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डोनाल्ड ट्रंप की धमकी के बाद भारत नहीं खरीद रहा रूसी तेल, ऐसा नरेटिव गढ़ रहा था रॉयटर्स समेत वेस्टर्न मीडिया: लेकिन इस प्रोपेगेंडा की खुल गई पोल, जानिए – क्या है सच्चाई

रिपोर्ट में सीधे तौर पर अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों का ज़िक्र किया गया था। साफ है कि रिपोर्ट का मकसद यह दिखाना था कि भारत, अमेरिका या ट्रंप की धमकियों के जवाब में झुक गया है।

भारत और अमेरिका में टैरिफ को लेकर जारी तनातनी के बीच रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से दावा किया था कि भारत की सरकारी तेल कंपनियों ने एक हफ्ते से रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दिया है। 31 जुलाई को प्रकाशित की गई इस रिपोर्ट में सीधे तौर पर अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों का ज़िक्र किया गया था। साफ है कि रिपोर्ट का मकसद यह दिखाना था कि भारत, अमेरिका या ट्रंप की धमकियों के जवाब में झुक गया है।

हालाँकि, रॉयटर्स का यह प्रोपेगेंडा केवल कुछ ही घंटों तक टिक पाया। समाचार एजेंसी एएनआई ने अब सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि भारतीय तेल रिफाइनरियाँ अभी भी रूस से तेल खरीद रही हैं। एएनआई की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कंपनियों के आपूर्ति संबंधी फैसले कीमत, कच्चे तेल की श्रेणी, भंडार, लॉजिस्टिक्स और अन्य आर्थिक कारकों के आधार पर ही तय किए जाते हैं।

‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट में भी तेल खरीदने की नीति में कोई बदलाव ना होने का दावा किया है। इसका मतलब साफ है कि भारत को तेल खरीदना है या नहीं, यह फैसले बाहरी दबाव के बजाय भारत के हितों के आधार पर लिया जाता है।

रॉयटर्स का क्या था दावा?

रॉयटर्स ने दावा किया था कि इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम और मंगलौर रिफाइनरी पेट्रोकेमिकल लिमिटेड ने पिछले एक हफ्ते से रूसी तेल नहीं खरीदा है। रिपोर्ट में कहा गया कि रूस से नियमित तेल खरीदने वाली ये कंपनियाँ अब मध्य पूर्वी देशों जैसे अबू धाबी के मुरबान क्रूड और पश्चिम अफ्रीकी तेल की खरीद कर रही हैं। इस रिपोर्ट में ट्रंप की रूसी कच्चा तेल खरीदने पर 100% टैरिफ लगाने की धमकी का भी ज़िक्र किया था।

एएनआई की रिपोर्ट में क्या कहा गया है?

युद्ध की आशंकाओं और अमेरिकी टैरिफ के बाद मची खलबली के बीच एएनआई की रिपोर्ट में बताया गया है कि इस चुनौतीपूर्ण समय में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का पूरी तरह से पालन करते हुए सस्ती ऊर्जा प्राप्त करने के लिए अपने स्रोतों को रणनीतिक रूप से अपने हिसाब से ढाला है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता भारत अपनी ऊर्जा पूर्ति के लिए 85% कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है।

एएनआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत ने रियायती रूसी कच्चा तेल नहीं खरीदा होता तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें मार्च 2022 के 137 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के शिखर से कहीं ज्यादा बढ़ सकती थी जिससे दुनियाभर में महंगाई बढ़ने का खतरा था। गौरतलब है कि रूसी तेल पर कभी प्रतिबंध नहीं लगाया गया है और ना ही अमेरिका या यूरोपीय संघ द्वारा इसे अभी भी प्रतिबंधित किया गया है।

वहीं, ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि शनिवार को दो वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों ने कहा कि भारत की तेल खरीदने की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। रिपोर्ट में एक अधिकारी के हवाल से दावा किया गया है कि सरकार ने तेल कंपनियों को रूस से आयात कम करने का कोई निर्देश नहीं दिया है।

ट्रंप ने दी थी भारत को धमकी

ट्रंप ने पिछले हफ्ते कहा था कि अगर भारत रूसी कच्चे तेल का आयात बंद नहीं करता है तो वह उस पर एक अतिरिक्त जुर्माना लगाएंगे। इसके कुछ दिनों बाद ट्रंप ने कहा कि उन्होंने सुना है कि भारत, रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद कर रहा है। ट्रंप का दावा था कि अगर ऐसा होता है तो यह अच्छा कदम होगा।

भारत के हितों के आधार पर फैसला: विदेश मंत्रालय

भारतीय विदेश मंत्रालय ने रूसी तेल खरीदने को लेकर अपने रूख को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के हिसाब से फैसला करता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “भारत अपनी ऊर्जा जरूरत को पूरा करने के लिए बाजार में जो भाव मिलता है और वैश्विक हालात को देखकर ही फैसला किया जाता है।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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