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‘धर्मांतरण हमारी संस्कृति पर खतरा’: छत्तीसगढ़ में ईसाई मिशनरियों के खिलाफ सड़क पर उतरे सैकड़ों ग्रामीण, उग्र आंदोलन की चेतावनी

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में धर्मान्तरण के विरोध में सैकड़ों ग्रामीणों ने सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया है। उन्होंने अपने घर परिवार के लोगों के ईसाई बन जाने का आरोप लगाया है। ग्रमीणों ने इसे अपनी संस्कृति पर खतरा बताया है और ये सब न रुकने पर उग्र आंदोलन की चेतावनी भी दी है। हालाँकि, मौके पर पुलिस ने पहुँच कर हालात को संभाला। घटना रविवार (7 अगस्त 2022) की है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक मामला राजिम के गाँव कौंदकेरा का है जहाँ हर रविवार को ईसाइयों की प्रार्थना सभा होती है। इस बार प्रार्थना सभा आयोजित होते ही वहाँ ग्रामीणों ने विरोध करना शुरू कर दिया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उस प्रार्थना में कुछ बाहरी लोग भी आते है। वो हमें ईसाई बनाने के लिए तरह-तरह के लालच देते हैं। हालत ऐसे हो चुके हैं कि एक ही माता-पिता के अलग-अलग बच्चे अब अलग-अलग मजहब में हैं।”

मिली जानकारी के मुताबिक यह सभा कांकेर के संतोष कुमार मरकाम के घर पर होती है। हालाँकि, ग्रामीणों के गुस्से को देख कर उन्होंने भी अपने कदम पींछे खींच लिए हैं। उन्होंने दुबारा किसी को बाहर से न बुलाने की हामी भरी है। आक्रोश की सूचना पर मौके पर पहुँचे SDM अविनाश को भी ग्रामीणों ने सख्त अंदाज़ में चेतावनी देते हुए कहा कि यदि धर्मान्तरण न रुका तो वो सब उग्र आंदोलन करेंगे। इस दौरान ग्रामीणों ने SDM से ये भी कहा कि धर्मान्तरण सिर्फ उनके ही नहीं बल्कि अन्य कई गाँवों में भी हो रहा है।

बताया जा रहा है कि गाँव वालों ने सोशल मीडिया से भी ईसाई धर्मान्तरण के विरोध की अपनी इस मुहिम को हवा दी है। अपने विरोध प्रदर्शन के दौरान गाँव वालों ने न सिर्फ गाँव में दोबारा इसे धर्मान्तरण न करने देने का संकल्प लिया बल्कि धर्मांतरित हो चुके लोगों की घर वापसी का भी ऐलान किया। उन्होंने कहा, “जो लोग भी अपना मूल धर्म बदल चुके हैं उन्हें एक बार फिर से वापस लाने का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए उनके हाथ में नारियल पकड़ाया जाएगा। जो भी व्यक्ति वापस आता है वही उनका अपना होगा। जो वापस नहीं आता उसे विदेशी माना जाएगा।”

वहीं छत्तीसगढ़ के जशपुर के साजबहार गाँव से भी एक मामला सामने आया है। यहाँ सरपंच सोनम लकड़ा के घर चंगाई सभा में ईसाई धर्मान्तरण का आरोप लगाया है। जिसमें भाजयुमो ने हंगामा कर दिया। बता दें कि यहाँ हिन्दू युवा नेता विजय सिंह जूदेव सरपंच सोनम लकड़ा के घर पहुँचे थे। उनके मुताबिक यहाँ चंगाई सभा कर रहे थे। उनका आरोप है कि यहाँ चंगाई सभा की आड़ में लोगों को ईसाई बनाने का काम हो रहा था। लेकिन हमने उनकी करतूत पर पानी फेर दिया। उनके मुताबिक प्रार्थना सभा में हिन्दू समुदाय के 4 लोग शामिल थे। जिसके बाद भाजयुमो के कार्यकर्ता भड़क गए और सरपंच को बर्खास्त करने की माँग करने लगे।

हालाँकि, यहाँ पुलिस ने उल्टे हिन्दू संगठनों के कार्यकर्ताओं को ही गिरफ्तार कर लिया है। और ईसाई धर्मान्तरण से इनकार कर दिया है।

गौरतलब है कि मई 2022 में छत्तीसगढ़ के जशपुर में ग्रामीणों की शिकायत पर 2 पादरी धर्मान्तरण करवाते हुए गिरफ्तार किए गए थे। इसी के साथ अक्टूबर 2021 में भी दुर्ग जिले में ग्रामीणों ने धर्मान्तरण के आरोप में 45 ईसाइयों को बंधक बना लिया था। बता दें कि ईसाई धर्मान्तरण को रोकने के लिए दिसम्बर 2021 में जशपुर में आयोजित एक सम्मेलन में जनजातीय सुरक्षा मंच ने राज्य सरकार से अवैध धर्मान्तरण पर तत्काल रोक लगाने को कहा था।

‘खुद के निकाह में शामिल नहीं हो सकती, तो मस्जिद के अंदर समारोह का क्या मतलब?’: दलीला की दो टूक, भड़की केरल की मुस्लिम संस्था

केरल के कोझिकोड (Kozhikode, Kerala) में मस्जिद में निकाह करनी वाली और उसके अंदर ढेरों फोटो क्लिक करवाने वाली बहजा दलीला (Bahja Dalil) सुर्खियों में हैं। उनके इस कदम को कुछ लोग प्रगतिशील बता रहे हैं, जबकि कुछ मुस्लिम विद्वानों सहित अन्य लोगों ने इसकी निंदा की है। इस पर बहजा दलीला ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा, “अगर मैं खुद के निकाह में शामिल नहीं हो सकती, तो निकाह के नाम पर मस्जिद के अंदर होने वाले समारोह का क्या मतलब है?”

अपने रिश्तेदारों की मौजूदगी में फहद कासिम से निकाह करने वाली बहजा ने कहा, “इन कथित आलिमों को यह एहसास होना चाहिए कि इस समय दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है।” उन्होंने यह भी कहा, “मेरे अब्बू की उपस्थिति में यह निकाह सम्पन्न हुआ है। हमारे परिवार में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। यह मेरे लिए सबसे यादगार दिन है। इस समारोह को 30 जुलाई को परक्कडवु महल समिति की अनुमति से आयोजित किया गया था।”

हाल ही में कोझिकोड के परक्कडवु जुमा मस्जिद ने कुट्टयदी के रहने वाले केएस उमर को मस्जिद परिसर में अपनी बेटी के निकाह की अनुमति दी थी। उमर की बेटी का नाम बहजा दलीला है, उन्होंने 30 जुलाई 2022 को फहद कासिम के साथ निकाह किया था। इसके बाद केरल के मुस्लिमों की संस्था पलेरी-परक्कडवु महल समिति ने कहा था कि निकाह के लिए महिला का मस्जिद में प्रवेश अस्वीकार्य है। समिति ने हाल ही में एक बयान जारी कर कहा कि वह भविष्य में इस तरह निकाह की अनुमति नहीं देगी। उन्होंने इसके लिए समिति के अधिकारी को भी माफी माँगने का आदेश दिया था, जिन्होंने समारोह की अनुमति दी थी।

इंडियन एक्प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, समिति पर सवाल उठाते हुए बाहजा ने उनसे पूछा, “इस खुशी के पल में मेरे मस्जिद में ना रहने का क्या मतलब है?” महल समिति ने बीते दिनों बाहजा के परिवार से मिलने का फैसला किया था, ताकि वे उन्हें घटना में उनकी चूक के बारे में बता सकें। समिति ने अपने बयान में लड़की के मस्जिद के अंदर फोटोशूट कराने को कथित रूप से दुर्व्यवहार बताया है।

बता दें कि दुल्हन के अब्बा एस उमर ने भी गैर-जरूरी परम्पराओं को त्यागने की अपील की है। उन्होंने कहा, “दोनों परिवार चाहते थे कि उनकी बेटी मस्जिद में अपनी निकाह की साक्षी बने। ऐसा हमारे इलाके में पहला कार्यक्रम था। मेरी बेटी सहित बाकी अन्य दुल्हनों को भी अपना निकाह देखने का हक है।” गौरतलब है कि इस्लाम में मस्जिदों के अंदर औरतों के प्रवेश की पाबंदी है।”

घरों में कैद रहती हैं अरब की औरतें, इसलिए मर्दों से ज्यादा दिखती हैं ‘थुलथुल’: द इकोनॉमिस्ट ने बताई मोटाई की वजह, लगी लताड़

विदेश के जाने-माने समाचार पत्र ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने हाल में अरब औरतों पर लिखे एक लेख में ‘मोटी’ शब्द का प्रयोग किया। इस लेख की शुरुआत जेनब नाम की महिला से हुई जिसका वजन 120 किलो है।

इस लेख का शीर्षक जहाँ दिया गया, “आखिर अरब जगत में औरतें जो हैं वो मर्दों से मोटी क्यों होती हैं।” वहीं इस लेख का निष्कर्ष यह दिखाया गया कि अरब में औरतें ज्यादातर घर में रहती हैं इसलिए वह मोटी होती हैं। इसके अनुसार औरतों को ज्यादा बाहर खेलने-कूदने का मौका नहीं मिलता जिससे वह मोटी हो जाती हैं जबकि जो मर्द हैं वो खेलते हैं, मजदूरी करते हैं, काम करते हैं और बाहर जाते रहते हैं।

जेनब का वर्णन करते हुए द इकोनॉमिस्ट ने बताया कि 60 साल की उम्र में ‘जेनब’ बगदाद के रेस्टोरेंट में काम करती है और उसका बॉस उसे वहाँ आखिरी में बचा तला-भुना खाना देता है। लेख के मुताबिक ऐसा खाना खा-खाकर जेनब 120 किलो की हो गई और उसकी बेटियों का वजन भी कुछ न करने के कारण आगे बढ़ता जाएगा।

द इकोनॉमिस्ट से नाराज हुए मुस्लिम

इस लेख और इसके शीर्षक को पढ़ने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स गुस्से से आग बबूला हो गए हैं। कई यूजर्स ने इस लेख को घटिया बताते हुए इसे तथ्यों से परे बताया है।

वहीं अरब से जुड़े लोगों ने उनके पूछा है कि आखिर द इकोनॉमिस्ट को उनसे समस्या क्या है। क्यों एक के बाद एक घटिया लेख उनपे लिखे जाते हैं।

इस लेख में मोटी शब्द का प्रयोग देखने के बाद लोग उन स्टडीज का जिक्र कर रहे हैं जो बताती हैं कि इंग्लैंड और अमेरिका में मोटापे के चलते कितनी गंभीर बीमारियाँ हो रही हैं।

एक यूजर ने लिखा, “इस अखबार को अरब और इराक की महिलाओं से माफी माँगनी चाहिए। इन्होंने इस आर्टिकल से अरब महिलाओं की और उनके शरीर में होने वाले बदलावों की बेईज्जती की है जो बच्चे को जन्म देने के बाद होते हैं। ये बेहद शर्मनाक है।” यूजर ने कहा कि न केवल द इकोनॉमिस्ट को ये तस्वीर हटानी चाहिए बल्कि जिस महिला कलाकार की फोटो शेयर की है, उससे माफी भी माँगनी चाहिए।

इसी तरह भारत में दलितों के विरुद्ध झूठ फैलाने वाली इरेना अकबर भी इस लेख से आहत दिखीं। उन्होंने गुस्से में पूछा क्या ये घटिया अखबर ये भी बताएगा कि पश्चिम में औरतें, पुरुषों से मोटी क्यों हैं। उन्होंने इस अखबार को नारीविरोधी और इस्लामोबिक बताया।

बलसम मुस्तफा ने आर्टिकल में प्रयोग की गई महिला कलाकार की तस्वीर पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि जो महिला तस्वीर में दिख रही है वो बहुत छोटेपन से हर टैबू को तोड़ती आई है। उसे तो सम्मान दिया जाना चाहिए, न कि उसे या किसी और अरब महिला को बॉडी शेम।

इसी तरह अन्य यूजर्स भी द इकोनॉमिस्ट पर गुस्सा उतारते हुए दिखे। कुछ ने इल्जाम लगाया कि ये विदेशी अखबर अरब वालों से चिढ़ता है क्योंकि वहाँ की औरतों के पास ज्यादा अधिकार हैं। अगर वहाँ उन्हें कोई परेशान करता है तो सीधे जेल में होगा।

सरकारी बैंकों ने 7 साल में वसूले ₹6.42 लाख करोड़ NPA और डूब गए कर्ज, 98.5% विलफुल डिफॉल्टरों पर मुकदमा

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSB) ने वित्तीय वर्ष 2015 के बाद से ₹6.42 लाख करोड़ के गैर-निष्पादित ऋण (NPA) और बट्टे खाते में डाले गए ऋण अर्थात डूब गए कर्जों की वसूली की है। इसके साथ ही 98.5% विलफुल डिफॉल्टरों पर मुकदमा दायर किया है। यह जानकारी सरकार के पास उपलब्ध आँकड़ों से सामने आई है।

कोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2011 से वित्त वर्ष 2016 तक, सरकार ने पीएसबी में 3.36 लाख करोड़ रुपए की पूँजी डाली है, जबकि बैंकों ने खुद से अतिरिक्त 2.99 लाख करोड़ रुपए जुटाए हैं। वहीं पीएसबी का प्रोविजन कवरेज अनुपात, एक ऐसा उपाय है जो खराब ऋणों को कवर करने के लिए अलग रखी गई राशि को कैप्चर करता है। जो मार्च 2022 के अंत में मार्च 2015 के अंत 46% से बढ़कर 86.9% हो गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2015 से सरकारी बैंकों ने गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में ₹ 5.17 लाख करोड़ और बट्टे खाते में डाले गए खातों में ₹ 1.24 लाख करोड़ की वसूली की है।

बता दें कि पीएसबी का सकल एनपीए अनुपात 31 मार्च, 2018 को 14.6% से गिरकर 31 मार्च, 2022 को 7.4% हो गया, जबकि इस अवधि में शुद्ध एनपीए अनुपात 8% से घटकर 2% हो गया। स्ट्रेस्ड एसेट 15.3% से घटकर 8.7% हो गया है।

वहीं इस मामले में एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया, “बैंक विभिन्न उपलब्ध वसूली तंत्रों के माध्यम से बट्टे खाते में डाले गए खातों में शुरू की गई वसूली कार्रवाई को जारी रखे हुए हैं।”

इनमें दीवानी और दिवालियापन संहिता, 2016 के तहत नागरिक अदालतों या ऋण वसूली न्यायाधिकरण में वित्तीय परिसंपत्तियों के प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण और सुरक्षा ब्याज अधिनियम, 2002 के तहत कार्रवाई नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 के तहत या बातचीत के जरिए निपटान/समझौता और एनपीए की बिक्री के जरिए शामिल हैं।

पीएसबी के सकल अग्रिम के अनुपात के रूप में धोखाधड़ी की घटना वित्तीय वर्ष 2013-14 के दौरान 1.32% से गिरकर वित्तीय वर्ष 2021-22 के दौरान 0.05% हो गई है।

वहीं ऐसे मामलों में पीएसबी का प्रोवीजन कवरेज अनुपात, एक ऐसा उपाय है जो खराब ऋणों को कवर करने के लिए निर्धारित राशि को कैप्चर करता है, मार्च 2022 के अंत में 46% से बढ़कर मार्च 2015 के अंत में 86.9% हो गया है।

उपरोक्त अधिकारी ने कहा, “इस तरह की धोखाधड़ी की घटनाओं में कमी आई है क्योंकि बेहतर पहचान और रिपोर्टिंग के साथ धोखाधड़ी की जाँच के लिए व्यापक कदम उठाए गए हैं।”

गौरतलब है कि 31 मार्च, 2022 तक 12,265 नामित विलफुल डिफॉल्टरों में से 12,076 (98.5%) के खिलाफ मामले दर्ज किए गए हैं, 40.2% के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है और 75.5% के खिलाफ सरफेसी की कार्यवाही शुरू की गई है।

अधिकारी ने बताया, “सरकार ने एक अनुकूल कारोबारी माहौल और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा प्रदान की है, जिसने निजी क्षेत्र के बैंकों को 2021-22% में देश में फलने-फूलने के लिए प्रोत्साहित किया है।”

‘टाइम्स नाउ’ की एंकर नाविका कुमार को सुप्रीम कोर्ट से राहत, पुलिस को कार्रवाई न करने के निर्देश: बंगाल में हुई थी पहली FIR, नूपुर शर्मा डिबेट वाला मामला

सुप्रीम कोर्ट ने ‘टाइम्स नाउ’ की एंकर नविका कुमार को बड़ी राहत देते हुए पुलिस को उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न करने के आदेश दिए हैं। उच्चतम न्यायालय ने यह आदेश नविका कुमार की उस याचिका पर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने की माँग की थी। इस याचिका पर कोर्ट ने पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, दिल्ली व जम्मू-कश्मीर राज्य सरकारों को नोटिस भेजा है। इस मामले में सुनवाई के लिए 2 सप्ताह का समय दिया गया है। यह आदेश 8 अगस्त, 2022 (सोमवार) को आया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह आदेश जस्टिस कृष्णा मुरारी और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच ने दिया है। राज्य सरकारों के अलावा इस केस से जुड़े अन्य लोगों को भी नोटिस भेजी गई है। नाविका कुमार की तरफ से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने बहस की। उन्होंने कहा, “टीवी डिबेट के दौरान नाविका चुप थीं। ज्ञानवापी की इस बहस में एक व्यक्ति ने दूसरे को कुछ कहा तो दूसरे ने उस पर पलटवार किया। नविका ने तो इस बहस को शांत करवाया था।”

पश्चिम बंगाल राज्य सरकार की तरफ से इस मामले में एडवोकेट मेनका गुरस्वामी पेश हुईं थीं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि पहली FIR पश्चिम बंगाल में दर्ज हुई थी। इस पर मुकुल रोहतगी ने सवाल किया कि इसमें बंगाल सरकार की अतिरिक्त रुचि क्यों थी ?

बता दें कि 26 मई, 2022 को ज्ञानवापी मुद्दे पर नूपुर शर्मा और तस्लीम अहमद रहमानी के बीच हो रही बहस में तस्लीम द्वारा बार-बार शिवलिंग का अपमान किया जा रहा था। नूपुर शर्मा द्वारा तस्लीम रहमानी को दिए गए जवाब को ऑल्ट न्यूज़ के कथित फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबेर ने काट-छाँट कर सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया, जिस से देश में तनाव फ़ैल गया। इसके चलते देश के अलग-अलग हिस्सों में न सिर्फ हिंसक गतिविधियाँ हुईं थीं, बल्कि नूपुर समर्थकों की हत्या भी की जाने लगी। इस शो की एंकर नविका कुमार थीं, जिन पर कुछ इस्लामी समूहों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में FIR दर्ज करवाई थी।

1 जुलाई को नूपुर शर्मा अपने खिलाफ देश भर में हुए FIR के खिलाफ राहत माँगने सुप्रीम कोर्ट गईं तो उन्हें तल्ख़ टिप्पणियों का सामना करना पड़ा था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद जुबेर और नूपुर शर्मा को देश भर में हुए केस में राहत दी थी और राज्य सरकारों से दंडात्मक कार्रवाई न करने के लिए कहा था।

कॉमनवेल्थ गेम्स में PV सिंधु ने जीता गोल्ड मेडल, PM मोदी ने बताया ‘चैंपियनों की चैंपियन’: मेडल तालिका में भारत ने न्यूजीलैंड को पीछे छोड़ा

कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG 2022) के अंतिम दिन भारत की स्टार शटलर पीवी सिंधु ने शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल जीता। सोमवार (8 अगस्त, 2022) को बैडमिंटन विमेन्स के सिंगल्स मुकाबले में उन्होंने कनाडा की मिशेल ली को शिकस्त दी। फाइनल में सिंधु ने ली को 21-15, 21-13 से हराया। कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने अब तक 56 मेडल अपने नाम कर लिए हैं। इनमें 19 गोल्ड, 15 सिल्वर और 22 ब्रॉन्ज मेडल शामिल हैं। सिंधु की इस जीत के साथ भारत पदक तालिका में न्यूजीलैंड को पछाड़ते हुए चौथे स्थान पर पहुँच गया है।

बैडमिंटन में सिंधु के बाद अब लक्ष्य सेन से पुरुष एकल में स्वर्ण की उम्मीद है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीत की बधाई देते हुए उन्हें ‘चैम्पियनों की चैम्पियन’ बताया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, गेम में शानदार शुरुआत करते हुए पीवी सिंधु ने पहले 4-2 से बढ़त बना ली थी, लेकिन मिशेल ली ने जबरदस्त वापसी करते हुए स्कोर को बराबरी पर ला दिया। इसके बाद दोनों के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिली। पहले गेम में ब्रेक तक सिंधु 11-10 से आगे थीं। ब्रेक के बाद सिंधु ने तुरंत ही 5 अंकों की बढ़त हासिल कर ली। इसके बाद स्कोर 17-12 हो गया। वहीं, मिशेल ली ने एक बार फिर वापसी की कोशिश की, लेकिन इस बार सिंधु के आक्रामक शॉट के आगे उनके पसीने छूट गए। इस तरह भारतीय खिलाड़ी ने पहले गेम को 21-15 से अपने नाम कर लिया।

इसके बाद दूसरे गेम में मिशेल ली ने पहला अंक हासिल किया, जिसके बाद सिंधु ने दमदार वापसी की। उन्होंने दो-तीन जबरदस्त स्मैश लगाए। ली कुछ समझ पाती, उससे पहले ही सिंधु ब्रेक तक 11-6 से आगे हो गईं। इसके बाद सिंधु ने शानदार प्रदर्शन करते हुए ली को कोई मौका नहीं दिया और दूसरा गेम भी उन्होंने 21-13 से अपने नाम कर लिया।

बता दें कि कॉमनवेल्थ में विमंस सिंगल्स मुकाबलों में सिंधु का यह पहला गोल्ड है। इससे पहले 2018 में सायना नेहवाल ने कॉमनवेल्थ में विमेंस सिंगल्स का गोल्ड जीता था। फाइनल में उन्होने सिंधु को ही हराया था।

जर्जर अवस्था में पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर, कभी भी हो सकता है धराशायी: मरम्मत के लिए ASI और गहलोत सरकार से गुहार, सीवर से आचमन को मजबूर श्रद्धालु

राजस्थान के पुष्कर में स्थित ब्रह्मा मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में बदहाल है और ये धरोहर कभी भी धराशाई होने की कगार पर खड़ा है। सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा का ये मंदिर मरम्मत और पुनर्निर्माण की बाट जोह रहा है। मंदिर के मूल ढाँचे में कई दरार हैं और ये कई जगह से टूट-फूट गया है। दुनिया भर कई श्रद्धालु यहाँ आते हैं, लेकिन उनकी नजर 3 बड़े दरारों पर पड़ती है। जगह-जगह से फर्श भी धँस चुकी है। बता दें कि इस पृथ्वी पर भगवान ब्रह्मा के दुर्लभ मंदिरों में से ये एक है।

इस सम्बन्ध में ‘दैनिक भास्कर’ से बात करते हुए मंदिर कमिटी के सचिव और SDM सुखराम भिंडर का कहना है कि ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) को उन्होंने कई बार पत्र लिखा है, लेकिन उसका जवाब नहीं आता। उन्होंने कहा कि ASI की अनुमति के बिना यहाँ कोई कार्य नहीं हो सकता। परकोटे के बाहरी हिस्से में दो बड़ी दरारें और एक अंदर है। मुख्य मंदिर के गर्भ गृह का पलस्तर भी जड़ चुका है। 2 महीने पहले ASI और ‘राष्ट्रीय धरोहर प्राधिकरण’ की टीम ने यहाँ का दौरा किया था, तब उन्हें इसकी जानकारी दी गई थी।

मंदिर के भूतल में स्थित 2 प्राचीन शिव मंदिरों को पूजा के लिए बंद कर दिया गया है, क्योंकि उनका ड्रेनेज सिस्टम ही जाम हो चुका है। श्रद्धालु जल चढ़ाते हैं तो पानी बाहर ही नहीं जा पाता। नींव में रिसाव की भी आशंका है। लोग सीवर से आचमन करने को मजबूर हैं। सरोवर को सीवर मुक्त करने के लिए बजट का प्रावधान तो हुआ, लेकिन योजना का खाका ही तैयार नहीं हो पाया। परिक्रमा मार्ग धँसने के कारण एक तरफ झुक गया है।

साथ ही बरगद के एक विशाल पेड़ से भी मंदिर को नुकसान पहुँच रहा है। RTDC (राजस्थान पर्यटन विकास निगम) के अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौड़ ने यहाँ की दुर्दशा को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और केंद्रीय संस्कृति मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के समक्ष रखा। दोनों राजस्थान से ही आते हैं। दिव्यांगों को दर्शन में दिक्कत होने के कारण जॉइंट कमिश्नर उमाशंकर शर्मा ने इसकी मरम्मत के लिए ASI को खाका भेजने का निर्देश भी दिया

मध्यप्रदेश के भानपुरा में स्थित ज्योर्तिमठ की अवांतर पीठ के जगद्‌गुरु शंकराचार्य ज्ञानानंद तीर्थ भी हाल ही में पुष्कर पहुँचे थे, जहाँ उन्होंने इस मंदिर की जर्जर स्थिति को देखते हुए सरकार से मरम्मत की माँग की। सैकड़ों शिष्यों के साथ यहाँ पहुँचे ज्ञानानंद ने कहा कि मंदिर का कोई हिस्सा ढह गया तो जनहानि हो सकती है। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार से भी लोग इसकी मरम्मत की माँग कर रहे हैं।

जामिया, AMU जैसे 5200 मुस्लिम संस्थान, 50% आरक्षण: पसमांदा मुस्लिमों के लिए BJP के OBC मोर्चा ने उठाई आवाज, कट्टरपंथी भड़के

भाजपा ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लक्ष्मण (K. Laxman) ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया और जामिया हमदर्द जैसे मुस्लिम संस्थानों में पसमांदा समुदाय (Pasmanda Community) के लिए 50% आरक्षण की माँग की है। हालाँकि, इस कदम ने समुदाय के एक वर्ग को नाराज कर दिया है। वहीं, कई लोगों ने इसे जाति के आधार पर समुदाय को विभाजित करने के लिए एक सोची समझी चाल बताया है।

नई दिल्ली में शनिवार (7 अगस्त 2022) को पसमांदा मुस्लिम स्नेह मिलन एवं सम्मान समारोह में लक्ष्मण ने कहा,

“मैं समुदाय के भीतर पसमांदा मुस्लिमों के सदियों पुराने अन्याय और शोषण की ओर आपका ध्यान केंद्रित करना चाहता हूँ। पसमांदा समुदाय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से बेहद कमजोर हैं। आजादी के 75 साल बाद भी उनकी हालत में कोई सुधार नहीं आया है। पसमांदा का मुद्दा हिंदू-मुस्लिम एकता के शोर में दब गया है। पसमांदा मुस्लिमों को आज एएमयू (AMU), जामिया मिलिया (JMI) और जामिया हमदर्द (JH) में 50% आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।”

इससे पहले राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रमुख आतिफ रशीद (Atif Rasheed) ने एएमयू, जामिया और झामुमो के कुलपतियों को पत्र लिखकर विश्वविद्यालयों में पसमांदा मुस्लिमों के लिए आरक्षण का अनुरोध किया था।

15 जून को लिखे एक पत्र में रशीद ने ‘कोटा के भीतर कोटा’ के बारे में लिखा था। उन्होंने कहा था, “हमने अल्पसंख्यक संस्थानों के तीन वीसी को पत्र लिखकर पसमांदा मुस्लिमों के लिए मुस्लिम कोटे के भीतर 50% आरक्षण के लिए कहा। इससे किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए या विश्वविद्यालयों के भीतर समीकरण नहीं बदलना चाहिए, क्योंकि हम केवल कोटा के भीतर ही कोटा माँग रहे हैं जो पहले से ही चलन में है।”

बता दें कि अभी तक किसी भी विश्वविद्यालय ने इस प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया नहीं दी है। इसलिए, भाजपा ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. लक्ष्मण ने नई दिल्ली में पसमांदा मुस्लिम स्नेह मिलन एवं सम्मान समारोह में इस मुद्दे को फिर से उठाया है।

आरक्षण की माँग केवल दो एएमयू, जामिया मिलिया और जामिया हमदर्द तक ही सीमित नहीं है। रशीद ने केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को भी पत्र लिखकर सामाजिक और आर्थिक रूप से संकटग्रस्त समुदाय की दुर्दशा की ओर ध्यान आकर्षित किया है।

उन्होंने कहा, “हमने केंद्र सरकार के हर मंत्री और लगभग 250 सांसदों को पत्र लिखा है। ओबीसी मोर्चा के प्रमुख के. लक्ष्मण ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की और हमारा समर्थन किया। इसके अलावा उन्होंने संसद में यह मुद्दा उठाया है।” उन्होंने (रशीद) पसमांदा मुस्लिमों के लिए 50% आरक्षण की माँग करते हुए देश भर में 5,200 मुस्लिम संस्थानों को पत्र लिखा है।

बता दें कि पसमांदा मुस्लिम सामाजिक रूप से बहिष्कृत, उपेक्षित और दबे हुए हैं। इसमें दलित और बैकवर्ड मुस्लिम आते हैं, जो मुस्लिम समाज में एक अलग सामाजिक लड़ाई लड़ रहे हैं। वे कई आंदोलन भी कर चुके हैं। ऐसे में भाजपा का ओबीसी मोर्चा उनकी आवाज बना है जिसे देख कट्टरपंथी नाराज हैं।

लालू को जंगलराज का दिया मौका, फिर सुशासन के लिए BJP का साथ: जॉर्ज से RCP तक कई पर किए सितम, ‘पलटू कुमार’ भी कहलाते हैं नीतीश

बिहार की राजनीति में एक बार फिर से हलचल तेज़ हो गई है। जैसा कि पिछले 17 वर्षों से होता आया है, इस उथल-पुथल के केंद्र में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। पिछले 17 वर्षों से सत्ता पर उनका ही कब्ज़ा है। इसके साथ ही मीडिया में सूत्रों का खेल भी शुरू हो गया है। कहीं कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार और सोनिया गाँधी में हाल ही में लंबी बातचीत हुई है, तो कोई जदयू प्रदेश अध्यक्ष की राजद सुप्रीमो लालू यादव से मुलाकात के दावे कर रहा है।

नीति आयोग की बैठक से नदारद रहने के बाद ही नीतीश कुमार को लेकर कयास लगने शुरू हो गए थे कि क्या वो अब फिर से पलटी मारेंगे? एक तरफ जदयू नेता उपेंद्र कुशवाहा कह रहे हैं कि गठबंधन में सब ठीक है और केंद्र की हर बैठक का हिस्सा होना ज़रूरी नहीं है, तो दूसरी तरफ जदयू अध्यक्ष ललन सिंह कह रहे हैं कि कहाँ से जदयू को तोड़ने का षड्यंत्र हुआ और किसने खुलासा किया, ये सब सामने आएगा। कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से ही नीतीश कुमार बेचैन हैं।

उन्हें डर है कि कहीं बिहार में भी कर्नाटक, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र न दोहरा दिया जाए। हालाँकि, राजनीति के शातिर खिलाड़ी नीतीश कुमार के बारे में कहा जाता है कि वो हमेशा दो दरवाजे खोल कर रखते हैं और दबाव से बचने के लिए किसी भी तरफ झुकने का रास्ता खुला रखते हैं। शायद यही कारण है कि कभी विधायक और सांसद का चुनाव हारने के बावजूद लगभग 2 दशक से बिहार की राजनीति उनके ही इर्दगिर्द घूम रही है।

नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर पर नजर डालें तो उन्होंने सबसे ताज़ा पलटी तब मारी थी, जब राजद के साथ उन्होंने गठबंधन तोड़ कर भाजपा के साथ हाथ मिला लिया और मुख्यमंत्री बने रहे। इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका स्टैंड बताते हुए भले ही प्रचारित किया गया हो, लेकिन क्या उन्हें लालू यादव के परिवार के बारे में जुलाई 2017 से पहले कुछ भी नहीं पता था? 20 वर्षों में 7 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश कुमार को तभी उनके विरोधी ‘पलटूराम’ कह कर सम्बोधित करते रहे हैं।

नीतीश कुमार की चुनावी शुरुआत अच्छी नहीं रही थी और उन्हें लगातार तीन बार विधायकी के चुनाव में हार के सामना करना पड़ा। आखिरकार उन्होंने 1985 में जीत का स्वाद चखा और नालंदा के हरनौत से ‘लोक दल’ के टिकट पर जीत दर्ज की। उससे पहले 80 के दशक के अंत में जब ‘जनता पार्टी’ टूटी थी, तब नीतीश कुमार सत्येंद्र नारायण सिन्हा के साथ हो लिए। लेकिन, उस दौरान भी वो किशन पटनायक के नेतृत्व वाले ‘लोहिया विचार मंच’ से जुड़े रहे थे।

उसी समय से उन्होंने दो तरफ वाली राजनीति खेलनी शुरू कर दी थी। पहली बार विधायक का चुनाव जीतने के 4 वर्षों बाद ही वो बाढ़ से सांसद भी निर्वाचित हो गए। ये वो दौर था, जब बिहार में लालू यादव का कद बढ़ता ही जा रहा था और अंततः वो मुख्यमंत्री के पद तक पहुँचे। लालू यादव को मुख्यमंत्री बनाने में नीतीश कुमार का भी योगदान था। ‘जनता पार्टी’ के भीतर उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में लालू यादव का समर्थन किया था।

हालाँकि, इसके कुछ ही वर्षों बाद लालू यादव से उनकी दूरी बढ़ती ही चली गई। 90 के दशक के मध्य में जब समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस ने समता पार्टी का गठन किया तो नीतीश कुमार उनके साथ हो लिए। फिर उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन किया और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल, सड़क परिवहन और फिर कृषि जैसे मंत्रालय सँभाले। 1994 में समता पार्टी के गठन के 9 साल बाद उन्होंने 2003 में जदयू बनाई।

नीतीश कुमार भले ही खुद को जातिवाद का विरोधी बताते हों और इससे खुद को अलग रखने की बातें करते हों, लेकिन ये भी जानने लायक बात है कि उन्होंने बिहार में अपना राजनीतिक दबदबा कायम करने के लिए एक जातीय रैली का ही सहारा लिया था। फरवरी 1994 की उस रैली को उन्हें लालू विरोध का मुख्य चेहरा बनाने के श्रेय जाता है। इसका नाम था ‘कुर्मी चेतना महारैली’, जिसमें पहले तो नीतीश कुमार शामिल नहीं होना चाहते थे लेकिन फिर पलट गए।

विधायक रहे सतीश कुमार सिंह के आग्रह के बाद उन्होंने इस रैली में शामिल होने के लिए हामी भर दी। कहते हैं, इस रैली में उनके शामिल होने के बाद से ही कुर्मी-कोइरी समाज उनके पीछे लामबंद होना शुरू हो गया और लालू यादव विरोधी राजनीति तेज़ होती चली गई। जदयू और समता पार्टी के बीच की भी एक कहानी है। जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश कुमार ने समता पार्टी का विलय शरद यादव के ‘जनता दल’ वाले धड़े में कर दिया था।

2005 में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने और भाजपा के सहयोग से उन्होंने सरकार चलाना शुरू किया। अपराध पर अंकुश से लेकर विकास परियोजनाओं तक, इस गठबंधन सरकार के पहले कार्यकाल की खासी सराहना हुई। लेकिन, भाजपा के साथ रहते हुए नीतीश कुमार ने 2010 में भाजपा नेताओं को दिया भोज रद्द कर दिया था। कारण – तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी के साथ उनकी एक तस्वीर अख़बारों में छप गई थी।

लुधियाना की उस रैली में नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार का हाथ पकड़ कर उठा दिया था और जनता को सन्देश दिया था कि दोनों में अच्छे रिश्ते हैं, लेकिन इससे नीतीश भड़क गए। हिंदुत्व से खुद को अलग दिखाने की कोशिश में नीतीश कुमार ने भाजपा नेताओं को दिया रात्रिभोज रद्द कर दिया, जबकि इसके कटआउट्स पूरे पटना में लग गए थे। भाजपा नेताओं को शर्मिंदगी महसूस करनी पड़ी। इतना ही नहीं, बाढ़ राहत कार्य के लिए गुजरार सरकार द्वारा दी गई मदद राशि भी उन्होंने लौटा दी थी।

इसके बावजूद नीतीश कुमार भाजपा के साथ सत्ता में बने रहे। लेकिन, हिंदुत्व विरोधी कीड़े ने उन्हें ऐसा काटा कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के साथ ही उन्होंने भाजपा से गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया और बाहर से राजद के समर्थन से मुख्यमंत्री बन बैठे। जब 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू की बुरी हार हुई और मोदी पीएम बन गए, तब नीतीश कुमार ने नैतिक जिम्मेदारी की बातें करते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया

लेकिन, उन्होंने अपने बदले जिन जीतन राम माँझी को पद पर बिठाया, उनके साथ उनके रिश्ते कुछ ही दिन बाद बिगड़ने लगे। फिर उन्होंने माँझी को हटा दिया और खुद मुख्यमंत्री बन बैठे। 2015 का चुनाव उन्होंने राजद-कॉन्ग्रेस के साथ मिल कर लड़ा और जीत दर्ज की। लेकिन, 3 साल सरकार चलाने के बाद उन्हें राजद फिर से भ्रष्टाचारी लगने लगी और उन्होंने भाजपा से हाथ मिला लिया। 2020 का चुनाव भाजपा के साथ लड़ कर उन्होंने जीत दर्ज की और फिर मुख्यमंत्री बने।

अब 2 साल सरकार चलाने के बाद उन्हें फिर से भाजपा बुरी लगने लगी है और वो एक बार फिर से राजद को डोरे डाल रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो ये कि जिन रामचंद्र प्रसाद सिंह के कारण ये पूरा बखेड़ा खड़ा हुआ है, वो उनके ही विश्वस्त हुआ करते थे। केंद्रीय मंत्री के कार्यकाल के दौरान RCP सिंह उनके सचिव थे। उन्हें समय-पूर्व रिटायर करा कर राजनीति में लाने के श्रेय भी नीतीश कुमार को ही जाता है। उन्होंने RCP सिंह को केंद्रीय मंत्री तक बनवा दिया।

नीतीश कुमार ने पहले मोदी मंत्रिमंडल में जदयू को शामिल किया, लेकिन फिर ऐलान करवा दिया कि जदयू अब मोदी मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं रहेगा। आज RCP सिंह नीतीश कुमार के दुश्मन नंबर एक हैं। वैसे जदयू अध्यक्षों के साथ उनकी दुश्मनी नई नहीं है। जॉर्ज फर्नांडिस को उन्होंने ही जदयू का अध्यक्ष बनाया, लेकिन मुख्यमंत्री बनने के एक साल के बाद ही उनसे ये पद चीन लिया। इतना ही नहीं, 2009 के लोकसभा चुनाव में उनका टिकट भी काट दिया।

फिर नीतीश कुमार ने शरद यादव को जदयू के अध्यक्ष का पद दिया। कुछ सालों बाद उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा कर खुद जदयू अध्यक्ष बन बैठे। उनका आवास भी छीन लिया। फिर RCP सिंह का भी वही हाल हुआ। मौजूदा जदयू अध्यक्ष ललन सिंह भले आज उनके विश्वासपात्र हों, लेकिन बीच में दोनों के बीच दुश्मनी हो गई थी। 2009 में उन्होंने ललन सिंह को पार्टी से निकाल दिया था। फिर दोनों दोस्त बन गए और ललन सिंह को मंत्री पद मिला।

जो नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी के हिंदुत्व से खुद को अलग दिखाने के लिए भाजपा से नाता तोड़ लेते हैं, वही हिंदुत्व के फायरब्रांड की छवि रखने वाले योगी आदित्यनाथ के शपथग्रहण समारोह में शामिल होते हैं। कभी लालू के साथ होते हैं, कभी विरोधी। कभी जॉर्ज-RCP-शरद-ललन को अध्यक्ष बनाते हैं, कभी दुश्मनी करते हैं। कभी केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा बनते हैं, कभी नहीं बनते हैं। कभी जीतन राम माँझी को सीएम बना देते हैं, फिर उनसे छीन भी लेते हैं।

प्रशांत किशोर भी इसके गवाह हैं। कभी उनके सबसे बड़े विश्वस्त हुआ करते थे और जदयू की सदस्यता के साथ-साथ मंत्री का दर्जा तक मिल गया था, लेकिन फिर उन्हें भी बाहर का रास्ता देखना पड़ा। बिहार में तो प्रशांत किशोर के एक घर को भी अवैध निर्माण बताते हुए ध्वस्त कर दिया गया। नीतीश कुमार ने जिसे भी अपना विश्वस्त बनाया, उसे बाहर का रास्ता भी दिखाया ही दिखाया। अब देखना है कि उनका ताज़ा फैसला क्या होता है।

1 मिनट नहीं खुला VIP गेट तो दबंगई पर उतरे पंजाब के आप MLA, तोड़ डाला बैरियर: 10 मिनट तक फ्री में निकलवाई गाड़ियाँ

पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक कर्मवीर सिंह घुम्मन की दादागीरी का कर एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। बताया जा रहा है कि दसूहा से आप विधायक ने होशियारपुर के एक टोल प्लाज़ा पर लगभग 10 मिनट तक जबरन कई गाड़ियों को फ्री में निकाला। हालाँकि, विधायक के गुस्से की वजह VIP लेन का न खुलना और उनका 1 मिनट इंतज़ार करना बताया जा रहा है।

इस घटना के वायरल हो रहे CCTV फुटेज में विधायक टोल नाके के बैरियर पर खड़े दिखाई दे रहे हैं। उनके पीछे पंजाब पुलिस के 2 सुरक्षाकर्मी भी दिखाई दे रहे हैं। वहीं पुलिस के जवान भी विधायक के काम में हाथ बँटवाते दिख रहे हैं जो लोगो से उस लेन से बिना टोल जाने को कह रहे जिसमें वो खुद हैं। इस दौरान बैरियर गिराने पर एक सुरक्षाकर्मी टोल प्लाजा के कर्मचारियों के साथ उलझता भी दिखाई दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह मामला होशियारपुर के चौलांग टोल प्लाजा का है। टोल प्लाजा के मैनेजर मुबारक अली के मुताबिक, “विधायक ने हमारे टोलकर्मी हरदीप सिंह को गालियाँ दी। इसके बाद खुद विधायक ने अपने हथियार बंद अंगरक्षकों के साथ मिल कर गाड़ियों को फ्री में निकलवाना शुरू कर दिया। हमारे टोल बूथों पर विधायक के साथियों ने कब्ज़ा जमा लिया था। इस दौरान उन्होंने हमारे बूम बैरियर को भी तोड़ डाला। हमने नेशनल हाइवे अथॉरिटी को इसकी जानकारी दे दी है।”

वहीं इस घटना पर विधायक घुम्मन ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “टोल प्लाजा पर कोई भी व्यक्ति VIP लेन खोलने को तैयार नहीं था। हमने ऐसा इसलिए किया। टोलकर्मी अपनी मनमानी करते हैं। कई बार तो मेरे कर्मचारियों को VIP टोल बूथ खोलना पड़ा था क्योंकि उसे खोलने के लिए टोलकर्मी मौजूद ही नहीं थे। मेरी इतनी चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि मैं विधायक हूँ।”

विधायक घुम्मन ने यह भी कहा कि वो अक्स्सर चंडीगढ़ और जालंधर उसी रास्ते से जाते हैं और हर बार उस टोल प्लाजा पर VIP लेन बंद मिली जिसे उन्हें खुद खोलना पड़ा। उनके मुताबिक, “घटना के दिन जब मैं टोल प्लाजा वालों से बात करने नीचे उतरा तब उनके कई गुंडों ने हमें घेर लिया था और हमसे गाली गलौज की थी।”