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जो जज जमानत न दे उसके पास केस लेकर क्यों जाएँ?: उमर खालिद के समर्थन में उतरे राजदीप सरदेसाई, ‘बेंच हंटिंग’ को दिया सही करार

दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में 2020 के दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगे के आरोपित उमर खालिद और अन्य आरोपितों की जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि आरोपितों पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया (prima facie) सही लगते हैं।

इस फैसले से तथाकथित लेफ्ट-लिबरल गैंग खासा परेशान हो गया है। पत्रकार राजदीप सरदेसाई भी उमर खालिद की जमानत खारिज होने पर नाराज दिखे।

उनके मुताबिक, सोशल मीडिया पर यह ‘नैरेटिव’ फैलाया जा रहा है कि उमर खालिद वर्षों से जेल में हैं और इसकी वजह कोर्ट की देरी नहीं है, बल्कि उनके वकील ही बार-बार सुनवाई टलवाते रहे हैं।

राजदीप सरदेसाई यह तो नहीं नकारते कि उमर खालिद के वकील बार-बार तारीख (adjournments) माँगते रहे हैं लेकिन वे इस देरी की रणनीति और फोरम शॉपिंग को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। हाई कोर्ट ने इन तरीकों को भांप लिया था।

सरदेसाई का कहना है कि खालिद के वकील तारीखें लेने और सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) वापस लेने में सही थे, क्योंकि यह मामला उस जज के पास लगा था जिसकी पहचान ऐसे मामलों में जमानत न देने के लिए रही है।

खालिद अपनी लंबी कैद को जमानत के आधार के रूप में कैसे इस्तेमाल करना चाहता था?

उमर खालिद की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि खालिद के वकील ही जानबूझकर देरी कर रहे हैं। विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने कहा कि 2023 से 2024 के बीच कुल 14 तारीखों में से 7 बार सुनवाई खालिद के वकीलों ने ही टलवाई। यानी जमानत याचिका में देरी कोर्ट की धीमी प्रक्रिया से नहीं, बल्कि खालिद की कानूनी रणनीति से हुई, ताकि जेल में लंबी कैद को जमानत का आधार बनाया जा सके।

अभियोजन ने यह भी बताया कि 2022 में हाई कोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद खालिद ने लगभग 6 महीने तक सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल नहीं की और फिर अप्रैल 2023 में दाखिल करने के बाद इसे वापस ले लिया।

इसके लिए वकीलों ने ‘परिस्थितियों में बदलाव’ का हवाला दिया। यह तथाकथित बदलाव दो कारणों से जुड़ा था। पहला जस्टिस अनिरुद्ध बोस के रिटायर होने के बाद बेंच में बदलाव हुआ और मामले को जस्टिस बेला त्रिवेदी के सामने सूचीबद्ध किया गया, जिसे खालिद के वकीलों ने बार-बार बदलवाने की कोशिश की।

दिलचस्प बात यह है कि ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान खालिद के वकील कपिल सिब्बल ने देरी का ठीकरा सुप्रीम कोर्ट पर फोड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि SLP की सुनवाई टलने और अंत में फरवरी 2023 में इसे वापस लेने की वजह सुप्रीम कोर्ट की धीमी कार्यवाही और बदलती परिस्थितियाँ थीं। सिब्बल ने खालिद को न्यायिक व्यवस्था का शिकार दिखाने की कोशिश की, जबकि हकीकत यह थी कि वे इसी व्यवस्था का दुरुपयोग करके उसे रिहाई दिलाना चाहते थे।

यह भी महत्वपूर्ण है कि खालिद का मामला उस सिद्धांत पर खरा नहीं उतरता कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’, क्योंकि 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि UAPA मामलों में ‘जेल नियम है और जमानत अपवाद’।

पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने खालिद की टालमटोल की रणनीति की आलोचना की

उमर खालिद के वकीलों की फोरम शॉपिंग और जानबूझकर देरी करने की रणनीति पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी वाई चंद्रचूड़ ने भी आपत्ति जताई थी। उन्होंने वही बातें दोहराईं जो अभियोजन पक्ष ने दिल्ली हाई कोर्ट में खालिद की जमानत सुनवाई के दौरान रखी थीं।

पूर्व CJI ने कहा कि खालिद के वकील बार-बार सुनवाई टलवाते रहे और सुप्रीम कोर्ट से अपनी जमानत याचिका वापस ले ली, लेकिन ऐसा माहौल बनाया जैसे पूरी न्यायिक व्यवस्था ही उनके खिलाफ काम कर रही हो।

Rajdeep supports Umarr Khalid bench hunting and bail plea withdrawals

पहले कहा हेल्थ इंश्योरेंस से GST हटना चाहिए, जब मोदी सरकार ने हटा लिया तो कह रहे इससे फायदा नहीं होगा: मिलिए रोंदू रवीश कुमार से

मोदी सरकार ने हाल ही में बीमा पॉलिसियों पर ‘GST जीरो’ कर एक बड़ा फैसला लिया है। सरकार के इस कदम की तारीफ चारों ओर हो रही है। लेकिन, हमेशा की तरह प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार इस फैसले से भी नाखुश दिख रहे हैं। पहले जब बीमा पर 18% जीएसटी लगता था, तब रवीश कुमार सरकार पर जमकर हमला करते थे। अब जब सरकार ने लोगों को राहत देते हुए इंश्योरेंस पर टैक्स 0% कर दिया है, उसके बाद भी वह सवाल उठा रहे हैं कि क्या वाकई GST जीरो होने से लाभ होगा।

रवीश कुमार 8 साल वाला हवाला तो दे रहे हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस काल में ऐसा फैसला कभी नहीं लिया गया, ये नहीं बता रहे हैं। इससे उनकी पत्रकारिता साफ झलकती है कि उनकी दुकान सिर्फ मोदी सरकार को कोसने से चलती है। और उनका लाभ कॉन्ग्रेस सरकार की खामियों पर पर्दा डालने से हैं।

रवीश का दोहरा मापदंड

पिछले साल प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार ने अपने यूट्यूब चैनल @ravishkumar.official पर एक वीडियो बनाकर डाला, जिसकी हेडलाइन ‘ममता की माँग: वापिस लो 18% GST’ थी। इस वीडियो में रवीश कुमार सरकार पर कई आरोप लगाते है। रवीश कुमार मेडिकल और स्वास्थ्य बीमा पर 18% GST का मुद्दा जोर-शोर से उठाते हैं। इसके अलावा इसे ‘जनविरोधी’ बताते हैं।

रवीश कुमार बताते है कि 18% GST होने से वरिष्ठ नागरिक सबसे ज्यादा परेशान है और दूसरे देशों की तुलना में यह सबसे ज्यादा है। रवीश कुमार सरकार पर गरीबों से पैसा लूटने का आरोप भी मड़ते है। उनके वीडियो में वह लगातार सरकार से सवाल करते कि वह बीमा पर टैक्स क्यों वसूल रही है। उस समय उनका तर्क था कि इस टैक्स से आम आदमी पर बोझ बढ़ रहा है, जिसे सरकार को वापस ले लेना चाहिए।

अब राहत मिली तो फिर हंगामा

अब जब सरकार ने वही किया, जिसकी माँग हो रही थी तो रवीश कुमार ने एक नई कहानी गढ़ ली। अब वह फिर से यूट्यूब पर वीडियो बनाकर पूछ रहे हैं कि क्या वाकई इंश्योरेंस पर ‘GST जीरो’ होने से कुछ लाभ होने वाला है??? रवीश कुमार को अब भी यकीन नहीं हो रहा कि जो काम कॉन्ग्रेस काल में नहीं हो पाया, वो काम मोदी सरकार ने एक झटके में कर दिखाया।

रवीश कुमार इस बात को बस हज़म नहीं कर पा रहे हैं कि इंश्योरेंस पर GST 18% से 0% कैसे हो गई, जो 70 साल से राज कर रही कॉन्ग्रेस में नहीं हो पाई। अपनी वीडियो में रवीश कुमार कह रहे है कि मोटा-मोटी वाला अनुमान दीजिए, क्योंकि उन्हें ‘जीरो’ GST समझ आने वाला नहीं है। इसके अलावा रवीश कुमार अपनी वीडियो में आरोप लगाते है, कि लोग प्राइवेट अस्पताल में इसलिए जाते हैं, क्योंकि सरकारी अस्पतालों की हालत ठीक नहीं है।

वहीं, सरकारी अस्पतालों की बात करते हुए उन्हें आइना दिखा देते हैं और याद दिलाते है 2014 के बाद की। स्वास्थ्य व्यय लगभग तीन गुना बढ़कर 95,958 करोड़ रुपए हुआ। सरकारी अस्पतालों में 50 करोड़ से ज्यादा नागरिकों को 5 लाख रुपए का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा मिला। ये पैसा अस्पताल में इलाज के लिए दिया गया, जिससे लोग इलाज के लिए अपनी जेबों से पैसा खर्च ना करें और सरकार की तरफ से मुफ्त इलाज आसानी से करवा सके।

इस योजना में पहले सिर्फ गरीब-मिडिल क्लास लोग ही शामिल थे, लेकिन अब इसमें 70 से ज्यादा उम्र के वृद्ध लोग भी शामिल कर दिए गए है। 40 करोड़ से ज्यादा लोग आयुष्मान कार्ड बनवाकर 17000+ सरकारी अस्पताल में लाभ ले रहे हैं। वहीं, 2014 के 80 केंद्रों से बढ़कर अब 16000+ केंद्र हुए, जहाँ 90% तक सस्ती दवाओं का लाभ लिया जा सकता है। इस सेवा से भी लोगों के 28,000 करोड़ रुपए की बचत का लाभ लिया हैं। रवीश कुमार कॉन्ग्रेस काल के सरकारी अस्पतालों की स्थिति को याद करते हुए रोते हैं और मोदी सरकार पर आरोप मढ़ देते हैं।

रवीश कुमार ने वीडियो में एक क्लिप दिखाई जिसमें पीएम मोदी इंदिरा गाँधी के टॉफी पर 21 प्रतिशत GST लगाने की बात कहते हैं और इसी का हवाला देते हुए निशाना साधते है। लेकिन रवीश कुमार भूल गए कि उसी इंदिरा गाँधी के दौर में इनकम टैक्स की दर एक समय में 97.5% तक पहुँच गई थी। और जवाहरलाल नेहरू के समय में 12 लाख कमाने वाले को 3 लाख टैक्स देना पड़ता था। लेकिन पुरानी बातें सोचने में शायद उन्हें मेहनत लगती है, इसलिए वह 10 साल वाली बातें ही सोच सकते हैं।

मोदी सरकार ने 12 लाख रुपए तक की आय को पूरी तरह से टैक्स-फ्री किया। यह फैसला मिडिल क्लास के लिए एक बड़ी राहत बनकर उभरा, जिससे उनकी जेब पर बोझ कम हुआ। लेकिन रवीश कुमार और उनके जैसे पत्रकार इस सकारात्मक बदलाव को देखने के बजाय सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति कर रहे हैं। रवीश जी, आरोप तो बहुत है, लेकिन अगर खोलने पर आए, तो एक किताब बन सकती है।

रवीश कुमार की ‘पत्रकारिता’ सिर्फ मोदी सरकार को गाली देने और कॉन्ग्रेस के ‘काले कारनामों’ पर पर्दा डालने तक सीमित है। उनकी हर रिपोर्ट और वीडियो में एक ही एजेंडा नजर आता है- सरकार की हर नीति में कमी निकालना, चाहे वह अच्छी हो या बुरी। GST पर उनके बदलते रुख से साफ है कि वह एक ‘टूटे हुए टेप रिकॉर्डर’ की तरह हैं जो हमेशा ‘सरकार के खिलाफ’ बजता रहता है।

‘यीशु की शरण में ठीक होंगी बीमारियाँ’: रतलाम के मेडिकल कॉलेज में जनजातीय मरीजों को निशाना बना रहे मिशनरी, नर्सिंग छात्र समेत 3 गिरफ्तार

मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में इलाज और प्रार्थना के बहाने जनजातीय समुदाय के लोगों पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाए जाने का मामला सामने आया है। यहाँ लोगों से कहा जाता था कि दवा से ठीक ना हो तो प्रभु यीशु की प्रार्थना करो और ईसाई बन जाओ। पुलिस ने इस मामले में चार लोगों पर केस दर्ज किया है, जिनमें से तीन को गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं एक अब भी फरार है।

शुक्रवार (5 सितंबर 2025) को रतलाम के औद्योगिक क्षेत्र स्थित टैंकर रोड पर एक झोपड़ी में प्रार्थना और इलाज के नाम पर जनजातीय महिलाओं और बच्चों को इकट्ठा किया गया था। सूचना मिलने पर हिंदू संगठनों के लोग वहाँ पहुंचे, तो उन्हें वहाँ बाइबल और क्रॉस मिले। कई लोगों की आँखों पर कपड़ा बाँधकर, सिर पर हाथ रखकर सामूहिक प्रार्थना करवाई जा रही थी। इनमें 18 साल से कम के लोग भी थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विरियाखेड़ी निवासी कैलाश निनामा, जो कि अनुसूचित जनजाति से हैं और मजदूरी करते हैं, उन्होंने पुलिस को बताया कि 4-5 महीने पहले बीमार होने पर वे मेडिकल कॉलेज इलाज के लिए गए थे। वहाँ उनकी मुलाकात जगदीश निनामा से हुई। जगदीश ने कहा कि अगर दवाइयों से फायदा न हो, तो प्रभु यीशु की प्रार्थना से राहत मिलेगी।

बाद में जगदीश ने कैलाश को बताया कि हर शुक्रवार को उसके भाई विक्रम के घर पर प्रार्थना होती है और वहाँ आकर वह भी ठीक हो सकते हैं। शुक्रवार (5 सितंबर) को कैलाश विक्रम के घर शिवनगर पहुँचे, जहाँ पहले प्रार्थना हुई, फिर प्रसाद दिया गया।

इसके बाद कैलाश ने बताया कि वहाँ मौजूद लोगों में शामिल जगदीश, विक्रम, मांगीलाल और अन्य ने उन पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाया। कहा गया कि प्रार्थना से कई लोगों की बीमारियाँ ठीक हुई हैं। कैलाश का कहना है कि वहाँ का प्रसाद खाने से उनका मानसिक संतुलन भी बिगड़ गया।

पुलिस ने धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर तीन आरोपितों गंगासागर निवासी जगदीश निनामा, शिवनगर निवासी विक्रम निनामा और राजस्थान निवासी मांगीलाल को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, मौके से मुख्य आरोपी ‘डॉक्टर’ विक्रम फरार हो गया है।

हिन्दुओं को खून पिलाकर-मांस खिलाकर पढ़ाते थे बाइबल, कहते थे अब तुम बन गए ईसाई: आगरा में सैकड़ों धर्मांतरण की दिल दहलाने वाली कहानी

आगरा में धर्मांतरण कराने वाले गिरोह को लेकर हर दिन नए खुलासे हो रहे हैं। अब ये पता चला है कि धर्मांतरण की प्रक्रिया काफी क्रूर और हैरान करने वाली थी। हिन्दू से ईसाई बनाने वाला गिरोह प्रार्थना सभा में लोगों को मांस खिलाकर खून पिलाता था। इसके बाद बाइबिल पढ़ाया जाता और कहा जाता था कि वे ईसाई बन गए हैं। इसके लिए उन्हें किसी तरह का सर्टिफिकेट या पेपर नहीं दिया जाता था।

इनलोगों को कभी भी कलावा नहीं बाँधने, तिलक नहीं लगाने और हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा नहीं करने के लिए कहा जाता था। यहाँ तक कि अपने घर में ये देवी-देवताओं की मूर्तियाँ नहीं रख सकते थे। सभा में शामिल होने वालों से वादा किया जाता था कि ईसाई बनने पर उनकी जिंदगी सुधर जाएगी और सरकारी नौकरी भी मिल सकती है।

प्रार्थना सभा में गुगल मीट के जरिए कई लोग जुड़ते थे। यूट्यूब पर इसका वीडियो अपलोड किया जाता था। साथ ही ईसाईयत का प्रचार किया जाता था। ये बात भी आरोपितों ने पुलिस को बताया है कि अक्सर स्पेन और दुबई के लोग प्रार्थना सभा में जुडते थे। राजकुमार ने एक यूट्यूब चैनल भी बना रखा था, जिसका नाम है ‘Church of God Agra,’ इस पर हर रविवार की सभाओं के वीडियो डाले जाते थे।

इसके 176 सबस्क्राइबर हैं और 93 वीडियो अपलोड हैं। सभी वीडियो प्रार्थना सभा या उसके द्वारा दिए गए उपचार के हैं। इनमें से कुछ वीडियो ऐसे भी हैं जो मतांतरित होने वाले लोगों के हैं। इसमें वे कह रहे हैं कि प्रार्थना सभा में शामिल होने से उनकी बीमारी ठीक हो गई।

धर्मांतरण करने वाले गिरोह का मुख्य आरोपी राजकुमार लालवानी को फंड मुहैया कराया जाता था। उसके पास से डायरी और रजिस्टर बरामद हुए हैं। इनमें कई लोगों के नाम और नंबर हैं, जिसकी जाँच पुलिस कर रही हैं। राजकुमार को विदेश से भी फंडिंग हो रही थी। इसके अलावा महाराष्ट्र, हरियाणा से फंडिंग के सबूत मिले हैं। हालाँकि पैसे किसके खाते में आ रहे थे, कौन भेज रहा था। इसकी अभी जाँच चल रही है। लोग राजकुमार की बेटी के खाते में भी पैसे भेज रहे थे, इसकी जानकारी पुलिस के पास है।

उसने अब तक 500 से ज्यादा लोगों को ईसाइयत का पाठ पढ़ाया। करीब 5 साल पहले मुंबई के उल्लासनगर से राजकुमार ने ईसाइयत का प्रचार करना शुरू किया। इसके बाद आगरा उसके धर्मांतरण का अड्डा बना।

धर्म परिवर्तन करने वाला गिरोह ज्यादातर गरीबों और बीमारों को टारगेट करता था। इनलोगों को कष्ट दूर करने के बहाने बुलाता था और फिर उनका ब्रेनवॉश किया जाता था। हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को घर से बाहर करने और प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए कहा जाता था। राजकुमार केदारनगर में स्थित अपने घर में हर रविवार को ये सभा करता था। वहाँ आए लोगों से कहा जाता था कि मूर्तियाँ हटा दो, कलावा काट दो, सिंदूर और बिछुए उतार दो, तभी खुशहाली आएगी।

बाढ़ से जूझ रहा देश, राहुल गाँधी छुट्टी मनाने पहुँच गए विदेश: बिहार का ‘असाइनमेंट’ खत्म कर मलेशिया की हवा खा रहे ‘पार्ट टाइम राजनेता’, लोगों ने पूछा- जाकिर नाइक से मिलने तो नहीं गए

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी की बिहार में हुई वोटर अधिकार यात्रा खत्म हो गई है। यह यात्रा राहुल गाँधी के सवालों से ज्यादा विवादों की वजह से चर्चा की वजह बनी रही थी। कभी पीएम मोदी को माँ की गाली दी गई तो अंत तक आते-आते समाप्ति सभा रद्द करनी पड़ी। यात्रा खत्म हुई तो राहुल गाँधी फिर छुट्टी पर निकल गए हैं। राहुल गाँधी की मलेशिया से सामने आई तस्वीरों पर भारतीय जनता पार्टी के लोग और सोशल मीडिया यूजर्स तमाम सवाल उठा रहे हैं।

राहुल गाँधी पर जो ‘पार्ट टाइम राजनेता’ होने के आरोप लगते रहे हैं वो इन तस्वीरों के सामने आने के बाद एक बार फिर खड़े हो गए हैं। ऐसे तस्वीरें से सवाल खड़े होते हैं कि क्या राहुल गाँधी के लिए बिहार का यह यात्रा या अन्य राजनीतिक यात्राएँ एक ‘असाइनमेंट’ की तरह होती हैं। जिन्हें वे बस खत्म करना चाहते हैं ताकि उन्हें फिर छुट्टियाँ मनाने का एक मौका मिल सके। ऐसी ही यह मलेशिया यात्रा भी है।

कोई राहुल गाँधी की मलेशिया यात्रा के पीछे लापरवाही भरे रवैये पर बात कर रहा है तो किसी को इस यात्रा के पीछे गहरी साजिश नजर आ रही है। मालूम हो कि यह पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस नेता की किसी विदेश यात्रा को लेकर इस तरह का बवाल हुआ हो। अमेरिका, इटली और बैंकॉक जैसी यात्राओं के दौरान भी राहुल गाँधी पर सवाल उठ चुके हैं।

भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने X पर लिखा, “राहुल गाँधी एक बार फिर चुपके से विदेश निकल गए। इस बार मलेशिया के लंगकावी में छुट्टियाँ मना रहे हैं। लगता है बिहार की राजनीति की गर्मी और धूल झेली नहीं गई। या फिर यह किसी गुप्त मीटिंग का हिस्सा है, जिसके बारे में जनता को जानना ही नहीं चाहिए? खैर, जहाँ लोग असली मुद्दों से जूझ रहे हैं, वहीं राहुल गाँधी गायब होकर छुट्टियाँ मनाने की कला में माहिर हैं।”

इसी तरह अन्य लोग भी राहुल गाँधी से लगातार सवाल कर रहे हैं। पूछा जा रहा है कि एक तरफ उत्तर भारत बाढ़ से प्रभावित है। तो दूसरी तरफ राहुल गाँधी जनता को उनके हाल पर छोड़कर मलेशिया ट्रिप पर निकल गए हैं। लोगों का सवाल है कि क्या एक जननेता ऐसा होता है कि जब जनता को जमीन पर जरूरतों हो और वो सब छोड़कर छुट्टियाँ मनाने निकल पड़े हैं।

इसके अलावा ये ट्रिप विवाद में इसलिए भी है क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक ने भी भारत छोड़ने के बाद मलेशिया की नागरिकता ही ली है। ऐसे में सवाल किया जा रहा है कि कहीं राहुल गाँधी की ये ट्रिप किसी खास मुलाकात के लिए तो नहीं है। कुछ लोगों ने यहाँ तक लिख दिया है, “वह अपने गुरु जाकिर नाइक से मिलने मलेशिया गए हैं।”

एक सोशल मीडिया यूजर का पोस्ट

चुनाव के बीच विदेश जाने का रहा है कॉन्ग्रेस के युवराज का इतिहास

चुनावी मौसम के दौरान या ऐसे समय जब उनकी पार्टी को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत हो, जनता को बताए बिना छुट्टियों पर जाने का राहुल गाँधी का इतिहास रहा है। इसे लेकर यह सवाल भी उठ चुका है कि वह पार्टी पर संकट के बीच ही यात्राएँ करते हैं साथ ही भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा भी देते हैं। साल 2019 में उनकी बैंकॉक यात्रा इसी तरह से विवादों में आई थी। उस समय भी चुनावों के बीच में छोड़कर वो घूमने निकल गए थे।

इन सवालों के पीछे की वजह भी ठोस है। राहुल गाँधी ने विदेश यात्राओं के दौरान कई बार भारत विरोधी तत्वों से मुलाकात की है। उदाहरण के लिए साल 2023 में ही उन्होंने अमेरिका की यात्रा के दौरान हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ से मुलाकात की। बता दें कि HfHR एक इस्लामवादी वकालत समूह है, जो भारत में हिंदुओं पर भेदभाव करने का आरोप लगाता है।

साल 2022 के अप्रैल महीने में जब कॉन्ग्रेस पार्टी को नेतृत्व की जरुरत थी और प्रशांत किशोर को कॉन्ग्रेस में शामिल करने की चर्चा चल रही थी, उस समय भी वे बेफिकर होकर घूमने निकल गए थे। प्रशांत किशोर के पार्टी में शामिल होने से इनकार करने के तुरंत बाद राहुल गाँधी लगभग 10 दिनों के लिए अचानक गायब हो गए और उनकी कोई जानकारी नहीं मिल पाई। उस दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी को बिना किसी नेतृत्व के काम करना पड़ा जबकि पार्टी गहरे संकट में थी।

इससे पहले, दिसंबर 2021 में, जब पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार मिली थी, राहुल गाँधी निजी यात्रा के लिए इटली के दौरे पर थे। उनकी यात्रा की ही वजह से उस समय पंजाब में चुनावी तैयारियों को बड़ा झटका लगा क्योंकि कई रैलियाँ उनकी वापसी तक टाल दी गईं। उनकी यही यात्रा आम आदमी पार्टी की जीत और उनकी अपनी पार्टी के सफाया होने की वजह बनी।

सितंबर 2021 में, जब पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के कारण कॉन्ग्रेस संकट में थी, उस वक्त भी गाँधी परिवार शिमला में छुट्टियाँ मना रहा था। दिसंबर 2020 में जब कॉन्ग्रेस पार्टी का 136वाँ स्थापना दिवस मनाया जा रहा था, राहुल गाँधी फिर इटली चले गए। इसी तरह अक्टूबर 2019 में हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों से ठीक 15 दिन पहले वो बैंकॉक चले गए थे।

इसी तरह 2019 के लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद, बिना नतीजे देखे ही लंदन रवाना हो गए और छुट्टियाँ मनाने लगे। यहाँ तक कि उन्होंने सोनिया गाँधी द्वारा बुलाई गई अहम बैठक में भी हिस्सा नहीं लिया। इसके अलावा, राहुल गाँधी अक्सर अपनी विदेश यात्राओं के दौरान एसपीजी सुरक्षा (विशेष सुरक्षा दल) नहीं लेते थे और सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करते रहे। इसी कारण सरकार ने उनकी एसपीजी सुरक्षा वापस ले ली। इस पर संसद में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी सवाल उठाए।

गाजा के नाम पर फंड इकट्ठा करके जिन 4 सीरियाई नागरिकों ने उड़ाई मौज, वो सब दिल्ली में गिरफ्तार: भागने वाले थे भारत से, अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने दबोचा

अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने शनिवार (6 सितंबर 2025) को 3 सीरियाई नागरिकों को दिल्ली से गिरफ्तार किया है। ये लोग गाजा पीड़ितों के नाम पर अवैध तरीके से फंड जमा कर रहे थे। इनलोगों को भारत से भागने के फिराक में दिल्ली हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया गया है। उसका एक साथी पिछले महीने क्राइम ब्रांच के हत्थे चढ़ा था।

गिरफ्तार किए गए जकारिया हैथम अलजार, अहमद ओहद अलहबाश और यूसुफ खालिद अलजहर की पुलिस को पहले से तलाश थी। तीनों आरोपितों को दिल्ली से दुबई होते हुए दमिश्क जाने वाली उड़ान में सवार होने की कोशिश करते समय रोका गया। पुलिस ने इनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया था। ताकि वे भारत से भाग न सकें। इन लोगों ने गाजा पीड़ितों के नाम पर चंदा इकट्ठा किया और उस पैसे को अपनी ऐशो-आराम पर खर्च किया।

एक की गिरफ्तारी के बाद तीन अंडरग्राउंड हो गए थे

पुलिस ने इनमें से दमिश्क के रहने वाले अली मेघत अल-अजहर को अहमदाबाद के एलिसब्रिज इलाके के एक होटल से 23 अगस्त 2025 को गिरफ्तार किया था। उसके पास से 3,600 अमेरिकी डॉलर और 25,000 रुपए नकद बरामद हुए थे। इस होटल में ये तीनों भी रुके थे।

पहले कोलकाता गए और फिर अहमदाबाद पहुँचे

क्राइम ब्रांच की जाँच में सामने आया था कि यह चारों टूरिस्ट वीजा पर भारत आए थे। वे 22 जुलाई को कोलकाता उतरे और 2 अगस्त को अहमदाबाद पहुँच गए। यहाँ आरोपित ने मस्जिदों में जाकर गाजा में भूखे परिवारों के वीडियो दिखाकर चंदा इकट्ठा किया।

पुलिस को अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिले है कि यह पैसा गाजा भेजा गया हो। पीटीआई से बातचीत में शरद सिंघल ने कहा कि यह जाँच का विषय है कि वे पहले कोलकाता क्यों गए और फिर अहमदाबाद क्यों आए।

यह भी पता लगाया जा रहा है कि वे वास्तव में चंदा इकट्ठा कर रहे थे या किसी और मकसद से भारत आए थे। उन्होंने बताया कि अमेरिकी डॉलर की बरामदगी और कुछ डिजिटल लेन-देन भी शक पैदा करते हैं। पुलिस अब उनकी गतिविधियों और संपर्कों को समझने के लिए सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है। शुरुआती जाँच में यह भी सामने आया है कि आरोपित कुछ संदिग्ध लोगों के संपर्क में थे।

आतंकवाद विरोधी एजेंसियाँ ​​जाँच में शामिल

गुजरात एंटी-टेररिज़्म स्क्वॉड (ATS) और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने भी इस मामले की जाँच शुरू कर दी है, ताकि आरोपित के असली इरादों का पता लगाया जा सके और यह जाना जा सके कि इकट्ठा किया गया पैसा कहाँ भेजा गया।

पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है ताकि उनके नेटवर्क और संपर्कों का पता चल सके। पूछताछ में गिरफ्तार एक आरोपित ने माना था कि यह पैसा उन्होंने अपनी शानो-शौकत वाली जिंदगी पर खर्च किया। पुलिस के मुताबिक, दान इकट्ठा कर उन्होंने अपने वीजा नियमों का उल्लंघन किया है। सरकार ने अब उन्हें ब्लैकलिस्ट और डिपोर्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर रही है।

धर्म बदलो, तभी मिलेगी जमीन: बलरामपुर में डेमोग्राफी बदलने की साजिश में सामने आया पूर्व सपा सांसद रिजवान जहीर का नाम, पीड़ितों ने किया- घुसपैठ, धर्मांतरण और लैंड जिहाद पर खुलासा

विश्व हिंदू रक्षा परिषद ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में डेमोग्राफी बदलने की बड़ी साजिश का भंडाफोड़ किया है। परिषद का कहना है कि इस साजिश के पीछे समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद रिजवान जहीर का हाथ है।

लखनऊ में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल राय ने आरोप लगाए कि रिजवान जहीर के इशारे पर उसके गुर्गे सईद अहमद और तौकीर अहमद, छांगुर गैंग के साथ मिलकर हिंदुओं की जमीन पर कब्जा, अवैध धर्मांतरण और ‘लैंड जिहाद’ जैसे कृत्य करवा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि हर महीने हजारों बच्चियों का अपहरण कर जबरन धर्मांतरण कराया जा रहा है। अंबेडकरनगर को इसका ज्वलंत उदाहरण बताते हुए उन्होंने इस पर कड़ी कार्रवाई की माँग की। छांगुर पीर उर्फ जलालुद्दीन, जिसे इस साजिश का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है, फिलहाल जेल में है। लेकिन उसके गैंग की करतूतें लगातार उजागर हो रही हैं।

बलरामपुर के मुन्ना नाम के एक व्यक्ति ने आरोप लगाया कि उसे सपा सांसद रिजवान के लोगों ने प्रताड़ित किया और वोटर लिस्ट में गड़बड़ी कर इलाके में डेमोग्राफी बदलने की कोशिश की। मुन्ना ने कहा कि करोड़ों की संपत्ति फर्जी तरीके से अर्जित की गई है और अब हिंदू महिलाओं की जमीनों पर अवैध कब्जा कर उन पर जमीन के बदले धर्म परिवर्तन का दबाव दिया जा रहा है।

इस दौरान बलरामपुर निवासी जबीउल्ला ने दावा किया कि सपा शासनकाल में रिजवान जहीर के गुर्गे सईद अहमद और तौकीर अहमद नेपाल बॉर्डर से मुस्लिम परिवारों को बसाते थे। यहाँ हिंदुओं की जमीनों पर कब्जा कर अवैध धर्मांतरण भी कराया गया।

वहीं, झारखंड से आई एक महिला ने आरोप लगाया कि उसकी बेटी को पहले दोस्ती कर फँसाया गया। बाद में बहला-फुसलाकर बलरामपुर लाया गया और वहाँ से बंगाल ले जाकर जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया। महिला ने कहा कि आरोपित पैसा देकर पुलिस को चुप करा रहा है।

बलरामपुर, जो नेपाल सीमा से सटा इलाका है, वहाँ पहले भी डेमोग्राफी बदलने की कोशिशों का खुलासा हो चुका है। अब धीरे-धीरे इस साजिश के शिकार लोग सामने आकर अपनी बात रख रहे हैं। विश्व हिंदू रक्षा परिषद का दावा है कि यह सिर्फ एक मामला नहीं है, बल्कि सुनियोजित तरीके से कई हिंदू परिवारों को निशाना बनाकर उनकी जमीनों और आस्था पर हमला किया जा रहा है।

भारत को लेकर फिर झूठ फैला रहा था ट्रंप का ‘तोता’ पीटर नवारो, X ने किया भंडाफोड़ तो भड़का: पहले ‘ब्राह्मणों’ पर उगल रहा था जहर, अब ‘एलन मस्क’ के पीछे पड़ा

हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ एक मजबूत रिश्ते की बात की। वहीं, दूसरी तरह अमेरिकी सलाहकार पीटर नवारो का भारत-रूस से तेल खरीदने का आरोप लगातार जारी है। अब इन झूठे आरोपों को X (पहले ट्विटर) ने फैक्ट-चेक किया है और बताया कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है। भारत का रूस से तेल खरीदना मुनाफा नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाना है।

ये सच्चाई पीटर नवारो सहन नहीं कर पाए और एलन मस्क पर आरोप लगाते हुए कह दिया कि प्रचार करना बंद करो और कम्युनिटी नोट को ‘क्राप नोट’ कहकर खारिज कर दिया।

पीटर नवारो का आरोप

पीटर नवारो ने X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट किया कि भारत रूस से तेल ‘सिर्फ मुनाफे के लिए’ खरीदता है और इससे रूस को युद्ध में मदद मिलती है। इसके अलावा पीटर नवारो ने यह भी कहा कि भारत के टैरिफ लगाने से इसका असर अमेरिकी नौकरियों और टैक्सपेयर्स पर पड़ रहा है।

मस्क का फैक्ट-चेक

पीटर नवारो के इस पोस्ट को X ने कम्युनिटी नोट के जरिए फैक्ट-चेक किया। इस नोट में साफ तौर पर कहा गया कि भारत का रूस से तेल खरीदना उसकी ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा हुआ है, ना कि सिर्फ मुनाफे के लिए। इसके अलावा, नोट में यह भी कहा गया कि अमेरिका खुद भी रूस से कुछ सामान खरीदता है, जिसे एक ‘दोहरा मापदंड’ माना गया।

फैक्ट चेक से पीटर नवारो भड़का

फैक्ट-चेक से नाराज पीटर नवारो ने मस्क पर आरोप लगाया कि वह ‘प्रचार’ को प्लेटफॉर्म पर बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने इस कम्युनिटी नोट को ‘क्राप नोट’ कहकर खारिज किया और फिर भारत पर आरोपों की झड़ी लगा दी। पीटर नवारो ने कहा, “भारत रूस से तेल सिर्फ मुनाफे के लिए खरीदता है। रूस-यूक्रेन में जब युद्ध जारी नहीं था, तब भारत भी रूस से तेल नहीं खरीदता था। भारत सरकार की स्पिन मशीनें भी तेजी से आगे बढ़ रही है। यूक्रेनियों को मारना बंद करों, अमेरिकी लोगों की नौकरियाँ छीननी बंद करो।”

भारत का पलटवार

भारत ने पीटर नवारो के आरोपों को सीधे तौर पर खारिज किया और कहा कि ये बयान पूरी तरह गलत और भ्रामक हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जैसवाल ने कहा कि भारत और अमेरिका के रिश्ते एक ‘विशेष साझेदारी’ पर आधारित हैं और भारत इन झूठे आरोपों का जवाब नहीं देगा।

ट्रंप-मोदी का दोस्ताना

जब ट्रंप खुद भारत को अपना ‘दोस्त’ और भारत-अमेरिका रिश्तों को ‘विशेष‘ बता चुका हैं तो पीटर नवारो की ये बयानबाजी समझ से बाहर लगती है। ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी को दोस्त बताते हुए उनके साथ अपने रिश्तों को काफी मजबूत बताया था, लेकिन पीटर नवारो ने अपनी बयानबाजी से इस रिश्ते पर सवाल उठाने का कोई मौका नहीं छोड़ा।

पीटर नवारो की कड़ी आलोचना

पीटर नवारो ने भारत के खिलाफ न सिर्फ राजनीतिक हमले किए हैं, बल्कि कभी-कभी तो जातिवादी टिप्पणियाँ भी की हैं। पीटर नवारों ने आरोप लगाया था कि रूस से भारत जो तेल खरीदता है उसका सबसे ज्यादा लाभ और मुनाफा ब्राह्मण लेते हैं। इस बेहुदा बयान को भारत ने पूरी तरह से खारिज किया।

पीटर नवारो के बयान यह भी उजागर करते हैं कि अमेरिका का रवैया भारत के प्रति कहीं न कहीं दोहरे मापदंडों से भरा हुआ है। जब अमेरिका खुद रूस से कुछ वस्तुएँ खरीद रहा है तो भारत के खिलाफ इतने तीखे बयान क्यों? यह सवाल आज भी खड़ा है।

पीटर नवारो का ये लगातार हमला भारत के खिलाफ सिर्फ एकतरफा और दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है, बल्कि यह भारत और अमेरिका के रिश्तों को और भी तनावपूर्ण बना सकता है। ट्रंप का भारत के प्रति दोस्ताना रुख और पीटर नवारो की लगातार आलोचना, यह दोनों ही अलग-अलग चेहरे हैं।

दूध-आटा-चावल से टीवी-AC तक, जानिए कितना बचेगा अब आपका पैसा: मोदी सरकार की वेबसाइट पर खुद चेक करिए GST 2.0 के फायदे

देश में GST को लागू हुए 8 साल हो गए और अब इसमें बड़े बदलाव किए गए हैं। GST काउंसिल ने पुराने चार स्लैब (5%, 12%, 18% और 28%) को खत्म करके इसे सिर्फ 5% और 18% की दरों में बदल दिया है। लग्जरी और तंबाकू, पान मसाला और सॉफ्ट ड्रिंक्स जैसी हानिकारक वस्तुओं पर 40% का अतिरिक्त टैक्स लगाया गया है। GST की नई दरें 22 सितंबर 2025 से लागू होंगी।

इस फैसले से आम लोगों को सबसे ज्यादा राहत रोजमर्रा की जरूरत की चीजों पर मिलेगी। उदाहरण के लिए, दूध, ब्रेड, छेना और पनीर जैसे उत्पादों पर अब GST शून्य कर दिया गया है।

साबुन, शैंपू, टूथपेस्ट और टूथब्रश जैसी घरेलू चीजों पर सिर्फ 5% टैक्स लगेगा। पहले 12% और 18% GST वाले कई पैकेज्ड फूड आइटम जैसे नमकीन, भुजिया, चॉकलेट, पास्ता और कॉफी पर अब केवल 5% टैक्स लगेगा। वहीं, टीवी (32 इंच तक), एसी और डिशवॉशर जैसी कंज्यूमर ड्यूरेबल वस्तुओं पर टैक्स 28% से घटाकर 18% कर दिया गया है।

सरकार का दावा है कि यह ‘नेक्स्ट-जेन जीएसटी’ परिवारों को सीधे बचत देगा। इसी को समझाने के लिए सरकार ने एक खास वेबसाइट www.savingswithgst.in लॉन्च की है। इस वेबसाइट पर जाकर लोग किसी भी उत्पाद की पुरानी कीमत और नई कीमत देख सकते हैं। यहाँ ‘बेस प्राइस’, ‘वैट के साथ कीमत’ और ‘नेक्स्ट-जेन जीएसटी कीमत’, तीनों कैटेगरी दिखाई जाती हैं।

उदाहरण के तौर पर, अगर आप दूध को कार्ट में जोड़ते हैं तो पहले 60 रुपए प्रति लीटर की कीमत वैट के साथ 63.6 रुपए  दिखेगी, जबकि नए GST के बाद वही दूध 60 रुपए का ही मिलेगा।

savingwithgst.in से स्क्रीनशॉट

इसी तरह उपभोक्ता अलग-अलग कैटेगरी, जैसे फूड, स्नैक्स, घरेलू सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स और किचन आइटम्स की कीमतें को देख कर पता लगा सकते हैं कि उन्हें कितनी बचत हो रही है।

घरेलू सामान से होती है बड़ी बचत

घरेलू सामान पर GST लागू होने के बाद बचत और भी बढ़ गई है। उदाहरण के लिए, एक कॉटन गद्दा जो वैट में 1,536 रुपए का मिलता था, अब GST में 1,416 रुपए का हो गया है। वहीं टूथपेस्ट की कीमत 38.1 रुपए से घटकर 31.5 रुपए हो गई है।

रोजमर्रा की चीजों में भी अंतर साफ दिख रहा है। एक लीटर डिटर्जेंट, जो पहले वैट में 281.6 रुपए का मिलता था, अब GST में 259.6 रुपए में मिल रहा है। यहाँ तक कि बाँस का फर्नीचर भी 1,230 रुपए से घटकर 1,050 रुपए हो गया है।

savingwithgst.in के माध्यम से स्क्रीनशॉट

कुल मिलाकर, घरेलू सामान की पूरी टोकरी पर वैट टैक्स 635.7 रुपए था, जो GST में घटकर 307.1 रुपए रह गया है। यानी उपभोक्ताओं को लगभग 328.6 रुपए की सीधी बचत हो रही है।

मध्यम वर्ग के लिए एक पारदर्शी पहल

सरकार savingswithgst.in के जरिए उपभोक्ताओं से सीधे जुड़ने की कोशिश कर रही है। यह इंटरएक्टिव प्लेटफॉर्म न सिर्फ नए रेट दिखाता है बल्कि लोगों में यह भरोसा भी पैदा करता है कि नया GST सिस्टम आम जनता की मदद के लिए बनाया गया है।

खाद्य पदार्थों, घरेलू सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसोई और लाइफस्टाइल प्रोडक्ट्स पर कीमतें कम होने से परिवारों पर आर्थिक बोझ घटेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम आने वाले त्योहारों के सीजन में रिटेल बिक्री को भी बड़ा बढ़ावा दे सकता है।

मलबे में दबी हुई हैं औरतें क्योंकि इस्लाम में गैर-मर्दों का उन्हें छूना गुनाह, अफगानिस्तान में भूकंप के बाद ‘शरिया’ के चलते तोड़ रहीं दम

अफगानिस्तान में एक हफ्ते के अंदर तीसरी बार भूकंप आया, जिसमें अब तक 2,200 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और हजारों घायल हुए। इस आपदा ने सिर्फ घरों और गाँवों में तबाही ही नहीं मचाई बल्कि तालिबान राज में महिलाओं की दर्दनाक स्थिति को भी सामने ला दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भूकंप के बाद कई महिलाएँ मलबे के नीचे फँसी रहीं लेकिन उन्हें बचाने की कोशिश नहीं हुई क्योंकि तालिबान के सख्त नियमों के तहत गैर-परिवार के पुरुष महिलाओं को छू नहीं सकते। केवल पिता, पति, भाई या बेटा ही महिला को छूने की अनुमति रखते हैं।

समस्या यह है कि वहाँ महिला रेस्क्यू वर्कर्स लगभग न के बराबर हैं। तालिबान ने वर्षों से महिलाओं को मेडिकल शिक्षा और सार्वजनिक भूमिकाओं से दूर रखा है। ऐसे में राहत कार्य में महिलाएँ लगभग ‘अदृश्य’ हो गई। मलबे से पुरुषों और बच्चों को पहले निकाला गया लेकिन महिलाएँ घंटों-घंटों तक उसी में फँसी रहीं।

कहीं-कहीं महिलाएँ तब तक इंतजार करती रहीं जब तक आस-पास की महिलाएँ आकर उनकी मदद नहीं कर पाईं। कई जगह बचावकर्मियों ने महिलाओं को छूने से बचने के लिए उनके कपड़ों को पकड़कर घसीटकर बाहर निकाला।

कुनार प्रांत की एक महिला बीबी आयशा ने बताया “हमें एक कोने में बैठाकर भुला दिया गया। 36 घंटे बाद रेस्क्यू टीम आई लेकिन सीधे मदद नहीं की।” एक पुरुष स्वयंसेवक तहज़ीबुल्लाह मुहाजिब ने कहा कि बचाव कार्य के दौरान महिलाएँ ‘जैसे दिखाई ही नहीं दे रही थीं’।

उन्होंने बताया कि पुरुष रेस्क्यू टीमें सांस्कृतिक विरोध के डर से महिलाओं को छूने से हिचक रही थीं। इस तरह यह भूकंप न केवल प्राकृतिक त्रासदी बना बल्कि तालिबानी नियमों की वजह से महिलाओं के लिए और भी बड़ी मानवीय त्रासदी साबित हुआ।

महिला चिकित्सा कर्मचारियों की कमी के कारण कई महिलाओं को इलाज नहीं मिल पाया

भूकंप प्रभावित इलाकों से मिली रिपोर्ट्स बताती हैं कि पुरुषों और लड़कों को तुरंत इलाज और मदद मिली लेकिन महिलाएँ दर्द और चोटों के बावजूद बिना इलाज के कोनों में बैठी रहीं। कई अस्पताल भरे हुए थे और वहाँ महिला डॉक्टर लगभग न के बराबर थीं, क्योंकि तालिबान ने महिलाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में काम करने पर लंबे समय से पाबंदी लगा रखी है।

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि इस आपदा का सबसे ज्यादा असर महिलाओं और लड़कियों को झेलना पड़ेगा। अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र महिला प्रतिनिधि सुसान फर्ग्यूसन ने कहा कि महिलाओं की जरूरतें राहत और पुनर्वास की प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन हकीकत में महिलाएँ बचाव और सहायता, दोनों से वंचित हैं।

तालिबान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने मान लिया कि महिला डॉक्टरों की कमी है। हालाँकि, उनका कहना था कि प्रभावित प्रांतों में कुछ महिलाएँ सेवा दे रही हैं। मगर बचे लोगों के बयान बताते हैं कि इस कमी की वजह से कई महिला पीड़ितों को इलाज ही नहीं मिला। यह भूकंप एक बड़ी सच्चाई सामने लाता है।

अफगान महिलाएँ दुनिया के सबसे कठोर लैंगिक प्रतिबंधों के बीच जी रही हैं। पिछले चार साल से तालिबान ने शरिया कानून की कठोर व्याख्या लागू की है, जिसने महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और आजादी छीन ली है।

लड़कियों को स्कूल और विश्वविद्यालय जाने की मनाही है। महिलाएँ ज्यादातर नौकरियों में काम नहीं कर सकतीं, न ही NGO या अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में शामिल हो सकती हैं। पुरुष अभिभावक के बिना वे लंबी यात्रा नहीं कर सकतीं।

पार्क और जिम जैसे सार्वजनिक स्थान भी उनके लिए बंद कर दिए गए हैं। इसलिए जब यह आपदा आई, महिलाओं के पास न कोई महिला बचावकर्मी थी, न महिला डॉक्टर, न ही बराबरी से मदद माँगने का अधिकार। उनके लिए यह भूकंप सिर्फ प्राकृतिक त्रासदी नहीं, बल्कि तालिबानी नियमों की वजह से और भी गहरी मानवीय त्रासदी साबित हुआ।

तालिबान के शरिया कानून ने अफगान महिलाओं को खत्म कर दिया है

भूकंप के दौरान महिलाओं के साथ जो हुआ, वह कोई संयोग नहीं था, बल्कि तालिबान के चार साल से जारी कठोर शासन का सीधा नतीजा है। तालिबान के बनाए शरिया नियमों का असली मकसद महिलाओं को समाज से गायब कर देना है।

2021 में सत्ता में आने के बाद से तालिबान ने अफगान महिलाओं को स्कूलों, नौकरियों और सार्वजनिक जीवन से बाहर कर दिया। छठी कक्षा से ऊपर की लड़कियों की पढ़ाई बंद कर दी गई, महिलाओं को विश्वविद्यालय जाने से रोक दिया गया और उन्हें दफ्तरों से निकाल दिया गया।

मानवीय संगठन, जो कभी महिला कर्मचारियों के सहारे ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँचते थे, अब लगभग ठप हो गए हैं क्योंकि महिलाओं को काम करने की अनुमति नहीं है। यूएनएएमए की रिपोर्ट बताती है कि कई प्रांतों में महिला रेडियो स्टेशन और घरों से चलने वाले ब्यूटी सैलून तक बंद करवा दिए गए।

कंधार में दुकानदारों को आदेश दिया गया कि वे बिना पुरुष अभिभावक (महरम) के आने वाली महिलाओं को रोकें और उनकी जानकारी दें। एक अस्पताल में तो कर्मचारियों को यह तक कहा गया कि वे अकेली महिला मरीजों का इलाज न करें।

तालिबान दावा करता है कि वह ‘इस्लामी कानून’ लागू कर रहा है लेकिन वास्तव में यह उनकी अपनी संकीर्ण और कठोर व्याख्या है। इस्लाम के इतिहास में शरिया अलग-अलग तरीकों से, बहस और करुणा के साथ अपनाई गई है।

तालिबान का संस्करण न तो सर्वमान्य है और न ही जरूरी, यह केवल महिलाओं को दबाने का राजनीतिक हथियार है। नतीजा यह है कि अफग़ान महिलाएँ अपने ही देश में कैद हो चुकी हैं। वे न पढ़ सकती हैं, न स्वतंत्र रूप से यात्रा कर सकती हैं और अगर भूकंप जैसी आपदा में मलबे के नीचे दब जाएँ तो उन्हें बचाना भी नियमों के कारण मुश्किल हो जाता है।

जबरन धर्मांतरण की बढ़ती संख्या

तालिबान ने अफग़ानिस्तान में दमनकारी नीतियों को और कड़ा कर दिया है। मीडिया पर नियंत्रण बढ़ा दिया गया है, शारीरिक दंड (कोड़े मारना आदि) तेज हो गए हैं और धार्मिक स्वतंत्रता पर भी रोक लगाई जा रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, 17 जनवरी से 3 फरवरी के बीच उत्तर-पूर्वी अफग़ानिस्तान के बदख्शान प्रांत में कम से कम 50 इस्माइली पुरुषों को रात में उनके घरों से उठा लिया गया और हिंसा की धमकी देकर उन्हें सुन्नी इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया। इसी अवधि में, 180 से अधिक लोगों, जिनमें महिलाएँ और लड़कियाँ भी शामिल हैं, उनको  व्यभिचार और समलैंगिकता जैसे अपराधों के लिए सार्वजनिक जगहों पर कोड़े लगाए गए। इन कार्यक्रमों में तालिबान अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया।

सार्वजनिक दंड और भय

तालिबान की तथाकथित शरिया ने एक बार फिर हिंसक सजाओं को जिंदा कर दिया है। अब सार्वजनिक रूप से कोड़े मारना, हाथ काटना और यहाँ तक कि फाँसी जैसी सजाएँ वापस आ गई हैं। 1996 से 2001 तक उनके पहले शासन के दौरान इन्हीं सजाओं ने पूरे देश में डर का माहौल बना दिया था और वही हालात अब फिर से बन रहे हैं।

महिलाओं से कहा जाता है कि वे चुप रहें और पर्दे के पीछे रहें, जबकि पुरुषों को आदेश है कि वे अपनी माँ, बहन और पत्नियों पर इन नियमों को लागू करें। हर तरीके से महिलाओं को स्वतंत्र इंसान नहीं, बल्कि पुरुषों की संपत्ति की तरह देखा जा रहा है और जब महिलाएँ विरोध करती हैं, अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाती हैं या प्रदर्शन करती हैं तो तालिबान की नैतिकता पुलिस उन्हें गिरफ़्तार कर लेती है, धमकाती है और हिंसा करती है।

यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र में काम करने वाली अफगान महिलाएँ भी बढ़ती परेशानियों और उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं, जिसके चलते कई बार एजेंसियों को उन्हें घर पर ही रहने की सलाह देनी पड़ती है।

महिलाओं के योगदान के बिना देश की अर्थव्यवस्था उबर नहीं सकती

भूकंप प्रकृति की त्रासदी थी, लेकिन वे महिलाएँ जो मलबे में दबी रह गईं क्योंकि पुरुष उन्हें ‘छू नहीं सकते थे’, उनकी मौत इंसानों द्वारा बनाई गई त्रासदी थी। यही होता है जब विचारधारा इंसानियत पर हावी हो जाती है।

अफगान महिलाएँ अदृश्य नहीं हैं, न ही बोझ हैं। वे भी इंसान हैं और उन्हें पुरुषों की तरह ही सम्मान, अधिकार और जिंदगी जीने का अवसर मिलना चाहिए।

जब तक तालिबान यह नहीं समझता, या दुनिया उन पर दबाव डालकर बदलाव के लिए मजबूर नहीं करती, तब तक अफ़ग़ान महिलाएँ सिर्फ भूकंप या भूख से नहीं, बल्कि उन कानूनों की क्रूरता से भी मरती रहेंगी जो उन्हें मिटाने के लिए बनाए गए हैं।

2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से अफग़ानिस्तान की सुरक्षा स्थिति और बिगड़ी है। देश और ज्यादा अलग-थलग और गरीब हो गया है। लगभग आधा देश भूखा है, कई परिवार दिन में सिर्फ एक वक्त का खाना खाकर जी रहे हैं।

महिलाओं को शिक्षा और रोजगार से बाहर कर दिया गया है, जिससे अर्थव्यवस्था सुधरने की कोई संभावना नहीं बची। राहत पहुँचाना भी मुश्किल हो गया है, क्योंकि आधी आबादी यानी अफ़ग़ान महिलाएँ मदद करने से रोकी गई हैं।

नतीजा यह है कि महिलाएँ हर तरह से हार रही हैं। उन्हें पढ़ाई से वंचित किया गया, काम से रोका गया, इसलिए न महिला डॉक्टर बचीं और न ही महिला देखभाल करने वाली और क्योंकि कार्यबल में महिलाएँ नहीं हैं, आपदा के वक्त मलबे में दबी महिलाएँ सिर्फ इसलिए मर जाती हैं क्योंकि इस्लामी कानून उन्हें बराबरी का अधिकार नहीं देता।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रीति सागर ने लिखी है, जिसे इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)