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बिहार में बने इंजन से अफ्रीकी देश ‘गिनी’ को मिलेगी रफ्तार… पहली खेप रवाना: 3 साल में ₹3000 करोड़ के लोकोमोटिव्स का होगा निर्यात, उद्योग मंत्री बोले- ये ऐतिहासिक क्षण

बिहार के सारण ने विश्वस्तर पर रेलवे निर्माण में अपनी पहचान बनाई है। जिले के मढ़ौरा स्थित WLPL मढ़ौरा लोकोमोटिव (रेल इंजन) प्लांट से 4500 हॉर्स पावर का आधुनिक रेल लोकोमोटिव्स की चार इंजन की पहली खेप अफ्रीकी देश गिनी निर्यात किए गए हैं। ये इंजन बिहार से पहले मुंद्रा पोर्ट पहुँची और फिर अफ्रीकी देश गिनी के लिए रवाना हुई।

मुंद्रा पोर्ट गुजरात के कच्छ जिले में मौजूद भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह है। हर साल यहाँ से करीब 338 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक सामानों की ढुलाई होती है।

क्या है WLPL

Wabtec Railway Lokomotive Plant Ltd (WLPL) एक संयुक्त उपक्रम है जो अमेरिकी कंपनी वेबटेक कॉर्पोरेशन (Webtec Corporation) और भारत सरकार के रेल मंत्रालय मिलकर संचालित करते हैं। भारतीय रेल मंत्रालय के लिए भी ये गर्व का क्षण है।

उद्योग मंत्री नीतीश मिश्रा ने एक्स हैंडल पर इसकी जानकारी दी है। उन्होंने लिखा, “बिहार के लिए ऐतिहासिक क्षण है। सारण जिलान्तर्गत मढ़ौरा स्थित WLPL Marhowra Locomotive Plant (अमेरिकी कंपनी Wabtec और भारत सरकार के रेल मंत्रालय का संयुक्त उपक्रम) में निर्मित ES43ACmi (4500 HP) लोकोमोटिव्स की चार इंजन की पहली खेप मुंद्रा पोर्ट से अफ्रीकी देश गिनी (Guinea) के लिए रवाना हुई।”

इससे बिहार की प्रगति को नई रफ्तार मिलेगी। उद्योग मंत्री ने कहा, ” विगत 20 जून को सिवान की धरती से यशस्वी प्रधानमंत्री आदरणीय श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इस खेप को फ्लैग-ऑफ किया था। अब यह खेप अफ्रीका के Simandou Project के लिए रवाना हो चुकी है। अगले 3 वर्षों में ₹3000 करोड़ मूल्य के लोकोमोटिव्स बिहार की धरती से गिनी भेजे जाएँगे।”

उद्योग मंत्री ने आगे कहा है, “यह केवल निर्यात नहीं, बल्कि बिहार की औद्योगिक क्षमता और भारत की तकनीकी सामर्थ्य का वैश्विक प्रदर्शन है। पहली बार बिहार में बने रेल इंजन किसी दूसरे देश में जा रहे हैं। अब यह पहल “Make in India” से आगे बढ़कर “Make for the World” की दिशा में नया अध्याय लिख रही है।”

मढोरा प्लांट में 6000 एचपी तक के इंजन बनते हैं

मढ़ौरा प्लांट में 4500 से 6000 हॉस पावर के डीजल रेल इंजन का निर्माण होता है। ये पर्यावरण के अनुकूल और अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से बनाए जाते हैं। भारतीय रेलवे को भी यहाँ से इंजन की आपूर्ति होती है। अब तक करीब 700 इंजन भारतीय रेलवे को यहाँ से दिया गया है। 2028 तक 1000 इंजन इस प्लांट से बना इंजन भारतीय रेलवे को मिल जाएगा।

ये प्लांट 270 एकड़ में फैला है जिसमें करीब 600 इंजीनियर और कर्मचारी काम करते हैं।

₹5,800 लाख करोड़ का निवेश, अमेरिका का टैरिफ विवाद, चीन का विकल्प: जानिए क्यों पीएम मोदी की जापान यात्रा हो सकती है दोनों देशों के लिए गेम-चेंजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 29 अगस्त 2025 को जापान की यात्रा पर जा रहे हैं। यह यात्रा सिर्फ औपचारिक मुलाकात नहीं होगी बल्कि दोनों देशों के बीच रिश्तों को और मज़बूत करने का बड़ा कदम मानी जा रही है।

जापान ने अगले दस सालों में भारत में करीब ¥10 ट्रिलियन (5,800 लाख करोड़ रुपए) निवेश करने का ऐलान किया है। यह 2022 में किए गए पाँच साल के लिए ¥5 ट्रिलियन (2,750 लाख करोड़ रुपए) निवेश की प्रतिबद्धता से कहीं ज्यादा है।

पीएम मोदी का जापान दौरा सिर्फ दो देशों के बीच की औपचारिकता से कहीं ज्यादा है। बदलते हुए दुनिया के माहौल में भारत जापान के लिए एक जरूरी साझेदार बनकर उभरा है। जापान को चीन की बढ़ती आक्रामकता की चिंता है।

हालाँकि, यह अब एक नया ‘टैरिफ फ़्लोर’ बन गया है, जिससे जापानी कंपनियों के मुनाफे पर दबाव रहेगा और उन्हें अपनी अंतरराष्ट्रीय रणनीतियों पर फिर से सोचना पड़ेगा। यही स्थिति भारत के लिए एक बड़ा अवसर है, क्योंकि जापान अपने व्यापार और निवेश के नए रास्ते भारत में तलाश सकता है।

अमेरिका-जापान व्यापार विवाद से भारत को लाभ क्यों?

जापान और अमेरिका को सबसे करीबी साथी माना जाता है। इसके बावजूद वॉशिंगटन का आर्थिक राष्ट्रवाद सामने आया है, जिसमें अपने ही साथियों के खिलाफ भी टैरिफ लगाया गया है। अब सभी देशों को 15-20% “दुनिया भर का टैरिफ” का खतरा झेलना पड़ रहा है, वो भी जब तक कि वो अमेरिका के साथ खास समझौता नहीं कर लेते।

इसी वजह से जापान को मजबूरी में 15% टैरिफ समझौता मानना पड़ा। कुछ दिनों बाद अमेरिका और यूरोपीय संघ ने भी ऐसा ही किया। इसका बड़ा सबक जापान के लिए यह है कि अमेरिकी बाजार पर ज्यादा निर्भरता जोखिम भरी है। अगर मुनाफा सुरक्षित रखना है तो उसे नए बाजार तलाशने होंगे और इसमें भारत सबसे बड़ा उदाहरण बना है।

  1. जापान को बड़ा बाजार चाहिए, भारत वो देता है। अमेरिका के टैरिफ से मुनाफा घट रहा है, इसलिए जापानी कंपनियों को ऐसे बाजार चाहिए जहाँ कीमतें कम और खपत ज्यादा हो। भारत की 1.4 अरब की आबादी, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और 2025 तक 6.4% GDP वृद्धि (IMF का अनुमान) उसे चीन और अमेरिका दोनों की तुलना में अधिक आकर्षक विकल्प बनाते हैं।
  2. भारत की एक और ताकत है उसकी रणनीतिक स्वायत्तता है। नई दिल्ली न तो पश्चिमी पाबंदियों का हिस्सा बनी, न ही पूर्वी एशिया के RCEP समूह में शामिल हुई। जापान जहाँ चीन पर निर्भरता घटाना चाहता है, वहीं भारत अपनी स्वतंत्र नीति की वजह से आदर्श साझेदार नजर आता है।
  3. बड़े ऐस्पेक्ट में देखें तो जापान के भीतर भी दबाव बढ़ रहा है। वहाँ मुद्रास्फीति बैंक ऑफ जापान के लक्ष्य से ऊपर है और आगे ब्याज दरें बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। यानी बेहद सस्ता ‘येन फ़ाइनेंस’ अब खत्म होने की ओर है। ऐसे में जापानी पूंजी अब भारत जैसे देशों में ज्यादा लाभ कमा सकती है।
  4. भारत पर भी दबाव है। हाल ही में अमेरिका-भारत की कुछ वार्ताएँ रद्द हो चुकी हैं। द्विपक्षीय समझौते न होने की वजह से भारत पर भी अमेरिकी अतिरिक्त शुल्क लगाने का खतरा बना हुआ है। वॉशिंगटन ने चेतावनी दी है कि अगर तेल और भू-राजनीति जैसी दिक्कतें जारी रहीं, तो और टैरिफ लगाए जा सकते हैं।
  5. इसलिए भारत के लिए अब जरूरी है कि वह अपने निर्यात को विविध बनाए (Export mix risk कम करे), साथ ही अन्य देशों के साथ साझेदारी मजबूत करे, ताकि बाजार जोखिम कम हो।

भारत-जापान साझेदारी दोनों देशों के लिए फायदेमंद

जापान और अमेरिका को सबसे करीबी सहयोगी माना जाता है, लेकिन अब वॉशिंगटन की आर्थिक राष्ट्रवाद की नीति मजबूत होकर टैरिफ (शुल्क) के रूप में सामने आ रही है और यह सहयोगियों पर भी लागू हो रही है।

अब सभी देशों पर 15–20% ‘दुनियाभर का टैरिफ’ का खतरा बना रहता है, जब तक कि वे अमेरिका के साथ विशेष समझौता न कर लें। बड़ी हानि से बचने के लिए जापान को 15% टैरिफ समझौते को मानना पड़ा।

अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) ने भी कुछ दिन बाद इसी तरह का समझौता किया। इससे जापान के लिए एक साफ सबक निकलता है। अमेरिकी बाजार पर उसकी ज्यादा निर्भरता जोखिमभरी है। अगर टैरिफ जारी रहते हैं, तो मुनाफे के लिए जापान को दूसरे बाजार तलाशने होंगे। ऐसे में भारत एक बड़ा विकल्प बनता जा रहा है।

1. जापान को बड़े पैमाने वाले बाजार की जरूरत है और भारत यह अवसर देता है। अमेरिकी टैरिफ से मुनाफा घट रहा है, इसलिए जापानी कंपनियों को अब ऐसे बाजार की तलाश है जहाँ कीमतें कम हों और खपत ज्यादा।

भारत इस मामले में सबसे उपयुक्त है यहाँ 1.4 अरब की आबादी है, तेजी से बढ़ता हुआ मध्यम वर्ग है और IMF के अनुसार 2025 तक 6.4% GDP वृद्धि का अनुमान है। यही वजह है कि भारत, चीन और दुनियाभर में टैरिफ लाद रहे अमेरिका के बीच जापान के लिए सबसे व्यवहारिक विकल्प बन रहा है।

2. रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) भारत के लिए फायदेमंद साबित हुई है। भारत किसी भी गुट में शामिल होने से बचाता रहा है चाहे वह पश्चिमी देशों के प्रतिबंध हों या पूर्वी एशिया का RCEP समझौता।

जापान जब चीन पर निर्भर हुए बिना अपने विकल्प बढ़ाना चाहता है, तब नई दिल्ली उसके लिए सबसे उपयुक्त साझेदार बनती है, क्योंकि भारत अपनी संतुलित और स्वतंत्र नीति पर कायम है।

3. आर्थिक माहौल बदल रहा है। जापान में महँगाई दर अब बैंक ऑफ जापान (BoJ) के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है और बाजार भविष्य में ब्याज दरें बढ़ने का अनुमान लगा रहे हैं। इसका मतलब है कि बहुत सस्ते येन पर वित्त मिलने का दौर अब खत्म होने की ओर है, भले ही येन अभी कुछ समय तक कमजोर बना रहे। ऐसी स्थिति में जापानी पूंजी बेहतर मुनाफे की तलाश में बाहर जाएगी और यहीं भारत अपने लिए एक बड़ा अवसर बना सकता है।

4. जापान से आगे बढ़कर अब भारत पर भी दबाव है। हाल ही में भारत-अमेरिका की बातचीत के कई दौर रद्द हो चुके हैं और अगर द्विपक्षीय समझौता नहीं हुआ तो भारत को अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ का खतरा है। वॉशिंगटन ने चेतावनी दी है कि अगर तेल से जुड़ी राजनीति और अन्य मतभेद जारी रहे तो और शुल्क लगाए जा सकते हैं। इसी वजह से अगस्त के आखिर में होने वाली बातचीत भी रद्द कर दी गई।

इस स्थिति से भारत के लिए दो जरूरी बातें सामने आती हैं

  1. ऐसे तीसरे देशों के साथ साझेदारी मजबूत करना, जिससे बाजार का खतरा घट सके।
  2. निर्यात को विविध बनाकर जोखिम कम करना।

भारत-जापान साझेदारी पारस्परिक रूप से लाभकारी है

जैसे-जैसे अमेरिका जापान और यूरोपीय संघ (EU) जैसे अपने दोस्तों पर भी टैरिफ की दीवार मज़बूत कर रहा है, वैसे-वैसे भारत सबसे बड़ा टैरिफ-फ्री साझेदार बनकर उभर रहा है।

भारत और EFTA (यूरोपियन फ़्री ट्रेड एसोसिएशन) के बीच FTA समझौता 1 अक्टूबर 2025 से लागू होगा, जबकि ब्रिटेन (UK) के साथ FTA पहले ही तय हो चुका है। इसका मतलब है कि जापानी निवेशक भारत में निवेश करके सीधे यूरोप तक बिना टैरिफ के पहुँच पाएँगे।

प्रधानमंत्री मोदी इसे भारत की एक बड़ी भू-राजनीतिक बढ़त (geopolitical arbitrage) के रूप में पेश कर सकते हैं।

सेमीकंडक्टर एंड एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स : जापान के सेमीकंडक्टर रेनसान्स (semiconductor renaissance) में भारत को ‘प्लस-वन’ बनाया जा सकता है। जापान का रपिदुस प्रोजेक्ट 2027 तक 2-नैनोमीटर चिप उत्पादन का लक्ष्य रखता है, जिसे METI का मज़बूत सहयोग और वैश्विक साझेदारों का साथ मिला है।

टोक्यो ने पहले ही भारत-जापान सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन पार्टनरशिप बनाई है और एक औपचारिक भारत-जापान सेमीकंडक्टर पॉलिसी डायलॉग की मेजबानी भी करता है। भारत को चाहिए कि वह रपिदुस इंडिया ‘डिजाइन, पैकेजिंग और टैलेंट’ कॉरिडोर का प्रस्ताव रखे, जिसका मुख्य केंद्र बेंगलुरु/हैदराबाद और गुजरात का धोलेरा हो। यह भारत की PLI और OSAT योजनाओं के साथ पूरी तरह मेल खाएगा।

इन्फ्रास्ट्रक्चर एण्ड कनेक्टिविटी : मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन से लेकर उत्तर-पूर्वी राज्यों की सड़क परियोजनाओं तक, जापानी ODA (Official Development Assistance) ने भारत की कई बड़ी कनेक्टिविटी योजनाओं को सहयोग दिया है। जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) ने उत्तर-पूर्व क्षेत्र में लगभग 750 किलोमीटर नई सड़कों के निर्माण को फंड किया है, जिससे कनेक्टिविटी में बड़ा सुधार हुआ है। इसके अलावा, जापान ने क्षेत्रीय पानी सप्लाई और स्वच्छता परियोजनाओं में भी योगदान दिया है। उदाहरण के लिए, गुवाहाटी में JICA ने पानी वितरण व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सहायता दी है।

भारत-जापान आर्थिक सहयोग का सबसे बड़ा प्रतीक है मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) प्रोजेक्ट, जिसे भारत की पहली बुलेट ट्रेन लाइन कहा जा रहा है। यह केवल हाई-स्पीड रेल नहीं है, बल्कि जापान की अत्याधुनिक शिंकानसेन तकनीक को भारत में लाने की महत्वाकांक्षा भी दिखाता है। इस प्रोजेक्ट को बड़े पैमाने पर जापानी ODA लोन के जरिए फंड किया जा रहा है।

इसकी गुजरात वाली लाइन दिसंबर 2027 तक पूरी करने का लक्ष्य है, जबकि पूरे प्रोजेक्ट का उद्घाटन दिसंबर 2029 में होगा। भारतीय सरकार चाहती है कि जापान भारत की राष्ट्रीय हाई-स्पीड रेल परियोजना में और भी ज्यादा सहयोग करे। उम्मीद है कि जापान पश्चिम भारत की मौजूदा लाइन के अलावा, देश के अन्य हिस्सों में भी शिंकानसेन तकनीक वाली नई रूट्स के प्रस्ताव पेश करेगा।

सुरक्षा और साझेदारी: भारत और जापान का सुरक्षा सहयोग अब एक गहरी रणनीतिक साझेदारी में बदल चुका है, जो आपसी हित और भरोसे पर आधारित है। इसकी नींव 2008 में हुए ‘ज्वॉइंट डिक्लेरेशन ऑन सिक्योरिटी कोऑपरेशन’ से रखी गई, जिसमें खुफिया जानकारी साझा करने, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी कदम और शांति स्थापना जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया।

इसके बाद कई समझौतों ने इस साझेदारी को और मजबूत किया, जैसे 2014 का रक्षा आदान-प्रदान समझौता, 2015 के रक्षा उपकरण और तकनीकी सहयोग तथा सैन्य सूचना सुरक्षा समझौते और 2020 का RPSS (Reciprocal Provision of Supplies and Services) समझौता, जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे को लॉजिस्टिक सहायता प्रदान कर सकते हैं।

हाल ही में 2024 में दोनों देशों ने एक मेमरैन्डम ऑफ इन्टेन्ट पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत भारतीय नौसेना के लिए UNICORN मस्त को संयुक्त रूप से विकसित किया जाएगा। यह रक्षा तकनीक सहयोग की दिशा में एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा का महत्व

इस यात्रा का एक अहम पहलू रियलपॉलिटिक भी है। प्रधानमंत्री मोदी यह दिखाना चाहते हैं कि भारत न केवल दुनिया में हो रहे अशांति के बीच टिके हुए है, बल्कि उससे फायदा भी उठा रहा है। जहाँ बाकी देश सिर्फ प्रतिक्रिया देते हैं, भारत व्यापारिक संघर्षों को सप्लाई चेन, पूँजी प्रवाह और भू-राजनीतिक ताकत में बदल रहा है।

भारत-जापान साझेदारी को और मज़बूत करने के लिए दोनों देशों के नेता कई क्षेत्रों पर ध्यान देंगे, जैसे इंटेलिजेंस शेयरिंग (खुफिया जानकारी साझा करना), सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए जरूरी रेयर अर्थ मेटल्स और व्यापक आर्थिक-सुरक्षा सहयोग, जिसमें क्वाड फ्रेमवर्क भी शामिल है।

चीन की आक्रामक नीतियों ने इंडो-पैसिफिक को बदल दिया है, जिससे दोनों लोकतांत्रिक देशों के पास विकल्प कम और जरूरतें ज्यादा हो गई हैं। जापान का भारत की ओर झुकाव चाहे वह रक्षा उपकरण और तकनीकी सहयोग, न्यूक्लियर छूट, मालाबार और समुद्री साझेदारी जैसे अभ्यास या नई टेक्नोलॉजी साझेदारियाँ हों क्षेत्रीय अस्थिरता के खिलाफ एक सोची-समझी रणनीति है।

भारत और जापान दोनों विचारधारा-आधारित गठबंधनों से बचते हैं और इसके बजाय क्वाड, SCRI और द्विपक्षीय संबंधों के जरिए एक लचीला और हित-आधारित सुरक्षा ढाँचा बना रहे हैं। यह किसी औपचारिक गठबंधन में फँसे बिना ही मज़बूत निवारक (deterrence) तैयार करता है। प्रधानमंत्री मोदी की यह टोक्यो यात्रा सिर्फ एक द्विपक्षीय मुलाकात नहीं होगी, बल्कि भारत की प्रगति को दुनिया के सामने पेश करने का अवसर बनेगी।

चीन जहाँ धमकियों से दबदबा बनाने की कोशिश कर रहा है और अमेरिका अपने साझेदारों पर टैरिफ का दबाव डाल रहा है, वहीं मोदी के नेतृत्व में भारत एक विश्वसनीय और मजबूत साझेदार के रूप में सामने आ रहा है।

आज भारत को एशिया के भविष्य का अहम खिलाड़ी माना जा रहा है बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट, नए चिप प्रोजेक्ट्स, रक्षा सहयोग और जापान की बड़ी निवेश योजनाएँ इसका सबूत हैं। यह यात्रा दिखाती है कि भारत अब सिर्फ परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रहा, बल्कि दुनिया की नई दिशा तय करने वाला देश बनता जा रहा है। मोदी के नेतृत्व में भारत आत्मविश्वासी, भरोसेमंद और वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयार नजर आ रहा है।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में दिव्यांश तिवारी ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।

शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद कट्टरपंथियों का हुआ मिलाप, बांग्लादेश- पाकिस्तान के बीच बढ़ने लगी नजदीकियाँ: जानिए PAK के उप प्रधानमंत्री इशाक डार के ढाका दौरे का भारत पर क्या पड़ेगा असर

बांग्लादेश में पिछले साल अगस्त में शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। इस बदलाव का सीधा असर बांग्लादेश और पाकिस्तान के रिश्तों पर भी पड़ा है। दोनों देशों के संबंधों में लंबे समय बाद एक नई मधुरता देखने को मिल रही है।

पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार इन दिनों तीन दिवसीय आधिकारिक दौरे पर ढाका पहुँचे हैं, जहाँ वे बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के शीर्ष नेताओं के अलावा कई कट्टरपंथी संगठनों के नेताओं से भी मुलाकात करेंगे।

भारत के लिए यह स्थिति चिंता का विषय मानी जा रही है, क्योंकि इन बैठकों में ऐसे संगठनों के नेता भी शामिल होंगे, जिनका रुख भारत विरोधी रहा है।

ढाका और इस्लामाबाद के बीच बढ़ती नजदीकीयाँ

पिछले एक साल में पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच कई अहम पहलें हुई हैं। फरवरी में दोनों देशों के बीच सीधे सरकारी स्तर पर व्यापार शुरू हुआ, जिसमें 50,000 टन चावल का सौदा शामिल था।

इसी दौरान पाकिस्तान की एयरलाइन फ्लाई जिन्ना को कराची से ढाका के लिए उड़ानें संचालित करने की मंजूरी भी मिली। हाल ही में गृह मंत्री मोहसिन नकवी की ढाका यात्रा के दौरान दोनों देशों ने राजनयिक और आधिकारिक पासपोर्ट धारकों को वीजा-मुक्त यात्रा की सुविधा देने पर सहमति जताई।

कॉमर्स मिनिस्टर जाम कमाल खान और अब उप प्रधानमंत्री इशाक डार की यात्राएँ इस बात का संकेत हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश रिश्तों को बहुपक्षीय स्तर पर गहरा करने के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक, डार की इस यात्रा के दौरान व्यापार, मीडिया, संस्कृति और प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में चार से पाँच समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर होने की संभावना है। साथ ही दोनों देश व्यापार बढ़ाने के लिए एक संयुक्त कार्य समूह स्थापित करने की प्रक्रिया में भी हैं।

बांग्लादेश में कट्टरपंथ की बढ़ती भूमिका

शेख हसीना के हटने के बाद बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने राजनीतिक संवाद के दरवाजे व्यापक रूप से खोले हैं। इस प्रक्रिया में कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतों को भी जगह मिल रही है।

डार की इस यात्रा के दौरान वे बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस और विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन के अलावा बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया से भी मुलाकात करेंगे।

लेकिन सबसे जरूरी और परेशान होने वाली बात यह है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री ढाका में जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश जैसे कट्टरपंथी संगठनों के नेताओं से भी मिलने वाले हैं। यह संगठन भारत विरोधी रुख और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के आरोपों के चलते लंबे समय तक प्रतिबंधित रहा है।

इन मुलाकातों से संकेत मिलता है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतें एक बार फिर मुख्यधारा की राजनीति में पैर जमाने की कोशिश कर रही हैं और पाकिस्तान उन्हें प्रोत्साहित करने की भूमिका निभा सकता है।

एक ओर पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच व्यापार और कूटनीतिक संबंध मज़बूत हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत विरोधी समूहों को बढ़ावा मिलना क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से गंभीर सवाल खड़े करता है। खासकर जम्मू-कश्मीर जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान लंबे समय से बांग्लादेशी कट्टरपंथियों के सहयोग की तलाश में रहा है।

पूतना राक्षसी का वध, बुराइयों का अंत और राजघराने की कहानी: जानिए नागपुर में 149 साल से मनाए जा रहे ‘मारबत उत्सव’ का क्या है महत्व, जब बीमारियों को भगाने के लिए ढोल पर नाचता है पूरा शहर

महाराष्ट्र के नागपुर में शनिवार (23 अगस्त 2025) को एक पुरानी परंपरा निभाते हुए ‘मारबत उत्सव’ मनाया गया। हर साल भाद्रपद महीने में मनाया जाने वाला मारबत उत्सव एक पुरानी और अनोखी सांस्कृतिक परंपरा है।

यह त्योहार अपने रंग-बिरंगे जुलूसों और समाज को बुराई के खिलाफ देने वाले संदेशों के लिए जाना जाता है। इस दिन हजारों लोग नागपुर की सड़कों पर इकट्ठा होते हैं। यह त्योहार सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि समाज कुरीतियों को आईना दिखाने का एक अनोखा तरीका भी है।

नागपुर का सुप्रसिद्ध ‘मारबत उत्सव’

नागपुर, जिसे ‘ऑरेंज सिटी’ कहा जाता है, अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी मशहूर है। इन्हीं परंपराओं में से एक है मारबत उत्सव। रिपोर्ट के अनुसार, इसकी शुरुआत 1881-85 के बीच हुई थी। हर साल गोकुल अष्टमी पर इसे बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।

इस दिन पीली मारबत और काली मारबत तैयार की जाती हैं, काली मारबत को बुराई और बीमारियों का प्रतीक माना जाता है। वहीं पीली मारबत को लोगों की रक्षा करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। परंपरा है कि इनका जुलूस शहरभर में घुमाया जाता है और फिर बाहर ले जाकर दहन किया जाता है, जिससे बुराइयाँ और बीमारियाँ दूर हो जाती हैं।

मारबत का इतिहास भी दिलचस्प है। कहा जाता है कि पीली मारबत का निर्माण 1885 से शुरू हुआ। उस समय शहर में बीमारियाँ फैली थीं। लोगों का विश्वास था कि इसे बनाने और जलाने से रोगों से मुक्ति मिलती है। वहीं, काली मारबत की परंपरा 1881 से चली आ रही है।

इस उत्सव में बड़ग्या (कचरे से बनाए पुतले) भी शामिल किए जाते हैं। पहले बच्चे इन्हें कागज और घर के कचरे से बनाते थे, बाद में यह परंपरा बड़ों ने भी अपनाई। बड़ग्या और मारबत दोनों को ही बुराई का प्रतीक माना जाता है।

आज भी नागपुर के कई कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी मारबत का निर्माण करते हैं। जुलूस के दौरान लोग ढोल-नगाड़ों और गानों की धुन पर नाचते-गाते हैं। लगभग 149 वर्षों से चल रहा यह उत्सव नागपुर की खास पहचान बन चुका है और इसे बुरी ताकतों को दूर भगाने तथा समाज को एकजुट करने वाला पर्व माना जाता है।

उत्सव मनाने का धार्मिक कारण

एक अन्य मान्यता के अनुसार, श्रीकृष्ण को दूध पिलाने गयी पूतना राक्षसी का वध होने के बाद गोकुल निवासियों ने घर के सभी कचरों को लेकर एक जुलूस निकाला था और उसे गाँव के बाहर ले जाकर दहन किया था। इसी परंपरा को निभाते हुए यह उत्सव तभी से मनाया जा रहा है।

रानी बाकाबाई और उत्सव के बीच संबंध

जानकारी के मुताबिक, बताया जाता है कि 1881 में नागपुर के भोसले राजघराने की बकाबाई नामक महिला ने विद्रोह कर अँग्रेजों से मिल गई थी। इसके बाद भोसले घराने को काफी कुछ झेलना पड़ा था। इसी बात के विरोध में उसी समय से काली मारबत का जुलूस निकालने की परंपरा चली आ रही है।

भारत ने अमेरिका के लिए निलंबित की डाक सेवाएँ, US के टैरिफ नियमों के चलते पोस्टल विभाग ने लिया फैसला: सिर्फ ₹8 हजार तक के गिफ्ट और चिट्ठियाँ भेज सकेंगे

अमेरिका में डाक भेजने वालों के लिए एक बड़ी खबर है। भारत के डाक विभाग ने अमेरिका जाने वाली सभी डाक सेवाओं को अस्थायी रूप से रोक दिया है। यह फैसला अमेरिका के नए ‘ड्यूटी’ नियमों के कारण लिया गया है।

इस नियम के तहत, अब 800 डॉलर (करीब 70 हजार) तक के सामान पर भी टैक्स लगेगा। यह रोक 25 अगस्त 2025 से लागू हो जाएगी। हालाँकि, पत्र, दस्तावेज और 100 डॉलर (करीब साढ़े आठ हजार) तक के उपहार अभी भी भेजे जा सकते हैं।

क्यों लगी है डाक सेवा पर रोक?

अमेरिकी प्रशासन ने 30 जुलाई 2025 को एक आदेश जारी किया था। इसके अनुसार, 29 अगस्त 2025 से 800 डॉलर तक के उन सभी सामानों पर कस्टम ड्यूटी लगेगी, जो पहले टैक्स-फ्री थे।

नए नियमों के तहत, डाक भेजने वाले ट्रांसपोर्टरों को ही टैक्स वसूलना और जमा करना होगा। लेकिन अमेरिकी कस्टम्स विभाग ने इस प्रक्रिया को अभी तक पूरी तरह से साफ नहीं किया है। इस वजह से अमेरिका जाने वाली एयरलाइन कंपनियों ने 25 अगस्त 2025 के बाद माल स्वीकार करने से मना कर दिया है।

इन कारणों को देखते हुए भारत के डाक विभाग ने 25 अगस्त 2025 से सभी डाक वस्तुओं की बुकिंग रोक दी है। यह कदम ग्राहकों को होने वाली असुविधा से बचाने के लिए उठाया गया है।

आगे क्या होगा?

जिन लोगों ने पहले ही अपने पार्सल बुक करा लिए हैं और जिनकी डिलीवरी नहीं हो सकती, वे डाक शुल्क वापस ले सकते हैं। डाक विभाग का कहना है कि वह स्थिति पर नजर बनाए हुए है और जल्द से जल्द सेवाएँ फिर से शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं।

यह फैसला भारत और अमेरिका में चल रहे व्यापारिक तनाव के बीच आया है। अमेरिका ने हाल ही में भारतीय सामानों पर 50% का शुल्क लगाया है, जिसमें रूस से तेल खरीदने के लिए अतिरिक्त शुल्क भी शामिल है। भारत ने इस फैसले को ‘अनुचित और अविवेकपूर्ण’ बताते हुए इसकी निंदा की है।

नक्सलियों के ‘सुरक्षा कवच’, गाँधी परिवार के ‘वफादार’… कॉन्ग्रेस ने जिन्हें बनाया उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार, जानिए उन सुदर्शन रेड्डी पर गृह मंत्री शाह ने क्यों उठाए सवाल: पढ़ें चिट्ठा

रिटायर्ड जस्टिस बालकृष्ण सुदर्शन रेड्डी को विपक्षी INDIA गठबंधन ने 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया है। इस गठबंधन में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, राजद, सपा, डीएमके, और अन्य क्षेत्रीय दल शामिल हैं। इस चुनाव में उनका मुकाबला NDA के उम्मीदवार सी.पी. राधाकृष्णन से होगा।

केंद्र की एनडीए सरकार के खिलाफ एकजुट होकर चुनाव लड़ रही INDIA गठबंधन ने रेड्डी को एक न्यायप्रिय, निष्पक्ष और संवैधानिक मूल्यों से जुड़े चेहरे के तौर पर पेश किया है। हालाँकि जस्टिस रेड्डी अपने कार्यकाल के दौरान और सेवानिवृत्ति के बाद भी अपने फैसलों से कॉन्ग्रेस के प्रति अपनी वफादारी को साफ तौर पर जाहिर कर दिया है।

गृह मंत्री ने उजागर की असलियत

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार (22 अगस्त 2025) को जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी पर तीखा हमला बोला।,उन्होंने जस्टिस रेड्डी के पुराने न्यायिक निर्णयों के जरिए वामपंथी उग्रवाद का समर्थन करने का आरोप लगाया।

केरल में एक कार्यक्रम में बोलते हुए गृह मंत्री ने कहा, “विपक्ष (कॉन्ग्रेस) के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी वही व्यक्ति हैं जिन्होंने सलवा जुडूम पर ऐसा फैसला दिया जो नक्सलवाद के समर्थन में था। अगर यह फैसला न दिया गया होता, तो 2020 तक उग्रवाद समाप्त हो चुका होता।”

अमित शाह ने आगे कहा, “केरल ने नक्सलवाद की पीड़ा झेली है और उग्रवाद का दंश सहा है। केरल की जनता निश्चित रूप से देखेगी कि कैसे वामपंथियों के दबाव में कॉन्ग्रेस ने ऐसा उम्मीदवार चुना जिसने सुप्रीम कोर्ट जैसे मंच का इस्तेमाल वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद को समर्थन देने के लिए किया।”

गृह मंत्री के बयान पर सुदर्शन रेड्डी ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पीटीआई भोषा से बात करते हुए रेड्डी ने कहा कि सलवा जुडूम पर फैसला उनका अपना नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट का था। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर वह गृह मंत्री के साथ बहस नहीं करना चाहते।

जस्टिस के तौर पर विवादित रहा सफर

जस्टिस रेड्डी का जन्म 8 जुलाई 1946 को तेलंगाना के रंगा रेड्डी ज़िले में एक किसान परिवार में हुआ। उनका न्यायिक करियर 1995 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायाधीश के तौर पर शुरू हुआ। इसके बाद वे गुवाहाटी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। 2007 से 2011 तक भारत के सर्वोच्च न्यायालय में बतौर जस्टिस अपनी सेवा भी दी।

जस्टिस रेड्डी के कार्यकाल में कई अहम फैसले आए, जिनमें मानवाधिकार, प्रशासनिक पारदर्शिता और सामाजिक न्याय से जुड़े विषय शामिल थे। लेकिन उनके कुछ ऐसे भी फैसलों रहे जिन पर विवाद हुआ और उसकी आलोचना आज भी होती आ रही है। आइए जानते हैं उन फैसलों के बारे में।

सलवा जुडूम को भंग करने का फैसला

छ्त्तीसगढ़ में नक्सलवादल को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने ‘सलवा जुडूम’ अभियान चलाया था। खास बात ये है कि ये अभियान छत्तीसगढ़ की तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार के समर्थन से ही चलाया गया था। इसका उद्देश्य राज्य में नक्सली हिंसा को रोककर शांति स्थापित करना था। इस अभियान की शुरुआत जून 2005 में कॉन्ग्रेस नेता महेंद्र कर्मा ने की थी।

कई वर्षों तक जनजातीय क्षेत्रों में हिंसा कर अपना गढ़ बना चुके नक्सलियों को खत्म करने में जनजातीय लोगों के हौसलों को सैन्य और पुलिस समर्थन भी मिलने लगा था। लेकिन जस्टिस रेड्डी और जस्टिस एस.एस. निज्जर की पीठ ने अपने फैसले में सलवा जुडूम अभियान को असंवैधानिक करार दिया।

5 जुलाई 2011 ने इसे भंग करते हुए पीठ ने फैसला में कहा कि सरकार गरीब आदिवासियों को बंदूक थमा कर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। जस्टिस रेड्डी के इस फैसले ने नक्सलियों के खिलाफ जंग को स्पष्ट तौर पर कमजोर कर दिया।

भोपाल गैस त्रासदी मामला

1984 की त्रासदी में हजारों लोगों की मौत हुई थी। CBI ने सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका दायर कर पुराने फैसले को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं ने यूनियन कार्बाइड और वॉरेन एंडरसन पर गंभीर आरोप लगाने की माँग की थी।

जस्टिस रेड्डी उस पाँच सदस्यीय पीठ का हिस्सा थे जिसने याचिका खारिज कर दी। इसका फैसला मई 2012 में आया था। इस फैसले से पीड़ितों को न्याय मिलने का एक मौका तो गया ही पर साथ ही जस्टिस रेड्डी और पीठ ने कॉन्ग्रेस की छत्रछाया में पल रही अमेरिकी कंपनी को भी साफ तौर पर बचाने का काम किया।

अर्मी कॉलेज की सीटों में आरक्षण मामला

दिल्ली स्थित आर्मी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (ACMS) एक प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थान है, जिसकी स्थापना भारतीय सेना द्वारा की गई थी। इस कॉलेज में MBBS की सीटें उपलब्ध हैं और लंबे समय से यह परंपरा रही है कि यहाँ प्रवेश केवल सेना के कार्यरत या सेवानिवृत्त कर्मियों के बच्चों को ही दिया जाता है।

इस नीति के खिलाफ कुछ याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि कॉलेज सार्वजनिक संसाधनों और रक्षा मंत्रालय के अधीन आता है, इसलिए इसकी सीटें सिर्फ एक वर्ग के लिए आरक्षित करना अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।

जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया कि ACMS की सभी सीटें केवल सैन्यकर्मियों के बच्चों के लिए आरक्षित रहेंगी। फैसले में यह भी कहा गया कि चूंकि यह संस्थान रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आता है और इसका संचालन सेना की आवश्यकताओं के अनुरूप होता है, इसलिए इसकी प्रवेश नीति को संवैधानिक रूप से वैध माना जा सकता है।

इसके अलावा रेड्डी ने 4 जुलाई 2011 को केंद्र सरकार को काले धन पर ढिलाई बरतने के लिए फटकार लगाई थी और एक विशेष जाँच टीम (SIT) गठित करने का निर्देश दिया। यह फैसला भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत कदम माना गया था। लेकिन अब कॉन्ग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाला INDIA गठबंधन अब उसी व्यक्ति को अपना उम्मीदवार बना रहा है। इससे सवाल उठना तो बनता है कि आखिर ऐसे व्यक्ति को उम्मीदवार के तौर पर कॉन्ग्रेस ने क्यों खड़ा किया?

क्यों किया गया जस्टिस रेड्डी का चयन?

रेड्डी की उम्मीदवारी को विपक्ष ने न्यायप्रिय और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा बताया है। लेकिन यह चयन वैचारिक कम और रणनीतिक अधिक है। INDIA गठबंधन के तहत DMK की माँग थी कि उम्मीदवार दक्षिण भारत से हो वहीं, TMC चाहती थी कि चेहरा गैर-राजनीतिक हो, और कॉन्ग्रेस को एक ऐसा व्यक्ति चाहिए था जिसकी छवि बेदाग हो। रेड्डी इन तीनों शर्तों पर खरे उतरते हैं।

इसके साथ ही जस्टिस बालकृष्ण सुदर्शन रेड्डी का नाम उम्मीदवार के तौर पर लाना राजनीतिक गलियारों में अपेक्षित नहीं था। जाहिर तौर पर कॉन्ग्रेस उनके जरिए संविधान की रक्षा, संघ विचारधारा के खिलाफ वैचारिक लड़ाई जैसे विषय पर बात करके और दक्षिण भारत के वोट बैंक को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही है।

उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद के लिए उनका चयन एक गंभीर सवाल उठाता है। जैसे कि इस पद के लिहाज से क्या क्या विपक्ष ने एक निष्पक्ष न्यायाधीश को चुना है या ढोंग करके एक ऐसा चेहरा लोगों के सामने पेश किया जो उनके वैचारिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधता है?

कब होगा उपराष्ट्रपति के लिए चुनाव

संसद में 21 जुलाई 2025 को मानसून सत्र के पहले दिन जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने उपराष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दे दिया। इशके बाद नए उपराष्ट्रपति को लेकर दोबारा चुनाव प्रक्रिया की जानी है।

उपराष्ट्रपति पद के लिए मतदान 9 सितंबर 2025 को होना निर्धारित किया गया है और उसी दिन मतगणना भी होगी। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 21 अगस्त 2025 थी, जबकि प्रत्याशी अपना नाम 25 अगस्त तक वापस ले सकते हैं।

उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सांसदों द्वारा किया जाता है। यह चुनाव संविधान के अनुच्छेद 64 और 68 के तहत संचालित होता है और 1952 के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव अधिनियम के अनुसार चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचित किया जाता है।

₹12 करोड़ कैश, ₹6 करोड़ का सोना, 10 किलो चाँदी और विदेशी मुद्रा…. ED के छापे के बाद कर्नाटक के कॉन्ग्रेस विधायक गिरफ्तार: अवैध सट्टेबाजी मामले में एक्शन, दुबई से मिले लिंक

कर्नाटक के कॉन्ग्रेस विधायक केसी वीरेंद्र उर्फ पप्पी को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गंगटोक (सिक्किम) से गिरफ्तार कर लिया है। कॉन्ग्रेस विधायक पर अवैध ऑनलाइन और ऑफलाइन सट्टेबाजी मामले में कार्रवाई की गई है।

साथ ही ED ने कॉन्ग्रेस विधायक के ठिकानों पर छापेमारी कर 12 करोड़ रुपए नगद, 6 करोड़ रुपए सोने के आभूषण, लगभग 10 किलोग्राम चाँदी और 4 वाहन बरामद किए गए हैं। नगद में एक करोड़ विदेशी मुद्रा भी मिली है। इसके अलावा ED ने 17 बैंक खाते और 2 बैंक लॉकर भी सीज किए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह कार्रवाई धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत दो दिन से ED द्वारा देशभर में 31 ठिकानों पर छापेमारी के बाद की गई है। 22 और 23 अगस्त 2025 को ED ने चित्रदुर्ग में 6 स्थानों, बेंगलुरु में 10, हुबली में 1, मुंबई में 2, जोधपुर में 3, गोवा में 8 और गंगटोक में छापेमारी की।

इनमें बिग डैडी कसिनो, ओशियन रिवर कसिनो, पप्पीज कसिनो प्राइड, ओशियन 7 कसिनो और पप्पीज कसिनो गोल्ड भी शामिल हैं। ED को ऑनलाइन सट्टेबाजी के लिंक दुबई से भी मिले हैं। ED के अनुसार, कॉन्ग्रेस विधायक केसी वीरेंद्र King567 और Raja567 जैसे नामों से कई अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म चला रहा था।

इन प्लेटफॉर्म को दुबई की कंपनी Diamond Softech, TRS Technologies और Prime9Technologies के माध्यम से विधायक का भाई केसी थिप्पेस्वामी संभालता था। ये कंपनियाँ बेटिंग प्लेटफॉर्म को कॉल सेंटर सेवा उपलब्ध कराती हैं।

ED के मुताबिक, केसी वीरेंद्र एक जमीनी कसिनों को पट्टे पर लेने के लिए बागडोगरा होते हुए गंगटोक गए थे। छापेमारी के दौरान उनके खिलाफ सबूत मिले, जिसके बाद गंगटोक से उन्हें गिरफ्तार किया गया है। इसके बाद गंगटोक की कोर्ट में उन्हें पेश कर बेंगलुरु कोर्ट में पेश करने के लिए ट्रांजिट रिमांड ली गई। मामले में आगे की जाँच जारी है।

कौन है केसी वीरेंद्र ?

केसी वीरेंद्र उर्फ पप्पी पेशे से कारोबारी हैं। उन्होंने साल 2023 में कर्नाटक की चित्रदुर्ग विधानसभा क्षेत्र से कॉन्ग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता। उनके चुनावी हलफनामें में कुल ₹134.9 करोड़ की संपत्ति दर्ज है। इसके अलावा कॉन्ग्रेस विधायक पर 2 अपराधिक मामले दर्ज हैं।

कर्नाटक विधायक सतीश कृष्ण सैल के घर भी हुई थी छापेमारी

केसी वीरेंद्र से पहले कर्नाटक कॉन्ग्रेस विधायक सतीश कृष्ण सैल ED के शिकंजे में आए थे। 14 अगस्त 2025 को ED की छापेमारी में सतीश कृष्ण के घर से ₹1.41 करोड़ नगद मिले थे। इसके साथ उनके और परिवार के बैंक लॉकरों से 6.75 किलो गोल्ड की ज्वेलरी और बिस्किट बरामद किए थे।

यह मामला साल 2010 से जुड़ा हुआ था। मामले में सतीश कृष्ण पर आरोप है कि उन्होंने अन्य कंपनियों और बेलकेरी पोर्ट के अधिकारियों के साथ मिलकर करीब 1.25 लाख मीट्रिक टन आयरन गैरकानूनी तरीके से बाहर भेजा था, जिसकी कुल कीमत ₹86.78 करोड़ बताई गई।

‘भारत रेड लाइन्स से नहीं करेगा समझौता’: जयशंकर की टैरिफ वॉर पर अमेरिका को दो टूक, बोले- तेल खरीदने पर हमें निशाना बनाने वाली दलीलें चीन पर क्यों नहीं होतीं लागू

अमेरिका और भारत के बीच टैरिफ को लेकर जारी विवाद पर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अहम टिप्पणियाँ की हैं। जयशंकर ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत अपनी ‘रेड लाइन’ से कभी समझौता नहीं करेगा, चाहे बात किसानों के हितों की हो या रणनीतिक स्वायत्तता की। अमेरिका द्वारा लगाए टैरिफ पर जयशंकर ने कहा, “इसे तेल का मुद्दा बताया जाता है लेकिन चीन पर कोई टैरिफ नहीं लगाया गया।”

जानकारी के मुताबिक, अमेरिका के साथ ट्रेड को लेकर विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा, “बातचीत अभी भी चल रही हैं लेकिन हमारी कुछ रेड लाइन्स हैं। सबसे अहम है किसानों और छोटे उत्पादकों के हित, यह ऐसा मुद्दा है जिस पर समझौता संभव नहीं है।”

जयशंकर ने अमेरिका पर सवाल उठाते हुए कहा, “इसे तेल का मुद्दा बताया जाता है लेकिन चीन, जो रूस से सबसे बड़ा आयातक है, उस पर कोई टैरिफ नहीं लगाया गया। भारत को निशाना बनाने वाली दलीलें चीन पर क्यों लागू नहीं होतीं?”

इकोनॉमिक टाइम्स वर्ल्ड लीडर्स फोरम 2025 में विदेश मंत्री जयशंकर ने यूरोप और अमेरिका को लेकर कहा, “अगर आपको भारत से तेल या रिफाइंड उत्पाद खरीदने में समस्या है, तो इसे न खरीदें, लेकिन यूरोप खरीदता है, अमेरिका खरीदता है। अगर पसंद नहीं तो हमसे मत खरीदिए।”

उन्होंने आगे कहा, “यह हास्यास्पद है कि एक व्यापार-समर्थक अमेरिकी प्रशासन के लिए काम करने वाले लोग दूसरों पर व्यापार करने का आरोप लगा रहे हैं।” अमेरिका और पाकिस्तान के बीच संबंधों पर बोलते हुए उन्होंने कहा, “उनका एक-दूसरे के साथ इतिहास रहा है और अपने इतिहास को नजरअंदाज करने का भी उनका इतिहास रहा है।”

ट्रंप जैसा राष्ट्रपति नहीं देखा: जयशंकर

जयशंकर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बारे में कहा, “अब तक हमने ऐसा कोई अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं देखा है, जिसने विदेश नीति को वर्तमान राष्ट्रपति की तरह सार्वजनिक रूप से संचालित किया हो। यह अपने आप में एक बदलाव है, जो केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप का दुनिया के साथ व्यवहार करने का तरीका, यहाँ तक ​​कि अपने देश के साथ व्यवहार करने का तरीका पारंपरिक रूढ़िवादी तरीके से बहुत बड़ा बदलाव है।”

इंजीनियर ने किया ₹100 करोड़ का भ्रष्टाचार, छापा पड़ा तो बीवी ने ₹2-3 करोड़ के नोट जलाकर फ्लश में ठूँसे: नाला जाम होने पर पता चली हरकत, पति-पत्नी गिरफ्तार

बिहार के पटना में इंजीनियर विनोद राय के घर छापा पड़ा तो उनकी पत्नी ने रातोंरात 2-3 करोड़ रुपए जलाकर सबूत मिटाने की कोशिश की। विनोद राय, ग्रामीण कार्य विभाग में सुपरीटेंडेंट इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने 100 करोड़ रुपए की संपत्ति होने की सूचना पर उनके घर छापेमारी की।

दरअसल, पटना के भूतनाथ रोड स्थित इंजीनियर के आवास पर EOU गुरुवार (21 अगस्त 2025) को छापा मारने पहुँची थी। इंजीनियर की बीवी बबली राय ने घर में अकेले होने का हवाला देते हुए EOU को अगले दिन आने के लिए बोला। उस दिन EOU पूरी रात घर के बाहर बैठी रही। वहीं उसी रात बबली राय ने सबूत मिटाने की कोशिश की।

इंजीनियर की बीवी ने आधी रात को करीब 2-3 करोड़ रुपए नोट और दस्तावेज जला दिए। उन अधजले नोटों को टॉयलेट में फ्लश करने की कोशिश की लेकिन उससे पाइपलाइन जाम हो गई। अगली सुबह शुक्रवार (22 अगस्त 2025) को सुबह 5 बजे EOU की टीम लौटी, यहाँ टीम को जलने की दुर्गंध आई।

टीम ने भीतर आकर जाँच करने के लिए कहा तो बबली राय ने फिर अकेले होने का हवाला देकर धमकी दी। कहासुनी के बाद परिचितों को बुलाने पर मानी। करीब आधे घंटे बाद EOU ने घर में प्रवेश किया तो हैरानी वाला दृश्य देखा। टीम को छापेमारी में 12-13 लाख रुपए के नोटों के बंडल मिले। छापेमारी की गई तो टॉयलेट, पानी की टंकी, किचन की नाली के पाइप में भी पैसे छिपाकर रखे हुए थे

इंजनीयिर विनोद कुमार राय गिरफ्तार

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, EOU ने छापेमारी में 39 लाख रुपए नगद, 10 लाख रुपए के जेवर, 6 लाख रुपए की लग्जरी गाड़ियों और करोड़ों की जमीन के दस्तावेज बरामद किए। EOU के अनुसार इंजीनियर ने 2-3 करोड़ रुपए जलाकर सबूत भी मिटाए हैं।

साथ ही EOU ने घर की निचली मंजिल में छिपे इंजीनियर विनोद कुमार राय को भी गिरफ्तार कर लिया है। साथ ही इंजीनियर की बीवी बबली पर भी कार्रवाई की गई।

मनी लॉन्ड्रिंग एंगल से ED करेगी जाँच

EOU की कार्रवाई के बाद अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी इस मामले मनी लॉन्ड्रिंग एंगल की जाँच शुरू कर सकती है। इंजीनियर विनोट राय के पास मिले 15 बैंक खातों, 18 जमीन के डीड, बीमा पॉलिसी और बाकी निवेश दस्तावेजों से मनी लॉन्ड्रिंग का शक जताया गया है।

ये सारी संपत्ति इंजीनियर की आय से कहीं अधिक है। EOU के अनुसार उनकी कुल संपत्ति 100 करोड़ रुपए के करीब है।

5 करोड़ रुपए कैश लेकर भागे थे

विनोद राय ग्रामीण कार्य विभाग के सीतामढ़ी डिवीजन में सुपरीटेन्डेंट इंजीनियर के पद पर तैनात हैं। उनके पास मधुबनी का भी प्रभार है। गुरुवार (21 अगस्त 2025) को इंजीनियर सीतामढ़ी से 5 करोड़ रुपए कैश लेकर निकले थे। इसी सूचना पर EOU ने इंजीनियर का पीछा किया लेकिन वो हाथ नहीं लगे। इसके बाद घर में छापेमारी की।

5 साल में करें 5 यूनिकॉर्न तैयार, ताकि हर साल हों 50 रॉकेट लॉन्च: ‘नेशनल स्पेस डे’ पर PM मोदी ने की स्टार्टअप्स से अपील, कहा- अब चाँद और मंगल तक नहीं रहेंगे सीमित, गहरे अंतरिक्ष में पहुँचेगा भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (23 अगस्त 2025) नेशनल स्पेस डे के मौके पर देशवासियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि इस बार की थीम ‘आर्यभट्ट से गगनयान तक’ है, जिसमें अतीत का आत्मविश्वास और भविष्य का संकल्प दोनों झलकते हैं।

पीएम मोदी ने कहा, “स्पेस सेक्टर से जुड़े वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और युवाओं को बधाई देते हुए कहा कि भारत लगातार अंतरिक्ष विज्ञान में नए माइलस्टोन बना रहा है और यह देश के लिए गर्व की बात है।”

उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए बताया कि भारत अब ‘Astronaut Pool’ तैयार करने जा रहा है और इसमें युवाओं को जुड़ने के लिए आमंत्रित किया। हाल ही में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर तिरंगा फहराने वाले ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला से मुलाकात का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि उस पल ने हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया।

पीएम मोदी ने बताया कि भारत सेमी क्राइअजेनिक इंजन (semi-cryogenic engine) और इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन (electric propulsion) जैसी नई तकनीक पर तेजी से काम कर रहा है। जल्द ही गगनयान मिशन लॉन्च होगा और आने वाले वर्षों में भारत अपना स्पेस स्टेशन भी बनाएगा।

पीएम मोदी ने कहा, “अभी हम चाँद और मंगल तक पहुँचे हैं। अब हमें गहरे अंतरिक्ष में उन हिस्सों में भी झाँकना है, जहाँ मानवता के भविष्य के लिए कई जरूरी रहस्य छिपे हैं।” प्रधानमंत्री ने स्पेस सेक्टर में हुए सुधारों पर भी प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि पहले इस क्षेत्र को कई पाबंदियों में बांधा गया था लेकिन अब प्राइवेट सेक्टर के लिए दरवाजे खोल दिए गए हैं। आज देश में 350 से ज्यादा स्टार्टअप्स स्पेस-टेक में काम कर रहे हैं।

पीएम मोदी ने स्टार्टअप्स से अपील की कि वे अगले 5 सालों में कम से कम 5 यूनिकॉर्न तैयार करें और भारत को उस स्थिति तक ले जाएँ कि हर साल 50 रॉकेट लॉन्च कर सके।

क्यों मनाया जाता है नेशनल स्पेस डे?

भारत ने इतिहास रचते हुए 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सफलतापूर्वक उतारा था। इसी मिशन में प्रज्ञान रोवर भी सफलतापूर्वक तैनात किया गया।

इस सफलता के बाद भारत चाँद पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा और साउथ पोल पर लैंडिंग करने वाला पहला देश बना। इस गौरवपूर्ण उपलब्धि को यादगार बनाने के लिए सरकार ने 23 अगस्त को ‘नेशनल स्पेस डे’ घोषित किया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि अंतरिक्ष तकनीक अब सिर्फ विज्ञान तक सीमित नहीं है बल्कि यह Ease of Living का भी साधन बन गई है।