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‘कबॉट्स केवल गॉड से बात करते हैं’: कौन हैं ‘बोस्टन ब्राह्मण’, अमेरिका को आबाद करने में इनका कितना योगदान, कोल्डप्ले स्कैंडल के बाद क्यों हो रही चर्चा?

हाल ही में एक कोल्डप्ले कंसर्ट ने दुनिया भर में हलचल मचा दी, जब एक किस कैम ने एस्ट्रोनॉमर कंपनी की HR एक्जीक्यूटिव क्रिस्टी कबॉट को उनके CEO एंडी बायरन के साथ गले लगाते हुए कैद कर लिया। दोनों शादीशुदा हैं, लेकिन कंसर्ट में वे एक-दूसरे के करीब नजर आए। क्रिस्टी ने कैमरे से मुँह छिपाने की कोशिश की, जबकि एंडी ने चेहरा फेर लिया।

इस वीडियो ने सोशल मीडिया पर तूफान ला दिया और कोल्डप्ले के सिंगर क्रिस मार्टिन ने मजाक में कहा कि या तो ये अफेयर है या वे बहुत शर्मीले हैं। क्रिस्टी अब कंपनी से छुट्टी पर हैं और ये स्कैंडल अब सिर्फ एक ऑफिस रोमांस से ज्यादा बन गया है।

इस घटना ने क्रिस्टी के पति एंड्र्यू कबॉट की फैमिली को फिर से दुनिया की नजरों में ला दिया। एंड्र्यू प्राइवेटियर रम कंपनी के मालिक हैं और कबॉट फैमिली बोस्टन की सबसे पुरानी और अमीर फैमिलीज में से एक है। बोस्टन की ये फैमिलीज ‘बोस्टन ब्राह्मण’ के नाम से जानी जाती है। ये फैमिली सदियों से न्यू इंग्लैंड की सत्ता और संस्कृति पर छाई हुई है।

इस स्कैंडल ने न सिर्फ व्यक्तिगत जीवन पर सवाल उठाए, बल्कि अमेरिका की इस पुरानी एलीट क्लास की परतें भी खोल दीं, जहाँ धन, परंपरा और गोपनीयता का बोलबाला है। ऐसे में अब हिंदुस्तान के लोग भी जानना चाहते हैं कि ये बोस्टन ब्राह्मण कौन हैं, और कबॉट फैमिली की ये पहचान कैसे बनी।

अमेरिका में बसे सबसे पुराने यूरोपीय परिवारों में से एक

कबॉट फैमिली बोस्टन की उन चुनिंदा फैमिलीज में से एक है, जिन्हें ‘फर्स्ट फैमिलीज ऑफ बोस्टन’ कहा जाता है। ये फैमिली 10 पीढ़ियों से न्यू इंग्लैंड में बसी हुई है और इनकी जड़ें 17वीं सदी के यूरोपीय आप्रवासियों से जुड़ी हैं। फैमिली की शुरुआत जॉन कबॉट से हुई, जो 1680 में जर्सी द्वीप (ब्रिटिश क्राउन डिपेंडेंसी) से सलेम, मैसाचुसेट्स आए थे।

कबॉट फैमिली के जॉन और उनके बेटे जोसेफ कबॉट ने जहाजरानी का बिजनेस शुरू किया, जो अफीम, रम और गुलामों की तस्करी तक फैला। 18वीं सदी में ये बोस्टन के सबसे अमीर मर्चेंट बन गए। उनके बेटों जोसेफ जूनियर, जॉर्ज और सैमुअल ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी छोड़कर शिपिंग में हाथ आजमाया और फैमिली की दौलत को आसमान छू लिया।

कबॉट फैमिली की अमीरी का राज कई बिजनेस में छिपा है। शुरुआत में शिपिंग से, फिर 19वीं सदी में कार्बन ब्लैक (सूट) का व्यापार, जो कार के टायरों में इस्तेमाल होता है। गॉडफ्रे लॉवेल कबॉट ने 1861 में कबॉट कॉर्पोरेशन की नींव रखी, जो आज दुनिया की सबसे बड़ी कार्बन ब्लैक प्रोड्यूसर है। इसके अलावा एंड्र्यू कबॉट (क्रिस्टी कबॉट के पति) प्राइवेटियर रम के छठे जनरेशन के मालिक हैं, जो फैमिली का पुराना ब्रैंड है।

1972 में न्यू यॉर्क टाइम्स ने फैमिली की दौलत को 200 मिलियन डॉलर आँका था, जो आज के हिसाब से करीब 15.4 बिलियन डॉलर (करीब 1.3 लाख करोड़ रुपये) है। फैमिली ने हार्वर्ड, MIT, नॉर्विच यूनिवर्सिटी और पर्किन्स स्कूल फॉर ब्लाइंड जैसी संस्थाओं को दान दिए। राजनीति में भी इनका दबदबा रहा। इस परिवार के जॉर्ज कबॉट सीनेटर थे, हेनरी कबॉट लॉज राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और जॉन मूर्स कबॉट कई देशों में अमेरिकी राजदूत।

फैमिली के वारिस फ्रांसिस कबॉट ने मजाक में कहा कि वे दो चीजों में इंटरेस्टेड हैं- अमीर औरतों से शादी और ग्रुप सिंगिंग। आज क्रिस्टी और एंड्र्यू का 2.2 मिलियन डॉलर का घर न्यू हैम्पशायर में है, लेकिन फैमिली की असली ताकत उनकी पुरानी दौलत और कनेक्शंस में है।

बोस्टन ब्राह्मण होने का मतलब है एलीट

बोस्टन ब्राह्मण अमेरिका की वो पुरानी एलीट क्लास है, जो 18वीं से 20वीं सदी तक न्यू इंग्लैंड की संस्कृति, राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज पर छाई रही। ये ज्यादातर व्हाइट एंग्लो-सैक्सन प्रोटेस्टेंट (WASP) फैमिलीज हैं, जो पुरिटन कॉलोनिस्ट्स के वंशज हैं। नाम ‘बोस्टन ब्राह्मण’ 1861 में ओलिवर वेंडेल होम्स सीनियर ने अपनी किताब ‘एल्सी वेनर’ में गढ़ा। उन्होंने बोस्टन की ऊपरी क्लास को ‘ब्राह्मण कास्ट ऑफ न्यू इंग्लैंड’ कहा, क्योंकि वे खुद को एक चमकती हुई शहर बनाने के लिए चुने हुए मानते थे- कड़ी मेहनत, किफायत, संस्कृति और शिक्षा पर जोर। ये फैमिलीज जैसे एपल्टन, बेकन, कबॉट, कूलिज, फोर्ब्स, लॉज, लॉवेल, पर्किन्स, रसेल, साल्टनस्टॉल, शॉ और विंथ्रोप- पुरानी दौलत और विरासत पर टिकी हैं।

इनकी पहचान कैसे बनी?

17वीं सदी में इंग्लैंड से आए पुरिटन्स ने बोस्टन को बसाया। 18वीं सदी में शिपिंग, मर्चेंट ट्रेड और बैंकिंग से अमीर बने। 19वीं सदी तक वे बोस्टन की अर्थव्यवस्था पर काबिज थे- चाइना ट्रेड, रेलरोड, टेक्सटाइल मिल्स। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी उनके कंट्रोल में थी, जहाँ वे पढ़ते और पढ़ाते थे। वे संस्कृति के संरक्षक बने, जिसमें उन्होंने बोस्टन सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा, म्यूजियम ऑफ फाइन आर्ट्स, बोस्टन एथेनियम जैसी संस्थाएँ बनाईं। उन्होंने राजनीति में मौजूदा समय की पार्टी रिपब्लिक्स को भी सहयोग दिया। हालाँकि इन परिवारों ने प्रवासियों के साथ बुरा किया, साथ ही ईसाईयों में भी वो आयरिश कैथोलिकों से दूरी बरतते रहे।

भारत के ब्राह्मणों से बिल्कुल अलग हैं ये एलीट ब्राह्मण

ये भारत के ब्राह्मणों से बिलकुल अलग हैं। भारत में ब्राह्मण धार्मिक कास्ट है – जो वेदों, पूजा और ज्ञान के रखवाले हैं, जन्म से तय। बोस्टन ब्राह्मण कोई धार्मिक ग्रुप नहीं, बल्कि सेकुलर एलीट क्लास है, जो दौलत, शिक्षा और विरासत पर आधारित। वे यूनिटेरियन या एपिस्कोपल चर्च फॉलो करते हैं, लेकिन रिलिजन से ज्यादा कल्चर पर जोर।

नाम में भारत की छाया इसलिए है क्योंकि होम्स ने हिंदू ब्राह्मणों की तरह उन्हें हाईएस्ट इंटेलेक्चुअल क्लास माना। भारत के ब्राह्मण रिलिजियस ड्यूटीज निभाते हैं, जबकि बोस्टन वाले बिजनेस और सोसाइटी लीड करते हैं। अंतर ये कि बोस्टन ब्राह्मणों में मैरिज से एंट्री हो सकती है, जबकि भारत में कास्ट जन्म से फिक्स।

धार्मिक आजादी के लिए अमेरिका आए, और सबको दी भी

बोस्टन ब्राह्मणों की कहानी इंग्लैंड और कुछ हॉलैंड से शुरू होती है। 17वीं सदी में पुरिटन्स- इंग्लिश प्रोटेस्टेंट्स जो चर्च ऑफ इंग्लैंड से असहमत थे- धार्मिक आजादी के लिए अमेरिका आए। 1620 में मेफ्लावर जहाज से प्लिमथ कॉलोनी बसाई। 1630 में जॉन विंथ्रोप ने बोस्टन की नींव रखी, जो ‘शाइनिंग सिटी ऑन ए हिल’ बनना था। कुछ डच भी आए, लेकिन मेनली इंग्लिश गेंट्री और मजिस्ट्रेट्स के वंशज। वे मैसाचुसेट्स में सेटल हुए, फार्मिंग से ट्रेड में शिफ्ट हुए। 18वीं सदी में ब्रिटिश ट्रूप्स से लड़कर इंडिपेंडेंस जीती। 19वीं सदी में इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन से अमीर बने, जैसे फ्रांसिस कबॉट लॉवेल ने टेक्सटाइल मिल्स शुरू कीं।

इन्हीं बोस्टन ब्राह्मणों का बसाया हुआ है आज का अमेरिका

असल में आज का अमेरिका काफी हद तक इन्हीं बोस्टन ब्राह्मणों का बसाया हुआ है। वे फाउंडिंग फादर्स के डिसेंडेंट्स हैं, जैसे जॉन एडम्स, जॉन क्विंसी एडम्स। उन्होंने बोस्टन लैटिन स्कूल (अमेरिका का पहला हाईस्कूल), हार्वर्ड, एंडोवर, फिलिप्स एक्सेटर जैसे एलीट स्कूल्स बनाए।

अर्थव्यवस्था में रेलरोड, यूनियन पैसिफिक, जनरल इलेक्ट्रिक जैसी कंपनियाँ फंड कीं। कल्चर में लिटरेचर (हॉथोर्न, एमर्सन), म्यूजियम्स, ऑर्केस्ट्रा दिए। राजनीति में जॉन केरी, हेनरी कबॉट लॉज जैसे लीडर्स दिए। वे अमेरिका को ‘अरिस्टोक्रेसी ऑफ वेल्थ’ बनाना चाहते थे, लेकिन डेमोक्रेसी से टकराते रहे।

ये एलीट क्लास है, जहाँ दौलत से ज्यादा रेस्ट्रेंट और ट्रेडिशन मायने रखते हैं। उनका बातचीत का अंदाज रिजर्व्ड और ब्रिटिश-टिंग्ड एक्सेंट वाला है, जैसे ‘कॉड’ को ‘काह्ड’ बोलना। उनका उच्चारण अंग्रेजों के अधिक करीब है और इसे उन्होंने बरकरार रखा।
पहनावे के मामले में भी बोस्टन ब्राह्मण सबसे अलग दिखते हैं। वो चमकदार कपड़े नहीं पहनते, लेकिन अच्छे सूट पहनना अपनी परंपरा का हिस्सा समझते हैं।

डाइट एक ट्रेडिशनल यानी पक्की। हर संडे रोस्ट बीफ और मंडे कोल्ड लेफ्टओवर्स, जिससे ‘कोल्ड रोस्ट बोस्टन’ फ्रेज आया, जिसे अपने यहाँ बासी खाना कहते हैं। शादी विवाह के मामले में भी काफी कड़े नियम हैं। बोस्टन फैमिली की शादियाँ अक्सर बोस्टन फैमिली में ही होती हैं, या फिर काफी अमीर घरानों में।

बोस्टन ब्राह्मण आर्ट्स, चैरिटी, कम्युनिटी लीडरशिप में सक्रिय भूमिका निभाते हैं, लेकिन किसी भी तरह के विवाद से खुद को दूर रखते हैं।

एलीटिज्म का उड़ता रहा है मजाक

कविता ‘कबॉट्स टॉक ओनली टू गॉड’ इस क्लास की हाईब्रो एटीट्यूड को कैद करती है-

“एंड दिस इज गुड ओल्ड बोस्टन

द होम ऑफ द बीन एंड द कॉड

वेयर द लॉवेल्स टॉक ओनली टू कबॉट्स

एंड द कबॉट्स टॉक ओनली टू गॉड।

इसे जॉन कोलिंस बॉसिडी ने लिखा था, जो बोस्टन की एलीट की हाई सोसाइटी को मजाक उड़ाती है। कबॉट फैमिली अपर क्लास इसलिए है क्योंकि वे पुरानी दौलत (ओल्ड मनी) के मालिक हैं, नई अमीरी (न्यू मनी) से अलग। वे अमीर हैं क्योंकि सदियों से ट्रेड, इंडस्ट्री और इन्वेस्टमेंट्स से- शिपिंग से कार्बन ब्लैक तक। लेकिन उनकी अमीरी दिखावे में नहीं, बल्कि पावर और इंस्टीट्यूशंस में है। केनेडी फैमिली जैसी आयरिश-कैथोलिक डायनेस्टी को वे बाद की बात मानते हैं और भाव नहीं देते।

कबॉट फैमिली के बारे में सबकुछ जानें तो पता चलता कि वे बोस्टन ब्राह्मणों का परफेक्ट उदाहरण हैं। जॉन कबॉट से शुरू होकर उन्होंने स्लेव और ओपियम ट्रेड से दौलत बनाई, लेकिन बाद में चैरिटी से इमेज साफ की। पॉल कोडमैन कबॉट ने अमेरिका का पहला म्यूचुअल फंड बनाया,और फैमिली हार्वर्ड की एंडाउमेंट को मैनेज करती। वे अपर क्लास हैं क्योंकि सोसाइटी में उनका स्टेटस जन्म से मिलता है, न कि सिर्फ पैसों से।

आज भी वे प्राइवेट क्लब्स, एलीट स्कूल्स और बिजनेस में छाए हैं। लेकिन कोल्ड प्ले जैसे स्कैंडल्स उनकी सीक्रेसी को चैलेंज करते हैं। बोस्टन ब्राह्मण अमेरिका की अरिस्टोक्रेसी हैं, जो हिंदुस्तान के लोगों को बताते हैं कि पुरानी दौलत कैसे दुनिया चलाती है।

भारतीय सेना में AI टास्क फोर्स, ऑपरेशन सिंदूर के बाद तैयार हुआ रोडमैप: 2027 तक बन जाएगा सिस्टम, जानिए कैसे मिनटों में दुश्मन का काम होगा तमाम

भारतीय सेना जल्द ही अपने कामकाज में AI का इस्तेमाल करेगी। इसके जरिए दुश्मन की पहचान की जाएगी और उसको निशाना बनाया जाएगा। AI और बिग डाटा को लेकर यह तैयारी सेना युद्धस्तर पर कर रही है। सेना AI को लेकर अपनी खुद की लैब तक स्थापित कर रही है। सेना इस पर पहले से काम कर रही थी लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद और तेजी आ गई है। सेना ने इस काम के लिए एक जनरल स्तर के अधिकारी को जिम्मेदारी दी है।

बन गया रोडमैप

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, सेना न एक बड़ा रोडमैप बनाया है। इसके तहत सेना AI, मशीन लर्निंग और बिग डाटा जैसी तकनीकों को अपनी लड़ाई में शामिल करना चाहती है। इनका इस्तेमाल ड्रोन और हवाई हमलों आदि में किया जाएगा।

AI सॉफ्टवेयर और तकनीक का इस्तेमाल करके राडार, सेंसर और सैटेलाइट का डाटा एनालाइज करने के लिए किया जाएगा। इससे दुश्मन के विषय में जल्द पता लग सकेगा। इसके अलावा उन रिपोर्ट्स और गड़बड़ी को पहचानने में भी सेना का AI कारगर होगा, जिसने कोई खतरा पैदा होता है।

सेना का AI इस सब का इस्तेमाल करके फैसले लेने में सक्षम होगा और यह जानकारी भी उन जवानों या विमानों, जहाजों तक भी पहुँचाई जाएगी, इससे उन्हें दुश्मन की लोकेशन और उसकी क्षमताओं के विषय में भी पता चल सकेगा।

काउंटर इंटेलीजेंस में भी होगा इस्तेमाल

AI का इस्तेमाल सेना काउंटर इंटेलीजेंस में भी करेगी। इसके अलावा ताजा सूचनाओं का विश्लेषण करने, सोशल मीडिया पर नजर रखने और सप्लाई चेन तक की समस्या हल करने के लिए किया जाएगा। AI का इस्तेमाल सेना हथियारों की तैनाती में भी कर सकती है।

AI का इस्तेमाल करके तोपें या टैंक उन जगह लगाए जा सकते हैं जहाँ दुश्मन की एक्टिविटी पहचानी गई हो। इसके अलावा सेना AI तकनीक के जरिए अपने हथियारों का मेंटेनेंस करने तक में कर सकती है। इससे उसकी युद्ध को लेकर तैयारी भी तेज रहेगी।

सेना AI के जरिए उन जगहों तक की जानकारी निकालने के प्रयास में है, जहाँ GPS भी काम नहीं करता। सेना यह मिशन जल्द पूरा करने के मोड में है और इसके लिए उसने तैयारी भी तेज रखी हुई है। सेना अपनी AI तकनीक का एयरफोर्स और नेवी के साथ भी तालमेल बिठाएगी।

2026-27 तक बन जाएँगे सिस्टम

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने बताया है कि सेना AI और मशीन लर्निंग के यह सिस्टम्स 2026-27 तक बनाना चाह रही है। सेना ने इस मिशन के लिए डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ इनफार्मेशन सिस्टम्स (DGIS) के तहत एक AI लैब बनाई है। DGIS को देखने वाला अधिकारी तीन स्टार और लेफ्टिनेंट जनरल रैंक का अधिकारी होता है।

इसमें तेजी ऑपरेशन सिंदूर के बाद आई है। सेना ऐसे ऑपरेशन में ली गई सीख का इस्तेमाल AI को सिखाने में करना चाहती है, जिससे आगे अगर कभी ऐसी स्थिति बने तो वह तकनीकी तौर पर और सक्षम हो। अब AI के लिए एक टास्क फ़ोर्स भी बनाई जा रही है।

बच्चा नाम में लगा सकता है माँ का भी सरनेम, कलकत्ता हाई कोर्ट का फैसला: कहा-ये उसकी पहचान का हिस्सा, 14 साल की लड़की ने डाली थी याचिका

कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा है कि कोई बच्चा अपनी माँ का उपनाम भी अपने नाम में लगा सकता है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी बच्चे का नाम उसकी पहचान का अभिन्न हिस्सा है। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणियाँ एक नाबालिग बच्ची की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जो अपनी माँ का नाम अपने उपनाम के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती थी। हाई कोर्ट ने उसे माँ का उपनाम इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है।

क्या कहा कलकत्ता हाई कोर्ट ने?

कलकत्ता हाई कोर्ट ने बच्ची के नाम में माता का उपनाम लगाने की अनुमति देते हुए कहा, “यह निर्णय इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि एक बच्चे का उपनाम, उसकी पहचान और उसके व्यक्तिगत विकास का एक अभिन्न अंग है और अदालतों ने लगातार यह कहा है कि जब तक नाम या उपनाम में परिवर्तन किसी तीसरे पक्ष के हित ना प्रभावित करता हो और बच्चे के हित में माँगा गया हो, तो इसकी अनुमति दे देनी चाहिए।”

हाई कोर्ट ने इसके बाद 14 वर्षीय बच्ची को अपने उपनाम में पिता की जगह माँ का उपनाम लिखने की अनुमति दे दी। हालाँकि, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता का नाम किसी सरकारी दस्तावेज से निकाले जाने का असर उसके जैविक पिता के अधिकारों पर नहीं पड़ेगा।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नाम में बदलाव के बावजूद लड़की अपनी पिता की सम्पत्ति की विरासत और बाकी मामलों में अधिकार रखेगी। हाई कोर्ट ने इसी के साथ चंद्रनगोर म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन को यह आदेश दिया कि नए उपनाम वाला यह जन्म प्रमाण पत्र 4 सप्ताह के भीतर 14 वर्षीय बालिका को जारी किया जाए।

क्या था मामला?

कलकत्ता हाई कोर्ट में माँ का उपनाम लेने सम्बन्धित यह याचिका एक 14 वर्षीय बालिका ने डाली थी। बालिका वर्तमान में कक्षा 9 की एक छात्रा है। बच्ची अपने माता-पिता के बीच तलाक के बाद माँ के साथ रहती है। बच्ची के माता-पिता का 2015 में तलाक हुआ था।

तलाक के बाद बच्ची और उसकी माँ ने ‘चटर्जी’ के जगह पर उपनाम ‘भट्टाचार्य’ को अपनाया। इसके चलते बच्ची के सरकारी दस्तावेजों में कहीं उपनाम चटर्जी तो कहीं भट्टाचार्य हो गया। उसने अपने उपनाम को बदलने के लिए नगर निगम को याचिका डाली थी, लेकिन उसकी इस अपील को इनकार कर दिया गया।

इसके बाद बच्ची ने हाई कोर्ट का रास्ता अपनाया। यहाँ बच्ची के पिता से भी जवाब माँगा गया लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। कोर्ट के भीतर नगर निगम ने दावा किया कि गृह मंत्रालय के नियमानुसार बच्चे का नाम नहीं बदला जा सकता। हालाँकि, बच्ची के वकील ने इसके विरोध में एक और ऐसे ही मामले का उदाहरण दिया।

इसके बाद कोर्ट ने दोनों पक्ष को सुनते हुए बच्ची के पक्ष में निर्णय दिया।

101 साल का कॉमरेड नहीं रहा: केरल को ‘इस्लामी राज्य’ बनाने की साजिशों का किया था खुलासा, 26/11 के बलिदानी मेजर के परिवार का CM रहते किया था अपमान

केरल के पूर्व मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन का 101 की उम्र में तिरुवनंतपुरम के एक निजी अस्पताल में सोमवार (21 जुलाई 2025) को निधन हो गया। उम्र संबंधित बीमारियों के कारण वह पिछले काफी समय से बीमार थे। 26 जून 2025 को हार्ट अटैक आने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

अच्युतानंदन 2019 से राजनीति में सक्रिय नहीं थे। वह पिछले कई सालों से अपने बेटे के घर पर रहते थे। अच्युतानंदन 2006 से 2011 तक CPI-M की सरकार के दौरान केरल के मुख्यमंत्री रहे थे।

केरल को ‘इस्लामी राज्य’ बनने की साजिश की खोली थी पोल

वामपंथी नेता अच्युतानंदन ने केरल को 2040 तक ‘इस्लामी राज्य’ बनाने की साजिशों का खुलासा भी किया था। इसका वीडियो साल 2023 में बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने भी एक्स/ट्विटर पर शेयर किया था।

27 सेकेंड का यह वीडियो 24 जुलाई 2010 को दिल्ली में अच्युतानंदन के प्रेस वार्ता का था। वीडियो में वे केरल को अगले 20 सालों में इस्लामी राज्य बनाने की साजिशों का जिक्र करते सुनाई पड़ रहे हैं।

वीडियो में अच्युतानंदन बताते हैं इस्लामी कट्टरपंथियों की योजना अगले 20 साल में केरल को मुस्लिम राज्य बनाने की है। इसके लिए वे युवाओं का माइंडवाश कर रहे हैं। उन्हें पैसे दे रहे हैं। मुस्लिम आबादी बढ़ाने के लिए युवाओं को हिंदू लड़कियों से शादी करने के लिए उकसाया जा रहा है। कम्युनिस्ट नेता ने बताया था कि इस्लामी कट्टरपंथियों की तरकीबें काम भी कर रही हैं और राज्य में उनकी आबादी भी बढ़ रही है।

इस वीडियो को ‘द केरल स्टोरी’ फिल्म में भी दर्शाया गया था। लेकिन सेंसर बोर्ड ने इस हिस्से को फिल्म से हटा दिया था। वैसे यह दृश्य फिल्म के टीजर में भी शामिल था।

बलिदानी मेजर संदीप उन्नीकृष्णन का किया था अपमान

मुंबई में हुए 26/11 हमले में केरल के रहने वाले NSG कमांडो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन ने बलिदान हो गए थे। उस समय वीएस अच्युतानंदन ही केरल के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने बलिदानी मेजर और उनका परिवार का अपमान भी किया था।

अच्युतानंदन ने कहा था, “क्या ये कहीं का नियम है कि कर्नाटक और केरल के मुख्यमंत्री को साथ में दौरा करना चाहिए? अगर वो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन का घर नहीं होता तो उसकी तरफ एक कुत्ता भी नहीं देखता। उनके परिवार के साथ हमारा जुड़ाव खास है। एक सैनिक के पिता होने के नाते के उन्नीकृष्णन को ये नहीं समझना चाहिए क्या?” केरल सरकार की तरफ से बलिदानी मेजर के अंतिम संस्कार में भी कोई नेता नहीं गया था।

आगरा धर्मांतरण गैंग के कई गुर्गे हिंदू से बने हैं मुस्लिम, जवान लड़कियों को ही करते थे टारगेट: जिनको इस्लाम कबूल करवाया, उनको दिया ‘रिवर्ट’ कोड नेम

आगरा मामले में गिरफ्तार धर्मांतरण गिरोह ने धर्मांतरण का शिकार बन चुके लोगों के लिए कोडवर्ड बनाए था। जिन लोगों का धर्मांतरण यह गैंग कर लेता था, उन्हें ‘रिवर्ट नाम दे दिया जाता था। गिरोह के लिए इससे धर्मांतरण किए जा चुकी युवतियों की पहचान करना आसान होता था। उनके सोशल मीडिया पर भी ‘रिवर्ट’ नाम से अकाउंट बना दिए जाते।

इस धर्मांतरण गैंग मामले में पकड़े गए लोगों से पुलिस पूछताछ में यह भी सामने आया कि यह गिरोह केवल ‘बालिग’ युवतियों को निशाना बनाता था। इससे उन्हें अपने साथ ले जाने में परेशानी नहीं होती थी। कोर्ट में भी वह खुद को बालिग बताकर परिवार से दूर जा सकती थी।

इसका फायदा यह भी है बाद में यही युवतियाँ अपने संपर्क में आने वाली बाकी लड़कियों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित करती थीं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, धर्मांतरण के बाद युवतियों का घर वापस जाना मुश्किल हो जाता था। धर्मांतरण कराने से पहले अखबार में विज्ञापन तक दिया जाता था।

यह गैंग इसके बाद कोर्ट में अर्जी लगाकर दस्तावेज तैयार करवा लेता था और यहाँ तक कि निकाह तक करवाता था।

गैंग वाले भी पहले थे हिन्दू

इस धर्मांतरण गैंग में शामिल 10 लोगों में से 6 पहले हिंदू थे। इन्होंने धर्म परिवर्तन कर अपने नाम भी बदल लिए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एसबी कृष्णा ने नाम बदलकर आयशा, रुपेंद्र बघेल ने अबु रहमान, मनोज ने मुस्तफा, शेखर रॉय ने अली हसन और पियुष सिंह पँवार ने मोहम्मद अली नाम रख लिया।

इसके बाद यह दूसरों फँसाने लगे। असल में पूरे गैंग का काम करने का तरीका यही था कि पहले यह पढ़ी लिखी महिलाओं को फँसाता और फिर उनसे भी धर्मांतरण का काम करवाता। आगरा में जिस बड़ी बहन को फँसाया गया, वह अभी तक इस धर्मांतरण गैंग के पक्ष में बोल रही है।

पुलिस ने बड़ी बहन से की पूछताछ

कोलकाता की मुस्लिम बस्ती से रेस्क्यू की गई आगरा की दोनों सगी बहनों से पुलिस ने पूछताछ की। उन्होंने घर जाने के लिए शर्त रख दी। कहा कि जब तक पकड़े गए लोगों को छोड़ा नहीं जाएगा वे घर नहीं जाएँगी। बहनों ने कहा कि पकड़े गए लोगों का कोई कसूर नहीं है। बहनों का कहना है कि यह लोग धर्म के लिए काम करते हैं और अगर वे जेल चले गए तो उन्हें जन्नत भी नसीब नहीं होगी।

कोलकाता में बनाया धर्मांतरण करने वालों के लिए ‘सेफ जोन’

जाँच में यह तक सामने आया है कि आगरा की दो सगी बहनों को कोलकाता तक पहुँचाया गया था। बताया गया कि दोनों बहनें घर से ₹25 हजार और कुछ गहने लेकर भागी थीं। दोनों बस से दिल्ली, मुजफ्फरनगर, समस्तीपुर होते हुए कोलकाता पहुँचीं। कोलकाता में ओसामा नाम के युवक ने बहनों को होटल दिलाया।

फिर कोलकाता की मुस्लिम बस्ती ‘तपसिया’ में कमरा दिलाने में भी मदद की। रिपोर्ट्स में सामने आया कि कमरा ₹6 हजार महीने किराए पर लिया था। ₹30 हजार रुपए एग्रीमेंट में दिए थे। अली हसन ने दोनों बहनों का धर्मांतरण प्रक्रिया शुरू करवाई।

गिरोह ने बहनों को नौकरी की तलाश में भी मदद की। धर्मांतरण में आने वाले लोगों के लिए इसे ‘सेफ जोन’ कहा जाता था। दोनों बहनों को यहाँ दीन की तालीम भी दी गई। धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों का कोलकाता में वोटर आईडी और आधार कार्ड भी बनाए जाते थे। इन्हें वोट डालने का भी अधिकार मिल जाता था।

कश्मीर की साइमा ने बहनों का किया ब्रेनवॉश

दोनों सगी बहनों में 33 साल की बड़ी बहन ने पुलिस को बताया कि वह Msc जूलॉजी से MPhil कर चुकी है। साल 2020 में नेट की तैयारी के लिए कोचिंग में दाखिला लिया था। तभी कश्मीर स्थित उधमपुर निवासी साइमा उर्फ खुशबू से दोस्ती हुई।

साइमा ने ही बड़ी बहन को इस्लाम अपनाने के लिए भड़काना शुरू किया। साइमा ने बुर्का पहनने से लड़कियों की हिफाजत होने की बात कही। इसके अलावा कहा कि इस्लाम अपनाने से जन्नत का रास्ता आसान होता है

12वीं फेल अबु रहमान ने यूट्यूब पर चलाई धर्मांतरण की मुहिम

पुलिस की गिरफ्त में आए 10 आरोपितों में से अबू रहमान इस गैंग का सरगना है। रहमान के यूट्यूब चैनल पर धर्मांतरण कर चुकी युवतियों के वीडियो मिले हैं। इन वीडियो में इस्लाम का प्रचार किया जा रहा है। यूट्यूब चैनल पर 1.69 सबस्क्राइबर्स और 1500 से अधिक वीडियो हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार, अबु रहमान सराय ख्वाजा का रहने वाला है। वह जूतों के स्टीकर बनाने का काम करता था। इसके साथ ही यूट्यूब चैनल पर धर्मांतरण की मुहिम भी चला रहा था। रहमान 12वीं फेल है, लेकिन यूट्यूब वीडियो पर वह अंग्रेजी बोलता दिखता है।

जानें पूरा मामला

हाल ही में आगरा में धर्मांतरण गिरोह का भंडाफोड़ किया गया। इस गिरोह के तार पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। इन्हें कनाडा, UAE और अमेरिका से फंडिंग मिलती थी। यह मामला आगरा की दो लापता बहनों की जाँच से सामने आया।

जाँच में 7 लोगों के खिलाफ सबूत मिले। उनके खिलाफ वारंट जारी हुए। फिर पुलिस ने 11 टीमें छह राज्यों में भेजीं। आगरा पुलिस ने यूपी, गोवा, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, दिल्ली और राजस्थान में छापे मारे। आखिर में कोलकाता की मुस्लिम बस्ती से बहनों को रेस्क्यू किया गया। यहाँ से धर्मांतरण कराने वाले गिरोह के 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

₹1890000000 इस मॉनसून सत्र में बर्बाद करेगा विपक्ष? मोदी सरकार ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर चर्चा को तैयार, फिर भी जारी है हुड़दंग: जानिए कैसे हंगामा बनी परिपाटी

सोमवार (21 जुलाई, 2025 को संसद का मॉनसून सत्र चालू हो गया है। यह सत्र 21 जुलाई 2025 से 21 अगस्त, 2025 तक चलेगा। 32 दिनों वाले इस सत्र में 21 बार संसद की बैठक होगी। विपक्ष के हंगामे के चलते संसद का पहला दिन ही कामकाज के मामले में ठप हो गया। पहले प्रश्न काल के दौरान व्यवधान हुआ तो 12 बजे तक लोकसभा की कार्यवाही रोकी गई, फिर हंगामे के चलते लोकसभा की कार्यवाही 2 बजे तक रोक दी गई।

संसद में हंगामा और कार्यवाही रुकना कोई विचित्र बात नहीं है। दुनिया भर की सांसदों में यह होता है। लेकिन लगातार पूरे-पूरे दिन संसद ना चलने देना और पहले बैठकों में सहमति बनाने के बाद भी डेडलॉक पैदा करना भारत के विपक्ष की आदत बन गई है। अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि लोग पहले ही बता देते हैं कि संसद का सत्र चालू होने से पहले या तो कोई रिपोर्ट आएगी या कोई ऐसा मुद्दा उठेगा जिस पर हंगामा होगा, इसके बाद संसद सत्र बर्बाद होगा।

कार्यवाही रुकना यानी करोड़ों की बर्बादी

मॉनसून सत्र का पहले ही दिन हंगामा भरा होना कोई शुभ संकेत नहीं है। यह सत्र 32 दिन चलने वाला है और इसमें 21 दिन संसद की बैठक होगी। नियमानुसार, हर दिन संसद के दोनों सदन 6 घंटे काम करते हैं। यह समय घट-बढ़ भी सकता है।

लेकिन 21 दिन भी संसद चले और 6 घंटे भी काम करे तो इस पर भारी-भरकम खर्च होता है। यह खर्च जनता के पैसे का होता है, जिसे हम टैक्स कहते हैं। लोकसभा के पूर्व महासचिव PDT आचार्य ने कई वर्षों पहले बताया था कि संसद का एक मिनट चलाने पर भी ₹2.5 लाख का खर्च होता है।

इसमें सांसदों की तनख्वाह, बिजली-पानी के बिल समेत बाकी खर्च शामिल होते हैं। यह खर्च अभी तक काफी बढ़ गया होगा। लेकिन ₹2.5 लाख खर्च आज भी प्रति मिनट माना जाए, तो इस मॉनसून सत्र पर सैकड़ों करोड़ खर्च होने वाले हैं।

सीधी गणित के हिसाब से इस संसद सत्र पर ₹2.5 लाख/मिनट के हिसाब से ₹189 करोड़ खर्च होने हैं। 21 दिन में संसद 126 घंटे चलने वाली है। यानी इसकी कार्रवाई 7560 मिनट चलेगी। इन 7560 मिनटों को ₹2.5 लाख से गुना करे तो यह ₹189 करोड़ की धनराशि खर्च होगी।

संसद के खर्च इसके अलावा और भी होते हैं, जैसे सांसदों को संसद सत्र के दौरान आने का हर दिन का ₹2500 भत्ता भी मिलता है। ऐसे में यह खर्च बढ़ता ही है, देश के लोकतंत्र के मंदिर पर खर्च हो, इससे किसी को ऐतराज नहीं है, लेकिन जिस तरह से इस सत्र की शुरुआत हुई है उससे अच्छे आसार नहीं लगते।

सरकार इस सत्र के पहले हुई सर्वदलीय बैठक में कह चुकी है कि वह ऑपरेशन सिंदूर समेत सभी मुद्दों पर बात करने को तैयार है। विपक्ष की माँग थी कि इस दौरान बिहार में चुनाव आयोग की पुनरीक्षण प्रक्रिया पर बात हो और एअर इंडिया हादसे को लेकर भी बात हो।

सरकार ने इसके लिए भी हामी भरी थी। हालाँकि, पहला दिन ही हंगामे की भेंट चढ़ा दिया गया। ऐसे में यह आशंका और गहरी हो जाती है कि इस बार भी जनता ठगी सी रह जाएगी और लगभग ₹200 करोड़ को सिर्फ तख्तियों और हंगामों में सिमटता देखेगी।

पहले के सत्र भी हो चुके बर्बाद

यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब संसद का सत्र शुरू होने से पहले ही उसे बर्बाद करने की ठान ली गई हो। विपक्ष ने इस बार मॉनसून सत्र मुद्दा बिहार में चुनाव आयोग की प्रक्रिया और ऑपरेशन सिंदूर तथा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान बनाए हैं लेकिन इससे पहले भी हर बार संसद सत्र को बर्बाद करने की पटकथा लिख ली जाती है।

विपक्ष ने पेगासस स्नूपिंग के आधारहीन आरोपों के लेकर राफेल और अडानी-हिंडनबर्ग तक के मुद्दे उठाए हैं। यह मुद्दे संसद क सत्र बर्बाद करने में बड़ा कारण रहे हैं। बजट सत्र 2023 को बर्बाद करने के लिए कॉन्ग्रेस और विपक्ष ने अडानी के खिलाफ हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा प्रकाशित हिट जॉब वाली रिपोर्ट मुद्दा उठाया था और पूरा सत्र बर्बाद कर दिया था।

इसी सत्र के पहले BBC की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बनाई प्रोपेगेंडा डाक्यूमेंट्री को लेकर भी बवाल विपक्ष ने किया था। 2023 के ही शीत सत्र के पहले एप्पल फोन की नोटिफिकेशन पर बवाल विपक्ष ने मचाया था। हालाँकि, यह मुद्दा बड़ा बनता लेकिन एप्पल ने सफाई दे दी।

इससे भी 2021 में मॉनसून सत्र के पहले पेगासस की स्टोरी को लेकर बवाल मचाया गया था और दावा किया गया था कि सरकार स्नूपिंग में लिप्त है। यह कहानी बाद में झूठी निकली लेकिन संसद का सत्र बर्बाद हो गया। इसमें भी जनता का अरबों रुपया बर्बाद हुआ।

2021 में राहुल गाँधी ने राफेल विमान खरीद में घोटाले का कथित मामला उठाया। यह विदेशी मीडिया में कुछ रिपोर्ट्स आने के बाद उठाया गया था। इसको लेकर 2021 में संसद के सत्र हंगामे भरे रहे। राफेल मामले में हवा-हवाई दावे संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक नहीं टिक पाए। लेकिन संसद का समय बर्बाद होता गया।

इस दौरान जिस समय का उपयोग देश में नए कानून की चर्चा, पुराने कानूनों में सुधार करने और जनता के प्रश्न उठाने के लिए होना चाहिए था, उसका उपयोग विपक्ष ने तख्तियाँ उछालने और हंगामा मचाने में किया। विपक्ष ने इस दौरान कई मौकों पर डेडलॉक की स्थिति पैदा की और संसदीय काम जहाँ का तहाँ लटक गया।

क्यों चिंताजनक है यह ट्रेंड?

संसद को चलाना पक्ष और विपक्ष दोनों की बराबर की जिम्मेदारी होती है। संसद का कम दिनों चलना और कम काम करना चिंताजनक इसलिए भी है कि इससे व्यवस्था के दूसरे हिस्सों को प्रभाव बढ़ाने का मौक़ा मिलता है। एक रिपोर्ट बताती है कि जहाँ पहली लोकसभा (1952-57) साल में 135 दिन बैठी तो वहीं 17वीं लोकसभा (2019-24) मात्र 55 दिन चली।

इससे भी चिंताजनक यह ट्रेंड है कि इन 17वीं लोकसभा का लगभग 50% समय हंगामे और बवाल की भेंट चढ़ गया। इससे जहाँ एक ओर जनता का पैसा बर्बाद होता है तो वहीं दूसरी तरफ महत्वपूर्ण विधेयकों पर तक चर्चा नहीं हो पाती।

ऐसे में विपक्ष को सिर्फ हंगामे की जगह अपने तर्क और सबूत के आधार पर संसद में सरकार को घेरने की नीति बनानी चाहिए ना कि कार्यवाही पर ही ग्रहण लगा देना चाहिए। इससे जनता का विश्वास बढ़ेगा ही, देश का लोकतंत्र मजबूत होगा और सरकारी पैसे की बर्बादी रुकेगी।

पहलगाम में हिंदुओं का नरसंहार करने वालों को NYT ने नहीं कहा ‘आतंकवादी’, अमेरिकी संसद की कमिटी ने लगाई लताड़: कहा- कत्लेआम करने वालों को छूट नहीं

अमेरिकी निचली सदन की विदेश मामलों की एक समिति ने पहलगाम आतंकी हमले को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टिंग की आलोचना की है। कमेटी ने कहा, ” यह साफ तौर पर एक आतंकवादी हमला था। चाहे भारत हो या इजराइल, जब आतंकवाद की बात आती है, तो न्यूयॉर्क टाइम्स वास्तविकता से दूर हो जाता है।”

निचले सदन के प्रतिनिधि ब्रायन मास्ट की अध्यक्षता वाली समिति ने शनिवार (19 जुलाई 2025) को कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप ने उस पर बैन लगाया है। रेजिस्टेंस फ्रंट एक विदेशी आतंकवादी संगठन है और उस पर रोक जरूरी है।”

समिति ने कहा, “जब आप नागरिकों का कत्लेआम करते हैं, तो आपको छूट नहीं मिलती। सबके साथ न्याय होना चाहिए। पहलगाम में हुआ हमला एक आतंकवादी हमला था।”

समिति ने एक्स पर 22 अप्रैल को किए गए अपने पोस्ट का भी हवाला दिया, जब समिति ने पहलगाम हमले पर न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट की आलोचना की थी।

इस पोस्ट में हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी ने शीर्षक में ‘उग्रवादी’ शब्द को हटाकर उसके स्थान पर ‘आतंकवादी’ शब्द रख दिया गया और उसे बोल्ड कर दिया।

प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों की समिति ने टीआरएफ को ग्लोबल टेरर संगठन घोषित करने का स्वागत भी किया है। पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा टीआरएफ यानी द रेजिस्टेंस फ्रंट पर हाल ही में अमेरिका ने प्रतिबंध लगा दिया है। अमेरिका ने द रेजिस्टेंस फ्रंट को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया था।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने टीआरएफ के खिलाफ कार्रवाई की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि ट्रंप सरकार ने आतंकवाद से लड़ने और पहलगाम हमले में न्याय दिलाने के लिए ये निर्णय लिया है।

मेरिका ने एक प्रेस स्टेटमेंट जारी कर TRF को आतंकी संगठन घोषित किया

भारतीय विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका ने TRF को आतंकी संगठन घोषित करके अच्छा किया। उन्होंने X पर लिखा कि यह भारत और अमेरिका के बीच आतंकवाद के खिलाफ मजबूत रिश्ते का सबूत है। जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और अमेरिकी विदेश विभाग की तारीफ भी की।

क्या है टीआरएफ, कैसे काम करता है?

लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा और प्रॉक्सी संगठन टीआरएफ ने 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में हुए हमले की जिम्मेदारी ली थी। इस दर्दनाक हमले में 26 नागरिक मारे गए थे।

टीआरएफ सीधे-सीधे बड़ा संगठन नहीं है। यह छोटे-छोटे आतंकी समूहों की तरह काम करता है, जिन्हें टेरर मॉड्यूल कहते हैं। इनमें फाल्कन स्क्वाड जैसे नाम शामिल हैं।

ये समूह किसी खास काम के लिए तैयार होते हैं और काम खत्म होने के बाद या तो खत्म हो जाते हैं या अपना चेहरा बदल लेते हैं। टीआरएफ के आतंकी बहुत चालाक होते हैं। वे आम लोगों की तरह रहते हैं।

हमला करने से पहले वे अपनी जगह की रेकी करते हैं, यानी वहाँ की पूरी जानकारी जुटाते हैं। फिर वे हथियार इकट्ठा करते हैं और ट्रेनिंग लेते हैं। हमले के बाद वे अपने हथियार छिपा देते हैं और घाटियों या जंगलों में छिप जाते हैं।

SP MLA इकबाल महमूद ने काँवड़ यात्रा को ‘महापर्व’ बताने की आड़ में की बदजुबानी, काँवड़ियों को बताया ‘गुंडा-मवाली’: कहा- 2027 में सपा सरकार में किए जाएँगे ‘अलग इंतजाम’

उत्तर प्रदेश में काँवड़ यात्रा के पावन अवसर पर समाजवादी पार्टी (सपा) के संभल से विधायक इकबाल महमूद ने एक बार फिर अपनी जहरीली जुबान से सनातन धर्म और शिवभक्तों को अपमानित करने का घिनौना काम किया है। काँवड़ यात्रा को आस्था का महापर्व बताने की आड़ में इकबाल महमूद ने शिवभक्तों को ‘गुंडा’ और ‘मवाली’ करार दे दिया।

इतना ही नहीं इकबाल महमूद ने 2027 में सपा की सरकार बनने की धमकी देते हुए कहा कि तब काँवड़ियों के लिए ‘अलग इंतजाम’ किए जाएँगे। यह बयान न सिर्फ सपा की सांप्रदायिक मानसिकता को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि यह पार्टी गुंडागर्दी और नफरत की राजनीति की असली पोषक है।

इकबाल महमूद ने एक चैनल से बातचीत में काँवड़ यात्रा को निशाना बनाते हुए कहा, “इसमें शिवभक्तों से ज्यादा गुंडे और मवाली हैं, जो सड़कों पर बदतमीजी और तोड़फोड़ करते हैं।” उन्होंने मुजफ्फरनगर की एक घटना का जिक्र करते हुए दावा किया कि काँवड़ियों ने स्कूल वैन पर हमला किया।

यह बयान न सिर्फ शिवभक्तों की आस्था पर चोट है, बल्कि लाखों काँवड़ियों की श्रद्धा को बदनाम करने की साजिश भी है। इकबाल ने धमकी भरे लहजे में कहा कि 2027 में सपा की सरकार बनेगी और तब काँवड़ियों को ‘सबक’ सिखाया जाएगा। यह साफ है कि सपा की नजर में श्रद्धालु नहीं, बल्कि सिर्फ वोटबैंक की राजनीति मायने रखती है।

सपा की यह करतूत कोई नई बात नहीं है। पार्टी के नेता पहले भी हिंदू धर्म, मंदिरों और आस्था के प्रतीकों पर विवादित बयान देकर माहौल बिगाड़ते रहे हैं। चाहे वह महबूब अली का मुस्लिम आबादी बढ़ने का दंभ हो या इंद्रजीत सरोज का मंदिरों और देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी, सपा बार-बार साबित करती है कि वह सांप्रदायिकता और नफरत की राजनीति की असली ठेकेदार है। इकबाल महमूद का ताजा बयान भी इसी कड़ी का हिस्सा है, जो काँवड़ यात्रा जैसे पवित्र आयोजन को बदनाम करने की कोशिश है।

इस बीच, सीएम योगी आदित्यनाथ ने काँवड़ यात्रा को बदनाम करने वालों को कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि उपद्रवियों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। यात्रा मार्ग पर सीसीटीवी और ड्रोन से निगरानी की जा रही है, ताकि अराजक तत्वों को बेनकाब किया जाए। योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के तहत गुंडागर्दी करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि सपा जैसे दल जो खुद को ‘गुंडों की पार्टी’ साबित कर चुके हैं, क्या ऐसी कार्रवाई से सबक लेंगे?

इकबाल महमूद का यह बयान न सिर्फ काँवड़ियों, बल्कि पूरे हिंदू समाज के लिए अपमानजनक है। सपा की हरकत दिखाती है कि वह आस्था और संस्कृति का सम्मान करने के बजाय, समाज को बाँटने और नफरत फैलाने में विश्वास रखती है। साल 2027 की धमकी देकर सपा ने अपनी मंशा साफ कर दी है कि वह सत्ता के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है।

ऑपरेशन सिंदूर, नक्सलवाद, मेड-इन-इंडिया और अर्थव्यवस्था… ‘मानसून सत्र’ से पहले PM मोदी ने मीडिया से की बात, कहा- ये ‘विजय उत्सव का सत्र’ है

मानसून सत्र से पहले पीएम मोदी ने देश की उपलब्धि को गिनवाया है। मानसून सत्र से पहले पीएम मोदी ने देश की उपलब्धि को गिनवाया है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर भारत के कदम रखने और ऑपरेशन सिंदूर में देश के पराक्रम की बात कही।

उन्होंने कहा कि इस दशक में शांति और प्रगति देखी गई, लाल गलियारा अब हरित विकास क्षेत्र में बदल रहा है। 2014 से पहले मुद्रास्फीति दर दहाई अंक में हुआ करती थी, अब यह लगभग दो प्रतिशत है। मानसून सत्र में पीएम ने विपक्ष से सकारात्मक बहस का आह्वान किया है।

उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर को पूरी तरह सफल बताते हुए कहा कि भारत की सैन्य शक्ति का, भारत के सैन्य के सामर्थ्य का रूप दुनिया देख रहा है। भारत की सेना ने जो लक्ष्य निर्धारित किया था, वह 100 फीसदी हासिल किया।

आतंकियों के घर में घुसकर 22 मिनट में उसे ध्वस्त कर दिया। बिहार के कार्यक्रम के दौरान जो घोषणा की थी, बहुत ही कम समय में सेना ने वो कर के दिखा दिया। मेक इन इंडिया की ताकत पूरी दुनिया ने देखी है।

पीएम ने कहा कि पहलगाम में हुए क्रूर नरसंहार ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया और आतंकवाद तथा उसके केंद्र की ओर वैश्विक ध्यान आकर्षित किया। दलगत भावना से ऊपर उठकर, पूरे भारत के प्रतिनिधि पाकिस्तान की भूमिका को उजागर करने के लिए एकजुट हुए

उन्होंने कहा, “हमारी सैन्य शक्ति में बहुत ही दमखम है ये दिखा दिया। इसमें मेड इन इंडिया सैन्य शक्ति का नया औजार पर दुनिया अचंभित है। मेड इन इंडिया रक्षा उपकरण बन रहे हैं उससे भारत की सैन्य शक्ति को बल मिलेगा। नौजवानों के रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा।”

नक्सलवाद का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “आज नक्सलवाद का दायरा तेजी से सिकुड़ रहा है। माओवाद और नक्सलवाद को पूरी तरह उखाड़ने का काम तेज गति से चल रहा है। मैं गर्व से कह सकता हूँ कि देश में सैकड़ों जिले नक्सल की चपेट से निकल कर मुक्ति का साँस ले रहे हैं। “

पीएम ने भारत की अर्थव्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि पहले हम दुनिया में 10वें नंबर की अर्थव्यवस्था थे, लेकिन अब हम दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं।

पीएम ने कहा, “देश ने एक स्वर का सामर्थ्य क्या होता है ये देखा है, इसलिए सदन में भी ये स्वर निकले। दल हित में मन मिले न मिले लेकिन देशहित में मन जरूर मिले। इसलिए देश की प्रगति को आगे ले जाने वाले बिल को पास करें।”

पीएम ने कहा, “बारिश हर परिवार की अर्थव्यवस्था के लिए अहम है। आने वाले दिनों में देश को इससे काफी फायदा मिलेगा। मानसून सत्र देश के लिए गौरवपूर्ण सत्र है। मानसून नवीनता और नवसृजन का प्रतीक है। अब तक की खबरों के मुताबिक देश में मौसम बहुत ही अच्छे ढंग से आगे बढ़ रहा है। बारिश किसानों की अर्थव्यवस्था,देश की अर्थव्यवस्था और हर परिवार की अर्थव्यवस्था के लिए अहम है। “

देश के साथ खड़े हुए शशि थरूर तो केरल कॉन्ग्रेस ने बंद किया दरवाजा: पूर्व मंत्री बोले- वे अब हमारे नहीं, पार्टी कार्यक्रमों में तिरुवनंतपुरम MP को नहीं करेंगे आमंत्रित

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता के. मुरलीधरन ने रविवार को तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर को लेकर बड़ा बयान दिया, जिसने पार्टी के भीतर हलचल मचा दी। मुरलीधरन ने साफ कहा कि जब तक थरूर राष्ट्रीय सुरक्षा पर अपना रुख नहीं बदलते, उन्हें तिरुवनंतपुरम में कॉन्ग्रेस के किसी भी कार्यक्रम में नहीं बुलाया जाएगा।

के मुरलीधरन ने शशि थरूर को चेतावनी देते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस कार्यसमिति (CWC) के सदस्य होने के बावजूद अब उन्हें ‘हम में से एक’ नहीं माना जाता। मुरलीधरन ने यह भी कहा कि थरूर के खिलाफ आगे की कार्रवाई का फैसला पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व करेगा।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब थरूर ने कोच्चि में एक कार्यक्रम में कहा कि देश और उसकी सीमाओं की सुरक्षा पहले आती है और पार्टियाँ सिर्फ देश को बेहतर बनाने का माध्यम हैं। उन्होंने हाल के घटनाक्रमों में सशस्त्र बलों और केंद्र सरकार के रुख का समर्थन किया था, जिसकी वजह से उनकी अपनी पार्टी में आलोचना हो रही है।

शशि थरूर ने कहा, “मैं अपने रुख पर कायम हूँ, क्योंकि यह देशहित में है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए दूसरी पार्टियों से सहयोग की बात करने पर उनकी अपनी पार्टी को यह विश्वासघात लगता है, जो एक बड़ी समस्या है।

मुरलीधरन ने पहले भी थरूर की आलोचना की थी। हाल ही में एक सर्वेक्षण में थरूर को यूडीएफ की ओर से केरल के मुख्यमंत्री पद का पसंदीदा चेहरा बताया गया था, जिस पर मुरलीधरन ने तंज कसते हुए कहा था कि थरूर को पहले अपनी पार्टी की पहचान तय करनी चाहिए। इसके अलावा थरूर के एक लेख में इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गाँधी की भूमिका पर टिप्पणी को लेकर भी मुरलीधरन ने उनसे स्पष्ट राजनीतिक रास्ता चुनने को कहा था।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद थरूर के बयानों ने पार्टी को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर किया, जिससे उनके और कॉन्ग्रेस नेतृत्व के बीच तनाव बढ़ गया। यह घटनाक्रम कॉन्ग्रेस के भीतर विचारधारा और नेतृत्व को लेकर गहरी खींचतान को दर्शाता है। पार्टी के कई नेता मानते हैं कि थरूर का रुख पार्टी लाइन से हटकर है, जिससे आंतरिक एकता पर सवाल उठ रहे हैं।