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जूडिशरी में हो लोकल भाषा पर जोर, न्याय प्रणाली में इससे बढ़ेगा भरोसा: जजों को PM मोदी की सलाह

साल 2016 के बाद आज एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विज्ञान भवन में देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और मुख्य न्यायाधीशों के साथ बैठक की। इस बैठक में भारत के चीफ जस्टिस एनवी रमना के अलावा 25 हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और कानून मंत्री भी मौजूद थे। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहाँ स्थानीय लोगों का विश्वास जीतने के लिए स्थानीय भाषा के प्रयोग पर अपनी बात रखी। वहीं सीजेआई ने इस बैठक में जनहित याचिका का मुद्दा उठाया और बताया कि कैसे आज जनहित की जगह इसका इस्तेमाल निजी स्वार्थ के लिए हो रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बैठक में कोर्ट में स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा, “हमें अदालत में लोकल भाषाओं को बढ़ावा देने की जरूरत है। इससे देश के नागरिकों का न्याय प्रणाली में भरोसा बढ़ेगा और वो खुद को उससे जुड़ा हुआ महसूस कर पाएँगे।” पीएम ने कहा, “देश में 3.5 लाख कैदी अंडर ट्रायल हैं। इनमें से अधिकांश लोग गरीब या सामान्य परिवारों से हैं। इनके मसले को निपटाने पर जोर दिया जाए। मैं सभी मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट के जजों से इस पर ध्यान देने की अपील करता हूँ।”

जजों और मुख्यमंत्रियों को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने बताया कि भारत सरकार भी न्याय व्यवस्था में तकनीक की संभावनाओं को डिजिटल इंडिया मिशन का हिस्सा मानती है। इसीलिए ई-कोर्ट प्रोजेक्ट को आज मिशन मोड में लागू किया जा रहा है। उन्होंने आम आदमी और कानून पेचिदगियों का मुद्दा उठाया। वह बोले- “2015 में हमने करीब 1800 ऐसे क़ानूनों को चिन्हित किया था जो अप्रासंगिक हो चुके थे। इनमें से जो केंद्र के कानून थे, ऐसे 1450 क़ानूनों को हमने खत्म किया। लेकिन, राज्यों की तरफ से केवल 75 कानून ही खत्म किए गए हैं।”

PIL का गलत इस्तेमाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले बैठक को संबोधित करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने भी आज की न्याय व्यवस्था पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “न्याय का मंदिर होने के नाते कोर्ट को लोगों का स्वागत करना चाहिए। कोर्ट की अपेक्षित गरिमा और आभा होनी चाहिए। आज जनहित याचिकाओं का इस्तेमाल लोग अब अपने पर्सनल इंटरेस्ट के हिसाब से कर रहे हैं। इसका प्रयोग अधिकारियों को धमकाने के लिए हो रहा है। जनहित याचिका राजनीतिक और कॉर्पोरेट विरोधी के खिलाफ एक टूल बन चुका है।”

उन्होंने कहा, “संविधान ने लोकतंत्र के तीनों अंगों के बीच शक्तियों का बँटवारा किया है। तीनों को अपने अपने कर्तव्यों का पालन करते समय लक्ष्मण रेखा पार नहीं करनी चाहिए। सरकारें जानबूझकर न्यायिक निर्देशों को नजरअंदाज करती हैं, ये सब करना हेल्दी डेमोक्रेसी के लिए उचित नहीं है।”

HC के जजों और मुख्यमंत्रियों से 39वीं कॉन्फ्रेंस

गौरतलब है कि न्यायधीशों के साथ ये 39वीं कॉन्फ्रेंस है। इससे पहले 38वीं कॉन्फ्रेंस का आयोजन साल 2016 में हुआ है और और उसके बाद साल 2022 में इसका आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम में केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू भी मौके पर मौजूद थे, जिन्होंने कहा, “यह प्रोग्राम सरकार और ज्यूडिशियरी के बीच ईमानदार और कंस्ट्रक्टिव बातचीत का अनूठा मौका है। इससे लोगों को ठोस न्याय दिलाने में मदद मिलेगी।”

आरफा खानम पर मुस्लिमों ने ही लगाया ‘बेहयाई’ का आरोप, फोटो दिखा कर कह रही थीं – मस्जिद में जा सकती हैं महिलाएँ

मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं को प्रवेश की अनुमति न होने की चर्चा के बीच द वायर की पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने 29 अप्रैल, 2022 (शुक्रवार) को एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में उन्होंने कुछ तस्वीरों और विजुअल के माध्यम से ये बताना चाहा कि मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं को प्रवेश और नमाज़ की अनुमति है। जामा मस्जिद की वीडियो को ट्वीट करते हुए उन्होंने RSS पर भी कटाक्ष किया।

वीडियो के साथ उन्होंने लिखा, “क्या संघी बनने के लिए बुद्धि स्तर कम होना चाहिए ? हाँ, मुस्लिम महिलाएँ मस्जिद के अंदर जा कर रोजा-इफ्तारी कर सकती हैं और नमाज़ भी पढ़ सकती हैं। मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं के लिए कोई पाबंदी नहीं है। इस वीडियो में दिल्ली की जामा मस्जिद में महिलाएँ नमाज़ से पहले वज़ू कर रही हैं।”

आरफा के इस ट्वीट पर उन्हें ट्रोल किया जाने लगा है। @yogendrapbh नाम के हैंडल से योगेंद्र ने लिखा, “मोहतरमा, आप सच्चाई को छुपा नही सकती हैं। आपके धर्म में महिलाओं का क्या ओहदा है, उनको क्या समझा जाता है, यह दुनिया से छिपा नहीं है। बेहतर होगा आप अपने समाज की महिलाओं के लिए आवाज उठाइए और हिन्दू महिलाओं की तरह उनको भी पुरुषों के समान अधिकार दिलाएँ।”

नेटीजेंस ने कराया सच का सामना

आरफा के इस ट्वीट पर उन्हें ट्रोल किया जाने लगा है। तारिक नाम के एक यूजर ने मस्जिद में महिलाओं को आना गलत बताते हुए कैमरे के आगे फोटग्राफी करवाते हुए बेहयाई फैलाने का आरोप लगा डाला।

दलीप पांचोली ने एक मौलाना का वीडियो बयान ट्वीट किया, जिसमें वो मस्जिद में महिलाओं के आने को गलत बता रहा है।

मिस्टर सिन्हा ने मुबाशिर के ट्वीट के स्क्रीन शॉट से जवाब दिया, जिसमें वो पढ़ी-लिखी महिलाओं को दीन की तालीम न होने और गैर मज़हब वालों के आगे वज़ू करने का आरोप लगा रहे हैं।

अफ़ज़ल अफाक ने तो वीडियो में दिख रहे वज़ू के तौर-तरीके पर ही सवाल उठा दिए।

सैयद हसन ने इन बातों को बेवकूफी बता दिया।

मदद को मोहताज जहाँगीरपुरी के घायल-पीड़ित हिंदू, नेता मुस्लिमों को बता रहे ‘डरा हुआ’: ग्राउंड रिपोर्ट

दिल्ली के जहाँगीरपुरी में 16 अप्रैल 2022 को हुई हिंसा के बाद जमीयत उलेमा ए हिन्द और कई अन्य राजनीतिक पार्टियों ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। इस दौरान पीड़ित बता कर कुछ लोगों को राहत सामग्री बाँटे जाने के कई फोटो और वीडियो भी वायरल हुए। कुछ संगठनों द्वारा मामले में आरोपित बनाए गए लोगों को कानूनी मदद भी देने की घोषणा हुई।

ऑपइंडिया ने जहाँगीरपुरी जा कर ग्राउंड पर ये जाना कि राहत और मदद एकतरफा है। पीड़ित हिन्दू पक्ष अभी भी मददगारों की बाट जोह रहा है। मतलब यह कि जिन लोगों ने दंगा किया, मदद भी उन्हें ही और जिन पर अत्याचार हुए… वो अभी भी लाचार-परेशान।

TMC ने मुस्लिमों को डरा हुआ बताया

TMC का प्रतिनिधि मंडल भी घटनास्थल पर गया। उसने जहाँगीरपुरी दंगों में एक पक्ष को पीड़ित बताते हुए दिल्ली पुलिस और सरकार पर निशाना साधा। TMC ने इसे फैक्ट फाइंडिंग टीम का नाम दिया था। टीम ने मुस्लिम पक्ष को डरा हुआ बता कर उनके घरों में सुविधाओं की कमी को अपने दौरे में जाँच निष्कर्ष के रूप में पाया।

सपा सांसद एचटी हसन और शफीकुर्रहमान बर्क के लिए कब्जाधारी ‘गरीब’

समाजवादी पार्टी ने भी अपना प्रतिनिधि मंडल मुरादाबाद के सांसद एचटी हसन और शफीकुर्रहमान के नेतृत्व में भेजा। एचटी हसन ने अतिक्रमण अभियान की निंदा करते हुए अवैध कब्जाधारियों को ‘गरीब’ और ‘उजाड़ दिया’ जैसी संज्ञा दी। उनके मुताबिक अतिक्रमण विरोधी अभियान की चपेट में आए लोगों की रोजी-रोटी छिन गई है। इस प्रतिनिधि मंडल के साथ CPI के नेता भी मौजूद थे। उन्होंने भी अतिक्रमण विरोधी अभियान को ‘सरकारी जुल्म’ बताया।

आरोपितों को लेकर इन तमाम नेताओं ने जो-जो कहा, जिनके-जिनके घर गए, वो सब ऊपर लिख दिया गया है। लेकिन क्या पीड़ितों के दर्द को भी समझने की कोशिश हुई है? ऑपइंडिया की टीम इसी को जानने ग्राउंड पर गई, लोगों से बात की। पीड़ितों ने जो बात बताई, वो वामपंथी-कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम की कलई खोलती है।

हिंसा पीड़ित हिन्दुओं के घर कोई नहीं गया

ऑपइंडिया ने इस हिंसा के दौरान पीड़ित हिन्दुओं के परिवारों से मुलाक़ात की। अलग-अलग परिवारों का अलग-अलग नुकसान हुआ। किसी की दुकान को लूटा गया, किसी के ठेले को पलट दिया गया, किसी की बाइक तोड़ दी गई तो किसी की रेहड़ी में आग लगा दी गई थी। उन सभी ने एक स्वर में बताया कि अभी तक उनको किसी भी प्रकार की कोई मदद नहीं मिली है। साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि उनसे मिलने अभी तक कोई नहीं आया। उनमें से कुछ पीड़ितों से हमने बात की।

महेश का ठेला बर्बाद

‘जय माँ वैष्णो चाऊमीन’ नाम से फास्ट फूड का ठेला लगाने वाले महेश का ठेला उपदव्रियों की चपेट में आ गया था। महेश ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया, “घटना के दिन हमारे पिता अशोक कुमार यहाँ पर थे। हमारे ठेले को पलट दिया गया था। सारा सामान बिखर गया था हमारा। हमारे पास उसकी तस्वीरें भी हैं। हम खुद बनवा रहे हैं अपने ठेले को अपने पैसे से। हमारा पूरा परिवार इसी से गुजारा करता है। अभी तक हमसे मिलने या हमारी मदद करने कोई भी नहीं आया।”

पीड़ित दुकानदार अपनी जेब से खर्च कर के ठेले को फिर से बनवा चुके हैं। पेट पालने के लिए वो काम पर फिर से लौट चुके हैं।

फिर से बनवाया गया ठेला

गर्ग स्टोर को लूटा, मालिक जान बचा कर भागा

सामने न आने की शर्त पर कुशल सिनेमा रोड के एक स्थानीय निवासी ने बताया, “वो (दंगाई) गर्ग स्टोर परचून वाले का गल्ला लूट कर ले गए। मेरे ही आगे हुआ ये। एक बंगाली का लड़का उसे लूट रहा था। मालिक जान बचा कर दुकान को खुली छोड़ कर भागा। वो पीछे के मकान में छिप गए थे। उस तरफ का मुख्य गेट बंद हो गया था। वर्ना वो पीछे वहाँ भी आ जाते। इतने के बाद भी गलियों के अंदर भीड़ गई थी। यहाँ अभी तक कोई हाल चाल पूछने वाला भी नहीं आया। मदद देना तो दूर की बात है।”

सच्चाई जानने के लिए हमने गर्ग स्टोर को देखा। हमने पाया कि गर्ग स्टोर बंद था और उसके आगे पुलिस बल तैनात था।

गर्ग स्टोर

गौतम स्टूडियो और रोहिणी क्लिनिक पर गिरी गाज

कुशल सिनेमा रोड पर ही गौतम स्टूडियो और रोहिणी क्लिनिक आस-पास मौजूद हैं। घटना के दिन दोनों मालिकों की बाइकें बाहर खड़ी थीं। गौतम सिनेमा के मलिक की बाइक यामाहा थी जबकि क्लिनिक संचालित करने वाले डॉक्टर बीएल माथुर की स्कूटी थी। ये दोनों वाहन हिंसक भीड़ की चपेट में आ गए। इसमें तोड़फोड़ की गई। गौतम स्टूडियो पर मौजूद व्यक्ति ने बताया कि अभी तक कोई भी मदद किसी से भी नहीं मिली है। उन्होंने आगे बताया कि हिंसा के दौरान दुकान के शटर गिरा लिए थे।

गौतम स्टूडियो और रोहिणी क्लिनिक

उनकी टूटी बाइक बाहर ही खड़ी दिखी। जबकि डॉक्टर माथुर की क्लिनिक बंद मिली और मौके पर उनकी स्कूटी भी नहीं दिखी।

हिंसा की चपेट में आई बाइक

दलित परिवार का बेटा घायल, कार क्षतिग्रस्त

काफी पहले आज़ादपुर में रेहड़ी लगाने वाले दलित परिवार के नरेश कुमार की जमा पूँजी से खरीदी गई कार को दंगाईयों ने क्षतिग्रस्त कर दिया। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया, “हमें अभी तक किसी भी प्रकार की कोई मदद नहीं मिली। हम कार को अपने खर्च से बनवा रहे हैं। ये हमला मुस्लिमों ने किया था। उनसे हमारी पहले कोई भी दुश्मनी नहीं थी। वो कभी इधर से हमला कर रहे थे तो कभी उधर से।”

नरेश के मुताबिक, “मेरा बेटा दंगाइयों की चपेट में आ गया था। उसको बेरहमी से मारा गया। उसके इलाज का भी खर्च हम ही उठा रहे हैं।”

नरेश की क्षतिग्रस्त कार

जला दी पानीपूरी वाले की रेहड़ी

नरेश के घर के सामने एक जली हुई रेहड़ी खड़ी थी। वहाँ पर मौजूद स्थानीय निवासी राकेश साहू ने ऑपइंडिया से बताया, “मैं दंगे का साक्षी हूँ। पहल दूसरी तरफ से हुई थी। यह इसी गली में टिक्की और गोलगप्पे लगाने वाले एक हिन्दू व्यक्ति की रेहड़ी है। हिंसा के दौरान उपद्रवियों ने इस रेहड़ी को पलट कर इसमें आग लगा दी थी। यह रेहड़ी उसने कर्ज ले कर बनवाई थी। वह किराए पर रहता है। कम से कम 40-50 हिन्दू ऐसे हैं, जिनका दंगों में नुकसान हुआ है। हिन्दू पक्ष की तरफ राहत आदि देने अभी तक कोई नहीं आया। सारा सहयोग मुस्लिमों की तरफ जा रहा है। यहाँ तो हालचाल पूछने भी कोई नहीं आया।”

हमारी स्कूटी तोड़ी, हमारे ही लोग पकड़े जा रहे

एक अन्य स्थानीय निवासी मंगल ने बताया, “हिंसा के दिन मेरा भतीजा स्कूटी चला रहा था। न जाने उसको कहाँ से हमलावर मिल गए। उन्होने मारपीट की और हमारी स्कूटी को भी तोड़ डाला है। अभी तक हम लोगों को किसी भी तरह की कोई मदद नहीं दी गई है। सबसे हैरानी की बात ये है कि हमारा ही नुकसान हुआ और हमारे ही लोग पकड़े जा रहे हैं।”

पत्थर भी खाया, स्कूटी भी तोड़ डाला… मदद शून्य

एक अन्य स्थानीय संजय कौशिक ने बताया, “मैं भी शोभा यात्रा में शामिल था। अचानक ही पथराव हुआ और पत्थरों से मुझे भी चोट लगी। बाद में भीड़ ने हमारी स्कूटी को तहस-नहस कर दिया। हमें अभी तक किसी भी प्रकार का कोई सहयोग किसी से भी नहीं मिला है।”

इन सबके अलावा स्थानीय लोगों के मुताबिक हिंसक भीड़ कुशल सिनेमा जाने वाली रोड पर मौजूद एक चौड़ी गली में घुसी थी। उस गली में कई लोगों के वाहनों को नुकसान पहुँचाया गया। रास्ते में मिले लोगों के साथ मारपीट भी की गई। पुलिस भी उप्रदवियों को रोकने में लाचार दिख रही थी। ऑपइंडिया को कुछ ऐसे लोग भी मिले, जिन्होंने हिंसा में अपना नुकसान होना तो स्वीकार किया लेकिन कैमरे पर कुछ भी बोलने से मना कर दिया।

बिना फिल्म देखे ‘द कश्मीर फाइल्स’ पर जहर उगल रही थी ‘मातृभूमि’ की पत्रकार, विवेक अग्निहोत्री ने दिखाया आईना तो डिलीट किया वीडियो

कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और पलायन को दर्शाती फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ को दर्शकों का इतना प्यार मिला कि इसने दुनिया भर में 350 करोड़ रुपए की कमाई कर ली। भारत में भी इसकी नेट कमाई 250 करोड़ रुपए के पार रही। कई थिएटरों में इसने 50 दिन पूरे किए। अब इसे इजरायल में रिलीज किया गया है। लेकिन, मीडिया का एक हिस्सा अब भी इसे बदनाम करने में लगा हुआ है। ताज़ा मामला ‘मातृभूमि’ का है, जिसने हाल ही में विवेक अग्निहोत्री का इंटरव्यू लिया।

विवेक अग्निहोत्री ‘द कश्मीर फाइल्स’ का निर्देशक हैं। वहीं ‘मातृभूमि’ मूल रूप से केरल का एक मलयालम मीडिया संस्थान है, जो अंग्रेजी में भी खबरें देता है। 18 मार्च, 1923 को इस अख़बार की पहली प्रति प्रकाशित हुई थी और फ़िलहाल इसकी 15 लाख प्रतियाँ बिकती हैं। कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन करने वाला ये मीडिया संस्थान अब प्रोपेगंडा फैलाने में किए लग गया है, इसका ताज़ा उदाहरण हम आपको बताते हैं।

विवेक अग्निहोत्री का इंटरव्यू लेते हुए मधु ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ को कला के माध्यम से घृणा फैलाने वाला काम करार दिया। इस पर निर्देशक ने उनसे सवाल दागा कि क्या कश्मीर में हजारों निर्दोष लोगों की हत्या ठीक थी? क्या इस पर चुप्पी जायज है? इस पर मधु कहने लगीं कि ये पहले की बात है और हमें गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ने चाहिए। विवेक अग्निहोत्री ने ‘मातृभूमि’ के पत्रकार के कुतर्क की धज्जियाँ उड़ाते हुए पूछा कि फिर तो हॉलीवुड निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग को होलोकॉस्ट पर ‘Schindler’s List (1993)’ फिल्म नहीं बनानी चाहिए थी?

बता दें कि होलोकॉस्ट, अर्थात जर्मन तानाशाह हिटलर के समय में नाजी फ़ौज के हाथों हुए यहूदियों के नरसंहार पर कई फ़िल्में बन चुकी हैं। मधु ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने का आरोप मढ़ दिया। विवेक अग्निहोत्री ने उन्हें याद दिलाया कि कैसे एक महिला को कश्मीर में आड़ी से बीचोंबीच काट दिया गया था। उन्होंने सलाह दी कि हमारा ध्यान कश्मीरी पंडितों के दर्द पर केंद्रित होना चाहिए, न कि राजनीति या विचारधारा पर आधारित प्रोपेगंडा पर।

और सबसे बड़ी बात तो ये है कि ‘मातृभूमि’ की पत्रकार मधु ‘द कश्मीर फाइल्स’ पर लगातार आरोप लगा रही थीं, लेकिन उन्होंने खुद अब तक ये फिल्म नहीं देखी है। विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि कैसे फिल्म में सत्ता की संपूर्ण विफलता को दिखाया गया है। इसे सिस्टम की विफलता को दिखाया गया है। हालाँकि, बेइज्जती से बचने के लिए ‘मातृभूमि’ ने वीडियो के इस हिस्से को इंटरव्यू से डिलीट कर दिया। चैनल को आईना दिखाया जाना पसंद नहीं आया।

मौलवी सहित अब तक कुल 14 अरेस्ट: 37 परिवारों के 100+ आदिवासियों को बनाया था मुस्लिम… सबकी जमानत भी खारिज

गुजरात के भरूच (Bharuch, Gujarat) जिले के काँकरिया गाँव में 37 हिंदू परिवारों और 100 हिंदू आदिवासियों के सामूहिक धर्मांतरण के मामले में चार और आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। गुजरात पुलिस ने गुरुवार (28 अप्रैल 2022) को भरूच के आमोद तालुका के रहने वाले अब्दुल समद दाऊद पटेल (बेकरीवाला), शब्बीर मोहम्मद पटेल (बेकरीवाला), हसन इब्राहिम पटेल (टिसली) और इस्माइल याकूब पटेल (डेलावाला) को गिरफ्तार किया। इस मामले में अब तक कुल 14 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

भरूच की पुलिस अधीक्षक लीना पाटिल ने बताया, “हमने चार अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया है। हम उनके बयान लेंगे और सबूत जुटाएँगे। इससे पहले इस मामले में 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था।” इस मामले में पुलिस गुजरात ने फ्रीडम फॉर रीलिजन ऐक्ट की धारा 4 और धारा 120 (बी), 153 (बी) (सी), और 506 (2) के तहत मामला दर्ज किया है।

इससे पहले लालच और जबरन धर्मांतरण कराकर इस्लाम कबूल करवाने के मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने 4 अप्रैल 2022 को वरयावा अब्दुल वहाब महमूद नाम के एक इस्लामी मौलवी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। महमूद को उसके धर्मांतरण के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए 5 अन्य आरोपितों शब्बीरभाई, समदभाई, अब्दुल अजीज, यूसुफ और अय्यूब ने मदद की थी। आरोपित महमूद ने गुजरात के भरूच शहर के आमोद पुलिस स्टेशन में पिछले साल 15 नवंबर 2021 में दर्ज एफआईआर के मामले में एंटीसिपेटरी बेल माँगी थी।

बता दें कि 15 नवंबर को भरूच जिले के आमोद तालुका के काकरिया गाँव के अब्दुल अजीज पटेल, युसूफ जीवन पटेल, अयूब बरकत पटेल और इब्राहिम पुनाभाई पटेल समेत अन्य लोगों ने 37 आदिवासी परिवारों के 100 लोगों को बहला-फुसलाकर जबरन धर्म परिवर्तन कराया। उन्हें हिंदू धर्म में वापस आने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी थी। परिवर्तित हिंदू आदिवासियों को इस्लाम कबूल करवाने के बाद उन्हें समुदाय के दूसरों लोगों को भी इस्लाम में परिवर्तित करने का कार्य सौंपा गया था।

क्या है भरुच धर्मान्तरण केस

गौरतलब है कि नवंबर 2021 में ही ऑपइंडिया ने बताया था कि भरुच जिले की आमोद तहसील के अंतर्गत आने वाले कांकरिया गाँव के रहने वाले प्रवीण वसावा की शिकायत कर फेफड़ावाला हाजी अब्दुल्ला, सलाहुद्दीन शेख समेत कई और लोगों के खिलाफ वसावा समुदाय के लोगों के सामूहिक धर्मान्तरण कराने का आरोप लगाया था। प्रवीण के मुताबिक, अनुसूचित जनजाति से आने वाले लोगों को नौकरी, घर, शादी के लिए भावी दुल्हन और पैसे की लालच देकर सैकड़ों लोगों का इस्लामिक धर्मान्तरण कराया गया था। इसके साथ ही प्रवीण ने इस बात का भी खुलासा किया था कि किस तरह से धर्मान्तरण के रैकेट को चलाने के लिए विदेशी फंडिंग होती थी।

ज्ञानवापी मस्जिद में वीडियोग्राफी कराने का कोर्ट का आदेश, मुस्लिमों की कमिटी ने कहा – नहीं करने देंगे, परिणाम भुगतने के लिए तैयार

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद में स्थानीय कोर्ट द्वारा मस्जिद का वीडियोग्राफी कराने के निर्णय का अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद (प्रबंधन समिति) ने विरोध करने का निर्णय लिया है। बता दें कि स्थानीय कोर्ट के इस निर्णय के खिलाफ मस्जिद कमिटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था।

कोर्ट के आदेश पर नियुक्त अधिवक्ता कमिश्नर की देखरेख में यह वीडियोग्राफी 6 और 7 मई को ज्ञानवापी मस्जिद में होनी है। कोर्ट ने इसकी रिपोर्ट 10 मई को देने के लिए कहा है। इस पर अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद के संयुक्त सचिव एसएम यासीन ने कहा, “हम वीडियोग्राफी और सर्वेक्षण के लिए मस्जिद परिसर में किसी के प्रवेश की अनुमति नहीं देंगे।” उन्होंने कहा कि वे परिणाम भुगतने के लिए तैयार हैं।

विवादित संपत्ति पर वक्फ कानून लागू नहीं

वहीं, इस मामले को लेकर मस्जिद कमिटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने गुरुवार (28 अप्रैल 2022) को इस याचिका को खारिज कर दिया। इस दौरान मंदिर पक्ष के वकील ने कहा कि काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद मुद्दे में विवादित संपत्ति पर वक्फ के प्रावधान लागू नहीं होते हैं। इसलिए यह वक्फ की संपत्ति नहीं है।

अधिवक्ता ने कहा, “जब 1995 का वक्फ कानून अस्तित्व में आया तो इस कानून में एक प्रावधान था कि वक्फ की संपत्ति को फिर से पंजीकृत कराया जाए, लेकिन विवादित संपत्ति को इस कानून के तहत पुनः पंजीकृत नहीं कराया गया। इसलिए विवादित संपत्ति वक्फ की संपत्ति नहीं है और इस कानून के प्रावधान यहाँ लागू नहीं होते।”

मंदिर के वकील ने दलील दी कि पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की धारा 4 यहाँ लागू नहीं होती, क्योंकि यहाँ एक प्राचीन मंदिर था। इसका निर्माण 15वीं शताब्दी से पूर्व कराया गया था। भगवान विवादित ढांचे के भीतर विराजमान हैं। यदि किसी भी तरह से मंदिर नष्ट किया भी गया है तो भी इसका धार्मिक चरित्र नहीं बदला है।

बता दें कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम की धारा 4, स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त 1947 को मौजूद स्थिति के मुताबिक, किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र के परिवर्तन के संबंध में कोई वाद दायर करने या कानून कार्यवाही से रोकती है।

मंदिर तोड़कर बनाई गई मस्जिद

इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा गया कि मस्जिद विश्वेश्वर नाथ मंदिर को तोड़कर बनाई गई है। इस दौरान कोर्ट ने अपने आदेश में 1936 में अदालत द्वारा दिए गए आदेश को भी रेखांकित किया है। तर्क दिया गया कि पूर्व में दाखिल वाद केवल तीन मुस्लिमों से संबंधित था। वह सामान्य आदेश नहीं था। उस आदेश के आधार पर कोई दावा नहीं किया जा सकता है।

विवादित स्थल के ‘निरीक्षण और वीडियोग्राफी’ के लिए आयुक्त द्वारा श्रृंगार गौरी और अन्‍य देवी-देवताओं के मौजूद विग्रह के साक्ष्‍यों के संकलन को लेकर मंदिर पक्ष के अधिवक्‍ता ने अदालत में दलील दी। उन्होंने कहा कि सभी सबूतों और तथ्यों को देखें तो ज्ञानवापी मस्जिद चारों तरफ से चारदीवारी से घिरी हुई है, जो कि मस्जिद से काफी पुरानी है। जो चहारदीवारी है, वह मंदिर का हिस्सा है और मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई है।

निचली कोर्ट ने वीडियोग्राफी का दिया था आदेश

वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी परिसर में स्थित माँ श्रृंगार गौरी और अन्य देव विग्रहों की पूजा अर्चना के मामले में मंगलवार (26 अप्रैल, 2022) को सीनियर डिवीजन के सिविल जज रवि कुमार ने फैसला सुनाया था। उन्होंने कहा था कि इस बार ईद के बाद 10 मई से पहले एडवोकेट कमिश्नर से मौके का मुआयना करा वहाँ की वीडियोग्राफी कराई जाएगी। कमिश्नर द्वारा अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपने के बाद इस पर 10 मई को सुनवाई होगी।

रिपोर्ट के मुताबिक, माँ श्रृंगार गौरी और अन्य देव विग्रहों के बारे में स्थितियों का पता लगाने के लिए इसी महीने की 8 अप्रैल को अदालत ने एडवोकेट कमिश्नर को नियुक्त किया था। इसके बाद एडवोकेट कमिश्नर द्वारा कार्रवाई को लेकर 18 अप्रैल को कोर्ट में एक प्रार्थना पत्र दायर किया था। इसमें कहा गया था कि श्रृंगार गोरी बैरिकेडिंग के बाहर है। ऐसे में उसके अंदर मुस्लिमों और सुरक्षाकर्मियों के अलावा कोई और नहीं जा सकता। वीडियोग्राफी के लिए कोर्ट ने आवश्यक होने पर पुलिस बल की सहायता लेने के लिए भी कहा है।

कैसे शुरू हुआ वीडियोग्राफी का मामला

यह मामला 18 अगस्त 2021 का है, जब दिल्ली की रहने वाली राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, सीता शाहू, मंजू व्यास और रेखा पाठक की ओर से कोर्ट में एक याचिका दायर कर श्रृंगार माता के नियमित दर्शन और पूजा-अर्चना करने की इजाजत माँगी थी। इसमें दावा किया गया था कि ऐसा न करने देना हिंदुओं के हितों का उल्लंघन होगा। इसमें विपक्ष के तौर पर अंजुमन इंतजामिया मसाजिद, वाराणसी के कमिश्नर, पुलिस कमिश्नर, जिले के डीएम और राज्य सरकार को चुना गया था।

हिंदू धर्म स्त्री विरोधी… वामपंथियों ने फैलाया ‘मनुस्मृति वाला षड्यंत्र’: बाप-बेटी की कहानी से जानें मनुवाद

किसी धर्म की मूल शक्ति ना उसके देव हैं ना ही उसके धर्मगुरु। किसी धर्म की मूल शक्ति उसके धर्मावलम्बी होते हैं। रोम की सभ्यता, ईरान की मूल सभ्यता, मेक्सिको, मेसोपोटामिया, मिस्र आदि सभी पुरातन सभ्यताओं के लुप्त हो जाने का मूल कारण उनके निवासियों का उस सभ्यता और धर्म में उदासीन हो जाना है। इसका कारण शासन का अत्याचार, जीविका का भय या अपने धर्म के विचारों से स्वतः ही उन्हें अप्रासंगिक जान के विरक्त हो जाना, कुछ भी हो सकता है।

इसका एक कारण यह भी है कि बाद के धर्मों में जहाँ उन धर्मों के नेताओं का अपना साम्राज्य निर्माण या सुरक्षा के उद्देश्य से अपने अनुयायियों को बाँधे रखने का नियम और नीतियाँ थी, प्राचीन धर्म मूलतः दर्शन थे और जीवनयापन के उचित मार्ग की अनुशंसा करते थे। ऐसे में इन धर्मों को ध्वस्त करने के लिए नवानगंतुक धर्मों एवं सम्प्रदायों ने उन्हीं प्राचीन धर्मों के समर्थकों में भय, दमन का अतिरिक्त उदासीनता भरने का भाव उत्पन्न किया।

इस संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि हिंदू सभ्यता या सनातन का जितना ह्रास धर्म के प्रति नैराश्य एवं उदासीनता हिंदुओं के भीतर भरे जाने के कारण हुआ, उतना संभवतः विदेशी आक्रांताओं की तलवार से नहीं हुआ। भारत के जिस भाग में इस्लाम का सर्वप्रथम प्रवेश हुआ, वहाँ हिंदू धर्म और व्यवहार का उस गति से क्षय तब तक नहीं हुआ, जब तक हिंदू ही धर्म के विरुद्ध में राजनैतिक रूप से लामबंद नहीं हो गए।

यह युद्ध लॉर्ड मेकौले ने शिक्षा पद्धति में परिवर्तन ला कर किया और स्वतंत्रता के पश्चात इस अभियान में वामपंथी भी जुड़ गए। इस कार्य के लिए समाज को जाति, भाषा, क्षेत्रवाद आदि को उभार कर निश्चित वर्गों को सनातन सभ्यता के विरुद्ध खड़ा किया गया। इस कार्य में मेरी समझ में एक वर्ग सनातन को साधने के लिए इस कारण बड़ा उपयोगी सिद्ध हो सकता था क्योंकि वह संख्या बल में मोटे तौर पर आधी जनसंख्या बनता था।

पश्चिम के दुराग्रहों और चलन के सामान्य प्रभाव से इतर स्त्रियों को धर्म से विचलित करने का जैसा बौद्धिक स्तर पर संगठित प्रयास वामपंथी विचारकों के द्वारा किया गया, उसमें मुझे एक स्पष्ट षड्यंत्र दिखाई पड़ता है। भारत में सनातन धर्म के वैदिक विचारों की जब नींव पड़ी, उस वक्त पशुवध से कृषि आधारित सभ्यता में उतरते मनुष्य ने पाशविक बल के आगे बौद्धिक शक्ति को स्थान दिया। मानसिक उत्कृष्टता पर आधारित समाज का सबसे बड़ा दर्पण उसमें स्त्रियों की अवस्था है, यदि हम शक्ति प्रधान क्षत्रियों से ऊपर विद्या प्रधान ब्राह्मण वर्ण (कर्म पर आधारित वर्ण) को मानने की नीति को अनदेखा भी कर दें।

पश्चिमी विचारकों ने मनुस्मृति की रचना का समय लगभग 1000 ईसा पूर्व माना है परंतु वेदों एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों में मनुस्मृति के संदर्भों को देख के माना जा सकता है कि इसका काल ऋग्वेद के आस-पास का है। इसमें स्वामी दयानंद के अनुसार कई प्रक्षेप भी आ गए हैं।

निजी स्वार्थ के कारण और एक वैचारिक और दार्शनिक रूप से अविकसित क्षेत्र से आए विदेशी आक्रांताओं के प्रभाव में इसमें कई श्लोक बाद के समय में डाले गए, जो मूल श्लोकों से भावना एवं शैली में स्पष्ट विरोधाभास रखते हैं। ऐसे ही कई श्लोक स्त्री-विरोधी रहे जो उन शक्तियों के लिए हिंदू समाज को लिंग के आधार पर तोड़ने के लिए शस्त्र बने, जिनकी चर्चा हम इस लेख के प्रारम्भ में कर चुके हैं।

सत्ता के प्रभाव में उस हिंसक कबीलायी संस्कृति को उत्कृष्ट बताने का प्रयास होता रहा है, परंतु एक मरुस्थलीय, प्राकृतिक सुविधाओं से वंचित समाज कितना परिष्कृत हो सकता है इसे सामान्य समझ का व्यक्ति भी तार्किक रूप से समझ सकता है। आक्रांताओं के असभ्य व्यवहार के विषय में रामधारी सिंह दिनकर ने बहुत निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ भाव से लिखा है जब वो कहते हैं:

“अनेक धर्मों का स्वागत करते-करते, वे (हिंदू) धार्मिक मामलों में बहुत ही सहिष्णु हो गए थे। लड़ाई और मार-काट के दृश्य तो हिंदुओं ने बहुत देखे थे, उन्हें सपने में भी ख़याल ना था कि दुनिया में एकाध जाति ऐसी भी हो सकती है, जो मूर्ति तोड़ने और मंदिरों को भ्रष्ट करने में ही सुख माने। जब मुस्लिम-आक्रमण के साथ मंदिरों और मूर्तियों पर विपत्ति आई, हिंदुओं का हृदय फट गया।”

ऐसे समय में स्त्रियों की क्रूर आक्रांताओं से सुरक्षा के भाव से कुछ ऐसे प्रक्षेप भी धर्म के नाम पर ग्रंथों में डाले गए, जिसने उस परिष्कृत समाज की स्मृतियाँ भी मिटा दीं जिसमें ऋषिका गार्गी शास्त्रार्थ में विजेता ऋषि याज्ञवल्क्य को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दे देती है। कुछ प्रक्षेप स्वार्थवश भी आए, सम्पत्ति पर स्त्रियों का अधिकार लेने के हेतु परंतु ऐसे श्लोक भाव और शैली दोनो में मूल रचनाओं से इतने भिन्न थे कि यह स्पष्ट हो जाता था कि ये धर्म के मूल में नहीं थे।

परंतु जिन शक्तियों को स्त्री समाज को ही हिंदू धर्म और संस्कृत से विमुख करना था, वह इन्हीं प्रक्षेपों और अर्धसत्यों को ले कर खड़ा हो गया, यह स्थापित करने को कि जिस धर्म की रीढ़ ही स्त्री समाज था, जिस धर्म में सती के बिना शिव का अस्तित्व नहीं था, जिस सभ्यता में श्रीराम एक पत्नीव्रत की मर्यादा थाम के खड़े थे, उसमें स्त्रियों का कोई स्थान ही नहीं है। इतिहास की पुस्तकें ही इतिहास का दर्पण है। इस इतिहास में इतने तथ्य हैं जो इस मिथ्या प्रचार की पोल खोल देते हैं।

ऋग्वेद ना सिर्फ़ हिंदू धर्म का सबसे प्राचीन धर्म ग्रंथ है, मानव इतिहास का प्राचीनतम ग्रंथ है। इसमें ऋषिका लोपामुद्रा और गार्गी जैसी महान दार्शनिक देवियों के अलावा देवाहुति के लिखे श्लोक भी हैं। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि वेद बहुत समय तक लिखे नहीं गए और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इसका ज्ञान मौखिक ही गया। कहने वाले कह सकते हैं कि क्योंकि मनु शासक थे तो उन्होंने भले ही अपनी पुत्री का लेखन अपने प्रभाव का उपयोग करके ऋग्वेद में घुसा दिया, परंतु अन्य स्त्रियों के लिए वेद और संस्कृत अध्ययन वर्जित रखा।

अब प्रश्न यह महत्वपूर्ण है कि उनके बाद के मनुवादियों ने ये श्लोक निकाल के बाहर क्यों नहीं किए? उत्तर स्पष्ट है कि उन्नीसवीं सदी के यूरोप की भाँति महिलाओं के लिए 7000 से 5000 ईसा पूर्व के भारत में स्त्रियों के लिए शिक्षा, दर्शन एवं लेखन के मार्ग बन्द नहीं थे, और उन्हें मिथ्या परिचय के साथ अपने विचार सार्वजनिक पटल पर नहीं रखने पड़ते थे। यह अन्य चर्चा का विषय है, मैं इस लेख में मनु की पुत्री देवाहुति के जीवन का एक ही प्रसंग साझा करना चाहता हूँ जिसके एक-एक भाव, एक-एक शब्द से स्पष्ट हो जाता है कि मनु के समाज में स्त्रियाँ कितनी मुक्त एवं सशक्त थीं।

हिंदू विचार में माना जाता है कि समस्त मानव समाज का उद्भव स्वयंभू मनु से हुआ, जो प्रथम मनुष्य और प्रथम शासक थे। उनके दो पुत्र प्रियव्रत एवं उत्तानपद तथा तीन बेटियाँ- अकुति, देवाहुति एवं प्रसूति थीं। मनु ऋषि कर्दम से मिलते हैं और उन्हें बताते हैं कि उनकी पुत्री शिक्षित एवं विवाह-योग्य है।

मनु कहते हैं – यदा तु भवतः शीलश्रुतरूपवयोगुणान। अश्रुणोत नारदाद एषा तव्ययासीत कृतनिश्चया।।
इन श्लोकों का अर्थ शब्दशः समझें तो उस काल की समाज व्यवस्था और उसमें स्त्रियों की स्थिति परिलक्षित होती है। यहाँ मनु कहते हैं – “जब उसने (मेरी पुत्री देवाहुति ने) ऋषि नारद से आपके उत्तम चरित्र, रूप, आयु एवं गुणों के विषय में सुना है, उसका हृदय आप पर ही निश्चित हो गया है।”

यह एक पिता हैं, जो स्वयं मनु हैं, विश्व के सम्राट हैं, क्षत्रिय हैं और एक ब्राह्मण ऋषि से अपनी पुत्री का विवाह इस कारण से करना चाहते हैं क्योंकि उनकी पुत्री ने अपने विवेक के अनुसार सब गुणों, वय, चरित्र एवं ज्ञान को देख कर उनसे विवाह का प्रण लिया है। इसमें कोई राजनीतिक कारण नहीं है, जिसमें कन्या बिसात पर बिछी कौड़ी हो, कन्या का विवेक है, उसका अधिकार है, निश्चय है और पिता की सहज स्वीकृति है।

इसके बाद के श्लोक में महाराज मनु ऋषि को अपने प्रस्ताव को स्वीकार करने का अनुरोध करते हैं। इसमें कोई वर्ग संघर्ष नहीं है जबकि सम्बन्ध एक राज पुत्री एवं एक निर्धन विद्वान के मध्य प्रस्तावित है। कर्दम ऋषि जो उत्तर देते हैं, उसमें भी उस समय के अनेक सत्य उद्घाटित होते हैं। ऋषि कन्या की ओर से प्रस्ताव पा के, ना तो अचंभित होते हैं ना स्वयं को अपमानित मानते हैं।

वे कहते हैं- ऋषिरुवाच बाढ़मुध्वोढुकामोहमप्रत्ता च तवात्मजा। आवयो: अनुरूपसौ आद्यो वैवाहिको विधि: ।।
ऋषि कहते हैं – “मैं अवश्य ही विवाह को इच्छुक हूँ, और आपकी पुत्री क्योंकि ना तो विवाहित है और ना ही उसने किसी अन्य से विवाह हेतु वचनबद्ध है अतः हमारा विवाह विधिसम्मत रूप से सम्भव है।”

इस कथन में कन्या के चुनाव और कन्या की भावनाओं की महत्ता देखने योग्य है। केवल देवाहुति के पिता ही नहीं उनके सम्भावित पति भी उनके चयन, उनके विचार और उनकी भावनाओं के आधार पर ही चल रहे हैं। यह मनुवादी समाज है, जिसके विषय में हिंदू स्त्रियों को भयभीत किया जाता है। इसके आगे ऋषि देवाहुति के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं। एक और महत्वपूर्ण बात यहाँ ऋषि कर्दम कहते हैं।

वे कहते हैं – अतो भजिष्ये समायेना साध्विम यावत्तेजो बिभृयाद् आत्मनो मे। अतो धर्मान पारमहंस्यमुख्यान, शुक्लप्रोक्तान बहु मान्येविहिमस्रान।।
“मैं इस पवित्र कन्या को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करूँगा परंतु इस वचन के साथ कि संतानोत्पत्ति के पश्चात मैं अपना जीवन ईश्वर की साधना में लगा दूँगा।”

एक संतुलित समग्र सम्बन्ध में अपनी भविष्य की योजनाओं एवं अभिलाषाओं को विवाह से पूर्व पत्नी से साझा करने की यह भावना तो अठारहवीं शताब्दी के पश्चिम में भी नहीं दिखती और आधुनिक समय में भी बहुधा विवाहों के टूटने का कारण एक दूसरे की अभिलाषाओं से अनभिज्ञता और उनके प्रति असम्मान होता है। अब इस सारे प्रकरण में देवाहुति के अतिरिक्त एक और स्त्री है, देवी शतरूपा, समस्त विश्व की साम्राज्ञी, मनु की पत्नी एवं देवाहुति की माता। क्या मनु उसे कहते हैं कि तुम अंदर जा के रसोई देखो?

मनु देखते हैं- सोऽनु ज्ञात्वा व्यवसितं महिष्या दुहितुः स्फुटम। तस्मै गुणगणाढ्याय ददौ तुल्यां प्रहर्षित: ।।
“यह देख कर कि इस सम्बंध में महारानी शतरूपा एवं पुत्री की स्पष्ट अनुमति है, महाराज मनु प्रसन्न हो अपनी पुत्री उसे सौंप देते हैं जो गुणों से सम्पन्न है एवं गुणों में उनकी पुत्री के समान (तुल्यां) है।”

समस्त विश्व के सम्राट, मनुवाद के प्रतिपादक, महाराज मनु, पुत्री एवं पत्नी की अनुमति पा कर ही कन्यादान के लिए आगे बढ़ते हैं। ऐसे सामंजस्य से ही ऐसे सुंदर परिवार बनते हैं, जो आगे ऐसी सभ्यता का निर्माण करते हैं जो सनातन होती है।

इस एक प्रसंग से और देवाहुति एवं मनु के चरित्र के अध्ययन से कई प्रकार के मिथ्याप्रचार की कलई खुल जाती है। साथ ही इस सारे प्रसंग में एक पिता, एक पति, एक पुत्री – तीनों के लिए इतने संदेश हैं जो जीवन और जीवन में स्त्री का उचित स्थान निश्चित करने के लिए पर्याप्त है। एक पिता जो अपनी पुत्री को इतना शिक्षित करता है, और इस योग्य बनाता है कि उसकी पुत्री विवेकपूर्ण निर्णय स्वतंत्र मन से ले सके, वह मनु किस प्रकार स्त्री विरोधी हो सकते हैं यह समझना आवश्यक है।

हिंदू धर्म को स्त्री विरोधी बनाने का का सारा समीकरण वामपंथी वर्ग संघर्ष और उस पर आधारित राजनीति पर आधारित है, जिसका एकमात्र ध्येय स्त्रियों को एक वर्ग के रूप में उस धर्म के प्रति उदासीनता और वितृष्णा से भर देना है, जो इस भारतवर्ष की सांस्कृतिक रीढ़ है। यह सारी रणनीति इस विश्वास पर आधारित है कि शताब्दियों की सांस्कृतिक इतिहास की शिक्षा की टूटी धारा के इस ओर अब सत्य तो सरस्वती बन के भूमि में समाहित हो चुका होगा। इस से लड़ने के लिए हमें उस सरस्वती की धारा को पुनर्जीवित करना होगा जो भविष्य और अतीत के मध्य का पवित्र संगम बना सके।

संदर्भ: भागवत पुराण, तृतीय खंड | संस्कृति के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर

पटियाला में काली माता मंदिर पर हमले के विरोध में हिंदू संगठनों का बंद: खालिस्तानियों पर कार्रवाई की माँग, इंटरनेट-मैसेजिंग सब ठप्प

पंजाब के पटियाला (Patiala, Punjab) में शुक्रवार (29 अप्रैल 2022) को खालिस्तान विरोधी मार्च के बाद हुई हिंसा के बाद राज्य सरकार अलर्ट है। काली मंदिर में तोड़फोड़ से गुस्साए हिंदू संगठनों ने शनिवार (30 अप्रैल 2022) को बंद बुलाया है। इसके बाद प्रशासन ने शाम तक मोबाइल इंटरनेट सेवाओं पर अस्थायी रूप से प्रतिबंध लगा दिया है। वहीं, शहर हाई अलर्ट पर है।

पंजाब सरकार के गृहमंत्रालय ने अफवाहों पर रोक लागने और शहर में कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए इंटरनेट बंद करने का निर्णय लिया है। इस संबंध में जिलाधिकारी ने एक नोटिफिकेशन जारी किया है और उसे ट्विटर पर साझा किया है।

वहीं, शुक्रवार को मंदिर में हुए हमले का एक वीडियो सामने आया है। इस वीडियो में स्पष्ट दिख रहा है कि कुछ अराजक तत्व मंदिर में घुसकर तोड़फोड़ करने की कोशिश कर रहे हैं। इनके हाथों में तलवारें और डंडे हैं। इस दौरान वहाँ मौजूद पुलिसकर्मी इन उपद्रवियों को रोकने का प्रयास करते दिख रहे हैं।

इस हिंसा को लेकर शुक्रवार को पंजाब पुलिस ने शिवसेना (बाल ठाकरे) के नेता हरीश सिंगला को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। वहीं, पार्टी ने भी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। ऐसे में कई मीडिया रिपोर्ट्स में जा रहा है कि हिंदू संगठन सिंगला से खफा हैं और बंद उनके खिलाफ बुलाया गया है। हालाँकि, हिंदू संगठनों का स्पष्ट कहना है कि वे सिंगला के खिलाफ नहीं हैं, वे खालिस्तान समर्थकों के खिलाफ हैं और इसीलिए बंद बुलाया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि सिंगला को विरोध प्रदर्शन करना ही तो अन्य तरीके से किया जा सकता था। उन्होंने गलती की है, उसकी सजा उन्हें मिल रही है। लेकिन, खालिस्तान समर्थकों को काली माता मंदिर पर हमला नहीं करना चाहिए था। यह बंद उन्हीं लोगों पर कार्रवाई की माँग को लेकर बुलाई गई है।

ऑपइंडिया से बातचीत में पटियाला के काली माता मंदिर के महंत रवि कुमार मुनि ने बताया, “हरीश सिंगला हमारे शहर के लोग हैं, हमारे अपने लोग हैं। लेकिन, अगर किसी एक व्यक्ति के काम को लेकर पूरी कम्युनिटी पर प्रोब्लम आएगी तो इसमें क्या करना चाहिए? हरीश सिंगला दोषी है, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन जिन लोगों ने मंदिर पर अटैक किया वे भी दोषी हैं। मंदिर ने तो किसी को कुछ नहीं कहा था। मंदिर पर अटैक क्यों किया गया? पंजाब में आतंकवाद के दौरान भी मंदिर पर कभी अटैक नहीं हुआ।”

हिंदू रक्षा समिति के अध्यक्ष राजेश केहर ने ऑपइंडिया को बताया, “ये बंद हरीश सिंगला के खिलाफ नहीं, बल्कि खालिस्तान समर्थकों द्वारा मंदिर पर किए हमले के कारण बंद किया गया है। पटियाला के सभी हिंदू संगठनों ने मिलकर ये निर्णय लिया है।” केहर ने कहा कि रोष मार्च शिवसेना (बाल ठाकरे) ने आर्य समाज से निकाला और हमला माल रोड पर काली माता मंदिर पर हुआ। यह सोची समझी साजिश थी। उन्होंने आरोप लगाया कि सारे हमलावरों को बाहर से बुलाया गया था। इनमें 10 प्रतिशत लोग भी पटियाला से नहीं थे।

इस हमले को लेकर राजेश केहर ने थाने में रिपोर्ट भी दर्ज कराई है। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने कहा कि शुक्रवार की दोपहर करीब 12 बजे 40-50 हमलावरों का एक समूह मंदिर के बाहर खालिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने लगा। वे मंदिर पर पथराव कर रहे थे। उन्होंने कहा, “रात के करीब 12 बजे जब मैं अपने कार्यालय में था, मैंने खालिस्तान जिंदाबाद के नारे सुने। मैं बाहर भागा, जहाँ मैंने देखा कि कुछ निहंग सिख दूसरों के साथ पथराव कर रहे थे और मंदिर भवन और लंगर भवन पर हमला कर रहे थे। उनके पास डंडे और अन्य हथियार थे। वे हिंदू विरोधी नारे लगा रहे थे।”

दर्ज कराई गई शिकायत में उन्होंने आगे कहा, “मैंने मंदिर के अधिकारियों और सुरक्षा को सतर्क किया और तुरंत फाटक बंद करवा दिया। कुछ ही मिनटों में हमलावरों ने मंदिर की इमारत पर हमला कर दिया, जिससे कुछ नुकसान हुआ। उन्होंने मंदिर के गेट के बाहर स्थित मंदिर की दुकानों पर भी हमला किया। उन्होंने 9 से 12 नंबर की दुकानों को क्षतिग्रस्त कर दिया और दुकानों से करीब 25-30 हजार रुपये की चोरी कर ली। पुलिस भी मौके पर मौजूद थी और हमलावरों को रोकने की कोशिश कर रही थी।”

बता दें कि सिख फॉर जस्टिस के प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नू ने कुछ दिन पहले शुक्रवार को खालिस्तान का स्थापना दिवस मनाने की घोषणा की थी। इसके जवाब में शिवसेना (बाल ठाकरे) के नेता हरीश सिंगला ने शुक्रवार (29 अप्रैल) को खालिस्तान विरोध रोष निकाली थी। इस दौरान उन विरोधी गुट के साथ उनकी झड़प हो गई। दोनों तरफ से पथराव भी हुए। वहीं अराजक तत्वों ने काली माता मंदिर पर हमला कर दिया। इस दौरान कई लोग घायल भी हुए।

AAP की महिला नेता को 7 साल जेल: पेट्रोल बम से करवाया था दंगा… 15 पुलिस वाले घायल, कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ बदलने आई थी राजनीति

हरियाणा के गुरुग्राम में शहरी आवास विकास प्राधिकरण (HUDA) के दस्ते पर पथराव करने के मामले में स्थानीय पार्षद निशा सिंह समेत 10 महिलाओं को अदालत ने 7 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। इस घटना में शामिल अन्य 7 दोषियों को 10 साल की सजा सुनाई गई है। दोषियों को ऊपर 10 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। एडिशनल सेशन जज मोना सिंह की अदालत ने गुरुवार (28 अप्रैल 2022) को सजा पर फैसला सुनाया।

पुलिस रेकॉर्ड में कहा गया है कि 15 मई 2015 को HUDA के JE राजपाल सीनियर अधिकारियों के साथ सेक्टर-47 झिम्मर बस्ती में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई कर रहे थे। आरोप है कि इसी दौरान एडवोकेट खजान सिंह, प्रदीप जैलदार और नगर निगम की तत्कालीन महिला पार्षद निशा सिंह ने भीड़ को भड़काया। इसके बाद भीड़ ने अधिकारियों और टीम पर हमला कर दिया। भीड़ ने पेट्रोल बम और एलपीजी सिलेंडर भी पुलिस टीमों पर फेंके थे। इस घटना में ड्यूटी मजिस्ट्रेट और 15 पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। इसके बाद सदर थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी।

घटना के बाद निशा सिंह सहित सभी 19 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था और उन पर दंगा करने और हत्या का प्रयास करने का आरोप लगाया गया था। हालाँकि, सबूत के अभाव में हत्या के प्रयास के मामले को हटा दिया गया था। इसके बाद वे सब जमानत पर बाहर आ गए थे। सजा सुनाए जाने के बाद सभी 17 लोगों को भोंडसी जेल भेज दिया गया है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जज ने कुल 19 लोगों को IPC की धारा 148, 149, 186, 325, 332, 333, 353, 436, 427, 435 के तहत दोषी करार दिया। इनमें से रमेश व रतन लाल नाम के दो लोगों की ट्रायल के दौरान ही मौत हो चुकी है। वहीं, पूर्व पार्षद निशा सिंह को IPC की धारा 114 के तहत भी दोषी करार दिया गया।

इसके अलावा, बुधराम, अशोक, सोनू, चांदराम, तेजपाल, संदीप उर्फ सतेंद्र और अनिल कुमार को एक्सप्लोजिव एक्ट के तहत भी दोषी करार देते हुए 10 साल की सश्रम कारावास और 20 हजार रुपए का लगाया गया है। जुर्माना नहीं भरने पर 3 साल की अतिरिक्त कैद का में रहना होगा।

निशा सिंह ने साल 2011 में गुरुग्राम के वॉर्ड नंबर 30 से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी। इसके बाद वह आम आदमी पार्टी में शामिल हो गई थीं। वह साल 2016 तक पार्षद रहीं। निशा सिंह मुंबई विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग करने के बाद लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से फाइनेंस में एमबीए किया है। कोर्स के बाद वे गूगल कंपनी को ज्वॉइन किया था। इसके पहले उन्होंने सीमेंस में भी काम किया था। हालाँकि, बाद में गूगल छोड़कर उन्होंने राजनीति में कदम रखा था।

₹34 करोड़ की लागत से बन कर तैयार हुआ काशी का ‘नमो घाट’: ओपन थिएटर, लाइब्रेरी, बनारसी खाना… सब मिलेगा, बनेगा बड़ा पर्यटन स्थल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में अंतरराष्ट्रीय स्तर का पर्यटन स्थल बनकर तैयार हो गया है। भारतीय संस्कृति और आधुनिकता को संजोए काशी के घाटों में एक और घाट नमो घाट (Namo Ghat) का नाम जुड़ गया है। सोशल मीडिया पर इसको लेकर पहले भी कई यूजर्स तस्वीरें और वीडियो शेयर कर चुके हैं। घाट की बनावट नमस्ते करता हुआ स्कल्पचर पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन रहा है। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर इसे लोग हैशटैग नमो घाट लिखकर शेयर कर रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगभग 34 करोड़ की लागत से बनी खिड़किया घाट का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्दी ही कर सकते है। इस घाट से जलमार्ग और वायु मार्ग को भी जोड़ा जाएगा, जिससे पर्यटक अन्य शहरों तक भी जा सकें।

वाराणसी स्मार्ट सिटी के मुख्य महाप्रबंधक डॉ. डी. वासुदेवन ने बताया, “करीब 21000 स्क्वायर मीटर में बन रहे इस घाट का पहला फेज बनकर तैयार हो गया है। इसके निर्माण में मेक इन इंडिया का विशेष ध्यान दिया गया है। इस घाट पर वोकल फॉर लोकल भी दिखेगा। यहाँ पर्यटक सुबह-ए-बनारस का नजारा देख और गंगा आरती में शामिल हो सकेंगे। वाटर एडवेंचर स्पोर्ट्स का मजा ले सकेंगे। इसके अलावा दिव्यांगजन और बुजुर्गों के लिए माँ गंगा के चरणों तक रैंप बना है।” पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद खिड़किया घाट यानी नमो घाट का अवलोकन किया था।

इसके अलावा यहाँ पर ओपेन थियेटर भी है। लाइब्रेरी, बनारसी खान-पान के लिए फूड कोर्ट है, यहाँ पर मल्टीपर्पज प्लेटफार्म भी होगा, जहाँ हेलीकाप्टर उतरने के साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन हो सकता है। यहाँ पर पर्यटक काशी विश्वनाथ धाम के दर्शन के लिए आसानी से टिकट भी ले सकते हैं। खिड़किया घाट से क्रूज के जरिए पास के अन्य शहरों का भ्रमण करना भी आसान है। इंजीनियर इंडिया लिमिटेड के मैनेजर दुर्गेश ने बताया कि गाबियन (GABION) और रेटेशन वाल से घाट तैयार किया गया है, जिससे बाढ़ में घाट सुरक्षित रहेगा। घाट तक गाड़ियाँ भी जा सकती हैं और यहाँ पर वाहनों की पार्किंग की व्यवस्था भी है।

बता दें कि घाट पर सूर्य और गंगा को प्रणाम करतीं तीन जोड़ी हाथ की आकृतियों के कारण इसे ‘नमो घाट’ का नाम दिया गया है। हाल ही में एक अधिकारी ने बताया था कि 34 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हुआ यह घाट वाराणसी का 85वाँ घाट होगा।