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‘दलाल गिरोह’ याद कर रहा 1997, क्योंकि 2014 में लालू यादव की कृपा वाला PM नहीं: सोते गुजराल को जगा कर कहा था – गाड़ी भेज रहा हूँ, अब आप प्रधानमंत्री

भारत की आज़ादी के 75 वर्ष पूरे होने पर कुछ लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि 1997 का भारत बेहतर था, जब देश ने स्वतंत्रता के 50 साल पूरे किए थे। ‘2014 से पहले के भारत’ की तारीफ़ के बाद ये एक नया नैरेटिव है। जहाँ मोदी सरकार ‘आज़ादी का अमृत काल’ मनाते हुए विकास और उत्थान के नए लक्ष्य तय कर रही है, ये लोग इंद्र कुमार गुजराल के समय को याद कर रहे हैं। लोगों की आँखों में धूल झोंकना आसान है, क्योंकि युवा पीढ़ी में से अधिकतर को 1997 में होश ही नहीं रहा होगा।

जो लोग 40-45 वर्ष के हो चुके हैं, वो उस दौरान छात्र जीवन में रहे होंगे और अगर देश की राजनीति में उनकी दिलचस्पी नहीं रही होगी तो उन्हें भी उस समय के भारत को लेकर ज्यादा कुछ याद नहीं होगा। इस तरह एक बड़े वर्ग को ये बताना आसान है कि 1997 का भारत स्वर्ग था। कारण ये है कि नरेंद्र मोदी के 2 बार प्रधानमंत्री बनने और भाजपा को लगातार 2 बार पूर्ण बहुमत मिलने के बाद जिस दलाल समूह पर मार पड़ी है, वो कुछ भी कर के झूठ को सच साबित करने में लगा है।

कहते हैं, ‘यथा राजा तथा प्रजाः’, अर्थात राजा के आचरण का ही प्रजा अनुसरण करती है। तो सबसे पहले तुलना कर लेते हैं कि उस समय देश के मुखिया कौन थे और अब कौन हैं। 2014 से देश में एक स्थिर सरकार है, पूर्ण बहुमत वाली पार्टी सत्ता में है, गठबंधन पार्टियाँ मोलभाव नहीं कर सकती हैं और एक सर्वमान्य नेता प्रधानमंत्री है। 2014 के बाद से देश में विकास और सामाजिक उत्थान ने रफ़्तार पकड़ी है। भाजपा ने पहले रामनाथ कोविंद के रूप में एक दलित और फिर द्रौपदी मुर्मू के रूप में एक जनजातीय महिला को राष्ट्रपति का पद दिया।

अब 1997 की भी जरा बात कर लें। 1989 से लेकर 1999 तक, इन 10 वर्षों में देश ने 8 बार प्रधानमंत्री के पद का शपथग्रहण देखा और 6 चेहरों को इस पद पर आसीन देखा। अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बीच 3 बार शपथ ली थी। अंततः 1999-2004 तक उनकी सरकार ने कार्यकाल पूरा किया। उनके अलावा 1991-96 तक कॉन्ग्रेस के नरसिम्हा राव कार्यकाल पूरा करने वाले प्रधानमंत्री थे। राजीव गाँधी के निधन के बाद इस उथल-पुथल वाले दशक में भारत कंगाली के स्तर तक पहुँच गया था।

तब देश की अर्थव्यवस्था खस्ता हालत में पहुँच गई थी। 90 का दशक जब शुरू हुआ था, तब भारत का विदेशी मुद्रा भण्डार कंगाल हो गया था। 2 सप्ताह के लिए ही आयात का खर्च चलाने लायक पैसे बचे थे। विदेशी कर्ज काफी ज्यादा था और राजस्व घाटा बढ़ता ही जा रहा था। नरसिम्हा राव की सरकार ने कुछ कदम उठाए, जिस कारण जैसे-तैसे देश चलता रहा। देश की हालत ऐसी थी कि राव से पहले प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर सिंह सोलंकी की सरकार 400 टन सोना बेच चुकी थी।

वो इंद्र कुमार गुजराल ही थे, जिन्होंने आज़ादी के 50 वर्ष पूरा होने पर झंडोत्तोलन किया था। उनका जन्म पंजाब के उस हिस्से में हुआ था, जो पाकिस्तान में पड़ता है। उनके शिक्षकों में फैज अहमद फैज नाम का एक इस्लामी कट्टरपंथी भी था, जो अपनी कविताओं के जरिए मुस्लिमों में भारत विरोध और देश विभाजन की नींव डाल रहा था। इंद्र कुमार गुजराल का साथी हुआ करता था वामपंथी पत्रकार मज़हर अली खान, जो एक पत्रकार के रूप में भारत को बाँटने की साजिश में लगा हुआ था।

आपातकाल के दौरान वो इंदिरा गाँधी मंत्रिमंडल में शामिल रहे थे और संजय गाँधी से विवाद के बाद उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से हटा कर दूसरा मंत्रालय दे दिया गया था, लेकिन वो सरकार में बने थे। आपातकाल के पक्ष-विपक्ष में बयान न देकर बड़ी चालाकी से उन्होंने सत्ता का पान किया। छात्र जीवन में वामपंथी रहे इंद्र कुमार गुजराल लेफ्ट पार्टियों के भी करीब थे। वो उर्दू के प्रेमी थे। उनका प्रधानमंत्री बनना भी एक संयोग ही था।

उस समय क्षेत्रीय पार्टियों ने मिल कर ‘संयुक्त मोर्चा’ बनाया हुआ था, जिसने कर्नाटक के HD देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री चुना था, लेकिन कॉन्ग्रेस ने कुछ ही महीनों बाद उनसे समर्थन वापस लेने की धमकी देनी शुरू कर दी। इसके बाद चर्चा शुरू हो गई कि अगला पीएम किसे बनाया जाए। सीताराम केसरी की अध्यक्षता वाली कॉन्ग्रेस ने देवेगौड़ा सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। उसी दौर में लालू यादव का चारा घोटाला भी खुल चुका था और CBI जाँच के दायरे में थे। उनसे ताबड़तोड़ पूछताछ हो रही थी।

लालू यादव ने इसके लिए कई बार तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा से लड़ाई भी कर ली, लेकिन वो इसे अदालत का मामला बता कर निकल जाते थे। अतः, देवेगौड़ा के बाद लालू यादव ने खुद को प्रधानमंत्री बनाने की सारी जतन फिर से की, लेकिन वामपंथी नेता ज्योति बसु इसके सख्त खिलाफ थे। लालू यादव ने प्रधानमंत्री पद के एक अन्य आकांक्षी मुलायम सिंह यादव का रास्ता भी रोक रखा था। लालू यादव ने ही तब इंद्र कुमार गुजराल के नाम का प्रस्ताव रखा।

उस समय इंद्र कुमार गुजराल सो रहे थे। नेताओं की बैठक में वो भी शामिल थे, लेकिन फिर उन्हें झपकी लग गई थी और सोने के लिए निकल गए थे। तभी उन्हें लालू का फोन आया, “गाड़ी भेज रहा हूँ। आ जाइए, आपको प्रधानमंत्री बनना है।” वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर लिखते हैं कि ऐसा नहीं था कि इंद्र कुमार गुजराल के नाम पर सब सहमत थे, लेकिन उनके नाम से असहमति काफी कम थी। वो लिखते हैं कि लालू यादव ने इंद्र कुमार गुजराल का नाम इसीलिए लिया, क्योंकि वो उनके ही विधायकों के वोटों पर पटना के एक फर्जी पते से राज्यसभा सांसद बनाए गए थे।

लालू यादव के सबसे घनिष्ठ मित्र और तब ‘आवामी सहकारी बैंक’ के अध्यक्ष अनवर अहमद के पटना के सब्जबाग स्थित इलाके के घर पर इंद्र कुमार गुजराल के नाम का नेमप्लेट टाँग कर ये दिखाया गया कि वो बिहार के निवासी हैं और यहाँ से राज्यसभा भेजे जाने के योग्य हैं। इंद्र कुमार गुजराल ने शुरू में लालू यादव की खूब मदद की, लेकिन CBI द्वारा चार्जशीट दायर किए जाने के बाद लालू यादव उनसे भी भड़क गए और सभी नेता इस पक्ष में थे कि लालू यादव को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

अंततः 5 जुलाई, 1997 को लालू यादव ने ‘जनता दल’ का विभाजन कर के ‘राष्ट्रीय जनता दल’ बना डाला। इसके बावजूद उनकी पार्टी के दो करीबी गुजराल मंत्रिमंडल में बनाए रखे गए। गुजराल ने लालू यादव को खुश करने के लिए CBI के निदेशक जोगिंदर सिंह को भी हटा दिया था। ‘जनसत्ता’ के पूर्व संपादक राम बहादुर राय बताते हैं कि इंद्र कुमार गुजराल ने चुन-चुन कर अपने लोगों को एक दर्जन से अधिक पदों पर बिठाया था। उन्होंने भ्रष्टाचार पर कोई कार्रवाई नहीं की और अपना निजी एजेंडा सेट करते रहे।

हो सकता है कि लिबरल गिरोह ये सब मिस कर रहा हो, क्योंकि न तो अब एक चुने हुए छोटे से गिरोह में से सभी को पद देने वाला प्रधानमंत्री है और न ही किसी भ्रष्टाचारी नेता से मोलभाव कर के उसे बचाया जा रहा है। 1997 का भारत वही था, जब प्रधानमंत्री पर प्रधानमंत्री बदल रहे थे और अस्थिर सरकारें चल रही थीं। अब का भारत अर्थव्यवस्था के मामले में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और एक स्थिर सरकार है। हाँ, दलालों को अब उनका हिस्सा नहीं मिलता। इसीलिए उन्हें आज़ादी के 75 साल पूरे होने पर भारत अच्छा नहीं लग रहा।

जिसके स्पर्म से पैदा हुए 48 बच्चे, 10 और जन्म लेने वाले; उससे शादी को तैयार नहीं कोई लड़की: 31 साल के ‘विकी डोनर’ का अलग ही दुखड़ा

48 बच्चों का एक पिता इन दिनों अपनी लव लाइफ को लेकर चर्चा में है। जल्द ही इस शख्स की 10 और संतानें इस दुनिया में आने वाली हैं। दरअसल, ‘विकी डोनर’ जैसे सीरियल स्पर्म डोनर (Serial Sperm Donor) के नाम से मशहूर इस शख्स का नाम काइल गोर्डी (Kyle Gordy) है।

31 वर्षीय काइल अमेरिका के लॉस एंजेलिस में रहते हैं। सोशल मीडिया के जरिए गोर्डी अपनी फ्री सर्विस के बारे में लोगों को बताते हैं कि वह स्पर्म बैंक में ना जाकर सीधे महिलाओं को अपना स्पर्म देते हैं। वह सिंगल मदर, लेस्बियन कपल और उन कपल्स को अपना स्पर्म डोनेट करते हैं, जो स्वस्थ स्पर्म ना मिलने के कारण बच्चा पैदा नहीं कर पा रहे हैं।

काइल के मुताबिक, कुछ लोग स्पर्म बैंक का इस्तेमाल करना पसंद नहीं करते हैं, क्योंकि इनमें स्पर्म डोनेट करने वाले अज्ञात लोग होते हैं। इससे नए पैरेंट्स को अपने बच्चे के ‘असली पिता’ के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाती है। काइल की वजह से पिछले 8 सालों में 4 दर्जन से अधिक महिलाएँ माँ बन चुकी हैं।

हालाँकि, उनके स्पर्म डोनेशन (Sperm Donation) की वजह से उनकी डेटिंग लाइफ पर बुरा असर पड़ा है और उनका कोई लंबा रिलेशनशिप नहीं रह पाया। अपनी लव लाइफ के बारे में बात करते हुए काइल कहते हैं, “मैंने 10 साल से किसी भी लड़की को डेट नहीं किया है। जब मैं उन लड़कियों को अपने स्पर्म डोनर होने के बारे में बताता हूँ, तो इसके बाद वो मुझमें इंटरेस्ट नहीं दिखाती हैं।”

उन्होंने बताया, “लड़कियाँ मुझसे कहती हैं कि वह इस बात को अच्छे से समझती हैं कि मैं महिलाओं की मदद करता हूँ। लेकिन वे किसी ऐसे पुरुष के साथ नहीं रहना चाहती हैं, जिसके दूसरे महिलाओं के बच्चे हों।”

काइल के शब्दों में, “मैंने 8 साल पहले स्पर्म डोनेट करना शुरू किया था, जब एक समलैंगिक जोड़े ने मेरे पास आकर कहा कि वे भी अपना परिवार शुरू करना चाहते हैं, लेकिन वह स्पर्म बैंक से स्पर्म नहीं लेना चाहते हैं, क्योंकि वे बच्चे के असली पिता के बारे में नहीं जानते थे।”

काइल की वजह से भले ही कई महिलाओं को माँ बनने का सुख मिला है, लेकिन इसके लिए स्पर्म डोनर को अन्य लोगों से काफी कुछ सुनना पड़ा है। वह आगे कहते हैं, “मुझे हर समय बहुत सारी घृणास्पद टिप्पणियाँ मेरे ईमेल पर मिलती रहती हैं। लोग कहते हैं कि तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, तुम्हारी शादी हो जानी चाहिए। तुम्हें इस तरह से बच्चे नहीं करने चाहिए।”

पाकिस्तानी एयरफोर्स को आजादी के दिन ‘नए गाने’ पर मिल रही गाली… कंगाल पाकिस्तानियों ने अपनी ही सेना की बैंड बजा दी

पाकिस्तान आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। इसी बीच पाकिस्तान एयर फोर्स (PAF, पीएएफ) ने अपनी आजादी दिवस पर एक नया राष्ट्रगीत लॉन्च किया। इस गाने के लॉन्च होने के बाद पाकिस्तानियों ने पीएएफ की जमकर आलोचना की। कुछ गाली-गलौच पर भी उतर गए।

14 अगस्त पाकिस्तान का आजादी दिवस होता है। इसे भारत में हालाँकि ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ कहा जाता है। रविवार, 14 अगस्त 2022 को पाकिस्तान एयर फोर्स ने जब एक गाना लॉन्च किया तो ‘भूख से बिल-बिला रहे पाकिस्तानी’ भड़क गए।

बड़े उत्साह के साथ पाकिस्तानी वायु सेना ने अपनी आजादी की 75वीं वर्षगाँठ पर आधारित 4 मिनट लंबे गीत को लॉन्च किया। उन्हें लेकिन कहाँ पता था कि पैसों की तंगी से जूझ रहे देशवासियों का पेट गाने से नहीं बल्कि खाने से भरेगा।

पाकिस्तान एयर फोर्स (PAF, पीएएफ) ने एक बयान में कहा, “ये गीत पाकिस्तानी वायु सेना के उन जवानों के साहस और बहादुरी को श्रद्धांजलि देता है, जिन्होंने दुश्मन के साथ हवाई लड़ाई में बहादुरी की कहानियाँ गढ़ीं और देश की प्रतिष्ठा बढ़ाई।”

पाकिस्तानी नागरिक हालाँकि पीएएफ के देश प्रेम की इस नाटकीयता से प्रभावित नहीं दिखे। उन्होंने मुश्किल समय में गाने पर पैसे खर्च करने के लिए पाकिस्तानी वायुसेना को जमकर लताड़ा। तंगी के दिनों में इस गीत से गुस्साए नागरिकों की प्रतिक्रिया देखते हुए, पाकिस्तान वायु सेना के आधिकारिक यूट्यूब चैनल ने कॉमेंट सेक्शन ही बंद कर दिया। इसके बावजूद पीएएफ अपने देश के नागरिकों के गुस्से का सामना करने से नहीं बच सकी। सोशल मीडिया में गाने को लेकर पाकिस्तानियों ने अपने वायुसेना की जमकर आलोचना की।

एक फेसबुक पोस्ट में, ‘स्टार्टअप पाकिस्तान’ ने पोस्ट किया था, “पाकिस्तान वायु सेना ने स्वतंत्रता के 75 वें वर्ष पर नया राष्ट्रीय गीत लॉन्च किया।”

पाकिस्तानी एयर फोर्स ने लॉन्च किया नया राष्ट्रगीत

इस मामले पर शाह हुसैन खान ने लिखा, “हमें गाना नहीं न्याय चाहिए।” एक अन्य फेसबुक यूजर ने चुटकी लेते हुए कहा, “गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार, अस्थिर अर्थव्यवस्था और सत्तारूढ़ दलों की खराब मानसिकता को हराने के लिए हमें बस एक नए राष्ट्रीय गीत की जरूरत है। धन्यवाद पाक एयरफोर्स।”

वन आर फरियाह खान ने टिप्पणी की कि कैसे पाकिस्तान वायु सेना और उसके सशस्त्र बलों के अन्य विंग देश के खजाने को सुखा रहे हैं। एक अन्य यूजर ने पाकिस्तान वायु सेना पर कटाक्ष किया और व्यंग्यात्मक रूप से सुझाव दिया कि भारत नया गीत सुनने के बाद कश्मीर (जो भारत का अभिन्न अंग है) को पाकिस्तान को सौंप सकता है।

“महान उपलब्धि। आशा है कि हम इस म्यूजिक इंडस्ट्री से और अच्छी खबरें सुनेंगे” – यह टिप्पणी मलिक जान ने की।

एक यूजर अहमद जुबैर ने टिप्पणी की, “माशाअल्लाह। महंगाई को मात देने के लिए बहुत जरूरी है। आशा है कि यह हमारी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा। शानदार कदम पाक वायु सेना।”

अम्मार अहमद ने कहा, “मीडिया बिजनेस में शामिल होने के लिए पीएएफ को बधाई।”

फेसबुक यूजर अरसल अहमद ने पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष कमर जावेद बाजवा पर निशाना साधा। उन्होंने लिखा, “बाजवा प्रमुख गायक हैं।”

एक यूजर फैजान नूर ने कमेंट किया, “पाकिस्तान को एक राष्ट्रगान लॉन्च करने के लिए बधाई, यह दिखाने के लिए कि अब हम कितने मूल्यवान हैं, यह दिखाने के लिए कि मुद्रा कैसे गति में है, हम कैसे एएफजी में आतंकवादी गतिविधि करने के लिए जमीन देते हैं, यह दिखाने के लिए कि हमारे राजनेता हमारे उद्योगों के विकास के लिए कितने सक्षम हैं। भविष्य के विकास के लिए और गाने गाएँ। पाकिस्तान जिंदाबाद।”

पाकिस्तान आर्थिक संकट की स्थिति से गुजर रहा है। इस साल जुलाई में वहाँ की मुद्रास्फीति 21.3% तक पहुँच गई है। पाकिस्तान की सेना अति राष्ट्रवाद के जरिए जनता की मूलभूत सुविधाओं से जुड़े सार्वजनिक मुद्दों को भटकाने में सक्षम थी, लेकिन अब हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि पैसों की तंगी से जूझ रहे पाकिस्तानी उनकी बातों में नहीं आ रहे।

₹180 करोड़ की फिल्म, 4 दिन में बस ₹38 करोड़: लाल सिंह चड्ढा के फ्लॉप होते ही सदमे में आमिर खान, डिस्ट्रीब्यूटर्स ने माँगा मुआवजा

लाल सिंह चड्ढा के बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से पिटने के बाद आमिर खान सदमे में हैं। एक्टर और उनकी पूर्व बीवी के एक करीबी दोस्त ने बताया है कि आमिर खान ने फॉरेस्ट गंप की रीमेक बनाने के लिए बहुत कोशिशें की थीं, लेकिन दर्शकों द्वारा नकारे जाने के बाद उन्हें बहुत बुरा लगा और वह सदमे में चले गए।

लाल सिंह चड्ढा फिल्म से जहाँ आमिर की साख पर सवाल खड़े हुए। वहीं बॉलीवुड हंगामा की रिपोर्ट के मुताबिक डिस्ट्रीब्यूटर्स को भी इससे काफी नुकसान हुआ है जिसके कारण उन्होंने मेकर्स से मुआवजे की माँग की है।

आमिर के लिए परेशानी की बात ये है कि वो खुद इस फिल्म के को-प्रोड्यूसर हैं। ऐसे में शायद डिस्ट्रीब्यूटर्स का दबाव उनके ऊपर भी हो। कहा जा रहा है वो इस फिल्म के फ्लॉप होने के पीछे खुद को वजह बता चुके हैं, लेकिन इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं दिया गया है।

लाल सिंह चड्ढा का बुरा हाल

बता दें कि 180 करोड़ रुपए के बजट में बनी लाल सिंह चड्ढा सोशल मीडिया पर चले बॉयकॉट अभियान के कारण बॉक्स ऑफिस पर कोई जादू नहीं दिखा पाई। अभी तक उन्होंने कुल 38.21 करोड़ रुपए कमाए हैं। रिलीज के चौथे दिन रविवार को इस फिल्म ने 10.5 करोड़ रुपए का बिजनेस किया। इससे पहले ये फिल्म शनिवार को 8.75 करोड़ रुपए और शुक्रवार को 7.26 करोड़ रुपए का ही बिजनेस कर पाई थी। पहले दिन इसकी कमाई 11.7 करोड़ रुपए थी।

लाल सिंह चड्ढा को बचाने की कोशिशें

उल्लेखनीय है कि लाल सिंह चड्ढा का विरोध जहाँ सोशल मीडिया पर जोर-शोर से हो रहा है। वहीं बॉलीवुड अभिनेता ऋतिक रौशन से लेकर पंजाब सीएम भगवंत मान तक आमिर खान की साख बचाने को मैदान में उतर आए।

ऋतिक ने लिखा,  “मैंने हाल ही में लाल सिंह चड्ढा देखी। मैंने इस फिल्म के दिल को महसूस किया है। अच्छी और बुरी चीजें एक साइड में रखकर, यह फिल्म वाकई शानदार है। इतनी अच्छी फिल्म को मिस मत करिए। जाइए और इसे अभी देखिए। ये बेहद खूबसूरत और सुंदर है।”

वहीं भगवंत मान ने कहा, “मैंने लाल सिंह चड्ढा फिल्म देखी। ये फिल्म भाईचारे की मिसाल को कामय करती है। साथ ही ये लोगों के बीच आपस में नफरत न करने का संदेश भी देती है। आमिर खान और उनकी पूरी टीम को इस शानदार फिल्म के लिए ढे़र सारी बधाई।”

लाल सिंह चड्ढा में सेना के अपमान का आरोप

आमिर खान की इस फिल्म में कथिततौर पर सेना के अपमान का आरोप लगा है। दिल्ली के वकील विनीत जिंदल ने पुलिस कमिश्नर के समक्ष आमिर खान और पैरामाउंट पिक्सचर्स समेत अन्य पर केस दर्ज कराया है। उन्होंने माँग की है कि इनके विरुद्ध आईपीसी की धारा 153, 153ए, 298 और 505 के तहत एफआईआर हो।

वो हिंदुस्तानी जो अभी भी नहीं हैं आजाद: PoJK के लोग देख रहे आशाभरी नजरों से भारत की ओर, हिंदू-सिखों का यहाँ हुआ था नरसंहार

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।

कविवर माखनलाल चतुर्वेदी की ‘आत्माभिमान’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता की भावना की नींव हैं। ‘स्वतंत्रता’ एक शब्द नहीं तन-मन में बिजली की सी कौंध पैदा करने वाला भाव है। यह मनुष्य ही नहीं जीव मात्र की चाह होती है। इसी तरह किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी आकांक्षा, सबसे बड़ा सपना, सबसे बड़ी ताकत भी स्वतंत्रता ही होती है। पराधीनता मनुष्य ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की भी संभावनाओं को कुचल डालती है। देश और देशवासियों का स्वाभाविक और सहज विकास स्वतंत्र वातावरण में ही हो सकता है।

किसी भी राष्ट्र के लिए पराधीनता से बढ़कर कोई अभिशाप नहीं होता है। इसीलिए सचेत आत्मा वाले राष्ट्र पराधीनता को सरलता से नहीं स्वीकारते। भारत एक सजग आत्मा वाला राष्ट्र रहा है। भारत ने विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा उसे गुलाम बनाने की कोशिशों के खिलाफ सतत संघर्ष किया है। स्वतंत्र रहने की इसी भावना के कारण ही भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष का इतना लंबा और गौरवशाली इतिहास है। बीच में अपनी कुछ भूलों-गलतियों और विदेशी आक्रान्ताओं की धूर्तता और कुटिल चालों के कारण सबसे प्राचीन और समृद्ध संस्कृति वाले इस राष्ट्र के ऊपर पराधीनता के बादल छा गए थे। लेकिन इन बादलों को छाँट कर अपनी स्वतन्त्रता, अपनी अस्मिता, अपनी पहचान और अपनी सनातन संस्कृति को बचाने की लड़ाई भी भारतवासियों द्वारा बहुत मजबूती और अदम्य साहस के साथ लगातार लड़ी गई।

हजारों-लाखों वर्ष पुरानी सनातन संस्कृति वाले भारतवर्ष को लगभग एक हजार साल की पराधीनता के कालखंड में नष्ट-भ्रष्ट करने की असंख्य कोशिशें और साजिशें हुईं। अनेक बार आक्रमण करके विदेशी आक्रान्ताओं ने लूटपाट करके, डर और लालच से मतान्तरण कराके ‘सोने की चिड़िया’ और ‘विश्वगुरू’ के रूप में सम्मानित भारतवर्ष की गौरवशाली संस्कृति को मिटाने की अनवरत कोशिशें की। परन्तु उनकी वे साजिशें असफल ही साबित हुईं। भारत माँ के करोड़ों वीरों और वीरांगनाओं के बलिदानों के परिणामस्वरूप पराधीनता की लम्बी अँधेरी रात का अंत हुआ और 15 अगस्त, 1947 को भारत देश आज़ाद हुआ। इस दिन देश स्वाधीन तो हो गया, लेकिन उसे औपनिवेशिक (गुलाम) व्यवस्था और चेतना से स्वतंत्र करने का काम अधूरा ही रहा। वह काम अब जारी है।

आज़ादी के अमृत महोत्सव की शुभ बेला में इस दिन को संभव करने वाले वीरों और वीरांगनाओं को याद करना राष्ट्रीय कर्तव्य है। मंगल पांडे, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, झलकारी बाई, रानी गाइदिन्ल्यू, तात्या टोपे, अजीमुल्ला खान, बिरसा मुंडा, वीर कुंवर सिंह, तिरोत सिंह, टिकेन्द्रजीत सिंह, सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, उधम सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, दुर्गा भाभी, कनकलता बरुआ, अशफाक उल्ला खां, रोशन सिंह, नेताजी सुभासचन्द्र बोस, महात्मा गाँधी, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल, सरदार वल्लभभाई पटेल, पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, वीर सावरकर, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, जयप्रकाश नारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया, श्रीमती एनी बेसेंट, सरोजिनी नायडू, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, पंडित प्रेमनाथ डोगरा आदि असंख्य क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों की यह सूची है। करोड़ों अनाम बलिदानी भी हैं जिनका नाम जाने-अनजाने इतिहास में अंकित न हो सका, लेकिन उनका त्याग, समर्पण और देशप्रेम किसी से भी कमतर नहीं था।

भारत की स्वतंत्रता, एकता, अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए अपना बलिदान देने वाले देश के लाखों जांबाजों का स्मरण करना और उन्हें श्रद्धान्जलि देना समस्त देशवासियों का सामूहिक कर्तव्य है। उनके आश्रितों और परिवार के सदस्यों का मान-सम्मान करना और उन्हें हरसंभव सुविधा और सहूलियत देना भी समाज का कर्तव्य है। हमें सदैव याद रखना चाहिए कि जो समाज अपने वीरों और बलिदानियों को सम्मान देना भूल जाता है, वह विनाश की ओर बढ़ जाता है।

हमें स्वतंत्रता मिले 75 वर्ष हो गए हैं। स्वतंत्रता के लिए हमारे पूर्वजों ने बहुत लम्बा संघर्ष किया था। इस संघर्ष में असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों के तप, त्याग और बलिदान की गाथाएँ छुपी हैं। स्वतंत्रता के बाद जन्मी वर्तमान पीढ़ी को उनके निःस्वार्थ बलिदान, शौर्य और साहस का ज्ञान होना आवश्यक है। हमारे पूर्वजों ने स्वतंत्रता-प्राप्ति के लिए क्या किया है, इसे केवल जानना ही नहीं चाहिए बल्कि इससे प्रेरणा भी लेनी चाहिए, ताकि अपनी स्वतंत्रता की रक्षा की जा सके। अपने इन स्वतंत्रता सेनानियों के अलावा स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए कुर्बानी देने वाले सेना और अन्य सुरक्षा बलों के जाँबाज सिपाहियों को भी निरंतर याद रखना चाहिए। आज भारतवर्ष को और आगे ले जाने की आवश्यकता है। उसके लिए वर्तमान पीढ़ी के आत्मविश्वास को बढ़ाना और उसे राष्ट्रभाव के लिए समर्पित और संगठित करना जरूरी है। ऐसा करके ही भारत को विश्व का सिरमौर बनाया जा सकता है। अपने पूर्वजों की वीरता और बलिदानों से प्रेरणा लेने वाला समाज ही सुरक्षित, संगठित, स्वतंत्र, संप्रभु और समृद्ध रह सकता है।

पीओजेके पर अक्टूबर 1947 में हुए पाकिस्तानी आक्रमण के समय मीरपुर, मुज़फ़्फ़राबाद, भिम्बर, कोटली आदि स्थानों पर हिन्दू और सिखों का क्रूरतम नरसंहार हुआ, माँ-बहनों पर अनेक अत्याचार हुए। उनमें से हजारों को अपना घर-द्वार, रोजी-रोटी, धन-संपत्ति; यहाँ तक कि प्राण भी गँवाने पड़े। लाखों निर्दोष लोग विस्थापित हुए। वे न्याय और अपने अधिकारों और घर वापसी की उम्मीद लगाए बैठे हैं। इसी प्रकार पीओजेके में रहने वाले भारतीय भी आज तक उपेक्षित और उत्पीड़ित हैं। वे अभी तक स्वतंत्र नहीं हैं, और भारत की ओर आशाभरी नज़र से देख रहे हैं। पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर और चीन अधिकृत जम्मू कश्मीर में रह रहे भारतीयों को न्याय, सम्मान, सुरक्षा, स्वतंत्रता और भारत की नागरिकता दिलाना प्रत्येक भारतीय का उत्तरदायित्व है।

इसके लिए संकल्पबद्ध और संगठित होकर काम करने की आवश्यकता है। देश और दुनिया में इस प्रताड़ित और अधिकार-वंचित समाज के दुःख-दर्द के प्रति जन-जागरण किया जाना चाहिए। उनकी परतन्त्रता और उनपर होने वाले अत्याचारों की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित करना चाहिए ताकि उनको उनका हक़ मिल सके और उनसे जबर्दस्ती छीन ली गई भारत की नागरिकता उनको वापस मिल सके। कश्मीर घाटी में कश्मीरी हिन्दुओं के साथ जो अत्याचार किए गए हैं उनसे भी हम सब परिचित हैं। ‘कश्मीर फाइल्स’ नामक फिल्म में उसके झकझोरने वाले विवरण दिखाए गए हैं। अविश्वसनीय और असीम यातनाएँ सहने वाले कश्मीरी हिंदुओं को भी न्याय मिलना चाहिए और उनकी घर वापसी के लिए सम्पूर्ण भारतवर्ष को एकस्वर में हुँकार भरनी चाहिए।

आज देश में सकारात्मक परिवर्तन की लहर है। दुनिया के सामने भारत को फिर खड़ा करने का सुनहरा अवसर आ गया है। भारत को खड़ा करने के लिए भारतीय समाज को खड़ा होना होगा। कंधे-से-कन्धा और कदम-से-कदम मिलाकर चलना होगा। हम सब बढ़ेंगे, मिलकर आगे बढ़ेंगे तभी भारत आगे बढ़ेगा। अकेले-अकेले और आपस में बँटकर कुछ हासिल नहीं होगा। ईर्ष्या,द्वेष और कटुता की जगह समता,समरसता और बंधुता हमारा स्वभाव बनें। बाँटने वाली और विध्वंसकारी बातों की जगह हमारी ध्यान जोड़ने वाले और समन्वयकारी विषयों की ओर हो।

भारत बोध और भारत भाव का जागरण आवश्यक है। अपने देश की मिट्टी, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, नदियों-पहाड़ों, साधनों-संसाधनों, परम्पराओं-रीति-रिवाजों, भाषाओं-बोलियों, सभ्यता-संस्कृति के साथ-साथ अपने देशवासियों से प्रेम करना और उनके दुःख-सुख में साथ खड़ा होना ही सच्ची देशभक्ति है। सम्पूर्ण समाज पूरी प्रतिबद्धता और एकजुटता के साथ वीर सैनिकों और बलिदानियों के परिवारों के साथ खड़ा रहे। बलिदानियों के परिवारों की ज़िम्मेदारी सरकार के साथ-साथ समाज भी ले। इन परिवारों को कभी भी अकेला महसूस न होने दे। उनके बलिदान की सार्थकता सिद्ध करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है। शहीदों के बलिदान को व्यर्थ न जाने देने की जिम्मेदारी सम्पूर्ण समाज की है। हमें एकजुट और एकस्वर होकर इस जिम्मेदारी को स्वीकार करना चाहिए।

अलग-अलग संस्थानों, मार्गों, भवनों विकास योजनाओं, पुरस्कारों और अपने बच्चों आदि का नामकरण देशभक्तों के नाम पर करें। अमर बलिदानियों के स्मारक बनाए जाएँ। जम्मू कश्मीर के स्वतन्त्रता संघर्ष के ऐतिहासिक स्थलों/केन्द्रों का संरक्षण और जीर्णोद्धार किया जाए। इन बलिदानियों के जन्मतिथि तथा पुण्यतिथि सामूहिक उत्सव की तरह मनाई जाएँ। 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय उत्सवों में बलिदानियों को अवश्य याद करें। राष्ट्र गान, राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रध्वज,राष्ट्रीय संविधान और अन्य राष्ट्रीय चिह्नों के प्रति ह्रदय में श्रध्दा और समर्पण का भाव रखें।

व्यक्ति मात्र के रूप में नहीं भारतीय के रूप में सोचने की आदत बनाएँ। अपने और अड़ोस-पड़ोस के गाँवों-मोहल्लों के शहीदों के बारे में पता करें और उनका नाम और उनकी वीरता की कहानी देश-समाज के सामने लाएँ। साहित्य, कहानी, लोकगीत, नाटक, फिल्मों, मीडिया और सोशल मीडिया आदि के माध्यम से इन अमर बलिदानियों की वीरगाथाओं को समाज के बीच लेकर जाएँ ताकि वे हमारे आदर्श और प्रेरणापुंज बन सकें। विदेशी आक्रान्ताओं की क्रूरता, मतान्धता और धन-लोलुपता के बारे में भी भावी पीढ़ियों को बताएँ। विभाजन की विभीषिका को भी भुलाया नहीं जा सकता। स्वतंत्रता-प्राप्ति का मूल्य समझकर और स्वतन्त्रता का मूल्य चुकाकर ही हम अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित और संरक्षित कर सकते हैं। ऐसा करके ही सशक्त भारत और अखंड भारत के स्वप्न को भी साकार किया जा सकता है।

वे नहीं रहे… क्योंकि वे हिन्दू थे: अपनी नवजात बेटी को भी नहीं देख पाए गौ प्रेमी किशन भरवाड

27 वर्षीय हिंदू युवक किशन भरवाड़ को कट्टरपंथी मुस्लिमों ने 25 जनवरी 2022 को केवल हिंदू होने के कारण मार डाला था। किशन भरवाड़ अहमदाबाद के धंधुका के रहने वाले थे। उनकी उस वक्त हत्या कर दी गई जब वह दोपहिया वाहन पर मोढवाड़ा मोहल्ले से गुजर रहे थे। कट्टरपंथी मुस्लिमों द्वारा अन्य हत्याओं की तरह, किशन की हत्या भी “ईशनिंदा” के आरोपों में की गई।

किशन भरवाड़ और तथाकथित ईशनिंदा

युवा किशन भरवाड़ को गायों से प्यार था। फोटोकॉपी की दुकान और खेत में काम करते हुए वह अपने परिवार को आजीविका कमाने में मदद करता थे। लेकिन जनवरी 2022 में उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट शेयर किया। यह एक छोटी सी वीडियो थी एनीमेशन के जरिए जिसमें यीशु को ‘गॉड के पुत्र’ के रूप, पैगंबर मुहम्मद ‘गॉड के दूत’ के रूप में, जबकि भगवान श्रीकृष्ण को ‘ईश्वर’ अर्थात गॉड के रूप में दिखाया गया था। इस वीडियो को साझा करने के 30 मिनट के भीतर, किशन भारवाड़ को धमकी भरे फोन आने लगे क्योंकि उन्होंने अपने स्वयं के विश्वास को प्रदर्शित किया जो कट्टरपंथी मुस्लिमों को पसंद नहीं आया।

इस घटना के बाद ही किशन भरवाड़ के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग को लेकर करीब 1000 मुस्लिमों की भीड़ स्थानीय थाने पहुँची। और शिकायत दर्ज कराने के बाद भी भीड़ ने किशन भारवाड़ की पिटाई कर दी। हालाँकि कट्टरपंथी भीड़ इससे भीड़ संतुष्ट नहीं हुई। तीन दिन बाद, उन्हें पुलिस स्टेशन से फोन आया क्योंकि उनके खिलाफ एक और प्राथमिकी दर्ज की गई थी और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। वहीं उनके पिता ने अगले ही दिन उनका जमानत करा दिया और सुझाव दिया कि वह कुछ दिनों के लिए गाँव छोड़कर चले जाएँ।

किशन को जेल में डाले जाने के ठीक एक दिन बाद, उनकी पत्नी का सिजेरियन सेक्शन हुआ और उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया। लेकिन किशन को अपनी बेटी का चेहरा कभी देखने को नहीं मिला, क्योंकि जिस दिन उनकी हत्या हुई उसी दिन वह अपनी बेटी को देखने के लिए अपने गाँव लौटे थे। एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार, किशन पर गोली चलाने वाले दो लोग उसके पीछे थे और मोढवाड़ा में एक मोड़ पर उन्होंने पहली गोली चलाई। वे चूक गए और फिर उन्होंने फिर फायरिंग की। जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। परिवार ने किशन के पार्थिव शरीर को लेने से इनकार कर दिया। हालाँकि, भारी पुलिस सुरक्षा के बीच उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

किशन की हत्या के बाद भारी विरोध प्रदर्शन

जिहादी नारे ‘गुस्ताख-ए-रसूल की एक ही साजा, सर तन से जुदा’ का पालन करते हुए, किशन भरवाड़ की हत्या को अंजाम दिया गया क्योंकि उसने एक पोस्ट साझा किया था जिसे मुस्लिम “ईशनिंदा” मानते थे। गुजरात में हो रहे इस जिहादी एजेंडे का विरोध करने और मारे गए हिंदू युवक को न्याय दिलाने के लिए गुजरात के विभिन्न शहरों में बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए थे।

लोगों ने केंद्र सरकार से इस मामले की जाँच कराने की भी माँग की ताकि पाकिस्तान से की मदद से कथित तौर पर की जाने वाली ऐसी जिहादी गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जा सके।

हथियार सप्लाई करने वाले मौलवियों की शुरुआती गिरफ्तारी

वहीं इस मामले में 27 जनवरी 2022 को, अहमदाबाद पुलिस ने किशन की हत्या के मामले में दो मौलवियों के लिंक का पता लगाने के बाद दो लोगों को गिरफ्तार किया। हत्या दो मौलवियों के निर्देश पर की गई थी, एक अहमदाबाद से और दूसरा मुंबई से था। अहमदाबाद के जमालपुर इलाके के एक मौलवी ने हत्यारों को हथियार मुहैया कराए थे और मुंबई के मौलाना ने निर्देश दिया था। वहीं 29 जनवरी 2022 को इसमें पाकिस्तानी कनेक्शन भी सामने आया।

इसके कुछ घंटों बाद ही पुलिस को कुल 6 मुस्लिम मौलवियों के शामिल होने का संदेह था। गिरफ्तार मौलवी अयूब से यह पता चला कि किशन की हत्या से पहले, जामनगर के एक अन्य युवक को इस्लाम के खिलाफ “ईशनिंदा” के लिए मारने की योजना थी। इसके लिए राजकोट निवासी अजीम बसीर समा ने हथियार दिए थे। हालाँकि, इस मामले में पुलिस ने उन शूटरों को भी गिरफ्तार कर लिया जिन्होंने इस हत्या को अंजाम दिया था।

वहीं किशन को मारने के लिए जिस पिस्तौल और बाइक का इस्तेमाल किया गया था, वह गुजरात पुलिस को धंधुका में सर मुबारक बुखारी दादा दरगाह के पास के इलाके से मिली थी। शूटर शब्बीर और इम्तियाज दोनों 25 जनवरी को किशन भरवाड़ की हत्या में शामिल थे। इम्तियाज बाइक चला रहा था और शब्बीर ने किशन पर गोलियाँ चलाईं।

शब्बीर और इम्तियाज ने अपनी खुलासा किया कि वे मौलाना कमर गनी के 2021 में सूरत में दिए गए भाषण से प्रेरित थे। जिसके बाद गुजरात एटीएस ने मौलाना कमर गनी उस्मानी को दिल्ली से गिरफ्तार किया था।

गौरतलब है कि जाँच एजेंसियों को करीब 26 लोगों के प्रोफाइल मिले जो इस जिहादी नेटवर्क के निशाने पर थे। सूची में गाजियाबाद के डासना मंदिर के यति नरसिंहानंद और जितेंद्र नारायण त्यागी (वसीम रिज़वी), बीएस पटेल, पंकज आर्य, पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ, महेंद्रपाल आर्य, राहुल आर्य, राधेश्याम आचार्य, अपडेट राणा, उपासना आर्य, साजन ओदेदरा और आरएसएन के नाम शामिल थे।

नोट: मूल रूम से यह लेख अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी। जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

‘3 घंटे में ख़त्म कर देंगे’: मुकेश अंबानी के परिवार को हत्या की धमकी, ‘रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल’ को 8 फोन कॉल्स के बाद मुंबई पुलिस ने शुरू की जाँच

रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमेन और देश के सबसे अमीर उद्योगपति मुकेश अंबानी के परिवार को जान से मारने की धमकी मिली है। मुंबई पुलिस ने इस घटना की जानकारी दी है। मुंबई पुलिस के अनुसार, रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल (Reliance Foundation hospital) के डिस्प्ले नंबर पर सोमवार (15 अगस्त, 2022) को धमकी भरे फोन कॉल किए गए। कॉलर ने धमकी देते हुए कहा कि उनके पूरे परिवार को तीन घंटे के भीतर खत्म कर दिया जाएगा।

डीबी मार्ग पुलिस थाने में शिकायत दर्ज

‘रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल’ के अधिकारियों ने डीबी मार्ग पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि मुकेश अंबानी को धमकी देते हुए कुल आठ कॉल किए गए हैं। ‘रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल’ के CEO तरंग ज्ञानचंदानी ने मिड-डे से बात करते हुए कहा, “मुकेश अंबानी को अज्ञात व्यक्ति द्वारा जान से मारने की धमकी देते हुए कुल 8 कॉल किए गए हैं। हमने मामले की जाँच के लिए मुंबई पुलिस से शिकायत की है।”

मुंबई पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मिड-डे को बताया, “हमें अस्पताल से शिकायत मिली है और हम इसकी पुष्टि कर रहे हैं। कॉल अस्पताल के डिस्प्ले नंबर पर की गई है।” इससे पहले समाचार एजेंसी ANI ने मुंबई पुलिस के हवाले से कहा था कि ‘रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल’ के फोन नंबर पर तीन से अधिक बार धमकी भरे कॉल आए थे।

गौरतलब है कि पिछले साल मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया से कुछ ही दूरी पर एक संदिग्ध कार मिली थी। जिसमें 20 जिलेटिन छड़ें बरामद हुई थीं। हालाँकि, इसे असेंबल नहीं किया गया था। एंटीलिया के बाहर खड़ी इस स्कॉर्पियों में एक चिठ्ठी भी मिली थी, जिसमें अंबानी परिवार को उड़ाने की धमकी दी गई थी। संदिग्ध कार मिलने के बाद हड़कंप मच गया था। इस मामले में महाराष्ट्र एटीएस के अलावा एनआईए ने भी इस मामले में जाँच कर रही है।

जिस कार में विस्फोटक मिला था, वह कार मनसुख हिरेन की थी। लेकिन कुछ दिन बाद ही मनसुख हिरेन का शव मिला था। मुंबई में मुकेश अंबानी के घर के पास विस्फोटक भरी गाड़ी के मामले में NIA ने मुंबई पुलिस अफसर सचिन वाजे को गिरफ्तार किया था। सचिन वाजे पर आरोप है कि उसने ही मनसुख हिरेन की हत्या की। मामले में जाँच जारी है। 

10 गोली खाकर भी जिस Axel ने आतंकी को दबोचा, उस आर्मी डॉग को ‘सर्वोच्च’ वीरता पुरस्कार: बचाई थी कई सैनिकों की जान

कुछ देश अपने मृत सैनिकों तक का सम्मान नहीं करते जबकि भारत ने अपने वीर पुरुषों को ही नहीं बल्कि जीवों तक का सम्मान किया है। आतंक-विरोधी अभियान में बलिदान हुए आर्मी डॉग एक्सल (Indian Army Dog Axel) को मरणोपरांत सम्मान देना उसी परंपरा की निशानी है।

इंडियन आर्मी डॉग एक्सल को मरणोपरांत आज 15 अगस्त 2022, स्वतंत्रता दिवस के दिन वीरता पुरस्कार ‘मेंशन-इन-डिस्पैच’ से सम्मानित किया गया। एक्सल भारतीय सेना का वो बहादुर डॉग था, जिसने गोली लगने के बाद भी आतंकी को दबोचा था।

30 जुलाई को कश्मीर के बारामूला जिले में सेना के एलीट असॉल्ट डॉग एक्सल की एक आतंकवादी ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। एक्सल ने गोली लगने के बावजूद आतंकवादी को पकड़ लिया था। एक्सल सिर्फ 2 साल का था और वह बेल्जियन मैलिनोइस (Belgian Malinois) प्रजाति का कुत्ता था।

एक्सल (Axel) की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला है कि 10 गोलियों के घाव के अलावा, उसकी फीमर पर फ्रैक्चर के साथ-साथ अन्य घाव भी थे। इससे स्पष्ट है कि लोगी लगने के बाद भी सेना के बहादुर डॉग ने आतंकी को नहीं छोड़ा था।

एक्सल की बहादुरी ने उन सैनिकों की जान बचाने में मदद की, जो ऑपरेशन का हिस्सा थे। सैनिकों के इमारत के अंदर जाने से पहले एक्सल ने एक कमरे में जाकर उसे ‘क्लीयर (मतलब कोई विस्फोटक नहीं, कोई खतरा नहीं की सूचना दी)’ किया। उसके बाद जैसे ही वो दूसरे कमरे में गया, वहाँ छिपे आतंकी ने उसे गोली मार दी। इसके बाद सैनिकों और आतंकियों के बीच फायरिंग शुरू हो गई। एक्सल के हैंडलर को भी इस अभियान के दौरान गंभीर चोंटे आईं।

एक्सल की बहादुरी के कारण हालाँकि कई सैनिकों की जान बच गई। क्योंकि जहाँ आतंकी छिपे हुए हों, ऐसे कमरे में हस्तक्षेप बहुत जोखिम भरा होता है। एक्सल ने पहले कमरे में जाकर आतंकी के होने का संकेत दिया, जिससे कई सैनिकों की जान बच सकी।

इंडियन आर्मी डॉग एक्सल (Indian Army Dog Axel) की इस बहादुरी को जानने के बाद उसकी वीरता को हर किसी ने सराहा। भारतीय सेना के उत्तरी कमान ने एक्सल को देश की सेवा करने वाला रियल हीरो कह करार दिया था। इंडियन आर्मी के ही चिनार कोर ने एक्सल की बहादुरी को सलाम किया था।

हाल के वर्षों में यह सर्वोच्च वीरता पुरस्कार (मेंशन-इन-डिस्पैच) होगा, जो एक आर्मी डॉग को ‘काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन’ में प्रदान की गई सेवाओं के लिए मिला है। आम तौर पर आर्मी डॉग्स को आतंकवाद विरोधी अभियानों में उनकी उत्कृष्टता के लिए सेना प्रमुख प्रशस्ति पत्र और उप-सेना प्रमुख प्रशस्ति पत्र जैसे प्रशंसा पुरस्कारों से सम्मानित किया जाता है।

‘लाल सिंह चड्ढा’ का प्रमोशन कर फँसे ऋतिक रोशन, लोगों ने किया ‘विक्रम वेधा’ के बॉयकॉट का ऐलान: सैफ अली खान भी हैं फिल्म में

आमिर खान और करीना कपूर खान की फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ रिलीज होते ही बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुँह गिरी। फिल्म के रिलीज से पहले सोशल मीडिया पर ‘लाल सिंह चड्ढा’ के बायकॉट की अपील की जा रही थी, जिसका असर फिल्म की कमाई पर साफ दिख रहा है। फिल्म के सोशल मीडिया पर हो रहे लगातार विरोध को देखते हुए कई बॉलीवुड कलाकार फिल्म का समर्थन कर रहे हैं और अपने फैंस से फिल्म को देखने की गुजारिश की है, जिसके बाद से वो सोशल मीडिया पर लोगों के निशाने पर आ गए हैं।

ऋतिक रोशन ने शनिवार (13 अगस्त 2022) को आमिर खान की फिल्म का खुलकर समर्थन करते हुए एक ट्वीट किया और फैंस से फिल्म को दिखने की गुजारिश की। लेकिन उनके लिए लाल सिंह चड्ढा का सपोर्ट करना काफी नुकसानदायक साबित होता दिख रहा है। क्योंकि अब सोशल मीडिया #boycottVikramVedha ट्रेंड हो रहा है।

ऋतिक रोशन ने ‘लाल सिंह चड्ढा’ की तारीफ करते हुए ट्विटर पर लिखा, “मैंने हाल ही में लाल सिंह चड्ढा देखी। मैंने इस फिल्म के दिल को महसूस किया है। अच्छी और बुरी चीजें एक साइड में रखकर, यह फिल्म वाकई शानदार है। इतनी अच्छी फिल्म को मिस मत करिए। जाइए और इसे अभी देखिए। ये बेहद खूबसूरत और सुंदर है।”

ऋतिक रोशन के ये ट्वीट अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और ट्रोल्स उन्हें जमकर खरी-खोटी सुना रहे हैं और भड़के यूजर्स अब ट्विटर पर ऋतिक रोशन की आगामी फिल्म विक्रम वेधा के बायकॉट की भी अपील कर रहे हैं। ऋतिक के ट्वीट पर एक यूजर ने भड़कते हुए लिखा, “बॉलीवुड से संन्यास लेने का इरादा कर लिया है क्या तुमने।”

जबकि दूसरे यूजर ने लिखा, “जिसकी पिक्चर है जनता उसकी नहीं सुन रही है तो तुम किस खेत की मूली हो। अपनी आने वाली पिक्चरों के बारे मे जरूर सोचना क्योंकि गेहूँ का साथ देने के चक्कर में घुन भी पिस जाता है।”

एक यूजर ने लिखा, “तुमने अब सोच ही रखा है तो अब धीरे धीरे पुरे बॉलीवुड का बहिष्कार होगा और हम सब करके रहेंगे। अभी लाल सिंह चड्ढा हुआ है… अगला पठान का होगा उसके बाद आपका भी अब नंबर आएगा…. जो आया है सब धोए जाएँगे।”

यूजर ने लिखा, “देखिए आपका सम्मान करते हैं, मगर आप ये मत भूलिए आप एक हिंदू भी है। हिंदू धर्म का अपमान अब नहीं सहेगा हिंदुस्थान।”

पंकज श्रीवास्तव नाम के यूजर ने लिखा, “ऋतिक इसलिए ऐसा लिखा है, क्योंकि कल को आमिर इसके लिए लिखे। ये परस्पर डैमेज कंट्रोल की नौटंकी है और कुछ नहीं।”

उज्जवल सिंह लिखते हैं, “ऋतिक जी अपना फिल्म का चिंता कीजिए। इनका फिल्म का झूठा प्रमोशन करने के चक्कर में आपका और आपके फिल्मों का भी बड़ा वाला L लग जाएगा। कोई नहीं है टक्कर में क्यों पड़े हो चक्कर में।”

सुभाषिनी शर्मा ने लिखा, “जो फिल्म हमे ये बताए की पूजा करने से दंगा फैलता है उसे कोई हिंदू कैसे देख सकता है। आप जैसे लोगों का बहिष्कार होना ही चाहिए। आमिर को ये नहीं पता की नमाज के बाद पथराव और दंगा होता है न की पूजा करने से।”

नेहा ने लिखा, “पेड ट्वीट, वो भी घटिया मूवी का।”

वहीं, बात अगर लाल सिंह चड्ढा के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन की करें तो रक्षा बंधन के दिन रिलीज हुई इस फिल्म ने बेहद धीमी शुरुआत के साथ ओपनिंग डे पर 11.70 करोड़ रुपए की कमाई की थी, जोकि पिछले 10 सालों में आमिर खान की फिल्म की सबसे कम कमाई है। जानकारी के अनुसार इस फिल्म का बजटलगभग 180 करोड़ रुपए बताया जा रहा है।

‘रेप कर रहा था दानिश, भाभी-बहन दे रही थी पहरा’: अविनाश बनकर मिला था, पीड़िता की शिकायत के बाद 6 पर FIR

उत्तर प्रदेश के शाहजहॉंपुर में पहचान छिपाकर एक हिंदू युवती के साथ 9 साल तक रेप किए जाने का मामला सामने आया है। पीड़िता के मुताबिक खुद को हिंदू बताकर दानिश उसके संपर्क में आया। बाद में उसने खुद भी उसके साथ रेप किया और अपने दोस्तों से भी करवाया। आरोप है कि अश्लील वीडियो बनाकर दानिश पीड़िता को ब्लैकमेल कर रहा था। पुलिस ने इस मामले में शनिवार (13 अगस्त 2022) को 6 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया। इनमें 4 नामजद हैं।

यह मामला कोतवाली नगर क्षेत्र का है। पीड़िता ने शिकायत में कहा है, “लगभग 9 साल पहले अविनाश नाम के एक युवक की कॉल मेरे पास आई और मेरी उससे दोस्ती हो गई। कुछ दिन बाद उसने मुझे अपने घर वालों से मिलने के लिए बुलाया। तब उसके रहन-सहन को देख कर मुझे उसके हिंदू होने पर शक हुआ। मैंने पता किया तो वह दानिश निकला, जिसके अब्बू का नाम रब्बू उस्ताद है। जब मैंने उसके झूठ की चर्चा की तब उसने अपनी भाभी की मदद से मुझे एक कमरे में बंद कर दिया। अपनी बहन व भाभी के आगे ही मुझसे रेप किया।”

पीड़िता ने शिकायत में कहा है, “रेप के दौरान में शोर मचा रही थी, तब दानिश की भाभी और बहन दरवाजे पर बैठ कर लोगों से मेरी तबियत खराब होने की बात कह रहे थे। दुष्कर्म के दौरान उसने मेरी कई अश्लील फोटो और वीडियो बना ली। इसी से डरा-धमकाकर उसने मेरा लगातार यौन शोषण किया। कुछ दिनों पहले उसने गुप्ता नाम के साथ 2 अन्य व्यक्तियों को बुलाकर मेरे साथ बलात्कार करवाया। ऐसा 9 साल तक चला। इस दौरान मुझे और मेरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी जाती रही। पहले मैंने चुपचाप सब झेला पर अब मैंने ग्लानि महसूस करते हुए दानिश की शिकायत की है। उसने ऐसी हरकतें कई और हिन्दू लड़कियों के साथ भी की हैं।”

पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने दानिश, उसकी भाभी और बहन, गुप्ता जी व 2 अन्य अज्ञात पर IPC की धारा 342, 376- D, 506 और IT एक्ट की धारा 67 के तहत FIR दर्ज कर ली है। शाहजहाँपुर के एडिशनल SP संजय कुमार ने बताया है, “मामले की गहराई से जाँच की जा रही है। जाँच में दोषी पाए गए आरोपितों की जल्द गिरफ्तारी की जाएगी।”

ऑपइंडिया से बात करते हुए पीड़िता के परिजनों ने बताया कि हम लोग काफी मानसिक तनाव की स्थिति से गुजर रहे हैं। अभी तक आरोपित पकड़ा नहीं गया है और वो कई नम्बरों से हमारे परिवार को धमकियाँ दिला रहे हैं। पीड़िता के भाई ने बताया कि दानिश उसकी बहन पर इस्लाम कबूलने का दबाव डालता था। उसने व्हाट्सएप पर कई वीडियो भी भेज रखी हैं जिसमें इस्लाम कबूलने के फायदे बताए गए हैं।

शाहजहाँपुर के विश्व हिन्दू परिषद (VHP) नेता राजेश अवस्थी ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा, “पुलिस 2 दिनों से पीड़िता का केस दर्ज करने में आनाकानी कर रही थी। इसके विरोध में हम लोगों ने थाने पर प्रदर्शन किया। इसके बाद केस दर्ज किया गया।”