब अपने परमाणु कार्यक्रम को और तेज कर दिया है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान के पास फिलहाल 170 परमाणु वॉरहेड हैं और वह 2030 तक इसे 200 तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही, पाकिस्तान अपनी मिसाइलों को भी आधुनिक बना रहा है। वह छोटी, मध्यम और बैलिस्टिक मिसाइलों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार कर चुका है। इसके पास ‘अब्दुल्ला’, ‘बाबर’, ‘शाहीन’ और ‘हत्फ-IX’ जैसी मिसाइलें हैं, जो अलग-अलग दूरी तक हमला कर सकती हैं।

पाकिस्तान की ‘फुल स्पेक्ट्रम डेटरेंस’ नीति

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान ने अपनी एक नई परमाणु नीति अपनाई है, जिसे वह ‘फुल स्पेक्ट्रम डेटरेंस‘ कहता है। इस नीति का उद्देश्य भारत को हर स्तर पर, चाहे वह रणनीतिक, ऑपरेशनल या टैक्टिकल हो रोकने का है। पाकिस्तान का मानना है कि इस नीति से वह भारत के किसी भी हमले का जवाब दे सकता है, यहाँ तक कि छोटे हमलों का भी। इसका मतलब है कि पाकिस्तान ने ‘पहले हमला नहीं करने’ की नीति को भी छोड़ दिया है।

कुल मिलाकर, इस रिपोर्ट से यह साफ होता है कि भारत की सैन्य ताकत ने पाकिस्तान को इतना डरा दिया है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए अब पूरी तरह से परमाणु हथियारों पर निर्भर हो रहा है।

हाइपरसोनिक मिसाइलें, स्टील्थ बॉम्बर ड्रोन और AI-बेस्ड फायरिंग पॉवर… इंडियन आर्म्ड फोर्सेस ने बताई आने वाले 15 सालों की प्लानिंग: दुश्मन को नेस्तनाबूद करेंगे ‘मेड इन इंडिया’ हथियार

भारत ने अपनी सबसे बड़ी रक्षा योजना की शुरुआत की है। यह योजना पिछले कुछ महीनों में हुए आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद सामने आई है। नरेंद्र मोदी सरकार ने अब तक की सबसे बड़ी रक्षा योजना पेश की है, जिसके तहत भारतीय सेना, वायुसेना, और नौसेना को अत्याधुनिक तकनीक और उपकरणों से सुसज्जित किया जाएगा।

रक्षा मंत्रालय ने इस 15 साल के रोडमैप को तैयार किया है, जिसमें लाखों डॉलर और नवीनतम तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इस प्लान में परमाणु-संचालित युद्धपोत, अगली पीढ़ी के टैंक, हाइपरसोनिक मिसाइलें, स्टील्थ बॉम्बर ड्रोन और AI-आधारित हथियार शामिल हैं।

क्या है इस 15-वर्षीय रक्षा प्लान की खास बातें?

रक्षा मंत्रालय के रोडमैप के अनुसार, भारतीय सेना को भविष्य के लिए पूरी तरह से तैयार किया जाएगा। इसमें अलग-अलग सेनाओं के लिए विशेष हथियार और उपकरण शामिल किए गए हैं। थल सेना (आर्मी) को लगभग 1,800 भविष्य के टैंक मिलेंगे, जो पुराने T-72 टैंकों की जगह लेंगे। पहाड़ों में लड़ाई के लिए 400 हल्के टैंक, 50000 टैंक-रोधी मिसाइलें और 700+ रोबोटिक काउंटर-IED सिस्टम भी खरीदे जाएँगे। इन उपकरणों से सेना की युद्ध क्षमता में जबरदस्त वृद्धि होगी।

वहीं, भारत की नौसेना (नेवी) को भी इस योजना में बड़ा स्थान मिला है। इसमें एक नया एयरक्राफ्ट कैरियर, 10 नए फ्रिगेट, 7 एडवांस कोरवेट और 4 लैंडिंग डॉक प्लेटफॉर्म मिलेंगे। इसके साथ ही, नौसेना को न्यूक्लियर प्रोपल्शन वाले युद्धपोत भी मिलेंगे। एयरक्राफ्ट कैरियर की बढ़ती संख्या से भारतीय नौसेना की ताकत और बढ़ेगी, जो भारत को समुद्र के इलाके में ज्यादा प्रभावी बना देगा।

वायु सेना (एयर फोर्स) के लिए भी इस योजना में कई बड़े बदलाव किए जा रहे हैं। इसमें 75 हाई-एल्टीट्यूड प्सूडो सैटेलाइट्स, 150 स्टील्थ बॉम्बर ड्रोन और 100+ रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट मिलेंगे। इसके अलावा, हाई-पॉवर वाली लेजर सिस्टम और निर्देशित ऊर्जा हथियारों का भी अधिग्रहण किया जाएगा, जिससे वायुसेना की युद्ध क्षमता और बढ़ेगी।

भारत की नई रक्षा योजना में बहुत सारी नई और एडवांस तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), हाइपरसोनिक मिसाइल और अंतरिक्ष से जुड़ी युद्ध प्रणाली। इन तकनीकों से भारत को आने वाले युद्धों के लिए तैयार किया जाएगा। इसमें साइबर सुरक्षा, सेटेलाइट के जरिए संवाद और ड्रोन को रोकने वाली तकनीक भी शामिल है।

‘मेक इन इंडिया’ पर जोर

इस योजना में सरकार ने ‘मेक इन इंडिया‘ का महत्व बताया है। रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि भारतीय कंपनियों को सरकार के साथ मिलकर इन नई तकनीकों को बनाने में मदद करनी चाहिए। साथ ही, सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों को आपस में मिलकर काम करना चाहिए ताकि देश में ज्यादा चीजें बनाई जा सकें।

आतंकवाद के खिलाफ बड़ा कदम

यह बड़ा रक्षा प्लान ऐसे समय में आया है जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान को सबक सिखाया है। इस ऑपरेशन में भारत ने पाकिस्तान और POK में आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे। हालाँकि पाकिस्तान ने भी जवाब में ड्रोन और रॉकेट से हमला किया, लेकिन भारत की मजबूत हवाई सुरक्षा प्रणाली ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद भारत ने पाकिस्तान के फौजी ठिकानों को निशाना बनाया और मजबूरन पाकिस्तान को युद्धविराम करना पड़ा।

यह विशाल रक्षा बूस्ट प्लान, भारत की तरफ से पाकिस्तान को एक स्पष्ट चेतावनी है कि किसी भी तरह की गुस्ताखी की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह दिखाता है कि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई तेज करने और किसी भी आपात स्थिति के लिए खुद को मजबूत करने के लिए तैयार है।

पश्चिमी देशों ने कहा- वो जमीन… आसमान… पानी हर तरफ से देंगे यूक्रेन को मदद, बस- सीजफायर हो जाए: पुतिन बोले- रूस नहीं देगा यूक्रेन की सिक्योरिटी की गारंटी, हम बनाएँगे दुश्मन को निशाना

रूस ने पश्चिमी देशों के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है, जिसमें यूक्रेन को सुरक्षा गारंटी देने की बात थी। रूस ने एक बहुराष्ट्रीय सुरक्षा बल बनाने के यूरोपियन प्रयास को भी खारिज कर दिया, जिसका उद्देश्य भविष्य में रूसी हमले को रोकना था। क्रेमलिन ने कहा कि वह ऐसी किसी भी स्थिति के लिए तैयार नहीं है, जिसमें सुरक्षा गारंटी के लिए यूक्रेन में विदेशी सैनिक तैनात किए जाएँ।

इस बारे में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने चेतावनी देते हुए कहा, “यूक्रेन में पश्चिमी सैनिकों की किसी भी तैनाती से वे रूसी सेना के लिए वैध निशाना बन जाएँगे।” साथ ही उन्होंने युद्धविराम वार्ता की संभावना का संकेत दिया है। इसके अलावा इस बात पर जोर दिया है कि जरूरत पड़ने पर वे रूस के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए सैन्य अभियान जारी रखने के लिए तैयार हैं।

रूस ने यह प्रस्ताव उस समय ठुकराया है, जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने बयान दिया था कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्धविराम होने के बाद 26 पश्चिमी देशों ने यूक्रेन में जमीन, समुद्र या हवाई मार्ग से सेना तैनात करने की प्रतिबद्धता जताई है। उन्होंने कहा कि इस योजना को अमेरिका के साथ अंतिम रूप दिया जाएगा।

रूस का यह रुख मॉस्को और पश्चिमी देशों के बीच दरार को और गहरा कर रहा है। वह भी ऐसे समय में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, यूरोपियन नेता और कीव युद्ध समाप्त होने के बाद लागू किए जाने वाले ढाँचे को तैयार करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

व्लादिवोस्तोक में ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम में बोलते हुए क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा,”यूक्रेन के लिए सुरक्षा की गारंटी विदेशी, खासकर यूरोपियन और अमेरिकी सैन्य टुकड़ियाँ नहीं दे सकतीं। बिल्कुल नहीं- वे नहीं दे सकतीं।”

पेसकोव ने आगे कहा, “यह यूक्रेन के लिए ऐसी सुरक्षा गारंटी नहीं हो सकती जो हमारे देश को स्वीकार्य नहीं हो।” उन्होंने कहा कि रूस ऐसे प्रस्तावों को ठुकराता है और मानता है कि इस मुद्दे को पहले के शांति ढाँचों में पहले ही संबोधित किया जा चुका है, जिसमें 2022 में इस्तांबुल में वार्ता भी शामिल है।

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने क्रेमलिन की स्थिति को मजबूत करते हुए कहा कि किसी भी स्थायी समझौते में जमीन पर हुए क्षेत्रीय बदलावों को शामिल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मॉस्को एक नए यूरेशियन सुरक्षा ढाँचे की बात करता है, जिसमें सभी के लिए ‘समान और अविभाज्य सुरक्षा’ हो।

मॉस्को ने ऐसे समय में प्रस्ताव ठुकराया है जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पेरिस में एक शिखर सम्मेलन आयोजित किया था। इसमें 26 यूरोपियन देशों ने यूक्रेन को सुरक्षा गारंटी देने का संकल्प लिया। योजना में जमीन, समुद्र और हवाई तैनाती से एक निवारक बल बनाने की बात है।

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने भी इस संकल्प को गंभीर और विशिष्ट कदम बताया, जो वर्षों के अधूरे आश्वासनों के बाद आया है। हालाँकि, जर्मनी और इटली समेत कुछ देश यूक्रेन में सेना भेजने में हिचकिचा रहे हैं और इसके बजाए यू्क्रेन की सेना बेहतर ट्रेनिंग और मजबूत बनाने का विकल्प चुन रहे हैं। जबकि बुल्गारिया जैसे बाकी देश काले सागर में नौसैनिक सहायता की तैयारी कर रहे हैं।

UK में इस्लामी कट्टरपंथियों के गढ़ बने लीसेस्टर में इस बार दीवाली पर नहीं होगी आतिशबाजी, 2022 के दंगों का प्रशासन ने दिया हवाला: भारतीय मूल की MP ने किया फैसले का विरोध

ब्रिटेन के लीसेस्टर में रहने वाले हिंदू धर्म के लोग धूमधाम से दीपावली त्योहार नहीं मना पाएँगे। ब्रिटिश अधिकारियों ने आतिशबाजी और मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने पर पाबंदी लगा दी है। इसके पीछे पब्लिक सेफ्टी का हवाला दिया गया है।

लीसेस्टर सिटी काउंसिल के मुताबिक, हर साल की तरह इस साल भी बेलग्रेव रोड पर मशहूर ‘गोल्डन माइल’ लाइटों से जगमगाएगा और 20 अक्टूबर 2025 को सड़कों पर ट्रैफिक भी बंद रहेगा। लेकिन इस बार आतिशबाजी नहीं होगी, ना ही मंच पर कोई कार्यक्रम होगा। पिछले सालों की तरह दीवाली का मेला भी नहीं लगेगा।

यह कदम शहर के सुरक्षा सलाहकार समूह (SAG) के निर्देश के बाद उठाया गया है, जिसमें काउंसिल, पुलिस और आपातकालीन सेवाओं के प्रतिनिधि शामिल हैं। SAG ने कहा कि पिछले साल दीपावली पर लगभग 50 हजार लोग इकट्ठा हुए थे, जो कि सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।

भारतीय मूल की ब्रिटिश सांसद शिवानी राजा ने की आलोचना

भारतीय मूल की लीसेस्टर सांसद शिवानी राजा ने इस फैसले की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि दीपावली का जश्न खतरे में है। शिवानी राजा ने एक्स पर पोस्ट में लिखा, “हमारी दीवाली का जश्न अब भी खतरे में, हमारे जश्न पर संकट मंडरा रहा है।”

सांसद ने आगे लिखा, “भारत से बाहर लीसेस्टर में दीवाली सबसे बड़ा जश्न है और हमारे शहर का मुख्य आकर्षण भी है। बावजूद लीसेस्टर सिटी काउंसिल अब पब्लिक सेफ्टी के नाम पर इस जश्न को सीमित करना चाहती है।”

पिछले साल दीवाली में परोसा मीट और शराब

यह पहली बार नहीं है जब ब्रिटेन में दीवाली के जश्न पर विवाद खड़ा हुआ है। पिछले साल 2024 में भी पीएम कीर स्टार्मर की सरकार के दौरान 10 डाउनिंग स्ट्रीट पर दीवाली रिसेप्शन कार्यक्रम में मीट और शराब परोसी गई थी।

तब भी हिंदू, सिख और जैन समाज के लोगों ने इस घटना को धार्मिक भावनाओं के खिलाफ बताकर विरोध जताया था। लीसेस्टर सांसद शिवानी राजा ने तब भी स्टार्मर को पत्र लिखकर कहा था कि खाने का मेन्यू धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार नहीं था। उन्होंने आगे से गाइडेंस देने की पेशकश भी की थी।

लीसेस्टर में हिंदू-विरोधी माहौल खड़ा करने की हुई कोशिश

ब्रिटेन के लीसेस्टर में 18 प्रतिशत हिंदू समाज के लोग रहते हैं। यही कारण है कि लीसेस्टर की दीवाली दुनियाभर में मशहूर है। इसके अलावा बाकी हिंदू त्योहार भी धूमधाम से मनाए जाते हैं। हालाँकि, शहर में कई बार हिंदू-विरोधी माहौल खड़ा करने की कोशिश की गई है।

हाल ही में गणेश चतुर्थी की शोभायात्रा में भगवा झंडे लगाने को लेकर विवाद शुरू हुआ था। जब मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन (MCB) ने इसे ‘हिंदू कट्टरवाद’ बताकर कार्रवाई की माँग की थी।

वहीं साल 2022 में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के बाद हिंसा के जख्म अब तक नहीं भरे हैं। सोशल मीडिया पर हिंदुओं के खिलाफ झूठी अफवाहें फैलाई गई थीं। इन अफवाहों के बाद हिंदू घरों और मंदिरों पर हमले हुए, भगवा झंडो का अपमान किया गया और सरेआम लोगों पर चाकू से वार किए गए थे।

कुछ समय बाद नवंबर 2022 में आई घटना की जाँच रिपोर्ट में साफ हो गया था कि हिंसा ‘हिंदुत्व कट्टरवाद’ से नहीं, बल्कि इस्लामी दुष्प्रचार से भड़की थी।

धर्मस्थल पर लगाए आरोपों में पीठाधीशों की गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात, साजिशों को देख की NIA जाँच की माँग: विरोध में उतरी कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार, छिपाया क्या जा रहा?

धर्मस्थल विवाद मामले में NIA (राष्ट्रीय जाँच एजेंसी) द्वारा जाँच किए जाने की माँग तेज हो गई है। हाल ही में कर्नाटक के विभिन्न मठों के पीठाधीशों ने केंद्र सरकार से इस मामले की जाँच NIA से करवाने की माँग की। इस मुद्दे पर कर्नाटक के गृहमंत्री जी परमेश्वर ने NIA जाँच प्रस्ताव पर विरोध जताया है।

NIA जाँच की माँग

कर्नाटक के विभिन्न मठों के पीठाधीशों ने दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और उन्हें धर्मस्थल विवाद की गंभीरता के बारे में बताया। धर्मस्थल में एक व्यक्ति ने दावा किया था कि उसने सैकड़ों शवों को दफनाया है, जिनमें महिलाओं के शव भी शामिल थे, जिनके साथ यौन उत्पीड़न के संकेत पाए गए थे।

पीठाधीशों ने इस मामले की जाँच NIA से कराने की माँग की, क्योंकि उनका मानना है कि यह एक व्यापक साजिश का हिस्सा है। इसका उद्देश्य हिंदू धर्मस्थलों को बदनाम करना है। पीठाधीशों ने गृह मंत्री से इस मामले में त्वरित कार्रवाई का अनुरोध किया और कहा कि यह केवल धर्मस्थल का मामला नहीं, बल्कि अन्य हिंदू तीर्थ स्थलों को भी निशाना बनाने का प्रयास हो सकता है।

कॉन्ग्रेस सरकार का NIA जाँच पर विरोध

हालाँकि, कर्नाटक के गृह मंत्री जी परमेश्वर ने NIA जाँच के प्रस्ताव का विरोध किया है। जी परमेश्वर ने कहा कि राज्य सरकार ने पहले ही एक विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया हुआ है और इस जाँच को पूरा होने देना चाहिए।

जी परमेश्वर का यह भी कहना था कि अगर SIT जाँच में कोई कमी पाई जाती है तो उसे राज्य सरकार के पास लाया जाएगा। लेकिन फिलहाल NIA को इस मामले में शामिल करने का कोई औचित्य नहीं है।

जी परमेश्वर ने कहा, “हमने पहले SIT का गठन किया था, लेकिन अब कुछ धार्मिक नेता कह रहे हैं कि NIA जाँच की जाए। क्या SIT जाँच भी पूरी नहीं है?” जी परमेश्वर ने आगे कहा कि अगर NIA को इसकी जाँच का औचित्य साबित करना होता है तो राज्य सरकार उसे स्वीकार कर सकती है।

धर्मस्थल मामले की गंभीरता

धर्मस्थल मामले में एक व्यक्ति सी एन चिन्नैया ने दावा किया था कि वह सैकड़ों शवों को दफनाने का गवाह है, जिनमें यौन उत्पीड़न के निशान वाले शव भी शामिल थे। हालाँकि बाद में चिन्नैया को झूठी गवाही देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।

धर्मस्थल विवाद में NIA जाँच की माँग और राज्य सरकार के विरोध के बीच, यह स्पष्ट है कि राजनीतिक और धार्मिक उथल-पुथल का यह मुद्दा अब पूरे कर्नाटक और देश में एक गर्म बहस बन चुका है। NIA की जाँच पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार की तरफ से खड़ी होने वाली दिक्कतें इस बात को और बढ़ा सकती हैं कि क्या यह मामला केवल एक स्थानीय विवाद है या यह कहीं बड़ा राजनीतिक और धार्मिक संकट पैदा कर सकता है।